Category: अर्थ संसार

  • कार्पोरेट बैंकिंग में प्रवेश की दहलीज पर सद्गुरु नागरिक सहकारी बैंक

    कार्पोरेट बैंकिंग में प्रवेश की दहलीज पर सद्गुरु नागरिक सहकारी बैंक

        सद्गुरु नागरिक सहकारी बैंक के चुनाव में 16 जुलाई को नालंदा स्कूल में लिखेगा नया अध्याय

    भोपाल,13 जुलाई,(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।राजधानी के व्यापारियों की आर्थिक प्रगति में बड़ी भागीदारी निभाने वाला सद्गुरु नागरिक सहकारी बैंक अब आधुनिकता के नए दौर में प्रवेश करने जा रहा है। बैंक ने आगामी 16 जुलाई रविवार को अपने नए संचालक मंडल के चुनाव आयोजित किए हैं। देश की तेज करवट ले रही अर्थव्यवस्था  के साथ कदमताल करने के लिए सद्गुरु वैभव पैनल ने आज पत्रकार वार्ता में अपनी योजनाओं का खाका प्रस्तुत किया।बैंक के संस्थापक स्वर्गीय श्री राजाभाऊ कुलकर्णी के सुपुत्र मिलिंद कुलकर्णी के मैदान में आ जाने से ये चुनाव नई उमंगों से लबरेज बन गया है।

             स्वर्गीय राजाभाऊ कुलकर्णी के प्रयासों से निर्मित इसबैंक को इसके अंशधारी सदस्यों, अमानतदारों, उधार कर्ताओं कर्मचारियों ने अपने अथक परिश्रम से लगातार सफल बनाया और ऊंचाईयों पर पहुंचाया। जब केवल सरकारी बैंकों का जलजला था और बाद में बड़े निजी बैंकों की धमक बढ़ी तब भी सद्गुरु नागरिक सहकारी बैंक अपना कारोबार बढ़ाता रहा है। जब सरकारी मदद से खोले गए सहकारी बैंक धूल धूसरित हो रहे थे तब भी सद्गुरु नागरिक सहकारी बैंक अपना लाभांश अपने हितग्राहियों में बांट रहा था। इस बार स्वर्गीय कुलकर्णी के बेटे ने अपने पिता के अधूरे स्वप्नों को साकार करके बैंक को नई ऊंचाईयों पर ले जाने का संकल्प व्यक्त किया है।

           आज पत्रकार वार्ता में सद्गुरु वैभव पैनल के सुरेश कानिटकर और मिलिंद कुलकर्णी ने कहा कि आधुनिक बैंकिंग के इस दौर में व्यापारियों और अंशधारकों की जरूरतों को पूरा करने के लिए हमारी पैनल ने एक व्यापक रोड मैप तैयार किया है। पैनल के अनुभवी सदस्यों ने मोबाईल बैंकिंग और आनलाईन बैंकिंग के माध्यम से अपने ग्राहकों के वित्तीय उन्नयन की तैयारी की है। उन्होंने बताया कि नालंदा स्कूल में होने वाले मतदान बैंक के वे अंशधारी सदस्य ही मतदान कर पाएंगे जिन्होंने अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार बैंक लोन लिया है। निर्वाचन अधिकारी ने मतदान के लिए शासन की ओर से मान्यता प्राप्त पहचान पत्र लाना अनिवार्य कर दिया है।

           उन्होंने बताया कि पिछले कुछ सालों में बैंक के सदस्य संस्था से अपना जुड़ाव नहीं बना पाए हैं। अंशधारी सदस्यों की जरूरतों पर ध्यान नहीं दिए जाने के कारण आम ग्राहक खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है। संचालक मंडल की नीतियों की वजह से कई योग्य अधिकारी कर्मचारी अपनी नौकरियां छोड़ चुके हैं। इसी वजह से इस बार चुनाव में एक बदलाव की बयार महसूस की जा रही है। बैंक एक सहकारी संस्था है और भारतीय रिजर्व बैंक की निगरानी में सहकारिता कानून के तहत कार्य करती है। पिछले वर्षों में इसे चंद लोगों के इर्द गिर्द चलाने की कोशिशें की गईं। इस चुनाव में हमारी पैनल विजयी हुई तो हम बैंक को कार्पोरेट गवर्नेंस की ओर ले जाएंगे।

         सद्गुरु वैभव पैनल ने समाज के जागरूक डाक्टरों, सीए,वकील, व्यवसायी, पत्रकार आदि सभी वर्गों के लोग शामिल किए गए हैं। उन्होंने समाज के सभी वर्गों के मतदाता सदस्यों से निवेदन किया है कि वे मतदान अवश्य करें और सद्गगुरु पैनल के सभी सदस्यों को भारी बहुमत से विजयी बनाकर बैंकिंग के क्षेत्र में एक नया अध्याय लिखने की शुरुआत करें।

  • रोजगार के सशक्त माध्यम हैं सूक्ष्म और लघु उद्योग

    रोजगार के सशक्त माध्यम हैं सूक्ष्म और लघु उद्योग

    मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बढ़ते मध्यप्रदेश का रोडमैप प्रस्तुत किया,ओमप्रकाश सखलेचा ने ली बैठक

    भोपाल, 19 जून( प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि आत्म-निर्भर भारत के लिए आत्म-निर्भर मध्यप्रदेश के निर्माण का जो रोडमेप हमने बनाया है, उसके रोम-रोम में सशक्त औद्योगिक परिदृश्य के निर्माण और रोजगार सृजन की भावना रची-बसी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में 21वीं सदी के आत्म-निर्भर भारत बनाने का जो यज्ञ चल रहा है, उसमें बड़े उद्योगों की भूमिका जितनी अहम है, उतना ही महत्व सूक्ष्म, लघु और मध्यम श्रेणी के उद्यमियों का भी है। युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने में इन उद्यमियों की भूमिका बहुत अधिक महत्वपूर्ण है, यह स्थानीय स्तर पर निवेश और रोजगार के अवसर सृजित करने के सशक्त माध्यम हैं। स्थानीय परिवेश-स्थानीय संसाधनों पर कार्य करने वाली इन इकाइयों की सहायता और विकास के लिए राज्य सरकार हरसंभव सहयोग प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसी उद्देश्य से आज हो रही समिट का ध्येय वाक्य “आर्थिक विकास के शुभ संयोग-मध्यप्रदेश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग” रखा गया है।
    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने होटल आमेर ग्रीन भोपाल में राज्य स्तरीय एमएसएमई समिट का शुभारंभ किया। भोपाल महापौर श्रीमती मालती राय विशेष रूप से उपस्थित थी। समिट में अनेक उद्योग परिसंघ के पदाधिकारी, बड़े औद्योगिक घराने, नव उद्यमी, केन्द्र और राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।
    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने दीप प्रज्ज्वलित कर समिट का शुभारंभ किया। मध्यप्रदेश में एमएसएमई की भूमिका पर लघु फिल्म का प्रदर्शन किया गया। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने सफल उद्यमियों को एमएसएमई अवार्ड प्रदान किए और राज्य सरकार एवं देश की प्रतिष्ठित कंपनी और संस्थानों के बीच एम.ओ.यू का आदान-प्रदान भी हुआ। प्रदेश के सभी जिले कार्यक्रम से वर्चुअली जुड़े।
    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मध्यप्रदेश की समृद्धि और विकास के भागीदार हैं। हम मिल-जुल कर कैसे आगे बढ़ सकते हैं, इस पर विचार-विमर्श के लिए यह समिट की गई है। सफलता के लिए उत्साह सबसे आवश्यक है। आप सकारात्मक सोच के साथ ईज ऑफ डूईंग बिजनेस का लाभ उठाते हुए आगे बढ़ें। सरकारी नीतियों में जहाँ सुधार की आवश्यकता हो, उन बिन्दुओं को सरकार के साथ साझा करें। जो भी बेहतर होगा उसे क्रियान्वित किया जाएगा। हम मिल कर काम करेंगे और मध्यप्रदेश को आगे बढ़ाएंगे। प्रधानमंत्री श्री मोदी के नेृतत्व में भारत को विश्व में अग्रणी बनाने के लिए हम सब प्रतिबद्ध हैं।
    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि स्व-रोजगार और छोटे उद्योगों को सहायता के लिए प्रदेश में 12 योजनाएँ संचालित हैं। मुख्यमंत्री सीखो कमाओ योजना भी लागू की जा रही है, जिसमें 700 कार्य चिन्हित किए गए हैं। उद्यमी इस योजना से जुड़ें, युवाओं को जोड़ें, उन्हें दक्ष बनाएँ और योजना का लाभ उठाएँ। यह योजना उद्यमियों, रोजगार के इच्छुक युवाओं के लिए उपयोगी और मध्यप्रदेश को सक्षम एवं आत्म-निर्भर बनाने के लिए प्रभावी है।
    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि हर स्तर के उद्योगों की आवश्यकता के अनुरूप नीतियाँ और योजनाएँ बनाकर उनका क्रियान्वयन किया जा रहा है। प्रदेश में उपलब्ध प्रचुर खनिज संसाधन, पर्याप्त लैण्डबैंक, सुविकसित सड़क अधो-संरचना, बढ़ती कृषि उत्पादकता और निवेश अनुकूल नीतियों से औद्योगिक विकास की अपार संभावनाएँ मौजूद हैं। एमएसएमई सेक्टर के विकास के लिए पृथक से विभाग गठित किया गया है। स्टार्टअप को प्रोत्साहित करने और उन्हें बेहतर ईको सिस्टम उपलब्ध कराने के लिए कई प्रावधान किए गए हैं। बेहतर सड़क नेटवर्क के साथ एक्सप्रेस-वे विकसित किए जा रहे हैं। साथ ही निवेश गलियारों का भी निर्माण होगा। बेहतर औद्योगिक अधो-संरचना सुविधा के लिए उद्योगों के क्लस्टर विकसित किए जा रहे हैं। “एक जिला-एक उत्पाद” से रोजगार के नए अवसर सृजित हो रहे हैं। दक्ष मानव संसाधन की उपलब्धता के लिए ग्लोबल स्किल पार्क के साथ संभाग और जिला स्तर पर आई.आई.टी को भी सशक्त किया जा रहा है।
    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि प्रदेश निरंतर विकास की ओर अग्रसर है। हम अब बीमारू राज्य नहीं हैं। मध्यप्रदेश की जीएसडीपी का आकार 15 लाख करोड़ पार कर चुका है। राज्य की प्रतिव्यक्ति आय एक लाख 40 हजार रूपए हो गई है। इस वर्ष का बजट 3 लाख 14 हजार करोड़ रूपए का है। प्रदेश ने वित्तीय प्रबंधन की अनूठी मिसाल प्रस्तुत की है। राज्य सरकार लाड़ली बहनों को प्रतिमाह एक हजार रूपए देने और केपिटल एक्सपेंडिचर बढ़ाने का कार्य एक साथ कर रही है।
    सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्री श्री ओमप्रकाश सखलेचा ने कहा कि हमारा विभाग अर्थ-व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देने वाला विभाग है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को सबसे अधिक आवश्यकता तकनीकी अपग्रेडेशन की है। मुख्यमंत्री श्री चौहान के सहयोग, मार्गदर्शन और उदारता से प्रदेश में उद्यमशीलता का वातावरण बना है। राज्य सरकार औद्योगिक क्लस्टर्स के साथ डिस्प्ले सेंटर और ऑनलाइन कनेक्टिविटी को प्रोत्साहित कर रही है। प्रदेश में उत्पादित सामग्री की बेहतर मार्केटिंग के लिए भी बेहतर प्रयास हो रहे हैं।
    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने वर्ष 2018-19, 2019-20 और 2020-21 के लिए एमएसएमई अवार्ड प्रदान किए। प्रभावी कार्य संस्कृति और बेस्ट प्रेक्टिसेस अपनाने के लिए वर्ष 2018-19 का प्रथम पुरस्कार आईटीएल इंडस्ट्रीज लिमिटेड इंदौर को, द्वितीय पुरस्कार शास्त्री सर्जिकल इण्डस्ट्रीज रायसेन और तृतीय पुरस्कार शक्ति एम्पोरियम झाबुआ को प्रदान किया गया। महिला उद्यमियों में मंत्रा कम्पोजिट इंदौर की श्रीमती ममता महाजन को पुरस्कृत किया गया। वर्ष 2019-20 के लिए नंदिनी मेडिकल लेबोरेट्रीज इंदौर को प्रथम, न्यू लाईफ लेबोरेट्रीज मण्डीदीप रायसेन को द्वितीय और सेफफ्लेक्स इंटरनेशनल धार को तृतीय पुरस्कार प्रदान किया गया। वर्ष 2020-21 के लिए मॉर्डन लेबोरेट्रीज इंदौर को प्रथम, डीइसीजी इंटरनेशनल मण्डीदीप रायसेन को द्वितीय और हेल्थीको क्वालिटी प्रोडक्ट्स धार को तृतीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। वर्ष 2020-21 में महिला उद्यमियों की श्रेणी में सांई मशीन टूल्स इंदौर की श्रीमती शिखा विशाल जायसवाल और श्रीमती निहारिका अजय जायसवाल तथा अर्थव पैकेजिंग इंदौर की श्रीमती ममता शर्मा को पुरस्कृत किया गया। मुख्यमंत्री श्री चौहान की उपस्थिति में एनएसई इंडिया, वॉलमार्ट, आरएक्सआईएल, इनवॉइस मार्ट तथा आइसेक्ट के साथ एम.ओ.यू. का आदान-प्रदान हुआ।
    सचिव एमएसएमई पी. नरहरि ने अतिथियों का स्वागत किया तथा समिट और विभागीय कार्यक्रमों एवं योजनाओं की जानकारी दी। समिट में 6 सत्र हैं, जिनसे उद्यमियों, विषय-विशेषज्ञों और युवाओं को उद्यमिता के लिए मार्गदर्शन प्राप्त होगा। सत्रों को ऐसा डिजाइन किया गया है, जिससे अलग-अलग क्षेत्रों में नई संभावनाओं पर विशेष फोकस रहे। समिट में एमएसएमई के लिए टेक्नालॉजी ट्रांसफर, न्यू एज फाइनेंस, अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा, महिला उद्यमिता को प्रोत्साहन और डिजिटल रूपांतरण विषयों पर विशेष सत्र हुए।
    समिट में संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन के भारत प्रतिनिधि श्री रेने वान बर्कल, फिक्की फ्लो की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री सुधा शिवकुमार, कोप्पल टॉय क्लस्टर के सीईओ श्री किशोर राव, राष्ट्रीय अनुसंधान विकास निगम के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक कमोडोर अमित रस्तोगी (सेवानिवृत्त), भारतीय लोक प्रशासन संस्थान के महानिदेशक श्री सुरेंद्र नाथ त्रिपाठी और लघु उद्योग भारती के अध्यक्ष श्री महेश गुप्ता उपस्थित थे। इन्वेस्ट इंडिया, एसोचेम इंडिया, सीआईआई, फिक्की, पीएचडी चेम्बर्स ऑफ कॉमर्स एण्ड इंडस्ट्री और डिक्की के प्रतिनिधि समिट में शामिल हुए।

  • जन धन खातों में न्यूनतम बैलेंस जरूरी नहीं

    जन धन खातों में न्यूनतम बैलेंस जरूरी नहीं

    भोपाल,14 जून(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर) के कुछ जिलों में कहीं-कहीं मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना की लाड़ली बहनों के बैंक खातों में अंतरित की गई राशि क्रेडिट नहीं होने की जानकारी मिली है। न्यूनतम बेलेंस नही होने से सेवा शुल्क में रूप में बैंकों द्वारा राशि काटे जाने की आशंका व्यक्त की गई है, जबकि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के निर्देशानुसार प्रधानमंत्री जन धन योजना में खुले बैंक अकाउंट सहित बेसिक सेविंग बैंक डिपॉजिट में न्यूनतम बेलेंस रखने की बाध्यता नहीं है। बैंक, इन अकाउंट पर सेवा शुल्क नहीं ले सकते हैं।

    संयुक्त संचालक महिला बाल विकास डॉ. विशाल नाडकर्णी ने बताया है कि स्टेट लेवल बैंकर्स कमेटी (एसएलबीसी) ने निर्देश जारी कर निष्क्रिय खातों वाली लाड़ली बहनाओं के खाते, जन धन खातों में परिवर्तित करने की कार्यवाही के निर्देश भी दिये हैं, जिससे कि बहनों के खाते में अंतरित की गई राशि जमा हो सके।

    डॉ. नाडकर्णी ने कहा है कि महिला बाल विकास संचालनालय द्वारा प्रयास किया जा रहा है कि महिलाओं के बैंक खातों से न्यूनतम बेलेंस न होने के कारण बैंकों द्वारा राशि काटी गई है, ऐसे सभी प्रकरणों के लिये जिला कार्यक्रम अधिकारी द्वारा प्रयास किया जा रहा है कि इन महिलाओं के बेसिक सेविंग डिपाजिट अकाउंट में या तो परिवर्तन किया जाएगा या फिर नवीन अकाउंट खुलवा कर डीबीटी सक्रिय किया जाएगा, जिससे उनके अकाउंट से राशि न कटे। इसके अतिरिक्त इस अवधि के दौरान जितने भी डीबीटी हुए हैं, उन सभी के भुगतान की प्रक्रिया महिला बाल विकास संचालनालय द्वारा जारी शेड्यूल के अनुसार की जाएगी। मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना के स्वीकृति-पत्र मिलने के बाद भी लाड़ली बहनों के खाते में राशि नहीं आने के प्रकरण बहुत कम संख्या में हैं। राशि प्राप्त नहीं होने के कारणों की जानकारी पोर्टल पर उपलब्ध हो गई है। ऐसे प्रकरणों का निदान जिला स्तर से ही किया जा रहा है और डीबीटी सक्रिय होते ही शेड्यूल अनुसार भुगतान किया जाएगा।

  • भारतीय रेल ने नौ साल में लिखी विकास की नई कहानी

    भारतीय रेल ने नौ साल में लिखी विकास की नई कहानी

    नई दिल्ली, 11 जून(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर). बीते 9 साल में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में, भारतीय रेलवे में अभूतपूर्व बदलाव देखा गया है. आर्थिक विकास को बढ़ावा देने और कनेक्टिविटी में सुधार के लिए मजबूत रेलवे नेटवर्क के महत्व को स्वीकार करते हुए, केंद्र की मोदी सरकार ने रेलवे के आधुनिकीकरण और विस्तार के लिए कई महत्वाकांक्षी योजनाएं शुरू की हैं.
    मोदी सरकार ने पैसेंजर्स की सुरक्षा सुनिश्चित करने और ऑपरेशनल कैपेसिटी को बढ़ाने के लिए रेलवे के बुनियादी ढांचे के एडवांसमेंट पर फोकस किया है. सिग्नलिंग और टेलीकम्यूनिकेशन सिस्टम को बढ़ाने के लिए पैसे का पर्याप्त आवंटन किया गया है और पुराने उपकरणों को अत्याधुनिक तकनीक से बदल दिया गया है. इससे दुर्घटनाओं में काफी कमी आई है और रेलवे के समग्र सुरक्षा रिकॉर्ड में सुधार हुआ है.
    डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर की योजना मोदी सरकार के लिए मील का पत्थर साबित हो रही है. ये हाई-स्पीड कॉरिडोर, जैसे कि पश्चिमी डीएफसी और पूर्वी डीएफसी, गुड्स को सही तरीके से ट्रांसपोर्ट करने और मौजूदा रेलवे लाइनों पर भीड़ को कम करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं. ये कॉरिडोर पूरे देश में गुड्स ढुलाई की निर्बाध आवाजाही को सुगम बनाकर अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देंगे.
    केंद्र की मोदी सरकार भारत में हाई-स्पीड रेल (Bullet Train) लेकर आई है. मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना, जापान के सहयोग से, इंटरसिटी यात्रा में रिवोल्यूशन लाने के लिए तैयार है, जिससे दोनों शहरों के बीच यात्रा का समय काफी कम हो जाएगा. यह परियोजना न केवल तकनीकी प्रगति के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करती है, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय साझेदारों के साथ संबंधों को भी मजबूत करती है.
    मोदी सरकार ने देश भर में रेलवे के बुनियादी ढांचे के विस्तार और आधुनिकीकरण को प्राथमिकता दी है. कई नई रेलवे लाइनें, दोहरीकरण और विद्युतीकरण परियोजनाएं शुरू की गई हैं, जो पहले से असंबद्ध क्षेत्रों को जोड़ती हैं और मौजूदा मार्गों पर भीड़भाड़ को कम करती हैं. इसके अलावा, सरकार ने भारतमाला परियोजना और सागरमाला परियोजनाएं शुरू की हैं, जो रेलवे को रोडवेज और पोर्ट कनेक्टिविटी के साथ इंटीग्रेट करती हैं, मल्टीमॉडल परिवहन को बढ़ावा देती हैं और आर्थिक विकास को बढ़ावा देती हैं.
    डिजिटल युग को गले लगाते हुए, मोदी सरकार ने पैसेंजर्स के अनुभव को बढ़ाने और संचालन को सिस्टमेटिक करने के लिए कई पहलें शुरू की हैं. भारतीय रेलवे खानपान और पर्यटन निगम (IRCTC) की वेबसाइट और मोबाइल ऐप की शुरुआत ने टिकट बुकिंग को आसान बना दिया है, जिससे फिजिकल टिकट काउंटरों पर निर्भरता कम हो गई है. इसके अतिरिक्त, रेलवे स्टेशनों पर वाई-फाई सेवाओं ने उन्हें डिजिटल हब में बदल दिया है.
    भारत की गौरव गाथा में वंदे भारत ट्रेन ने बड़ा योगदान दिया है. इस अत्याधुनिक सेमी हाई-स्पीड ट्रेन ने देश में रेल यात्रा में क्रांति ला दी है, कनेक्टिविटी को बढ़ाया है और आर्थिक विकास को बढ़ावा दिया है. अपनी अत्याधुनिक तकनीक और बेहतर सुविधा के साथ, इसने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों पर्यटकों को आकर्षित किया है, पर्यटन क्षेत्र को बढ़ावा दिया है और रोजगार के अवसर पैदा किए हैं. साथ ही तेजस ट्रेनों को भी लाया गया है. ये ट्रेनें प्राइवेट हाथों में हैं. डबल डेकर ट्रनों के भी इंट्रोड्यूस किया गया है.
    पैसेंजर सुविधाओं पर सरकार का मुख्य फोकस रहा है. देश भर के स्टेशनों को बेहतर प्रतीक्षालयों, बेहतर स्वच्छता सुविधाओं और एस्केलेटर और लिफ्ट जैसी सुविधाओं का आधुनिकीकरण किया गया है.
    कार्बन फुटप्रिंट को कम करने और ऊर्जा दक्षता बढ़ाने के लिए, मोदी सरकार ने रेलवे इलेक्ट्रिफिकेशन पर बहुत जोर दिया है. ब्रॉड-गेज रेलवे लाइन के 100% इलेक्ट्रिफिकेशन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सख्ती से पालन किया गया है, जिससे ईंधन की लागत में काफी बचत और ग्रीन रेलवे सिस्टम का रास्ता खुला है. इस संक्रमण ने न केवल प्रदूषण को कम किया है, बल्कि ट्रेन संचालन की गति और दक्षता को भी बढ़ाया है.
    मोदी सरकार ने रोजगार के अवसर पैदा करने में रेलवे की क्षमता को पहचाना है. रेलवे कर्मियों के स्किल डेवलपमेंट के जरिए सक्षम कार्यबल बनाने के प्रयास किए गए हैं. भारतीय रेलवे विश्वविद्यालय और व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम जैसी पहलें लोगों को रेलवे उद्योग में करियर बनाने के लिए आवश्यक कौशल से लैस करने के लिए शुरू की गई हैं. इससे न केवल नौकरी चाहने वालों को लाभ हुआ है बल्कि रेलवे की समग्र मानव संसाधन क्षमताओं को भी मजबूती मिली है.

  • नेशनल इनोवेशन सिस्टम से जुड़ें फार्मासिस्ट

    नेशनल इनोवेशन सिस्टम से जुड़ें फार्मासिस्ट


    अगर हम अपनी कंपनियों, सार्वजनिक शोध और नियमन में जरूरी बदलाव करें तो इनोवेशन पर आधारित एक ऐसा औष​धि उद्योग तैयार कर सकते हैं जो दुनिया को पीछे छोड़ देगा।

    भोपाल, 10 जून (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर). प्रभावी नैशनल इनोवेशन सिस्टम कायम करने के लिए हमें बीते 70 वर्षों की सबसे सफल आर्थिक घटनाओं से सबक लेना होगा। जापान, द​क्षिण कोरिया, ताइवान, सिंगापुर और चीन इसके उदाहरण हैं। इन सभी देशों ने इनोवेशन की क्षमता विकसित करने की एक प्रक्रिया का पालन किया। एक प्रतिस्पर्धी उद्योग तैयार किया गया फिर गहरी तकनीकी क्षमता, उसके पश्चात आंतरिक शोध एवं विकास तथा अंत में सरकारी स्तर पर शोध और विकास किया गया।

    हम फार्मा सेक्टर में दुनिया को पछाड़ने वाला इनोवेशन कर सकते हैं। यह एक ऐसा उद्योग है जिसमें हम शोध एवं विकास में वै​श्विक स्तर का निवेश कर सकते हैं। हमने यह नतीजा कैसे निकाला? दरअसल यह जानकारी उन टिप्प​णियों का नतीजा है जो फार्मा सेक्टर में इनोवेशन को लेकर बंद दरवाजों के पीछे हुई एक बैठक में निकलीं। इस बैठक में फार्मा उद्योग के कुछ सर्वा​धिक जानकार लोग, विद्वान, सरकार के लोग आदि शामिल थे। इसका आयोजन सेंटर फॉर टेक्नॉलजी इनोवेशन ऐंड इकनॉमिक रिसर्च तथा अनंत सेंटर ने किया था।

    कंपनियों के सामने चुनौती यह है कि भारतीय फार्मा उद्योग एक सफल क्षेत्र है। 50 वर्ष पहले जहां हम विदेशी कंपनियों और ब्रांड पर निर्भर रहते थे, वहीं अब हमने एक बड़ा और जीवंत फार्मा सेक्टर तैयार किया है जहां उद्यमिता श​क्ति से भरपूर भारतीय कारोबारी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मुकाबला कर रहे हैं। आकार के मामले में हम 10 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दुनिया में तीसरे स्थान पर हैं लेकिन 42 अरब डॉलर की बिक्री के साथ हम मूल्य में 14वें स्थान पर हैं और हमारी हिस्सेदारी केवल 1.5 फीसदी है।

    फार्मा उद्योग की आकांक्षा 2030 तक अपना आकार तीन गुना करने की है। इसमें इनोवेशन का योगदान होगा। परंतु इसके लिए पूरी व्यवस्था बनानी होगी। इसकी शुरुआत शोध एवं विकास में निवेश से होनी चाहिए। अमेरिका, जापान, जर्मनी, ​स्विट्जरलैंड और ब्रिटेन में बड़ी-बड़ी फार्मास्युटिकल कंपनियां हैं। इन सभी ने शोध एवं विकास में अरबों डॉलर का निवेश किया है। ​​

    स्विट्जरलैंड की रॉश और नोवार्टिस, अमेरिका की जेऐंडजे, फाइजर, ब्रिस्टल-मायर्स, मर्क और इलाई लिली, ब्रिटेन की ऐस्ट्राजेनेका और जीएसके, जर्मनी की बेयर, बोरिंगर और मर्क डी, जापान की ताकेदा, दाइची, एस्टेल्लास, ओत्सुका और एईसाई। हमें उनकी बराबरी के लिए क्या करना चाहिए? ये कंपनियां हमारी टॉप पांच फार्मा कंपनियों के कुल टर्नओवर से अ​धिक रा​शि तो अपने शोध एवं विकास पर व्यय करती हैं। हमारी कंपनियों को कम से कम 10 वर्षों तक शोध एवं निवेश व्यय बढ़ाना होगा।

    आंतरिक शोध एवं विकास में निवेश को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। हम कंपनियों से वह करने के लिए कहने में भी हिचकिचाते हैं जो उन्हें अपनी बेहतरी के लिए खुद कहना चाहिए यानी शोध एवं विकास पर व्यय बढ़ाना। शोध एवं विकास पर व्यय करने वाली टॉप कंपनियों से यह कहा जाना चाहिए कि वे इस सेक्टर में निवेश बढ़ाएं। अगले 10 वर्षों तक शोध एवं विकास व्यय में इजाफे के मामले में आय कर पर कर छूट दी जानी चाहिए।

    हमें ऐसी नियामकीय व्यवस्था बनानी चाहिए जो कंपनियों में इनोवेशन को बढ़ावा दे। हमारी एक राउंडटेबल बैठक में वक्ताओं ने नियामकीय ढांचे में सुधार की बात कही थी। नियमन का काम ऐसे अ​धिकारियों के हवाले है जिनको औष​धि निर्माण में लगने वाले नए घटक के बारे में कोई जानकारी नहीं है।

    ऐसी ही वजहों से भारतीय औष​धि निर्माताओं को पहले चरण के परीक्षण भारत के बजाय ऑस्ट्रेलिया में करने पड़ रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया में इसकी लागत 10 गुना तक अ​धिक होती है लेकिन वहां प्रक्रिया व्यव​स्थित, पारद​र्शी और सुनि​श्चित है। अगर हम नियामकीय व्यवस्था में सुधार करें तो हमें औष​धि निर्माण में प्रतिस्पर्धी बढ़त मिल सकती है।

    हम अपने सकल घरेलू उत्पाद का करीब 0.4 फीसदी सार्वजनिक फंडिंग वाले शोध एवं विकास में खर्च करता है जो वै​श्विक औसत का 0.5 फीसदी है। परंतु इस निवेश पर हमें बहुत कम प्रतिफल मिलता है। समस्या यह नहीं है कि हम कितना व्यय करते हैं ब​ल्कि दिक्कत यह है कि हम कहां खर्च करते हैं। राष्ट्रीय शोध एवं विकास व्यय का आधा से अ​धिक हिस्सा सरकार अपनी स्वचालित प्रयोगशालाओं में व्यय करती है। सबसे अ​धिक व्यय रक्षा पर उसके बाद परमाणु ऊर्जा, CSIR और कृ​षि पर व्यय होता है। स्वास्थ्य शोध छठे स्थान पर है और शोध एवं विकास पर होने वाले सरकारी व्यय का छह फीसदी उस पर खर्च किया जाता है।

    अमेरिका में स्वास्थ्य क्षेत्र का शोध रक्षा के ठीक बाद आता है और सकार शोध विकास व्यय का 27 फीसदी हिस्सा उस पर खर्च करती है। ब्रिटेन में यह 20 फीसदी है। मजबूत आंतरिक व्यय से ही इस क्षेत्र में बात बन सकती है। सरकारी शोध एवं विकास व्यय का बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च करने से इसलिए भी लाभ होगा क्योंकि फार्मा उद्योग में गहन शोध एवं विकास होता है।

    इसके अलावा भी अवसर हैं। फार्मा उद्योग का कोई भी व्य​क्ति आपको बता देगा कि वे आसानी से कई फार्मेसी पाठ्यक्रमों के ​युवा स्नातकों को नौकरी दे सकते हैं। लेकिन उन्हें आसानी से बढि़या शोध प्रतिभाएं नहीं मिलतीं। विशेष प्रतिभाएं अक्सर अमेरिका और ब्रिटेन की प्रयोगशालाओं में चली जाती हैं। यह बात उन्हें बेहतर फंडिंग वाले विश्वविद्यालयों से जोड़ती है जो इस दिशा में ढेर सारा शोध करते हैं।

    तमाम ऐतिहासिक कारणों से हमारे अ​धिकांश सार्वजनिक शोध स्वायत्त सरकारी प्रयोगशालाओं में होता है। जबकि तमाम अन्य देश सरकारी विश्वविद्यालयो में शोध करते हैं। अगर हम उच्च ​शिक्षा में सार्वजनिक शोध पर बल दें तो हम बेहतर प्रतिभाएं तैयार कर पाएंगे।

    इनोवेशन को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर आकांक्षा होनी आवश्यक है। चीन के अनुभव से भी हम सीख सकते हैं। 15 वर्ष पहले भारतीय फार्मा उद्योग इनोवेशन में चीन से आगे था लेकिन आज हम 10 वर्ष पीछे हैं। 2012 के आसपास चीन में नियामकीय बदलाव करके चिकित्सकीय परीक्षणों को आसान बना दिया गया, वि​भिन्न स्थानीय सरकारों के बीच की प्रतिद्वंद्विता ने कंपनियों को अपने शहर में शोध विकास बढ़ाने को प्रेरित किया।

    वहां प्रतिभा खोज कार्यक्रम में हजारों प्रतिभाशाली युवाओं का चयन किया गया और चीन के बाजार और निर्यातोन्मुखी उद्योग ने पूरा परिदृश्य बदल दिया। इसके इर्दगिर्द फलता-फूलता वेंचर कैपिटल उद्योग तैयार हुआ। गत वर्ष इस उद्योग ने चीन में इस क्षेत्र के स्टार्टअप में 15 अरब डॉलर का निवेश किया। भारत में इसकी तुलना में बहुत कम प्रगति हुई। आगे की राह एक व्यापक राष्ट्रीय उद्देश्य से निकलेगी जिसके तहत भारत के फार्मा उद्योग को इनोवेशन में अग्रणी बनाने का प्रयास होना चाहिए।

    नियामकीय ढांचे में बदलाव लाकर चिकित्सकीय परीक्षणों का मार्ग सहज किया जा सकता है और स्वास्थ्य से जुड़े शोध के क्षेत्र में सरकारी निवेश बढ़ाने से भी हालात में सुधार होगा। आज से 10 वर्ष बाद हमारे फार्मा उद्योग का बदला हुआ इनोवेशन भारतीय उद्योग को दिशा दिखा सकता है।

    (नौशाद फोर्ब्स, फोर्ब्स मार्शल के को-चेयरमैन और सतीश रेड्डी, रेड्डीज लैबोरेटरीज के चेयरमैन हैं) बिजिनेस स्टैंडर्ड हिंदी से साभार

  • बीना रिफायनरी से ज्यादा धंधा कर रही रिलायंस

    बीना रिफायनरी से ज्यादा धंधा कर रही रिलायंस

    भोपाल,26 मई(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। भारत की सरकारी तेल रिफायनरियां नियमों से बंधे होने की वजह से बाजार की रपटीली राहों पर फिसड्डी साबित हो रहीं हैं।इसकी तुलना में निजी रिफायनरीज ज्यादा अच्छा धंधा कर रहीं हैं। मसलन भारत पेट्रोलियम या इंडियन ऑइल, कच्चे तेल से बने उत्पाद – माने पेट्रोल-डीज़ल निर्यात नहीं कर सकते. वहीं, निजी रिफाइनरीज़ पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है. उन्हें बस 65 हज़ार पेट्रोल पंप्स में से 10 हज़ार में तेल की सप्लाई देने की बाध्यता है. उसके बाद वो चाहे जहां तेल बेच सकती हैं. रूस-यूक्रेन जंग से पहले, रिलायंस और नायरा जैसी निजी रिफाइनरियों को इंटरनैशनल मार्केट से कच्चा तेल ख़रीदना पड़ता था, जो कि रूसी तेल की तुलना में काफी महंगा था. अब ये दोनों रिफाइनरियां रियायती दरों पर रूस से तेल आयात करती हैं. और विदेश में माल बेचकर भयानक मुनाफ़ा कमाती हैं.

    नायरा गुजरात में स्थित है, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से कंपनी का स्वामित्व, प्रमुख रूसी तेल कंपनी रॉसनेफ्ट के पास है. रॉसनेफ्ट ने 2017 में रुइया समूह से एस्सार रिफाइनरी को क़रीब 105 करोड़ रुपए में ख़रीद लिया था. विशेषज्ञ इस बात को भी रेखांकित करते हैं कि रिलायंस का पहले से ही रूसी कंपनियों से अच्छा संपर्क है.

    बीना रिफायनरीज के एक प्रमुख सूत्र ने बताया कि भारत सरकार रूस पर लगे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों की वजह से न तो उसका तेल खरीद की अनुमति दे सकती है न ही वह खुद रशिया से कोई कारोबार कर सकती है। जबकि निजी कंपनियों के सामने ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। भारत की निजी कंपनियों ने जिस तरह विदेशी परिवहन के क्षेत्र में अपने कदम बढ़ाए हैं उससे भारतीय कंपनियों का विदेशी कारोबार तेजी से बढ़ा है। यही वजह है कि चाहे रिलायंस हो या नायरा दोनों के कारोबार में भारत सरकार कोई दखल नहीं दे सकती है। यही नहीं उसे इन कंंपनियों के कारोबार को सफल बनाने के लिए सुरक्षा के प्रबंध भी करने हैं। यही वजह है कि मुक्त बाजार की अर्थव्यवस्था का ये मसला आज वैश्विक प्रतिबंधों पर भारी पड़ रहा है।

  • समृद्धि में सहायक हैं संग्रहालय बोले मनोज श्रीवास्तव

    समृद्धि में सहायक हैं संग्रहालय बोले मनोज श्रीवास्तव

    भोपाल,20 मई,(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर) मानव मन अपने गौरव के बिंदुओं का स्मरण करके खुद को मजबूत बनाता है। यही वजह है कि हमारी प्रेरणा के भावों से जुड़े संग्रहालय अर्थव्यवस्था को बूस्ट देने वाले इंजन बन जाते हैं। उज्जैन में महाकाल लोक,काशी में बाबा विश्वनाथ परिसर, गुजरात में सरदार वल्लभ भाई पटेल की विशाल प्रतिमा( स्टेच्यू आफ यूनिटी) आज सरकार के लिए रिकार्डतोड़ कमाई का साधन बन रहे हैं। भारत के संविधान ने संसद में पारित विषयों पर बने संग्रहालयों को आयकर में छूट दी है।इस नामुराद शर्त को हटाना होगा तभी देश की विरासत को संजोया जा सकता है। राजधानी में कवि दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय में आयोजित कमलेश्वर व्याख्यान माला के अंतर्गत- संग्रहालय, समाज और मीडिया- विषय पर आयोजित व्याख्यान में पूर्व संस्कृति सचिव मनोज श्रीवास्तव ने ये विचार व्यक्त किए । संस्कृति विभाग के सहयोग से आयोजित इस आयोजन की अध्यक्षता  प्रसिद्ध संस्कृति कर्मी वसंत निर्गुणे ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में पुरातत्व वेत्ता डॉ.मनोज कुमार  कुर्मी ने भी अपने विचार व्यक्त किए। संग्रहालय के अध्यक्ष श्री वामनकर ने विषय का प्रवर्तन किया और संचालन श्री घनश्याम मैथिल अमृत ने किया। संग्रहालय की सचिव सुश्री करुणा राजुरकर ने सभी आगंतुकों और सहयोगियों के प्रति अपना आभार प्रदर्शित किया।

    मुख्य अतिथि के रूप में अपने संबोधन में श्री मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि भोपाल ऐसा महानगर है  जहां 21 से ज्यादा संग्रहालय मौजूद हैं। ये दर्शाता है कि भोपाल की सांस्कृतिक विरासत कितनी समृद्ध है। आमतौर पर हमारे सामाजिक परिवेश में अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोने का भाव देखने नहीं मिलता है। इसके बावजूद किसी एक साहित्यकार की स्मृतियां संजोने के लिए एक व्यक्ति ने दीवानगी की हद तक काम किया हो ऐसा देखने नहीं मिलता है। स्वर्गीय राजुरकर राज मेरे सहपाठी रहे हैं और उन्होंने कवि दुष्यंत कुमार के संग्रहालय को समाज में विशिष्ट पहचान दिलाई है। ये  काम हमारे विश्वविद्यालय ,कालेज या कई अन्य संस्थान भी कर सकते हैं। वे यदि किसी एक व्यक्तिव के कृतित्व को संग्रहालय के रूप में संरक्षित करना शुरु कर दें तो हम अपनी विरासत से जुडा समाज बना सकते हैं।

    विश्व के कई विश्वविदयालय और संस्थानों की ओर से चलाए जा रहे संग्रहालय पूरी दुनिया के ऊर्जावान लोगों की प्रेरणा के स्रोत बने हुए हैं। मिसिसिपी विश्वविद्यालय ने नोबेल और पुलित्जर पुरस्कार विजेता लेखक विलियम फॉकनर, का संग्रहालय बनाया है। राष्ट्रकवि रवीन्द्र नाथ टैगोर की स्मृति में बना म्यूजियम पूरे भारत तो क्या विश्व के लोगों के आकर्षण का केन्द्र है। ग्लास्गो विश्वविद्यालय का मार्गन संग्रहालय अपनी विविधताओं के साथ दुनिया में अनूठा है।

    उन्होंने कहा कि हमारे देश में साहित्यिक संग्रहालय न तो किसी धनपति ने बनाए न किसी संस्थान ने और सरकार ने तो कभी इस ओर गंभीरता से विचार भी नहीं किया। जो काम संस्थानों या सरकार को करना था वो अकेले राजुरकर ने कर दिखाया। जिसके पास संसाधन नहीं थे केवल समर्पण था। संग्रहालयों को लेकर हमारे स्कूल कालेजों में कोई पाठ्यक्रम भी नहीं पढ़ाया जाता है। प्रदेश में गिने चुने स्कूल कालेज हैं जो अपने विद्यार्थियों के लिए संग्रहालयों के आऊटरीच कार्यक्रम करवाते हैं। कई देशों में ये पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं। जहां बच्चों को अपनी विरासत का संग्रह करना सिखाया जाता है। संग्रहालय में अनुसंधान होते हैं। डाक्यूमेंटेशन सिखाया जाता है। हमारे यहां तो संग्रहालय के शैक्षणिक नजरिए को भी नजरंदाज किया गया है।ऐसे में दुष्यंत संग्रहालय एक जीवंत प्रयोगशाला बन गया है।

    उन्होंने कहा कि श्री राजुरकर की बेटी विशाखा ने मुझसे पूछा कि भारत में कितने संग्रहालय सफलता पूर्वक चलाए जा रहे हैं। मैंने उसे बताया कि एक फैजावाद में सरोजिनी नायडू का है। इसी तरह कोट्टायम में रमन पिल्लई के कार्यों को संग्रहित किया गया है। हमारे यहां साहित्यकारों की स्थिति न तो जीवनकाल में अच्छी है न मरने के बाद उनके काम को सराहा जाता है। गीतकार साहिल लुधियानवी ने तो सार्वजनिक तौर पर कई बार इस पर दुख व्यक्त किया था।

    ऐसा समाज जहां कोई संग्रहालय नहीं बनाता वहां दुष्यंत संग्रहालय अपने आप में अनूठा है। क्या होशंगाबाद में भवानी प्रसाद मिश्र या बाबई में माखनलाल चतुर्वेदी,उज्जैन में श्रोत्रिय जी का संग्रहालय नहीं बनाया जाना चाहिए। नरेश मेहता से गजानंद माधव मुक्तिबोध जैसे साहित्यकार हमारे यहां हुए हैं उनके भी संग्रहालय नहीं है। राजुरकर राज का काम उल्लेखनीय तो है पर अभी वैसा नहीं है जैसा होना चाहिेए। ये साहित्यकारों का मंच तो बन गया है लेकिन अभी संग्रहालय नहीं बन पाया है। यहां दुष्यंत जी के जीवन वृत्त से संबंधित सारी चीजें होनी चाहिए। उनकी व्यक्तिगत उपयोग की वस्तुएं भी रखी जानी चाहिए। दुष्यंत जी की पुस्तकों और पांडुलिपियों का सेट बल्कि उन पर लिखी पुस्तकें और शोध भी रखे जाने चाहिए। उनकी रचना प्रक्रिया की कुछ व्यावहारिकताएं और वास्तविकताएं थीं उनका सूचनात्मक प्रस्तुतिकरण होना चाहिए। यह दूसरा भाग राजुरकर जी की बेटी विशाखा को पूरा करना है।

    उन्होंने कहा कि हमारे यहां संग्रहालय की संस्कृति नहीं है। आईसलेंड में तो नाव का संग्रहालय बना हुआ है। जिस नाव से दक्षिण अमेरिका से चलकर लोग आईसलेंड पहुंचे थे। उस नाव को संरक्षित किया गया है। वहां लोग जाते हैं और वहां की संस्कृति को आत्मसात करते हैं।

    कई शहरों में सिटी म्युजियम की परंपरा है । हर नगर का एक इतिहास है। रमेश शर्मा जी किताब लिख रहे हैं जो भारत के वैदिक इतिहास को बताएगी। उन सब चीजों को लेकर हमारी क्या तैयारी है। किस काल में जनजीवन कैसा था। किचिन कैसे थे घर कैसे थे। ये भी दर्शाया जाता है। विश्व के विकसित समाज अपनी उपलब्धियों का ही म्यूजियम नहीं बनाते वे अपनी लज्जा का भी म्यूजियम बनाते हैं। लिवरपूल में दास प्रथा का म्यूजियम बना है। जिसमें दासों के व्यापार को दर्शाया गया है। शेख्सपीयर का म्यूजियम सरकार की ओर से नहीं चलाया जाता। उसे मिला दान आयकर में छूट दिलाता है। यदि आप दान देंगे तो कर में छूट मिलेगी। मास्को में पुश्किन का म्यूजियम है उसे भी एक संस्थान चलाता है ।पुश्किन सरकार के समर्थक साहित्यकार माने जाते हैं लेकिन उनका संग्रहालय सरकार नहीं चलाती।  ये संग्रहालय कई पार्टनर, और सदस्य मिलकर चलाते हैं। मध्यप्रदेश में कालिदास संग्रहालय है। भोपाल के कुछ संग्रहालयों में स्टेट म्यूजियम, आदिवासी संग्रहालय, ओरछा में राम राजा म्यूजियम इस तरह के अच्छे प्रयास हैं। हमने वाणिज्यकर विभाग में रहते हुए डाक टिकिट का म्यूजियम बनाया था। हमें अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सहेजकर रखना आना चाहिए।

    हमारे देश में भारतीय पुरातत्व संग्रहालय विभाग ने लगभग 3800 स्थानों को संरक्षित किया है। जबकि ब्रिटेन छोटा सा देश है वहां बीस  हजार राष्ट्रीय संग्रहालय हैं। फ्रांस में चवालीस हजार संग्रहालय हैं। हमारे संविधान में संग्रहालय बनाने के लिए जो प्रावधान किए गए हैं उनमें इसे बनाना राज्य का कर्तव्य बताया गया है। लेकिन केवल उन्हीं संग्रहालयों को अनुमति दी जाती है जो संसद की निगाह में राष्ट्रीय महत्व के होते हैं हमारे देश के संविधान को ऐतिहासिक कहा जाता है पर उसमें राष्ट्रीय महत्व की शर्त रख दी गई है। जबकि दुनिया भर के सारे देशों में इनकी अनुमति देना राज्य का कर्तव्य होता है।इसमें संसद की घोषणा की क्या आवश्यकता है। कभी किसी ने ये कानून लिखा होगा पर हमने उस संस्कृति की बाधा को दूर नहीं किया।जब इस विषय पर चिंतन होगा तभी हमारे समाज में और मीडिया में कोई चेतना आएगी। मीडिया ही बहुत सारी चीजों को चलाता है। यदि मीडिया में डिबेट शुरु नहीं होगी तो हमारी संवेदना इन बातों को प्रस्तुत नहीं कर पाएगी।  

  • छोटे उद्यमों से दूर होगी देश की बेरोजगारी

    छोटे उद्यमों से दूर होगी देश की बेरोजगारी


    समावेशी विकास के लिए एमएसएमई ही सबसे बेहतर विकल्प है। उसमें आ रही समस्याओं को नजरअंदाज नहीं कर सकते।डॉ. अरुणा शर्मा,प्रैक्टिशनर डेवलपमेंट इकोनॉमिस्ट और इस्पात मंत्रालय की पूर्व सचिव

    मध्यप्रदेश और भारत में अपने फौलादी इरादों से बदलाव की इबारत लिखने वाली देश की प्रख्यात आईएएस अरुणा शर्मा आर्थिक मुद्दों पर देश का मार्गदर्शन कर रहीं हैं। उन्होंने पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने में भारत के आर्थिक सुधारों पर गहरा अध्ययन किया है। उनका कहना है कि भारत के कुल एमएसएमई में से 50% ग्रामीण क्षेत्र में संचालित होते हैं और वे कुल रोजगारों में 45% का योगदान देते हैं। एमएसएमई मंत्रालय के डाटा के अनुसार इस सेक्टर के कुल रोजगार का 97% हिस्सा माइक्रो सेगमेंट से प्राप्त होता है। एमएसएमई पर फोकस करने से देश की ग्रोथ बढ़ेगी।
    भारत की आबादी 1.4 अरब है, जिसमें से 65% आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी की 1 मार्च 2023 की रिपोर्ट के अनुसार 7.45% युवा ऐसे हैं, जिन्हें नौकरियां नहीं मिल रही हैं। इस कारण भारत की 3.7 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी की ग्रोथ समावेशी नहीं रह जाती है। हमारे सामने चुनौती है कि न केवल इस ग्रोथ स्टोरी को जारी रखें, बल्कि साथ ही रोजगार के अवसर भी पैदा करें। यह एमएसएमई यानी छोटे और मंझोले उद्योगों द्वारा ही किया जा सकता है। भारत में रोजगारों का जो परिदृश्य है, उसमें आज भी कृषि क्षेत्र द्वारा सबसे ज्यादा 42% रोजगार सृजित किए जाते हैं, सेवा क्षेत्र का योगदान 32% और उद्योग क्षेत्र का 25% का है। लेकिन केवल कृषि और सेवा से दीर्घकालीन और गुणवत्तापूर्ण रोजगार नहीं मिल सकते, इसके लिए उद्योग पर फोकस जरूरी है।
    बड़ी संख्या में एमएसएमई के बंद होने की समस्या : उद्यम पोर्टल में रजिस्टर्ड एमएसएमई की बात करें तो मौजूदा वित्त वर्ष में यह 18.04 लाख पंजीयनों तक पहुंच गई है, जबकि विगत वित्त वर्ष में कोई 10 हजार एमएसएमई बंद हुए हैं। मौजूदा वित्त वर्ष में बंद होने वाली एमएसएमई की संख्या 2016 से 2022 के दौरान बंद हुए एमएसएमई की कुल संख्या से भी अधिक है। सरकार द्वारा अनेक कदम उठाए जाने के बावजूद महामारी के उपरांत एमएसएमई को चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। कुल पंजीयनों में से 0.59% यानी 30,997 ने रजिस्ट्रेशन रद्द करवा दिए, 67% ने अनियतकालीन रूप से अपने उद्यम को बंद कर दिया और एसआईडीबीआई के एक सर्वेक्षण के मुताबिक 50 हजार से ज्यादा ने नौकरियां गंवाईं। जो सेक्टर देश में युवाओं को रोजगार देने में सबसे ज्यादा सक्षम है, वही ऐसी समस्याओं से जूझ रहा है, जिनका सामना नहीं किया गया है।
    ऑटो मोड में एनपीए घोषित करने की समस्या : बड़ी कम्पनियों को कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती का लाभ मिल जाता है, लेकिन एमएसएमई को करों में छूट नहीं दी जाती। महामारी के दौरान और उसके बाद कार्यशील पूंजी बड़ी समस्या बन गई थी और एक छोटे प्रतिशत को यह प्रदान की गई थी, लेकिन मौजूदा पूंजी/कार्यशील पूंजी ऋण और इस नए अतिरिक्त कर्ज की प्रणाली को सुधारने के बजाय एमएसएमई पर पुराने और नए कर्जों की किश्तों के भुगतान का बोझ लाद दिया गया। समस्या तब और बढ़ गई, जब रिटेलरों, सेलरों, ट्रेडरों आदि के 90 दिनों के अनपेड लोड को डिफॉल्टर्स घोषित करने के बजाय ऑटो मोड में एनपीए घोषित कर दिया गया।
    जीएसटी से सम्बंधित समस्याएं : जीएसटी के पांच वर्ष पूर्ण होने पर गुड्स एंड सर्विसेस टैक्स नेटवर्क की वित्त वर्ष 2021-22 की एक रिपोर्ट के मुताबिक जीएसटी के लिए रजिस्टर की गई कुल कम्पनियां 1.45 करोड़ हैं, जिनमें से 78% राजस्व संग्रह निजी और सार्वजनिक कम्पनियों, न्यासों, विदेशी और अन्य शासकीय संस्थाओं से प्राप्त होता है, जबकि स्वामित्व वाली फर्मों से प्राप्त होने वाला जीएसटी राजस्व संग्रह 13.28% और साझेदारी फर्मों से प्राप्त होने वाला जीएसटी राजस्व संग्रह 7.29% है। वहीं 69.80% कुल कर-संग्रह मंझोले और बड़े उद्योगों से प्राप्त होता है, 16.67% छोटे उद्योगों से और केवल 13.53% जीएसटी माइक्रो एंटरप्राइजेस से प्राप्त होता है। ऐसे में यह सुझाव दिया गया है कि माइक्रो और छोटी इकाइयों के लिए जीएसटी दरों में राहत दी जाए।
    डिजिटल भुगतान को हतोत्साहित करना : डिजिटल भुगतान की ओर शिफ्ट सुरक्षा कारणों से हुआ है, लेकिन आरटीजीएस और एनआईएफटी पर सेवा शुल्क लेकर इसे हतोत्साहित किया जा रहा है। एनपीसीआई का कहना है कि यूपीआई नि:शुल्क है, तब तो यही सिद्धांत किसी भी तरह के डिजिटल भुगतान पर लागू होना चाहिए, फिर वह आईएमपीएस हो, आरटीजीएस या एनआईएफटी हो। वैसे भी ये मुद्रा की छपाई में आरबीआई का लगने वाला पैसा बचा रहे हैं और नगदी के आदान-प्रदान में बैंकों का होने वाला व्यय भी कम कर रहे हैं। देश में समावेशी विकास को बढ़ावा देने के लिए एमएसएमई ही सबसे बेहतर विकल्प है। उसमें आ रही समस्याओं को नजरअंदाज करने से विकास एकतरफा होकर रह जाएगा। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

  • एमपी के उद्योगों में रुपया लगाकर धन उलीचने की होड़

    एमपी के उद्योगों में रुपया लगाकर धन उलीचने की होड़


    भोपाल, 09 जनवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।सभी प्रकार के उद्योगों को फलने फूलने लायक माहौल बनाए जाने के बाद से देश विदेश के निवेशकों का रुझान मध्यप्रदेश की ओर तेजी से बढ़ता जा रहा है। यहां कोई भी कारोबार शुरु करना हो तो सरकारी अनुमतियों से लेकर उद्योग चलाने लायक सभी सुविधाएं एवं कच्चा माल आसानी से उपलब्ध हो जाता है। यही वजह है कि आज एमपी में औद्योगिक निवेश करके मुनाफा कमाने के लिए मध्यप्रदेश पूरे देश में अव्वल राज्य बन गया है।
    भारत के बीचों बीच हृदय स्थान पर यह राज्य क्षेत्रफल की दृष्टि से दूसरा सबसे बड़ा प्रदेश है ।शांतिपूर्ण माहौल की वजह से आज ये विकास के पथ- पर तेजी से बढ़ रहा है। राज्य प्राकृतिक संसाधनों और खनिजों से संपन्न है। राज्य में 95 से अधिक औद्योगिक क्षेत्र, 7 स्मार्ट सिटी और बेहतरीन यातायात व्यवस्था है।
    राज्य में खेती एवं प्रोसेसिंग क्षेत्र में तेजी से विकास हो रहा है, जिससे औद्योगिक निवेश के लिए माहौल बन रहा है। इसके साथ ही फार्मास्यूटिकल ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग, टेक्सटाईल, लॉजिस्टिक, आईटी, अक्षय ऊर्जा, पर्यटन, शहरी विकास ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ निवेश की अपार संभावनाएँ हैं।
    कुशल मानव संसाधन और उचित मूल्य पर भूमि की उपलब्धता, राज्य में औद्योगिक वातावरण को तैयार करती है। सरकार की नीति और प्रशासन का सहयोग इस दिशा में मददगार साबित हो रहा है। मध्य प्रदेश में निवेशकों को आकर्षित करने के लिए वह सभी कुछ है, जो निवेश के लिए आवश्यक है।
    देश के केंद्र में स्थित होने के कारण मध्यप्रदेश की सीमा देश के 5 राज्यों से लगती है और यह देश की तकरीबन 50 प्रतिशत आबादी को प्रवेश देता है। यह देश के किसी भी उपभोक्ता बाजार से अधिकतम 15 घंटे की दूरी पर स्थित है। भोपाल, इन्दौर, ग्वालियर, जबलपुर, खजुराहो में कुल 5 व्यावसायिक हवाई अड्डे हैं। 20 से अधिक रेल जंक्शन और राज्य में 550 से अधिक ट्रेनें संचालित होती है। मालनपुर, मंडीदीप, पवारखेड़ा, रतलाम, तिही, धन्नद में 6 इनलैंड कंटेनर डिपो हैं।
    मध्यप्रदेश देश के कई बड़े प्रोजेक्टस से जुड़ा हुआ है। दिल्ली-मुम्बई औद्योगिक कॉरिडोर के तहत मध्य प्रदेश के हिस्से में औद्योगिक क्षेत्र विक्रम उद्योगपुरी, उज्जैन आया है। नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर के लिए साथ विकसित दिल्ली- नागपुर कॉरिडोर से आर्थिक गतिविधियों में आश्चर्यजनक रूप से उछाल आएगा। ग्वालियर से होकर जाने वाले ईस्ट-वेस्ट कॉरिडोर (एन.एच.27) को उत्तर भारत में प्रवेश करने के लिए मध्यप्रदेश का गेटवे कहा जाता है। दिल्ली-मुम्बई ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे के प्रदेश से गुजरने के कारण प्रदेश की कनेक्टिविटी बढ़ गई है और औद्योगिक क्षेत्र में विकास हुआ है। रतलाम- दिल्ली-मुम्बई ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे का केंद्र है।
    मध्य प्रदेश सरकार ने कुछ महत्वपूर्ण सेक्टर्स का चुनाव किया है, जो सरकार की 550 बिलियन अमरीकी डॉलर अर्थ-व्यवस्था की सोच को साकार करने में सहयोग करेंगे।
    ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग के क्षेत्र में 10 से अधिक उपकरण निर्माता और 200 से अधिक ऑटो कंपोनेंट निर्माता प्रदेश में कार्यरत हैं। इन्दौर और भोपाल में भारत के अग्रणी ऑटो क्लस्टर्स हैं। पीथमपुर में 4500 हेक्टेयर में विकसित औद्योगिक क्लस्टर 25 हजार से अधिक लोगों को रोजगार दे रहा है। इंदौर में एशिया का सबसे लंबे और तेज गति के टेस्टिंग ट्रेक नेट्रेक्स की स्थापना की गई है।
    मध्यप्रदेश को भारत का फूड बास्केट कहा जाता है। यहाँ 45 लाख हेक्टेयर से अधिक कृषि योग्य भूमि है, जो 10 प्रमुख नदियों से जुड़ी है। इस वजह से जिसके कारण राज्य में उत्तम सिंचाई व्यवस्था है। प्रदेश उद्यनिकी फसलों, मसालों, संतरा, अदरक, लहसुन आदि के उत्पादन में अग्रणी है। मध्यप्रदेश दलहन, तिलहन एवं डेयरी उत्पाद में भी अग्रणी है। राज्य में 8 सरकारी फूड पार्क और 2 निजी मेगा फूड पार्क है। इन्दौर, ग्वालियर, जबलपुर में सरकारी कृषि कॉलेज संचालित हैं। प्रदेश को 7 बार भारत सरकार से कृषि क्षेत्र का प्रतिष्ठित “कृषि कर्मण” पुरस्कार मिलना प्रदेश की उन्नत कृषि का संकेत है।
    मध्यप्रदेश में टेक्सटाईल एवं गारमेंट सेक्टर में भी सतत् प्रगति हो रही है। राज्य 43 प्रतिशत भारतीय और 24 प्रतिशत वैश्विक जैविक रूई का उत्पादक है। यहाँ 60 से अधिक टेक्सटाईल यूनिट में 4 हजार से अधिक लूम्स और 2.5 मिलियन स्पिंडल्स संचालित हैं। राज्य के टेक्सटाईल सेक्टर में स्पिनिंग से लेकर बुनाई, गारमेंटिंग की सभी प्रक्रिया रूप से संचालित हैं। भारत सरकार की पीएलआई योजना में राज्य के टेक्सटाईल सेक्टर को 3513 करोड़ रुपए का निवेश प्राप्त हुआ है। गारमेंट यूनिट के प्लांट एवं मशीनरी में निवेश का 200 प्रतिशत तक का पॉलिसी इंसेंटिव दिया जाता है। प्रदेश में 200 से अधिक रेडीमेड गारमेंट क्लस्टर एवं इन्दौर में अपैरल डिजाइनिंग सेंटर स्थित है। एनआईएफटी, एनआईडी भोपाल और आईआईआईटीडीएम जबलपुर जैसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर के फैशन डिजाइनिंग इंस्टीट्यूट मध्यप्रदेश के टेक्सटाईल उद्योग की रीढ़ हैं।
    फार्मास्यूटिकल सेक्टर में भी राज्य तेजी से आगे बढ़ रहा है। कोरोना काल में यहाँ की दवाइयाँ विदेशों में निर्यात की गईं। इन्दौर, देवास, भोपाल, मंडीदीप, मालनपुर और पीथमपुर स्पेशल इकोनॉमिक जोन में फार्मा क्लस्टर है। यहाँ 300 फार्मा एवं मेडिकल यूनिट से 1 लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिल रहा है। विक्रम उद्योगपुरी, उज्जैन में मेडिकल डिवाइस पार्क की स्थापना की गई है। साल 2021 में राज्य से 10 हजार करोड़ रुपए से अधिक का फार्मा निर्यात किया गया। अमेरीका, ब्रिटेन, रूस, जर्मनी, ब्राजील, हॉलैंड सहित विश्व के 160 से अधिक देशों में राज्य में बनने वाली दवाइयाँ निर्यात की जा रही हैं। राज्य को एआईसीटीई से मान्यता प्राप्त 73 फार्मेसी इंस्टीट्यूट से 9 हजार से अधिक स्किल्ड प्रोफेशनल प्रतिवर्ष प्राप्त हो रहे हैं। फार्मा सेक्टर के विकास और क्षमता को देखते हुए प्रदेश में फार्मा औद्योगिक पार्क की स्थापना का प्रस्ताव भी विचाराधीन है।
    मध्यप्रदेश में लॉजिस्टिक एवं वेयरहाउसिंग के लिए आदर्श सड़कें एवं रेल कनेक्टिविटी है। देश के केंद्र में स्थित होने के कारण लॉजिस्टिक का खर्च बेहद कम है। देश की 50 प्रतिशत आबादी मध्यप्रदेश से जुड़ी हुई है। इससे विशाल उपभोक्ता बाजार पर नियंत्रण किया जा सकता है। प्रदेश में 40 एमएमटी की वेयरहाउसिंग और 13.2 एमएमटी की कोल्ड स्टोरेज क्षमता है। भारत सरकार के सहयोग से इंदौर और भोपाल में मल्टी मॉडल लॉजिस्टिक पार्क का निर्माण प्रस्तावित है। प्रदेश स्टील साइलो निर्माण के क्षेत्र में भी अग्रणी है। प्रदेश में लॉजिस्टिक एवं वेयरहाउसिंग इकाई / पार्क के लिए आकर्षक इंसेंटिव पॉलिसी है।
    मध्यप्रदेश अक्षय ऊर्जा के सृजन लिए आवश्यक प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है। राज्य की अक्षय ऊर्जा की क्षमता साल 2012 की तुलना में 11 गुना बढ़ गई है। सर्वाधिक सोलर रेडिएशन के कारण राज्य सोलर पॉवर प्लांट स्थापित करने के लिए आदर्श स्थान है। तकनीकी रूप से मजबूत अक्षय ऊर्जा पॉलिसी बनाकर अक्षय ऊर्जा उपकरण निर्माण और इनोवेशन करने वाला पहला राज्य है। अक्षय ऊर्जा का मध्य प्रदेश की ऊर्जा क्षमता में 20 प्रतिशत का योगदान है। साँची को राज्य की पहली सोलर सिटी के रूप में विकसित किया गया है। विश्व का सबसे बड़ा फ्लोटिंग सोलर पार्क (600 मेगावाट) ओंकारेश्वर में प्रस्तावित है। रीवा सोलर पॉवर प्रोजेक्ट को वर्ल्ड बैंक ग्रुप प्रेसीडेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया है।
    मध्यप्रदेश रक्षा उपकरण निर्माण के लिए आदर्श राज्य है। यहाँ रेअर अर्थ मेटल प्रोसेसिंग, अनुसंधान एवं विकास ट्रेनिंग के लिए भोपाल में रेयर अर्थ एंड टाइटेनियम थीम प्रस्तावित है। राज्य में 4 पीएसयू जबलपुर और 1-1 पीएसयू कटनी और इटारसी में है। प्रदेश में भारत की पहली निजी क्षेत्र की लघु हथियार निर्माण यूनिट स्थापित की गई है। 5 कॉमर्शियल हवाई अड्डे तथा भोपाल और इंदौर के हवाई अड्डे एमआरओ गतिविधियों के लिए उपयुक्त हैं। यहाँ इंडस्ट्री एवं सिविल हवाई सेवा के लिए 26 एयर स्ट्रिप हैं। मेगा इन्वेस्टमेंट रीजन के साथ इंदौर के समीप ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट प्रस्तावित है।
    राज्य में 150 से अधिक ईएसडीएम यूनिट और 220 से अधिक आईटी/आईटीईएस यूनिट मौजूद हैं। राज्य में 4 स्पेशल आईटी इकोनॉमिक जोन, 10 आईटी पार्क, 2 मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर मौजूद हैं। इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, जबलपुर में हर तरह की सुविधाओं से युक्त बुनियादी ढाँचा है। राज्य में आईआईटी, आईआईएम, आईआईएसईआर, आईआईटीएम जैसे 330 से अधिक तकनीकी इंस्टीट्यूट स्किल्ड प्रोफेशनल को तैयार कर रहे हैं। राज्य में जीवन जीने के लिए बेहतरीन माहौल उपलब्ध है। इन्दौर और भोपाल देश के 10 सबसे स्वच्छ शहरों में शामिल हैं। उचित दर पर 24X7 निर्बाध विद्युत आपूर्ति सुविधा है। यहाँ लो रिस्क सीस्मिक जोन के कारण डाटा सेंटर स्थापित करने के लिए आदर्श स्थिति है।
    मध्यप्रदेश की स्टार्ट अप पॉलिसी 2022 के तहत राज्य में स्टार्ट अप्स को बढ़ावा दिया जा रहा है। उत्पाद आधारित स्टार्ट अप को विशेष सहायता दी जा रही है। हर तरह के आर्थिक सहयोग और जानकारी के लिए ऑनलाइन पोर्टल बनाया गया है। राज्य में 2500 से अधिक डीपीआईआईटी द्वारा मान्यता प्राप्त स्टार्ट अप्स और 45 से अधिक इनक्यूबेटर सेंटर स्थित है। महिला उद्यमियों द्वारा 1100 से अधिक स्टार्ट अप संचालित किये जा रहे हैं। राज्य में 26 लाख से अधिक एमएसएमई इकाईयाँ हैं जिनका राज्य की जीडीपी में 25.68 प्रतिशत योगदान है।

  • टेक्सटाईल एवं गारमेण्ट में नये क्षितिज पर पहुंचा मध्यप्रदेश बोले राजवर्धन दत्तीगांव

    टेक्सटाईल एवं गारमेण्ट में नये क्षितिज पर पहुंचा मध्यप्रदेश बोले राजवर्धन दत्तीगांव

    भोपाल, 08 जनवरी(बबीता मिश्रा) टेक्सटाईल एवं गारमेण्ट सेक्टर में मध्यप्रदेश नये कीर्तिमान रच रहा है। मध्यप्रदेश की समृद्ध प्रिंटिंग कला ने इसे नये आयाम दिये हैं। मध्यप्रदेश की बाघ, नंदना एवं बाटिक प्रिन्ट विश्व प्रसिद्ध हैं। इसमें ट्रेडिशनल के साथ मार्डन एवं फैशनेबल वस्त्र बनाये जा रहे हैं। यह बात औद्योगिक नीति एवं निवेश प्रोत्साहन मंत्री श्री राजवर्धन सिंह दत्तीगांव ने 17वें प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन के पहले दिन टेक्सटाईल एवं गारमेण्ट सत्र में प्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने कहा कि महेश्वरी एवं चंदेरी मध्यप्रदेश की विश्व प्रसिद्ध साड़ियाँ हैं। प्रदेश में अनुकूल सरकारी नीति और सहायक प्रशासन के साथ कुशल संसाधनों की उपलब्धता, प्रतिस्पर्धी दरों पर प्रचुर भूमि की उपलब्धता व्यवसायों को राज्य में फलने-फूलने में मदद करेगा। सत्र में उद्यानिकी एवं खाद्य प्र-संस्करण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री भारत सिंह कुशवाह भी उपस्थित थे।

    मंत्री श्री दत्तीगांव ने कहा कि मध्यप्रदेश अद्वितीय मुद्रण तकनीकों का घर है, जिनमें ज्यादातर प्राकृतिक रंगों का उपयोग करके हाथ से ब्लॉक प्रिंटिंग, बाटिक प्रिंटिंग, बांधने और रंगाई की तकनीक शामिल हैं, जिन्हें बंधिनी के रूप में जाना जाता है। चंदेरी और महेश्वरी, रेशमी और सूती कपड़े मध्य प्रदेश की बुनाई की विशेषताएँ हैं।

    श्री दत्तीगांव ने कहा कि मध्यप्रदेश टेक्सटाईल और गारमेंट्स के क्षेत्र में देश के लिए ग्रोथ सेंटर है। कपड़ा और परिधान उद्योग दशकों से प्रदेश में महत्वपूर्ण महत्व रखता है। यह तेजी से फैलता और बढ़ता बाजार है और इसमें रोजगार की अतुलनीय संभावनाएँ हैं।

    मंत्री श्री दत्तीगांव ने बताया कि मध्यप्रदेश में जैविक कपास उत्पादन भारत का 43% और विश्व का 24% हिस्सा है। प्रदेश ने पिछले 3 वर्ष में जैविक कपास उत्पादन में 60% सीएजीआर देखा है। साठ से अधिक बड़ी कपड़ा मिलों, 4 हजार से अधिक करघों और 2.5 मिलियन स्पिंडल की उपस्थिति इस क्षेत्र में प्रदेश की ताकत को प्रदर्शित करती है। इंदौर, भोपाल, उज्जैन, धार, देवास, ग्वालियर, छिंदवाड़ा और जबलपुर प्रमुख कपड़ा हब के रूप में उभरे हैं। इंदौर में रेडीमेड गारमेण्ट उद्योग समूह में 1,200 से अधिक इकाइयाँ हैं। इंदौर एसईजेड में एक परिधान डिजाइनिंग केंद्र भी है। सरकार की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना में सबसे ज्यादा निवेश मध्यप्रदेश को मिला है।

    मंत्री श्री दत्तीगांव ने कहा कि राज्य में टेक्सटाईल और गारमेण्ट फोकस क्षेत्रों में से एक है और ये युवाओं और महिलाओं के लिए रोजगार के बड़े अवसर प्रदान करते हैं। राज्य सरकार, कपड़ा और परिधान क्षेत्र के उद्योगों के लिए पूरी तरह से अनुकूल प्रोत्साहन पैकेज लेकर आई है। उद्योगों को दी जाने वाली वित्तीय सहायता, संयंत्र और मशीनरी (पी एंड एम) में किए गए निवेश की मात्रा के समानुपाती होती है।

    ट्राइडेंट ग्रुप, रेमंड, आदित्य बिड़ला, बेस्ट कॉर्प, गोकलदास एक्सपोर्ट्स, प्रतिभा सिंटेक्स, एवीजीओएल, इंडोरामा, सागर ग्रुप, भास्कर, नाहर ग्रुप और वर्धमान ग्रुप कुछ ऐसे बड़े नाम हैं, जिन्होंने प्रदेश में निवेश किया है और अपनी इकाई स्थापित की है। राज्य सरकार की अनुकूल नीति, आसानी से उपलब्ध कुशल जनशक्ति और कम मानव-दिवस हानि की वजह से वे राज्य में बार-बार निवेश कर रहे हैं।

    अपर मुख्य सचिव कुटीर, ग्रामोद्योग, तकनीकी शिक्षा, कौशल विकास एवं रोजगार श्री मनु श्रीवास्तव ने कहा कि बहुत कम समय में ही प्रदेश ने तेजी से प्रगति की है। टेक्सटाईल एवं गारमेण्ट सेक्टर नई ऊँचाइयों को छू रहा है। सत्र में अपर मुख्य सचिव श्री अशोक वर्णवाल और प्रमुख सचिव पशुपालन एवं डेयरी विकास श्री गुलशन बामरा उपस्थित थे।

    एमएसएमई सचिव श्री पी. नरहरि ने टेक्सटाईल एवं गारमेण्ट क्षेत्र में प्रदेश की क्षमताओं एवं औद्योगिक नीति के संबंध में पॉवर प्वाइंट प्रेजेन्टेशन दिया। टेक्सटाईल एवं गारमेण्ट सेक्टर सत्र के पेनल में प्रतिभा सिन्टेक्स लि. के मैनेजिंग डायरेक्टर श्री श्रेयस्कर चौधरी, नागल गारमेण्ट इंडस्ट्रीज के मैनेजिंग डायरेक्टर श्री प्रदीप अग्रवाल, एम.पी. टेक्सटाईल मिल एसोसिएशन एवं भास्कर इंडस्ट्रीज प्रा.लि. के एमडी श्री अखिलेश राठी, आई टोकरी के को-फाउंडर श्री नितिन पमनानी और उमंग श्रीधर डिजाइन्स की फाउंडर सुश्री उमंग श्रीधर ने अपने-अपने उद्योग की विकास गाथा को साझा किया एवं मध्यप्रदेश की इन्वेस्टर्स फ्रेण्डली नीति एवं क्षमताओं को सराहा। सत्र के अंत में पेनलिस्ट ने प्रवासी भारतीयों के सवालों का जवाब दिया।

  • वनोपज संग्राहकों को शोषण से बचाएगा पेसा एक्टःराज्यपाल मंगूभाई पटेल

    वनोपज संग्राहकों को शोषण से बचाएगा पेसा एक्टःराज्यपाल मंगूभाई पटेल

    भोपाल,27 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने कहा है कि मध्यप्रदेश में लघु वनोपजों का संग्रहण एवं विक्रय दूरस्थ अंचलों में रहने वाले ग्रामीणों के लिये आजीविका का एक मुख्य साधन है। प्रदेश में लगभग 15 लाख परिवारों के 37 लाख सदस्य लघु वनोपज संग्रहण कार्य से जुड़े हैं, जिनमें 50 प्रतिशत से अधिक सदस्य जनजातीय वर्ग के हैं। इन लघु वनोपज संग्राहकों को बिचौलियों के शोषण से बचाने के लिए राज्य सरकार ने पेसा एक्ट लागू किया है। संग्रहीत लघु वनोपज का उचित लाभ दिलाने के उद्देश्य से प्रदेश में लघु वनोपज का संग्रहण एवं व्यापार अब ग्राम-सभा के माध्यम से किया जायेगा। राज्यपाल आज लाल परेड मैदान पर अंतर्राष्ट्रीय वन मेले के समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे।
    राज्यपाल श्री पटेल ने कहा कि प्रदेश में राष्ट्रीयकृत वनोपज के संग्रहण का वनवासियों एवं ग्रामीणों को उचित पारिश्रमिक दिलाने के लिये लघु वनोपज संघ कार्यशील है। संघ अपनी 1066 प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियों और 60 जिला वनोपज सहकारी यूनियनों के माध्यम से लघु वनोपज संग्रहण कार्य, रोजगार सुलभ कराने के साथ ही औषधीय और सुगंधित पौधों के प्र-संस्करण, भंडारण एवं विपणन का कार्य भी सफलता से कर रहा है। राज्यपाल ने कहा कि संघ द्वारा वनोपज विक्रय का लाभांश भी संग्राहकों को वितरित किया जा रहा है। इन गतिविधियों से जनजातीय भाइयों एवं बहनों को आत्म-निर्भर एवं सशक्त बनाने के प्रयास प्रशंसनीय हैं। उन्होंने कहा कि तेंदूपत्ता संग्रहण तथा अन्य लघु वनोपज संग्रहण कार्य में संलग्न अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति और अन्य कमजोर वर्ग के ग्रामीणों का आर्थिक सुदृढ़ीकरण हो रहा है।
    राज्यपाल श्री पटेल ने कहा कि लघु वनोपज संघ द्वारा संचालित गतिविधियों के प्रचार-प्रसार, सुदूर वनांचलों में निवासरत जनजाति की लघु वनोपजों और प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति इत्यादि को पहचान दिलाने और मंच प्रदान करने के उद्देश्य से वन मेले का आयोजन प्रशंसनीय है।
    राज्यपाल श्री पटेल ने अगले वर्ष अंतर्राष्ट्रीय वन मेले में दोगुने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये प्रयास करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जनजातीय समुदाय एवं वैद्यों के परंपरागत औषधीय ज्ञान के प्रमाणीकरण एवं औपचारिक लाइसेंस की व्यवस्था के लिये प्रयास तेजी से करने की आवश्यकता है। इसके पहले राज्यपाल ने वन मेले के स्टॉलों का अवलोकन और मेले पर केन्द्रित स्मारिका का विमोचन किया।
    वन मंत्री डॉ. कुंवर विजय शाह ने बताया कि इस वर्ष वन मेले में 2 लाख 50 हज़ार नागरिकों की उपस्थिति रही। लगभग 3 करोड़ रूपए के वनोपज उत्पादों का विक्रय हुआ। मेले में 28 करोड़ मूल्य के एमओयू साइन किये गये, जो विगत वर्ष से दो-गुने हैं। क्रेता-विक्रेता संवाद से बिचौलियों को हटाने का प्रयास किया गया ताकि वनोपज़ संग्राहक सीधे बड़े संस्थानों से जुड़े एवं उन्हें उत्पाद के बेहतर मूल्य प्राप्त हों। मंत्री डॉ. शाह ने आगामी दिवसों में किए जाने वाले कार्यों विशेषकर महुआ से च्यवनप्राश, चाकलेट आदि उत्पाद बनाये जाने की भी जानकारी दी।
    मंत्री डॉ. शाह ने कहा कि इंदौर में फरवरी-मार्च 2023 में वन मेला लगवाया जायेगा। उन्होंने भोपाल में अंतर्राष्ट्रीय वन मेले के सूत्रधार सेवानिवृत्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख श्री व्ही.आर. खरे और श्री दवे का विशेष रूप से आभार माना। अपर मुख्य सचिव वन एवं प्रशासक मप्र लघु वनोपज संघ श्री जे.एन. कंसोटिया ने लघु वनोपज संघ द्वारा आगामी दिवसों में किए जाने वाले हितग्राहीमूलक कार्यों की जानकारी दी। प्रबंध संचालक लघु वनोपज संघ श्री पुष्कर सिंह ने वन मेले की उपलब्धियों और संचालित गतिविधियों की जानकारी दी। पीसीसीएफ़-सह-वन बल प्रमुख श्री रमेश कुमार गुप्ता सहित वन विभाग एवं लघु वनोपज संघ के अधिकारी, कर्मचारी और वनोपज विक्रेता उपस्थित थे। अपर प्रबंध संचालक श्री भागवत सिंह ने आभार माना।

    वन मंत्री डॉ. कुंवर विजय शाह ने कहा है कि प्रदेश में संचालित विभिन्न जिला यूनियन, निजी संस्थाओं और वन धन केन्द्रों ने अंतर्राष्ट्रीय वन मेले में प्रशंसनीय कार्य किया है। इसके लिए वे बधाई के पात्र है। वन मंत्री लाल परेड ग्राउंड पर मेले के समापन कार्यक्रम में पुरस्कार वितरित कर रहे थे।



    वन मंत्री ने प्रदर्शनी के क्षेत्र में एम.पी.एम.एफ.पी. पार्क भोपाल को प्रथम, सामाजिक वानिकी को द्वितीय और म.प्र. मत्स्य महासंघ को तृतीय पुरस्कार स्वरूप शील्ड प्रदान की। प्रधानमंत्री वन धन योजना में पूर्व छिंदवाड़ा वन धन केन्द्र को प्रथम, पूर्व मण्डला वन धन को द्वितीय, उत्तर सिवनी वन धन केन्द्र को तृतीय एवं दक्षिण पन्ना वन धन केन्द्र और उमरिया वन धन केन्द्र को सांत्वना पुरस्कार से पुरस्कृत किया। प्रदेश में संचालित विभिन्न जिला यूनियनों में से सीहोर जिला यूनियन को प्रथम, औब्दुलागंज यूनियन को द्वितीय, पश्चिम बैतूल जिला यूनियन को तृतीय और गुना एवं छतरपुर यूनियन को सांत्वना पुरस्कार दिया गया।
    वन मंत्री डॉ. शाह ने मेले में शामिल हुई निजी संस्थाओं में से विशाल जवारिया, पचमढ़ी प्रथम, त्रिशटा टी को द्वितीय और आदिवासी आयुर्वेदिक पचमढ़ी को तृतीय पुरस्कार देकर सम्मानित किया। अन्य राज्यों की संस्थाओं में छत्तीसगढ़ राज्य (लघु वनोपज) को प्रथम, दीपू मिश्रा प्रतापगढ़ को द्वितीय, सुखदेव समत मेदनीपुर को तृतीय पुरस्कार से नवाजा गया। अंतर्राष्ट्रीय स्टॉलों की श्रेणी में नेपाल को पुरस्कृत किया गया। राज्य बाँस मिशन एवं विन्ध्य हर्बल को विशेष पुरस्कार से नवाजा गया।
    शहद संग्रहण में सामुदायिक प्रयास के लिए पश्चिम बैतूल की नांदा समिति को विशेष सम्मान, नर्मदापुरम वन मण्डल में स्थापित वन धन विकास केन्द्र को महुआ का ब्रिटेन में सफल निर्यात करने और छिन्दवाड़ा के मैनावाड़ी वन धन केन्द्र के अंतर्गत “वनभोज रसोई” को सफल सामुदायिक उपक्रम के विशेष सम्मान से नवाजा गया।
    अपर मुख्य सचिव वन श्री जे.एन. कंसोटिया, प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख श्री आर.के. गुप्ता, राज्य लघु वनोपज संघ के एम.डी. श्री पुष्कर सिंह सहित वन विभाग के अन्य अधिकारी मौजूद थे।

  • बैंकों ने दस लाख करोड़ का कर्ज बैलेंस शीट से हटाया

    बैंकों ने दस लाख करोड़ का कर्ज बैलेंस शीट से हटाया


    नईदिल्ली,05 अगस्त,(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। देश के कई व्यापारिक बैंको ने पिछले 5 वित्त वर्ष के अंदर लगभग 10 लाख करोड़ रुपये के लोन को बट्टे खाते (Loan Write Off) में डाल दिया है. वित्त राज्यमंत्री भागवत के कराड (Minister of State for Finance Bhagwat Karad) ने राज्यसभा (RajyaSabha) में लिखित प्रश्न के उत्तर में यह जानकारी दी है.
    वित्त राज्यमंत्री कराड ने बताया कि Financial Year 2021-22 में बैंको ने बट्टेखाते में डाली जाने वाली राशि पिछले वित्तवर्ष के 2,02,781 करोड़ रुपये की तुलना में घटकर 1,57,096 करोड़ रुपये रह गई. वर्ष 2019-20 में, यह राशि 2,34,170 करोड़ रुपये थी, जो वर्ष 2018-19 में 2,36,265 करोड़ रुपये के 5 साल के रिकॉर्ड स्तर से कम थी. मंत्री कराड ने कहा कि वर्ष 2017-18 के दौरान, बैंकों ने बट्टे खाते में 1,61,328 करोड़ रुपये डाली थी. कुल मिलाकर पिछले 5 वित्त वर्ष (2017-18 से 2021-22) में 9,91,640 करोड़ रुपये का बैंक ऋण बट्टे खाते में डाला गया है.
    मंत्री कराड का कहना है कि, Scheduled Commercial बैंक (SCB) और सभी भारतीय वित्तीय संस्थान रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India Financial Institutions) को बड़े लोन पर Central Repository of Information on Large Credits (CRILC) के तहत 5 करोड़ रुपये और उससे अधिक के कुल लोन लेने वाले सभी उधारकर्ताओं के बारे में जानकारी जुटाई जाती हैं.
    भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India) के अनुसार, पिछले 4 साल में लोन चुकाने में जानबूझकर चूक करने वालों की कुल संख्या 10,306 थी. सबसे अधिक संख्या वर्ष 2020-21 में 2,840 रही थी. अगले वर्ष यह संख्या 2,700 रही थी. मार्च 2019 के अंत में ऐसे चूककर्ताओं की संख्या 2,207 थी जो वर्ष 2019-20 में बढ़कर 2,469 हो गई.
    मार्च 2022 तक शीर्ष 25 चूककर्ताओं का विवरण साझा करते हुए कराड ने कहा कि गीतांजलि जेम्स लिमिटेड (Geetanjali Gems Limited) इस सूची में सबसे ऊपर है. इसके बाद एरा इंफ्रा इंजीनियरिंग (Era Infra Engineering), कॉनकास्ट स्टील एंड पावर (Concast Steel & Power), आरईआई एग्रो लिमिटेड (REI Agro Limited) और एबीजी शिपयार्ड लिमिटेड (ABG Shipyard Limited) का स्थान है. फरार हीरा कारोबारी मेहुल चोकसी (Mehul Choksi) की कंपनी गीतांजलि जेम्स पर बैंकों का 7,110 करोड़ रुपये बकाया है, जबकि एरा इंफ्रा इंजीनियरिंग पर 5,879 करोड़ रुपये और कॉनकास्ट स्टील एंड पावर लिमिटेड पर 4,107 करोड़ रुपये बकाया है.
    आरईआई एग्रो लिमिटेड (REI Agro Limited) और एबीजी शिपयार्ड (ABG Shipyard) ने बैंकों से क्रमश: 3,984 करोड़ रुपये और 3,708 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की है. इसके अलावा फ्रॉस्ट इंटरनेशनल लिमिटेड (Frost International Limited) पर 3,108 करोड़ रुपये, विनसम डायमंड्स एंड ज्वैलरी (Winsome Diamonds And Jewelery) पर 2,671 करोड़ रुपये, रोटोमैक ग्लोबल प्राइवेट लिमिटेड (Rotomac Global Private Limited) पर 2,481 करोड़ रुपये, कोस्टल प्रोजेक्ट्स लिमिटेड (Coastal Projects Limited) पर 2,311 करोड़ रुपये और कुडोस केमी (Kudos Cami) पर 2,082 करोड़ रुपये बकाया हैं.
    बैंक जब अपने ग्राहकों से कर्ज की वसूली नहीं कर पाते तो वह राशि Non Performing Assets (NPA) में चली जाती है. जिन बैंकों का NPA काफी बढ़ जाता है तो वे एनपीए की राशि को बट्टे खाते में डाल देते हैं यानी अर्थात राइट ऑफ (Right Fff) कर देते हैं. इसके बाद बैंक 4 साल पुराने फंसे कर्ज को बैलेंस सीट से हटा देती हैं. जिससे उसकी बैलेंस शीट अच्छी बनी रहे. इसे ही राइट ऑफ या बट्टे खाते में डालना कहा जाता है. बट्टे खाते में डाले जाने के बाद भी कर्ज की वसूली जारी रहती है.

  • जंगलों से समृद्ध जनजीवन

    जंगलों से समृद्ध जनजीवन

    ऋषभ जैन

    मध्यप्रदेश में सामुदायिक भागीदारी से वन प्रबंधन, संरक्षण एवं सुधार की दिशा में वन समितियों के माध्यम से शानदार काम किया गया है जो पूरे देश में अनूठा है। इन वन समितियों से जुड़े परिवार आर्थिक रूप से भी सशक्त हुए हैं।

    वन समितियों के उल्लेखनीय कामसतना की ग्राम वन समिति गोदीन ने गोंड जनजाति की महिलाओं को सॉफ्ट टॉय बनाने का प्रशिक्षण ग्रीन इंडिया मिशन में दिया है। इसी प्रकार सीधी वन मंडल की ग्राम वन समिति बम्हनमरा ने बिगड़े वन क्षेत्र में काम करना शुरू किया और अवैध कटाई, चराई, अतिक्रमण से जंगलों की सुरक्षा की। समिति को महुआ फूल, गुल्ली, अचार, जलाऊ लकड़ी मिल रही है।बालाघाट की ग्राम समिति अचानकपुर ने बाँस-रोपण क्षेत्र में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की। बाँस के दोहन से समिति को एक लाख रूपये का शुद्ध मुनाफा हुआ। वन मंडल सीधी की ग्राम वन समिति ने वन विहीन पहाड़ी में काम करना शुरू किया और अपने परिश्रम से इसे सघन सागौन वन में बदल दिया। समिति को सागौन की बल्लियों से आर्थिक लाभ भी हुआ। वन मंडल पश्चिम मंडला की ग्राम वन समिति मनेरी ने वन विहीन पहाड़ी को हरा-भरा बना दिया। इसी प्रकार अन्य समितियाँ भी अपने-अपने क्षेत्रों में सरकार के सहयोग से शानदार काम कर रही हैं।

    प्रदेश का वनक्षेत्र 94 हजार 689 वर्ग किलोमीटर है जो अन्य राज्यों की तुलना में सर्वाधिक है। यह देश के कुल वन क्षेत्र का 12.3% है। प्रदेश के 79 लाख 70 हजार हेक्टेयर वन क्षेत्र के प्रबंधन में जन-भागीदारी के लिये 15 हजार 608 गाँवों में वन समितियाँ काम कर रही हैं। पिछले एक दशक में 1552 गाँवों में वन समितियों ने 4 लाख 31 हजार हेक्टेयर वन क्षेत्र में सुधार किया है। जब पूरी दुनिया में वनों पर खतरा मंडरा रहा है, ऐसे समय इन समितियों ने वन विभाग के साथ मिलकर शानदार काम किया है।

    राज्य लघु वनोपज सहकारी संघ, वनोपज संग्रह करने वाले परिवारों को उचित मूल्य दिलाने के उद्देश्य से काम कर रहा है। संघ के नवाचारी उपायों से तेंदूपत्ता संग्राहकों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आया है। तेंदूपत्ता सीजन में 2021 कोविड-19 के कारण लॉक-डाउन के बाद भी तेंदूपत्ता संग्रहण कराकर दूरदराज के क्षेत्रों में रह रहे जनजातीय परिवारों को 415 करोड़ रूपये का पारिश्रमिक दिलाया गया और 192 करोड़ का लाभांश भी वितरित किया गया।

    पुरानी नीति में 70 फीसदी लाभांश संग्राहकों को बोनस के रूप में दिया जाता था। साथ ही 15% राशि संग्राहकों के सामाजिक एवं आर्थिक कल्याण के लिए और 15% राशि वन क्षेत्रों में लघु वन उपज देने वाली प्रजातियों के संरक्षण एवं विकास पर खर्च की जाती थी। अब “पेसा अधिनियम” की भावना के अनुसार तेंदूपत्ता के व्यापार से होने वाले लाभ का 75% संग्राहकों को, 10% राशि संग्राहकों के सामाजिक-आर्थिक कल्याण के लिए और 10% राशि वन क्षेत्रों में लघु वनोपज प्रजातियों के संरक्षण तथा 5 प्रतिशत ग्राम सभाओं को दी जाएगी।

    वन विभाग द्वारा नए संकल्प में राष्ट्रीय उद्यानों में पर्यटकों के प्रवेश से मिलने वाली राशि का 33% वन समितियों को देने का प्रावधान किया गया है । समितियों को आवंटित क्षेत्र में ईको पर्यटन का कार्य संचालित करने के लिए सशक्त किया गया है। इससे होने वाली आय वन समिति को मिलेगी। इससे स्थानीय युवाओं को आर्थिक गतिविधियाँ शुरू करने के अवसर मिलेंगे।

    वन समितियों का माइक्रो प्लान

    प्रदेश के एक तिहाई गाँव वन क्षेत्रों के अंदर या उसके आसपास बसे हैं। वहाँ के निवासियों की आजीविका वनों पर आधारित है।

    आत्म-निर्भर मध्यप्रदेश में इस साल के आखिर तक 5 हजार वन समितियों का माइक्रो प्लान तैयार करने का लक्ष्य है। इससे रोजगार के अवसर मिलेंगे। साथ ही ग्राम समुदाय अपनी आवश्यकता की वनोपज का उत्पादन कर अपने पैरों पर खड़े हो सकेंगे।

    लाभांश में वृद्धि

    वन समितियों को दिए जाने वाले लाभांश में वृद्धि की गई है। पहले जिला स्तर पर शुद्ध लाभ की राशि का 20 फीसदी मिलता था, जिसकी वजह से राशि का वितरण केवल कुछ ही जिलों में हो पाता था। अधिकांश समितियाँ लाभ से वंचित रह जाती थी। नए संकल्प के अनुसार प्रत्येक समिति को उसके क्षेत्र में से किए गए दोहन से प्राप्त राजस्व का 20 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा। पहले काष्ठ एवं बाँस का 50 करोड़ रूपए तक का लाभांश वितरण होता था। अब लगभग 160 करोड़ प्रति वर्ष हो रहा है।

    ग्राम सभाओं को सौंपा अधिकार

    वन समितियों के गठन एवं पुनर्गठन करने का अधिकार अब ग्राम सभाओं को सौंपा गया है। वन समिति की कार्यकारिणी में महिलाओं एवं कमजोर वर्गों के लोगों को शामिल करने की व्यवस्था भी की गई है। प्रदेश में अनेक प्रकार की वनोपज का उत्पादन होता है। इसमें महुआ, तेंदूपत्ता, हर्रा, बहेड़ा, आंवला और चिरौंजी प्रमुख है। पेसा कानून की भावना के अनुरूप ग्राम सभाओं को लघु वनोपजों का पूरा अधिकार सौंपा गया है।

    मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में ऐसे निर्णय लिये गये हैं, जो वन समितियों से जुड़े संग्राहक परिवारों के लिये परिवर्तनकारी साबित हुए हैं। वन समितियों को भरपूर आर्थ‍िक लाभ हुआ है। उदाहरण के लिये 32 वनोपजों का समर्थन मूल्य निर्धारित करने से करीब 17 लाख परिवारों को लाभ हुआ है। तेंदूपत्ता व्यापार के शुद्ध लाभ का 70 प्रतिशत के स्थान पर 75 प्रतिशत देने से 17 लाख परिवारों को लाभ हुआ है।

    तेंदूपत्ता संग्रहण दर में वृद्धि

    तेंदूपत्ता संग्रहण दर में लगातार वृद्धि की गई है। इसी के अनुपात में पारिश्रमिक और बोनस का भुगतान भी किया गया है। तेंदूपत्ता संग्रहण दर वर्ष 2005 में प्रति मानक बोरा ₹400 थी, जो अब बढ़कर 2500 सौ रूपये प्रति मानक बोरा हो गई है। पारिश्रमिक का भुगतान वर्ष 2005 में ₹67 करोड़ रूपये होता था, जो वर्ष 2021 में बढ़कर 415 करोड़ रूपये हो गया है। संग्राहकों के बच्चों के लिए एकलव्य शिक्षा योजना पिछले ग्यारह साल से चल रही है, जिससे अब तक 1712 बच्चों को शिक्षा के लिये 2 करोड़ एक लाख रूपये की राशि उपलब्ध कराई गई है।

  • प्रहलाद पटेल बोले दमोह के टमाटर को फूड प्रोसेसिंग नीति का लाभ मिलेगा

    प्रहलाद पटेल बोले दमोह के टमाटर को फूड प्रोसेसिंग नीति का लाभ मिलेगा

    भोपाल,18 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। देश में अगस्त 2019 से जल जीवन मिशन का कार्य प्रारंभ हुआ, लेकिन मध्य प्रदेश में इसका काम मई 2020 से प्रारंभ हुआ। मध्य प्रदेश में जल जीवन मिशन के पूर्व 14.5 प्रतिशत घरों में नल से जल प्रदाय था, जो अब बढ़कर 36.5 प्रतिशत हो चुका है।

    यह बात केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग एवं जल शक्ति राज्य मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल ने शनिवार को भोपाल में पत्रकार वार्ता में कही। उन्होंने कहा कि जल जीवन मिशन के तहत प्रदेश में 2024 तक कुल 1 करोड़ 22 लाख क्रियाशील घरेलू नल कनेक्शन उपलब्ध कराए जाने हैं। 17 दिसंबर 2021 तक प्रदेश में 44.64 लाख (36.5 प्रतिशत) परिवारों को घरेलू नल कनेक्शन उपलब्ध करा दिए गए हैं। पटेल ने कहा कि मध्य प्रदेश अकेला राज्य है, जिसमें समस्त जिला स्तरीय पेयजल परीक्षण प्रयोगशालाएं NABL प्रमाणित हैं। उन्होंने कहा कि जल जीवन मिशन के तेजी से क्रियान्वयन के लिए प्रदेश के बजट को वर्ष 2021-22 में तीन गुना (5824 करोड़ रुपये) किया गया, जिससे राज्यांश व्यय करने में मप्र (1260 करोड़ रुपये) प्रथम स्थान पर है।

    https://youtu.be/p-tKV9do7pY
    आज केन्द्रीय मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल ने दमोह की चना दाल और टमाटर की फूड प्रोसेसिंग को बढ़ावा देने की बात कही, (वीडियो आईएनएच टीवी के सौजन्य से उपलब्ध)उन्होंने प्रेस इंफार्मेशन सेंटर को आश्वासन दिया कि दमोह जिले के रंजरा में बनाई जा रही गौशाला शीघ्र ही प्रारंभ हो जाएगी ।इसके लिए उन्होंने प्रशासन को स्पष्ट निर्देश भी दिए।

    पत्रकार वार्ता में मध्यप्रदेश की पूर्व मंत्री श्रीमती अर्चना चिटनिस, डॉ.हितेश वाजपेयी, भोपाल भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष विकास वीरानी,प्रवक्ता सुश्री नेहा बग्गा समेत कई अन्य पदाधिकारी भी उपस्थित थे।

  • BitMEX ने पेश किया अब तक का सबसे फायदेमंद क्रिप्टो उत्पाद ‘EARN’

    BitMEX ने पेश किया अब तक का सबसे फायदेमंद क्रिप्टो उत्पाद ‘EARN’

    BitMEX ने पेश किया अब तक का सबसे फायदेमंद क्रिप्टो उत्पाद ‘EARN’

    BitMEX EARN शुरुआत के ग्राहकों के लिए Tether पर
    १००% तक का एपीआर ऑफर करता है

    माहे, सेशेल्स – 10दिसंबर,(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर) वैश्विक क्रिप्टोक्यूरेंसी ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म BitMEX ने आज BitMEX EARN के लॉन्च की घोषणा की। यह ब्याज देने वाला उत्पाद सभी सार्वजनिक कमाई उत्पादों के मुकाबले उच्चतम वार्षिक प्रतिशत दर (एपीआर) प्रदान करता है।
    BitMEX EARN उत्पाद, एक निर्धारित अवधि के लिए फण्ड की सदस्यता लेने वाले उपयोगकर्ताओं को १४ – १००% एपीआर के ब्याज भुगतान से पुरस्कृत करता है। इसके अलावा, BitMEX EARN बाजार में अपने प्रकार का एकमात्र उत्पाद है जो १००% बीमा फंड समर्थित है। सभी भुगतानों की गारंटी उद्योग के सबसे बड़े फंडों में से एक BitMEX बीमा कोष द्वारा दी जाती है।
    BitMEX EARN पर उपलब्ध पहली क्रिप्टोक्यूरेंसी Tether (USDT ERC-२०) है। BitMEX के ग्राहक, जो ७ दिसंबर २०२१ से पहले सदस्य्ता लेते हैं वे प्रति उपयोगकर्ता USDT १,००० तक के जमा राशि पर Tether पर १००% एपीआर तक और USDT १००,००० तक के जमा राशि पर १४% एपीआर तक कमाने के अर्ली बर्ड ऑफर का फायदा उठा सकते हैं। BitMEX EARN पर अधिक विवरण यहां पाया जा सकता है।

    अलेक्जेंडर हॉप्टनर, मुख्य कार्यकारी अधिकारी – BitMEX ने कहा, “BitMEX EARN से कोई भी आसानी से दो अंकों का रिटर्न उत्पन्न प्राप्त कर सकता है – जो TradFi उत्पादों से मिलने वाली दरों से काफी अधिक है। हमारे EARN उत्पादों का एपीआर अन्य क्रिप्टो प्लेटफॉर्म पर पेश किए जाने वाले उत्पादों, जिनकी समान उत्पादों पर हेडलाइन दरें आमतौर पर अप्राप्य शर्त आवश्यकताओं से जुड़ी होती हैं. उनसे कहीं अधिक है। हमने अपनी सदस्यता प्रक्रिया को भी सुव्यवस्थित किया है, जिससे यह एक ऐसा उत्पाद बन गया है जो, न केवल पेशेवरों के लिए, लेकिन सभी प्रकार के व्यापारियों के लिए आकर्षक बन गया है।”

    BitMEX EARN, कंपनी के महत्वाकांक्षी व्यापार परिवर्तन का हिस्सा है, जिसे इसकी ‘बियॉन्ड डेरिवेटिव्स’ रणनीति के रूप में जाना जाता है। BitMEX साल २०२० में एक कठोर उपयोगकर्ता सत्यापन और अनुपालन कार्यक्रम शुरू करने के बाद पांच नए वैश्विक व्यापार खंड (स्पॉट, ब्रोकरेज, कस्टडी, सूचना उत्पाद और अकादमी) जोड़ रहा है। जनवरी २०२१ में, बिटमेक्स ने अपने उपयोगकर्ता सत्यापन कार्यक्रम को पूरा करने की घोषणा की, जिससे बिटमेक्स सबसे बड़े क्रिप्टो डेरिवेटिव एक्सचेंजों में से एक है जिसके पास पूरी तरह से सत्यापित सक्रिय उपयोगकर्ता आधार है। BitMEX EARN नवंबर २०२१ में कंपनी द्वारा मार्जिन और स्थायी स्वैप पर निपटान के लिए USDT की शुरुआत का अनुसरण करता है।

    BitMEX EARN दिसंबर ०१, २०२१ को लॉन्च किया गया, जिसमें दिसंबर ०७, २०२१ तक (या पूरी तरह से सब्सक्राइब होने तक) पहले दो उत्पादों के लिए सब्सक्रिप्शन खुला है। सदस्यता लेने या अधिक जानने के लिए, BitMEX EARN वेबपेज पर जाएं।

    BitMEX के बारे में:
    BitMEX एक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म है जो निवेशकों को वैश्विक डिजिटल करेंसी के वित्तीय बाजारों तक पहुंच प्रदान करता है। एचडीआर ग्लोबल ट्रेडिंग लिमिटेड BitMEX के मालिक है। BitMEX के बारे में, हमारी दृष्टि के बारे में, बढ़ती टीम के बारे में और आगे की राह के बारे में अधिक जानने के लिए, कृपया हमें Twitter, Telegram, और BitMEX Blog पर फॉलो करें।

  • वाइब्रेंट गुजरात वैश्विक सम्मेलन के लिए सीएम भूपेंद्र पटेल दुबई में करेंगे प्रचार

    वाइब्रेंट गुजरात वैश्विक सम्मेलन के लिए सीएम भूपेंद्र पटेल दुबई में करेंगे प्रचार

    अहमदाबाद,8 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र पटेल (CM Bhupendra Patel) वैश्विक निवेशक शिखर सम्मेलन (Vibrant Gujarat Global Summit 2022) से पहले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) आकर्षित करने के लिए बुधवार को दुबई (Dubai expo) में प्रचार-प्रसार करेंगे. सम्मेलन गांधीनगर में जनवरी में होगा. मुख्यमंत्री कार्यालय ने एक विज्ञप्ति में कहा, ‘पटेल संयुक्त अरब अमीरात के उद्योग जगत प्रमुखों के साथ अलग-अलग बैठक करेंगे. वह दुबई में चल रहे ‘दुबई एक्सपो’ में भारत के मंडप का भी दौरा करेंगे.’

    ‘वायब्रेंट’ गुजरात वैश्विक शिखर सम्मेलन 10 से 12 जनवरी को होगा. विज्ञप्ति के अनुसार ‘वायब्रेंट’ गुजरात शिखर सम्मेलन की तैयारी के सिलसिले में मुख्यमंत्री भूपेन्द्र पटेल आठ दिसंबर को दुबई में प्रचार-प्रसार करेंगे. इस दौरान गुजरात के उद्योग राज्यमंत्री जगदीश पांचाल और अन्य वरिष्ठ सरकारी अधिकारी मुख्यमंत्री के साथ होंगे.
    वायब्रेंट गुजरात वैश्विक शिखर सम्मेलन का पीएम मोदी करेंगे उद्घाटन
    वाईब्रेंट गुजरात के नोडल अधिकारी एम थेन्नासरन का कहना है कि मुख्यमंत्री के पास एक लाख करोड के एमओयू सम्मेलन से पहले हो चुके होंगे. अब तक इस वैश्विक सम्मेलन के पहले 50 हजार करोड के निवेश प्रस्ताव मिल चुके हैं. जिनसे राज्य में 50 हजार को नौकरी मिल सकेगी. गांधीनगर में 10 से 12 जनवरी 2022 को यह निवेशक सम्मेलन आयोजित होगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते 2005 में इसकी शुरुआत की थी. यह हर दो साल में होता है. वैसे वाइब्रेंट समिट 2021 में ही होनी थी लेकिन कोरोना महामारी के चलते इसका आयोजन नहीं किया जा सका था.

    बता दें कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 10 जनवरी को सम्मेलन का उद्घाटन करेंगे. इसी के ही साथ बीते 18 सालों में इस समिट के दौरान कई एमओयू हुए हैं. जिसमें से 64.35 प्रतिशत प्रोजेक्ट को क्रियान्वित भी किया जा चुका है. सिर्फ 6.26 प्रतिशत प्रोजेक्ट ही क्रियान्वयन के चरण में हैं.

    18 राज्य चले गुजरात की राह पर
    वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट को अब देश के अधिकांश राज्यों ने अपना लिया है. गुजरात में इस तरह के सम्मेलन शुरू करने के बाद देश के करीब 18 राज्यों ने अब तक यह अपने-अपने यहां निवेश के लिए इस तरह के सम्मलेन का आयोजन आरंभ किया है. इन राज्यों में मध्य प्रदेश, कर्नाटक, बंगाल, तमिलनाडु, राजस्थान, तेलंगाना, ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और आंध्र प्रदेश, सहित कई राज्य शामिल हैं.

  • विदेशी फंडिंग से धर्मांतरण कराने वाले NGO और PFI जैसे संगठनों की जांच होगी बोले गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा

    विदेशी फंडिंग से धर्मांतरण कराने वाले NGO और PFI जैसे संगठनों की जांच होगी बोले गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा

    विदेशी फंडिंग का गलत उपयोग कर धर्मांतरण कराने वाले NGO और PFI जैसे संगठनों की भूमिका की पूरी जांच की जा रही है, जांच में दोषी पाए जाने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी- ग्रह मंत्री नरोत्तम मिश्रा

    (मध्य प्रदेश में 8 छात्रों के धर्मांतरण का आरोप लगा विदिशा के मिशनरी स्कूल में तोड़फोड़, दक्षिणपंथी हिंदू संगठन पर आरोप लगाया था और केस दर्ज हुआ हैं*

    भोपाल,7 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, हिंदू जागरण मंच व अन्य संगठनों ने स्कूल प्रबंधन पर आठ छात्रों का ईसाई धर्म में परिवर्तन करने का आरोप लगाया है. इन संगठनों ने स्कूल और चर्च पर विदेशों से पैसे लेने, छात्रों को तिलक नहीं लगाने और कलावा नहीं बांधने के लिए मजबूर करने का भी आरोप लगाया है

    मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के विदिशा जिले के एक मिशनरी स्कूल (Vidisha missionary school vandalized) में दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों (Right wing Hindu organization) के कार्यकर्ताओं के तोड़फोड़ करने के मामले में ग्रह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बयां दिया है कि विदेशी फंडिंग का गलत उपयोग कर धर्मांतरण कराने वाले NGO और PFI जैसे संगठनों की भूमिका की पूरी जांच की जा रही है और जांच में दोषी पाए जाने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी |

    क्या है पूरा मामला
    दक्षिणपंथी संगठनों का आरोप है कि स्कूल में 8 छात्रों का धर्मांतरण कराया गया था जबकि स्कूल प्रशासन ने इस तरह के आरोपों से इनकार कदिया है. इलाके के पुलिस अधिकारी (SDOP) भारत भूषण शर्मा के मुताबिक फिलहाल अज्ञात लोगों के खिलाफ दंगा फैलाने और तोड़फोड़ करने के मामले से जुड़ी धाराओं में केस दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है.

    भारत भूषण शर्मा ने बताया कि विदिशा जिला मुख्यालय से करीब 48 किलोमीटर दूर गंजबासौदा में सेंट जोसेफ स्कूल के परिसर में ये तोड़फोड़ की गई है.आरोपियों की पहचान की जा रही है और उनके खिलाफ कानून के अनुसार उचित कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने बताया कि इस घटना में स्कूल की संपत्ति को काफी नुकसान हुआ है. मौके पर मौजूद लोगों के मुताबिक हंगामा करने वाले लोगों ने स्कूल पर पथराव भी किया था.

    उधर विश्व हिन्दू परिषद के पदाधिकारी नीकेश अग्रवाल ने बताया कि उन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन किया और प्रशासन को ज्ञापन भी सौंपा है. अग्रवाल ने कहा, ”हमारा कथित हंगामे से कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि स्थानीय प्रशासन को सूचित करने के बाद हमारा विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण था. इस धर्मांतरण के खिलाफ पिछले एक सप्ताह से कई संगठन विरोध कर रहे हैं और इसकी जांच की मांग कर रहे हैं. दूसरे राज्यों से लाए गए गरीब छात्रों का कथित तौर पर धर्मांतरण किया जा रहा है.’

    प्रशासन को सौंपे गए ज्ञापन में विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, हिंदू जागरण मंच व अन्य संगठनों ने स्कूल प्रबंधन पर आठ छात्रों का ईसाई धर्म में परिवर्तन करने का आरोप लगाया है. इस ज्ञापन में इन संगठनों ने स्कूल और उसके चर्च पर विदेशों से पैसे लेने, छात्रों को तिलक नहीं लगाने और कलावा (कलाई में हिंदुओं द्वारा पहना जाने वाला पवित्र धागा) नहीं बांधने के लिए मजबूर करने का भी आरोप लगाया है. इसके अलावा, यह भी आरोप लगाया गया कि छात्रों को ईसाई धर्म की प्रार्थना करने के लिए मजबूर किया जा रहा है.

    स्कूल ने आरोपों से किया इनकार
    रविवार को जिलाधिकारी को लिखे पत्र में सेंट जोसेफ चर्च और स्कूल प्रशासन ने धर्मांतरण के सभी आरोपों से इंकार किया है. चर्च ने कहा है कि 30 अक्टूबर को आठ ईसाई बच्चों का ईसाई धर्म रीति से संस्कार किया गया था ये हिंदू धर्म में ‘जनेऊ संस्कार’ की तरह ही होता है. चर्च ने इस मामले की जांच करने का भी आग्रह किया ताकि सच्चाई का पता चल सके. पत्र में चर्च ने स्थानीय यूट्यूब चैनलों पर धर्मांतरण की झूठी खबरें फैलाने और सांप्रदायिक तनाव फैलाने का भी आरोप लगाया है और प्रशासन से उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने की मांग की है.

    स्कूल के प्रिंसिपल ने एसडीओपी को लिखे पत्र में सुरक्षा की मांग करते हुए कहा है कि फिलहाल स्कूल में परीक्षाएं कराई जा रही हैं. पत्र में यह भी कहा गया है कि मीडिया में प्रसारित किए जा रहे कथित धर्मांतरण की तस्वीरें स्कूल परिसर की नहीं हैं. इस बीच, स्कूल प्रबंधन के प्रवक्ता ने बताया कि मीडिया के माध्यम से विरोध प्रदर्शन की जानकारी मिलने के बाद स्थानीय प्रशासन को समय पर कार्रवाई के लिए संभावित गड़बड़ी के बारे में पहले से सूचित कर दिया गया था. उन्होंने कहा कि लेकिन लोग इकट्ठा होने लगे और पथराव से स्कूल को कम से कम 10 लाख रुपये का नुकसान हुआ है. जब यह घटना हुई, उस वक्त स्कूल में छात्र अपनी परीक्षाएं देने के लिए मौजूद थे

  • भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान (CIIL) और Koo App ने मिलाया हाथ

    भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान (CIIL) और Koo App ने मिलाया हाथ

    भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान (CIIL) और Koo App ने मिलाया हाथ
    • आपत्तिजनक माने जाने वाले शब्दों और वायांशों का एक संग्रह तैयार करेगा सीआईआईएल
    • भारतीय भाषाओं के संदर्भ, तर्क और व्याकरण को परिभाषित करेंगे
    • प्लेटफॉर्म पर सुरक्षा बढ़ाने और दुरुपयोग को रोकने के लिए Koo तकनीकी सहायता प्रदान करेगा और कंटेंट मॉडरेशन नीतियों को मजबूत करेगा

    राष्ट्रीय, 06 दिसंबर, 2021: सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोकने और भाषा के उचित इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए मैसूर स्थित सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन लैंग्वेजेज (CIIL) ने भारत के बहुभाषी माइक्रो-ब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म Koo App की होल्डिंग कंपनी बॉम्बिनेट टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड के साथ एक समझौते (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं। भारत सरकार द्वारा भारतीय भाषाओं के विकास के सामंजस्य के लिए स्थापित की गई CIIL अब Koo App के साथ संयुक्त रूप से काम करेगी, ताकि इसकी कंटेंट मॉडरेशन नीतियों को मजबूत करने के साथ ही यूज़र्स को ऑनलाइन सुरक्षित करने में मदद मिल सके। यह समझौता यूजर्स को ऑनलाइन दुर्व्यवहार, बदमाशी और धमकियों से बचाने की दिशा में काम करेगा और एक पारदर्शी और अनुकूल कसो सिस्टम का निर्माण करेगा।

    इस समझौते के जरिये CIIL शब्दों, वाक्यांशों, संक्षिप्त रूपों और संक्षिप्त शब्दों सहित अभिव्यक्तियों का एक कोष तैयार करेगा, जिन्हें भारत के संविधान में आठवीं अनुसूची की 22 भाषाओं में आक्रामक या संवेदनशील माना जाता है। जबकि Koo App कोष बनाने के लिए प्रासंगिक डेटा साझा करेगा और इंटरफेस बनाने के लिए तकनीकी सहायता प्रदान करेगा जो सार्वजनिक पहुंच के लिए कोष की मेजबानी करेगा। यह सोशल मीडिया पर भारतीय भाषाओं के जिम्मेदार इस्तेमाल को विकसित करने के लिए एक दीर्घकालिक समझौता है और यह यूजर्स को सभी भाषाओं में एक सुरक्षित और व्यापक नेटवर्किंग अनुभव प्रदान करके दो साल के लिए वैध होगा।

    CIIL और Koo App के इस संयुक्त अग्रणी कार्य का उद्देश्य भारतीय भाषाओं में शब्दों और अभिव्यक्तियों के ऐसे शब्दकोश विकसित करना है, जिन्हें आक्रामक, अपमानजनक या आपत्तिजनक माना जाता है और इन भाषाओं में कुशल कंटेंट मॉडरेशन को सक्षम किया जा सके। भारतीय संदर्भ में इस तरह की पहल को पहले कभी लागू नहीं किया गया था।

    इस समझौते का स्वागत करते हुए CIIL के निदेशक प्रो. शैलेंद्र मोहन ने कहा कि भारतीय भाषाओं के यूजर्स को Koo मंच पर संवाद करने में सक्षम बनाना, वास्तव में समानता और बोलने की स्वतंत्रता के अधिकार की अभिव्यक्ति है, जो हमारे बहुत सम्मानित संवैधानिक मूल्य हैं। CIIL और Koo के बीच समझौता ज्ञापन यह सुनिश्चित करने की दिशा में एक प्रयास है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल, विशेष रूप से Koo App, बोलने/लिखने की स्वच्छता के साथ आता है और यह अनुचित भाषा और दुरुपयोग से मुक्त है। सोशल मीडिया पोस्ट के लिए सुखद और सुरक्षित वातावरण बनाने की दिशा में Koo की इस पहल को प्रोत्साहित करते हुए प्रो. मोहन ने कहा कि Koo App के प्रयास सराहनीय हैं। इसलिए, CIIL कोष के माध्यम से भाषा परामर्श प्रदान करेगा और जिम्मेदार एवं स्वच्छ सोशल मीडिया चर्चा को हासिल करने के लक्ष्य को साकार करने में Koo टीम के हाथों को मजबूत करेगा।

    इस सहयोग पर प्रकाश डालते हुए Koo App के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी अप्रमेय राधाकृष्ण ने कहा, “एक बेहतरीन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के रूप में Koo भारतीयों को कई भाषाओं में जुड़ने और चर्चा में सक्षम बनाता है। हम ऑनलाइन इको सिस्टम को बढ़ाकर अपने यूजर्स को सशक्त बनाना चाहते है, ताकि दुरुपयोग को प्रभावी तरीके से रोका जा सके। हम चाहते हैं कि हमारे यूजर्स भाषाई संस्कृतियों के लोगों के साथ सार्थक रूप से बातचीत करने के लिए मंच का लाभ उठाएं। हम इंटरनेट यूजर्स के लिए परस्पर दुनिया को अधिक सुरक्षित, भरोसेमंद और विश्वसनीय बनाने के लिए और इस कोष के निर्माण के लिए प्रतिष्ठित सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन लैंग्वेजेज के साथ साझेदारी करते हुए प्रसन्न हैं।”

  • भारतीय यूजर्स के लिए Koo App पर आया Snapdeal

    भारतीय यूजर्स के लिए Koo App पर आया Snapdeal

    नई दिल्ली,1 दिसंबर, महत्वपूर्ण ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म सैपडील (Snapdeal) ने भारत में अपने लाखों यूज़र्स से उनकी मूल भाषाओं में जुड़ने के लिए मेड-इन-इंडिया सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Koo App पर लॉगिन किया है। देश में ई-कॉमर्स बाजार को ऑनलाइन खरीदारों की बढ़ती संख्या की वजह से नया स्वरूप मिला है। ये ख़रीदार छोटे भारतीय शहरों और कस्बों से जुड़े हैं, जिन्हें भारत भी कहा जाता है। इन ग्राहकों की विशेष जरूरतों ने इस क्षेत्र के विकास को तेजी से बढ़ावा दिया है और इसके साथ ही स्थानीय भाषा में सामग्री और जानकारी की मांग भी बढ़ी है। सैपडील (Snapdeal), विशेष रूप से दूसरे और तीसरे दर्जे के शहरों समेत भारत भर के यूज़र्स के साथ जुड़ने के लिए Koo App की बेहतरीन बहुभाषी सुविधाओं का लाभ उठाएगा और उनकी मातृभाषा में सेल, डील्स और अन्य घोषणाओं के ज़रूरी अपडेट्स देकर उनसे जुड़ेगा। देसी भाषाओं में अभिव्यक्ति के लिए एक सोशल मीडिया मंच के रूप में Koo App वर्तमान में हिंदी, कन्नड़, तेलुगु, तमिल, बंगाली, असमिया, मराठी, गुजराती और अंग्रेजी समेत नौ भाषाओं में अपनी शानदार सुविधाएं प्रदान करता है। प्लेटफॉर्म पर फिलहाल यूजर्स की संख्या डेढ़ करोड़ से ज्यादा है और अगले एक वर्ष में इस माइक्रो-ब्लॉगिंग प्लेटफ़ॉर्म के डाउनलोड्स का आंकड़ा 10 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है।

    Koo App पर अपना अकाउंट बनाकर स्रैपडील, तमाम आयु-लिंग-स्थान के इंटरनेट यूजर्स तक पहुंचने में सक्षम होगा ये इंटरनेट यूजर्स डिजिटल फर्स्ट अर्थव्यवस्था में अपनी मूल भाषा में ब्रांड्स के साथ जुड़ने की इच्छा रखते हैं। सेपडील के ब्रांड मार्केटिंग निदेशक, सौम्यदीप चटर्जी ने कहा, “मोबाइल इंटरनेट एक्सेस ने दूरदराज की जगहों में रहने वाले लोगों तक पहुंचना और स्थानीय भाषाओं में उनके साथ बातचीत करना मुमकिन कर दिया है। इसलिए तमाम भाषाओं में कंटेंट बनाने में वक्त देना और कोशिश करना ज़रूरी हो जाता है। Koo App जैसा प्लेटफॉर्म हमें बड़े पैमाने पर स्थानीय समुदायों के साथ जुड़ाव बनाए रखने में मदद करेगा।”

    स्रेपडील (Snapdeal) का प्लेटफॉर्म पर स्वागत करते हुए Koo App के सह-संस्थापक मयंक बिदावतका ने कहा, “भारत के सबसे बड़े और सबसे लोकप्रिय ई-कॉमर्स दिग्गजों में से एक सैपडील को हम अपने प्लेटफॉर्म पर पाकर काफी खुश हैं। Koo App भारतीयों को अपनी मातृभाषा में अभिव्यक्ति का मौका देता है। हमारे ऑटो ट्रांसलेशन जैसे स्मार्ट फीचर्स, भाषा की जंजीरों को तोड़ते हुए, यूजर्स को एक-दूसरे से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। हमें विश्वास है कि हमारे फीचर्स का फायदा उठाकर, सेपडील एक विशाल यूजर बेस के साथ
    सफलतापूर्वक जुड़ने में सफल होगा और कई भाषाओं में अपनी पेशकशों पर अधिक चर्चा को बढ़ावा दे सकेगा।”

    कू (Koo) के बारे में:

    Koo की स्थापना मार्च 2020 में भारतीय भाषाओं के एक बहुभाषी, माइक्रो-ब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म के रूप में की गई थी और अब इसके डेढ़ करोड़ से ज्यादा यूजर्स हो गए हैं। इनमें काफी प्रतिष्ठित लोग भी शामिल हैं। भारत के विभिन्न हिस्सों के लोग, तमाम भारतीय भाषाओं में मौजूद इस मंच के जरिये मातृभाषा में अपनी अभिव्यक्ति कर सकते हैं। एक ऐसे देश में जहां भारत के सिर्फ 10% लोग अंग्रेजी बोलते हैं. एक ऐसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की बेहद जरूरत है जो भारतीय यूजर्स को भाषा का व्यापक अनुभव दे सके और उन्हें जोड़ने में मदद कर सके। Koo भारतीय भाषाओं को पसंद करने वाले लोगों की आवाज़ के लिए एक मंच प्रदान करता है।

  • बिजली क्रांति बढ़ाएगी मुद्रा भंडार

    बिजली क्रांति बढ़ाएगी मुद्रा भंडार

    
    
    
    
    


    रमेश कुमार दुबे
    बिजली से चलने वाले वाहन अर्थव्‍यवस्‍था के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी मुफीद साबित होंगे। इसी प्रकार इलेक्‍ट्रिक वाहन पेरिस जलवायु समझौते की शर्तों के अनुपालन में भी मददगार बनेंगे। इतना ही नहीं इलेक्‍ट्रिक वाहनों के साथ आने वाली स्‍वचालन तकनीक से सड़क दुर्घटनाओं में भी कमी आएगी। स्‍पष्‍ट है, मोदी सरकार ने जो कदम उठाया है वह देश में एक नई बिजली क्रांति का आगाज करेगा।

    दुनिया भर में बिजली खपत में भारी असमानता पाई जाती है। इतना ही नहीं जहां विकसित देशों में जीवन के हर पहलू में बिजली की भरपूर भागीदारी रही है, वहीं भारत जैसे विकासशील देशों में बिजली की भूमिका रोशनी और औद्योगिक गतिविधियों तक सिमटी रही।

    दशकों की उपेक्षा के बाद भारत में भी बिजली की भागीदारी बढ़ाने के प्रयास शुरू हो चुके हैं। देश के हर गांव तक बिजली पहुंचाने के बाद प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी ने सातों दिन-चौबीसों घंटे बिजली मुहैया कराने का महत्‍वाकांक्षी लक्ष्‍य तय किया है। इसके साथ-साथ सरकार देश के समूचे परिवहन तंत्र को पेट्रोल-डीजल के बजाए बिजली आधारित करने की महत्‍वाकांक्षी योजना पर काम कर रही है। रेल लाइनों का विद्युतीकरण और 2030 तक कुल वाहनों के 25 फीसदी को इलेक्‍ट्रिक वाहन करने का लक्ष्‍य है।


    इलेक्‍ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए मोदी सरकार ने 2015 में फास्‍टर एडॉप्‍शन एंड मैनुफैक्‍चरिंग ऑफ इलेक्‍ट्रिक ह्विकल (फेम)-1 शुरू किया था। इसे मिली कामयाबी को देखते हुए 28 फरवरी को कैबिनेट ने फेम के दूसरे चरण को मंजूरी दे दी। इसके तहत देश में इलेक्‍ट्रिक वाहनों को प्रोत्‍साहन देने के लिए 10,000 करोड़ रूपये का आवंटन किया गया है।

    यह राशि इलेक्‍ट्रिक वाहनों और इलेक्‍ट्रिक इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर पर खर्च की जाएगी जिससे 2030 तक 100 फीसदी वाहनों को इलेक्‍ट्रिक बनाने का काम किया जा सके। फेम-2 के अंतर्गत इलेक्‍ट्रिक वाहनों की खरीद को सस्‍ता बनाने और चार्जिंग स्‍टेशनों की पर्याप्‍त व्‍यवस्‍था पर काम किया जाएगा।

    फेम-2 योजना के तहत इलेक्‍ट्रिक वाहन 20,000 से 2.5 लाख रूपये तक सस्‍ते हो जाएंगे। वाहनों को सस्‍ता बनाने के लिए वाणिज्‍यिक वाहनों को प्राथमिकता दी जा रही है। सरकार का लक्ष्‍य है कि तय समय के भीतर देश में 10 लाख इलेक्‍ट्रिक दोपहिया, पांच लाख इलेक्‍ट्रिक तिपहिया, 55000 इलेक्‍ट्रिक कार और 70000 इलेक्‍ट्रिक बस खरीदी जाएं। यह प्रोत्‍साहन सिर्फ उन्‍हें दिया जाएगा जो लिथियम आयन बैटरी से युक्‍त वाहन खरीदेंगे।

    योजना के तहत महानगरों, टू टियर शहरों और पहाड़ी इलाकों में 2700 चार्जिंग स्‍टेशन लगाए जाएंगे। इन शहरों में हर तीन किमी पर एक चार्जिंग स्‍टेशन और राजमार्गों पर हर 25 किमी पर चार्जिंग स्‍टेशन लगाने का लक्ष्‍य रखा गया है। इसके साथ-साथ रिहाइशी इलाकों में भी चार्जिंग स्‍टेशन लगाए जाएंगे।

    इस दिशा में आंध्र प्रदेश सरकार ने एक बड़ी पहल करते हुए 2024 तक पेट्रोल-डीजल कारों के पंजीकरण रोकने और अगले पांच वर्षों में सड़कों पर 10 लाख इलेक्‍ट्रिक वाहन लाने की घोषणा की है। इसके साथ-साथ 2024 तक सभी सरकारी वाहनों को इलेक्‍ट्रिक वाहनों में बदल दिया जाएगा। कमोबेश इसी तरह की पहल कर्नाटक सरकार ने भी की है।

    अधिक से अधिक लोग पेट्रोल-डीजल के बजाए बिजली से चलने वाले वाहन अपनाएं इसके लिए सरकार खुद पहल कर रही है। हाल ही में सरकार ने टाटा मोटर्स से 10,000 इलेक्‍ट्रिक वाहन खरीदने का समझौता किया है। बिजली मंत्रालय के मुताबिक इस दिशा में सबसे बड़ी बाधा कीमत है लेकिन एलईडी बल्‍ब का उदाहरण सरकार के लिए प्रेरणा का काम कर रहा है। गौरतलब है कि शुरू में एलईडी बल्‍ब बहुत महंगे पड़ते थे लेकिन जब देश में इनका बड़े पैमाने पर उत्‍पादन होने लगा तब इनकी कीमतों में तेजी से कमी आई। इसी तरह बैटरी रिक्‍शा व सोलर पंप को मिल रही लोकप्रियता भी सरकार का उत्‍साह बढ़ा रही है।

    फिर लीथियन ऑयन आधारित बैटरी की कीमतों में गिरावट से इलेक्‍ट्रिक वाहनों की लागत कम हो रही है। दूसरी ओर कठोर उत्‍सर्जन मानकों के कारण पेट्रोल-डीजल वाहनों की कीमत लगातार बढ़ रही है। मौजूदा अनुसंधान को देखें तो अगले पांच वर्षों में डीजल-पेटोल व बिजली से चलने वाले वाहनों की लागत लगभग एक समान हो जाएगी।

    स्‍पष्‍ट है, यदि भारत ढांचागत बदलाव नहीं करता तो उसे बड़े पैमाने पर इलेक्‍ट्रिक वाहन व संबंधित कल-पुर्जा आयात करना पड़ेगा। जर्मनी, चीन, अमेरिका जैसे देश पेट्रोल-डीजल की जगह इलेक्‍ट्रिक वाहन पर फोकस कर चुके हैं। इन देशों में वाहन निर्माताओं को 30-40 फीसदी सब्‍सिडी मिल रही है। भारत में इतनी सब्‍सिडी संभव नहीं है। इसलिए उसे समय पर कदम उठाना पड़ेगा।

    भारत अपनी जरूरत का 80 फीसदी पेट्रोलियम पदार्थ आयात करता है। ऐसे में परिवहन क्षेत्र में हो रही बिजली क्रांति से न केवल आयात पर निर्भरता घटेगी बल्‍कि पर्यावरण प्रदूषण में भी कमी आएगी। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक इलेक्‍ट्रिक वाहनों के इस्‍तेमाल से 2030 तक सड़क परिवहन में खपत होने वाली ऊर्जा में 64 फीसदी और कार्बन उत्‍सर्जन में 37 फीसदी की कमी आएगी।

    स्‍पष्‍ट है, बिजली से चलने वाले वाहन अर्थव्‍यवस्‍था के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी मुफीद साबित होंगे। इसी प्रकार इलेक्‍ट्रिक वाहन पेरिस जलवायु समझौते की शर्तों के अनुपालन में भी मददगार बनेंगे। इतना ही नहीं इलेक्‍ट्रिक वाहनों के साथ आने वाली स्‍वचालन तकनीक से सड़क दुर्घटनाओं में भी कमी आएगी। स्‍पष्‍ट है, मोदी सरकार ने जो कदम उठाया है वह देश में एक नई बिजली क्रांति का आगाज करेगा।