Category: अपराध

  • आईटीबीपी के शूटर जेल संभालेंगे

    आईटीबीपी के शूटर जेल संभालेंगे

    भोपाल,21 जनवरी(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। राजधानी की केन्द्रीय जेल तोड़ने और सिमी आतंकवादियों की मुठभेड़ में हत्या के बाद मध्यप्रदेश सरकार ने जेलों में पुलिस की घुसपैठ बढ़ाने के नए नए तरीके खोजने शुरु कर दिए हैं। राज्य शासन ने भारत सरकार को एक प्रस्ताव भेजकर भारत तिब्बत सीमा पुलिस बल के जवानों की तीन बटालियन मांगी हैं। शूटिंग में माहिर इन जवानों को जेलों की सुरक्षा के लिए तैनात किया जाएगा। इसके साथ साथ मध्यप्रदेश पुलिस के चार आला अफसरों को भी जेलों का प्रबंधन संभालने भेजा जा रहा है।

    सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने होशंगाबाद जिले के सांगाखेड़ा खुर्द में नर्मदा सेवा यात्रा के 33 वें दिन एक सार्वजनिक कार्यक्रम में ऐलान किया है कि महिलाओं से दुराचार करने वालों पर अब मुकदमा तो चलेगा पर दोषियों को सीधे फांसी चढ़ाने की व्यवस्था भी की जाएगी। राज्य की भाजपा सरकार ने जबसे महिलाओं के हित के नाम पर नई योजनाएं चलाईं हैं तबसे जेलों में छेड़छाड़ संबंधी अपराधों के दोषियों की संख्या बढ़ती जा रही है। आज जेलों में महिला अपराधों से संबंधित आरोपियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इनमें से ज्यादातर मामले महिलाओं को मुआवजा राशि दिलाने और विरोधियों को कथित तौर पर निपटाने की रणनीति के तहत दर्ज किए गए हैं। बताते हैं कि भाजपा सरकार दोषियों को इस्लामिक देशों की तरह सख्त सजा से दंडित करने की तैयारी कर रही है।

    गौरतलब है कि राज्य में पहली बार जेलों में बंदियों के सुधार की जिम्मेदारी पुलिस अफसरों को सौंपी जा रही है। अंग्रेजों के शासनकाल से जेलों की जवाबदारी जेल विभाग के अधिकारी कर्मचारी संभालते रहे हैं। जस्टिस मुल्ला कमेटी की रिपोर्ट में तो जेलों में पुलिस के हस्तक्षेप को अनैतिक बताया गया है। इसके बावजूद जेलों में पुलिस का हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है। पुलिस को अपराधों की जांच के साथ साथ दोषियों को दंडित करने की भी जबाबदारी सौंपे जाने से न्यायाधीशों में भी दहशत फैल रही है। उन्हें लगता है कि जजों को चुनने वाली कोलोसियम पद्धति पर विवादों के बाद भाजपा ने पूरे देश में अपनी सरकारों को दंड का अधिकार अपने हाथों में लेने की तैयारी शुरु कर दी है।

    सूत्रों के अनुसार मध्यप्रदेश की जेलों में मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन किया जा रहा है। राजनीतिक चंदा वसूली के चलते बंदियों के साथ मारपीट की घटनाएं भी बढ़ीं हैं और उनके परिजनों पर अनैतिक तरीके से चंदा वसूली का दबाव बढ़ता जा रहा है। सूत्र बताते हैं कि जेलों में बंदियों के साथ अमानवीय तरीके से मारपीट की जा रही है। उनकी कराहों और आवाजों से जेलों में दहशत का माहौल बन गया है। सिमी से जुड़े आरोपियों के कथित जेल ब्रेक कांड के बाद बदनामशुदा जेल डीजी सुशोभन बैनर्जी को तो हटा दिया गया है लेकिन इस मामले में जेल विभाग के अफसरों और प्रहरियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा रही है। इससे जेल विभाग के अफसरों में भी नाराजगी देखी जा रही है।

    हाल ही में जेल डीजी संजय चौधरी ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के दौरान प्रदेश की जेलों के प्रभारियों को साफ चेतावनी दी है कि यदि उन्होंने मुख्यालय के निर्देशों का पालन नहीं किया तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। इस वीडियो कांफ्रेंसिंग में अतिरिक्त मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी और जेल विभाग के प्रमुख सचिव विनोद सेमवाल भी मौजूद थे।

  • मध्यप्रदेश की जेलों में मीसा बंदी का दौर

    मध्यप्रदेश की जेलों में मीसा बंदी का दौर

    भोपाल (पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। सुशासन का वादा करने वाली भाजपा ने मध्यप्रदेश में ढांचागत विकास पर तो बहुत जोर दिया है लेकिन उसने कांग्रेस की वे तमाम बुराईयां भी अपना लीं हैं जिन्हें वह कभी पानी पी पीकर कोसती रही है।श्रीमती इंदिरा गांधी के आपातकाल की ज्यादतियों की कहानी आज भी जो सुनता है उसकी रूह कांप जाती है। उन्हीं कहानियों को सुनाकर शिवराज सिंह चौहान की मिठबोली सरकार ने मीसाबंदियों के लिए पेंशन योजना भी लागू की है। इसके बावजूद अब उनकी सरकार जेलों में जो दमन चक्र चला रही है उससे प्रदेश के लगभग पैंतीस हजार बंदियों और उनके परिवारों के बीच आतंक फैल गया है। बंदियों पर जो नए नियम लादे जा रहे हैं उससे बंदियों में आक्रोश फैल गया है और वे भूख हड़ताल जैसे कदम उठाने पर मजबूर हो रहे हैं।

    अंग्रेजों के बाद से पहली बार शिवराज सिंह सरकार ने जेलों को राजनीतिक योजनाओं की आय का स्रोत बनाना शुरु किया है। मजेदार बात ये है कि इस काली दौलत की खेती कथित तौर पर भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी कर रहे हैं। जेलों में आधुनिकीकरण के नाम पर लागू की जा रही योजनाओं को सफल बनाने के लिए जेल विभाग में पुलिस के तीन आला अफसर तैनात किये गए हैं। अब वहां चार और बड़े अफसर भेजे जाने की तैयारी हो रही है जो सरकार की मंशाओं को पूरा करने की जवाबदारी संभालेंगे। जेलों में प्रहरियों की भारी कमी है उन्हें भर्ती किया जाना जरूरी है पर इसके स्थान पर सरकार ने जेलों में एसएएफ के जवान भेज दिए हैं। जेलों में पुलिस की तैनाती को सही साबित करने के लिए भोपाल जेल ब्रेक कांड की जांच में लापरवाही की जवाबदारी जेल महकमे के कर्मचारियों और प्रहरियों पर डाली जा रही है। जबकि हकीकत ये है कि सिमी के आतंकवादी जब भोपाल की केन्द्रीय जेल तोड़कर फरार हुए तब जेल पर एसएएफ के जवान ड्यूटी दे रहे थे। एकबारगी ये मान भी लिया जाए कि जेल के प्रहरी लापरवाह थे तब भी पुलिस को उसकी ड्यूटी के लिए क्लीनचिट कैसे दी जा सकती है।

    जेल विभाग पर पुलिस का शिकंजा किसी भी तरह न तो कानूनी है और न ही नैतिक उसके बावजूद मौजूदा सरकार जेलों की आड़ में जिस दंड प्रक्रिया को लागू कर रही है वह आपातकाल से भी गंभीर प्रताड़ना और अमानवीयता की ओर जाती साफ नजर आ रही है। भोपाल जेल ब्रेक कांड के बाद हटाए गए जेल महानिदेशक सुशोभन बैनर्जी की हरकतों को पूरी तरह नजरंदाज करके जिस तरह जेल विभाग के अफसरों के खिलाफ दमन चक्र चलाया जा रहा है उससे जेल महकमे के भीतर भी असंतोष घुमड़ रहा है। जेल विभाग में दो डीआईजी और दो एडीशनल एसपी भेजे जाने की खबर ने तो अफसरों की नींदें उड़ा दीं हैं। उन्हें पता है कि कि मौजूदा पदों पर जब पुलिस के बड़े अधिकारी जम जाएंगे तो उनके प्रमोशन की राह तो हमेशा के लिए अवरुद्ध हो जाएगी। जेल महकमें में लंबे समय तक नौकरी करने वाले जिन अफसरों ने प्रशासन में सुधार के जो सपने संजोए थे उन्हें पुलिस के आला अफसर अपने नौसिखिएपन में मट्टी पलीत करे दे रहे हैं।

    सूत्र बताते हैं कि ये सारा खेल साजिशन किया जा रहा है,जिससे जेलों में असंतोष फैले और पुलिस के अलावा सरकार के पिट्ठुओं की तैनाती का रास्ता प्रशस्त हो सके। पिछले दिनों जेल प्रशासन ने एक आदेश निकाला जिसमें कहा गया कि कोई भी मुलाकाती बंदियों को अपने घरों से बनाया हुआ या बाहिरी सामान नहीं दे सकता। कोई बहन यदि अपने बंदी भाई को संक्रांति पर तिल के लड्डू भी खिलाना चाहे तो उसे इसकी इजाजत नहीं है। क्योंकि जेलों में बंदियों के लिए बाहर से लाए जाने वाले नमक, मसाले, तेल, टाफी, बिस्किट, सिगरेट, बीड़ी, तंबाखू, जूते आदि पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है। अब तक बंदियों को तय लगभग पचपन रुपए के डाईट प्लान में सुबह नाश्ते में चाय के साथ उबले चने और पौष्टिक आहार दिया जाता था, पर अब उनकी डाईट में ब्रेड, बिस्किट, मिठाई, खीर जैसे आईटम शामिल कर दिए गए हैं। ये पैक सामान एक तो पूरा बजट बिगाड़ रहा है वहीं नई समस्याएं भी खड़ी कर रहा है। अब कैदियों को यदि ब्रेड दी जाए तो उसके लिए बड़े मग भर चाय भी चाहिए। इस तरह की दिक्कतें बंदियों को नए झमेले में धकेल रहीं हैं।

    बंदियों को उनकी घरेलू समस्याओं की देखभाल करने के लिए जेलों में पे रोल का प्रावधान किया गया है। इससे जहां बंदियों को सामाजिक दायरों की अहमियत समझाई जाती है वहीं जेलों के संचालन के लिए मनोवैज्ञानिक सहारा भी मिल जाता है। पुलिसिया फंडों को लादने वाले जेल प्रशासन ने पे रोल को लगभग बंद कर दिया है। इससे बंदियों को नई मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है और प्रदेश भर की जेलों के बंदी भड़क रहे हैं।

    दंड प्रकिया में अपराधी को दोषी साबित करवाने वाले पुलिस के अफसरों को बंदियों का कथित संरक्षक बनाने पर तुली शिवराज सरकार को आंखें मूंदकर जेलों की सीमा रेखा लांघ रही है। जेलों में एसएएफ के साथ साथ विशेष दस्ते भी तैनात किए जा रहे हैं जिन्हें बंदियों की निगरानी की जवाबदारी सौंपी गई है। सूत्रों का कहना है कि ये ही वो दस्ता है जो राजनैतिक विरोधियों को जेलों में भेजकर उन्हें प्रताड़ित करने की जवाबदारी संभाल रहे हैं। भोपाल में इस दस्ते को सेना जैसी वर्दी दी गई है। जेलों के प्रहरियों और अफसरों को प्रशिक्षण देने का काम अरसे से बंद है। नतीजा ये है कि प्रहरी बेडोल हो रहे हैं और कई ने तो अपनी नौकरी के दौरान बंदूक की गोली भी नहीं चलाई है। इसके बावजूद जेलों में जो प्रक्रिया अपनाई जाती है उसके चलते बंदियों में विद्रोह के भाव नहीं पनपते हैं और वे अपनी सजा शराफत से पूरी करके एक नए जीवन की शुरुआत करते हैं। पुलिसिया घुसपैठ ने वो समरसता का माहौल बिगाड़ दिया है। जेल ब्रेक कांड भी उसी कड़ी का नतीजा है।

    जेलों में संवाद का आलम ये है कि कथित तौर पर जेलों की व्यवस्था धराशायी करने और अवैध कमाई में जुटे रहे पूर्व डीजी सुशोभन बैनर्जी ने जेल विभाग की वेवसाईट ही बंद करा दी थी। आज यदि आप प्रदेश की किसी भी जेल की जानकारी या संपर्क तलाशना चाहें तो संभव नहीं है। जेल विभाग के प्रशासनिक प्रतिवेदन को तलाशना संभव नहीं है। यदि बंदियों के परिजन कोई संदेश पहुंचाना चाहें तो उन्हें वही पुरातनपंथी समय साध्य व्यवस्था को ढोना पड़ता है। जेल महकमे के पुलिसिया ढर्रे का आलम ये है कि भोपाल केन्द्रीय जेल की पुरानी वेवसाईट अब तक चल रही है जिसे कभी 2008 में पूर्व जेल अधीक्षक पीडी सोमकुंवर ने बनवाया था। आज सोमकुंवर स्वयं जेल में बंद हैं पर वेवसाईट पर उन्हें जेल अधीक्षक ही बताया जा रहा है।

    भाजपा को जमीनी विचारधारा देने वाले पं.दीन दयाल उपाध्याय ने समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान का संस्कार दिया था। लंबे समय तक भाजपा के नेता इसे अपनी गीता मानते रहे। आज भी भाजपा से जुड़े परिवारों में इसे ध्येय विचार माना जाता है। इसके बावजूद सत्ता की चाशनी चांटने के बाद सत्ता शीर्ष पर विराजमान भाजपाईयों में जो विकार घर कर गए हैं उनसे भाजपा की सत्ता धिक्कार के पथ पर अग्रसर हो चली है। आमतौर पर कबाड़खाने से किसी भी समाज की मानसिकता और उसकी स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। जाहिर है समाज के सुधार गृह में बंदियों में सुधरने के बजाए यदि विद्रोह के संस्कार फैलने लगें तो सरकार के औचित्य की जरूरत ही क्या रह जाएगी।

  • शिवराज की जेलों में चंदा उगाही का नारकीय आतंक

    शिवराज की जेलों में चंदा उगाही का नारकीय आतंक

    भोपाल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम). दुनिया भर में सुधारगृह कही जाने वाली जेलें शिवराज सिंह चौहान की सरकार के कार्यकाल में चंदा उगाही के नारकीय आतंक का घर बन गईं हैं। इस त्रासदी को भोगने वाले बताते हैं कि वे किसी डॉन की तुलना में जेल के वसूली जल्लादों से ज्यादा भयभीत रहते हैं। ये स्थिति इसलिए बनी है कि शिवराज सिंह सरकार का चंदा वसूली कोटा लगातार बढ़ता जा रहा है। इसकी पूर्ति के लिए पुलिस विभाग के अफसरों ने जेल विभाग के अफसरों को किनारे बिठाकर वसूली की कमान अपने हाथों में ले ली है। गृह विभाग से प्रतिनियुक्ति पर जेल महकमें में भेजे गए पुलिस अफसरों ने अपने गुर्गों के हाथों में ये वसूली की कमान थमा दी है। उन्होंने जेल विभाग के अफसरों को तो पद पर बिठा रखा है पर वसूली का ठेका किसी डिप्टी जेलर, चक्कर अधिकारी जैसे कर्मचारी को थमा दिया है। खुद जेल महकमे के अफसर हताश हैं क्योंकि उनके महकमे में पुलिस का दखल बढ़ता जा रहा है। हालत ये है कि पुलिस के अफसर जेल मंत्री तक की बात नहीं सुनते। इसकी जगह गृहमंत्री यदि कुछ कहे तो वो आदेश तत्काल लागू हो जाता है। हालत ये है कि आपराधिक रिकार्ड वाले अफसरों को जेलों की कमान थमा दी गई है, जो अफसर चापलूसी में और नजराना पेश करने में हाजिरी नहीं देते उन्हें किनारे बिठा दिया जाता है।

    जस्टिस मुल्ला कमेटी की सिफारिशों में साफ कहा गया है कि जो व्यक्ति आपराधिक प्रकरणों की जांच करेगा वो अपराधी को दंडित नहीं कर सकता। इसीलिए ये जवाबदारी अदालतों को दी गई है। इसके बाद कैदी को जेल विभाग के निर्देशन में सुधार की प्रक्रिया से गुजारा जाता है। जबकि पुलिस के बढ़ते दखल से राजनैतिक विरोधियों को निपटाने का रास्ता सुलभ बना दिया गया है। जेलों में बढ़ते पुलिस के दखल ने जेलों को सुधार गृह के बजाए प्रताड़ना घर बना दिया है जो किसी भी सभ्य समाज के लिए खतरे का सबब कहा जा सकता है।

    भोपाल जेल ब्रेक कांड के बाद जारी हो रहे तुगलकी आदेशों ने भी जेल महकमे की दुर्दशा कर दी है। भोपाल केन्द्रीय जेल से सिमी के आतंकी जब मुठभेड़ में मारे गए तो वे मंहगे जूते पहने हुए थे। पुलिस विभाग के लालबुझक्कड़ी विवेचना कर्ताओं ने कहा कि जूते पहने होने के कारण वे आसानी भाग सके। इस पर कैदियों को जूते के बजाए चप्पल पहनने के आदेश जारी कर दिए गए। अब कड़ाके की ठंड में जब कैदियों के पैरों में बिवाई फट रहीं हैं और उनसे खून रिस रहा है तब भी जेल प्रशासन अपने उसी आदेश पर अटका हुआ है।

    मध्यप्रदेश की 39 जिला जेलों और 72 उपजेलों में इस समय सजा याफ्ता 17 हजार 58 कैदी बंद हैं, इसकी तुलना में 21 हजार 300 कैदी महज विचाराधीन का तमगा लिए बंद हैं। यही विचाराधीन कैदी जेल के जल्लाद नुमा वसूली अफसरों की कमाई का बड़ा स्रोत बने हुए हैं। जो विचाराधीन कैदी छोटे अपराध में बंद होता है और जिसे जल्दी जमानत मिलने उम्मीद होती है उससे वसूली का काम जल्दी से जल्दी निपटाया जाता है। कैदी की माली हालत की खबर लाने में वकील और अदालत में तैनात पुलिस विभाग के कर्मचारी बड़ी भूमिका निभाते हैं। जैसा कैदी हो उससे वसूली की इबारत भी उसी तरह लिखी जाती है। प्रदेश में एक भी महिला जेल नहीं है। जेलों में इन दिनों 603 सजायाफ्ता महिला कैदी बंद हैं। जबकि 718 विचाराधीन महिला कैदी भी हैं। ये दैहिक शोषण का साधन तो हैं ही साथ में इनसे वसूली भी की जाती है। अब चूंकि कानून की नजर में वे अपराधी हैं या उन्हें मालूम है कि उनसे अपराध हो गया है तो उनके शोषण का रास्ता आसान हो जाता है।

    जेल महकमे में प्रतिनियुक्ति पर आए महानिदेशक संजय चौधरी खुद भोपाल की केन्द्रीय जेल में आए दिन दौरा करते रहते हैं इसके बावजूद इस जेल में जो प्रताड़ना का तंत्र चल रहा है उन्हें वो नजर नहीं आता है। जेल ब्रेक कांड के बाद ब खंड से थोड़े दिनों के लिए चक्कर अधिकारी पद से हटा दिए गए अफसर को वसूली कांड का तजुर्बेकार माना जाता है। एक कैदी मुकेश उर्फ मुक्कू उनका इशारा अच्छी तरह समझता है। अफसर का इशारा मिलते ही मुक्कू जेल में नए नए आने वाले विचारधीन या सजायाफ्ता कैदी से भिड़ जाता है। पीट पीटकर उसकी ये हालत कर देता है कि नवांतुक डर के मारे कांपने लगता है। इसके बाद मुक्कू के सहयोगी कैदी को बता देते हैं कि यदि तुम्हें जेल में ठीक तरह रहना है तो अपने घर से रुपए बुलाकर चक्कर अधिकारी को दे दो। इस रकम का एक हिस्सा मुक्कू और उसके सहयोगियों को भी मिलता है।घर से पैसे बुलाने के लिए जो फोन दिया जाता है उसके एक काल का चार्ज पचास रुपए होता है। हर सुविधा की कीमत अलग है। यदि जेल में रहते हुए आराम फरमाना है तो डाक्टर साहब हैं न। ये सेटिंग कंपाऊंडर करता है। मात्र दस हजार रुपए में आपको सिक प्रमाण पत्र मिल जाएगा फिर आप बिस्तर पर आराम फरमाईए। ये सुविधा भी तब तक मिलेगी जब तक कोई बड़ा अधिकारी जांच करने नहीं आ जाता। यदि जांच हुई तो सौदा पूरा। अगली सिक के लिए नई फीस फिर देना होगी।

    चक्कर अधिकारी का जलवा इतना जोरदार है कि गत 13 दिसंबर को जब सभी लोग सदमें में थे तब एक जेलर ने कैदियों को चक्कर अधिकारी की तारीफ में सुनाया कि वे जेल में हर सुविधा मुहैया करा सकते हैं। बस पैसे देते जाओ तो फिल्मी हीरोईन भी आ जाएगी सेवा में। कैदियों को जेल में बिस्कुट, सिगरेट, गांजा, चरस, फोन जो भी सुविधा चाहिए आसानी से मिल जाती है। कैदियों से जो पैसा वसूला जाता है वो सभी के बीच बंटता है। आंखें मूंदे रखने के लिए जेलर या जेल अधीक्षक को भी निश्चित हिस्सा मिल जाता है। यदि जेल महकमे के आला अधिकारी ने टारगेट दे दिया है तो वो रकम भी कैदियों की पिटाई से जुटाई जाती है।
    मजदूरी भी कमाई का एक नायाब स्रोत है। कैदियों को मजदूरी के नाम पर पुताई का जिम्मा दिया जाता है। खेत से सब्जी उगाने और तरह तरह के कामकाज से उसे मजदूरी दी जाती है। पर ये मजदूरी कभी लगातार नहीं मिलती। जेल के रिकार्ड में पुताई का जितना रिकार्ड दर्ज किया जाता है यदि वास्तव में उतनी पुताई कर दी जाए तो जेल की दीवारों पर इंचो में नहीं फुटों में चूने की परत चढ़ जाए।

    शिवराज सिंह सरकार के बेटी बचाओ अभियान ने जेलों में बलात्कार के दोषी और विचाराधीन कैदियों की बाढ़ ला दी है। इसकी वजह है कि बलात्कार पीढ़िता तो सरकार की ओर से राहत राशि मुआवजे के रूप में दी जाती है। अक्सर मुआवजे की ये राशि भी महिला को पूरी नहीं मिल पाती । इसका भी बंटवारा हो जाता है, पर जेल को एक फोकट की कमाई का मुर्गा जरूर मिल जाता है। पहले अनुसूचित जाति प्रताड़ना में लोगों को जेल भेजा जाता था अब ये काम महिलाओं की मदद के नाम पर होने लगा है। जिसका फायदा जेलों में खूब लिया जा रहा है।

    मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कहते हैं कि उन्हें प्रेस से मिलने वाले फीडबैक की ज्यादा जरूरत नहीं होती वे तो रोज हजारों लोगों से मिलते हैं। उनकी जेलों में कैदियों को किस अमानवीय प्रताड़ना से गुजरना पड़ रहा है ये बात कैदी उनसे बता नहीं सकते और उनके रिश्तेदार उनसे कह नहीं सकते क्योंकि उनके करीबी अभी अदालतों में सुनवाई के दौर से गुजर रहे हैं या फिर उन्हें अपराधी करार दिया जा चुका है। शिवराज सिंह को शायद नहीं पता कि पुलिस किस तरह बेकसूर लोगों पर फर्जी प्रकरण लादकर उन्हें जेलों में धकेलती है। अदालतों में घसीटती है। इसके बावजूद मुख्यमंत्री कहते हैं कि उन्होंने राजनीति को ढर्रे से बाहर निकालकर पटरी पर ला दिया है। उनके चापलूस मंत्री, अफसर, पत्रकार सभी इसी सुर में सुर मिलाकर उन्हें अहसास कराने की कोशिशों में जुटे हैं कि राज्य में सब अमन चैन चल रहा है। अब इसे राजा का भाग्य ही नहीं तो क्या कहेंगे कि कि उनकी पार्टी भाजपा और सहयोगी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी सब कुछ ठीक ठाक ही नजर आ रहा है। हकीकत में तस्वीर इतनी उजली नहीं है।

  • गृहमंत्री की जिद से जेल महकमे में कोहराम

    गृहमंत्री की जिद से जेल महकमे में कोहराम

    gopal-tamrakar
    बंटी बबली की जोड़ी के सामने आईपीएस लाबी ने घुटने टेके
    -आलोक सिंघई-
    भोपाल,7 दिसंबर। गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह और जेल मंत्री सुश्री कुसुम सिंह मेहदेले के बीच ठनी रार ने जेल महकमे के अफसरों में असमंजस के हालात बना दिए हैं। भोपाल की केन्द्रीय जेल से सिमी आतंकवादियों कीफरारी और मुठभेड़ में उनके सफाए के बाद से कोई अधिकारी सरकार का उचित मार्गदर्शन करना नहीं चाह रहा है। नतीजतन पूरे महकमे में अफरातफरी मच गई है। गृहमंत्री के बाल सखा और उज्जैन केन्द्रीय जेल के अधीक्षक गोपाल ताम्रकार ने कुछ ऐसा ताना बाना बुना है कि विभाग के आला अफसर भी खुद को लाचार महसूस कर रहे हैं। उनकी हालत सांप छछूंदर की तरह हो गई है शासन का आदेश मानते हैं तो गृहमंत्री नाराज और गृहमंत्री की बात मानते हैं तो जेल मंत्री नाराज। इस करामात की असली वजह भोपाल जेल टूटने के बाद हटाए गए जेल डीजी सुशोभन बैनर्जी और उनकी सहेली अफसर ( बंटी बबली की जोड़ी )बताए जा रहे हैं।
    शिवराज सिंह सरकार की असफलताओं की फेरहिस्त जैसे जैसे खुलती जा रही है वैसे ही कई विभागों से तरह तरह की कहानियां सामने आती जा रहीं हैं। ग्यारह साल पूरे करने के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तरह तरह के कार्यक्रमों के आयोजन से खुद की पीठ ठोकते नजर आ रहे हैं लेकिन उन्होंने चपरासीनुमा जिन भ्रष्ट अफसरों को अपना सलाहकार बना रखा है उनकी कारस्तानियां अब छप्पर फाड़कर सिर उठाने लगीं हैं। भाजपा की सरकार में शिवराज सिंह चौहान के ग्यारह साल पूरे होने पर उनके राजनीतिक प्रतिद्वंदी ही तरह तरह के मामलों से सरकार की नींव हिलाने में जुट गए हैं। अब जैसे शिवराज सिंह चौहान के करीबी माने जाने वाले गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह ने जेल विभाग की मंत्री सुश्री कुसुम सिंह मेहदेले को खुली चुनौती दे डाली है। जेल गोलीकांड के बाद चैतन्य हुए राज्य शासन के प्रमुख सचिव विनोद चंद्र सेमवाल ने जेल मुख्यालय में काम का बोझ संभालने के लिए डीआईजी पद पर प्रमोशन पाने वाले उज्जैन के जेल अधीक्षक गोपाल ताम्रकार को मुख्यालय में पदस्थ किया है। लगभग डेढ़ महीना बीत जाने के बाद भी ताम्रकार अपनी कुर्सी छोड़ने को राजी नहीं हैं।शासन के आदेश का पालन इसलिए नहीं हो पा रहा क्योंकि ताम्रकार गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह के साथ पढ़े हैं। उन्होंने हटाए गए जेल डीजी सुशोभन बैनर्जी से एक आदेश जारी करवा लिया कि आगामी आदेश तक वे अपने ही पद पर बने रहें। जबकि शासन के आदेश के समर्थन में जेल मंत्री सुश्री कुसुम सिंह मेहदेले ने भी निर्देश जारी करके श्री ताम्रकार को भोपाल मुख्यालय में आमद देने के निर्देश दिए हैं। इसके बावजूद श्री ताम्रकार टक के मस होने को तैयार नहीं हैं। उनकी जगह जेल अधीक्षक सुश्री ऊषा राज उज्जैन पहुंच चुकी हैं लेकिन श्री ताम्रकार उन्हें पदभार सौंपने तैयार नहीं हैं।यही नहीं स्थानीय अखबारों में उन्होंने हटाए गए जेल डीजी सुशोभन बैनर्जी के पत्र के माध्यम से खबर भी छपवाई कि मुख्यालय ने शासन के तबादला आदेश को निरस्त कर दिया है।
    इस मामले में जेल महानिदेशक संजय चौधरी कुछ बोलने को तैयार नहीं हैं। सूत्र बताते हैं कि गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह ने उन्हें फोन करके श्री ताम्रकार को उज्जैन में ही पदस्थ रखने के निर्देश दिए हैं। जेल विभाग में पदस्थ आईजी सुधीर शाही भी इस मामले में कोई बात करने तैयार नहीं हैं। उन्होंने हाल ही में उज्जैन जेल का निरीक्षण भी किया था और कार्यभार संभालने पहुंची ऊषा राज को सभी जेलों के निरीक्षण के निर्देश भी जारी किए थे। उन्होंने उज्जैन जेल से निरीक्षण के लिए उन्हें वाहन भी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। जेल विभाग में पदस्थ डीआईजी प्रशासन संजय पांडे के पास काम का बोझ इतना अधिक बढ़ गया है कि उन्हें अपना काम निपटाने के लिए देर रात तक दफ्तर में रुकना पड़ रहा है। इसकी जानकारी जेल मंत्री को भी दी जा चुकी है लेकिन मंत्री जी अपने ही सहयोगी गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह को नीचा दिखाने से बच रहीं हैं। हालांकि उन्होंने अपने विभाग के आला अफसरों से आदेशों का पालन न होने पर नाराजगी भी जताई है। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि यदि उनके ही विभाग का अफसर आदेशों का पालन नहीं करेगा तो अंततः उन्हें अपने विशेषाधिकार का उपयोग करके उसे दंडित करना पड़ेगा।
    जेल महकमे को चकर घिन्नी बनाने वाली सतना की जेल अधीक्षक सुश्री शेफाली तिवारी ने इस काम के लिए कथित तौर पर हटाए गए जेल डीजी सुशोभन बैनर्जी को अपना हथियार बनाया है। भोपाल जेल ब्रेक कांड में भी इसी बंटी बबली की जोड़ी की करतूतें धीरे धीरे प्रशासन के सामने आती जा रहीं हैं। इनकी करीबी की कहानियां पूरे जेल महकमें में कुख्याति की तरह फैली हुई हैं। जेल मंत्री सुश्री कुसुम मेहदेले के निवास पर कभी याचक की तरह खड़े रहकर सुशोभन बैनर्जी ने शेफाली तिवारी को सतना का जेल अधीक्षक बनवाया था। अब जबकि सुशोभन बैनर्जी हटा दिए गए हैं तब उनके ही कृपा पात्र रहे गोपाल ताम्रकार ने शासन के आदेश के खिलाफ लिखे गए सुशोभन बैनर्जी के पत्र को अपनी ढाल बना लिया है।
    शेफाली तिवारी का इतिहास कई किस्से कहानियों से भरा पड़ा है। जब वे होशंगाबाद जेल प्रभारी थीं तो तीन कैदी फरार हो गए थे। जेल मंत्री जगदीश देवड़ा ने जब छापा मारा तो जेल में गंदगी मिली पांच किलो गांजे की खेप बरामद हुई थी। शहला मसूद हत्याकांड में इंदौर की जेल में बंद सबा फारूखी और जाहिदा परवेज ने कमीशनखोरी के चक्कर में शेफाली तिवारी को बाल पकड़कर पीटा था। सतना में उनके बंगले से एक कैदी फरार हो गया। दो आरोपी जेल से फरार हो गए। जेल में मोबाईल बरामद हुए। दो कैदियों की संदिग्ध हालात में मौत हो गई। जिसका मुकदमा अभी भी लंबित है। जेल प्रहरी मनीष शेखर ने उसकी प्रताड़ना से तंग आकर जहर खा लिया जिसकी विभागीय जांच चल रही है। बताते हैं कि कैदियों को बिना कागजी कार्रवाई रिहा कर देने की बात जैसे ही प्रशासन को मालूम चली तो उन्हें पुलिस से दुबारा धारा 151 में गिरफ्तार कराकर जेल में बंद करवा दिया। अब प्रशासन इस बात की जांच कर रहा है कि कैदी यदि जेल में बंद थे तो पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कैसे किया। जबलपुर की मूल निवासी इस जेल अधीक्षक ने कथित तौर पर एक कैदी से ही शादी रचा ली थी लेकिन बाद में उसे आजीवन कैद की सजा सुना दी गई तो बताते हैं उन्होंने अपने ही कंप्यूटर आपरेटर से शादी रचा ली। पूर्व मंत्री बाबूलाल गौर से उनकी नजदीकियों के किस्से भी जेलों में चटखारे लेकर सुनाए जाते हैं। बताते हैं कि यही किस्से भोपाल जेल ब्रेक कांड की नींव बने थे।
    हटाए गए जेल डीजी सुशोभन बैनर्जी के हवा हवाई फरमानों के बाद जब जेलरों के बीच ये बात फैल गई कि उन्हें मुख्यालय में चंदे की खेप पहुंचानी है तो कैदियों से चौथ वसूली की जाने लगी जिसका अंत भोपाल जेल ब्रेक और मुठभेड़ के रूप में सामने आया। ये जानकारियां पुलिस प्रशासन को भी हैं और सरकार के पास भी लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियतावादी नीतियों से तंग आकर जमीनी हालात सुधारने की सुध कोई अफसर नहीं ले रहा है।

  • सुशोभन बैनर्जी की हीरोपंती ने तुड़वाई जेल

    सुशोभन बैनर्जी की हीरोपंती ने तुड़वाई जेल

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    भोपाल 5 नवंबर(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। सिमी आतंकवादियों ने भोपाल जेल की दीवार तो फांद ली लेकिन भोपाल पुलिस की चौकस निगाहों ने उन्हें कानून को लतियाने की उचित सजा देकर अपनी मुस्तैदी का सबूत भी दे डाला। इस मुठभेड़ की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। इसलिए जो लोग जेल से हवलदार की हत्या कर भागे आतंकवादियों को टपका देने पर मरसिया पढ़ रहे हैं उनकी बातें रद्दी की टोकरी में फेंकने लायक हैं। मगर इस पर तो विचार करना ही होगा कि कानून से खिलवाड़ करने का ये साहस किसमें, कैसे और क्यों पलता रहा है।
    मध्यप्रदेश की जेलें अपनी सुधारात्मक गतिविधियों के लिए जानी जाती हैं। यहां ये माना जाता है कि बुरा आदमी गलत शिक्षा का नतीजा होता है । जब कानून किसी को दोषी ठहराए तो जेलों में ले जाकर उन्हें नए सिरे से संस्कारित किया जा सकता है। इसलिए मध्यप्रदेश की जेलों को सुधारगृह कहा जाता है। होशंगाबाद में तो खुली जेल का जो प्रयोग किया गया वो सबसे सफल प्रोजेक्ट रहा है। जेल प्रशासन हमेशा से जेलों में इतने बुलंद अफसरों को तैनात करता रहा है कि वे समाज के कबाड़ कहे जाने वाले अपराधियों को मुख्य धारा में चलने लायक जरूर बना देते थे। पिछले कुछ सालों में जेलों की ये साख खंडित हुई है। इसकी वजहों पर विचार किए बिना मध्यप्रदेश की सरकार, प्रशासन और प्रेस जिस तरह हवा हवाई उपाय सुझा रही है उससे कहा जा सकता है कि सुशासन का दावा करने वाली मध्यप्रदेश की सरकार कांग्रेस की लचर सरकार के मुकाबले लाचार अधिक साबित हो रही है।
    जब भी कोई मुठभेड़ होती है और पुलिस की गोली से एक भी अपराधी मारा जाता है तो उस मामले की मजिस्ट्रीयल जांच की जाती है। जाहिर है भोपाल जेल से भागे सिमी आतंकवादियों की हत्या के मामले में भी न्यायिक जांच ही एक मात्र कानून सम्मत कदम है। इसके बावजूद एसआईटी के गठन, एनआईए, सीबीआई , सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जैसी संस्थाओं से जांच की बात करके इस मामले का राजनीतिकरण किया जा रहा है। सरकार की इच्छा का सम्मान करते हुए पुलिस महानिदेशक ऋषि कुमार शुक्ला ने एसआईटी के गठन की घोषणा भी कर दी. उन्होंने बताया कि एसआईटी की तीन सदस्यीय टीम का नेतृत्व सीआईडी के एसपी अनुराग शर्मा करेंगे और वो पूरे मामले की रिपोर्ट पुलिस हेडक्वाटर को सौपेंगे.मुठभेड़ कांड के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पूर्व पुलिस महानिदेशक नंदन दुबे को मामले की जांच करने भेजा था लेकिन बाद में उन्हें इस प्रक्रिया से हटा दिया गया। उनके खिलाफ प्रदेश के पुलिस थानों में रिलायंस जियो कंपनी को फ्री में टावर लगाने का मामला उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। इस सौदे में प्रदेश को कथित तौर पर 1400 करोड़ रुपए की क्षति पहुंचाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट उनके खिलाफ काफी पहले स्ट्रक्चर पारित कर कह चुका है कि उन्हें किसी बड़े पद पर नहीं रखा जाना चाहिए। इसके बावजूद प्रदेश सरकार ने उन्हें डीजीपी बनाया और रिटायर होने के बाद एक निगम में पुनर्वासित भी कर दिया। जबकि हकीकत ये है जेल तोड़ने की साजिश भी तबसे रची जा रही थी जबसे वे पुलिस महानिदेशक रहे । उन्होंने अपने प्रिय अफसर सुशोभन बैनर्जी को डीजी जेल बनवाया था। उनके कार्यकाल में ही खंडवा जेल से सिमी के आतंकवादी फरार हुए थे। जब मार्च 2015 में सुशोभन बैनर्जी को डीजी जेल बनाया गया तबसे सिमी आतंकवादियों को मिलने वाली सहूलियतें भी बढ़ गईं थीं।
    सुशोभन बैनर्जी मूलतः कलकत्ता के रहने वाले आईपीएस अफसर हैं। जिनका अपराध और कानून की दुनिया से कभी कोई रिश्ता नहीं रहा। तीसरे प्रयास में वे प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पास कर सके थे। वे क्रिकेट खिलाड़ी रहे हैं और नौकरी में आने से पहले वे क्रिकेट ही खेलते रहते थे। कालेज के दिनों में ही वे शरीर सौष्ठव और फिल्मों नाटकों में अभिनय से जुड़ गए और नौकरी के दौरान फिल्मों में अभिनय करते रहे। नंदन दुबे जैसे अफसरों की मेहरबानी से उन्होंने मुंबई में घुमक्कड़ी की नौकरी की और उनकी पत्नी ने वहीं अपना कारोबार भी फैलाया। आज उनकी पत्नी मुंबई में बड़ा कारोबार चलाती हैं और बेटा फिल्मों में अभिनय करता है। सुशोभन बैनर्जी ने डीजी जेल की नौकरी भी पूरी तरह पार्ट टाईम जॉब की तरह की। जेल अधीक्षकों और जेलरों को कथित तौर पर टारगेट दिए गये थे कि वे अपने बजट का लगभग पचास फीसदी हिस्सा बचाकर चंदे के रूप में पेश करें। ये नजराना वसूलने वे स्वयं जाते थे। नतीजा ये हुआ कि आज जेलों में कैदियों को मिलने वाला 70 फीसदी बजट गुल्ली हो जाता है। कैदियों को सुविधाएं खरीदने के भरपूर मौके दिए जाते हैं।जेलों को सुरक्षा बढ़ाने के निर्देश कागजों पर हमेशा दिए जाते रहे लेकिन फील्ड पर हकीकत कुछ और थी। आज जो मीडिया सुशोभन बैनर्जी को हटा दिए जाने के बाद उनकी शान में कशीदे पढ़ रहा है उसे ये हकीकत पता करने में जरा भी रुचि नहीं है कि सुशोभन बैनर्जी ने डीजी जेल रहते हुए उनके सत्कार पर जो रकम खर्च की वो उन्होंने कहां से जुटाई थी। जिन अफसरों ने उनके इशारे पर चलने से इंकार कर दिया उनके खिलाफ विभागीय जांचें शुरु कर दीं गईं। उन्हें निलंबित भी किया गया। जेलों के प्रभार से भी हटा दिया गया।
    सुशोभन बैनर्जी की रुचि चंदा वसूलने और उसकी रकम मुंबई में पत्नी के कारोबार में लगाने बेटे को फिल्मों में काम दिलाने में तो रही ही है साथ में वे जेल में बंद महिला कैदियों में भी खासी दिलचस्पी लेते रहे हैं। जेलरों और अफसरों को कथित तौर पर निर्देश रहते थे कि वे जेलों में बंद खूबसूरत और चालाक किस्म की महिला अपराधियों को भी पेश करें। सूत्र बताते हैं कि वे अपने दौरों में शराब और शबाब के बीच महिला कैदियों से फिल्मों के लिए कहानियां भी तलाशते रहते थे। समय समय पर अपने मीडिया इंटरव्यू में वे कहते रहे हैं कि वे समाज में महिलाओं की स्थितियों को बदलने के लिए फिल्म बनाना चाहते हैं। उनके इस कथित रंगीलेपन की कहानियां जेलों में आम हो गईं थीं। यही वजह है कि जेलों में कैदियों को सुविधाएं बेचे जाने और उनसे चंदा उगाहने की परंपरा का एक नया युग शुरु हो गया था। जेलों के प्रहरी डीजी जेल के महिला प्रेम की कहानियां भी चटखारे लेकर सुनाते थे और यही वजह जेलों में गुंडागर्दी बढ़ने की असली वजह बनी। एक चर्चित जेल अधिकारी से उनकी करीबियां पूरे महकमे को मालूम है। यही महिला अधिकारी उनके नाम पर जेलों के अफसरों से चंदे के फरमान सुनाती रहती थी। जो अफसर सुनते उन्हें बजट और प्रभार भी मिल जाते और जो नहीं सुनते वे निलंबन की सजा भोगते।
    सिमी आतंकवादियों से मुठभेड़ कांड की जांच करने वाले अधिकारी तमाम पहलुओं पर विचार करने में जुटे हैं। सरकार को तो इस घटना के नाम पर एक नया कर्ज लेने का बहाना मिल गया है। उसने जेलों में एक नई चारदिवारी बनाने के नाम पर ढाई सौ करोड़ के कर्ज लेने की भी योजना प्रस्तुत कर दी है। सुशोभन बैनर्जी के स्थान पर भेजे गए 1988 बैच के आईपीएस अधिकारी सुधीर शाही की गिनती ईमानदार अफसरों में की जाती है।व्यापम कांड में अपनी सख्ती के लिए भी उनका नाम लिया जाता रहा है लेकिन सुशोभन बैनर्जी की लापरवाहियों की ओर न तो सरकार और न ही अफसरशाही कोई निगाह कर रही है। अभी हाल ही में जन्माष्टमी के कार्यक्रम में जब जेल मंत्री सुश्री कुसुम सिंह मेहदेले स्वयं मौजूद थीं तब भी सुशोभन बैनर्जी महिला कैदियों में रुचि लेने में शर्म नहीं महसूस कर रहे थे। स्वयं वरिष्ठ मंत्री ने तब टिप्पणी की थी कि इस अफसर के बारे में अब तक तो वे बहुत सुनती रहीं हैं लेकिन ये तो उससे एक कदम आगे है। जेल मंत्री के आदेशों को रद्दी की टोकरी में फेंक देने की बदतमीजी बैनर्जी इसलिए ही करते रहे क्योंकि उन्हें वरिष्ठ पुलिस अफसरों ने अपने कार्यकाल के दौरान बेजा संरक्षण दे रखा था।
    अब जबकि उन्हें इस महत्वपूर्ण पद से हटा दिया गया है तब भी उनके खिलाफ किसी किस्म की विभागीय जांच नहीं खोली गई है। एक नाकारा और बेईमान अफसर को नौकरी में रखकर पालते रहने वाली शिवराज सिंह चौहान की मजबूर सरकार तरह तरह के वायदे करके लोगों को यकीन दिलाने में जुटी है कि वह जेलों की सुरक्षा के प्रति वचन बद्ध है। इसके बावजूद लोगो में मुठभेड़ को लेकर तरह तरह के सवाल उठ रहे हैं। भोपाल में तो इस मुठभेड़ को फर्जी बताने का माहौल बनाया जा रहा है। मुस्लिम समाज के जन प्रतिनिधियों ने इस मामले पर भारी प्रदर्शन की अनुमति मांगी थी जिसे प्रशासन ने शांति व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर रद्द करवा दिया। इसके बावजूद कुछ मुस्लिम युवाओं ने इकबाल मैदान के समीप नारेबाजी करके अपना विरोध जताया।
    सरकार यदि इस मुठभेड़ कांड के बाद यदि अपनी गलती सुधारने की मंशा रखती है तो उसे अपनी जेलों में पनप रहे कुशासन पर लगाम लगानी होगी। अदालतों को भी उन कारणों पर विचार करना होगा जिनसे उनके आधिपत्य वाली जेलों में अराजकता के हालातों पर काबू पाया जा सके ।
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    सेंट्रल जेल भोपाल से बंदियों के फरार होने और मुठभेड़ की जाँच के बिन्दु तय

    आयोग का मुख्यालय भोपाल होगा, तीन माह में रिपोर्ट देगा
    राज्य सरकार द्वारा जाँच आयोग के गठन की अधिसूचना जारी
    भोपाल : सोमवार, नवम्बर 7, 2016,
    सेंट्रल जेल भोपाल से 30-31 अक्टूबर की दरम्यानी रात को आठ विचाराधीन बंदियों के जेल से भागने और मुठभेड़ में मृत्यु होने की घटना की जाँच के बिन्दु तय किये गये हैं। उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री श्री चौहान ने घटना की जाँच के लिये उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश श्री एस.के. पाण्डे की अध्यक्षता में एक-सदस्यीय जाँच आयोग गठित करने की घोषणा की थी। जाँच आयोग का मुख्यालय भोपाल (मध्यप्रदेश) होगा। आयोग अधिसूचना के मध्यप्रदेश राजपत्र में प्रकाशन की तारीख से 3 माह के भीतर जाँच पूरी कर अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को प्रस्तुत करेगा।

    राज्य शासन ने जाँच आयोग और उसके जाँच के बिन्दु की अधिसूचना आज जारी की है। जाँच आयोग जेल से विचाराधीन बंदियों के फरार होने और ग्राम मनीखेड़ा थाना गुनगा जिला भोपाल के निकट पुलिस मुठभेड़ में बंदियों की मृत्यु की घटना की जाँच निम्न बिन्दुओं पर करेगा:-

    1. दिनांक 30-31 अक्टूबर की दरम्यानी रात में केन्द्रीय जेल भोपाल से आठ विचाराधीन बंदी किन परिस्थितियों एवं घटनाक्रम में जेल से फरार हुए? उक्त घटना के लिये कौन अधिकारी एवं कर्मचारी उत्तरदायी हैं?

    2. ग्राम मनीखेड़ा थाना गुनगा जिला भोपाल के निकट 31 अक्टूबर को फरार आठ बंदियों के साथ हुई पुलिस मुठभेड़, जिसमें सभी आठ बंदियों की मृत्यु किन परिस्थितियों एवं घटनाक्रम में हुई?

    3. क्या मुठभेड़ में पुलिस द्वारा की गयी कार्यवाही तत्समय विद्यमान परिस्थितियों में युक्ति-युक्त थी?

    4. कारागार से बंदियों के फरार होने की घटना की पुनरावृत्ति न हो, इसके संबंध में सुझाव।

    5. ऐसा अन्य विषय, जो जाँच के लिये अनुषांगिक हो।