भोपाल, 23 सितंबर (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। तीसरे दिन के उद्घाटन सत्र में उपस्थित पैनल मेंबर्स ने बताया कि कैसे क्रिप्टोकरेंसी और क्रिप्टो-लेन-देन ने साइबर अपराध परिदृश्य और डार्कवेब पर उनके उपयोग को प्रभावित किया है। इस सत्र का संचालन सहायक पुलिस महानिरीक्षक सायबर सेल रियाज इकबाल ने किया। इस सत्र में पुलिस महानिरीक्षक महाराष्ट्र पुलिस बृजेश सिंह, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक विशेष शाखा योगेश चौधरी और सायबर एक्सपर्ट जितेंद्र सिंह पैनलिस्ट के रूप में उपस्थित रहे। चर्चा में विभिन्न प्रकार के लेन-देन के हस्ताक्षर, आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले टर्म्स और शब्दावली, इंटरनेट पर क्रिप्टोकरेंसी के उपयोग – डार्क वेब में ख़रीद फरोख्त से लेकर शुल्क और सेवाएं शामिल थे।
दूसरा सत्र क्रिप्टोकरेंसी से सम्बंधित साइबर अपराध की जांच के इर्द-गिर्द रहा जिसमें इंटरनेट ऑडियंस ने कई सवाल पूछे। सत्र की अध्यक्षता अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक विशेष शाखा योगेश चौधरी ने की। श्री चौधरी ने क्रिप्टोकरेंसी से सम्बंधित एक केस पर चर्चा की जिसमें एक निवेशक के साथ लगभग एक करोड़ रुपये (136,000 अमरीकी डॉलर) की धोखाधड़ी की गई। इस धोखाधड़ी में पाकिस्तान, चीन और अन्य देशों में स्थित अपराधियों के बीच अंतर्राष्ट्रीय सांठ-गांठ पाई गई।
अगले दो सत्र में भारतीय दृष्टिकोण से क्रिप्टोकरेंसी के भविष्य पर विस्तृत चर्चा हुई। इन सत्रों को सीईओ वज़ीरएक्स निश्चल शेट्टी और कॉइनडीसीएक्स के संस्थापक और सीईओ सुमित गुप्ता ने संबोधित किया । सत्रों में ब्लॉकचेन प्रौद्योगिकी की प्रकृति और अन्य पहलुओं के बीच एक विकेन्द्रीकृत वित्तीय प्रणाली की खूबियों पर चर्चा की गई।
अंतिम सत्र को अंतर्राष्ट्रीय प्रशिक्षक संचार डेटा विशेषज्ञ, राष्ट्रीय साइबर अपराध कानून प्रवर्तन यूके पुलिस मार्क बेंटले ने संबोधित किया। यह सत्र क्रिप्टोकोरेंसी की जांच और डार्कवेब पर क्रिप्टोकरेंसी के उपयोग से सम्बंधित रहा |
पत्रकार पवन विद्रोही की हत्या के आरोपी राजेन्द्र आम्रपाली और उनके वकील विजय चौधरी।
पवन विद्रोही हत्याकांड मामले में अदालत ने सुनाया फैसला
भोपाल,23 अगस्त(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। राजधानी में वर्ष 2007 के दौरान हुए पत्रकार पवन विद्रोही हत्याकांड के मामले में अदालत ने ग्वालियर के तीन शूटरों सहित आरोपी बनाए गए बिजनेस पार्टनर राजेंद्र जैन आम्रपाली, मुकेश जैन राजेश जैन और सुनील भदोरिया को सबूतों के अभाव मैं दोषमुक्त कर दिया है। जिला अदालत में अपर सत्र न्यायाधीश यतेश सिसोदिया ने सोमवार को यह फैसला सुनाया।अपने फैसले में अदालत ने कहा कि मामले में गवाहों के बयानों में विरोधाभास है साथ ही जब्ती की कार्रवाई भी प्रमाणित नहीं है। ऐसे में सभी को दोषमुक्त किया जाता है।
पत्रकार और बिल्डर पवन जैन विद्रोही की 3 जुलाई 2007 को गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। विद्रोही कार में विदिशा से नेहरू नगर स्थित घर लौट रहे थे। ग्वालियर के शूटर जितेंद्र, मेवालाल और आरिफ ने कार को जेके रोड के पास रोककर विद्रोही की गोली मारकर हत्या कर दी थी। जिस कार में विद्रोही लौट रहे थे उसमें ही आरोपी बनाए गए विद्रोही के साले मुकेश जैन और राजेंद्र जैन आम्रपाली बैठे थे। कार चालक सरदार सिंह की भी गोलीबारी में मौत हो गई थी। मामले में शुरू में राजधानी पुलिस ने विवेचना की थी। बाद में हाईकोर्ट के आदेश पर जांच सीबीआई को सौंपी गई थी।
सीबीआई ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर पवन के पार्टनर और साले को ही चिन्हित किया था। जांच अधिकारी का कहना था कि चूंकि गोलियां सीट के पीछे से मारी गईं हैं इसलिए शूटरों और गवाहों का बयान झूठा है। ड्राईवर और पवन दोनों के मृत शरीरों में गोलियां पीछे से घुसकर आगे की ओर निकलीं थीं। जबकि पकडे गए कथित शूटरों का कहना था कि उन्होंने आगे से गोलियां चलाईं थीं। सीबीआई के बाद के अफसरों ने इस मामले में रुचि नहीं ली और अदालत में आरोपियों को भ्रम की स्थिति निर्मित करने में सफलता मिल गई।
राजेंद्र जैन आम्रपाली के वकील विजय चौधरी ने बताया कि पुलिस की कहानी के अनुसार बिजनेस पार्टनर राजेंद्र जैन आम्रपाली, मुकेश जैन राजेश जैन और सुनील भदोरिया ने कारोबारी रंजिश के चलते साजिश रच कर भाड़े के हत्यारों से विद्रोही की हत्या कराई थी। हालांकि कोर्ट में पुलिस चारों पर लगे आरोप साबित नहीं कर सकी। अदालत में गवाहों ने अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया।
ऐसे हुआ था हत्याकांड का खुलासा
जांच के दौरान पिपलानी पुलिस को विद्रोही का मोबाइल मिला था। जांच में पाया गया कि हत्या के पहले विद्रोही की लगातार फोन पर बिजनेस पार्टनरों से बातचीत हो रही थी। जिस नंबर पर ज्यादा बार बातचीत हुई उसकी लोकेशन घटनास्थल के आसपास की थी। जांच में नंबर विदिशा के रहने वाले सुनील भदोरिया का निकला। सुनील भदोरिया ने पुलिस को दिए मेमोरेंडम में बताया कि उसने राजेंद्र जैन आम्रपाली, मुकेश जैन और राजेश जैन के कहने पर गवालियर के शूटरों से हत्या करवाई है। भदोरिया ने बताया था कि हत्या का सौदा 15 लाख में तय हुआ था।
मध्यप्रदेश सरकार इसी चमक दमक को प्रदेश की औद्योगिक प्रगति बताती रही है.
भोपाल,4 जुलाई (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय समेत देश की तमाम एजेंसियां इन दिनों शैल कंपनियों के सहारे काला धन सफेद करके उद्योगपति बन बैठे जेबकतरों की खाना तलाशी ले रहीं हैं। केरल के गोरखधंधेबाजों के बाद देश के अन्य प्रांतों में भी इन ठगों की धरपकड़ जारी है। मुद्रा को खोखला करने वाले इन फर्जी उद्योगपतियों से जूझने में राज्यों की सरकारें सबसे बड़ा अड़ंगा साबित हो रहीं हैं। पुलिस राज्य का विषय है और पुलिस की आंखें मूंदने के लिए काले धन के इन धोबियों ने राजनेताओं से गहरी सांठगांठ कर ली है। गुजरात के अहमदाबाद में पंजीकृत कराई गई डीबी कार्प लिमिटेड और इसके सहयोगी संस्थानों पर डाले गए छापे में पता चला कि बैंकों से लगभग 28 हजार करोड़ रुपए का कर्ज लेकर भास्कर समूह ने शैल कंपनियों के सहारे लगभग छह हजार करोड़ रुपयों का सालाना टर्नओवर हासिल कर लिया था। देश के वित्तीय ढांचे की आंखों में धूल झोंकने के लिए इस समूह ने बाजार से मंहगी दर पर निवेश जुटाया और पुलिस के रिश्वतखोरों की सहायता से इन छोटे निवेशकों की पूंजी हड़पकर उसे अपनी आय बता दिया.जबकि हकीकत में ये समूह देश के संसाधनों का लूजर बनकर सामने आया है.
डीबी कार्प लिमिटेड में आ रहे विदेशी निवेश की जांच करने पर पता चला है कि कांग्रेस नेता दिग्गी के सहयोग से शुरु किए गए इस गोरखधंधे में भाजपा के कई बड़े दिग्गज भी शामिल हैं। सत्ताधीशों का ये गिरोह राज्य के खजाने से फर्जी योजनाओं के नाम पर मोटी रकमें निकालकर इस समूह को मुहैया कराता रहा है। आयकर अधिनियम की धारा 132 में जो तलाशी ली गई उससे इस काले कारोबार की पोल खुल गई है। समूह के मुंबई, दिल्ली, भोपाल, इंदौर,जयपुर, कोरबा,, नोयडा, अहमदाबाद, समेत लगभग 40 परिसरों की तलाशी ली गई है। लगभग सात दिनों तक डेरा डाले रहे अन्य प्रदेशों से भेजे गए अधिकारियों ने इस गोरखधंधे के पूरे दस्तावेज जब्त कर लिए हैं। अपने समाचार पत्र समूह और राज्य के गृहमंत्री के सहारे दबाव बनाने के प्रयास भी नाकाम होने के बाद अब समूह के कर्ताधर्ता संघ के दरबार में दंड बैठक लगाने की जुगत भी बिठा रहे हैं।
सरे चौराहे कथित प्रगति की पोल खुलने से शेयर मार्केट में औंधे मुंह गिरने लगा कंपनी का शेयर
यह समूह मीडिया, बिजली, कपड़ा और रियल एस्टेट के अलावा कई अन्य धंधों से भी अपनी आय होना दिखाता रहा है। जबकि इसका मुख्य धंधा मनी लांड्रिंग(धनशोधन) का रहा है। समूह ने अपना सालाना कारोबार 6000 करोड़ रुपए दिखाया है।समूह से जुड़े उद्योगपति नमक, अगरबत्ती, साबुन, प्रिंटिंग आदि तमाम धंधों से अपनी आय दिखाते रहे हैं।प्रेस को बुद्धू समझने वाले इस गिरोह के सदस्य लोटा बाल्टियां बांटते रहते है विदेशों में अय्याशी करने वाले इन कारोबारियों की जान इन दिनों सांसत में फंसी हुई है क्योंकि देश के मुद्रा तंत्र से काले धन की धरपकड़ का शिकंजा भारत सरकार की पहल पर ही कसा गया है।
सूत्रों के अनुसार समूह की फ्लैगशिप कंपनी डीबी कॉर्प लिमिटेड है, जो दैनिक भास्कर समाचार प्रकाशित करती है। कोयला आधारित बिजली उत्पादन व्यवसाय मेसर्स डीबी पावर लिमिटेड के नाम से किया जाता है। सरकारी सूत्र कहते हैं कि फर्जी खर्च और शेल संस्थाओं की आड़ में समूह ने सरसरी नजर में लगभग सात सौ करोड़ की टैक्स चोरी की है। समूह ने अपने कर्मचारियों के साथ शेयर धारकों और निदेशकों के रूप में कई कागजी कंपनियां बनाई हैं। इस तरह से निकाले गए धन को मॉरीशस स्थित संस्थाओं के माध्यम से शेयर प्रीमियम और विदेशी निवेश के रूप में विभिन्न व्यक्तिगत और व्यावसायिक खातों में वापस भेज दिया गया। परिवार के सदस्यों के नाम पनामा पेपर लीक मामले में भी सामने आए। विभागीय डेटा बेस बैंकिंग पूछताछ और अन्य तरीकों से पूछताछ का विश्लेषण करने के बाद तलाशी का सहारा लिया गया।
जांच से जुड़े सूत्र बताते हैं कि डीबी कार्प लिमिटेड के रूप में समूह को कमाई का एक नया साधन मिल गया था। शासन की अनुमति प्राप्त किए बगैर समूह ने मध्यप्रदेश हाऊसिंग बोर्ड से वह जमीन खरीद ली थी। खरीद का अनुबंध करने वाली कंपनी से मिलता जुलता नाम वाली नई कंपनी बनाकर मॉल खरीदा गया। बाद में आकार ली कंपनी देश भर में मॉल बनाने का दावा करके लोन पर लोन लेती चली गई।लगभग ढाई सौ करोड़ रुपयों से बने डीबी कार्प लिमि. पर आज हजारों करोड़ रुपयों का कर्ज है। ये राशि समूह की संपत्तियों से कई गुना अधिक है।इस राशि से समूह ने आय तो की लेकिन उस पर न तो टैक्स दिया न जुर्माना भरा।मुनाफे को शैल कंपनियों में घुमाकर और अधिक लोन लिया जाता रहा।
बड़े समाचार प्रतिष्ठान देश के वित्तीय प्रबंधकों को धमकाने की आड़ बन गए थे.
कंपनी ने मॉल बनाने के नाम पर भारी लोन उठाया है।बताते हैं कि इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट बैंक से सितंबर 2011 में 1,080,000,000रुपए, स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक से अगस्त 2010 में 500,000,000 रुपए,आईडीबीआई बैंक से 1,890,000,000 रुपए,राबो इंडिया फाईनेंस लिमि.से 1,400,000,000रुपए,एबीएन एंब्रो बैंक एनवी से जून 2009 में 250,000,000 रुपए,यूको बैंक से चल संपत्तियों पर 120,000,000 रुपए,स्टेट बैंक आफ इंदौर से फरवरी 2010 में 517,000,000 रुपए, यस बैंक लिमिटेड से 700,000,000 रुपए, स्टेट बैंक आफ इंदौर से 20,000,000 रुपए,स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक से 250,000,000 रुपए, आईडीबीआई बैंक से 700,000,000रुपए, 31इंफोटेक ट्रस्टीशिप सर्विसेज लिमिटेड से 1,000,000,000 रुपए,एगको फाईनेंस जीएमबीएच से 1,778,500,000 रुपए, आईएल एंड एफएस ट्रस्ट कंपनी लिमिटेड से अक्टूबर 2007 में 250,000,000 रुपए,इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट बैंक आफ इंडिया लिमिटेड से फरवरी 2008 में 200,000,000 रुपए लोन के नाम पर जुटाए गए। ये तो प्राप्त जानकारी का बहुत छोटा हिस्सा है।
जासूस बादशाह समाचार पत्र के ब्यूरो प्रमुख अनिल तिवारी बताते हैं कि समूह की वित्तीय अनियमितताओं पर देश की जांच एजेंसियां लंबे समय से निगाह रख रहीं थीं।कई दस्तावेजों को एकजुट करने का काम चल रहा है।अभी तक जो जानकारियां सामने आईं है उससे वित्तीय अनियमितताओं की केवल सरसरी जानकारी मिली है।इससे जुड़ी अन्य जानकारियां सामने आने पर पता चलेगा कि किस तरह उद्योग खड़े करने के नाम पर देश में ही धनशोधन की फेक्टरी चलाई जा रही थी।
लूटो और भागो की तर्ज पर काम करता रहा समूह जिद करो दुनिया बदलो का टैग वाक्य सुनाता रहा लेकिन उसने न तो दुनिया बदली न ही देश को समृद्ध बनाया। बैंकों का पैसा हड़पकर समूह के कर्ता धर्ता अपने रिश्तेदारों के घरों में ये जायदाद छुपाते रहे।प्रदेश के नेता और अफसर तो समूह के दरवाजे पूंछ हिलाते रहे लेकिन पहली बार देश की जांच एजेंसियों ने तिजोरी में बंद लक्ष्मी को आजाद कराने की पहल की है। निश्चित तौर पर ये पहल कई करोड़ गरीबों के औद्योगिक संस्थान रोशन करेगी और हजारों करोड़ घरों में रोजगार के दीप जलाएगी।
भोपाल 3 अगस्त(प्रेस सूचना केन्द्र)। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट नागरिकों की चाहे जो चिंता करे पर कार्यपालिका के मैदानी अफसरों को सिर्फ अपनी कमाई की चिंता सताती है। न्यायपालिका के मुखिया प्रदेश के चीफ जस्टिस मोहम्मद रफीक और जस्टिस विजय कुमार शुक्ला ने कोरोना काल में कंगाल हुए नागरिकों को राहत देने के लिए बैंकों को कुर्की करने पर रोक लगाई है लेकिन तहसीली का अमला दुष्ट साहूकार की तरह गुंडई पर उतर आया है। एमपी नगर वृत्त के तहसीली दफ्तर में तो बैंकों के वसूली एजेंटों ने बाकायदा अपना अड्डा बना लिया है। ये एजेंट पुलिस की वर्दी पहनकर कर्जदारों के घर जाते हैं और उन्हें वारंट थमाकर कुर्की का भय दिखा रहे हैं। हाईकोर्ट को झांसा देने के लिए एजेंटों ने कर्जदारों को नए लोन मंजूर करा दिए हैं। इस टॉपअप राशि से वे पुराना कर्ज जमा कर देते हैं और नए कर्ज की वसूली के लिए कुर्की आदेश जारी करवा देते हैं।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर बेंच ने रिट याचिका क्रमांक- 8820-2021 का निपटारा करते हुए 15.07.2021 को कोरोना जैसी आपदा से प्रभावित कर्जदारों को राहत देने का प्रयास किया है । अपने फैसले में मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने अंतरिम आदेश की समय सीमा 25 अगस्त 2021 तक बढ़ा दी है। हाईकोर्ट ने कहा है कि वित्तीय संस्थान कोरोना की आपदा को देखते हुए मजबूर डिफाल्टरों को नए लोन दें और वसूली की समय सीमा कम से कम एक महीने तक बढ़ाएं।
बैंकों ने अपनी गड़बड़ाई कर्ज वसूली को लाईन पर लाने के लिए नए ऋण तो मंजूर किए हैं लेकिन मुनाफा बढ़ाने के लिए राजस्व अमले को साथ लेकर कुर्की का हथकंडा इस्तेमाल करना शुरु कर दिया है। बैंकों की वसूली एजेंसियों ने साहूकारों के गुंडों की तरह डिफाल्टरों का जीना हराम कर दिया है। जिला प्रशासन का साथ होऩे के कारण पुलिस का अमला भी एजेंटों को संरक्षण देता है। डिफाल्टरों से मारपीट और दुर्वयवहार की शिकायत लिखने के बजाए पुलिस वाले नागरिकों को डरा धमकाकर भगा देते हैं।
गांधीनगर के 42 सेक्टर के निवासी शहनवाज खान ने गाड़ी के लिए आईडीएफसी फर्स्ट बैंक लिमिटेड से डेढ़ लाख रुपयों का लोन लिया था। पेशे से मैकेनिक शहनवाज का कामकाज लॉकडाउन की वजह से ठप हो गया। इसकी वजह से वह लोन की किस्तें वक्त पर जमा नहीं कर पाया। बैक के अधिकारियों ने पुराने रिकार्ड के आधार पर नया लोन मंजूर कर दिया। अब बैंक के वसूली एजेंट कथित पुलिस वालों को लेकर उसके घर जा रहे हैं और घर की कुर्की करने की धमकी दे रहे हैं।
इसी तरह इतवारा निवासी मोहम्मद नावेद के नाम पर मंगलवारा पुलिस से 5000 रुपए का वारंट भिजवाया गया है। उसे घर की कुर्की किए जाने की धमकी दी जा रही है। जबकि उसका लोन तो कंज्यूमर सामान के लिए था। जिसकी वसूली के लिए वारंट जैसी प्रक्रिया का उपयोग ही नहीं किया जा सकता।
कर्जों की वसूली के लिए बैंकों से आरआरसी जारी होने के बाद कलेक्ट्रेट दफ्तर को भेजी जाती है। यहां से संबंधिक एसडीएम के माध्यम से तहसील के ऋण वसूली अमले को मांग सूची जारी करने की अनुमति प्रदान की जाती है। भोपाल में इस प्रक्रिया का पालन नहीं हो रहा है। तहसील दफ्तर में अड्डा जमाए बैठे वसूली एजेंट खुद की सील ठप्पे लगाकर फर्जी हस्ताक्षरों से मांग सूची जारी कर देते हैं। फर्जी पुलिस वालों को भेजकर डिफाल्टरों को धमकाया जाता है। आईडीएफसी बैंक से जुड़ी कुछ वसूली एजेंसियों ने तो कर्ज वसूली के लिए गुंडों को नौकरी पर रख लिया है। इनमें सहयोग ,विसर्प, श्री जैसी एजेंसियों के मुश्ताक खान,लोकेश शर्मा और उनके सहयोगियों ने छीना झपटी के साथ माफियागिरी भी शुरु कर दी है। बताते हैं कि रूपाली यादव नाम की एक डिफाल्टर की कार इन्हीं एजेंटों ने धमकाकर कुर्क कर ली और उसे बाजार में बेच दिया। इसी तरह से आईडीएफसी बैंक के यार्ड में खड़ी तीन अन्य कारें भी कोरोना काल के बाद कुर्क की गईं हैं। सहयोग नाम की एजेंसी के अमित ठाकुर के ससुर पुलिस में थे और इसका लाभ लेकर वह लोन वसूली के लिए पुलिस का झांसा दिखाता रहता है। आईडीएफसी बैंक के मैनेजर सुजीत सिंह और रोहित शर्मा कथित तौर पर इन एजेंटों को संरक्षण भी देते हैं और जरूरत होने पर उनके लिए वित्तीय मदद भी मुहैया कराते हैं। कंज्यूमर प्रोडक्ट के लोन की वसूली के लिए तो आरआरसी जारी करने का प्रावधान ही नहीं है लेकिन ये एजेंट कथित तौर पर फर्जी कुर्की वारंट बनाकर लोगों को धमका रहे हैं।
तहसील दफ्तर की ऋण वसूली शाखा पर बैंकों के वसूली एजेटों ने कब्जा जमा लिया है.
सूत्र बताते हैं कि गुरु एसोसिएट नाम की वसूली एजेंसी के फरीद और गुरु भाई अपने पार्टनरों के साथ मिलकर लंबित किस्तों वाले वाहनों को तहसील से बाहर ही बेच देते हैं। तहसील के नोटिसों के आधार पर डिफाल्टरों को धमकाया जाता है। कई ग्राहकों ने तो राजधानी के पुलिस थानों में इस गुंडागिरी के विरुद्ध प्रकरण भी दर्ज कराए हैं। अशोका गार्डन समेत कई पुलिस थानों में ये प्रकरण जांच के बाद दर्ज किए गए हैं ।तहसीलदार को अनाप शनाप जानकारियां देकर सहयोग एजेंसी के सुजीत सिंह ने तो कथित तौर पर आठ दस ग्राहकों के बैंक खाते भी सीज करवा दिए हैं ।
वसूली एजेंट खुद को राजस्व अधिकारी भी बता देते हैं.
हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी एजेंटों के माध्यम से की जा रही इस अवैध वसूली और गुंडागर्दी के बारे में पूछे जाने पर तहसीलदार मनीष शर्मा ने कहा कि हाईकोर्ट के आदेश की वजह से कुर्की की प्रक्रिया रोक दी गई है। डिफाल्टरों को मांग पत्र जरूर भेजे जा रहे हैं क्योंकि हम किसी को कर्ज जमा करने से रोक नहीं सकते। श्री शर्मा ने कहा कि बैंकों की वसूली पर हमें प्रोत्साहन राशि मिलती है जो कि बाकायदा शासन की ओर से वेतन के अलावा जारी होती है। कलेक्टर के ब्रिक्स फंड में भी कर्ज वसूली का एक हिस्सा जमा होता है। इस वजह से हम लोग कर्ज वसूली को प्राथमिकता देते हैं। हाईकोर्ट जब अनुमति देगा तो कुर्की की कार्रवाई वसूली नियमों के अनुसार ही की जाएगी।
स्वर्गीय रमेश चंद्र अग्रवालःपिता के जिलाबदर होने के बाद खोला बैंक उलीचने का उद्योग
भोपाल,28 जुलाई(अनिल तिवारी)। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने 27 जुलाई मंगलवार को संसद में कहा कि रिजर्व बैंक को सरकारी क्षेत्र के बैंकों ने बताया है कि जानबूझकर कर्ज लौटाने में चूक करने वाले 2,494 लोगों से वसूली का काम जारी है। पिछले तीन वित्तीय वर्षों के दौरान एनपीए और बट्टे खाते में डाले गए ऋणों में से 3,12,987 करोड़ रुपयों की वसूली की गई है। इनमें से ज्यादातर लोग भास्कर समूह की तरह दबाव की रणनीति अपनाकर बैंकों से करोड़ों रुपए का लोन हड़प रहे थे। अपनी दबंगई के सहारे आडिट रिपोर्ट को मनमाफिक तैयार कराकर रोज नए लोन मंजूर करा रहे थे लेकिन उन्हें चुकाने की जगह सरकार को बदनाम करने की गुंडई करते रहे हैं।
पिछले दिनों भास्कर समूह पर आयकर विभाग ने जो छापे डाले उसके बाद माफिया की तरह बर्ताव कर रहे समूह के प्रमोटरों ने अपने कांग्रेसी गुर्गों के माध्यम से सरकार और संसद पर ये कहकर दबाव बनाना शुरु कर दिया था कि ये पत्रकारिता पर हमला है। भास्कर समूह के तनखैया पत्रकारों ने भी शोर मचाना शुरु कर दिया कि आपातकाल की तरह प्रेस की आजादी को कुचलने का प्रयास किया जा रहा है।जबकि सरसरे अनुमान के मुताबिक भास्कर समूह ने 28 हजार करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज ले रखा है।
भास्कर समूह की लिस्टेड कंपनियां तो भास्कर इंडस्ट्रीज लिमिटेड और शारदा साल्वेंट लिमिटेड के नाम से दर्ज हैं लेकिन इसकी आड़ में सैकड़ा भर अनलिस्टेड कंपनियां भी काम कर रहीं थीं। इनमें आरके इंनवेस्टमेंट प्राईवेट लिमिटेड, बीईएल ट्रेडर्स प्राईवेट लिमिटेड, बीएफपी एंटरप्राईजेस प्राईवेट लिमिटेड,बेरी डेवलपर्स एंड इंफ्रास्ट्रक्चर प्राईवेट लिमिटेड, बीएफपी ट्रेडर्स प्राईवेट लिमिटेड, भास्कर एयरलाईंस इंडिया प्राईवेट लिमिटेड, भास्कर ब्राडकास्टिंग कार्पोरेशन लिमिटेड, भास्कर डेनिम लिमिटेड, भास्कर एक्सिम लिमिटेड, भास्कर एक्सोआईल लिमिटेड, भास्कर इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड, भास्कर फूड्स प्राईवेट लिमिटेड,भास्कर ग्लोबल प्राईवेट लिमिटेड, भास्कर हाऊसिंग डेवलपमेंट कंपनी प्राईवेट लिमिटेड, भास्कर मल्टीमीडिया प्राईवेट लिमिटेड, भास्कर मल्टीनेट लिमिटेड,भास्कर पब्लिकेशन एंड एलाईड इंडस्ट्रीज प्राईवेट लिमिटेड,भास्कर बायोफ्यूल प्राईवेट लिमिटेड, भास्कर व्यंकटेश प्रोडक्ट प्राईवेट लिमिटेड, भोपाल फाईनेंशियल सर्विस प्राईवेट लिमिटेड,ब्रिक ज्वाईंट प्राईवेट लिमिटेड,ब्राईट ड्रग इंडस्ट्रीज लिमिटेड, चंबल ट्रेडिंग प्राईवेट लिमिटेड,डीबी बिल्डकॉन प्राईवेट लिमिटेड, डीबी इनर्जी प्राईवेट लिमिटेड, डीबी इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड, डीबी माल्स प्राईवेट लिमिटेड, डीबी माईनिंग कार्पोरेशन लिमिटेड,डीबी पावर लिमिटेड, डीबी पब्लिकेशंस प्राईवेट लिमिटेड, डिलाईट इंनवेस्टमेंट प्राईवेट लिमिटेड, डीलक्स ट्रेवल सर्विस प्राईवेट लिमिटेड, डिजाईन साल्यूशंस लिमिटेड, देव एंटरप्राईजेस प्राईवेट लिमिटेड, देव फिस्कल सर्विसेस प्राईवेट लिमिटेड, देव मीडिया प्राईवेट लिमिटेड, डेलीजेंट मीडिया कार्पोरेशन लिमिटेड, डायमेंशन मीडिया प्राईवेट लिमिटेड,डायरेक्ट ओह मीडिया प्राईवेट लिमिटेड, दिव्या देव डेवलपर्स प्राईवेट लिमिटेड,दिव्या ट्रेडिंग प्राईवेट लिमिटेड, एक्सोईल्स एंटरप्राईजेस प्राईवेट लिमिटेड, ग्वालियर बिल्डकान प्राईवेट लिमिटेड, इंडिया इंटरएक्टिव टेक्नालाजीस प्राईवेट लिमिटेड, खानदाधर मिनरल्स लिमिटेड,मंजुल पब्लिशिंग हाऊस प्राईवेट लिमिटेड, मेरी डेवलपर्स प्राईवेट लिमिटेड, जैसी कंपनियां शामिल हैं।
कमलनाथ हों या शिवराज,पानी भरते रहे प्रदेश के सभी कर्णधार
जिन प्रोप्राईटर फर्म्स से भास्कर समूह अपनी आय होना दिखाता रहा है उनमें मेसर्स भास्कर ग्लोबल, भास्कर फोटो टाईप सेटर भोपाल, भास्कर प्रिंटिंग प्रेस अहमदाबाद, सूरत,वडोदरा, भास्कर प्रिंटिंग प्रेस भोपाल, मेसर्स द्वारका प्रसाद अग्रवाल एंड ब्रदर्स, द्वारका प्रसाद अग्रवाल चैरीटेबल ट्रस्ट, गिरीश अग्रवाल हिंदू अविभाजित फैमिली, मेसर्स मतोलिया मोटल्स, ओमप्रकाश गर्ग हिंदू अविभाजित फैमिली, पवन अग्रवाल हिंदू अविभाजित फैमिली, रमेश चंद्र अग्रवाल हिंदू अविभाजित फैमिली, आरसी अग्रवाल चैरिटेबल ट्रस्टर, आरसी फोटो टाईप सेटर रायपुर, मेसर्स आरसी प्रिंटर्स, शारदा देवी चैरीटेबल ट्रस्ट, शिवपुरी ट्रेडिंग कार्पोरेशन, सुधीर अग्रवाल हिंदू अविभाजित फैमिली, शामिल हैं।
जिन कंपनियों से ये समूह अपना कारोबार दिखाता रहा है उनमें न्यू इरा पब्लिकेशंस प्राईवेट लिमिटेड, पीकाक ट्रेडिंग एंड इंनवेस्टमेंट प्राईवेट लिमिटेड, रीजेंसी एग्रो प्रोडक्टस् प्राईवेट लिमिटेड, रीजेंसी होटल्स एंड इंनवेस्टमेंट्स इंडिया प्राईवेट लिमिटेड,एसए ट्रेडिंग एंड इन्वेस्टमेंट्स प्राईवेट लिमिटेड,सौराष्ट्र समाचार प्राईवेट लिमिटेड, एसबी होटल्स प्राईवेट लिमिटेड, शारदा रियल इस्टेट प्राईवेट लिमिटेड, शाश्वत होम्स प्राईवेट लिमिटेड, शौर्या डायमंड लिमिटेड, साल्वेंट ट्रेडर्स प्राईवेट लिमिटेड, स्टाईटेक्स ग्लोबल लिमिटेड, सनशाईन साल्वेंट प्राईवेट लिमिटेड, सर्ज डेवलपर्स प्राईवेट लिमिटेड, सूर्या आई इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर प्राईवेट लिमिटेड, राईटर्स एंड पब्लिशर्स लिमिटेड, वेंचर ड्राईव प्राईवेट लिमिटेड, विज्युअल मीडिया एंटरटेनमेंट प्राईवेट लिमिटेड, जैसी कई अन्य कंपनियां शामिल हैं।
पत्रकारिता की आड़ में परिवारवाद
आयकर अधिनियम की धारा 132 के तहत दिए गए नोटिस के जवाब में जो जानकारी समूह के प्रवर्तकों ने दी है उसमें परिवारों और रिश्तेदारों के नाम मोटा मालिकाना हिस्सा दिखाया गया है। कंपनी के प्रमोटरों की हिस्सेदारी भी बांटकर उन्हें संपत्ति का मालिक बनाया गया है।सर्व श्री गिरीश अग्रवाल 5.24 प्रतिशत संपत्ति के मालिक हैं। जबकि श्रीमती ज्योति अग्रवाल 5.26 प्रतिशत,कस्तूरी देवी अग्रवाल 3.08 प्रतिशत, नमिता अग्रवाल 4.23 प्रतिशत, निकिता अग्रवाल 1.42 प्रतिशत, पवन अग्रवाल 5.70 प्रतिशत,रमेश चंद्र अग्रवाल 19.66 प्रतिशत,स्वर्गीय रमेशचंद्र अग्रवाल हिंदू अविभाजित परिवार की हैसियत से 2.78 प्रतिशत, सुधीर अग्रवाल 8.73 प्रतिशत, भास्कर फूड्स प्राईवेट लिमिटेड 2.78 प्रतिशत,राईटर्स एंड पब्लिशर्स लिमिटेड 1.93 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ समूह के प्रमोटर्स हैं।
अनुप्रिया आचार्यः डीबी कार्प लिमिटेड की डायरेक्टर, पिता की दौलत पर ऐश्वर्य का साम्राज्य
जिन विदेशी हिस्सेदारों ने एनआरआई के तौर पर भागीदारी की है उनमें सर्वश्री बृजेश जे पटेल 2.34 प्रतिशत, जयवंत एन पटेल 5.99 प्रतिशत,कांतिभाई नाथाभाई पटेल 4.83 प्रतिशत, माया जे पटेल 5.80 प्रतिशत, पायल जी पटेल 2.34 प्रतिशत, सविबेन कांतिभाई पटेल 2.22 प्रतिशत, के भागीदार हैं। समूह में शामिल अन्य प्रमोटरों में चंबल ट्रेडिंग प्राईवेट लिमिटेड की 7.20प्रतिशत, भास्कर इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड की 7.89 प्रतिशत हिस्सेदारी है। अन्य लोगों की 0.58 प्रतिशत हिस्सेदारी भी दर्शायी गई है।कुल पांच लाख करोड़ से अधिक की संपत्तियां भास्कर समूह के पास इकट्ठी हैं। भास्कर के इस साम्राज्य में पलीता लगाने वालों में भी इसके प्रमोटर्स ही शामिल हैं क्योंकि समूह ने न तो सरकार को टैक्स देना उचित समझा न बैंकों को उसकी संपत्तियां लौटाईं और न ही प्रमोटरों को मुनाफे का हिस्सा दिया। इसी वजह से कागजों पर बनी कंपनियों की कागजी नाव डूबने की कगार पर जा पहुंची।
चाचा महेश प्रसाद अग्रवालःरमेश ने हड़प लिया दैनिक भास्कर
जनधन को दबाने वालों में स्वर्गीय रमेश चंद्र अग्रवाल का पूरा परिवार और खानदान बढ़ चढ़कर भागीदार रहा है। दस्तावेजों पर जनधन का मालिकाना हक प्राप्त करने वालों में रमेश चंद्र अग्रवाल की मां कस्तूरी देवी अग्रवाल, बहन मीना गर्ग, बहन नीलम गोयल, बेटे सुधीर अग्रवाल, गिरीश अग्रवाल, पवन अग्रवाल,शामिल हैं।अन्य मालिकों में रमेश चंद्र अग्रवाल की बेटी भावना अग्रवाल, दामाद स्वर्गीय डाक्टर ओपी गर्ग, दामाद श्री गोविंद प्रसाद गर्ग, जिठसास विनीता खेतावत, सुधीर अग्रवाल की पत्नी ज्योति अग्रवाल, सुधीर का बेटा अर्जुन अग्रवाल, बेटी शुभ अग्रवाल, ससुर डीडी बेरी, सास सुषमा बेरी, साले सुमीत बेरी, जिठसास अन्नू राखीजा, जिठसास नीतू सिंह, जिठसास रीनू दुआ शामिल हैं।
दैनिक भास्कर समूह ने अपने राजनीतिक संबंधों और पत्रकारिता से अर्जित रसूख के दम पर बैंकों में भारी माफियागिरी मचाई थी।बैंकों ने भी इस कागजी विकास के दावों को सच माना और धड़ाधड़ मोटी रकमें समूह को थमा दीं। वर्ष 2013 से 2017 के दौरान भारतीय स्टेट बैंक ने 4,400,000,000 रुपए समूह को थमा दिए। सितंबर 2018 में आरबीएल बैंक लिमिटेड ने 1,000,000,000 रुपए समूह को दिए। अचल संपत्तियों और ब्याज को गिरवी रखकर आरबीएल बैंक ने 2,430,000,000 रुपए और दे दिए। एक्सिस ट्रस्टी सर्विस लिमिटेड ने 6,000,000,000 रुपए,एक्सिस ट्रस्टी सर्विसेज लिमिटेड ने 5,970,000,000 रुपए, एक्सिस ट्रस्टी सर्विस लिमिटेड ने 5,970,000,000 रुपए फिर जारी किए।हाऊसिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट कार्पोरेशन लिमिटेड ने इन्हीं संपत्तियों को गिरवी रखकर अप्रैल 2011 में 250,000,000 रुपए, स्टेट बैंक आफ इंदौर ने मार्च 2011 में 250,000,000 रुपए, एलआईसी हाऊसिंग फायनेंस लिमिटेड ने 400,000,000 रुपए,आरबीएल बैंकलिमिटेड ने 1,995,000,000 रुपए,आरबीएल बैंक लिमिटेड ने ही संपत्तियों पर 313,000,000 रुपए सितंबर 2018 में जारी किए। कार्पोरेट गारंटी पर आरबीएल बैंक ने जुलाई 2019 में 218,750,100 रुपए, यूनियन बैंक आफ इंडिया ने दस्तावेजों के आधार पर 5,970,000,000 रुपए भास्कर समूह को थमा दिए। आईडीबीआई बैंक ने 750,000,000 रुपए, सेन्ट्रल बैंक आफ इंडिया ने 500,000,000 रुपए, पंजाब एंड सिंध बैंक ने 250,000,000 रुपए, स्टेट बैंक आफ पटियाला ने 432,900,000 रुपए, स्टेट बैंक आफ इंडिया ने 3,150,000,000 रुपए, एक्सिस ट्रस्टी सर्विसेज लिमिटेड ने 6,000,000,000 रुपए भास्कर समूह को थमा दिए जिन्हें न तो समूह लौटा रहा है न ही उससे आय हासिल करके उसे बढ़ा पा रहा है।
बैंकों से हड़पी गईं इन राशियों की ये पूरी सूची नहीं हैं।प्राप्त राशियों में से ये चंद आंकड़े हैं जो राशियां खुद को कागज पर उद्योगपति बताकर भास्कर समूह ने हड़पी हैं। जिद करो दुनिया बदलो जैसा झांसेवाला स्लोगन देकर भास्कर समूह दिन ब दिन नाममात्र का ब्याज देकर ये राशि प्राप्त करता रहा है। समूह के लालच और ठगी का आलम ये है कि वह बैंकों को ब्याजराशि भी नहीं दे पा रहा है। शिवराज सिंह चौहान जैसी कमजोर सरकार अखबार को विज्ञापन के रूप में भारी धनराशि मुहैया कराती रही जिससे वह बैंकों की किस्त भरकर अधिकारियों को टहलाता रहा। बताते हैं कि एक्सिस बैंक की एक अधिकारी ने ब्याज की रकम जमा न करने पर रमेश चंद्र अग्रवाल को ऐसी डॉट पिलाई थी कि वे स्वयं मध्यप्रदेश सरकार के खजाने से रकम लेकर अहमदाबाद गए थे लेकिन हार्ट अटैक आ जाने की वजह से उनकी मौत हो गई।
भास्कर समूह ने बैंकों से इतना अधिक कर्ज ले रखा है कि वह इसी मूल रकम भी बैंकों को नहीं लौटा सकता है। उसकी संपत्तियां भी इतनी नहीं हैं कि उन्हें बेचकर जनधन की वसूली की जा सके। समूह पर आयकर ही इतना बाकी है कि यदि वह जुर्माना सहित वसूला जाए तो पूरा समूह बिक जाए और फिर भी कर नहीं भरा जा सकता है। देश में फर्जी उद्योगपतियों का सरगना भास्कर समूह पत्रकारिता के दम पर अपनी झूठी शान बघार रहा है। जब आयकर की जांच शुरु हुई तो इसे पत्रकारिता पर हमला बताने वालों की भीड़ खड़ी हो गई। इन चंद आंकड़ों से समूह की औकात साफतौर पर आंकी जा सकती है। जो मुफ्तखोर इस समूह के साथ खड़े हो रहे हैं उनकी भी जांच कराई जानी जरूरी है ताकि जनधन को गड़पने वाले बदमाशों को आर्थिक विकास की धुरी से बाहर किया जा सके।
दो माह
में 733 चिन्हित
गुण्डों पर कार्यवाही,
चार हजार से अधिक ईनामी
बदमाशों की गिरफ्तारी
भोपाल।
पुलिस महानिदेशक विवेक जौहरी
के नेतृत्व में विगत दो माह
जून-जुलाई में प्रदेश
की पुलिस ने गुण्डों-माफियाओं
और आपराधिक तत्वों के विरूद्ध
कठोर कार्यवाही की है। डीजीपी
ने अपने मैदानी अफसरों को
निर्देश दिए थे कि शासन की
मंशा के अनुरूप प्रदेश में
आपराधिक तत्वों का समूल सफाया
करें और प्रदेश को अपराध मुक्त
बनाने के लिये कार्य करें।
समाज विरोधी गैर कानूनी
गतिविधियों को अंजाम देने
वाला व्यक्ति चाहे कितना भी
रसूखदार हो, उसके
विरूद्ध कानूनी कार्यवाही
करें। संगठित अपराध करने वाले
आपराधिक लोगों का सिंडीकेट
तहस-नहस कर दें।
कोविड-
19 अनलॉक की प्रक्रिया
प्रारम्भ होने के बाद म.प्र.
पुलिस द्वारा आधारभूत
पुलिसिंग पर कार्य करना प्रारम्भ
किया गया है। अपराध एवं अपराधियों
पर नियंत्रण करने के उद्देश्य
से पुलिस महानिदेशक जौहरी ने
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग करके
ये विशेष अभियान चलाने के
निर्देश दिए थे। अभियान के
दौरान प्रत्येक जिले में शीर्ष
आपराधिक तत्वों को सूचीबद्ध
कर उनके विरूद्ध उचित वैधानिक
कार्यवाही करने के निर्देशों
के फलस्वरूप 733 आपराधिक
तत्वों को चिन्हित कर उनके
विरुद्ध 133 एनएसए,
350 जिला बदर एवं 140
धारा 110 द.प्र.सं.
के प्रकरण पंजीबद्ध
कर न्यायालय में प्रस्तुत
किये गये।
माह
जून-2020 में चलाए गए
विशेष अभियान में 1980 नई
हिस्ट्रीशीट फाईल एवं 88 नई
गैंग हिस्ट्रीशीटर फाईल तैयार
की गई। माह जून-2020 में
चलाए गए विशेष अभियान में 137
पैरोल पर छूटे अपराधियों
की पैरोल निरस्त कराने की
कार्यवाही की गई। माह जून-2020
में चलाए गए विशेष
अभियान में संपत्ति संबंधी
अपराधों के 2564 स्थाई
वारंटी एवं 375 गिरफ्तारी
वारंट तामील कराये गये। इसी
प्रकार माह जुलाई में 3914
स्थाई वारण्ट एवं 477
गिरफ्तारी वारण्ट
तामील कराने गये।
विगत माहों
में कुल 4386 ईनामी
बदमाशों को गिरफ्तार करने
में सफलता प्राप्त हुई। पोर्टल
के माध्यम से वाहन चैकिंग एवं
थानों में रखे वाहनों की सर्चिंग
के दौरान माह जुलाई में 3,45,182
वाहनों को सर्च किया
गया। जिसमें 228 अपराधियों
से 251 चोरी के वाहन
जप्त करने में सफलता प्राप्त
की।
गुम
बालक/बालिकाओं की
दस्तयाबी के लिए माह जुलाई
में 1,628 बालक/बालिकाओं
को दस्तयाब करने में सफलता
प्राप्त की है। चिटफण्ड कंपनियों
के विरूद्ध शिविर लगाकर शिकायतें
प्राप्त कर निराकरण कराने के
निर्देश दिये गये थे 275 प्रकरण
कायम किये जाकर शिकायतों का
निराकरण कराया जा रहा है। जिला
रतलाम, कटनी,
इंदौर एवं नीमच में
निवेशकों के रूपये वापस कराने
की अच्छी कार्यवाही की गई है।
करोड़ों रुपये आवेदकों को
दिलाए गए। बदमाशों द्वारा
अवैध तरीके से अर्जित की गई
सम्पत्ति एवं शासकीय जमीनों
पर अतिक्रमण करने के मामलों
में इन सम्पत्तियों को नष्ट
करना एवं शासकीय जमीनों को
अतिक्रमण मुक्त कराया गया।
इसी तरह जिला इंदौर, भोपाल
में भू-माफियाओं
के विरुद्ध भी प्रभावी कार्यवाही
की गई है।
भोपाल में नव निर्मित उच्च तकनीक प्रयोगशाला में डीएनए जाँच शुरू
भोपाल, 07 मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)। दृढ़ इच्छा शक्ति एवं संकल्पबद्ध होकर डीएनए के सभी लंबित सैम्पल की जाँच का काम अगले छ: माह के भीतर पूरा करें। इसके लिए तकनीकी स्टाफ एवं अन्य सुविधाएं मुहैया कराने में पुलिस मुख्यालय का पूरा सहयोग मिलेगा। यह बात पुलिस महानिदेशक राजेन्द्र कुमार ने एफएसएल वैज्ञानिकों एवं तकनीकी स्टाफ को संबोधित करते हुए कही। श्री राजेन्द्र कुमार ने यहाँ भदभदा रोड़ स्थित क्षेत्रीय न्यायालयिक विज्ञान प्रयोगशाला परिसर में नव निर्मित हाईटेक लेबोरेटरी कॉम्प्लेक्स (उच्च तकनीक प्रयोगशाला) में डीएनए परीक्षण कार्य का शनिवार को शुभारंभ किया। ज्ञात हो लगभग छ: करोड़ रूपये की लागत से निर्मित इस हाईटेक लेबोरेटरी कॉम्प्लेक्स भवन का लोकार्पण गत 26 फरवरी को मुख्यमंत्री द्वारा किया गया था।
इस लेबोरेटरी के शुरू होने से डीएनए जाँच के क्षेत्र में मध्यप्रदेश में नया अध्याय जुड़ा है। अब प्रदेश में डीएनए जाँच के लिए अत्याधुनिक तकनीक से सुसज्जित दो प्रयोगशालाएँ हो गईं हैं। अभी तक केवल सागर की एफएसएल में ही डीएनए जाँच की सुविधा उपलब्ध थी। इस हाईटेक लैब में एनजीएस उपकरण भी लगाया गया है, जो भारत की किसी लैब में पहली बार लगा है। भोपाल में आधुनिकतम उपकरणों के साथ शुरू हुई इस प्रयोगशाला में डीएनए जाँच के साथ-साथ Cow Buffalo meat testing ( गाय एवं भैंस के मांस का परीक्षण) का काम भी होगा। यह लैब शुरू होने से पॉक्सो एक्ट एवं यौन अपराधों के निराकरण में तेजी आएगी।
पुलिस महानिदेशक श्री राजेन्द्र कुमार ने मध्यप्रदेश एफएसएल के निदेशक से कहा कि प्रदेश में जब तक नई अन्य लैब शुरू नहीं होतीं तब तक डीएनए सैम्पल जाँच की पैडेंसी दूर करने के लिए सागर एवं भोपाल की लैब को 24 घंटे चालू रखने का प्रयास करें। तकनीकी स्टाफ की कमी दूर करने के लिए स्टाफ का युक्तियुक्तकरण किया जाए। उन्होंने हिदायत दी कि डीएनए जाँच करने में सक्षम स्टाफ को मैदानी स्तर से इन प्रयोगशाला में पदस्थ करें। साथ ही भरोसा दिलाया अन्य जरूरी सुविधाएं मुहैया कराने के लिए पुलिस मुख्यालय से हर संभव मदद मिलेगी। पुलिस महानिदेशक के आहृवान पर कार्यक्रम में मौजूद स्टाफ ने डीएनए पैडेंसी छ: माह के भीतर निपटाने का संकल्प लिया।
श्री राजेन्द्र कुमार ने कहा कि डीएनए जाँच रिपोर्ट एक ऐसा साक्ष्य है, जिससे अपराधी को शत-प्रतिशत सजा दिलाई जा सकती है। उन्होंने कहा कि लैगिंक अपराधों एवं हत्या के प्रकरणों में न्यायालय द्वारा डीएनए सैम्पल जाँच रिपोर्ट की माँग खासतौर पर की जाती है। इसलिए डीएनए जाँच की गति हमें तेज करनी ही होगी। पुलिस महानिदेशक ने डीएनए जाँच के लिए प्रदेश की लेबोरेटरी में उच्च मानक स्थापित करने पर भी विशेष बल दिया। साथ ही कहा कि ऐसे पाठ्यक्रम बनाएं, जिनके डिप्लोमा व प्रमाण पत्र के आधार पर तकनीकी स्टाफ की पूर्ति की जा सके और न्यायालय में भी हमारा पक्ष मजबूत हो सके।
आरंभ में पुलिस महानिदेशक ने दीप प्रज्ज्वलन कर डीएनए परीक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इस अवसर पर जी अखेतो सेमा अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक तकनीकी सेवाएं मंचासीन थे। स्वागत उद्बोधन मध्यप्रदेश एफएसएल के निदेशक हर्ष शर्मा ने दिया। डीएनए लैब के प्रभारी डॉ अनिल कुमार सिंह ने बताया कि मध्यप्रदेश डीएनए जाँच में देश भर में अग्रणी है। डीएनए जाँच के आधार पर पिछले लगभग तीन वर्ष में मध्यप्रदेश में न्यायालय ने 34 मौत की सजाएं सुनाईं है, जो देश भर में सर्वाधिक हैं।
कार्यक्रम में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक रेल श्रीमती अरूणा मोहन राव, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक महिला अपराध अन्वेष मंगलम, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक कल्याण विजय कटारिया, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक जेएनपीए डी.सी.सागर, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक प्रबंध डी.श्रीनिवास राव व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक योजना अनंत कुमार सिंह सहित अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारी एवं एफएसएल के वैज्ञानिक व अधिकारी मौजूद थे।
इलाहाबाद,3
मार्च(प्रेस
सूचना केन्द्र)।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है
कि अनुसूचित जाति और जनजाति
(अत्याचार निवारण)
अधिनयम, 1989 के
तहत कथित अपराध “सार्वजनिक
रूप” (पब्लिक व्यू)
से होना चाहिए।
न्यायमूर्ति राम कृष्ण गौतम
ने स्पष्ट किया कि अगर किसी
व्यक्ति को एससी/एसटी
समुदाय का होने के कारण अपमानित
किया जाता है और यह घटना बंद
दरवाज़े के भीतर होती है तो
इस पर एससी/एसटी
अधिनियम लागू नहीं होता।
यह आदेश
जाँच विभाग के जांच अधिकारी
केपी ठाकुर के आवेदन पर दिया
गया है।उन्होंने अपने आवेदन
में विनोद कुमार तनय के ख़िलाफ़
शिकायत की है। ठाकुर ने तनय
को अपने कमरे में बुलाकर साक्ष्य
की रिकॉर्डिंग को कहा था। तनय
के साथ उसका एक सहकर्मी एमपी
तिवारी भी था। ठाकुर ने इस पर
आपत्ति की और उन्होंने तिवारी
से इस प्रक्रिया में व्यवधान
नहीं पहुँचाएँ और कमरे से बाहर
चले जाएं। इसके बाद, तनय
ने आवेदनकर्ता के ख़िलाफ़
आईपीसी की धारा 323, 504, 506 और
एससी/एसटी अधिनियम
की धारा 3(1) (X) के तहत
मामला दायर किया।
जब निचली
अदालत ने ठाकुर को अदालत में
पेश होने को कहा तो उसने इस
मामले को हाईकोर्ट में चुनौती
दी। हाईकोर्ट ने अपने आदेश
में कहा था कि ठाकुर पर जिस
अपराध का आरोप लगाया अगया है
वह “सार्वजनिक”
नहीं है। अदालत ने कहा
कि “यह जाँच अधिकारी
का चैम्बर था जहाँ प्रेज़ेंटिंग
ऑफ़िसर और जाँच अधिकारी मौजूद
थे और यह नहीं कहा जा सकता कि
वह एक आम स्थल था,” ।
एससी/एसटी
अधिनियम की धारा 3(1) (X) स्पष्ट
कहती है कि “अगर
कोई व्यक्ति जो अनुसूचित जाति
या जनजाति का सदस्य नहीं है
– (x) अगर सार्वजनिक
रूप से अनुसूचित जाति या जनजाति
के किसी सदस्य को जानबूझकर
धमकता है या अपमानित करता है।”
इस बारे में गोरिगे
पेंटैय्याह बनाम आंध्र प्रदेश
राज्य एवं अन्य, (2008) 12 SCC 531 का
भी हवाला दिया जा सकता है जिसमें
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि
‘पब्लिक व्यू’
ऐसी जगह है तहाँ तक आम
लोगों की पहुँच है। जब यह किसी
घर के अंदर है, तो
यह पब्लिक व्यू नहीं हो सकता
और इस आधारभूत बात के अभाव
में, अधिनियम की
धारा 3(1)(X) के तहत यह
मामला नहीं बनता।
अदालत
ने इस बात पर भी ग़ौर किया कि
शिकायतकर्ता ने पूरी प्रक्रिया
के दौरान यह कभी नहीं बताया
कि अनुसूचित जाति के होने के
कारण उसे उस व्यक्ति ने अपमानित
किया जो ख़ुद उस समुदाय का
नहीं है। इसलिए यह बात भी इससे
ग़ायब है। इस तरह ठाकुर के
आवेदन को सुनवाई के लिए स्वीकार
कर लिया गया और उसके ख़िलाफ़
एससी/एसटी अधिनियम
की धारा 3(1) (X) के तहत
जारी सम्मन को निरस्त कर दिया।
पर अदालत ने अन्य आरोपों में
हस्तक्षेप नहीं किया और कहा
कि उन मामलों में सुनवाई जारी
रहेगी। अदालत ने जाते जाते
शिकायतकर्ता की इस बात के लिए
भी खिंचाई की कि उसने पूछताछ
के दौरान जाँच में रोड़ा अटकाने
के लिए अपने एक सहयोगी के साथ
वहाँ पहुँच गया था।
पुलिस महानिदेशक श्री सिंह ने किया ”स्टेटिस्टिकल डाटा-2020” पुस्तक का विमोचन
भोपाल, 10 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र). पुलिस मुख्यालय की योजना शाखा द्वारा पुलिस की अन्य शाखाओं के सहयोग से मध्यप्रदेश पुलिस के सांख्यकीय आंकड़ों को समाहित कर ”स्टेटिस्टिकल डाटा-2020” पुस्तक का प्रकाशन किया है। पुलिस महानिदेशक श्री विजय कुमार सिंह ने सोमवार को इस पुस्तक का विमोचन किया।
”स्टेटिस्टिकल डाटा-2020” पुस्तक को इस हिसाब से तैयार किया गया है, जिससे मध्यप्रदेश पुलिस की बेहतरी व क्षमता संवर्धन के लिए उपयोगी योजनाएं तैयार की जा सके। मध्यप्रदेश पुलिस के आधुनिकीकरण एवं उन्न्यन को ध्यान में रखकर इस पुस्तक को अंतिम रूप दिया गया है।
विमोचन कार्यक्रम में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक योजना श्री अनंत कुमार सिंह, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक प्रबंध श्री डी श्रीनिवास राव, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक निजी सुरक्षा एजेंसी श्री एम.एस.शर्मा, पुलिस महानिरीक्षक योजना श्री योगेश चौधरी, पुलिस महानिरीक्षक अपराध अनुसंधान श्री डी.श्रीनिवास वर्मा, सहायक पुलिस महानिरीक्षक संपदा श्री सुनील तिवारी व सहायक पुलिस महानिरीक्षक योजना श्री मनोज केडिया भी मौजूद थे।
अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक योजना श्री अनंत कुमार सिंह के मार्गदर्शन में तैयार हुई इस सांख्यिकी पुस्तक में पुलिस से संबंधित बुनियादी आंकड़े मसलन पुलिस में क्षेत्र के अनुपात में उपलब्ध मानव संसाधन अर्थात आई.जी., डीआईजी, एसपी, सीएसपी, एसडीओपी, सशस्त्र बल इत्यादि की संख्या उपलब्ध है। साथ ही कुल पुलिस थानों की संख्या के साथ-साथ महिला, अजाक, यातायात व सीआईडी थानों की संख्या भी पुस्तक में शामिल की गई है। रेंजवार पुलिस थानों में दर्ज अपराधों की स्थिति सहित मध्यप्रदेश से संबंधित भौगोलिक, प्रशासनिक व सामाजिक सांख्यकीय आंकड़े भी पुस्तक में प्रमुखता से शामिल किए गए हैं।
18 जिलों के 42 पुलिस अधिकारियों ने सीखीं उत्कृष्ट विवेचना की बारीकियाँ
भोपाल,07 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। पुलिस अधिकारी महिला अपराधों से संबंधित नये कानूनों की बारीकियाँ समझें और साक्ष्य आधारित, आधुनिक एवं स्मार्ट पुलिसिंग के जरिए महिला उत्पीड़न से संबंधित अपराधों की ऐसी विवेचना करें, जिससे कोई भी अपराधी बचने न पाए। यह बात पुलिस महानिदेशक विजय कुमार सिंह ने कही। श्री सिंह शुक्रवार को मध्यप्रदेश पुलिस अकादमी भौंरी में ”लैंगिक अपराधों की विवेचना में पुलिस की भूमिका” विषय पर संपन्न हुई मास्टर ट्रेनर्स की तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला के समापन सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा क्रिमनल जस्टिस सिस्टम के सभी अंगों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है, तभी हम पीड़ित को न्याय और अपराधी को सजा दिलाने में सफल होंगे।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा महिला अपराधों की विवेचना के संबंध में दिए गए दिशा-निर्देशों के परिपालन में पुलिस मुख्यालय की निर्देश पर यह कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यशाला में प्रदेश के 18 जिलों से आए उप निरीक्षक से लेकर अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक स्तर के 42 पुलिस अधिकारियों को खास तौर पर महिलाओं के उत्पीड़न से संबंधित अपराधों की उत्कृष्ट विवेचना करने के गुर सिखाए गए। समापन सत्र में विशेष पुलिस महानिदेशक प्रशिक्षण श्री संजय राणा, मध्यप्रदेश पुलिस अकादमी के निदेशक श्री के.टी.वाइफे एवं संयुक्त संचालक स्वास्थ्य सेवा डॉ वंदना खरे मंचासीन थीं।
पुलिस महानिदेशक श्री सिंह ने कहा कि महिला अपराधों की विवेचना के दौरान विशेष सावधानी व सतर्कता बरतने की जरूरत है। साक्ष्य जुटाने व डीएनए जाँच के लिए सैंपल भेजने से लेकर उसकी रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करने तक निर्धारित प्रोटोकॉल व समय-सीमा का पालन करें। उन्होंने पुलिस अधिकारियों से इस काम को चुनौती के रूप में लेकर अंजाम देने को कहा।
विशेष पुलिस महानिदेशक प्रशिक्षण श्री संजय राणा ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के पालन में एक साल के भीतर प्रदेश भर में विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित कर लगभग 650 पुलिस अधिकारियों को उत्कृष्ट विवेचना का प्रशिक्षण दिया जाएगा। उन्होंने कहा विशेषज्ञ रिसोर्स पर्सन का लाभ जिले स्तर तक पहुँचाने के लिए वीडियो कॉन्फ्रेसिंग के जरिए भी प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके लिए स्मार्ट क्लास तैयार किए जा रहे हैं।
कार्यशाला में विशेषज्ञों द्वारा यौन अपराधों की उत्कृष्ट विवेचना व वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाने की बारीकियां सहित इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए अन्य दिशा-निर्देशों के बारे में विस्तार पूर्वक बताया गया। यहाँ प्रशिक्षित किए गए सभी मास्टर ट्रेनर्स अपने-अपने जिलों में जाकर पुलिस अधिकारियों को प्रशिक्षित करेंगे।
समापन सत्र में पुलिस महानिदेशक ने सभी प्रशिक्षु अधिकारियों को प्रमाण-पत्र प्रदान किए। इस अवसर पर प्रशिक्षुओं ने भी अपना फीडबैक दिया और प्रशिक्षण को अत्यंत उपयोगी बताया। आरंभ में पुलिस प्रशिक्षण अकादमी के निदेशक श्री के.टी.वाईफे ने कार्यशाला की विषय वस्तु पर प्रकाश डाला। सभी अतिथियों को स्मृति चिन्ह के रूप में पुस्तकें भेंट की गईं। समापन सत्र का संचालन प्रशिक्षण अकादमी के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक श्री नीरज पाण्डेय ने किया। अंत में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक श्रीमती रश्मि पाण्डेय ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक प्रशिक्षण श्रीमती निमिषा पाण्डेय व मध्यप्रदेश पुलिस अकादमी के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक श्री कमल मौर्य सहित अन्य संबंधित अधिकारी मौजूद थे।
शंका समाधान के लिए शुरू होगी इनफोरमेशन डेस्क
पुलिस महानिदेशक श्री विजय कुमार सिंह ने मध्यप्रदेश पुलिस प्रशिक्षण अकादमी भौंरी की प्रशिक्षण व्यवस्था एवं सुविधाओं की सराहना की। साथ ही कहा कि यहाँ से प्रशिक्षण लेकर जाने वाले पुलिस अधिकारियों सहित अन्य विवेचना अधिकारियों की शंकाओं के समाधान के लिए अकादमी में एक इनफोरमेशन डेस्क शुरू की जाए।
भोपाल,21
जनवरी(प्रेस
सूचना केन्द्र)।
सागर में दलित को जिंदा जलाने
वाले युवकों को कांग्रेस के
नेताओं का खुला संरक्षण है
इसलिए पुलिस इस वारदात के असली
आरोपियों को बचा रही है। जिन
तीस पैंतीस लोगों ने पीड़ित
धन प्रसाद पुत्र निजाम अहिरवार
का घर घेरा था उन्हें पुलिस
ने आरोपी नहीं बनाया है। भारतीय
जनता पार्टी के पूर्व मंत्री
लाल सिंह आर्य ने आज पत्रकार
वार्ता में आरोप लगाया कि
सरकार दलितों को निशाना बना
रही है और अपना खोया वोट बैंक
लौटाने के लिए दलितों के बीच
अपने समर्थन वाला नेतृत्व
खड़ा करने का प्रयास कर रही
है।
उन्होंने
बताया कि सागर के मोतीनगर
थानाक्षेत्र के धर्मश्री
वार्ड की आवासीय कालोनी के
रहवासी धनप्रसाद अहिरवार को
आरोपियों ने मिट्टी का तेल
डालकर आग लगा दी और दरवाजे की
कुंडी भी बंद कर दी ताकि वो
किसी भी प्रकार से बच न पाए।
उसे साठ फीसदी जल जाने के बावजूद
सरकार से कोई मदद नहीं मिली
है। सरकार यदि उसे न्याय दिलाने
के लिए गंभीर होती तो उसे
सफदरजंग दिल्ली की बर्न यूनिट
में भर्ती करवाती और बेहतर
इलाज कराती। उसे बुंदेलखंड
मेडीकल कालेज की सिफारिश के
बाद हमीदिया अस्पताल के सामान्य
वार्ड में रखा गया है। इससे
सरकार के दलित विरोधी चेहरे
की असलियत उजागर हो गई है।
श्री
आर्य ने बताया कि भाजपा प्रदेश
अध्यक्ष राकेश सिंह ने इस
मामले को गंभीरता से लिया और
पीड़ित को न्याय दिलाने के
लिए एक टीम भी गठित की है। इस
टीम में श्री आर्य के साथ सागर
के विधायक शैलेन्द्र जैन,
नरयावली विधायक
प्रदीप लारिया और सूरज कैरों
व अन्य लोग घटना स्थल पर गए
थे। उन्हें बताया गया कि दो
दिन पहले बच्चों का विवाद
पुलिस थाने भी पहुंचा था लेकिन
पुलिस ने मामले को गंभीरता
से नहीं लिया। इसके बाद कालोनी
के ही छुट्टू, अज्जू
पठान, कल्लू
और इरफान ने कैरोसिन डालकर
धनप्रसाद को जिंदा जला दिया।
आज वह जीवन और मौत के बीच झूल
रहा है।
भाजपा
की ओर से श्री आर्य ने बताया
कि कांग्रेस की सरकार बनने
के बाद प्रदेश में दलितों पर
अत्याचार बढ़ रहे हैं। कांग्रेस
के नेता अपना खोया वोट बैंक
वापस पाने के लिए दलित समाज
के ऐसे लोगों को निशाना बना
रही है जिन्होंने दलितों को
वोट बैंक समझे जाने वाली राजनीति
का विरोध किया है। इसके लिए
वे मुस्लिमों को ढाल बनाकर
दलितों के बीच फूट डालने का
काम कर रहे हैं।
उधर
सागर विधायक शैलेन्द्र जैन
का कहना है कि पुलिस ने समय पर
कार्रवाई की होती तो अपराधियों
में खौफ होता और वे इस तरह की
वारदात करने की हिम्मत नहीं
जुटा पाते। प्रदेश की कानून
व्यवस्था खराब होने की वजह
से ये स्थितियां निर्मित हुई
हैं।
भारत
पर 514 अरब
डॉलर का कर्ज है और इस कर्ज का
अधिकतर हिस्सा या तो अनुत्पादक
है या फिर उसके मुनाफे पर चंद
लोग ऐश कर रहे हैं। इस कर्ज का
अधिकांश हिस्सा विदेशी बैंकों
में छिपाकर रखा गया है।विदेशी
धन वापस लाने का वायदा करके
सत्ता में आई भाजपा की मोदी
सरकार के लिए यह विदेशी कर्ज
एक अबूझ पहेली बन गया है। पहले
कार्यकाल में तो प्रधानमंत्री
नरेन्द्र मोदी ने टैक्स हैवन
देशों से नई संधियां करके
विदेशी बैंकों में रखे धन के
मालिकों को ढूंढ़ने का भरपूर
जतन किया। इसके बावजूद सरकार
को अधिक सफलता नहीं मिली। ये
जरूर पता चल गया कि बैंकों की
85 फीसदी
कर्ज की रकम जिन उद्योपतियों
ने गड़प ली है वे भारत में ही
सक्रिय हैं और फर्जी कंपनियों
से धन का उपयोग कर रहे हैं।
सरकार ने फर्जी कंपनियों को
भी ढूंढ़ निकाला और उनका धन
बरामद कर लिया। इसके बावजूद
जिस धन को शोधन के बाद बाकायदा
सीए की मंजूरी के बाद कंपनियों
में निवेश किया गया है उनसे
धन की वसूली की प्रक्रिया देश
भर में अपनाई जा रही है। कमलनाथ
सरकार भी उस व्यवस्था का हिस्सा
हैं जो देश में काले धन की
खोजबीन में जुटे हैं। उनसे
ये उम्मीद की जाती रही है कि
वे अपना काम जिम्मेदारी से
करेंगे और काला धन उजागर करने
में सहयोगी की भूमिका निभाएंगे।
इसके
विपरीत कमलनाथ की भूमिका
प्रोपेगंडा से अधिक साबित
नहीं हो रही है। वे शुद्द के
लिए युद्ध और भू माफिया के
विरुद्ध जिस तरह से अभियान
चला रहे हैं उसे लेकर वे ये
जताने का प्रयास कर रहे हैं
कि वे काले धन की वसूली के
प्रयास कर रहे हैं। वास्तव
में उनकी भूमिका देश से काला
धन उजागर करने की मुहिम को
पंचर करना अधिक नजर आ रहा है।
उन्होंने जिस तरह रेत के ठेकों
में देश की पूंजी हड़पने वाले
फर्जी उद्योगपतियों की भीड़
जुटाई है उसे देखकर उनकी भूमिका
की असलियत आसानी से समझी जा
सकती है। जिस रेत कारोबार से
प्रदेश को 250 करोड़
रुपए की आय होती थी और बाद में
इसे शिवराज सरकार ने मुक्त
कर दिया उससे कमलनाथ 1200
करोड़ रुपए
की आय होने की कहानियां सुना
रहे हैं। उनकी सरकार का कहना
है कि रेत माफिया पर अंकुश
लगाकर ये आय की जा रही है। इस
कारोबार के पुराने खिलाड़ी
धंधे से बाहर कर दिए गए हैं और
जिला स्तर पर नए ठेकेदारों
को खदानें आबंटित की गई हैं।
रेत खदानों के ठेके लेने वालों
में वे लोग शामिल हैं जिन पर
देश का अरबों रुपया जीम जाने
का आरोप है।
सरकार
ने जिन रेड्डी बंधुओं को रेत
कारोबार का सहयोगी बनाया है
और राज्य के लिए आय देने वाला
बताया जा रहा है उन रेड्डी
बंधुओं की असलियत कुछ और है।
मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़
और महाराष्ट्र की पुलिस उन्हें
सरगर्मी से तलाश रही है। उन
पर हजारों लोगों को झांसा देकर
उनके साथ बैंक धोखाघड़ी करने
का आरोप है।इसके बावजूद कमलनाथ
सरकार उन्हें राज्य को आय
कराने वाला निवेशक बता डाला
है। जो लोग बैंकों का हजारों
करोड़ रुपया पौंजी स्कीमों
से हड़प चुके हैं वे प्रदेश
को कितनी और कैसी आय कराएंगे
ये तो आने वाले समय में पता
चलेगा लेकिन तब तक कमलनाथ
सरकार ने उन्हें पुलिस से
रक्षा कवच जरूर उपलब्ध करा
दिया है।
इसके
विपरीत भारत सरकार का ध्यान
बंटाने के लिए राज्य सरकार
माफिया को ध्वस्त करने की
मुहिम चला रही है। इस मुहिम
में सैकड़ों निर्दोष व्यापारियों
और बिल्डरों की बलि चढ़ाई जा
रही है। राज्य सरकार की इस
मुहिम में अफसर, जज
और पुलिस सभी शामिल हैं। जिस
तरह की रिपोर्ट के आधार पर आम
नागरिकों को भयंकर माफिया,
मिलावटखोर,
जमाखोर बताया
जा रहा है वे आने वाले समय में
आपातकाल से भी ज्यादा भयावह
प्रताड़ना की असलियत सामने
लाने लाएंगे। लेकिन इससे
प्रदेश की विकास यात्रा बुरी
तरह तहस नहस हो रही है। जो लोग
छुटपुट कारोबार करके हजारों
लोगों को रोजगार देने का काम
कर रहे थे वे भी खुद को असहाय
महसूस कर रहे हैं। सरकार की
मुहिम से बचने के लिए व्यापारियों
ने न केवल भारी भरकम टैक्स
चुकाना जारी रखा है बल्कि वे
राजनीतिक चंदे की मुंहमांगी
रकम भी देने को मजबूर किए जा
रहे हैं। जिन लोगों को माफिया
बताकर प्रशासन ने उनके ठिकाने
तहस नहस कर डाले हैं उनमें से
अधिकतर केवल दस्तावेजों की
कमी की वजह से निशाना बने हैं।
जिन अफसरों और दलालों ने उन्हें
झांसा देकर कारोबार बढ़ाने
में मदद की अब वही लोग उन्हें
माफिया साबित करने में जुटे
हुए हैं।
सरकार
की इस मुहिम से आम जनता परेशान
है और काला धन बनाने वाला माफिया
अपनी बुलंदियां छू रहा है।
वह न केवल काला धन बचाने में
सफल हो रहा है बल्कि निर्दोष
लोगों को डरा धमकाकर उनसे अवैध
वसूलियां भी कर रहा है। ये
हालत कमोबेश वैसी ही है जैसे
कभी इंदिरा गांधी के आपातकाल
के दौरान सामने आई थी। बेशक
कमलनाथ कह रहे हैं कि निर्दोष
लोगों को घबराने की जरूरत नहीं
है लेकिन जब प्रशासन और तंत्र
उन्हें आरोपी बना देता है तब
वे अपनी बेगुनाही साबित ही
नहीं कर पाते और सरकार के
दमनचक्र का शिकार हो जाते हैं।
ऐसे
ही एक पनीर कारोबारी के विरुद्ध
हाईकोर्ट ने बाईस पेज का फैसला
दिया और उसे दोषी बताते हुए
मामले की सुनवाई अधिक जजों
की खंडपीठ से कराने का निर्देश
दिया। जिस मामले को कोई बच्चा
भी षड़यंत्र पूर्वक रचा गया
बता सकता है उसे हाईकोर्ट
मानने तैयार नहीं है। हाईकोर्ट
के ही एक विद्वान न्यायाधीश
कह रहे हैं कि वह व्यक्ति
निर्दोष है और उसे बरी किया
जाना चाहिए लेकिन दूसरे जज
केवल अपना तमगा बढवाने और
कमलनाथ की गुड बुक में आने के
लिए अपनी विद्वत्ता का प्रदर्शन
किए जा रहे हैं।
वास्तव
में समय आ गया है जब देश की
सर्वोच्च संस्थाएं इन मामलों
पर गौर करें और राज्य सरकार
की पक्षपातपूर्ण नीतियों पर
लगाम लगाएं। ये तो साफ हो चुका
है कि मध्यप्रदेश एक बार फिर
आपातकाल दो के दौर से गुजर रहा
है लेकिन ये आपातकाल भारत की
मानवता के लिए कलंक न बन जाए
इसके लिए आगे बढ़कर इस पर रोक
लगाना समय की मांग बन गई है।
खंडवा(अनवर मंसूरी)। इंदिरा सागर बांध जलाशय में मत्स्य आखेट का कार्य कर रही सिमरन फिशरीज के कर्मचारियों की गुंडागर्दी देखने को मिली जिसमे उंडेल के एक युवक रामू नायक को मछली चोरी के शक में पकड़ कर बेरहमी से पीटा गया है।
सोशल मीडिया में जारी वीडियो में सिमरन फिशरीज के कर्मचारी युवक से मारपीट करते नजर आ रहे हैं। मामला जावर थाना क्षेत्र के उंडेल गाँव का है। मारपीट करने वाले सिमरन फिशरीज के दबिश इचार्ज सुंदरेश ओर उनकी टीम बताई जा रही है। जिनके खिलाफ पुलिस ने नामजद केस दर्ज किया है।
जावर थाने के अनुसार मामला 2 दिन पुराना बताया जा रहा है। मारपीट का वीडियो वायरल होने के बाद ग्रामीणों का गुस्सा फूटा और वे थाना जावर पहुंचे। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ मामला कायम करके छानबीन शुरु कर दी है।
इधर मारपीट का शिकार हुए युवक का हाथ हुआ फेक्चर है। और उसे गंभीर चोटें आई है।
मध्यप्रदेश एटीएस को बड़ी सफलता, सिमी के दो सदस्य दो दिन के भीतर पकड़े
भोपाल,13 दिसंबर (प्रेस सूचना केन्द्र)। मध्यप्रदेश पुलिस के आतंक विरोधी दस्ता (एटीएस) को बड़ी कामयाबी मिली है। एटीएस ने दो दिन के भीतर प्रतिबंधित संगठन सिमी के दो सस्दयों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार किये गए सिमी सदस्यों में एजाज व इलियास शामिल हैं। आरोपी एजाज पिछले 13 वर्षों से एवं आरोपी इलियास पिछले 18 वर्षों से फरार था। विभिन्न राज्यों की गुप्तचर एजेंसियों को इन दोंनों आरोपियों की तलाश थी।
अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक एटीएस श्री राजेश गुप्ता ने बताया कि सिमी के सदस्य एजाज शेख पिता मोहम्मद अकरम निवासी जाकिर हुसैन मार्ग बुरहानपुर को एटीएस ने पुख्ता सूचना के आधार पर गत 12 दिसंबर को पाला बाजार बुरहानपुर से पकड़ा है। एजाज के खिलाफ एटीएस मुंबई में विधिविरूद्ध क्रियाकलाप निवारण अधिनियम की धारा 10,13 के तहत आरोप दर्ज है। गिरफ्तारी के बाद आरोपी एजाज को सीजेएम न्यायलय बुरहानपुर में पेश किया गया है। साथ ही महाराष्ट्र एटीएस को भी उसकी गिरफ्तारी के संबंध में सूचना दे दी गई है।
मध्यप्रदेश एटीएस द्वारा इसी तरह दिल्ली स्पेशल सेल की मदद से आरोपी इलियास शेख पिता मोहम्मद अकरम निवासी शाहीन नगर ओखला दिल्ली को 13 दिसंबर को दिल्ली से गिरफ्तार किया गया है। इलियास के खिलाफ बुरहानपुर थाना कोतवाली में भारतीय दंड विधान की धारा 153ए एवं विधिविरूद्ध क्रियाकलाप निवारण अधिनियम की धारा 11,13 के तहत प्रकरण दर्ज है। साथ ही एटीएस थाना मुंबई में भी इलियास के खिलाफ विधिविरूद्ध क्रियाकलाप निवारण अधिनियम की धारा 11,13 के तहत प्रकरण कायम है।
अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक एटीएस श्री गुप्ता ने बताया कि इलियास को फिलहाल मुंबई एटीएस को सौंपा गया है। इसे बुरहानपुर कोतवाली में दर्ज प्रकरण में रिमांड पर लिया जाएगा। अन्य सूत्र बताते हैं कि दोनों आतंकी एहतेशाम सिद्दीकी और अब्दुल सुभान कुरैशी उर्फ तौकीर के साथ जुड़े थे.
लगभग चौदह साल का शिव राज प्रशासनिक तौर पर प्रदेश का सबसे लचर शासनकाल कहा जा रहा है। जबकि शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश को परिवार की तरह चलाया। सबको काम करने और आगे बढ़ने का अवसर दिया। शिवराज की इस शासनशैली से आम नागरिकों ने तो संतोष महसूस किया लेकिन कांग्रेस का कहना है कि शिव के राज में माफिया ताकतों ने अपना आतंक फैला रखा था । अब मुख्यमंत्री कमलनाथ की सरकार ने प्रदेश के लगभग बीस माफिया ताकतों को कथित तौर पर पहचाना है। वह अब माफिया के विरुद्ध संघर्ष का ऐलान कर रही है। इस कड़ी में उसने इंदौर से लोकस्वामी अखबार के संपादक जीतू सोनी को खलनायक की तरह पेश करने का अभियान चलाया है। उसके जीतू सोनी के लगभग छह ठिकाने धराशायी कर दिये गए हैं। होटल से लेकर घर और ऐसे तमाम परिसरों पर तोड़फोड़ की गई जिन पर जीतू सोनी का दावा रहा है। सरकार की इस कार्रवाई से प्रदेश के लोग हैरान हैं। प्रेस जगत के लोग भी खासे खफा हैं। जिन्होंने जीतू सोनी की कार्यशैली देखी है वे उसे एक सदाशयी पत्रकार के रूप में जानते हैं। ऐसा बहादुर जिसने सत्ता के बुलंद बुर्जों की काली करतूतें भी ठप्पे से अपने अखबार में प्रकाशित कीं। जीतू सोनी का साम्राज्य पिछले तीस सालों में तमाम झंझावातों के बीच लगातार बढ़ता चला। कांग्रेस की सरकारें हों या भाजपा की सभी ने उनकी पत्रकारिता को सलाम किया और उनके डांसबार को एक उपयोगी कारोबार माना। उनके होटल माईहोम को शराब पिलाने का लाईसेंस प्राप्त था। वह होटल पुलिस प्रशासन,अफसरों और अपराधियों सभी का लोकप्रिय स्थान रहा है। मुंबई की तर्ज पर न केवल इंदौर बल्कि प्रदेश और देश भर के बिगड़े नवाब इस डांस बार में आते रहे हैं। जीतू सोनी अच्छे व्यवस्थापक रहे और उन्होंने बार बालाओं समेत इस कारोबार से जुड़े लोगों को सुरक्षित ठिकाना उपलब्ध कराया। शराबखोरी के बीच होने वाली गुंडागर्दी को नियंत्रित करने के लिए उनके पास बाऊंसर्स की टीम थी। इसके बावजूद उन्होंने कभी प्रशासन से टकराव नहीं लिया। अब कमलनाथ सरकार खजाना खाली होने का शोर मचाकर समाज के सभी तबकों से वसूली अभियान चला रही है। शुद्ध के लिए युद्ध अभियान की आड़ में व्यापारियों के चंदा और टैक्स वसूली का अभियान चलाया गया। इसके बाद अब सरकार कथित तौर पर माफिया के विरुद्ध अभियान चला रही है। दरअसल सरकार का लक्ष्य प्रदेश से राजस्व संग्रहण की उगाही बढ़ाना तो है ही साथ में कांग्रेस का पार्टी फंड भी जुटाया जा रहा है। यह काम गुंडागर्दी के किया जा रहा है और इसके लिए आड़ जनता की ली गई है। शुद्ध के लिए युद्ध अभियान में जिन्होंने चंदा दिया और टैक्स भरना शुरु कर दिया उनके विरुद्ध तो कोई कार्रवाई नहीं की गई लेकिन जिन्होंने न चंदा दिया और न ही टैक्स भरने का तंत्र विकसित किया उनके विरुद्ध रासुका जैसी कार्रवाईयां की गईं। इस दौरान कई व्यापारियों के तो कारोबार बंद हो गए और उससे जुड़े कर्मचारी भी बेरोजगार हो गए। जीतू सोनी को पुलिस और प्रशासन गुंडातत्वों पर नियंत्रण पाने के लिए इस्तेमाल करता रहा है। जो काम पुलिस या निगम प्रशासन नहीं कर पाता वह जीतू सोनी के बाऊंसर्स की मदद से पूरे कराए जाते थे।पहली बार पुलिस ने अपने ही पाले पोसे इस तंत्र के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की है। जीतू सोनी पर तेईस मुकदमे लाद दिए गए हैं,तीस हजार रुपए का इनाम घोषित कर दिया गया है,विदेश भागने पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी चल रही है। ऐसा करके कमलनाथ सरकार कानून के सहारे अपना आतंक का राज स्थापित करना चाह रही है। जीतू सोनी के अखबार लोकस्वामी ने हनी ट्रेप कांड की किस्तें छापनी शुरु कीं थीं। अफसरों और नेताओं के जिस गठजोड़ ने सरकार में रहकर प्रदेश के कर्ज के दलदल में धकेला और भ्रष्टाचार के माध्यम से भारी धन जुटाया वे अय्याशी में लिप्त हो गए। जीतू सोनी को पुलिस और प्रशासन ने जिस जिम्मेदारी के लिए तैयार किया था उन्होंने वह बखूबी निभाई। अय्याशियों की ये खबर उनके अखबार ने जैसे ही छापना शुरु की सत्ता शीर्ष के इंद्र का सिंहासन डोल गया। मंत्रालय के कई अफसरों को लगा कि यदि वे चुप रहे तो उनकी तो भद पिट जाएगी। नतीजतन उन्होंने पुलिस का इस्तेमाल करके जीतू सोनी को धराशायी करने की मुहिम चला दी। पिछले तीस सालों से जो जीतू सोनी समाज का उपयोगी उपकरण था वो आज कुख्यात माफिया बना दिया गया है। अखबारों के बीच भी आतंक फैल गया है। भारत सरकार के कार्पोरेट कार्य मंत्रालय से अरबों रुपयों का लोन जुटाकर जो कथित बड़े अखबार प्रकाशित हो रहे हैं उनकी तो औकात भी नहीं थी कि वे अपने समान भ्रष्टाचार की गंगा में नहाने वाले सत्ताधीशों पर कीचड़ उछाल सकें। यही वजह है कि वे कथित बड़े अखबार सरकार की कार्रवाई को सही ठहराने में जुट गए। अवसरवादी पत्रकारों के एक समूह ने भी इस अवसर को लपक लिया और वे जीतू सोनी को खलनायक बताने वाली कहानियां छापने दिखाने लगे। इसके बावजूद आज पत्रकारों का बड़ा तबका सरकार की कार्रवाई से खफा है। वह जानता है कि सरकार उन भ्रष्ट और अय्याश अफसरों नेताओं के नेटवर्क को बचाने का काम कर रही है जिन्होंने विकास के नाम पर प्रदेश को बेचने का काम किया है। जीतू सोनी को अपराधी बताने वालों को तय करना होगा कि समाज की वैचारिक गंदगी को साफ करने वाला लोकस्वामी ज्यादा बड़ा अपराधी है या फिर प्रदेश को अरबों रुपयों के कर्ज में डुबाने वाले गद्दार नेता, अफसर या ठेकेदार । आज मध्यप्रदेश विकास के पथ पर दौड़ रहा है। उसे काली अर्थव्यवस्था के पथ पर दौड़ाने वाले नेता, अफसर,ठेकेदार न केवल प्रदेश बल्कि देश की विकास यात्रा को भी क्षति पहुंचा रहे हैं। जब हिंदुस्तान पांच ट्रिलियन डालर की इकानामी बनने को अग्रसर है तब सत्ता माफिया प्रदेश के आय के संसाधनों पर कब्जा जमाने की जंग लड़ रहा है। कमलनाथ सरकार जाने अनजाने में इस वैश्विक माफिया का औजार बन रही है। सरकार के ये कार्यकलाप अवश्य ही निंदनीय हैं। कमलनाथ सरकार तब समानांतर अर्थव्यवस्था को फूलने फलने का अवसर दे रही है जब नोटबंदी के बाद भारत सरकार ने रुपये की ताकत बढ़ाने का अभियान चलाया था। देश की नीतियों से इस टकराव के बीच प्रदेश की विकास यात्रा क्षतिग्रस्त हो रही है। सरकार को अपने फैसले पर फिरसे चिंतन करना चाहिए। सरकार पर माफिया का शिकंजा इसी तरह बढ़ता रहा तो आने वाले समय में ब्राजील या इटली की तरह माफिया सरकार से भी बड़ी ताकत बन जाएगा जो घातक सिद्ध होगा।
भोपाल,30 सितंबर(दुर्गेश रायकवार)भारतीय संस्कृति और परम्परा हमेशा से गौरवशाली रही है। हमारे परिवारों में बच्चों को देवतुल्य माना गया है। यह माना जाता है कि उनका मन कच्ची माटी सा होता है और उसे जिस सांचे में ढालो, वह वैसा ही बन जाता है। नन्हीं बच्चियों को लेकर हमारा समाज अपने जन्म से संवेदनशील रहा है लेकिन बदलते दौर में सारे मानक बदल रहे हैं और हमारी गौरवशाली संस्कृति और परम्परा को घात पहुंचा रहे हैं। इन विपरीत और शर्मनाक स्थिति को नियंत्रण में करने के लिए कानून सख्त से सख्त कदम उठाता रहा है। बच्चों के साथ जिस तरह से बर्बर यौन व्यवहार किया जा रहा है, वह भारतीय समाज के लिए शर्मनाक है। बच्चों को यौन उत्पीडऩ से बचाने के लिए वर्ष 2012 में एक कानून बनाया गया था जिसे पॉक्सो कानून यानी की प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट 2012 जिसको हिंदी में लैंगिक उत्पीडऩ से बच्चों के संरक्षण का अधिनियम 2012 कहा जाता है। इस कानून के बाद भी अपराधों में कमी नहीं आने के कारण कानून को और सख्त बनाया गया है। हाल ही में 2019 में पाक्सो एक्ट में संशोधन कर अपराधी को दंड दिए जाने के लिए कड़े प्रावधान किए गए हैं।
प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट 2012 के तहत अलग-अलग अपराध में पृथक-पृथक सजा का प्रावधान है। और यह भी ध्यान दिया जाता है कि इसका पालन कड़ाई से किया जा रहा है या नहीं। इस अधिनियम में सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय बाल संरक्षण मानकों के अनुरूप प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति यह जानता है कि किसी बच्चे का यौन शोषण हुआ है तो उसे इसकी रिपोर्ट नजदीकी थाने में देनी चाहिए, यदि वो ऐसा नहीं करता है तो उसे छह महीने के कारावास और आर्थिक दंड से दंडित किया जा सकता है।
उल्लेखनीय है कि 18 साल से कम किसी भी मासूम के साथ अगर दुराचार होता है तो वह पॉक्सो एक्ट के तहत आता है। इस कानून के लगने पर तुरंत गिरफ्तारी का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त अधिनियम की धारा 11 के साथ यौन शोषण को भी परिभाषित किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि यदि कोई भी व्यक्ति अगर किसी बच्चे को गलत नीयत से छूता (बेड टच करता) है या फिर उसके साथ गलत हरकतें करने का प्रयास करता है या उसे पोर्नोग्राफी दिखाता है तो यह धारा 11 के तहत दोषी माना जाएगा। इस धारा के लगने पर दोषी को तीन साल तक की सजा हो सकती है।
इस कानून की धारा चार में वो मामले आते हैं जिसमें बच्चे के साथ कुकर्म या फिर दुष्कर्म किया गया हो। इस अधिनियम में सात साल की सजा से लेकर उम्रकैद तक का प्रावधान है, साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है। धारा छह के अंतर्गत वो मामले आते हैं जिनमें बच्चों के साथ कुकर्म, दुष्कर्म के बाद उनको चोट पहुँचाई गई हो। इस धारा के तहत 10 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है। अगर धारा सात और आठ की बात की जाए तो उसमें ऐसे मामले आते हैं जिनमें बच्चों के गुप्तांग में चोट पहुँचाई जाती है। इसमें दोषियों को पाँच से सात साल की सजा के साथ जुर्माना का भी प्रावधान है।
पाक्सो एक्ट बाल संरक्षक की जिम्मेदारी पुलिस को सौंपता है। इसमें पुलिस को बच्चे की देखभाल और संरक्षण के लिए तत्काल व्यवस्था बनाने की जिम्मेदारी दी जाती है। जैसे बच्चे के लिए आपातकालीन चिकित्सा उपचार प्राप्त करना और बच्चे को आश्रय गृह में रखना इत्यादि। पुलिस की यह जिम्मेदारी बनती है कि मामले को 24 घंटे के अंदर बाल कल्याण समिति की निगरानी में लाए जिससे समिति बच्चे की सुरक्षा और संरक्षण के लिए जरूरी कदम उठा सके।
इस अधिनियम में बच्चे की मेडिकल जाँच के लिए प्रावधान भी किए गए हैं। यह भी निर्देश हैं कि जाँच बच्चे के लिए कम से कम पीड़ादायक हो। मेडिकल जाँच बच्चे के माता-पिता या किसी अन्य व्यक्ति की उपस्थिति में किया जाना चाहिए, जिस पर बच्चे का विश्वास हो और बच्ची की मेडिकल जाँच महिला चिकित्सक द्वारा ही की जानी चाहिए। अधिनियम में इस बात का ध्यान रखा गया है कि न्यायिक व्यवस्था के द्वारा फिर से बच्चे पर किसी भी प्रकार का दबाव नहीं बनाया जाए। इस नियम में केस की सुनवाई एक विशेष अदालत द्वारा बंद कमरे में कैमरे के सामने दोस्ताना माहौल में किया जाने का प्रावधान है। इस दौरान बच्चे की पहचान गुप्त रखने की कोशिश की जानी चाहिए। पुलिस की यह जिम्मेदारी बनती है कि मामले को 24 घंटे के अन्दर बाल कल्याण समिति की निगरानी में लाये। विशेष न्यायालय, उस बच्चे को दिए जाने वाली मुआवजा राशि का निर्धारण कर सकता है, जिससे बच्चे के चिकित्सा उपचार और पुनर्वास की व्यवस्था की जा सके। अधिनियम में यह कहा गया है कि बच्चे के यौन शोषण का मामला घटना घटने की तारीख से एक वर्ष के भीतर निपटाया जाना चाहिए।
पॉक्सो अधिनियम में संशोधन बाल यौन अपराध के पहलुओं से उचित तरीके से निपटने के लिए किया गया है। एक आधिकारिक बयान में कहा गया है कि अधिनियम की धारा 4, 5 और 6 में संशोधन किए जाने का प्रस्ताव किया गया है, ताकि बच्चों का आक्रामक यौन उत्पीडऩ करने के मामले में मौत की सजा सहित कठोर सजा का प्रावधान हो सके। इसमें कहा गया है कि यह संशोधन, देश में बाल यौन अपराध की बढ़ती हुई प्रवृत्ति को रोकने के लिए कठोर उपाय करने की जरूरत के तहत, किया जा रहा है। इसके मुताबिक अधिनियम में 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा परिभाषित किया गया है। यह लैंगिक रूप से निरपेक्ष कानून है। संशोधन में प्राकृतिक संकटों और आपदाओं के समय बच्चों के यौन अपराधों से संरक्षण और आक्रामक यौन अपराध के उद्देश्य से बच्चों की जल्द यौन परिपक्वता के लिए उन्हें किसी भी तरीके से हार्मोन या कोई रासायनिक पदार्थ देने के मामले में अधिनियम की धारा 9 में संशोधन किया गया है।
इस कानून के तहत बच्चों का यौन उत्पीडऩ करने वाले दोषियों को उम्रकैद के साथ मौत की सजा का प्रावधान किया गया है। कानून में बच्चों का यौन उत्पीडऩ करने के उद्देश्य से उन्हें दवा या रसायन आदि देकर जल्दी युवा करने को गैर जमानती अपराध बनाया गया है। इस अपराध के लिए पाँच साल तक की कैद का प्रावधान है।
बाल पोर्नोग्राफी की बुराई से निपटने के लिए पॉक्सो अधिनियम, 2012 की धारा 14 और धारा 15 में भी संशोधन किया गया है। बच्चों से संबद्ध पोर्नोग्राफिक सामग्री को नष्ट नहीं करने/डिलीट नहीं करने पर जुर्माना लगाने का प्रस्ताव किया गया है। साथ ही, इस तरह की चीजों को अदालत में साक्ष्य के तौर पर पेश करने सहित कुछ मामलों को छोड़ कर अन्य किसी भी तरह के इस्तेमाल में जेल या जुर्माना, या दोनों सजा हो सकती है।
नए प्रावधान में चाइल्ड पोर्नोग्राफी की परिभाषा तय की गई है, जिसमें चाइल्ड पोर्नोग्राफी की फोटो, वीडियो, कार्टून या फिर कंप्यूटर जेनरेटेड इमेज को दंडनीय अपराध की जद में लाया गया है। इससे जुड़ी सामग्री रखने पर 5000 से लेकर 10 हजार रुपये तक के जुर्माने के दंड की व्यवस्था की गई है। लेकिन अगर कोई ऐसी सामग्री का व्यवसायिक इस्तेमाल करता है तो उसे जेल की सख्त सजा होगी।
इसमें व्यापारिक उद्देश्य के लिए किसी बच्चे की किसी भी रूप में पोर्नोग्राफिक सामग्री का भंडारण करने या उस सामग्री को अपने पास रखने के लिए दंड के प्रावधानों को अधिक कठोर बनाया गया है। यह संशोधन देश में बाल यौन उत्पीडऩ की बढ़ती प्रवृत्ति को रोकने की जरूरत के तहत सख्त उपाय करने के लिए किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश देते हुए कहा है कि वह हर जिले में विशेष न्यायालयों की स्थापना करें। इनकी स्थापना ऐसे जिलों में की जानी चाहिए जहाँ अधिनियम के तहत 100 या उससे अधिक मामले लंबित हैं। कोर्ट ने कहा कि विशेष अदालतों को 60 दिनों के अंदर-अंदर बच्चों पर यौन उत्पीडऩ के मामलों की सुनवाई शुरू करने की कोशिश करनी चाहिए। साथ ही यह भी कहा है कि वह चार हफ्तों में इसकी प्रगति रिपोर्ट दाखिल करें। यह अधिनियम पूरे भारत पर लागू होता है, पॉक्सो कानून के तहत सभी अपराधों की सुनवाई, एक विशेष न्यायालय द्वारा कैमरे के सामने बच्चे के माता पिता या जिन लोगों पर बच्चा भरोसा करता है, उनकी उपस्थिति में होती है।
पाक्सो एक्ट को और सख्त बनाये जाने के बाद बच्चों को अधिक सुरक्षा की उम्मीद की जा सकती है। कानून के साथ-साथ इस दिशा में सामाजिक जागरूकता की भी आवश्यकता है। बच्चों के साथ दुर्व्यहार रोकने के लिए सबको सजग होना होगा क्योंकि जागरूकता से ही अपराधों पर नियंत्रण पाया जा सकेगा।
भोपाल,28
सितंबर(प्रेस
सूचना केन्द्र)।
मध्यप्रदेश में कांग्रेस की
सरकार आने के बाद मोबाईल लूट
और चैन खींचने की घटनाओं में
तेजी से इजाफा हुआ है। इससे
निपटने के लिए पुलिस ने मोबाईल
खोजने की यूनिट को पुरानी
विधानसभा के सामने स्थित नए
कंट्रोल रूम में कंप्यूटरीकृत
सेंटर में शिफ्ट कर दिया है।
मोबाईल
लुटेरों से निपटने के लिए बनाए
इस नए ठिकाने पर गुमशुदा
मोबाईलों की सर्च की व्यवस्था
की गई है। पुलिस की साईबर सेल
यूनिट ने बढ़ती मोबाईल लूट
की घटनाओं के मद्देनजर ये
सेंटर जन सुविधा केन्द्र के
रूप में विकसित किया है जबकि
मोबाईल नेटवर्क के विश्लेषण
की जिम्मेदारी साईबर क्राईम
विंग को दी गई है।
राजधानी
के सभी सार्वजनिक स्थलों पर
मोबाईल लुटेरों ने अपनी
गतिविधियां बढ़ा दीं हैं। वे
बेखौफ होकर जेबकतरी,
मोबाईल चोरी
और चैन स्नेचिंग जैसी वारदातों
को अंजाम दे रहे हैं। इन सभी
स्थानों पर सरकारी प्रबंधन
ने न तो कैमरों की व्यवस्था
की है और न ही निगरानी तंत्र
विकसित किया है। पुलिस की
कार्यप्रणाली भी फील्ड आधारित
नहीं रही है इसलिए लुटेरों
के हौसले बुलंद होते जा रहे
हैं।
खासतौर
पर आरटीओ दफ्तर, अस्पतालों
और हाट बाजारों में जेबकतरों
के गिरोह बेखौफ होकर वारदातें
कर रहे हैं जिनके सामने पुलिस
पूरी तरह असहाय साबित हो रही
है। पुलिस प्रशासन के निकम्मेपन
का ही नतीजा है कि चोरी किए गए
अधिकतर मोबाईल ढूंढ़े नहीं
जा सके हैं। भोपाल पुलिस ने
गुम मोबाईल की रिपोर्ट लिखवाने
के लिए नए पुलिस कंट्रोल रूम
की तीसरी मंजिल पर पूरी यूनिट
शुरु की है।
भोपाल
जिले की सीमा में मोबाईल गुम
हो जाने पर सूचनाएं इसी नए
कंट्रोल रूम के सेंटर पर जमा
किए जा रहे हैं। भोपाल पुलिस
की वेवसाईट www.bhopalpolice.com/lostphone.html
पर जो फार्म
दिया गया है उसकी दो प्रतियों
में यहां शिकायत की जा सकती
है। आवेदन प्रस्तुत करते समय
वोटर कार्ड या अन्य किसी पहचान
पत्र के साथ मोबाईल बिल की
फोटोकापी भी प्रस्तुत करनी
होगी। दो प्रतियों में भरे
इस फार्म के अलावा संबंधित
थाने में दिए गए आवेदन की
फोटोकापी भी लगानी होगी। आवेदन
जमा करने का समय प्रातः 11
बजे से शाम 5
बजे तक है।
अवकाश के दिन आवेदन पत्र जमा
नहीं किए जाएंगे। मोबाईल मिलने
पर फार्म में दिए गए नंबरों
पर सूचना भेजी जाएगी। ध्यान
रहे यहां मोबाईल गिर जाने या
फिर गुम जाने पर ही फार्म लिया
जाएगा। मोबाईल चोरी या छीने
जाने की रिपोर्ट संबंधित पुलिस
थाने में ही करनी होगी।
अब
इस नई व्यवस्था के चलते क्राइम
ब्रांच में साइबर मामलों की
जांच नहीं होगी. वहीं
पेंडिंग 1530 मामलों
को भी क्राइम ब्रांच से साइबर
क्राइम ब्रांच में ट्रांसफर
कर दिया गया है.दो
साल में क्राइम ब्रांच के पास
पहुंची 1530 शिकायतों
को अब साइबर क्राइम ब्रांच
को सौंपा गया है. इस
ब्रांच की जिम्मेदारी एएसपी
संदेश जैन को दी गई. जिले
में सात एएसपी रैंक के अधिकारियों
के पदों में से ये भी एक पद है.
एससपी संदेश
जैन ने बताया कि क्राइम ब्रांच
पहुंचने वाले फरियादी साइबर
क्राइम ब्रांच आना शुरू हो
गए हैं. एक
दिन में करीब 25 शिकायतें
आ रही हैं. शिकायतों
की जांच के लिए अलग-अलग
टीमों को जिम्मेदारी दी गई
है. जांच
को प्रभावी तरीके से कर निराकरण
भी कम समय में किया जा रहा है.
साइबर क्राइम
से जुड़ी शिकायतें पूरे मध्य
प्रदेश में लगातार बढ़ती जा
रही हैं. ऐसे
में पुलिस ने भी इस चुनौती से
निपटने के लिए जमीनी स्तर पर
काम करना शुरू कर दिया है.
अब प्रदेश स्तर
पर नहीं, बल्कि
जिला स्तर पर बनाई जा रही साइबर
क्राइम ब्रांच इससे जुड़े
अपराधों की जांच कर रही है.
इसकी शुरुआत
भोपाल से की गई. आने
वाले दिनों में दूसरे बड़े
महानगरों में जल्द शुरू किया
जाएगा.
भोपाल,1सितंबर(प्रेस
सूचना केन्द्र)।
क्वालिटी के मापदंडों को लेकर
रासुका लगाए जाने ले नाराज
व्यापारियों ने लामबंद होकर
सरकार के निर्णय का विरोध शुरु
कर दिया है। स्वास्थ्य मंत्री
तुलसी सिलावट से चर्चा के बाद
व्यापारियों ने सरकार की ओर
से चलाए जा रहे शुद्ध के लिए
युद्ध अभियान को अव्यावहारिक
बताया है। व्यापारियों का
कहना है कि सरकार यदि अपने
अभियान को तर्कसंगत नहीं
बनाएगी तो व्यापारियों की ये
नाराजगी गंभीर रूप ले लेगी।
कनफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट), खाद्य पेय एवं मिष्ठान विक्रेता संघ,नमकीन व्यापारी संघ,मावा व्यापारी संघ दूध डेरी प्रोडक्ट एसोसिएशन ने एकजुट होकर शनिवार को होटल पलाश मे पत्रकारवार्ता आयोजित रखी और अभियान की आड़ में व्यापारियों से की जा रही ज्यादतियों का विरोध किया। कैट के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कैलाश अग्रवाल ने बताया कि शासन एवं प्रशासन की ओर से व्यापारियों पर दर्ज किए जा रहे आपराधिक प्रकरणों और रासुका की कार्रवाई को लेकर संगठन ने मध्यप्रदेश शासन के मंत्री आरिफ अकील और तुलसी सिलावट जी से मुलाकात की थी। उन्होंने हमें आश्वासन दिया है कि अब व्यापारियों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज नहीं किए जाएंगे और रासुका की कार्रवाई नहीं होगी। व्यापारियों ने भी अपनी ओर से आश्वासन दिया कि वे मिलावट को जड़ से मिटाने में सरकार का पूरा सहयोग करेंगे।
कैट के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राधेश्याम माहेश्वरी कहा कि हम भी चाहते हैं कि मिलावट पूरी तरह से खत्म हो। साथ ही हम भी मिलावट खोरों के विरुद्ध चलाई जा रही मुहिम में सहयोग करेंगे। मिलावटियों की वजह से बाजार में कीमतों का निर्धारण नहीं हो पाता है जिससे उपभोक्ताओं को अच्छी गुणवत्ता का माल नहीं मिलता है।
कैट के प्रवक्ता विवेक साहू ने कहा की हम शासन एवं प्रशासन को यह भी कहना चाहते हैं कि आज यह बात समझने की जरूरत है कि हर व्यापारी मिलावट नहीं करता है। 100 में सिर्फ 5 फीसदी लोग ही ऐसे होंगे जो ये ग़लत काम करते है लेकिन ऐसे लोगो के कारण आज पूरा व्यापारी वर्ग जो 50-60सालो से ईमानदारी से काम करता आ रहा है एवं जिनकी तीन तीन पीढ़ियां अपने इस पेशे को बचाए रखने के लिए कार्य कर रही है वो सरकार के निशाने पर आ गए है और उसे भी जांच के नाम पर परेशान किया जा रहा है।उन्होंने कहा कि खाद्य सामग्री के नाम पर जो अपराधी तत्व नकली माल सप्लाई कर रहे हैं उन पर कार्रवाई से किसी को आपत्ति नहीं है लेकिन गुणवत्ता को आधार बनाकर व्यापारियों पर जो रासुका लगाई जा रही है वह अत्याचार है।मानवीय संवेदनाओं की हत्या है। यदि सरकार चाहे तो वह स्वयं दूध, मावा, मिठाई बनवाए और जनता को उपलब्ध कराए।
खाद्य पेय एवं मिष्ठान विक्रेता संघ के मुरली हरवानी ने कहा की हमारे व्यापारियों को भय के माहौल में कार्य करना पड़ रहा है। शासन को चाहिए कि वह हमें भयमुक्त वातावरण प्रदान करें और हम भी अपनी ओर से प्रयास करेंगे कि हम मिलावट अभियान में शासन का सहयोग करें।
पत्रकार वार्ता में कैट के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कैलाश अग्रवाल, राधेश्याम महेश्वरी, प्रवक्ता विवेक साहू मुरली हरवानी, मोहन शर्मा, संजीव अग्रवाल, राकेश जैन, संजय अग्रवाल, विजय नेमा, रमेश चंचल, पंकज टंग, कुबेर सिंह, रितेश विजयवर्गीय, शरद अग्रवाल, प्रमोद कुमार गुप्ता, मोहित सचदेव, प्रकाश राठौर, रमेश बनियानी, प्रदीप सोनी, प्रियंका अजमेरा, अजीत कुमार जैन, मुकेश साहू, दर्पण कुमार जैन, प्रेम यादव समेत कई अन्य व्यापारी भी उपस्थित थे।
भोपाल,25अगस्त(प्रेस सूचना केन्द्र)। पूर्व मंत्री डॉ.नरोत्तम मिश्रा की ललकार को अब हाईकोर्ट का भी संबल मिल गया है। बहुचर्चित ई टेंडर घोटाला अदालत की देहरी पर हवा हवाई साबित होने लगा है।साक्ष्यों के परीक्षण के बाद हाईकोर्ट ने प्रमुख आरोपी नंदकुमार ब्रह्मे की जमानत मंजूर कर ली है। इसके बाद अन्य आरोपियों के भी बच निकलने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। सत्तासीन कांग्रेस की ओर से प्रमुख विपक्षी दल को घेरने के लिए आरोप लगाए जा रहे थे अब उसके अरमानों पर पानी फिरता नजर आने लगा है।
जस्टिस
राजीव कुमार दुबे की सिंगल
बेंच ने ब्रह्मे की जमानत
याचिका मंजूर कर ली है। नंद
किशोर ब्रह्मे मध्यप्रदेश
स्टेट इलेक्ट्रानिक्स डेवलपमेंट
कार्पोरेशन भोपाल में ओएसडी
के पद पर तैनात थे। उन्हें
2012 में ई
टेंडर प्रक्रिया का नोडल
अधिकारी बनाया गया था। उन पर
आरोप है कि उन्होंने ई टेंडर
प्रक्रिया में घालमेल करके
कई ठेकेदारों को लाभ पहुंचाया।
वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल खरे और
अधिवक्ता अभिनव श्रीवास्तव
ने इस मामले की पैरवी की।
उन्होंने अदालत को बताया कि
टेंडर जारी करने की प्रक्रिया
से ब्रह्मे का कोई संबंध नहीं
था।
मध्य प्रदेश पुलिस
आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ
(ईओडब्ल्यू) ने
बीजेपी शासन के दौरान हुए कथित
ई-टेंडर घोटाले की
जांच के सिलसिले में पूर्व
मंत्री और बीजेपी नेता नरोत्तम
मिश्रा के दो पूर्व निजी सचिवों
को भी गिरफ्तार किया था.
ईओडब्ल्यू की टीम ने
इन दो कर्मचारियों के ठिकानों
की तलाशी भी ली थी,जिसके
आधार पर कांग्रेस खेमे से
पूर्ववर्ती भाजपा सरकार पर
ई टेंडर घोटाला करने के आरोप
लगाए जाने लगे थे।इसके जवाब
में पूर्व मंत्री मिश्रा ने
कमलनाथ सरकार को सबूतों के
साथ सामने आने की चुनौती देते
हुए कहा कि मामले में केवल
छोटी मछलियों को निशाना बनाया
जा रहा है.
ईओडब्ल्यू के
महानिदेशक के एन तिवारी कहते
रहे हैं कि दो सरकारी अधिकारियों
वीरेंद्र पांडे और नीलेश
अवस्थी (पूर्व मंत्री
नरोत्तम मिश्र के दोनों पूर्व
सचिव) को ई-टेंडरिंग
प्रक्रिया में अनियमितता के
मामले में गिरफ्तार करके हमने
बड़ी कड़ी जोड़ ली है। पांडे
नरोत्तम मिश्रा के सहायक रहे
हैं जबकि नीलेश अवस्थी लॉ
विभाग का चपरासी है और मिश्रा
के बंगले पर फोन सुनने की ड्यूटी
पर तैनात था।
ईओडब्ल्यू की
कार्रवाई पर पूर्व मंत्री
नरोत्तम मिश्रा ने इसे राजनीति
से प्रेरित कार्रवाई करार
दिया. उन्होंने
कहा, ”जब ई-टेंडरिंग
प्रक्रिया में छेड़छाड़ की
बात सामने आई, तो
हमने जांच का आदेश दिया था.
इसके विपरीत वर्तमान
सरकार ने उन एजेंसियों को ठेके
दिये हैं जिनके खिलाफ पिछली
सरकार ने इस अनियमितताओं में
जांच का आदेश दिया था.” मिश्रा
ने कहा, ”मैं कमलनाथ
को चुनौती देता हूं कि वे तथ्यों
और प्रमाणों के साथ आगे आएं.
जिसमें हमें छेड़छाड़
की शिकायतें मिलीं थीं वे सभी
टेंडर हमने रद्द कर दिये थे.
न तो काम पूरा हुआ,
न ही उन्हें कोई भुगतान
किया गया.”
नरोत्तम मिश्रा का कहना है कि ई टेंडर को मंजूरी देने वाली समितियों में प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव और सचिव स्तर के अधिकारी शामिल होते हैं. यह जानने के बावजूद सरकार ने छोटी मछलियों को पकड़ने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार इस मामले में फिजूल मेहनत कर रही है, थोड़े समय बाद वह जान जाएगी कि भाजपा सरकार ने कितनी ईमानदारी से जनहित के कार्य किए थे। मालूम हो कि इस साल 10 अप्रैल को ईओडब्ल्यू ने 3,000 करोड़ रुपये के ई-टेंडर घोटाले में सात कंपनियों, सरकारी विभागों और अन्य (अज्ञात) राजनेताओं सहित अधिकारियों के खिलाफ मामले दर्ज किए थे.
भोपाल,18
अगस्त(प्रेस
सूचना केन्द्र)।
मुख्यमंत्री कमलनाथ ने पुलिस
कमिश्नर प्रणाली को एक कमेटी
के हवाले करके उसे अपने अनुकूल
बनाने की कवायद भले ही शुरु
कर दी हो लेकिन इस विषय पर जितनी
कवायद हो चुकी है उसके चलते
मध्यप्रदेश के प्रमुख शहरों
में इस प्रणाली को लागू करने
से वे इंकार नहीं कर पाएंगे।इसके
संकेत मिलने लगे हैं। भोपाल
और इंदौर में एसएसपी प्रणाली
लागू करके इस संबंध में सभी
प्रायोगिक प्रक्रिया पूरी
की जा चुकी है और अब सिर्फ
मजिस्ट्रेटी अधिकार देकर इस
प्रणाली को कारगर बनाया जाना
बाकी रह गया है।
कानून
और व्यवस्था की जवाबदारी
भारतीय लोकतंत्र में राज्य
को सौंपी गई है। इसके बावजूद
राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे
पर राज्य की जिम्मेदारी है
कि वह केन्द्रीय एजेंसियों
की सिफारिशों पर अमल भी करे।
यही वजह है कि पिछली शिवराज
सिंह चौहान सरकार ने भी पुलिस
कमिश्नर प्रणाली को लागू करने
की पूरी कवायद कर ली थी। चुनावों
के मद्देनजर उसे लागू करने
की प्रक्रिया जरूर नहीं अपनाई
गई थी। अब कमलनाथ सरकार की
जवाबदारी है कि वह इसे कैसे
लागू करे।
चुनावी
संग्राम के दौरान राज्य पुलिस
ने पुलिस कर्मियों को साप्ताहिक
अवकाश दिए जाने और नई भर्तियां
किए जाने के मुद्दे पर कमलनाथ
सरकार का साथ दिया था। अब जब
कमलनाथ सरकार में आ चुके हैं
तब वे पुलिस के मुद्दों पर
पूरी तरह असफल साबित हो रहे
हैं। राज्य का खजाना खाली होने
का हल्ला मचाकर उन्होंने पुलिस
की भर्तियां भी टाल दी हैं और
पुलिस कर्मियों को साप्ताहिक
अवकाश दिए जाने की व्यवस्था
भी लागू नहीं हो पाई है। ऐसे
में पुलिस के आला अफसरों का
दबाव है कि भले की महानगरों
से शुरुआत हो पर प्रदेश में
पुलिस कमिश्नर प्रणाली की
शुरुआत कर दी जानी चाहिए। इससे
कानून और व्यवस्था के विषय
में पुलिस को जो बेवजह लांछन
झेलना पड़ रहे हैं उससे राहत
मिल सकेगी।
कमलनाथ
सरकार ने स्वाधीनता दिवस के
अवसर पर पुलिस कमिश्नर प्रणाली
की घोषणा किए जाने के संकेत
दिए थे। ऐन वक्त पर सरकार ने
राज्य प्रशासनिक सेवा के
अधिकारियों के प्रतिनिधि
मंडल की आशंकाओं पर गौर करते
हुए घोषणा टाल दी। अब सरकारी
सूत्रों की ओर से तर्क दिया
जा रहा है कि इस प्रणाली का
अध्ययन कराया जाएगा तब इसे
लागू किया जाएगा। हालांकि इस
संबंध में पुलिस सूत्रों का
कहना है कि कमिश्नर प्रणाली
के संबंध में सारी कवायद पूरी
की जा चुकी है और अब इसे सिर्फ
लागू करना बाकी है।
दरअसल
कानून व्यवस्था के लिए जिम्मेदारी
तो पुलिस की है पर फैसले लेने
का अधिकार राजस्व अमले पर है।
कलेक्टर तय करते हैं कि एसडीएम
कैसे कानून व्यवस्था पर नियंत्रण
रखें। आज देश के 71 महानगरों,
मेट्रो शहरों
में कमिश्नर प्रणाली लागू
हैं। वैसे दस लाख तक की आबादी
वाले शहरों में पुलिस कमिश्नर
प्रणाली लागू किए जाने का
प्रावधान है। कलेक्टर के पास
डिस्ट्रीक मजिस्ट्रेट की
शक्तियां होती हैं। इसके तहत
रासुका लगाने, जिलाबदर
करने, संवेदनशील
हालातों में फायरिंग,
लाठी चार्ज
की इजाजत देने व धारा 144
व कर्फ्यू
घोषित करने के अधिकार हैं।
इसी प्रकार धारा 151 व
अन्य प्रतिबंधात्मक कार्रवाई
में जमानत दिए जाने व नहीं दिए
जाने के फैसले भी कलेक्टर करते
हैं. कमिश्नरी
लागू हो जाने के बाद कलेक्टर
की ये तमाम शक्तियां पुलिस
कमिश्नर को हंस्तारित हो
जाएंगी और कलेक्टर की भूमिका
महज राजस्व अधिकारी की रह
जाएगी।
जहां
तक पुलिस प्रणाली में सुधार
और संशोधित एक्ट को लागू करने
की बात है तो अब तक कई राज्यों
ने इस पर अमल नहीं किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने संशोधित
पुलिस एक्ट को लागू करने के
आदेश भी दिए थे, जिसमें
नए एक्ट के तहत राज्य सुरक्षा
आयोग गठित करके पुलिस के कामकाज
की निगरानी करके सरकार को
रिपोर्ट सौंपने की सिफारिश
की गई थी। सरकार को आयोग की
रिपोर्ट मानना होगी इससे सरकार
की मनमर्जी पर रोक लग सकेगी।डीजीपी,
आईजी,
डीआईजी की
नियुक्ति के लिए वरिष्ठता और
सेवा रिकार्ड का आधार ही मापदंड
माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट
का मानना था कि पुलिस के कामकाज
में राजनैतिक हस्तक्षेप रोका
जाए।
वर्तमान
व्यवस्था पुलिस को जांच और
कानून के पालन के अधिकार तो
देती है पर अपराध पर अंकुश
लगाने की जवाबदारी उसकी नहीं
है। इसके लिए उसे प्रशासनिक
अफसरों और अदालत पर निर्भर
रहना पड़ता है। यही वजह है कि
कई पुलिस अधिकारी प्रतिनियुक्ति
पर अन्य विभागों में चले जाते
हैं या फिर कविताएं लिखने और
किताबें लिखने में जुट जाते
हैं। अपराध पर अंकुश लगाने
में उनकी रुचि नहीं रहती है।
अपराध रोकने के तंत्र पर भारी
संसाधन खर्च करने के बावजूद
अपराधियों का जाल अपना काम
बदस्तूर जारी रखता है।
मध्यप्रदेश
में कमलनाथ सरकार के सामने
अपराधों पर नियंत्रण रखने की
चुनौती तो है लेकिन वह अपराधों
की जड़ को उजागर नहीं होने
देना चाहती।कल्याणकारी योजनाओं
के नाम पर जारी बजट को हड़पने,मकानों
की जमाखोरी करने, खेती
की जमीनों की आड़ में काला धन
सफेद करने वाले, सरकारी
ठेकों को हड़पने के लिए अपराधियों
का सहारा लेने वाले, टैक्स
चोरी करने वाले व्यापारी,
आयकर चोरी करने
वाले फर्जी एनजीओ जैसों की
वजह से जो आपराधिक जंजाल पनपता
है उसे भी सरकार उजागर नहीं
होने देना चाहती। यही वजह है
कि पुलिस कमिश्नर प्रणाली को
विभिन्न बहानों से टालने की
जुगत हो रही है। इसके बावजूद
अब देश जिस आर्थिक प्रणाली
की ओर बढ़ चला है उसमें फर्जी
पुलिस पालना किसी भी शासन
व्यवस्था के लिए संभव नहीं
रहा है। जाहिर है कि ऐसे हालात
में कमलनाथ चाहकर भी पुलिस
कमिश्नर प्रणाली को रोक नहीं
पाएंगे। वे मुख्यमंत्री हैं
प्रदेश के मालिक नहीं,
ये बात जितनी
जल्दी समझ लेंगे उतनी जल्दी
टकराव से बचकर जन समस्याओं
का समाधान कर पाएंगे।