Category: मध्यप्रदेश

  • सुप्रीम कोर्ट ने वोटर की जांच सही पाई तो रोकिए नेताओं की लंपटता

    सुप्रीम कोर्ट ने वोटर की जांच सही पाई तो रोकिए नेताओं की लंपटता

    भारत में लोकतंत्र की ताकत केवल इस बात में नहीं है कि हर पांच साल में चुनाव हो जाएं, बल्कि इसकी असली ताकत इस बात में है कि चुनाव में वोट डालने वाले व्यक्ति की पात्रता पर भरोसा किया जा सके। मतदाता सूची लोकतंत्र की वह बुनियादी दस्तावेज है जिसके आधार पर सरकारें बनती हैं, नीतियां तय होती हैं और सत्ता का हस्तांतरण होता है। इसलिए मतदाता सूची में एक भी अपात्र नाम रहना जितना गंभीर प्रश्न है, उतना ही गंभीर प्रश्न किसी पात्र नागरिक का नाम हट जाना भी है। इसी संतुलन को सामने रखकर विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision—SIR को देखना चाहिए।

    SIR को लेकर देश में जिस तरह का राजनीतिक संघर्ष खड़ा किया गया है, उसमें मूल सवाल कहीं पीछे छूटता दिखाई देता है। सवाल यह है कि क्या भारत की मतदाता सूची हमेशा के लिए बिना किसी गहन जांच के चलती रहे या समय-समय पर उसकी व्यापक समीक्षा हो? यदि वर्षों से मतदाता सूचियों में मृत्यु, स्थानांतरण, दोहरे पंजीकरण, गलत पते और पात्रता से जुड़ी विसंगतियां जमा होती रही हैं तो उनका निराकरण कौन करेगा? निर्वाचन आयोग का संवैधानिक दायित्व ही चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची की विश्वसनीयता सुनिश्चित करना है।देश में चल रही सभी योजनाओं की समीक्षा भी तो इसी आधार पर की जा रही है कि संसाधनों का उचित उपयोग करके सभी जरूरत मंदों को समर्थन दिया जा सके।

    बिहार में SIR शुरू करते समय निर्वाचन आयोग ने साफ कहा था कि इसका उद्देश्य सभी पात्र नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल करना और अपात्र व्यक्तियों को सूची से बाहर करना है। आयोग ने इसे संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 21 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र में रखा। 2003 के बाद बिहार में दो दशक से अधिक समय तक नियमित संक्षिप्त पुनरीक्षण होते रहे, लेकिन वैसा व्यापक गहन पुनरीक्षण नहीं हुआ था।

    यहीं से इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। मतदाता सूची की शुचिता किसी राजनीतिक दल की सुविधा का विषय नहीं हो सकती। यदि किसी सूची में मृत व्यक्ति का नाम है, एक ही व्यक्ति के नाम कई जगह दर्ज हैं, कोई व्यक्ति स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुका है या ऐसा व्यक्ति मतदाता के रूप में दर्ज है जिसकी पात्रता पर गंभीर सवाल है, तो उसकी जांच लोकतंत्र के विरुद्ध नहीं, लोकतंत्र के पक्ष में है।

    सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 को बिहार SIR की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखते हुए इस बहस को काफी हद तक स्पष्ट कर दिया। अदालत ने माना कि SIR का उद्देश्य स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए विश्वसनीय मतदाता सूची तैयार करना है। अदालत ने यह भी माना कि निर्वाचन आयोग मतदाता के रूप में पंजीकरण की पात्रता के लिए नागरिकता की सीमित जांच कर सकता है। साथ ही अदालत ने यह महत्वपूर्ण सीमा भी तय की कि निर्वाचन आयोग की यह जांच नागरिकता पर अंतिम फैसला नहीं है। जहां नागरिकता का प्रश्न निर्णायक हो, वहां मामला सक्षम प्राधिकारी के पास जाएगा और संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर मिलेगा।

    यानी SIR को लेकर यह कहना कि निर्वाचन आयोग किसी व्यक्ति की नागरिकता पर अंतिम न्यायिक फैसला कर रहा है, सही नहीं है। लेकिन यह कहना भी सही नहीं होगा कि आयोग को मतदाता सूची में शामिल व्यक्ति की पात्रता की जांच करने का कोई अधिकार ही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों के बीच की संवैधानिक सीमा को स्पष्ट कर दिया है।

    इसके बाद SIR का देशव्यापी विस्तार हुआ। मई 2026 में निर्वाचन आयोग ने तीसरे चरण के तहत 16 राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों में प्रक्रिया आगे बढ़ाने की घोषणा की। आयोग के अनुसार इस चरण में 3.94 लाख से अधिक बूथ लेवल अधिकारी घर-घर जाकर लगभग 36.73 करोड़ मतदाताओं से संबंधित प्रक्रिया में शामिल होने वाले थे और राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंटों को भी इसमें भागीदारी का अवसर दिया गया।

    इस तथ्य का महत्व इसलिए है क्योंकि SIR को केवल निर्वाचन आयोग की बंद कमरे की कवायद बताना वास्तविक प्रक्रिया को छोटा करके देखना होगा। राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की भागीदारी, घर-घर सत्यापन, दावों और आपत्तियों की व्यवस्था और न्यायिक समीक्षा—ये सभी लोकतांत्रिक सुरक्षा-तंत्र का हिस्सा हैं।

    यही वह बिंदु है जहां राहुल गांधी और कांग्रेस के मौजूदा विरोध की आलोचना जरूरी हो जाती है। विपक्ष को किसी भी चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाने, आंकड़े मांगने, शिकायत करने और अदालत जाने का पूरा अधिकार है। लेकिन यदि किसी प्रक्रिया की वैधानिकता को लेकर सर्वोच्च न्यायालय अपना फैसला दे चुका है, तब लोकतांत्रिक राजनीति की जिम्मेदारी यह होनी चाहिए कि वह फैसले के भीतर उपलब्ध उपचारों और पारदर्शिता के रास्तों का इस्तेमाल करे। केवल यह मांग करना कि प्रक्रिया ही रोक दी जाए, तब तक न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता जब तक उसके विरुद्ध ठोस और प्रमाणित कानूनी आधार सामने न रखा जाए।

    7 अक्टूबर 2026 को राहुल गांधी और विपक्षी सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन किया और उनके इस्तीफे की मांग की। प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी सहित कई नेताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया। विपक्ष SIR और मतदाता सूची में बदलावों को लेकर गंभीर आरोप लगा रहा है, जबकि निर्वाचन आयोग इन आरोपों को स्वीकार नहीं करता।

    यहां एक दूसरा संवैधानिक प्रश्न भी सामने आता है—क्या किसी संवैधानिक संस्था के फैसले से असहमति का समाधान सड़क पर संस्था के काम को रोकने में है या संस्थागत जांच और न्यायिक प्रक्रिया में? लोकतंत्र में विरोध जरूरी है, लेकिन संस्थाओं को काम करने से रोकना लोकतांत्रिक अधिकार की अंतिम सीमा नहीं हो सकता।

    ज्ञानेश कुमार के संदर्भ में भी इसी संतुलन की जरूरत है। उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच होनी चाहिए तो वह निष्पक्ष रूप से होनी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने 5 अक्टूबर 2026 को उन्हें अंतरिम रूप से निलंबित करने से इनकार करते हुए निर्वाचन आयोग से संबंधित रिकॉर्ड मांगे हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल समाचार रिपोर्टों के आधार पर अंतरिम आदेश नहीं दिया जा सकता और यदि रिकॉर्ड से कानून का उल्लंघन सामने आता है तो उसके परिणाम होंगे।

    इस आदेश का अर्थ किसी व्यक्ति को क्लीन चिट देना नहीं है। इसका अर्थ इतना है कि संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज पर आरोपों का परीक्षण प्रमाण, रिकॉर्ड और कानून के आधार पर होना चाहिए। यही न्यायपालिका की ताकत है और यही लोकतंत्र की खूबसूरती भी।

    देश में मतदाता सूची को लेकर एक और भ्रम दूर करना आवश्यक है। SIR का मतलब यह नहीं कि हर हटाया गया नाम विदेशी नागरिक का नाम है। नाम हटने के कई कारण हो सकते हैं—मृत्यु, स्थायी स्थानांतरण, दोहरा पंजीकरण, गलत विवरण या पात्रता से जुड़ी समस्या। इसलिए किसी भी बड़े आंकड़े को सीधे “घुसपैठियों की संख्या” घोषित करना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन इसी के साथ यह तर्क भी स्वीकार नहीं किया जा सकता कि मतदाता सूची में किसी अपात्र व्यक्ति के नाम की जांच ही न हो।

    भारत की सबसे बड़ी संवैधानिक उपलब्धि यही है कि यहां राजनीतिक विरोध का जवाब राजनीतिक या प्रशासनिक हिंसा नहीं, कानून देता है। सरकार के खिलाफ आंदोलन हो सकते हैं, विपक्ष सरकार की आलोचना कर सकता है, अदालत में चुनौती दी जा सकती है, मीडिया सवाल पूछ सकता है। इसलिए मतदाता सूची की शुद्धता के सवाल को नस्लीय संघर्ष, राजनीतिक नरसंहार या किसी दूसरे देश की दमनकारी व्यवस्था से जोड़ना भी भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की प्रकृति को गलत ढंग से पेश करना होगा। भारत में असहमति के लिए संवैधानिक रास्ते खुले हैं।

    वास्तविक चुनौती यह है कि SIR निष्पक्ष भी दिखाई दे और निष्पक्ष हो भी। पात्र मतदाता का नाम किसी कीमत पर नहीं कटना चाहिए। जिस व्यक्ति का नाम हटाया जाए, उसे कारण पता होना चाहिए और उसे दावा तथा आपत्ति का अवसर मिलना चाहिए। नागरिकता से संबंधित संदेह हो तो सक्षम कानूनी प्राधिकारी की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। राजनीतिक दलों को भी अपने बूथ स्तर के प्रतिनिधियों के जरिए सूची की जांच करनी चाहिए। निर्वाचन आयोग को हर चरण में आंकड़े और प्रक्रिया सार्वजनिक करके अपने ऊपर उठने वाले संदेहों का जवाब देना चाहिए।यही वह रास्ता है जो SIR को किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष की कार्रवाई बनने से रोक सकता है।

    सरकार के निर्णय का समर्थन करने का सबसे मजबूत आधार यह नहीं है कि सरकार ने फैसला लिया है, बल्कि यह है कि मतदाता सूची की विश्वसनीयता लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है। निर्वाचन आयोग ने संवैधानिक अधिकार के आधार पर प्रक्रिया शुरू की, सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में इसकी वैधता को स्वीकार किया और अब देश के सामने चुनौती यह है कि इस प्रक्रिया को पारदर्शिता, सावधानी और कानूनी सुरक्षा के साथ पूरा किया जाए।

    राहुल गांधी या कोई भी विपक्षी नेता यदि SIR की किसी खास प्रक्रिया में गड़बड़ी का प्रमाण सामने रखते हैं तो उसकी जांच होनी चाहिए। यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से काटा गया है तो उसे वापस जोड़ा जाना चाहिए। यदि किसी अधिकारी ने कानून का उल्लंघन किया है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन केवल इसलिए कि व्यापक मतदाता पुनरीक्षण से राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं, पूरी प्रक्रिया को रोक देना लोकतांत्रिक दृष्टि से अधिक गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है।

    आखिर चुनाव किसी दल की निजी संपत्ति नहीं हैं। न भाजपा की, न कांग्रेस की और न किसी अन्य राजनीतिक दल की। चुनाव भारत के नागरिक का अधिकार हैं। इसलिए मतदाता सूची भी राजनीतिक दलों की सुविधा के हिसाब से नहीं, नागरिक की पात्रता और संविधान के हिसाब से बननी चाहिए।

    SIR का अंतिम मूल्यांकन इसी कसौटी पर होना चाहिए—क्या उसने पात्र नागरिक को सुरक्षित रखा, अपात्र नामों की पहचान की, प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया और हर वास्तविक शिकायत के लिए न्याय का रास्ता खुला रखा? यदि जवाब हां है तो SIR लोकतंत्र को कमजोर करने वाली प्रक्रिया नहीं, लोकतंत्र की नींव मजबूत करने वाली प्रक्रिया है।

    और ज्ञानेश कुमार के मामले में भी यही कसौटी लागू होनी चाहिए। न उन्हें आरोपों से परे मान लेना उचित है, न आरोप लगते ही दोषी घोषित कर देना। निर्वाचन आयोग संवैधानिक संस्था है और उसके प्रमुख के खिलाफ आरोप भी संवैधानिक और न्यायिक प्रक्रिया में ही परखे जाने चाहिए।

    भारत को आज सबसे अधिक जरूरत इसी राजनीतिक परिपक्वता की है—मतदाता सूची साफ हो, पात्र मतदाता सुरक्षित रहे, अपात्र नाम हटें, निर्वाचन आयोग जवाबदेह रहे और न्यायपालिका अंतिम संवैधानिक प्रहरी की भूमिका निभाती रहे। लोकतंत्र में इससे बेहतर सुरक्षा-कवच और क्या हो सकता है?

  • नया भोपाल बनाने का मसौदा जारी

    नया भोपाल बनाने का मसौदा जारी


    मास्टर प्लान पर नागरिकों से सुझाव आमंत्रित

    भोपाल 26 सितंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि श्री गणेश अनंत चतुर्दशी के पावन अवसर पर एक लंबे अंतराल के बाद भोपाल विकास योजना-2047 (मास्टर प्लान) के प्रारूप (ड्रॉफ्ट) का प्रकाशन कर दिया गया है।मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि कैपिटल सिटी की यह विकास योजना (मास्टर प्लान) भोपाल की प्राकृतिक धरोहर- भोजताल, वन क्षेत्रों एवं बाघ भ्रमण क्षेत्र के संरक्षण के साथ नागरिकों को बेहतर सुविधाएं, सुगम मोबिलिटी और आर्थिक विकास के अवसर उपलब्ध कराने की दृष्टि से तैयार की गई है। इस विकास योजना में हरित टीडीआर का बेहतर प्रावधान किया गया है, इससे हरित क्षेत्र में आने वाली भूमि के स्वामियों की क्षतिपूर्ति के साथ विकासकर्ताओं को टीडीआर के जरिए अतिरिक्त विकास की सुविधा भी मिल सकेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि समृद्ध, सुगम, सुरक्षित और विकसित भोपाल के संकल्प की दिशा में यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने कहा कि भोपाल विकास योजना के प्रकाशित प्रारूप पर नागरिकगण अपनी आपत्ति एवं सुझाव दे सकते हैं।

    भोपाल मास्टर प्लान ड्रॉफ्ट के हैं चार प्रमुख स्तंभ

    प्रकाशित भोपाल मास्टर प्लान का ड्रॉफ्ट सतत् विकास, समावेशी शहर और समृद्ध भविष्य की संकल्पना से अभिप्रेरित है। इसकी कोर थीम हरित भोपाल, समृद्ध भोपाल और विकसित भोपाल रखी गई है। इस मास्टर प्लान ड्रॉफ्ट के चार प्रमुख आधार स्तंभ रखे गए हैं। इसमें पहला प्राकृतिक पारिस्थितिकीय तंत्र के संरक्षण को प्राथमिकता दी गई है। इसके बाद दूसरा आधुनिक दृष्टिकोण एवं नागरिक हितैषी नियोजन पर बल दिया गया है। तीसरा सुधारोन्मुख एवं परिवर्तनकारी नियोजन को भी केन्द्रीय लक्ष्य (कोर टारगेट) में रखा गया है। चौथा इस मास्टर प्लान को आत्मनिर्भर एवं आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने वाले सतत् विकास की अवधारणा पर केन्द्रित किया गया है।

    भोपाल मास्टर प्लान ड्रॉफ्ट की प्रमुख विशेषताएं

    • प्राकृतिक संवेदनशीलता सम्मत नियोजन इस मास्टर प्लान की प्रमुख विशेषता है।
    • आर्थिक विकास एवं रोजगार सृजन सम्बन्धी प्रस्ताव।
    • महानगरीय अवधारणा के अनुरूप प्रस्ताव।
    • ग्रोथ कॉरिडोर के माध्यम से शहर का आर्थिक विकास।
    • राज्य की टीओडी नीति के अनुरूप मिश्रित भूमि उपयोग का प्रस्ताव।
    • असीमित एफएआर एवं भवन ऊंचाई।
    • विकास मापदंडों का सरलीकरण एवं युक्तियुक्तकरण।
    • मास्टर प्लान ड्रॉफ्ट में शहर के हरित क्षेत्र को 16 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया गया है।
    • विकास योजना के क्रियान्वयन के लिए पूंजी संग्रहण की समुचित व्यवस्था।
    • क्रिएटिव री-डेवलपमेंट के माध्यम से पुनर्विकास।
    • अफोर्डेबल हाउसिंग को प्रोत्साहन दिया गया है।
    • हरित टीडीआर के प्रावधान भी किए गए हैं।
    • मास्टर प्लान के क्रियान्वयन का प्रभावी पर्यवेक्षण भी सुनिश्चित किया गया है।
    • मास्टर प्लान ड्रॉफ्ट में सुरक्षित शहर (सेफ सिटी) के सभी प्रावधान भी किए गए हैं।
    • पार्किंग प्रोत्साहन संबंधी प्रावधान भी किए गए हैं।
    • निजी विकासकर्ताओं द्वारा विकास योजना की मांगों का क्रियान्वयन भी तय किया गया है।
    • मास्टर प्लान ड्रॉफ्ट में भोपाल को इकाई सिटी (EKAI – एज्युकेशन, नॉलेज एंड आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस सिटी) के रूप में डेवलप करने के लिए भी समुचित प्रस्ताव/प्रविधान किए गए हैं।
  • स्वामित्व योजना लागू होगी,नहीं फंसेंगे पटवारी

    स्वामित्व योजना लागू होगी,नहीं फंसेंगे पटवारी

    भोपाल, 18 सितंबर (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्यप्रदेश के गांवों की आबादी भूमि पर रह रहे परिवारों को मालिकाना हक देने के लिए शुरू की गई स्वामित्व अधिकार अभिलेख निष्पादन एवं पंजीयन योजना-2026 को पटवारियों के एक वर्ग के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन 17 सितंबर से शुरू हुए अभियान के तहत करीब 50 लाख ग्रामीण संपत्तियों की नि:शुल्क रजिस्ट्री की जानी है।

    पटवारियों की मुख्य आपत्ति रजिस्ट्री के दस्तावेज में उन्हें निष्पादन अधिकारी बनाए जाने को लेकर है। उनका कहना है कि स्वामित्व योजना में ड्रोन सर्वे, सीमांकन और सत्यापन के बाद ग्रामीणों के नाम सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज किए जा चुके हैं। अब उन्हीं संपत्तियों की रजिस्ट्री में उनके ई-सिग्नेचर कराए जा रहे हैं। भविष्य में संपत्ति को लेकर परिवारों या पड़ोसियों के बीच विवाद हुआ तो दस्तावेज तैयार करने वाले पटवारी को भी विवाद में पक्षकार बनाया जा सकता है। पटवारियों का सवाल है कि जब विवाद का फैसला करने का अधिकार उनके पास नहीं है तो इसकी जिम्मेदारी भी उन्हें क्यों दी जा रही है।प्रदेश के विभिन्न स्थानों से पटवारियों ने इस आशय के ज्ञापन स्थानीय प्रशासन को दिए हैं। दमोह में मध्यप्रदेश राजस्व कर्मचारी कल्याण संघ की जिला शाखा की ओर से कलेक्टर को दिए ज्ञापन में कहा गया है कि हम कानूनी पेचीदगियों का सामना करने को राजी नहीं हैं।

    प्रदेश के कई जिलों में पटवारी संगठनों ने प्रशासन को ज्ञापन देकर इस व्यवस्था में बदलाव की मांग की है। कुछ स्थानों पर काम प्रभावित होने की खबरें भी सामने आई हैं। उनका कहना है कि वे ग्रामीणों को मालिकाना हक देने के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि अपनी व्यक्तिगत कानूनी जवाबदेही को लेकर चिंतित हैं।

    राज्य सरकार का तर्क है कि यह सामान्य जमीन की खरीद-बिक्री की रजिस्ट्री नहीं है। स्वामित्व योजना के तहत सर्वे और सत्यापन के बाद तैयार अधिकार अभिलेखों का पंजीयन किया जा रहा है। जून में राज्य मंत्रिमंडल ने इसके लिए योजना को मंजूरी दी थी। रजिस्ट्री पर लगने वाली स्टांप ड्यूटी और पंजीयन शुल्क भी सरकार वहन कर रही है। इसका उद्देश्य ग्रामीणों को ऐसा वैध दस्तावेज देना है, जिसका उपयोग बैंक ऋण और दूसरी आर्थिक जरूरतों के लिए किया जा सके।

    केंद्र सरकार की स्वामित्व योजना में ड्रोन तकनीक से आबादी भूमि का सर्वे कर नक्शे और अधिकार अभिलेख तैयार किए जाते हैं। इसके बाद राज्यों को जमीनी सत्यापन और संपत्ति कार्ड उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी दी गई है। मध्यप्रदेश इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाकर अधिकार अभिलेखों का पंजीयन कर रहा है।

    पटवारियों की आपत्ति का मामला 15 सितंबर की कैबिनेट बैठक में भी उठा। प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सामने यह मुद्दा रखा। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को पटवारियों की चिंता दूर करने और कलेक्टरों को उन्हें समझाने के निर्देश दिए। सरकार का कहना है कि भविष्य में संपत्ति को लेकर विवाद होने पर पटवारी को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं माना जाएगा।

    मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल ने भी अधिकारियों को पंचायत स्तर पर शिविर लगाकर तेजी से रजिस्ट्रियां पूरी करने के निर्देश दिए हैं। अधिकारियों को प्रतिदिन 30 से 40 रजिस्ट्रियां करने का लक्ष्य दिया गया है।

    अब विवाद का समाधान केवल मौखिक आश्वासन से नहीं, बल्कि लिखित रूप से जिम्मेदारियां स्पष्ट करने से होगा। सरकार को यह बताना होगा कि अधिकार अभिलेख में दर्ज जानकारी की जिम्मेदारी किस स्तर की है, निष्पादन अधिकारी के रूप में पटवारी की भूमिका कितनी सीमित है और भविष्य में विवाद होने पर उसकी व्यक्तिगत जवाबदेही किस सीमा तक होगी। यह स्पष्ट होने पर एक ओर ग्रामीणों को संपत्ति का कानूनी दस्तावेज मिल सकेगा और दूसरी ओर मैदानी कर्मचारियों की आशंका भी दूर हो सकती है।

  • रामजी महाजन की 27वीं पुण्यतिथि पर 77 समाजसेवियों का सम्मान

    रामजी महाजन की 27वीं पुण्यतिथि पर 77 समाजसेवियों का सम्मान

    भोपाल 12 सितंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर) संयुक्त माली सैनी मरार समाज भोपाल ने युगपुरुष रामजी महाजन की 27वीं पुण्यतिथि के अवसर पर प्रदेश स्तरीय पिछड़ा वर्ग सम्मान दिवस समारोह महात्मा फुले भवन अरेरा कॉलोनी भोपाल में आयोजित किया ।
    कार्यक्रम में समाज के विभिन्न जिलों से आए 77 समाजसेवियों जिनमें डॉक्टर, इंजीनियर, अधिवक्ता, शिक्षक एवं वैज्ञानिक सम्मिलित रहे।

    कार्यक्रम में आए प्रमुख अतिथियों में श्री विश्वास कैलाश सारंग मंत्री मध्य प्रदेश शासन, श्रीमती मालती राय महापौर नगर निगम भोपाल, श्री भगवान दास सबनानी विधायक दक्षिण पश्चिम भोपाल, श्री पी सी शर्मा पूर्व मंत्री मध्य प्रदेश शासन, श्री अनोखी पटेल अध्यक्ष जिला कांग्रेस कमेटी भोपाल (ग्रामीण), रामनारायण चौहान, जगदीश सैनी, हरि सिंह सैनी सरपंच, राजेंद्र सैनी, राजेश चौहान, गीता प्रसाद माली पार्षद, डॉ प्रेमलता सैनी, श्रीमती शांति माली, डॉक्टर छाया सैनी, भूपेंद्र माली, बबलू सैनी, दिनेश सैनी, अजय सैनी, जगदीश सोलंकी, रामचरण माने, मधु अम्बाड़कर एवं समाज के गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। अतिथियों ने मासिक महात्मा फुले दर्शन पत्रिका विशेषांक का विमोचन किया।

    भोपाल के सबसे लोकप्रिय और सफल प्रशासक जीपी माली माली ने समाजसेवियों को एकजुट किया.


    कार्यक्रम की अध्यक्षता जी पी माली अध्यक्ष एवं पूर्व अपर कलेक्टर द्वारा की गई श्री जी पी माली द्वारा सामाजिक बंधुओ से रामजी महाजन के आदर्श एवं समाज की एक जुटता पर चलने का आह्वान किया। समाज द्वारा यह भी निश्चय किया गया कि प्रदेश स्तरीय दूसरा महिला सम्मेलन शीघ्र ही किया जाएगा।संचालन राजेंद्र अम्बाडकर एवं घनश्याम राहुल द्वारा किया गया

  • घरों में बाजार बनाने वालों पर कार्रवाई कौन करेगा

    घरों में बाजार बनाने वालों पर कार्रवाई कौन करेगा

    भोपाल06 सितंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।राजधानी में अरेरा कॉलोनी, रोहित नगर, बावड़ियाकलां और दूसरे आवासीय इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियों के खिलाफ चल रही कार्रवाई को केवल दुकानदारों और रहवासियों के बीच का विवाद मानना बड़ी भूल होगी। यह संकट एक-दो साल में पैदा नहीं हुआ। इसके पीछे दो दशक से चली आ रही नगर नियोजन की कमजोरी, राजनीतिक संरक्षण, जमीन के कारोबार से जुड़े हित और प्रशासन की आंखों के सामने नियमों के उल्लंघन का लंबा सिलसिला है। अब जब नगर निगम कार्रवाई कर रहा है तो सवाल यह भी उठना चाहिए कि इतने वर्षों तक यह सब किसकी अनुमति, संरक्षण या लापरवाही से चलता रहा?

    अरेरा कॉलोनी और रोहित नगर मूल रूप से आवासीय क्षेत्र हैं। यहां घर बनाने के लिए स्वीकृत भूखंडों पर धीरे-धीरे दुकानें, शोरूम, रेस्टोरेंट, होटल, क्लीनिक और कार्यालय खुलते चले गए। इससे सड़क पर पार्किंग बढ़ी, यातायात का दबाव बढ़ा और रहवासियों की निजता तथा सुरक्षा प्रभावित हुई। रहवासियों की शिकायतें नई नहीं हैं। अरेरा कॉलोनी के एक निवासी के अनुसार 2021 से अब तक इस संबंध में अनेक शिकायतें शासन और नगर निगम के विभिन्न अधिकारियों को दी गईं, फिर भी प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।

    व्यापारियों का अपना तर्क है। उनका कहना है कि भोपाल का मास्टर प्लान लंबे समय से लंबित रहा और नए व्यावसायिक क्षेत्र विकसित नहीं किए गए। इसलिए शहर की जरूरत के साथ कारोबार आवासीय इलाकों में फैलता गया। यह तर्क पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन मास्टर प्लान का न आना किसी व्यक्ति को आवासीय भूखंड पर अपनी मर्जी से व्यावसायिक निर्माण करने का अधिकार नहीं देता। यही इस पूरे विवाद का मूल प्रश्न है।वास्तविक जिम्मेदारी तीन स्तरों पर तय होनी चाहिए।

    पहली जिम्मेदारी उन संपत्ति मालिकों और कारोबारियों की है जिन्होंने स्वीकृत आवासीय उपयोग के विपरीत निर्माण किया या व्यवसाय शुरू किया। यदि किसी ने जानबूझकर आवासीय अनुमति लेकर व्यावसायिक भवन खड़ा किया है तो केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि उसने बिजली का बिल, संपत्ति कर, जीएसटी या ट्रेड लाइसेंस लिया था। किसी विभाग की ओर से लिया गया कर या जारी किया गया लाइसेंस भूमि उपयोग को अपने आप वैध नहीं बना देता।

    दूसरी और अधिक गंभीर जिम्मेदारी नगर नियोजन और स्थानीय प्रशासन की है। जिस भवन में वर्षों से होटल चल रहा हो, जहां रोज दर्जनों वाहन खड़े होते हों, जहां शोरूम या अस्पताल संचालित हो रहा हो, उसे प्रशासन ने एक दिन में नहीं देखा। नगर निगम के अधिकारी, नगर तथा ग्राम निवेश विभाग, भवन अनुज्ञा से जुड़े अधिकारी और स्थानीय प्रशासन इस बदलाव से अनजान नहीं हो सकते। फिर सवाल उठता है कि कार्रवाई इतने वर्षों तक क्यों नहीं हुई?

    तीसरी जिम्मेदारी उस राजनीतिक तंत्र की बनती है जिसने इस अव्यवस्था को बढ़ने दिया। सत्ता में आने वाली सरकारों और स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधियों ने यदि लगातार बढ़ते व्यावसायीकरण को देखा और रोकने के बजाय उसे नजरअंदाज किया, तो जवाबदेही सभी की होनी चाहिए। आज राजनीतिक दल व्यापारियों के साथ खड़े होकर राहत की मांग कर रहे हैं और दूसरी ओर रहवासी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। यह राजनीति समस्या का समाधान नहीं है।

    इस पूरे मामले में भू-माफिया और बिल्डर लॉबी की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। आवासीय भूखंड का व्यावसायिक उपयोग उसकी कीमत कई गुना बढ़ा देता है। यही वह आर्थिक प्रोत्साहन है जिसने कई जगह नियमों को पीछे धकेला। यदि किसी बिल्डर या कॉलोनाइजर ने खरीदार को यह भरोसा दिलाकर संपत्ति बेची कि भविष्य में यहां दुकान या कार्यालय चल जाएगा, तो उसकी भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। केवल उस व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा जिसने अंत में दुकान खोली। यह पता लगाना जरूरी है कि उसे व्यावसायिक उपयोग का भरोसा किसने दिया, भवन का नक्शा किसने पास किया और वर्षों तक निरीक्षण किसने नहीं किया।

    नगर निगम ने अब बड़े पैमाने पर नोटिस और सीलिंग की कार्रवाई शुरू की है। अगस्त में अरेरा कॉलोनी और रोहित नगर से कार्रवाई शुरू हुई और बाद में शहर के अन्य क्षेत्रों तक पहुंची। अगस्त के अंत तक हजारों नोटिस जारी होने की जानकारी सामने आई। सितंबर की शुरुआत में भी कार्रवाई जारी रही, हालांकि कुछ स्थानों पर नोटिस लगे होने के बावजूद आसपास की दुकानें चलती मिलने से कार्रवाई की समानता पर सवाल उठे हैं

    यही स्थिति सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। कार्रवाई हो तो सब पर समान हो। प्रभावशाली व्यक्ति का होटल, बिल्डर का शोरूम और सामान्य नागरिक की छोटी दुकान—कानून के सामने इनके लिए अलग-अलग पैमाना नहीं हो सकता।

    मामला न्यायालय में भी गंभीर स्तर पर पहुंच चुका है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद भोपाल में कार्रवाई शुरू हुई और इस विषय की अगली महत्वपूर्ण सुनवाई 15 सितंबर को निर्धारित है। सरकार के लिए अब राजनीतिक समझौते से ज्यादा महत्वपूर्ण न्यायालय के आदेश और कानून के अनुरूप स्थायी व्यवस्था बनाना है।

    समाधान केवल सीलिंग नहीं है। सरकार को सबसे पहले हर संपत्ति का स्वीकृत भूमि उपयोग, स्वीकृत नक्शा और वास्तविक उपयोग सार्वजनिक करना चाहिए। इसके बाद तीन श्रेणियां बन सकती हैं—पूरी तरह वैध, नियमों के तहत सीमित रूप से नियमित किए जा सकने वाले और पूरी तरह अवैध। तीसरी श्रेणी पर बिना राजनीतिक हस्तक्षेप कार्रवाई होनी चाहिए। जहां मिश्रित भूमि उपयोग वैज्ञानिक आधार पर संभव है, वहां सड़क की चौड़ाई, पार्किंग, यातायात, अग्निसुरक्षा और सीवेज व्यवस्था को देखकर नए मास्टर प्लान में स्पष्ट प्रावधान किया जा सकता है।

    सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अवैध कारोबार को पहले बढ़ने दिया जाए और फिर उसके कारण पैदा हुई मानवीय परेशानी का पूरा भार सरकार पर डाल दिया जाए, यह भी न्याय नहीं है। कारोबार शुरू करने वाले को अपने निवेश का जोखिम समझना होगा। वहीं सरकार और नगर निगम यह नहीं कह सकते कि उन्हें कुछ पता ही नहीं था।

    भोपाल का असली सवाल दुकानों की सीलिंग नहीं है। सवाल यह है कि आवासीय भोपाल को व्यावसायिक भोपाल में बदलने की अनुमति किसने दी? अगर इसका जवाब नहीं मिला तो आज कुछ दुकानें सील होंगी, कल दूसरी जगह वही कहानी दोहराई जाएगी। कार्रवाई की सार्थकता तभी होगी जब दुकान के साथ उस व्यवस्था पर भी कार्रवाई हो जिसने आवासीय जमीन को बाजार बनने दिया—चाहे उसमें कारोबारी हो, बिल्डर हो, अधिकारी हो या राजनीतिक संरक्षण देने वाला व्यक्ति।

  • राजा विक्रमादित्य के न्याय की स्थापना करती मोहन सरकार

    राजा विक्रमादित्य के न्याय की स्थापना करती मोहन सरकार

    विजय शाह प्रकरण को केवल एक विवादित बयान के रूप में देखने के बजाय लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनप्रतिनिधि की अभिव्यक्ति, राजनीतिक विमर्श और संस्थागत मर्यादा के व्यापक संदर्भ में देखने की आवश्यकता है। विजय शाह लंबे समय से आदिवासी समाज की राजनीति का प्रतिनिधित्व करने वाले नेता हैं। उनकी राजनीतिक भाषा और संवाद की शैली को उसी सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ में समझना चाहिए, न कि चुनिंदा शब्दों को अलग करके ऐसा अर्थ निकालना चाहिए जो वक्ता की मूल भावना से मेल ही न खाता हो।डाक्टर मोहन यादव की सरकार ने माननीय सुप्रीम कोर्ट की भावना को दृष्टिगत रखते हुए इस मुद्दे पर जो रुख अपनाया है वह लोकतांत्रिक इतिहास में एक मील का पत्थर बनने जा रहा है।मुख्यमंत्री और उनकी कैबिनेट के इस फैसले से एक बार फिर राजा विक्रमादित्य की न्यायप्रियता का माडल देश के सामने प्रकट हुआ है।

    इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या किसी जनप्रतिनिधि की कही हुई बात को उसके पूरे संदर्भ से काटकर ऐसी व्याख्या दी जा सकती है, जिससे विधायिका और न्यायपालिका के बीच अनावश्यक टकराव की स्थिति पैदा हो? लोकतंत्र का उत्तर स्पष्ट है—जनप्रतिनिधि की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए और किसी भी बयान की व्याख्या उसके संपूर्ण संदर्भ में की जानी चाहिए।

    विजय शाह ने जिस संदर्भ में अपनी बात रखी, उसे राजनीतिक आलोचकों ने जिस रूप में प्रस्तुत किया, उसके बीच अंतर को समझना जरूरी है। किसी नेता की भाषा को लेकर असहमति हो सकती है, लेकिन असहमति और आशय को विकृत करके प्रस्तुत करना दो अलग बातें हैं। यदि किसी वक्तव्य में सेना के विरुद्ध भावना नहीं थी, देश के विरुद्ध भावना नहीं थी और कर्नल सोफिया कुरैशी के प्रति व्यक्तिगत वैमनस्य का उद्देश्य नहीं था, तो पूरे प्रसंग को उसी राजनीतिक और भावनात्मक संदर्भ में समझा जाना चाहिए।

    यहां एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है—विजय शाह केवल एक मंत्री नहीं, बल्कि आदिवासी समाज से आने वाले जननेता हैं। आदिवासी राजनीति की अपनी भाषिक और सामाजिक अभिव्यक्ति की परंपरा रही है। जनप्रतिनिधित्व का अर्थ केवल सदन के भीतर बोलना नहीं है; जनता के बीच जाकर उनकी भावनाओं, आक्रोश और राष्ट्रहित से जुड़े प्रश्नों को अपनी भाषा में व्यक्त करना भी लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का हिस्सा है। यही लोकतंत्र की जीवंतता है।

    सरकार ने अपना राजनीतिक रुख स्पष्ट करके यह संदेश दिया है कि किसी जनप्रतिनिधि की राजनीतिक अभिव्यक्ति को मनमाने ढंग से परिभाषित नहीं किया जा सकता। यही बिंदु इस पूरे प्रकरण को महत्वपूर्ण बनाता है। सरकार यदि अपने मंत्री के पक्ष को राजनीतिक और संस्थागत स्तर पर स्पष्ट करती है, तो उसका अर्थ न्यायपालिका से टकराव नहीं है। बल्कि लोकतंत्र में विधायिका और कार्यपालिका की अपनी संवैधानिक भूमिका है और न्यायपालिका की अपनी भूमिका। इन संस्थाओं के बीच मतभेद को स्वतः टकराव अथवा संवैधानिक संकट मान लेना भी लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित नहीं है।

    वास्तविक खतरा तब पैदा होता है जब राजनीतिक विरोध को न्यायिक संघर्ष का रूप देने की कोशिश की जाती है। किसी राजनीतिक बयान पर राजनीतिक जवाब दिया जाना चाहिए, तथ्यों के आधार पर उसका प्रतिवाद होना चाहिए और आवश्यकता होने पर कानूनी प्रक्रिया अपने रास्ते पर चलनी चाहिए। लेकिन किसी बयान को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत कर ऐसा वातावरण बनाना कि सरकार और न्यायपालिका आमने-सामने हैं, लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है।

    मोहन सरकार का स्पष्ट रुख इसी दृष्टि से राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। सरकार ने यह संदेश दिया है कि वह अपने जनप्रतिनिधि की अभिव्यक्ति को राजनीतिक दबाव के आधार पर परिभाषित नहीं होने देगी। यह रुख लोकतंत्र में विधायिका की गरिमा को मजबूत करता है। साथ ही, न्यायिक प्रक्रिया अपने निर्धारित मार्ग पर चल सकती हैदोनों बातें एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं।

    यह भी याद रखना चाहिए कि राष्ट्रभक्ति पर किसी एक राजनीतिक समूह का एकाधिकार नहीं हो सकता। देश के प्रति सम्मान और सेना के प्रति गौरव भारतीय समाज की व्यापक भावना है। विजय शाह के वक्तव्य की आलोचना करने वाले भी राष्ट्रहित की बात कर सकते हैं और उनका विरोध करने वाले भी। लोकतांत्रिक भारत की खूबसूरती यही है कि राष्ट्रप्रेम की अभिव्यक्ति के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं।

    इसलिए विजय शाह प्रकरण को राजनीतिक षड्यंत्र, न्यायपालिका बनाम विधायिका अथवा राष्ट्रभक्ति बनाम राष्ट्रविरोध जैसे अतिरंजित द्वंद्व में बदलने के बजाय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जनप्रतिनिधित्व के अधिकार के प्रश्न के रूप में देखना अधिक सार्थक होगा। किसी जननेता के कथन को उसके मूल संदर्भ से हटाकर उसकी राजनीतिक पहचान पर प्रहार करने का माध्यम बनाना लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करता है।

    मोहन सरकार का स्पष्ट रुख इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि उसने अपने जनप्रतिनिधि के राजनीतिक अधिकार और लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के प्रश्न पर अस्पष्टता नहीं दिखाई। लोकतंत्र में सरकार का काम केवल प्रशासन चलाना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और जनप्रतिनिधित्व की गरिमा की रक्षा करना भी है।कांग्रेस के प्रवक्ता मुकेश नायक ने भी इस मुद्दे को मजाकिया लहजे में स्वीकार्य बनाने की जो पहल की वह भी स्वस्थ लोकतत्र की दिशा में स्वागतयोग्य कदम है।

    अंततः इस पूरे प्रकरण से यही संदेश निकलता है कि लोकतंत्र में किसी नेता के शब्दों से असहमति हो सकती है, लेकिन उसकी राजनीतिक अभिव्यक्ति को मनमाने अर्थ देकर दबाने का प्रयास लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए उचित नहीं है। विजय शाह की आदिवासी राजनीतिक पृष्ठभूमि, उनका जनसरोकार और उनके वक्तव्य का मूल संदर्भ—इन सभी को साथ रखकर ही निष्पक्ष निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए। राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, लेकिन जनप्रतिनिधि की आवाज को कुतर्क, अतिरंजना और संदर्भ-विहीन व्याख्या के जरिए बाधित करना लोकतंत्र को मजबूत नहीं, बल्कि कमजोर करता है।मोहन सरकार के इस फैसले पर सभी ओर यही स्वर उभरते नजर भी आ रहे हैं।

  • पूंजीवाद को ब्लैकमेल करने वाला दिमागी नक्सलवाद

    पूंजीवाद को ब्लैकमेल करने वाला दिमागी नक्सलवाद

           स्वाधीनता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किले से देश  को दिए संबोधन में जिस दिमागी नक्सली शब्द का उल्लेख किया वह इन दिनों ट्रेंडिंग कर रहा है। छोटे बड़े कई विपक्षी नेताओं ने देश का ध्यान आकर्षित करने के लिए खुद को नक्सली बताना शुरु कर दिया है। कुछ पत्रकारों ने भी बगैर जाने समझे नक्सलवादी सोच का महिमामंडन शुरु कर दिया है।  उन्हें न तो नक्सलवाद की जमीनी हकीकत मालूम है और न ही देश में इसे लेकर भारत सरकार की ओर से चलाए गए दुर्गम अभियान की लंबी यात्रा से कोई सरोकार है। वे तो बस फैशन में खुद को दिमागी नक्सलवादी बताकर ये जताना चाह रहे हैं कि वे दिमागी रूप से बहुत होशियार हैं और सरकार की नीतियों का विरोध करने की वजह से उन्हें दिमागी नक्सली बताया जा रहा है। पूर्व केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने पत्रकार वार्ता के माध्यम से इस अभियान पर पलटवार किया है। उन्होंने कहा कि यदि आप सरकार से असहमत हैं तो विरोध करिए किसने रोका है। आपको प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पसंद नहीं हैं तो उनका विरोध कीजिए। भारत जैसे लोकतंत्र में इसकी खुली छूट है। आप चुनाव की प्रक्रिया में आगे बढ़िए उन्हें और उनकी पार्टी के नेताओं को हरा दीजिए फिर सत्ता में भी आ जाईए इसे कौन रोक सकता है। इसके विपरीत आप यदि सड़कों पर रोते फिरेंगे कि हम सरकार से असहमत हैं इसलिए हमें दिमागी नक्सली कहा जा रहा है तो आपकी इस होशियारी को देश सुनने वाला नहीं है।

             पूर्व गृह मंत्री चिदंबरम ने इस उड़ते तीर को अपने ऊपर लेते हुए बयान जारी किया कि हां मैं दिमागी नक्सली हूं। उनके इस बयान पर देश और सरकार की ओर से तीखी प्रतिक्रिया भी सामने आई है। असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा ने कहा है कि कांग्रेस के कई नेता आपसी प्रतिद्वंदिता के चलते नक्सलियों का सहारा लेते रहे हैं। उनके ही संरक्षण की वजह से नक्सलवाद इतने सालों से देश का सिरदर्द बना रहा ।वामपंथ की विचारधारा से प्रेरित नक्सवाद हो या माओवादी हिंसा की गिरोह बंदी उससे संघर्ष करते हुए देश को लगभग साढ़े तीन हजार होनहार जवान खोना पड़े हैं। कांग्रेस की सरकारें भी नक्सलवाद से विरुद्ध लड़ाई लड़ने का संकल्प दुहराती रहीं हैं लेकिन केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह की घोषणा के बाद अब नक्सलवाद के खात्मे की घोषणा हुई है। कई राज्यों की सरकारों ने केन्द्र के साथ सहयोग करके घेराबंदी की तब जाकर नक्सलवाद से देश का पिंड छूटा है।

              ऐसा माना जाता है कि नक्सलबाड़ी आंदोलन की शुरुआत वर्ष 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गाँव से हुई थी। यह आंदोलन मुख्य रूप से भू-स्वामियों (जमींदारों) के विरुद्ध गरीब किसानों व आदिवासियों के शोषण और भूमि अधिकारों की मांग के खिलाफ उपजा एक सशस्त्र किसान विद्रोह था।यह आंदोलन ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त आर्थिक असमानता, गरीबी, और पारंपरिक भू-स्वामित्व प्रणाली के विरुद्ध किसानों के असंतोष की उपज था।इसे उग्र वामपंथी नेता चारू मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल ने अपना नेतृत्व प्रदान किया था। यह मार्क्सवादी-लेनिनवादी और माओवादी विचारधारा से प्रेरित था, जिसमें सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से सत्ता के विरुद्ध आवाज उठाई गई थी। इसके बाद ये देश के विभिन्न स्थानों तक फैला। इसके नाम पर कई स्थानीय जमींदारों ने अपनी सेनाएं बना लीं और वे जमीनें हथियाने व अपनी सत्ता कायम रखने के लिए नक्सलवादियों को पालते पोसते रहे। कांग्रेस के कई नेता भी वक्त बेवक्त इस आंदोलन की आड़ लेते रहे ।पूर्व मंत्री विद्याचरण शुक्ल , लिखीराम कांवरे ,उदय मुदलियार, छत्तीसगढ़ कांग्रेस के अध्यक्ष नंद कुमार पटेल,उनके पुत्र नंदकुमार पटेल को इसी नक्सलवाद के चलते जान गंवानी प़ड़ी। विद्याचरण शुक्ल के काफिले को बम से उड़ाने वाले नक्सलियों ने कहा कि वे किसी और को निशाना बना रहे थे ।नक्सलवाद के विरुद्ध भारत सरकार और छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से चलाए गए सलवा जुडूम अभियान की वजह से कांग्रेस नेता महेन्द्र कर्मा को भी अपनी जान गंवानी पड़ी। सलवा जुड़ूम उन्होंने जमीनी हकीकत को देखकर ही शुरु किया था। उनका मानना था कि नक्सलवाद की आड़ में समाज की शोषणकारी ताकतों ने गुंडागर्दी और लूट का अभियान चला रखा है इसकी वजह से गरीब आदिवासी पिस रहा है और क्षेत्र का विकास प्रभावित हो रहा है। उनकी इस पहल से नक्सली माफिया चिढ़ गया । 25 मई 2013 को छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में स्थित दरभा घाटी में जब महेन्द्र कर्मा छत्तीसगढ़ परिवर्तन यात्रा से लौट रहे थे तो उनके काफिले पर घात लगाकर हमला किया गया और बम धमाके से उड़ा दिया गया।  

           देश ने इस वामपंथी सोच से उपजे आतंकी षड़यंत्र की मंहगी कीमत चुकाई है। हमारी विकास यात्रा में अड़ंगा बनकर ये आंदोलन कभी नर्मदा विरोधी आंदोलन के रूप में सामने आया। पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के सिंगूर (Singur) में टाटा के नैनो कार प्रोजेक्ट का विरोध करके विकास विरोधी काला अध्याय बनकर सामने आया। कुडनकुलम आंदोलन (तमिलनाडु), जैतापुर आंदोलन (महाराष्ट्र), चुटका आंदोलन (मध्य प्रदेश),जैसे परमाणु संयंत्रों के विरुद्ध चलाए गए आंदोलनों ने देश की विकास यात्रा को बुरी तरह प्रभावित किया। इन आंदोलनों की वजह से आज तक देश बिजली उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर नहीं हो पाया है। बिजली आधारित परिवहन न विकसित हो पाने की वजह से हमें हर साल लगभग बीस लाख करोड़ रुपयों का ईंधन आयात करना पड़ता है जो हमारी अर्थव्यवस्था को गहरी क्षति पहुंचाता है।

          वामपंथी सोच के इसी दिमागी षड़यंत्र ने नक्सलवाद को ब्लैकमेलिंग का हथियार बना रखा है। जिस अंबानी और अडानी को कांग्रेस की ही सरकारों ने विकसित होने का अवसर दिया उन्हें ब्लैकमेल करने के लिए काग्रेस कुमार राहुल गांधी बदमिजाजी की हद पार कर चुके हैं। जिस कांग्रेसी को देखो वो विकास विरोधी नारेबाजी करके जनता की राह में रोड़े अटकाते नजर आते हैं। प्रधानमंत्री की चिंता देश के भविष्य को लेकर सामने आई।जब युद्धों की विभीषिका ने देश को संकटपूर्ण हालात में डाल  रखा है तब भी यही दिमागी नक्सली खुद को बुद्धिमान बताते हुए सरकार का विरोध करने में जुटे हैं। राहुल गांधी तो कई वैश्विक मंचों पर भारत के विरोध में बयानबाजी करते रहे हैं।  श्रीलंका में चीन की घुसपैठ हो सकी तो इसके पीछे सोनिया गांधी परिवार की ही वह प्रतिशोधात्मक राजनीति जिम्मेदार बताई जाती है जो राजीव गांधी को बम से उड़ाए जाने के बाद सामने आई। भारत की सेना ने तो जानते बूझते लिट्टे प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरण पर  हाथ नहीं डाला पर गांधी परिवार ने कथित तौर पर अपने चीनी सहयोगियों को प्रेरित करके तमिलों का भीषण नरसंहार करवाकर प्रतिशोध पूरा किया।

               भारत की शिक्षा व्यवस्था पर वामपंथी सोच का असर रहा है। इस वामपंथी सोच वाले रूस हों या चीन वे तो इस सोच के जाल से बाहर निकल आए और उन्होंने अपनी विकास यात्रा की ऊंचाईयां भी हासिल कीं लेकिन भारत के वामपंथी अभी भी लाल सलाम के उसी मकड़जाल में उलझे हैं जो पूंजीवाद को शोषणवादी बताकर उसका विरोध करने में अपनी होशियारी समझता है। ये बात अलग है उसकी ये राजनीतिक धूर्तता पूंजीवाद की ब्लैकमेलिंग से ही गुजरती है।जबकि पूंजीवाद अलग है और शोषणवाद अलग है। आप शोषणवाद को सदैव गाली दीजिए पर उसकी गोदी में बैठकर यदि आप विकास का विरोध करेंगे तो फिर आप निशाने पर जरूर आएंगे। समय आ गया है जब देश इस षड़यंत्र से बाहर निकले और विकास के राजमार्ग पर बिंदास होकर आगे बढ़े।

  • कैसे मिले दिमागी नक्सलियों से मुक्ति

    कैसे मिले दिमागी नक्सलियों से मुक्ति

    स्वतंत्र भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न केवल यह नहीं है कि गरीबी कितनी कम हुई, बल्कि यह भी है कि देश के नागरिक कितनी तेजी से समृद्ध हो रहे हैं। किसी भी राष्ट्र की सफलता का अंतिम पैमाना यह नहीं हो सकता कि उसने गरीबों की संख्या को किसी सीमा तक बनाए रखा या गरीबों को कुछ सुविधाएं उपलब्ध करा दीं। असली सफलता तब होगी, जब गरीब परिवार स्थायी रूप से गरीबी से बाहर निकलकर सम्मानजनक और संपन्न जीवन जीने लगें।

    यही वह बिंदु है जहां आज भारत की विकास-यात्रा के सामने एक वैचारिक संघर्ष दिखाई देता है। एक विचारधारा विकास को मुख्यतः पुनर्वितरण, सब्सिडी और संरक्षण के चश्मे से देखती रही है। दूसरी सोच का आग्रह है कि देश की संपत्ति का आकार इतना बड़ा किया जाए कि अवसरों, रोजगार, उद्यम और आय के नए स्रोत लगातार पैदा हों। पहली सोच पूछती है कि उपलब्ध संसाधनों को कैसे बांटा जाए; दूसरी पूछती है कि संसाधनों और संपदा को कई गुना कैसे बढ़ाया जाए। भारत जैसे विशाल और युवा देश के लिए दूसरा प्रश्न अधिक निर्णायक है।

    गरीब को गरीब बनाए रखना किसी भी अर्थ में सामाजिक न्याय नहीं हो सकता। सामाजिक न्याय का अर्थ यह होना चाहिए कि गरीब व्यक्ति को ऐसी शिक्षा, पूंजी, तकनीक, रोजगार और उद्यम का अवसर मिले जिससे वह अपनी आर्थिक स्थिति बदल सके। यदि कोई व्यवस्था लगातार गरीबी को एक स्थायी राजनीतिक पहचान में बदल देती है, तो वह अंततः गरीब को सशक्त नहीं बल्कि निर्भर बनाती है।

    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकास मॉडल की एक प्रमुख विशेषता यही है कि उसमें बुनियादी सुविधाओं के विस्तार के साथ-साथ आर्थिक गतिविधियों, बुनियादी ढांचे, विनिर्माण, उद्यमिता, डिजिटल अर्थव्यवस्था और निवेश को महत्व दिया गया है। इसका उद्देश्य अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ाना है। लेकिन इस मॉडल की सफलता केवल बड़े आंकड़ों से तय नहीं होगी। इसकी असली परीक्षा यह है कि विकास का लाभ कितने व्यापक स्तर पर आय और अवसर में बदलता है।

    यहीं तथाकथित “दिमागी नक्सल” वाली बहस को भी समझने की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री यदि उन वैचारिक शक्तियों की ओर संकेत करते हैं जो हर बड़े बुनियादी ढांचे, उद्योग, निजी निवेश या बाजार आधारित गतिविधि को संदेह की दृष्टि से देखती हैं, तो यह बहस गंभीर है। विकास परियोजनाओं पर सवाल उठाना लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन हर परियोजना को केवल इसलिए खारिज कर देना कि उससे पूंजी, उद्योग या आर्थिक विस्तार जुड़ा है, विकास की प्रक्रिया को बाधित कर सकता है।

    प्रधानमंत्री के लाल किले के भाषण का मर्म आम लोग समझ सकें इसके लिए हमें व्यापक सामाजिक विमर्श खड़ा करना होगा। किसी भी विकास-विरोधी तर्क को “नक्सली” कह देना समाधान नहीं हो सकता। लोकतंत्र में पर्यावरणविद्, किसान संगठन, श्रमिक संगठन, सामाजिक कार्यकर्ता और विपक्षी दल सरकार की परियोजनाओं पर सवाल उठा सकते हैं। सरकार का दायित्व है कि वह प्रमाण, आंकड़ों और पारदर्शिता के साथ जवाब दे। असहमति और हिंसक उग्रवाद को एक ही श्रेणी में रखना लोकतांत्रिक विमर्श को नुकसान पहुंचाएगा।

    वास्तविक चुनौती इससे कहीं बड़ी है। भारत को ऐसी विकास व्यवस्था बनानी है जिसमें पूंजी निर्माण और सामाजिक न्याय एक-दूसरे के विरोधी न दिखाई दें। बड़े उद्योगों की आवश्यकता है, लेकिन छोटे उद्यमों की भी। विदेशी निवेश की आवश्यकता है, लेकिन घरेलू उद्यमिता की भी। आधुनिक शहर चाहिए, लेकिन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करना होगा। संपत्ति निर्माण जरूरी है, लेकिन संपत्ति के अवसरों तक व्यापक पहुंच भी जरूरी है।

    यहीं “अमीरी बढ़ाने” की अवधारणा को सही अर्थ में समझना होगा। इसका मतलब कुछ लोगों को और अमीर बनाना नहीं, बल्कि पूरे समाज की उत्पादक क्षमता बढ़ाना होना चाहिए। यदि आर्थिक वृद्धि रोजगार नहीं बनाती, यदि उत्पादकता नहीं बढ़ती, यदि छोटे उद्यम प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाते और यदि शिक्षा तथा कौशल कमजोर रहते हैं, तो केवल GDP बढ़ना पर्याप्त नहीं होगा।

    भारत की राजनीतिक व्यवस्था की समस्या यह है कि चुनावी राजनीति अक्सर दीर्घकालीन संपत्ति निर्माण की तुलना में तात्कालिक लाभ को प्राथमिकता देती है। मुफ्त सुविधाएं तत्काल राजनीतिक लाभ दे सकती हैं, जबकि बेहतर स्कूल, बेहतर न्याय व्यवस्था, औद्योगिक गलियारे, कौशल विकास और प्रशासनिक सुधार का परिणाम वर्षों बाद दिखाई देता है। इसलिए राजनीतिक नेतृत्व के लिए दीर्घकालीन विकास की कीमत चुकाना आसान नहीं होता।

    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सीमा भी इसी लोकतांत्रिक वास्तविकता से जुड़ी है। वे चाहे जितनी तेजी से आर्थिक परिवर्तन की कल्पना करें, भारत की संस्थाएं, संघीय ढांचा, न्यायिक प्रक्रिया, राजनीतिक विरोध और सामाजिक विविधता उन्हें लगातार समझौते करने के लिए बाध्य करते हैं। प्रधानमंत्री के पास राजनीतिक शक्ति है, लेकिन वे लोकतंत्र की संस्थागत सीमाओं से बाहर जाकर परिवर्तन नहीं ला सकते।

    इसलिए भारत की अगली लड़ाई किसी एक विचारधारा को पराजित करने की नहीं, बल्कि उस मानसिकता को बदलने की है जो गरीबी को स्थायी स्थिति मानती है। गरीब को संरक्षण की जरूरत हो सकती है, लेकिन उसका अंतिम लक्ष्य संरक्षण में बने रहना नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर होकर समृद्ध होना होना चाहिए।

    गरीबी का सम्मान गरीब व्यक्ति का सम्मान है; गरीबी को स्थायी बनाना गरीब का सम्मान नहीं। भारत को ऐसी राजनीति और ऐसी प्रशासनिक संस्कृति चाहिए जो गरीबों की संख्या और निर्भरता दोनों घटाए तथा संपन्न, उत्पादक और अवसर-संपन्न नागरिकों की संख्या बढ़ाए।

    अगर भारत को विकसित राष्ट्र बनना है तो सवाल यह नहीं होना चाहिए कि गरीबी को कैसे सुरक्षित रखा जाए। सवाल यह होना चाहिए कि हर भारतीय को गरीबी से बाहर निकलकर समृद्धि की दौड़ में शामिल होने का अवसर कैसे दिया जाए। यही विकास की सबसे बड़ी कसौटी है और आने वाले वर्षों में भारतीय लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा भी।

  • चंद चेहरे नहीं जनमन की आवाज सुनाता है प्रेस

    चंद चेहरे नहीं जनमन की आवाज सुनाता है प्रेस

    लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह नहीं कि वहाँ चुनाव होते हैं, बल्कि यह है कि वहाँ संवाद जीवित रहता है। संसद कानून बनाती है, सरकार उन्हें लागू करती है, न्यायपालिका उनकी संवैधानिक समीक्षा करती है और पत्रकारिता जनता के सामने इन सबका लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है। यही कारण है कि स्वतंत्र प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है। किंतु जब राजनीतिक असहमति का उत्तर तथ्यों से देने के बजाय स्वयं संवाद के माध्यम पर हमला बोला जाने लगे, तब यह केवल मीडिया का संकट नहीं रहता, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर आघात बन जाता है।सोशल मीडिया जहां व्यक्तियों की सपाट भावनाओं को व्यक्त करता है वहीं मीडिया को देश का मन पढ़कर जन भावनाओं को व्यक्त करने की जवाबदारी निभाना होती है।

    बीते कुछ वर्षों में एक चिंताजनक प्रवृत्ति सामने आई है। जैसे ही कोई समाचार या विश्लेषण किसी राजनीतिक दल, आंदोलन या विचारधारा की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं होता, पूरे मीडिया को एक राजनीतिक विशेषण देकर खारिज करने का प्रयास शुरू हो जाता है। किसी चैनल, अखबार या पत्रकार की आलोचना करना एक बात है, लेकिन पूरे मीडिया जगत को अविश्वसनीय घोषित कर देना दूसरी बात है। यह आलोचना नहीं, बल्कि जनता के मन में संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करने का प्रयास है।पत्रकारिता की भूमिका केवल धर्मकांटे की होती है। ये कांटा जब खोट को उजागर करता है तो क्या आप उसे झुठलाने के लिए कांटे को ही दोषी बताने लग जाएंगे। 

    भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। इसी संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत राजनीतिक दल अपनी विचारधारा जनता तक पहुँचाते हैं, चुनाव प्रचार करते हैं और मतदाताओं से समर्थन मांगते हैं। लोकतंत्र ने उन्हें अपनी बात रखने का पूरा अवसर दिया है। यदि किसी राजनीतिक दल को किसी समाचार से आपत्ति है, तो उसका उत्तर तथ्य, दस्तावेज़ और तर्क से दिया जाना चाहिए। संवाद का उत्तर संवाद से होना चाहिए, न कि संवाद के माध्यम को ही कठघरे में खड़ा करके। समाचार माध्यम तो वो हवाएं हैं जो चंद आंदोलनकारियों का चेहरा देखकर नहीं बल्कि समाज के विश्वसनीय तबकों के बीच रायशुमारी के आधार पर भावनाओं का तापमान प्रदर्शित करती हैं। मुट्टी भर आंदोलनकारियों की आवाज को यदि लोकतंत्र की आवाज बताया जाने लगे तो फिर देश के तीन प्रमुख प्रभावी स्तंभों को देश की दिशा तय करना कठिन हो जाएगा।

    यह समझना भी आवश्यक है कि पत्रकारिता और राजनीति का चरित्र मूलतः अलग है। राजनीतिक दल सत्ता प्राप्त करने के लिए संघर्ष करते हैं। उनकी सफलता चुनावी जीत से मापी जाती है। पत्रकारिता की सफलता सत्ता प्राप्त करने में नहीं, बल्कि जनता को विश्वसनीय सूचना उपलब्ध कराने में है। मीडिया न सरकार बनाता है, न मुख्यमंत्री चुनता है, न प्रधानमंत्री नियुक्त करता है। वह मतदाता नहीं है, वह प्रत्याशी नहीं है और वह निर्वाचन आयोग भी नहीं है। उसका कार्य केवल इतना है कि वह समाज के सामने तथ्य रखे, विभिन्न पक्षों को सुने और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर अपनी संपादकीय राय व्यक्त करे।

    यही पत्रकारिता की संवैधानिक और नैतिक मर्यादा भी है। मीडिया अदालत नहीं है कि दोष सिद्ध कर दे। वह कार्यपालिका नहीं है कि दंड दे सके। वह विधायिका नहीं है कि कानून बना सके। इसलिए पत्रकारिता को फतवे जारी करने का अधिकार नहीं है। उसका सबसे बड़ा हथियार विश्वसनीय तथ्य हैं, न कि राजनीतिक घोषणाएँ। इसी प्रकार राजनीति को भी यह अधिकार नहीं है कि वह असहमति के कारण पूरे मीडिया को कठघरे में खड़ा कर दे। लोकतंत्र में किसी संस्था की विश्वसनीयता पर हमला करना आसान है, किंतु उसे पुनः स्थापित करना अत्यंत कठिन।

    यह भी उतना ही सत्य है कि मीडिया को आत्मानुशासन का पालन करना चाहिए। यदि किसी समाचार में तथ्यात्मक त्रुटि है, यदि किसी रिपोर्ट में पक्षपात है या यदि किसी पत्रकार ने नैतिक सीमाएँ लांघी हैं, तो उसकी आलोचना न केवल उचित बल्कि आवश्यक है। स्वतंत्र पत्रकारिता का अर्थ जवाबदेही से मुक्त होना नहीं है। किंतु व्यक्तिगत या संस्थागत त्रुटियों के आधार पर पूरे मीडिया जगत को संदेह के घेरे में खड़ा कर देना न्यायोचित नहीं कहा जा सकता।

    सोशल मीडिया के विस्तार ने इस प्रवृत्ति को और अधिक उग्र बना दिया है। अब किसी समाचार से असहमति होने पर कुछ ही मिनटों में हैशटैग, वीडियो और पोस्ट के माध्यम से पूरे मीडिया को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। इस डिजिटल भीड़ में तथ्य पीछे छूट जाते हैं और आरोप आगे निकल जाते हैं। परिणाम यह होता है कि नागरिक यह तय ही नहीं कर पाता कि सत्य किसके पास है। जब सत्य पर विश्वास कमजोर पड़ता है, तब अफवाहें लोकतंत्र की सबसे बड़ी शत्रु बन जाती हैं।

    भारतीय पत्रकारिता का इतिहास बताता है कि प्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आपातकाल और उसके बाद के दशकों तक सत्ता की दुरभिसंधियों को उजागर किया है। अनेक बार सरकारों के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश भी पत्रकारों ने किया और अनेक अवसरों पर विपक्ष के दावों की भी तथ्य-जाँच की। इसलिए पूरे मीडिया को किसी एक राजनीतिक खांचे में बाँध देना न तो इतिहास के साथ न्याय है और न वर्तमान के साथ।

    राजनीतिक दलों को यह नहीं भूलना चाहिए कि आज जिस मीडिया मंच से वे अपने भाषण, प्रेस कॉन्फ़्रेंस और जनसभाएँ देशभर तक पहुँचाते हैं, उसी मंच की विश्वसनीयता पर यदि वे स्वयं लगातार प्रश्नचिन्ह लगाएंगे, तो अंततः नुकसान उनका भी होगा। लोकतंत्र में संवाद का मंच जितना मजबूत होगा, लोकतंत्र उतना ही मजबूत रहेगा। संवाद का मंच यदि अविश्वसनीय बना दिया गया, तो राजनीति भी अंततः अफवाहों के सहारे चलने लगेगी।

    पत्रकारिता की भी परीक्षा का समय है। उसे किसी दल की प्रशंसा या विरोध के आधार पर नहीं, बल्कि अपने पेशेवर मानकों के आधार पर स्वयं को सिद्ध करना होगा। समाचार और टिप्पणी के बीच स्पष्ट अंतर, तथ्य की कठोर जाँच, सभी पक्षों को अवसर और त्रुटि होने पर सार्वजनिक सुधार—यही वे आधार हैं जिन पर पत्रकारिता का भविष्य टिका है।

    लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह होती है जब राजनीतिक प्रतिस्पर्धा संस्थाओं के विरुद्ध अभियान का रूप ले लेती है। आज आवश्यकता यह नहीं कि मीडिया को मित्र या शत्रु घोषित किया जाए। आवश्यकता यह है कि उसे स्वतंत्र, उत्तरदायी और विश्वसनीय बने रहने दिया जाए। क्योंकि जिस दिन समाज संवाद के अपने माध्यम पर भरोसा खो देगा, उस दिन लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित रह जाएगा और जनमत का निर्माण तथ्यों से नहीं, बल्कि शोर से होगा।

    खासतौर से ये प्रहार मीडिया के ही कुछ बंधुओं के कंधे पर बंदूक रखकर किए जाते हैं। जिनके पास अपनी बात कहने का साहस और ज्ञान नहीं होता वे इसकी भरपाई करने के लिए मीडिया के बंधुओं का उपहास उड़ाना शुरु कर देते हैं। वे मीडिया के जनसरोकारों पर लांछन लगाकर उसकी जड़ें काटने में जुट जाते हैं। इसलिए मतभेद रखिए, कठोर आलोचना कीजिए, समाचारों को चुनौती दीजिए, प्रमाण प्रस्तुत कीजिए—लेकिन लोकतंत्र के उस दर्पण को मत तोड़िए जिसमें पूरा राष्ट्र स्वयं को देखता है। दर्पण पर पत्थर फेंकने से चेहरा नहीं बदलता; केवल प्रतिबिंब धुंधला हो जाता है।

  • नीट माफिया की अड़ीबाजी फेल

    नीट माफिया की अड़ीबाजी फेल

    नीट का प्रश्नपत्र लीक होना देश की परीक्षा व्यवस्था पर एक गंभीर माना जाना चाहिए। करोड़ों विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ी इस परीक्षा में यदि कहीं भी संगठित अपराध ने सेंध लगाई है तो उसके दोषियों के प्रति कोई नरमी नहीं हो सकती। इस मामले में केंद्र सरकार ने जांच सीबीआई को सौंपी, अनेक राज्यों में छापेमारी हुई, गिरफ्तारियां हुईं, आरोपपत्र दायर हुए और परीक्षा सुरक्षा व्यवस्था में सुधार की प्रक्रिया प्रारंभ की गई। इसके साथ ही लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 जैसे कठोर कानून को लागू करने की दिशा में भी कदम बढ़ाए गए। इन कार्रवाइयों का उद्देश्य केवल इस प्रकरण का समाधान नहीं, बल्कि वर्षों से पनप रहे परीक्षा माफिया को संदेश देना था कि अब उनके लिए पहले जैसी परिस्थितियां नहीं रहेंगी।

    लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, यह मुद्दा केवल परीक्षा की निष्पक्षता का प्रश्न नहीं रहा। वह शीघ्र ही राष्ट्रीय राजनीति का विषय बन गया। संसद से लेकर सड़क तक विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। दिल्ली में धरने हुए, संसद मार्ग पर प्रदर्शन हुए और कई स्थानों पर पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव भी देखने को मिला। यह लोकतंत्र का स्वाभाविक दृश्य हो सकता है, परंतु प्रश्न यह है कि क्या आंदोलन का पूरा केंद्र विद्यार्थियों का भविष्य था, या उसके साथ-साथ राजनीतिक लाभ-हानि का गणित भी जुड़ गया था? आखिर राजनीतिक दलों के वो कौन लोग थे जो अपने बच्चों (ग्राहकों) को देश की प्रतिष्ठित नौकरियों में प्रवेश करवाने के लिए अड़ीबाजी पर उतर आए ।

    यह स्वीकार करना होगा कि जिन विद्यार्थियों ने वर्षों की मेहनत के बाद परीक्षा दी थी, उनके मन में संदेह पैदा होना स्वाभाविक था। यदि कहीं प्रश्नपत्र लीक हुआ है तो वे निष्पक्ष जांच और पारदर्शी कार्रवाई की अपेक्षा करेंगे। इसलिए छात्रों की चिंता और उनकी आवाज को लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में देखा जाना चाहिए। किंतु जब किसी भी आंदोलन में राजनीतिक दल, उनके छात्र संगठन और वैचारिक मंच सक्रिय हो जाते हैं, तब आंदोलन का स्वरूप व्यापक राजनीतिक संघर्ष का रूप भी ले लेता है। नीट विवाद में भी यही हुआ।

    सरकार का पक्ष था कि उपलब्ध जांच और न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत सामग्री यह सिद्ध नहीं करती कि पूरे देश की परीक्षा प्रभावित हुई थी। इसी आधार पर सरकार ने संपूर्ण परीक्षा रद्द करने का विरोध किया। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने भी उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पूरे देश में पुनर्परीक्षा का आदेश नहीं दिया। न्यायालय ने यह अवश्य कहा कि जहां अपराध हुआ है वहां दोषियों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, किंतु पूरे देश के लाखों ईमानदार अभ्यर्थियों को बिना पर्याप्त आधार के पुनः परीक्षा के लिए बाध्य करना उचित नहीं होगा।

    यहीं से राजनीतिक बहस और तेज हुई। विपक्ष ने इसे सरकार की प्रशासनिक विफलता बताया। सरकार समर्थकों का तर्क था कि पहली बार संगठित परीक्षा माफिया पर राष्ट्रीय स्तर पर इतनी व्यापक कार्रवाई हो रही है, इसलिए जिन नेटवर्कों के हित प्रभावित हुए हैं, वे भी इस विवाद को राजनीतिक रूप देने का प्रयास कर रहे हैं। यह एक राजनीतिक तर्क है, परंतु इसका निर्णायक निष्कर्ष तभी निकाला जा सकता है जब जांच पूरी हो और उसके आधार पर ठोस प्रमाण सामने आएं।

    दिल्ली में हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा बल प्रयोग भी चर्चा का विषय बना। पुलिस का कहना था कि निषेधाज्ञा वाले क्षेत्रों में प्रवेश रोकना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी थी। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि उनकी लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति पर अंकुश लगाया गया। लोकतंत्र में दोनों पक्षों की जिम्मेदारियां हैं—प्रशासन की भी और आंदोलनकारियों की भी। यदि प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे तो बल प्रयोग की आवश्यकता नहीं पड़ती, और यदि प्रतिबंधित क्षेत्रों में टकराव की स्थिति बने तो पुलिस भी निष्क्रिय नहीं रह सकती।

    इस पूरे विवाद का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई। भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं के साथ जुड़े संगठित गिरोह कोई नई घटना नहीं हैं। विभिन्न राज्यों में, अलग-अलग सरकारों के समय, भर्ती परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं में पेपर लीक के अनेक मामले सामने आ चुके हैं। इसका अर्थ है कि समस्या किसी एक सरकार तक सीमित नहीं, बल्कि एक लंबे समय से विकसित हुए अपराध तंत्र की है। यदि इस तंत्र को वास्तव में समाप्त करना है तो केवल राजनीतिक आरोपों से नहीं, बल्कि तकनीकी सुरक्षा, संस्थागत सुधार, त्वरित न्याय और कठोर दंड से समाधान निकलेगा।

    नीट विवाद ने यह भी स्पष्ट किया कि परीक्षा प्रणाली पर जनता का विश्वास बनाए रखना सरकार की सर्वोच्च जिम्मेदारी है। जांच की गति तेज हो, मुकदमे समयबद्ध हों, दोषियों को दंड मिले और परीक्षा एजेंसियों में पारदर्शिता बढ़े—यही वह रास्ता है जिससे विद्यार्थियों का भरोसा लौटेगा। दूसरी ओर, विपक्ष की भूमिका भी केवल विरोध तक सीमित न होकर रचनात्मक सुधारों के सुझाव देने की होनी चाहिए।

    इस पूरे घटनाक्रम से सबसे बड़ा सबक यही मिलता है कि परीक्षा व्यवस्था को राजनीतिक संघर्ष का स्थायी मैदान बनाने से सबसे अधिक नुकसान विद्यार्थियों का होता है। परीक्षा माफिया के विरुद्ध कार्रवाई और छात्रों के हित—इन दोनों उद्देश्यों में कोई टकराव नहीं है। टकराव तब पैदा होता है जब राजनीतिक विमर्श तथ्यों की जगह धारणाओं पर आधारित होने लगता है।

    अंततः किसी भी लोकतांत्रिक समाज की कसौटी यही है कि वह अपराधियों को कठोर दंड दे, निर्दोष विद्यार्थियों के हितों की रक्षा करे और संस्थाओं में जनता का विश्वास बनाए रखे। नीट विवाद का वास्तविक निष्कर्ष भी इसी कसौटी पर तय होगा—न कि केवल इस आधार पर कि किसने कितने प्रदर्शन किए या किसने कितने आरोप लगाए।

  • भाजपा की धुलाई का अंदाज समझिए नेताजी

    भाजपा की धुलाई का अंदाज समझिए नेताजी

    भारतीय जनता पार्टी के फैसलों को देखकर आज लोग हतप्रभ हैं। नरोत्तम मिश्रा जैसे दिग्गज की पतंग कटने से भाजपा के कार्यकर्ता और नेता सभी बौखलाए घूम रहे हैं। उन कार्यकर्ताओं की पूरी जमीन दरक गई है जिन्होंने नरोत्तम के लंबी दौड़ का घोड़ा मानकर अपनी पूरी जायदाद दांव पर लगा दी थी। भाजपा की राजनीति को जिन्होंने भी करीब से देखा है उन्होंने नरोत्तम की दबंगई से बैचेनी भी महसूस की है। ब्राह्मण राजनीति का संबल पाकर नरोत्तम सत्ता के जिस सत्रहवें आसमान पर पहुंच गए थे उसे देखकर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि पार्टी कभी उनका टिकिट काटने का फैसला भी ले सकती है। खुद को केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह का करीबी होने का अहसास भरने वाले नरोत्तम भी इस तरह की कोई उम्मीद नहीं कर रहे थे. उन्होंने अपनी चुनावी तैयारी पूरे आत्म विश्वास से चालू कर दी थी।

    भाजपा बार बार अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को संदेश देने का प्रयास कर रही है कि वे समय की मांग को देखते हुए अपने तौर तरीके बदलें। कांग्रेस के जमाने की राजनीतिक शैली की पूंछ पकड़कर चलने की कुनबे वाली राजनीति छोड़ें पर गमले में उगे हुए नेता ये समझने को राजी नहीं हैं। विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर, पीडब्ल्यूडी मंत्री राकेश सिंह, पंचायत मंत्री प्रहलाद पटेल जैसे नेताओं को मध्यप्रदेश भेजकर भाजपा हाईकमान ने पार्टी की लाईन और लैंथ बदलने की कोशिश की लेकिन वह असफल रही। उमा भारती जैसी कद्दावर नेता को विदा करके संदेश देने का प्रयास किया कि भारत की राजनीतिक जरूरतें कुछ अलग हैं लेकिन कार्यकर्ता पुराना ढर्रा छोड़ने को तैयार नहीं हैं। गोपाल भार्गव , भूपेन्द्र सिंह, जयंत मलैया, हिम्मत कोठारी जैसे दिग्गजों को दर्शक दीर्घा में बिठाकर पार्टी ने अन्य नेताओं को नई राजनीति करने का संदेश दिया पर वे कांग्रेस के दिग्विजय सिंह की दगाबाजी को अपना माडल बनाकर चलने लगे। शिवराज सिंह चौहान को केन्द्र भेजकर पार्टी ने चाहा था मध्यप्रदेश में वह भाजपा को कांग्रेस की छत्रछाया बनकर चलने वाली पिछलग्गू छवि से मुक्त कर पाएगी। इसके बाद भी लगभग पांच लाख करोड़ रुपए डकारकर बैठे नेताओं के मुंह लगा खून उन्हें आदमखोर बनने से नहीं रोक पा रहा है। नरोत्तम के टिकिट कटने के बाद उनके समर्थकों ने जिस तरह भाजपा कार्यालय को बंधक बनाया, शहर के बाजार बंद कराने का प्रयास करके सरकार को ठेंगा दिखाया उससे लगता है कि नरोत्तम अपने पतन की नई इबारत लिख रहे हैं।

    आज भाजपा के सामने चुनौती है कि वह कांग्रेस के छोड़े गए पापों को भी ढोए और वैश्विक परिस्थितियों जन्य मंहगाई से भी जनता को बचाए। ऐसे में वह दंभी नेताओं की स्वयं का घर भरने वाली राजनीति को बर्दाश्त कैसे कर सकती है। जिन नेताओं को उसने घर बिठाया है वे सभी अरबों की जायदाद खड़ी करके किनारे किए जाने के बाद स्वयं को सहानुभूति का पात्र बताने का प्रयास कर रहे हैं। वे अपने स्थान पर अपनी औलादों को राजगद्दी दिलाने का पुरजोर प्रयास भी कर रहे हैं। भाजपा हाईकमान ने कई बार स्पष्ट कर दिया है कि वह कांग्रेस की तरह परिवारवादी पार्टी नहीं है। किसी कार्यकर्ता को केवल इसलिए सत्ता में नहीं उतारा जा सकता कि वह फलां राजनेता का बेटा या बेटी है। इसके बावजूद पार्टी के नेतागण चंद उदाहरणों का हवाला देकर अपनी नई पीढ़ी को अवसर दिए जाने की वकालत कर रहे हैं।

    मध्यप्रदेश भाजपा की प्रयोगशाला रही है। यहीं से भाजपा का संगठन परवान चढ़ा है। इसके बावजूद कुशाभाऊ ठाकरे,राजमाता विजयाराजे सिंधिया, वीरेन्द्र कुमार सखलेचा,प्यारेलाल खंडेलवाल,  कैलाश जोशी,सत्यनारायण जटिया, राघवजी भाई,जैसे अनेकानेक नेताओं ने जो भाजपा खडी की थी वह धीरे धीरे कांग्रेस में तब्दील हो गई। सुंदरलाल पटवा ने उस भाजपा को अर्जुनसिंह कांग्रेस की बी टीम बनाकर यहां केन्द्र विरोधी राजनीति की नींव रखी थी। कैलाश नारायण सारंग, बाबूलाल गौर, जैसे नेताओं को खड़ा करके कांग्रेस ने भाजपा को अपने अनुकूल बनाकर उपयोग किया। आज वह भाजपा कांग्रेस की लूटो और भागो की संस्कृति की वाहक बन गई है। दिग्विजय सिंह ने अपने गुरु अर्जुनसिंह की तरह शतरंज की चाल चलते हुए भाजपा को सत्ता में आने का अवसर देकर सोचा था कि समय आने पर हम इसे पटवा सरकार की तरह गिराकर दुबारा गद्दी संभाल लेंगें।उनका ये दांव वक्त की आंधी में धराशायी हो गया। अपने राजनीतिक जीवनकाल में उन्होंने भाजपा में कई नेता खड़े कर लिए थे जो हमेशा उनके हुकुम के गुलाम बने रहे। कैलाश विजयवर्गीय जैसे नेता तो खुलकर आज भी दिग्विजय सिंह का गुणगान करते नहीं थकते।

    भाजपा की इसी दुहरे मुंह वाली राजनीति देखकर हाईकमान के चिंतक और विचारक बैचेन हो गए हैं। मध्यप्रदेश की धीमी राजनीतिक विकास यात्रा, किसान कर्मण्य अवार्ड जीतकर फर्जी विकास के दावे करने वाली राजनीति की पोल राज्य की बैलेंसशीट बार बार खोल रही है। इसके बावजूद भ्रष्टाचार करके माफिया सरगना बन चुके दंभी नेताओं की धमकियों के सामने हाईकमान कई बार खुद को लाचार पाता रहा है। भाजपा संगठन की कमान युवा नेता विष्णुदत्त शर्मा को सौंपकर भाजपा ने सोचा था कि वे नई पीढ़ी के योग्य युवाओं को आगे लाएंगे पर वे ब्राह्रणवादी राजनीति के मोहपाश में इस कदर उलझे कि राजनीति के परिदृश्य में अलग थलग हो गए।

    भाजपा ने महाकाल लोक का निर्माण करके धर्म की राजनीति को सत्ता का सहायक बनाने का प्रयास किया है पर नरोत्तम मिश्रा दतिया में नवगृह मंदिर बनाकर राजनीति को धर्म का चेला बनाने चल निकले। आखिर कब तक भाजपा हाईकमान इस ब्लैकमेलिंग को बर्दाश्त कर सकता था। अपनी बारी आने पर उसने टिकिट काटकर संदेश देने का प्रयास किया है कि कार्यकर्ता यदि मालिक बनने का प्रयास करेगा तो फिर उसे उसकी भूमिका याद जरूर दिलाई जाएगी। शिवराज सिंह चौहान  की पिलपिली सरकार में मलखंभ पर चढ़कर राजनीति करने वाले नरोत्तम ये भूल गए हैं कि भाजपा आज विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है। उसके सामने चुनौती है कि वह भारत को विश्व की महाशक्ति बनाकर दिखलाए। किसी छुटभैये नेता की जयजयकार कराने के लिए भाजपा का मंच आज सीढ़ी नहीं बन सकता।हाईकमान ने पार्टी संगठन से कई नजरियों से छानबीन कराई और उसके बाद टिकिट काटने का फैसला लिया । जाहिर है कि कार्यकर्ताओं को इस फैसले का सम्मान करना पड़ेगा। आखिर कैप्टन को ये अधिकार तो होना ही चाहिए कि वह किस वक्त पर किस खिलाड़ी को कहां उतारे।

  • अब आधी आबादी को मिलेगा फैसले लेने का हक

    अब आधी आबादी को मिलेगा फैसले लेने का हक

    नारी शक्ति वंदन अधिनियम:

    मध्यप्रदेश विधानसभा में नारी शक्ति वंदन अधिनियम को पारित कर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार ने केवल एक विधायी पहल नहीं की, बल्कि उस व्यापक राष्ट्रीय एजेंडे को मजबूती दी है जिसमें भारत की आधी आबादी को आर्थिक और राजनीतिक रूप से निर्णायक भूमिका में लाने की परिकल्पना की गई है। यह अधिनियम महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने का प्रावधान रखता है और लोकतंत्र की संरचना में एक ऐसा बदलाव प्रस्तावित करता है, जो आने वाले समय में सत्ता और समाज दोनों के चरित्र को प्रभावित कर सकता है।


    भारतीय सामाजिक ढांचे की एक पुरानी सच्चाई यह रही है कि एक व्यक्ति कमाता है और कई लोग उसी आय पर निर्भर रहते हैं। इस व्यवस्था ने न केवल परिवारों की आर्थिक क्षमता को सीमित किया, बल्कि देश की उत्पादकता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाला। यदि महिलाओं को बड़े पैमाने पर कार्यबल और निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में शामिल किया जाता है, तो यह केवल सामाजिक न्याय नहीं बल्कि आर्थिक विकास का भी प्रश्न बन जाता है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम इसी सोच को संस्थागत रूप देने का प्रयास करता है।


    मध्यप्रदेश और कई अन्य राज्यों में पहले ही लाड़ली बहना सरीखी योजनाएं लाकर भारतीय जनता पार्टी ने महिलाओं को विकास की मुख्य धारा में लाने का प्रयास किया था। ये योजनाएं सफलता पूर्वक चलती जा रही हैं। मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव ने सदन में भी संकल्प दुहराया है कि उनकी सरकार महिलाओं को दी जाने वाली राशि बढ़ाकर छह हजार रुपए तक कर देगी। जबकि राज्य सरकार के पास आर्थिक संसाधन पर्याप्त नहीं हैं। जाहिर है कि सरकार अपनी इस निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ाना चाहती है जो वस्तुस्थिति स्वयं देखकर फैसला कर पाएंगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्र की भाजपा सरकार ने इस विधेयक का जो हश्र ऊंचे सदनों में देखा उसके बाद अब उनकी पार्टी ने राज्यों से एक तरह जन जागरण का ही प्रयास शुरु कर दिया है। सदन में प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने परिसीमन को मुद्दा बनाकर बहिर्गमन कर दिया और प्रस्ताव पारित नहीं किया इससे ये संदेश निचले स्तर तक चला गया है कि कांग्रेस आजादी के बाद से महिलाओं को सत्ता में संवैधानिक भागीदारी देने में अडंगा लगाती रही है। छुटपुट महिला नेतृत्व को अपनी उपलब्धियां बताते हुए कांग्रेस ने जो बात सदन में रखी उसका खमियाजा उसे आगामी चुनावी राजनीति में उठाना पड़ सकता है।
    स्थानीय निकायों—पंचायतों और नगरपालिकाओं—में महिलाओं को आरक्षण का अनुभव पहले ही सकारात्मक संकेत दे चुका है। अनेक महिला जनप्रतिनिधियों ने प्रशासनिक दक्षता और जनसरोकारों के प्रति संवेदनशीलता का परिचय दिया है। लेकिन विधायिका के उच्च स्तर पर उनकी भागीदारी अब तक सीमित रही है। ऐसे में यह अधिनियम महिलाओं को नीति-निर्माण की अग्रिम पंक्ति में लाने का अवसर प्रदान करता है, जिससे शासन की प्राथमिकताओं में भी संतुलन आने की उम्मीद की जा सकती है।


    राजनीतिक दृष्टि से यह कदम सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के लिए भी महत्वपूर्ण है, जो लंबे समय से महिला सशक्तिकरण को अपने प्रमुख एजेंडे के रूप में प्रस्तुत करती रही है। यह पहल महिला मतदाताओं के बीच उसकी पकड़ को मजबूत कर सकती है। हालांकि, विपक्ष—विशेषकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस—इसे राजनीतिक लाभ के नजरिए से देखता है और इसके क्रियान्वयन को लेकर गंभीर सवाल उठा रहा है।


    यहीं से इस अधिनियम की सबसे जटिल और विवादास्पद परत सामने आती है—परिसीमन का प्रावधान। सरकार ने महिला आरक्षण को आगामी जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन से जोड़ दिया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि आरक्षण तत्काल लागू नहीं होगा, बल्कि निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण के बाद ही प्रभावी होगा। यही कारण है कि यह नीति जितनी ऐतिहासिक कही जा रही है, उतनी ही राजनीतिक बहस का केंद्र भी बन गई है।


    कांग्रेस का तर्क है कि महिलाओं को उनका अधिकार देने के लिए परिसीमन का इंतजार करना अनावश्यक है। यदि सरकार की मंशा स्पष्ट है, तो वर्तमान सीटों पर ही 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जा सकता है। विपक्ष इसे “विलंबित न्याय” के रूप में देखता है और आशंका जताता है कि यह प्रावधान महिलाओं को तत्काल लाभ से वंचित कर सकता है।


    इसके विपरीत, भाजपा इस निर्णय को दीर्घकालिक और रणनीतिक दृष्टि से उचित ठहराती है। उसका कहना है कि परिसीमन के बाद संसद और विधानसभाओं की सीटों में वृद्धि संभावित है। ऐसे में यदि आरक्षण उस समय लागू किया जाता है, तो महिलाओं को न केवल प्रतिशत के आधार पर बल्कि वास्तविक संख्या में भी अधिक प्रतिनिधित्व मिलेगा। यह तर्क अधिनियम को केवल प्रतीकात्मक न रखकर व्यापक प्रभाव वाला बनाने की कोशिश के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।


    हालांकि, इस पूरे विमर्श में सबसे बड़ा प्रश्न समय-सीमा का है। भारत में आखिरी परिसीमन 2002 में हुआ था और उसके बाद 2026 तक इस पर रोक रही है। यदि नई जनगणना और परिसीमन में देरी होती है, तो महिला आरक्षण भी स्वतः टलता जाएगा। ऐसे में यह आशंका निराधार नहीं है कि यह ऐतिहासिक पहल कागजों तक सीमित रह सकती है, जब तक कि इसे समयबद्ध तरीके से लागू न किया जाए।
    परिसीमन का एक और आयाम क्षेत्रीय संतुलन से जुड़ा है। नई जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण कुछ राज्यों को अधिक प्रतिनिधित्व देगा, तो कुछ को अपेक्षाकृत कम। ऐसे में महिला आरक्षण इस व्यापक राजनीतिक पुनर्संरचना का हिस्सा बन जाएगा, जहां लैंगिक समानता के साथ-साथ संघीय संतुलन का प्रश्न भी जुड़ जाएगा।


    इन तमाम बहसों के बीच यह भी स्वीकार करना होगा कि केवल आरक्षण ही महिलाओं के वास्तविक सशक्तिकरण की गारंटी नहीं है। शिक्षा, राजनीतिक प्रशिक्षण और सामाजिक स्वीकृति जैसे कारक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। कई बार ‘प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व’ की समस्या सामने आती है, जिसे दूर किए बिना इस पहल के उद्देश्य अधूरे रह सकते हैं।


    अंततः, नारी शक्ति वंदन अधिनियम को भारत की विकास यात्रा के एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखा जाना चाहिए। यह आधी आबादी को केवल अधिकार देने की नहीं, बल्कि उन्हें देश की आर्थिक और राजनीतिक शक्ति का सक्रिय भागीदार बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। अब यह सरकार और व्यवस्था पर निर्भर करेगा कि वह परिसीमन जैसी प्रक्रियाओं को कितनी गंभीरता और गति से पूरा करती है, ताकि यह ऐतिहासिक पहल अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त कर सके और भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी बना सके।

  • जनता स्वस्थ रहे इसलिए ज्यादा डाक्टर बना रहेःराजेन्द्र शुक्ला

    जनता स्वस्थ रहे इसलिए ज्यादा डाक्टर बना रहेःराजेन्द्र शुक्ला

    भोपाल, 26 फरवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। राजेन्द्र शुक्ला ने आज विधानसभा में प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ बनाने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा कि आमजन को गुणवत्तापूर्ण और सुलभ उपचार उपलब्ध कराना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य ढांचे के विस्तार, विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति और आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता के लिए व्यापक कार्ययोजना पर अमल किया जा रहा है।उन्होंने कहा कि प्रदेश में डाक्टरों की कमी दूर करने के लिए एमबीबीएस में 1000 औ पोस्ट ग्रेजुएट विशेषज्ञता के लिए आठ सौ सीटें बढ़ाई गईं हैं। भारत सरकार हर लोकसभा क्षेत्र में एक मेडीकल कालेज खोलना सुनिश्चित कर रही है। इससे आने वाले समय में लोगों को डाक्टरी सुविधाएं सुलभ हो जाएंगी।

    विधानसभा में अपने वक्तव्य के दौरान मंत्री ने बताया कि जिला अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में सुविधाओं के उन्नयन का कार्य तेज गति से चल रहा है। कई अस्पतालों में आईसीयू और मातृ-शिशु वार्डों का विस्तार किया गया है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की कमी दूर करने के लिए विशेष भर्ती अभियान चलाया जा रहा है, जिससे दूरस्थ अंचलों के मरीजों को भी बेहतर उपचार मिल सके।

    मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि गंभीर बीमारियों के उपचार के लिए राज्य सरकार द्वारा संचालित योजनाओं के दायरे को बढ़ाया गया है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के मरीजों को निशुल्क उपचार उपलब्ध कराने के लिए बजट में पर्याप्त प्रावधान किए गए हैं। उन्होंने कहा कि दवाओं और जांच सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु अस्पतालों की नियमित मॉनिटरिंग की जा रही है।

    विपक्ष के सवालों का जवाब देते हुए श्री शुक्ला ने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम लागू किया जा रहा है। टेलीमेडिसिन सेवाओं का विस्तार कर विशेषज्ञ चिकित्सकों को ग्रामीण क्षेत्रों से जोड़ा जा रहा है।

    अंत में उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सरकार के समन्वित प्रयासों से प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार होगा और आम नागरिकों को बेहतर एवं त्वरित चिकित्सा सेवाएं प्राप्त होंगी।

  • लोक कल्याण के लिए सख्त कार्रवाई बोले पीडब्ल्यूडी मंत्री राकेश सिंह

    लोक कल्याण के लिए सख्त कार्रवाई बोले पीडब्ल्यूडी मंत्री राकेश सिंह

    भोपाल, 25 फरवरी (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्य प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र में लोक निर्माण विभाग की अनुदान मांगों पर चर्चा के दौरान प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह ने विभागीय कार्यों, गुणवत्ता नियंत्रण और पारदर्शिता पर विस्तृत वक्तव्य दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि सड़क और पुल निर्माण में किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी तथा जवाबदेही तय कर सख्त कार्रवाई की जाएगी। हमने लोक निर्माण से लोक कल्याण का जो लक्ष्य तय किया है उसे सार्थक करने के लिए आवश्यक कार्रवाई की जा रही है।

    मंत्री ने सदन को अवगत कराया कि पिछले 13 महीनों में विभाग द्वारा 875 से अधिक औचक निरीक्षण किए गए। इन निरीक्षणों के आधार पर चार इंजीनियरों को निलंबित किया गया और 25 ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट किया गया है। उन्होंने बताया कि गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए थर्ड-पार्टी ऑडिट प्रणाली को और सुदृढ़ किया जा रहा है तथा प्रत्येक बड़े कार्य के लिए चरणबद्ध तकनीकी परीक्षण अनिवार्य किए गए हैं। निर्माण कार्यों में मानक सामग्री के उपयोग और समयसीमा का पालन सुनिश्चित करने के लिए जिला स्तर पर मॉनिटरिंग तंत्र सक्रिय किया गया है।

    भोपाल में चर्चित तथाकथित “90 डिग्री पुल” के संदर्भ में मंत्री ने कहा कि पुल का वास्तविक कोण 119 डिग्री है और इसे स्वीकृत डिजाइन के अनुरूप बनाया गया है। तकनीकी पेचीगदियों के बीच इस पुल को इसी प्रकार बना पाना संभव हुआ है। उन्होंने बताया कि मामले की तकनीकी जांच कराई गई है और यदि कहीं प्रक्रिया में त्रुटि पाई जाती है तो संबंधित एजेंसी के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। मंत्री ने यह भी जोड़ा कि भविष्य में डिजाइन स्वीकृति और साइट सुपरविजन के बीच बेहतर समन्वय के लिए विशेष दिशानिर्देश जारी किए जा रहे हैं।

    विपक्ष की ओर से सड़क निर्माण की गुणवत्ता, गड्ढों की समस्या और अधूरी परियोजनाओं को लेकर प्रश्न उठाए गए। कांग्रेस विधायक महेश परमार ने इंदौर-भोपाल क्षेत्र की परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए जवाब मांगा। इस पर मंत्री ने स्पष्ट किया कि मेट्रो परियोजना लोक निर्माण विभाग के अधीन नहीं आती, जबकि विभागीय सड़कों और पुलों पर निर्धारित भारतीय सड़क कांग्रेस (IRC) मानकों के अनुसार कार्य कराया जा रहा है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2026-27 के लिए विभाग ने रखरखाव मद में अतिरिक्त प्रावधान का प्रस्ताव रखा है, ताकि गड्ढा-मुक्त सड़कों का लक्ष्य समयबद्ध तरीके से हासिल किया जा सके।

    चर्चा के दौरान कांग्रेस विधायक हेमंत कटारे की टिप्पणी पर मंत्री ने कहा कि सदन में गंभीर विषयों पर रचनात्मक बहस होनी चाहिए। उन्होंने सभी दलों से आग्रह किया कि विकास कार्यों को राजनीति से ऊपर उठकर देखा जाए। मंत्री ने यह भी बताया कि लोक शिकायतों के त्वरित निवारण के लिए ‘लोकपथ’ एप को अपग्रेड किया गया है, जिससे नागरिक सीधे फोटो और लोकेशन टैग के साथ शिकायत दर्ज कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त विभाग ‘पीएम गति शक्ति’ प्लेटफॉर्म पर परियोजनाओं का डेटा एकीकृत कर रहा है, ताकि विभिन्न विभागों के बीच समन्वय बढ़े और दोहराव से बचा जा सके।

    मंत्री राकेश सिंह ने यह जानकारी भी दी कि ग्रामीण संपर्क सड़कों के उन्नयन के लिए चरणबद्ध योजना तैयार की गई है, जिसके तहत दूरस्थ और आदिवासी अंचलों को जिला मुख्यालय से जोड़ने वाली सड़कों को प्राथमिकता दी जाएगी। उन्होंने बताया कि वर्ष 2025-26 में हजारों किलोमीटर सड़कों के नवीनीकरण और मजबूतीकरण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जिससे परिवहन लागत घटेगी और कृषि-उद्योग गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही, सड़क सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ब्लैक स्पॉट चिन्हित कर सुधारात्मक कार्य किए जा रहे हैं।

    सदन में सड़कों पर आवारा पशुओं से दुर्घटनाओं की बढ़ती घटनाओं का मुद्दा भी उठा। मंत्री ने कहा कि यह विषय बहु-विभागीय है और स्थानीय निकायों व पशुपालन विभाग के साथ समन्वय स्थापित कर समाधान की दिशा में काम किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि प्रमुख राजमार्गों पर चेतावनी संकेतक, रिफ्लेक्टर और प्रकाश व्यवस्था को सुदृढ़ करने के निर्देश दिए गए हैं।

    विधानसभा में दिए गए इस विस्तृत वक्तव्य के माध्यम से मंत्री राकेश सिंह ने जहां विभाग की उपलब्धियों को रेखांकित किया, वहीं कमियों को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाने का भरोसा भी दिलाया। बजट सत्र में लोक निर्माण विभाग पर हुई यह चर्चा प्रदेश में अधोसंरचना विकास की दिशा और सरकार की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करती है।

  • कांग्रेसियों की औकात से बहुत बड़ा है कार्पोरेट का योगदान

    कांग्रेसियों की औकात से बहुत बड़ा है कार्पोरेट का योगदान


    -आलोक सिंघई-
    मध्यप्रदेश की सत्तारूढ़ भाजपा और प्रमुख विपक्षी कांग्रेस के बीच इन दिनों तनातनी का दौर चल रहा है। कई शहरों में आपसी गुत्थमगुत्थी आज की ताजा खबर है। इंदौर में कांग्रेसियों ने हमला किया तो भोपाल में भाजपाईयों ने कांग्रेस कमेटी के दफ्तर में कोहराम मचा दिया। ये सारा मामला उस मुद्दे पर जोर पकड़ा जिसमें अडानी का नाम आने पर भाजपा के वरिष्ठ नेता और संसदीय कार्य मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार को औकात में रहने की नसीहत दे दी थी। कहा ये गया कि दिल्ली की ए आई समिट में कांग्रेस के अर्ध नग्न प्रदर्शन का विरोध है।कैलाश पिछले कुछ दिनों से इंदौर के भागीरथपुरा में गंदा पेयजल सप्लाई होने से होने वाली पैंतीस से चालीस मौतों के बाद से निशाने पर चल रहे हैं। भाजपा की अंदरूनी राजनीति भी कैलाश के अनुकूल नहीं है। ऐसे में उनके तैश में दिए बयान को उनकी दंभोक्ति माना गया। सदन में हंगामे के बाद उन्होंने अपने कथन पर दुख व्यक्त किया और मुख्यमंत्री ने भी माफी मांगी। जाने अन जाने में हुए इस संवाद ने न केवल मध्यप्रदेश बल्कि पूरे देश को सोचने पर मजबूर किया है कि कांग्रेसियों की मुफ्तखोरी और भिखारी सोच को आखिर कैसे बदला जा सकता है। अनुत्पादक सरकारी सेक्टर और डिफाल्टरों का कर्जा माफ करने वाली फोकटिया सोच को कुचलकर उत्पादकता बढ़ाने वाली सोच को कैसे विकसित किया जा सकता है।

    कांग्रेस के राजपुत्र राहुल गांधी को देश के लोग यदि पप्पू कहते हैं तो कांग्रेसी इसे भाजपाईयों का दुष्प्रचार कहकर आगे बढ़ जाते हैं। जवाहर लाल नेहरू के बाद श्रीमती इंदिरा गांधी ने जिस सरकारीकरण की नींव रखी थी उसकी वजह से देश की विकास दर बहुत धीमी गति से बढ़ सकी है। आज 357.14 लाख करोड़ रुपये (GDP USD 4.18 ट्रिलियन) अर्थव्यवस्था वाला हिंदुस्तान तब सामने आया है जब उसने 2026 की शुरुआत तक कुल सार्वजनिक ऋण (आंतरिक और बाहरी) लगभग 197-200 लाख करोड़ रुपये के बीच ले रखा है। हमें सोचने पर मजबूर होना ही पड़ेगा कि कथित आजादी के लगभग 78 सालों बात तक हम करते क्या रहे हैं। लगभग 147 करोड़ आबादी वाले जिस देश में लगभग सौ करोड़ कार्यबल मौजूद हो उसका उपयोग अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में क्यों नहीं किया जा सका इस मुद्दे पर हमें विचार अवश्य करना होगा। आजादी के बाद यदि हमने केवल डेढ़ सौ लाख करोड़ रुपयों का योगदान किया तो इसकी वजह क्या रही होगी हमें इस पर अवश्य विचार करना होगा।

    भारत सरकार ने देश के लगभग पचास लाख लोगों को नौकरी दे ऱखी है। जबकि इसके विपरीत कार्पोरेट सेक्टर और निजी क्षेत्र मिलकर शेष लगभग सत्तर लाख परिवारों का जीवन रोशन कर रहा है । टाटा समूह में 7,50,000 कर्मचारी हैं। एल एंड टी में 3,38,000 लोग कार्यरत हैं। इंफोसिस में 2,60,000 कर्मचारी हैं। महिंद्रा एंड महिंद्रा के 2,60,000 कर्मचारी हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज के 2,36,000 लोग हैं। विप्रो में 2,10,000 कर्मचारी हैं। एचसीएल में 1,67,000 कर्मचारी हैं। एचडीएफसी बैंक में 1,20,000 कर्मचारी हैं। आईसीआईसीआई बैंक में 97,000 कर्मचारी हैं। टीवीएस समूह में 60,000 कर्मचारी हैं। मात्र ये दस कंपनियां मिलकर लगभग 25 लाख भारतीयों को रोजगार देती हैं वो भी सम्मानजनक वेतन के साथ।

    ये केवल वो आँकड़े हैं जो इनके डायरेक्ट पेरोल पर हैं। इनके अलावा ऑफ रोल्स, ऐसोशिएट्स, डीलर्स, एजेंट्स, इनके प्रोडक्ट्स से जुड़े सहायक प्रोडक्ट्स की कंपनियां। इनके सहारे जन्मी पैकेजिंग कंपनियां, ट्रांसपोर्ट सेक्टर। लिस्ट बहुत लंबी है। किसी कंपनी के अगर डायरेक्ट 1 लाख कर्मचारी हैं तो मान के चलिए कि कम से कम चार लाख ऐसे हैं जिनका चूल्हा उसी कम्पनी के कारण चलता है। यहां बात मात्र 10 बड़ी कंपनियों की हो रही है। हजारों ऐसी प्राइवेट कंपनियां हैं जो देश में रोजगार पैदा कर रही हैं। ये 25 लाख कॉर्पोरेट नौकरियां भारत में पिछले 78 वर्षों में सृजित कुल केंद्र सरकार की नौकरियों (48.34 लाख) के आधे से अधिक हैं।

    राहुल गांधी जिस तरह अडानी अंबानी की सरकार कहकर मोदी सरकार पर कीचड़ उछालते फिरते हैं इनमें से अधिकतर घराने तो कभी कांग्रेसियों की काली कमाई और संरक्षण से ही शुरु हुए थे। सरकारी खजाने से चुराया धन कार्पोरेट घरानों में लगाकर ब्याज खाने की आदत के कारण ही नेहरू गांधी परिवार आज एक अभेद्य विरासत वाला राजघराना बन सका है। बार बार उन्हें समझाया जाता है कि निजी क्षेत्र का सम्मान करें, उन्हें गालियों से मत नवाजें। अपने राजनैतिक एजेंडे और पसंद नापसंद के कारण उन लोगों का मजाक ना उड़ायें जो देश के विकास में बहुत बड़े सहभागी हैं। नौकरी देने वालों के लिए जयकार जयकार भले ना करें लेकिन उन्हें इज़्ज़त देना तो सीखिए।वे लाखों भारतीयों के लिए आजीविका पैदा कर रहे हैं।

    भारत के आर्थिक इतिहास पर दृष्टि डालें तो स्वतंत्रता के बाद सार्वजनिक क्षेत्र को मजबूत करने की नीति अपनाई गई थी। बाद के दशकों में उदारीकरण और निजीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई, जिसने अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी। आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकारी और निजी—दोनों क्षेत्रों की ताकतों का संतुलित उपयोग हो।

    मध्यप्रदेश की हालिया राजनीतिक तनातनी इसी व्यापक राष्ट्रीय बहस का एक स्थानीय प्रतिबिंब है। व्यक्तिगत कटाक्ष और टकराव से न तो विकास का रास्ता निकलेगा और न ही लोकतांत्रिक गरिमा की रक्षा होगी। राज्य और देश, दोनों के हित में यही होगा कि राजनीतिक दल विचारधारात्मक मतभेदों को शालीन संवाद के माध्यम से सामने रखें और आर्थिक नीति पर ठोस, तथ्याधारित चर्चा करें।

    आखिरकार भारत जैसे 147 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश के लिए सबसे बड़ी चुनौती है—रोजगार, उत्पादकता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा। यदि आने वाली पीढ़ियों के लिए समृद्ध भविष्य का निर्माण करना है, तो सरकार और निजी क्षेत्र को परस्पर विरोधी ध्रुवों की तरह नहीं, बल्कि सहयोगी साझेदारों की तरह देखना होगा। राजनीति की गर्मी के बीच यही संतुलित दृष्टिकोण देश को आगे ले जा सकता है।

  • अब दुनिया भर में फैल रही एकात्म मानवतावाद की खुशबू

    अब दुनिया भर में फैल रही एकात्म मानवतावाद की खुशबू

    • डॉ. मोहन यादव

    व्यक्ति से समाज और समाज से राष्ट्र निर्माण का मार्ग दिखाने वाले , विलक्षण व्यक्तित्व के धनी , एकात्म मानव दर्शन और अंत्योदय के प्रणेता पं . दीनदयाल उपाध्याय जी के चरणों में कोटिशः नमन।

    पं . दीनदयाल जी का जीवन भारत राष्ट्र को दिशा देने वाला प्रकाश स्तंभ है। वे एक ऐसे ऋषि राजनेता थे जो समाज, संस्कृति और राष्ट्र के समग्र उत्थान के लिए समर्पित रहे। उन्होंने राजनीति को राष्ट्रधर्म की साधना का माध्यम माना। उनका स्पष्ट मत था कि स्वतंत्र भारत की यात्रा भारतीय दर्शन , संस्कृति और परंपरा के अनुरूप होनी चाहिए।

    पं . दीनदयाल जी ने राजनीतिक चिंतन को भारतीय मूल्यों से जोड़ते हुए एकात्म मानव दर्शन का सूत्र दिया। इसमें व्यक्ति , समाज , राष्ट्र और सृष्टि के बीच समन्वय और संतुलन समाहित है। यह जीवन और संपूर्ण सृष्टि को एक सूत्र में पिरोता है। यही दर्शन व्यष्टि से समष्टि की रचना करता है। इसमें श्रीकृष्ण के वसुधैव कुटुम्बकम के भाव से लेकर आज के वैश्विक परिदृश्य का समावेश है।

    पं . दीनदयाल जी भारत के भविष्य की कल्पना चतुर्पुरुषार्थ -धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष के आधार पर की। उनका विश्वास था कि इन चारों का संतुलन ही व्यक्ति और समाज को पूर्णता की ओर ले जा सकता है। यदि व्यक्ति और समाज को विकास के समान अवसर दिए जाएँ , तो स्वावलंबी और समर्थ समाज का निर्माण संभव है। पं . दीनदयाल जी का मानना था कि राजनीति का अंतिम लक्ष्य सशक्त , समरस और स्वाभिमानी राष्ट्र का निर्माण है। उनका विकास मॉडल केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं था , बल्कि उसमें सांस्कृतिक चेतना , सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक संतुलन का समावेश था। वे चाहते थे कि विकास का लाभ अंतिम पंक्ति के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे , तभी वह सच्चा विकास कहलाएगा। यही अंत्योदय का भाव है।

    हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत जिस विकास पथ पर अग्रसर है , उसके मूल में पं . दीनदयाल जी का चिंतन है। विरासत से विकास , आत्मनिर्भर भारत , वोकल फॉर लोकल और सबका साथ – सबका विकास , यह सभी एकात्म मानव दर्शन के आधुनिक रूप हैं। प्रधानमंत्री श्री मोदी जी का संकल्प है कि वर्ष 2047 , स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष तक भारत को विश्व की सर्वोच्च शक्ति के रूप में स्थापित किया जाए। यह संकल्प पं . दीनदयाल जी के स्वप्निल भारत की ही साकार अभिव्यक्ति है।

    मुझे बताते हुए प्रसन्नता है कि प्रधानमंत्री श्री मोदी जी के आत्मनिर्भर और विकसित भारत निर्माण की परिकल्पना को मूर्तरूप देने की दिशा में प्रदेश के प्रत्येक अंचल को विकास की मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। प्रदेश के हर क्षेत्र की क्षमता , मेधा और दक्षता को अवसर प्रदान करने के लिए जहां रीजनल इंडस्ट्री कॉन्क्लेव का नवाचार किया गया, वहीं भोपाल में संपन्न हुई ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट से स्थानीय उद्योगों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने का प्रयास किया गया। निवेश के लिये हमने यूके , जर्मनी , जापान और दावोस आदि यात्राएं कीं और हैदराबाद , कोयंबटूर सहित मुंबई में रोड-शो के माध्यम से उद्योगपतियों को आमंत्रित किया। यह क्षेत्रीय से वैश्विक स्तर तक उद्योग को जोड़ने का पहला सशक्त प्रयास है।

    मुझे यह बताते हुए संतोष है कि माननीय प्रधानमंत्री श्री मोदी जी के मार्गदर्शन में मध्यप्रदेश में पं . दीनदयाल उपाध्याय जी के चिंतन को व्यवहार में उतारने का प्रयत्न किया जा रहा है। समरस, संवेदनशील और उत्तरदायी शासन के माध्यम से अंतिम व्यक्ति तक योजनाएं और विकास के लक्ष्य धरातल पर पहुंच रहे हैं। प्रदेश में गरीब कल्याण, किसान कल्याण, युवा शक्ति और नारी सशक्तिकरण को केन्द्र में रखकर 4 मिशन के माध्यम से कार्य किया जा रहा है। इससे समाज के सभी वर्गों के कल्याण का लक्ष्य पूर्ण होगा।

    पं . दीनदयाल जी ने आर्थिक विकास के लिए कृषि , उद्योग , परिवहन , व्यापार समाज , सुरक्षा एवं सेवा का एक स्पष्ट और व्यावहारिक क्रम बताया। इस क्रम में कृषि प्रधान देश भारत में खेती को प्रथम स्थान देने की आवश्यकता व्यक्त की। उनका मानना था यदि देश में कृषि सुदृढ़ होगी , तो किसानों की आय बढ़ेगी , ग्रामीण जीवन में स्थिरता आएगी और उद्योगों को कच्चा माल एवं श्रम दोनों सहज रूप से उपलब्ध होगा। इससे किसान, उपभोक्ता और समाज तीनों का संतुलन बना रहेगा। पं . दीनदयाल जी खेती की मजबूती और किसानों की समृद्धि को समग्र विकास का आधार मानते थे। मुझे यह बताते हुए संतोष है कि मध्यप्रदेश में प्रधानमंत्री श्री मोदी जी के मार्गदर्शन में किसानों के स्वाभिमान, सुरक्षित जीवन और आत्मनिर्भरता को केन्द्र में रखकर वर्ष 2026 को कृषक कल्याण वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। इसमें आधुनिक तकनीक , उन्नत बीज , सिंचाई , भंडारण और बाजार तक बेहतर पहुंच के माध्यम से खेती को लाभ का व्यवसाय बनाया जाएगा। कृषि आजीविका के साधन के साथ प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। कृषि क्षेत्र के सशक्तिकरण में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी।

    मुझे बताते हुए प्रसन्नता है कि मध्यप्रदेश देश का पहला राज्य है जिसने वर्ष 2025-26 किसानों के कल्याण के लिए समर्पित किया है। मध्यप्रदेश में पार्वती-कालीसिंध-चंबल तथा केन-बेतवा नदी लिंक राष्ट्रीय परियोजना सहित ताप्ती ग्राउंड वॉटर रिचार्ज मेगा परियोजना से प्रदेश के 25 जिलों में 16 लाख हेक्टेयर से अधिक अतिरिक्त कृषि रकबा सिंचित होगा। प्रदेश के किसानों के समग्र कल्याण के लिए हर जरूरी कदम उठाया जायेगा।

    प्रदेश में श्रीअन्न , सरसों और चना अनुसंधान केंद्र की स्थापना की जा रही है। इससे श्रीअन्न का उत्पादन और पोषण सुरक्षा को नई ऊंचाई मिलेगी। इन केंद्रों के जरिए फसलों की गुणवत्ता और पैदावार बढ़ाने पर विशेष बल दिया जाएगा। प्रदेश के 30 लाख से अधिक किसानों को अगले तीन साल में सोलर पॉवर पम्प दिये जायेंगे। प्रदेश में सिंचाई का रकबा 65 लाख हैक्टेयर से बढ़ाकर 1 00 लाख हैक्टेयर किये जाने का लक्ष्य है।

    पं . दीनदयाल उपाध्याय जी ने स्वाभिमानी, स्वावलंबी और विश्व कल्याण में अग्रणी भारत की कल्पना की थी। माननीय प्रधानमंत्री श्री मोदी जी के नेतृत्व में देश इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है। उनका जीवन और दर्शन हम सबको राष्ट्रधर्म के पथ पर निरंतर अग्रसर करता रहेगा।

    राष्ट्र निर्माण के अमर साधक पं . दीनदयाल जी की पुण्यतिथि पर पुनः कोटिशः वंदन।

    (लेखक, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं)

  • राज्य के विकास काआधार बनेगा केन्द्रीय बजटःडॉ.मोहन यादव

    राज्य के विकास काआधार बनेगा केन्द्रीय बजटःडॉ.मोहन यादव

    भोपाल, 03 फरवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।  मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव एवं भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष व विधायक  हेमंत खण्डेलवाल ने केंद्रीय बजट 2026-27 को लेकर मंगलवार को कुशाभाऊ ठाकरे सभागार भोपाल में पत्रकार वार्ता को संबोधित किया। पत्रकार-वार्ता में पार्टी के प्रदेश प्रभारी डॉ. महेन्द्र सिंह एवं मध्यप्रदेश शासन के उप मुख्यमंत्री श्री जगदीश देवड़ा विशेष रूप से उपस्थित रहे। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने पत्रकार-वार्ता को संबोधित करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के मार्गदर्शन में और वित मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत केंद्रीय बजट प्रधानमंत्री जी के विकसित भारत के संकल्पों को सिद्ध करने वाला है। केंद्रीय बजट मध्यप्रदेश के आर्थिक-औद्योगिक और सामाजिक विकास का ऐतिहासिक अवसर सिद्ध होगा। पूंजीगत व्यय में वृद्धि, शहरों के विकास व लॉजिस्टिक्स इकोसिस्टम का विकास प्रदेश के लिए वरदान बनेगा। यह बजट सतत आर्थिक विकास के साथ जनअपेक्षाओं को पूरा करने वाला है। प्रधानमंत्री मोदी जी ने समय-समय पर अपने निर्णयों से देश को सशक्त बनाने के साथ दुनिया को भारत की ताकत का अहसास कराया है। इस बजट के माध्यम से उद्योगों को बढ़ावा मिलने के साथ अलग-अलग क्षेत्रों में रोजगार के अनेक अवसर पैदा होंगे। यह केंद्रीय बजट सभी वर्गों की आशा-आकांक्षाओं को पूरा करने के साथ उन्हें सशक्त बनाने में निर्णायक सिद्ध होगा। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष व विधायक श्री हेमंत खण्डेलवाल ने कहा कि केंद्रीय बजट 2026-27 में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की बताई चार जातियों गरीब, युवा, नारी शक्ति और अन्नदाता के साथ मध्यम वर्ग, उद्यमियों और हर वर्ग के कल्याण व शक्तिकरण के लिए प्रावधान किए गए हैं। केंद्रीय बजट सिर्फ बजट नहीं है, यह विकसित भारत और आत्मनिर्भर भारत का विजन डॉक्यूमेंट है। यह आने वाले वर्षों में भारत की दिशा तय करने वाला बजट सिद्ध होगा। यह सर्वस्पर्शी, सर्वव्यापी और सर्वसमावेशी बजट है। बजट में तीन कर्तव्यों-आर्थिक विकास, जन-आकांक्षाओं की पूर्ति और ‘सबका साथ, सबका विकास’ की परिकल्पना को साकार किया गया है। बजट में रिफॉर्म, परफॉर्म और ट्रांसफॉर्म स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहा है। केन्द्रीय बजट में राजकोषीय घाटा को 4.5 प्रतिशत से घटाकर 4.3 प्रतिशत तक लाने का रोडमैप तैयार किया है। देश के कुल कर्ज को जीडीपी के 56 प्रतिशत से घटाकर 50 प्रतिशत तक लाने की भी योजना है। बजट में 7 हाई-स्पीड कॉरिडोर्स के निर्माण और 12.2 लाख करोड़ के कैपिटल एक्सपेंडिचर का प्रावधान किया गया है। सेमीकंडक्टर मिशन के लिए निवेश राशि को 22,500 करोड़ से बढ़ाकर 40,000 करोड़ करने का प्रस्ताव है।उन्होंने कहा कि इस बजट से मध्यप्रदेश को भी व्यापक लाभ होगा और यह बजट वर्ष 2047 के विकसित भारत की परिकल्पना को साकार करने में मील का पत्थर साबित होगा।

    मध्यप्रदेश को सुदृढ़ वित्तीय आधार प्राप्त होगा, निवेशकों का विश्वास और बढ़ेगा- डॉ. मोहन यादव

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि यह बजट युवा शक्ति प्रेरित बजट है। इस बजट का मूल उद्देश्य तेज एवं सतत आर्थिक वृद्धि, जन आकांक्षाओं की पूर्ति, क्षमता निर्माण तथा सभी परिवारों, क्षेत्रों और सेक्टरों को समान अवसर उपलब्ध कराना है। बजट में आत्मनिर्भरता को मार्गदर्शक सिद्धांत बनाकर उच्च विकास दर बनाए रखने के स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं। यह बजट मध्यप्रदेश को सुदृढ़ वित्तीय आधार प्रदान करेगा। साथ ही निवेशकों का विश्वास और बढ़ेगा, जिससे मध्यप्रदेश के विकास की रफ्तार और तेज होगी और हमारा प्रदेश आत्मनिर्भर बनेगा। बजट में वैश्विक बाजारों से जुड़ाव, निर्यात विस्तार तथा दीर्घकालिक निवेश आकर्षण की रणनीति है, जिसका बहुत फायदा आने वाले सालों में मध्यप्रदेश को मिलेगा। उन्होंने कहा कि यह बजट केवल वित्तीय प्रावधानों का संकलन नहीं है, बल्कि ईज ऑफ डूइंग बिजनेस आधारित आर्थिक विकास का संरचित रोडमैप है। यह बजट मध्यप्रदेश को सतत विकासशील राज्य के रूप में स्थापित करने की दिशा में निर्णायक भूमिका अदा करेगा। बजट के प्रावधानों से मध्यप्रदेश में निवेश, उद्योग स्थापना, रोजगार सृजन, उत्पादन क्षमता, निर्यात उन्मुख विनिर्माण का बेहतर वातावरण तैयार होगा।

    मध्यप्रदेश स्वास्थ्य और ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में तेजी से आगे बढ़ेगा

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि बायोफार्म शक्ति योजना से बायोटेक्नोलॉजी, बायो फार्मा, फार्मास्यूटिकल अनुसंधान और हेल्थ इंडस्ट्री आधारित स्टार्ट अप्स को बढ़ावा मिलेगा। मध्यप्रदेश ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की दिशा में अग्रसर होगा, जिससे उच्च मूल्य रोजगार सृजित होंगे। सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 से इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग और एआई आधारित तकनीकों के विकास से मध्यप्रदेश में हाई टेक उद्योग, डिजिटल निवेश और नवाचार आधारित उद्यमिता को बढ़ावा मिलेगा। बजट के प्रावधान मध्यप्रदेश के पारंपरिक औद्योगिक क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से लाभकारी सिद्ध होगा। ग्रामीण और स्थानीय अर्थव्यवस्था रोजगार तथा औद्योगिक पुनर्जीवन को नई गति प्रदान करेंगे। 200 लेगेसी इंडस्ट्रियल क्लस्टर्स के पुनर्जीवन से मध्यप्रदेश के पारंपरिक औद्योगिक क्षेत्रों में अधोसंरचना सुधार, निवेश पुनर्स्थापन, उत्पादन विस्तार और स्थानीय रोजगार को नई ऊर्जा मिलेगी। उन्होंने कहा कि केंद्रीय बजट मध्यप्रदेश के एमएसएमई सेक्टर के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा। राज्य में उद्यमिता, स्वरोजगार तथा औद्योगिक विस्तार को मजबूती मिलेगी। मध्यप्रदेश के लघु एवं मध्यम उद्योग अधिक प्रतिस्पर्धी, आत्मनिर्भर और विस्तार उन्मुख बनेंगे। मध्यप्रदेश को आईटी, पर्यटन, स्वास्थ्य एवं शिक्षा सेवाओं के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने में यह बजट महती भूमिका निभाएगा।

    ग्रामीण क्षेत्र के साथ नारी शक्ति को आर्थिक सशक्तिकरण देगा बजट

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि बजट में वर्ष 2047 तक भारत को वैश्विक सेवा क्षेत्र में नेतृत्व दिलाने की दृष्टि से सेवा क्षेत्र को विकास का प्रमुख चालक बनाया गया है। यह बजट मध्यप्रदेश को आईटी, हेल्थ, एजुकेशन, टूरिज्म और प्रोफेशनल सर्विसेज के केंद्र के रूप में विकसित होने में सहायक सिद्ध होने के सथ भारत को सेवा क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व भी दिलाएगा। बजट में 10 हजार करोड़ की लागत से देश के प्रत्येक जिलों में महिला छात्रावास स्थापना का के साथ नारी शक्ति के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने 1.5 लाख सेवा प्रदाताओं और एक लाख स्वास्थ्य पेशेवरों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया है। लखपति दीदी योजना पर आधारित सामुदायिक स्व-सहायता समूह उद्यम स्थापित करने का प्रावधान है, इससे महिलाओं को क्रेडिट लिंक्ड आजीविका से उद्यम स्वामित्व की ओर जाने में मदद मिलेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि बजट के इन प्रावधनों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी ही, साथ ही यह बजट नारी शक्ति को आर्थिक सशक्तिकरण देने वाला होगा। सिटी ईकोनॉमिक रीजन के अंतर्गत शहरी क्षेत्रों में नियोजित आर्थिक विकास, औद्योगिक व्यावसायिक क्लस्टरिंग और आधुनिक अधोसंरचना का निर्माण होगा। इसके साथ ही मध्यप्रदेश के प्रमुख शहर संगठित आर्थिक केंद्रों के रूप में विकसित होंगे, जिससे  निवेश अनुकूल शहरी अर्थव्यवस्था का निर्माण होगा।

    बजट मध्यप्रदेश के आर्थिक विकास के नए द्वार खोलता है

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि यह बजट मध्यप्रदेश के लिए आर्थिक विकास के नए द्वार खोलता है, जहां उद्योगों को सरल प्रक्रियाएं, निवेशकों को भरोसेमंद वातावरण, युवाओं को रोजगार के अवसर, महिलाओं को आर्थिक सशक्तिकरण, एमएसएमई को संस्थागत समर्थन और नागरिकों को बेहतर सेवाए प्राप्त होंगी। यह बजट मध्य प्रदेश के सर्वांगीण विकास, समावेशी प्रगति और दीर्घकालिक आर्थिक समृद्धि का एक मजबूत आधार बनेगा। साथ ही एक निवेश-आकर्षक, विकासोन्मुख और भविष्य-उन्मुख अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित करने की दिशा में निर्णायक भूमिका निभाएगा। यह बजट मध्यप्रदेश के लिए तेज विकास, संरचनात्मक परिवर्तन और सतत समृद्धि की एक सशक्त विकास यात्रा का प्रारंभ बिंदु सिद्ध होगा, जो राज्य के सामाजिक आर्थिक भविष्य को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में अत्यंत सहायक एवं परिवर्तनकारी भूमिका निभाएगा।

    प्रदेश की प्रतिभाओं के बलबूते फार्मा सहित सभी क्षेत्रों में लगाएंगे छलांग

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि मध्य्रदेश अपनी प्रतिभाओं के बलबूते पर फार्मा सहित सभी क्षेत्रों में लंबी छलांग लगाएगा। सेमीकंडक्टर बड़ा सेक्टर है। मैं सेमीकंडक्टर को लेकर गुजरात के मुख्यमंत्री से कल ही बात करके आया हूं। सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 भारतीय तकनीक है, जिसके आधार पर मध्यप्रदेश में अत्याधुनिक उद्योग, डिजिटल निवेश के साथ देश के साथ कदम से कदम मिलाकर चलेंगे। हमारे प्रदेश में जो उद्योग चल रहे हैं, वह अधिकांश परंपरागत आधारित हैं। आगे बढ़ने के लिए रिनोवेशन के साथ और अधिक प्रभावी कार्य किया जाएगा। मध्यप्रदेश में पहले कॉटन इंडस्ट्री चलती थी, लेकिन रिनोवेशन नहीं होने से वह डूब गई थी। प्रधानमंत्री मोदी जी ने धार में पीएम मित्र पार्क की सौगात दी है, जिसके आधार पर हमारी सरकार मध्यप्रदेश वस्त्र उद्योग को बढ़ावा दे रही है। उन्होंने कहा कि नए उद्योग लगाना अच्छी बात है, लेकिन जो चल रहे हैं उनका संवर्धन करना भी एक बड़ा कार्य है। हमारी सरकार इस क्षेत्र में भी कार्य कर रही है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी टियर-2 और टियर-3 शहरों के लिए भी पर्याप्त धनराशि दी गई है। मध्यप्रदेश में प्रमुख शहर संगठित और आर्थिक रूप से समृद्ध होंगे और संरचना निवेश मॉडल मध्य प्रदेश के लिए अत्यंत लाभकारी होगा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की दूरदृष्टि आर्थिक विकास के नए राह दिखा रही है। मैं प्रधानमंत्री जी को बधाई देता हूं कि उन्होंने देश के आर्थिक विकास के लिए कई निर्णय लिए हैं। पाकिस्तान हमारे साथ आजाद हुआ। वहां की आर्थिक स्थिति दुनिया में किसी से छिपी नहीं है। हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने देश को सशक्त बनाने के साथ दुनिया को भारत की ताकत का अहसास कराया है।भारत को आत्मनिर्भर बनाने, देशवासियों के कल्याण और मध्यम वर्ग को राहत देने वाले इस क्रांतिकारी बजट के लिए यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी और केंद्रीय वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण जी का मध्यप्रदेशवासियों की ओर से बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूं।

    केंद्रीय बजट सशक्त भारत की नींव को और मजबूती प्रदान करेगा – श्री हेमंत खण्डेलवाल

    भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष श्री हेमंत खण्डेलवाल ने कहा कि केंद्रीय बजट 2026-27 प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के विकसित व आत्मनिर्भर भारत के विजन का सशक्त दस्तावेज़ है। गरीब, युवा, नारी शक्ति, अन्नदाता के साथ मध्यम वर्ग और उद्यमियों के कल्याण व सशक्तिकरण के प्रावधान बजट में किए गए हैं। यह सर्वस्पर्शी, सर्वसमावेशी बजट रिफॉर्म, परफॉर्म और ट्रांसफॉर्म की भावना को दर्शाता है, जो मध्यप्रदेश सहित देश को 2047 के विकसित भारत की ओर मजबूती से ले जाएगा। केंद्रीय बजट को राजनीति के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की नजर से देखना आवश्यक है। देश के कुल कर्ज को जीडीपी के 56 प्रतिशत से घटाकर 50 प्रतिशत तक लाने की भी योजना है। बजट में 7 हाई-स्पीड कॉरिडोर्स के निर्माण और 12.2 लाख करोड़ के कैपिटल एक्सपेंडिचर का प्रावधान किया गया है। सेमीकंडक्टर मिशन के लिए निवेश राशि को 22,500 करोड़ से बढ़ाकर 40,000 करोड़ करने का प्रस्ताव है।उन्होंने कहा कि इस बजट से मध्यप्रदेश को भी व्यापक लाभ होगा और यह बजट वर्ष 2047 के विकसित भारत की परिकल्पना को साकार करने में मील का पत्थर साबित होगा। यह बजट भारत को आने वाले वर्षों में विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में एक मजबूत कदम है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में देश तेजी से सही दिशा में आगे बढ़ रहा है, और बजट 2026 उसी भरोसे और दूरदृष्टि का प्रमाण है। यह केंद्रीय बजट देश के आर्थिक विकास के साथ “रिफॉर्म एक्सप्रेस” की रफ्तार को भी दिखा रहा है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में प्रस्तुत केंद्रीय बजट तात्कालिक प्रभाव से अधिक अगले 10-20 वर्षों में भारत की दिशा तय करने वाला है। यह बजट सशक्त भारत की नींव को और मजबूती प्रदान करेगा।

    स्वास्थ्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देगा बजट

    भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष श्री हेमंत खण्डेलवाल ने कहा कि केन्द्रीय बजट में फिस्कल डेफिसिट (राजकोषीय घाटा) को 4.5 प्रतिशत से घटाकर 4.3 प्रतिशत तक लाने का रोडमैप तैयार किया है। साथ ही देश के कुल कर्ज को जीडीपी के 56 प्रतिशत से घटाकर 50 प्रतिशत तक लाने की भी योजना है। रेयर अर्थ मिनरल्स के क्षेत्र में ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में बड़े निवेश की योजना बनाई गई है, जिससे इस क्षेत्र में चीन की निर्भरता कम होगी। सेमीकंडक्टर उद्योग को बढ़ावा देने के लिए लगभग 40 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा केमिकल पार्क और नए इकोनॉमिक जोन स्थापित करने की भी घोषणा हुई है। स्वास्थ्य क्षेत्र में कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की 17 दवाइयों पर कस्टम ड्यूटी शून्य कर दी गई है। एक लाख हेल्थ प्रोफेशनल्स की नियुक्ति, राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थान और हेल्थ टूरिज्म को बढ़ावा देने जैसे महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। जिला अस्पतालों का उन्नयन कर उनमें ट्रामा सेंटर स्थापित करने संबंधी प्रावधान स्वास्थ्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार लाएंगे। महिलाओं के लिए हर जिले में हॉस्टल, डेढ़ लाख केयर वर्कर्स और पेंशनर्स को सुविधाएं देने का भी प्रावधान है। यह महिलाओं को आर्थिक सशक्तिकरण के लिए बड़ा कदम है। उन्होंने कहा कि ‘लखपति दीदी’ योजना, पशुपालन में पूंजी सब्सिडी, पशु चिकित्सकों की संख्या बढ़ाने तथा अमृत सरोवर योजना के माध्यम से रोजगार सृजन पर विशेष ध्यान दिया गया है। यह निर्णय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करेंगे।

    युवाओं को रोजगार दिलाने में महती भूमिका निभाएगी कंटेंट क्रिएटर लैब

    भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष श्री हेमंत खण्डेलवाल ने कहा कि केंद्रीय बजट में 15 हजार माध्यमिक शालाओं में कंटेंट क्रिएटर लैब की स्थापना, आईआईएम के सहयोग से 10 हजार टूरिस्ट गाइड तैयार करने और ‘खेलो इंडिया’ के माध्यम से खेलों को प्रोत्साहन देने की घोषणाएं की गई हैं। क्रिएटर लैब युवाओं को रोजगार दिलाने में महती भूमिका निभाएगी। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी देश को हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर बना रहे हैं। रक्षा बजट में 15 प्रतिशत की वृद्धि से देश की सुरक्षा और आत्मनिर्भरता को और बल मिलेगा। उन्होंने कहा कि बजट में महात्मा गांधी जी के ग्राम स्वराज की परिकल्पना का पालन करते हुए खादी, हथकरघा, हस्तशिल्प और एक जिला एक उत्पाद को बढ़ावा देने वाला है। रक्षा बजट में 15 फीसदी की बढ़ोतरी देश की सुरक्षा की प्रधानमंत्री जी की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है। पूर्वोत्तर राज्यों में बौद्ध स्थलों के संरक्षण, बुनियादी ढांचे के विकास और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने का निर्णय प्रधानमंत्री जी की विरासत के विकास के मंत्र को साकार कर रहा है। कैंसर की 17 जीवनरक्षक दवाओं पर कस्टम ड्यूटी शून्य या न्यूनतम कर गरीबों को संबल देने का कार्य किया गया है। यह बजट महिला सशक्तिकरण को नई दिशा देने वाला है। बजट में किसानों की आय बढ़ाने और कृषि को आधुनिक बनाने पर स्पष्ट फोकस किया गया है। पशुपालन और मत्स्य पालन को मजबूती, पूंजी सब्सिडी से पशु चिकित्सकों की संख्या बढ़ेगी और जलाशयों, अमृत सरोवरों के निर्माण से ग्रामीण रोजगार को प्राथमिकता दी गई है।

    पत्रकार-वार्ता के दौरान पार्टी के प्रदेश महामंत्री श्री राहुल कोठारी, प्रदेश मीडिया प्रभारी श्री आशीष उषा अग्रवाल एवं जिला अध्यक्ष श्री रविन्द्र यति मंचासीन रहे।

  • ज्योतिरादित्य सिंधिया ने संजय जैन को डाक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया

    ज्योतिरादित्य सिंधिया ने संजय जैन को डाक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया


    भोपाल,03 फरवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। फार्मेसी और मेडीकल साईंस के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मध्यप्रदेश फार्मेसी काऊंसिल के अध्यक्ष संजय जैन को डाक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया है। मध्यांचल प्रोफेशनल विश्वविद्यालय भोपाल के प्रथम दीक्षांत समारोह में उन्होंने कहा कि दुनिया के दवा बाजार में भारत की भागीदारी बढ़ाने के लिए हमारे युवा और फार्मासिस्ट महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने श्री संजय जैन को डाक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किए जाने पर बधाई भी दी।


    इस कार्यक्रम में विश्वविद्यालय की चांसलर प्रीति पटेल. वाइस चांसलर श्री राय . राजीव गांधी विश्वविद्यालय के कुल गुरु डॉक्टर एस.सी. चौबे. कवि एवं साहित्यकार शैलेश लोढ़ा एवं डॉ प्रदीप कुमार जोशी पूर्व अध्यक्ष यूपीएससी भारत सरकार उपस्थित थे। कार्यक्रम में लगभग 500 छात्र-छात्राओं को भी उपाधि देकर सम्मानित किया गया।


    कार्यक्रम के समापन पर विश्वविद्यालय से संबंधित समिति के अध्यक्ष श्री अजीत पटेल ने अतिथियों का आभार प्रदर्शित किया।

  • शीश कटा लेंगे पर भोपाल चेंबर आफ कामर्स को जेबी संस्था नहीं बनने देंगेःतेजकुल पाल सिंह पाली

    शीश कटा लेंगे पर भोपाल चेंबर आफ कामर्स को जेबी संस्था नहीं बनने देंगेःतेजकुल पाल सिंह पाली


    भोपाल,30 जनवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। भोपाल के व्यापारियों का प्रतिष्ठापूर्ण नेतृत्व कर रहे प्रगतिशील पैनल के अध्यक्ष तेजकुल पाल सिंह पाली ने कहा है कि यदि वक्त आया तो वे शीश कटाना मंजूर करेंगे पर भोपाल चेंबर आफ कामर्स को कभी किसी नेता या कार्पोरेट घरानों की जेबी संस्था नहीं बनने देंगे। व्यापारियों का कहना है कि पाली का पिछला कार्यकाल उपलब्धियों के भरा पूरा रहा है। उन्होंने चुनाव न कराए जाने पर तीन साल नौ महीने बाद केवल इसलिए इस्तीफा दिया था कि संस्था के चुनाव निष्पक्ष रूप से कराए जा सकें। प्रतिद्वंदी के रूप में चुनाव लड़ रहे कांग्रेस के पूर्व कोषाध्यक्ष गोविंद गोयल ने पिछले सात सालों से खुद को Confedration of MP for Industry, Service & Trade (COMPIST) का स्वयंभू अध्यक्ष घोषित कर रखा है और संस्था के चुनाव तक नहीं कराए हैं।यह मुद्दा इस चुनाव में व्यापारियों को डराने वाला साबित हो रहा है।


    एक फरवरी रविवार को होने जा रहे भोपाल चेंबर आफ कामर्स के चुनावों में जो अंदरूनी कहानियां रिसकर बाहर आ रहीं हैं उनसे व्यापारियों के बीच नेतृत्व की खींचतान को लेकर खासी सरगर्मी देखी जा रही है। व्यापारियों का कहना है कि चुनाव को जातिगत गोलबंदी में धकेलने वाले कार्पोरेट के षड़यंत्र की पोल खुल चुकी है। खुद को पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के प्रतिनिधि के तौर पर प्रस्तुत करने वाले गोविंद गोयल को हराने के लिए व्यापारियों ने पहले मतदान फिर जलपान का नारा दिया है। कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में आकाश गोयल और उनके सहयोगियों ने जिस तरह अनाप शनाप पैसा खर्च करके संस्था को लगभग खरीदने की पेशकश की उससे भी व्यापारियों के बीच संदेह का माहौल गहरा गया है।

    गोविंद गोयलः कम्पिस्ट के चुनाव न कराकर खुद को स्वयंभू अध्यक्ष बनाना पड़ा भारी.


    सूत्र बताते हैं कि प्रगतिशील पैनल से उपाध्यक्ष पद का चुनाव लड़ रहे ट्रांसपोर्ट व्यवसायी कमल पंजवानी इस चुनाव में गेम चेंजर साबित हो रहे हैं। चेंबर के अध्यक्ष पद पर जब व्यापारियों ने आकाश गोयल के नाम पर असहमति जताई तो वे कमल पंजवानी को निर्विरोध अध्यक्ष के रूप में स्वीकार करने राजी हो गए थे। इस नाम पर गोविंद गोयल ने असहमति जता दी और अपना नामांकन भर दिया। यही वजह थी कि तेजकुल पाल सिंह पाली ने संस्था पर मंडराते काले बादलों का पटाक्षेप करने के लिए मैदान संभाल लिया।


    तेजकुल पाल सिंह पाली का नाम सामने आते ही भाजपा समर्थित व्यापारी भी प्रगतिशील पैनल के समर्थन में आ गए और चुनाव रोचक मोड़ पर पहुंच गया। इस चुनाव में सक्रिय भागीदारी निभा रहे व्यापारियों का कहना है कि वे चाहते हैं संस्था उनकी समस्याओं को सुलझाने के लिए सीना चौड़ा करके चले। पाली का पिछला कार्यकाल गौरवपूर्ण रहा है और किसी नेता के पिट्ठू को वे अपना प्रतिनिधि स्वीकार नहीं कर सकते। संस्था को अपनी स्थापना के बाद से पहली बार पाली जैसा दबंग नेतृत्व मिला इसलिए वे दुबारा उन्हें अध्यक्ष के रूप में देखना चाहते हैं।


    प्रगतिशील पैनल से ही महामंत्री पद का चुनाव लड़ रहे समाजसेवी ललित तांतेड़ का कहना है कि राजधानी के व्यापारी पहले कभी इतने सक्रिय नहीं रहते थे। चंद जेबी नेता मिलकर सरकार से अपने हित में सौदेबाजी कर लेते थे। इससे न तो व्यापारिक गतिविधियों को विस्तार मिलता था और न ही व्यापारियों के हितों की रक्षा हो पाती थी। ऐसे में तेजकुल पाल सिंह पाली जी ने राजधानी के सक्रिय और ईमानदार व्यापारियों को मिलाकर संस्था को नेतृत्व प्रदान करने की पहल की है जिसका व्यापार जगत में स्वागत किया जा रहा है। एक फरवरी को होने जा रहे चुनावों में व्यापारियों के इस भाव पर मुहर भी लग जाएगी।

  • बैंकों के हजारों करोड़ दबाए बैठे लोग नहीं चाहते दबंग नौकरशाही

    बैंकों के हजारों करोड़ दबाए बैठे लोग नहीं चाहते दबंग नौकरशाही

    भोपाल,23 जनवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटऱ)। बैंकों की रकम दबाकर बैठा मीडिया माफिया हो या जमीनों पर कब्जा जमाने वाला भू माफिया,आपराधिक वारदातों में संलग्न दबंग, सरकारी योजनाओं को गड़प जाने वाले राजनेता और ठेकेदार कोई नहीं चाहता कि उनके विरुद्ध लंबित शिकायतें सुनी जाएं और उनका निराकरण हो। यही वजह  है कि जब मुख्य सचिव अनुराग जैन ने कलेक्टरों, पुलिस अधीक्षकों और राजस्व अधिकारियों को शिकायतों का निराकरण करने की नसीहत दी तो माफिया ताकतों के टुकड़खोरों ने बात का बतंगड़ बना दिया। सहज संवाद की घटना को इस तरह प्रस्तुत किया गया मानों मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव कलेक्टरों को चोर कहना चाहते हैं। सरकार के मीडिया सलाहकारों ने इस मुद्दे पर खंडन जारी करवाकर तथ्य सामने रखे तो खबर का वैसा ही मंडन हो गया जैसा कि पहले से अपेक्षित था।

                   जनता के हित में उठी एक आवाज को कुचलने में जुटी माफिया ताकतें बार बार ये स्थापित करने का प्रयास कर रहीं हैं कि मानों सीएस ने नौकरशाही की मैली कुचैली तस्वीर को स्वीकार करके हथियार डाल दिए हों। कुछ नादान कलम घिस्सू ,जनहित की इस ललकार को  सीएस की चूक बताने में जुट गए हैं। शासन की ओर से कहा जा रहा है कि खबर को तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत किया गया है पर कोई मानने को राजी नहीं है। अब इसे अनपढ़ प्रदेश नहीं तो क्या कहा जाए जो जनहित में उठी आवाज के विरोध में अपनी खुशी तलाश रहा है। सभी जानते हैं कि शिवराज सिंह चौहान ने सुशासन के नाम पर लगभग दो दशकों तक जिस नौकर शाही को अपने सिर पर बिठाकर रखा वह आज बेलगाम हो चुकी है। कहीं राजनेताओं ने नौकरशाही को अपने दरवाजे बंधा कुत्ता बना दिया है कहीं संघ के नाम पर अफसरों के हाथ बांध दिए गए हैं। विपक्ष तो पहले से उन मुद्दों पर राजनीति करता रहा है जो समाज को सुधारने के बजाए बांटने का काम करते हैं।

                  कांग्रेस के नेता जीतू पटवारी ने सीएस की आवाज को मुख्यमंत्री और सरकार की असफलता दर्शाने के लिए प्रेस वार्ता तक बुला डाली। उनका कहना है कि सीएस ने जाने अनजाने में एक सच्चाई उजागर कर दी है। वे शासन के पक्ष पर गौर करने को राजी नहीं हैं कि मुख्य सचिव ने जो नहीं कहा उसे खबर बनाने की शैतानी कौन कर रहा है और क्यों कर रहा है। अखबारों की सुर्खियां बटोरने के लिए कांग्रेस के नेता इस गंभीर मुद्दे पर हंसी ठिठोली करने में जुट गए हैं। अन्य विपक्षी दलों की तो कोई आवाज ही नहीं है। उनका प्रदेश हित की  राजनीति से कोई वास्ता भी नहीं है। कांग्रेस के जो नेता राज्य में ठेकेदारी करके अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं वे भी नहीं चाहते कि नागरिकों की शिकायतों का निराकरण हो जाए । क्योंकि इससे सत्ता माफिया की जुगलबंदी की उनकी पोल भी खुल सकती है।  जो सत्ता माफिया कांग्रेस के शासनकाल में अपने डैने पसार चुका था वही आज अपने सहयोगियों के साथ भाजपा सरकार के सुशासन को पंगु बनाए हुए हैं। वह चाहता भी नहीं कि किसी तरह का सुशासन स्थापित हो।

               अटल बिहारी सुशासन संस्थान के जिन विशेषज्ञों ने बार बार सलाह देकर सरकारी तंत्र को जवाबदेह बनाने की सलाह दी वह भी इस घटना पर मुंह सिले हुए बैठे है। ये आनलाईन कांफ्रेंस पांच मुद्दों पर केन्द्रित थी। इनमें सुशासन, कानून व्यवस्था, कृषि,स्वास्थ्य और नगरीय प्रशासन जैसे जनहित से जुड़े विषय शामिल थे। जिन अतिक्रमण के मुद्दों पर जनता ने सीएम हेल्पलाईन पर शिकायतें की हैं उन्हें दबंगों ने अफसरों के सहारे पेंडिंग करवा दिया है। समय सीमा में निराकरण न होने की वजह से आम नागरिक परेशान हैं और बार बार कई स्तरों पर अपनी बातें उठाते रहते हैं। कानून व्यवस्था के मुद्दों को अपराधियों ने पुलिस प्रशासन से सांठ गांठ करके डंप करवा रखा है। कृषि विभाग का तो पूरा अमला नदारद है। खाद वितरण जैसे सरल विषय पर सरकारी अमले ने किसानों को धोबी का कुतका बना रखा है। स्वास्थ्य के लिए सरकारी अस्पतालों पर हजारों करोड़ रुपए खर्च होने के बावजूद जनता को निजी और कार्पोरेट अस्पतालों में लुटने को मजबूर होना पड़ रहा है। नगर पालिकाएं हों या नगर निगम सभी में अफसरों ने अपने कान और आंख बंद कर रखे हैं। वे सीएम हेल्पलाईन की शिकायतों को दबाव डालकर बंद करा देते हैं या एक दूसरे की ओर भेजकर टल्ले खिलाते रहते हैं।

            ऐसे हालात में यदि कोई मुख्य सचिव, अपने मातहतों को मुख्यमंत्री का भय दिखाकर लाईन पर लाना चाह रहा है तो मध्यप्रदेश का कथित मुख्यधारा का मीडिया इसे उपहास का विषय बनाने में जुट गया है। घरों में मां अपने बच्चों को पिता की नाराजगी का भय दिखाकर अच्छा नागरिक बनाने का प्रयास करती है। क्या इसे माता पिता के बीच दुश्मनी की तरह प्रस्तुत किया जाने लगेगा। राज्य का लगभग पैंतालीस फीसदी बजट खा जाने वाली नौकरशाही यदि जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरेगी तो निश्चित रूप से जन आक्रोश बढ़ेगा । जनता का असंतोष सरकार पर भी भारी पड़ेगा । सरकार और नौकरशाही के हित में यदि मुख्य सचिव उसे शिकायतों के निवारण की जिम्मेदारी पूरा करने की नसीहत दे रहे हैं तो वे कौन लोग हैं जो इसे आरोप प्रत्यारोप या विवाद का विषय बनाना चाहते हैं।

            सत्ता रूढ़ भाजपा को इस मुद्दे पर गंभीर रूप से चिंतन करना चाहिए। सरकार को असफल बनाने में जुटे माफिया को नसीहत देने के लिए सरकार को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तरह सख्त फैसले लेने होंगे। माफिया की कमर तोड़े बगैर यदि सरकार इस मुद्दे को दबाने का प्रयास करेगी तो आने वाला भविष्य भाजपा को एक असफल पार्टी के रूप में ही याद करेगा।