Category: अर्थ संसार

  • कर्ज से गुलछर्रे उड़ाने वालों की दहशत

    कर्ज से गुलछर्रे उड़ाने वालों की दहशत

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    देश में विमुद्रीकरण की आंधी ने जनता के नाम पर कर्ज लेकर गुलछर्रे उड़ाने वाले तथाकथित उद्योगपतियों की नींदें उड़ा दी हैं। विकास योजनाओं के नाम पर कर्ज लेने वाले और गुल्ली करने वाले राजनेताओं की भी जान सांसत में है। उन्होंने विकास योजनाओं पर लिए साफ्ट लोन की राशि को गुल्ली कर लिया था।ये धन उन्होंने मंहगी ब्याज दरों पर भूमाफिया, बिल्डरों, उद्योगपतियों को उपलब्ध करा रखा था ।अबउसे ताबड़तोड़ ढंग से वापस जमा करने की चुनौती ने उनकी नींदें उड़ा दी हैं। नतीजा ये है कि नेताओं और उद्योगपतियों के इस गठजोड़ ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना लगाना शुरु कर दिया है। आज मध्यप्रदेश के एक अखबार ने संपादकीय लिखा है जिसमें कहा गया है कि सरकार लोगों को नहींसमझा पाई है कि उसने जनता की गाढ़ी कमाई और महिलाओं के बचाकर रखे गए धन को हलक में हाथ डालकर निकाल लिया है वह लोगों के विकास में ही उपयोग की जाएगी। इस तरह की हल्की बातों को कहकर ये गैर जिम्मेदार अखबार विमुद्रीकरण के फैसले के खिलाफ जनमत तैयार करने का काम कर रहा है। ये अखबार ये भी कह रहा है कि विमुद्रीकरण का फैसला केवल और केवल प्रधानमंत्री मोदी ने लिया है। ये बात सही है कि विमुद्रीकरण का फैसला लिए जाते समय पूरी गोपनीयत बरती गई थी। लेकिन ये फैसला सुविचारित ढंग से देश के जिम्मेदार लोगों ने लिया है। सेना के तीनों अध्यक्षों को इसके लिए विश्वास में लिया गया। रिजर्व बैंक के अफसरों, वित्तीय सलाहकारों, और उन तमाम लोगों को भरोसे में लिया गया जो देश की नीति निर्धारण में बड़ी भूमिका निभाते हैं। इसके बावजूद बौखलाए सूदखोर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ जनमत जगाने में जुट गए हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि उन्होंने वैश्विक मुद्राकोषों से लिए गए जिस साफ्टलोन को मंहगी ब्याजदरों पर बाजार में चला रखा था उसे वे समयसीमा के भीतर वापस कैसे जमा करा सकेंगे। यदि उन्होंने ये धन घोषित नहीं किया तो वह मिट्टी हो जाएगा, और यदि घोषित करते हैं तो जेल जाने के हकदार होंगे। शायद इसीलिए वे जनता की परेशानियों का हवाला देकर तरह तरह की खबरें अखबारों में छपवा रहे हैं। उन घटनाओं को खबर बनाया जा रहा है जिसमें लोग बैक की लाईनों में खड़े होकर अपनी कमजोरियों के कारण बेहोश हो गए या उनकी मौत हो गई। ये सब माहौल वे बना रहे हैं जिन्हें जनता का धन हड़प करने के कारण अपनी मौत करीब नजर आ रही है। खुद भारतीय जनता पार्टी के नेता इस फैसले से अचंभित हैं। उन्हें लग रहा है कि ये फैसला उनकी मौत की वजह बनने जा रहा है। अब तक विकास के नाम पर भाजपा की सरकारों ने भी कांग्रेस की सरकारों की ही तरह भारी कर्ज ले रखा था। इस धन को उन्होंने फर्जी कंपनियों के माध्यम से शेयर मार्केट में भी लगा ऱखा था। जमीनों के भाव अनाप शनाप बढ़ाकर उन्होंने रियल स्टेट सेक्टर में भी भारी निवेश कर ऱखा था। मकानों की जमाखोरी को बढ़ावा देकर वे उस साफ्टलोन से करोड़ों रुपए उलीच रहे थे। सरकार के इस एक फैसले ने उनकी तमाम अय्याशियों को धरातल पर ला दिया है। इसलिए वे ऊपरी तौर से तो भले ही प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ कर रहे हैं लेकिन छिपकर वे भारत सरकार पर भी प्रहार करने से बाज नहीं आ रहे हैं। वे भूल गए हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमेशा से भारतीय अर्थव्यवस्था को नई कसावट देने का पक्षधर रहा है। भाजपा और आरएसएस के चिंतकों का एक बड़ा वर्ग नोटों से महात्मा गांधी की फोटो हटाने के पक्षधर रहे हैं। सच भी तो है महात्मा गांधी अपरिग्रह के पक्षधर थे और वे पूंजी के अधिक उपयोग के विरोधी थे। गांधीवाद वास्तव में पूंजी के विरोध पर टिका था जबकि पूंजीवाद लोगों की भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करके सुलझे समाज के निर्माण की बात करता है। ये दोनों विचार परस्पर विरोधी हैं इसलिए अब गांधी को विसर्जित करने का समय आ गया है। महात्मा गांधी को मुख्य धारा से हटाए बगैर हम सुखी समाज के निर्माण का अपना लक्ष्य नहीं पा सकते हैं। अब जबकि भारत ने पूंजीवाद के रास्ते पर पच्चीस सालों तक चलने के बाद ठोस फैसले लेकर पूंजीवाद को सफल बनाने की रणनीति पर काम शुरु कर दिया है तब ये सूदखोरों की लाबी इस फैसले की आलोचना में जुट गई है। वास्तव में विमुद्रीकरण का फैसला जनता के लिए जितना परेशान नहीं कर रहा उतना ये भ्रष्टाचारियों और शोषकों सिर पर लटकी तलवार साबित हो रहा है।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना सिर्फ एक बात पर की जा सकती है कि वे नए नोटों को गांधी से मुक्ति नहीं दिला सके हैं। शायद उन्होंने पूंजी को मजबूती देने के लिए अभी गांधी से पंगा लेने से बचने की रणनीति अपनाई है। इसके बावजूद विमुद्रीकरण जिस तरह देश की मुद्रा को मजबूती देने मे मील का पत्थर साबित होने वाला है उससे गरीबों के नाम पर शोषण का दुष्चक्र चलाने वालों की नींदें तो उड़ गई हैं। जनता को उसके अपने हित की रक्षा में लड़ रही इस सरकार के हाथ मजबूत करने के लिए आगे आना होगा। प्रधानमंत्री ने वाकई बड़ा पंगा लिया है और हमें समझना होगा कि राष्ट्रभक्ति के इस अनुष्ठान में आगे बढ़कर अपना योगदान देेने का सही वक्त आ गया है।

  • धन की धुलाई में जुटे लोगों पर गाज गिरेगी

    धन की धुलाई में जुटे लोगों पर गाज गिरेगी

    The Prime Minister, Shri Narendra Modi being received on his arrival at Varanasi, Uttar Pradesh on November 14, 2016.
    The Prime Minister, Shri Narendra Modi being received on his arrival at Varanasi, Uttar Pradesh on November 14, 2016.

    नईदिल्ली(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।
    18-नवंबर, 2016

    अपने काले धन को नए नोटों में परिवर्तित करने के लिए अन्य व्यक्तियों के बैंक खातों का उपयोग करने वाले कर चोरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी

    इस उद्देश्‍य के लिए अपने बैंक खातों के दुरुपयोग की अनु‍मति देने वाले लोगों पर उकसाने के लिए आयकर अधिनियम के तहत मुकदमा चल सकता है, सरकार ने लोगों से अपील की है कि वे काले धन को परिवर्तित करने वालों के लालच में न आएं और इस तरीके से काले धन को सफेद करने के अपराध में भागीदार न बनें तथा इसे समाप्‍त करने में सरकार से जुड़कर उसकी मदद करें

    सरकार ने पहले इस आशय की घोषणा की थी कि कारीगरों, कामगारों, गृहणियों इत्‍यादि द्वारा बैंकों में जमा की जाने वाली छोटी राशियों पर आयकर विभाग वर्तमान आयकर छूट सीमा के 2.5 लाख रुपये रहने के तथ्‍य को ध्‍यान में रखते हुए कोई भी सवाल नहीं करेगा। इस बीच, ऐसी जानकारियां मिली हैं कि कुछ लोग अपने काले धन को नये नोटों में बदलने के लिए अन्‍य व्‍यक्तियों के बैंक खातों का उपयोग कर रहे हैं, जिसके लिए उन खाताधारकों को इनाम भी दिया जा रहा है जो अपने खातों के इस्‍तेमाल की अनुमति देने पर सहमत हो जाते हैं। इस तरह की गतिविधि जन धन खातों में भी होने की सूचना मिली है।
    यह स्‍पष्‍ट किया गया है कि यदि यह बात साबित हो जाती है कि किसी बैंक खाते में जमा की गई राशि खाताधारक के बज़ाय किसी और व्‍यक्ति की है तो इस तरह की कर चोरी पर आयकर के साथ-साथ जुर्माना भी लगाया जा सकता है। यही नहीं, जो व्‍यक्ति इस उद्देश्‍य के लिए अपने खाते के दुरुपयोग की अनुमति देगा उस पर उकसाने के लिए आयकर अधिनियम के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है।
    हालांकि, अपनी ही नकद बचत राशि को बैंक खाते में जमा करने वाले वास्‍तविक व्‍यक्तियों से कोई भी सवाल नहीं पूछा जायेगा।

  • चाईना बोला तो मिर्ची लगी

    चाईना बोला तो मिर्ची लगी

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    चीन के सरकारी मीडिया का कहना है कि चीनी माल पर प्रतिबंध लगाने के मामले में भारत केवल भौंक सकता है चीनी माल का मुकाबला नहीं कर सकता। देसी अंदाज में की गई इस टिप्पणी से पूरे हिंदुस्तान में नाराजगी का माहौल है। इसकी वजह ये है कि आम भारतीय केवल बात नहीं करता वह बदलाव के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता है। हिंदुस्तान के साधुओं की तपस्या और युद्ध के मैदान में मौत को गले लगा लेने वाले रणबांकुरों की बहादुरी देखकर हिंदुस्तानियों की असीमित शक्तियों का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। इसलिए ये बयान आम भारतीयों को कचोट रहा है। चीन का सरकारी मीडिया हो या स्वयं सरकार किसी को ये मुगालता नहीं पालना चाहिए कि हिंदुस्तान कुछ नहीं कर सकता। इस तरह का ओछा बयान देने से ज्यादा नुक्सान चीन का ही होने वाला है। यदि सवा सौ करोड़ हिंदुस्तानियों ने ठान लिया तो वे चीन के माल की होलियां जलाकर पूरा कारोबार ठप कर देंगे।

    चीनियों को नहीं भूलना चाहिए कि अंग्रेजों को भगाने के लिए इसी हिंदुस्तान में विदेशी कपड़ों की होलियां जलाई जाती रहीं हैं। ये बात अलग है कि आजादी के बाद नेहरू इंदिरा की धूर्त कांग्रेस ने देश के लहू में मक्कारी का जहर भर दिया है। एक महान देश को जातियों, संप्रदायों में बांट दिया है। आरक्षण के जहर से प्रतिभाओं को सरेराह कत्ल किया है। सुअर सरकारीकरण थोपकर देश की मुद्रा को भिखारी बना दिया है। आज अड़सठ रुपए का डालर बिके तो जाहिर है कि आम हिंदुस्तानी कितनी भी मेहनत क्यूं न कर ले पर वह चीन के बराबर सस्ता माल नहीं दे सकता। चीन की मुद्रा इतनी ताकतवर है कि वह कच्चे माल को बहुत थोड़ी लागत लगाकर बाजार में फेंक देता है। अब इतने सस्ते माल का मुकाबला भला कोई भी देश कैसे कर सकता है। चीन ने इसी हिकमत के बल पर न केवल हिंदुस्तान बल्कि दुनिया के तमाम देशों के बाजारों को अपने माल से पाट दिया है। वो ये सब केवल इसलिए कर सका क्योंकि वहां लोकतंत्र नहीं है। आम आदमी को मनचीता करने की आजादी नहीं है। जबकि हिंदुस्तान में तो जितने मुंह उतनी बातें। हर नागरिक शहंशाह है। राजतंत्र के दौर में एक राजा होता था जो यदि अच्छा हो तो पूरा राज्य सुगंधित विकास से भर जाता था और यदि मूर्ख हो तो कुशासन का अभिशाप उस राज्य को दूसरे शासक के हाथों विजित करा देता था। चीन का ये भड़काऊ बयान उस दौर में आया है जब हिंदुस्तान की महान जनता ने कांग्रेस के कुशासन को उखाड़ फेंका है। उसने उम्मीदों की एक नई सुबह के इंतजार में सत्ता की बागडोर नरेन्द्र मोदी जैसे सशक्त नेतृत्व के हाथों में सौंपी है।

    नरेन्द्र मोदी भारतीय जनता पार्टी की उस पाठशाला में पले बढ़े हैं जिसे संघ के तपोनिष्ठ स्वयंसेवकों ने अपने खून पसीने से सींचा है। नरेन्द्र मोदी जैसे हजारों लाखों स्वयंसेवक आज न केवल भारतीय जनता पार्टी बल्कि देश के अन्य राजनैतिक दलों का भी संचालन कर रहे हैं। पराजित होकर सत्ताच्युत हो चुकी कांग्रेस में भी संघ की ज्वाला में तपे निखरे स्वयंसेवक मौजूद हैं। ये वो लोग हैं जो भारत माता की आराधना करते हैं। ये वो लोग हैं जो देश के लिए मर मिटने में पल भर का वक्त भी नहीं लगाते हैं। यही वजह है कि हम चीन के इस मुगालते भरे कटाक्ष का स्वागत करते हैं। हम चीनी मीडिया को इस बात के लिए भी धन्यवाद देते हैं कि उसने हमें झकझोरने का काम तो किया। यही बात यदि भारतीय मीडिया के पत्रकार बंधु कहते तो सत्ता के मद में डूबे स्वयंभू देशभक्त उन पर तरह तरह की तोहमतें थोप देते। कोई उन पर वामपंथी, नक्सली, सनकी, बिका हुआ होने का लेबल चिपका देता तो कोई विपक्षी कांग्रेसियों की शह पर दिया गया बयान बताकर खारिज करने का श्रम करके अपने आकाओं से नंबर बढ़वाने का जतन करने लग जाता। ये अच्छी बात है कि ये बयान चीन के मीडिया ने दिया है। उसने न केवल भारत को भौंकने वाला लाचार देश बताया बल्कि ये भी कहा कि नरेन्द्र मोदी के मेक इन इंडिया अभियान का कोई मतलब नहीं। इसकी वजह उसने बताई कि भारत में भारी भ्रष्टाचार है। चीनी मीडिया ने अपने निवेशकों को भी सलाह दी है कि वे भारत में कतई निवेश न करें।

    चिंताजनक बात तो ये है कि चीनी मीडिया का ये बयान तब आया है जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जैसे कई नेता चीन की जमीन पर जाकर वहां के उद्योगपतियों को निवेश का न्यौता देते फिर रहे हैं। लगता है कि नेताओं के ये प्रयास चीन के उद्योगपतियों और सरकार का भरोसा नहीं जीत पाए हैं। ये बात भी सही है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह विश्व पटल पर पाकिस्तान में आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए चीन को सवालों के घेरे में खड़ा किया उससे भी चीन बौखलाया हुआ है। अमेरिका से बढ़ती नजदीकियों से भी चीन के रणनीतिकार परेशान महसूस कर रहे हैं। इसके बावजूद चीन के मीडिया ने जो बात कही है उसके लिए भारत के शासकों को अपने गिरेबान में जरूर झांकना पड़ेगा। कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री पी.व्ही.नरसिंम्हाराव और डाक्टर मनमोहन सिंह ने कड़ा दिल करके देश को नेहरू इंदिरा काल की गद्दार नीतियों से बाहर निकालने का भरपूर जतन किया। वे खुलकर तो नहीं कह सकते थे कि इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण और अंधे सरकारीकरण को थोपकर देश को गरीबी के दलदल में धकेल दिया था। इसलिए उन्होंने कार्पोरेटीकरण को बढ़ावा देकर एक समानांतर अर्थव्यव्यवस्था खड़ी करने का प्रयास किया। ये बात अलग है कि इससे आम नागरिकों पर दोहरा बोझ पड़ने लगा है। एक ओर तो वे कार्पोरेटीकरण जनित मंहगाई की मार झेलने के लिए खुले बाजार के हवाले कर दिए गए हैं वहीं राष्ट्रीयकरण के नाम पर थोपे गए अनुत्पादक सरकारी तंत्र को भी पालने पोसने के लिए मजबूर हैं। कांग्रेस के पतन के बाद जरूरत थी कि भारत जल्दी से जल्दी इस थोपे गए सरकारीकरण के जाल से खुद को मुक्त कर लेता।

    कांग्रेस की विदाई के बाद भाजपा की सरकारें भी कमीशनखोरी के चक्कर में कांग्रेस की ही पूंछ पकड़कर चलने लगीं। इसलिए देश में एक बार फिर निराशा का माहौल फैलने लगा है। इससे निजात दिलाने के लिए भाजपा के नेता खोखले बयानों की राजनीति कर रहे हैं। वे जनता को वैचारिक तौर पर राहत महसूस कराने का प्रयास कर रहे हैं जबकि इससे कोई समाधान निकलने वाला नहीं है। ये बात दुनिया भर के निवेशकों को भी मालूम है। यही वजह है कि जापान जैसा मित्र देश और उसके उद्योगपति भी भारत में निवेश करने से कतरा रहे हैं। धूर्त सरकारीकरण से घबराकर जापान की संस्था ने मध्यप्रदेश में मैट्रो रेल की जायका जैसी संस्था को भी कर्ज देने के मामले में चुप्पी साध ली है। चीन का मीडिया क्या बोलता है हम उसकी चिंता न भी करें तो हमें अपने हालात पर गौर जरूर करना होगा। कर्ज लेकर चलने वाली विकास योजनाओं को हम यदि विकास बताते रहेंगे तो फिर हमारी शुतर्मुर्गी भूमिका देश को एक नए झमेले में डाल देगी। यदि हम कांग्रेस को गाली देते रहे और युवाओं को रोजगार मुहैया नहीं करा सके तो ध्यान रखें हम एक नई उथलपुथल को पनपने का अवसर दे रहे हैं। हिंदुस्तान के शासकों और उनकी भोंदू नौकरशाही को आत्मचिंतन करना ही होगा। उन्हें ध्यान रहे कि ये दौर पूंजीवाद का है और कानून का डंडा केवल शासकों के हाथ का नौकर नहीं होता।

  • अब उपभोक्ता फ्रेंडली कानून बने

    अब उपभोक्ता फ्रेंडली कानून बने

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    भरतचन्द्र नायक……

    लोककल्याणकारी राज्य में उत्पाद उत्पादकों, वितरकों और विचैलियों से आम उपभोक्ताओं को रक्षा कवच के लिए सरकारें वैद्यानिक कवच प्रदान करती है। उपभोक्ता संरक्षण कानूनों की रचना का यही उद्देश्य है। एमआरपी की व्यवस्था की गई, लेकिन एमआरपी की आड़ में ऐसी लूट आरंभ हो गई कि एमआरपी पर मनमाना रिवेट दिया जाने लगा। गोया एमआरपी भी लूट का जरिया बन गई। ऐसे में केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण मंत्रालय की यह पहल उत्साहवर्द्धक लगती है कि सरकार आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं के दाम तय करेगी। खुदरा बाजार में दाल, दूध, चीनी, खाद्य तेलों और दूसरी वस्तुओं की कीमतों को लेकर एक कड़े कानून की उम्मीद की जा रही है। आशा की जाती है कि मौजूदा हालात में पेक्ड और खुली वस्तुओं के मूल्यों का अंतर घट जायेगा। यदि यह होता है तो बाजार में मूल्यों को लेकर क्रांतिकारी बदलाव आयेगा। लेकिन देखने में आया है कि मूल्य निर्धारण का संकेत मिलते ही घी के उत्पादकों ने घी के दामों में 30 से 40 प्रतिशत मूल्य वृद्धि करके त्योहारों का स्वाद कसैला कर दिया है। यह बात तय है कि सिर्फ कानून ही इस धींगा मस्ती पर नियंत्रण नहीं कर सकता उपभौकता संरक्षण यदि ऐसा होता तो 1860 में बने कानून अपनी प्रासंगिकता नहीं खो देते। उपभोक्तावाद का पलड़ा बाजारवाद से भारी करना होगा। इसके लिए भी हमें राष्ट्र की चेतना को जगाना होगा। कानून के प्रति सम्मान की भावना और दंड का भय पैदा करना होगा। छत्रपति शिवाजी ने एक वक्त आधिकारियों को कहा उनकी आज्ञा के बिना दुर्ग का प्रवेश द्वार नहीं खोला जायेगा। इसी बीच छत्रपति के पुत्र ने प्रवेश द्वार खोलने की इच्छा व्यक्त की और सेना के अधिकारी ने महाराज के पुत्र की इच्छा पूरी कर दी। छत्रपति शिवाजी ने सेनापति और स्वयं के पुत्र को बंदी बनाकर न्यायपति के समक्ष पेश करने का आदेश दिया जहां दोनों को दंड मिला।

    आर्थिक उदारीकरण से विश्व में आर्थिक प्रक्रिया तेज हुई है। विकास का तानाबाना बुना गया है। लेकिन जो भावना एकात्म मानवदर्शन में निहित है उसका प्रादुर्भाव न तो पूंजीवाद से होता दिखता है और न वामपंथ से। ‘‘सरवाईबिल आफ दी फिटेस्ट’’ की कहावत चरितार्थ हुई है। उत्पाद के उत्पादन की प्रक्रिया, इसमें शामिल अवयव, इनका मानव पर प्रभाव, इनकी लागत और इनका विक्रय मूल्य फैक्टरियों के सूचना पट पर हो यह ताकीद परोक्ष में कानून की भावना है। लेकिन देखने की बात है कि इसका पालन बिरले स्थान पर ही होता हैं हैरत की बात है यह ताकीद यदि तत्कालीन यूनियन कार्बाइट जैसे कारखाने ने भी अपनाई होती तो भोपाल के नाम दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी सदा के लिए नत्थी नहीं हो जाती। लाखों जिन्दगियां तबाही से बच जाती, उनके इलाज में सुविधा होती आज तक सरकारें और रसायन विश्लेषक इस बात की खोज कर रहे हैं कि यूनियन कारवाईट फैक्टरी से लीक गैस निकली और हजारों बेगुनाह लोगों को मौत की नींद सुला गई। उसका किस योग से उत्पादन हो गया और प्राण घातक गैसों से पीड़ित इन्सानों के लिए क्या उपचार कारगर होगा। अंधेरे में ही चिकित्सा जगत मरीजों का इलाज कर रहाह ै। जिस युग में हम पारदर्शिता की बात करते हैं उत्पादक अपने हितों की हिफाजत के लिए इन्सान के जीवन से खिलवाड़ करने में कतई गुरेज नहीं करते। उपभोक्तावाद पर बाजारवाद कितना शिंकजा कस चुका है यह इसकी एक मिसाल हैं।

    मिलावट खोरी उद्योग बनी
    भारत दुनिया में दुग्ध उत्पादन में शीर्ष पर है। यहां शाकाहार में दूध को पोषण आहार के रूप में प्रतिष्ठा है। दूध-दही अमृत माना जाता हैं देवताओं को भोग में इस्तेमाल होता है। शैशव का पोषण आहार है, लेकिन दूध में मिलावाट शहरों और गांवों में आम बात हो चुकी हैं पहले दूध में पानी मिलाने की शिकायत पर गौर होता था लेकिन अब पानी में दूध मिलाना आम हो चुका है और उपभोक्ता मौन है, क्योंकि जायें तो जायें कहाॅं?

    फूड सिक्योरिटी एंड स्टेंडर्ड अथारिटी आफ इंडिया का अध्ययन बताता है कि 68 प्रतिशत दूध मिलावटी हैं इसमें 33 प्रतिशत वह दूध है जो कंपनियां ब्रांड के साथ पैकेट में बंद करके बेचती हैं। सवाल उठता है कि कानून और कानून के रखवाले होते हुए हम इस मिलावट खोरी को रोक क्या नहीं पा रहे हैं? दूध में डिटर्जेन्ट, काॅस्टिक सोडा, ग्लूकोज सफेद पेंट और रिफाइन्ड तेल की मिलावट पाई जाती है। यूरिया और ग्लूकोज मिलाकर बनाये गये दूध को भी जांच दलों ने पकड़ा है। 2013 में एक जनहित याचिका की सुप्रीम कोर्ट में सुनवायी हुई है। खंडपीठ ने कहा था कि दूध की मिलावट करने वालों को उम्र कैद दी जाना चाहिए। मानव स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वालों के विरूद्ध कड़े दंड के लिए राज्यों को कानून में संशोधन करना चाहिए। इसपर कुछ राज्यों उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा में अमल हुआ। उम्र कैद का संशोधन हुआ है, लेकिन अभी भी कुछ राज्यों में फुड सिक्यूरिटी एंड स्टेंडर्ड एक्ट में मिलावट पर अधिकतम 6 माह की सजा का प्रावधान है।
    उपभोक्ता के हित में बहुत कुछ किये जाने की जरूरत है। अनुचित व्यापार व्यवहार वाले झूठ विज्ञापनों की भरमार है। इसमें बड़े-बड़े किरदारों को ब्रांड ऐम्बेसेडर बनाकर भोलीभाली जनता को गुमराह किया जाता है। भारी रकम लेकर बड़े-बड़े फिल्मी सितारे, खिलाड़ी, प्रतिष्ठित व्यक्ति विज्ञापनों में अपनी साख और प्रतिष्ठा को बट्टा लगाने में नहीं शर्माते हैं। एक तेल के विज्ञापन पर जनहित याचिका में उत्पादक के साथ ब्रांड एम्बेसेडर को भी न्यायालय कड़ी चेतावनी दे चुका है, लेकिन चांदी की चमक में नैतिकता काफूर हो चुकी है।

    सबसे दुखद और त्रासद बात यह है कि इन मिलवट खोरों के कारण राष्ट्र क नाम कलुषित हो रहा है। भारत की गिनती दुनिया के सर्वाधिक मिलावटखोर कुपोषित देशों में होने लगी है। खेत से लेकर बाजार तक खाद्य पदार्थाें को लगातार प्रदूषित करने की होड लगी है। हम धर्म-अधर्म को लाभ के कारण भूल चुके हैं। खैरात में भी मिलावट करके कौन से पुण्य कमा रहे हैं इस बात से भी व्यापारी उत्पादक तनिक भी भयभीत नही हैं। हाल ही में भोपाल में अतिवृष्टि से बाढ़ में निचली बसाहटों के रहवासी सबकुछ लुटा बैठे। राज्य सरकार ने पीड़ित परिवारों को पचास-पचास किलों राशन देकर राहत की व्यवस्था की, नागरिक आपूर्ति निगम ने तुरत-फुरत वितरण के लिए भण्डार खोल दिया। लेकिन पीड़ित परिवारों चेहरों पर शिकुन तब आ गई जब उन्होंने पाया कि गेहूॅ में मिट्टी के बाजाय मिट्टी के ढेले थे। राजधानी का मामला ठहरा। उच्च स्तरीय जांच का आदेश दिया गया। जांच कमेटी बैठी, सक्रिय हुई इसके बाद पता नही ंचला कि क्या हुआ। मिलावट से निपटने में सरकार, उपभोक्ता मंत्री की भी जिम्मेदारी है, लेकिन कंपनियां, उत्पादक, विक्रेता भी अपनी जिम्मेेवारी से मुकर नहीं सकते हैं।

    मिलावट महीना और मौज
    लोकतंत्र प्रशासन का सर्वोत्तम तंत्र है, लेकिन इसकी उदारता को लाचारी में बदला जा रहा है, जिससे प्रशासन बिगडै़ल हो गया है। कानून जनहित के संरक्षण के लिए होता है लेकिन वह विफल हो रहा है। जिन्हें उपभोक्ता कवच बनने का दायित्व है वे पहले उनकी फिक्र करते हैं जो हरमाह ‘‘महिना’’ इनाम तोहफा भेंट करते हैं। अदालतें जब तब कई फैसले सुनाकर उपभौक्ता को राहत पहुंचाती है, लेकिन अदालती प्रक्रिया भी कठिन और व्यय साध्य है। जब तक इसे सरल नहीं बनाया जाता न्याय पालिका से भी उपभोक्ता हित संरक्षण की अपेक्षा दिवा स्वप्न ही है।

  • पशु भूखे हैं भोजन बचाओःविद्यासागर जी

    पशु भूखे हैं भोजन बचाओःविद्यासागर जी

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    अनाज बचाओ ताकि मूक पशुओं को भी साफ भोजन मिलेःआचार्य विद्यासागर जी

    भोपाल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। विख्यात संत आचार्य विद्यासागर जी महाराज ने कहा है कि देश में कृषि उत्पादों के संधारण की चाक चौबंद व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। आपात स्थितियों के लिए देश में इतना खाद्यान्न मौजूद होना चाहिए कि इंसान तो क्या जानवरों को भी साफ भोजन की कमी न हो। आचार्य श्री से भेंट करने पहुंचे कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन से उन्होंने कहा कि देश का विकास तेजी से हो रहा है पर कीटनाशक रहित साफ खाद्यान की कमी होती जा रही है। मूक पशुओं को पेट भरने के लिए कचरा खाने पर मजबूर होना पड़ रहा है। सरकार को बहुत सावधानी से व्यवस्था में सुधार की कमान संभालनी होगी।

    आचार्यश्री से भेंट के बाद चर्चा में कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन ने कहा कि खाद्यान्न के प्रसंस्करण और परिरक्षण के संदर्भ में ये बात सही है कि भंडारण की उचित व्यवस्था न होने के कारण हमारे खाद्यान्न का बहुत सारा हिस्सा बर्बाद हो जाता है। उन्होंने कहा कि हमने आचार्यश्री को आश्वस्त किया कि सरकार इस दिशा में काम कर रही है। सरकार इसके लिए नए भंडारगृह बनाने और भंडारण की तकनीक के प्रशिक्षण पर भी खासा जोर दे रही है।

    श्री बिसेन ने बताया कि आचार्य श्री ने कृषि मंत्री के नाते उनसे कहा कि हम लोग अपने भोजन को तो साफ सुथरा रखने का प्रयास करते हैं पर पशुओं को कचरा खाने के लिए भी दर दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं। उन्होंने कहा कि वे सड़कों पर आए दिन पशुओं को भोजन के अभाव में भटकता देखते हैं । ये स्थिति गौ पालन से सुधारी जा सकती है। आखिर क्यों हमारे पशुधन को भोजन के लिए भटकना पड़े। यदि हम केवल भोजन की बर्बादी रोक सकें तो पशुओं को बगैर किसी अतिरिक्त खर्च के पेट भरने लायक भोजन दिया जा सकता है।

    उन्होंने बताया कि आचार्यश्री ने उन्हें गौवंश के पालन और उनके स्वास्थ्य की देखभाल से होने वाले सामाजिक फायदों के बारे में जन चेतना जगाने की सलाह दी। आचार्य़श्री का कहना था कि गौवंश की देखभाल सुधारने का माहौल बनाकर बड़ी हद तक कुपोषण से निपटा जा सकता है। उन्होंने कहा कि पशुओं को पौष्टिक आहार मिलेगा तो समाज के लिए मिलने वाला पौष्टिक दूध बड़ी आबादी का कुपोषण स्वमेव दूर कर देगा। उन्होंने कहा कि आज भी बड़ी आबादी पौष्टिक भोजन से वंचित है। सरकार कृषि और पशुपालन की व्यवस्था सुधारने पर जोर देगी तो प्रदेश और देश की उत्पादकता बढ़ाने की दिशा में हम बहुत कम खर्च में ज्यादा उपलब्धियां हासिल कर सकेंगे।

    श्री बिसेन ने कहा कि आचार्य़श्री की भावनाओं पर गौर करते हुए हम जैविक खेती और खाद्य प्रसंस्करण के कार्यक्रमों को नई ऊर्जा से चलाने की तैयारी कर रहे हैं। सरकार का प्रयास रहेगा कि कृषि उत्पादों से किसान की माली हालत तो सुधरे ही साथ में उसकी मेहनत से उपजाया गया खाद्यान्न जरूरतमंदों के हाथों में पहुंचे। उन्होंने कहा कि आचार्यश्री ने उनसे कहा कि हम तो अपने मिलने जुलने वालों से हमेशा कहते हैं कि जूठन के रूप में खाद्यान्न की बर्बादी नहीं होनी चाहिए। यदि हम अपने बच्चों को पौष्टिक भोजन नहीं दिला पाएंगे तो हमारे देश की नई पीढ़ी वांछित सफलताएं कैसे अर्जित कर पाएगी। श्री बिसेन ने कहा कि मैं अपने भाषणों में आचार्यश्री के इस मार्गदर्शन का उल्लेख हमेशा करूंगा और लोगों से खाद्यान्न की बर्बादी रोकने की अपील करूंगा।

    कृषि मंत्री श्री बिसेन ने कहा कि हालिया ओलंपिक खेलों में भारत के खिलाड़ियों के प्रदर्शन को देखकर एक बार फिर पौष्टिक भोजन युवाओं तक पहुंचाने की ओर देश का ध्यान गया है। इसे देखते हुए सरकार ने जनता की जरूरत के मुताबिक खाद्यान्न पैदा करने का कैलेण्डर बनाया है। इसके अनुसार किसानों को उनके खेत की मिट्टी और मौसम के मुताबिक खाद्यान्न उत्पादन की सलाह दी जा रही है।

  • केंपा राशि से फिर लग सकेंगे जंगल

    केंपा राशि से फिर लग सकेंगे जंगल

    केंपा बिल पारित हो जाने से एक बार फिर जंगलों को नया जीवन देने का मार्ग सुलभ हो गया है।केन्द्रीय मंत्री अनिल दवे इसे क्रांतिकारी पहल बता रहे हैं।
    केंपा बिल पारित हो जाने से एक बार फिर जंगलों को नया जीवन देने का मार्ग सुलभ हो गया है।केन्द्रीय मंत्री अनिल दवे इसे क्रांतिकारी पहल बता रहे हैं।

    प्रतिपूरक वनीकरण निधि कानून की सामयिकता……
    भरतचन्द्र नायक…..
    वन संपत्ति प्रकृति का अनुपम उपहार है। वनों के क्षरण को लेकर लगातार चिंता व्यक्त की जाती रही है और विरोधाभास यह भी है कि इसके लिए वन प्र्रान्तर में रहने वाले उन आदिवासियों के सिर ठीकरा फोड़ा जाता रहा है, जो आदिकाल से वनों के न्यासी सिद्ध हुए है। संपत्ति की लालसा और प्रगति की चाह में हमनें आधारभूत मानवीय संस्कारों को तिलांजलि दे दी है। वन संपत्ति की अवधारणा को पूंजी में परिवर्तित कर लिया है। लेकिन आदिवासी, वनवासियों ने हमेशा निजी संपत्ति की उस धारणा को नकारा है जो सभ्य समाज कहे जाने वाले समुदाय का प्रिय शगल है। आदिकाल से वे जानते रहे है कि प्रकृति के शोषण की लालसा इंसान के लिए आपदा का आमंत्रण है। प्रकृति के साथ तादाम्य, मानवेत्तर प्राणियों के साथ सह अस्तित्व का जीवन जीना आदिवासी परंपरा का अटूट हिस्सा है। वैश्वीकरण ने निजी संपत्ति की धारणा को प्रबल किया, पूंजी का वर्चस्व बढ़ा। मानवीय, जीव-जगत, वन-संपदा के सरोकार तिरोहित हो गये, जिसनेे वन संपत्ति के दोहन के बजाय शोषण का मार्ग खोल दिया। वनों के अंधाधुंध शोषण से जहां प्राकृतिक संतुलन गड़बड़ा गया, वहीं वन्य प्राणी आश्रय की खोज में शहरों की आरे झांकने लगे, बाघ, मगर के बाद अजगर के कदम बसाहट की ओर बढ़ते देखे जा रहे है। वहीं आखेट करने वालों ने मौके का फायदा उठाकर वन्य प्राणियों का शिकार करना शौक और व्यवसाय बनाकर ‘कोढ़ में खाज’ पैदा कर दी।। देर आयत-दुरूस्त आयत, केन्द्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार ने प्रतिपूरक वनीकरण को प्राथमिकता दी। राज्यों से इससे सरोकार जोड़ने के लिए पूर्व में निधि गठित की गयी थी, लेकिन इस निधि के परिचालन के लिए संवैधानिक व्यवस्था न होने से राज्यों से प्राप्त क्षतिपूर्ति वनीकरण की 40 हजार करोड़ रू. की राशि फिक्सड़ डिपाॅजिट में जमा रही। ब्याज तो बढ़ता गया लेकिन राज्य इस निधि से अंशदान के लिए तरसते रहे। मोटे तौर पर तय किया गया था कि एक हेक्टेयर वन भूमि के गैर-वन के लिए उपयोग होने पर दो हेक्टेर में क्षतिपूर्ति वनीकरण किया जाये, जो सिर्फ औपचारिक तौर पर कागजों पर होता रहा।

    संसद के पावस सत्र की यह एक उपलब्धि कही जायेगी कि संसद ने दो ऐसे बिल सर्वोच्च प्राथमिकता से पारित कर दिये जिससे एक ओर आर्थिक क्रांति की आशा की जा सकती है। पहला वस्तु एवं सेवा कर विधेयक है एवं दूसरा प्रतिपूरक वनीकरण निधि विधेयक है, जो वनों के बारें में परंपरागत सोच के स्थान पर वैज्ञानिक आधार पर वनीकरण को देशव्यापी बनानें और वन्य जीवों को सहेजने, संवारनें में मील का पत्थर सिद्ध होगा। वनवासियों के जीवन स्तर में सुधार होगा। केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अनिल माधव दवे ने आशा व्यक्त की है कि इससे देश को जलवायु परिवर्तन की तपिश से मुक्ति मिलने में सहायता मिलेगी। जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने में भारत वैसे भी प्रयासवान अग्रणी मुल्क है, इस विधेयक के अमल में आने सेे ‘सोने में सुहागा’ होगा।
    प्रतिपूरक वनीकरण निधि विधेयक का सरोकार वन से संबद्ध सभी पक्षों की बेहतरी से होगा। वनों पर आश्रित समुदाय की आजीविका, वनों, चरागाहों, दलदली क्षेत्र समेत प्राकृतिक पारितंत्र के संरक्षण, सुरक्षा, पुर्नवास पर सुविचारित प्रणाली के तहत उपयोग में लायी जायेगी। यह भी एक वास्तविकता है कि दुनिया में वन आश्रित अर्थव्यवस्था भारत की पुरातन परंपरा है, बड़ी संख्या में आबादी वनों पर निर्भर है। वनों की उपयोगिता औद्योगिक प्रयोजन के अलावा, कार्बन को सोखने, बाढ़ की विभीषिका को रोकने, मिट्टी को सरंक्षित रखने, मिट्टी की गुणवत्ता बढ़ाने के अलावा जलवायु के अनुकूलन के लिए भी है। हम वन को वृक्षों का समूह मानकर रह जाते है। लेकिन वन जीवित परितंत्र है जो जैव विविधता को आश्रय देते है और परिस्थितीय प्रतिकूल विकृति पर लगाम लगाता है। प्रतिपूरक वनीकरण निधि (सीएपी) विधेयक केंपा सभी सरोकारों को एक सूत्र में पिरोता है। इससे यह भी कहा जा सकता है कि इससे पंचायती राज व्यवस्था की भावना समृद्ध होगी। पंचायत की भूमिका और वर्चस्व पर आंच नहीं आयेगी। संसद में इस आशय की प्रतिबद्धता अनिल माधव दवे व्यक्त कर भी चुके है।

    ‘‘केंपा का दिलचस्प सफर’’

    प्रतिपूरक वनीकरण निधि विधेयक और इसके परिचालन के लिए अनिवार्य प्रतिपूरक वनीकरण निधि प्राधिकरण केंपा के लिए पूर्व में सारे काम तदर्थवादी भावना से मनमाने ढंग से चल रहे थे। राज्यों में वनभूमि ली जाती, क्षतिपूर्ति राशि एक हेक्टेयर के बदले में दो हेक्टेयर वन विस्तार की योजना बनती, कागजी जमा खर्च होता रहता था। अस्सी के दशक में वनों के सिकुड़ने का अहसास होने पर वन पर्यावरण क्षेत्र में केन्द्र का वर्चस्व होने के लिए व्यवस्था की गयी। राज्यों की परियोजना बिजली घर, बांध, सड़क, बिजली लाईन ले जाने, कारखाना, खनिज उत्खनन, स्कूल जैसे सार्वजनिक कार्यों के लिए भूमि की आवश्यकता पर निर्णय लेने का अधिकार केन्द्र से निहित हो गया। 2008 में केन्द्र सरकार ने प्रतिपूरक वनीकरण निधि विधेयक तैयार किया। विधेयक लोकसभा में पारित हो गया, लेकिन राज्यसभा में बहस के लिए प्रस्तुत नहीं हो सका। इसी दरम्यिान लोकसभा विघठित हो गई। परिणाम स्वरूप विधेयक लेप्स हो गया। प्रतिपूरक निधि झमेले में पड़ गयी। तब लेखा महानिरीक्षक ने प्रतिपूरक निधि को शासकीय लेखा से परे जमा करने का सुझाव दिया। सर्वोच्च न्यायालय से तदर्थ केंपा के बारें में मार्गदर्शन लेने की आवश्यकता महसूस की गयी, जिससे प्रतिपूरक वनीकरण राशि लोक लेखा का अंश बन सके। इसी परिप्रेक्ष्य में 2014 मंे वन पर्यावरण मंत्रालय ने केंपा की स्थायी रूप से शुरूआत की। केन्द्र और राज्यों में निधि संचालन के लिए प्रथक-प्रथक प्राधिकार स्थापित करने का खाका तैयार कर अंतिम निर्णय के लिए सर्वोच्च न्यायालय को सौंप दिया। अभी तक सर्वोच्च न्यायालय से इस संबंध में सहमति अपेक्षित है। वनों की क्षतिपूर्ति और प्रतिपूर्ति वनीकरण निधि के उपयोग की त्वरा को देखते हुए केन्द्र सरकार ने लोकसभा में प्रतिपूरक वनीकरण निधि विधेयक-2015 लोकसभा में प्रस्तुत कर दिया। 13 मई 2015 को लोकसभा ने विधेयक विज्ञान-टेक्नोलाॅजी संसदीय स्थायी समिति के विचारार्थ भेज दिया। समिति की राज्यों, केन्द्र शासित प्रदेशों और इससे संबद्ध व्यक्तियों, संस्थाओं के साथ बैठकों का लंबा दौर चला। 26 अनुशंसाएं की गयी, जिनमें से 20 अनुशंसाएं मंजूर कर ली गयी। विधेयक में 49 संशोधन कर दिये गये। लोकसभा ने मई 2016 में विधेयक पारित कर दिया। 28 जुलाई 2016 को राज्यसभा ने भी विधेयक पर अपनी मोहर लगाते हुए तदर्थवाद से मुक्ति दिला दी। केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री अनिल माधव दवे ने राज्यसभा को विश्वास दिलाया है कि एक वर्ष बाद जनता की आपत्ति पर पुनः विचार किया जायेगा और नियमों का जन सुविधा की दृष्टि से पुनार्वलोकन किया जायेगा।

    केंपा बिल के पारित हो जाने के साथ जमा राशि 40 हजार करोड़ रू. और ब्याज की राशि करीब 2000 करोड़ रू. देश के प्रदेशों में प्रतिपूर्ति वनीकरण के लिए निर्धारित प्रक्रिया के अंतर्गत उपयोग किये जायेंगे। इससे प्रत्यक्ष रोजगार की दृष्टि से 15 करोड़ मानव दिवस का रोजगार सृजन होगा। दुनिया के वन क्षेत्र का 40 प्रतिशत वन क्षेत्र भारत के बिगड़े वन के रूप में मौजूद है। इसे हरि परिधानाच्छादित करने का बीड़ा उठाया जाना है। इससे वनवासी, पिछड़ी जाति बहुल वसाहटों मंे जहां रोजगार के अवसर बढ़ेंगे वहीं वन-पर्यावरण के प्रति जन-जागरूकता का ज्वार उठेगा। इमारती लकड़ी, काष्ठ, पशुचारा की उन्नत किस्में वनोपज के साथ विपुल क्रांति लायेगी जिससे इन क्षेत्रों में निवासियों के जीवन स्तर में सुधार होगा। केंपा विधेयक के कानून के रूप में अमल में आते ही केन्द्र और राज्य स्तर पर स्थायी संस्थागत सरंचना तैयार होगी जो इस निधि के विधि और तर्क संगत उपयोग पर नजर रखेगी। यह निधि ऐसे खाते में जमा होगी जो लेप्स नहीं होगा, किन्तु ब्याज की निरंतरता बनी रहेगी। संसद और विधानसभा निगरानी के लिए सक्षम होगी। एक मानीटरिंग समूह भी गठित किया जायेगा। प्रतिपूरक वनीकरण निधि जो 40 हजार करोड़ प्लस 2000 करोड़ रू. ब्याज है में से 90 प्रतिशत राज्यों को और 10 प्रतिशत केन्द्र के हिस्से में आयेगी। इस दरम्यिान राज्यों में वनभूमि गैर-वन के उपयोग में ली जायेगी, उससे क्षतिपूर्ति राशि की उगाही गयी राशि राज्यवार लोक निधि मद में जमा की जायेगी। वन सरंक्षण कानून-1980 में वनभूमि गैर-वन के प्रयोजन के लिए दिये जाने की अनुमति के साथ यह शर्त रखी है कि इस क्षतिपूर्ति राशि के प्राप्त होने पर उसका उपयोग क्षतिपूर्ति वनीकरण, जलग्रहण क्षेत्र के उपचार, वन्य-जीव प्रबंधन और वन भूमि के प्रत्यावर्तन से उत्पन्न समस्याओं के समाधान पर किया जायेगा। अब इस दिशा में नियमों का कड़ाई से पालन होगा।

    केन्द्र सरकार ने पर्यावरण सरंक्षण कानून-1985 के तहत प्रतिपूरक वनीकरण निधि प्रबंधन और नियोजन प्राधिकरण केंपा का गठन किया था, लेकिन व्यवस्था प्रभावशील नहीं हो सकी थी। नये परिप्रेक्ष्य में केंपा व्यवस्था को संवैधानिक स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है और विश्व में जलवायु परिवर्तन के दौर की चुनौती से निपटने के जो उपाय विश्वव्यापी चल रहे है, उसमें भारत की अग्रणी भूमि तय करनें में यह व्यवस्था निश्चित रूप से सार्थक सिद्ध होगी।

  • रिलायंस पर ढाई हजार करोड़ का जुर्माना

    रिलायंस पर ढाई हजार करोड़ का जुर्माना

    जनता को झांसा देने वाली रिलायंस इंडस्ट्री पर ढाई हजार करोड़ का अतिरिक्त जुर्माना लगाया गया है।
    जनता को झांसा देने वाली रिलायंस इंडस्ट्री पर ढाई हजार करोड़ का अतिरिक्त जुर्माना लगाया गया है।

    एजेंसी नई दिल्ली 18 अगस्त।
    सरकार ने रिलायंस इंडस्ट्रीज और उसके भागीदारों पर कंपनी के पूर्वी अपतटीय क्षेत्र केजी-डी6 से लक्ष्य से कम गैस उत्पादन होने पर 38 करोड़ डॉलर (करीब 2,500 करोड़ रुपये) का अतिरिक्त जुर्माना लगाया है। इसके साथ ही इस परियोजना क्षेत्र को विकसित करने पर कंपनी के कुल 2.76 अरब डॉलर का दावा नामंजूर किया जा चुका है। इसका अर्थ है कि कंपनी इस परियोजना के तेल-गैस की बिक्री में से अब इतनी राशि की वसूली नहीं कर सकती है। कंपनी अप्रैल 2010 से लगातार पांच वित्तीय वर्षों में उत्पादन लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाई है।

    केजी-डी6 क्षेत्र के आवंटन के समय किए गए उत्पादन भागीदारी अनुबंध (पीएससी) में यह व्यवस्था है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड और उसकी भागीदारी कंपनियां ब्रिटेन की बीपी पीएलसी और कनाडा की नीको रिसोर्सिज तेल-गैस की खोज पर आए पूंजी और परिचालन खर्च को गैस की बिक्री से प्राप्त राशि से पूरा कर सकते हैं। उसके बाद ही वह मुनाफे को सरकार के साथ बांटेंगे। कंपनी के खर्च के उपरोक्त दावे नामंजूर होने से खनिज तेल-गैस मुनाफे में सरकार की हिस्सेदारी बढ़ेगी। वित्त वर्ष 2013-14 तक क्षेत्र में 2.376 अरब डॉलर की लागत को नामंजूर किया गया था जिसके परिणामस्वरूप सरकार की क्षेत्र के पेट्रोलियम मुनाफे में भागीदारी 19.53 करोड़ डॉलर बढ़ गई। रिलायंस के केजी-डी6 के धीरूभाई एक और तीन से गैस का उत्पादन आठ करोड़ घनमीटर प्रतिदिन होना चाहिए था लेकिन 2011-12 में यह 3.35 करोड़ घनमीटर प्रतिदिन, 2012-13 में 2.09 करोड़ घनमीटर, 2013-14 में 97 लाख घनमीटर और उसके बाद 80 लाख घनमीटर प्रतिदिन के स्तर पर रहा।


  • खेती चली मुनाफे की ओर

    खेती चली मुनाफे की ओर

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    भोपाल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। भारतीय खेती को बढ़ावा देने की दिशा में केन्द्र सरकार के सुधारों के साथ कदमताल करते हुए मध्यप्रदेश सरकार ने भी बटाई पर खेती देना आसान बनाने की तैयारी कर ली है। बीजेपी की अगुवाई वाली केंद्रीय सरकार ने खेती की ज़मीन को लीज़ पर देने और लेने वाले लोगों का जीवन आसान करने के लिए एक नया अध्यादेश बनाया है। मध्यप्रदेश में इसके लागू होने के बाद देश में खेती की ज़मीन बटाईदारी पर या लीज़ पर देना कानूनन अपराध नहीं बचेगा। दावा है कि नए नियमों से ग्रामीण भारत में गरीबी मिटाने, उत्पादकता बढ़ाने व विकास दर को तेज़ करने में मदद मिलेगी।

    केंद्र सरकार की थिंक टैंक संस्था नीति आयोग ने कुछ समय पहले एक कमेटी गठित की थी, जिसका उद्देश्य खेतिहर भूमि को लीज़ पर देने से जुड़ी समस्याओं को समझने और सुलझाने के सुझाव देना था। कमेटी ने विभिन्न राज्यों की स्थितियों को ध्यान में रखते हुए ‘खेतिहर भूमि लीजिंग एक्ट 2016’ तैयार कर हाल ही में सरकार को सौंपा है। राज्यों द्वारा इस एक्ट को अपनाए जाते ही पुराने सारे नियम समाप्त हो जाएंगे।इसी पर अमल करते हुए मध्यप्रदेश सरकार ने भी ये फैसला लिया है कि वो खेती को मुनाफे का धंधा बनाने की दिशा में सभी बदलाव स्वीकार करेगी।

    जानकारों का कहना है कि नया एक्ट ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बहुत ज़रूरी है क्योंकि इससे गांव का एक खेती जानने वाला किसान ज़मीन के आभाव में मजदूरी नहीं करेगा। अब बिना डर के जब भूस्वामी उसे अपना खेत लीज़ पर देगा तो वो खेती कर सकेगा।कृषि अर्थशास्त्री टी. हक़ की अध्यक्षता वाली कमेटी ने ही नीति आयोग के तहत ये नया एक्ट तैयार किया है।

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में 14 करोड़ किसान हैं। पुराने नियमों के हिसाब से बटाईदारों की गिनती किसानों में नहीं होती थी जिसके कारण उन्हें सरकारी योजनाओं से लेकर खेती की सामग्रियों पर मिलने वाली आर्थिक मदद भी नहीं मिल पाती थी। वे फसलों का मुआवजा भी नहीं ले पाते थे।

    डॉ हक ने बताया कि ज़मीन बटाई पर देने वाला और बटाईदार के बीच कोई लिखित समझौता नहीं होता था। ऐसे में बटाईदार फसल बीमा नहीं करवा पाते थे, न ही किसी आपदा में फसल गंवाने पर सरकारी राहत के हकदार होते थे। अब नए एक्ट के लागू होते ही बटाईदार किसान भी इन सभी योजनाओं व सहायताओं में अपना हक पा सकेंगे, भूस्वामी उनका हक नहीं छीन पाएगा।

    नए नियम के बाद अब कोई भू-मालिक भी दोतरफा कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर करके एक नियत समय के लिए बिना किसी डर अपनी ज़मीन बटाईदार या खेती के लिए लीज़ पर दे सकेगा। देश में बहुत सी खेती की ज़मीन का सही इस्तेमाल केवल इसलिए नहीं हो पाता है क्योंकि ज़मीन मालिक गाँव में नहीं रहता या खेती छोड़ चुका है। लेकिन वह किसी अन्य किसान को अपनी खेती बटाई या ठेके पर भी सिर्फ इस डर से नहीं देता था कि कहीं उसकी ज़मीन न चली जाए।

    नियमत: यदि कोई बटाईदार एक नियत समय से ज्यादा किसी खेत पर बटाई पर खेती करता रहा है तो वह उस खेत को अपने नाम कराने का हकदार है।

    डॉ हक के अनुसार, “भूस्वामियों को बढ़ावा मिलेगा कि वो अपनी ज़मीन गंवाने का डर पाले बिना उसे लीज़ पर देकर मिलने वाले धन को खेती के बाहर किसी इकाई में लगाएं। इससे देश में व्यावसायिक विविधता आएगी, जो ग्रामीण विकास के लिए महत्वपूर्ण है।”

    कमेटी ने यह पाया था कि देश में खेतिहर भूमि का पूरा प्रयोग इसलिए भी नहीं हो पा रहा क्योंकि अलग-अलग राज्यों में खेती की ज़मीन को लीज़ पर देने को लेकर अलग-अलग नियम हैं। ज्यादातर खेतिहर भूमि की लीज़ को बढ़ावा नहीं देते जो कि देश की खाद्य उत्पादकता और कृषि विकास के लिए एक समस्या है।

    देश के उत्तर प्रदेश, बिहार, तेलंगाना, कर्नाटक, और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में खेत लीज़ पर देना प्रतिबंधित रहा है, केवल विधवा, अवयस्क, शारीरिक अक्षमता वाले व सैनिक किसानों को छूट दी गई है। केरल में भी बटाईदारी प्रतिबंधित रही है, लेकिन हाल ही में सरकार ने स्वयं सहायता समूहों को कुछ छूट दी है।

    इसी तरह पंजाब, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र और असम जैसे राज्यों में ज़मीन लीज़ पर देना तो गैरकानूनी नहीं है लेकिन बटाईदारों को यह अधिकार है कि निर्धारित समय तक बटाई पर खेती करने के बाद वे भूस्वामी से ज़मीन खरीदने के हकदार हो जाते हैं।

    केवल आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान, और पश्चिम बंगाल में ही बटाईदारी के सरल कानून हैं।

    खेती की ज़मीन गैर-कृषि कार्यों के लिए भी लीज़ पर देना बने आसान

    नए अध्यादेश का प्रारूप तैयार करने वाले नीति आयोग के वाइस चेयरमेन अरविंद पनगढ़िया ने एक्ट का ज़िक्र करते हुए अपने आधिकारिक ब्लॉग पर लिखा, “मेरा मानना है कि इस एक्ट में खेती की ज़मीन को खेती के उपयोगों में ही लीज़ पर दिए जाने के नियम को और विस्तार दिया जाना चाहिए, ताकि खेती की ज़मीन को उद्योगों या गैर-कृषि कार्यों के लिए भी लीज़ पर देना आसान हो सके”।

    जानकारों की राय

    नया एक्ट ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बहुत ज़रूरी है क्योंकि इससे गांव का एक खेती जानने वाला किसान ज़मीन के आभाव में मजदूरी नहीं करेगा। अब बिना डर के जब भूस्वामि उसे खेत लीज़ पर देगा तो वो खेती करेगा और गौरव के साथ जिंदगी काटेगा।

    – डॉ टी. हक, अध्यक्ष, खेतिहर भूमि लीज़िंग एक्ट कमेटी, नीति आयोग

    यह सही दिशा में उठाया गया कदम है। बटाईदार किसानों की हालत बुरी है देश में, इससे सुधार में मदद मिलेगी। इतना ही नहीं अनाज उत्पादन भी सुधरेगा क्योंकि जो छोटा किसान खेती बढ़ाना चाहता है वो अब असानी से लीज़ पर खेत लेगा।

    – राकेश टिकैत, राष्ट्रीय प्रवक्ता, भारतीय किसान यूनियन

    यह सही दिशा में उठाया गया कदम है उम्मीद है कि आगे चलकर यह कॉर्पोरेट सेक्टर के खेती में उतरने का रास्ता बन सकता है। नए एक्ट में अभी तो छोटे किसान द्वारा बड़े किसान को ज़मीन लीज़ पर देने का प्रावधान नहीं है पर आगे एक्ट में यह परिवर्तन होते ही, कॉर्पोरेट सेक्टर छोटे किसानों की ज़मीन लीज़ पर ले लेंगे। इससे इकोनोमी में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

  • बढ़े वेतन का असर बाजार पर भी: राकेश सिंह

    बढ़े वेतन का असर बाजार पर भी: राकेश सिंह

    rakesh singh sansad
    भोपाल(पीआईसी). भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष, महाराष्ट्र के सह प्रभारी व सांसद श्री राकेश सिंह ने कहा कि केन्द्र सरकार ने सातवें वेतन आयोग की अनुशंसा को अक्षरशः अमल में लाकर सिर्फ कर्मचारियों का वेतन ही तय नहीं किया जटिलता वाले भत्तों का भी युक्तियुक्तकरण किया है। वेतन भत्तों में वृद्धि के साथ समानता एकरूपता लाने का पुरजोर प्रयास किया गया है। कर्मचारियों को दायित्व के प्रति सचेत किया गया है। इससे कर्मचारी वर्ग अपने दायित्व के प्रति प्रोत्साहित होगा। सातवें वेतन आयोग के अमल से देश की अर्थव्यवस्था उर्जित होगी।
    उन्होंने कहा कि सामान्य तौर पर वेतनवृद्धि के बाद मंहगाई बढने की आशंका व्यक्त की जाती है, लेकिन इस बार यह वेतन वृद्धि अर्थव्यवस्था को उर्जित करने में सहायक होगी। पहले तो मानसून की माफिक बारिश से किसानों के चेहरे पर मुस्कान है। खेती बाडी में बरकत हुई है। खरीफ का रकबा बढा है। अच्छे उत्पादन की उम्मीदें बढी है। इससे महंगाई बढने की उम्मीदे नगण्य है। दूसरी बात यह है कि देश में दो वर्षो में हर क्षेत्र में उत्पादन बढा है और इस दौरान मांग कमजोर रही है, लेकिन सातवां वेतन आयोग जब बाजार पर असर डालेगा औद्योगिक क्षेत्र में अनुकूल प्रतिक्रिया बढती हुई मांग के रूप में परिलक्षित होगी। ड्यूरेबिल कन्यूमर गुडस, रीयल स्टेट का उठाव शुरू होगा। खेती में बरकत होगी। कर्मचारी वर्ग बचत योजनाओं की ओर भी आकर्षित होंगे।
    श्री राकेश सिंह ने कहा कि सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के अमल से राज्यों पर भी बोझ बढेगा, लेकिन यह समझना आवश्यक है कि केन्द्र सरकार असल में राज्य सरकारों के प्रदर्शन का ही परिणाम होती है। वित्त आयोग केन्द्र राज्यों में संसाधनों के वितरण में समुचित व्यवस्था करता है। पिछले बजट की तुलना में राज्यों के आर्थिक स्त्रोत बढे है। प्रदेश को अब 32 के बजाए 42 प्रतिशत अंशदान मिलने जा रहा है।