भारत का विपक्ष ये नैरेटिव गढ़ने का प्रयास कर रहा है कि केन्द्र की मोदी सरकार दिल्ली में आहूत प्रदर्शन को हतोत्साहित करके अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने का प्रयास कर रही है।ये वही विपक्ष है जो दिन रात सोशल मीडिया पर अपनी गलीज अभिव्यक्ति उगलता फिरता है।लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सत्ता में रहने पर व्यवस्था की मर्यादा याद आती है और विपक्ष में आते ही उसी व्यवस्था पर तानाशाही के आरोप लगने लगते हैं। दिल्ली में 10 अक्टूबर को प्रस्तावित सीजेपी और अन्य संगठनों के प्रदर्शन को लेकर छिड़ी बहस इसी राजनीतिक दोहरेपन की परीक्षा है। राहुल गांधी और विपक्षी दलों का आरोप है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बहाने मताधिकार छीना जा रहा है। दूसरी ओर, सरकार और भाजपा का तर्क है कि निष्पक्ष चुनाव के लिए मतदाता सूची का शुद्धिकरण आवश्यक है। सवाल यह है कि लोकतंत्र की रक्षा कौन कर रहा है और उसके नाम पर राजनीतिक लाभ कौन तलाश रहा है?पुलिस वाली को जिस तरह से छूते हुए राहुल गांधी का फोटो वायरल हुआ है उसने भी वंशवादी बुराई को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है। सरकार की आलोचना करना, चुनाव आयोग से सवाल पूछना और सड़कों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। ये बात संविधान निर्माताओं ने लगभग आठ दशक पहले सोची थी। तब न तो आम जन के पास फोन थे न टीवी रेडियो अखबार जैसे सुव्यवस्थित संचार के साधन थे। मुगलों के बाद अंग्रेजों की गुलामी से बाहर निकलने के लिए छटपटाते देश के सामने केवल भीड़ जुटाकर प्रदर्शन करने का एकमात्र विकल्प था । ये भीड़ इसलिए जुटाई जाती थी कि सरकारों के पास प्रदर्शनकारियों को गिरफतार करने की क्षमता ही नहीं थी। ऐसे में ब्रितानी हुकूमत के हाथ पैर फूल जाते थे और वह जनता की बात मानने को विवश हो जाती थी। आज ऐसी कोई परिस्थिति नहीं है। देश की किसी सरकार की इतनी कूबत नहीं है कि वह जन भावनाओं को रौंद सके और अपनी मनमानी करती रहे। इसके बावजूद विपक्ष यही रोना रो रहा है कि सरकार उन्हें प्रदर्शन ही नहीं करने दे रही है। राजधानी को अस्तव्यस्त करने वाले षड़यंत्रकारियों के प्रदर्शन से आम नागरिकों को बचाने के लिए दिल्ली सरकार ने जिस तरह से सार्वजनिक परिवहन का दुरुपयोग रोकने की पहल दिखाई है उससे तिलचट्टे तो खफा हैं हीं साथ में कांग्रेस के युवराज के समर्थक भी खासे परेशान हैं।
राहुल गांधी का ‘वोट चोरी’ संबंधी आरोप राजनीतिक रूप से गंभीर है, लेकिन उसकी पुष्टि के लिए ठोस प्रमाण जरूरी हैं। भाजपा की ओर से कहा गया है कि लगभग 13 करोड़ नामों को अंतिम रूप से मतदाता सूची से हटाया नहीं गया, बल्कि पुनरीक्षण में मृत, अनुपस्थित, स्थानांतरित या दोहरी प्रविष्टियों के रूप में चिह्नित किया गया है। पार्टी ने नए युवा मतदाताओं के नाम जोड़ने का भी हवाला दिया है। इन दावों की स्वतंत्र जांच और निर्वाचन आयोग के पारदर्शी आंकड़े ही सच्चाई स्पष्ट कर सकते हैं।
यदि सूची में फर्जी या दोहरे नाम हैं तो उन्हें हटाना जरूरी है; लेकिन यदि किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हटता है तो उसे बहाल करना भी उतना ही जरूरी है। विपक्ष को प्रत्येक कथित गड़बड़ी का दस्तावेजी प्रमाण देना चाहिए और निर्वाचन आयोग को प्रत्येक वैध शिकायत का जवाब। चुनाव आयोग की निष्पक्षता केवल उसके दावों से नहीं, उसकी पारदर्शिता और जवाबदेही से सिद्ध होगी। भाजपा के लिए भी यही कसौटी है।विपक्ष का कहना है कि कई नाम वैध पाए गए और उन्हें बाद में शामिल भी कर लिया गया तो उन्हें हटाया ही क्यों था। जबकि हकीकत ये है कि ये नाम तथ्यात्मक आधार प्रस्तुत करने के बाद जोड़े गए हैं । यदि वे मतदाता पहले ही अपनी जानकारी मुहैया करा देते तो उनके नाम काटे ही नहीं जाते।
अवैध घुसपैठ राष्ट्रीय सुरक्षा, संसाधनों और नागरिकता से जुड़ा गंभीर विषय है। किसी समुदाय या राजनीतिक विरोधी को बिना प्रमाण घुसपैठिया घोषित करना सरकार का भी मकसद नहीं है। पहचान, नागरिकता और मताधिकार से जुड़े निर्णय कानून और उचित प्रक्रिया के अनुसार ही तो किए जाएंगे। इसी प्रकार विदेशों में जमा कथित काले धन या भारत से अवैध रूप से बाहर भेजी गई संपत्ति पर सवाल उठाना उचित है किसी दल या नेता पर आरोप लगाने के लिए जांच, वित्तीय अभिलेख और विश्वसनीय साक्ष्य चाहिए। सरकार ने इसीलिए तो अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की लेकिन जांच की प्रक्रिया जारी है। भारत में शासन करने वालों ने आजादी के बाद से लगभग पचास विदेशी मुल्कों में भारत से लूटा धन निवेश कर रखा है।उसी के आने वाला ब्याज देश की सत्ता को अस्थिर करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। अदालतों ने तो इस संबंध में प्रमाण सुन समझ लिए हैं लेकिन ये जानकारी आज तक पब्लिक डोमेन में नहीं आई है। यही वजह है कि देश की आबादी खासतौर से युवाओं के बड़े वर्ग को लगता है कि सरकार तानाशाही से उनकी आवाज को कुचलने का प्रयास कर रही है।
सीजेपी के नेता अभिजीत दिपके ने रेल सेवाओं और मेट्रो स्टेशनों पर प्रतिबंधों को लेकर केंद्र पर कटाक्ष किया है। कांग्रेस भी इन कदमों को लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बता रही है। मगर प्रश्न यह है कि प्रदर्शनकारियों की राजनीतिक लड़ाई में दफ्तर जाने वाले कर्मचारी, अस्पताल पहुंचने वाले मरीज, विद्यार्थी और रोज कमाकर खाने वाले नागरिक क्यों परेशान हों? सार्वजनिक परिवहन को बाधित करने या संभावित भीड़ को रोकने के लिए पूरे शहर की आवाजाही सीमित करने का औचित्य देश के आम लोगों को भी समझना होगा।
दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा कारणों से प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी और व्यापक प्रतिबंधों की तैयारी की है। सर्वोच्च न्यायालय के कुछ जज भी मेट्रो और रेल सेवाओं पर व्यापक रोक को लेकर सवाल उठा रहे हैं। पिछले आंदोलनों से सबक लेकर दिल्ली सरकार नागरिकों की सुविधाओं के साथ सुरक्षा को लेकर भी चिंतित है। यही वजह है कि उसने दिल्ली के आम परिवहन को नहीं रोका है।बाहर से दिल्ली आने वाले सार्वजनिक परिवहन को नियंत्रित किया जा रहा है। दिल्ली सरकार का ये कदम निश्चित रूप से सराहनीय है। आज जब गांव में बैठे व्यक्ति को प्रधानमंत्री और सरकार तक अपनी बात पहुंचाने के लिए तमाम संसाधन उपलब्ध हैं तब दिल्ली में भीड़ जुटाकर किसके इशारे पर और किसे डराने का प्रयास किया जा रहा है।
भाजपा प्रवक्ता प्रदीप भंडारी का एसआईआर के समर्थन में दिया गया तर्क सरकार के फैसले का समर्थन करता है। राहुल गांधी के लिए केवल ‘वोट चोरी’ का नारा पर्याप्त नहीं; उन्हें प्रमाण सामने रखने होंगे। सीजेपी और दूसरे प्रदर्शनकारी संगठनों को शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार की आड़ लेने के बजाए आम जनता की कठिनाइयों के प्रति संवेदनशील रहना सीखना पड़ेगा। किसी भी दल की आलोचना को राष्ट्रविरोध और हर प्रशासनिक कार्रवाई को तानाशाही बताना लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है।
लोकतंत्र किसी एक पार्टी की जागीर नहीं, बल्कि संविधान से संचालित सार्वजनिक व्यवस्था है। उसकी रक्षा न अंधसमर्थन से होगी, न अंधविरोध से। सरकार तो संयम और पारदर्शिता दिखा रही है पर विपक्ष को भी प्रमाण और जिम्मेदारी का भाव रखना होगा।दिल्ली में जमा अराजक भीड़ को ठोकना न पड़े इसके लिए सरकार यदि उन्हें अनुमति नहीं दे रही है तो ये उचित ही है। जनता को नारों से अधिक तथ्यों पर गौर करने की जरूरत है। लोकतंत्र की चिंता में दुबला होने का अभिनय छोड़कर यदि सभी पक्ष अपने आचरण की समीक्षा करें, तभी प्रजातंत्र का वास्तविक खतरा कम होगा।





















