Category: अर्थ संसार

  • कार बाजार में चीनी कंपनियों का बोलबाला

    कार बाजार में चीनी कंपनियों का बोलबाला

    भारत का इलेक्ट्रिक कार बाजार तेजी से बदल रहा है। कुछ साल पहले इलेक्ट्रिक कारों का बाजार लगभग पूरी तरह टाटा मोटर्स के आसपास दिखाई देता था। अब चीनी कंपनियों की तकनीक और उनके साथ साझेदारी करने वाली कंपनियों ने प्रतिस्पर्धा बढ़ा दी है। इसका सबसे बड़ा असर भारतीय उपभोक्ता पर पड़ा है। उसे अब ज्यादा मॉडल, ज्यादा फीचर और अलग-अलग कीमतों में इलेक्ट्रिक कारों के विकल्प मिल रहे हैं।

    2025 में भारत में करीब 1.77 लाख इलेक्ट्रिक कारें बिकीं। टाटा मोटर्स 70 हजार से ज्यादा कारों के साथ सबसे आगे रही। JSW MG Motor करीब 51 हजार कारों के साथ दूसरे स्थान पर रही। चीन की BYD ने करीब 5,400 कारें बेचीं। इससे साफ है कि भारत के इलेक्ट्रिक कार बाजार पर चीन का सीधा कब्जा नहीं है। फिर भी चीन का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है।

    MG की मूल कंपनी चीन की SAIC Motor है। भारत में JSW के साथ साझेदारी के बाद MG का कारोबार तेजी से बढ़ा है। MG Windsor ने 2026 की पहली छमाही में देश की सबसे ज्यादा बिकने वाली इलेक्ट्रिक कार का स्थान हासिल किया। चीन की BYD भी भारत में अपने इलेक्ट्रिक मॉडल बेच रही है। चीन की Chery की तकनीक भारतीय कंपनियों के नए इलेक्ट्रिक वाहन कार्यक्रमों तक पहुंच रही है। इस तरह चीन की भूमिका केवल अपनी कार बेचने तक सीमित नहीं रह गई है।

    भारतीय कार कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती कीमत और तकनीक की है। चीन ने इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग के लिए बैटरी, मोटर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और सॉफ्टवेयर की बड़ी आपूर्ति व्यवस्था तैयार कर ली है। वहां इलेक्ट्रिक कार बनाने वाली कंपनियों के बीच जबरदस्त प्रतिस्पर्धा है। इससे कंपनियां कम कीमत में ज्यादा फीचर देने के लिए मजबूर हैं। भारतीय कंपनियों के सामने अभी ऐसी बड़ी और तैयार सप्लाई चेन नहीं है। बैटरी और कई महत्वपूर्ण कलपुर्जों के लिए आयात पर निर्भरता बनी हुई है। इससे लागत बढ़ती है और नए मॉडल बाजार में लाने में समय लगता है।

    भारतीय कंपनियों की दूसरी कमजोरी मॉडल पेश करने की गति है। आज का ग्राहक केवल कार नहीं खरीदना चाहता। वह बेहतर बैटरी, ज्यादा रेंज, तेज चार्जिंग, आधुनिक स्क्रीन, कनेक्टेड फीचर और आरामदायक इंटीरियर चाहता है। चीनी कंपनियां इन जरूरतों को तेजी से पहचानकर नए मॉडल बाजार में ला रही हैं। भारतीय कंपनियों को भी इसी गति से काम करना होगा।

    सरकार को भी इस प्रतिस्पर्धा को केवल विदेशी कंपनियों को रोकने के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। प्राथमिकता भारतीय उपभोक्ता को बेहतर और सस्ती कार उपलब्ध कराने की होनी चाहिए। सरकार ऐसी नीतियां बनाए जिससे भारत में बैटरी, मोटर, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य जरूरी कलपुर्जों का उत्पादन बढ़े। कंपनियों को अनुसंधान और नई तकनीक विकसित करने के लिए प्रोत्साहन मिले। साथ ही ऐसी प्रतिस्पर्धा बनी रहे जिसमें विदेशी और घरेलू कंपनियां भारतीय ग्राहक के लिए बेहतर उत्पाद बनाने को मजबूर हों।

    चीनी कंपनियों को रोकने का सबसे प्रभावी रास्ता केवल आयात नियंत्रण नहीं है। भारतीय कंपनियों को कीमत, गुणवत्ता, तकनीक, रेंज और सेवा में उनसे बेहतर विकल्प देना होगा। भारतीय ग्राहक जिस कार को अपने पैसे के बदले सबसे अच्छा समझेगा, वही बाजार में टिकेगी।

    भारत के लिए लक्ष्य साफ होना चाहिए। घरेलू कार निर्माता ऐसी कार बनाएं जो भारतीय परिवार की जरूरत, भारतीय सड़कों, भारतीय मौसम और भारतीय बजट के अनुकूल हो। चीन से मुकाबला सीमा खींचकर नहीं, भारतीय उपभोक्ता को बेहतर कार देकर किया जा सकता है।

  • बलूचिस्तान की आवाज ने खोली पाक की पोल

    बलूचिस्तान की आवाज ने खोली पाक की पोल

    -पूनम सरकार-

    11 अगस्त को बलूच राष्ट्रवादियों ने जिस दिन को ‘बलूचिस्तान स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में मनाया, वह केवल पाकिस्तान के लिए एक राजनीतिक चुनौती नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति का संकेत भी है। जुलाई 2026 में बलूच राष्ट्रवादी नेता मीर यार बलोच ने पाकिस्तान से अलग होकर ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ की घोषणा की और अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेषकर भारत से समर्थन और मान्यता की अपील की। हालांकि इस घोषणा को स्वतंत्र राष्ट्र बनने के बराबर समझना अभी जल्दबाजी होगी। वर्तमान स्थिति में किसी भी संप्रभु देश ने बलूचिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में औपचारिक मान्यता नहीं दी है और पाकिस्तान का नियंत्रण अभी भी क्षेत्र के बड़े हिस्से पर कायम है।सोशल मीडिया पर बलूचिस्तान को इजराईल की ओर से पृथक राष्ट्र के रूप में मान्यता दिए जाने की बातें उठाई गईं लेकिन अब तक वहां की सरकार ने या संयुक्त राष्ट्र ने किसी तरह की घोषणा नहीं की है।

    11 अगस्त का महत्व भारत पाक विभाजन के इतिहास से जुड़ा है। ब्रिटिश भारत के विभाजन के समय कलात रियासत की संप्रभुता को लेकर अलग व्यवस्था बनी थी। 11 अगस्त 1947 को कलात और पाकिस्तान के बीच स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट हुआ था, जिसे बलूच राष्ट्रवादी अपनी स्वतंत्रता की ऐतिहासिक आधारभूमि मानते हैं। कलात कुछ समय स्वतंत्र रहा, लेकिन मार्च 1948 में उसके पाकिस्तान में विलय के बावजूद बलूच असंतोष समाप्त नहीं हुआ।

    बलूचिस्तान का वर्तमान संकट केवल जातीय राष्ट्रवाद का परिणाम नहीं है। इसके पीछे संसाधनों पर नियंत्रण, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आर्थिक हिस्सेदारी, सैन्य कार्रवाई, कथित जबरन गुमशुदगियां और मानवाधिकारों के प्रश्न भी हैं। बलूचिस्तान पाकिस्तान का क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा प्रांत है और प्राकृतिक संसाधनों तथा रणनीतिक समुद्री स्थिति के कारण उसका महत्व असाधारण है। ग्वादर बंदरगाह और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा इसी भूभाग को चीन की रणनीतिक परियोजना का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाते हैं।

    यही कारण है कि बलूचिस्तान का प्रश्न पाकिस्तान-चीन संबंधों से भी जुड़ जाता है। यदि वहां राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती है तो ग्वादर और CPEC की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। बलूच विद्रोही संगठनों के हमले पहले ही चीन के हितों के लिए गंभीर सुरक्षा चुनौती बन चुके हैं। पाकिस्तान के लिए समस्या यह है कि जिस प्रांत को वह सैन्य शक्ति से नियंत्रित करना चाहता है, वही उसकी समुद्री रणनीति, खनिज संसाधनों और चीन के साथ आर्थिक संबंधों का महत्वपूर्ण आधार है।

    भारत के संदर्भ में यह मुद्दा और अधिक महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2016 के लाल किले के भाषण में पहली बार सार्वजनिक रूप से बलूचिस्तान, गिलगित और पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर के लोगों के प्रति समर्थन का उल्लेख किया था। यह पाकिस्तान की कश्मीर-केंद्रित कूटनीति के सामने भारत की रणनीतिक भाषा में महत्वपूर्ण बदलाव था।

    लेकिन भारत ने आज तक बलूचिस्तान को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता नहीं दी है। यह अंतर समझना जरूरी है। भारत का बलूचिस्तान के मानवाधिकार प्रश्न को अंतरराष्ट्रीय विमर्श में उठाना एक बात है और किसी अलगाववादी संगठन को औपचारिक राजनयिक मान्यता देना दूसरी। मौजूदा भारतीय नीति इसी सीमा के भीतर दिखाई देती है।

    पाकिस्तान की वर्तमान कमजोरी का पूरा श्रेय केवल मोदी सरकार की नीतियों को देना भी तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। पाकिस्तान की आर्थिक कठिनाइयों के पीछे दशकों से चली आ रही कम कर-संग्रह, भारी ऋण, ऊर्जा संकट, सैन्य व्यय, राजनीतिक अस्थिरता और कमजोर संस्थागत व्यवस्था जैसे अनेक कारण हैं। IMF के अनुसार 2026 में पाकिस्तान की वास्तविक GDP वृद्धि का अनुमान 3.6 प्रतिशत है और मार्च 2026 तक IMF के प्रति उसका बकाया लगभग 7.14 अरब SDR था।पाकिस्तान को मिलने वाले ये SDR उसके विदेशी मुद्रा भंडार का हिस्सा बनते हैं, जिससे देश को अपनी अर्थव्यवस्था संभालने और अंतरराष्ट्रीय भुगतान करने में मदद मिलती है।

    फिर भी मोदी सरकार के दौर में भारत ने पाकिस्तान के प्रति अपनी रणनीति अवश्य बदली है। आतंकवाद के बाद कूटनीतिक दबाव, सीमा-पार कार्रवाई, पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग-थलग करने का प्रयास और 2025 में सिंधु जल संधि को ‘होल्ड’ पर रखने का फैसला इसी कठोर नीति का हिस्सा हैं। भारत सरकार ने इसे आतंकवाद के समर्थन से जोड़ते हुए पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाने का निर्णय बताया।

    2026 के पाकिस्तान बजट में भी तस्वीर चिंताजनक है। रक्षा व्यय लगभग 3 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपये रखा गया, जिसमें 18 प्रतिशत वृद्धि हुई, जबकि संघीय विकास व्यय लगभग 1 ट्रिलियन रुपये तक सीमित रहा। इसका अर्थ है कि पाकिस्तान को सुरक्षा और ऋण दायित्वों के बीच विकास के लिए सीमित वित्तीय गुंजाइश मिल रही है।

    अब सबसे बड़ा प्रश्न है—क्या बलूचिस्तान का संकट पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर को भारत में वापस लाने का रास्ता खोल सकता है? उत्तर है—संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन इसे निकट भविष्य की निश्चित परिणति मानना राजनीतिक अतिशयोक्ति होगी। पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर में भी इस समय गंभीर राजनीतिक असंतोष और हिंसक विरोध देखने को मिल रहा है। अगस्त 2026 की रिपोर्टों के अनुसार वहां चुनावी विवाद, आर्थिक शिकायतों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सवालों ने बड़े आंदोलन का रूप लिया है।

    यदि पाकिस्तान की आंतरिक कमजोरियां एक साथ बढ़ती हैं—बलूचिस्तान में विद्रोह, सिंध में असंतोष, खैबर पख्तूनख्वा में सुरक्षा संकट और पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर में राजनीतिक अस्थिरता—तो इस्लामाबाद की प्रशासनिक और सैन्य क्षमता पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति भारत के लिए कूटनीतिक अवसर अवश्य पैदा कर सकती है, लेकिन किसी क्षेत्र का भारत में विलय केवल पाकिस्तान के कमजोर पड़ने से स्वतः नहीं हो जाता। उसके लिए स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियां, अंतरराष्ट्रीय समर्थन, सुरक्षा व्यवस्था और दीर्घकालीन कूटनीतिक रणनीति निर्णायक होंगी।

    आज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि पाकिस्तान जिस कश्मीर को भारत के विरुद्ध अपनी राष्ट्रीय पहचान का आधार बनाता रहा है, उसी के कुछ हिस्सों में अब शासन और प्रतिनिधित्व को लेकर असंतोष सामने आ रहा है; दूसरी ओर बलूचिस्तान में स्वतंत्रता की मांग पहले से अधिक अंतरराष्ट्रीय चर्चा में है। पाकिस्तान ने इसी बीच विदेशी मीडिया की गतिविधियों पर भी नियंत्रण बढ़ाया है, जिसकी अंतरराष्ट्रीय प्रेस संगठनों ने आलोचना की है।

    इसलिए 11 अगस्त का ‘बलूचिस्तान स्वतंत्रता दिवस’ फिलहाल किसी नए राष्ट्र के जन्म का प्रमाण नहीं, बल्कि पाकिस्तान की संघीय संरचना, उसकी राष्ट्रीय पहचान और उसकी सुरक्षा-नीति के सामने खड़े गहरे प्रश्नों का प्रतीक है। भारत के लिए इसका अर्थ पाकिस्तान के विघटन की घोषणा नहीं, बल्कि एक ऐसे भू-राजनीतिक अवसर का उभरना है जिसमें भारत को जल्दबाजी के बजाय संयम, कूटनीति, आर्थिक शक्ति और अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर अपनी दीर्घकालीन रणनीति आगे बढ़ानी होगी। इतिहास में राष्ट्र केवल घोषणाओं से नहीं बनते—उन्हें भूगोल, जनसमर्थन, संस्थाएं, अंतरराष्ट्रीय मान्यता और टिकाऊ शासन मिलकर वास्तविकता बनाते हैं।

  • सेवा का मुनाफा बांटता इक्विटास बैंक

    सेवा का मुनाफा बांटता इक्विटास बैंक

    भारतीय बैंकिंग व्यवस्था में आम तौर पर बैंक को जमा लेने, ऋण देने और मुनाफा कमाने वाली वित्तीय संस्था के रूप में देखा जाता है। लेकिन इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक ने इस पारंपरिक परिभाषा में एक महत्वपूर्ण नया अध्याय जोड़ने का प्रयास किया है। यहां बैंकिंग को बैलेंस शीट और मुनाफे का कारोबार बनाने के साथ आर्थिक रूप से वंचित वर्गों को मुख्यधारा से जोड़ने और समाज में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम भी बनाया गया है। इस सोच के केंद्र में रहे हैं बैंक के संस्थापक और पूर्व एमडी एवं सीईओ पी. एन. वासुदेवन।

    इक्विटास की कहानी 2007 में माइक्रोफाइनेंस संस्था के रूप में शुरू हुई और 2016 में यह बैंक बना। वासुदेवन की प्रबंधन शैली की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने छोटे और अनौपचारिक कारोबार करने वाले लोगों को बैंकिंग व्यवस्था के योग्य बनाने के बजाय बैंकिंग व्यवस्था को उनकी जरूरतों के अनुरूप ढालने का प्रयास किया। बैंक ने छोटे व्यापारियों, वाहन मालिकों, लघु उद्यमियों और निम्न आय वर्ग के ग्राहकों के लिए ऐसे ऋण मॉडल विकसित किए जिनमें स्थानीय आर्थिक परिस्थितियों और ग्राहक की वास्तविक क्षमता को महत्व दिया गया। बैंक के दस्तावेजों के अनुसार समय के साथ ऋण पोर्टफोलियो को असुरक्षित माइक्रोफाइनेंस से अधिक सुरक्षित ऋणों की ओर मोड़ा गया। 2024-25 में बैंक के लगभग 88 प्रतिशत ऋण सुरक्षित थे।

    यही परिवर्तन इक्विटास की प्रबंधन रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। केवल तेजी से ऋण बांटना लक्ष्य नहीं रहा, बल्कि जोखिम को समझते हुए ऋण की गुणवत्ता सुधारना भी प्राथमिकता बनी। छोटे व्यवसाय ऋण इसका प्रमुख उदाहरण है। 2024-25 में Small Business Loans का पोर्टफोलियो 25 प्रतिशत बढ़कर 16,383 करोड़ रुपये हुआ और इस खंड का GNPA 2.54 प्रतिशत रहा। बैंक ने डिजिटल माध्यम से भी इस कारोबार को विस्तार दिया।

    वासुदेवन की सोच का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू था—ग्राहक को केवल उधार लेने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि भविष्य का बैंकिंग ग्राहक और उद्यमी मानना। यही कारण है कि बैंक ने डिजिटल बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग, इन-हाउस UPI अवसंरचना और ग्राहक संबंध प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में निवेश किया। 2025 में बैंक ने ‘Equitas 2.0’ क्लाउड-नेटिव डिजिटल बैंकिंग प्लेटफॉर्म शुरू किया और UPI infrastructure को भी अपने नियंत्रण में लाने की दिशा में कदम बढ़ाया।

    इक्विटास की सबसे अलग पहचान हालांकि ‘Beyond Banking’ है। बैंक अपनी आधिकारिक जानकारी में कहता है कि वह सालाना शुद्ध लाभ का 5 प्रतिशत तक Equitas Development Initiatives Trust और Equitas Healthcare Foundation के माध्यम से स्वास्थ्य, शिक्षा, वित्तीय समावेशन और सामाजिक परिवर्तन पर खर्च करता है। बैंक के अनुसार उसकी इन पहलों से अब तक लगभग 1.47 करोड़ लोगों को लाभ पहुंचा है। इनमें स्वास्थ्य शिविरों के 81.98 लाख से अधिक लाभार्थी, 7.12 लाख से अधिक महिलाओं का कौशल प्रशिक्षण, 3.39 लाख से अधिक युवाओं को रोजगार और 29,000 से अधिक मरीजों का श्रंगेरी शारदा इक्विटास अस्पताल में उपचार शामिल है।

    श्रंगेरी शारदा इक्विटास अस्पताल इस विचार का सबसे प्रभावशाली उदाहरण है। श्रंगेरी शारदा पीठ (मठ)के सहयोग से स्थापित यह अस्पताल कैंसर और मल्टी-स्पेशियलिटी उपचार को अपेक्षाकृत सुलभ बनाने की दिशा में काम करता है। यहां बैंकिंग की कमाई का एक हिस्सा ऐसी व्यवस्था खड़ी करने में लगाया जा रहा है जिसका प्रत्यक्ष लाभ उन लोगों तक पहुंचता है जो महंगे स्वास्थ्य उपचार का खर्च उठाने में कठिनाई महसूस करते हैं। इसीलिए ‘आपका पैसा केवल ब्याज नहीं कमाता, बल्कि समाज में भी काम करता है’—इक्विटास के ‘Beyond Banking’ संदेश का मूल आधार है।

    अब प्रश्न यह है कि निवेशक और जमाकर्ता इक्विटास को किस नजर से देखें? इसका उत्तर केवल सामाजिक कार्यों में नहीं, बैंक की वित्तीय प्रगति में भी तलाशना होगा। दिसंबर 2025 तक बैंक के सकल अग्रिम लगभग 43,269 करोड़ रुपये पहुंच गए थे। सितंबर 2025 की तुलना में तिमाही आधार पर 10.60 प्रतिशत और दिसंबर 2024 की तुलना में 15.86 प्रतिशत वृद्धि दर्ज हुई।

    जनवरी 2026 में जारी तीसरी तिमाही के परिणामों में बैंक ने 90 करोड़ रुपये का तिमाही शुद्ध लाभ दर्ज किया, जो पिछले वर्ष की समान तिमाही से 36 प्रतिशत अधिक था। सकल अग्रिम में 16 प्रतिशत की सालाना वृद्धि हुई, जबकि वितरण 28 प्रतिशत बढ़कर 6,557 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा। बैंक की पूंजी पर्याप्तता 20.47 प्रतिशत रही और लागत-ए-धन घटकर 7.13 प्रतिशत हुई।फिजूलखर्ची रोककर बैंक अपने ग्राहकों के बीच मुनाफा बांटने की जो ईमानदारी दिखाता है वह बैंक के कारोबार को निरंतर आगे बढ़ा रहा है।

    इन आंकड़ों के बीच एक सावधानी भी जरूरी है। माइक्रोफाइनेंस क्षेत्र में दबाव के कारण 2025 की पहली तिमाही में बैंक को 330 करोड़ रुपये के अतिरिक्त प्रावधान करने पड़े थे और उस तिमाही में 224 करोड़ रुपये का घाटा दर्ज हुआ था। बाद की तिमाहियों में लाभ और कारोबार में सुधार दिखाई दिया। इसलिए इक्विटास को जोखिम-मुक्त बैंक मानना उचित नहीं होगा। बैंकिंग में हमेशा ऋण गुणवत्ता, ब्याज दर, जमा वृद्धि, पूंजी पर्याप्तता और नियामकीय जोखिम पर नजर रखना आवश्यक है। इक्विटास बैंक ने अपने परिचालन की लागत घटाकर एकत्रित पूंजी के उचित निवेश से ज्यादा मुनाफा कमाया। यही वजह है कि आज बैंकिंग कारोबार में ये बैंक अपने निवेशकों को सबसे ज्यादा मुनाफा दिला पा रहा है।

    फिर भी इक्विटास की विशेषता यह है कि उसने एक कठिन प्रश्न का व्यावहारिक उत्तर देने की कोशिश की है—क्या बैंक ग्राहक के पैसे को सुरक्षित रखते हुए उसे आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बना सकता है? पी. एन. वासुदेवन की प्रबंधन सोच ने इसी प्रश्न को बैंक की संस्कृति का हिस्सा बनाया। उनके नेतृत्व में विकसित मॉडल में वित्तीय समावेशन, डिजिटल तकनीक, सुरक्षित ऋण, ग्राहक विश्वास और सामाजिक उत्तरदायित्व को एक साथ रखा गया।

    जमाकर्ता के लिए इसका अर्थ यह है कि बैंक चुनते समय केवल अधिक ब्याज दर देखना पर्याप्त नहीं है। बैंक की वित्तीय स्थिति, जोखिम प्रबंधन, पूंजी और नियामकीय सुरक्षा भी देखनी चाहिए। इक्विटास की जमा राशि भी अन्य पात्र बैंक जमाओं की तरह लागू नियमों के अनुसार जमा बीमा व्यवस्था के दायरे में आती है। इसलिए बड़े निवेश को केवल आकर्षक ब्याज के आधार पर किसी एक बैंक में केंद्रित करने के बजाय अपनी जोखिम क्षमता और नियामकीय सीमाओं को ध्यान में रखना अधिक समझदारी है।

    इक्विटास की वास्तविक उपलब्धि शायद यही है कि उसने बैंकिंग को ‘पैसे का कारोबार’ भर न मानकर ‘विश्वास का कारोबार’ बनाने की कोशिश की है। जब बैंक की जमा राशि छोटे उद्यमी को कारोबार खड़ा करने में मदद करती है, किसी महिला को कौशल देकर रोजगार से जोड़ती है, किसी बच्चे को शिक्षा देती है और किसी जरूरतमंद मरीज को इलाज उपलब्ध कराती है, तब बैंकिंग की परिभाषा कुछ व्यापक हो जाती है।यही वजह है कि

  • आसान हुई खुद को श्रेष्ठि बताने वाले कर चोरों की छानबीन

    आसान हुई खुद को श्रेष्ठि बताने वाले कर चोरों की छानबीन

    देश में आयकर देने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यह बदलाव केवल सरकारी राजस्व के लिए महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इस बात का संकेत भी है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा अब औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से जुड़ रहा है। वित्त वर्ष 2020-21 में 6.72 करोड़ आयकर रिटर्न दाखिल हुए थे, जो वित्त वर्ष 2024-25 में बढ़कर 9.19 करोड़ हो गए। यानी पांच वर्षों में रिटर्न दाखिल करने वालों की संख्या लगभग 36 प्रतिशत बढ़ी है। वित्त वर्ष 2013-14 में व्यक्तिगत आयकर रिटर्न की संख्या 3.91 करोड़ थी। इस दृष्टि से देखें तो एक दशक से कुछ अधिक समय में आयकर रिटर्न दाखिल करने वालों की संख्या दोगुने से भी अधिक हो गई है।सरकार ने काले धन को देश की अर्थव्यवस्था में लाने के लिए आयकर विभाग में कुशल लोगों की भर्तियां करने का अभियान चला रखा है,जाहिर है कि आने वाले समय में देश की आय को और भी ज्यादा उत्पादक कार्यों में लगाए जाने की प्रवृत्ति को बढ़ाया जा सकेगा।

    करदाताओं की बढ़ती संख्या के साथ प्रत्यक्ष कर संग्रह में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वित्त वर्ष 2024-25 के शुरुआती आंकड़ों में 17 जून 2024 तक सकल प्रत्यक्ष कर संग्रह 5.16 लाख करोड़ रुपये था, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 4.22 लाख करोड़ रुपये से 22.19 प्रतिशत अधिक था। इसी अवधि में शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह 4.63 लाख करोड़ रुपये रहा, जिसमें व्यक्तिगत आयकर और प्रतिभूति लेनदेन कर का हिस्सा 2.81 लाख करोड़ रुपये था। अग्रिम कर संग्रह भी 27.34 प्रतिशत बढ़कर 1.49 लाख करोड़ रुपये पहुंचा था।

    वित्त वर्ष 2024-25 के पूरे सरकारी खातों में केंद्र को शुद्ध कर राजस्व के रूप में लगभग 24.99 लाख करोड़ रुपये प्राप्त हुए। इससे स्पष्ट है कि कर संग्रह सरकार की विकास योजनाओं, राज्यों को करों के हस्तांतरण, बुनियादी ढांचे और सामाजिक योजनाओं के वित्तपोषण का सबसे महत्वपूर्ण आधार है।

    लेकिन इन उपलब्धियों के बावजूद आयकर व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि देश की वास्तविक आर्थिक गतिविधि और घोषित कर योग्य आय के बीच मौजूद अंतर को किस प्रकार कम किया जाए। करदाताओं की संख्या बढ़ना अच्छी बात है, लेकिन केवल रिटर्न की संख्या बढ़ना पर्याप्त नहीं है। सवाल यह है कि जिन लोगों की वास्तविक आय कर योग्य सीमा में आती है, क्या वे सभी अपनी पूरी आय घोषित कर रहे हैं?

    आयकर चोरी का स्वरूप भी अब बदल चुका है। पहले नकद लेन-देन और आय छिपाना इसके प्रमुख माध्यम माने जाते थे। अब फर्जी खर्च दिखाना, गलत कटौती और छूट का दावा करना, कारोबार का वास्तविक टर्नओवर कम बताना, फर्जी बिल और कागजी कंपनियों का इस्तेमाल करना, बेनामी संपत्ति रखना तथा अलग-अलग खातों और संस्थाओं के माध्यम से वास्तविक आय को विभाजित करना इसके आधुनिक तरीके हो सकते हैं। विदेशों में रखी संपत्ति और वित्तीय खातों की जानकारी भी कर प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण हो गई है।

    इसलिए आयकर विभाग की भूमिका केवल रिटर्न की जांच करने वाले विभाग की नहीं रह सकती। उसे आधुनिक डेटा-आधारित कर प्रशासन में बदलना होगा। आज सरकार के पास आयकर रिटर्न के साथ-साथ टीडीएस, जीएसटी, बैंकिंग लेन-देन, प्रतिभूति बाजार, संपत्ति खरीद-बिक्री और अन्य वित्तीय गतिविधियों से जुड़ी बड़ी मात्रा में जानकारी उपलब्ध है। Annual Information Statement यानी AIS और Project Insight जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से विभाग डेटा एनालिटिक्स का इस्तेमाल कर रहा है। प्री-फिल्ड रिटर्न की व्यवस्था ने भी अनुपालन को आसान बनाया है।

    अब आवश्यकता इस व्यवस्था को और अधिक वैज्ञानिक बनाने की है। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति की घोषित वार्षिक आय 10 लाख रुपये है, लेकिन उसके नाम पर करोड़ों रुपये की संपत्ति खरीद, बड़े निवेश, अत्यधिक वित्तीय लेन-देन या अन्य असामान्य गतिविधियां दिखाई देती हैं, तो सिस्टम को ऐसे मामले को स्वतः जोखिम श्रेणी में डालना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं कि हर ऐसे व्यक्ति को कर-चोर मान लिया जाए। पहले उसे अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर मिले और उसके बाद ही जांच आगे बढ़े। इससे ईमानदार करदाता भी सुरक्षित रहेगा और वास्तविक कर-चोरी पकड़ना भी आसान होगा।

    इसी प्रकार ऐसे लोगों और संस्थाओं पर भी कार्रवाई आवश्यक है जो कर चोरी के लिए पूरा तंत्र तैयार करते हैं। फर्जी कटौती, नकली दस्तावेज, फर्जी बिल या गलत रिटर्न तैयार करने वाले बिचौलिये और संगठित नेटवर्क कर-चोरी को बढ़ावा देते हैं। केवल अंतिम करदाता पर कार्रवाई करके इस समस्या को समाप्त नहीं किया जा सकता। जिस व्यक्ति ने जानबूझकर गलत जानकारी दी और जिसने उसे गलत जानकारी देने का रास्ता उपलब्ध कराया, दोनों की भूमिका अलग-अलग जांची जानी चाहिए।

    कर प्रशासन में एक और बड़ा सुधार यह होना चाहिए कि ईमानदार और कम जोखिम वाले करदाताओं को बार-बार जांच और नोटिस से परेशान न किया जाए। दूसरी ओर बड़े और असामान्य वित्तीय अंतर वाले मामलों की जांच अधिक गहराई से हो। कर विभाग के सीमित अधिकारियों और संसाधनों का उपयोग वास्तविक जोखिम वाले मामलों पर होना चाहिए।

    फेसलेस असेसमेंट इस दिशा में महत्वपूर्ण सुधार है। 2019 में शुरू हुई फेसलेस ई-असेसमेंट व्यवस्था ने करदाता और आकलन अधिकारी के बीच प्रत्यक्ष संपर्क को कम किया है और प्रक्रिया को डिजिटल बनाया है। लेकिन तकनीक के साथ जवाबदेही भी जरूरी है। यदि किसी करदाता को नोटिस मिलता है तो उसे यह स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए कि विभाग ने कौन-सी सूचना के आधार पर सवाल उठाया है, उसे जवाब देने के लिए पर्याप्त अवसर मिले और अपील की प्रक्रिया सरल तथा समयबद्ध हो।

    आयकर व्यवस्था में सुधार का एक महत्वपूर्ण पक्ष कानून को सरल बनाना भी है। नया आयकर कानून लागू होने के बाद सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि कानून की भाषा और प्रक्रियाएं वास्तव में आम करदाता के लिए कितनी सरल बनती हैं। कर कानून जितना जटिल होगा, करदाता उतना ही अधिक सलाहकारों और मध्यस्थों पर निर्भर रहेगा। सरल कानून का अर्थ केवल धाराओं की संख्या कम करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें सामान्य नागरिक अपनी आय, कटौती और कर देनदारी को बिना अत्यधिक तकनीकी सहायता के समझ सके।

    कर चोरी रोकने के लिए नकदी आधारित अर्थव्यवस्था को लगातार सीमित करना भी जरूरी है। डिजिटल भुगतान और बैंकिंग व्यवस्था के विस्तार ने सरकार को वित्तीय गतिविधियों की बेहतर तस्वीर उपलब्ध कराई है। लेकिन छोटे कारोबारियों और नकद अर्थव्यवस्था से जुड़े क्षेत्रों को अचानक अपराधी की तरह देखने के बजाय उन्हें औपचारिक अर्थव्यवस्था में आने के लिए प्रोत्साहन देना अधिक प्रभावी होगा। अनुपालन जितना सरल और कम खर्चीला होगा, स्वैच्छिक कर भुगतान उतना ही बढ़ेगा।

    सबसे महत्वपूर्ण सुधार करदाता और सरकार के बीच विश्वास का होना है। ईमानदारी से कर देने वाले नागरिक को यह महसूस होना चाहिए कि उसकी जानकारी सुरक्षित है, उसे अनावश्यक परेशान नहीं किया जाएगा और उसकी शिकायत का समय पर समाधान होगा। दूसरी ओर जानबूझकर आय छिपाने वाले बड़े करदाताओं, फर्जी लेन-देन करने वालों और संगठित कर-चोरी के नेटवर्क के प्रति व्यवस्था को कठोर होना चाहिए।

    भारत में आयकर रिटर्न की संख्या 9 करोड़ से ऊपर पहुंच चुकी है। यह केवल एक आंकड़ा नहीं बल्कि बदलते भारत की आर्थिक तस्वीर है। अब चुनौती यह नहीं है कि अधिक से अधिक लोगों को किसी तरह कर-जाल में लाया जाए। चुनौती यह है कि जो व्यक्ति कानून के अनुसार कर देने योग्य है, वह अपनी वास्तविक आय घोषित करे; जो ईमानदारी से कर देता है उसे सुविधा मिले और जो जानबूझकर सार्वजनिक राजस्व को नुकसान पहुंचाता है, उसके लिए बच निकलने की गुंजाइश लगातार कम होती जाए।

    कर संग्रह बढ़ना देश की आर्थिक शक्ति का संकेत है, लेकिन कर-न्याय उससे भी बड़ा लक्ष्य है। आने वाले समय में भारत की आयकर व्यवस्था की सफलता इस बात से मापी जानी चाहिए कि वह कितनी कम लागत में कितनी अधिक वास्तविक आय को कर-जाल में ला पाती है, ईमानदार करदाता को कितना कम परेशान करती है और संगठित कर-चोरी पर कितनी प्रभावी चोट करती है। यही वह संतुलन है जो भारत को व्यापक कर आधार, मजबूत राजस्व और अधिक न्यायपूर्ण आर्थिक व्यवस्था की ओर ले जा सकता है।

  • विपक्ष की गोद चढ़ी तेल लाबी पर भारी पड़ा स्वदेशी इथेनाल

    विपक्ष की गोद चढ़ी तेल लाबी पर भारी पड़ा स्वदेशी इथेनाल


    देश में ई-20 (20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) को लेकर पिछले कुछ दिनों से भ्रम और विवाद का वातावरण बना हुआ है। सोशल मीडिया पर ऐसे दावे किए जा रहे हैं कि इससे वाहनों के इंजन खराब हो जाएंगे, माइलेज में भारी गिरावट आएगी और उपभोक्ताओं को नुकसान होगा। इन आशंकाओं के बीच केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि कोई यह सिद्ध कर दे कि ई-20 से किसी वाहन का इंजन खराब हुआ है तो सरकार जवाब देने को तैयार है। उन्होंने इसे देश की ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय और विदेशी मुद्रा बचत से जुड़ा राष्ट्रीय कार्यक्रम बताया है।

    वास्तव में ई-20 केवल ईंधन परिवर्तन का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह भारत की आर्थिक, कृषि और ऊर्जा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत अपनी पेट्रोलियम आवश्यकताओं का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। इस आयात पर हर वर्ष लाखों करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा खर्च होती है। ऐसे में यदि पेट्रोल में घरेलू स्तर पर उत्पादित इथेनॉल मिलाया जाता है तो आयातित पेट्रोल की आवश्यकता घटती है और विदेशी मुद्रा की बड़ी बचत होती है। केंद्र सरकार का अनुमान है कि इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम से देश को प्रतिवर्ष लगभग दो लाख करोड़ रुपये तक की बचत का दीर्घकालिक लाभ मिल सकता है।
    गडकरी बार-बार कह चुके हैं कि भारत का भविष्य केवल पेट्रोल पर आधारित नहीं रहेगा। उनका जोर—
    इथेनॉल,
    बायो-सीएनजी,
    हरित हाइड्रोजन,
    इलेक्ट्रिक वाहन,
    फ्लेक्स-फ्यूल इंजन,
    और जैव ऊर्जा
    पर है।
    वर्ष 2014 में भारत में पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण केवल लगभग 1.5 प्रतिशत था । लगातार नीति सुधार, चीनी मिलों को प्रोत्साहन और जैव ईंधन कार्यक्रम के विस्तार के कारण यह स्तर बढ़ते-बढ़ते वर्ष 2025 में 20 प्रतिशत तक पहुँच गया। यह लक्ष्य मूल रूप से वर्ष 2030 तक प्राप्त किया जाना था, लेकिन भारत ने इसे पाँच वर्ष पहले ही हासिल कर लिया।

    इथेनाल का उत्पादन वर्ष 2014 लगभग अड़तीस करोड़ लीटर होता था। 2025 तक यह बढ़कर 661 करोड़ लीटर से अधिक होने लगा। आज देश भर के लगभग पंद्ह हजार से अधिक पेट्रोल पंपों पर ई-20 पेट्रोल उपलब्ध कराया जाने लगा है।

    ई-20 को लेकर सबसे बड़ा भ्रम यही फैलाया गया कि इससे वाहन खराब हो जाएंगे। सरकार, पेट्रोलियम मंत्रालय और प्रमुख वाहन निर्माता कंपनियों का कहना है कि वर्षों के परीक्षण के बाद ही ई-20 लागू किया गया है। आधुनिक वाहनों को ई-20 के अनुरूप तैयार किया जा चुका है। पुराने वाहनों में भी व्यापक स्तर पर इंजन क्षति का कोई प्रमाण सामने नहीं आया है। हाँ, कुछ पुराने मॉडलों में 3 से 5 प्रतिशत तक माइलेज में कमी आ सकती है, क्योंकि इथेनॉल की ऊर्जा घनत्व पेट्रोल से कुछ कम होती है। लेकिन इसके बदले उच्च ऑक्टेन संख्या, कम प्रदूषण और आयात में कमी जैसे लाभ प्राप्त होते हैं। इससे इंजन की टूटफूट कम होती है और निकलने वाला धुआं कम विषैला होता है। विदेशी मुद्रा में बचत तो सबसे बड़ा लाभ है ही।

    इथेनॉल कार्यक्रम का सबसे बड़ा लाभ किसानों को मिला है। पहले चीनी मिलों में अधिशेष चीनी का संकट बना रहता था। अब गन्ने के रस, बी-हैवी शीरे तथा अन्य कृषि उत्पादों से इथेनॉल बनने लगा है। इससे चीनी मिलों की आय बढ़ी और किसानों के बकाया भुगतान में भी सुधार आया। भविष्य में मक्का तथा अन्य अनाज आधारित इथेनॉल उत्पादन बढ़ने से फसल विविधीकरण को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

    भारत में पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता एक दिन में नहीं बढ़ी। कई दशकों तक ऊर्जा सुरक्षा की बजाय आयात-आधारित व्यवस्था पर अधिक भरोसा किया गया। पेट्रोलियम विपणन, रिफाइनिंग और वितरण के विस्तार के साथ देश में ईंधन उपभोग तेजी से बढ़ा, जबकि वैकल्पिक जैव ईंधनों के विकास पर अपेक्षित गति से काम नहीं हुआ। परिणामस्वरूप पेट्रोलियम आयात का बोझ लगातार बढ़ता गया और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर देश के बजट और चालू खाते पर पड़ता रहा।बढ़ती गाड़ियों की संख्या की वजह से ये खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। वर्तमान सरकार ने इसी निर्भरता को कम करने के लिए इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को प्राथमिकता दी है।

    इथेनॉल एक नवीकरणीय जैव ईंधन है। इसके उपयोग से कार्बन उत्सर्जन में कमी आती है तथा पेट्रोल की तुलना में यह अधिक स्वच्छ ईंधन माना जाता है। भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। ई-20 उस दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    ई-20 पर विवाद का एक कारण यह भी है कि देश में करोड़ों पुराने वाहन अभी भी चल रहे हैं। कुछ उपभोक्ताओं ने माइलेज में कमी की शिकायत की है। वहीं सोशल मीडिया पर अपुष्ट वीडियो और संदेशों ने आशंकाओं को बढ़ाया। हाल के दिनों में सरकार को औपचारिक स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा कि ई-20 नीति वर्षों के परीक्षण के बाद लागू की गई है और इसे लेकर फैलाई जा रही अनेक बातें तथ्यात्मक नहीं हैं।

    भारत ऊर्जा आयात पर निर्भर देश है। यदि घरेलू स्तर पर उत्पादित इथेनॉल से विदेशी मुद्रा की बचत होती है, किसानों को नया बाजार मिलता है, प्रदूषण घटता है और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होती है, तो यह केवल ईंधन नीति नहीं बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता की रणनीति भी है। स्वाभाविक है कि इतने बड़े परिवर्तन के साथ तकनीकी प्रश्न और उपभोक्ताओं की शंकाएँ भी सामने आएँगी। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह पारदर्शी वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराए और जहाँ आवश्यक हो वहाँ पुराने वाहनों के लिए व्यावहारिक समाधान भी दे।

    ई-20 पर बहस होनी चाहिए, लेकिन उसका आधार वैज्ञानिक तथ्य और प्रमाण हों, अफवाहें नहीं। यदि भारत को आयातित तेल पर निर्भरता कम करनी है और विदेशी मुद्रा की बचत के साथ किसानों की आय बढ़ानी है, तो इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम आने वाले वर्षों में देश की ऊर्जा नीति का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ बन सकता है।

  • भाजपा के सफल विकासवाद का उद्घोष करता नर्मदा समझौता

    भाजपा के सफल विकासवाद का उद्घोष करता नर्मदा समझौता

    मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने मध्यप्रदेश के स्वर्णिम आकाश में एक जबर्दस्त छलांग लगाकर दिखाई है। विकास की अवधारणा को लेकर दशकों तक शोर मचाते आंदोलनकारी आज भी समझने को राजी नहीं हैं कि विकास की बयार किसी भी जड़ता से मीलों आगे निकल जाती है। यही नहीं देश के बड़े अखबारों के माध्यम से इन बुद्धिजीवियों ने एक बार फिर भ्रम फैलाने का खटराग शुरु कर दिया है। जबकि पूंजी को चलायमान करने वाली भाजपा की विचारधारा ने इस समझौते के माध्यम से ये संदेश देने का प्रयास किया है कि विकास की धारा को किसी कीमत पर थमने नहीं दिया जाएगा। वास्तव में नर्मदा घाटी परियोजना स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी बहुउद्देशीय नदी परियोजनाओं में गिनी जाती है। सरदार सरोवर परियोजना से जुड़े वित्तीय दायित्वों, डूब क्षेत्र, पुनर्वास और मुआवजे को लेकर मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के बीच वर्षों से विवाद चलता रहा। जुलाई 2026 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में चारों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने लंबित वित्तीय दावों और नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण (NWDT) के पुरस्कार से जुड़े मुद्दों के समाधान के लिए एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी हस्ताक्षर किए। केंद्र सरकार के अनुसार इसका उद्देश्य दशकों से लंबित भुगतान, लागत साझेदारी तथा पुनर्वास संबंधी विवादों का स्थायी समाधान करना रहा है।

    मध्यप्रदेश के दृष्टिकोण से देखें तो इस समझौते का सबसे बड़ा लाभ यह है कि लंबे समय से अटके वित्तीय दावे और भुगतान का रास्ता साफ हुआ है। पिछले कुछ वर्षों से मध्यप्रदेश सरकार का दावा रहा था कि सरदार सरोवर परियोजना के कारण राज्य की बड़ी मात्रा में राजस्व भूमि, वन भूमि तथा अन्य सरकारी संपत्तियाँ डूब क्षेत्र में चली गईं, जिनका समुचित प्रतिपूर्ति मूल्य अभी तक प्राप्त नहीं हुआ था। इस विवाद के कारण हजारों करोड़ रुपये की राशि वर्षों से लंबित थी। समझौते के बाद एकमुश्त समाधान (One-Time Settlement) की दिशा में सहमति बनने से मध्यप्रदेश की वित्तीय स्थिति को लाभ मिलने की संभावना है। डैमिंग द नर्मदा किताब लिखने वाले नर्मदा आंदोलनकारी रमेश बिल्लौरे जब गांव गांव जाकर बांध के विरोध में अलख जगाने की कोशिश कर रहे थे तब भी बांध प्रभावित बांध के विरोध में नहीं थे। उनका डर था कि उनकी संपत्तियों का मुआवजा मिलेगा भी या नहीं। तब कांग्रेस की डिफाल्टर सरकारें हुआ करती थीं और किसी को ये विश्वास नहीं था कि सरकार मुआवजा कैसे दे पाएगी।

    इस बहुपक्षीय समझौते से प्रभावित हितधारकों की सूची बहुत बड़ी है। सबसे पहले प्रभावित होंगे वे हजारों परिवार जो नर्मदा घाटी में विस्थापित हुए। यदि समझौते के अनुरूप लंबित भुगतान और पुनर्वास संबंधी दायित्वों का समयबद्ध क्रियान्वयन होता रहेगा, तो उन्हें वर्षों से लंबित राहत मिल सकती है। दूसरा बड़ा वर्ग मध्यप्रदेश सरकार का है, जिसे लंबित वित्तीय दावों के समाधान से राजकोषीय राहत मिलेगी। तीसरा लाभार्थी कृषि और सिंचाई क्षेत्र है, क्योंकि अंतरराज्यीय विवाद समाप्त होने से परियोजना के संचालन और भविष्य के जल प्रबंधन में अधिक स्थिरता आएगी। चौथा लाभ उद्योग और ऊर्जा क्षेत्र को होगा, क्योंकि परियोजना से जुड़ी बिजली उत्पादन और जल प्रबंधन योजनाओं में समन्वय बढ़ेगा।

    पुनर्वास और मुआवजे का प्रश्न नर्मदा परियोजना का सबसे संवेदनशील पक्ष रहा है। नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण ने विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश दिए थे। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने भी विभिन्न मामलों में यह स्पष्ट किया कि पुनर्वास परियोजना का अभिन्न हिस्सा है और इसके बिना निर्माण कार्य आगे नहीं बढ़ सकता। समय के साथ भूमि के बदले भूमि, नकद मुआवजा, आवासीय भूखंड, आधारभूत सुविधाएँ तथा पुनर्वास स्थलों का विकास जैसी व्यवस्थाएँ लागू की गईं। हालिया समझौते का उद्देश्य इन्हीं लंबित वित्तीय दायित्वों और भुगतान संबंधी विवादों का अंतिम निपटारा करना है, जिससे प्रभावित परिवारों और राज्यों के बीच शेष विवाद समाप्त हो सकें।

    नर्मदा आंदोलन का नेतृत्व करने वालों का कहना था कि बिना पर्याप्त पुनर्वास के बड़े बांध का निर्माण मानवाधिकारों का उल्लंघन होगा। उनके प्रयासों के कारण पुनर्वास नीति पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर बहस हुई और सरकारों को पुनर्वास मानकों में कई बार सुधार करना पड़ा।इससे जहां प्रभावितों को मुआवजा मिलना सुनिश्चित हुआ वहीं परियोजना में विलंब से देश को एक मंहगी कीमत भी चुकानी पड़ी। बांध विरोध की लड़ाई यदि परियोजना स्थापना के वक्त लड़ी गई होती तो परियोजना का रूप कुछ और हो सकता था। बाद के वर्षों में खड़ा किया गया जन असंतोष विकास के मार्ग में बड़ा अवरोध बन गया। विकास के कथित गांधीवादी मॉडल की आड़ लेकर विकास विरोधियों ने प्रदेश और देश की तरुणाई को गुमराह किया जो आज भी एक चुनौती बना हुआ है।

    सरकारों तथा परियोजना समर्थकों का मत रहा कि लगातार न्यायालयी लड़ाइयों, धरना-प्रदर्शनों और पर्यावरणीय आपत्तियों के कारण परियोजना वर्षों तक विलंबित हुई, जिससे सिंचाई, पेयजल और विद्युत उत्पादन के अपेक्षित लाभ देर से मिले तथा लागत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर परियोजना को आगे बढ़ाने की अनुमति दी, साथ ही पुनर्वास संबंधी शर्तों के पालन पर भी बल दिया। इसलिए यह कहना अधिक संतुलित होगा कि आंदोलन ने परियोजना को पूरी तरह रोक नहीं दिया, बल्कि उसके क्रियान्वयन की गति और पुनर्वास नीति—दोनों को प्रभावित किया।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की भूमिका इस समझौते में राजनीतिक और प्रशासनिक—दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण रही। उन्होंने मध्यप्रदेश की ओर से समझौते पर हस्ताक्षर कर यह संकेत दिया कि राज्य अब दशकों पुराने विवादों को समाप्त कर विकास परियोजनाओं को गति देना चाहता है। राज्य सरकार लगातार यह तर्क देती रही है कि नर्मदा परियोजना से सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन के व्यापक लाभ प्राप्त हुए हैं तथा शेष वित्तीय विवादों का समाधान विकास की गति बढ़ाएगा। समझौते में उनकी भागीदारी इस राजनीतिक प्रतिबद्धता का संकेत मानी जा रही है।
    राज्य के मुख्य सचिव अनुराग जैन ने राज्य के वित्तीय सुधारों को लागू करते हुए प्रशासनिक दक्षता का युक्तियुक्त समाधान प्रस्तुत किया। नर्मदा घाटी विकास विभाग को वे तमाम अनुमतियां दी गईं जिनसे राज्यों के बीच ये समझौता आकार ले सका। ऐसे अंतरराज्यीय समझौतों में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों का कार्य राज्यों के दावों का परीक्षण, वित्तीय देयताओं का मिलान, कानूनी बिंदुओं का समन्वय तथा अंतिम मसौदे की तैयारी करना होता है। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी से यह स्पष्ट है कि मध्यप्रदेश के अधिकारियों ने गुजरात तथा अन्य राज्यों के अधिकारियों के साथ लंबे समय तक तकनीकी और वित्तीय स्तर पर बातचीत की, जिसके बाद राजनीतिक स्तर पर अंतिम समझौता संभव हो सका। हालांकि सार्वजनिक स्रोतों में प्रत्येक वार्ता चरण में व्यक्तिगत अधिकारियों की विस्तृत भूमिका का आधिकारिक विवरण उपलब्ध नहीं है।

    समग्र रूप से देखें तो यह समझौता केवल वित्तीय विवाद का समाधान नहीं है, बल्कि सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) का एक महत्वपूर्ण उदाहरण भी है। यदि लंबित भुगतान वास्तव में समय पर हो जाते हैं, पुनर्वास के शेष मामलों का न्यायसंगत निपटारा होता है और परियोजना से जुड़े सभी राज्यों के बीच समन्वय बना रहता है, तो मध्यप्रदेश को वित्तीय, कृषि, ऊर्जा तथा जल प्रबंधन—चारों क्षेत्रों में दीर्घकालिक लाभ मिल सकते हैं। वहीं यह भी उतना ही आवश्यक होगा कि विकास के साथ विस्थापित परिवारों के अधिकारों की अनदेखी न हो। किसी भी बड़ी नदी परियोजना की सफलता केवल बांध बनने से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि उससे प्रभावित अंतिम व्यक्ति को भी न्याय मिला या नहीं। यही इस ऐतिहासिक समझौते की वास्तविक कसौटी होगी।नर्मदा समग्र के सूत्रधार अनिल माधव दवे के प्रयासों को इस समझौते ने सच्ची श्रद्धांजलि दी है जिन्होंने नर्मदा और इस जैसी माता समान नदियों के विकास को लेकर पूरी अवधारणा प्रस्तुत की थी।

  • ट्रकों में ओवरलोडिंग बंद पर चेकपोस्ट पर छानबीन शुरु

    ट्रकों में ओवरलोडिंग बंद पर चेकपोस्ट पर छानबीन शुरु

    भोपाल,25 अप्रैल,(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्यप्रदेश में परिवहन नाकों (चेकपोस्ट) को दोबारा शुरू करने के फैसले ने एक बार फिर सड़क परिवहन व्यवस्था को बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। राज्य सरकार इसे नियमों के बेहतर पालन, राजस्व में वृद्धि और अवैध गतिविधियों पर अंकुश लगाने की दिशा में जरूरी कदम बता रही है, लेकिन ट्रांसपोर्टरों के बीच इस निर्णय को लेकर गहरी चिंता और असंतोष देखने को मिल रहा है।

    दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में चेकपोस्ट व्यवस्था को समाप्त कर परिवहन प्रणाली को अधिक डिजिटल और पारदर्शी बनाने की कोशिश की गई थी। ऑनलाइन परमिट, ई-वे बिल और हाल ही में लागू किए गए व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (VLTD) जैसे उपायों के जरिए वाहनों की निगरानी को आधुनिक स्वरूप दिया गया। ट्रांसपोर्टरों का मानना है कि इन व्यवस्थाओं के बाद ओवरलोडिंग और नियमों के उल्लंघन में काफी कमी आई है। ऐसे में चेकपोस्ट की वापसी उन्हें पुराने ढर्रे की ओर लौटने जैसा प्रतीत हो रही है।

    परिवहन सचिव मनीष सिंह और परिवहन आयुक्त उमेश जोगा को दिए गए ज्ञापन में भोपाल के ट्रक आपरेटरों का कहना है कि जब तकनीकी माध्यमों से हर वाहन की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है, तब भौतिक चेकपोस्ट की जरूरत समझ से परे है। उनका यह भी आरोप है कि चेकपोस्ट व्यवस्था पहले भी देरी, अनावश्यक रोक-टोक और भ्रष्टाचार के कारण बदनाम रही है। लंबी कतारों में फंसे ट्रक न केवल समय की बर्बादी का कारण बनते हैं, बल्कि इससे माल की समय पर डिलीवरी भी प्रभावित होती है, जिसका सीधा असर व्यापार और उद्योग पर पड़ता है।

    दूसरी ओर, परिवहन विभाग का तर्क है कि केवल डिजिटल सिस्टम पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। विभाग के अधिकारियों का कहना है कि कई बार तकनीकी खामियों, डेटा में हेरफेर या नेटवर्क समस्याओं के कारण नियमों का उल्लंघन पकड़ में नहीं आ पाता। ऐसे में चेकपोस्ट एक अतिरिक्त सुरक्षा परत के रूप में काम करते हैं, जिससे ओवरलोडिंग, बिना परमिट संचालन और टैक्स चोरी जैसे मामलों पर प्रभावी नियंत्रण रखा जा सकता है।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच आर्थिक पहलू भी महत्वपूर्ण है। पहले से ही बढ़ती लागत, ईंधन की कीमतों और नई तकनीकी अनिवार्यताओं के कारण ट्रांसपोर्टर दबाव में हैं। VLTD जैसे उपकरणों पर अतिरिक्त खर्च और उनके रखरखाव की लागत ने उनकी परेशानियों को और बढ़ा दिया है। ऐसे में चेकपोस्ट पर संभावित देरी और अनौपचारिक खर्च की आशंका उन्हें और चिंतित कर रही है।

    विशेषज्ञ मानते हैं कि यह विवाद केवल चेकपोस्ट की वापसी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक असंतुलन को दर्शाता है, जो नीति निर्माण और जमीनी हकीकत के बीच मौजूद है। जहां सरकार एक सुदृढ़ और नियंत्रित परिवहन तंत्र स्थापित करना चाहती है, वहीं ट्रांसपोर्टर व्यावहारिक कठिनाइयों और आर्थिक दबावों को सामने रख रहे हैं।

    स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए यह आवश्यक हो गया है कि सरकार और ट्रांसपोर्टर आपसी संवाद के माध्यम से समाधान तलाशें। यदि चेकपोस्ट व्यवस्था को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ते हुए पारदर्शी और समयबद्ध बनाया जाए, तो संभव है कि दोनों पक्षों की चिंताओं का संतुलन स्थापित किया जा सके।

    फिलहाल, परिवहन नाकों की वापसी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सुधार के प्रयास तभी सफल होंगे, जब वे जमीनी स्तर पर व्यावहारिक और सभी हितधारकों के लिए स्वीकार्य हों। मध्यप्रदेश की परिवहन व्यवस्था एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां लिए गए फैसले आने वाले समय में इसके भविष्य की दिशा तय करेंगे।

  • समृद्धि की वैश्विक दौड़ में भारत का बजट बना ग्रोथ का इंजन

    समृद्धि की वैश्विक दौड़ में भारत का बजट बना ग्रोथ का इंजन

     “स्पीड, स्केल और संकल्प का केंद्रीय बजट”  – सीए अखिलेश जैन

    प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ना तो छोटा सोचते हैं, ना छोटा करते हैं। स्पीड और स्केल अपने आप में भिन्न होती है। कार्यों के परिणाम भी भिन्न होते हैं। प्रधानमंत्री जी के लक्ष्य भी भिन्न होते हैं। प्रधानमंत्री जी कार्य शुरू करके उसको 100% तक पूरा करने का प्रयास करते हैं। यह बात बिल्कुल सही है प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने 2014 में जब से देश की सत्ता संभाली है, देश के स्थापित लक्ष्यों को पीछे छोड़ते हुए जिस स्पीड और स्केल से कार्य किया है, रात दिन एक करके बिना विश्राम लिए, वह किसी भी विश्लेषक को आश्चर्यचकित करने के लिए पर्याप्त है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की अगुवाई वाली सरकार ने हमेशा निर्णायक रूप से, अस्पष्टता की जगह काम को, बातों की जगह सुधार को और लोक-लुभावन नीतियों की जगह लोगों को प्राथमिकता दी है।

    सन् 2014 में प्रति व्यक्ति की आय 86647 रुपए सालाना थी,  2023 में बढ़कर 172000 रुपए सालाना हो गई, 2026 में लगभग 2.5 लाख से 2.72 लाख रुपए सालाना के बीच तक पहुंचने का अनुमान है, इस बीच में कोरोना जैसी वैश्विक महामारी का भी देश ने सामना किया। कोरोना के बावजूद 2022-23 में प्रति व्यक्ति आय 172000 रुपए सालाना, मतलब लगभग 9 वर्षों में प्रति व्यक्ति आय को दोगुना करने में, प्रधानमंत्री जी वैश्विक अनिश्चिताओं, वैश्विक उथल-पुथल, वैश्विक महामारी के बाद भी 172000 रुपए सालाना आय के लक्ष्य प्राप्त करने में सफल रहे। यही प्रति व्यक्ति आय 2024 – 2025 में 235000 रुपए सालाना तक पहुंच गई। यही प्रधानमंत्री जी की अर्थनीति, स्पीड और स्केल है, यही मोदी जी का 13 वर्षों का बजट है।

    2014-15 में प्रति व्यक्ति जीडीपी 98405 रुपए सालाना के लगभग थी, 2024 – 2025 में प्रति व्यक्ति जीडीपी 234859 रुपए सालाना तक पहुंच गई। यही मोदी जी का 13 वर्षों का बजट है।

    भारत का कुल निर्यात 2013-14 के दौरान 465 अरब अमेरिकी डॉलर के बराबर था जो 2024 – 2025 में भारत का कुल निर्यात 825.3 अरब अमेरिकी डॉलर पहुंच गया। अर्थात् 11 वर्षों में भारत का निर्यात 177.5 % की दर से सकारात्मक वृद्धि दर को प्राप्त किया। यही मोदी जी का 13 वर्षों का बजट है।

    मंदी के दौरान भी भारत ने पर्याप्त प्रत्यक्ष विदेशी निवेशकों को आकर्षित किया है। मोदी सरकार के लगातार सुधारों एवं प्रयासों के परिणाम स्वरूप एफडीआई 2013-14 में लगभग 36 अरब अमेरिकी डॉलर था। 2024-25 में 80 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गया, 222.23 % की दर से सकारात्मक वृद्धि दर को प्राप्त किया। जो निवेशकों के निरंतर विश्वास और सेवा, डिजिटल, विनिर्माण एवं बुनियादी अवसंरचनात्मक क्षेत्रों में निवेश की तेज गति को दर्शाता है। यही प्रधानमंत्री मोदी जी की अर्थनीति और 13 वर्षों बजट है।

    2014 में हाई- स्पीड कॉरिडोर की लंबाई 550 किलोमीटर थी, वित्त वर्ष 2025- 2026 में दिसंबर तक 5,364 किलोमीटर हो गई है। लगभग दस गुना बढ़ गई है। यही प्रधानमंत्री मोदी जी की स्पीड और स्केल है।

    हवाई अड्डों की संख्या 2014 में 74 थी, 2025 में 164 हो गई है। भारत घरेलू विमानन के क्षेत्र में विश्व का तीसरा सबसे बड़ा बाजार बन गया है। यही प्रधानमंत्री मोदी जी की अर्थनीति है।

    नवकरणीय ऊर्जा तथा संस्थापित सौर ऊर्जा क्षमता के मामले में भारत मार्च 2014 में 76.38 गीगावॉट पर था, नवंबर 2025 तक 253.96 गीगावाट हो गई, वैश्विक स्तर पर तीसरे स्थान पर है और स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता में चौथे स्थान पर है। कुल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता पिछले दशक में तीन गुना से अधिक बढ़ गई है। यही प्रधानमंत्री मोदी जी की अर्थनीति है।

    2014 में उच्च गति क्षमता वाली पटरियों की लंबाई 31,445 किमी थी, 2025 तक लगभग दोगुनी से भी ज्यादा होकर होकर 84,244 किमी हो गई है, जिससे राष्ट्रीय रेल नेटवर्क के लगभग 80% हिस्से पर 110 किमी प्रति घंटे से अधिक की गति से परिचालन संभव हो पा रहा है।

    उद्योग को समर्थन देना उद्योग को बढ़ाने में सहायक सिद्ध होता है। इसलिए उच्च स्तरीय उच्च गति की रेल कॉरिडोर का विकास औद्योगिक क्षेत्र के लिए विशेष सहायक होगा।
    प्रधानमंत्री मोदी जी ने सभी महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्र को हाई स्पीड रोड से जोड़ने का प्रयास किया है। यही प्रधानमंत्री मोदी जी की स्पीड और स्केल है।

    रक्षा बजट 2013-14 में 2.53 लाख करोड़ रुपये था, वर्ष 2026-27 में 7.85 लाख करोड़ रुपये हो गया है, अर्थात इसमें लगभग 5.32 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोत्तरी हुई है, जो लगभग तीन गुना वृद्धि को दर्शाता है। इस बढ़े हुए प्रावधान के माध्यम से, सरकार ने आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य की दिशा में रणनीतिक बदलाव के साथ सशस्त्र बलों और उनकी क्षमताओं को दुनिया के उच्चतम मानकों में बदलने के अपने संकल्प की पुष्टि की है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में रुकावट और विदेशी विक्रेताओं की तुलना में घरेलू आवश्यकताओं को प्राथमिकता देने ने आयात प्रतिस्थापन की आवश्यकता पर फिर से जोर दिया है और न केवल निर्वाह के लिए बल्कि भविष्य के आधुनिकीकरण के लिए स्वदेशीकरण की ओर बढ़ रहा है। यही मोदी जी का बजट है।

    13 सालों के बजट की चर्चा इसलिए भी आवश्यक है कि आज देश जिस स्थिति में खड़ा है उस स्थिति को प्राप्त करने में कोई एक बजट महत्वपूर्ण नहीं है, आज की स्थिति जो भारत ने प्राप्त की है इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए मोदी जी को विरासत में मिला भारत और विरासत को मोदी जी के द्वारा सजाया संवारा गया है। इन दोनों चीजों का परिणाम आज का वर्तमान भारत है और भविष्य का भारत आज के भारत से आगे के भारत के लिए की गई तैयारी का परिणाम होगा।

    मोदी जी भारत को तेज गति से आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं। तेज गति को प्राप्त करने के लिए आवश्यक सुधारों पर बल दिया गया है। सरकार के प्राथमिकताओं में परिवर्तन किया गया है। सरकार ने युवा शक्ति को भविष्य का भारत बनाने के लिए तैयार करने डेवलप करने और नेतृत्व करने के लिए रचनात्मक प्रयास किए हैं। राजकोषीय अनुशासन, सतत् विकास, मुद्रास्फीति की दर को कम करने का शानदार प्रयास किया है। मोदी सरकार ने आत्मनिर्भरता को लक्ष्य मान करके घरेलू उत्पादन क्षमता को बढ़ाने का प्रयास किया है। ऊर्जा सुरक्षा को सुरक्षा प्रदान करने का प्रयास किया है। मेक इन इंडिया जैसे कार्यक्रमों को चला करके आयात पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया है। सरकार की पूरी अर्थनीति का अगर विश्लेषण करेंगे तो उसके केंद्र बिंदुओं में सरकार का लक्ष्य आत्मनिर्भरता, रोजगारसृजन, कृषि उत्पादन क्षमता का विकास, नागरिकों की क्रय शक्ति का बढ़ना, नागरिकों के जीवन स्थान में सुधार लाना अपनाया गया है। सरकार ने 7% उच्च वृद्धि दर को सुनिश्चित करके गरीबी घटाने और नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने के प्रयासों में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है।

    जो देश कृषि उत्पादों को आयात करता था, अनाज की कमी से जुझता था, आज वही देश ढाई लाख करोड़ रुपए से अधिक के कृषि उत्पादों को निर्यात करता है, कितना फर्क है,

    सरकार की अर्थ नीति कर्तव्य नीति ज्यादा दिखाई देती है। जिसके चलते सरकार ने 25 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकलने में सफलता प्राप्त की है।

    इसलिए मोदी सरकार के बजट में, मोदी सरकार की अर्थनीति में, स्पीड और स्केल में, हर क्षेत्र की तरफ, नभ, जल और आकाश सभी तरफ नए कीर्तिमान स्थापित होते दिखते हैं। क्योंकि हमारे पूर्व की क्षमताओं से हम एक नए स्तर पर आ गए हैं। मोदी सरकार का लक्ष्य तो इससे कहीं ऊपर है। देश को वापस अपना खोया हुआ गौरव हासिल करना है। देश को विश्व की अर्थव्यवस्था में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करना है। इसीलिए भारत विश्व का ग्लोबल ग्रोथ इंजन है। कोई भी इस विकास की दौड़ में पीछे ना छूटे, कोई भी विकास की भागीदारी में रह ना जाए, समग्र विकास के साथ-साथ समग्र दृष्टिकोण केवल भाजपा सरकार, प्रधानमंत्री मोदी जी ही कर सकते हैं।

    (लेखक- अखिलेश जैन सीए व भाजपा मप्र के प्रदेश कोषाध्यक्ष हैं)

  • बीना में पचास हजार करोड़ रुपयों की एथिलीन क्रेकर परियोजना का काम शुरु

    बीना में पचास हजार करोड़ रुपयों की एथिलीन क्रेकर परियोजना का काम शुरु


    भोपाल,12 फरवरी (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 सितंबर 2023 को बीना में लगभग 50 हजार करोड़ रुपये की लागत वाली जिस एथिलीन क्रैकर परियोजना की आधारशिला रखी थी उसके लिए नए केन्द्रीय बजट में आवश्यक प्रावधान कर दिया गया है। इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड की कंसल्टेंसी में प्रोजेक्ट का काम यहां जोरों शोरों से चालू है। राज्य सरकार इस परियोजना को सफल बनाने के लिए आवश्यक सुविधाएं जुटाने का प्रयास भी कर रही है।


    बीना रिफायनरी के सहयोगी प्रतिष्ठान के रूप में ये प्रोजेक्ट देश को दुनिया के पेट्रोकेमिकल क्षेत्र में प्रमुख स्थान दिलाएगा। केन्द्रीय बजट में बीना पेट्रोलियम क्रेकर्स परियोजना को लगभग पचास हजार करोड़ रुपए जुटाने की मंजूरी मिल गई है। भारत पेट्रोलियम कार्पोरेशन लिमिटेड BPCL की सागर जिले स्थित बीना रिफाइनरी (Bina Refinery) के विस्तार और वहां ₹49,000 करोड़ से अधिक की लागत से एक विश्वस्तरीय पेट्रोकेमिकल्स कॉम्प्लेक्स स्थापित करने का काम चल रहा है । यह परियोजना ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत भारत को तैयार पेट्रोकेमिकल प्रोडेक्ट का आयात कम करने और निर्यात बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभाएगी।


    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब इस परियोजना की आधारशिला रखी थी तब किसी को ये अनुमान नहीं था कि इतनी जल्दी ये परियोजना आकार ले लेगी। प्रदेश के कुछ सांसदों और विधायकों ने इस परियोजना को अन्यत्र स्थानांतरित किए जाने की लाबिंग भी की थी। शासन के कुछ अधिकारियों ने इसके लिए तमाम तर्क दिए थे,लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा कि इस परियोजना का कच्चा माल नेप्था बीना रिफायनरी से ही प्राप्त होता है। यहां स्थित टाऊनशिप भी काफी सुविधाजनक है। जमीन उपलब्ध है। सरकार का अमला मुआवजे आदि की प्रक्रियाएं भी पूरी कर चुका है। ऐसे में परियोजना को जल्दी पूरा करने के अलावा कोई सोच विचार नहीं किया जा सकता।


    बीना पेट्रोकेमिकल परियोजना की मुख्य बातें:
    परियोजना लागत: लगभग ₹49,000 करोड़ (लगभग ₹52,000 करोड़ तक अनुमानित) के निवेश से 1.2 MTPA एथिलीन क्रैकर यूनिट स्थापित की जा रही है।
    क्षमता विस्तार: परियोजना में रिफाइनरी की क्षमता 7.8 MTPA से बढ़ाकर 11 MTPA करने का प्रावधान शामिल है।
    उत्पादन: यह परियोजना Linear Low-density Polyethylene (LLDPE), High-density Polyethylene (HDPE), Polypropylene (PP) और अन्य पेट्रोकेमिकल उत्पादों का उत्पादन करेगी।
    रोजगार: निर्माण चरण में 15,000 से अधिक और चालू होने के बाद 1 लाख से अधिक प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे।


    इस परियोजना का उद्देश्य बुंदेलखंड क्षेत्र को औद्योगिक केंद्र बनाना और आयात पर निर्भरता कम करना है। परियोजना के लिए भारत सरकार (SBI के नेतृत्व में) और मध्य प्रदेश सरकार (औद्योगिक प्रोत्साहन के माध्यम से) वित्तीय सहायता व बुनियादी ढांचा प्रदान कर रही हैं। यह परियोजना 2028 तक चालू होने की उम्मीद है।

  • मोहन ने लगाया छन्ना तो उखड़ पड़े खैराती नगर सेठ

    मोहन ने लगाया छन्ना तो उखड़ पड़े खैराती नगर सेठ

    भले ही भारत की अर्थव्यवस्था वृद्धि दर के लिहाज़ से मजबूत मानी जा रही है, लेकिन देश पर बढ़ते कर्ज को कई विदेशी ताकतें भाजपा सरकारों की असफलता ठहराने का प्रयास कर रहीं हैं। केंद्र और राज्यों दोनों का कर्ज लगातार बढ़ रहा है और इसका प्रत्यक्ष असर राज्यीय अर्थव्यवस्थाओं पर भी दिख रहा है। मध्यप्रदेश भी इससे अछूता नहीं है। यहाँ सरकार लगातार बड़े बजट और जनकल्याण योजनाओं के साथ आर्थिक गतिविधियों को तेज़ करने का प्रयास कर रही है, लेकिन इन पहलों का वित्तीय भार राज्य की ऋण-प्रणाली को चुनौती देता बताया जा रहा है।ये सारा शोर कमोबेश वही लोग मचा रहे हैं जो अब तक शिवराज सिंह चौहान की सरकार के दौरान मलाई छानते रहे हैं।


    भारत में पिछले कुछ वर्षों में सरकारी एवं घरेलू—दोनों स्तरों पर कर्ज तेज़ी से बढ़ा है। कोविड के बाद पुनरुद्धार पैकेज, बुनियादी ढाँचे में निवेश, सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता ने सरकारी उधारी पर निर्भरता बढ़ाई है। राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते ऋण का सीधा असर राज्यों की उधारी सीमा, बाजार ब्याज दरों और उधार की लागत पर पड़ता है। केंद्र की उधारी बढ़ने से बाजार में बांडों की मांग प्रभावित होती है और राज्यों को ऊँचे ब्याज पर ऋण लेना पड़ता है। यही स्थिति आज मध्यप्रदेश समेत कई राज्यों के सामने है।


    विधानसभा के हालिया सत्र में अनुपूरक बजट प्रस्तावों पर चर्चा करते हुए प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डाक्टर राजेन्द्र सिंह ने कहा कि सरकार पर कर्ज का बोझ लगभग चार लाख अस्सी हजार करोड़ से ज्यादा हो गया है। ये राज्य के कुल बजट से भी ज्यादा है। राज्य पर ब्याज का बोझ भी बढ़ता जा रहा है और सरकार की विकास योजनाएं प्रभावित हो रहीं हैं। मध्यप्रदेश का वार्षिक बजट जहाँ लगातार बढ़ा है, वहीं राज्य का कर्ज उससे भी तेज़ी से ऊपर गया है। 2025 तक उपलब्ध सरकारी आँकड़ों के अनुसार, राज्य पर बकाया ऋण लगभग 4.4–4.6 लाख करोड़ रुपयों तक पहुँच चुका है—जो राज्य के वार्षिक बजट (लगभग 4.21 लाख करोड़) से भी अधिक है।
    इसके अलावा, वर्ष 2025 के भीतर सरकार ने कई बार तात्कालिक उधारी (short-term borrowing) ली—जो यह संकेत देती है कि योजनाओं और भुगतान दायित्वों को पूरा रखने के लिए सरकार को बाजार से बार-बार धन जुटाना पड़ रहा है। राज्य की ऋण-से-GSDP अनुपात (Debt-to-GSDP Ratio) भी बढ़कर 31% के आसपास पहुँच गया है, जो आदर्श वित्तीय सीमा से अधिक माना जाता है।


    ऐसा कहा जा रहा है कि लाड़ली बहना योजना की वजह से सरकार झमेले में पड़ रही है। हालांकि ये योजना डाक्टर मोहन यादव को विरासत में मिली थी।वर्तमान सरकार ने महिलाओं को आर्थिक आधार देने के लिए ‘लाडली बहना’ योजना को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। उन्हें दी जाने वाली रकम भी बढ़ाई है। योजना की मासिक किश्तें और लगातार बढ़ती पात्रता संख्या के कारण राज्य को हर माह बड़ी राशि खर्च करनी पड़ती है। यह योजना सामाजिक रूप से अत्यंत प्रभावी है, लेकिन इसके लिए आवश्यक बजट का एक बड़ा हिस्सा उधार पर निर्भर है।


    सरकारी कर्मचारियों के वेतन-संशोधन, महंगाई भत्ते और पेंशन दायित्व बढ़े हैं, जिससे सरकार का नियमित राजस्व व्यय लगातार ऊपर जा रहा है। मेडिकल कॉलेज, नदी-लिंक, पर्यटन अवसंरचना और औद्योगिक इकाइयों पर बड़े निवेश की पहल की गई है। ये प्रोजेक्ट दीर्घकाल में लाभ देंगे, लेकिन शुरुआती वर्षों में इन पर भारी पूंजी खर्च की आवश्यकता होती है—जो उधारी के सहारे पूरी की जा रही है। सरकार ने मई से अक्टूबर 2025 के बीच कई बार 3,000–5,000 करोड़ रुपये के कर्ज लिए। यह नकदी-अभाव और बढ़ते भुगतान दायित्वों की ओर संकेत बताया जा रहा है। जबकि वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि ये रकम देश की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ाने में प्रयुक्त हो रही है इसलिए इस पर ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं है।


    डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में राज्य सरकार की प्राथमिकता जनकल्याण, महिलाओं का सशक्तिकरण, बड़े बुनियादी प्रोजेक्ट पर कार्य, औद्योगिक विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य पर नए निवेश के रूप में जारी है। इन सभी पहलों को जनता का समर्थन भी प्राप्त है। परंतु यह भी सच है कि इतनी व्यापक योजनाओं के लिए राज्य को सशक्त राजस्व आय की आवश्यकता है,जो अभी सीमित है। यही कारण है कि सरकार को बार-बार उधार लेकर नीतियों को गति देनी पड़ रही है। राजनीतिक दृष्टि से ये योजनाएँ मजबूत आधार बनाती हैं, लेकिन आर्थिक दृष्टि से ऋण-पोषित कल्याण मॉडल लंबे समय में चुनौती बन सकता है।


    वित्तीय तरलता घटने से कई कार्यक्रम गड़बड़ा जाते हैं। जब कर्ज बढ़ता है, तो बजट का बड़ा हिस्सा ब्याज भुगतान में जाता है। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचे में निवेश कम पड़ने का खतरा होता है। उच्च ऋण/GSDP अनुपात से राज्य की क्रेडिट रेटिंग प्रभावित होती है, और आने वाले वर्षों में उधार लेना महंगा हो सकता है। कर्ज जितना बढ़ता जाएगा, नीति-निर्माताओं के पास नई योजनाओं के लिए वित्तीय गुंजाइश उतनी ही कम होती जाएगी।
    मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव ने आय बढ़ाने वाले विभागों पर तेजी से कार्य करने का फैसला लिया है। उसका प्रयास है कि राजस्व आय बढ़े,उद्योग और पर्यटन पर निवेश बढ़ाने की नई नीतियां लाई जाएं। जीएसटी की प्रक्रिया मजबूत हो और कर संग्रहण की स्थितियों में सुधार हो। राज्य के संसाधनों और संपत्तियों का इस तरह से पुर्ननियोजन किया जाए कि उनसे आय बढ़ाई जा सके और बर्बादी रोकी जा सके। कल्याण योजनाओं के लिए लाभार्थियों की नियमित समीक्षा कर खर्च की दक्षता बेहतर की जा सकती है। सरकारी खरीद और प्रशासनिक खर्च में कटौती कर कर्ज निर्भरता को कम किया जा सकता है। ऐसे प्रोजेक्ट जिनसे सीधे राजस्व आय बढ़ती है — कृषि वैल्यू चेन, पर्यटन, स्वास्थ्य सेवाएँ, स्टार्टअप इकॉनमी — इन्हें प्राथमिकता मिलनी चाहिए।


    मध्यप्रदेश आज दो राहे पर खड़ा है उसे अपनी जन हितकारी योजनाएं जारी रखनी हैं लेकिन उसे अपने कर्ज के निवेश से आय के नए संसाधन भी विकसित करने हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की नीतियाँ सकारात्मक सामाजिक बदलाव ला रही हैं, किंतु इन नीतियों की वित्तीय स्थिरता तभी सुनिश्चित हो पाएगी जब राज्य कर्ज-निर्भरता से निकलकर मजबूत राजस्व-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ेगा। राज्य के लिए चुनौती यह नहीं कि योजनाएँ जारी रहें या नहीं—बल्कि यह है कि उन्हें वित्तीय दृष्टि से टिकाऊ कैसे बनाया जाए। यही वह बिंदु है जो आने वाले वर्षों में मध्यप्रदेश की आर्थिक सेहत और विकास गति दोनों तय करेगा।

  • बैलेंसशीट के मुनाफे में जन भागीदारी से ही सफल होगा मध्यप्रदेश

    बैलेंसशीट के मुनाफे में जन भागीदारी से ही सफल होगा मध्यप्रदेश

    -आलोक सिंघई-

    मध्यप्रदेश को अक्सर “भारत का हृदय” कहा जाता है — और आर्थिक संकेतक बताते हैं कि यह राज्य अब सचमुच भारत के विकास-मानचित्र पर एक अहम स्थान लेता जा रहा है। वर्ष 2024–25 में राज्य का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) लगभग 15.03 लाख करोड़ रुपए तक पहुँच गया है, जो 11.05 प्रतिशत की प्रभावशाली वृद्धि दर्शाता है। यह दर राष्ट्रीय औसत से बेहतर है और राज्य की आर्थिक गतिशीलता का संकेत देती है। राज्य की प्रति व्यक्ति आय भी बढ़कर लगभग 1.52 लाख रुपए तक पहुँची है। हालांकि यह वृद्धि उत्साहजनक है, फिर भी यह महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक जैसे अग्रणी राज्यों से कम है।
    मध्यप्रदेश की अर्थव्यवस्था अब केवल खेती पर निर्भर नहीं है। सोयाबीन, गेहूँ और तिलहन के उत्पादन प्रेोसेसिंग में अग्रणी होने के साथ, राज्य ने अब औद्योगिक निवेश और निर्यात में भी उल्लेखनीय प्रगति की है। वर्ष 2024–25 में राज्य की निर्यात रैंकिंग 15वें से सुधरकर ग्यारहवें स्थान पर पहुँच गई है। इंदौर, भोपाल, पीथमपुर और मंडीदीप जैसे औद्योगिक क्षेत्र अब तकनीक, इंजीनियरिंग और फार्मा उत्पादों के नए केंद्र बन रहे हैं। राज्य ने पिछले वर्ष ढाई हजार करोड़ रुपयों से अधिक के तकनीकी निवेशों को आकर्षित किया है। यही वजह है कि राज्य अब धीरे-धीरे एक “डिजिटल पावरहाउस” के रूप में उभर रहा है।
    विकास के इन सकारात्मक संकेतों के बावजूद, सामाजिक क्षेत्र अभी भी मध्यप्रदेश की कमजोर कड़ी है। राज्य की साक्षरता दर लगभग सत्तर फीसदी है, जो राष्ट्रीय औसत से कम है। स्कूलों में इंटरनेट कनेक्टिविटी सिर्फ पैंतीस प्रतिशत तक सीमित है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों से प्रतिभाओं की प्राप्ति कठिन बनी हुई है। जो ग्रामीण अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देना चाहते हैं उन्हें इसकी मंहगी कीमत चुकाकर बच्चों को बड़े शहरों में भेजना पड़ता है।
    स्वास्थ्य के पैमाने पर भी राज्य कठिन संकटों से जूझ रहा है। भारी धनराशि खर्च करने के बावजूद कार्यकुशल आबादी का सवास्थ्य चिंताजनक बना हुआ है। शिशु मृत्यु दर लगभग 43 प्रति 1000 जन्म है, और ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों की उपलब्धता सीमित है। मानव विकास सूचकांक (HDI)0.611 के आसपास है, जो भारत के कई अन्य राज्यों से नीचे है।
    यदि कोई क्षेत्र है जिसमें मध्यप्रदेश ने राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाया है, तो वह है स्वच्छता और आधारभूत ढाँचे का विकास। इंदौर लगातार सातवीं बार भारत का सबसे स्वच्छ शहर घोषित हुआ है। बिजली, सड़क, और ग्रामीण कनेक्टिविटी के क्षेत्र में पिछले दशक में उल्लेखनीय सुधार हुए हैं। राज्य ने वर्ष 2024–25 में 1.01 लाख मिलियन यूनिट बिजली ट्रांसमिट कर नया रिकॉर्ड बनाया।
    राज्य सरकार ने लाड़ली बहना योजना,मुख्यमंत्री उद्यम क्रांति योजना और कृषि निवेश प्रोत्साहन कार्यक्रमों के ज़रिए सामाजिक व आर्थिक समावेशन को बढ़ावा देने का प्रयास किया है इसके बावजूद बेरोज़गारी, महिला सुरक्षा और भ्रष्टाचार जैसी समस्याएँ अब भी जनता के बीच चिंता का कारण हैं।
    अन्य राज्यों से तुलना

    संकेतकमध्यप्रदेशगुजरातमहाराष्ट्रकर्नाटकउत्तरप्रदेश
    GSDP वृद्धि दर (2024–25)11.05%9.3%8.1%9.8%9.1%
    प्रति व्यक्ति आय (₹)1.52 लाख2.74 लाख2.85 लाख2.65 लाख1.45 लाख
    साक्षरता दर (%)7079827668
    HDI0.6110.6820.6960.6850.613

    *स्रोत: NITI Aayog, आर्थिक सर्वेक्षण 2024–25, Free Press Journal, Times of India, ET Government Reports
    मध्यप्रदेश आज एक तेजी से बढ़ता, परंतु चुनौतियों से जूझता राज्य है। जहाँ आर्थिक प्रगति ने एक ठोस आधार तैयार किया है, वहीं शिक्षा, स्वास्थ्य और मानव विकास को मजबूत किए बिना “सफल राज्य” की उपाधि अधूरी रहेगी। संक्षेप में कहा जाए तो — मध्यप्रदेश अब भारत का “उभरता हुआ विकासशील राज्य” है, पर वास्तविक सफलता की मंज़िल तक पहुँचने के लिए सामाजिक विकास पर केंद्रित नई रफ्तार की जरूरत है।

    1. शिक्षा और डिजिटल पहुँच में तेज़ निवेश के माध्यम से हर स्कूल तक इंटरनेट व स्मार्ट क्लास की पहुंच आज की अनिवार्य पहल बन गई है।
    2. ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं का सशक्तीकरण करने के लिए हमें अपने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टर और उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी।
    3. कृषि से उद्योग तक वैल्यू-चेन विकसित करना होगी ताकि किसानों की आय स्थायी रूप से बढ़ाई जा सके और उन्हें सरकारी मदद की बाट न जोहनी पड़े।
    4. महिला सुरक्षा व कौशल विकास कार्यक्रमों को वास्तविक परिणामों तक पहुँचाना होगा। लाड़ली बहना योजना का लाभ हर महिला तक न तो पहुंच पा रहा है और न ही ये संभव होगा। महिलाएं आर्थिक विकास की चेन का हिस्सा बनें तभी इन लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है।
    5. नवाचार और स्टार्टअप निवेश के लिए विशेष औद्योगिक ज़ोन बनाना होंगे जो नव उद्यमियों को सहारा देकर उत्पादन बढ़ाने में सहयोगी साबित हो। कल्याणकारी राज्य की कहानियां बहुत सुनी सुनाई जा चुकी हैं। अब तो चुनौतीपूर्ण नतीजे लाने की प्रतिस्पर्धा ही एमपी को सिरमौर बना सकती है।
  • धार अब फैशन की दुनिया में लगाएगा नई छलांग

    धार अब फैशन की दुनिया में लगाएगा नई छलांग

    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 17 को भैंसोला में लिखेंगे नई इबारत


    भोपाल,13 सितंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आगामी सत्रह सितंबर को धार के दौरे पर आ रहे हैं। वे फैशन की दुनिया में धार के बढ़ते सोपानों की आधार शिला रखेंगे। भारत सरकार ने वस्त्र उद्योग को सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से पीएम मित्रा पार्क योजना (PM MITRA Parks Scheme) की शुरुआत की है। यह योजना प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के “आत्मनिर्भर भारत” और “मेक इन इंडिया” विज़न को साकार करने का एक बड़ा कदम है।

    पीएम मित्रा पार्क योजना की घोषणा केंद्रीय बजट 2021-22 में की गई थी। इस योजना के अंतर्गत देशभर में 7 मेगा इंटीग्रेटेड टेक्सटाइल रीजन एंड अपैरल (MITRA) पार्क स्थापित किए जाएंगे। इन पार्कों का उद्देश्य वस्त्र क्षेत्र को एक ही स्थान पर पूरी वैल्यू चेन—कपास से लेकर तैयार कपड़े और निर्यात तक—उपलब्ध कराना है।मध्यप्रदेश का निमाड़ और मालवा अंचल कपास की खेती करके देश के लिए सूती कपड़े बनाने का प्रमुख आधार मुहैया कराता रहा है।

    इस वस्त्र हबका उद्देश्य भारत को वैश्विक स्तर पर वस्त्र निर्माण का हब बनाना है। रोटी कपड़ा और मकान उपलब्ध कराने की श्रंखला में राज्य का धार अंचल अब कपड़ा प्रोसेसिंग से रोजगार के नए अवसर पादा करेगा। निर्माण की पूरी प्रक्रिया एक ही जगह होने से यहां उत्पादित वस्त्रों की लागत घटेगी। उद्योग को बढ़ावा देने की तमाम प्रक्रिया नए अनुसंधानों को बढ़ावा भी देगी। विकसित मशीनें पूरी दुनिया के लिए उत्तम गुणवत्ता का कपड़ा बनाकर देंगी। खेतों में कपड़े के रेशे उत्पादन के बाद फैक्ट्री में प्रोसेसिंग ,फैशन डिजाईनिंग और वैश्विक बाजार में कपड़ा भेजने के फाईव एफ(Farm to Fibre to Factory to Fashion to Foreign) विजन को भी यहां साकार किया जा सकेगा।

    गौरतलब है कि देश के अलग अलग राज्यों में कुल सात मित्रा पार्क स्थापित किए जा रहे हैं। ये सभी पार्क केन्द्र और राज्य सरकारों की साझेदारी में बनाए जाएंगे। केन्द्र सरकार इन पार्कों पर लगभग चार हजार चार सौ पैंतालीस करोड़ का निवेश करेगी।
    इस विशेष क्षेत्र में कामन प्रोसेसिंग हाऊस होंगे जो वस्त्र निर्माण की लागत घटाने में मददगार होंगे। औद्योगिक जरूरतों के लिए पर्याप्त क्षेत्र उपलब्ध होगा। ट्रांसपोर्ट एवं लॉजिस्टिक्स सुविधाएं भी होंगी। नई तकनीकों और ट्रेंडिंग तकनीकी नवाचारों के लिए पर्याप्त अवसर भी उपलब्ध हो सकेंगे। इस विशेष औद्योगिक प्रक्षेत्र में लगभग 1 लाख प्रत्यक्ष और 2 लाख अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे जो सामाजिक रोजगार जरूरतों के लिए काफी बड़ा स्रोत साबित होगा।

    इस औद्योगिक क्षेत्र की वजह से वस्त्र उद्योग की उत्पादन क्षमता और गुणवत्ता बढ़ेगी। छोटे एवं मध्यम उद्योगों (SMEs) को सपोर्ट मिलेगा। निर्यात क्षमता बढ़ेगी और विदेशी मुद्रा का अर्जन भी होगा। कपड़ा क्षेत्र में ग्लोबल सप्लाई चेन में भारत की भागीदारी मजबूत होगी। किसानों को कपास और रेशम जैसी कच्ची सामग्री का बेहतर मूल्य मिलेगा।

    सरकार ने योजना के अंतर्गत विभिन्न राज्यों को मित्रा पार्क स्थापित करने की स्वीकृति दी है। इनमें तमिलनाडु, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्रप्रदेश और उत्तरप्रदेश शामिल हैं। इन राज्यों में ज़मीन और उद्योगों की संभावनाओं के आधार पर पार्क का निर्माण कार्य आगे बढ़ाया जा रहा है।

    पीएम मित्रा पार्क योजना वस्त्र उद्योग में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाली है। इससे न केवल रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, बल्कि भारत को वैश्विक स्तर पर एक टेक्सटाइल पॉवरहाउस के रूप में पहचान मिलेगी। यह योजना “आत्मनिर्भर भारत” और “मेक इन इंडिया” को मजबूती देने के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों को भी लाभ पहुँचाएगी।

  • इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक ने मनाई अपनी 9वीं वर्षगांठ

    इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक ने मनाई अपनी 9वीं वर्षगांठ


    Equitas Small Finance Bank Celebrates Its 9th Anniversary
    इक्विटास बैंक – 9 साल विश्वास और प्रगति के।
    Equitas Bank – 9 Years of Trust and Progress.

    भोपाल, 06 सितंबर (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर) इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक ने आज अपनी स्थापना के 9 गौरवशाली वर्ष पूरे कर लिए। इस अवसर पर देशभर की सभी शाखाओं में विविध कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें ग्राहकों, कर्मचारियों और स्थानीय समुदायों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।भोपाल की एमपीनगर शाखा में भी इस अवसर पर ग्राहक मिलन कार्यक्रम आयोजित किया गया।

    Bhopal, 06 September(Press Information Centre).Equitas Small Finance Bank proudly marked the completion of its 9 successful years today. To celebrate the occasion, a series of events were held across all its branches nationwide, with enthusiastic participation from customers, employees, and local communities.

    ग्राहकों के प्रति आभार | Gratitude Towards Customers
    बैंक ने इस अवसर पर अपने ग्राहकों को विशेष धन्यवाद देते हुए कहा कि उनकी निरंतर विश्वास और सहयोग से ही इक्विटास आज इस मुकाम तक पहुँचा है। बैंक ने यह दोहराया कि ग्राहकों को बेहतर सेवा और आधुनिक वित्तीय समाधान प्रदान करना उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है।

    On this special day, the bank expressed heartfelt gratitude to its customers, stating that their continued trust and support have been the foundation of Equitas’ growth. The bank reaffirmed its commitment to delivering excellent service and innovative financial solutions.

    कार्यक्रमों की झलक | Highlights of the Celebrations
    ग्राहक सम्मान समारोह

    वित्तीय जागरूकता अभियान

    सामुदायिक सेवा गतिविधियाँ

    Customer Appreciation Events

    Financial Literacy Drives

    Community Service Initiatives

    डिजिटल पहल: Equitas 2.0 ऐप लॉन्च | Digital Leap: Launch of Equitas 2.0 App
    अपने डिजिटल दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते हुए, बैंक ने अपने नए और उन्नत मोबाइल बैंकिंग ऐप – Equitas 2.0 के लॉन्च की विधिवत घोषणा की। यह ऐप बेहतर ग्राहक अनुभव, आसान ट्रांजैक्शन और नई सुविधाओं से लैस है।

    Reinforcing its focus on digital transformation, the bank announced the launch of its advanced mobile banking app – Equitas 2.0. The app is designed to offer a smoother user experience, seamless transactions, and enhanced features.

    भविष्य की दिशा | Vision Ahead
    इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक ने अपने मिशन “हर ग्राहक तक बैंकिंग” को दोहराया और वादा किया कि आने वाले वर्षों में वह और अधिक नवाचारों और सेवाओं के साथ हर वर्ग तक सुलभ बैंकिंग पहुँचाएगा।

    Equitas SFB reiterated its mission of “Banking for Every Customer” and pledged to bring more innovation and inclusive services in the coming years to reach every segment of society.

  • ड्राईवरों का स्वास्थ्य सुधारिए बोलीं ट्रांसपोर्ट कमिश्नर रजनी सिंह

    ड्राईवरों का स्वास्थ्य सुधारिए बोलीं ट्रांसपोर्ट कमिश्नर रजनी सिंह

    भोपाल,12 जुलाई(ट्रांसपोर्ट रिपोर्टर)।सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाने के लिए सरकार ने अब मूलभूत सुधार शुरु किए हैं।श्रम विभाग की ओर से भारी वाहनों जैसे बस, ट्रक, टैक्सी आदि का संचालन करने वाले ड्रायवरों तथा अन्य स्टाफ जैसे कंडक्टर और क्लीनर के कार्य के घंटे के संबंध में प्रावधानों को प्रभावी रूप से लागू किए जाने की पहल की जा रही है।इसी सिलसिले में मोटर ट्रांसपोर्ट नियोजकों की कार्यशाला शुक्रवार 18 जुलाई को श्रमायुक्त कार्यालय, इंदौर में सम्पन्न हुई।

    कार्यशाला में श्रमायुक्त श्रीमती रजनी सिंह ने मोटर परिवहन कर्मकार अधिनियम, 1961 के अंतर्गत ट्रांसपोर्ट कार्यों में संलग्न ड्राइवरों और अन्य स्टाफ के कार्य के घंटों, विश्राम अवधि और अन्य सुविधाओं के बारे में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अधिनियम के अंतर्गत ट्रांसपोर्ट वर्कर्स के लिए प्रतिदिन 8 घंटे और साप्ताहिक 48 घंटे कार्य की अवधि निर्धारित है। इन प्रावधानों का गंभीरता से पालन किया जाना आवश्यक है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ड्रायवरों और स्टाफ के लगातार लंबी अवधि तक कार्य करने और विश्राम का समय न मिलने से थकान और तनाव की स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं, जिससे सड़क दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ जाती है।

    श्रमायुक्त ने वाहनचालकों के समय-समय पर नियमित स्वास्थ्य परीक्षण, विशेषकर नेत्र परीक्षण, सुनिश्चित करने का सुझाव भी दिया। उन्होंने जोर देकर कहा कि विभिन्न तकनीकों और उपकरणों की सहायता से, साथ ही जागरूकता और प्रचार-प्रसार के माध्यम से सड़क दुर्घटनाओं की संभावनाओं को कम किया जा सकता है। इसके लिए ड्रायवरों के कार्य समय और विश्राम अवधि की निगरानी करने तथा अन्य सुरक्षा मानकों को सुनिश्चित करने हेतु मोटर वाहनों में सीसीटीवी कैमरे, जीपीएस प्रणाली जैसे तकनीकी उपकरणों के उपयोग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

    कार्यशाला में अटल इंदौर सिटी ट्रांसपोर्ट सर्विसेस लिमिटेड (AICTSL) के अधिकारी श्री अभिनव चौहान ने भी भाग लिया। उन्होंने बताया कि उनके संस्थान में संभावित वाहन दुर्घटनाओं को रोकने के लिए ड्रायवर और पैसेंजर मैनेजमेंट सिस्टम का भविष्य में उपयोग किया जाएगा। इस संबंध में कार्यशाला में एक प्रस्तुति भी दी गई, जिससे सड़क दुर्घटनाओं की रोकथाम में मदद मिलेगी। कार्यशाला में ट्रांसपोर्टर एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने अधिनियम के परिपालन के लिए सकारात्मक सुझाव प्रस्तुत किए और मोटर यातायात श्रमिक अधिनियम के प्रावधानों के अनुपालन में सहयोग देने का आश्वासन भी दिया। कार्यशाला में श्रम विभाग से श्री प्रभात दुबे, श्री आशीष पालीवाल, जिला परिवहन अधिकारी श्री प्रदीप शर्मा, अटल इंदौर ट्रांसपोर्ट सर्विसेस लिमिटेड (AICTSL) के अधिकारी श्री अभिनव चौहान, प्राइम रूट बस ऑनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष श्री गोविंद शर्मा, इंदौर ट्रक ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन के श्री सी. एल. मुकाती एवं अन्य ट्रांसपोर्टर्स उपस्थित थे।

  • नई दवाएं मानवता का उपहारःसंजय जैन

    नई दवाएं मानवता का उपहारःसंजय जैन

    भोपाल,27 जून(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।

    मध्यप्रदेश फार्मेसी काऊंसिल के अध्यक्ष और फार्मेसी काऊंसिल आफ इंडिया के सदस्य संजय जैन ने कहा है कि आर्टीफीशियल इंटेलिजेंस से बन रहीं आधुनिक दवाएं मानवता के लिए उपहार बनकर सामने आई हैं। ये दवाएं जल्दी बन जाती हैं और व्यक्ति विशेष के लिए खास तौर पर बनाई जा सकती हैं। एल एन सी टी संस्थान भोपाल के फार्मेसी विभाग में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में उन्होंने ये विचार व्यक्त किए। संगोष्ठी के मुख्य अतिथि विज्ञान एवं साइंस टेक्नोलॉजी विभाग मध्य प्रदेश के संचालक डॉक्टर अनिल कोठारी थे।


    कार्यक्रम में विशेष अतिथि के रूप में स्टेट फार्मेसी काउंसिल मध्य प्रदेश के अध्यक्ष .एवं फार्मेसी काउंसिल आफ इंडिया के सदस्य संजय कुमार जैन ने भाग लिया । संस्थान के डायरेक्टर श्री अशोक राय एवं फार्मेसी विभाग की विभाग अध्यक्ष श्रीमती पारुल मेहता ने अतिथियों का पुष्प एवं मालाओं से स्वागत किया । श्री कोठारी ने अपने अपने उद्बोधन में कहा कि फार्मेसी के बगैर विज्ञान अधूरी है विज्ञान की विभिन्न विभिन्न शाखों द्वारा फार्मेसी के क्षेत्र में विभिन्न शोध कार्य किया जा रहे हैं।


    मध्य प्रदेश स्टेट फार्मेसी काउंसिल के अध्यक्ष श्री संजय जैन ने संगोष्ठी में फार्मेसी के क्षेत्र में हो रहे विकास कार्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में देश में जितनी उन्नति फार्मेसी के क्षेत्र में हुई है। उतनी आजादी के बाद कभी नहीं हुई थी। इसी का कारण है कि दुनिया के अधिकतम देश औषधि के क्षेत्र में भारत पर निर्भर हैं।


    मध्य प्रदेश में भी फार्मेसी औद्योगिक क्षेत्र एवं शिक्षा के क्षेत्र में प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव एवं उपमुख्यमंत्री श्री राजेंद्र शुक्ल के मार्गदर्शन में निरंतर आगे बढ़ रहे हैं। इसी का कारण है कि मध्य प्रदेश आज फार्मेसी के क्षेत्र में विकासशील प्रदेशों में जाना जाता है।
    इस संगोष्ठी में देश प्रदेश एवं विदेश के कई फार्मासिस्ट विभिन्न माध्यमों के द्वारा भाग ले रहे हैं।

  • उद्यमियों का सफल मंच बना राष्ट्रीय स्वदेशी मेला-किशन सूर्यवंशी

    उद्यमियों का सफल मंच बना राष्ट्रीय स्वदेशी मेला-किशन सूर्यवंशी


    भोपाल, 13 अप्रैल(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। राजधानी के बिट्टन मैदान पर 7 से 13 अप्रैल तक आयोजित राष्ट्रीय स्वदेशी मेला का आज विधिवत समापन हो गया।मेले के भव्य आयोजन के स्वरूप को देखते हुए नगर पालिक निगम के सभापति किशन सूर्यवंशी ने कहा कि ये आयोजन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मेक इन इंडिया कार्यक्रम की सफलता का बुलंद उद्घोष है।ये उद्यमियों को संबल देने वाला बड़ा मंच बनकर सामने आया है।

    राजेश पोरवालः स्वदेशी के विचार को देशव्यापी बनाने में उल्लेखनीय योगदान.


    अखिल भारतीय स्वदेशी संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेश पोरवाल ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वप्न को साकार करने के लिए मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव ने जिस तरह मेले के आयोजन को सफल बनाने के लिए आशीर्वाद दिया उससे नागरिकों की जन भागीदारी बढ़ी है। उन्होंने मेले के समापन अवसर पर विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित नगर निगम सभापति किशन सूर्यवंशी का हार्दिक अभिनंदन किया। श्री सूर्यवंशी ने मेले का भ्रमण किया और देश भर से आए शिल्प कलाकारों की सफलता की कहानियां भी सुनीं। उन्होंने बताया कि जिस तरह युवा उद्यमियों ने अपनी कला अभिरुचि को व्यावसायिक तौर पर प्रस्तुत किया है उसे देखकर कहा जा सकता है कि भारत की अर्थव्यवस्था में जन भागीदारी बढ़ती जा रही है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव ने राज्य की उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए जो उपाय किए हैं उनमें इस तरह के मेलों के आयोजन से युवाओं को ज्यादा अवसर मिल रहे हैं।


    भारत सरकार के सूक्ष्म एवं लघु उद्योग मंत्रालय के प्रतिनिधि चेतन कुमार गुप्ता ने बताया कि भारत सरकार के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए मंत्रालय ने उद्यमियों के लिए कई फ्लैगशिप योजनाएं चलाई हैं। उद्यमियों को आर्थिक सहयोग प्रदान करके राष्ट्र के विकास सूचकांक को बढ़ाने में मदद मिली है। इस मेले में भी विभाग ने सक्रिय सहयोग करके युवाओं का मार्गदर्शन किया है।राज्य सरकार ने जिस तरह आगे बढ़कर उद्यमियों को अवसर उपलब्ध कराया उससे मध्यप्रदेश को राष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान मिली है.


    अखिल भारतीय स्वदेशी संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेश पोरवाल ने बताया कि महावीर जयंती तक मेले की सूचना राजधानी के दूरदराज के इलाकों तक पहुंच चुकी थी। इससे दस अप्रैल से मेला स्थल पर खासा जमघट लगने लगा था। छुट्टी के दिनों में तो मेले में पहुंचे नागरिकों ने भरपूर खरीददारी की। मेला स्थल पर वाहन पार्किंग, पेयजल, बैठक व्यवस्था, प्रकाश संयोजन और व्यंजनों की सुविधा और बच्चों के लिए खेल जैसी तमाम सुविधाएं उपलब्ध कराईं गईँ थीं जिसका लोगों ने भरपूर आनंद लिया। मेले के संचालक प्रणम्य अग्रवाल ने सभी सहयोगियों और नागरिकों के प्रति आभार व्यक्त किया है।

  • एमपी में उद्यमियों को नहीं झेलना पड़ेगा सत्ता की दलाली का बोझ

    एमपी में उद्यमियों को नहीं झेलना पड़ेगा सत्ता की दलाली का बोझ


    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत की सत्ता संभालते ही गुजरातियों के व्यापारिक सोच से पूरे देश को रोशन करने का अभियान चलाया हुआ है। भारत ही नहीं बल्कि वे पूरे देश में अपने इसी सोच की वजह से वे आज आकर्षण का केन्द्र बन गए हैं। भोपाल में जब ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट का आयोजन तय किया गया तभी से पूरी दुनिया के भारत मित्रों की निगाह देश के दिल की ओर लगी हुईं थीं। फ्रांस,जर्मनी, अमेरिका समेत विश्व के तमाम देशों में जाकर प्रधानमंत्री ने निवेशकों को भारत आने का न्यौता दिया है। यही वजह है कि एमपी आज निवेशकों के लिए एक प्रमुख डेस्टिनेशन बनकर सामने आया है। उद्योग अनुकूल माहौल बनाने के लिए भाजपा ने लगभग दो दशक पहले आधारभूत ढांचे को विकसित करने पर जोर दिया था। बिजली, सड़क और पानी की मूलभूत जरूरतें पूरी करने के साथ प्रधानमंत्री आवास योजना, जल नल योजना जैसी तमाम योजनाओं ने एमपी के इंफ्रास्टक्चर को मजबूती प्रदान की है। आज प्रदेश की तस्वीर पूरी तरह बदली हुई नजर आती है। कल्याणकारी हितग्राही मूलक योजनाओं से यहां के आम नागरिक की खरीद क्षमता भी बढ़ी है जिससे राज्य आज एक सफल बाजार के रूप में उभरकर सामने आया है। इस सबसे अलग जो बात आज श्री मोदी ने इंवेस्टर्स समिट में आए निवेशकों को समझाने का प्रयास किया वो यह कि देश का दिल आज निवेशकों को मुनाफे की गारंटी वाला राज्य बन गया है।


    इसके लिए हमें दो दशक पहले मध्यप्रदेश पर गौर करना होगा। तब राज्य में न तो सड़कें थीं, न बिजली पानी की मूलभूत व्यवस्थाएं थीं। कांग्रेस की सरकारों ने राज्य में लूटपाट का माहौल बना रखा था। वोट बटोरने के लिए तुष्टिकरण और जनता को बरगलाने के लिए उद्योगपतियों, व्यापारियों, सेठों को खलनायक बताने की राजनीति की जाती थी। शोषण की कहानियां सुनाकर कांग्रेस के नेता लोगों को बरगलाते थे। व्यापारियों और उद्योगपतियों को चोर व शोषक बताया जाता था। उनकी पैरवी करने वाली भाजपा को व्यापारियों की पार्टी बताकर लांछित किया जाता था। चंबल में डकैतों का आतंक इतना गहरा था कि लोग शाम के वक्त घरों से बाहर नहीं निकलते थे। उन्हीं डकैतों की कहानियां दिखाकर मुंबई की फिल्म नगरी कांग्रेस की जीवनरेखा बनी हुई थी। मीडिया की अपराध कथाएं भी उद्यमियों को कलंकित करती होती थीं। यही वजह है कि न तो यहां उद्योग विकसित हो पाए और न ही पूंजी का निर्माण हो पाया । आर्थिक रूप से बुरी तरह टूट चुका मध्यप्रदेश एक दुःस्वप्न बनकर रह गया था।


    बदले माहौल में आज इन्हीं पिछड़ेपन की नीतियों को मार भगाया गया है। लगभग दो दशकों की भाजपा की सरकारों ने पहले डकैतों, माफियाओं, ठगों और षड़यंत्र कारियों के विरुद्ध अभियान चलाया। अब वह सत्ता के दलालों को मार भगाने में जुटी हुई है। शिवराज सिंह की भाजपा सरकार ने आधारभूत ढांचे को तो विकसित किया लेकिन वह राज्य को सत्ता के दलालों से मुक्ति नहीं दिला पाई थी। डकैतों और माफियाओं ने जंगल छोड़ दिए लेकिन वे बस्तियों में आकर सेठ बन गए। राज्य की आय तो नहीं बढ़ी लेकिन कर्ज बढ़कर साढ़े तीन लाख करोड़ हो गया। चोरों मवालियों और ठगों ने अपनी आय बढ़ाई लेकिन वे न तो उद्योग स्थापित कर रहे थे और न ही उन्होंने अपनी काली कमाई का टैक्स चुकाया ।


    इस बार प्रदेश की जनता ने जैसे ही भाजपा को एक बार फिर सत्ता सौंपी तो सबसे पहले सत्ता के दलालों के आगे नतमस्तक नेताओं को सत्ता से बाहर किया और नई पीढ़ी को बागडोर सौंपी। डाक्टर मोहन यादव जैसे जमीनी नेता के हाथों कमान सौंपकर केन्द्र सरकार ने सत्ता के दलालों को घर बैठने का संदेश दिया। लाठी लेझम चलाने वाले पहलवान मोहन यादव हों या फिर वित्तमंत्री जगदीश देवड़ा जैसे समर्पित राजनेताओं तो आगे लाकर उन्होंने जड़ हो चुकी राजनीति को एक खुला आसमान सौप दिया है। इसके साथ ही काला धन बटोरकर जिन राजनेताओं ने अपने चहेते व्यापारियों के माध्यम से निवेश किया और महाराजा बन बैठे उनसे काला धन भी निकलवाया जाने लगा है।इस सब कार्य के लिए मोहन यादव ने अफसरशाही को खुला अवसर दिया है।


    मुख्य सचिव के रूप में अनुराग जैन को भेजकर राज्य में निवेश अनुकूल वातावरण बनाया गया है।जिन अफसरों के हाथों में आज राज्य की कमान है,योजनाओं को लागू करने की जवाबदारी है वे अपेक्षाकृत रूप से साफ सुथरे हैं। ये भी कहा जा सकता है कि अफसरशाही पर शिकंजा कसकर उसे औद्योगिक विकास के अनुकूल बनाया गया है। यही वजह है कि इस बार की इंवेस्टर समिट पिछले तमाम सम्मेलनों से अलग तस्वीर लेकर सामने आई है। निवेशकों की परख के लिए राज्य की पूरी जानकारी डिजिटल कर दी गई है। उनके आवेदनों की प्रक्रिया भी इतनी सरल कर दी गई है कि वे निवेश का प्रस्ताव देकर आसानी से अपना कारोबार शुरु कर सकते हैं।दुनिया के बहुराष्ट्रीय बैंकों में कार्य कर चुके भोपाल के ही युवा उद्यमी अंकेश मेहरा ने बताया कि उन्होंने अलान्ना ब्रांड नेम से राजधानी में एक स्टार्टअप शुरु किया है। उनका प्रोडक्ट होंठों की सुंदरता के लिए दुनिया का आधुनिकतम आविष्कार है। अपने माल को सस्ता और आम जनता की पहुंच का बनाने के लिए उन्हें कुछ पैकिंग मटेरियल आज भी चीन से बुलाना पड़ता है। जल्दी ही वे ये सामान भी भारत में बनाने लगेंगे। राज्य की औद्योगिक नीतियां उद्यमियों के लिए दोस्ताना हैं ।ये माहौल बना रहेगा तो राज्य जल्दी ही एक सफल स्टेट के रूप में अपना नाम रौशन करेगा।


    इसके पहले तक राज्य में एक कुप्रथा छाई हुई थी कि टेंडर किसी भी उद्यमी के नाम खुले उसे एक विशेष प्रजाति का साईलेंट पार्टनर रखना पड़ता था। कांग्रेस के आपराधिक चरित्र वाले मुख्यमंत्रियों की चलाई इस प्रथा का पालन भाजपा की सरकारें भी दो दशक तक करती रहीं।इसका सबसे बड़ा नुक्सान ये होता था कि निवेशक यदि गुणवत्ता का कार्य करे और कम मुनाफा ले तब भी उसे सत्ता के दलालों को मुनाफे का कट देना पड़ता था। सत्ता का पेट भरते भरते उसे यहां कारोबार करना घाटे का सौदा बन जाता था और वो यहां की परंपराओं से घबराकर निवेश से पीछे हट जाता था। पहली बार डाक्टर मोहन यादव की सरकार ने निवेशकों को सत्ता के दलालों के भय से मुक्ति दिलाकर स्वच्छंद वातावरण मुहैया कराया है। यही वजह है कि राज्य में निवेशकों ने धड़ाधड़ निवेश शुरु कर दिया है।


    लोक निर्माण विभाग के प्रमुख सचिव आईएएस नीरज मंडलोई ने बताया कि इंवेस्टर्स समिट की सफलता का आलम ये है कि आज पहले दिन ही उनके विभाग को लगभग ढाई सौ करोड़ रुपयों के निवेश के प्रस्ताव मिल चुके हैं। कल तक ये आंकडा़ नया रिकार्ड स्थापित करेगा। इसी तरह एमपी इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कार्पोरेशन लिमिटेड के अध्यक्ष राघवेन्द्र कुमार सिंह ने बताया कि उद्यमियों में जो उत्साह देखने मिल रहा है वह अद्वितीय है। हमें अब तक के अनुभवों और निरंतर संवाद का लाभ भी मिला है। ये बात सही है कि राज्य में कई मूलभूत बदलाव हुए हैं लेकिन अब तक भाजपा के कई स्थानीय नेता भी इस बदलाव को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। उन्हें कांग्रेस से आए ज्योतिरादित्य सिंधिया गुट के नेताओं के नाम पर भड़काया जा रहा है। अब तक जो हुआ सो हुआ पर जीआईएस के आयोजन की सफलता की जो तस्वीर उभरी है वह मध्यप्रदेश और देश में मेक इन इंडिया का एक सफल माडल दुनिया के सामने लाने में सफल हुई है।

  • राजधानी में अंतर्राष्ट्रीय वनमेले का शुभारंभ

    राजधानी में अंतर्राष्ट्रीय वनमेले का शुभारंभ

    भोपाल,16 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। 10वां अंतर्राष्ट्रीय वन मेला 17 से 23 दिसंबर तक लाल परेड मैदान में आयोजित होने जा रहा है। मेले का उद्घाटन शाम पांच बजे राज्यपाल मंगूभाई पटेल करेंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव करेंगे, विशिष्ट अतिथि के रूप में वन एवं पर्यावरण, राज्य मंत्री दिलीप अहिरवार भी उपस्थित रहेंगे। मंत्री दिलीप अहिरवार ने आज एक भीड़ भरी पत्रकार वार्ता में बताया कि मेले की थीम ‘लघु वनोपज से महिला सशक्तिकरण’ रखी गई है। लघु वनोपजों के प्रबंधन में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है, प्रदेश में लघु वनोपज संग्रहण कार्य में लगभग 50 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी है।
    मंत्री दिलीप अहिरवार ने बताया कि मेले में 300 स्टाल्स लगाए जाएंगे। प्रदेश के जिला यूनियन, वन धन केंद्र, जड़ी-बूटी संग्राहक, उत्पादक, कृषक, आयुर्वेदिक औषधि निर्माता, परंपरागत भोजन सामग्री के निर्माता एवं विक्रेतागण अपने उत्पादों का प्रदर्शन एवं विक्रय करेंगे। उन्होंने कहा कि मेले में लघु वनोपज एवं औषधीय पौधों के क्षेत्र की गतिविधियों, उत्पादों एवं अवसरों को प्रदर्शित करने एवं इससे जुड़े संग्राहकों, उत्पादकों, व्यापारियों, उद्यमियों, वैज्ञानिकों, प्रशासकों एवं नीति निर्धारकों के बीच संवाद स्थापित करने के लिए एक व्यापक मंच उपलब्ध कराया जाएगा।
    मेले में विभिन्न शासकीय विभागों की प्रदर्शनी लगाई जाएगी। साथ ही 19 एवं 20 दिसंबर को मेला स्थल पर ‘लघु वनोपज से महिला सशक्तिकरण’ पर दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया जाएगा। जिसमें श्रीलंका, नेपाल एवं ऑस्ट्रेलिया के प्रतिनिधिगण भाग लेंगे। 21 दिसंबर को क्रेता-विक्रेता सम्मेलन आयोजित होगा,जिसमें उच्च गुणवत्ता युक्त लघु वनोपजों (औषधीय पौधों ) कच्ची जड़ी-बूटियों एवं एमएफपी-पार्क की बनाईं हुईं आयुर्वेदिक औषधियों के क्रय-विक्रय के लिए अनुबंध किए जाएंगे।
    मंत्री दिलीप अहिरवार ने बताया कि मेले में ओपीडी संचालन किया जाएगा। जिसमें आयुर्वेदिक पद्धति के चिकित्सकों, उपचार करने वाले विशेषज्ञों द्वारा निशुल्क चिकित्सा परामर्श दिया जाएगा। जिसमें 25 हजार लोगों के उपचार कराने की संभावना है।
    वन राज्य मंत्री ने बताया कि मेले में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। जिसमें आर्केस्टा, नुक्कड़ नाटक एवं लोक नृत्य, स्कूली छात्र-छात्राओं के लिए चित्रकला, फैंसी ड्रेस, गाय कार्यक्रम आयोजित होंगे, साथ ही 18 दिसंबर को लोक गायिका मालिनी अवस्थी एवं 19 को हास्य कलाकार एहसान कुरैशी, 20 को सूफी बैंड, 21 फिडली क्राफ्ट और 22 को ‘एक शाम वन विभाग के नाम’ कार्यक्रम का आयोजन होगा।
    अंतर्राष्ट्रीय वन मेला, 2024, प्रदेश की वन संपदा और महिला सशक्तिकरण को समर्पित एक ऐसा मंच है, जो पर्यावरण, संस्कृति और अर्थव्यवस्था के सामंजस्य को प्रदर्शित करता है।

  • फिर लौटेगी राज्य के बीड़ी उद्योग की रौनक

    फिर लौटेगी राज्य के बीड़ी उद्योग की रौनक


    भोपाल,16 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्यप्रदेश बीड़ी उद्योग संघ के प्रतिनिधि मंडल ने आज मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से भेंट कर बीड़ी उद्योग में रोजगार के अवसरों को बढ़ाने के लिए कारोबार में आ रही कई तकनीकी अड़चनों को दूर करने का अनुरोध किया। संघ के प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री को बताया कि बीड़ी श्रमिकों को श्रम कानूनों का लाभ दिलाने के लिए बीड़ी निर्माताओं को राज्य की ओर से आवश्यक संरक्षण प्रदान किया जाए। इससे श्रमिकों को साल भर रोजगार देने वाले इस कारोबार से प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाया जा सकेगा।
    विधानसभा के मुख्यमंत्री कक्ष में उन्होंने डाक्टर मोहन यादव को बताया कि बरसों से इस उद्योग को अनदेखा किए जाने की वजह से पूरा कारोबार अराजकता का शिकार हो गया है। बीड़ी उद्योग संघ के सचिव श्री अर्जुन खन्ना के नेतृत्व में मिले प्रतिनिधि मंडल ने बताया कि बीड़ी निर्माण एक श्रम आधारित कुटीर ग्रामोद्योग है, जिसमें न्यूनतम पूंजी और बुनियादी ढांचे की आवश्यकता होती है। संघ ने बताया कि प्रदेश के जंगलों से प्राप्त होने वाले अच्छी गुणवत्ता के तेंदूपत्ते से बीड़ी उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। प्रति मानक बोरी तेंदूपत्ते पर सब्सिडी बढ़ाकर श्रमिकों का भी भला किया जा सकता है। प्रति मानक बोरी तेंदूपत्ते पर सब्सिडी बढ़ाने से मध्यप्रदेश बीड़ी निर्यात की अपनी खोई विरासत दुबारा हासिल कर सकता है।
    संघ के प्रतिनिधियों ने बताया कि उत्पादन बढ़ाने का प्रोत्साहन देकर राज्य को संगठित और स्थायी बीड़ी उत्पादन के केन्द्र के रूप में मजबूती से खड़ा किया जा सकता है। तेंदूपत्ता की स्थानीय खपत बढ़ने से प्रदेश में ही पूंजी का उत्पादन बढ़ाया जा सकेगा। बीड़ी का स्थानीय निर्माण होने से बेरोजगारी की समस्या का समाधान भी किया जा सकेगा। मुख्यमँत्री डाक्टर मोहन यादव ने प्रतिनिधि मंडल को आश्वासन दिया कि राज्य सरकार बीड़ी उद्योग संघ के सुझावों पर अमल करने के लिए आवश्यक सुधार लागू करेगी।
    गौरतलब है कि राज्य में तेंदूपत्ते का राष्ट्रीयकरण के साथ ही छोटी सिगरेट को बढ़ावा मिलने की वजह से राज्य का बीड़ी उद्योग अन्य राज्यों में पहुंच गया था। इससे स्थानीय रोजगार घटा था और सिगरेट कंपनियों का मुनाफा बढ़ गया था। कांग्रेस की पूर्ववर्ती अर्जुनसिंह की सरकार ने श्रमिकों को अधिक मजदूरी का प्रलोभन देकर खूब वाहवाही बटोरी थी। राज्य का बीड़ी उद्योग समाप्त हो जाने की वजह से स्थानीय श्रमिकों का रोजगार छिन गया था। अन्य राज्यों में ट्रांसफर हुए बीड़ी उद्योग की वजह से उन राज्यों में तो श्रमिकों को लाभ होने लगा लेकिन यहां के मजदूर लाचार हो गये थे। धीरे धीरे तेंदूपत्ते की चोरी बढ़ी और स्थानीय स्तर पर स्थापित ब्रांडों की और बगैर लेवल वाली नकली बीड़ी का निर्माण बढ़ गया था। इससे राज्य को टैक्स के रूप में होने वाली आय भी प्रभावित हुई थी और अपंजीकृत मजदूरों को श्रम कानूनों का लाभ मिलना भी बंद हो गया था।

  • शराब की खपत बढ़ी तो आय भी बढ़ाइए

    शराब की खपत बढ़ी तो आय भी बढ़ाइए

    भोपाल01 अक्टूबर(अजय खेमरिया).
    प्रदेश की मौजूदा आबकारी नीति में बड़े बदलाब की आवश्यकता है क्योंकि जिस व्यापक पैमाने पर शराब का अवैध कारोबार मैदानी स्तर पर हो रहा है उसे आबकारी विभाग रोक पाने में नाकाम साबित हो रहा है। सीमित मानव संसाधन और केंद्रीयकृत नियंत्रण तंत्र के अभाव में सरकार को इस अवैध कारोबार से राजस्व की क्षति भी हजारों करोड़ में हो रही है।
    तथ्य यह है कि प्रदेश में जितनी आधिकारिक शराब दुकानें है उससे दोगुने अनुपात में शराब का अवैध विक्रय संगठित तौर पर किया जा रहा है।प्रदेश में एक भी गांव ऐसा नही है जहां सरकारी दुकानों से अवैध परिवहन कर शराब नही बेची जा रही हो। यही नही इसी अनुपात में अवैध रूप से शराब निर्माण भी गांव-गांव में किया जा रहा है। इसके दुष्परिणाम सरकारी राजस्व में चपत के साथ आम नागरिकों की अमानक शराब से असमय मौत के रूप में भी सामने आ रहे हैं। मुरैना जिले में पिछले सालों जिस तरह से अवैध शराब भट्टियों से निर्मित शराब पीने से जो मौते हुई थी उससे सरकार ने कोई सबक नही सीखा।
    सरकार नहीं कर सकती शराब दुकानें बंद?
    मध्यप्रदेश सरकार बिहार या गुजरात की तरह शराब बंदी नहीं कर सकती है, क्योंकि राज्य के राजस्व का एक बड़ा हिस्सा उसे आबकारी से ही प्राप्त होता है। प्रदेश में अभी तीन हजार 600 शराब दुकानों से सरकार को 13 हजार 916 करोड़ का राजस्व चालू वित्तीय बर्ष में मिला है। 2003 में यह आंकड़ा लगभग 750 करोड़ रुपए था। जाहिर है कि औधोगिक एवं खनिज संसाधनों रूप में बीमारू मप्र के लिए सरकारी राजस्व का बड़ा स्रोत शराब भी है।
    वर्तमान तीन हजार छह सौ दुकानों की संख्या आंकड़े के रूप में तो बहुत नजर आती है, लेकिन जो जमीनी हकीकत है वह इन आंकड़ों से जुदा है क्योंकि बिना सरकारी दुकानों के भी हजारों जगह शराब का अवैध विक्रय हो रहा है और इसी अनुपात में अवैध भट्टियों का संचालन भी जारी है। यह दोनों तथ्य सरकार से छिपे हुए नहीं है।
    सरकार के राजस्व का इतना महत्वपूर्ण स्रोत होने के बाबजूद आबकारी महकमा मानव संसाधन की गंभीरतम कमी से जूझ रहा है। अधिकतर जिलों में आबकारी उपनिरीक्षक, हवलदार, आरक्षक के आधे से ज्यादा पद खाली है। एक एक उपनिरीक्षक के पास दो से तीन सर्किल का प्रभार है। नतीजतन अवैध भट्टियों पर कारवाई के लिए महकमें के पास कोई संसाधन ही नहीं हैं । इस अवैध कारोबार को स्थानीय दबंगो के अलावा राजनीतिक स्तर पर भी खुला संरक्षण मिला हुआ है। जब भी आबकारी महकमा अवैध बिक्री या निर्माण पर कारवाई करता है उसे स्थानीय माफिया और नेता कारवाई नहीं करने देते हैं। नेताओं के संरक्षण के कारण ही उन अवैध कारोबारियों को न तो पुलिस का भय है और न ही आबकारी विभाग का।

    अवैध शराब के लिए बाजार की उपलब्धता होना है, वर्तमान में मध्य प्रदेश में संपूर्ण प्रदेश को दो ,तीन या चार-चार दुकानों के समूहों में बांटा गया है, प्रत्येक समूह किसी न किसी ठेकेदार को टेंडर के माध्यम से आवंटित किया जाता है जिसके एवज में सरकार को राजस्व की प्राप्ति होती है। दुकानें शासकीय होती हैं और ड्यूटी पेड शराब सरकारी वेयर हाउस से उनको प्रदान की जाती हैं जिनको वो एमएसपी और एमआरपी के बीच अपने सुविधा जनक रेट पर विक्रय करने हेतु स्वतंत्र होते हैं। अब सवाल ये उठता है कि अवैध शराब यदि दुकानों से नहीं बिकती तो फिर कहां बिकती है? प्रत्येक मदिरा समूह में ठेकेदार को आवंटित दुकानों की संख्या कम होने और उन दुकानों से संबद्ध क्षेत्र बहुत बड़ा होने से प्रति व्यक्ति दुकान तक मदिरा खरीदने जाने के लिए सक्षम नहीं होता इसलिए ठेकेदार प्रत्येक गांव में अपना एक कमीशन किसी सामान्य पान या परचून दुकानदार को दे देते हैं जिस से प्रत्येक गांव में ड्यूटी पेड शराब प्रत्येक व्यक्ति को आसानी से स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हो जाती है।
    अवैध शराब विक्रय को रोकने के लिये प्रत्येक गांव में अघोषित रूप से खुली हुई कलारियों को सरकार नियमों के अंतर्गत लाकर उनके नियमित लाइसेंस प्रदान करने की कार्यवाही करें, जिससे सरकार के राजस्व में वृद्धि होगी और जनहानि की संभावना भी खत्म हो जाएगी। इसके अलावा शराब की कीमतों में कमी की जानी चाहिए क्योंकि जो शराब का आदि है, वह तो शराब पियेगा, फिर चाहे जहरीली ही क्यों न हो। ऐसे में यदि कीमत कम होगी, तो यह मौतों का सिलसिला भी कम होगा। आबकारी विभाग द्वारा की जाने वाली कार्यवाहियों का पूर्ण अधिकार विभाग को ही दिया जाना चाहिए, ताकि विभागीय अधिकारियों का अवैध करोबार पर अंकुश लगाए जाने के प्रति रूझान बढ सके। अन्यथा पुलिस द्वारा की जाने वाली कार्यवाहियों के कारण आबकारी अपने कर्तव्यों के प्रति उदासीन हो जाती है, फलस्वरूप दिखावे की कार्यवाहियां कर अपने काम की इतिश्री कर ली जाती है। आबकारी अधिनियम में कठोर दण्ड का प्रावधान करना और पालन करना चाहिए। दुकानों की संख्या में वृद्धि की जाकर ड्यूटी पेड मदिरा की उपलब्धता में वृद्धि की जानी चाहिए।