Category: अपराध

  • रिटायर्ड आईएएस राकेश अग्रवाल की हत्या किस उद्योगपति ने कराई

    रिटायर्ड आईएएस राकेश अग्रवाल की हत्या किस उद्योगपति ने कराई

    भोपाल 05 अक्टूबर (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर) सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी राकेश अग्रवाल की हत्या की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, मामला केवल लूट के लिए हत्या तक सीमित नहीं दिखाई दे रहा है। पुलिस की प्राथमिक जांच में केयरटेकर वरुण कुमार मुख्य संदेही है और वारदात के बाद उसके लगातार ठिकाने बदलने, मृतक का मोबाइल आगरा में मिलने, घर में गैस फैलाने की कोशिश और अग्रवाल से जुड़े करीब पांच करोड़ रुपये के पुराने वित्तीय विवादों ने जांच के कई रास्ते खोल दिए हैं।उनकी नौकरी के दौरान उन्होंने जिन प्रोजेक्ट पर काम किया उनसे जुड़े लोगों से भी जानकारी बटोरी जा रही है। हालांकि हत्या का अंतिम मकसद अभी पुलिस ने स्पष्ट नहीं किया है।

    30 सितंबर की रात सूरज नगर स्थित घर में राकेश अग्रवाल की हत्या हुई। प्रारंभिक पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार धारदार सर्जिकल ब्लेड से उनका गला काटा गया। घटनास्थल पर संघर्ष के स्पष्ट निशान नहीं मिले। पुलिस का अनुमान है कि वारदात उस समय हुई जब अग्रवाल सो रहे थे। हत्या के बाद घर की अलमारियों के ताले टूटे मिले। परिवार की ओर से सोने की चेन, अंगूठियां, महंगी घड़ियां, नकदी और मोबाइल सहित सामान गायब होने की जानकारी दी गई। इसी आधार पर पुलिस ने हत्या के साथ लूट/डकैती के कोण से भी जांच शुरू की।

    घटना के बाद सबसे महत्वपूर्ण सुराग केयरटेकर वरुण कुमार का गायब होना है। वह हत्या से करीब तीन दिन पहले ही एक निजी एजेंसी के माध्यम से अग्रवाल के घर काम पर आया था। वारदात के बाद वह घर से निकला और सीसीटीवी फुटेज में बैग के साथ दिखाई दिया। पुलिस ने उसके भागने का रूट तैयार किया है। ताजा जांच में उसकी गतिविधियां आगरा और फिर मथुरा-वृंदावन क्षेत्र तक पहुंची हैं। 5 अक्टूबर को पुलिस ने उसकी तलाश के लिए 50 हजार रुपये का इनाम घोषित किया और मध्यप्रदेश सहित पांच राज्यों में टीमें लगाई हैं।

    वरुण के भागने के दौरान मृतक का मोबाइल भी उसके साथ था। मोबाइल बाद में आगरा में मिला। वहां जिस युवक के पास फोन मिला, उसने पुलिस को बताया कि उसे मोबाइल रास्ते में पड़ा मिला था। पुलिस यह पता लगा रही है कि फोन वरुण से उस युवक तक कैसे पहुंचा। एक जांच कोण यह भी है कि वरुण ने फोन बेच दिया हो या किसी परिचित को दे दिया हो। मोबाइल की तकनीकी जानकारी और वरुण के पुराने नंबरों की गतिविधियों से उसके भागने की कड़ियां जोड़ी जा रही हैं।

    हत्या के बाद घर में गैस फैलने की घटना ने भी जांच को महत्वपूर्ण दिशा दी है। पुलिस के अनुसार रसोई में गैस सिलेंडर की पाइप लाइन अलग की गई थी और गैस हवा में फैल रही थी। पास में गर्म इलेक्ट्रिक प्रेस रखे जाने की बात भी जांच में सामने आई है। पुलिस को आशंका है कि हत्या के बाद घर में आग लगाकर साक्ष्य नष्ट करने की कोशिश की गई। यह बिंदु इस बात की जांच को महत्वपूर्ण बनाता है कि वारदात के बाद आरोपी केवल भागना चाहता था या घटनास्थल के सबूत मिटाने की भी योजना थी।

    जांच का एक दूसरा और महत्वपूर्ण सिरा अग्रवाल से जुड़े पुराने आर्थिक विवादों तक पहुंचा है। पुलिस को करीब पांच करोड़ रुपये से जुड़े दो मामलों की जानकारी मिली है। इनमें एक मामला करीब एक करोड़ रुपये का है, जिसमें गुरुग्राम निवासी अजीत पाटनी के खिलाफ अग्रवाल ने शिकायत की थी। आरोप था कि कंपनी में निवेश और बेहतर रिटर्न का भरोसा देकर उनसे रकम ली गई। दूसरा मामला करीब चार करोड़ रुपये की कथित धोखाधड़ी से जुड़ा बताया गया है, जिसमें अवधेश दुबे का नाम सामने आया है। दोनों मामले न्यायिक प्रक्रिया में बताए जा रहे हैं। पुलिस अब इन मामलों के दस्तावेज, वित्तीय लेनदेन और संबंधित लोगों से अग्रवाल के संपर्क की जांच कर रही है।

    इन आर्थिक विवादों को लेकर फिलहाल पुलिस ने हत्या से कोई सीधा संबंध स्थापित नहीं किया है। लेकिन जांच में इनका सामने आना महत्वपूर्ण है। पुलिस पिछले एक वर्ष के दौरान अग्रवाल के संपर्कों, फोन रिकॉर्ड, वित्तीय लेनदेन और निवेश संबंधी गतिविधियों की भी पड़ताल कर रही है। यही जांच यह स्पष्ट कर सकती है कि इन पुराने विवादों का हत्या से कोई संबंध था या वे केवल अलग-अलग मामले थे।

    जांच में सुपारी या पहले से योजना बनाकर हत्या किए जाने की संभावना की भी चर्चा हुई है। इसका आधार यह है कि वरुण को घर के अंदर की व्यवस्था और अग्रवाल की दिनचर्या की जानकारी बहुत कम समय में हो गई थी तथा हत्या के बाद उसने सामान लेकर भागने और कथित तौर पर साक्ष्य नष्ट करने का प्रयास किया। कुछ रिपोर्टों में पुलिस के हवाले से यह भी कहा गया है कि उसके आने से पहले घर की रेकी की गई थी या हत्या की योजना पहले से हो सकती थी। हालांकि इस कोण की पुष्टि अभी नहीं हुई है और पुलिस ने किसी कथित सहयोगी या सुपारी देने वाले व्यक्ति का नाम सार्वजनिक नहीं किया है।

    एक और महत्वपूर्ण सवाल केयरटेकर एजेंसी की भूमिका का है। वरुण को वर्मा होम हेल्थ केयर एजेंसी के माध्यम से काम पर भेजा गया था। जांच में एजेंसी के संचालन, वरुण के दस्तावेज और उसके पुलिस सत्यापन की प्रक्रिया की पड़ताल की जा रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार एजेंसी के पास वरुण का आधार, पैन और चरित्र प्रमाणपत्र था, लेकिन पंजाब के नाभा थाने से जारी चरित्र प्रमाणपत्र की वैधता 1 मई 2025 को समाप्त हो चुकी थी और भोपाल में नया पुलिस सत्यापन नहीं कराया गया था। एजेंसी के संचालन और पंजीयन को लेकर भी सवाल उठे हैं।

    पुलिस अब तक परिवार, घरेलू सहायकों, ड्राइवरों, माली, सफाईकर्मियों और अन्य लोगों सहित करीब 15 व्यक्तियों के बयान दर्ज कर चुकी है। वरुण के पिता, बहन और परिचितों से भी पूछताछ की गई है। पुलिस उसके पुराने मोबाइल नंबरों और डिजिटल संपर्कों को खंगाल रही है। ताजा जांच में यह भी सामने आया है कि उसके पुराने मोबाइल नंबर दोबारा सक्रिय हुए हैं, जिससे पुलिस उसके संपर्कों और संभावित मददगारों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है।

    इस हत्याकांड में अभी कई सवालों के जवाब बाकी हैं। क्या हत्या का उद्देश्य केवल लूट था? क्या आर्थिक विवादों का इससे कोई संबंध है? क्या वरुण ने अकेले वारदात की या किसी की मदद ली? आगरा में मिला मोबाइल वहां तक कैसे पहुंचा? गैस छोड़ने का उद्देश्य वास्तव में साक्ष्य मिटाना था या कोई दूसरा कारण था? और सबसे महत्वपूर्ण, वरुण को अग्रवाल के घर भेजने से पहले उसका सत्यापन किस स्तर पर हुआ था?

    फिलहाल पुलिस की तलाश वरुण कुमार पर केंद्रित है। उसकी गिरफ्तारी और पूछताछ के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि सूरज नगर की इस वारदात के पीछे लूट, व्यक्तिगत विवाद, पहले से रची गई योजना या किसी अन्य कारण की भूमिका थी। पांच करोड़ रुपये के पुराने वित्तीय विवाद और केयरटेकर की संदिग्ध गतिविधियां जांच के महत्वपूर्ण बिंदु जरूर बन गई हैं, लेकिन इनके बीच संबंध स्थापित होना अभी बाकी है।

  • यौन आरोपी प्रकाश चंद्र गुप्ता की साजिश बेनकाब, पीड़िता को न्याय के लिए समन जारी

    यौन आरोपी प्रकाश चंद्र गुप्ता की साजिश बेनकाब, पीड़िता को न्याय के लिए समन जारी

    भोपाल, 22 सितंबर (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। बूटकॉम सिस्टम्स के प्रोप्राईटर प्रकाश चंद्र गुप्ता के खिलाफ नाबालिग से कथित यौन छेड़छाड़ के पॉक्सो प्रकरण में सुनवाई आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है। विशेष पॉक्सो न्यायालय ने आरोपी की ओर से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 91 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 94 के तहत प्रस्तुत आवेदन खारिज कर अभियोजन साक्ष्य के लिए समन जारी किए हैं। अदालत के इस आदेश से करीब चार साल पुराने मामले में पीड़िता के बयान दर्ज होने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

    इस मामले में नाबालिग पीड़िता ने अपने परिवार के साथ जाकर गुप्ता के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। मार्च 2024 से मामले में पीड़िता के बयान दर्ज नहीं हो पाए हैं। आरोपी के वकील हरीश मेहता की ओर से यह तर्क दिया जाता रहा कि प्रकरण के मूल दस्तावेज पुलिस के पास हैं और उनके उपलब्ध होने के बाद ही आगे की कार्रवाई होनी चाहिए। अदालत ने इस आधार को स्वीकार नहीं किया।

    गुप्ता की ओर से यह भी दावा किया गया था कि पीड़िता के परिवार के साथ आर्थिक लेनदेन हुआ था और इसी विवाद के कारण उसके खिलाफ शिकायत की गई।इसमें उसने पीड़िता के पिता के फर्जी हस्ताक्षरों वाला एक दस्तावेज प्रस्तुत किया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी आपराधिक मामले की विवेचना और विचारण को किसी अलग सिविल विवाद के आधार पर रोका नहीं जा सकता। आर्थिक लेनदेन का विवाद है तो उसके लिए अलग कानूनी प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।

    प्रेस इंफार्मेशन सेंटर की उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार  गुप्ता के खिलाफ इससे पहले भी आर्थिक धोखाधड़ी से जुड़े मामले सामने आ चुके हैं। भोपाल के एक चर्चित व्यापारी परिवार को झांसा देकर गुप्ता ने लगभग चार करोड़ रुपयों की ठगी की थी जिसमें उसे जेल भेजा गया था। वर्ष 2024 में केनरा बैंक की कोहेफिजा शाखा से जुड़े एक अन्य मामले में 2.21 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी के आरोप में गुप्ता को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। वर्ष 2006-07 के पंजाब नेशनल बैंक से जुड़े 32 लाख रुपये के पुराने मामले का भी उल्लेख उपलब्ध रिपोर्टों में है।

    हालांकि इन पुराने मामलों में लगाए गए आरोपों और वर्तमान पॉक्सो प्रकरण का अंतिम निर्णय संबंधित अदालतों द्वारा ही किया जाना है। वर्तमान मामले में अदालत का ताजा आदेश फिलहाल इतना स्पष्ट करता है कि दस्तावेजों और दूसरे विवादों के आधार पर कार्यवाही को लंबा खींचने की कोशिश स्वीकार नहीं की जाएंगी और अब अभियोजन साक्ष्य की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।   ये मामला लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 के विशेष न्यायाधीश की कोर्ट में विचारण के लिए चल रहा है। आरोपी का प्रयास है कि बालिका के बयान अदालत के समक्ष दर्ज न हो पाएं इसके लिए वह तरह तरह के आरोप लगाकर अदालत को गुमराह कर रहा है।

    दरअसल आदतन अपराधी  प्रकाश चंद्र गुप्ता हुंडी का धंधा दिखाकर हवाला का कारोबार करता है। दुनिया की आंखों में धूल झोंकने के लिए यह भोपाल के एमपीनगर में बूटकाम सिस्टम नाम से कंप्यूटर की दूकान चलाता है। कंप्यूटर व्यवसाय में ठगी से लेकर इसके विरुद्ध ज्यादा ब्याज दिलाने का वादा करके रकम हड़पने के कई मामले एमपीनगर पुलिस थाने में और अन्य जगहों व शहरों में लंबित हैं। पुलिस के पास गुप्ता का पिछले 25 सालों का रिकार्ड है जिसमें उसने आम नागरिकों के अलावा कई प्रतिष्ठित लोगों से अरबों रुपयों की ठगी और धोखाधड़ी की है। उसके विरुद्ध महिलाओं के विरुद्ध किए गए अपराधों की भी लंबी फेरहिस्त है।

  • सौरभ शर्मा से जब्त गोल्ड और भूपेन्द्र सिंह का जहरीली शराब कांड से क्या रिश्ता

    सौरभ शर्मा से जब्त गोल्ड और भूपेन्द्र सिंह का जहरीली शराब कांड से क्या रिश्ता

    भोपाल, 21 सितंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। सागर के बंडा-शाहगढ़ इलाके में जहरीली और नकली शराब से हुई मौतों ने मध्यप्रदेश में अवैध शराब के कारोबार और उसके पीछे काम करने वाले पूरे तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है। शुरुआती तौर पर मामला कुछ गांवों में बिक रही जहरीली शराब का लगा था, लेकिन पुलिस की जांच आगे बढ़ने के साथ इसकी कड़ियां अंतरराज्यीय शराब तस्करी, स्पिरिट की आपूर्ति, नकली बोतल-लेबल और लाइसेंसी शराब दुकान तक पहुंच गईं। 19 सितंबर तक पुलिस ने 52 लोगों को आरोपी बनाया और 37 गिरफ्तारियां होने की जानकारी सामने आई। मौतों की संख्या 30 से अधिक बताई गई है, हालांकि सरकारी रिकॉर्ड और स्थानीय आंकड़ों में अंतर है।

    जहरीली शराब कांड उजागर होने के बाद राजनीतिक हलकों में तरह तरह के कयास लगाए जाने लगे हैं। भोपाल में सौरभ शर्मा से जब्त 52 किलोग्राम सोना (गोल्ड) और लगभग 10 से 11 करोड़ रुपये नकद बरामद होने के मामले को इस शराब कांड से जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीति के गलियारों में चर्चा है कि भूपेन्द्र सिंह और खाद्य मंत्री गोविंद राजपूत के बीच पारंपरिक अदावट शराब कांड के रूप में सामने आई है।

    पुलिस की पूछताछ में सामने आई कहानी इस मामले को और गंभीर बनाती है। जांच के अनुसार बरेठी शराब दुकान से जुड़े लाइसेंसी मनीष लोधी का संपर्क उत्तर प्रदेश के शराब तस्कर रवि लखेरा से था। आरोप है कि इसी नेटवर्क ने नकली शराब बनाने की तकनीक और कच्चा माल उपलब्ध कराया। चंदू राजपूत के मक्के के खेत में स्पिरिट, खाली बोतल, नकली रैपर और पैकिंग सामग्री के सहारे करीब 50 पेटी नकली शराब तैयार किए जाने की जानकारी जांच में सामने आई। शराब को ‘सागर गोल्ड’ जैसे असली ब्रांड की शक्ल में बाजार तक पहुंचाया गया। पुलिस ने अलग-अलग स्थानों से शराब के साथ खाली क्वार्टर, ढक्कन, लेबल, पैकिंग सामग्री और शराब बनाने के उपकरण भी जब्त किए। रवि लखेरा के खिलाफ करीब 25 और मनीष लोधी के खिलाफ 11 आपराधिक मामले दर्ज होने की जानकारी पुलिस रिकॉर्ड के हवाले से सामने आई है।

    मामले की एक महत्वपूर्ण कड़ी आबकारी आयुक्त दीपक सक्सेना का वो बयान है,जिसमें  उन्होंने बताया कि जब्त शराब का स्टॉक बरेठी के एक शराब ठेकेदार से खरीदा गया था। संबंधित खेप की जांच कर यह पता लगाने के निर्देश दिए गए कि वह कहां-कहां पहुंची और बाजार से उसे वापस मंगाने को कहा गया। इससे यह सवाल भी सामने आया कि यदि किसी लाइसेंसी दुकान से खरीदी गई शराब नकली नेटवर्क तक पहुंच रही थी तो निगरानी व्यवस्था कहां विफल हुई।

    घटना के बाद आबकारी विभाग की भूमिका पर सरकार ने तत्काल कार्रवाई की। सहायक आबकारी आयुक्त कीर्ति दुबे, सहायक जिला आबकारी अधिकारी दिलीप खंडाते और बंडा की आबकारी उप निरीक्षक रोशनी उरेती को निलंबित किया गया, जबकि उपायुक्त एवं संभागीय उड़नदस्ता प्रभारी नीरजा श्रीवास्तव को ग्वालियर मुख्यालय अटैच किया गया। बाद में सागर में लंबे समय से पदस्थ सहायक जिला आबकारी अधिकारी मंजूषा सोनी को भी उनकी वर्तमान जिम्मेदारी से हटाया गया। घटना के बाद आबकारी आयुक्त ने प्रदेशभर में अवैध और जहरीली शराब के खिलाफ सर्चिंग तेज करने के निर्देश दिए। ग्वालियर में कार्रवाई के दौरान करीब 2300 लीटर एथेनॉल भी बरामद किया गया।

    पुलिस स्तर पर बंडा थाना प्रभारी राजेंद्र सिंह कुशवाहा और चौकी प्रभारी को निलंबित किया गया। प्रभावित क्षेत्र की छह शराब दुकानें सील कर उनके नमूने जांच के लिए भेजे गए। पुलिस कार्रवाई के साथ यह भी जांच शुरू हुई कि अवैध शराब की सूचना पहले से किस-किस स्तर पर थी और उसके बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई। गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ में नेटवर्क के दूसरे लोगों की भूमिका खोजी जा रही है। फरार प्रमुख आरोपियों की गिरफ्तारी पर इनाम घोषित किया गया है।

    स्वास्थ्य विभाग की भूमिका इस मामले में उपचार और बीमारी की पहचान तक सीमित दिखाई दी, लेकिन शुरुआती व्यवस्था की गति पर सवाल भी उठे। बड़ी संख्या में मरीजों को बंडा और सागर के अस्पतालों में भर्ती कराया गया। गंभीर मरीजों को बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज भेजा गया और कुछ को बेहतर उपचार के लिए बाहर भेजने की व्यवस्था की गई। उप मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल ने बीएमसी पहुंचकर मरीजों का हाल जाना और 24 घंटे विशेषज्ञ डॉक्टरों तथा जरूरी दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। प्रभावित गांवों में स्वास्थ्य दल भेजे गए। जहरीली शराब से आंखों पर पड़े प्रभाव की जांच के लिए बाद में स्वास्थ्य शिविर भी लगाए गए।

    सरकार ने मामले को केवल विभागीय कार्रवाई तक नहीं रखा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने न्यायिक जांच के आदेश दिए और सेवानिवृत्त हाईकोर्ट न्यायाधीश विष्णु प्रताप सिंह चौहान की अध्यक्षता में आयोग गठित किया गया। सागर संभाग में प्रशासनिक और पुलिस स्तर पर भी बदलाव किए गए। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को नीचे से ऊपर तक जिम्मेदारी की जांच करने और लापरवाही मिलने पर कार्रवाई के निर्देश दिए।

    राजनीतिक संरक्षण का आरोप इस मामले का सबसे संवेदनशील हिस्सा है। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि शराब कारोबार को राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण के बिना इतने बड़े स्तर पर चलाना संभव नहीं था।अभी तक उपलब्ध रिपोर्टों में पूर्व मंत्री भूपेंद्र सिंह के खिलाफ सागर के इस जहरीली शराब कांड में संरक्षण देने का कोई पुलिस या न्यायिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है।

    भूपेंद्र सिंह का नाम इसलिए चर्चा में आया क्योंकि अगस्त 2025 में उनके सगे भतीजे रुद्र प्रताप सिंह के बामोरा स्थित फार्म हाउस से करीब 11.79 लाख रुपये की अवैध शराब बरामद हुई थी। आबकारी अधिनियम के तहत मामला दर्ज होने के बाद भूपेंद्र सिंह ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से सार्वजनिक सूचना जारी कर कहा था कि उनके निकट परिवार के बाहर के रिश्तेदारों के कारोबार से उनका कोई संबंध नहीं है। हालांकि उनके इस वक्तव्य का असर बूमरेंग की तरह उलटा हुआ और जनता के बीच भूपेन्द्र सिंह संदेह की नजर से देखे जाने लगे।

    अब सागर शराब कांड के बाद विपक्ष इसी पुराने घटनाक्रम को जोड़कर सवाल उठा रहा है कि प्रभावशाली लोगों से जुड़े शराब कारोबार पर प्रशासन की निगरानी कितनी प्रभावी रही। असली सवाल न्यायिक जांच के सामने यह है कि क्या स्थानीय शराब कारोबारियों, लाइसेंसी दुकानों, तस्करों और अधिकारियों के बीच ऐसा कोई संरक्षण तंत्र था जिसने अवैध कारोबार को लंबे समय तक चलने दिया।

    सागर कांड की सबसे बड़ी अंतर्कथा यही है कि खेत में नकली शराब बनाने वाले कुछ लोगों की गिरफ्तारी से मामला खत्म नहीं होगा। यदि स्पिरिट दिल्ली से, बोतलें और पैकिंग सामग्री दूसरे शहरों से और तस्करी दूसरे राज्यों से जुड़ी थी तो स्थानीय स्तर पर इसकी निगरानी करने वाले तंत्र को इसकी भनक क्यों नहीं लगी। आबकारी आयुक्त की ओर से संबंधित खेप को वापस मंगाने का निर्देश और बाद में सामने आया बड़ा नेटवर्क बताता है कि जांच को केवल जहरीली शराब बनाने वालों तक सीमित रखने के बजाय सप्लाई चेन और उसकी निगरानी करने वालों तक ले जाना होगा। न्यायिक जांच अब यह तय करेगी कि मौतों के लिए केवल शराब बनाने और बेचने वाले जिम्मेदार थे या प्रशासनिक लापरवाही की भी कोई प्रमाणित भूमिका थी।

  • बागी पानसिंह तोमर का एनकाऊंटर करने वाले विजय रमन को खाकी वर्दी का योद्धा बताने वाली पुस्तक का विमोचन

    बागी पानसिंह तोमर का एनकाऊंटर करने वाले विजय रमन को खाकी वर्दी का योद्धा बताने वाली पुस्तक का विमोचन

     

    डीजीपी श्री कैलाश मकवाना बोले पुलिस का काम टारगेट पूरा करना

    भोपाल, 12 सितंबर,(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।चंबल के बागी पानसिंह तोमर का एनकाउंटर करने वाले स्वर्गीय विजय रमन के जीवन और व्यक्तित्व को संवारने वाली पुस्तक खाकी वर्दी का योद्धा के हिंदी संस्करण का लोकार्पण आज भोपाल में किया गया। आईपीएस अधिकारी स्व. विजय रमन के जीवन, कार्यशैली, साहस और अनुभवों पर आधारित इस पुस्तक का विमोचन समारोह शनिवार को दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय, भोपाल में संपन्न हुआ।

    समारोह में मध्यप्रदेश के डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस कैलाश मकवाना मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने कहा कि स्व. विजय रमन के साहस, नेतृत्व क्षमता, बुद्धिमत्ता और पुलिस सेवा में उनके उल्लेखनीय योगदान को हमेशा याद किया जाएगा।उन्होंने कहा कि पुलिस को जिन सामाजिक लक्ष्यों को पूरा करने की जवाबदारी दी जाती है कुशल अधिकारी उन्हें पूरा करते हैं। चंबल क्षेत्र में कुख्यात दस्यु पान सिंह तोमर और उसके गिरोह के खिलाफ चलाए गए अभियान में श्री रमन की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने बताया कि स्व. विजय रमन ने कुख्यात आतंकवादी गाज़ी बाबा के खिलाफ अभियान का भी नेतृत्व किया था।

    कार्यक्रम में स्व. विजय रमन की पत्नी श्रीमती वीना रमन तथा वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक गिरिजा शंकर विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। पब्लिक रिलेशंस सोसायटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनोज द्विवेदी ने अतिथियों का स्वागत किया। मंच का संचालन स्व. विजय रमन की पुत्रवधू श्रीमती दिव्या रमन ने किया। इसके साथ ही पूर्व पुलिस महानिदेशक एस.के. राउत तथा आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. रश्मि झा ने मंच से संबोधित किया।पूर्व पुलिस महानिदेशक सुरेन्द्र सिंह और पूर्व मंत्री आईपीएस रुस्तम सिंह जी भी कार्यक्रम में शामिल हुए।

    इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि स्व. श्री विजय रमन ने चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी कानून और कर्तव्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उनकी साहसिक कार्यशैली, निर्णय क्षमता और कर्तव्यनिष्ठा पुलिस सेवा से जुड़े अधिकारियों एवं नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है।

    वर्ष 2023 में उनके निधन के बाद प्रकाशित ‘खाकी वर्दी का योद्धा’ उनके जीवन, संघर्ष, अनुभवों और पुलिस सेवा में दिए गए योगदान को संजोने का महत्वपूर्ण प्रयास है। पुस्तक के माध्यम से स्व. विजय रमन की प्रेरणादायी यात्रा और उनकी कार्यशैली को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है।

  • बंडा में जहरीली शराब लाने वाला अभी तक नहीं पकड़ाया

    बंडा में जहरीली शराब लाने वाला अभी तक नहीं पकड़ाया

    भोपाल, 07 सितंबर (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। सागर के बंडा-शाहगढ़ क्षेत्र में जहरीली शराब से हुई मौतों का आंकड़ा बढ़कर 21 तक पहुंच गया है। 120 से अधिक लोगों के उपचार की जानकारी सामने आई है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कुछ मृतकों की मौत मेथेनॉल के विषाक्त प्रभाव से होने की पुष्टि हुई है। इस घटना ने अवैध शराब के कारोबार के साथ आबकारी और पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    घटना के बाद सरकार ने सागर के सहायक आबकारी आयुक्त कीर्ति दुबे, सहायक जिला आबकारी अधिकारी दिलीप खंडाते और बंडा वृत्त की आबकारी उप निरीक्षक प्रोशनी उरेती को निलंबित किया है। उपायुक्त एवं संभागीय फ्लाइंग स्क्वाड प्रभारी नीरजा श्रीवास्तव को ग्वालियर मुख्यालय अटैच किया गया। बंडा थाना प्रभारी राजेंद्र सिंह कुशवाहा और गुगरा चौकी प्रभारी पूरण लाडिया पर भी निलंबन की कार्रवाई हुई है। प्रभावित क्षेत्र की शराब दुकानों को सील किया गया है और 30 से अधिक आरोपियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज कर कई लोगों को हिरासत में लिया गया है।

    सरकार की ओर से उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल ने सागर पहुंचकर बीएमसी अस्पताल में मरीजों और उनके परिजनों से मुलाकात की। उन्होंने इलाज में लापरवाही नहीं होने देने और अवैध शराब के पूरे नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए। मृतकों के परिवारों को चार-चार लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा भी की गई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जिम्मेदार लोगों को नहीं बख्शने की बात कही है।

    मामले की मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए गए हैं। जांच में शराब तैयार करने, भंडारण, परिवहन और वितरण से लेकर विभागीय लापरवाही तक की पड़ताल होगी। सागर पुलिस की प्रारंभिक जांच में उत्तर प्रदेश के ललितपुर से नकली शराब आने और उस पर फर्जी रैपर, सील और क्यूआर कोड लगाए जाने की बात सामने आई है। हालांकि ललितपुर पुलिस ने इस दावे को भ्रामक बताया है। इससे जांच का दायरा और महत्वपूर्ण हो गया है।

    कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सरकार पर शराब माफिया को संरक्षण देने का आरोप लगाते हुए सागर एसपी अनुराग सुजानिया के खिलाफ कार्रवाई और उन्हें जेल भेजने की मांग की है। उन्होंने प्रशासन पर मौतों के वास्तविक आंकड़े छिपाने का आरोप भी लगाया है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भी सरकार से जवाब मांगा और शराब माफिया के संरक्षण का मुद्दा उठाया है। पटवारी के 50 मौतों के दावे की फिलहाल सरकारी आंकड़ों से पुष्टि नहीं हुई है।

    इस बीच इंदौर-उज्जैन के किसी शराब कारोबारी की सप्लाई और उसे कारोबार से हटाने के लिए जहरीली शराब कांड रचे जाने जैसी चर्चाएं भी हैं। फिलहाल जांच एजेंसियों ने इसकी पुष्टि नहीं की है। इसलिए जांच का यह संभावित कोण हो सकता है, तथ्य नहीं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतनी बड़ी मात्रा में जहरीली शराब स्थानीय नेटवर्क तक कैसे पहुंची और उसे रोकने में आबकारी तथा पुलिस तंत्र क्यों विफल रहा। मजिस्ट्रियल और पुलिस जांच के निष्कर्ष ही यह स्पष्ट करेंगे कि यह केवल शराब माफिया की साजिश थी या इसके पीछे किसी बड़े कारोबारी हित और प्रशासनिक संरक्षण की भी भूमिका थी।

  • देश के गले नहीं उतरेगी सुभाष चंद्रा की माफी

    देश के गले नहीं उतरेगी सुभाष चंद्रा की माफी

    सुभाष चंद्रा और Essel Group की कहानी को केवल एक उद्योगपति की व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया मानकर छोड़ देना शायद इस पूरे प्रकरण के साथ सबसे बड़ी नाइंसाफी होगी। 22,006 करोड़ रुपये के दावों के सामने 6.5 करोड़ रुपये की repayment plan को NCLT की मंजूरी मिलना कानूनी प्रक्रिया का परिणाम हो सकता है, लेकिन आम आदमी के मन में जो बेचैनी पैदा हुई है, उसका कारण कानून नहीं, उस कानून के पीछे दिखाई देने वाली वित्तीय तस्वीर है। आखिर इतनी बड़ी देनदारी पैदा कैसे हुई? पैसा देने वाले संस्थान इतने वर्षों तक क्या देखते रहे? कारोबार की चमक, बड़े दफ्तर, बड़े मीडिया ब्रांड, शेयर बाजार की ऊंची कीमत और उद्योगपति की प्रतिष्ठा क्या कर्ज चुकाने की क्षमता का प्रमाण बन गए थे?सुभाष चंद्रा की आर्थिक हालत सबके सामने थी इसके बावजूद हमारे वित्तीय संस्थान उन्हें कर्ज पर कर्ज आखिर क्यों और कैसे देते रहे।

    सुभाष चंद्रा ने सफाई दी है कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से 22 हजार करोड़ रुपये का कर्ज नहीं लिया था। उनका कहना है कि उनके खिलाफ व्यक्तिगत गारंटी से जुड़े दावे करीब 3,992 करोड़ रुपये के हैं और वे Vivek Infracon, Spirit Textiles और Churu Enterprises के कर्जों के गारंटर थे। NCLT की कार्यवाही में 22,006.57 करोड़ रुपये के कुल दावे सामने आए, ये कर्ज भले ही सुभाष चंद्रा ने नहीं लिया हो पर उनकी गारंटी को आखिर लोन देने का आधार क्यों मान लिया गया। उससे भी बड़ा सवाल यह है कि जिन कंपनियों ने पैसा लिया, उन्हें पैसा देने वालों ने उनकी वास्तविक क्षमता का आकलन किस तरह किया था? क्या कोई फोकटिया गारंटी के दस्तावेज पेश कर देगा तो बैंक उसके लिए अपना खजाना खोलकर रख देंगे।

    यह बी कॉम, एलएलबी नीलेश शर्मा बताया जा रहा है।NCLT का सदस्य है। सुभाष चंद्रा के केस में मामला जब दो सदस्यों के बीच टाई हो गया था तो तीसरे सदस्य के तौर पर इनके पास भेजा गया इन्होंने सुभाष चंद्रा को डिफाल्टर मानकर कथित तौर पर देश को 21 हजार 9 सौ 93 करोड़ का चूना लगवा दिया।

    यहीं से यह कहानी एक उद्योगपति की कहानी से निकलकर भारत की वित्तीय व्यवस्था की कहानी बन जाती है।किसी बैंक या वित्तीय संस्था का पैसा मुफ्त का पैसा नहीं होता। उसमें आम आदमी की जमा पूंजी, बीमा कंपनियों का पैसा, निवेशकों की बचत और अर्थव्यवस्था की पूंजी शामिल होती है। इसलिए हजारों करोड़ रुपये का कर्ज देते समय केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि सामने वाला कारोबारी कितना बड़ा है। यह देखना जरूरी है कि उसका कारोबार कितना कमा रहा है, उसकी नकदी कितनी है, कर्ज कितना है और वह कर्ज की किस्त तथा ब्याज अपनी कमाई से चुका सकता है या नहीं।

    Essel Group के मामले में 2019 तक वित्तीय संकट छिपा हुआ नहीं रह गया था। समूह पर भारी कर्ज था, शेयरों की कीमतों में दबाव था और ऋणदाताओं के सामने जोखिम बढ़ रहा था। उस समय यह भी सामने आया कि Essel की कुछ कंपनियां घाटे और कमजोर नेटवर्थ की स्थिति में थीं, फिर भी म्यूचुअल फंडों ने उनके ऋण साधनों में बड़ी रकम लगाई थी। एक रिपोर्ट के अनुसार दो ऐसी कंपनियों में तीन बड़े म्यूचुअल फंडों का करीब 960 करोड़ रुपये का निवेश था।

    अगर कोई कंपनी लगातार कर्ज लेकर अपना कारोबार चला रही है, पुराने दायित्वों का दबाव बढ़ रहा है और उसकी संपत्ति तथा आय के बीच संतुलन बिगड़ रहा है, तो वित्तीय संस्थान को खतरे की घंटी बहुत पहले सुनाई देनी चाहिए। NPA घोषित होने का इंतजार करना किसी अच्छे वित्तीय प्रबंधन की पहचान नहीं है। बीमारी का पता तब लगाना जब मरीज अस्पताल पहुंच चुका हो, इलाज की सफलता नहीं कहलाती।

    यह बात केवल Essel पर लागू नहीं होती। किसी भी बड़े कारोबारी समूह पर लागू होती है। चाहे वह मीडिया हो, रियल एस्टेट हो, बिजली हो, सड़क हो, दूरसंचार हो या कोई दूसरा उद्योग। चमकदार ब्रांड, बड़े विज्ञापन, महंगे कार्यालय और बाजार में ऊंची प्रतिष्ठा किसी कर्ज की सुरक्षा नहीं हैं। कर्ज की असली सुरक्षा वह आय है जो समय पर वापस पैसा पैदा करती है।

    यहीं समाचार उद्योग का उदाहरण भी गंभीर है। देश में बड़े-बड़े मीडिया समूह हैं, जिनके पास अखबार, टीवी चैनल, डिजिटल प्लेटफॉर्म और विशाल प्रिंटिंग नेटवर्क हैं। उनके बारे में यदि कहीं ऋण, कर या भुगतान संबंधी विवाद हों तो उन्हें भी उसी कसौटी पर जांचा जाना चाहिए जिस पर किसी दूसरे कारोबारी समूह को जांचा जाता है। कई मीडिया घरानों पर तो आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय ने भी छापे मारे हैं ।छापों के पीछे आयकर चोरी और विदेशी धन की डंपिंग को बड़ा कारण बताया गया है। इसके बावजूद वे लगातार सरकार की आंखों का तारा बने हुए हैं। क्या सरकारों की वित्तीय अकुशलता को लगाम लगाने की क्षमता हमारे वित्तीय प्रशासन में तनिक भी नहीं है। यदि हां तो फिर उन्हें सिर आंखों पर बिठाने की जरूरत ही क्या है।

    अगर किसी बड़े उद्योगपति को बैंक पैसा देता है तो बैंक को यह नहीं सोचना चाहिए कि वह देश का बड़ा उद्योगपति है, इसलिए उसका कारोबार कभी नहीं डूबेगा। उसे यह सोचना चाहिए कि यदि कारोबार डूब गया तो बैंक के पास क्या बचेगा। यही सोच छोटे कारोबारी और किसान के मामले में भी होनी चाहिए और बड़े कॉरपोरेट के मामले में भी।

    यहां एक असमानता जनता को सबसे ज्यादा परेशान करती है। छोटा कर्जदार किस्त में चूक करे तो बैंक फोन करता है, नोटिस भेजता है, उसकी संपत्ति पर कार्रवाई होती है और उसकी क्रेडिट हिस्ट्री खराब हो जाती है। बड़े कारोबारी के मामले में हजारों करोड़ रुपये का जोखिम पैदा हो जाए तो वर्षों तक पुनर्गठन, अतिरिक्त कर्ज, समय-विस्तार और समाधान योजनाओं की प्रक्रिया चलती रहती है। कानूनी कारण अलग हो सकते हैं, लेकिन जनता के मन में पैदा होने वाली धारणा एक ही होती है—क्या नियम सबके लिए बराबर हैं?

    NCLT ने सुभाष चंद्रा के मामले में 6.5 करोड़ रुपये का repayment plan मंजूर किया है और इस फैसले के खिलाफ कुछ ऋणदाता आगे जाने की तैयारी कर रहे हैं। HDFC Bank, LIC Housing Finance, Union Bank और Canara Bank जैसे ऋणदाताओं की आपत्तियां इस बात का संकेत हैं कि मामला अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

    इस मामले में पहला सबक यह कि बड़े कर्ज की मंजूरी केवल संपत्ति देखकर नहीं होनी चाहिए। दूसरा, प्रमोटर की व्यक्तिगत गारंटी की वास्तविक कीमत का स्वतंत्र आकलन होना चाहिए। तीसरा, एक ही कारोबारी समूह की अलग-अलग कंपनियों में विभिन्न वित्तीय संस्थाओं के कुल जोखिम की निगरानी होनी चाहिए। चौथा, संकट के शुरुआती संकेत मिलते ही नई वित्तीय सहायता पर कठोर जांच होनी चाहिए। और पांचवां, यदि पैसा कारोबार बढ़ाने के बजाय पुराने कर्ज को बचाने में लग रहा है तो उसे तुरंत लाल संकेत माना जाना चाहिए।

    कर्ज उत्पादन के लिए हो तो अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। कर्ज केवल कर्ज चुकाने के लिए लिया जाने लगे तो अर्थव्यवस्था के भीतर एक कृत्रिम चमक पैदा होती है। बाहर से कारोबार चलता हुआ दिखाई देता है, लेकिन भीतर से वह कर्ज पर टिका होता है। ऐसी व्यवस्था जितने दिन चलती है, अंतिम नुकसान उतना ही बड़ा होता जाता है।

    सुभाष चंद्रा का यह कहना कि समूह ने वर्षों में बहुत बड़ी रकम चुकाई है और उन्होंने अपनी संपत्तियां बेचकर भी भुगतान किया, स्वतंत्र रूप से सत्यापित होने पर इस मामले को समझने में महत्वपूर्ण होगा। लेकिन जब तक पूरा लेखा सार्वजनिक और स्वतंत्र रूप से जांचा नहीं जाता, इसे दावा ही माना जाना चाहिए। दूसरी तरफ ऋणदाताओं के दावों का भी पूरा हिसाब जनता के सामने आना चाहिए।

    इस शोर के बीच एक शांत और कठोर बात कही जानी चाहिए—व्यवसाय की शान कर्ज चुकाने की क्षमता से बड़ी नहीं हो सकती। किसी कारोबारी का महल, उसका मीडिया साम्राज्य, उसकी गाड़ियां, उसके दफ्तर, उसका बाजार मूल्य या उसकी सार्वजनिक प्रतिष्ठा जनता के पैसे की गारंटी नहीं है। बैंक को पैसा देते समय केवल यह देखना चाहिए कि पैसा वापस कैसे आएगा।

    और जब कोई कंपनी संकट में हो तो उसे बचाने का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि उसे लगातार नया पैसा देकर पुराने नुकसान को छिपाया जाए। संकटग्रस्त लेकिन व्यवहार्य कारोबार को बचाना अर्थव्यवस्था के हित में है; केवल प्रतिष्ठा बचाने के लिए लगातार वित्त देना अंततः जनता के हित के खिलाफ जा सकता है।

    सुभाष चंद्रा प्रकरण की सबसे बड़ी सीख इसलिए 22 हजार करोड़ और 6.5 करोड़ के बीच का अंतर नहीं है। असली सीख यह है कि कर्ज देने की गलती को कर्ज लेने वाले की प्रतिष्ठा के पीछे छिपाया नहीं जा सकता।

    जिस दिन भारत का वित्तीय तंत्र यह सिद्ध कर देगा कि छोटा किसान हो या बड़ा उद्योगपति, अखबार हो या टीवी नेटवर्क, नई कंपनी हो या पुराना कारोबारी घराना—पैसा उसी को मिलेगा जो उसे उत्पादक ढंग से इस्तेमाल करके वापस कर सकता है—उस दिन जनता का भरोसा मजबूत होगा।

    वरना शान-शौकत के पीछे छिपा कर्ज एक दिन फिर किसी नई कहानी में सामने आएगा। नाम बदल जाएगा, उद्योग बदल जाएगा, रकम बदल जाएगी, लेकिन सवाल वही रहेगा—पैसा किसने दिया, किस भरोसे पर दिया और अंत में उसकी कीमत किसने चुकाई?

  • ट्विशा शर्मा मौत की जांच से चकराई सीबीआई

    ट्विशा शर्मा मौत की जांच से चकराई सीबीआई

    भोपाल,23 जून(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर).राजधानी के कटारा हिल्स स्थित एक प्रतिष्ठित परिवार में विवाह के कुछ ही महीनों बाद 31 वर्षीय ट्विशा शर्मा की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। नोएडा निवासी ट्विशा का शव 12 मई को उनके ससुराल में फंदे से लटका मिला था। प्रारंभिक तौर पर इसे आत्महत्या का मामला बताया गया, लेकिन परिजनों ने शुरुआत से ही हत्या, दहेज प्रताड़ना और साक्ष्य मिटाने के आरोप लगाते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की। मामला इतना संवेदनशील हो गया कि अंततः इसकी जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपनी पड़ी।

    ट्विशा का विवाह दिसंबर 2025 में भोपाल के अधिवक्ता समर्थ सिंह से हुआ था। समर्थ सिंह एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश के पुत्र हैं। मृतका के परिवार का आरोप है कि विवाह के बाद से ही ट्विशा मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का शिकार थीं। परिवार का दावा है कि वह भोपाल छोड़कर वापस नोएडा आना चाहती थीं और अपनी परेशानियों का उल्लेख कई बार मित्रों तथा परिजनों से कर चुकी थीं। घटना से एक दिन पहले अपनी एक मित्र को भेजे गए संदेश में ट्विशा ने लिखा था कि वह “फंस गई हैं” और खुलकर बात नहीं कर सकतीं। इस संदेश ने मामले को और अधिक रहस्यमय बना दिया।

    मामले ने उस समय नया मोड़ ले लिया जब ट्विशा के परिजनों ने अंतिम संस्कार करने से इनकार कर दिया और दोबारा पोस्टमार्टम की मांग को लेकर आंदोलन शुरू कर दिया। परिवार का आरोप था कि प्रारंभिक जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से उन्हें संतोष नहीं मिला। उन्होंने शव को सुरक्षित रखने, एम्स दिल्ली में पुनः परीक्षण कराने और उच्चस्तरीय जांच की मांग की। कई दिनों तक चले विरोध प्रदर्शन के बाद मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया।

    जांच के दौरान दहेज प्रताड़ना, घरेलू हिंसा, कथित गर्भपात के लिए दबाव, आर्थिक लेन-देन और वैवाहिक विवाद जैसे कई पहलू सामने आए। कुछ रिपोर्टों में शेयर निवेश और लाखों रुपये के वित्तीय विवाद की भी चर्चा हुई है। हालांकि इन आरोपों की पुष्टि जांच एजेंसियों द्वारा अभी नहीं की गई है और इन्हें जांच का हिस्सा माना जा रहा है।

    मामले की गंभीरता को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने भी संज्ञान लिया। बाद में सीबीआई ने भोपाल पुलिस से जांच अपने हाथ में लेकर प्रकरण पुनः दर्ज किया। सीबीआई की विशेष टीम ने घटनास्थल का पुनर्निर्माण, डिजिटल साक्ष्यों का परीक्षण, मोबाइल रिकॉर्ड, अंतिम बातचीत और घटनाक्रम की विस्तृत पड़ताल शुरू की। जांच एजेंसी आधुनिक तकनीकों की सहायता से ट्विशा के अंतिम घंटों की परिस्थितियों को समझने का प्रयास कर रही है।

    इसी बीच ट्विशा के पति समर्थ सिंह और उनकी मां, सेवानिवृत्त न्यायाधीश गिरिबाला सिंह, जांच एजेंसियों के घेरे में आए। दोनों से विस्तृत पूछताछ की गई और न्यायालय ने उनकी हिरासत एवं न्यायिक रिमांड संबंधी आदेश भी जारी किए। हाल ही में अदालत ने उनकी न्यायिक रिमांड 30 जून तक बढ़ा दी है, जबकि जांच एजेंसियां दूसरी पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य वैज्ञानिक साक्ष्यों का इंतजार कर रही हैं।

    ट्विशा शर्मा की मौत ने केवल एक परिवार की त्रासदी को सामने नहीं रखा, बल्कि दहेज प्रताड़ना, वैवाहिक हिंसा, महिलाओं की सुरक्षा और प्रभावशाली परिवारों से जुड़े मामलों की निष्पक्ष जांच जैसे मुद्दों को भी राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है। क्या यह आत्महत्या थी, आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला था या फिर कोई सुनियोजित साजिश? इस प्रश्न का उत्तर अब सीबीआई जांच, फॉरेंसिक रिपोर्ट और न्यायिक प्रक्रिया से ही सामने आएगा।

    फिलहाल पूरे देश की निगाहें इस बहुचर्चित मामले पर टिकी हैं, जहां एक युवा महिला की असमय मृत्यु ने न्याय व्यवस्था, पुलिस जांच और सामाजिक मूल्यों से जुड़े कई कठिन प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

  • कांग्रेस की हांडी चढ़े भी तो कैसे

    कांग्रेस की हांडी चढ़े भी तो कैसे


    भारत की जनता अब कांग्रेस के नेताओं और प्रवक्ताओं की बदजुबानी झेलने तैयार नहीं है। कांग्रेस कुमार राहुल गांधी ने जिस अंदाज में ऊल जलूल बयानबाजी शुरु की उसी रौ को उनके कार्यकर्ताओं ने भी अपना लिया। शिव खेड़ा के बयान के बाद असम पुलिस ने जो छापामारी की उससे चिचियाते कांग्रेस नेताओं ने इसे राजनैतिक विद्वेष से की गई कार्रवाई बताना शुरु कर दिया था। इसी को लेकर शिव खेड़ा सुप्रीम कोर्ट भी दौड़े पर वहां उन्हें निराशा हाथ लगी।


    इस मामले में जब विषय सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, तो अदालत ने प्रथम दृष्टया पुलिस की कार्रवाई को गलत नहीं माना। इसका सीधा अर्थ यह नहीं है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर दिया गया है, बल्कि यह कि संविधान के तहत दी गई स्वतंत्रता पूर्णतः निरंकुश नहीं है। अनुच्छेद 19(1)(a) के साथ-साथ अनुच्छेद 19(2) भी लागू होते हैं, जो राज्य को सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टता और राष्ट्रीय एकता के हित में सीमाएं तय करने का अधिकार देते हैं।


    यहां मध्यप्रदेश में कांग्रेस के प्रवक्ता के.के.मिश्रा ने भी राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव के फैसले को निशाना बनाकर पत्रकारों को उकसाने का प्रयास किया। सरकार ने तो इस विषय पर असम की तरह कोई प्रतिक्रिया नहीं दी लेकिन पत्रकारों ने इस दांव को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। इसकी वजह साफ थी कि मंत्रालय के गलियारों में घूमने वाले पत्रकार आला अफसर की सख्त और नियमों का पालन करने वाली शैली से पहले ही अवगत थे। उन्हें मालूम था कि राजस्व जैसे जिम्मेदार महकमे को संभालते हुए लिए वे प्रदेश हित को हमेशा सर्वोपरि रखते रहे हैं। कोई लाग लपेट, प्रलोभन या चमचागिरी उन्हें प्रभावित नहीं करती है।


    यही वजह है कि लगभग दो हफ्ते पहले जब कांग्रेस प्रवक्ता के.के.मिश्रा ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि पीएस महोदय ने लावारिस लाशों के अंतिम संस्कार के नाम पर एनजीओ चलाने वाले पत्रकार को धक्के मारकर अपने कमरे से बाहर निकाल दिया। इस पर कुछेक पत्रकारों को लगा कि ये तो पत्रकारों का अपमान हुआ है। के.के.मिश्रा की कांग्रेस से सहानुभूति रखने वाले कतिपय पत्रकारों ने भी सुर में सुर मिलाकर कहा कि हम ईंट से ईंट बजा देंगे।उस वक्त कांग्रेस के सेनानियों को लगा कि शायद अब पत्रकार भड़क उठेंगे और पीएस महोदय के विरुद्ध हमला बोल देंगे। आज लगभग दो हफ्ते बीत जाने के बाद भी कहीं कोई सुगबुगाहट सुनाई नहीं दी है। सरकार ने तो इस घटना को लगभग अनसुना कर दिया। प्रशासनिक तबके ने इसे खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे जानकर मुंह फेर लिया। पत्रकारों ने आपस में पूछताछ की और उन्हीं पत्रकार महोदय को दर किनार कर दिया।


    पत्रकारों ने जब तहकीकात की तो पता चला कि एनजीओ चलाने वालों ने जेल पहाड़ी की बेशकीमती जमीन पर अतिक्रमण करके बड़ा भवन बना लिया है। इस पूरी तरह अवैध निर्माण को दिखाकर कई बैंकों ,सांसद,नेताओं और अफसरों से अच्छा खासा चंदा वसूला जाता है। लगभग चार एंबुलेंस जुटा ली हैं जो समाजसेवा का वजन बढ़ाने में इस्तेमाल होती हैं। हालांकि उनका इस्तेमाल लगभग न के बराबर होता है। इसकी वजह है कि नगर निगम भोपाल ने अपनी निःशुल्क शव वाहन सेवा चला रखी है। कई अन्य धार्मिक संस्थाएं भी शव वाहन उपलब्ध कराती हैं। फोन लगाकर बुलाई जाने वाली एंबुलेंस सेवा भी उपलब्ध है । राजधानी में आपातकालीन सेवाएं इतनी ज्यादा हो गईं हैं कि इन गाड़ियों की जरूरत ही नहीं पड़ती है।

    शवों की चीरफाड़ करने वाले कंपाऊंडर से भेलकर्मी बनकर रिटायर हुए इन समाजसेवी महोदय की वरिष्ठता को देखकर और अंतिम संस्कारों की कहानियों को सुनकर जनसंपर्क महकमा भी उनकी सेवा कर देता है। उन्हें श्रद्धानिधि के रूप में पेंशन भी मिलती है और एनजीओ के विशेषांक के नाम पर विज्ञापन भी मिलता है। कई अन्य अखबारों और संस्थाओं के नाम पर भी वे चंदा और विज्ञापन वसूल लेते हैं। उनके बेटे नामी बिल्डर हैं और अफसरों नेताओं के साथ मिलकर बेशकीमती जमीनों की खरीद फरोख्त भी करते रहते हैं। कुछ पत्रकारों को खुश करके वे अपनी समाजसेवा की शान में वाहवाही भी लिखवा लेते हैं।


    बरसों से चलती आ रही इस व्यवस्था की मजबूती देखकर उन्होंने जिला प्रशासन से जमीन आबंटन की फाईल भी चलवा ली। कलेक्टर और संभागायुक्त कार्यालय से भी फाईल चली जो मंत्रालय पहुंच गई। फाईल जब प्रमुख सचिव महोदय के कमरे में पहुंची तो पीछे से आदरणीय भी पहुंच गए। उन्होंने नाराजगी भरे लहजे में कहा कि इतना लंबा समय हो गया है और मेरी जमीन का आबंटन नहीं हो पाया है। इस पर आला अफसर ने ये कहते हुए फाईल लौटा दी कि वह करोड़ों रुपये मूल्य वाली बेशकीमती जमीन किसी अन्य शासकीय सेवा के लिए आरक्षित है । समाज की गैर जिम्मेदारियों और आपराधिक वारदातों की वजह से कथित तौर पर लावारिस लाशें मिलती हैं। हम इसे संस्थागत रूप देकर सामाजिक स्वीकृति नहीं दे सकते। ये आपराधिक षड़यंत्र है और इसका सख्ती से इलाज होना चाहिए। शासन इसके लिए मुफ्त में जमीन क्यों देगा।लाशों के अंतिम संस्कार के लिए कई प्रकल्प मौजूद हैं। सरकार भी इस पर खासी राशि खर्च करती है ।


    साहब का तमतमाया रुख देखकर एनजीओ संचालक के होश उड़ गए। तब उन्होंने पैंतरा बदला कि आप मेरी उम्र का तक लिहाज नहीं कर रहे हैं। इस पर अफसर महोदय ने कहा कि आप आदर से बैठिए हम अभी चाय भी पिलाते हैं। वहां से तो चाय पीकर वे वापस आ गए पर अपनी नाराजगी उन्होंने कई जगह साझा की। उन्होंने कहना शुरु कर दिया कि अफसर महोदय ने तो उनकी फाईल फेंक दी और कहा कि लावारिस लाशों के लिए सरकार जमीन थोड़ी बांटती फिरेगी।
    इस घटना की गूंज उन सभी लोगों के बीच हुई जिनके प्रस्ताव शासन से रिजेक्ट होकर वापस लौट चुके हैं। उनमें से कुछ लोगों ने कांग्रेस के खेमें में जाकर ये कहानी सुनाई। सत्ता पक्ष में घुसपैठ जमाए बैठे भू माफिया ने भी इस कहानी में नमक मिर्च लगाकर हवा दी। नतीजा के.के.मिश्रा के बयान के रूप में सामने आया।


    मध्यप्रदेश के इतिहास में लंबे समय बाद ऐसा कार्यकाल आया है जब प्रशासनिक मशीनरी को खैराती प्रदेश की छवि से बाहर निकलकर आत्म निर्भर प्रदेश के रूप में खड़ा करने के लिए निर्देशित किया गया है। खुद मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव अपनी राजनीतिक जरूरतों के लिए अफसरों को टोकने और प्रभावित करने से बचते हैं। भाजपा के लंबे शासनकाल के बावजूद मध्यप्रदेश की आर्थिक स्थिति कई चुनौतियों से घिर गई है। उमा भारती की भाजपा तो पंच ज जैसे आत्मनिर्भर सिद्धांत को लेकर सत्ता में आई थी। ये विचार चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला से निकला हुआ था। उनके बाद आए बाबूलाल गौर हों या शिवराज सिंह चौहान दोनों ने विकास की चमक दमक को जमीन पर उतारने के लिए भरपूर कर्ज लिया। बीच में आई कांग्रेस की कमलनाथ सरकार इंस्पेक्टर राज वापस ले आई और उस दौरान प्रशासन इतना बेलगाम हो गया कि हर सरकारी पद मंहगी कीमतों में बिकने लगा।


    अब जबकि प्रदेश लगभग साढ़े चार लाख करोड़ के कर्ज में डूबा हुआ है तब सरकार और शासन सभी को अनियंत्रित अर्थव्यवस्था की आहट सुनाई देने लगी है। वैश्विक चुनौतियों ने इन हालात को और गंभीर बना दिया है। सरकारी कर्मचारियों के मन में भी संदेह के बादल इस तरह घुमड़ रहे हैं कि वे पूछते हैं कि आगे हम लोगों का वेतन भी मिल पाएगा या नहीं ।ऐसे हालात में एक आला अफसर की सख्ती को निशाना बनाकर कांग्रेस के नेतागण अपनी खोखली और गैर जिम्मेदार सोच को ही उजागर कर रहे हैं। कांग्रेस के नेतागण अपनी हताशा में कभी प्रेस पर गोदी मीडिया का लेबल चिपकाने का प्रयास करते हैं कभी पत्रकारिता की आड़ में पल रहे भू माफिया को आगे करके सरकार और शासन को बदनाम करने की कोशिशें करते हैं। अपनी असफलताओं के लंबे दौर के बाद भी कांग्रेस के नेतागण ये मानने राजी नहीं हैं कि काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती।

  • पुलिस को ठेंगा बताते प्रीतम लोधी का इलाज कौन करेगा

    पुलिस को ठेंगा बताते प्रीतम लोधी का इलाज कौन करेगा

    भोपाल, 23 अप्रैल(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्यप्रदेश की राजनीति में हालिया घटनाक्रम ने एक बार फिर सत्ता, पुलिस और प्रशासन के रिश्तों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। शिवपुरी जिले की पिछोर सीट से विधायक प्रीतम लोधी से जुड़ा विवाद केवल एक व्यक्तिगत बयानबाजी या दुर्घटना का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह राज्य में राजनीतिक प्रभाव, प्रशासनिक स्वतंत्रता और कानून के राज की वास्तविक स्थिति को उजागर करने वाला प्रकरण बन चुका है।
    घटना की पृष्ठभूमि में एक सड़क हादसा है, जिसमें विधायक के पुत्र की थार गाड़ी से पांच लोग घायल हुए। इस मामले में पुलिस कार्रवाई शुरू हुई, लेकिन इसके तुरंत बाद जिस तरह विधायक ने खुले मंच से पुलिस अधिकारी को धमकी दी—यह घटना प्रशासनिक तंत्र की गरिमा पर सीधा प्रहार मानी गई।

    पुलिस की गरिमा पर प्रहार मानी गई प्रीतम लोधी और उनके बेटे की बदमिजाजी.


    इस प्रकरण का सबसे चिंताजनक पक्ष यह रहा कि एक जनप्रतिनिधि की ओर से न केवल पुलिस की कार्यवाही पर सवाल उठाए गए, बल्कि सार्वजनिक रूप से दबाव बनाने की कोशिश भी की गई। “घर को गोबर से भर देने” जैसी भाषा ने राजनीतिक संवाद की गिरती मर्यादा को उजागर किया।
    यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या पुलिस वास्तव में दबाव में थी या यह केवल धारणा का संकट है। रिपोर्टों में यह सामने आया कि प्रारंभिक स्तर पर पुलिस द्वारा कार्रवाई में हिचकिचाहट की बात भी उठी, खासकर आरोपी के नाम दर्ज करने को लेकर। हालांकि बाद में एफआईआर दर्ज हुई, लेकिन शुरुआती प्रतिक्रिया ने यह संकेत जरूर दिया कि राजनीतिक प्रभाव का मनोवैज्ञानिक दबाव प्रशासन पर मौजूद रहता है।
    मध्यप्रदेश में पिछले कुछ समय में जनप्रतिनिधियों द्वारा अधिकारियों को धमकाने या अपमानित करने की कई घटनाएं सामने आई हैं। यह प्रवृत्ति बताती है कि समस्या केवल एक व्यक्ति या एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यापक राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बनती जा रही है।
    विवाद बढ़ने के बाद पार्टी ने विधायक को कारण बताओ नोटिस जारी किया और तीन दिन में जवाब मांगा। यह कदम संगठनात्मक अनुशासन का संकेत अवश्य देता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पर्याप्त है? राजनीतिक दलों द्वारा नोटिस जारी करना अक्सर “डैमेज कंट्रोल” के रूप में देखा जाता है। जब तक ऐसे मामलों में ठोस और उदाहरणात्मक कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह धारणा बनी रहती है कि सत्ता पक्ष अपने नेताओं को वास्तविक दंड से बचाता है और केवल औपचारिक कार्रवाई करता है।

    प्रीतम लोधी के बेटे के घमंड का इलाज फिर कौन करेगा.


    इस मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि आईपीएस एसोसिएशन और कर्मचारी संगठनों ने खुलकर नाराजगी जताई और कार्रवाई की मांग की। आईपीएस एसोसिएशन के अध्यक्ष और एडीजी चंचल शेखर ने क्षोभ व्यक्त करते हुए प्रीतम लोधी के बयानों की निंदा की है । यह संकेत है कि प्रशासनिक ढांचे के भीतर भी इस प्रकार के राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर असंतोष गहराता जा रहा है। जब पुलिस बल का मनोबल प्रभावित होता है, तो उसका सीधा असर कानून-व्यवस्था पर पड़ता है। अधिकारी यदि स्वयं को असुरक्षित या दबाव में महसूस करते हैं, तो निष्पक्ष कार्रवाई कठिन हो जाती है।
    अक्सर ऐसी परिस्थितियों में “यूपी मॉडल” की चर्चा होती है, जिसका आशय सख्त और त्वरित पुलिस कार्रवाई से है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि किसी भी राज्य में कानून का शासन केवल कठोरता से नहीं, बल्कि संस्थागत संतुलन से चलता है। यदि पुलिस को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त कर दिया जाए और उसे विधिक ढांचे के भीतर स्वतंत्रता दी जाए, तो अलग से किसी “मॉडल” की आवश्यकता नहीं पड़ती। समस्या मॉडल की नहीं, राजनीतिक इच्छाशक्ति की है।मध्यप्रदेश में इसी राजनीतिक दबाव से पुलिस को मुक्त करने के लिए कुछ बड़े शहरों में पुलिस कमिश्नर प्रणाली भी शुरु की गई थी। इसके बावजूद पुलिस का समूचा ढांचा सरकार के साथ केवल कदमताल करता नजर आ रहा है।
    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सामने यह एक महत्वपूर्ण परीक्षा है। यदि सत्ता पक्ष के विधायक ही कानून की सीमाओं को चुनौती देते नजर आएं, तो सरकार की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी केवल प्रशासन चलाना नहीं, बल्कि अपने दल के जनप्रतिनिधियों के आचरण को नियंत्रित करना भी है। यदि यह नियंत्रण कमजोर पड़ता है, तो प्रशासनिक तंत्र को “अतिरिक्त सक्रियता” दिखानी पड़ती है—जो लोकतांत्रिक संतुलन के लिए हमेशा स्वस्थ संकेत नहीं होता।
    प्रीतम लोधी प्रकरण केवल एक विवाद नहीं, बल्कि एक संकेत है—उस दिशा का जिसमें राजनीति और प्रशासन के संबंध विकसित हो रहे हैं। यदि समय रहते इस प्रवृत्ति पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो यह कानून के राज को कमजोर कर सकता है। इसलिए समाधान किसी एक कठोर कार्रवाई में नहीं, बल्कि तीन स्तरों पर है—राजनीतिक दलों की वास्तविक अनुशासनात्मक प्रतिबद्धता, पुलिस की संस्थागत स्वतंत्रता, और शासन की स्पष्ट जवाबदेही। अन्यथा, ऐसे विवाद आते रहेंगे, नोटिस जारी होते रहेंगे, और जनता के मन में यह सवाल बना रहेगा कि कानून वास्तव में किसके लिए है। फिलहाल तो सवाल यही है कि कांग्रेस के केपी सिंह जैसे कुख्यात नेता को किनारे करके उभरे प्रीतम सिंह लोधी और उनके बेटे के विरुद्ध पुलिस क्या कार्रवाई करती है। उनके आपराधिक मामलों की सूची बड़ी लंबी है लेकिन पुलिस के आला अफसरों की नेताओं से जुगलबंदी जनता को न्याय दिलाने के मार्ग में बाधक बनती नजर आ रही है।

  • एमपी में नशे के नेटवर्क पर बरपा पुलिस का कहर

    एमपी में नशे के नेटवर्क पर बरपा पुलिस का कहर


    डीजीपी कैलाश मकवाणा के निर्देश पर प्रदेशभर में नशे के विरुद्धप्रभावी कार्रवाई


    भोपाल 6 अप्रैल(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। पुलिस महानिदेशक कैलाश मकवाणा ने 01 अप्रैल से प्रदेशभर में विशेष अभियान संचालित कर मादक पदार्थों की तस्करी पर प्रभावी नियंत्रण के लिए सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं। इसी क्रम में बीते पांच दिनों में विभिन्न जिलों की पुलिस द्वारा समन्वित कार्रवाई करते हुए लगभग 1 करोड़ 22 लाख रुपये से अधिक मूल्य के मादक पदार्थ जप्त किए गए हैं।
    जिले में मादक पदार्थों के विरुद्ध कार्रवाई को आर्थिक स्तर तक प्रभावी बनाते हुए पुलिस द्वारा बड़ी वैधानिक कार्यवाही की गई है। थाना कालूखेड़ा क्षेत्र में अवैध ड्रग्स फैक्ट्री संचालित करने वाले आरोपियों की पहचान कर उनके द्वारा अर्जित अवैध संपत्तियों का विस्तृत विश्लेषण किया गया। इसके पश्चात एनडीपीएस एक्ट के तहत प्रकरण दर्ज कर तस्कर और विदेशी मुद्रा हेरफेर करने वाले (संपत्ति की ज़ब्ती) अधिनियम,(The Smugglers and Foreign Exchange Manipulators (Forfeiture of Property) Act, 1976 ) SAFEMAके तहत लगभग 16 करोड़ 16 लाख रुपये मूल्य की संपत्ति फ्रीज करने के आदेश जारी किए गए। यह कार्रवाई न केवल तस्करों के आर्थिक तंत्र को कमजोर करने की दिशा में महत्वपूर्ण है, बल्कि प्रदेश में मादक पदार्थों के अवैध कारोबार के विरुद्ध कड़ा संदेश भी देती है।
    नीमच
    जिले में नशा विरोधी अभियान के तहत तीन अलग-अलग प्रकरणों में लगभग 62 लाख रुपये मूल्य की 500 ग्राम एमडीएमए, 2 किलो 140 ग्राम अफीम एवं 67 किलो 200 ग्राम डोडाचूराजप्त किया गया। इस दौरान चार अंतरराज्यीय तस्करों को गिरफ्तार किया गया। पुलिस चौकी नयागांव, थाना जीरन एवं थाना सिंगोली की संयुक्त कार्रवाई में वाहन चेकिंग एवं मुखबिर सूचना के आधार पर यह कार्यवाही की गई।
    आगर मालवा
    कोतवाली पुलिस द्वारा नाकाबंदी कर एक कार से 148 ग्राम एमडी ड्रग्स जब्‍त की गई, जिसकी वाहन एवं अन्य सामग्री सहित कीमत लगभग 25 लाख 30 हजार रुपये आंकी गई है। इस कार्रवाई में दो आरोपियों को गिरफ्तार किया गया हैं।
    शिवपुरी
    थाना करैरा पुलिस द्वारा 52 ग्राम स्मैक (कीमत लगभग 10 लाख 40 हजार रुपये) के साथ आरोपी को गिरफ्तार किया गया। इसके अतिरिक्त थाना अमोला पुलिस ने भी 15 ग्राम स्मैक (कीमत लगभग 3 लाख रुपये) जप्त कर आरोपी को गिरफ्तार किया है।
    उज्जैन
    भाटपचलाना थाना पुलिस ने 1किलो84 ग्राम गांजा (कीमत लगभग 68 हजार रुपये) के साथ आरोपी को गिरफ्तार किया गया। वहीं एक अन्य बड़ी कार्रवाई में एमडीएमए ड्रग्स बनाने वाले अंतरराज्यीय नेटवर्क का भंडाफोड़ कर भारी मात्रा में केमिकल और नगदी सहित 8 लाख 50हजार रूपए की संपत्ति जब्त की है।
    इंदौर
    क्राइम ब्रांच इंदौर ने कार्रवाई करते हुए एक महिला सहित 4 आरोपियों को गिरफ्तार कर उनके कब्जे से 24.08 ग्राम एमडी ड्रग्स, कार एवं मोबाइल सहित लगभग 5 लाख रुपये की संपत्ति जब्‍त की है।
    मंदसौर
    थाना शामगढ़ पुलिस ने 1 किलो 245 ग्राम अवैध अफीम (कीमत लगभग 2 लाख 49 हजार रुपये) के साथ 3 आरोपियों को गिरफ्तार किया है।
    गुना
    बजरंगगढ़ थाना क्षेत्र में कार्रवाई करते हुए 1लाख50 हजार रुपये के लगभग 17.294 किलोग्राम100 गांजे के पौधे जप्तकर आरोपी को गिरफ्तार किया।
    उज्जैन
    थाना बड़नगर पुलिस ने 36.58 ग्राम एमडी ड्रग्स (कीमत लगभग 1 लाख रुपये) के साथ एक आरोपी को गिरफ्तार किया गया। आरोपी ने मादक पदार्थ रतलाम से लाकर बेचने की बात स्वीकार की है।
    नर्मदापुरम
    थाना इटारसी पुलिस ने 1 लाख रुपयेका 6 किलो 76 ग्राम गांजा जप्त कर आरोपी को गिरफ्तार किया है।
    खरगोन
    सनावद पुलिस ने 13.41 ग्राम ब्राउन शुगर (कीमत लगभग 1.30 लाख रुपये), मोटरसाइकिल एवं मोबाइल फोन जप्त कर तीन तस्करों को गिरफ्तार किया गया।
    छिंदवाड़ा
    थाना कुण्डीपुरा पुलिस ने 1 किलो492ग्राम गांजा (कीमत लगभग 20 हजार रुपये) जप्त कर आरोपी को गिरफ्तार किया गया।
    वहीं कोतवाली पुलिस ने प्रतिबंधित इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट के 34 नग (कीमत लगभग 68 हजार रुपये) जप्त कर आरोपी के विरुद्ध प्रकरण दर्ज किया है।
    बैतूल में अंतरराज्यीय गांजा सप्लायर गिरफ्तार
    जिले में कोतवाली पुलिस द्वारा सतत विवेचना के दौरान गांजा तस्करी के एक अंतरराज्यीय नेटवर्क का खुलासा किया गया। पूर्व में दो आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने तकनीकी एवं मुखबिर तंत्र के आधार पर मुख्य आरोपी को चिन्हित किया। कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार किया गया, जो उड़ीसा से गांजा लाकर जिले में सप्लाई करता था। पूछताछ में आरोपी ने बताया कि वह सब्जी परिवहन के बहाने उड़ीसा जाता था और वापसी में गांजा लाकर स्थानीय स्तर पर बेचता था। पुलिस द्वारा अब इस नेटवर्क के अन्य सदस्यों की तलाश कर आगे की कार्रवाई की जा रही है।
    मध्यप्रदेश पुलिस द्वारा की जा रही इन सतत एवं प्रभावी कार्यवाहियों से स्पष्ट है कि प्रदेश में मादक पदार्थों के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई गई है। पुलिस मुख्यालय ने सभी जिलों को निर्देशित किया है कि न केवल तस्करों की गिरफ्तारी सुनिश्चित की जाए, बल्कि उनके नेटवर्क, वित्तीय स्रोत एवं अवैध संपत्तियों पर भी सख्त कार्रवाई की जाए।

  • पेट्रोलियम जमाखोरों पर सख्त कार्रवाई करेंः अनुराग जैन

    पेट्रोलियम जमाखोरों पर सख्त कार्रवाई करेंः अनुराग जैन

    मुख्य सचिव ने बैठक में कलेक्टर्स को दिए निर्देश


    भोपाल 2 अप्रैल(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। संपूर्ण प्रदेश में एलपीजी सहित अन्य पेट्रोलियम पदार्थ पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है । किसी भी जिले में इनकी कोई कमी नहीं है।इसके बावजूद यदि कोई व्यक्ति या व्यापारी इनकी जमाखोरी करता है तो उसके विरुद्द सख्त कार्रवाई की जाए। मुख्य सचिव अनुराग जैन ने पेट्रोलियम पदार्थों की सुगम उपलब्धता के लिए प्रदेश में किए जा रहे प्रयासों पर संतोष व्यक्त करते हुए कलेक्टर्स से कहा है कि वे प्रतिदिन मानीटरिंग करें और जमाखोरी के साथ कालाबाजारी की शिकायतों पर त्वरित तथा सख्त कार्यवाही करें। मुख्य सचिव श्री जैन ने गुरूवार को मंत्रालय में वरिष्ठ अधिकारियों और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से कलेक्टर्स के साथ जिलों में पेट्रोलियम पदार्थों की उपलब्धता की समीक्षा की। बैठक में तय किया गया कि राज्य स्तर और जिला स्तर पर पेट्रोलियम पदार्थों की उपलब्धता पर प्रतिदिन रिव्यू होगा।
    मुख्य सचिव श्री जैन ने पीएनजी लाइन वाले जिलों में अधिकाधिक घरेलू कलेक्शन देने के लिए संबंधित एजेंसियों को जिला प्रशासन से नियमित समन्वय करने के साथ ही कलेक्टर्स को निर्देश दिए हैं कि वे एजेंसियों को वर्क फोर्स उपलब्ध करवाएं। उन्होंने कहा कि उपभोक्ताओं के बीच पीएनजी की विशेषताओं का प्रचार-प्रसार करें, जिससे अगले 3 महीने की समय-सीमा मे उन क्षेत्रों में अधिकतम घरों तक पाइप से गैस पहुंच सके। बैठक में विगत एक माह में पेट्रोलियम पदार्थों की उपलब्धता और आपूर्ति की समीक्षा की गई। पेट्रोल पंप तथा गैस एजेंसियों पर अब लाइन आदि समाप्त होने के साथ पैनिक बुकिंग बंद होने पर संतोष व्यक्त किया गया।
    मुख्य सचिव श्री जैन ने निर्देश दिए कि वैकल्पिक ऊर्जा का उपयोग बढ़ाने के लिए व्यापक प्रचार-प्रसार सुनिश्चित करें। मुख्य सचिव श्री जैन ने गैस की पर्याप्त उपलब्धता और निरंतर आपूर्ति पर संतोष व्यक्त किया। उन्होंने घरों में पीएनजी कनेक्शन की समीक्षा की और निर्देश दिए कि पाइप लाइन की क्षमता अनुरूप घरेलू कनेक्शन करें। कनेक्शन जो बंद हो गए हैं, उन्हें भी पुन: प्रारंभ करें। उन्होंने इन एजेंसियों के लिए विभागों से 24 घंटे में अनापत्ति प्रमाण-पत्र आदि जारी करने के साथ ही कालोनियों में कनेक्शन के लिए शिविर लगाने के निर्देश दिए।
    मुख्य सचिव श्री जैन ने प्रदेश में एलपीजी की जमाखोरी और कालाबाजारी करने वालों के विरूद्ध की गई कार्यवाही की समीक्षा की। उन्होंने कलेक्टर्स को निर्देश दिए कि आवश्यक वस्तु अधिनियम के लागू करने के साथ भारी अर्थदंड और एजेंसियों पर आवश्यक होने पर निलंबन की कार्रवाई की जाए। उन्होंने कहा कि एजेंसियाँ कई बार मुनाफे के लिए अपने कर्मियों से भी कालाबाजारी करवाती है। बैठक में बताया गया कि प्रदेश में अब तक 3029 गैस सिलेंडर जब्त किए गए हैं। 2759 छापे मारे गए हैं। दोषियों के विरूद्ध 11 एफआईआर भी दर्ज की गई हैं।
    बैठक में बताया गया कि प्रदेश में पेट्रोल एवं डीजल की पर्याप्त उपलब्धता है और ऑयल कंपनी के डिपो से निरंतर आपूर्ति जारी है। जिलों में गैस पाईप लाईन बिछाने के सभी आर.ओ.यू आवेदनों को आवेदन प्रस्तुत करने के 24 कार्यकारी घंटो के अंदर डीम्ड सीजीडी अनुमति प्रदान करने के आदेश अनुसार कार्यवाही की जा रही हैं।
    राज्य शासन को अतिरिक्त 10% एलपीजी आवंटन प्राप्त हो चुका है। 27 मार्च 2026 को भारत सरकार द्वारा कॉमर्शियल एलपीजी का अतिरिक्त 20% आवंटन उद्योरग जैसे-स्टील, ऑटोमोबाईल, टेक्सटाइल, डाई, केमिकल्स, प्लास्टिक्स आदि के लिए किया गया है और उद्योगों को कॉमर्शियल गैस सप्लाई उक्त अनुसार की जा रही है।
    बैठक में बताया गया कि केंद्र सरकार द्वारा प्रदेश को केरोसीन आवंटन और एवं प्रत्येक जिले में 2 पेट्रोल पंपों का आंकलन प्रक्रियाधीन है। विभाग द्वारा केरोसीन वितरण के दिशा निर्देश जारी किए गए हैं। केरोसीन का वितरण मांग के आधार पर होगा। इस दौरान वरिष्ठ अधिकारी और आयल कंपनी के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

  • नशा माफिया पर मध्यप्रदेश पुलिस का कारगर प्रहार

    नशा माफिया पर मध्यप्रदेश पुलिस का कारगर प्रहार

    भोपाल,22 फरवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्यप्रदेश में बीते दो वर्षों में नशा तस्करी के विरुद्ध पुलिस की कार्रवाई ने एक संगठित और निरंतर अभियान का रूप ले लिया है। राज्य सरकार के निर्देश पर मध्यप्रदेश पुलिस ने न केवल मादक पदार्थों की तस्करी पर अंकुश लगाने के लिए विशेष अभियान चलाए, बल्कि ड्रग माफिया की आर्थिक कमर तोड़ने के लिए भी सख्त कदम उठाए। यह संघर्ष केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक और पीढ़ीगत सुरक्षा से जुड़ा विषय बन चुका है।

    वर्ष 2024 और 2025 के दौरान राज्य के विभिन्न जिलों—इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, जबलपुर और सीमावर्ती इलाकों—में पुलिस ने संयुक्त कार्रवाई कर करोड़ों रुपये मूल्य के मादक पदार्थ जब्त किए। पुलिस मुख्यालय के आंकड़ों के अनुसार, इन दो वर्षों में एनडीपीएस एक्ट के अंतर्गत हजारों प्रकरण दर्ज हुए और बड़ी संख्या में आरोपियों की गिरफ्तारी की गई। जब्त सामग्री में गांजा, अफीम, डोडाचूरा, ब्राउन शुगर, हेरोइन और प्रतिबंधित नशीली गोलियां शामिल रहीं।

    विशेष रूप से अंतरराज्यीय तस्करी के नेटवर्क पर प्रहार करते हुए पुलिस ने राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ से जुड़े गिरोहों का भंडाफोड़ किया। कई मामलों में ट्रांजिट रिमांड लेकर अन्य राज्यों से जुड़े सरगनाओं को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने ड्रग्स की खेप के साथ-साथ परिवहन में प्रयुक्त वाहन, मोबाइल फोन, बैंक खाते और संपत्तियां भी जब्त कीं, जिससे तस्करों के आर्थिक तंत्र पर चोट पहुंची।

    बीते वर्षों में ड्रग माफिया ने तस्करी के तौर-तरीकों में भी बदलाव किया है। पुलिस जांच में सामने आया कि अब पारंपरिक ढंग से बड़े ट्रकों या बसों के जरिए खेप भेजने के बजाय छोटे-छोटे पैकेटों में कुरियर सेवाओं, निजी वाहनों और यहां तक कि ऑनलाइन डिलीवरी नेटवर्क का उपयोग किया जा रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स के माध्यम से ग्राहकों तक संपर्क साधा जाता है। भुगतान के लिए डिजिटल वॉलेट और फर्जी बैंक खातों का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे लेन-देन का पता लगाना कठिन हो जाता है।

    कुछ मामलों में युवाओं और छात्रों को “कैरियर” के रूप में इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति भी सामने आई है। उन्हें कम जोखिम और अधिक कमाई का लालच देकर नेटवर्क का हिस्सा बनाया जाता है। सीमावर्ती जिलों में खेतों और सुनसान इलाकों का उपयोग अस्थायी गोदाम के रूप में किया जाता है, जहां से स्थानीय सप्लायर छोटे स्तर पर वितरण करते हैं।

    इन चुनौतियों से निपटने के लिए मध्यप्रदेश पुलिस ने तकनीकी निगरानी और साइबर विश्लेषण को प्राथमिकता दी है। कॉल डिटेल रिकॉर्ड, बैंकिंग ट्रांजेक्शन और सीसीटीवी फुटेज के विश्लेषण से कई बड़े नेटवर्क का खुलासा हुआ। ड्रोन कैमरों और विशेष निगरानी टीमों की मदद से संवेदनशील क्षेत्रों में छापेमारी की गई।

    राज्य स्तर पर नारकोटिक्स प्रकोष्ठ को सक्रिय कर जिला पुलिस के साथ समन्वय बढ़ाया गया। स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता अभियान चलाकर युवाओं को नशे के दुष्परिणामों से अवगत कराया गया। “नशा मुक्त मध्यप्रदेश” अभियान के तहत पुलिस, प्रशासन और सामाजिक संगठनों ने मिलकर परामर्श शिविरों और जनसंवाद कार्यक्रमों का आयोजन किया।

    पुलिस ने केवल गिरफ्तारी तक कार्रवाई सीमित नहीं रखी, बल्कि ड्रग माफिया की अवैध संपत्तियों को चिह्नित कर कुर्क करने की प्रक्रिया भी शुरू की। एनडीपीएस एक्ट और अन्य संबंधित धाराओं के तहत करोड़ों रुपये मूल्य की चल-अचल संपत्तियां अटैच की गईं। इससे स्पष्ट संदेश गया कि नशे के कारोबार से अर्जित संपत्ति सुरक्षित नहीं रहेगी।

    हालांकि कार्रवाई के आंकड़े उत्साहजनक हैं, परंतु चुनौती पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। अंतरराज्यीय सीमाएं, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और संगठित अपराध का नेटवर्क लगातार नए रास्ते खोज रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल पुलिस कार्रवाई पर्याप्त नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता, पुनर्वास केंद्रों की मजबूती और पारिवारिक स्तर पर संवाद भी आवश्यक है।

    बीते दो वर्षों में मध्यप्रदेश पुलिस की कार्रवाई ने यह संकेत दिया है कि राज्य नशा तस्करी के विरुद्ध कठोर रुख अपनाए हुए है। बड़ी जब्तियां, अंतरराज्यीय गिरोहों का पर्दाफाश और आर्थिक कुर्की की कार्यवाही इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। फिर भी यह लड़ाई लंबी है। जब तक समाज, प्रशासन और कानून प्रवर्तन एजेंसियां एकजुट होकर निरंतर प्रयास नहीं करेंगी, तब तक ड्रग माफिया नए रूप में उभरते रहेंगे।

    मध्यप्रदेश में चल रही यह मुहिम केवल अपराध के विरुद्ध नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की सुरक्षा का संकल्प है—और यही इसे एक निर्णायक सामाजिक आंदोलन का स्वरूप देता है।

  • फोरेंसिक साक्ष्यों ने दंड की प्रक्रिया ज्यादा सटीक बनाईःकैलाश मकवाना

    फोरेंसिक साक्ष्यों ने दंड की प्रक्रिया ज्यादा सटीक बनाईःकैलाश मकवाना


    भोपाल09 जनवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Indian Evidence Act, 2023) और भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita – BNS),ने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) को और भी ज्यादा सटीक बना दिया है। इससे अपराधियों को दंड दिलाना सरल हुआ है। यही वजह है कि अपराध की रोकथाम में पुलिस की पहल कानून के लिए ज्यादा उपयोगी हो गई है।मध्यप्रदेश में अपराधियों को दंड दिलाने के मामलों को देखकर कानून की सटीकता आसानी से समझी जा सकती है। नव वर्ष मिलन समारोह में पत्रकारों से अनौपचारिक चर्चा करते हुए पुलिस महानिदेशक कैलाश मकवाना ने कानून व्यवस्था के कई पहलुओं पर प्रकाश डाला।


    श्री मकवाना ने कहा कि मध्यप्रदेश की पुलिस अपनी सामाजिक जिम्मेदारी के मानदंडों पर खरी साबित हुई है। हमने पुलिसिया अत्याचार को रोका है लेकिन अपराध पर लगाम लगाने में सफलता पाई है। अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारियों के बीच राज्य की पुलिस आम जनता के ज्यादा करीब पहुंची है। समाज के बीच से ही पुलिस के अधिकारी आते हैं और अपने अपने नजरिए से अपराध की रोकथाम के नवाचार करते हैं।


    उन्होंने बताया कि हमने जनता से लूटा गया माल वापस दिलाने में बड़ी कामयाबी पाई है। मोबाईल या वाहन चोरी की बरामदगी पहले की तुलना में ज्यादा सरल हुई है। नई पीढ़ी के पुलिस कर्मियों ने पुलिस की कई बुराईयां दूर की हैं। इसके बावजूद हमें अभी बहुत प्रयास करने हैं। हमने पुलिस सुधार का पूरा खाका बनाया है। हर पीढ़ी के नए अधिकारी आकर इसमें कुछ न कुछ सुधार करते जाते हैं। यही कड़ी हमें ज्यादा कारगर बना रही है। मैंने स्वयं अपने कार्यकाल में इस निरंतरता को बनाए रखने का प्रयास किया है। निश्चित तौर पर भविष्य में भी पुलिस की यही गरिमा बनी रहेगी।

  • पीड़िता पर दबाव बनाकर सजा से बचने का प्रयास कर रहा पास्को आरोपी प्रकाश गुप्ता

    पीड़िता पर दबाव बनाकर सजा से बचने का प्रयास कर रहा पास्को आरोपी प्रकाश गुप्ता


    भोपाल, 01 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। सैकड़ों लोगों से ठगी और महिलाओं के विरुद्ध यौन अपराध करने वाला कंप्यूटर व्यवसायी प्रकाश चंद्र गुप्ता इन दिनों जेल की सजा से बचने के लिए तरह तरह के कानूनी दांवपेंचों का इस्तेमाल कर रहा है। उसने अपने वकील के माध्यम से पीडि़ता पर दबाव बनाकर पास्को एक्ट की कड़ी सजा से बचने का जाल बिछाया है। वह अदालत के सामने पुलिस कार्रवाई के विरुद्ध भी शिकायतें करके खुद को निर्दोष बताने का प्रयास कर रहा है।


    बताया जाता है कि राजधानी के एमपीनगर में बूटकॉम सिस्टम नामक दूकान चलाने वाला गुप्ता अपने ग्राहकों को झांसा देकर ठगने के लिए कुख्यात रहा है। उसके विरुद्ध कई व्यापारियों और ग्राहकों ने भी ठगी की शिकायतें दर्ज कराई हैं। जब इस बार उसके विरुद्ध एक नाबालिग बालिका ने यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई और पुलिस ने सख्त जांच करके उसे अदालत के माध्यम से जेल पहुंचा दिया । तभी से वह अपने बचाव में कई तरह के षड़यंत्र कर रहा है।ये आदतन अपराधी अब तो सजा से बचने के लिए पुलिस और अदालतों के विरुद्ध भी तरह तरह की झूठी शिकायतें कर रहा है।


    पीड़िता की ओर से पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को शिकायत की गई है कि आरोपी गुप्ता स्वयं एवं अपने वकील के माध्यम से मनगढ़ंत लिफाफे भेज रहा है जिन पर लीगल नोटिस लिखा है। वह पहले से अन्य प्रकरणों में भी इस तरह के लिफाफे भेजकर अदालत को गुमराह करने का प्रयास करता रहा है। पूर्व में वरिष्ठ अधिवक्ता विजय चौधरी ने ऐसे ही लिफाफे भेजने के कारण गुप्ता के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने की चेतावनी दी थी। तब उन लिफाफों में ऊटपटांग चित्र और रद्दी कागज भेजे गए थे। श्री चौधरी ने लिखा था कि उनके पक्षकार मनीष बाधवानी को इस तरह की चिठ्ठियां भेजना बंद करें। इस प्रकार के षड़यंत्र करना न्याय के लिए घातक है। ये दस्तावेज पक्षकार की ओर से अदालत को भी दिए गए हैं।


    ज्ञात हुआ है कि विगत में एक लड़की अनन्या पाराशर ने एमपीनगर पुलिस थाने को शिकायत की थी कि जब गुप्ता ने उसे कबाड़ा कंप्यूटर बेचा और वह शिकायत करने पहुंची तो गुप्ता ने अपनी ही दूकान में बंदूक तानकर गाली देते हुए जान से मारने की धमकी दी। लड़की की शिकायत पर एमपीनगर पुलिस ने आरोपी के विरुद्ध अपराध क्रमांक 0210 । 2022 दर्ज कर न्यायालय में प्रस्तुत किया था। बाद में शिकायत कर्ता लड़की की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई।


    महिलाओं को जाल में फंसाने के लिए कुख्यात प्रकाश गुप्ता ने केनरा बैंक कोहेफिजा शाखा की मैनेजर सुधा दर्शिका से दो करोड़ इक्कीस लाख रुपयों की ठगी के आरोप में जेल की हवा खाना पड़ी थी। इससे बचने के लिए गुप्ता ने सुधा दर्शिका के विरुद्ध भोपाल जिला न्यायालय में एक झूठा प्रकरण दर्ज कराने का प्रयास किया । बाद में केनरा बैंक और सुधा दर्शिका को भी वह इसी तरह के फर्जी लिफाफे भेजने लगा। केनरा बैंक ने आम जनता को सावधान करने के लिए राजधानी के एक अखबार में आम सूचना प्रकाशित करवाई थी कि बैंक की ओर से गुप्ता से ये रकम वसूली जानी है। वह कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर भ्रम फैलाने का प्रयास कर रहा है ।


    कमलानगर पुलिस ने भी महिलाओं की शिकायत पर प्रकाश गुप्ता के विरुद्द चार करोड़ सत्ताईस लाख रुपए की धोखाधड़ी की शिकायत की थी। पुलिस ने अपराध दर्ज करके गुप्ता को गिरफ्तार किया था तब न्यायालय ने उसे जेल भेज दिया था। यह प्रकरण क्रमांक आरटी 4137 । 20 अभी अदालत में विचाराधीन है।


    गुप्ता की ओर से न्यायाधीशों पर दबाव बनाने के लिए हाईकोर्ट तक में झूठी शिकायतें की जाती रहीं हैं। अपर सत्र न्यायाधीश विशाल अखंड और मुख्य न्यायायिक मजिस्ट्रेट विनोद पाटीदार की झूठी शिकायतें हाईकोर्ट के सतर्कता विभाग ने जांच के बाद झूठी पाए जाने पर खारिज कर दीं थीं।

  • फार्मासिस्ट ने काऊंसिल के गार्ड का सिर फोड़ा तो लड़कों ने तबियत से धुन दिया

    फार्मासिस्ट ने काऊंसिल के गार्ड का सिर फोड़ा तो लड़कों ने तबियत से धुन दिया


    भोपाल,28 नवंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्यप्रदेश फार्मेसी काऊंसिल के कार्यालय में आज उस समय अफरातफरी मच गई जब इंदौर से आए एक कथित फार्मासिस्ट ने अपना पंजीयन कराने का दबाव बनाने के लिए वहां पदस्थ गार्ड का सिर फोड़ दिया। उसने रजिस्ट्रार और कर्मचारियों को भी धमकाया और गाली गलौच की। इसकी सूचना जब पुलिस को मिली तो पुलिस भी घटना स्थल पर पहुंच गई लेकिन तब तक अपना पंजीयन कराने आए कुछ लड़कों ने आरोपी को घसीटकर तबियत से धुन दिया। पुलिस ने गार्ड और आरोपी की शिकायत पर एफआईआर दर्ज की है। सरकारी कार्य में अड़चन करने की शिकायत भी दर्ज की गई है।


    प्राप्त जानकारी के अनुसार घटना आज पूर्वान्ह लगभग 11 बजे की है। खुद को इंदौर का फार्मेसी छात्र बताने वाला तुषार नाम का एक युवक वहां पदस्थ गार्ड से अंदर प्रवेश के लिए जिद कर रहा था। गार्ड ने उसे रोका तो उसने गार्ड से मारपीट शुरु कर दी। इससे गार्ड का सिर फट गया और उससे खून निकलने लगा। इसे देखकर वहां मौजूद छात्रों और कर्मचारियों ने भागते हुए इस आरोपी को पकड़ लिया और मन लगाकर धुन दिया। इस बीच पुलिस भी पहुंच गई और सूचना मिलते ही मध्यप्रदेश फार्मेसी काऊंसिल के अध्यक्ष संजय जैन भी पहुंच गए और उन्होंने बीच बचाव करके आरोपी को पुलिस के हवाले करवाया।


    श्री जैन ने पुलिस को दी सूचना में कहा है कि काऊंसिल में आनलाईन पंजीयन का कार्य होता है। एमपी आनलाईन के फार्म को भरने और सभी दस्तावेज भरने पर जांच के बाद स्वतः ही पंजीयन हो जाता है। इसके लिए किसी को काऊंसिल के दफ्तर आने की जरूरत नहीं होती है। इसके बावजूद हर दिन लगभग पचास अभ्यर्थी अपना आवेदन जमा कराने के लिए काऊंसिल आते हैं। इसके लिए काऊंसिल ने गार्ड की व्यवस्था की है जो एक एक करके अभ्यर्थियों को अंदर जाने देता है। उन्होंने पंजीयन के इस कार्य में आवश्यक सुरक्षा बल उपलब्ध कराने की मांग की है।


    गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में फार्मासिस्टों के पंजीयन का कार्य लंबे समय से अव्यवस्था के दौर से गुजर रहा है। वर्तमान में काऊंसिल ने इस कार्य के लिए आनलाईन आवेदन जमा करने की व्यवस्था की है। इसके बावजूद कुछ अड़ीबाज फर्जी दस्तावेजों के आधार पर पंजीयन कराने का प्रयास करते हैं। काऊंसिल ने मेडीकल स्टोरों के पंजीयन की प्रक्रिया में जीवन प्रमाण पत्र देने के निर्देश जारी किए हैं। इससे प्रदेश भर के वे मेडीकल संचालक नाराज हैं जिनके संचालक बरसों पहले ही स्वर्गवासी हो चुके हैं। इसके बावजूद उनके नाम पर फर्जी मेडीकल स्टोर चलाए जा रहे हैं। यही वजह है कि नए नियमों से नाराज फार्मासिस्ट काऊंसिल पर दवाब बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

    प्राप्त जानकारी के अनुसार पुलिस ने काऊंसिल के कर्मचारी गोपाल सिंह यादव की शिकायत पर आरोपी फार्मासिस्ट के विरुद्ध शासकीय कार्य में बाधा पहुंचाने की शिकायत दर्ज की है। गार्ड जितेन्द्र बैरागी की हालत खतरे से बाहर बताई गई है।

  • डायल 112 से बंटता है साढ़े पांच हजार पुलिस वालों का वेतन

    डायल 112 से बंटता है साढ़े पांच हजार पुलिस वालों का वेतन

    पुलिस ने खुद बताई ये कड़वी सच्चाई

    भोपाल, 15 सितंबर (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।जनता की सेवा के नाम पर जिस तरह नौकरियां बांटने की परिपाटी मध्यप्रदेश में चल रही है उसने सारे विकास कार्यों की राह बंद कर दी है। सरकार के पास इन कर्मचारियों को बांटने के लिए धन नहीं है। यही वजह है कि अपने अमले के स्थापना व्यय तक के लिए सरकार को योजनाओं के नाम पर भारी कर्ज लेना पड़ रहा है। इस तरह की योजनाएं वैसे तो तमाम विभागों में चल रही हैं लेकिन पुलिस विभाग की इस योजना के बारे में जब जनचर्चा फैली तो पुलिस को स्पष्टीकरण देने सामने आना पड़ा है।

    पुलिस सूत्रों का कहना है कि सोशल मीडिया पर डायल-112 परियोजना के अंतर्गत वाहनों की खरीद एवं खर्च से जुड़ी भ्रामक और असत्य जानकारी प्रसारित की जा रही है। इन पोस्टों में दावा किया गया है कि सरकार ने गाड़ियां 30-40 लाख रुपए की जगह 1 करोड़ रुपए से अधिक कीमत पर खरीदीं और इस पर कुल ₹1500 करोड़ खर्च हुए हैं। यह दावा पूरी तरह गलत और निराधार है।

    डायल-112 परियोजना से संबंधित कुछ तथ्यों को स्पष्ट करना आवश्यक है। इस योजना का कुल टेंडर लगभग ₹972 करोड़ का है, न कि ₹1500 करोड़, जैसा कि कुछ स्थानों पर गलत रूप से प्रस्तुत किया गया है। यह राशि किसी एक वर्ष के लिए नहीं, बल्कि पूरे पाँच वर्षों की अवधि के लिए निर्धारित है। इसमें केवल गाड़ियों का किराया शामिल नहीं है, बल्कि कई अन्य महत्वपूर्ण मदें भी सम्मिलित हैं। कुल बजट में से ₹719.75 करोड़ का प्रावधान 1200 फर्स्ट रिस्पॉन्स व्हीकल्स (FRVs) के संचालन, रख-रखाव और लगभग 5000 कर्मचारियों के वेतन के लिए किया गया है। इसी प्रकार, ₹78.5 करोड़ का प्रावधान स्टेट कमांड सेंटर, डेस्कटॉप्स तथा 500 से अधिक कर्मचारियों के वेतन के लिए है। इसके अतिरिक्त, ₹174 करोड़ आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर, सर्वर एवं उनके रख-रखाव पर खर्च किया जाएगा। यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि गाड़ियाँ खरीदी नहीं गई हैं, बल्कि किराए पर ली गई हैं—जहाँ बोलेरो वाहन का किराया ₹32,000 प्रति माह और स्कॉर्पियो वाहन का किराया ₹36,000 प्रति माह तय किया गया है। इस प्रकार पाँच वर्षों के लिए कुल अनुमानित खर्च लगभग ₹972 करोड़ है।

    मध्यप्रदेश पुलिस ने नागरिकों से आग्रह किया है कि वे इस प्रकार की भ्रामक और असत्य अफवाहों पर ध्यान न दें तथा सोशल मीडिया पर इनका प्रसार करने से बचें। सही एवं प्रमाणित जानकारी के लिए केवल मध्यप्रदेश पुलिस के आधिकारिक माध्यमों पर भरोसा करें।

    गौरतलब है कि कांग्रेस के बाद भाजपा की सरकारों ने भी नौकरियों की खैरात बांटने के लिए मुक्त हस्त से नियुक्तियां जारी रखीं हैं। इन नौकरियों की वजह से आम जनता को अपनी गाढ़ी कमाई कई स्तरों पर टैक्स के रूप में भुगतना पड़ रही है। मोदी सरकार जहां वन कंट्री वन टैक्स की लोरियां सुनाती है वहीं राज्यों की सरकारें वाहवाही लूटने के लिए कर्ज लेकर खैरात बांटने की मुहिम चलाए हुए हैं।

  • जैन मंदिर में जानलेवा हमला करने वाले सटोरिए को बचाने उतरे अहिंसा के पुजारी

    जैन मंदिर में जानलेवा हमला करने वाले सटोरिए को बचाने उतरे अहिंसा के पुजारी

    भोपाल 14 सितंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। जैन समाज के एक सटोरिए ने शिवाजी नगर जैन मंदिर के भीतर समाजसेवी प्रदीप जैन पर जो प्राणघातक हमला किया उसे छुपाने के लिए समाज के कई सफेदपोश नेता अब समझौते का दबाव बनाने में जुट गए हैं। घटना की प्राथमिकी दर्ज होने के बाद इन सफेदपोशों ने पुलिस मुख्यालय के आला अधिकारियों पर दबाव बनाकर प्रदीप जैन के खिलाफ लगभग ग्यारह घंटे बाद छेड़खानी की झूठी शिकायत दर्ज करवा दी। अब आपराधिक पृष्ठभूमि के यही नेता राजधानी में विराजमान मुनि श्री से समझौता करवाने के लिए निवेदन कर रहे हैं।
    पर्यूषण पर्व के उत्सवी माहौल के बाद लाड़ू चढ़ाने के कार्यक्रम में ये आपराधिक वारदात समाज के तमाम लोगों की मौजूदगी में घटित हुई थी। पुलिस रिपोर्ट के अनुसार प्रदीप कुमार जैन पिता स्वं. श्री अशोक कुमार जैन उम्र 61 साल निवासी म.न. डी 4 ग्रीन हाईट्स कालोनी ऑरा माल के पीछे थाना शाहपुरा जिला भोपाल एमपीनगर थाने में शिकायत दर्ज कराई है कि एमपीनगर में जैन स्वीट्स नाम से मेरी दूकान है। मैं जैन मंदिर शिवाजी नगर ,मानसरोवर के पास जोन 2 के ट्रस्ट मे संयोजक के पद पर हूँ । ये मंदिर जैन ट्रस्ट कमेटी चौक के अंतर्गत आता है। यहां विशाल जैन मंदिर का निर्माण चल रहा है।
    विगत छह तारीख को साढ़े दस बजे जब वे जैन मंदिर शिवाजी नगर ,मानसरोवर के पास जोन 2 एमपी नगर पूजा के लिए गए तभी आरोपियों ने घात लगाकर इस वारदात को अंजाम दिया। उनके साथ उनकी भतीजी प्रज्ञा जैन भी उपस्थित थी। वहां पर लाड़ू चढ़ने का प्रोसीजर चल रहा था पंडितजी वहां पर मंत्र पढ़ रहे थे मेरी भतीजी के हाथ मे लाडू थे जिसके ऊपर कपूर रखा था और मेरे हाथ मे माचिस थी उसी समय वहां पर कैलाश चंद्र जैन(सिंघई) औऱ उसका लड़का अंकित सिघंई आए और गाली गलौच करने लगे।


    कैलाश चंद्र के पुत्र अंकित ने उन्हें धक्का देकर माचिस छीन ली। विरोध करने पर अंकित सिघंई और कैलाश चंद्र ने मंदिर के भीतर ही प्रदीप जैन और उनकी भतीजी प्रज्ञा जैन को मां- बहन की गंदी-गंदी गालियां देने लगे । जब उनसे कहा गया कि मंदिर परिसर से बाहर निकलकर बात कीजिए तो दोनों फरियादी प्रदीप जैन पर पिल पड़े। इसी मारपीट में सहयोग करने के लिए उनके साथी नितिन जैन और जितेन्द्र जैन भी आ गए। चारों मिलकर उनके साथ हाथ मुक्को से मारपीट करने लगे । इस बीच कैलाश सिंघई ने किसी धारदार हथियार से प्रदीप जैन के सिर पर प्रहार किया। वे फर्श पर गिर पड़े और उनकी बायीं आंख व भौंह से खून बहने लगा। मारपीट में प्रदीप जैन को बायीं आँख मे एवं भौह मे ऊपर एवं दाहीने पैर के घुटने मे एवं शरीर मे अन्य जगह चोटे आयी है। इस वारदात के प्रत्यक्षदर्शी विजय मोदी और बलराम सैनी ने बताया कि उन्होंने हमलावरों को दूर करने की कोशिश की लेकिन वे नहीं माने। कैलाश चंद्र और उनके साथी बोल रहे थे कि आज तो बच गया आईंदा उलझा तो जान से खत्म कर देंगे।
    गौरतलब है कि कैलाश सिंघई कथित तौर पर गैरकानूनी सट्टे का फड़ संचालित करता है। इस वजह से पुलिस के कई आला अधिकारियों से उसके करीबी संपर्क भी हो गए हैं। समाज के कुछ सफेदपोश नेता भी इस मामले में कूद पड़े और उन्होंने पुलिस अधिकारियों को गुमराह करते हुए कहा कि ये तो सामाजिक मामला है। हम लोग आपस में समझौता करवा देंगे। आप पुलिस थाने को बोलकर हमलावरों की ओर से भी एक शिकायत दर्ज करवा दीजिए। बाकी हम निपट लेगें।इसके ग्यारह घंटे बाद पुलिस ने फरियादी के विरुद्ध छेड़खानी की झूठी शिकायत दर्ज कर ली है। जबकि इस मामले में भाजपा के एक बड़े नेता ने भी हस्तक्षेप करके पुलिस को निर्देश दिए हैं कि वह निष्पक्ष जांच करके प्रकरण अदालत भिजवाए ताकि अपराधियों को अपनी करनी पर दंड मिल सके।

  • मछली ठेके और नशा कारोबार से दुबई में बनाई दौलत

    मछली ठेके और नशा कारोबार से दुबई में बनाई दौलत

    भोपाल 06 सितंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटऱ) मध्यप्रदेश की राजनीति में शरीफ मछली का नाम आज भी आदर से लिया जाता है। उनके निधन के बाद उनके परिवार ने जिस तरह अपराध जगत से नाता जोड़ा वो प्रदेश के लिए एक बड़ी समस्या बन गया था। अपराध की दुनिया में ‘मछली परिवार’ के नाम से कुख्यात यह गिरोह ड्रग तस्करी, यौन शोषण, जबरन वसूली जैसे संगीन आरोपों से जुड़ा रहा हैं। प्रशासन ने इस गिरोह की बनाई गई अवैध संपत्तियों को बुलडोजर से ध्वस्त कर एक स्पष्ट संदेश भेजा कि अपराध नहीं बख्शा जाएगा।

    1. बुलडोजर से अवैध संपत्तियों का ध्वंस
      30 जुलाई 2025 को प्रशासन ने मछली परिवार की लगभग ₹50 करोड़ की अवैध संपत्ति—जिसमें फार्म‑हाउस, वेयरहाउस, फैक्ट्री और आवासीय भवन शामिल थे—को अवैध अतिक्रमण की कार्रवाई में ध्वस्त किया। उसी दिन जिला प्रशासन, पुलिस और नगर निगम के संयुक्त टीम ने कई ठिकानों पर बुलडोजर चलाया जिसमें लगभग ₹100 करोड़ मूल्य की अवैध संपत्तियाँ शामिल थीं। 21 अगस्त 2025 को ‘मछली परिवार’ की तीन मंजिला कोठी (अनंतपुरा‑कोकता इलाके, वार्ड 62) को ध्वस्त किया गया, जिसकी कीमत ₹22–25 करोड़ आंकी गई थी। यह भी सरकारी जमीन पर बिना अनुमति निर्मित थी।
    2. गंभीर आरोप: ड्रग्स, यौन शोषण, ब्लैकमेलिंग
      गिरफ्तारी के बाद युवक यासीन अहमद उर्फ मछली और उनके चाचा शाहवर अहमद उर्फ मछली ने अपराध शाखा की गिरफ्त में आने पर कई खुलासे किए। आरोप है कि वे राजस्थान से ड्रग्स लाते, पब और लाउंज में पुरानी एवं भरोसेमंद ग्राहकों को पहुँचाते थे, और लड़कियों का उपयोग फिक्स डिलीवरी करने और उन्हें मुफ़्त ड्रग दे कर शोषित करने में करते थे। यासीन के मोबाइल में अश्लील वीडियो और पिस्टल भी बरामद हुए, जिससे यौन शोषण और ब्लैकमेलिंग का मामला और गंभीर हो गया।
    1. न्याय प्रक्रिया में ढिलाई—एफ़आईआर का अभाव
      लगभग ₹100 करोड़ की संपत्ति ध्वस्त कर दी गई परन्तु 34 दिनों बाद भी शारिक मछली के खिलाफ कोई FIR दर्ज नहीं की गई। शिकायतों और उपलब्ध सबूतों के बावजूद पुलिस कार्रवाई की निष्क्रियता पर सवाल उठे हुए हैं।
    2. नए उत्‍पन्न मामले—रेप और होटल में शोषण
      हाल ही में बीजेपी नेता के भतीजे यासीन मछली के खिलाफ और एक एफआईआर दर्ज हुई है जिसमें उन पर 5‑स्टार होटल में शादी का झांसा देकर रेप और मारपीट का आरोप लगाया गया है। यह वीडियो भी सामने आया है और अब पुलिस इस मामले की जांच कर रही है।
    3. राजनीतिक बयान और सरकार की प्रतिक्रिया
      मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने राज्य स्तरीय नशा मुक्ति कार्यक्रम में कहा कि “ड्रग्स तस्करों के खिलाफ ढूंढ‑ढूंढकर कार्रवाई की जा रही है” और कहा—“कोई कितनी भी पॉलिटिकल अप्रोच वाला हो, कोई कुछ भी — हम छोड़ेंगे नहीं।”–30 जुलाई 2025 ~₹50–100 करोड़ की अवैध संपत्ति (फार्म‑हाउस, वेयरहाउस आदि) ढहायी गई । 21 अगस्त 2025 तीन मंजिला कोठी (₹22–25 करोड़) ध्वस्त, सरकारी जमीन पर गिरफ्तारी यासीन और शाहवर सहित कई आरोपियों ने ड्रग तार्किक भय, यौन शोषण आदि खुलासे किए हैं।

    1. FIR मामला शारिक मछली के खिलाफ अभी तक FIR नहीं
      नया मामला यासीन के खिलाफ होटल में रेप व मारपीट की FIR का है। एक प्रताड़ित राजेश तिवारी ने मीडिया के सामने खुद के साथ हुई मारपीट और धोखाघड़ी की शिकायत की है।क्षेत्र के मुस्लिम नागरिकों ने भी इस परिवार की गुंडागर्दी के खिलाफ खुलकर बयान दिए हैं। लोगों का कहना है कि उनके कब्जे वाले तालाबों पर मछली मारने वालों को इस परिवार के गुर्गे उठा ले जाते थे और हवेली में बंद करके मारपीट करते थे।
      मुख्यमंत्री की टिप्पणी सख्त कार्रवाई का राजनीतिक संदेश जारी
      ‘मछली परिवार’ ने लंबे समय तक भोपाल में अपराधों के जरिए करोड़ों की संपत्ति और साम्राज्य का निर्माण किया। ड्रग तस्करी, यौन शोषण, ब्लैकमेलिंग जैसे अपराधों की घटित पृष्ठभूमि ने प्रशासन को कठोर कदम उठाने पर मजबूर किया। बुलडोजर द्वारा अवैध निर्माणों को ध्वस्त कर प्रशासन ने स्पष्ट संदेश दिया कि अपराध के लिए कोई स्थान नहीं होगा।
      हालांकि, कार्रवाई के बाद भी न्यायालयीन प्रक्रिया में विलंब, विशेषकर शारिक मछली के खिलाफ FIR का अभाव, चिंता का विषय है। इसके अलावा, नए अपराधों की झड़ी से यह मामला अभी समाप्त नहीं माना जा सकता। सरकार की प्रतिबद्धता और पुलिस की सक्रियता ही इस जटिल अपराधी नेटवर्क को सुलझा कर कानूनी रास्ता सुनिश्चित कर सकती है।
  • केनरा बैंक के ठग प्रकाश गुप्ता पर आयकर का छापा

    केनरा बैंक के ठग प्रकाश गुप्ता पर आयकर का छापा


    भोपाल, 03 सितंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। केनरा बैंक की कोहेफिजा शाखा से दो करोड़ इक्कीस लाख रुपए ठगने वाले प्रकाशचंद्र गुप्ता के ठिकानों पर आयकर महकमे ने अपना शिकंजा कस दिया है। पिछले दो दिनों से आयकर के अधिकारी गुप्ता की एमपीनगर वाली कंप्यूटर दूकान बूटकॉम सिस्टम्स और कम्फर्ट पार्क, अयोध्या बाईपास रोड स्थित निवास पर दस्तावेज खंगाल रहे हैं। उसकी अवैध पत्नी के 31A पार्क एवेन्यू गिरधर परिसर कोलार रोड स्थित आवास एवं गर्ल्स हास्टल्स और फार्म हाऊस आदि संपत्तियों पर भी निगाह बनाए हुए है।


    आयकर विभाग ने राजधानी के जिन सूदखोरों और ठेकेदारों पर छापे डाले हैं उन्हीं के साथ गुप्ता का कारोबारी लेनदेन पाया गया है। सूत्र बताते हैं कि इसके घर से जांच अमले को करोड़ों रुपए नकद, सोना और अवैध संपत्तियों के दस्तावेज भी बरामद हुए हैं। पिछले दो दिनों से एमपीनगर स्थित उसकी दूकान पर पुलिस दस्ते की मौजूदगी में अधिकारी तमाम दस्तावेज खंगाल रहे हैं।
    गुप्ता ने पुलिस और न्यायालय के समक्ष ये दावा किया था कि उसने केनरा बैंक की बुजुर्ग महिला मैनेजर को अपनी दूकान कार्यालय में बुलाकर एनपीए हो गए लोन एकाऊंट को बंद करने के लिए दो करोड़ इक्कीस लाख रुपए की बड़ी राशि कैश। नकद दी थी। आरोपी ने इतनी बड़ी नकद धनराशि उसके पास मौजूद होने का कोई कानूनी दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया था। इसी प्रकार एक अन्य प्रकरण क्रमांक आरसीटी 4137 । 2020 जो भोपाल जिला न्यायालय में लंबित है इसमें भी फरियादी को करोड़ों रुपए नकद भुगतान करने का उल्लेख किया गया है। इस नकद राशि का भी कोई वैध स्रोत नहीं बताया गया है। ये रकम उसके पास कहां से आई यही जांच का विषय है।
    गौरतलब है कि प्रकाश चंद्र गुप्ता लंबे समय से काले धन और हवाला का कारोबार कर रहा है। इसकी सूचनाएं कई बार पुलिस और अन्य जांच एजेंसियों को भी दी जा चुकी हैं। वह कंप्यूटर व्यवसायियों के अलावा समाज के हर वर्ग के लोगों को झांसा देकर करोड़ों रुपयों की ठगी करता रहा है। अधिक ब्याज का प्रलोभन देकर वह लोगों से रकम एंठता है फिर वह रकम डकार जाता है। इसके अपराध करने के तरीकों पर पुलिस ने लगभग पांच दर्जन प्रकरण दर्ज किए हुए हैं। पास्को एक्ट के एक अपराध में वह जमानत पर छूटा है। केनरा बैंक धोखाघड़ी प्रकरण में भी वह लगभग सवा महीने जेल में बंद रहा था। बाद में अदालत के सामने मामले का निपटारा करने की गुहार पर उसे जमानत पर छोड़ा गया था।
    ज्ञात हो कि वर्ष 2006-07 में भी प्रकाश चंद्र गुप्ता ने ठगी करते हुए पंजाब नेशनल बैंक की हबीबगंज शाखा से 32 लाख रुपए की धोखाधड़ी की थी। इस प्रकरण में उसने झूठे दस्तावेजों के आधार पर बैंक से लगभग पैंसठ लाख रुपए वसूले थे। पुलिस सूत्रों के अनुसार प्रकाश गुप्ता एक आदतन अपराधी है। पुलिस के पास विगत पच्चीस सालों से उसका आपराधिक रिकार्ड है। अपराध को छुपाने के लिए वह न्याय व्यवस्था के सामने झूठे साक्ष्य गढ़कर खुद को बचाता आ रहा है।

  • दवा माफिया पर सर्जिकल स्ट्राईक

    दवा माफिया पर सर्जिकल स्ट्राईक


    देश की प्रख्यात बड़ी बड़ी अस्पतालों के चढ़ते शेयर और आम जनता के घटते स्वास्थ्य ने दुनिया के तमाम देशों के बीच भारत की भारी बदनामी कराई है। बेशक भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं का ढांचा मजबूत हुआ है ।बढ़ते संसाधनों के बीच आम नागरिक की औसत आयु भी बढ़ी है, इसके बाद भी आम आदमी को स्वस्थ रहने की जितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है वह चिंताजनक है। दवा माफिया के इस मायाजाल को काटने के लिए केन्द्र सरकार ने प्रधानमंत्री जनऔषधि परियोजना शुरु की थी। अगले चरण के रूप में दवाईयों की कीमतें मनमाने ढंग से बढ़ाने वाले दवा माफिया पर प्रहार किया गया है। केन्द्र की फार्मेसी काऊंसिल और राज्यों की फार्मेसी काऊंसिलों ने फार्मेसी एक्ट के अधिकारों का प्रयोग करते हुए दवाईयों पर मनमानी एमआरपी प्रकाशित करने और छूट देकर ग्राहकों को आकर्षित करने के काले कारोबार पर करारा प्रहार किया है।


    मध्यप्रदेश में केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स एसोसिएशन (एमपीसीडीए) ने दवाओं के अनुचित डिस्काउंट, प्रचार और छूट के माध्यम से होने वाले उपभोक्ता शोषण और स्वास्थ्य जोखिमों को दृष्टिगत रखते हुए मध्य प्रदेश राज्य फार्मेसी कौंसिल से निवेदन किया था कि वह इस पर रोक लगाने के लिए आवश्यक दिशा निर्देश जारी करे। इसके बाद 26 जुलाई 2025 को काऊंसिल ने दवाओं पर छूट के नाम पर अनुचित मुनाफा कमाने वाले दवा माफिया के विरुद्ध दिशा निर्देश जारी किए हैं। राज्य सरकार के ड्रग कंट्रोलर, ड्रग आफिसर और ड्रग इंस्पेक्टरों ने दवा माफिया के इस जाल के विरुद्ध जांच भी शुरु कर दी है। जल्दी ही दवाओं की मूल कीमतों और इनके बेमेल काम्बीनेशन के विरुद्ध कार्रवाई करने की तैयारियां भी कीं गईं हैं।


    इस आदेश के माध्यम से फार्मेसी कौंसिल ने यह निर्देशित किया है कि रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट किसी भी प्रकार के छूट, ऑफर, बोर्ड, बैनर अथवा प्रचार सामग्री का उपयोग न करें, और उल्लंघन की स्थिति में नियमानुसार अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाएगी। यह निर्णय न केवल फार्मेसी अधिनियम, 1948 तथा फार्मेसी प्रैक्टिस रेगुलेशन्स, 2015 की भावना के अनुरूप है, बल्कि आम नागरिकों की स्वास्थ्य सुरक्षा और जीवन रक्षा की दिशा में एक दूरदर्शी और प्रभावशाली पहल भी है।


    छूट आधारित दवा बिक्री के कारण घटिया या नकली दवाओं की आपूर्ति में वृद्धि हो रही है। डाक्टर जिन दवाओं को अनुशंसित करता है,केमिस्ट उन्हें बदलकर छूट के नाम पर दूसरी दवाएं थमा देता है। इससे रोगियों में दवाओं के विरुद्ध एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस जैसी जटिलताएं बढ़ रहीं हैं।


    देश में दवाओं के मूल्य तय करने की जवाबदारी राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) को दी गई है। उसने पहले से ही शेड्यूल दवाओं पर 8-16% और नॉन-शेड्यूल पर 10-20% तक मार्जिन निर्धारित कर रखा है। प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ में कुछ प्रतिष्ठान छूट के नाम पर अनैतिक, अवैध एवं खतरनाक व्यापारिक प्रथाएं अपना रहे हैं — जिनमें सब-स्टैंडर्ड या नकली दवाओं की बिक्री, तथा डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन में मनमर्जी से परिवर्तन शामिल हैं।
    प्रिस्क्रिप्शन से इतर या गलत दवा दिए जाने से जीवन संकट में पड़ सकता है, विशेषकर गंभीर बीमारियों, हार्ट, कैंसर, डायबिटीज या मानसिक रोगों के मामलों में ये दवाएं मरीज को नुक्सान पहुंचा सकती हैं। छूट के नाम पर घटिया गुणवत्ता की या एक्सपायर्ड दवाओं की खपत बढ़ रही है, जिससे रोग ठीक होने के बजाय और गंभीर हो सकता है। मरीजों में AMR एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस , एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस, दवा का अप्रभावी होना, और एलर्जी या दुष्प्रभाव की घटनाएं बढ़ रही हैं।


    दवाएं बदल दिए जाने से मरीज को जो क्षति उठानी पड़ती है उससे डॉक्टर-फार्मासिस्ट के बीच भरोसे का रिश्ता कमजोर होने लगा है। समाज में फार्मेसी पेशे के प्रति विश्वास धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है, जिससे पूरे हेल्थकेयर सिस्टम की छवि प्रभावित हो रही है।
    केरल उच्च न्यायालय ने 31 जनवरी 2025 को पारित आदेश में फार्मासिस्टों को डिस्काउंट आधारित विज्ञापन न करने के स्पष्ट निर्देश दिए गए थे। महाराष्ट्र, पंजाब, गोवा, मणिपुर, छत्तीसगढ़, आदि राज्यों की फार्मेसी काउंसिल्स और ड्रग कंट्रोलर जम्मू कश्मीर भी इस विषय में स्पष्ट परामर्श जारी कर चुके हैं।

    दवा कारोबारियों ने दवा माफिया की चुनौती पर प्रहार करने के बाद मध्यप्रदेश फार्मेसी काऊंसिल के अध्यक्ष संजय जैन का अभिनंदन किया।


    एसोसिएशन ने फार्मेसी काऊंसिल के इस निर्देश पर प्रभावी अमल करने के लिए मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि वे संबंधित विभागों विशेष रूप से औषधि नियंत्रण प्रशासन (Drug Control Department) को आवश्यक निर्देश जारी करें, ताकि इस निर्णय का पालन सभी फार्मेसी आउटलेट्स को अनिवार्य रूप से करना पड़े।


    फार्मेसी क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि दवाईयों की दूकानों पर अलग अलग डिस्काऊंट के बोर्ड लगे होते हैं जिनमें एक ही किस्म की अलग अलग कंपनियों से बनी दवाएं अलग अलग रेट पर बेची जा रहीं हैं। कुछ सालों से दवा माफिया ने दवा निर्माण के साथ साथ मार्केटिंग का जो तंत्र विकसित किया है उसमें डाक्टरों के साथ सांठ गांठ की गई है। इस दवा माफिया ने प्रचलित ब्रांडों की दवाओं से मिलते जुलते नामों से कंपनियां बना लीं हैं। ये दवाईयां थर्ड पार्टी के लाईसेंस से बनाई जा रहीं हैं।इन दवाईयों पर पहले से कई गुना अधिक एमआरपी लिखवा दी जाती है फिर उस पर डिस्काउंट देकर छूट का कारोबार चलाया जाता है।


    फार्मेसी प्रेक्टिस एक्ट 2015 के अध्याय 7 एवं 8 में उल्लेख किया गया है की फार्मासिस्ट कोई भी ऐसा कार्य यह प्रचार प्रसार नहीं कर सकता जो की जनता को भ्रमित करें । इसी के तहत डिस्काउंट के बोर्ड लगाकर जनता को भ्रमित करना एक्ट के विरुद्ध है। इन सब को देखते हुए देश के 6 प्रदेशों में इस तरह के कार्य नहीं करने के लिए काउंसिल द्वारा समाचार पत्रों में सूचना प्रकाशित की गई है इसी के क्रम में मध्य प्रदेश में भी यह सूचना जारी की गई है। फार्मेसी एक्ट के तहत नियमों का पालन कराना काउंसिल के दायरे में आता है इसमें उनके साथ फूड एंड ड्रग का योगदान महत्वपूर्ण होता है।जम्मू एवं कश्मीर के ड्रग कंट्रोलर ने ही इसी तरह के निर्देश जारी किए हैं।


    दवाओं की गुणवत्ता और इनके बाजार मूल्यों पर नियंत्रण के लिए भारत में पहली बार इस तरह का अभियान सरकारी तंत्र की पहल पर चलाया जा रहा है। इससे जहां कुकरमुत्तों की तरह उग आईं नकली दवाओं की कंपनियों पर रोक लगेगी वहीं दवा कंपनियों की सांठगांठ से चलने वाले असपतालों की लूट से भी उपभोक्ताओं को बचाया जा सकेगा।

    मध्यप्रदेश फार्मेसी काऊंसिल के अध्यक्ष संजय जैन कहते हैं कि दवाओं की गुणवत्ता स्थापित करने के लिए नकली दवा कंपनियों पर रोक लगाना जनहित का कार्य है। निश्चित रूप से भारत सरकार ने दवा माफिया पर लगाम लगाने की जो मुहिम चलाई है उसका लाभ देश के दवा उद्योग और दवाईयों का निर्यात करने वाली कंपनियों को भी मिलेगा।दवा निर्माण का लाईसेंस देने में स्थानीय अधिकारियों ने जो गोरख धंधा चला रखा है इस मुहिम से उसे भी नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। भारत की दवाओं की साख बढ़ाने के इस अभियान से सरकारी अस्पतालों में सप्लाई की जाने वाली दवाओं पर भी पड़ेगा जो भारत के आम लोगों के स्वास्थ्य के पैमाने पर एक सार्थक प्रयास साबित होगा।