Category: अर्थ संसार

  • निजीकरण न किया तो फिर पूंजी खा जाएंगे बैंक

    निजीकरण न किया तो फिर पूंजी खा जाएंगे बैंक

    बैंक इस समय चारों तरफ से घिरे हुए हैं। देश की अर्थव्यवस्था का इंजन सेवा क्षेत्र हो गया है जिसे लोन की जरूरत कम है। बड़े उद्योग सीधे बॉड के माध्यम से पूंजी उठा रहे हैं
    डॉ. भरत झुनझुनवाला

    बैंक इस समय चारों तरफ से घिरे हुए हैं। देश की अर्थव्यवस्था का इंजन सेवा क्षेत्र हो गया है जिसे लोन की जरूरत कम है। बड़े उद्योग सीधे बॉड के माध्यम से पूंजी उठा रहे हैं। छोटे उद्योग पस्त है और इनकी लोन लेने की क्षमता ही नहीं रह गई है।

    विकास दर में गिरावट आने से खपत के लिए कम ही लोन दिए जा रहे हैं। ऊपर से सार्वजनिक बैंकों में कुप्रबंधन एवं भ्रष्टाचार व्याप्त है। इस स्थिति में सरकार को दो कदम उठाने चाहिए। छोटी मैनुफैक्चरिंग एवं सेवा क्षेत्र को ईकाइयों को संरक्षण देना चाहिए।

    मेक इन इंडिया को छोटे उद्योगों की तरफ मोडऩा चाहिए। साथ-साथ सार्वजनिक बैंकों का निजीकरण कर देना चाहिए। इनका डूबना निश्चित है। डूबे इसके पहले इनकी बिक्री कर देना चाहिए जैसे चतुर दुकानदार एक्सपायरी के पहले दवा को बेच देता है।

    सर्वविदित है कि सरकारी बैंकों की हालत खस्ता है। इन्हें पुनजीर्वित करने को सरकार छोटे सार्वजनिक बैंकों का बड़े सार्वजनिक बैंकों के साथ विलय करने पर विचार कर रही है। बड़े बैंकों की कार्यकुशलता अच्छी होने से इनके द्वारा छोटे बैंकों को पुनजीर्वित किया जा सकता है। लेकिन बड़े बैंकों के सामने स्वयं खतरा मंडरा रहा है। वास्तव में देश के बैंकिंग सेक्टर का मूल चरित्र ही बदलता जा रहा है।

    इकानॉमिक ग्रोथ में अब क्रेडिट की भूमिका ही सिकुड़ती जा रही है। वर्ष 2015 में हमारे सम्पूर्ण बैंकिंग सेक्टर द्वारा दिए गए लोन में 10.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। वर्ष 2016 में यह वृद्धि घट कर 5.1 प्रतिशत रह गई है। यानी कुल लोन बढ़ रहे हैं परन्तु बढ़त की गति कम होती जा रही है जैसे कार का एक्सलरेटर हल्का होता जा रहा है। इस स्थिति में स्वाभाविक है कि कमजोर बैंक दबाव में शीघ्र आएंगे जैसे अकाल के समय छोटे किसान पहले प्रभावित होते हैं।

    लोन की मांग कम होने का प्रमुख कारण है कि अर्थव्यवस्था का इंजन सेवा क्षेत्र हो गया है। इस क्षेत्र में साफ्टवेयर, होटल, ट्रांसपोर्ट, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि सेवाएं आती हैं जिनमें किसी भातैक माल जैसे कपड़े अथवा सब्जी का उत्पादन नहीं होता है।

    बीते 5 वर्षों में सेवा क्षेत्र में 51 प्रतिशत की ग्रोथ हुई जबकि मैन्युफैक्चरिंग में 32 प्रतिशत की। ऐतिहासिक तौर पर देखा जाए तो सेवा क्षेत्र का दबदबा बढ़ता जा रहा है। सेवाओं के व्यापार में लोन की जरूरत कम पड़ती है।

    जैसे साफ्टवेयर के निर्माण में 25,000 रुपए के एक कम्प्यूटर से वर्ष में 10-20 लाख रुपए के साफ्टवेयर का उत्पादन किया जा सकता है। अथवा एक कम्प्यूटर से वर्ष में लगभग 3-4 लाख रुपए के आनलाइन ट्यूशन दिए जा सकते हैं।

    तुलना में मैनुफैक्चरिंग में जमीन, फैक्ट्री शेड तथा मशीन में भारी निवेश की जरूरत पड़ती है। इसलिए मैनुफैक्चरिंग सेक्टर के फिसलने के साथ-साथ लोन की मांग कम होती जा रही है। हमारी बैंकिंग व्यवस्था के दबाव में आने का यह प्रमुख कारण दिखता है।

    दूसरा कारण बॉड मार्केट का विस्तार है कंपनियों द्वारा वर्तमान में भारी मात्रा में बॉड जारी किए जा रहे हैं। बॉड जारी करने को कंपनी द्वारा अपनी प्रापर्टी को रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी में गिरवी रखा जाता है।

    गिरवी रखी गई प्रापर्टी के सामने कंपनी द्वारा फुटकर निवेशकों को बॉड जारी किए जाते हैं। किसी विशेष स्थिति में कंपनी अगर डूब गई तो सरकार द्वारा गिरवी प्रापर्टी की नीलामी करके निवेशक को उनकी रकम लौटाने की व्यवस्था रहती है। इससे खुदरा निवेशक सुरक्षित महसूस करते हैं और बॉड खरीदते हैं। इस प्रक्रिया में कंपनी द्वारा ब्याज की सम्पूर्ण रकम निवेशक को मिलती है।

    बैंकों के माध्यम से लोन लेने में भी मूल रूप से यही प्रक्रिया अपनाई जाती है। कंपनी द्वारा अपनी प्रापर्टी को बैंक के पास गिरवी रख दिया जाता है। इस प्रापर्टी के सामने बैंक लोन देता है। कंपनी को लोन देने के लिए बैंक द्वारा खुदरा निवेशकों से फिक्स डिपाजिट में रकम ली जाती है। लोन देने वाले खुदरा निवेशक तथा लोन लेने वाली कंपनी के बीच बैंक बिचौलिए की भूमिका निभाता है।

    जैसे बैंक द्वारा 7 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से खुदरा निवेशक से रकम ली जाती है और 12 प्रतिशत की दर से उसी रकम से कंपनी को लोन दिया जाता है। बॉड तथा बैंक दोनों ही तरह से खुदरा निवेशक द्वारा ही निवेश की गई रकम को कंपनी तक पहुंचाया जाता है। बीते समय में बॉड के मार्केट का विकास हो जाने के कारण कंपनियां बॉड के माध्यम से सीधे खुदरा निवेशक से लोन ज्यादा ले रही हैं।

    कंपनी 10 प्रतिशत की दर से बॉड जारी करती है तो खुदरा निवेशक को 10 प्रतिशत का ब्याज मिलता है। बैंक को कमीशन नहीं मिलता है। बैंकों का धंधा मंद पड़ गया है। बीते 4 वर्षों में कुल लोन में बैंकों का हिस्सा 45 प्रतिशत से घट कर 22 प्रतिशत रह गया है जबकि बॉड का हिस्सा 22 प्रतिशत से बढ़कर 33 प्रतिशत हो गया है। वर्तमान समय में बैंकों के खस्ता हाल होने का यह दूसरा कारण है।

    हमारे सार्वजनिक बैंकों की मूल समस्या प्रबन्धन आदि की नहीं है। मूलरूप से बैंकों की जमीन ही खिसक गई है। सार्वजनिक बैंकों में इसके अतिरिक्त कुप्रबन्धन एवं भ्रष्टाचार की भी समस्या है। छोटे सार्वजनिक बैंकों का बड़े सार्वजनिक बैंकों के विलय से छोटे बैंकों में व्याप्त कुप्रबन्धन की समस्या का कुछ निदान हो सकता है। परन्तु बैंकों की जमीन के खिसकने से उत्पन्न मूल समस्या का समाधान विलय से हासिल नहीं हो सकता है।

    बॉड जारी करने की प्रक्रिया पेचीदी होती है। इसे बड़ी कंपनियों द्वारा ही अपनाया जा सकता है। खुदरा निवेशकों में भरोसा बनाने के लिए भारी एडवर्टाइज़मेंट देने होते हैं एवं रोड शो करने होते हैं। इसलिए छोटी कंपनियों को बैंकों पर ही निर्भर रहना होता है। लेकिन बीते समय में सरकार द्वारा लागू की गई नीतियों ने छोटे उद्योगों को पस्त कर दिया है।

    सरकार का प्रयास है कि मेक इन इंडिया जैसी योजनाओं के तहत बड़े, आधुनिक एवं आटोमेटिक मशीनों का उपयोग करने वाले उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए। फलस्वरूप छोटे उद्योगों को मिल रहा संरक्षण कम हो गया है।

    इसके बाद नोटबंदी के कारण इनके ग्राहक लुप्त हो गए। अब जीएसटी की जटिल व्यवस्था इनके लिए अभिशाप बन गई है। इस कारण छोटे उद्योगों द्वारा लोन कम ही लिए जा रहे हैं। बड़े उद्योग बॉड मार्केट के चलते बैंकों के हाथ से फिसल गए हैं।

    छोटे उद्योग स्वयं मृतप्राय हो रहे हैं। अत: सेवा एवं मैनुफैक्चरिंग दोनों क्षेत्रों में बैंकों का धंधा कमजोर पड़ रहा है। बचता है खपत का क्षेत्र जैसे कार अथवा मकान के लिए दिए गए लोन। यह क्षेत्र अभी भी जीवित हैं। परन्तु देश की आर्थिक विकास दर में गिरावट आने के कारण आम आदमी की क्रय शक्ति घट रही है और यह क्षेत्र भी दबाव में है।

    बैंक इस समय चारों तरफ से घिरे हुए हैं। देश की अर्थव्यवस्था का इंजन सेवा क्षेत्र हो गया है जिसे लोन की जरूरत कम है। बड़े उद्योग सीधे बॉड के माध्यम से पूंजी उठा रहे हैं। छोटे उद्योग पस्त है और इनकी लोन लेने की क्षमता ही नहीं रह गई है।

    विकास दर में गिरावट आने से खपत के लिए कम ही लोन दिए जा रहे हैं। ऊपर से सार्वजनिक बैंकों में कुप्रबंधन एवं भ्रष्टाचार व्याप्त है। इस स्थिति में सरकार को दो कदम उठाने चाहिए। छोटी मैनुफैक्चरिंग एवं सेवा क्षेत्र को ईकाइयों को संरक्षण देना चाहिए।

    मेक इन इंडिया को छोटे उद्योगों की तरफ मोडऩा चाहिए। साथ-साथ सार्वजनिक बैंकों का निजीकरण कर देना चाहिए। इनका डूबना निश्चित है। डूबे इसके पहले इनकी बिक्री कर देना चाहिए जैसे चतुर दुकानदार एक्सपायरी के पहले दवा को बेच देता है।

  • जीएसटी से मिली विकास की गारंटी

    जीएसटी से मिली विकास की गारंटी

    – भरतचन्द्र नायक
    गत सप्ताह जीएसटी परिषद ने अठासी वस्तुओं और सेवाओं पर टेक्स के रेट में कटौती कर घरेलु उपभोक्ता उत्पाद के मूल्य में सात आठ प्रतिशत तक उपभोक्ताओं राहत पहुंचाने का अपना मंतव्य जाहिर कर दिया है। इन वस्तुओं और सेवाओं पर 28 प्रतिशत जीएसटी था जिसे घटाकर 18 प्रतिशत और 12 प्रतिशत तक कर दिया है। टेक्स की दरों में कमी का लाभ उपभोक्ता को मिले इसमें दो राय नहीं है, लेकिन इसमें भी अगर मगर लगाकर उत्पादक राहत से उपभोक्ताओं को वंचित कर देते हैं। हांलाकि ऐसी दशा में समस्या से निपटने के लिए भी केंद्र सरकार ने मुनाफा विरोधी प्राधिकरण एन्टी प्राफिटियरिंग निकाय की व्यवस्था की है और उसने पिछले अवसर पर टेक्स घटने पर उत्पाद को और वितरकों को आगाह भी किया था। उसने पुराने एमआरपी पर संशोधित एमआरपी रेपर पर लिखकर घटे हुए टेक्स लाभ ग्राहकों को पहुंचाने को कहा था, लेकिन सामान्य तह ऐसी राहत महसूस नहीं की गई। टेक्स में राहत दिये जाने से केंद्र सरकार पर 70 हजार करोड़ रू. का बोझ पड़ा है। केंद्र सरकार ने 14 प्रतिशत राजस्व नहीं बढ़ने पर राज्यों को पांच साल की भरपाई का भरोसा दिया है। अच्छा है कि इस बार कुछ उत्पादकों ने स्वयं स्फूर्त होकर घरेलु उपभोक्ता वस्तुओं पर टेक्स घटती का लाभ उपभोक्ता को देने की घोषणा की है। ऐसा करने वालों में गोदरेज, एलजी इंडिया, पेनासोनिक इंडिया, जैसे संस्थान अग्रणी हैं। उद्योग जगत की इस सदस्यता का दूसरे उत्पादकों को अनुकरण कर समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व बोध दिखाना चाहिए। इसके साथ इन संस्थानों ने केंद्र से अपेक्षा की है कि विदेशों से आयात किये जाने वाले घरेलु सामान एप्लाएंसज पर लगने वाला आयात शुल्क बढ़ाया जाए। इसे बढ़ाकर घरेलु उद्योगों को केंद्र सरकार प्रोत्साहित करें। ऐसे समय जब विकसित देश संरक्षणवाद का सहारा ले रहे हैं भारत सरकार को भी देशी उद्योगों की आकांक्षा के अनुरूप आयात नीति में संशोधन करके उद्योगों को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है।

    जीएसटी को आरंभ हुए एक साल हो चुका है। जीएसटी राजस्व संग्रह में धीरे-धरे स्थिरता परिलक्षित हो रही है। औसतन यह राजस्व संग्रह 95 हजार करोड़ तक पहुंच चुका है। जनता अपेक्षा करती है कि अमुक वस्तु पर टेक्स कम हो। इसके अनुरूप जीएसटी परिषद विचार भी करती है। जब टेक्स में कटौती की जाती है तो सियासत शुरू हो जाती है। लेकिन असलियत यह है कि टेक्स कटौती को सियासी हथकंडा नहीं कहा जा सकता। क्यांेकि इसका दारोमदार जीएसटी परिषद पर है, जिसमें राज्यों की भी केंद्र के साथ भागीदारी है। जीएसटी परिषद वास्तव में भारतीय संघवाद का सबसे बड़ा प्रतीक है। जिसने जीएसटी को अल्प समय में पटरी पर लाकर जनता और उत्पादकों को कमोवेश सत्रह बेरियरों की बेड़ी से मुक्ति दिला दी है। परिवहन की रफ्तार बढ़ा दी है। इन डेढ़ दर्जन टेक्सों के बदले में जीएसटी जैसा एकीकृत टेक्स लगा है जिसकी प्रक्रिया को लेकर हौआ खड़ा किया जा रहा था, लेकिन परिषद ने नियमों का सरलीकरण करके इसे सुगम, सरल और आसान बना दिया है। फिर जो डेढ़ दर्जन टेक्स समाप्त हुए हैं वे मिलाकर बत्तीस प्रतिशत होते थे। जबकि जीएसटी की सबसे अधिक दर 28 प्रतिशत है।

    जीएसटी को लेकर राजनैतिक दलों को शिकायत है और वे एक ही स्लेव में सभी वस्तुओं और सेवाओं को शामिल करना चाहते हैं जो न तो उचित है और न संभव है। इस लिए जीएसटी को लेकर उद्योग जगत और उपभोक्ताओं में फैलाये जा रहे भ्रम से बचा जाना चाहिए। आखिर तीन दशकों के विचार विमर्ष के बाद ही 1 जुलाई 2017 से जीएसटी अमल में आया है। राज्यों की शिकायत दूर करते हुए मोदी सरकार ने आने वाले 5 वर्षों तक राज्यों को क्षतिपूर्ति करने का भरोसा दिलाया है और इस आश्वासन पर अमल भी शुरू हो गया है। दरअसल यूीपए सरकार के दौरान तो कांग्रेस ने राज्यों को क्षतिपूर्ति देना असंभव बताकर हाथ खीच लिऐ थे। इसलिए कांग्रेस को तो जीएसटी प्रणाली में मीनमेख निकालने का नैतिक अधिकार नहीं है।
    जीएसटी टेक्स निर्धारण के लिए पांच श्रेणियां मौजूदा है। माना जा रहा है कि इतनी अधिक श्रेणियों जब कभी भटकाव पैदा करती है। इसका उपाय खोजने के बारे में परिषद में गहन विचार विमर्ष बताता है कि आने वाले दिनों में पांच श्रेणियों की जगह तीन स्लेव शेष रहेंगे, लेकिन इसमें जल्दवाजी नहीं की जा सकती क्योंकि इससे राज्यों को मिलने वला राजस्व जुड़ा है, राज्यों की आम सहमति आवश्यक होगी। पूर्व वित्तमंत्री श्री पी. चिदंबरम जो यूपीए सरकार में प्रभावशाली मंत्री रहे। जीएसटी के अमल के असमर्थ रहे हैं अब आपत्ति इस बात पर कह रहे हैं कि जिन 88 वस्तु सेवाओं पर टेक्स घटाया गया। वह 2017 में भी घटाया जाना संभव था। अब इसका सटीक उत्तर तो यही हो सकता है कि टेक्स कम करने अथवा बढ़ाने में किसी विशेष राजनैतिक दल अथवा जैसा चिदम्बरम का आरोप है, अकेली भाजपा ही उत्तरदायी नहीं है। परिषद में प्रतिनिधित्व करने वाले राज्यों का पूरा हस्तक्षेप है और सहमति से ही फैसला लिया जाता है। इसलिए जनता बीच में भाजपा को लाना बेमानी है। अर्थशास्त्री ही नहीं समाज शास्त्री और आमजन जनता है कि सरकारों का संचालन टेक्स कराधान और उसके संग्रह पर निर्भर रहता है। इसलिए सीधी सी बात है कि जीएसटी कराधान की शुरूआत ही इस सोच के साथ हुई कि इससे राज्यों और केंद्र को आर्थिक क्षति न पहुंचने पाये। जैसे-जैसे जीएसटी कराधान में स्थिरता आती गई। सोच विचार के साथ वस्तु और सेवा पर लगने वाले टेक्स पर रियायत देने पर परिषद ने विचार आरंभ किया और यह सिलसिला जारी रहेगा। एक वर्ष में 384 वस्तुओं पर से टेक्स कम किया गया है। अब चूंकि जीएसटी का कर संग्रह 95 हजार करोड़ रू. तक औसतन पहुंच गया है। जीएसटी करों में राहत देने पर परिषद विचार करने में सक्षम होगी। इससे उपभोक्ता वस्तुओं के दामों में कमी आना निश्चित है। इससे मुद्रास्फीति भी घटेगी। राज्यों की क्षतिपूर्ति करने में श्री नरेंद्र मोदी सरकार की सदाशयता प्रशंसनीय कही जाएगी। क्योंकि यूपीए सरकार में जब सेंट्रल सेल्स टेक्स तीन से दो प्रतिशत किया था। डाॅ. मनमोहन सिंह सरकार ने राज्यों को वायदा किया था कि राज्यों के नुकसान की केंद्र भरपाई करेगा। परंतु यूपीए सरकार वायदे से मुकर गई और उसने 2011-12 की क्षतिपूर्ति कभी नहीं की।

    मजे की बात है कि अब जनता जीएसटी को मूल्य स्थिरता का माध्यम मानने लगी है। यही कारण है कि पेट्रोलियम उत्पादों की अस्थिर कीमतों से चिन्तित उपभोक्ता डीजल, पेट्रोल को भी जीएसटी के नेट में लाने की मांग करने लगे हैं। उपभोक्ताओं का मानना है कि यदि डीजल पेट्रोल जीएसटी कराधान के अंतर्गत लाया गया तो वास्तव में उपभोक्ता अच्छे दिनों का अहसास जरूर करेंगे। यह भी धारणा बनाई जा रही है कि दरों में कमी चुनावी आहट को सुनकर हो रही है और व्यापरी घरानों की आकांक्षा पूरी की जा रही है लेकिन वास्तव में यह सोच सियासत का बदरूप चेहरा है। जीएसटी जैसे ऐतिहासिक आर्थिक क्रांतिकारी सुधार को चुनावी नजरिये से देखना कतई उचित नहीं है।

  • गरीब को सेठ बनाने की दिशा में बड़ा कदम रही नोटबंदी

    गरीब को सेठ बनाने की दिशा में बड़ा कदम रही नोटबंदी

    भोपाल,12 जून(पीआईसी)। सत्ता के गलियारों में उद्योगपतियों को इंतजार करते देखने का दौर अब बीत चला है। मोदी सरकार ने नोटबंदी करके समानांतर अर्थव्यवस्था पर जो चोट की है उसके चलते अब उद्योगपतियों को सत्ताधीशों के दरवाजे हाजिरी देना जरूरी नहीं रहा है। नतीजा ये है कि आर्थिक विकास में लगे कार्पोरेट घटाने आसानी से अपना कारोबार बढ़ा रहे हैं। छोटे स्तर पर जिन समूहों ने नोटबंदी के बाद जीएसटी की व्यवस्था को समझ लिया था उन्होंने भी अपने कारोबार में सुधार किया है। नतीजतन देश अर्थव्यवस्था में तेजी आई है।

    वित्तमंत्री अरुण जेटली का विश्वास है कि यदि आप देश के लिए पैसा बना रहे हैं तो आपको हमारे दरवाजे पर सिर झुकाने की जरूरत नहीं है। नियमों में बदलाव की इस नई परंपरा से शेयर बाजार तेजी की ओर अग्रसर हो रहा है। जीएसटी को लागू करने और आर्थिक सुधारों को लागू करने की दिशा में देश के औद्योगिक घराने सरकार के साथ इसलिए खड़े नजर आ रहे हैं क्योंकि इससे उनके संसाधनों की बर्बादी रुकी है। वित्तीय प्रबंधन के छिद्र बंद हुए हैं, जिससे मुनाफे की बर्बादी रुकी है।

    चार साल पहले अर्थव्यवस्था कमजोर रुपए, छीजते विदेशी मुद्रा भंडार, राजकोषीय और चालू खाते के ऊंचे घाटे और दहाई में महंगाई से जद्दोजहद कर रही थी.इस बार2018 में वृहत अर्थव्यवस्था के संकेतकों में खासा सुधार आया है—क्रिसिल के एक विश्लेषण के मुताबिक, खुदरा कीमतों की महंगाई 2015-2018 में औसतन 4.7 फीसदी रही है, जबकि इससे पहले के पांच साल में यह औसतन 10.2 फीसदी रही थी; चालू खाते का घाटा बीते चार साल में घटकर आधा रह गया है और विदेशी मुद्रा भंडार में अच्छा-खासा इजाफा हुआ है. रुपए का अवमूल्यन पहले के पांच साल के 5.5 फीसदी के मुकाबले घटकर 1.7 फीसदी पर आ गया है.

    जीएसटी और दिवालिया तथा शोधन अक्षमता संहिता (आइबीसी) जैसे सुधार कारोबार करने के उसूलों में आमूलचूल बदलाव लाने का भरोसा बंधा रहे हैं. आइबीसी ने असरदार ढंग से बता दिया है कि कर्ज लेकर उसे न चुकाने का बेलगाम और बेशर्म तरीका अब और काम नहीं आएगा.

    सरकार ने कर अनुपालन को बढ़ाने और नोटबंदी के साथ आमदनी की घोषणा योजना के जरिए और ज्यादा लोगों को औपचारिक अर्थव्यवस्था के दायरे में लाने की एकजुट कोशिशें की हैं. जिससे प्रत्यक्ष करों की वसूली में तेज बढ़ोतरी हुई है, बावजूद इसके कि जीडीपी की ग्रोथ पिछले दो वित्तीय साल में धीमी पड़ी है. शुरुआती गड़बडिय़ों के बावजूद हिंदुस्तान के अप्रत्यक्ष कर आधार में जीएसटी के लागू होने के बाद 50 फीसदी से ज्यादा का इजाफा हुआ है.

    कर और जीडीपी का अनुपात 2014 के वित्तीय साल के 5.7 फीसदी से बढ़कर 2018 के वित्तीय साल में 6 फीसदी पर पहुंच गया. प्रत्यक्ष कर संग्रह वित्तीय साल 2016 के 0.6 फीसदी से बढ़कर 2018 के वित्तीय साल में 1.9 फीसदी पर पहुंच गया.

    हालांकि नोटबंदी के अंतिम नतीजों पर अभी फैसला होना बाकी है और कुछ अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि इससे जीडीपी की ग्रोथ में 1-2 फीसदी की सेंध लग सकती है, पर इसका असर प्रत्यक्ष कर (खासकर आयकर) के बढ़े हुए अनुपालन में साफ दिखाई देता है.

    इसके बावजूद देखा जा रहा है कि नौकरियां 7.4 फीसदी की वृद्धि दर के साथ कदमताल करते हुए नहीं बढ़ी हैं और कारोबार करने में आसानी की फेहरिस्त में हिंदुस्तान की ऊंची छलांग के बाद भी निजी निवेश परवान नहीं चढ़ सके हैं.

    सामान्य मॉनसून और बंपर फसल के बावजूद 2018 में ग्रामीण अर्थव्यवस्था मुश्किलों से घिरी रही. कृषि की असल जीडीपी ग्रोथ वित्तीय साल 2010-14 के 4.3 फीसदी से तकरीबन आधी घटकर 2015-18 के वित्तीय साल में 2.4 फीसदी पर आ गई. बड़ी तादाद में नौकरियां देने वाले निर्माण क्षेत्र को नोटबंदी और जीएसटी की मार सहनी पड़ी है.

    ईंधन की बढ़ती कीमतों ने एक बार फिर अर्थव्यवस्था के सामने चुनौतियां खड़ी कर दीं हैं। इससे चालू खाते के घाटे पर सीधा असर पड़ेगा और यह महंगाई की आग में घी का काम कर सकती है. पेट्रोल-डीजल के दाम ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच रहे हैं और ऐसे में खुदरा तेल पर केंद्र और राज्य सरकारों के शुल्कों को कम करने की मांग तेज हो रही है.

    अगले साल सरकार को चुनाव की चुनौती से जूझना है। इस बीच कई राज्यों के बीच भी चुनाव की तैयारियां शुरु हो चुकी हैं। जाहिर है कि सरकार को जीएसटी और नोटबंदी जैसे मुद्दों पर जनता के बीच सभी तथ्य सिलसिलेबार रखने होंगे उसे बताना होगा कि किस तरह नोटबंदी करके देश ने एक बड़ा लक्ष्य हासिल किया है तभी वो जनता की नाराजगी से बच पाएगी।

  • किसानों तक पहुंच गया देश का कृषि बाजार

    किसानों तक पहुंच गया देश का कृषि बाजार

    राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना से जुड़ीं मध्यप्रदेश की 58 कृषि उपज मण्डियाँ

    भोपाल,4 जून(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।देश के अन्नदाता का सोना बिचौलियों के हाथों पड़ने के कारण अब तक खेती किसानी का जीवन एक अबूझ पहेली बना हुआ है। शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने इस दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए अब सभी कृषि उपज मंडियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार से जोड़ दिया है। कृषि बाजार (ई-नाम) एक पैन-इण्डिया इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल है। यह कृषि उपजों के लिये एकीकृत राष्ट्रीय बाजार का निर्माण करने का सशक्त माध्यम है। कृषि उपज मण्डी से संबंधित सभी सूचनाओं और सेवाओं के लिये यह ई-नाम पोर्टल सिंगल विण्डो सेवा प्रदान कर रहा है। इस पोर्टल में उपज के आगमन और कीमतों तथा उपज को खरीदने और बेचने के व्यापारिक प्रस्तावों के प्रावधान को शामिल किया गया है। प्रदेश में ई-नाम पोर्टल के माध्यम से अभी तक 58 कृषि उपज मण्डियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार से जोड़ा जा चुका है।

    http://www.enam.gov.in/NAM/home/index.html

    इस अभिनव पहल से प्रदेश की 58 कृषि उपज मण्डियाँ राष्ट्रीय कृषि बाजार से जुड़ गईं हैं। 13 कपास मण्डियों को भी राष्ट्रीय कृषि बाजार से जोड़ा जा रहा है।ई-नाम पोर्टल पर 49 लाख क्विंटल कृषि जिन्सों का व्यापार भी हो चुका है।

    प्रदेश में ई-नाम पोर्टल की शुरूआत भोपाल की पण्डित लक्ष्मीनारायण शर्मा कृषि उपज मण्डी करोंद से की गई। योजना के पहले चरण में प्रदेश की 19 चयनित कृषि उपज मण्डियों को इस पोर्टल से जोड़ा गया। ई-नाम पोर्टल से जुड़ी कृषि उपज मण्डियों में 6 जिन्सों पर ऑनलाईन ट्रेडिंग की जा रही है। योजना के दूसरे चरण में 30 और तीसरे चरण में 8 कृषि उपज मण्डियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना में शामिल किया गया है। अब तक प्रदेश की 58 कृषि उपज मण्डियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना से जोड़ा जा चुका है।

    इसके साथ ही, 13 कपास मण्डियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना से जोड़ने का कार्य तेजी से पूर्ण किया जा रहा है। प्रदेश में राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना में अब तक करीब 12 लाख किसानों से 19 हजार लायसेंस धारी व्यापारियों ने ई-प्लेटफार्म के माध्यम से करीब 49 लाख क्विंटल कृषि जिन्सों का व्यापार किया है। प्रदेश में ई-नाम पोर्टल की सभी 58 मण्डियों में कृषि उपज के गुणवत्ता परीक्षण के लिये वृहद एसेइंग एण्ड ग्रेडिंग लैब स्थापित करने की कार्यवाही की जा रही है। ई-नाम पोर्टल में देश के 18 राज्यों में मध्यप्रदेश की स्थिति गेट एन्ट्री और एसेइंग में प्रथम तथा बिड क्रिएशन और सेल ऐग्रीमेंट में तृतीय रही है। ज्ञातव्य है‍कि देश में अप्रैल 2016 से प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने ऑनलाइन राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना की शुरूआत की थी। इसका मकसद किसानों को उनकी उपज का राष्ट्रीय स्तर पर सही दाम दिलवाना है।

  • यूपीए की सरकारो ने डुबाए बैंक

    यूपीए की सरकारो ने डुबाए बैंक

    नईदिल्ली( अनिल जैन)।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बैंकिंग और रियल एस्टेट क्षेत्र की बिगड़ी हालत के लिए पिछली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। मोदी ने बुधवार को कहा कि उनकी सरकार अब उन नीतियों को सुधार रही है। इससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और खासकर छोटी और मझोली कंपनियों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्‍पर्धा करने में मदद मिलेगी।संप्रग की सरकारों ने बैंकों पर दबाव डालकर ऐसे उद्योगपतियों को कर्ज दिलाया था जो केवल कागजी खानापूर्ती करते थे।

    गुजरात में दूसरे और अंतिम चरण के लिए होने वाले मतदान से पहले मोदी ने छोटे और मंझोले उद्योगपतियों से हमदर्दी जताते हुए कहा कि कई बड़े औद्योगिक घराने उनके बकाये का भुगतान समय पर नहीं कर रही हैं। उन्होंने कहा कि अब इन कंपनियों को ई-मार्केटप्लेस के जरिये सीधे सरकार को अपना माल बेचने की अनुमति दे दी गई है। इससे पहले मोदी के गृह राज्य गुजरात में सूक्ष्म, लघु और मझोली इकाइयों ने वस्तु एवं सेवा कर का विरोध किया था। मोदी ने यह कहकर तसल्ली दी थी कि जीएसटी से उन्हें वैश्विक स्तर पर प्रतिस्‍पर्धा करने में मदद मिलेगी। अब यही बात वे बैंकिंग सुधार के सिलसिले में कह रहे हैं।

    औद्योगिक संस्था फिक्की की 90वीं वार्षिक आम बैठक को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि वित्तीय समाधान एवं जमा बीमा विधेयक के बारे में लोगों को गुमराह किया जा रहा है। उन्होंने जमाओं की सुरक्षा के बारे में फैलाए जा रहे भ्रम को दूर करने में फिक्की से मदद करने को कहा। प्रधानमंत्री बनने के बाद यह पहला मौका था जब मोदी ने किसी राष्ट्रीय उद्योग निकाय की बैठक को संबोधित किया। मोदी ने आयात पर निर्भरता खत्म करने और देश में ही उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कारोबारी समुदाय से मदद करने को कहा।

    मोदी ने कहा, ‘पुराने कानूनों को खत्म किया जा रहा है और नए कानून बन रहे हैं। हम यूरिया, कपड़ा, उड्डयन, परिवहन और स्वास्थ्य के क्षेत्र में नई नीति लाए हैं।’ उन्होंने कहा कि नई कपड़ा नीति से एक करोड़ रोजगार पैदा होंगे जबकि यूरिया नीति के कारण किसी नए संयंत्र को जोड़े बिना 18 से 28 लाख टन उत्पादन बढ़ा है। मोदी ने कहा कि उनकी सरकार ने रक्षा, निर्माण, खाद्य प्रसंस्करण और वित्तीय सेवा सहित 21 क्षेत्रों में 87 बड़े सुधार किए हैं। इन सुधारों के कारण पिछले 3 साल में विदेशी मुद्रा भंडार में 100 अरब डॉलर का इजाफा हुआ है और यह 400 अरब डॉलर के पार पहुंच गया है। उन्होंने कहा, ‘निर्माण क्षेत्र में अब तक जितना भी विदेशी प्रत्यक्ष निवेश आया है उसमें से 70 फीसदी पिछले 3 साल मे आया है जबकि वायु परिवहन के क्षेत्र में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश 75 फीसदी बढ़ा है।’

    मोदी ने आंकड़ों का सहारा लेकर यह संदेश देने की कोशिश की कि अर्थव्यवस्था पटरी पर है। उन्होंने कहा कि यात्री वाहनों की बिक्री नवंबर में सालाना आधार पर 14 फीसदी बढ़ी है, व्यावसायिक वाहनों की बिक्री में 50 फीसदी का इजाफा हुआ है, तिपहिया वाहनों की बिक्री 80 फीसदी बढ़ी है और दोपहिया वाहनों की बिक्री में 23 फीसदी से ज्यादा का इजाफा हुआ है। प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार की नीतियों के कारण विश्व बैंक की ताजा सूची में कारोबार आसान बनाने के मामले में भारत ने 30 पायदान की छलांग लगाई है। सरकार ने मुद्रा योजना के तहत पिछले 3 साल में 4.5 लाख करोड़ रुपये का ऋण देकर 3 करोड़ नए उद्यमी बनाए हैं।

    मोदी ने कहा कि स्टार्ट अप कंपनियों के लिए सिडबी ने फंड ऑफ फंड्स बनाया है जबकि सरकार ने वैकल्पिक निवेश फंड की अनुमति दी है। प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार की गरीबोन्मुखी योजनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि 2014 से महिलाओं के लिए मुफ्त रसोई गैस, सभी परिवारों के लिए बैंक खाते, युवाओं को ऋण और सस्ते मकानों की योजनाएं लागू की गई हैं।

    उन्होंने कहा कि जनधन योजना के तहत 30 करोड़ से अधिक लोगों के बैंक खाते खोले गए हैं। उन्होंने एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि जिन ग्रामीण इलाकों में ये खाते खोले गए हैं वहां महंगाई कम हुई है। प्रधानमंत्री ने कहा कि उद्योग जगत ने जीएसटी की मांग की थी। उन्होंने कहा, ‘मुझे याद है कि जब मैं गुजरात का मुख्यमंत्री था तो उद्योग प्रतिनिधिमंडल जीएसटी लागू करने की मांग को लेकर मेरे पास आया करता था।’ उन्होंने कहा कि देश के रेस्तराओं ने जीएसटी में कमी का फायदा अपने ग्राहकों को नहीं दिया है, जबकि जनता की असुविधा को देखते हुए सरकार ने दरों को दुबारा संयोजित भी किया ।

    मोदी ने कहा कि जीएसटी से बैंक क्रेडिट प्रवाह बढ़ेगा, कच्चे माल की गुणवत्ता बढ़ेगी और लॉजिस्टिक लागत में कमी आएगी। उन्होंने कहा कि सरकार चाहती है कि छोटे कारोबारी भी जीएसटी को अपनाएं, भले ही उनका टर्नओवर कुछ लाख ही क्यों न हो। ऐसा नहीं है सरकार उनसे राजस्व कमाना चाहती है लेकिन इससे पारदर्शिता आएगी। 20 लाख रुपये तक सालाना टर्नओवर वाले कारोबारियों को जीएसटी से दूर रखा गया है।

    मोदी ने पिछली संप्रग सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि उसने कुछ उद्योगपतियों को कर्ज देने के लिए बैंकों पर दबाव डाला। पिछली सरकार के अर्थशास्त्रियों ने विरासत के रूप में हमें बैंकिंग प्रणाली की गैर निष्पादित परिसंपत्तियां दी थीं। यह राशि राष्ट्रमंडल खेलों, कोयला और 2जी स्पेक्ट्रम घोटालों से बड़ी थी। उन्होंने कहा कि पिछली सरकार के दौरान मध्य वर्ग के लोगों ने अपनी मेहनत की कमाई बिल्डरों को दीं लेकिन उन्हें मकान नहीं मिला। मोदी ने सवाल किया, ‘क्या पिछली सरकार रेरा जैसा कानून नहीं बना सकती थी।’

  • पूंजी को ठगों से बचाने सरकार लाई नया कानून

    पूंजी को ठगों से बचाने सरकार लाई नया कानून


    बैंककारी विनियमन संशोधन विधेयक 2017
    नई दिल्ली। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कर्ज के दबाव में फंसी कंपनियों के प्रवर्तकों को आस्वस्त करते हुए कहा कि उनके पुराने फंसे कर्ज एनपीए की समस्या का समाधान करने के लिये लाए गए नए दिवाला एवं शोधन अक्षमता कानून का मकसद उन्हें बाहर करना नहीं बल्कि कर्ज वसूली सुनिश्चित करने के साथ साथ उनका बचाव करना भी है।

    कर्ज लेने वालों को बेहतर कर्ज संस्कृति विकसित करने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा, ‘वह पुरानी व्यवस्था जिसमें कर्ज देने वाला कर्जदार का पीछा करते करते थक जाता था और आखिर में उसे कुछ हाथ नहीं लगता था अब समाप्त हो चुकी है। यदि कर्ज लेने वाले को व्यवसाय में बने रहना है तो उसे अपने कर्ज की किस्त-ब्याज को समय पर चुकाना होगा अन्यथा उसे दूसरे के लिए रास्ता छोड़ना होगा।’ जेटली देश के प्रमुख वाणिज्य और उद्योग मंडल सीआईआई द्वारा आयोजित एक बैठक को संबोधित कर रहे थे।

    उन्होंने कहा, ‘एनपीए समस्या के समाधान के पीछे वास्तविक उद्देश्य संपत्तियों को समाप्त करना नहीं है, बल्कि इन व्यवसायों को बचाना है। यह काम चाहे इन कंपनियों के मौजूदा प्रवर्तक खुद करें अथवा अपने साथ नया भागीदार जोड़कर करें या फिर नए उद्यमी आएं और यह सुनिश्चित करें कि इन मूल्यवान संपत्तियों को संरक्षित रखा जा सके।’

    कर्ज वसूली सुनिश्चित करने वाले नए कानून को कर्जदाताओं को मजबूती देने वाले प्रावधान के रूप में देखा जा रहा है। बैंक और कर्ज देने वाली विभिन्न संस्थाएं 8 लाख करोड़ रुपये के फंसे कर्ज से जूझा रही हैं। समूचे फंसे कर्ज में अकेले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की ही 75 प्रतिशत तक राशि है।

    उन्होंने नए दिवाला और शोधन अक्षमता कानून की जरूरत को बताते हुए कहा कि ऋण वसूली न्यायाधिकरणों के अपना काम प्रभावी तरीके से नहीं करने और उनके असफल रहने की वजह से यह कानून लाना पड़ा है। उन्होंने कहा कि प्रतिभूतिकरण और वित्तीय आस्तियों का पुनर्गठन एवं प्रतिभूति हितों का प्रवर्तन सरफेसी कानून शुरू के दो तीन सालों के दौरान एनपीए को प्रभावी ढंग से नीचे लाने में सफल रहा था। लेकिन उसके बाद ऋण वसूली न्यायाधिकरण उतने प्रभावी नहीं रहे जितना समझा गया था, जिसकी वजह से नया कानूना लाना पड़ा।

  • किसान को माफिया से नहीं बचा पा रही भावांतर योजना

    किसान को माफिया से नहीं बचा पा रही भावांतर योजना


    भोपाल,(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।नीति आयोग की पहल पर मध्यप्रदेश को प्रयोगभूमि बनाने वाली भावांतर भुगतान योजना किसानों के शोषण और लूट का हथियार साबित हो रही है। लगातार संशोधनों के बाद योजना का मूल उद्देश्य कुचल गया है और अब इसने मंडियों में माफिया के हाथ मजबूत कर दिए हैं। बाजार से सरकार का नियंत्रण छूट गया है और मंडियों का प्रशासन व्यापारियों से गठजोड़ करके किसानों की फसलों से भारी कमीशन कबाड़ रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार इस कुशासन के सामने लाचार साबित हो रही है।

    राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के अध्यक्ष पं.शिवकुमार शर्मा इसे किसान हितैषी होने का पाखंड रच रही शिवराज सिंह सरकार की असफल योजना बता रहे हैं। उनका कहना है कि इस योजना के माध्यम से किसानों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। उनका कहना है कि इस योजना की असफलता के कारण किसान आगे बढ़कर सरकार के खिलाफ आंदोलन पर उतारू हो गए हैं। जब खुद मुख्यमंत्री, उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी, पार्टी और किसान कल्याण विभाग किसानों को इस योजना से सहमत नहीं करा पाए तो प्रमुख सचिव स्तर के 25अधिकारियों को मंडियों में भेजा जा रहा है। वे भी किसानों के आक्रोश को नहीं रोक पा रहे हैं और राधेश्याम जुलानिया जैसे अफसर अब किसानों को मजदूरी करने की सलाह देने लगे हैं।

    दरअसल अपने सबसे बड़े वोट बैंक किसान को खुश करने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने योजना आयोग की इस योजना को पहली बार मध्यप्रदेश में लागू किया है। जबकि इससे पहले इस योजना का पायलट प्रोजेक्ट गोवा में लागू किया गया था। जब व्यावहारिक कठिनाईयां सामने आईँ तो सरकार ने आनन फानन में संशोधन किए और पंद्रह संशोधनों के बाद भी मंडी माफिया पर लगाम लगाना संभव नहीं हो पाया है। सबसे बड़ी बात तो ये है कि किसानों की फसलों को सीलिंग सीमा में बांधकर रखा गया है। जिसके चलते अधिक फसलें उपजाने वाले किसानों की फसलें औने पौने दामों पर मंडी माफिया छीन रहा है।

    खुद को किसान हितैषी बताने वाली शिवराज सिंह चौहान की सरकार की नीतियों से एक ओर जहां किसान को उसकी फसलों का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है वहीं आम नागरिकों को कृषि उत्पादों के लिए मंहगी कीमत चुकानी पड़ रही है। किसानों के शोषण की नींव एक दशक पहले ही पड़ गई थी। जब शिवराज सिंह चौहान सरकार ने मंडी एक्ट पारित करके किसानों पर अपरोक्ष नियंत्रण करने का प्रयास किया था। पूर्ववर्ती कांग्रेसी सरकार के मंडी एक्ट में किसान अपने वोट से मंडियों के अध्यक्ष का चुनाव करता था। जबकि एक में संशोधन के बाद मंडी अध्यक्ष के पद करोड़ों रुपयों में बिकने लगे। यानि जिस किसान के पास ऋण पुस्तिका है वो केवल अपने वार्ड के सदस्यों का चुनाव करते हैं. अब ये वार्ड मेंबर मिलकर अध्यक्ष का चुनाव करते हैं। इस अप्रत्यक्ष चुनाव से मंडियों पर माफिया की सत्ता स्थापित हो गई है। अब जबकि मंडियों में पदाधिकारी और व्यापारी मिलकर किसानों की फसलों को लूटने लगे हैं तब एक्ट में बदलाव के दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं।

    सबसे बड़ी बात तो ये है कि मंडियों के इस माफिया ने सरकारी तंत्र के नेफेड(भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ मर्यादित) जैसे संगठनों को भी अपने कब्जे में ले लिया है। पिछली फसल की खरीद के दौरान नेफेड ने किसानों से एक जिले में लगभग90 हजार क्विंटल मूंग 2022 रुपए प्रति क्विंटल की दर से खरीदी थी। जब किसान आंदोलन के बाद दबाव में आई सरकार ने घोषणा की कि वो किसानों की फसलों को खरीदेगी तो नेफेड ने वही दाल व्यापारियों को बेच दी। व्यापारियों ने वही दाल सरकार को 5250 रुपए की दर पर बेच दी। इस तरह फसलों की बार बार खरीदी बिक्री ने आढ़तियों और माफिया को तो लाभ पहुंचाने के लिए सरकार को चूना लगाया है। राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के नेता पं. शिवकुमार शर्मा कहते हैं कि सरकार को झूठी शान छोड़कर इस योजना को तत्काल बंद करना चाहिए, तभी किसानों को माफिया के चंगुल से छुड़ाया जा सकता है।

    इस योजना को लेकर जो भ्रम फैले हैं उनके चलते किसान योजना में अपना पंजीयन नहीं करा पा रहे हैं। सरकार ने पंद्ह दिनों का समय बढ़ाकर आधार कार्ड, समग्र आईडी, फोटो, खसरे की प्रति, और ऋण पुस्तिका जैसे दस्तावेजों के आधार पर पंजीयन कराने के निर्देश दिए हैं पर इससे फर्जी किसानों का पंजीयन तो हो गया पर जरूरत मंद छोटा किसान अब भी वंचित ही रह गया है। मजबूरन सरकार को फसलों के रिकार्ड खंगालना पड़ रहे हैं कि खाद्यान्न लेकर मंडी में आने वाले किसान के पास जमीन है भी या नहीं। या फिर उसने वह खाद्यान्न खेत में बोया भी है या नहीं।

    मंडी एक्ट में स्पष्ट प्रावधान है कि सरकार व्यापारी से जो खाद्यान्न खरीदेगी उसका भुगतान वो उसी दिन कर देगी। इसके विपरीत सरकार ने किसान को तीन महीने में भुगतान करने का वादा किया है जो सीधे तौर पर मंडी एक्ट का उल्लंघन है। प्याज, मूंग, उड़द और तुअर जैसी फसलों के भुगतान किसानों को छह महीनों में भी नहीं किए गए हैं जिससे किसानों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।

    मोदी सरकार ने सत्ता में आने के लिए किसान को उसकी फसल के पचास फीसदी हिस्से पर लाभकारी मूल्य देने का वायदा किया था।अब जबकि उसकी ही एक प्रदेश सरकार भावांतर योजना पर किसानों को मंडी माफिया से नहीं बचा पा रही है तब मोदी सरकार खामोश है और विपक्षी राजनीतिक दलों के लिए ये योजना एक अच्छा राजनीतिक हथियार साबित हो रही है।

  • वित्तीय साक्षरता देश की जरूरत

    वित्तीय साक्षरता देश की जरूरत

    वित्तीय शिक्षा

    21वीं शताब्दी की पहली दशाब्दी में लोगों में वित्तीय साक्षरता फैलाने की आवश्यकता को सभी ने स्वीकार किया। अधिकतर देश वित्तीय शिक्षा के लिए एकीकृत और समन्वित राष्ट्रीय रणनीति अपना रहे हैं। भारत एक बड़ी जनसंख्या वाला देश है, जहां राष्ट्रीय स्तर पर समग्र विकास पर जोर दिया जा रहा है और अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और इसके साथ एक जीवंत और स्थिर वित्तीय प्रणाली विकसित करने की तुरंत आवश्यकता महसूस की जा रही है, ऐसी स्थिति में यह और भी जरूरी हो गया है कि जल्दी ही एक राष्ट्रीय रणनीति तैयार करके उसे लागू किया जाए।

    वित्तीय साक्षरता फैलाने के कार्य में केन्द्र और राज्य सरकारें, वित्तीय नियामक, वित्तीय संस्थाएं, सभ्य समाज, शिक्षाविद् और अन्य एजेंसियां जैसे कई पक्ष शामिल हैं। इसलिए एक व्यापक राष्ट्रीय रणनीति बनाना जरूरी है, ताकि ये सभी उस रणनीति के अनुसार एकरूपता से काम करें और विरोधी उद्देश्‍यों के लिए काम न करें।
    इस प्रकार राष्ट्रीय रणनीति का उद्देश्य वित्तीय दृष्टि से एक जागरूक और सशक्त भारत बनाना है। इसका उद्देश्य एक विशाल वित्तीय शिक्षा अभियान चलाना है जिससे आर्थिक खुशहाली के लिए लोगों को उपयुक्‍त वित्‍तीय सेवाओं के जरिए अपने धन का अधिक कारगर तरीके से प्रबंधन करने में मदद मिल सके।
    वित्तीय साक्षरता क्या है?
    आर्थिक सहयोग और विकास संगठन ने वित्तीय साक्षरता की परिभाषा इस प्रकार दी है कि-यह वित्तीय जागरूकता, ज्ञान, कौशल, दृष्टिकोण और व्यवहार का संयुक्त समग्र रूप है, जिसकी सहायता से वित्तीय फैसले लिये जा सकें और व्यक्ति अपनी आर्थिक स्थिति को बेहतर बना सकें। लोग वित्तीय शिक्षा की प्रक्रिया के माध्यम से वित्तीय साक्षरता प्राप्त करते हैं।

    वित्‍तीय समावेशीकरण : सरकार की उच्‍च प्राथमिकता वाली नीति
    भारत सरकार ने वित्‍तीय साक्षरता को फैलाने के महत्‍व को स्‍वीकार किया है, ताकि घरेलू बचतों को निवेशों में लगाने के लिए जोरदार प्रयास किये जा सकें। लेकिन वित्‍तीय उत्‍पादों की विविधिता और जटिलता ने एक साधारण व्‍यक्ति के लिए सही प्रकार का फैसला लेना मुश्किल कर दिया है। वित्‍तीय साक्षरता से विश्‍वास, ज्ञान और कौशल में वृद्धि होती है, जिससे वित्‍तीय उत्‍पादों और सेवाओं का सही लाभ उठाया जा सकता है और अपनी वर्तमान तथा भावी परिस्थितियों पर अधिक नियंत्रण किया जा सकता है। वित्‍तीय साक्षरता से शोषण करने वाली वित्‍तीय योजनाओं और साहूकारों द्वारा लिये जाने वाले अधिक ब्‍याज से भी लोगों को और समाज को बचाने में मदद मिलती है।

    यह उम्‍मीद की जाती है कि वित्‍तीय शिक्षा से अर्थव्‍यवस्‍था में कई गुणा प्रभाव होगा। एक सुशिक्षित परिवार नियमित रूप से बचतें करेगा, सही योजनाओं में निवेश करेगा और अपनी आमदनी बढ़ायेगा। इस प्रकार व्‍यक्तियों की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा तथा समाज की भलाई होगी।

    अंतर्राष्‍ट्रीय अनुभव और भारत के लिए सबक
    विश्‍व में चैक गणराज्‍य, नीदरलैंड, न्‍यूजीलैंड, स्‍पेन और ब्रिटेन जैसे देश वित्‍तीय शिक्षा के लिए राष्‍ट्रीय रणनीति पहले ही लागू कर चुके हैं तथा कई अन्‍य देश रणनीति बनाने और उसे लागू करने की प्रक्रिया में हैं।

    भारत में विशाल विविधता को देखते हुए हमें राष्‍ट्रीय रणनीति के अंतर्गत कई स्‍तरों पर काम करना होगा। राष्‍ट्रीय रणनीति का प्रारूप तैयार कर लिया गया है, जिसके उद्देश्‍य हैं – 1. वित्‍तीय सेवाओं, विभिन्‍न वित्‍तीय उत्‍पादों और उनकी विशिष्‍टताओं की जानकारी के लिए उपभोक्‍ताओं को जागरूक बनाना और शिक्षित करना। 2. जानकारी को व्‍यवहार में बदलने की वृत्तियों को विकसित करना और 3. वित्‍तीय सेवाओं के लाभार्थियों के रूप में उपभोक्‍ताओं को उनके अधिकारों और जिम्‍मेदारियों की जानकारी देना।

    वित्‍तीय जगत में तेजी से हो रहे परिवर्तनों को देखते हुए रणनीतिक कार्य योजनाओं के जरिए राष्‍ट्रीय रणनीति को 5 वर्ष के अंदर लागू करने की व्‍यवस्‍था रखी गई है।

    वित्‍तीय साक्षरता और समावेशीकरण का आकलन करने के लिए नमूना सर्वेक्षण
    इस रणनीति में वित्‍तीय समावेशीकरण और वित्‍तीय साक्षरता की स्थिति का आकलन करने के‍ लिए राष्‍ट्रव्‍यापी नमूना सर्वेक्षण की व्‍यवस्‍था है। इस सर्वेक्षण के अंतर्गत वित्‍तीय समावेशीकरण की स्थिति, विभिन्‍न वित्‍तीय उत्‍पादों के बारे में वित्‍तीय जागरूकता का स्‍तर, सुविचारित फैसले लेने के लिए वित्‍तीय क्षमता का स्‍तर तथा धन के प्रति लोगों का नजरिया और जोखिम उठाने के प्रति उनकी सोच, जैसे पहलुओं का आकलन किया जाएगा।

    सर्वेक्षण के आकलन के आधार पर विभिन्‍न वित्‍तीय नियामक लोगों की आवश्‍यकताओं को ध्‍यान में रखते हुए वित्‍तीय शिक्षा के अपने प्रकल्‍प बनायेंगे, बाद में स्‍कूल पाठयक्रम, सोशल मार्किटिंग तथा रेडियो, टे‍लीविजन, समाचार पत्र आदि के माध्‍यम से इनका प्रचार किया जाएगा तथा समर्पित वित्‍तीय शिक्षा वेबसाइट भी विकसित की जाएगी। इस कार्य में स्‍व-सहायता समूहों, माइक्रो-वित्‍तीय संस्‍थाओं, निवेशकों और उपभोक्‍ता एसोसिएशनों आदि की भी सहायता लेने का प्रस्‍ताव है।

    स्‍कूल पाठ्यक्रम में वित्‍तीय शिक्षा
    सरकार का मानना है कि वित्‍तीय शिक्षा स्‍कूल से ही शुरू हो जानी चाहिए और लोगों को जीवन में जितना जल्‍दी हो सके, वित्‍तीय मामलों के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन ने स्‍कूलों के लिए अच्‍छे वित्‍तीय शिक्षा कार्यक्रम तैयार करने के उद्देश्‍य से सम्‍बद्ध पक्षों के लिए तथा नीति निर्माताओं की सहायता के लिए मार्ग-निर्देश तैयार किये हैं।

    लेकिन यह बात स्‍पष्‍ट रूप से समझनी होगी कि वित्‍तीय शिक्षा स्‍कूलों में पढ़ाये जाने के लिए अलग विषय नहीं होगा, इसे केवल स्कूल पाठ्यक्रम में उचित रूप से समावेशित करना होगा। उदाहरण के लिए स्‍कूलों में गणित के विषय में चक्रवृद्धि ब्‍याज के बारे में समझाया जाता है कि एक व्‍यक्ति –ए दूसरे व्‍यक्ति –बी को कुछ वार्षिक ब्‍याज दर पर पैसा उधार देता है और उस पर चक्रवृद्धि ब्‍याज लगता है। इस अवसर का फायदा वित्‍तीय शिक्षा के लिए उठाया जा सकता है और लोगों को इस तरह समझाया जा सकता है कि एक कंपनी बैंक से पैसा उधार लेती है, या एक बैंक उपभोक्‍ता, सामान्‍य निश्चित अवधि का जमा खाता खोलने की बजाय एक सामूहिक जमा खाता खोलता है। इसी प्रकार नैतिक शिक्षा के पाठ्यक्रमों में ऐसी बातें शामिल की जा सकती हैं, जो रोजमर्रा के वित्‍तीय लेन-देनों पर आधारित हों।

    केन्‍द्रीय माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड-सीबीएसई प्राथमिक स्‍तर से ऊपर वाली कक्षाओं के लिए स्‍कूल शिक्षा में समन्वित रूप से वित्‍तीय शिक्षा को शामिल करने के बारे में सिद्धांत रूप से सहमत हो गया है और इस संबंध में विशेषज्ञों की एक समिति का भी गठन किया गया है।

    वित्‍तीय शिक्षा के प्रचार में नियामकों की भूमिका
    भारत में विभिन्‍न वित्‍तीय नियामक, जैसे भारतीय रिजर्व बैंक, भारतीय प्रतिभूति नियमन बोर्ड-सेबी, विनियामक और विकास प्राधिकरण आदि बहुसूत्रीय प्रणाली के जरिए विशाल वित्‍तीय साक्षरता कार्यक्रम पहले ही शुरू कर चुके हैं।

    भारतीय रिजर्व बैंक ने स्‍कूल और कॉलेज के छात्रों, महिलाओं, ग्रामीण और शहरी गरीबों, रक्षा सेनाओं के कर्मचारियों, और वरिष्‍ठ नागरिकों सहित विभिन्‍न लक्षित समूहों को केन्‍द्रीय बैकों के बारे में और सामान्‍य बैंकिंग प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी देने के लिए ‘प्रोजेक्‍ट फाइनेंशियल लिटरेसी’’ नाम से एक परियोजना शुरू की है। सेबी ने देशभर में अनुभवी और जानकार लोगों की एक सूची तैयार की है, जो विभिन्‍न समूहों को बचतों, निवेश, वित्‍तीय आयोजन, बैंकिंग, बीमा, सेवानिवृत्ति के बाद धन के उपयोग की योजनाओं, आदि जैसे विभिन्‍न पहलुओं के बारे में जानकारी देने के लिए कार्यशालाओं का आयोजन करते हैं। विभिन्‍न राज्‍यों में अब तक ऐसी 3500 से अधिक कार्यशालाएं आयोजित की जा चुकी हैं, जिनसे लगभग 3 लाख लोग लाभ उठा चुके हैं।

    बीमा नियमन और विकास प्राधिकरण पॉलिसी धारकों को अधिकारों और कर्तव्‍यों के बारे में और विवादों को हल करने के तरीकों के बारे में रेडियो, टेलीविजन और समाचार पत्रों के माध्‍यम से अंग्रेजी, हिन्‍दी तथा 11 अन्‍य भारतीय भाषाओं के जरिए सरल भाषा में संदेश और जानकारियां देते हैं।
    पेंशन निधि और विकास प्राधिकरण, आम जनता को सामाजिक सुरक्षा संबंधी संदेश देता है। इस प्राधिकरण ने पेंशन के बारे में आमतौर पर पूछे जाने वाले प्रश्‍नों की सूची को अपनी वेबसाइट पर डाला है तथा समाज के वंचित वर्गों को पेंशन सेवाओं का लाभ दिलाने के लिए यह विभिन्‍न गैर-सरकारी संगठनों के साथ सहयोग कर रहा है। इसी प्रकार, व्‍यावसायिक बैंक, स्‍टॉक एक्‍सचेंज, कमीशन एजेंसियों और म्‍युचुअल फंडों ने भी वित्‍तीय शिक्षा के बारे में प्रयास किये हैं। इसके लिए उन्‍होंने सेमिनार आयोजित किये हैं और समाचार पत्रों में अभियान चलाए हैं तथा क्‍या करना चाहिए और क्‍या नहीं करना चाहिए, जैसी जानकारियां उपलब्‍ध कराई हैं।

    इन सभी संस्‍थानों ने वित्‍तीय साक्षरता प्रदान करने के लिए जो विशाल सामग्री तैयार की है, उसको एकत्र करने और वर्गीकृत करने की आवश्‍यकता है, ताकि वह देश में वित्‍तीय शिक्षा के लिए ज्ञान का आधार बन सके।

    संस्‍थागत प्रबंधों के अंतर्गत राष्‍ट्रीय वित्‍तीय शिक्षा संस्‍थान की स्‍थापना की गई है, जिसके सदस्‍यों में विभिन्‍न नियामकों के प्रतिनिधि हैं। इस संस्‍थान का मुख्‍य उद्देश्‍य विभिन्‍न वित्‍तीय क्षेत्रों के लिए वित्‍तीय शिक्षा की सामग्री तैयार करना होगा। यह संस्‍थान खासतौर पर वित्‍तीय शिक्षा के लिए एक वेबसाइट भी तैयार करेगा।

    पूरी नीति पर अमल मौजूदा संस्‍थागत तंत्र के माध्‍यम से किया जाना है। वित्‍तीय समावेशीकरण और वित्‍तीय साक्षरता की वित्‍तीय स्थिरता और विकास परिषद की उप-समिति के तकनीकी दल को राष्‍ट्रीय नीति के अमल पर निगरानी रखने के लिए जिम्‍मेदारी सौंपी जाएगी।

    * इस लेख के लिए सामग्री 16.07.2012 को जारी भारतीय रिजर्व बैंक के वित्‍तीय शिक्षा की राष्‍ट्रीय रणनीति-2012 के प्रारूप से ली गई है। (पत्र सूचना कार्यालय, मुंबई)

  • अब समझौता शुल्क से निपट जाएंगे श्रमिकों के प्रकरण

    अब समझौता शुल्क से निपट जाएंगे श्रमिकों के प्रकरण

    भोपाल 12 अक्टूबर(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)

    प्रदेश में ईज ऑफ डूईंग बिजनेस के उद्देश्य से श्रम कानूनों में प्रक्रियाओं को श्रमिक एवं नियोजक के हित में सरल बनाया गया है। प्रावधानों को अधिक युक्‍तियुक्‍त किया गया है। विभागीय कार्यप्रणाली में पारदर्शिता के साथ सूचना प्रौद्योगिकी का व्‍यापक उपयोग करते हुए वर्ष 2014 से अब तक अनेक महत्वपूर्ण कदम इस संबंध में उठाये गये हैं।

    वॉलन्‍टरी कम्‍प्‍लायंस स्‍कीम

    अक्‍टूबर 2014 में प्रारंभ की गयी वॉलन्‍टरी कम्‍प्‍लायंस स्‍कीम विश्‍व बैंक, केन्‍द्र सरकार और अन्‍य राज्‍यों द्वारा सराही गयी है। स्कीम में 16 श्रम कानूनों में 61 रजिस्‍टर के स्‍थान पर एक रजिस्‍टर रखने तथा कार्यालयों में 13 रिटर्न की जगह मात्र 2 वार्षिक रिटर्न का प्रावधान किया गया है। पाँच वर्षों में संस्‍थान के अधिकतम एक बार निरीक्षण का प्रावधान किया गया है।

    श्रम कानूनों में संशोधन

    राज्‍य के 3 और केन्‍द्र के 15 श्रम कानूनों में संशोधन कर निवेशक एवं श्रमिक हितैषी बनाया गया है। राज्‍य के लाखों श्रमिकों के हित में सेवानिवृत्‍ति की आयु 58 से बढाकर 60 वर्ष की गयी। मध्यप्रदेश औद्योगिक नियोजन (स्थायी आज्ञा) अधिनियम के लागू होने संबंधी श्रमिक संख्‍या सीमा 20 से बढ़ाकर 50 की गयी तथा माइक्रो इण्‍डस्‍ट्रीज को इससे छूट दी गयी है। दस से कम श्रमिक संख्‍या वाले संस्‍थानों में निरीक्षण के लिए श्रम आयुक्‍त की अनुमति अनिवार्य की गयी है।

    मध्‍यप्रदेश श्रम कल्‍याण निधि अधिनियम से माइक्रो इण्‍डस्‍ट्रीज को छूट दी गयी है। श्रमिकों के अधिसमय कार्य के घंटों को किसी तिमाही में श्रमिकों की सहमति से 75 से बढ़ाकर 125 किये जाने का प्रावधान किया गया है। रात्रि पाली में महिलाओं की सुरक्षा को सुनिश्चित करते हुए रात्रि 8.00 बजे से सुबह 6.00 बजे तक कार्य की अनुमति का प्रावधान किया गया है। श्रमिकों को पिछले वर्ष में 240 दिन के स्थान पर 180 दिन कार्य करने पर उसी केलेण्डर वर्ष में सवैतनिक अवकाश की सुविधा उपलब्‍ध करायी गयी है। श्रमिकों की छंटनी की स्थिति में एक माह की सूचना के प्रावधान के स्थान पर तीन माह की सूचना के साथ न्यूनतम 3 माह के वेतन के भुगतान का प्रावधान किया गया है। किसी संस्थान में ले-ऑफ, छंटनी या बंदीकरण के लिए पूर्व अनुमति की आवश्यकता 100 श्रमिक वाले संस्थानों के स्थान पर 300 या अधिक श्रमिक वाले संस्थानों के लिए की गयी है। सेवा समाप्‍ति संबंधी औद्योगिक विवाद प्रस्‍तुत करने की समय-सीमा तीन वर्ष निर्धारित की गयी है।

    निवेशकों के हित में मध्‍यप्रदेश दुकान एवं स्‍थापना अधिनियम, ठेका श्रम अधिनियम, मोटर यातायात श्रमिक अधिनियम, भवन संन्निर्माण कर्मकार अधिनियम और अन्‍तर्राज्‍यीय प्रवासी कर्मकार अधिनियम प्रावधान किये गये हैं कि यदि अधिनियम में पंजीयन या लायसेंस व उसके नवीनीकरण आवेदन को 30 दिन में स्‍वीकृत नहीं किया जाता है तो इसे स्‍वत: पंजीकृत (डीम्‍ड) माना जाएगा। मध्‍यप्रदेश दुकान एवं स्‍थापना अधिनियम, मध्‍यप्रदेश औद्योगिक नियोजन (स्‍थाई आदेश) अधिनियम, समान पारिश्रमिक अधिनियम, श्रम विधि (विवरणी देने और रजिस्टर रखने से कतिपय स्थापनाओं को छूट) अधिनियम, न्यूनतम वेतन अधिनियम, वेतन भुगतान अधिनियम, विक्रय संर्वधन कर्मचारी (सेवा की शर्ते) अधिनियम में उल्‍लंघन के प्रकरण न्‍यायालय ले जाने के स्‍थान पर कार्यालय में समझौता शुल्‍क देकर निराकृत किये जाने का प्रावधान किया गया।

  • आर्थिक सुधारों पर संकट का कोहराम

    आर्थिक सुधारों पर संकट का कोहराम

    एमके वेणु
    2019 के चुनावों से 18 महीने पहले, भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था पूरी तरह से लड़खड़ाई हुई दिखाई दे रही है, लेकिन नरेंद्र मोदी द्वारा लगातार 2022 तक पूरे किए जाने वाले नामुमकिन वादों की झड़ी लगाने का सिलसिला जारी है.

    चारों तरफ से आ रही आर्थिक संकट की ख़बरों ने अचानक भाजपा की जान को सांसत में डाल दिया है. नोटबंदी के फैसले के बाद कुछ वैसी ही बदइंतजामी जीएसटी को लागू करने के मामले में भी दिखाई दे रही है. इसने छोटे कारोबारियों की कमर तोड़ दी है, जिसका नतीजा नोटबंदी के बाद के महीनों में उत्पादन और बेरोजगारी में आई गिरावट की स्थिति के और भयावह होने के तौर पर सामने आया है.

    कारोबारी कंपनियां जीएसटी के लागू होने से पहले अपना स्टॉक खाली करने में लगी हुई थीं. उन्हें उम्मीद थी कि वे नई कर-प्रणाली में नया स्टॉक जमा करेंगी. लेकिन, विशेषज्ञों का कहना है कि जीएसटी को खराब तरीके से लागू किए जाने के कारण नया स्टॉक जमा करने रफ्तार काफी सुस्त है और कंपनियां फिलहाल जीएसटी व्यवस्था के स्थिर होने का इंतजार कर रही हैं. इसके बाद ही वे रफ्तार पकड़ेंगी.

    इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि यह सब त्योहारों के मौसम के ठीक पहले हो रहा है. 2017 की दूसरी छमाही में इसका असर आर्थिक विकास पर पड़ना तय है. जैसा कि कई लोगों ने आशंका जताई थी, जीएसटी को लागू करने के बाद मुद्रास्फीति में भी थोड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. पिछले कई दशकों में घरेलू पेट्रोल और डीजल की सर्वाधिक कीमत ने भी स्थिति को और बिगाड़ने का काम किया है.

    इसे विडंबना ही कहा जा सकता है कि तेल पर लगाए गए रिकॉर्ड टैक्स स्थिर राजस्व का एकमात्र स्रोत हैं, क्योंकि इसे जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया है. फिलहाल जीएसटी नहीं, तेल पर लगा कर ही केंद्र सरकार की जान बचाए हुए है.

    वित्त मंत्री अरुण जेटली की मुश्किलों को और बढ़ाते हुए जीएसटी नेटवर्क के उम्मीदों से कमतर प्रदर्शन (ऐसा कहना शायद स्थिति की गंभीरता को कम करके बताना है) ने 2017-18 में राजस्व में कमी का गंभीर खतरा पैदा कर दिया है. इससे केंद्र के राजकोषीय हिसाब-किताब के गड़बड़ाने की आशंका पैदा हो गई है. वित्त मंत्रालय को पहला झटका तब लगा जब जुलाई के महीने के लिए जीएसटी के तहत जमा हुए 95,000 करोड़ रुपये में से कुल 65,000 करोड़ रुपये के रिफंड का दावा उसके सिर पर आ गया.

    अगर इन सारे रिफंड दावों को स्वीकार कर लिया जाता है, तो केंद्र के पास महज 30,000 करोड़ रुपये ही बचेंगे, जबकि बजट में प्रति माह वास्तविक कर संग्रह 90,000 करोड़ से ज्यादा होने का अनुमान लगाया गया है. पुराने स्टॉक पर रिफंड के प्रावधान के कारण पहले महीने में रिफंड के ज्यादा दावों के आने का अंदाजा पहले से ही था. अनुमान है कि आनेवाले महीनों में जीएसटी से ज्यादा राजस्व प्राप्त होगा. लेकिन, जीएसटीएन के सॉफ्टवेयर में आ रही दिक्कतों को देखते हुए इस वित्तीय वर्ष में इस पूरी कवायद का भविष्य अधर में लटका हुआ नजर आता है.

    जीएसटीएन में आ रही विभिन्न परेशानियों को दूर करने के लिए राज्यों के मंत्रियों की नवनिर्मित समिति की अगुआई कर रहे बिहार के उप-मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने पिछले सप्ताह एक दिलचस्प बयान दिया: ‘हम नाव को खेते हुए नाव का निर्माण कर रहे हैं.’ साफ तौर पर यह बयान केंद्र को कठघरे में खड़ा करता है, जिसने बगैर पर्याप्त तैयारी के जीएसटी को लागू कर दिया.

    इस नई समिति के सदस्य कर्नाटक के कृषि मंत्री कृष्ण बायरे गौड़ा ने बताया कि जीएसटीएन के सॉफ्टवेयर के साथ कई दिक्कतें हैं, जिन्हें ठीक करने में कम से कम छह महीने का वक्त लग जाएगा.

    उन्होंने कहा, ‘फिलहाल बहुत बुनियादी परेशानियां सामने आ रही हैं. मसलन, व्यापारी यह शिकायत कर रहे हैं कि उन्होंने रजिस्ट्रेशन करा लिया है और जीएसटी रिर्टन भी अपलोड कर दिया है, लेकिन इसे सिस्टम द्वारा नहीं दिखाया जा रहा है. सिस्टम की कछुआ चाल ने टैक्स भरनेवालों को दिन में तारे दिखा दिए हैं. जीएसटी सिस्टम इनवॉयस और विभिन्न चरणों, मसलन, जीएसटीआर-2 और जीएसटीआर-3, पर भरे गए रिटर्नों को अपलोड करने में भी परेशानी पैदा कर रहा है. इससे भी खराब बात ये है कि राज्य सरकारें जीएसटी अदायगी की निगरानी करने के लिए कंपनियों से संबंधित आंकड़ों को निकालने में असमर्थ साबित हो रही हैं.’

    गौड़ा का कहना है कि समिति के सदस्यों से सॉफ्टवेयर प्रोवाइडर से बात की है और ‘उनका कहना है कि उन्हें जुलाई में जीएसटी के लागू होने से पहले आखिरी मौके पर प्रक्रियागत नियमावली (प्रोटोकॉल) सौंपी गई. ट्रायल रन करने के लिए पर्याप्त समय नहीं था.’ इसलिए अब हम यह समझ सकते हैं कि आखिर सुशील मोदी के यह कहने का क्या अर्थ है कि नाव का निर्माण, बहती हुई नाव पर बैठे-बैठे किया जा रहा है!

    संघ परिवार के शीर्ष विचारकों ने देर से इस बात को स्वीकार किया है कि अर्थव्यवस्था की अस्थिर नाव पहले से ही नोटबंदी के कारण आए तूफान से पछाड़ खाते हुए हुए समुद्र में बह रही है. संघ परिवार के एक महत्वपूर्ण आर्थिक विचारक एस. गुरुमूर्ति ने कहा है कि एक साथ नोटबंदी, जीएसटी, बैंकों की गैर-निष्पादन परिसंपत्तियां (एनपीए), सेटलमेंट प्रोसेस और काले धन पर कई स्तरों पर किए जा रहे सुधारों ने व्यापार को बड़ा झटका दिया है.

    गुरुमूर्ति की यह आत्मस्वीकृति काफी दिलचस्प है, क्योंकि वे नोटबंदी, जीएसटी और निजी उद्यमियों तथा छोटे कारोबारियों पर कर-अधिकारियों की मनमानी कार्रवाई के सबसे बड़े समर्थकों में से एक थे. टैक्स डिपार्टमेंट बड़े कारोबारियों पर हाथ नहीं डाल रहा है. इसका कारण शायद ये है कि उनके साथ इनके संबंध मुद्दतों से अच्छे रहे हैं. आपको अगर इस बात का अर्थ समझना है, तो आपको बस नौकरी छोड़कर भारत की शीर्ष 500 कंपनियों से जुड़नेवाले वरिष्ठ टैक्स अधिकारियों की संख्या देखनी पड़ेगी.

    यानी संघ परिवार के विचारक अब ये खुलकर मान रहे हैं कि मोदी और जेटली ने दरअसल नवजात शिशु को सीधे पानी में तैरने के लिए फेंक दिया है. जीएसटी का वर्तमान चरण इसकी सबसे बड़ी मिसाल है. जुलाई महीने के लिए जीएसटी रिटर्न दाखिल करने और वाजिब रिफंड का दावा करनेवाले कारोबारियों को इस तरह परेशान किया जा रहा है, मानो वे कोई अपराधी हों.

    पहले निर्यातकों को हमेशा एक्साइज ड्यूटी से मुक्त रखा जाता था, क्योंकि वे वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करते थे. जीएसटी के तहत, चूंकि सभी कारोबारियों को प्रक्रिया के तहत अप्रत्यक्ष कर भरना पड़ रहा है, इसलिए निर्यातकों से 18 प्रतिशत जीएसटी भरने के लिए कहा गया था, जिसे उनके माल को विदेश भेजने से पहले वापस लौटाने की बात कही गई थी.

    लेकिन अब निर्यातकों की यह शिकायत है कि उनका टैक्स रिफंड समय पर नहीं आ रहा है. निर्यातक इसके लिए इंतजार नहीं कर सकते, क्योंकि वे मौसम के हिसाब से काम करते हैं. मसलन, क्रिसमस के लिए बाहर माल भेजना. 18 प्रतिशत जीएसटी चुका देने के बाद उनकी कामकाजी पूंजी फंस जाती है. यह एक बड़ी रकम है. उन्हें छोटी अवधि में कामचलाऊ पूंजी की जरूरत को पूरा करने के लिए कर्ज लेने के लिए अतिरिक्त पैसा चुकाना पड़ रहा है. इससे उनका मुनाफा और सिकुड़ रहा है.

    भारत करीब 300 अरब अमेरिकी डॉलर का सालाना निर्यात करता है जिससे जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा आता है. कल्पना कीजिए कि जीएसटी अधिकारी निर्यात मूल्य का 18 प्रतिशत अपने पास रख लेते हैं और उसे समय पर वापस नहीं लौटाते हैं. यह निर्यातकों के लिए किसी खराब सपने से कम नहीं कहा जा सकता है. निर्यातकों को त्वरित रिफंड के इस समीकरण को समझ पाने में वित्त मंत्रालय नाकाम रहा. जाहिर है इसका खामियाजा किसी न किसी को तो उठाना ही पड़ेगा.

    जीएसटी के पहाड़ जैसे कुप्रबंधन के मद्देनजर, अगर 2017 की दूसरी छमाही में जीडीपी विकास दर अप्रैल-जून में दर्ज किए गए 5.7 प्रतिशत से भी नीचे लुढक जाती है, तो मुझे कोई हैरत नहीं होगी. निश्चित तौर पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के इस साहस भरे बयान के बावजूद कि लोगों को ‘आधिकारिक आंकड़ों को नजरअंदाज करना चाहिए’ सरकार के अंदर अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहे काले बादलों को लेकर बदहवासी की स्थिति है.

    भारत के अनौपचारिक क्षेत्र, खासकर कृषि और छोटे उद्योगों को हुए नुकसान का काफी विस्तार से दस्तावेजीकरण किया गया है. पिछले कुछ महीनों से सोशल मीडिया पर इस मसले पर लगातार आंकड़ों के सहारे बात की जा रही है. छोटी कंपनियों (जिनका कुल कारोबार 25 करोड़ से कम है) को लेकर किए गए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के एक सर्वेक्षण के मुताबिक जनवरी-मार्च, 2017 में उनकी बिक्री में 58 फीसदी की गिरावट देखी गई. जुलाई के बाद जीएसटी ने उनकी बदहाली को और बढ़ाया ही होगा.

    अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा समूह, क्रेडिट सुइस की मुंबई स्थित रिसर्च इकाई ने हाल ही में कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था बेहद खराब दौर से गुजर रही है और नोटबंदी और जीएसटी जैसे बड़े नीतिगत उपायों ने अर्थव्यवस्था में बड़ी रुकावटें पैदा की हैं.

    क्रेडिट सुइस का कहना है कि इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात ये है कि इन रुकावटों के साथ-साथ कुल सरकारी खर्च में भी भारी कमी आई है. यह याद रखना होगा कि निजी निवेश की गैरहाजिरी में संभवतः सार्वजनिक निवेश ही वह इकलौता इंजन बचा था, जो विकास की गाड़ी को थोड़ा-बहुत आगे खींच रहा था.

    2019 के चुनावों से 18 महीने पहले, भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था पूरी तरह से लड़खड़ाई हुई दिखाई दे रही है. मोदी द्वारा लगातार 2022 तक पूरे किए जाने वाले नामुमकिन वादों की झड़ी लगाने का सिलसिला जारी है. इन नए वादों के पीछे छिपा संदेश यह है कि 2019 में उनकी सत्ता में वापसी पहले से ही तय है.

    इतिहास हमें बताता है कि राजनीति अक्सर चकमा देती है. किसी निजाम के आत्मविश्वास और लोकप्रियता के अपने चरम पर पहुंचने के ठीक बाद पैरों के नीचे की ज़मीन खिसकना शुरू कर देती है. मतदाता 2018 के बाद इस बारे में गंभीरता के साथ आकलन करना शुरू करेगा कि ‘नए भारत’ का वादा सच्चा है या फिर यह एक और बुलबुला है, जिसकी नियति ‘स्वच्छ भारत’ के कूड़ेदान में पड़ा पाया जाना है.(द वायर से साभार)

  • छोटे करदाताओं के लिए केवल पांच फीसदी टैक्स

    छोटे करदाताओं के लिए केवल पांच फीसदी टैक्स

    नई दिल्ली(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। केन्द्रीय वित्‍त एवं कॉरपोरेट मामलों के मंत्री श्री अरुण जेटली ने कहा कि वित्‍त मंत्रालय के आयकर विभाग ने कर प्रशासन में दक्षता, पारदर्शिता एवं निष्‍पक्षता सुनिश्चित करने के लिए पिछले दो-तीन वर्षों में अनेक कदम उठाए हैं। वित्‍त मंत्री ने इन पहलों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि 50 लाख रुपये तक की आमदनी वाले करदाताओं के लिए सिर्फ एक पेज वाला आईटीआर-1 (सहज) फॉर्म पेश किया गया। वित्‍त मंत्री ने कहा कि 2.5 लाख रुपये से लेकर 5 लाख रुपये तक की आमदनी वाले करदाताओं के लिए टैक्‍स दर 10 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दी गई जो दुनिया की न्‍यूनतम कर दरों में से एक है। वित्‍त मंत्री श्री जेटली ने यह भी कहा कि 5 लाख रुपये तक की आमदनी वाले ऐसे गैर-बिजनेस करदाताओं के लिए ‘कोई जांच नहीं’ अवधारणा शुरू की गई जिन्‍होंने पहली बार टैक्‍स रिटर्न भरा था। इसके पीछे मुख्‍य उद्देश्‍य यह था कि ज्‍यादा से ज्‍यादा लोग कर दायरे में आएं, अपने-अपने आईटी रिटर्न भरें और निर्धारित टैक्‍स भरें। वित्‍त मंत्री आज यहां ‘आईटी विभाग की पहलों’ विषय पर वित्‍त मंत्रालय से संबंद्ध सलाहकार समिति की दूसरी बैठक को संबोधित कर रहे थे।

    आयकर विभाग की अन्‍य पहलों पर प्रकाश डालते हुए वित्‍त मंत्री श्री अरुण जेटली ने कहा कि 50 करोड़ रुपये तक के कारोबार वाली कंपनियों के लिए कॉरपोरेट टैक्‍स की दर घटाकर 25 प्रतिशत के स्‍तर पर ला दी गई जिससे लगभग 96 फीसदी कंपनियों को कवर कर लिया गया। 01 मार्च, 2016 को अथवा उसके बाद गठित नई विनिर्माण कंपनियों को बगैर किसी छूट के 25 फीसदी की दर से टैक्‍स लगाए जाने का विकल्‍प दिया गया। वित्‍त मंत्री ने कहा कि प्रक्रियागत सुधारों के तहत न्‍यूनतम वैकल्पिक कर (मैट) से संबंधित क्रेडिट को 10 वर्षों के बजाय 15 वर्षों तक आगे ले जाने (कैरी फॉरवर्ड) की अनुमति दी गई।

    ई-गवर्नेंस के क्षेत्र में विभाग की पहलों पर रोशनी डालते हुए वित्‍त मंत्री ने कहा कि इस साल 97 फीसदी आयकर रिटर्न इलेक्‍ट्रॉनिक ढंग से दाखिल किए गए जिनमें से 92‍ फीसदी रिटर्न की प्रोसेसिंग 60 दिनों के भीतर कर दी गई और 90 फीसदी रिफंड 60 दिनों के भीतर जारी कर दिए गए। वित्‍त मंत्री ने यह भी कहा कि आयकर विभाग ने शिकायत निवारण प्रणाली ‘ई-निवारण’ शुरू की है जिसके तहत ऑनलाइन एवं कागज पर लिखकर दी गई सभी शिकायतों को एकीकृत कर दिया गया है और इनका निवारण होने तक इन पर करीबी नजर रखी जाती है। प्रत्‍येक शिकायत को स्‍वीकार किया जाता है और उसके समाधान के बारे में सूचना ईमेल और एसएमएस के जरिये दी जाती है। वित्‍त मंत्री ने कहा कि 4.65 लाख ई-निवारण शिकायतों में से 84 फीसदी शिकायतों का निपटारा अब तक किया जा चुका है।

    वित्‍त मंत्री श्री जेटली ने कहा कि ‘ई-सहयोग’ के जरिये सूचनाओं में अंतर वाले सभी मामलों को गैर-दखल तरीके से निपटाया जाता है जिससे कि पूर्ण जांच को टाला जा सके। वित्‍त मंत्री ने कहा कि आयकर विभाग द्वारा हर तिमाही लगभग 1.9 करोड़ वेतनभोगी करदाताओं को यह सूचना दी जाती है कि उनके नियोक्‍ताओं द्वारा कितना टीडीएस (स्रोत पर कर कटौती) जमा कराया गया है। वित्‍त मंत्री ने कहा कि विभाग की इन सभी ई-गवर्नेंस पहलों से कर निर्धारण अधिकारियों और करदाताओं के बीच प्रत्‍यक्ष संपर्क न्‍यूनतम हो गया है जिससे करदाताओं का उत्‍पीड़न कम करने, भ्रष्‍टाचार पर अंकुश लगाने और समय की बचत करने में मदद मिली है।

    केंद्रीय वित्‍त मंत्री ने कारोबार में सुगमता और वित्‍तीय बाजारों को बढ़ावा देने के लिए आयकर विभाग द्वारा उठाए गए कदमों पर भी प्रकाश डाला। इस संबंध में उन्‍होंने 50 लाख रुपये तक की आमदनी वाले प्रोफेशनलों के लिए प्रकल्पित कराधान योजना शुरू किए जाने का उल्‍लेख विशेष रूप से किया। इसी तरह कारोबारी आमदनी हेतु प्रकल्पित कराधान योजना के लिए सीमा को 1 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 2 करोड़ रुपये कर दिया गया है। वहीं, अंतरराष्‍ट्रीय वित्‍तीय सेवा केंद्र (आईएफएससी) में अवस्थित कंपनियों को लाभांश वितरण कर से मुक्‍त कर दिया गया है और उन्‍हें केवल 9 फीसदी की दर से मैट अदा करना होगा।

    जहां तक काले धन के खिलाफ छेड़े गए अभियान का सवाल है, आयकर विभाग ने वर्तमान सरकार के सत्‍ता में आने के बाद अनेक तरह के कदम उठाए हैं। इस संबंध में वित्‍त मंत्री ने काला धन अधिनियम 2015, बेनामी अधिनियम 1988 में किए गए व्‍यापक संशोधनों और ऑपरेशन क्लीन मनी इत्‍यादि का उल्‍लेख किया। वित्‍त मंत्री ने कहा कि 9 नवंबर, 2016 से लेकर 10 जनवरी, 2017 तक के विमुद्रीकरण संबंधी आंकड़ों के गहन अध्‍ययन के बाद लगभग 1100 तलाशियां ली गईं और इसके परिणामस्‍वरूप 513 करोड़ रुपये की नकदी सहित 610 करोड़ रुपये की राशि जब्‍त की गई। उन्‍होंने कहा कि 5400 करोड़ रुपये की अघोषित आय के बारे में पता लगा और समुचित कार्रवाई के लिए लगभग 400 मामले ईडी और सीबीआई को सौंपे गए हैं।

    ‘लेस कैश’ अर्थव्‍यवस्‍था और डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए वित्‍त मंत्री ने कहा कि आयकर विभाग ने अनेक कदम उठाए जिनमें 2 लाख रुपये अथवा उससे ज्‍यादा की नकदी की प्राप्ति पर जुर्माना लगाना, धर्मार्थ ट्रस्टों को नकद दान की सीमा को 10,000 रुपये से घटाकर 2,000 रुपये करना और राजनीतिक दलों को 2000 रुपये या इससे अधिक का नकद दान नहीं किया जाना, इत्‍यादि शामिल हैं।

    विमुद्रीकरण के असर और आयकर विभाग के विभिन्‍न सक्रिय कदमों पर प्रकाश डालते हुए वित्‍त मंत्री ने कहा कि प्रत्‍यक्ष करों के मामले में राजस्‍व संग्रह वित्‍त वर्ष 2016-17 के दौरान 14.5 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 8,49, 818 करोड़ रुपये के स्‍तर पर पहुंच गया। वित्‍त मंत्री ने यह भी कहा कि चालू वित्‍त वर्ष में 18 सितंबर, 2017 तक प्रत्‍यक्ष करों का शुद्ध संग्रह 15.7 प्रतिशत बढ़कर 3.7 लाख करोड़ रुपये के स्‍तर पर पहुंच गया।

    उन्‍होंने कहा कि करदाताओं की कुल संख्‍या वित्‍त वर्ष 2012-13 के 4.72 करोड़ से काफी बढ़कर वित्‍त वर्ष 2016-17 में 6.26 करोड़ हो गई।

    इससे पहले सीबीडीटी के अध्‍यक्ष श्री सुशील चंद्रा ने समिति के समक्ष आयकर विभाग की पहलों पर एक प्रस्‍तुति दी।

    उपर्युक्‍त बैठक में वित्‍त राज्‍य मंत्री श्री एस.पी.शुक्‍ला, वित्‍त सचिव श्री अशोक लवासा, राजस्‍व सचिव डॉ. हसमुख अधिया, निवेश एवं सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग में सचिव श्री नीरज कुमार गुप्‍ता, आर्थिक मामलों के विभाग में सचिव श्री एस.सी.गर्ग, मुख्‍य आर्थिक सलाहकार डॉ. अरविंद सुब्रमण्‍यन, सीबीडीटी के अध्‍यक्ष श्री सुशील चंद्रा और वित्‍त मंत्रालय के अन्‍य वरिष्‍ठ अधिकारीगण भी उपस्थित थे।

  • पिता ने सौंपी विरासत तो खैरात नहीं बांट सकतेःगौतम सिंघानिया

    पिता ने सौंपी विरासत तो खैरात नहीं बांट सकतेःगौतम सिंघानिया

    मुंबई(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। देश के स्थापित सूट ब्रांड रेमंड के मालिक गौतम सिंघानिया का जो पक्ष देश के सामने आया है उससे उनके पिता विजयपत सिंघानिया की सनक उजागर हो गई है। वे कंपनी के मालिकाना हक वाले जेके हाऊस को प्रमोटर के हाथों कौड़ियों के मोल बेचना चाह रहे हैं। इस प्रस्ताव के खिलाफ गौतम कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। मुंबई हाईकोर्ट ने उन्हें ये मामला अदालत से बाहर सुलझाने की सलाह दी है।

    गौतम ने पिता के उस दावे को खारिज किया है जिसमें उन्होंने कहा था कि बेटे के प्यार में आकर उन्होंने गलती से अपने 37.17 प्रतिशत शेयर बेटे को गिफ्ट कर दिए थे। इन शेयरों की कीमत बाजार में लगभग 1000 करोड़ रुपए है।गौतम सिंघानिया ने मीडिया को बताया कि ये शेयर फरवरी 2015 में ट्रांसफर हुए थे। पैंतीस सालों के लंबे प्रयासों के दौरान ये हिस्सा उन्होंने कंपनी के लिए काम करके कमाया था। गौतम अपने पिता के कारोबार में साथ देने वाले अकेले बेटे थे। इसलिए पिता ने उन्हें ये भागीदारी सौंपी। बातचीत में 52 साल के गौतम सिंघानिया ने कहा कि 35 सालों तक लगातार 16 घंटे काम करके उन्होंने कंपनी को संवारा है इसलिए परिवार में पहले ही ये बात तय थी कि पिता की विरासत बेटा संभालेगा। उन्होंने अपना स्टेक बेटे को देकर अपना कर्तव्य निभाया। इसके लिए कोई जोर जबरदस्ती तो थी नहीं। अगर पिता अपना स्टेक किसी और को देते तो कंपनी के 35000 कर्मचारियों का भविष्य बिगड़ सकता था। पिता ने शेयर सौंपे तो इसके बाद मैं या पिता कोई भी मनमाने ढंग से खैरात नहीं बांट सकते, इसके लिए कंपनी के शेयरहोल्डर्स के हितों की रक्षा करना हमारी प्राथमिकता है।

    रेमंड के सीएमडी ने कहा कि 2015 में पिता के हाथों कंपनी का स्टेक मिलने के बाद उन्हें कारोबार में प्रोफेशनलों को शामिल करने, सलाहकार बोर्ड बनाने जैसे कई फैसले लेने में सरलता होने लगी। ढाई साल पहले पिता से शेयर होल्डिंग कंट्रोल लेते ही मेरे लिए खेल बदल गया। ग्रोथ को बढ़ावा देने के लिए मैंने कई फैसले लिए।इसके बाद से कंपनी का शेयर 50 फीसदी तक चढ़ चुका है। इस दौरान बीएसई सेंसेक्स केवल 12 फीसदी बढ़ा है जबकि रेमंड के शेयरों का सुधार इससे कई गुना ज्यादा हुआ।

    पिता की बदहाली पर उन्होंने कहा कि नारियल का पेड़ तूफान में झुक जाता है पर दूसरे दरख्त नहीं झुकते इसलिए टूट जाते हैं। उन्होंने कहा कि रेमंड ने अपने अगले बीस सालों की रणनीति बनाई है। लोग इस ब्रांड को अपने नए अवतार में देख रहे हैं। कंपनी में कार्पोरेट गवर्निंग को बढ़ावा मिला है। राजनीतिक फैसलों के चलते कंपनी के बहुत से कामकाज नहीं हो पाते हैं, पर अब माहौल बदल गया है। उन्होंने कहा कि वे अपने शेयर होल्डर्स को अधिकतम फायदा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

  • फसलों का रिकार्ड रखो तो ज्यादा मिलेगा बीमा दावा

    पाँच वर्ष की औसत उत्पादकता और वास्तविक फसल उत्पादकता के अंतर पर बनता है बीमा दावा

    भोपाल 20 सितंबर(सुरेश गुप्ता)।

    प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत देश में सर्वाधिक 42 हजार किसानों को मध्यप्रदेश में बीमित किया गया है। इस योजना के अंतर्गत खरीफ 2016 के बीमित दावों का भुगतान किया गया है। खरीफ 2016 में सीहोर जिले के 43 हजार 850 कृषकों को 55 करोड़ 50 लाख की दावा राशि स्वीकृत हुई है। देखा जाय तो जिले के एक किसान के मान से 12 हजार 657 रुपये बीमा दावे का औसत आता है। लेकिन पटवारी हल्का अनुसार क्षतिस्तर भिन्न-भिन्न होने से कहीं अधिक और कहीं कम बीमा राशि का भुगतान हुआ।

    प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना पिछले 5 वर्षों की औसत उत्पादकता (जो फसल कटाई प्रयोग से निकाली जाती है) में वास्तविक फसल उत्पादकता के अंतर पर बीमा दावा बनाया जाता है।

    उदाहरण के लिये सीहोर जिले की रेहटी तहसील के पटवारी हल्का 44 में वास्तविक उपज तथा थ्रेश होल्ड उपज में फसल कटाई प्रयोगों में कमी मात्र 2 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर रही। इस वजह से बीमा दावा राशि अत्यन्त कम रही। दूसरी ओर जिन पटवारी हल्के में फसल कटाई प्रयोगों में थ्रेश होल्ड तथा वास्तविक फसल कटाई में अधिक अंतर रहा, वहाँ ज्यादा फसल बीमा राशि बनी।

    उदाहरण के लिये इसी तहसील के पटवारी हल्का 42 में थ्रेश होल्ड उपज से वास्तविक उपज में अंतर फसल कटाई प्रयोगों में 319 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर रहा। इस कारण से इस पटवारी हल्के के ग्रामों में किसानों को फसल बीमा राशि अधिक मिली।

    सीहोर जिले में कृषकों को सोयाबीन फसल में अधिक नुकसान होने से अधिक राशि प्राप्त हुई है जैसे – कृषक श्री दशरथ सिंह पटवारी हल्का नं. 41 ग्राम अवंतिपुरा को बीमा दावा राशि 1,81,345 रुपये प्राप्त हुए हैं। इसी प्रकार कृषक श्री मनोहर सिंह पटवारी हल्का नं. 42 ग्राम महोड़िया को राशि 1,21,949 रुपये, कृषक श्री अशोक कुमार गुप्ता पटवारी हल्का नं. 42 ग्राम महोडिया को 1,40,752 रुपये, कृषक सिद्धनाथ सिंह पटवारी हल्का नं. 47 ग्राम संग्रामपुर को 97 हजार 480 रुपये, कृषक श्री भरतसिंह गेहलोत पटवारी हल्का नं. 52 ग्राम संग्रामपुर को 94 हजार 697 रुपये, कृषक श्री शेरसिंह पटवारी हल्का नं. 35 ग्राम तकीपुर को 85 हजार 732 रुपये, कृषक श्री पर्वतसिंह पटवारी हल्का नं. 64 ग्राम धबोटी को 76 हजार 636 रुपये, कृषक श्री नरसिंह पटवारी हल्का नं. 68 ग्राम बड़नगर को 84 हजार 882 रुपये और कृषक श्री हरिचरण पटवारी हल्का नं. 07 ग्राम सेमरादांगी को 66 हजार 539 रुपये प्राप्त हुए हैं।

    इस प्रकार यह स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के प्रावधानों के अनुसार पिछले 5 सालों में फसल कटाई प्रयोगों के मान से वास्तविक उपज के अंतर के अनुसार बीमा राशि का भुगतान होता है। कटाई अंतर कम होने पर बीमा राशि कम प्राप्त होती है और वास्तविक उपज का अंतर ज्यादा होता है तो दावा राशि ज्यादा प्राप्त होती है। यह भी कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना क्षेत्र आधारित है। किसानवार योजना नहीं है।

    किसान इस माह के अन्त तक फसल का बीमा करवायें

    भोपाल, 23 सितम्बर(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।

    प्राकृतिक आपदा से किसानों को होने वाले नुकसान की भरपाई के लिये केन्द्र सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना प्रारम्भ की है। इसमें किसानों को कम प्रीमियम देना पड़ता है। बीमा कंपनियों को रबी फसलों के प्रीमियम रेट का सिर्फ डेढ़ फीसदी एवं खरीफ फसल का 02 प्रतिशत किसान देंगे। बागवानी फसलों के मामले में किसानों को 05 प्रतिशत प्रीमियम देना होगा। बाकी प्रीमियम केन्द्र और राज्य की सरकारें देंगी। यह योजना 2016 से लागू की गई है। जिले के कृषकों से जिला प्रशासन द्वारा अपील की गई है कि अऋणी कृषक 30 सितम्बर तक निकट के बैंक से सम्पर्क कर अथवा जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक से सम्पर्क कर अपनी रबी फसल का बीमा करवा सकते हैं।

    ऋणी किसान हेतु स्वीकृत ऋण राशि एवं अऋणी किसान के प्रस्ताव बैंक में जमा कराने की तिथि 15 सितम्बर 2017 से 15 जनवरी 2018 निर्धारित है। बैंकों से बीमा कंपनी को घोषणा-पत्र भेजने की अन्तिम तिथि 28 फरवरी 2018 है। किसानों के खातों से काटे गये प्रीमियम को बीमा कंपनी को जमा करने की अन्तिम तिथि ऋणी कृषकों के लिये 15 फरवरी 2018 एवं अऋणी कृषकों के लिये 22 जनवरी 2018 है। बीमा योजना के तहत पैदावार के आंकड़े निर्धारित करने की अन्तिम तिथि 30 जून 2018 निर्धारित की गई है।

    प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अन्तर्गत सभी प्रकार की फसलों रबी, खरीफ, वाणिज्यिक और बागवानी को शामिल किया गया है। उपज नुकसान के आधार पर इस योजना में बिजली गिरने, तूफान, ओला पड़ने, चक्रवात, अंधड़, बवंडर, बाढ़, जलभराव, जमीन धंसने, सूखा, खराब मौसम, कीट एवं फसल को होने वाली बीमारियां आदि जोखिम से फसल को होने वाले नुकसान को शामिल कर एक ऐसा बीमा कवर दिया जाता है, जिसमें इनसे होने वाले सारे नुकसान से सुरक्षा प्रदान की जाती है।

  • नरेन्द्र मोदी के साथ महाशक्ति की राह पर भारत

    नरेन्द्र मोदी के साथ महाशक्ति की राह पर भारत


    - भरतचन्द्र नायक
    वीरता और पराक्रम में सदैव से भारत अजेय रहा है। उसकी समृद्धि ने सभी को ललचाया और बाह्य आक्रमण का दंश झेला, लेकिन समय की रफ्तार के साथ कदम से कदम मिलाने में जो चूक हुई उसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा। जब आक्रमण का प्रचलन हो चुका था और दुश्मन ने तोप बंदूक से लेस होकर आक्रमण किया हम अपना शौर्य भाला तलवार लेकर दिखा रहे थे। आजादी के बाद विकास की ओर ध्यान गया। कदम संभले पं. नेहरू ने बांध जलाशयों, कारखानों को तीर्थधाम बनाया। इंदिरा जी ने परमाणु शक्ति संपन्नता की ओर ध्यान दिया। राजीव गांधी ने देश में कंप्यूटरीकरण का मार्ग प्रशस्त करने का श्रेय दिया गया। अटलजी ने प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना से गांवों तक विकास की रोशनी पहुंचाई। मोदी जी ने देश को बुलेट पर सवार कर दिया। लोकतंत्र में सत्ता पक्ष की नीतियों कार्यक्रमों का विरोध अनिवार्य है और ऐसा हुआ, लेकिन 2014 में जब सोलहवीं लोकसभा के चुनाव की रणपेटी बजी और गुजरात के सफल मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी के चुनाव प्रचार की कमान संभाली उनकी प्रखर आलोचना उनके लिए स्वीकार्यता विस्तार में सहायक सिद्ध हुई। मोदी ने पूर्ववर्ती सरकार के भ्रष्टाचार से मुक्ति, महंगाई पर लगाम, सुरक्षा परिदृश्य में सुखद बदलाव का भरोसे और अच्छे दिन आने का सपने को देश की जनता ने मोदी जी के नेतृत्व में उनकी कटु आलोचना के बावजूद भारतीय जनता पार्टी के नाम प्रचंड बहुमत के साथ जनादेश दे दिया। मजे की बात यह रही कि जब नरेंद्र मेादी को जनता एक दूर दृष्ठा, कल्पनाशील और कुशल प्रशासक के रूप में देख रही थी। राजनैतिक दल उन्हें मौत का सौदागर बता रहा था। जनता महसूस कर चुकी थी कि विरोध राजनैतिक है। वास्तविकता यह थी कि गुजरात ने मोदी के नेतृत्व में नई करवट ली थी। गुजरात विकास के हर मापदंड पर कसे जाने के बाद देश में अब्बल, प्रगतिशील अमन चैन के मामले अब्बल राज्य था, जो राजनैतिक दल मोदी पर असहिष्णुता का इल्जाम लगा रहे थे उनके द्वारा शासित राज्यों से गुजरात के अल्पसंख्यक तरक्की की ऊंची सीढ़ियां चढ़ चुके थे। जनता देख चुकी थी कि नरेंद्र मोदी समस्या नहीं समाधान पुरूष है।

    प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी अपने कार्यकाल के तीन वर्ष पूर्ण कर चुके हैं और उन्होंने मंत्रालयवार अपना रिपोर्ट कार्ड जनता को सौंप दिया है। कुछ स्थानेां को अपवाद स्वरूप छोड़कर जहाॅ विधानसभा चुनाव अथवा लोकसभा उपचुनाव हुए जनता ने तमाम मुसीबतें सहते हुए मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी और भाजपानीत एनडीए कोसमर्थन देकर विजय रथ आगे बढ़ाया है। नरेंद्र मोदी सरकार ने कड़े, कष्टप्रद फैसले लेने में कभी गुरेज नहीं किया जिनका पुरजोर विरोध भी हुआ लेकिन देश की अपढ़ कही जाने वाली जनता ने मुसीबते झेलते हुए माना कि मोदी की दिशा और दशा सही है। नीयत में खोट नहीं है। विपक्ष के सामने सबसे बड़ी हैरानी परेशानी की बात यह रही कि वह बीते तीन वर्षों में एनडीए सरकार पर गड़बड़, घोटाला, भ्रष्टाचार का एक भी इल्जाम नहीं लगा पाई। जब 8 नवम्बर 2016 को एकाएक नोटबंदी का ऐलान हुआ गैरभाजपा दल हक्के-बक्के रह गये। उनका सीधा सपाट आरोप था कि बिना जनता को भरोसे में लिए इतना बड़ा फैसला क्यों ले लिया कि करेंसी कम पड़ गई। बैंकों से खाताधारियों को अपनी रकम निकालने पर पाबंदी लग गई। बैंकों के सामने बंद करेंसी बदलने के लिये गरीबों, अमीरों की लाइने लग गई। नोटंबंदी को कालेधन और उसके सृजन पर प्रहार बताया गया रोजी-रोटी छोड़ कर मजदूर भी बैंक के दरवाजे पर वहीं खड़ा था जहां धन्ना सेठ वारी का इन्तजार कर रहे थे। विपक्ष को मुंहमांगा मुद्दा मिल गया। लेकिन आम आदमी ने माना कि इससे कालेधन की समानान्तर चलने वाली व्यवस्था ध्वस्त हो गई जनता ने विरोध के स्वरों को अनसुना ही नहीं किया उत्तरप्रदेश जेसे राज्य में भारतीय जनता पार्टी को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विजय से नवाजा और नोटबंदी के प्रबल विरोधियों को हाशिये पर धकेल दिया। नीति नीयत ने मोदी का हर बार साथ दिया। आलोचना मोदी को संजीवनी साबित हुई। नोटबंदी के पश्चात् उपलब्धि की जो गुलाबी तसवीर रिजर्व बैंक ने सार्वजनिक की है वह साबित करती है कि आजदी के पश्चात् देश के आर्थिक क्षेत्र में नोटबंदी सबसे बड़ा कं्रातिकारी सुधार है जिसने धनपतियों की तसवीर बैंक के राडार पर ला दी है। अब न तो बेनामी सौंदे हो पा रहे हैं और न कालाधन खपाने की गली शेष बची है। बैंकों में नकदी का अंबार लगा है। कर्ज वितरण आसान हुआ है। टेक्स का वेस बड़ा है और सरकार के खजाने में आने वाले टेक्स में बहुगुवित वृद्धि हुई है।

    सुरक्षा परिदृश्य में आये बदलाव से दुनिया चकित है। पड़ौसी देश पाकिस्तान और चीन भ्रमित है। सर्जिकल स्ट्राईक ने दुनिया को बता दिया है कि भारत अब साफ्ट इस्टेट नहीं रहा है। इसकी डोकलाम प्रकरण में भारत की दृढ़ता ने मोहर लगा दी है। चीन को डोकलाम मामले में उल्टे पैर लौटना पड़ा है। इसने भारत की प्रतिष्ठा में चारचांद लगा दिये हैं। चीन के पुसैल पाकिस्तान को भारत की सीमा में आतंकवाद फैलाने के लिए उकसाने वाले चीन को ही ब्रिक्स की बैठक में पाकिस्तान की भत्र्सना करने को नरेंद्र मोदी ने विवश कर दिया। यह पहला मौका था जब मोदी ने चीन की धरती पर चीन केा मात दे दी। विश्व शक्तियां दांत तले अंगुली दबाने को विवश हुई। लेकिन इसे कांग्रेस की नादानी ही कहेंगे कि जब चीन भारत के बीच तनाव चरम पर था राहुल गांध्ीा चीन के दूतावास पहुंच गये और खुद संदेह के घेरे में आ गये। देश विदेश खासकर अमेरिका ने भारत में जीएसटी की जी भरकर प्रशंसा की। लेकिन राहुल गांधी ने अमेरिका की धरती पर जीएसटी का विरोध करके न केवल घरेलु मामलों पर विवाद खड़ा कर दिया अपितु अपनी कूटनीतिक निरक्षरता जनता के सामने उजागर कर दी।

    हाल के दिनों में जापान के प्रधानमंत्री आबे ने भारत पहुंचकर नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों का खुलेमन से समर्थन किया अपितु भारत को सामरिक, आर्थिक समर्थन देकर पड़ौसी देश चीन का बुलेट और पाकिस्तान को बुलट का अर्थ समझा दिया। आज पाकिस्तान यदि आतंकवादी देश के रूप में अलग-थलग खड़ा है और चीन की विस्तारवादी दुष्प्रवृत्ति के कारण विश्व के अधिकांश देश चीन के विरोधी और भारत के समर्थन में खड़े हैं यह इक्कीसवीं शताब्दी की बड़ी सफलता है जिसका श्रेय नरेंद्र मोदी को जाता है। उन्होंने भारत के इतिहास को नया मोड़ देकर वैश्विक पटल पर भारत का मान और प्रतिष्ठा बढ़ाई है।

    नरेंद्र मोदी के प्रयास से अहमदाबाद से मुंबई बुलेट ट्रेन की आधार शिला रखे जाने के पश्चात् जापान के प्रधानमंत्री ने ऐलान किया है कि वे 2022 में बुलेट ट्रेन से भारत के नयनाभिराम स्थलों का दौरा करेंगे। पांच वर्षों में पूर्ण होने वाली बुलेट ट्रेन परियोजना पर 84 लाख करोड़ रू. का खर्च आयेगा जो कर्ज के रूप में जापान भारत को 0.1 प्रतिशत ब्याज पर देगा। नरेंद्र मोदी का यह कहना कि बुलेट ट्रेन परियोजना भारत को मुफ्त में पड़ेगी अतिरंजना नहीं एक हकीकत है। क्योकि इस कर्ज राशि की वसूली 15 वर्ष बाद लंबी अवधि की किश्तों में होगी। तब तक यह परियोजना भारत के लिए दुधारू गाय साबित हो चुकी होगी। देश के औद्योगिक शहरों में आवागमन सरल, सुलभ पर यातायात का दबाव केन्द्रित होने से सड़क और देश यातायात पर से दबाव घटेगा। इससे पर्यावरण संरक्षण का नया अध्याय आरंभ होगा।

    नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हर क्षेत्र में काम की गति में तीव्रता आई है। सबसे बड़ी बात यह है कि भारत की दुनिया की महाशक्ति की राह पर अजेय बनकर बढ़ रहा है भारतीय फौज ने पाकिस्तान के विरूद्ध सर्जिकल स्ट्राईल लालसेना के साथ साहसिक झड़पे मोल ली हैं। ऐसा पहली बार हुआ कि भारत ने सीना तानकर इसकी जानकारी सार्वजनिक करने में गुरेज नहीं किया। अब तक यह साहस विश्व का महानशक्तिशाली देश अमेरिका ही करता रहा है। इतिहास में दर्ज है कि पूर्ववर्ती सरकार के दौर में नाथूला पर हुई झड़पों में चीन के 300 सैनिक ढेर हुए थे लेकिन सरकार यह बताने का साहस नहीं कर सकी थी। क्योंकि उसे अंदेशा था कि ऐसा करने से चीन भड़क जायेगा। लेकिन इस बार सेना को जितनी आजादी दी गई। उतने ही खुलेपन के साथ भारतीय फौज के शौर्य का सरकार ने बखान किया और उसे पूरा श्रेय भी दिया। अब तक भारत की विदेश नीति संकोच के अवकुंठन रही है। लेकिन मोदी ने इसमें साहस के साथ पारदर्शिता का रंग भरा है और देश का भाल उन्नत किया है यहीं महाशक्ति के सिर का सेहरा है।

  • अब चीन भी आतंकवाद पर भारत के साथ

    अब चीन भी आतंकवाद पर भारत के साथ

    नई दिल्ली । चीन के शियामेन शहर में ब्रिक्स सम्मेलन के समापन की औपचारिक घोषणा के साथ अगले साल दक्षिण अफ्रीका के जोहानिसबर्ग में अगले ब्रिक्स सम्मेलन की घोषणा की गई।

    ब्रिक्स सम्मेलन पर देश और दुनिया की नजर इस बात पर टिकी थी कि भारत और चीन के बीच बातचीत का एजेंडा क्या होगा। सोमवार को जब ब्रिक्स का घोषणापत्र जारी हुआ तो उसमें अहम बात ये रही कि पहली बार चीन ने माना कि लश्कर और जैश दुनिया के लिए खतरनाक हैं। ब्रिक्स के घोषणापत्र में लश्कर और जैश संगठनों का जिक्र होना भारत के लिए अहम कामयाबी मानी गई। गोवा में 2016 के ब्रिक्स के घोषणापत्र के समय भारत की तमाम कोशिशों के बाद भी लश्कर और जैश के नाम पर चीन अड़ गया था। आज जब पीएम मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनफिंग के बीच मुलाकात हुई तो कयास लगाए जा रहे थे कि शायद डोकलाम के मुद्दे पर दोनों देशों के बीच बातचीत हो। लेकिन चीन ने बातचीत से पहले ही साफ कर दिया कि डोकलाम पर बातचीत नहीं होगी।

    पीएम मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की बातचीत के बाद विदेश सचिव एस जयशंकर ने सधे अंदाज में कहा कि मतभदों को कभी विवाद नहीं बनने देंगे। भारत के इस बयान से साफ हो गया कि पंचशील सिद्धांतों के तहत ही चीन और भारत को आगे बढ़ने की जरुरत है।

  • ऑनलाइन फंड ट्रांसफर के सरल तरीके

    ऑनलाइन फंड ट्रांसफर के सरल तरीके

    Hand of man with credit card, using a ATM

    अब आपको पैसे ट्रांसफर करने के लिए बैंकों की लाईनों में लगने की जरूरत नहीं है। बैंक बंद हों या आप बैंक से दूर हों ऐसी स्थिति में ऑनलाइन फंड ट्रांसफर आपकी मदद कर सकता है। आप भी जानिए कुछ सरल तरीके-

    ऑनलाइन फंड ट्रांसफर सिस्टम किसी दूसरे के खाते में पैसे ट्रांसफर करने की बेहद सुरक्षित और तेज प्रक्रिया है। इसके लिए आपको अपने बैंक से नेटबैंकिंग फैसिलिटी लेनी होती है। यूजर आईडी और पासवर्ड लेकर आप नेटबैंकिंग के जरिए हर वे काम कर सकते हैं, जिसके लिए आपको बैंक जाना पड़ता है। सरकारी बैंकों में यूजर आईडी और पासवर्ड लेने की लंबी प्रक्रिया है लेकिन निजी बैंकों ने इसे काफी हद तक आसान बनाया हुआ है।
    तीन तरह की फैसिलिटीः
    1. नेट बैंकिंग के जरिए
    2. एटीएम के जरिए
    3. मोबाइल बैंकिंग के जरिए

    1. नेट बैंकिंग से फंड ट्रांसफरः
    नेट बैंकिंग के जरिए फंड ट्रांसफर फैसिलिटी अमूमन दो तरह की होती है। RTGS यानी रियल टाइम ग्रॉस सेटलमेंट और NEFT यानी नैशनल इलेक्ट्रॉनिक फंड ट्रांसफर सिस्टम। इनमें कोई खास फर्क नहीं है, सिवाय इसके कि कुछ बैंकों ने NEFT में फंड ट्रांसफर की लिमिट तय की हुई है। बैंक अकाउंट खुलवाने के दौरान ही आपको नेट बैंकिंग में रजिस्ट्रेशन से संबंधित किट दी जाती है। रजिस्ट्रेशन के बाद आपको अपने पेज पर थर्ड पार्टी ट्रांसफर ऑप्शन में जाना होगा। इसमें लाभार्थी अकाउंट नंबर ऐड करना होगा। नेट बैंकिंग रजिस्ट्रेशन के बाद आप मोबाइल और एटीएम से भी पैसे ट्रांसफर कर सकते हैं।

    2. एटीएम के जरिए फंड ट्रांसफर: तमाम बैंकों ने एटीएम के जरिए भी फंड ट्रांसफर की फैसिलिटी दी हुई है। इसे कार्ड टु कार्ड ट्रांसफर सिस्टम भी कहते हैं। डेबिट कार्ड को एटीएम में डालने या स्वाइप करने के बाद आपको जिसे भी पैसे भेजने हैं, उसका 16 अंकों का डेबिट कार्ड नंबर फीड करना होगा। इसके बाद आपको जितना पैसा ट्रांसफर करना है, वो फीड करना होगा। इसके बाद जैसे ही आप ओके बटन दबाएंगे, आपके अकाउंट से उतनी रकम डेबिट (घट) हो जाएगी यानि पैसा जरूरतमंद के कार्ड में ट्रांसफर हो जाएगा। इस फैसिलिटी के तहत आपको बैंक की ब्रांच में जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी और किसी भी एटीएम से काम चल जाएगा। आप एक दिन में 5 हजार और महीने भर में 25 हजार रुपये तक ट्रांसफर कर सकते हैं। हालांकि अभी ये सुविधा शुरुआती दौर में है और नेटवर्किंग प्रक्रिया पूरी नहीं होने से लोगों को दिक्कतें भी होती हैं। फिलहाल स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की ही सर्विस कुछ हद तक संतोषजनक है। इसमें पैसे भेजने वाले और प्राप्त करने वाले, दोनों के पास एसबीआई डेबिट कार्ड होना चाहिए। प्राइवेट बैंकों में येस बैंक, आईसीआईसीआई, एचडीएफसी, एक्सिस जैसे तमाम बैंकों ने भी ये फैसिलिटी दी हुई है। ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए फिलहाल इस सर्विस पर कोई चार्ज नहीं लिया जा रहा है।

    3. मोबाइल के जरिए फंड ट्रांसफर: इसके लिए पैसे भेजने वाले और उसे हासिल करने वाले के पास मोबाइल मनी आइडेंटिफिकेशन यानी MMID और मोबाइल बैंकिंग का पासवर्ड यानी MPIN होना जरूरी है। इन्हें आप अपने बैंक से हासिल कर सकते है। अब अपने मोबाइल से *99# डायल करें और ध्यान से निर्देश सुनें। अमूमन डायल पैड पर 3 नंबर दबाने पर फंड ट्रांसफर प्रॉसेस शुरू होता है। इसमें आपको फंड प्राप्तकर्ता का 10 अंकों का मोबाइल नंबर और उसके बाद स्पेस देकर 7 अंकों का MMID डालना होता है। इसके बाद जितनी रकम आपको भेजनी है, वो भरनी होगी। फिर आपको बैंक से पूर्व में मिली हुई MPIN (मोबाइल बैंकिंग का पासवर्ड) डालकर ट्रांजैक्शन को ओके करना होगा। इसके बाद पैसा जरूरतमंद के पास ट्रांसफर हो जाएगा। मोबाइल बैंकिंग के जरिए आप IMPS माध्यम से भी फंड ट्रांसफर कर सकते हैं। इसमें आपको लाभार्थी का अकाउंट नंबर और 11 अंकों का IFSC कोड डालना होगा। इसके बाद भेजने वाली रकम दर्ज करें। फिर अपना MPIN डालकर ट्रांजैक्शन को ओके करें। पैसा जरूरतमंद तक पहुंच जाएगा। *99# डायल कर आप अपने खाते में रकम से संबंधित जानकारी भी ले सकते हैं और चाहें तो मिनी स्टेटमेंट भी प्राप्त कर सकते हैं।

    NEFT/RTGS
    एनईएफटी या आरटीजीएस को रियल टाइम फंड ट्रांसफर के रूप में भी जाना जाता है। यह एक ऐसी सुविधा है, जिसमें कोई शख्स, कंपनी या फर्म किसी दूसरे के अकाउंट में पैसे का ट्रांसफर कर सकते हैं। यह ट्रांसफर बैंक के वर्किंग पीरियड में होता है। इसमें जो भी ट्रांजैक्शन होता है, उसके लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पास संबंधित बैंक रिक्वेस्ट भेजते हैं। इसके बाद ही वह पैसा दूसरे शख्स के खाते में ट्रांसफर हो पाता है। इसमें कुछ घंटों का समय लगता है। NEFT के तहत एक निश्चित समय तक बैंक फंड ट्रांसफर रिक्वेस्ट का कलेक्शन करते हैं। इसे कट ऑफ टाइम कहते हैं। यानी आपने फंड ट्रांसफर भले ही किसी भी वक्त किया हो, पैसा फौरन ट्रांसफर नहीं होता। RTGS प्रति ट्रांजैक्शन के आधार पर काम करता है और फंड तत्काल ट्रांसफर होता है।

    IMPS
    IMPS में रियल टाइम वर्किंग होने के चलते आप दिए गए समय के अलावा फंड ट्रांसफर नहीं कर पाएंगे। मसलन रात के वक्त फंड ट्रांसफर की सुविधा आपको नहीं मिलती। इसके लिए बैंकों ने विकल्प के तौर पर IMPS यानी इमीडियेट पेमेंट सर्विस भी शुरू की हुई है। इसमें आप किसी के भी खाते में कभी भी पैसे ट्रांसफर कर सकते हैं। हालांकि दूसरे काम मसलन रिचार्ज या बिल पेमेंट नहीं कर पाएंगे। इसमें न तो समय की बाध्यता है, न दिन की। छुट्टी के दिन भी आप इसका फायदा उठा सकते हैं।

    इंटर बैंक और इंटर एकाउंट मनी ट्रांसफर: इसमें पैसों का लेन-देन बैंक के नेटवर्क के बीच में ही होता है। यह सिस्टम रियल टाइम आधार पर काम करता है। इसके तहत एकाउंट होल्डर किसी भी वक्त अपने या उसी बैंक में किसी तीसरे व्यक्ति के एकाउंट में पैसे ट्रांसफर कर सकता है। रियल टाइम सिस्टम के जरिए ट्रांसफर की गई राशि तुरंत उस एकाउंट में क्रेडिट हो जाती है। इसमें पैसे ट्रांसफर की कोई लिमिट नहीं है। बैंक इस सुविधा के लिए कोई चार्ज नहीं वसूलते हैं।

    यूपीआई:यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस सर्विस का नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) तेजी से विस्तार करने की तैयारी में है। यूपीआई एक यूनिक पेमेंट सॉल्यूशन है जिसे यूपीआई समर्थित किसी भी एप को ई-मेल, आधार नंबर और मोबाइल नंबर से एक्टिवेट कर सकते हैं।
    यूपीआई की मदद से एक से ज्यादा बैंक एकाउंट को एक साथ हैंडल किया जा सकता है। साथ ही किसी भी बैंक एकाउंट में पेमेंट करने के लिए एकाउंट नंबर की जरूरत नहीं होगी। कोई भी व्यक्ति किसी के भी बैंक एकाउंट में भुगतान उसके मोबाइल नंबर या बैंक के साथ लिंक ई-मेल एड्रेस के जरिए कर सकेगा। मसलन, इनमें से अगर कोई भी एक जानकारी रिसीवर के बैंक एकाउंट से लिंक है, तो उसके एकाउंट में फंड ट्रांसफर किया जाना संभव होगा। आपको बता दें कि इसके जरिए फंड ट्रांसफर रियल टाइम में किया जा सकेगा। यूजर के लिए यह सर्विस 24 घंटे उपलब्ध रहेगी।

  • चीनी माल का बहिष्कार करेंःइंद्रेश कुमार

    चीनी माल का बहिष्कार करेंःइंद्रेश कुमार

    भोपाल21 अगस्त,(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।भारत ने कभी किसी देश की जमीन हड़पने का प्रयास नहीं किया। इसके बावजूद चीन और पाकिस्तान जिस तरह की चालें चल रहे हैं उन्हें पता ही नहीं चल रहा कि उनकी जमीन कैसे खिसक रही है। पाकिस्तान ने यदि भारत से द्वेष बंद नहीं किया तो निकट भविष्य में वह अपना मौजूदा अस्तित्व ही गंवा देगा। इसी तरह चीन समुद्र की ओर बढ़ने की ललक में दुनिया से टकराव की नीति पर चल रहा है। दक्षिणी सागर में तेरह देश मिलकर चीन की लूट रोकने के लिए जुट गए हैं। उसके सभी पड़ौसी देशों से संबंध खराब हैं और वह बिखरने की कगार तक पहुंच गया है। हिंद बलोच फोरम के आव्हान पर आज भोपाल में एकत्रित जनसमूह को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार ने ये बातें कहीं।

    हिंद बलोच फोरम पाकिस्तान में बेहतर जीवन की लड़ाई लड़ रहे बलोचिस्तान के नागरिकों के हित में आवाज बुलंद कर रहा है। इस संगठन का उद्देश्य देश विदेश में बलोचिस्तान के नागरिकों के मानवाधिकारों के हनन की आवाज बुलंद करना है।……. जम्मू कश्मीर और बलोचिस्तान में पाकिस्तान का बर्बर चेहरा….. विषय पर आयोजित इस सेमिनार में देश के कई जाने माने विशेषज्ञों ने भी अपने विचार व्यक्त किए। इनमें हिंद बलोच फोरम के संयोजक स्वामी जितेन्द्रानंद सरस्वती,हिंद बलोच फोरम के अध्यक्ष और जाने माने ज्योतिषाचार्य पवन सिन्हा (गुरुजी), राजनीतिक विश्लेषक और पाकिस्तान मामलों के जानकार पुष्पेन्द्र कुलश्रेष्ठ, हिंद बलोच फोरम के राष्ट्रीय सूत्रधार गोविंद शर्मा,रक्षा विशेषज्ञ कर्नल आरएसएन सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किए। फादर मरिया स्टीफेन और सभी धर्मगुरु भी इस अवसर पर उपस्थित थे।स्थानीय स्तर पर आयोजित इस कार्यक्रम के संयोजक गजेन्द्र सिंह चौहान, अश्विनी, अजय ठाकुर एवं कई अन्य युवाओं ने कार्यक्रम को सफल बनाने में अपना सक्रिय सहयोग दिया। भारत और बलोचिस्तान की बहनों ने राखी बांधकर इस आयोजन को स्नेह सूत्र में पिरोया।

    हिंदू मुस्लिम एकता के लिए बरसों से कार्य कर रहे संघ के स्वयंसेवक इंद्रेश कुमार ने कहा कि हम कभी पाकिस्तान,इस्लाम या मुसलमान के विरोधी नहीं रहे। पाकिस्तान हमारी इच्छा के विरुद्ध बनाया गया था। तत्कालीन नेताओं नेहरू और जिन्ना ने इसमें भले ही सहमति दी हो पर दोनों देशों के नागरिक इस बंटवारे से न तो तब सहमत थे और न आज। पाकिस्तान के मौजूदा शासक इसके बावजूद आज भारत से द्वेष पैदा कर रहे हैं और चीन से गलबहियां डाल रहे हैं। इसके कारण पाकिस्तान के लोगों में भय फैल गया है कि चीन कहीं भविष्य में हमें तिब्बत की तरह गड़प न कर जाए।

    उन्होंने कहा कि लार्ड माऊंटबैटन के जिस कागज पर नेहरू और जिन्ना ने हस्ताक्षर किए थे वो आजादी का नहीं विभाजन का दस्तावेज था। इस विभाजन से दोनों देशों के तीन करोड़ लोग उजड़ गए, दस लाख लोगों का कत्लेआम हुआ, चार लाख बहनों ने आत्महत्या की या बलात्कार के बाद उनकी हत्या कर दी गई, छह लाख लोगों को धर्म परिवर्तन करना पड़ा। उन्होंने बताया कि आजादी के जश्न में बापू स्वयं मौजूद नहीं थे। एक भी दस्तावेज या वीडियो नहीं है जिसमें उन्होंने आजादी का संदेश दिया हो। उन्होंने इस अवसर पर झंडा भी नहीं फहराया। वे तो चाहते थे कि स्वाधीनता आंदोलन के दौरान कांग्रेस के बैनर पर देश के लोगों को एकजुट किया गया था। इसलिए इसे राजनीतिक दल का स्वरूप न दिया जाए। इसके बावजूद चंद स्वार्थी लोगों ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए स्वाधीनता संग्राम की याद दिला दिलाकर देश को लूटा। आज कांग्रेस के नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में कब भागीदारी की जो सेनानियों के नाम पर आज तक देश का दोहन कर रहे हैं।

    श्री इंद्रेश कुमार ने कहा कि जो लोग देश के अन्य राज्यों से पाकिस्तान पहुंचे थे वे आज मुहाजिर कहे जाते हैं। पाकिस्तान के लोगों ने कानून बनाकर उन्हें शरणार्थी का दर्जा दिया और वे आज भी पाकिस्तान के नागरिक नहीं बन सके हैं। आज वे कह रहे हैं कि अपने बुजुर्गों की गलती के लिए वे भारत से क्षमा चाहते हैं। भारत अपने प्रभाव का उपयोग करके उन्हें या तो पाकिस्तान का नागरिक बनवाए या हमें भारत में वापस शामिल कर ले। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के सिंध, गिलगित, बाल्टिस्तान के लोगों ने कभी पाकिस्तान नहीं मांगा था। बलूचिस्तान और सिंध के लोगों ने तो बाकायदा दिल्ली आकर पंडित नेहरू से ये विभाजन रोकने का अनुरोध किया था पर वे नहीं माने। पाकिस्तान की फौजें उन्हें नियंत्रण में रखने के लिए दो लाख मुस्लिमों का कत्ल कर चुकी है। यही वजह है कि पाकिस्तान में नो मोर पाकिस्तान का नारा देने वाले सात संगठन अपनी आवाज उठा रहे हैं। पाकिस्तान नफरत के मार्ग पर चल रहा है इसलिए वह विकास की दौड़ में पिछड़ता जा रहा है।

    कश्मीर की मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती और नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष व लोक सभा सांसद फारूख अब्दुला के बयानों के बारे में इंद्रेश कुमार ने कहा कि एक बार अनुच्छेद 35 ए को हटाकर जरूर देख लिया जाना चाहिए कि इसका क्या असर होता है। हो सकता है इसी से कोई रास्ता निकल आए। मेहबूबा मुफ्ती के बयान पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि तिरंगे की मौत नहीं हो सकती इसलिए इसका जनाजा भी नहीं निकल सकता। इसलिए इस तरह की बातें फिजूल हैं। उन्होंने युवाओं से आव्हान किया कि वे कश्मीर में जमीन खरीदने और बसने के लिए तैयार रहें।

    उन्होंने कहा कि भारत का हिंदू कभी मुसलमान के खिलाफ नहीं रहा। जब बाबरी ढांचे को ढहाने देश भर से स्वयंसेवक अयोध्या पहुंच रहे थे तो उन्होंने किसी दूसरी मस्जिद को हाथ भी नहीं लगाया। किसी भी मुसलमान को चांटा भी नहीं मारा। इस सच्चाई के बावजूद यदि कोई हिंदू को मुसलमानों का दुश्मन बताए तो ये उसके शैतानी दिमाग की उपज ही हो सकती है। पूर्व राष्ट्रपति हामिद अंसारी के बयान के बारे में उन्होंने कहा कि देश भर में कश्मीर के लाखों छात्र विभिन्न राज्यों में पढ़ते हैं कहीं भी उनसे वैमनस्य नहीं रखा जाता है। इसके बावजूद यदि कोई कहता है कि भारत का मुसलमान डरा हुआ है तो वह जिस देश को सुरक्षित समझता है वहां चला जाए। किसी को भारत का माहौल खराब करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

    श्री इंद्रेश कुमार ने कहा कि भारत की कूटनीतिक सफलता ही तो है कि आज दुनिया का एक भी देश चीन का मित्र नहीं है। पाकिस्तान भी पूरी दुनिया से अलग थलग पड़ गया है पर दुनिया के तमाम देश भारत के मित्र हैं। हम कन्फ्यूशियस वाले चीन के पक्षधर हैं, कम्युनिस्ट चीन के नहीं। डोकलाम में हमने अपनी अतिरिक्त सेना तैनात की है। हम युद्ध नहीं चाहते वार्ता से टकराव टालने का प्रयास कर रहे हैं। चीन यदि टकराव का रास्ता अपनाएगा तो इस नकारात्मक सोच के चलते वह बिखर भी जाएगा। उन्होंने कहा कि चीन और पाकिस्तान को सन्मार्ग पर लाने के लिए देश के लोगों को आगे आना होगा। भारत ने चीन को कच्चे माल की सप्लाई बंद कर दी है। हम लोगों से ये भी अपील कर रहे हैं कि तीज त्योहार से लेकर रोज की पूजा तक में इस्तेमाल होने वाले चीन के माल का उपयोग बंद कर दें।उन्होंने लोगों को चीन और पाकिस्तान की विस्तारवादी सोच से उपजे आतंकवाद से मुक्ति के लिए प्रार्थना करने का अनुरोध किया।

  • चीन से विवाद में कांग्रेसी दलालों की भूमिका

    चीन से विवाद में कांग्रेसी दलालों की भूमिका

    डोकलाम विवाद: भारत ने नहीं हटाई सेना तो दो हफ्तों में हमला कर सकता है चीन- ग्लोबल टाइम्स

    नईदिल्ली। चीनी मीडिया लगातार भारत और खासतौर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को निशाना करके हमले की चेतावनी दे रहा है। चीनी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने चीनी सैन्य विशेषज्ञों के हवाले से लिखा है कि अगर नरेन्द्र मोदी सरकार का इस मुद्दे पर अड़ियल रवैया कायम रहता है तो जंग होना तय है। चीन के सैन्य विशेषज्ञों के मुताबिक चीन की पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी दो हफ्तों के अंदर डोकलाम में भारतीय सेना पर सीमित कार्रवाई कर सकती है।

    शंघाई एकेडमी ऑफ सोशल साइसेंज के इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल रिलेशंस में रिसर्च फेल हु ज़ियोंग ने कहा, ‘पिछले दो दिनों में चीन की ओर से की गई टिप्पणियां दिखाती हैं कि चीन भारतीय सेना को विवादित क्षेत्र में लंबे समय तक बर्दाश्त नहीं करेगा।’ ग्लोबल टाइम्स ने हु जियोंग के हवाले से लिखा है कि चीन की सैन्य कार्रवाई का मकसद डोकलाम में मौजूद भारतीय सैनिकों को कैद करना या फिर उन्हें पीछे धकेलना शामिल होगा, साथ ही चीन का विदेश मंत्रालय ऐसी किसी भी कार्रवाई से पहले भारत के विदेश मंत्रालय को अपने फैसले की सूचना देगा।’

    चीन के विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, भारत में चीन के दूतावास और पीपुल्स डेली की ओर से भारत को धमकी दी जा चुकी है कि भारत डोकलाम से अपनी सेना हटाए। बता दें कि डोकलाम में पिछले दो महीनों से भारत चीन की सेना आमने-सामने है। चीन के सरकारी टीवी ने शुक्रवार को बताया कि चीन की सेना ने तिब्बत मिलिट्री क्षेत्र में युद्धाभ्यास किया है, ये युद्धाभ्यास सुबह 4 से शुरू हुआ था और इसमें दुश्मन के ठिकानों पर कब्जे का अभ्यास किया गया था।

    शंघाई इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल स्टडीज में सेन्टर फॉर एशिया-पैसिफिक स्टडीज के निदेशक जाओ गेनचेंग ने ग्लोबल टाइम्स को बताया कि चीनी सेना का ये अभ्यास दिखाता है कि डोकलाम में चीन सैन्य संसाधनों का इस्तेमाल कर सकता है और ऐसा करने की संभावनाएं बढ़ती जा रही है क्योंकि भारत कह कुछ रहा है और कर कुछ रहा है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने गुरुवार को संसद में बयान दिया था कि युद्ध से समस्या का समाधान नहीं हो सकता है इसके लिए बात चीत और बौद्धिक विमर्श की जरूरत है। हालांकि सुषमा स्वराज ने ये भी कहा था कि भारत की सेना किसी भी स्थिति का सामना करने को तैयार है।

    डोकलाम में सड़क बना रहे चीनी अमले को रोकने के लिए जबसे भारत की सेना ने हस्तक्षेप किया है तभी से ये विवाद गरमाया है। भारत में अपना कारोबार लगातार बढ़ाने के लिए चीन ने इन सड़कों का विस्तार किया है। सामरिक महत्व से भी चीन लगातार भारत को घेरने में लगा हुआ है। पड़ौसी मुल्कों से लगातार संबंध बिगाड़ने वाली कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी ने इस बीच चीनी दूतावास जाकर वहां के राजनयिकों से मुलाकात की थी। इस गोपनीय मुलाकात की जानकारी लीक हो गई और सत्तारूढ़ भाजपा के नेताओं ने राहुल गांधी के इस तरह गुपचुप मिलने पर सवाल उठाए थे। तभी से ये सवाल लगातार उठाए जा रहे हैं कि मौजूदा तनाव के पीछे कहीं कांग्रेस के रणनीतिकारों की तो भूमिका नहीं है। जनता की चुनी हुई सरकार के सामने लगातार लाचार नजर आती कांग्रेस जिस तरह देश के साथ षड़यंत्र करती रही है उसे देखकर तो शंकाएं उठना लाजिमी हैं। भारत सरकार को कांग्रेस से जुड़े दलालों और तस्करों की भूमिका की छानबीन भी करनी चाहिए जिससे इस विवाद का समाधान हो सके। (एजेंसियां)

  • चुटका परमाणु बिजली संयंत्र को जमीन आबंटित

    चुटका परमाणु बिजली संयंत्र को जमीन आबंटित

    मंत्रि-परिषद के निर्णय

    भोपाल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।

    मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में आज हुई मंत्रि-परिषद की बैठक में पचमढ़ी अभयारण्य से 11 ग्राम एवं नजूल के 395.939 हेक्टेयर क्षेत्र को अभयारण्य क्षेत्र से बाहर करने तथा अभयारण्य के शेष बचे 28 ग्रामों को अभयारण्य क्षेत्र में इनक्लोजर के रूप में रखने का निर्णय लिया गया। इन ग्रामों पर वन्य-प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 के अभयारण्य से संबंधित प्रावधान लागू नहीं होंगे।

    मंत्रि-परिषद ने केंद्रीय जेल भोपाल के 8 विचाराधीन बंदियों के भागने की घटना की न्यायिक जाँच के लिए गठित जाँच आयोग के कार्यकाल में तीन माह की वृद्धि करने का निर्णय लिया । यह वृद्धि 7 अगस्त से 6 नवंबर 2017 तक की गई है।

    मंत्रि-परिषद ने राजधानी परियोजना प्रशासन के तहत 422 नियमित अस्थाई पद और कार्यभारित स्थापना के तहत 300 पद इस तरह कुल 722 पद 1 मार्च 2017 से आगामी 5 वर्ष के लिए निरंतर रखने की स्वीकृति दी।

    मंत्रि-परिषद ने मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों में सामान्य पूल के आवासगृहों के निर्माण के लिए 220 करोड़ की प्रशासकीय स्वीकृति दी।

    मंत्रि-परिषद ने मध्यप्रदेश गौण खनिज नियम 1996 में संशोधन के संबंध में समन्वय में दिये गये आदेश का अनुसमर्थन किया।

    स्कूल शिक्षा के महत्वपूर्ण निर्णय

    मंत्रि-परिषद ने प्रदेश में शासकीय हाई /हायर सेकेण्डरी विद्यालयों में फर्नीचर और हायर सेकेण्डरी स्कूलों की प्रयोगशाला में आवश्यक सामग्री की पूर्ति करने की स्वीकृति दी। इसका क्रियान्वयन आगामी 3 वर्षों तक होगा।

    मंत्रि-परिषद ने कक्षा 9 से 12 के दिव्यांग बच्चों के लिए संभाग स्तर पर छात्रावास संचालन की स्वीकृति दी। योजना को आगामी 3 वर्ष तक संचालन की स्वीकृति मिली है।

    मंत्रि-परिषद ने शासकीय हाई/हायर सेकेण्डरी विद्यालय भवन में रेट्रोफिटिंग जैसे लैब, पुस्तकालय, खेलकूद कक्ष में आवश्यक कार्य, पार्टीशन, सायकल स्टेण्ड, शेड निर्माण, स्टेज निर्माण, मैदान निर्माण, बगीचा निर्माण, पेयजल व्यवस्था आदि के लिए नयी योजना स्वीकृत की। वर्ष 2017-18 में इस मद में 9.20 करोड़ तथा 3 वर्ष के लिए 43.7 करोड़ की राशि स्वीकृत की गईं।

    राजस्व निर्णय

    मंत्रि-परिषद ने भूमि-अर्जन, पुनर्वासन एवं पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013-शासन के विभिन्न विभागों/उपक्रमों के लिए ‘आपसी सहमति से भूमि क्रय नीति’ 12 नवंबर 2014 में संशोधन की मंजूरी दी। संशोधन के बाद कण्डिका 14 में क्रय की गई भूमियों के विक्रय विलेख के विषय में भारतीय स्टाम्प अधिनियम 1899 एवं रजिस्ट्रीकरण अधिनियम 1908 के प्रावधान लागू होंगे।

    मंत्रि-परिषद ने ‘शासकीय भूमि में से भूमिगत पाइप लाइन, केबल या डक्ट बिछाने के लिए अनुज्ञप्ति’ विषयक नीति लागू करने की मंजूरी दी। निर्णय लिया गया कि विभिन्न परियोजनाओं के लिए भूमिगत पाइप लाइन, केबल या डक्ट बिछाने के लिए निजी भूमियों का उपयोक्ता का अधिकार अर्जन किया जाता है और जहाँ इन कार्यों के लिए शासकीय भूमि की आवश्यकता होगी ऐसी भूमि परियोजना को लाइसेंस पर उपलब्ध करवाई जायेगी।

    मंत्रि-परिषद ने चुटका परमाणु विद्युत परियोजना के लिए न्यूक्लियर पॉवर कार्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड को मंडला और सिवनी जिले की शासकीय भूमि वर्तमान में प्रचलित कलेक्टर गाइड लाइन वर्ष 2017-18 के आधार पर प्रीमियम राशि और 7.5 प्रतिशत वार्षिक भू-भाटक लेकर आवंटन की मंजूरी दी।

  • जीएसटी से देश का आर्थिक एकीकरणःमलैया

    जीएसटी से देश का आर्थिक एकीकरणःमलैया

    भोपाल 12 जुलाई(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।

    वित्त एवं वाणिज्यिक कर मंत्री जयंत मलैया ने कहा है कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) ने काश्मीर से कन्याकुमारी तक देश का आर्थिक रूप से एकीकरण किया है। जीएसटी देश की आजादी के बाद आर्थिक क्षेत्र का सबसे बड़ा बदलाव है। इससे देश की तरक्की की रफ्तार को काफी गति मिलेगी। वित्त मंत्री मलैया आज भोपाल के समन्वय भवन में जीएसटी जागरूकता कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे। कार्यशाला में राजस्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता और सहकारिता राज्य मंत्री विश्वास सारंग भी मौजूद थे।

    वित्त मंत्री श्री मलैया ने कहा कि जीएसटी एक राष्ट्र, एक कर और एक बाजार के उद्देश्य से लागू किया गया है। प्रदेश में एक जुलाई से वाणिज्यिक कर विभाग की 29 चौकी समाप्त हो गयी हैं। उन्होंने कहा कि पहले करीब 18 प्रकार के कर हुआ करते थे। अब इन सबको समाप्त कर एक कर जीएसटी लागू किया गया है। श्री मलैया ने कहा कि मध्यप्रदेश में पूर्व में वेट विधान में व्यवसायियों को पंजीयन लेने की सीमा 10 लाख रुपये वार्षिक टर्न-ओव्हर थी। जीएसटी विधान में यह 20 लाख रुपये वार्षिक टर्न-ओव्हर कर दी गयी है। इसके साथ ही 75 लाख रुपये तक के व्यापारियों को कंपोजिशन की सुविधा भी दी गयी है। जीएसटी कानून में छोटे व्यवसायियों को सुविधा देने के अधिक से अधिक प्रयास किये गये हैं।

    वित्त मंत्री ने कहा कि बेरियर खत्म होने से सड़कों पर चलने वाले ट्रकों की रफ्तार तेज होगी। देश में जब बेरियर थे, तो ट्रकों में लगने वाले ईंधन में प्रतिवर्ष एक लाख 40 हजार करोड़ रुपये का अनावश्यक खर्च होता था। वित्त मंत्री ने कहा कि अमेरिका में मालवाहक ट्रक प्रतिदिन 800 किलोमीटर की दूरी तय करता है। जब बेरियर थे तब मालवाहक ट्रक देश में केवल 280 किलोमीटर प्रतिदिन की दूरी तय करते थे। अब मालवाहक ट्रकों की रफ्तार प्रतिदिन 350 से 400 किलोमीटर हो जायेगी। इससे व्यापारिक गतिविधियों में तेजी आयेगी। जीएसटी के टैक्स स्लेब की चर्चा करते हुए श्री मलैया ने कहा कि जीएसटी में कर की 5 दरें 0, 5, 12, 18 और 28 प्रतिशत हैं। केवल 19 प्रतिशत वस्तुएँ ऐसी हैं, जिन पर कर की दर उच्चतम अर्थात 28 प्रतिशत है। शेष 81 प्रतिशत वस्तुओं पर 18 प्रतिशत या उससे कम की दरें हैं। वित्त मंत्री श्री मलैया ने जीएसटी को देश के संघीय ढाँचे की बेहतर मिसाल बताया।

    राजस्व मंत्री श्री उमाशंकर गुप्ता ने कहा कि जीएसटी का निर्णय देश की तरक्की और आम जनता की भलाई के लिये लिया गया है। उन्होंने व्यापारियों से जीएसटी के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखने की सलाह दी। सहकारिता राज्य मंत्री श्री विश्वास सारंग ने कहा कि जीएसटी को लागू करने का निर्णय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का साहसिक कदम है। इसके अच्छे प्रभाव आने वाले वर्षों में देखने को मिलेंगे। प्रमुख सचिव वाणिज्यिक कर श्री मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि देश के संविधान को बनाने के लिये जितनी चर्चा नहीं हुई थी, उससे ज्यादा जीएसटी कानून को बनाने के लिये हुई है। उन्होंने कहा कि जीएसटी कानून में लगातार चर्चा के बाद जनता के हितों को देखते हुए संशोधन किये जायेंगे। उन्होंने हाल ही में किसानों के हित में फर्टिलाइजर में जीएसटी की दर कम किये जाने का उल्लेख किया। कार्यशाला में वाणिज्यिक कर आयुक्त श्री राघवेन्द्र सिंह और सेंट्रल एक्साइज के चीफ कमिश्नर श्री हेमंत भट्ट ने जीएसटी के प्रावधानों के बारे में जानकारी दी। कार्यशाला का संचालन वित्त मंत्री के विशेष कर्त्तव्यस्थ अधिकारी श्री नितिन नांदगांवकर ने किया। कर सलाहकार श्री आर.एस. महेश्वरी ने व्यापारियों की समस्याओं का समाधान किया।