Category: अपराध

  • बदनामशुदा पत्रकार संघ के अध्यक्ष शलभ भदौरिया को 3 साल जेल की सजा

    बदनामशुदा पत्रकार संघ के अध्यक्ष शलभ भदौरिया को 3 साल जेल की सजा


    भोपाल। मध्यप्रदेश की पत्रकारिता को अनैतिक ठकुरासी के इशारे पर कलंकित करने वाले शलभ भदौरिया को लंबे अंतराल के बाद अदालत ने दंडित किया है। पत्रकार और अदालतें तो बार बार इंगित करती रहीं हैं कि मध्यप्रदेश के चौथे स्तंभ में सुधार की जरूरत है लेकिन सत्ता माफिया के इस प्रतीक पुतुल ने लगभग तीन दशकों तक पत्रकारिता के चेहरे पर कालिख पुतवाने का काम जारी रखा। एमपी वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के शलाका पुरुष राधावल्लभ शारदा की जिजीविषा और धैर्य ने पत्रकारों के इस कलंक को अब उसके अंजाम तक पहुंचाने में सफलता पाई है। प्रेस जगत में अदालत के इस फैसले की भूरी भूरी प्रशंसा की जा रही है।

    इस अपराधी ने झूठे दस्तावेज पेश कर सरकारी विज्ञापन की राशि हडपी और डाक विभाग को भी धोखे में रखा था। राज्य आर्थिक अनवेषण ब्यूरो भोपाल ने इस शिकायत पर 23 फरवरी 2006 को प्रकरण क्रमांक 05/06 दर्ज किया था। जिसमें सुनवाई करते हुए प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश भोपाल ने आरोपी मध्यप्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ के अध्यक्ष शलभ भदौरिया को 3 साल के कारावास और 50 हजार रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई है।प्रकरण धारा 120बी, 420, 467, 468, 471 भादवि में दर्ज हुआ था।

    उल्लेखनीय है कि एमपी वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष राधावल्लभ शारदा ने वर्ष 2003 में राज्य आर्थिक अनवेषण ब्यूरो भोपाल में शिकायत दर्ज करवाई थी जिस पर माननीय न्यायालय ने अपना निर्णय सुनाया। इस प्रकरण में फरियादी गुलाब सिंह राजपूत थाना प्रभारी रा.आ.अप. अन्वेषण ब्यूरो भोपाल और संदेही/आरोपियों में शलभ भदौरिया एवं विष्णु वर्मा विद्रोही थे।सुनवाई के दौरान ही विष्णु वर्मा की मौत हो चुकी है। प्रकरण की विवेचना भोपाल इकाई के पुलिस अधीक्षक सुधीर लाड़ ने की।

    न्यायालय ने पाया कि आरोपियों ने आंध्र प्रदेश में रजिस्टर्ड तेलगू समाचार पत्र के आरएनआई प्रमाण पत्र और अन्य फर्जी दस्तावेज लगाकर सरकारी विज्ञापन प्राप्त किए। इसी प्रकार आरोपी शलभ भदौरिया ने फर्जी दस्तावेज लगाकर डाक पंजीयन भी करवाया और अवैध रूप से आर्थिक लाभ भी प्राप्त किया। ये प्रकरण काफी समय पहले सरकारों की निगाह में आ चुका था इसके बावजूद ये व्यक्ति कई फर्जी नामों से सरकारी सुविधाओं का हितग्राही बना रहा।

    इस व्यक्ति के विरुद्ध प्रदेश और राजधानी के पत्रकार लगभग तीन दशकों से ही अपनी खबरें प्रकाशित करते रहे हैं। इसके बावजूद सरकारों में घुसपैठ बनाने वाला सत्ता माफिया इसे संरक्षण देकर जिंदा बनाए रखता था। अब जबकि सोशल मीडिया की मजबूत उपस्थिति दर्ज हो चुकी है तब मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी मीडिया को उपदेश जारी करने की परंपरा शुरु कर दी है। जाहिर है कि इस फैसले से मुख्यमंत्री को भी मीडिया के बीच पलते रहे ठगों को पहचानने में आसानी हो जाएगी।

  • एमपी पुलिस ने दो इनामी नक्सलियों को मार गिराया

    एमपी पुलिस ने दो इनामी नक्सलियों को मार गिराया

    भोपाल,10 जुलाई(प्रेस सूचना केन्द्र)।मध्यप्रदेश पुलिस ने बालाघाट में दो इनामी नक्सलियों को सीधी मुठभेड़ में मार गिराया है। मंगलवार को हुई इस मुठभेड़ में मारे गए नक्सली टाण्डा दलम के सदस्य बताए गए हैं। पुलिस महानिदेशक व्हीके सिंह ने इसे एक बड़ी उपलब्धि बताया है। गौरतलब है कि छह सालों बाद पुलिस की नक्सलियों से ये सीधी मुठभेड़ हुई है।

    पुलिस मुख्यालय में आयोजित पत्रकार वार्ता में आज पुलिस महानिदेशक विजय कुमार सिंह, एडीजी नक्सल जी.पी.सिंह और बालाघाट के आईजी के पी वेंकटेश्वर राव ने घटनाक्रम पर विस्तृत जानकारियां दीं। डीजीपी ने प्रेस को दिए संबोधन में बताया कि पुलिस मुठभेड़ में जो दो नक्सली मारे गए हैं उन पर महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में कुल चौदह लाख रुपये का इनाम घोषित किया गया था।

    उन्होंने बताया कि पुलिस को जानकारी मिली थी कि बालाघाट जिले के नेवरवाही गांव के पुजारी टोला के एक मकान में नक्सलियों की बैठक आयोजित होने वाली है। इस सूचना के आधार पर हॉक फोर्सऔर पुलिस अधीक्षक बालाघाट ने कार्ययोजना बनाई। अपने अभियान में देवरवेली से हॉक फोर्स के 17 जवानों को घटनास्थल पर भेजा गया। ये इलाका लांजी पुलिस थाने के क्षेत्र में होने के कारण लांजी के एसडीओपी और थाना प्रभारी भी पहुंच गए।

    पुलिस टीम को रेकी करने पर पता चला कि वहां वर्दीधारी नक्सली हथियारों के साथ मौजूद हैं। सूचना पक्की होने पर पुलिस की चार टीमों ने प्रेम लाल टेकाम के उस मकान को चारों ओर से घेर लिया। आवाज होने पर कुछ लोग टार्च लेकर घर से बाहर आए तो पुलिस ने उन्हें समर्पण करने को कहा। इसके जवाब में नक्सलियों ने गोलियां चलाना शुरु कर दीं। हॉक फोर्स के तीन प्रधान आरक्षक तब तक मकान के नजदीक पहुंच चुके थे। उन्होंने भी जवाबी गोलीबारी शुरु कर दी।

    पुलिस को पता चला था कि मकान में पांच नक्सली मौजूद हैं। पुलिस गोलीबारी के बीच तीन नक्सली अंधेरे का फायदा उठाकर जंगल में भाग गए। मोर्चा संभालने वाले एक पुरुष और एक महिला नक्सली को पुलिस ने गोलीबारी के बीच मार गिराया। नक्सली युवक मंगेश की उम्र लगभग 21 साल थी और उसके पास सशस्त्र बलों से चुराई गई एसएलआर बरामद की गई है। जबकि युवती के पास से 315 बोर की रायफल थी। नक्सली युवक मंगेश उर्फ अशोक छत्तीसगढ़ के ही राजनांदगांव के कुर्रेझर गांव का निवासी था। वह टाण्डा एरिया कमेटी का सदस्य था। जबकि महिला नक्सली की पहचान नंदे उम्र 19 वर्ष निवासी बस्तर के रूप में की गई है।

    पुरुष नक्सली के पास से पुलिस ने एसएलआर राईफल,उसकी तीन मैगजीन, दो वायरलेस सेट, मोबाईल चार्जर, टार्च, केल्कुलेटर, पिट्ठू बैग, नकद 1720 रुपए,दो डायरी बरामद की गई हैं। मृत महिला नक्सली के पास से 315 बोर की राईफल के साथ 13 राऊंड, फुल थ्रू , छाता, चाकू, सुई धागा और पेन आदि सामग्री बरामद हुई है।

    पुलिस ने नक्सली गतिविधियों पर रोकथाम करने पहुंचे जवानों पर हमला करने के आरोप में अज्ञात नक्सलियों के विरुद्ध लांजी थाने में अपराध क्रमांक 200। 19 धारा 307,120 बी, 147, 148, 149 और भारतीय दंड विधान की धारा 25। 27 आर्म्स एक्ट के साथ साथ धारा 11,13 विधि विरुद्ध क्रियाकलाप अधिनियम पंजीकृत करके विवेचना शुरु की है। मृत नक्सलियों पर मध्यप्रदेश राज्य ने 3-3 लाख, छत्तीसगढ़ राज्य ने 5-5 लाख, और महाराष्ट्र राज्य ने 6-6 लाख का इनाम घोषित किया गया था।

    पुलिस महानिदेशक ने बताया कि देवरलांजी के थोड़े से इलाके में नक्सलियों का मूवमेंट रहा है। पिछले चुनाव के दौरान नक्सलियों की कई गतिविधियां मंडला, डिंडोरी और अमरकंटक के इलाकों में भी देखी गईं थीं। बालाघाट में भी कई आपराधिक दलों के बीच नक्सलियों से जुड़ाव की सूचनाएं मिलती रहीं हैं। इन्हें देखते हुए ये तो नहीं कहा जा सकता कि प्रदेश में नक्सलवाद बढ़ा है लेकिन ये बात साफ है कि मध्यप्रदेश पुलिस ने नक्सलवाद को समाप्त करने के लिए अपने कदम आगे बढ़ाए हैं। उन्होंने कहा कि एनकाऊंटर करने वाले पुलिस कर्मियों को उनकी बहादुरी के लिए पुरस्कार भी दिए जाएंगे।

  • गांधी हत्या पर गोडसे के बहाने लुटेरों को बचाने की साजिश

    गांधी हत्या पर गोडसे के बहाने लुटेरों को बचाने की साजिश

    भोपाल,17मई(प्रेस सूचना केन्द्र)। भाजपा की लोकसभा प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा ने आम चुनाव के अंतिम दौर में महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की देशभक्ति पर जैसे ही बयान दिया भूचाल आ गया। खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे खारिज किया और कहा कि वे इसके लिए मन से साध्वी को माफ नहीं कर पाएंगे। प्रश्न फिल्म अभिनेता कमल हासन के गोडसे को आतंकवादी बताए जाने पर था लेकिन इस पर समूची भाजपा बैकफुट पर आ गई।

    इसकी एक बड़ी वजह 19 मई को होने जा रहा आम चुनाव का अंतिम चरण भी है। गांधी देश के लोकप्रिय व्यक्तित्व हैं और उनके हत्यारे को देशभक्त बताना राजनीतिक रूप से उचित नहीं था।साध्वी का बयान आसानी से देश के आम मतदाता के गले उतरने वाला नहीं था । इसलिए आनन फानन में भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा को माफी मांगने के निर्देश दिए। उनके समर्थन में बहस को गांधीवाद पर लाने के प्रयास करने वाले अनिल सौमित्र को तो भाजपा ने निलंबित ही कर दिया। अनुशासन समिति उनके बयानों पर स्पष्टीकरण लेगी और फिर तय किया जाएगा कि पार्टी इन बयानों को कैसे देखे। हालांकि तब तक आम चुनाव का अंतिम दौर बीत जाएगा।

    महात्मा गांधी की हत्या के बाद उनके व्यक्तित्व की जिस तरह मीमांसा की गई है उससे भारत में गांधी को महापुरुष माना जाता है। दुनिया भी उन्हें शांतिदूत मानती है। जिस तरह उन्होंने सत्य और अहिंसा को लेकर प्रयोग किए उससे गांधी के व्यक्तित्व की विशालता का पता चलता है। उनके व्यक्तित्व का एक पक्ष हत्या के लिए फांसी पाने वाले नाथूराम गोडसे ने भी अपने बयानों में रेखांकित किया है। हालांकि तत्कालीन कांग्रेसी सरकारों ने उन विचारों पर लिखी पुस्तक यह कहते हुए प्रतिबंधित कर दी कि बापू के हत्यारे को महिमा मंडित नहीं किया जा सकता।

    चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में आयोजित पत्रकार वार्ता में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने एक सवाल के जवाब में कहा कि जिस तरह मालेगांव बम धमाके की आड़ में हिंदुओं को आतंकवादी बताने का षड़यंत्र किया गया हमने उसके विरुद्ध साध्वी प्रज्ञा को मैदान में उतारकर अपना सत्याग्रह दर्ज कराया है। साध्वी प्रज्ञा को इस मामले में झूठा फंसाया गया था। एनआईए अदालत ने विचारण के बाद इसीलिए उन पर से आतंकवादी निरोधक कानून(मकोका) हटाया था।

    साध्वी प्रज्ञा तथा कथित हिंदू आतंकवाद की शिकार रहीं हैं। कांग्रेस पार्टी की ओर से भाजपा पर हिंसा को समर्थन देने के जो आरोप लगाए जाते रहे हैं उसे षड़यंत्र बताने के लिए ही साध्वी प्रज्ञा को प्रत्याशी बनाया गया था। जरूरत थी कि साध्वी प्रज्ञा इस मुद्दे पर खूब बोलतीं। वे बताती कि हिंदू आतंकवाद के षड़यंत्र का वे कैसे शिकार बनीं। उनके बयान कांग्रेस के लिए संकट खड़े करने वाले साबित हो सकते थे। इसीलिए कांग्रेस ने अपनी चिरपरिचित शैली में इस पर चर्चा को रोकने की रणनीति बनाई और उसे सफल बनाने में कामयाब भी हुई। कांग्रेस के इस षड़यंत्र में उसके भाजपाई सहयोगियों ने बढ़ चढ़कर सहयोग दिया। उनके हर बयान को वे भाजपा के लिए संकट में डालने वाला बताते रहे और अपनी ओर से स्पष्टीकरण देने के बजाए साध्वी से बयान वापस लेकर माफी मंगवाने की रणनीति अपनाते रहे।

    जब साध्वी प्रज्ञा ने बाबरी ढांचा और राम मंदिर के संदर्भ में बयान दिया तो भाजपा के इन्हीं बौड़म रणनीतिकारों ने बयान वापस करवा दिया। जबकि ये बयान बहुसंख्यक वोट दिलाने में मददगार था। हेमंत करकरे के अत्याचारों का उल्लेख करने पर इसे मराठी भाषियों को नाराज करने वाला बताकर माफी मंगवा दी गई। जब कमलहासन ने गोडसे को देश का पहला आतंकवादी बताया तो साध्वी प्रज्ञा ने अपनी जानकारी के आधार पर उन्हें देशभक्त बता दिया। दरअसल वे जिस अभिनव भारत नाम के संगठन से कथित तौर पर जुड़ी रहीं हैं वो संगठन देश विरोधी ताकतों को चुनौती देने के लिए जाना जाता है। इस संगठन ने बापू वध के उस पक्ष को भी करीब से देखा सुना है जिसे आम लोग नहीं जानते। न केवल कांग्रेस बल्कि कई भाजपा की सरकारें भी चाहती रहीं हैं कि जनता देश के जरूरी मुद्दों के बजाए काल्पनिक कहानियों में ही उलझी रहे। कुछ इसी रणनीति के चलते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा हाईकमान को भी सीमित जानकारियां पहुंचाई गईं हैं।

    अनिल सौमित्रःसाध्वी प्रज्ञा को जनता की आवाज बनाने की कीमत चुकाई

    भाजपा मीडिया विभाग के प्रमुख अनिल सौमित्र ने साध्वी के बयान के दुष्परिणामों से पार्टी को बचाने के लिए निजी हैसियत से जो स्पष्टीकरण दिया और बहस को मोदी सरकार के गांधीवादी कार्यों की ओर मोड़ने का प्रयास किया उस पर भी राज्य भाजपा ने निलंबन की अज्ञानता भरी जल्दबाजी दिखाई। श्री सौमित्र का कहना था कि भारत तो सनातनी देश है। इसका कभी निर्माण नहीं किया गया। यहां कोई भी महापुरुष धरती माता का सुपुत्र होता है पिता या पति नहीं।निर्माण तो पाकिस्तान का हुआ था। अंग्रेजों ने इसके लिए बाकायदा षड़यंत्र किया जिसकी कीमत देश के हिंदू मुस्लिम दोनों समुदायों के नागरिकों को चुकानी पड़ी। ये विभाजन गांधी जी के दो शिष्यों जवाहरलाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना के आपसी टकराव की वजह से हुआ था। अंग्रेजी भाषा में देश बनाने वाले को फादर आफ द नेशन कहा जाता है। इस लिहाज से गांधी तो पाकिस्तान के राष्ट्रपिता हुए। श्री सौमित्र ने कहा कि कांग्रेस के नेतागण ही कहते हैं कि इंदिरा गांधी जी ने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए। इस लिहाज से बंगलादेश बनाए जाने पर उन्हें बंगलादेश की माता कहा जाना चाहिए।

    तर्कों और तथ्यों के आधार पर ये बातें पहली बार नहीं कही गईं हैं। देश के कई मूर्धन्य विद्वानों ने महात्मा गांधी के व्यक्तित्व की मीमांसा करते हुए ये बातें कही हैं। देश के कई विद्वान और संगठन इनसे सहमत हैं और समय समय पर ये कहते भी रहते हैं। भाजपा अपना जनाधार बढ़ाने के लिए इन देशभक्त संगठनों से सहयोग भी लेती रहती है। इन संगठनों से जुड़े लोग राष्ट्रवादी संगठन आरएसएस से भी जुड़े रहे हैं। इस लिहाज से वे भाजपा से भी जुड़े रहे हैं। इस आम चुनाव में जब भाजपा का संगठन खुलकर मैदान में नहीं था तब अनिल सौमित्र ने अपने संपर्कों के जरिए आगे बढ़कर साध्वी प्रज्ञा के प्रचार की कमान संभाली थी। इस लिहाज से वे भाजपा के उन दिग्गजों के निशाने पर आ गए थे जो कांग्रेस के दिग्विजय सिंह के साथ खड़े ठेकेदारों के गिरोह से जुड़े रहे हैं। यही समूह चुनाव में साध्वी प्रज्ञा के बयान और भाषण रोकने की रणनीति पर काम कर रहा था। अब जबकि चुनाव अंतिम चरण में पहुंच गया है तब ये गिरोह अपने षड़यंत्र उजागर न होने देने के लिए किसी को जिम्मेदार ठहराने का प्रयास कर रहा था। अनिल सौमित्र का ताजा बयान उनके लिए बहाना बन गया।

    पिछले पंद्रह सालों के शासनकाल में भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने पार्टी की विचारधारा को मजबूत न होने देने के लिए भरसक प्रयास किए । पार्टी का मुखपत्र रही चरैवेति चरैवेति पत्रिका और अन्य प्रकाशनों को भी छिन्न भिन्न कर दिया गया। प्रदेश में स्वस्थ परिचर्चा न हो इसके लिए मालवीय नगर के पत्रकार भवन को भी आपराधिक तत्वों के हाथों में सौंपकर गूंगा बना दिया गया। यही वजह है कि देश के मूलभूत मुद्दों पर जब भी कोई चर्चा होती है पत्रकार और नागरिक सभी ज्ञानशून्य और दिशा शून्य नजर आते हैं। प्रदेश में सत्ता माफिया की लूट को छुपाने के लिए भी इसी षड़यंत्र का सहारा लिया गया। पहली बार साध्वी प्रज्ञा के मैदान में आ जाने से इस गिरोह को अपनी रणनीति असफल होती नजर आने लगी है। इस गिरोह को साध्वी प्रज्ञा एक बड़ी बाधा नजर आ रहीं हैं। पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के खिलाफ षड़यंत्र करने वाला ये गिरोह अब साध्वी प्रज्ञा और उन्हें समर्थन देने वालों के विरुद्ध भी साजिशें रच रहा है। देखना है कि खुद को जनता का चौकीदार कहने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस मामले पर क्या भूमिका निभा पाते हैं। यदि जनता उन्हें एक बार फिर सत्ता सौंपती है भूमिका भी तभी तय होगी।

  • साध्वी प्रज्ञा को भगवा आतंकी बताने के पीछे सत्ता माफिया का षड़यंत्र

    साध्वी प्रज्ञा को भगवा आतंकी बताने के पीछे सत्ता माफिया का षड़यंत्र

    साध्वी प्रज्ञाःभगवा आतंकवाद कहकर हिंदुत्व को बदनाम किया गया, हम तो सबका साथ सबका विकास चाहते हैं।

    भोपाल,9 मई(प्रेस सूचना केन्द्र)। भगवा आतंकवाद का शोर मचाकर मालेगांव बम धमाके के असली आरोपियों को छुड़ाने और साध्वी प्रज्ञा को आतंकी बताने की साजिश एनआईए की अदालत में धराशायी हो गई। आतंकवाद विरोधी दस्ते(एटीएस) का षड़यंत्र अब केवल सामान्य मुकदमे में बदल गया है जो इतना आधारहीन है कि जल्दी समाप्त हो जाएगा। मुंबई हाईकोर्ट के वकील और साध्वी प्रज्ञा प्रताड़ना कांड की हर कड़ी से वाकिफ रणजीत सांगले ने एक पत्रकार वार्ता में इस षड़यंत्र की सभी बारीकियों का खुलासा किया और इसे सत्ता माफिया का षड़यंत्र बताया।

    भारत रक्षा मंच के राष्ट्रीय मंत्री श्री सांगले ने बताया कि एटीएस के प्रमुख स्वर्गीय हेमंत करकरे और उनके सहयोगियों ने अपनी कथित छानबीन के बाद जो कहानी तैयार की थी वो एनआईए की अदालत में हवा हवाई साबित हुई। एनआईए ने साध्वी प्रज्ञा और उनके सहयोगियों पर लगाया मकोका हटा दिया और केवल सामान्य धाराओं में मुकदमा चलाने की इजाजत दी है। कानूनी प्रक्रियाओं का पालन जरूरी है इसलिए ये मुकदमा चलाया जा रहा है । इस मुकदमे में इतनी खामियां हैं कि वो अदालत में नहीं टिक पाएगा।

    उन्होंने बताया कि कांग्रेस के खेमे से साध्वी प्रज्ञा को आतंकवादी कहकर बदनाम किया जाता रहा है। ये कहा जाता है कि वे बीमार थीं इसलिए अदालत ने उन्हें जमानत दे दी। हकीकत ये है कि न्यायालय को उनके विरुद्ध प्रथम दृष्टया ही बमकांड में शामिल होने के सबूत नहीं मिले। वे स्त्री हैं और साढ़े आठ साल उन्होंने विचाराधीन अवस्था में न्यायिक हिरासत में गुजारे हैं। हिरासत में रहते हुए ही उन्हें कैंसर जैसे रोग ने जकड़ लिया। उन्हें पर्याप्त इलाज नहीं मिल पा रहा था इसलिए स्वास्थ्य को अतिरिक्त कारण समझकर उनकी जमानत मंजूर की गई।

    तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम ने संसद में झूठा आश्वासन दिया था कि हम गैर कानूनी गतिविधियां प्रतिबंधक कानून और उसके अधीन बनाए गए अधिनियमों का दुरुपयोग रोकने के लिए न्यायाधीश स्तर का परिवीक्षा अधिकारी नियुक्त करेंगे। उसकी रिपोर्ट पर ही सबूतों की जांच की जाएगी। इसके बावजूद मुकदमे की समीक्षा के लिए कोई स्वतंत्र न्यायिक अधिकारी नियुक्त नहीं किया। विधि विभाग के सरकारी अधिकारी की राय पर साध्वी प्रज्ञा की गिरफ्तारी की गई थी जिससे सरकार की नियत उजागर होती है।

    श्री सांगले ने बताया कि 2008 में घटित मालेगांव बम धमाके में मारे गए और घायल व्यक्तियों की जो रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत की उसमें 101 घायलों के इंज्यूरी सर्टिफिकेट फर्जी साबित हुए। छह मृत व्यक्तियों की पोस्ट मार्टम रिपोर्ट के आधार पर डाक्टरों ने अदालत में कहा कि मृतकों के शरीर पर बम धमाके के निशान नहीं मिले थे। कुछ मृत शरीरों में से तो बंदूक की गोलियां तक बरामद हुईं जिससे बम धमाके की कहानी ही काल्पनिक साबित हो रही है। ऐसा लगता है कि वहां कम क्षमता का बम तो फटा लेकिन किन्हीं असामाजिक तत्वों ने बंदूकों से गोलियां भी चलाईं थीं।

    उन्होंने कहा कि बम धमाके के बाद साध्वी की मोटरसाईकिल मिलने की कहानी भी कई घुमावदार रास्तों से जोड़ी गई जिससे भगवा आतंकवाद की कहानी एक षड़यंत्र साबित होती है।

    रणजीत सांगलेःभगवा आतंकवाद के पीछे सत्ता माफिया

    गौर तलब है कि भगवा आतंकवाद को हवा देने का काम गृहमंत्री पी चिदंबरम और सुशील कुमार शिंदे के कार्यकाल में हुआ। शिवराज पाटिल और दिग्विजय सिंह ने कई स्थानों पर जिस तरह से इस मुद्दे का हौआ खड़ा किया उससे भी स्पष्ट होता है कि ये एक षड़यंत्र था। बाटला हाऊस एनकाऊंटर में इंस्पेक्टर मोहन शर्मा की शहादत को जिस तरह से बदनाम करने का षड़यंत्र किया गया उससे तो जांच एजेंसियों से जुड़े लोग साफ समझ गए थे कि हिंदू मुस्लिम वैमनस्य फैलाने के लिए भगवा आतंकवाद की कहानी को बल दिया जा रहा है।

    भोपाल लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी और प्रदेश के जन विद्रोह के बाद हटाए गए पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अपने सहयोगियों के माध्यम से जिस तरह साध्वी प्रज्ञा को आतंकवादी साबित करने का जो प्रयास आज भी कर रहे हैं उससे भी कांग्रेस के षड़यंत्रों का खुलासा हो रहा है। उनकी दूसरी पत्नी और पत्रकार अमृता राय अपने मित्रों के माध्यम से जो कहानियां प्रसारित करने का प्रयास कर रहीं हैं उससे भी भगवा आतंकवाद को लेकर दिग्गी खेमे की सक्रियता उजागर हो रही है। दिग्विजय सिंह हिंदू विरोधी छवि से बचने के लिए कहते रहे हैं कि उन्होंने कभी भगवा आतंकवाद नहीं शब्द इस्तेमाल नहीं किया बल्कि संघी आतंकवाद कहा था। जबकि हकीकत ये है कि अभिनव भारत जैसे संगठन हिंदुत्व की विचारधारा के तो समर्थक रहे हैं पर आरएसएस से उनका सीधा जुड़ाव नहीं था।

    हाल ही में देश के कई अखबारों में कर्नाटक की पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के लिए बनाई गई एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट का हवाला देकर खबरें छपवाई गईं हैं। जिनमें कथित तौर पर वही कहानी दुहराई गई है जो मालेगांव बम धमाके और समझौता एक्सप्रेस धमाके में एटीएस ने रची थी। ये कहानी एनआईए की सख्त छानबीन में आधारहीन साबित हो चुकी है। इसके बावजूद कांग्रेस का दुष्प्रचार तंत्र इसे लगातार दुष्प्रचारित कर रहा है। भोपाल में साध्वी प्रज्ञा के दावे के बाद जिस तरह कंप्यूटर बाबा के नेतृत्व में बाबाओं की तंत्र साधना और परेड कराई गई उससे भी कांग्रेस का षड़यंत्र जनता के सामने आ गया है। कई बाबाओं ने कैमरे के सामने स्वीकार किया कि उन्हें दक्षिणा देकर बुलाया गया था। जाहिर है कि 12 मई हो होने वाले मतदान में भोपाल की जनता इस मुद्दे पर अपनी राय जरूर देगी।

  • दिग्विजय सिंह ने रची थी हिंदुओं को आतंकी बताने की साजिशःप्रेम शुक्ल

    दिग्विजय सिंह ने रची थी हिंदुओं को आतंकी बताने की साजिशःप्रेम शुक्ल

    भोपाल,3 मई(प्रेस सूचना केन्द्र)। साध्वी प्रज्ञा को बमकांड के झूठे आरोप में फंसाकर हिंदुओं को आतंकवादी बताने का षड़यंत्र कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह और उनके सहयोगियों ने रचा था। इससे वे पूरी दुनिया में हिंदुओं को उसी तरह संदिग्ध बनाने की साजिश कर रहे थे जिस तरह पाकिस्तान के नागरिकों को कई देशों में शंका की दृष्टि से देखा जाता है। मालेगांव बम धमाके में साध्वी प्रज्ञा को जिस पुरानी मोटरसाईकिल से रिश्ता जोड़कर गिरफ्तार किया गया था वह पुलिस ने आठ दिन बाद बरामद की, जिससे साबित होता है कि ये सोची समझी साजिश थी।

    भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और ख्यातनाम पत्रकार प्रेम शुक्ल ने आज भोपाल में आयोजित बुद्धिजीवियों की चाय पर चर्चा में ये बात कही। भारत में आतंकवाद से हिंदुओं को जोड़ने के विषय पर लिखी गई चार पुस्तकों पर चर्चा के दौरान देश की आतंकवादी घटनाओं की पृष्ठभूमि की पड़ताल करने का प्रयास किया गया।इस दौरान भगवा आतंक एक षड़यंत्र किताब के लेखक आरवीएस मणि और द ग्रेट इंडियन कांस्पिरेसी के लेखक प्रवीण तिवारी ने आतंकी घटनाओं की पृष्ठभूमि पर अपने नजरिए का खुलासा किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार रामेश्वर मिश्र पंकज ने की। आयोजक के तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच की महासचिव रेशम सिंह ने अपना मार्गदर्शन दिया। मंच की ओर से कार्यक्रम का संचालन विचारक अनिल सौमित्र ने किया।

    अपने वक्तव्य में प्रेम शुक्ल ने कहा कि बाबरी विध्वंस के बाद राजनीति में जिस तरह भाजपा का उदय हुआ उसे देखते हुए कांग्रेस ने हिंदू आतंकवाद की कहानी रचकर देश को बदनाम करने की साजिश रची। मालेगांव में फोड़ा गया बम जहां बनाया गया उसकी मिट्टी और बम रखने के लिए इस्तेमाल साईकिल बरामद करके आतंकवादियों को भी गिरफ्तार कर लिया गया था। सफदर नागौरी के नार्को एनालिसिस टेस्ट में सारी कहानी सामने आ गई। पुलिस ने मुंबई हमले की साजिश में उजागर हुए डेविड कोलमेन हेडली ने भी इसी कहानी को सत्यापित किया।इसके बावजूद पुलिस ने लंबे समय तक चालान पेश नहीं किया और बाद में आरोपी संदेह का लाभ देकर छोड़ दिए गए।

    इसकी वजह तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल, दिग्विजय सिंह और सुशील कुमार शिंदे जैसे नेता थे। किन्हीं विदेशी ताकतों के साथ मिलकर इन्होंने देश के खिलाफ षड़यंत्र किया। मालेगांव बम धमाके में अचानक एटीएस साध्वी प्रज्ञा भारती,समीर कुलकर्णी, कर्नल पुरोहित, असीमानंद और अन्य के नाम सामने लाए गए। कहा गया कि आरएसएस की विचारधारा से जुड़े इन लोगों ने ये बम फोड़ा था। इस कहानी का आधार साध्वी प्रज्ञा की वो कथित मोटरसाईकिल थी जिसे इन लोगों की गिरफ्तारी के आठ दिनों बाद बरामद किया गया। हिंदू आतंकवाद की कहानी दिग्विजय सिंह ने ही रची थी।यदि 26।11हमले में अजमल कसाब नहीं पकड़ा जाता और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की भूमिका का खुलासा नहीं होता तो मारे गए आतंकवादियों के फर्जी हिंदू नामों वाले परिचयपत्रों और हाथों में बंधे कलावा के आधार पर हिंदू आतंकवाद को प्रमाणित कर दिया जाता।

    उन्होंने बताया कि जब ये घटना हुई थी तब कांग्रेस नेता अहमद पटेल ने दबाव डालकर हसन कपूर को मुंबई पुलिस का मुखिया बनवाया गया था। उनके हस्तक्षेप से इन घटनाओं के साक्ष्य मिटाने की साजिश की गई। अजीज बर्नी की जिस विवादित पुस्तक को आनन फानन में लिखवाया गया और दिग्विजय सिंह उसका विमोचन करने पहुंचे उसमें कहा गया कि हेमंत करकरे हिंदू आतंकवाद के कारण मारे गए। जबकि उस दुष्टात्मा का निधन आतंकवादियों की गोली से हुआ था। उन्होंने कहा कि देश में अब तक जो आतंकवादी पकड़े गए या मारे गए वे अजमेर शरीफ की दरगाह, फातिमा की दरगाह को तो निशाना बनाते रहे लेकिन उन्होंने कभी किसी देवबंदी मस्जिद को निशाना नहीं बनाया। श्री शुक्ल ने आव्हान किया कि जिन लोगों ने साध्वी प्रज्ञा को नौ सालों तक अमानवीय प्रताड़ना दी जनता उन्हें सौ सालों तक के लिए सत्ता से बाहर फेंक देगी।

    जब देश में ये आतंकवादी घटनाएं चल रहीं थीं तब गृह मंत्रालय में अवर सचिव रहे आरवीएस मणि ने जब देशभक्तों के खिलाफ इन षडयंत्रों को करीब से देखा तो उन्होंने इसका राज फाश करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने भगवा आतंक एक षड़यंत्र नाम से लिखी पुस्तक में पूरे षड़यंत्र के दस्तावेजी प्रमाण भी प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने पुस्तक में लिखी बातों के संबंध में बताया कि गृहमंत्री चिदंबरम ने 2010 में देवबंद जाकर भगवा आतंकवाद शब्द कहकर देश के लोगों को ही अपराधी बताने का काम किया था। एटीएस ने ही समझौता एक्सप्रेस के आतंकवादियों को भाग निकलने में मदद की। बाटला हाऊस एनकाऊंटर को फर्जी बताकर दिग्विजय सिंह, सोनिया गांधी जैसे नेताओं ने बहादुर अफसर मोहन शर्मा की शहादत का मजाक उड़ाया था। इस तरह कांग्रेस ने आतंकवाद को अल्पसंख्यकों पर अत्याचार बताकर न केवल मुस्लिमों की हत्याएं करवाईं बल्कि हिंदू आतंकवाद जैसा झूठा शब्द रचकर देश के मूल नागरिकों को बदनाम करने का काम किया था।

    आतंक से समझौता पुस्तक के लेखक प्रवीण तिवारी ने कहा कि जिस दिन स्वामी विवेकानंद के शरीर के भगवा रंग के कपड़ों को आतंक से जोड़ने की साजिश की गई उसे देखकर हर आम भारतीय का मन दुखी हुआ था। एटीएस ने आतंकवाद की जड़ें खोदने वाले कर्नल पुरोहित और उनके सहयोगियों को ही इस कांड में आरोपी बना दिया और असली दोषियों को बच निकलने की पृष्ठभूमि तैयार की। भाजपा की प्रत्याशी प्रज्ञा भारती भी इस षड़यंत्र का शिकार हुई थीं। उन्हें लौमहर्षक प्रताड़ना दी गई। आज हर राष्ट्रभक्त नागरिक का दायित्व है कि वो देश के विरुद्ध षड़यंत्र करने वालों को दंडित करे।

    कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए साहित्यकार रामेश्वर मिश्र पंकज ने कहा भारत की अस्मिता का अपमान करने वाले दिग्विजय सिंह, चिदंबरम जैसे लोगों को सजा देने का दायित्व अब जनता का है।आयोजन में श्रोता के रूप में शामिल सूर्यकांत केलकर ने कहा कि भारत रक्षा मंच से जुड़े एड्व्होकेट हिंदू आतंकवाद जैसा शब्द रचने के दोषी लोगों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करेंगे। एड्व्होकेट साधना पाठक ने कहा कि जब हम अपने वकील साथियों को लेकर साध्वी प्रज्ञा के बयान लेने जाते थे तब हमने उनकी असहनीय वेदना को करीब से महसूस किया था। उन्होंने कहा कि निर्दोष नागरिकों के विरुद्ध षड़यंत्र करने वालों के विरुद्ध हम अब तक लगभग उदार रहे हैं, पर अब समय आ गया है कि जब हम उन्हें आगे बढ़कर दंडित करें।

  • सेना पर आरोप से पहले सबूत दें या चुप रहें

    सेना पर आरोप से पहले सबूत दें या चुप रहें


    भोपाल,18 मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)। वायुसेना के पूर्व सैनिकों और अफसरों ने भारतीय सेना की कार्रवाईयों पर सवाल उठाने वालों को तमीज सिखाने के लिए खुली चेतावनी दी है। उनका कहना है कि जो सैनिक देश पर जान न्यौछावर करने तैयार रहते हैं उनकी कार्रवाई को घटिया राजनीति का मुद्दा न बनाया जाए। जिस तरह से कुछ नेताओं ने पुलवामा आतंकी हमले और उसके बाद वायुसेना की एयर स्ट्राईक को लेकर आधारहीन आरोप लगाए हैं उन्हें अब सावधान हो जाना चाहिए। बगैर नाम लिए कांग्रेस के एक पूर्व मुख्यमंत्री के बयानों पर भी वायुसेना के पूर्व अफसरों ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई है।


    टॉप ब्रॉस पूर्व सैनिक एवं अधिकारी संघ भोपाल की ओर से रिटायर्ड विंग कमांडर डॉ.यू.के.चौधरी ने कहा कि कांग्रेस और कुछ अन्य राजनीतिक दल देश की सुरक्षा के मुद्दों पर जिस तरह से घटिया राजनीति कर रहे हैं वो सेना का अपमान है। सर्जिकल और एयर स्ट्राईक सैन्य बलों का विशेषाधिकार है। हम सुरक्षा के मुद्दों पर पूरे चिंतन मनन के साथ कार्रवाई करते हैं। देश की सुरक्षा हमारी जवाबदारी है। हम इसकी मंहगी कीमत भी चुकाते हैं। इसके बावजूद कुछ राजनेता काल्पनिक आरोपों के आधार पर सेना की कार्रवाई पर भ्रम फैला रहे हैं। जिन्हें सेना की कार्रवाई पर शक है वे सबूत पेश करें। हमसे सबूत मांगकर शत्रुओं को शक्तिशाली बनाने की गद्दारी न करें।


    उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर राजनीति बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इसके लिए हम राष्ट्रपति और राज्यपाल महोदय को ज्ञापन भी सौंप रहे हैं। बातचीत के दौरान पूर्व सैन्य अधिकारियों ने कहा कि हम बाहिरी दुश्मनों के साथ साथ देश के भीतर के दुश्मनों से भी निपटना जानते हैं। छोटे मोटे शत्रुओं का इलाज तो कंबल परेड से ही किया जा सकता है लेकिन गद्दारों का इलाज उसी तरह करना पड़ेगा जैसे हम शत्रुओं का करते हैं।

  • कारोबारी लुटेंगे तो कौन करेगा निवेश

    कारोबारी लुटेंगे तो कौन करेगा निवेश

    जबरिया घर में घुसकर कब्जा जमाने वाले इन लोगों पर कार्रवाई करने से पुलिस भी घबरा रही है,जाहिर है ये भविष्य में बड़े आपराधिक टकराव की वजह भी बन सकती है।

    भोपाल,17 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। कांग्रेस के सत्ता में आते ही कई अपराधियों ने अपना पुराना कारोबार शुरु कर दिया है। वे सामाजिक न्याय के नाम पर ऐसी वारदातों को अंजाम दे रहे हैं जिनसे मध्यप्रदेश में कारोबार करना भरोसेमंद नहीं रहा है। कमलनाथ सरकार की पुलिस भी असमंजस में है और वो ऐसे मामलों में हाथ नहीं डाल रही है। जो कारोबारी सौदे, विवादों की वजह से अदालतों में हैं उनमें भी अपराधी तत्वों ने लूटमार शुरु कर दी है।

    भोपाल के शाहपुरा थाना क्षेत्र स्थित बावड़िया कला के लक्ष्मी परिसर में भवन क्रमांक 14 पर राहुल रघुवंशी के नेतृत्व में 40-50 लोगों की भीड़ ने जबरिया कब्जा कर लिया। इस परिसर का निर्माण गौरा कंस्ट्रक्शन ने किया है। प्रोप्राईटर विश्वजीत दुबे ने इस संबंध में घटना की दिनांक 4 फरवरी 2019 को शाहपुरा पुलिस थाने को सूचित किया और सुरक्षा की मांग भी की। पुलिस ने हस्तक्षेप से इंकार कर दिया, कहा कि मामला अदालत में है इसलिए आप वही अपनी बात रखें।

    पुलिस की बात आधी सही है मकान का दीवानी मामला अदालत में लंबित है, जबकि जबरिया हमला करके कब्जा कर लेने का मामला फौजदारी है। इसके बावजूद पुलिस ने फरियादी को चलता कर दिया। बाद में पुलिस से जुड़े कुछ लोगों ने बताया कि सुरेन्द्र और राहुल रघुवंशी पूर्व मंत्री हजारीलाल रघुवंशी के परिवार से जुड़े हैं, और सरकार के प्रभावी लोगों ने कहा है कि पुलिस इसमें हस्तक्षेप न करे।

    इस मकान के लिए श्रीमती उर्मिला रघुवंशी की ओर से लक्ष्मी प्रापर्टीज से मार्च 2007 में निर्माण अनुबंध किया गया था। तब इस मकान की कीमत 34 लाख थी। इसकी खरीद के लिए उर्मिला रघुवंशी ने 21 लाख रुपए बिड़ला होम फायनेंस से लोन लेकर चुका दिए। बाद में एक लाख रुपए नकद भी दिए। शेष 12 लाख रुपए का भुगतान शेष था जिसका चैक देकर उन्होंने बिल्डर से रजिस्ट्री भी करवा ली। बाद में चैक बाऊंस हो गया। जब शेष भुगतान नहीं मिला तो विक्रेता ने अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन होने पर भवन का आधिपत्य खरीददार को हस्तांतरित नहीं किया। भवन का आधिपत्य समय सीमा में हस्तांतरित हो सकता था लेकिन उर्मिला रघुवंशी की ओर से एक प्रकरण क्रमांक 406 ए। 2014 श्रीमान षष्ठम व्यवहार न्यायाधीश वर्ग 2 भोपाल के सामने प्रस्तुत किया गया जिसमें स्थायी निषेधाज्ञा चाही गई थी। अदालत ने उर्मिला रघुवंशी का प्रकरण खारिज कर दिया क्योंकि वे अपना आधिपत्य साबित नहीं कर पाईं। अदालत ने पाया कि चैक बाऊंस करवाकर भवन का पूरा भुगतान नहीं किया गया है।इसलिए न्यायालय ने फैसला दिया कि संपत्ति पर गौरा कंस्ट्रक्शन का ही आधिपत्य है।

    चैक बाऊंस के मामले में भी अदालत ने उर्मिला रघुवंशी, पत्नी सुरेन्द्र सिंह रघुवंशी को दोषी पाया।अदालत के इस फैसले के खिलाफ उर्मिला रघुवंशी ने दूसरी अदालत में ये कहते हुए अपील की कि बिल्डर ने चैक बाऊंस होने की सूचना उन्हें समय अवधि में नहीं दी थी,इसलिए अब वे भुगतान देने के लिए उत्तरदायी नहीं हैं।गौरा कंस्ट्रक्शन ने आधिपत्य अपने पास ही रखा और इस धोखाधड़ी को हाईकोर्ट में चुनौती दी। तबसे ये प्रकरण विचाराधीन है।

    भाजपा की सरकार रहते समय तो राहुल रघुवंशी और उसके परिजनों ने अदालत के प्रकरण पर चुप्पी साधे रखी पर कांग्रेस की सरकार आने के बाद घेराबंदी करके 4 फरवरी को मकान पर कब्जा कर लिया। इस मकान में गौरा कंस्ट्रक्शन के 15 लाख रुपए के टाईल्स रखे थे। सामान लेने पहुंचे विश्वजीत दुबे को उर्मिला और राहुल रघुवंशी ने धमकाया कि मकान पर हमारा कब्जा है और आपसे जो बन सके कर लो। अब हमारी सरकार है। हम शेष रुपए भी नहीं देंगे और इतने लंबे अंतराल के कारण जो कीमत बढ़ चुकी है वो भी नहीं देंगे।

    सरेआम संपत्ति की इस लूट की शिकायत पर जब पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की तो फरियादी विश्वजीत दुबे ने आईजी इरशाद वली और एसएसपी संजय साहू के सामने भी इस आपराधिक मामले में हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई। इसके बावजूद पुलिस ने पूरे मामले में चुप्पी साध रखी है।

    सवाल ये है कि जब किसी खरीददार ने संपत्ति की कीमत ही नहीं चुकाई तो वो उस पर अपना कब्जा कैसे जता सकता है। अनुबंध की शर्तें तो तभी पूरी होती जब रजिस्ट्री के वक्त दिये गए चैक का भुगतान हो जाता। उर्मिला रघुवंशी, सुरेन्द्र रघुवंशी और राहुल रघुवंशी की ओर से जानबूझकर ये धोखाघड़ी की गई है इसके बावजूद पुलिस उनके कब्जे को लूट का आपराधिक कृत्य मानने तैयार नहीं है। सुरेन्द्र रघुवंशी पर कई अन्य आपराधिक मामले भी दर्ज हैं। इसके बावजूद पुलिस की चुप्पी बता रही है कि कांग्रेस की कमलनाथ सरकार कारोबारियों को लूटने से बचाने में रुचि नहीं दिखा रही है। जब कारोबारियों पर अपराधी इस तरह हावी होंगे तो ईज आफ डूइंग के लिए साख बना चुके मध्यप्रदेश में जो असुरक्षा का माहौल बनन लगा है उसमें निवेशकों को उनकी सुरक्षा का भरोसा कैसे दिलाया जा सकता है। शांति का टापू कहा जाने वाला मध्यप्रदेश यदि अब लुटेरों का स्वर्ग बन जाएगा तो इसका खमियाजा आम जनता को भुगतना पड़ेगा क्योंकि असुरक्षा के इस माहौल में कोई भी निवेशक यहां आने की हिम्मत नहीं करेगा।

  • महिला अपराध पर पुलिस ने बनाया एक्शन प्लान

    महिला अपराध पर पुलिस ने बनाया एक्शन प्लान

    अतिरिक्‍त पुलिस महानिदेशक महिला अपराध ने ऊर्जा डेस्‍क की समीक्षा बैठक ली

    भोपाल, 15 जनवरी 2019। अतिरिक्‍त पुलिस महानिदेशक महिला अपराध अन्‍वेष मंगलम ने वीडियो कॉन्‍फ्रेंसिंग के माध्‍यम से 12 जिलों के एसपी के साथ ऊर्जा (URJA-अर्जेन्‍ट रिलीफ फॉर जस्‍ट एक्‍शन) डेस्‍क की समीक्षा बैठक की। उन्‍होंने कहा कि महिला अपराधों के संबंध में ऊर्जा डेस्‍क महिला पीडि़ता की शिकायतों पर संवेदनशीलता एवं सहानुभूति के साथ कार्यवाही करें तथा उन्‍हें एहसास करायें कि वे सही स्‍थान पर आई हैं और उन्‍हें न्‍याय मिलेगा। किसी भी तरह से केवल खानापूर्ति न की जाए सिर्फ और सिर्फ सटीक कार्यवाही हो।

    श्री मंगलम ने सभी एसपी को निर्देशित किया कि ऊर्जा डेस्‍क के लिए आवश्‍यक संसाधन मुहैया करवाकर अधिकारी एवं कर्मचारियों की नियमित रूप से ड्यूटी लगाकर सही कार्यवाही के लिए सतत मॉनिटरिंग करें। ऊर्जा हेल्‍प डेस्‍क में कार्यरत सभी अधिकारी एवं कर्मचारियों को निर्धारित कार्यक्रम अनुसार प्राथमिकता के आधार पर प्रशिक्षण दिलाया जाए। ऊर्जा हेल्‍प डेस्‍क के लिए आवश्‍यक संसाधनों एवं अन्‍य जरूरतों के लिए पुलिस मुख्‍यालय की संबंधित शाखा को यथाशीघ्र मांग प्रेषित की जाए। उन्‍होंने कहा कि ऊर्जा डेस्‍क में समर्थ, संवेदनशील एवं कर्तव्‍यनिष्‍ठ अधिकारी/कर्मचारियों को रखा जाए। श्री मंगलम ने कहा कि स्‍थानीय सामाजिक, धार्मिक एवं अन्‍य संगठनों सहित ग्राम रक्षा समिति, आशा कार्यकर्ता, दीदी आदि के सहयोग से थानों के आसपास के अंचलों में महिला अपराधों के प्रति जागरुकता एवं ऊर्जा डेस्‍क के संबंध में जानकारी देने के लिए व्‍यापक एवं कारगर प्रयास किए जाएं। ऊर्जा डेस्‍क में आई महिला पीडि़ता की शिकायत सुनने के लिए हर समय अधिकारी/कर्मचारी मौजूद रहें। ऊर्जा डेस्‍क का माहौल ऐसा हो जिसमें पीडि़ता बेझिझक एवं निडर होकर अपनी बात रख सके सा‍थ ही उसे यह एहसास हो कि वह सही जगह आई है और उसे न्‍याय मिलेगा। ऊर्जा डेस्‍क स्‍टाफ वॉट्सअप ग्रुप से जुड़कर निर्देशों, सूचनाओं एवं अन्‍य किसी भी जानकारी का त्‍वरित आदान-प्रदान करें। उन्‍होंने कहा कि ऊर्जा डेस्‍क से संबंधित कार्यवाही गंभीर एवं सटीक हो इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं है। श्री मंगलम ने 12 जिलों के सभी एसपी से ऊर्जा हेल्‍प डेस्‍क के संबंध में एक-एक करके विस्‍तृत जानकारी ली एवं निर्देश दिए।

    उल्‍लेखनीय है कि पुलिस महानिदेशक श्री ऋषि कुमार शुक्‍ला ने माह सितंबर 2018 में जहांगीराबाद में ऊर्जा (अर्जेन्‍ट रिलीफ फॉर जस्‍ट एक्‍शन) डेस्‍क का शुभारंभ किया था।प्रदेश के 12 जिलों विदिशा, रतलाम, इंदौर, भोपाल, बैतूल, सिवनी, बालाघाट, रीवा, जबलपुर, पन्‍ना, मुरैना एवं ग्‍वालियर के 180 थानों में पीडि़त महिलाओं की शिकायतें एवं समस्‍याएं सुनने के लिए तीन श्रेणियों में ऊर्जा हेल्‍प डेस्‍क स्‍थापित किए गए हैं। प्रथम वर्ष इन 180 थानों में ऊर्जा डेस्‍क के कार्य करने के बाद प्राप्‍त हुए वैज्ञानिक डेटा के आधार पर महिला अपराधों एवं अपराध पीडि़ताओं के बचाव के लिए आगे की नीति एवं कार्यवाही की योजना बनाई जाएगी। इस अवसर पर सहायक पुलिस महानिरीक्षक श्रीमती शालिनी दीक्षित, सुश्री इमरीन शाह, श्री एम.एस.मुजाल्‍दे, श्री मलय जैन, एवं रिसर्च टीम के सदस्‍य उपस्थित थे।

  • मनीष गौतम रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार

    मनीष गौतम रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार

    अहमदाबाद,11 दिसबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। डायरेक्टर आफ रीजनल आऊटरीच ब्यूरो(आरओबी) के निदेशक और भारतीय सूचना सेवा के अधिकारी मनीष आर गौतम को गुजरात एंटी करप्शन ब्यूरो ने बीस हजार रुपए की रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया है।भोपाल दूरदर्शन में सहायक निदेशक रहा ये अधिकारी एक जादूगर से रिश्वत लेते धराया गया है।

    अहमदाबाद पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का यह प्रथम श्रेणी अधिकारी एक जादूगर को प्रचार कार्य का ठेका देने के लिए रिश्वत मांग रहा था। कलाकार की शिकायत पर एंटी करप्शन ब्यूरो ने नेहरूनगर में जाल बिछाया और गौतम को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों धर दबोचा।पुलिस ने उसके कब्जे से रिश्वत की रकम के रूप में बीस हजार रुपए बरामद किए हैं।

    प्राप्त जानकारी के अनुसार मनीष गौतम के विरुद्ध कई सालों से रिश्वतखोरी की शिकायतें मिलती रहीं हैं। भोपाल दूरदर्शन में संवाददाताओं को नियुक्त करने में रिश्वत लेने के संबंध में भी शिकायतें की गईं थीं लेकिन जांच एजेंसियों की शिथिलता के चलते कार्रवाई नहीं की जा सकी। फिलहाल गुजरात एंटी करप्शन ब्यूरो उन शिकायतों की भी छानबीन कर रहा है। गौतम की संपत्तियों की भी जानकारी जुटाई जा रही है।

  • अदालतों में भ्रष्टाचार का अंत

    अदालतों में भ्रष्टाचार का अंत

    भोपाल जिला बार एसोसिएशन ने जिले के लोगों को स्वाधीनता दिवस की बड़ी सौगात दी है। उसने घोषणा की है कि आज से जिले की अदालतों में भ्रष्टाचार नहीं होगा। किसी भी प्रकार के गैरकानूनी लेनदेन की शिकायत यदि मिलती है तो बार एसोसिएशन उस आपराधिक कृत्य करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में शिकायत दर्ज कराएगा। जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेश व्यास राज्य की एडवोकेट एनरोलमेंट कमेटी के अध्यक्ष भी हैं। जबलपुर हाईकोर्ट के दायरे में चलने वाली ये संस्था संवैधानिक दर्जा प्राप्त है। इस लिहाज से राजेश व्यास की राय प्रदेश की समूची न्यायपालिका की आत्मा की आवाज मानी जा सकती है। खुद राजेश व्यास कहते हैं कि उनकी ये राय एक दिन में नहीं बनी है। वे लंबे समय से प्रदेश भर के पीठासीन जजों, बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों,सदस्यों,वरिष्ठ अधिवक्ताओं, न्यायिक कर्मचारी संघों के पदाधिकारियों, कर्मचारियों, वरिष्ठ और कनिष्ठ अधिवक्ताओं, कोर्ट मुंशियों, थाने के मुंशियों ,चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों से चर्चा करते रहे हैं। सभी इस घृणित परंपरा को पसंद नहीं करते हैं। इसके बावजूद बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे। इस मुद्दे पर कोई बोलने की पहल नहीं करता है। इसलिए अदालतों की गरिमा रोज खंडित होती रहती है और न्याय देने दिलाने का काम आम जनता से दूर होता जाता है।

    राजेश व्यास कहते हैं कि ये बात सही है कि मंहगाई के इस दौर में किसी अनजान पक्ष के लिए न्याय दिलाने की लंबी जद्दोजहद बहुत खर्चीली होती है। यदि भ्रष्टाचार का सामना न भी करना पड़े तब भी पक्षकार को दर दर की ठोकरें खाना पड़ती हैं। ऐसे में लोग अदालत की चौखट चढ़ने को भी अपने पूर्व कर्मों का पाप मानने लगते हैं। यही वजह है कि सभी के बीच संवाद के दौरान उनके मन में भ्रष्टाचार मुक्त अदालतों का विचार आया। उनका कहना है कि लोगों के बीच से न्यायपालिका को लेकर बना संशय दूर होने से समूची न्यायप्रक्रिया से जुड़े लोगों को सिर ऊंचा करके चलने का अवसर मिलेगा।

    वे कहते हैं कि जिस तरह अदालतों का कामकाज तेजी से कंप्यूटरीकृत होता जा रहा है ऐसे माहौल में किसी पक्षकार का काम केवल इसलिए टरकाया जाए कि उससे रिश्वत वसूलनी है तो ये बड़ा गंभीर अपराध है। देश भर की अदालतों में जब लंबित प्रकरणों को निपटाने की तेजी अपनाई जा रही है ऐसे माहौल में वकीलों का काम सरल बनाने के लिए जरूरी है कि समूचा कामकाज पारदर्शी बनाया जाए। अब जबकि नोटबंदी के बाद लेनदेन का काम भी लोग मोबाईल एप से करने लगे हैं तब वकीलों की भागदौड़ घटाने के लिए भी जरूरी है कि न्याय प्रक्रिया को सरल बनाया जाए।
    राजेश व्यास ने झंडावंदन के बाद अध्यक्षीय उद्बोधन में जब ये बात कही तो वकीलों ने इसका भरपूर स्वागत किया। जिला एवं सत्र न्यायाधीश शैलेन्द्र शुक्ला ने भी उनकी बात का समर्थन करके इस राय पर अपना निर्णय सुना दिया। उन्होंने कहा कि ये सराहनीय पहल है और पूरी न्यायपालिका की ओर से वे इस फैसले का स्वागत करते हैं। ये राय इस संवैधानिक स्तंभ से जुड़े लोगों के बीच व्यापक विमर्श से निकली है इसलिए अदालतों में इसे लागू कराने के लिए कोई सख्ती की भी जरूरत नहीं पड़ेगी।

    राजेश व्यास ने कहा कि लोगों को सस्ता त्वरित और सुलभ न्याय दिलाना आज इसलिए भी जरूरी हो गया है कि देश विकास के एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है। यदि हम लोगों को कानूनी पचड़ों में ही उलझाए रहेंगे तो पड़ौसी देशों या विश्व के देशों से विकास के पैमाने पर कभी मुकाबला नहीं कर पाएंगे। उनका मानना है कि लोगों को सुलभ न्याय मिले और वकीलों को उन्हें न्याय दिलाने के लिए अनावश्यक परेशान न होने पड़े इसे देखते हुए ही उन्होंने ये निर्णय लिया कि इस नैतिक गंदगी का पुरजोर विरोध किया जाए।

    वरिष्ठ अधिवक्ता सी.एस. शर्मा कहते हैं कि इस फैसले से न्यायपालिका की गरिमा बढ़ेगी। अदालतों और जनता के बीच करीबी बढ़ने से ज्यादा लोग अदालतों के माध्यम से अपने फैसले करवा सकेंगे।जिस तरह पारिवारिक मामले अदालतों में अधिक आने लगे हैं उन्हें देखते हुए अदालतों को लोगों की मित्र बनाना जरूरी है। अदालत का कामकाज सुगम हो तो ज्यादा लोग अदालतों के माध्यम से कानून का राज कायम कर सकेंगे। विकास की गति तेज करने की दिशा में ये कदम मील का पत्थर साबित होगा। उनका कहना है कि इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए।

    एडवोकेट श्रीमती सुनीता राजपूत ने कहा कि अदालत की चौखटों पर पहुंचने वाले आम नागरिकों के हितों की रक्षा में ये नई परिपाटी ऐतिहासिक साबित होगी। उन्होंने कहा कि न्याय प्रक्रिया का लाभ आम नागरिकों तक पहुंचाने में वकीलों की बड़ी भूमिका होती है। अदालतों में बढ़ने वाले अनावश्यक खर्चों से डरकर बहुत से लोग न्याय से वंचित रह जाते हैं। अब जब अदालतों का कामकाज जनता के ज्यादा करीब होगा तो इससे ज्यादा लोग अदालत पहुंचेंगे और न्यायपालिका की गरिमा बढ़ेगी।

  • सड़क को युद्धस्थल बनाया तो फिर रोने की गुजाईश नहीं

    सड़क को युद्धस्थल बनाया तो फिर रोने की गुजाईश नहीं

    –आलोक सिंघई–

    सड़कें हमारी जीवनरेखा हैं और दिन भर हमें इन पर खेल भावना से दौड़ना होता है। न चाहते हुए भी कई बार हमसे गलतियां हो जाती हैं और इसका एकमात्र समाधान यही है कि गलती के लिए तत्काल माफी मांग ली जाए। प्रभावित का गुस्सा पल भर में काफूर हो जाता है और हम भी बिना वजह के तनाव से बच जाते हैं। जब हम कानों में ईयरफोन लगाकर मोबाईल पर बात कर रहे हों और अचानक अपनी गाड़ी सड़क पर डाल दें। इससे मुख्य सड़क पर आने वाले दूसरे वाहन चालक को अचानक स्टीयरिंग मोड़कर ब्रेक लगाना पड़े तो उसके चालक का झुंझलाना वाजिब है। वह भी तब जब इन हालात में कोई निरीह राहगीर कुचलने से बच जाए तो उसके रंज की तीव्रता बढ़ना भी स्वाभाविक है। इन हालात में हमारा दायित्व है कि हम क्षमा मांग लें और आगे बढ़ें। यदि पिटने के भय से हम वहां से भाग भी खड़े हों और प्रभावित गाड़ी वाला पीछा करके भीड़ भरे स्थान पर आपको गरियाने आ जाए तब भी सॉरी के दो बोल आपका काम चला सकते हैं। जब प्रभावित कार चालक अपने परिवार की महिलाओं और बुजुर्ग के साथ हो और अचानक आपको महिला चालक के रूप में सामने पाए तो उसका मकसद सिर्फ आपको उलाहना देना ही हो सकता है।वह राजधानी के सार्वजनिक स्थल पर छेड़खानी नहीं कर सकता। इस पर भी यदि वो पच्चीस वर्षीय वाहन चालक जैन परिवार का लड़का हो तो क्षमा भरे दो बोल उसके गुस्से पर घड़ों बर्फीले पानी का काम कर सकते हैं। क्योंकि उसने अपने संस्कारों से जाना है कि क्षमा वीरों का आभूषण होता है। ये सब तब संभव है जब आप सड़कों की यात्रा खेल भावना से करते हैं।

    बेशक सड़कों पर चलते समय कानून हर पल हमारा तरफदार होता है। हमारा अधिकार है कि हम अपने ऊपर होने वाली ज्यादतियों के लिए कानून का सहारा लें। कानून सड़क पर चलने वाले हर राहगीर और वाहन चालक पर समान रूप से लागू होता है। सड़क पर गाड़ी चलाते समय आप स्त्री या पुरुष नहीं केवल चालक होते हैं। आपकी गाडी़ की पहचान के लिए परिवहन विभाग नंबर जारी करता है जिस पर आप स्त्री या पुरुष किसी का भी नाम लिखवा सकते हैं। ये नाम तब तक सार्वजनिक होता है जब तक आपका वाहन सड़क पर होता है। इसे आप गैरेज में रख दें तो ये आम जनता से छुपाया जा सकता है। सड़क पर आप ये नहीं बोल सकते कि मेरे वाहन का रजिस्ट्रेशन नंबर और नाम आपने उजागर कर दिया इससे मेरी स्त्री अस्मिता चोटिल हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने रेप पीड़िता या स्त्री अत्याचार से पीड़िता की पहचान उजागर न करने का कानून बनाया है, सड़क पर चलने वाले वाहन की चालक स्त्री का नाम छुपाने का कोई प्रावधान उसने नहीं किया है। यातायात नियमों में साफ प्रावधान है कि यदि कोई वाहन चालक असावधानी से वाहन चलाता है तो उसका लाईसेंस निरस्त किया जा सकता है। इसके बावजूद परिवहन विभाग की भर्राशाही के कारण गलत लाईसेंस जारी होना और उसका निरस्त न होना लगभग मजाक बना हुआ है।

    दरअसल आजादी के बाद से कांग्रेस की सरकारें आम नागरिकों को शैतान पर कंकर मारने की सोच से हांकती रहीं हैं। सर ए ओ ह्यूम ने भारतीयों की कांग्रेस को अंग्रेजों के शॉक एब्जार्बर के लिए बनाया था। समय के साथ लोगों ने अंग्रेजों को शैतान पाकर कंकर फेंकने शुरु कर दिए और वही कांग्रेस स्वाधीनता संग्राम की वजह बनी।महात्मा गांधी जानते थे कि ये मानस आगे चलकर आत्मघाती साबित होगा इसलिए उन्होंने कहा कि कांग्रेस का काम अब खत्म हो गया इसे समाप्त कर दिया जाना चाहिए था। इसके बावजूद सत्ता लोलुपों ने उसे चलने दिया। उन्होंने कंकर मारने के इस भाव को राजाओं की ओर, फिर सामंतों की ओर, फिर पूंजीपति सेठों की ओर मोड़ दिया। बालीवुड की फिल्में नायक और खलनायक के दो ध्रुवों के बीच ही झूलती रहती हैं। खलनायक जितना पीटा जाएगा नायकत्व उतना ज्यादा उभरेगा। आधुनिक भारत में यही भाव अभिशाप बन गया है। कश्मीर में शैतान पर कंकर मारने वाला यही भाव सेना को खलनायक बनाए फिर रहा है और सेना के बूटों तले रौंदा जा रहा है। देश की जनता ने सत्ता की चाभी भाजपा को सौंपी कि वह इस गलती को नहीं दुहराएगी। जबकि भाजपा आज उससे बड़ी कांग्रेस साबित हो रही है। महिला वोटों की खेती के लिए उसने बालिका से बलात्कार करने वालों के खिलाफ सख्त कानून बना दिए। जबकि दोषियों को दंड देने के पर्याप्त विधान पहले से मौजूद थे।

    इसका विपरीत असर ये हुआ है कि आम स्त्री के मन में असुरक्षा का भाव घर कर गया है। वह सोचती है कि हर पुरुष रेपिस्ट है, अत्याचारी, आतताई है।जबकि हकीकत में पुरुष और स्त्री एक दूसरे के पूरक हैं। भोपाल के प्रेस काम्पलेक्स में घटित वाहन दुर्घटना को भी स्त्री के विरुद्ध साजिश बताने की कोशिश की जा रही है। लापरवाही से उपजे तनाव को क्षमा के दो बोल से ठंडा किया जा सकता था। दुर्घटना का एक पक्ष टीवी की एंकर स्वयं हो तब तो एकमात्र यही अपेक्षा की जा सकती है। पर समस्या शैतान पर कंकर फेंकने वाली सोच में निहित है। उस स्त्री के सलाहकार जब उसे उकसा रहे हों कि उसे गलती के लिए टोका जाना स्त्री अस्मिता पर प्रहार है। पत्रकार होते हुए कोई भला उसे कैसे टोक सकता है। तब रायता फैलना स्वाभाविक ही है। फिर जब इसमें राजनीति प्रविष्ट हो जाए। कांग्रेस के नेता, ठेकेदार, और माफिया शामिल हो जाएं तो फिर जाहिर है कि भाजपा की मौजूदा सरकार को लानत मलानत से कौन बचा सकता है। इस पर भी जब विपक्ष की बागडोर किसी पुतुल प्रेमी को सौंप दी गई हो तो फिर पुलिस को हर दिन तैयार रहना होगा कि उस पर प्रदेश भर के विभिन्न स्थानों पर स्त्री की रक्षा न कर पाने का लांछन जरूर लगेगा।

    समाज के जिम्मेदार लोगों को सोचना होगा कि सड़क पर चलने वाले वाहन धारक यदि अपने चालक की लापरवाही का भूल सुधार न करेंगे तो सड़कें खेल का मैदान बनने की जगह युद्ध भूमि बन जाएंगी। फिर जब आप युद्ध भूमि में प्रवेश कर जाएं तो फिर स्त्री, बुजुर्ग या लाचार होने का कोई मतलब ही नहीं रह जाता है। घटनास्थल की सच्चाई से भागकर आप इसे युद्ध की पृष्ठभूमि में ले जाना चाहते हैं तो फिर आपकी नियत आसानी से समझी जा सकती है। विषय पुलिस की विवेचना से ज्यादा आत्मचिंतन का है। इसे समझेंगे तो न केवल यातायात, खेल बन जाएगा बल्कि, देश भी सीरिया बनने से बच जाएगा।

  • घाटा देने वाली मिल खाक,छीने रोजगार

    घाटा देने वाली मिल खाक,छीने रोजगार


    भोपाल,25 फरवरी,(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।चांदबड़ स्थित न्यू भोपाल टेक्सटाईल मिल की नई यूनिट भीषण आग के चलते राख हो गई है। अपनी स्थापना के साल 1937 से लगातार घाटा दे रही इस मिल को मुनाफे में लाने के लिए जुलाई 2013 में यहां नई यूनिट लगाई गई थी। इसके बावजूद नई और पुरानी दोनों यूनिटें लगातार घाटा देती जा रहीं थीं। सूत्र बताते हैं कि इसी के चलते मिल में कल रात रहस्यमयी आग से पूरी यूनिट स्वाहा हो गई और लगभग एक हजार परिवार बेरोजगार हो गए हैं।

    मिल के प्रबंधक अजय दीक्षित ने इस मुद्दे पर बात करने से इंकार कर दिया। इसके बावजूद फैक्टरी के सूत्रों ने बताया कि कल रात की पारी में करीबन ढाई बजे जब ब्लो रूम में श्रमिकों ने चिंगारियां देखीं तो उन्होंने उन्हें बुझाने के लिए फव्वारे चालू किए। तब वाटर लाईन में पानी ही नहीं था इसलिए आग मशीन के ऊपर पड़े यार्न के कचरे तक पहुंच गई। घबराए श्रमिकों ने जब फायर उपकरणों का प्रयोग करना चाहा तो वे खाली निकले। श्रमिकों को आपात स्थिति से निपटने का प्रशिक्षण भी नहीं दिया गया था। इसलिए आग भड़कने के बावजूद उन्होंने मशीनें बंद नहीं कीं। आपात कालीन स्थिति से निपटने में पूरी तरह नाकाम प्रबंधन भी वक्त पर मौजूद नहीं था। सुपरवाईजर तय नहीं कर पा रहे थे कि अब क्या किया जाए। मिल का अग्निशमन अमला जब तक घटना स्थल पर पहुंचता तब तक आग पूरी यूनिट तक पहुंच चुकी थी।
    घबराए प्रबंधन ने आग की सूचना फायर ब्रिगेड तक दी लेकिन तब तक पूरी नई यूनिट भीषण आग से घिर चुकी थी। आनन फानन में सेना तक को सूचना दी गई। बाद में जेसीबी मशीनों से मिल की दीवारें तोड़ी गईं तब आग पर पानी की बौछारें पहुंच सकीं। सुबह तक आग पर काबू नहीं पाया जा सका था। मिल प्रबंधन से श्रमिकों को सुबह की पारी में आने से रोक दिया और उन्हें आश्वासन दिया गया कि उनकी हाजिरी होगी और पारिश्रमिक भी दिया जाएगा।
    गौरतलब है कि कपड़ा मंत्रालय के हस्तक्षेप के बाद मिल में 107 करोड़ रुपए का निवेश किया गया था। पहली किस्त में 27 करोड़ और दूसरी किस्त में 81 करोड़ दिए गए थे। इस दौरान केवल यार्न का धागा बनाने की यूनिट लगाई गई थी। तत्कालीन कपड़ा मंत्री संबाशिवा राव ने दूसरे चरण की शुरुआत करते हुए कहा था कि मिल का उत्पादन दोगुना हो जाएगा और ये मुनाफा कमाने लगेगी।
    1937 में स्थापित इस मिल को औद्योगिक और वित्तीय पुननिर्माण बोर्ड (बीआईएफआर) ने घाटा पहुंचाने वाली मिल करार दिया था। मध्यप्रदेश की सात मिलों में से पांच को अव्यावहारिक इकाईयां बताकर बंद कर दिया गया था। इसके बाद बुरहानपुर की ताप्ती मिल और भोपाल की इस इकाई में सरकार ने और भी निवेश किया था। इसके बावजूद ये इकाईयां आत्मनिर्भर नहीं हो पाईं. नई सरकार ने इन मिलों के प्रबंधन से उनके कामकाज का ब्यौरा मांगा है जिसके चलते प्रबंधन अपनी गलतियां छुपाने का जतन कर रहा है। बताते हैं कि मिल प्रबंधन ने षड़यंत्र पूर्वक ऐसे हालात निर्मित कर दिए कि आग भड़की और उसे समय पर बुझाया भी नहीं गया।

  • अपराधी का पीछा करेगा अब कंप्यूटर

    अपराधी का पीछा करेगा अब कंप्यूटर

    अपराधी न्याय प्रणाली को फास्ट ट्रैक बनाने के लिये सीसीटीएनएस डिजिटल पुलिस पोर्टल का शुभारंभ

    * दीपक राजदान

    जैसे-जैसे अपराध बढ़ते जा रहे हैं और अपराधी तकनीक का सहारा ले रहे हैं, ऐसे में राज्यों में कानून तोड़ने वालों को सजा दिलाने में पुलिस जांचकर्ताओं को कठिन चुनौती का सामना करना पड़ता है। यद्यपि इस स्थिति में क्रान्तिकारी बदलाव आ रहा है। इस वर्ष अगस्त माह में भारत सरकार ने डिजिटल पुलिस पोर्टल का शुभारंभ किया, यह भारत सरकार के क्राइम एण्ड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एण्ड सिस्टमस का एक अंग है। यह न केवल पुलिस अधिकारियों द्वारा अपराधियों को तेजी से पकडने में मदद करेगा बल्कि अपराध पीडि़त को समाधान की प्रक्रिया में भी ऑनलाइन मदद करेगा।

    देश में अपराधों में बढ़ोतरी का ग्राफ बढ़ा है वर्ष 2014 में अपराधों की संख्‍या 28.51 लाख थी जो वर्ष 2015 में बढ़कर 29.49 लाख हो गई। केन्द्रीय गृह मंत्रालय की नवीनतम वार्षिक रिपोर्ट (2016-17) के अनुसार वर्ष 2011 में कुल उपलब्ध अपराध आंकड़ों में आईपीसी अपराधों का प्रतिशत हिस्सा 37.2 प्रतिशत था औऱ यह वर्ष 2015 में बढ़कर 40.3 प्रतिशत हो गया। अपराध दर में यह बढोत्तरी प्रति एक लाख जनसंख्या पर वर्ष 2012 में 497.9 से वर्ष 2015 में 581.8 हो गयी।

    इस तरह की परिस्थितियों में विभिन्‍न सुविधाओं से युक्‍त डिजिटल पुलिस पोर्टल स्‍थि‍‍ति में परिवर्तन का परिचायक हो सकता है। सीसीटीएनएस पोर्टल जांचकर्ताओं को पूरे देश में किसी भी अपराधी के इतिहास की पूरी जानकारी देगा। गूगल टाइप एडवान्स सर्च इंजन से सुसज्जित एवं विश्लेषण जानकारी देने में सक्षम, यह पोर्टल देश की अपराधी न्याय प्रणाली का आधार साबित हो सकता है। राज्य पुलिस संगठनों और जाँच एजेंसी जैसे सीबीआई, आईबी, ईडी और एनआईए के लिए यह डिजिटल पुलिस पोर्टल, 11 सर्च और 44 रिपोर्ट की सुविधाओँ के साथ, अपराध और अपराधियों के राष्ट्रीय डेटाबेस उपलब्ध कराएगा। यह राष्ट्रीय सुरक्षा में सुधार लाएगा और देश में पुलिस की कार्यप्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव लाएगा। डिजिटल पोर्टल नागरिकों को एफआईआर दर्ज करने की ऑनलाइन सुविधा प्रदान करता है। प्रारंभिक रूप से 34 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में सात पब्लिक डिलीवरी सर्विसिज होंगी जैसे कर्मचारियों, किराएदारों, परिचारिकाओँ आदि के पते की पुष्टि, लोक कार्यक्रमों की मेजबानी की इजाजत, वस्तु और वाहन चोरी खोया और पाया आदि की जानकारी उपलब्‍ध होगी। यह पोर्टल अपराधिक जांच को पूरी तरह से नागरिक-मैत्री सेवा के रूप में बदल देगा। नागरिकों की रिपोर्टस और (अनुरोध), जांच कार्य के लिये बिना समय गंवाए सीधे राज्य एवं केन्द्र शासित प्रदेशों की पुलिस को भेजे जा रहे हैं।

    वर्ष 2004 में गृह मंत्रालय ने पुलिस स्टेशनों में स्टेन्ड अलोन आधार पर अपराधिक रिकॉर्डस का कम्पयूटरीकरण करने के उद्देश्य से, राज्‍य पुलिस बलों के आधुनिकीकरण की परियोजना (मार्डनाइजेशन ऑफ स्टेट पुलिस फोरसिस) (एमपीएफ) के एक भाग के रूप में कामन इन्टेगरेटीड पुलिस एप्लीकेशन (सीआईपीए) परियोजना की शुरूआत की। बाद में आपराधिक रिकॉर्डस के राष्ट्रीय डेटाबेस की आवश्यकता महसूस होने पर गृह मंत्रालय ने वर्ष 2009 में सीसीटीएनएस की शुरूआत, सभी पुलिस स्टेशनों को एक कामन एप्लीकेशन साफ्टवेयर के अऩ्तर्गत आपस में जोड़ने और जांच, नीति निर्धारण, डेटा विश्लेषण, अनुसंधान और नागरिक सेवाएं प्रदान करने की।

    यह परियोजना राज्य पुलिस अधिकारियों को अपराध एवं अपराधियों के आंकड़ों को सीसीटीएनएस एप्लीकेशन में दर्ज करने का मंच प्रदान करती है। जिसे राज्य डेटा बेस के माध्यम से स्टेट डाटा सेन्टर, राष्ट्रीय आंकड़ों के लिए नेशनल डाटा सेन्टर से प्राप्त किया जा सकता है। इस परियोजना पर कुल मंजूर व्यय राशि दो हजार करोड़ रुपये है। केन्द्र सरकार राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों को हार्डवेयर, सीसीटीएऩएस सॉफ्टवेयर, कनेक्टविटी, एकीकृत प्रणाली, परियोजना प्रबंधन एवं प्रशिक्षण प्रदान करती है। केन्द्र सरकार ने राज्यों को 1,450 करोड़ रुपये की राशि दी है जिसमें से 1,086 करोड़ रुपये राज्यों औऱ केन्द्र शासित प्रदेशों द्वारा व्‍यय किए जा चुके हैं।

    वर्तमान में, इस योजना के अंतर्गत 15,398 पुलिस स्टेशनों में से 14,284 पुलिस स्टेशनों में सीसीटीएऩएस सॉफ्टवेयर लगाया गया है। 14,284 पुलिस स्टेशनों में से कुल 13,775 पुलिस स्टेशन इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करते हुए शतप्रतिशत एफआईआर दर्ज कर रहे हैं। 15,398 पुलिस स्टेशनों में से 13,439 पुलिस स्टेशन इस योजना में शामिल हैं। 15,398 पुलिस स्टेशनों में से 13,439 पुलिस स्टेशन इस योजना में शामिल है, यह पहले से ही जुड़े हुए हैं। अपराध और अपराधियों के रिकॉर्डस राज्य एवं राष्ट्रीय डेटा बेस से जुड़े हुए हैं। सीसीटीएनएस का प्रयोग करते हुए मार्च 2014 में 1.5 लाख से कम एफआईआर दर्ज हुई जो जून 2017 में बढ़कर 1.25 करोड़ हो गई। 34 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों ने प्रधान सेवाओं जैसे अपराध रिपोर्ट करना, सत्यापन का अनुरोध, कार्यक्रमों की अनुमति इत्यादि के लिए अपने राज्य नागरिक पोर्ट सेवाओँ की शुरूआत की है। 36 में से 35 राज्य एवं केन्द्र शासित प्रदेश राष्ट्रीय अपराध औऱ अपराधिक डेटाबेस के साथ आंकड़े साझा कर रहे हैं। इस प्रणाली में अपराध औऱ अपराधिक आंकड़ों के 7 करोड़ रिकॉर्डस हैं जिसमें 2.5 करोड़ एफआईआर रिकॉर्ड्स औऱ संबद्ध आंकड़े शामिल है।

    सीसीटीएनएस परियोजना का दायरा पुलिस आंकड़ों को अपराधिक न्याय प्रणाली के अऩ्य स्तंभो के साथ एकीकृत करने जैसे न्यायालय, जेल, अभियोग, पैरवी, फोरेंसिक और फ़िंगरप्रिंट्स और किशोर गृहों की पहुंच तक बढ़ाया गया है। इसी के अऩुसार एक नई प्रणाली – अंतर परिचालन आपराधिक न्याय प्रणाली (आईसीजेएस) भी विकसित की गई है। आईसीजेएस प्रणाली का विकास वांछित डेटा पाने के लिए एडवांस सर्च सेवा के साथ एक डैशबोर्ड के रूप में किया गया है। इस आईसीजेएस परियोजना का संचालन एक कार्य समूह द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश श्री मदन बी लोकुर की अध्यक्षता में किया गया है।

    राज्य पुलिस संगठनों और सभी जांच एजेंसियों का डिजिटल पुलिस पोर्टल द्वारा सशक्तिकरण किया गया है। यह पोर्टल सीसीटीएनएस राष्ट्रीय डेटा बेस पर आधारित 11 सर्च और 44 रिपोर्ट प्रदान करता है। यह अग्रिम खोज (एडवांस सर्च) गहन खोज और विश्लेषणात्मक तकनीक से सज्जित है। यह प्रारंभिक खोज दो तरह से पूरी की जा सकती है। खोज के प्रथम चरण में सर्च प्रक्रिया पूर्ण दर्ज किए गए नाम को दिखायेगी (उदाहरणार्थ नाम एवं परिजन नाम) किन्तु जहां एक अथवा दोनों नाम हैं वही रिकॉर्ड देगा। सर्चिंग के द्वितीय चरण में यह आंशिक मेल के साथ रिकॉर्ड प्रदान करेगा और पूर्ण परिणाम भी उपलब्‍ध करायेगा।

    पोर्टल पर विभिन्न प्रकार के फिल्टर्स उपलब्ध हैं जिनके माध्यम से आँकड़े छांटे जा सकते है और नजदीक लाए जा सके है। व्यक्ति के नाम, व्यक्ति एवं परिजन नाम, व्यक्ति एवं धारा/अनुच्छेद, निशुल्‍क आधारभूत खोज और दर्ज एफआईआर पर सटीक खोज, संख्या/मोबाइल नम्बर/इमेल के द्वारा सर्च पूरी की जा सकती है। यह सीसीटीएनएस पोर्टल जांचकर्ताओं को पूरे देश में किसी भी अपराधी के इतिहास की पूर्ण जानकारी प्रदान करेगा।

    यह सॉफ्टवेयर गूगल टाइम एडवांस सर्च इंजन और विश्लेषणात्मक रिपोर्ट्स प्रस्तुत करता है। अभी हाल ही में इस सॉफ्टवेयर का प्रयोग तमिलनाडु की कुछ मानसिक रूप से विकसित महिलाओं को ढूंढने के लिए उत्तराखंड में किया गया और उन्हें उनके परिवार से मिलाया गया। बाद में इस सीसीटीएनएस डेटाबेस को वाहन पंजीकरण के लिए सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय डेटाबेस से जोड़ा जाएगा।

    डिजिटल पुलिस पोर्टल की शुरूआत के बाद से नागरिकों ने पोर्टल पर शिकायतें दर्ज करना शुरु कर दिया है। यह डिजिटल पुलिस पोर्टल दोस्ताना रूप में नागरिक-केंद्रित सेवाओं को सुगम रूप से उपलब्‍ध कराने के लिए सरकार की मदद कर रहा है जो आज के आधुनिक कल्याणकारी राज्य की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

    * श्री दीपक राजदान एक वरिष्ठ पत्रकार हैं और वर्तमान में द स्टेट्समैन, नई दिल्ली में संपादकीय सलाहकार हैं। इस आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं।

  • अड़ीबाज पुलिस और लाचार शिवराज

    अड़ीबाज पुलिस और लाचार शिवराज


    भोपाल,22 नवंबर,(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। मध्यप्रदेश की भारतीय जनता पार्टी सरकार अपनी चौथी पारी के लिए जिन महिला वोटों की खेती कर रही है उसके कारण स्त्री प्रताड़ना के मामलों में तो बाढ़ सी आ गई है। संपत्तियों पर कब्जे के लिए महिलाओं की आड़ लेकर धड़ाधड़ मुकदमे दर्ज हो रहे हैं। इनमें वे मामले भी शामिल हैं जिनमें स्त्रियां सचमुच प्रताड़ित हुईं हैं। इसके बावजूद सरकार की सदाशयता का लाभ लेकर ढेरों प्रकरण हर दिन सामने आ रहे हैं। सरकार की नासमझी और कथनी करनी में अंतर से व्यवस्था कैसे चौपट होती है, ये उसका सटीक उदाहरण है। खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पुलिस मुख्यालय जाकर आपराधिक मामलों की समीक्षा की। हालांकि ये काम गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह का था। पुलिस के जागरूक अधिकारियों ने बढ़ते अपराधों की जो वजहें बताई हैं उनमें मैदान में पुलिस की सक्रियता कम होना तो एक कारण है ही साथ में पुलिस के बीच बढ़ती अड़ीबाजी की घटनाएं भी शामिल हैं।

    कुछ समय से पुलिस के मैदानी पदों पर पदस्थापना के लिए चंदे की दरें जिस तरह बढ़ती रहीं हैं उससे पुलिस अपराध रोकने के बजाए खुद अपराध को बढ़ावा देने वाला संगठन बनकर रह गई है। सिपाही से लेकर तमाम मैदानी पदों पर पदस्थापना के लिए तो चंदा वसूला ही जा रहा है साथ में खामोशी से शहरों में जमे रहने के लिए बाकायदा फीस वसूली जाती है। अड़ीबाजी के मामलों की तो हालत ये है कि हवलदार और एएसआई तक इतने पावरफुल हो गए हैं कि वे टीआई या सीएसपी की फटकार को हवा में उड़ा देते हैं।जब जिले के पुलिस अधीक्षक उन पुलिसवालों के विरुद्ध कार्रवाई करते हैं तो वरिष्ठ पुलिस अधिकारी उन्हें रोक देते हैं।इन पुलिस अफसरों के भी सरकार से अच्छे संबंध बताए जाते हैं इसलिए पुलिस मुख्यालय में बैठे अफसर भी लाचारी महसूस करते हैं। सबसे बड़ी बात तो ये है कि खुद मुख्यमंत्री निवास के बाजू में स्थित श्यामला हिल्स थाने से भी अड़ीबाजी का ये काम धड़ल्ले से किया जा रहा है।

    हाल में पालीटेक्निक कालेज के एक शिक्षक के विरुद्ध एक महिला ने छेड़खानी की शिकायत श्यामला हिल्स थाने में की। थाने में पदस्थ एएसआई शिवेन्द्र मिश्रा ने शिक्षक के घर जाकर पांच लाख रुपए की मांग की। धमकाते हुए कहा कि उस महिला ने बलात्कार की शिकायत की है। यदि तुमने पैसे नहीं दिए तो फिर जेल जाने के लिए तैयार हो जाओ।उस महिला के दो साथी पहले से गवाही के लिए तैयार थे। आरटीओ दलाल के रूप में काम करने वाले संजय पाठक और रेखा परिहार ने ही उस महिला को घरेलू काम के लिए भेजा था और वे ही थोड़ी देर बाद थाने ले गए। रिश्वत का दबाव बनाने के लिए दोपहर में मीडिया के कुछ कैमरामेनों को भी पुलिस ने बुला लिया और शाम के अखबारों में मुकदमा दर्ज होने की सूचना भी दे दी। जबकि खुद पुलिस ने अपने रिकार्ड में शाम को मुकदमा दर्ज होना दिखाया है।

    ये गिरोह पुलिस के निर्देश में कई अन्य लोगों पर भी अड़ीबाजी का काम कर चुका है। रिश्वत की वसूली खुद पुलिस का एएसआई शिवेन्द्र मिश्रा करता है। जबकि गिरोह के सद्स्यों को सरकार से मिलने वाले हर्जाने की राशि और बाद में समझौते के नाम पर वसूली के लिए तैयार किया जाता है। इस घटना की जानकारी पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को भी दी गई लेकिन सभी लाचार थे। कई बड़े अफसरों ने तो टीआई से भी कहा कि मामले की पूरी छानबीन करके प्रकरण दर्ज करो लेकिन एएसआई ने तब तक प्रकरण दर्ज करके चालान भी अदालत में प्रस्तुत कर दिया। ये बात सही है कि अदालत में ये प्रकरण नहीं टिकेगा।साक्ष्य और परिस्थितिजन्य स्थितियों के बीच आरोपी खुद को बेगुनाह साबित कर लेगा,लेकिन तब तक वो अदालतों के चक्कर ही काटता रहेगा। इस तरह के एक नहीं सैकड़ों प्रकरण प्रदेश भर में रोज दर्ज किए जा रहे हैं। महिला अपराधों के मामलों में यदि पुलिस प्रकरण दर्ज नहीं करती है तो उसे दंड का भागी बनना पड़ता है ये भय दिखाकर अड़ीबाज पुलिस वाले दिल से प्रकरण दर्ज करने में जुट गए हैं।

    मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद को सख्त दिखाना चाहते हैं लेकिन उनकी पुलिस सरकार की असफलताओं को करीब से देख रही है। सरकार के कथित भ्रष्टाचारों की पोल भी सबसे पहले पुलिस के सामने ही खुलती है। इससे पुलिस की अड़ीबाजी की प्रवृत्ति खुलकर सामने आ रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह, डीजीपी ऋषि शुक्ला और तमाम बड़े अधिकारी पुलिस सुधार के नाम पर बैठकें कर रहे हैं। निर्देश जारी कर रहे हैं लेकिन हकीकत में जमीन पर स्थितियां पूरी तरह विपरीत हैं। पुलिस सड़कों पर गश्त लगा रही है। मैदानी अफसरों को कहा गया है कि अपराधियों की छानबीन करो ताकि जनता को पुलिस की मौजूदगी का भरोसा हो सके। लेकिन पुलिस को मैदान में उतारना अपराधों को और भी बढ़ाने की वजह बन रहा है। पुलिस के कामकाज का आकलन करने की व्यवस्था धराशायी होने से बदमाश पुलिस वाले तो मजा मौज कर रहे हैं जबकि हम्माली वाली ड्यूटी ईमानदार पुलिस वालों के पल्ले पड़ रही है।

    गृहमंत्री भूपेन्द्रसिंह पुलिस महकमे के बजाए परिवहन महकमे की व्यवस्थाएं संभालने में ज्यादा रुचि रखते हैं। उन पर सरकार की मैदानी व्यवस्थाएं संभालने की भी जवाबदारी है। मुख्यमंत्री के चहेते मंत्री होने के नाते उन्हें हर काम की आजादी भी मिली हुई है। इसके बावजूद पुलिस मुख्यालय के अफसरों ने उनके आदेशों के बजाए सीधे मुख्यमंत्री के आदेशों पर अमल करने की नीति अपना रखी है। यही वजह है कि गृहविभाग पर सीधे मुख्यमंत्री का हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है।

    पुलिस मुख्यालय के आला अफसर भी दबी जुबान से इन स्थितियों को बयान कर रहे हैं। लेकिन उनका कहना है कि बढ़ते अपराधों की वजह पुलिस नहीं बल्कि सरकार की असफलताएं हैं। अपने लंबे कार्यकाल में सरकार रोजगार के साधन नहीं बढ़ा सकी है। आधारभूत ढांचे के विकास के नाम पर सरकार ने भारी धन व्यय किया है लेकिन इसका असर निचले स्तर तक नहीं पहुंचा है। चंद उद्योगपतियों की गिरफ्त में होने के कारण भारी बजट का अधिकांश हिस्सा बाजार में पहुंचने के बजाए सीधे उद्योगपतियों के खातों में पहुंचा है। अधिकतर उद्योगपतियों का जुड़ाव राष्ट्रीय नेताओं और प्रदेश के बाहर के औद्योगिक घरानों से है इसलिए मुनाफे की रकम भी प्रदेश में खर्च नहीं की गई है। प्रदेश पर कर्ज बढ़ा जिससे ब्याज भी बढ़ता गया है। नतीजतन आर्थिक अपराधों की संख्या में भारी इजाफा हो रहा है। किसानों की दुर्दशा और सरकार के शहरीकरण के अभियानों ने भी व्यवस्था को चौपट कर दिया है।

    भारतीय जनता पार्टी की सरकार अपने कुशल संगठन के भरोसे चौथी बार भी सत्ता में आने की तैयारी कर रही है। जबकि प्रमुख विपक्षी दल के रूप में कांग्रेस आज भी मैदान में धराशायी है। उसका न तो संगठन है और न ही उसके नेताओं में कोई सुरताल है। मैदान में लंबे समय से पदस्थ अफसरों ने जब महसूस कर लिया कि सरकार का हर काम चंदे से जुड़ा है तो उन्होंने अपनी मनमानी शुरु कर दी है। जिसका नतीजा बढ़ते अपराधों के आंकडों से साफ महसूस किया जा सकता है। सरकार अपराध पर नियंत्रण के लाख दावे करे लेकिन आने वाले समय में अपराधों की ये परिपाटी और भी तेजी से बढ़ती महसूस होगी।

  • बलात्कारियों को सजा दिलाने पुलिस ने डॉ. हर्ष शर्मा को बुलाया

    बलात्कारियों को सजा दिलाने पुलिस ने डॉ. हर्ष शर्मा को बुलाया


    भोपाल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)3 नवंबर। 31 अक्टूबर की रात हबीबगंज रेलवे स्टेशन के नजदीक घटित सामूहिक बलात्कार की वारदात के बाद पुलिस ने अब दोषियों को दंडित कराने के लिए मोर्चा संभाल लिया है। बेहद शर्मनाक गेंगरेप की इस घटना के बाद आज पुलिस ने फोरेंसिक विशेषज्ञ को लेकर घटना स्थल का बारीकी से मुआयना किया। कई नए साक्ष्य भी जुटाए ताकि दोषियों को दंडित कराने के लिए सबूतों की कड़ी को आपस में जोड़ा जा सके। इसके लिए पुलिस ने प्रदेश के सबसे बड़े फोरेंसिक वैज्ञानिक डॉ.हर्ष शर्मा को बुलाया है।

    सागर स्थित राज्य न्यायालयिक विज्ञान प्रयोगशाला के निदेशक डॉ.हर्ष शर्मा ने आज घटना स्थल का बारीकी से मुआयना किया। उन्होंने पुलिस को वारदात से जुड़े कई अहम सबूतों को एकत्र करने की सलाह दी। घटना स्थल पर मौजूद अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक तकनीकी सेवाएं दिनेश चंद सागर ,डी.पी.गुप्ता आईजी रेल, भोपाल स्थित फोरेंसिक शाखा के प्रभारी डॉ.दिनेश शर्मा एवं संबंधित पुलिस थानों के प्रभारी अधिकारियों के साथ घटना से सभी पहलुओं की छानबीन की।

    राजधानी के प्रमुख क्षेत्र में घटित इस घटना के बाद पुलिस को भारी बदनामी झेलनी पड़ रही है। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने पुलिस की अक्षमता के लिए सरकार को दोषी ठहराया है। जन न्याय दल के अध्यक्ष एड्व्होकेट बृजबिहारी चौरसिया ने कहा कि बलात्कार जैसे संज्ञेय अपराध में पीड़िता की रिपोर्ट लिखने में पुलिस ने देरी करके सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन किया है। वरिष्ठ पत्रकार अनिल तिवारी ने कहा कि देश की सर्वोच्च अदालत की संविधान पीठ ने ललिता कुमारी विरुद्ध स्टेट आफ यूपी मामले में किसी भी संज्ञेय अपराध में प्रथम सूचना रिपोर्ट तत्काल दर्ज करने के निर्देश दिए थे। दिल्ली में घटित निर्भया कांड के बाद अनुच्छेद 141 में पुलिस एक्ट में संशोधन करते हुए कहा था कि ड्यूटी पर तैनात किसी भी अधिकारी की कर्तव्य निर्वहन में लापरवाही पर धारा 166 ए के तहत कार्रवाई की जाना जरूरी है। इस धारा में लापरवाह अधिकारियों को समुचित आधार पाए जाने पर एक साल की सजा से दंडित किया जा सकता है।

    गौरतलब है कि विदिशा निवासी एक छात्रा जब 31 अक्टूबर को अपनी कोचिंग की पढ़ाई समाप्त करके ट्रेन पकड़कर घर जाने के लिए रेलवे पटरी से गुजर रही थी तभी वहां बैठे दो अपराधियों ने उसका अपहरण कर लिया था। उन्होंने लड़की से से बलात्कार किया और उसके सोने के कर्णफूल और मोबाईल भी छुड़ा लिए। यही नहीं उन्होंने अपने दो साथियों को भी बुला लिया। चारों अपराधियों ने लड़की से सात बार बलात्कार किया और लगभग चार घंटों तक उसे बंधक बनाए रखा था। बाद में अपराधियों के चंगुल से छूटकर लड़की ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। इस मामले में एमपीनगर पुलिस और हबीबगंज पुलिस ने अपना क्षेत्र न होने के कारण कार्रवाई करने से इंकार कर दिया। बाद में रेलवे पुलिस ने प्रकरण कायम कर मामले की तफतीश शुरु की।

    सबसे बड़ी बात तो ये है कि खुद लड़की ने अपने पिता के साथ मिलकर एक आरोपी को पक़ड़ा और उसे पुलिस के सुपुर्द किया। आज जब ये मामला अखबारों की सुर्खियां बना तब सरकार और पुलिस सभी सक्रिय हुए।

    मध्यप्रदेश सरकार को इस मामले में काफी अपयश झेलना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर पुलिस महकमें में अनावश्यक हस्तक्षेप करने के आरोप लगाए जा रहे हैं। जबकि गृह मंत्री भूपेन्द्र सिंह पर भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण देने के आरोप लग रहे हैं। पुलिस महानिदेशक ऋषि कुमार शुक्ला ने इस संबंध में पुलिस मुख्यालय में विशेष बैठक ली और आरोपियों को दंडित कराने के निर्देश दिए। भोपाल डीआईजी संतोष सिंह की कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान लगाए जा रहे हैं।

  • डंपर कांड के विधिक सलाहकार तनखा को  लोकायुक्त की नियुक्ति गलत नजर आई

    डंपर कांड के विधिक सलाहकार तनखा को लोकायुक्त की नियुक्ति गलत नजर आई


    सरकार को घेरने में जुटी कांग्रेस की लाबी की करारी शिकस्त
    भोपाल 17 अक्टूबर, (पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। डंपर खरीदी कांड में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को क्लीनचिट दिलाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले हाईकोर्ट के वकील विवेक तनखा को अब नए लोकायुक्त जस्टिस नरेश गुप्ता की नियुक्ति गलत नजर आ रही है। विशेष कृपा से राज्यसभा सांसद बने विवेक तनखा का कहना है कि सरकार ने नैतिक आधार पर ये फैसला गलत लिया है।उनका कहना है कि नए लोकायुक्त महोदय वर्तमान उपलोकायुक्त जस्टिस माहेश्वरी से छह साल जूनियर हैं इसलिए ये फैसला न्यायपालिका की मान्य परंपराओं के विपरीत है।

    सामान्य प्रशासन विभाग ने बाकायदा अधिसूचना जारी करके जस्टिस नरेश गुप्ता की नियुक्ति की घोषणा कर दी है। वे दीवाली से एक दिन पहले कल अपना कार्यभार ग्रहण करेंगे।जस्टिस गुप्ता 2010 में मप्र हाईकोर्ट में न्यायाधीश बने थे।जनवरी 2016 में उनका तबादला ग्वालियर कर दिया गया। वे 30 जून 2017 को रिटायर हुए थे।

    जस्टिस गुप्ता की नियुक्ति पर सबसे पहले राज्यसभा सांसद और कांग्रेस के राष्ट्रीय विधि प्रकोष्ठ से जुड़े विवेक तनखा ने ट्वीट करके कहा कि सरकार ने रातोंरात लोकायुक्त बनाकर विधि के मान्य सिद्धांतों को तोड़ा है।उन्होंने नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह की चुप्पी पर भी आश्चर्य व्यक्त किया। इस मामले में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने बताया कि उन्होंने लगभग सवा साल से खाली पड़े लोकायुक्त पद को भरने के लिए सरकार को पत्र लिखा था। इसके जवाब में सरकार ने उन्हें सूचित किया कि मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के माननीय चीफ जस्टिस ने लोकायुक्त पद के लिए जस्टिस नरेश गुप्ता का नाम भेजा है। जाहिर है विपक्ष के नेता होने के नाते मैंने उसका अनुमोदन कर दिया।

    जस्टिस गुप्ता की नियुक्ति पर सवाल उठाने वाले आरटीआई एक्टिविस्ट अजय दुबे का कहना है कि लोकायुक्त की नियुक्ति को पहले कैबिनेट से मंजूरी ली जानी थी। बाद में इसे राज्यपाल के पास भेजा जाना था। लेकिन सरकार ने प्रस्ताव को सीधे राज्यपाल के पास भेज दिया। उनका सवाल है कि सरकार यह बताए कि आखिर ऐसी कौन सी जल्दी थी जो सरकार ने नियुक्ति का प्रस्ताव सीधे राज्यपाल को भेज दिया। जब सवा साल से पद खाली था तो कुछ दिन और इंतजार किया जा सकता था।हालांकि जब उनसे पूछा गया कि प्रक्रिया को छोड़कर इस नियुक्ति में गलत क्या है। इसके जवाब में उन्होंने चुप्पी साध ली।

    दरअसल ये मामला मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के वकीलों और कांग्रेस समर्थित जजों की लॉबी से जुड़ा है। विवेक तनखा लंबे समय से मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के फैसलों में दबदबा बनाए रहे हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही राजनीतिक दलों के विधि सलाहकारों के हित साधने में उन्हें महारथ हासिल है। इस बात का जस्टिस नरेश गुप्ता लंबे समय से विरोध करते रहे हैं। न्यायपालिका ने टकराव टालने के लिए ही उन्हें जबलपुर बेंच से हटाकर ग्वालियर भेज दिया था। सूत्रों का कहना है कि उप लोकायुक्त जस्टिस यू सी माहेश्वरी ने सवा साल में लगभग सौ मामलों पर स्वतः संज्ञान लेकर प्राथमिक जांच शुरु कराई थी। बाद में जब उन्हें पता लगा कि ये मामले बाकायदा षड़यंत्र पूर्वक लोकायुक्त संगठन को भेजे गए हैं तो उन्होंने उन मामलों की फाईलें ठंडे बस्ते में डाल दीं। इसी को लेकर तनखा की लॉबी लंबे समय से जस्टिस यू सी माहेश्वरी पर फैसले न लेने के आरोप लगा रही थी। उप लोकायुक्त के माध्यम से अपना राजनीतिक हित साधने में जुटे तनखा और उनके सहयोगियों का कहना है कि पूर्व लोकायुक्त जस्टिस पीपी नावलेकर ने अपने पूरे कार्यकाल में नौ मामलों में स्वतः संज्ञान लेकर जांच शुरु कराई थी जबकि उप लोकायुक्त यूसी माहेश्वरी ने सौ मामलों को संज्ञान में लेकर जांच शुरु कराई पर उन्हें लंबित कर दिया।

    अब जबकि सरकार ने हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की सिफारिश पर अमल करते हुए जस्टिस गुप्ता की नियुक्ति की प्रक्रिया आनन फानन में पूरी कर ली तो इससे सरकार को घेरने में जुटी तनखा की लॉबी बौखला गई है। उसका मानना है कि इतने लंबे समय तक लोकायुक्त नियुक्त न होने के दौरान विवेक तनखा की लॉबी ने जो मामले लोकायुक्त संगठन में भेजे उनसे कांग्रेस की रणनीति तो उजागर हो गई है लेकिन उनके लंबित रहने से सरकार को घेरने का उनका मकसद कामयाब नहीं हो सका है। इसे सरकार के संसदीय कार्य मंत्री नरोत्तम मिश्रा का मास्टर स्ट्रोक भी कहा जा रहा है। जस्टिस गुप्ता की नियुक्ति के बाद भ्रष्टाचार के मामलों पर फैसले लेने में तेजी आएगी और लंबित पड़े मामलों का निराकरण जल्दी हो जाएगा। इससे लंबे समय से लोकायुक्त संगठन में रहकर सरकार के विरोध में षड़यंत्र कर रहे जजों और अफसरों की भी भूमिका उजागर हो गई है। इससे लोकायुक्त संगठन में अब बड़े बदलावों की भी संभावना व्यक्त की जाने लगी है।

  • डेरा सच्चा सौदा के समर्थक हत्याएं और आगजनी पर उतरे

    डेरा सच्चा सौदा के समर्थक हत्याएं और आगजनी पर उतरे

    पंचकूला(विनीत कुमार)।डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम को सीबीआई की विशेष अदालत ने बलात्कार मामले में दोषी करार दिया है। उन्हें इस मामले में सजा 28 अगस्त को सुनाई जाएगी।अदालत के इस फैसले के बाद उनके समर्थकों ने पंजाब और हरियाणा में कई हिंसक वारदातों को अंजाम दिया जिससे पच्चीस से अधिक लोग मारे गए हैं। करोड़ों रुपयों की संपत्ति जला दी गई है। दो रेलवे स्टेशनों को आग में फूंक दिया गया है। हाईकोर्ट ने डेरा सच्चा सौदा की पूरी संपत्ति को राजसात करने के आदेश दिए हैं। अदालत ने कहा है कि डेरा समर्थक जिस सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाएंगे उसकी कीमत डेरा की संपत्ति से वसूल की जाएगी।

    प्रशासन ने हरियाणा के पंचकुला और पंजाब के फिरोजपुर, बठिण्डा और मानसा में कर्फ्यू लगा दिया गया है. फतेहाबाद, जयतो और फरीदकोट को रेड अलर्ट पर रखा गया है.हरियाणा के पुलिस महानिदेशक ने बताया है कि राज्य में 2500 लोगों को हिरासत में लिया गया है. राज्य के गृह सचिव राम निवास के मुताबिक हरियाणा में हालात नियंत्रण में है. समाचार एजेंसियों के मुताबिक दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर को जानोमाल की हिफाजत के लिए एहतियाती कदम उठाने के लिए कहा है. हरियाणा के सिरसा में हालात पर काबू करने के लिए पुलिस ने सेना की मदद मांगी है.

    दिल्ली पुलिस ने बताया है कि हिंसा फैलाने के मामले में दिल्ली से तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया है. दो लोगों को बदरपुर से गिरफ्तार किया गया है जबकि एक व्यक्ति को ख़्याला से गिरफ्तार किया गया है.संगरूर में पुलिस ने चार लोगों को पेट्रोल बम के साथ गिरफ्तार किया है. पंचकुला में कुछ सरकारी इमारतों में भी आग लगा दी गई है.हरियाणा के मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार अमित आर्य ने एक बयान जारी कर बताया, “हमने पंचकुला में कर्फ्यू लगाया है. आगे की कार्रवाई के लिए हरियाणा कैबिनेट की बैठक की जा रही है.”

    हरियाणा और पंजाब में हो रही हिंसा का असर रेल यातायात पर भी पड़ा है. रेलवे के प्रवक्ता अनिल सक्सेना ने बताया है कि उत्तर रेलवे ने इस रूट से आने वाली ट्रेनों को रद्द कर दिया है.
    रेलवे प्रवक्ता ने दिल्ली के आनंद विहार रेलवे स्टेशन पर खड़ी रीवा एक्सप्रेस के दो डिब्बों को आग लगाए जाने की घटना पर स्पष्टीकरण भी दिया है. सक्सेना ने कहा, “आनंद विहार में एक घटना सामने आई थी लेकिन ये डिब्बे यार्ड में खड़े थे और किसी ने इनमें आग लगा दी. लेकिन किसी भीड़ के इसमें शामिल होने की बात सामने नहीं आई है.”

    हिंसा की घटनाओं के चलते 26 अगस्त को पंजाब के कई ज़िलों में स्कूल और कॉलेजों को बंद रखने के लिए कहा गया है. राजस्थान के गंगानगर ज़िले में इंटरनेट सेवाएं बंद की गई हैं.
    दिल्ली मेट्रो को भी अलर्ट पर रखा गया है. समाचार एजेंसी ने सीआईएसएफ़ के महानिदेशक ओपी सिंह के हवाले से बताया कि उत्तर प्रदेश और हरियाणा से लगे सभी स्टेशनों पर चौकसी बढ़ा दी गई है.

    उधर, डेरा सच्चा सौदा के एक प्रवक्ता डॉक्टर दिलावर इंशा ने कहा है, “हमारे साथ अन्याय हुआ है. हम अपील करेंगे. हमारे साथ वही हुआ है जो इतिहास में गुरुओं के साथ हुआ था. डेरा सच्चा सौधा मानवता की भलाई के लिए है. सभी शांति बनाएं रखें.”

    पंजाब के मानसा और मलोट में रेलवे स्टेशन को डेरा समर्थकों ने आग लगा दी है. फिरोजपुर में प्रशासन ने कर्फ्यू जैसे क़दम उठाने के लिए कहा है. अमृतसर और तरणताल में पुलिस के आला अधिकारियों की बैठक हो रही है.रेड अलर्ट के साथ-साथ सीमा पर चौकसी बढ़ा दी गई है. पंजाब और हरियाणा के कई स्थानों से डेरा समर्थकों द्वारा हिंसा की ख़बरें मिल रही हैं. सुरक्षा बलों और डेरा समर्थकों के बीच झड़प में 11 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है. कई लोग घायल हुए हैं.

    हरियाणा के पंचकुला और पंजाब के फिरोजपुर, बठिण्डा और मानसा में कर्फ्यू लगा दिया गया है.
    उधर, पंजाब और हरियाणा दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने डेरा समर्थकों से अमन और शांति बनाए रखने की अपील की है. कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा है कि हम किसी को राज्य में माहौल ख़राब करने की इजाजत नहीं देंगे.

    मई 2002 में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत सिंह पर यौन शोषण के आरोप लगाते हुए डेरा की एक साध्वी ने गुमनाम पत्र तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भेजा था. जिसकी एक प्रति पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को भी भेजी गई.हाईकोर्ट ने 24 सितंबर 2002 को साध्वी यौन शोषण मामले में जांच के आदेश दिए.पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने 10 नवंबर 2003 को सीबीआई को एफआईआर दर्ज कर जांच के आदेश जारी किए.

  • लोअर क्लास की चोटी

    लोअर क्लास की चोटी

    रजनीश जैन

    चोटी कटवा घूम रहा है। स्त्रियों से उनकी अमूल्य निधि छीनने। लटें, गेसू, ज़ुल्फें, केश, घटाऐं ही तो हैं जो पुरुषों की कल्पना में असल स्त्रीधन है।…इसीलिए इसे केशराशि भी कहा गया। यही एक ऐसी राशि है जो सरकार के सारे प्रतिबंधात्मक कदमों के बाद बढ़ने से नहीं रुकती। विभिन्न वित्तवर्गों की स्त्रियों के पास केशराशि अलग अलग मात्रा में मौजूद होती है। ऐसी इकलौती राशि भी है जो विलोम प्रकृति रखती है। जो स्त्री जितनी विपन्न होगी उसके पास केशराशि की अधिक मात्रा होगी।स्त्री के अमीर होते जाने का एक संकेत यह भी है कि उनकी केशराशि उसी तदात्म्य में सीमित होती जाती है। अमीरी में केशराशि को छोटा किंतु सुघढ़ बगीचे की तरहा कृत्रिम विन्यास दिये जाने के प्रयास होते हैं।
    गरीब स्त्रियों के पास प्रचुर मात्रा में केशराशि होती है लेकिन गाजरघास की तरह अस्त व्यस्त और बेतरतीब। ‘बिनु पानी साबुन बिना’ सुभाव तो निर्मल हो सकता है। लेकिन जल और साबुन के अभाव में निम्न मध्यमवर्गीय केशराशियों में इससे एक जैवविविधता से भरा वनप्रदेश निर्मित होता है। बिल्कुल सतपुड़ा के घने जंगलों की तरहा। ‘घुस सको तो घुसो इनमें, धँस सको तो धँसो इनमें,घुस न पाती हवा जिनमें…ऊंघते अनमने जंगल’। इस वन में कंघी कभी घुसाई या धँसाई नहीं जाती।उपलब्धता के आधार पर तेल की तहें चढ़ाई जाती हैं। इतना तगड़ा बंदोबस्त होता है कि बारिश का पानी भी तहों को न भेद पाये।
    इस वनीकृत केशराशि में विचरण करने वाला प्रमुख प्राणी जूँ नामक कीट होता है जो अपनी असीमित प्रजनन क्षमता से इन वनों को व्यापक रूप से खसखस के दानों सदृश्य अपनी भावी संततियों की असंख्य मात्रा से आच्छादित कर देता है। इस प्राणी की एक मात्र प्राकृतिक शत्रु वनप्रांत की स्वामिनी की माता, भगिनी, सखी , पुत्रियां ही होती हैं जो एक दूसरे के वनों में अपने तीक्ष्ण नखों से इन प्राणियों का शिकार करने एक के पीछे एक बैठ जाती हैं। शिकार की खोज में कटार जैसी निगाहें और पैनी होकर अभियान चलाती हैं। सूक्ष्म पगडंडियों की अभ्यस्त होते ही जूँ मिलने लगते हैं जिन्हें एहतियात से खींच कर पहले हथेली पर रखकर साईज इत्यादि का मुआयना किया जाता है। फिर दोनों अंगूठों के मध्य दबाकर ‘पिट्ट’ की ध्वनि का श्रवण किया जाता है। स्त्रीस्वभाव में हिंसात्मक तत्व का सर्वोत्तम दर्शन ‘जूँ आखेट’ में ही होते हैं। इस पर शोध होना आवश्यक है कि नाखूनों के बीच दबाकर जूँ को पिचलते वक्त उनके दिमाग में किसका प्रतिबिंब होता है। पति , समाज , व्यवस्था या अपने सपनों में से किसकी हत्या इतनी निर्दयता से कर रही होती हैं वे उस वक्त! जूँ को प्राणदंड देने की इस सुखद और अनंत संतुष्टि देने वाली इस प्रकिया में इतना आनंद होता है कि इसे बहुधा घंटों तक तल्लीनता से किया जाता है। इस प्रक्रिया को यदि पड़ोसिनों की निंदाचर्चा के साथ संपन्न किया जाये तो समय का भान नहीं होता। आईंस्टीन का सापेक्षता के सिद्धांत के आदर्श उदाहरण की तरह। …हालांकि जूँ के निरंतर शिकार की इस परंपरा का सबसे नायाब पहलू यह है कि प्रतिदिन शिकार किए जाने पर भी जूँ की तादाद कभी घटती नहीं और आनंदप्राप्ति का स्रोत शाश्वत अजस्र बना रहता है।
    यह पूरा शिरोधार्य पारिस्थितिकी तंत्र हरेक वन की तरह ही अर्से में इकट्ठा हो गयी अवशिष्ट सामग्री के सड़ने से दुर्गंध युक्त भी हो जाता है लेकिन केशरमणी इस दुर्गंध की इतनी अभ्यस्त होती है कि उसे यह सुगंध ही प्रतीत होती है। कभी कोई प्रेमातुर केशराशि की तैलीय चमक के आकर्षण में निकट आकर गेसुओं की खुशबू से मदहोश होने के फेर में बेहोश होने लगे तब रमणी अपने केशतेल पर शक करती है और गांव के बनिए से भृंगराज की जगह इसबार डाबर आँवला केशतेल की डिमांड करती है।आखिर ब्रांड की बात ही और होती है। बढ़ी हुई कीमत का बोझ या तो ‘वे’ भुगतें या दूकानदार।
    मितरों, …ऊपर यह पर्यावरणीय जानकारियां इस वजह से समझना जरूरी थीं कि इन्हीं में ‘चोटी कटवा ‘ का रहस्य छुपा है। यह कृत्य न अंधविश्वास है न अपराध। यह उक्त पारिस्थितिकी तंत्र के असंतुलन से उपजा उपचार है। बरसाती पानी केशराशि में अतिक्रमण कर चिकट,गंदगी वगैरह से मिलकर दुर्गंध और खुजली पैदा करता है। अमीरों में इसे फंगल इंफेक्शन या रूसी कहा जाता है। जब यह असहनीय हो जाती है तो रमणियों को अपने केश त्यागने की तीव्र इच्छा होती होगी। खुली हवा में सांस लेने की प्राकृतिक इच्छा सासें और समाज नहीं रोक सकतीं। नाई से बाल कटाने की परंपरा बनाई नहीं, ब्यूटीपार्लर का कांसेप्ट पिछड़े इलाकों में पहुंचा नहीं, पहुंच गया है तो मुफ्त में ऊगे बाल कटाने के दो सौ रुपया कौन दे। इसलिए चोटीकाटने का यह कार्य लुकछिप कर किये गये कई घरेलू कार्यों में से ही एक है।
    …दक्षिण में तिरुपति के मंदिर की परंपरा को देखिए। वहां दान में बाल अर्पित करके सफाचट निकल कर भक्तजन आते हैं। इनमें बड़ी तादाद में नारियां भी होती हैं जो धर्म के ही प्रताप से सिर पर खुली हवा के प्रछन्न झोंकों का लुत्फ लेती हैं। बुंदेली में कहावत है ‘जुंआ लगे न लीख मुंडा सबसे ठीक।’ समाज की लादी परंपरा की दवा उन्होंने धार्मिक कर्मकांड में ही ढूंढ़ ली। लोहे को लोहे से काट लिया। पर उत्तर भारत में तिरुपतिबालाजी नहीं हैं। बाल प्रचुरता से हैं। बाल चोटियां बनते हैं और चोटियां कट रही हैं। हल साबुन, शैंपू,कंघी, स्नान , वस्त्रों की सफाई, स्वच्छता में छिपा है पर गरीब की अर्थव्यवस्था आड़े आ जाती है।…घरों में कैद लोअर क्लास महिला क्या करे?…परिवार पाले या बाल संवारे। तो बाल और चोटी लोअर क्लास की ही समस्या है वहीं कटेगी। सदियों से कट रही है, दिख आज रही है।
    (रजनीश जैन, सागर)

  • सफेदपोशों के अपराध

    सफेदपोशों के अपराध

    पुस्तक समीक्षा

    हमारे दिमाग में जमाने से चली आ रही अपराधों की परिकल्पना में चोरी, डकैती, हत्या, आक्रमण, सेंधमारी, यौन उत्पीड़न आदि का ही समावेश हो पाता है।…

    डॉ. हनुमंत यादव
    हमारे दिमाग में जमाने से चली आ रही अपराधों की परिकल्पना में चोरी, डकैती, हत्या, आक्रमण, सेंधमारी, यौन उत्पीड़न आदि का ही समावेश हो पाता है। ये अपराध आमतौर पर निम्न आय वर्ग तथा गरीबी से जुड़े रहते हैं। इसके अलावा गरीबी से जुड़ी मनोविकृतियां भी अपराध को जन्म देती हैं। यह मान्यता पुरानी हो गई है कि अपराध मजबूरी में किए जाते हैं तथा भगवान ने जिसको सब कुछ दिया है उसको अपराध करने की जरूरत नहीं पड़ती। आधुनिक पूंजीवाद के उदय के साथ ही अपराध के चरित्र और स्वरूप में परिवर्तन हुआ तथा नए प्रकार के आर्थिक अपराधों का तेजी से विस्तार हो रहा है। नए प्रकार का अपराध सफेदपोश अपराध अपने विविध रूपों में सामने आया। अर्थशास्त्री डॉ. गिरीश मिश्र और राजनीतिशास्त्री डॉ. ब्रजकुमार पांडेय द्वारा लिखित प्रस्तुत पुस्तक इन्हीं धनाढयों और प्रभावशाली लोगों के अपराध के विषय पर केन्द्रित है।
    सफेदपोश अपराधी, सुशिक्षित सौम्य और सुसंस्कृत है, लिहाजा उनको समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त है। इन लोगों के अपराध के विषय में अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और अन्यत्र स्थानों के समाजविज्ञानियों द्वारा शोध करके काफी कुछ लिखा गया है। किन्तु अपने देश में इस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया गया था। इस रिक्तता को महसूसकर डॉ. गिरीश मिश्र और राजनीतिशास्त्री डॉ. ब्रजकुमार पांडेय ने सफेदपोश अपराध पर शोध कार्य प्रारंभ किया। उनकी सोच थी कि जब तक देश में सफेदपोश अपराध की जड़ों में नहीं जाएंगे और भ्रष्टाचार के स्वरूप और फैलाव को समझने का प्रयास नहीं करेंगे तब तक जड से उन्मूलन संभव नहीं है। इसलिए उन्होंने अन्यत्र देशों के समाजविज्ञानियों के शोधग्रंथों के अध्ययन कर भारत में सफेदपोश अपराध के विभिन्न पहलुओं का समग्र शोध करके अंग्रेजी में ”व्हाइट कॉलर क्राइम्स” नामक पुस्तक अंग्रेजी में लिखी जो 1998 में प्रकाशित हुई। हिन्दी के जागरूक पाठकों को अपेक्षा थी कि कुछ ही वर्षों में उक्त पुस्तक का हिन्दी संस्करण का भी प्रकाशन हो जाएगा। किन्तु ऐसा नहीं हो पाया तथा अंग्रेजी न जानने वाले हिन्दी भाषी पाठक उक्त पुस्तक को पढ़ने से वंचित रहे। अंतत: हिन्दी पाठकों की भावनाओं को ध्यान में रखकर एवं जागरूक मित्रों के अनुरोध पर लेखकद्वय ने अद्यतन सामग्री शामिल करते हुए हिन्दी में ”सफेदपोशों के अपराध” पुस्तक लिखी, जो अभी हाल में दानिश बुक्स द्वारा प्रकाशित की गई है। इस पुस्तक के प्रकाशन के लिए लेखकद्वय डॉ. गिरीश मिश्र और डॉ. ब्रजकुमार पांडेय धन्यवाद के पात्र हैं।
    पुस्तक की प्रस्तावना में सफेदपोश अपराध का अर्थ समझाते हुए आम अपराध एवं सफेदपोश अपराध में उदाहरणों सहित अंतर समझाया गया है। इसके साथ ही दोनों प्रकार के अपराधियों के प्रति हमारे समाज का नजरिया भी बताया गया है। सफेदपोशों के अपराध को समाजशास्त्री अल्बर्ट मौरिस ने ”अभिजात्य वर्गीय अपराध” का नाम दिया है। ऊंचे लोगों का गुनाह व्यक्ति और समाज में दोमुंहेपन का सूचक है। यह सफेदपोश अपराधी की कथनी और करनी का अंतर है तो दूसरी ओर अभिजात्य वर्ग के अपराधों को समाज की अनदेखी करनी व मौन स्वीकृति की प्रवृत्ति का भी द्योतक है। उद्योग-व्यवसाय में कारपोरेट क्षेत्र के बढ़ते प्रभाव के साथ ही कारपोरेट अर्थात् संगठित क्षेत्र की सफेदपोश अपराधों की भागीदारी भी लगातार तेजी से बढ़ती जा रही है। कारपोरेट जगत के अपराध को विश्वास हनन के अपराध की संज्ञा दी जा सकती है।
    लेखकद्वय के अनुसार धंधे-पेशों के विस्तार के साथ हर क्षेत्र में सफेदपोश अपराध फैल रहा है। चोरी को प्राचीनतम अपराध माना जाता है। गुपचुप तरीके से बिना किसी धमकी या हिंसा को सहारा लिए व्यक्तिगत व सार्वजनिक धन-सम्पत्ति हड़पना चोरी की श्रेणी में आता है। हेराफेरी, भ्रष्टाचार, गबन, घोटाले, सार्वजनिक सम्पत्ति का निजी उपयोग व दुरूपयोग आदि चोरी के विभिन्न स्वरूप हैं। वर्तमान भूमंडलीकरण के दौर में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तनों के फलस्वरूप गैर-परम्परागत चोरी के आयामों का विस्तार हुआ है। पुस्तक में मीडिया की दुनिया, शिक्षा जगत, प्रशासन तंत्र और राजनीति में भ्रष्टाचार अध्यायों के पड़ने से पता लगता है कि सफेदपोश अपराध हमारे देश में हर क्षेत्र में प्रवेश कर गया है, कोई क्षेत्र अछूता नहीं बचा है। धार्मिक पाखंडी लोगों की धार्मिक आस्था व श्रध्दा का फायदा उठाकर देवता का बाना पहन कर शैतान के रूप में कारगुजारियां कर रहे हैं। आश्चर्य है कि पढ़े-लिखे समझदार बड़े लोग भी इनके चंगुल में स्वेच्छा से फंस जाते हैं।
    धमकी व हिंसा माफिया की कार्यशैली के अंग होते हैं। जिस संदर्भ में माफिया शब्द का प्रयोग आज किया जाता है उस का उद्भव इटली में हुआ तो कालान्तर में अनेक देशों में फैला। भूमंडलीकरण ने माफिया के राष्ट्रीय सीमाओं से निकलकर विरूव के पैमाने पर अपनी गतिविधियां चलाने को अनुकूल परिस्थितियां पैदा कीं। अब तो यह दूसरे विश्व में फैल चुका है। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा है। पुस्तक के अंतिम चार अध्यायों में माफिया के उद्भव, भूमंडलीकरण के प्रभाव तथा भारत में माफिया का विस्तार से वर्णन किया गया है।
    यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत में नवपूंजीवाद में राजनेताओं, अधिकारियों और व्यवसायियों- इन तीन वर्ग के श्रीमान लोगों का गठजोड़ से सफेदपोश अपराध फलता-फूलता जा रहा है। उदाहरण के लिए वस्तुओं के भंडार और कीमतों में कानून के तहत फेरबदलकर बेहिसाब मुनाफा कमाना, उच्च सरकारी अधिकारियों द्वारा नियमों की अनदेखी करना, सरकारी धन राशि का अन्यत्र व्यय करना, राजनेताओं द्वारा नियमों को तोड़-मरोड़ कर अपने लोगों का निजी हित करना आदि कुछ उदाहरण हैं।
    सरल हिन्दी भाषा में लिखी गई शोध पर आधारित ”सफेदपोशों के अपराध” यह पुस्तक आजादी के बाद, विशेषकर नवउदारवादी चिंतन को अंगीकार करने के बाद, भारत में क्या हुआ और क्या हो रहा है, को समझने में मददगार होगी। जो अध्येता सफेदपोश अपराध पर आगे शोध कार्य करना चाहते हैं उनके लिए यह पुस्तक उपयोगी संदर्भ ग्रंथ साबित होगी।
    पुस्तक: सफेदपोशों के अपराध
    लेखक द्वय:गिरीश मिश्र एवं ब्रजकुमार पांडेय
    प्रकाशक: दानिश बुक्स
    25 सी, स्काइलार्क 450 रूअपार्टमेट्स
    गाजीपुर, दिल्ली-110096
    मूल्य: 450 रूपए

  • नागरिकों को सूचना तंत्र से जोड़ेगा राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण  मंच

    नागरिकों को सूचना तंत्र से जोड़ेगा राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच

    राष्ट्रीय सुरक्षा मंच के समन्वयक डॉ.अनिल सौमित्र, मप्र इकाई के कार्यकारी अध्यक्ष शैलेन्द्र प्रधान और अध्यक्ष एस.के.राऊत ने पत्रकार वार्ता के माध्यम से जनता से मंच से जुड़ने का आव्हान किया है।

    भोपाल,26 अप्रेल। देश के जागरूक नागरिकों को सूचना तंत्र से जोड़ने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच का गठन किया गया है। हाल ही में गुरुग्राम में हुई मंच की बैठक में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई जिम्मेदार नागरिकों ने जनता को एक बेहतर सुरक्षा मंच उपलब्ध कराने का अभियान प्रारंभ किया है। इस अभियान के तहत भोपाल में मध्यप्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक एस.के.राऊत को अध्यक्ष बनाया गया है। श्री राऊत के साथ आज मप्र इकाई के कार्यकारी अध्यक्ष शैलेन्द्र प्रधान और स्पंदन स्वयंसेवी समूह के अनिल सौमित्र ने मंच की गतिविधियों की जानकारी दी।
    सफल पुलिस महानिदेशक के रूप में ख्याति बटोर चुके श्री एस.के.राऊत ने बताया कि राष्ट्र की सुरक्षा की कड़ी में सीधे तौर पर देश के जागरूक नागरिकों को जोड़ने के लिए इस मंच का गठन किया गया है। समाज की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए स्कूलों, कालेजों, महाविद्यालयों के अलावा विभिन्न संगठनों के बीच संवाद स्थापित किया जाएगा। इसमें सामाजिक और स्वैच्छिक संगठन भी बड़ी भूमिका निभाएंगे।
    उन्होंने बताया कि हरियाणा के गुरुग्राम में 15-16 मार्च को हुई बैठक में देश भर के विभिन्न राज्यों के कार्यकर्ता उपस्थित हुए थे। मंच के राष्ट्रीय समन्वयक इंद्रेश कुमार की उपस्थिति में हरियाणा के राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी ने दीप प्रज्ववलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया था। दूसरे दिन समापन समारोह पूर्व गृह सचिव आर. के सिंह की मौजूदगी में हुआ। बैठक में तय किया गया कि राष्ट्रीय महत्व के तीन दिवसों को बड़े स्तर पर मनाया जाएगा। इनमें 8 अप्रैल को इंकलाब दिवस, 23 सितंबर को हायफा दिवस, और 30 दिसंबर को प्रथम स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाएगा। प्रदेशों की इकाईयां अपनी जरूरत के मुताबिक अन्य कार्यक्रमों का आयोजन भी कर सकेंगी।
    मंच के मार्गदर्शन में साल भर सामाजिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ साथ संगोष्ठियों का भी आयोजन किया जाएगा। जिनके माध्यम से राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जरूरतों पर व्यापक विमर्श किया जाएगा। विश्वविद्यालयों में सुरक्षा से जुड़े विषयों पर अनुसंधान कार्यों को प्रोत्साहन दिया जाएगा। गुरुग्राम में आयोजित मीडिया की कार्यशाला में राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण के लिए पांच विषयों पर अधिक प्रकाश डाला गया
    । इनमें पर्यटन बनाम आतंकवाद, हिंद महासागरीय क्षेत्र की गतिविधियां, भारत इसराईल संबंध, एशियाई क्षेत्रों में चीन की धौंसपट्टी, और जन सांख्यिकीय परिवर्तन एक प्रमुख खतरा जैसे विषय शामिल किए गए थे। कार्यशाला में जाने माने पत्रकार अशोक श्रीवास्तव, जगदीश उपासने, और शिवाजी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों पर न केवल चर्चा की बल्कि समस्याओं के संभावित निराकरणों पर पूछे गए सवालों के उत्तर भी दिए।
    पत्रकारों से चर्चा के पहले वक्ताओं ने छत्तीसगढ़ के सुकमा में नक्सली हिंसा में शहीद हुए जवानों को श्रद्धा सुमन भी अर्पित किए। उनके शोक संतप्त पीड़ित परिवारों के प्रति भी संवेदना व्यक्त की गई।मीडिया समन्वयक कृपा शंकर चौबे और मंच के स्थानीय समन्वयक डॉ.अनिल सौमित्र ने राष्ट्र के प्रति बढ़ाई जाने वाली इस जागरूकता से देश को न केवल विदेशी बल्कि देश को तोड़ने वाली भीतरी ताकतों से भी निपटने में सफलता मिलेगी।