Category: अर्थ संसार

  • फसलों का रिकार्ड रखो तो ज्यादा मिलेगा बीमा दावा

    पाँच वर्ष की औसत उत्पादकता और वास्तविक फसल उत्पादकता के अंतर पर बनता है बीमा दावा

    भोपाल 20 सितंबर(सुरेश गुप्ता)।

    प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत देश में सर्वाधिक 42 हजार किसानों को मध्यप्रदेश में बीमित किया गया है। इस योजना के अंतर्गत खरीफ 2016 के बीमित दावों का भुगतान किया गया है। खरीफ 2016 में सीहोर जिले के 43 हजार 850 कृषकों को 55 करोड़ 50 लाख की दावा राशि स्वीकृत हुई है। देखा जाय तो जिले के एक किसान के मान से 12 हजार 657 रुपये बीमा दावे का औसत आता है। लेकिन पटवारी हल्का अनुसार क्षतिस्तर भिन्न-भिन्न होने से कहीं अधिक और कहीं कम बीमा राशि का भुगतान हुआ।

    प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना पिछले 5 वर्षों की औसत उत्पादकता (जो फसल कटाई प्रयोग से निकाली जाती है) में वास्तविक फसल उत्पादकता के अंतर पर बीमा दावा बनाया जाता है।

    उदाहरण के लिये सीहोर जिले की रेहटी तहसील के पटवारी हल्का 44 में वास्तविक उपज तथा थ्रेश होल्ड उपज में फसल कटाई प्रयोगों में कमी मात्र 2 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर रही। इस वजह से बीमा दावा राशि अत्यन्त कम रही। दूसरी ओर जिन पटवारी हल्के में फसल कटाई प्रयोगों में थ्रेश होल्ड तथा वास्तविक फसल कटाई में अधिक अंतर रहा, वहाँ ज्यादा फसल बीमा राशि बनी।

    उदाहरण के लिये इसी तहसील के पटवारी हल्का 42 में थ्रेश होल्ड उपज से वास्तविक उपज में अंतर फसल कटाई प्रयोगों में 319 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर रहा। इस कारण से इस पटवारी हल्के के ग्रामों में किसानों को फसल बीमा राशि अधिक मिली।

    सीहोर जिले में कृषकों को सोयाबीन फसल में अधिक नुकसान होने से अधिक राशि प्राप्त हुई है जैसे – कृषक श्री दशरथ सिंह पटवारी हल्का नं. 41 ग्राम अवंतिपुरा को बीमा दावा राशि 1,81,345 रुपये प्राप्त हुए हैं। इसी प्रकार कृषक श्री मनोहर सिंह पटवारी हल्का नं. 42 ग्राम महोड़िया को राशि 1,21,949 रुपये, कृषक श्री अशोक कुमार गुप्ता पटवारी हल्का नं. 42 ग्राम महोडिया को 1,40,752 रुपये, कृषक सिद्धनाथ सिंह पटवारी हल्का नं. 47 ग्राम संग्रामपुर को 97 हजार 480 रुपये, कृषक श्री भरतसिंह गेहलोत पटवारी हल्का नं. 52 ग्राम संग्रामपुर को 94 हजार 697 रुपये, कृषक श्री शेरसिंह पटवारी हल्का नं. 35 ग्राम तकीपुर को 85 हजार 732 रुपये, कृषक श्री पर्वतसिंह पटवारी हल्का नं. 64 ग्राम धबोटी को 76 हजार 636 रुपये, कृषक श्री नरसिंह पटवारी हल्का नं. 68 ग्राम बड़नगर को 84 हजार 882 रुपये और कृषक श्री हरिचरण पटवारी हल्का नं. 07 ग्राम सेमरादांगी को 66 हजार 539 रुपये प्राप्त हुए हैं।

    इस प्रकार यह स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के प्रावधानों के अनुसार पिछले 5 सालों में फसल कटाई प्रयोगों के मान से वास्तविक उपज के अंतर के अनुसार बीमा राशि का भुगतान होता है। कटाई अंतर कम होने पर बीमा राशि कम प्राप्त होती है और वास्तविक उपज का अंतर ज्यादा होता है तो दावा राशि ज्यादा प्राप्त होती है। यह भी कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना क्षेत्र आधारित है। किसानवार योजना नहीं है।

    किसान इस माह के अन्त तक फसल का बीमा करवायें

    भोपाल, 23 सितम्बर(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।

    प्राकृतिक आपदा से किसानों को होने वाले नुकसान की भरपाई के लिये केन्द्र सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना प्रारम्भ की है। इसमें किसानों को कम प्रीमियम देना पड़ता है। बीमा कंपनियों को रबी फसलों के प्रीमियम रेट का सिर्फ डेढ़ फीसदी एवं खरीफ फसल का 02 प्रतिशत किसान देंगे। बागवानी फसलों के मामले में किसानों को 05 प्रतिशत प्रीमियम देना होगा। बाकी प्रीमियम केन्द्र और राज्य की सरकारें देंगी। यह योजना 2016 से लागू की गई है। जिले के कृषकों से जिला प्रशासन द्वारा अपील की गई है कि अऋणी कृषक 30 सितम्बर तक निकट के बैंक से सम्पर्क कर अथवा जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक से सम्पर्क कर अपनी रबी फसल का बीमा करवा सकते हैं।

    ऋणी किसान हेतु स्वीकृत ऋण राशि एवं अऋणी किसान के प्रस्ताव बैंक में जमा कराने की तिथि 15 सितम्बर 2017 से 15 जनवरी 2018 निर्धारित है। बैंकों से बीमा कंपनी को घोषणा-पत्र भेजने की अन्तिम तिथि 28 फरवरी 2018 है। किसानों के खातों से काटे गये प्रीमियम को बीमा कंपनी को जमा करने की अन्तिम तिथि ऋणी कृषकों के लिये 15 फरवरी 2018 एवं अऋणी कृषकों के लिये 22 जनवरी 2018 है। बीमा योजना के तहत पैदावार के आंकड़े निर्धारित करने की अन्तिम तिथि 30 जून 2018 निर्धारित की गई है।

    प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अन्तर्गत सभी प्रकार की फसलों रबी, खरीफ, वाणिज्यिक और बागवानी को शामिल किया गया है। उपज नुकसान के आधार पर इस योजना में बिजली गिरने, तूफान, ओला पड़ने, चक्रवात, अंधड़, बवंडर, बाढ़, जलभराव, जमीन धंसने, सूखा, खराब मौसम, कीट एवं फसल को होने वाली बीमारियां आदि जोखिम से फसल को होने वाले नुकसान को शामिल कर एक ऐसा बीमा कवर दिया जाता है, जिसमें इनसे होने वाले सारे नुकसान से सुरक्षा प्रदान की जाती है।

  • नरेन्द्र मोदी के साथ महाशक्ति की राह पर भारत

    नरेन्द्र मोदी के साथ महाशक्ति की राह पर भारत


    - भरतचन्द्र नायक
    वीरता और पराक्रम में सदैव से भारत अजेय रहा है। उसकी समृद्धि ने सभी को ललचाया और बाह्य आक्रमण का दंश झेला, लेकिन समय की रफ्तार के साथ कदम से कदम मिलाने में जो चूक हुई उसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा। जब आक्रमण का प्रचलन हो चुका था और दुश्मन ने तोप बंदूक से लेस होकर आक्रमण किया हम अपना शौर्य भाला तलवार लेकर दिखा रहे थे। आजादी के बाद विकास की ओर ध्यान गया। कदम संभले पं. नेहरू ने बांध जलाशयों, कारखानों को तीर्थधाम बनाया। इंदिरा जी ने परमाणु शक्ति संपन्नता की ओर ध्यान दिया। राजीव गांधी ने देश में कंप्यूटरीकरण का मार्ग प्रशस्त करने का श्रेय दिया गया। अटलजी ने प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना से गांवों तक विकास की रोशनी पहुंचाई। मोदी जी ने देश को बुलेट पर सवार कर दिया। लोकतंत्र में सत्ता पक्ष की नीतियों कार्यक्रमों का विरोध अनिवार्य है और ऐसा हुआ, लेकिन 2014 में जब सोलहवीं लोकसभा के चुनाव की रणपेटी बजी और गुजरात के सफल मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी के चुनाव प्रचार की कमान संभाली उनकी प्रखर आलोचना उनके लिए स्वीकार्यता विस्तार में सहायक सिद्ध हुई। मोदी ने पूर्ववर्ती सरकार के भ्रष्टाचार से मुक्ति, महंगाई पर लगाम, सुरक्षा परिदृश्य में सुखद बदलाव का भरोसे और अच्छे दिन आने का सपने को देश की जनता ने मोदी जी के नेतृत्व में उनकी कटु आलोचना के बावजूद भारतीय जनता पार्टी के नाम प्रचंड बहुमत के साथ जनादेश दे दिया। मजे की बात यह रही कि जब नरेंद्र मेादी को जनता एक दूर दृष्ठा, कल्पनाशील और कुशल प्रशासक के रूप में देख रही थी। राजनैतिक दल उन्हें मौत का सौदागर बता रहा था। जनता महसूस कर चुकी थी कि विरोध राजनैतिक है। वास्तविकता यह थी कि गुजरात ने मोदी के नेतृत्व में नई करवट ली थी। गुजरात विकास के हर मापदंड पर कसे जाने के बाद देश में अब्बल, प्रगतिशील अमन चैन के मामले अब्बल राज्य था, जो राजनैतिक दल मोदी पर असहिष्णुता का इल्जाम लगा रहे थे उनके द्वारा शासित राज्यों से गुजरात के अल्पसंख्यक तरक्की की ऊंची सीढ़ियां चढ़ चुके थे। जनता देख चुकी थी कि नरेंद्र मोदी समस्या नहीं समाधान पुरूष है।

    प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी अपने कार्यकाल के तीन वर्ष पूर्ण कर चुके हैं और उन्होंने मंत्रालयवार अपना रिपोर्ट कार्ड जनता को सौंप दिया है। कुछ स्थानेां को अपवाद स्वरूप छोड़कर जहाॅ विधानसभा चुनाव अथवा लोकसभा उपचुनाव हुए जनता ने तमाम मुसीबतें सहते हुए मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी और भाजपानीत एनडीए कोसमर्थन देकर विजय रथ आगे बढ़ाया है। नरेंद्र मोदी सरकार ने कड़े, कष्टप्रद फैसले लेने में कभी गुरेज नहीं किया जिनका पुरजोर विरोध भी हुआ लेकिन देश की अपढ़ कही जाने वाली जनता ने मुसीबते झेलते हुए माना कि मोदी की दिशा और दशा सही है। नीयत में खोट नहीं है। विपक्ष के सामने सबसे बड़ी हैरानी परेशानी की बात यह रही कि वह बीते तीन वर्षों में एनडीए सरकार पर गड़बड़, घोटाला, भ्रष्टाचार का एक भी इल्जाम नहीं लगा पाई। जब 8 नवम्बर 2016 को एकाएक नोटबंदी का ऐलान हुआ गैरभाजपा दल हक्के-बक्के रह गये। उनका सीधा सपाट आरोप था कि बिना जनता को भरोसे में लिए इतना बड़ा फैसला क्यों ले लिया कि करेंसी कम पड़ गई। बैंकों से खाताधारियों को अपनी रकम निकालने पर पाबंदी लग गई। बैंकों के सामने बंद करेंसी बदलने के लिये गरीबों, अमीरों की लाइने लग गई। नोटंबंदी को कालेधन और उसके सृजन पर प्रहार बताया गया रोजी-रोटी छोड़ कर मजदूर भी बैंक के दरवाजे पर वहीं खड़ा था जहां धन्ना सेठ वारी का इन्तजार कर रहे थे। विपक्ष को मुंहमांगा मुद्दा मिल गया। लेकिन आम आदमी ने माना कि इससे कालेधन की समानान्तर चलने वाली व्यवस्था ध्वस्त हो गई जनता ने विरोध के स्वरों को अनसुना ही नहीं किया उत्तरप्रदेश जेसे राज्य में भारतीय जनता पार्टी को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विजय से नवाजा और नोटबंदी के प्रबल विरोधियों को हाशिये पर धकेल दिया। नीति नीयत ने मोदी का हर बार साथ दिया। आलोचना मोदी को संजीवनी साबित हुई। नोटबंदी के पश्चात् उपलब्धि की जो गुलाबी तसवीर रिजर्व बैंक ने सार्वजनिक की है वह साबित करती है कि आजदी के पश्चात् देश के आर्थिक क्षेत्र में नोटबंदी सबसे बड़ा कं्रातिकारी सुधार है जिसने धनपतियों की तसवीर बैंक के राडार पर ला दी है। अब न तो बेनामी सौंदे हो पा रहे हैं और न कालाधन खपाने की गली शेष बची है। बैंकों में नकदी का अंबार लगा है। कर्ज वितरण आसान हुआ है। टेक्स का वेस बड़ा है और सरकार के खजाने में आने वाले टेक्स में बहुगुवित वृद्धि हुई है।

    सुरक्षा परिदृश्य में आये बदलाव से दुनिया चकित है। पड़ौसी देश पाकिस्तान और चीन भ्रमित है। सर्जिकल स्ट्राईक ने दुनिया को बता दिया है कि भारत अब साफ्ट इस्टेट नहीं रहा है। इसकी डोकलाम प्रकरण में भारत की दृढ़ता ने मोहर लगा दी है। चीन को डोकलाम मामले में उल्टे पैर लौटना पड़ा है। इसने भारत की प्रतिष्ठा में चारचांद लगा दिये हैं। चीन के पुसैल पाकिस्तान को भारत की सीमा में आतंकवाद फैलाने के लिए उकसाने वाले चीन को ही ब्रिक्स की बैठक में पाकिस्तान की भत्र्सना करने को नरेंद्र मोदी ने विवश कर दिया। यह पहला मौका था जब मोदी ने चीन की धरती पर चीन केा मात दे दी। विश्व शक्तियां दांत तले अंगुली दबाने को विवश हुई। लेकिन इसे कांग्रेस की नादानी ही कहेंगे कि जब चीन भारत के बीच तनाव चरम पर था राहुल गांध्ीा चीन के दूतावास पहुंच गये और खुद संदेह के घेरे में आ गये। देश विदेश खासकर अमेरिका ने भारत में जीएसटी की जी भरकर प्रशंसा की। लेकिन राहुल गांधी ने अमेरिका की धरती पर जीएसटी का विरोध करके न केवल घरेलु मामलों पर विवाद खड़ा कर दिया अपितु अपनी कूटनीतिक निरक्षरता जनता के सामने उजागर कर दी।

    हाल के दिनों में जापान के प्रधानमंत्री आबे ने भारत पहुंचकर नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों का खुलेमन से समर्थन किया अपितु भारत को सामरिक, आर्थिक समर्थन देकर पड़ौसी देश चीन का बुलेट और पाकिस्तान को बुलट का अर्थ समझा दिया। आज पाकिस्तान यदि आतंकवादी देश के रूप में अलग-थलग खड़ा है और चीन की विस्तारवादी दुष्प्रवृत्ति के कारण विश्व के अधिकांश देश चीन के विरोधी और भारत के समर्थन में खड़े हैं यह इक्कीसवीं शताब्दी की बड़ी सफलता है जिसका श्रेय नरेंद्र मोदी को जाता है। उन्होंने भारत के इतिहास को नया मोड़ देकर वैश्विक पटल पर भारत का मान और प्रतिष्ठा बढ़ाई है।

    नरेंद्र मोदी के प्रयास से अहमदाबाद से मुंबई बुलेट ट्रेन की आधार शिला रखे जाने के पश्चात् जापान के प्रधानमंत्री ने ऐलान किया है कि वे 2022 में बुलेट ट्रेन से भारत के नयनाभिराम स्थलों का दौरा करेंगे। पांच वर्षों में पूर्ण होने वाली बुलेट ट्रेन परियोजना पर 84 लाख करोड़ रू. का खर्च आयेगा जो कर्ज के रूप में जापान भारत को 0.1 प्रतिशत ब्याज पर देगा। नरेंद्र मोदी का यह कहना कि बुलेट ट्रेन परियोजना भारत को मुफ्त में पड़ेगी अतिरंजना नहीं एक हकीकत है। क्योकि इस कर्ज राशि की वसूली 15 वर्ष बाद लंबी अवधि की किश्तों में होगी। तब तक यह परियोजना भारत के लिए दुधारू गाय साबित हो चुकी होगी। देश के औद्योगिक शहरों में आवागमन सरल, सुलभ पर यातायात का दबाव केन्द्रित होने से सड़क और देश यातायात पर से दबाव घटेगा। इससे पर्यावरण संरक्षण का नया अध्याय आरंभ होगा।

    नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हर क्षेत्र में काम की गति में तीव्रता आई है। सबसे बड़ी बात यह है कि भारत की दुनिया की महाशक्ति की राह पर अजेय बनकर बढ़ रहा है भारतीय फौज ने पाकिस्तान के विरूद्ध सर्जिकल स्ट्राईल लालसेना के साथ साहसिक झड़पे मोल ली हैं। ऐसा पहली बार हुआ कि भारत ने सीना तानकर इसकी जानकारी सार्वजनिक करने में गुरेज नहीं किया। अब तक यह साहस विश्व का महानशक्तिशाली देश अमेरिका ही करता रहा है। इतिहास में दर्ज है कि पूर्ववर्ती सरकार के दौर में नाथूला पर हुई झड़पों में चीन के 300 सैनिक ढेर हुए थे लेकिन सरकार यह बताने का साहस नहीं कर सकी थी। क्योंकि उसे अंदेशा था कि ऐसा करने से चीन भड़क जायेगा। लेकिन इस बार सेना को जितनी आजादी दी गई। उतने ही खुलेपन के साथ भारतीय फौज के शौर्य का सरकार ने बखान किया और उसे पूरा श्रेय भी दिया। अब तक भारत की विदेश नीति संकोच के अवकुंठन रही है। लेकिन मोदी ने इसमें साहस के साथ पारदर्शिता का रंग भरा है और देश का भाल उन्नत किया है यहीं महाशक्ति के सिर का सेहरा है।

  • अब चीन भी आतंकवाद पर भारत के साथ

    अब चीन भी आतंकवाद पर भारत के साथ

    नई दिल्ली । चीन के शियामेन शहर में ब्रिक्स सम्मेलन के समापन की औपचारिक घोषणा के साथ अगले साल दक्षिण अफ्रीका के जोहानिसबर्ग में अगले ब्रिक्स सम्मेलन की घोषणा की गई।

    ब्रिक्स सम्मेलन पर देश और दुनिया की नजर इस बात पर टिकी थी कि भारत और चीन के बीच बातचीत का एजेंडा क्या होगा। सोमवार को जब ब्रिक्स का घोषणापत्र जारी हुआ तो उसमें अहम बात ये रही कि पहली बार चीन ने माना कि लश्कर और जैश दुनिया के लिए खतरनाक हैं। ब्रिक्स के घोषणापत्र में लश्कर और जैश संगठनों का जिक्र होना भारत के लिए अहम कामयाबी मानी गई। गोवा में 2016 के ब्रिक्स के घोषणापत्र के समय भारत की तमाम कोशिशों के बाद भी लश्कर और जैश के नाम पर चीन अड़ गया था। आज जब पीएम मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनफिंग के बीच मुलाकात हुई तो कयास लगाए जा रहे थे कि शायद डोकलाम के मुद्दे पर दोनों देशों के बीच बातचीत हो। लेकिन चीन ने बातचीत से पहले ही साफ कर दिया कि डोकलाम पर बातचीत नहीं होगी।

    पीएम मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की बातचीत के बाद विदेश सचिव एस जयशंकर ने सधे अंदाज में कहा कि मतभदों को कभी विवाद नहीं बनने देंगे। भारत के इस बयान से साफ हो गया कि पंचशील सिद्धांतों के तहत ही चीन और भारत को आगे बढ़ने की जरुरत है।

  • ऑनलाइन फंड ट्रांसफर के सरल तरीके

    ऑनलाइन फंड ट्रांसफर के सरल तरीके

    Hand of man with credit card, using a ATM

    अब आपको पैसे ट्रांसफर करने के लिए बैंकों की लाईनों में लगने की जरूरत नहीं है। बैंक बंद हों या आप बैंक से दूर हों ऐसी स्थिति में ऑनलाइन फंड ट्रांसफर आपकी मदद कर सकता है। आप भी जानिए कुछ सरल तरीके-

    ऑनलाइन फंड ट्रांसफर सिस्टम किसी दूसरे के खाते में पैसे ट्रांसफर करने की बेहद सुरक्षित और तेज प्रक्रिया है। इसके लिए आपको अपने बैंक से नेटबैंकिंग फैसिलिटी लेनी होती है। यूजर आईडी और पासवर्ड लेकर आप नेटबैंकिंग के जरिए हर वे काम कर सकते हैं, जिसके लिए आपको बैंक जाना पड़ता है। सरकारी बैंकों में यूजर आईडी और पासवर्ड लेने की लंबी प्रक्रिया है लेकिन निजी बैंकों ने इसे काफी हद तक आसान बनाया हुआ है।
    तीन तरह की फैसिलिटीः
    1. नेट बैंकिंग के जरिए
    2. एटीएम के जरिए
    3. मोबाइल बैंकिंग के जरिए

    1. नेट बैंकिंग से फंड ट्रांसफरः
    नेट बैंकिंग के जरिए फंड ट्रांसफर फैसिलिटी अमूमन दो तरह की होती है। RTGS यानी रियल टाइम ग्रॉस सेटलमेंट और NEFT यानी नैशनल इलेक्ट्रॉनिक फंड ट्रांसफर सिस्टम। इनमें कोई खास फर्क नहीं है, सिवाय इसके कि कुछ बैंकों ने NEFT में फंड ट्रांसफर की लिमिट तय की हुई है। बैंक अकाउंट खुलवाने के दौरान ही आपको नेट बैंकिंग में रजिस्ट्रेशन से संबंधित किट दी जाती है। रजिस्ट्रेशन के बाद आपको अपने पेज पर थर्ड पार्टी ट्रांसफर ऑप्शन में जाना होगा। इसमें लाभार्थी अकाउंट नंबर ऐड करना होगा। नेट बैंकिंग रजिस्ट्रेशन के बाद आप मोबाइल और एटीएम से भी पैसे ट्रांसफर कर सकते हैं।

    2. एटीएम के जरिए फंड ट्रांसफर: तमाम बैंकों ने एटीएम के जरिए भी फंड ट्रांसफर की फैसिलिटी दी हुई है। इसे कार्ड टु कार्ड ट्रांसफर सिस्टम भी कहते हैं। डेबिट कार्ड को एटीएम में डालने या स्वाइप करने के बाद आपको जिसे भी पैसे भेजने हैं, उसका 16 अंकों का डेबिट कार्ड नंबर फीड करना होगा। इसके बाद आपको जितना पैसा ट्रांसफर करना है, वो फीड करना होगा। इसके बाद जैसे ही आप ओके बटन दबाएंगे, आपके अकाउंट से उतनी रकम डेबिट (घट) हो जाएगी यानि पैसा जरूरतमंद के कार्ड में ट्रांसफर हो जाएगा। इस फैसिलिटी के तहत आपको बैंक की ब्रांच में जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी और किसी भी एटीएम से काम चल जाएगा। आप एक दिन में 5 हजार और महीने भर में 25 हजार रुपये तक ट्रांसफर कर सकते हैं। हालांकि अभी ये सुविधा शुरुआती दौर में है और नेटवर्किंग प्रक्रिया पूरी नहीं होने से लोगों को दिक्कतें भी होती हैं। फिलहाल स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की ही सर्विस कुछ हद तक संतोषजनक है। इसमें पैसे भेजने वाले और प्राप्त करने वाले, दोनों के पास एसबीआई डेबिट कार्ड होना चाहिए। प्राइवेट बैंकों में येस बैंक, आईसीआईसीआई, एचडीएफसी, एक्सिस जैसे तमाम बैंकों ने भी ये फैसिलिटी दी हुई है। ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए फिलहाल इस सर्विस पर कोई चार्ज नहीं लिया जा रहा है।

    3. मोबाइल के जरिए फंड ट्रांसफर: इसके लिए पैसे भेजने वाले और उसे हासिल करने वाले के पास मोबाइल मनी आइडेंटिफिकेशन यानी MMID और मोबाइल बैंकिंग का पासवर्ड यानी MPIN होना जरूरी है। इन्हें आप अपने बैंक से हासिल कर सकते है। अब अपने मोबाइल से *99# डायल करें और ध्यान से निर्देश सुनें। अमूमन डायल पैड पर 3 नंबर दबाने पर फंड ट्रांसफर प्रॉसेस शुरू होता है। इसमें आपको फंड प्राप्तकर्ता का 10 अंकों का मोबाइल नंबर और उसके बाद स्पेस देकर 7 अंकों का MMID डालना होता है। इसके बाद जितनी रकम आपको भेजनी है, वो भरनी होगी। फिर आपको बैंक से पूर्व में मिली हुई MPIN (मोबाइल बैंकिंग का पासवर्ड) डालकर ट्रांजैक्शन को ओके करना होगा। इसके बाद पैसा जरूरतमंद के पास ट्रांसफर हो जाएगा। मोबाइल बैंकिंग के जरिए आप IMPS माध्यम से भी फंड ट्रांसफर कर सकते हैं। इसमें आपको लाभार्थी का अकाउंट नंबर और 11 अंकों का IFSC कोड डालना होगा। इसके बाद भेजने वाली रकम दर्ज करें। फिर अपना MPIN डालकर ट्रांजैक्शन को ओके करें। पैसा जरूरतमंद तक पहुंच जाएगा। *99# डायल कर आप अपने खाते में रकम से संबंधित जानकारी भी ले सकते हैं और चाहें तो मिनी स्टेटमेंट भी प्राप्त कर सकते हैं।

    NEFT/RTGS
    एनईएफटी या आरटीजीएस को रियल टाइम फंड ट्रांसफर के रूप में भी जाना जाता है। यह एक ऐसी सुविधा है, जिसमें कोई शख्स, कंपनी या फर्म किसी दूसरे के अकाउंट में पैसे का ट्रांसफर कर सकते हैं। यह ट्रांसफर बैंक के वर्किंग पीरियड में होता है। इसमें जो भी ट्रांजैक्शन होता है, उसके लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पास संबंधित बैंक रिक्वेस्ट भेजते हैं। इसके बाद ही वह पैसा दूसरे शख्स के खाते में ट्रांसफर हो पाता है। इसमें कुछ घंटों का समय लगता है। NEFT के तहत एक निश्चित समय तक बैंक फंड ट्रांसफर रिक्वेस्ट का कलेक्शन करते हैं। इसे कट ऑफ टाइम कहते हैं। यानी आपने फंड ट्रांसफर भले ही किसी भी वक्त किया हो, पैसा फौरन ट्रांसफर नहीं होता। RTGS प्रति ट्रांजैक्शन के आधार पर काम करता है और फंड तत्काल ट्रांसफर होता है।

    IMPS
    IMPS में रियल टाइम वर्किंग होने के चलते आप दिए गए समय के अलावा फंड ट्रांसफर नहीं कर पाएंगे। मसलन रात के वक्त फंड ट्रांसफर की सुविधा आपको नहीं मिलती। इसके लिए बैंकों ने विकल्प के तौर पर IMPS यानी इमीडियेट पेमेंट सर्विस भी शुरू की हुई है। इसमें आप किसी के भी खाते में कभी भी पैसे ट्रांसफर कर सकते हैं। हालांकि दूसरे काम मसलन रिचार्ज या बिल पेमेंट नहीं कर पाएंगे। इसमें न तो समय की बाध्यता है, न दिन की। छुट्टी के दिन भी आप इसका फायदा उठा सकते हैं।

    इंटर बैंक और इंटर एकाउंट मनी ट्रांसफर: इसमें पैसों का लेन-देन बैंक के नेटवर्क के बीच में ही होता है। यह सिस्टम रियल टाइम आधार पर काम करता है। इसके तहत एकाउंट होल्डर किसी भी वक्त अपने या उसी बैंक में किसी तीसरे व्यक्ति के एकाउंट में पैसे ट्रांसफर कर सकता है। रियल टाइम सिस्टम के जरिए ट्रांसफर की गई राशि तुरंत उस एकाउंट में क्रेडिट हो जाती है। इसमें पैसे ट्रांसफर की कोई लिमिट नहीं है। बैंक इस सुविधा के लिए कोई चार्ज नहीं वसूलते हैं।

    यूपीआई:यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस सर्विस का नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) तेजी से विस्तार करने की तैयारी में है। यूपीआई एक यूनिक पेमेंट सॉल्यूशन है जिसे यूपीआई समर्थित किसी भी एप को ई-मेल, आधार नंबर और मोबाइल नंबर से एक्टिवेट कर सकते हैं।
    यूपीआई की मदद से एक से ज्यादा बैंक एकाउंट को एक साथ हैंडल किया जा सकता है। साथ ही किसी भी बैंक एकाउंट में पेमेंट करने के लिए एकाउंट नंबर की जरूरत नहीं होगी। कोई भी व्यक्ति किसी के भी बैंक एकाउंट में भुगतान उसके मोबाइल नंबर या बैंक के साथ लिंक ई-मेल एड्रेस के जरिए कर सकेगा। मसलन, इनमें से अगर कोई भी एक जानकारी रिसीवर के बैंक एकाउंट से लिंक है, तो उसके एकाउंट में फंड ट्रांसफर किया जाना संभव होगा। आपको बता दें कि इसके जरिए फंड ट्रांसफर रियल टाइम में किया जा सकेगा। यूजर के लिए यह सर्विस 24 घंटे उपलब्ध रहेगी।

  • चीनी माल का बहिष्कार करेंःइंद्रेश कुमार

    चीनी माल का बहिष्कार करेंःइंद्रेश कुमार

    भोपाल21 अगस्त,(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।भारत ने कभी किसी देश की जमीन हड़पने का प्रयास नहीं किया। इसके बावजूद चीन और पाकिस्तान जिस तरह की चालें चल रहे हैं उन्हें पता ही नहीं चल रहा कि उनकी जमीन कैसे खिसक रही है। पाकिस्तान ने यदि भारत से द्वेष बंद नहीं किया तो निकट भविष्य में वह अपना मौजूदा अस्तित्व ही गंवा देगा। इसी तरह चीन समुद्र की ओर बढ़ने की ललक में दुनिया से टकराव की नीति पर चल रहा है। दक्षिणी सागर में तेरह देश मिलकर चीन की लूट रोकने के लिए जुट गए हैं। उसके सभी पड़ौसी देशों से संबंध खराब हैं और वह बिखरने की कगार तक पहुंच गया है। हिंद बलोच फोरम के आव्हान पर आज भोपाल में एकत्रित जनसमूह को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार ने ये बातें कहीं।

    हिंद बलोच फोरम पाकिस्तान में बेहतर जीवन की लड़ाई लड़ रहे बलोचिस्तान के नागरिकों के हित में आवाज बुलंद कर रहा है। इस संगठन का उद्देश्य देश विदेश में बलोचिस्तान के नागरिकों के मानवाधिकारों के हनन की आवाज बुलंद करना है।……. जम्मू कश्मीर और बलोचिस्तान में पाकिस्तान का बर्बर चेहरा….. विषय पर आयोजित इस सेमिनार में देश के कई जाने माने विशेषज्ञों ने भी अपने विचार व्यक्त किए। इनमें हिंद बलोच फोरम के संयोजक स्वामी जितेन्द्रानंद सरस्वती,हिंद बलोच फोरम के अध्यक्ष और जाने माने ज्योतिषाचार्य पवन सिन्हा (गुरुजी), राजनीतिक विश्लेषक और पाकिस्तान मामलों के जानकार पुष्पेन्द्र कुलश्रेष्ठ, हिंद बलोच फोरम के राष्ट्रीय सूत्रधार गोविंद शर्मा,रक्षा विशेषज्ञ कर्नल आरएसएन सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किए। फादर मरिया स्टीफेन और सभी धर्मगुरु भी इस अवसर पर उपस्थित थे।स्थानीय स्तर पर आयोजित इस कार्यक्रम के संयोजक गजेन्द्र सिंह चौहान, अश्विनी, अजय ठाकुर एवं कई अन्य युवाओं ने कार्यक्रम को सफल बनाने में अपना सक्रिय सहयोग दिया। भारत और बलोचिस्तान की बहनों ने राखी बांधकर इस आयोजन को स्नेह सूत्र में पिरोया।

    हिंदू मुस्लिम एकता के लिए बरसों से कार्य कर रहे संघ के स्वयंसेवक इंद्रेश कुमार ने कहा कि हम कभी पाकिस्तान,इस्लाम या मुसलमान के विरोधी नहीं रहे। पाकिस्तान हमारी इच्छा के विरुद्ध बनाया गया था। तत्कालीन नेताओं नेहरू और जिन्ना ने इसमें भले ही सहमति दी हो पर दोनों देशों के नागरिक इस बंटवारे से न तो तब सहमत थे और न आज। पाकिस्तान के मौजूदा शासक इसके बावजूद आज भारत से द्वेष पैदा कर रहे हैं और चीन से गलबहियां डाल रहे हैं। इसके कारण पाकिस्तान के लोगों में भय फैल गया है कि चीन कहीं भविष्य में हमें तिब्बत की तरह गड़प न कर जाए।

    उन्होंने कहा कि लार्ड माऊंटबैटन के जिस कागज पर नेहरू और जिन्ना ने हस्ताक्षर किए थे वो आजादी का नहीं विभाजन का दस्तावेज था। इस विभाजन से दोनों देशों के तीन करोड़ लोग उजड़ गए, दस लाख लोगों का कत्लेआम हुआ, चार लाख बहनों ने आत्महत्या की या बलात्कार के बाद उनकी हत्या कर दी गई, छह लाख लोगों को धर्म परिवर्तन करना पड़ा। उन्होंने बताया कि आजादी के जश्न में बापू स्वयं मौजूद नहीं थे। एक भी दस्तावेज या वीडियो नहीं है जिसमें उन्होंने आजादी का संदेश दिया हो। उन्होंने इस अवसर पर झंडा भी नहीं फहराया। वे तो चाहते थे कि स्वाधीनता आंदोलन के दौरान कांग्रेस के बैनर पर देश के लोगों को एकजुट किया गया था। इसलिए इसे राजनीतिक दल का स्वरूप न दिया जाए। इसके बावजूद चंद स्वार्थी लोगों ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए स्वाधीनता संग्राम की याद दिला दिलाकर देश को लूटा। आज कांग्रेस के नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में कब भागीदारी की जो सेनानियों के नाम पर आज तक देश का दोहन कर रहे हैं।

    श्री इंद्रेश कुमार ने कहा कि जो लोग देश के अन्य राज्यों से पाकिस्तान पहुंचे थे वे आज मुहाजिर कहे जाते हैं। पाकिस्तान के लोगों ने कानून बनाकर उन्हें शरणार्थी का दर्जा दिया और वे आज भी पाकिस्तान के नागरिक नहीं बन सके हैं। आज वे कह रहे हैं कि अपने बुजुर्गों की गलती के लिए वे भारत से क्षमा चाहते हैं। भारत अपने प्रभाव का उपयोग करके उन्हें या तो पाकिस्तान का नागरिक बनवाए या हमें भारत में वापस शामिल कर ले। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के सिंध, गिलगित, बाल्टिस्तान के लोगों ने कभी पाकिस्तान नहीं मांगा था। बलूचिस्तान और सिंध के लोगों ने तो बाकायदा दिल्ली आकर पंडित नेहरू से ये विभाजन रोकने का अनुरोध किया था पर वे नहीं माने। पाकिस्तान की फौजें उन्हें नियंत्रण में रखने के लिए दो लाख मुस्लिमों का कत्ल कर चुकी है। यही वजह है कि पाकिस्तान में नो मोर पाकिस्तान का नारा देने वाले सात संगठन अपनी आवाज उठा रहे हैं। पाकिस्तान नफरत के मार्ग पर चल रहा है इसलिए वह विकास की दौड़ में पिछड़ता जा रहा है।

    कश्मीर की मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती और नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष व लोक सभा सांसद फारूख अब्दुला के बयानों के बारे में इंद्रेश कुमार ने कहा कि एक बार अनुच्छेद 35 ए को हटाकर जरूर देख लिया जाना चाहिए कि इसका क्या असर होता है। हो सकता है इसी से कोई रास्ता निकल आए। मेहबूबा मुफ्ती के बयान पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि तिरंगे की मौत नहीं हो सकती इसलिए इसका जनाजा भी नहीं निकल सकता। इसलिए इस तरह की बातें फिजूल हैं। उन्होंने युवाओं से आव्हान किया कि वे कश्मीर में जमीन खरीदने और बसने के लिए तैयार रहें।

    उन्होंने कहा कि भारत का हिंदू कभी मुसलमान के खिलाफ नहीं रहा। जब बाबरी ढांचे को ढहाने देश भर से स्वयंसेवक अयोध्या पहुंच रहे थे तो उन्होंने किसी दूसरी मस्जिद को हाथ भी नहीं लगाया। किसी भी मुसलमान को चांटा भी नहीं मारा। इस सच्चाई के बावजूद यदि कोई हिंदू को मुसलमानों का दुश्मन बताए तो ये उसके शैतानी दिमाग की उपज ही हो सकती है। पूर्व राष्ट्रपति हामिद अंसारी के बयान के बारे में उन्होंने कहा कि देश भर में कश्मीर के लाखों छात्र विभिन्न राज्यों में पढ़ते हैं कहीं भी उनसे वैमनस्य नहीं रखा जाता है। इसके बावजूद यदि कोई कहता है कि भारत का मुसलमान डरा हुआ है तो वह जिस देश को सुरक्षित समझता है वहां चला जाए। किसी को भारत का माहौल खराब करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

    श्री इंद्रेश कुमार ने कहा कि भारत की कूटनीतिक सफलता ही तो है कि आज दुनिया का एक भी देश चीन का मित्र नहीं है। पाकिस्तान भी पूरी दुनिया से अलग थलग पड़ गया है पर दुनिया के तमाम देश भारत के मित्र हैं। हम कन्फ्यूशियस वाले चीन के पक्षधर हैं, कम्युनिस्ट चीन के नहीं। डोकलाम में हमने अपनी अतिरिक्त सेना तैनात की है। हम युद्ध नहीं चाहते वार्ता से टकराव टालने का प्रयास कर रहे हैं। चीन यदि टकराव का रास्ता अपनाएगा तो इस नकारात्मक सोच के चलते वह बिखर भी जाएगा। उन्होंने कहा कि चीन और पाकिस्तान को सन्मार्ग पर लाने के लिए देश के लोगों को आगे आना होगा। भारत ने चीन को कच्चे माल की सप्लाई बंद कर दी है। हम लोगों से ये भी अपील कर रहे हैं कि तीज त्योहार से लेकर रोज की पूजा तक में इस्तेमाल होने वाले चीन के माल का उपयोग बंद कर दें।उन्होंने लोगों को चीन और पाकिस्तान की विस्तारवादी सोच से उपजे आतंकवाद से मुक्ति के लिए प्रार्थना करने का अनुरोध किया।

  • चीन से विवाद में कांग्रेसी दलालों की भूमिका

    चीन से विवाद में कांग्रेसी दलालों की भूमिका

    डोकलाम विवाद: भारत ने नहीं हटाई सेना तो दो हफ्तों में हमला कर सकता है चीन- ग्लोबल टाइम्स

    नईदिल्ली। चीनी मीडिया लगातार भारत और खासतौर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को निशाना करके हमले की चेतावनी दे रहा है। चीनी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने चीनी सैन्य विशेषज्ञों के हवाले से लिखा है कि अगर नरेन्द्र मोदी सरकार का इस मुद्दे पर अड़ियल रवैया कायम रहता है तो जंग होना तय है। चीन के सैन्य विशेषज्ञों के मुताबिक चीन की पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी दो हफ्तों के अंदर डोकलाम में भारतीय सेना पर सीमित कार्रवाई कर सकती है।

    शंघाई एकेडमी ऑफ सोशल साइसेंज के इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल रिलेशंस में रिसर्च फेल हु ज़ियोंग ने कहा, ‘पिछले दो दिनों में चीन की ओर से की गई टिप्पणियां दिखाती हैं कि चीन भारतीय सेना को विवादित क्षेत्र में लंबे समय तक बर्दाश्त नहीं करेगा।’ ग्लोबल टाइम्स ने हु जियोंग के हवाले से लिखा है कि चीन की सैन्य कार्रवाई का मकसद डोकलाम में मौजूद भारतीय सैनिकों को कैद करना या फिर उन्हें पीछे धकेलना शामिल होगा, साथ ही चीन का विदेश मंत्रालय ऐसी किसी भी कार्रवाई से पहले भारत के विदेश मंत्रालय को अपने फैसले की सूचना देगा।’

    चीन के विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, भारत में चीन के दूतावास और पीपुल्स डेली की ओर से भारत को धमकी दी जा चुकी है कि भारत डोकलाम से अपनी सेना हटाए। बता दें कि डोकलाम में पिछले दो महीनों से भारत चीन की सेना आमने-सामने है। चीन के सरकारी टीवी ने शुक्रवार को बताया कि चीन की सेना ने तिब्बत मिलिट्री क्षेत्र में युद्धाभ्यास किया है, ये युद्धाभ्यास सुबह 4 से शुरू हुआ था और इसमें दुश्मन के ठिकानों पर कब्जे का अभ्यास किया गया था।

    शंघाई इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल स्टडीज में सेन्टर फॉर एशिया-पैसिफिक स्टडीज के निदेशक जाओ गेनचेंग ने ग्लोबल टाइम्स को बताया कि चीनी सेना का ये अभ्यास दिखाता है कि डोकलाम में चीन सैन्य संसाधनों का इस्तेमाल कर सकता है और ऐसा करने की संभावनाएं बढ़ती जा रही है क्योंकि भारत कह कुछ रहा है और कर कुछ रहा है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने गुरुवार को संसद में बयान दिया था कि युद्ध से समस्या का समाधान नहीं हो सकता है इसके लिए बात चीत और बौद्धिक विमर्श की जरूरत है। हालांकि सुषमा स्वराज ने ये भी कहा था कि भारत की सेना किसी भी स्थिति का सामना करने को तैयार है।

    डोकलाम में सड़क बना रहे चीनी अमले को रोकने के लिए जबसे भारत की सेना ने हस्तक्षेप किया है तभी से ये विवाद गरमाया है। भारत में अपना कारोबार लगातार बढ़ाने के लिए चीन ने इन सड़कों का विस्तार किया है। सामरिक महत्व से भी चीन लगातार भारत को घेरने में लगा हुआ है। पड़ौसी मुल्कों से लगातार संबंध बिगाड़ने वाली कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी ने इस बीच चीनी दूतावास जाकर वहां के राजनयिकों से मुलाकात की थी। इस गोपनीय मुलाकात की जानकारी लीक हो गई और सत्तारूढ़ भाजपा के नेताओं ने राहुल गांधी के इस तरह गुपचुप मिलने पर सवाल उठाए थे। तभी से ये सवाल लगातार उठाए जा रहे हैं कि मौजूदा तनाव के पीछे कहीं कांग्रेस के रणनीतिकारों की तो भूमिका नहीं है। जनता की चुनी हुई सरकार के सामने लगातार लाचार नजर आती कांग्रेस जिस तरह देश के साथ षड़यंत्र करती रही है उसे देखकर तो शंकाएं उठना लाजिमी हैं। भारत सरकार को कांग्रेस से जुड़े दलालों और तस्करों की भूमिका की छानबीन भी करनी चाहिए जिससे इस विवाद का समाधान हो सके। (एजेंसियां)

  • चुटका परमाणु बिजली संयंत्र को जमीन आबंटित

    चुटका परमाणु बिजली संयंत्र को जमीन आबंटित

    मंत्रि-परिषद के निर्णय

    भोपाल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।

    मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में आज हुई मंत्रि-परिषद की बैठक में पचमढ़ी अभयारण्य से 11 ग्राम एवं नजूल के 395.939 हेक्टेयर क्षेत्र को अभयारण्य क्षेत्र से बाहर करने तथा अभयारण्य के शेष बचे 28 ग्रामों को अभयारण्य क्षेत्र में इनक्लोजर के रूप में रखने का निर्णय लिया गया। इन ग्रामों पर वन्य-प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 के अभयारण्य से संबंधित प्रावधान लागू नहीं होंगे।

    मंत्रि-परिषद ने केंद्रीय जेल भोपाल के 8 विचाराधीन बंदियों के भागने की घटना की न्यायिक जाँच के लिए गठित जाँच आयोग के कार्यकाल में तीन माह की वृद्धि करने का निर्णय लिया । यह वृद्धि 7 अगस्त से 6 नवंबर 2017 तक की गई है।

    मंत्रि-परिषद ने राजधानी परियोजना प्रशासन के तहत 422 नियमित अस्थाई पद और कार्यभारित स्थापना के तहत 300 पद इस तरह कुल 722 पद 1 मार्च 2017 से आगामी 5 वर्ष के लिए निरंतर रखने की स्वीकृति दी।

    मंत्रि-परिषद ने मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों में सामान्य पूल के आवासगृहों के निर्माण के लिए 220 करोड़ की प्रशासकीय स्वीकृति दी।

    मंत्रि-परिषद ने मध्यप्रदेश गौण खनिज नियम 1996 में संशोधन के संबंध में समन्वय में दिये गये आदेश का अनुसमर्थन किया।

    स्कूल शिक्षा के महत्वपूर्ण निर्णय

    मंत्रि-परिषद ने प्रदेश में शासकीय हाई /हायर सेकेण्डरी विद्यालयों में फर्नीचर और हायर सेकेण्डरी स्कूलों की प्रयोगशाला में आवश्यक सामग्री की पूर्ति करने की स्वीकृति दी। इसका क्रियान्वयन आगामी 3 वर्षों तक होगा।

    मंत्रि-परिषद ने कक्षा 9 से 12 के दिव्यांग बच्चों के लिए संभाग स्तर पर छात्रावास संचालन की स्वीकृति दी। योजना को आगामी 3 वर्ष तक संचालन की स्वीकृति मिली है।

    मंत्रि-परिषद ने शासकीय हाई/हायर सेकेण्डरी विद्यालय भवन में रेट्रोफिटिंग जैसे लैब, पुस्तकालय, खेलकूद कक्ष में आवश्यक कार्य, पार्टीशन, सायकल स्टेण्ड, शेड निर्माण, स्टेज निर्माण, मैदान निर्माण, बगीचा निर्माण, पेयजल व्यवस्था आदि के लिए नयी योजना स्वीकृत की। वर्ष 2017-18 में इस मद में 9.20 करोड़ तथा 3 वर्ष के लिए 43.7 करोड़ की राशि स्वीकृत की गईं।

    राजस्व निर्णय

    मंत्रि-परिषद ने भूमि-अर्जन, पुनर्वासन एवं पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013-शासन के विभिन्न विभागों/उपक्रमों के लिए ‘आपसी सहमति से भूमि क्रय नीति’ 12 नवंबर 2014 में संशोधन की मंजूरी दी। संशोधन के बाद कण्डिका 14 में क्रय की गई भूमियों के विक्रय विलेख के विषय में भारतीय स्टाम्प अधिनियम 1899 एवं रजिस्ट्रीकरण अधिनियम 1908 के प्रावधान लागू होंगे।

    मंत्रि-परिषद ने ‘शासकीय भूमि में से भूमिगत पाइप लाइन, केबल या डक्ट बिछाने के लिए अनुज्ञप्ति’ विषयक नीति लागू करने की मंजूरी दी। निर्णय लिया गया कि विभिन्न परियोजनाओं के लिए भूमिगत पाइप लाइन, केबल या डक्ट बिछाने के लिए निजी भूमियों का उपयोक्ता का अधिकार अर्जन किया जाता है और जहाँ इन कार्यों के लिए शासकीय भूमि की आवश्यकता होगी ऐसी भूमि परियोजना को लाइसेंस पर उपलब्ध करवाई जायेगी।

    मंत्रि-परिषद ने चुटका परमाणु विद्युत परियोजना के लिए न्यूक्लियर पॉवर कार्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड को मंडला और सिवनी जिले की शासकीय भूमि वर्तमान में प्रचलित कलेक्टर गाइड लाइन वर्ष 2017-18 के आधार पर प्रीमियम राशि और 7.5 प्रतिशत वार्षिक भू-भाटक लेकर आवंटन की मंजूरी दी।

  • जीएसटी से देश का आर्थिक एकीकरणःमलैया

    जीएसटी से देश का आर्थिक एकीकरणःमलैया

    भोपाल 12 जुलाई(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।

    वित्त एवं वाणिज्यिक कर मंत्री जयंत मलैया ने कहा है कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) ने काश्मीर से कन्याकुमारी तक देश का आर्थिक रूप से एकीकरण किया है। जीएसटी देश की आजादी के बाद आर्थिक क्षेत्र का सबसे बड़ा बदलाव है। इससे देश की तरक्की की रफ्तार को काफी गति मिलेगी। वित्त मंत्री मलैया आज भोपाल के समन्वय भवन में जीएसटी जागरूकता कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे। कार्यशाला में राजस्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता और सहकारिता राज्य मंत्री विश्वास सारंग भी मौजूद थे।

    वित्त मंत्री श्री मलैया ने कहा कि जीएसटी एक राष्ट्र, एक कर और एक बाजार के उद्देश्य से लागू किया गया है। प्रदेश में एक जुलाई से वाणिज्यिक कर विभाग की 29 चौकी समाप्त हो गयी हैं। उन्होंने कहा कि पहले करीब 18 प्रकार के कर हुआ करते थे। अब इन सबको समाप्त कर एक कर जीएसटी लागू किया गया है। श्री मलैया ने कहा कि मध्यप्रदेश में पूर्व में वेट विधान में व्यवसायियों को पंजीयन लेने की सीमा 10 लाख रुपये वार्षिक टर्न-ओव्हर थी। जीएसटी विधान में यह 20 लाख रुपये वार्षिक टर्न-ओव्हर कर दी गयी है। इसके साथ ही 75 लाख रुपये तक के व्यापारियों को कंपोजिशन की सुविधा भी दी गयी है। जीएसटी कानून में छोटे व्यवसायियों को सुविधा देने के अधिक से अधिक प्रयास किये गये हैं।

    वित्त मंत्री ने कहा कि बेरियर खत्म होने से सड़कों पर चलने वाले ट्रकों की रफ्तार तेज होगी। देश में जब बेरियर थे, तो ट्रकों में लगने वाले ईंधन में प्रतिवर्ष एक लाख 40 हजार करोड़ रुपये का अनावश्यक खर्च होता था। वित्त मंत्री ने कहा कि अमेरिका में मालवाहक ट्रक प्रतिदिन 800 किलोमीटर की दूरी तय करता है। जब बेरियर थे तब मालवाहक ट्रक देश में केवल 280 किलोमीटर प्रतिदिन की दूरी तय करते थे। अब मालवाहक ट्रकों की रफ्तार प्रतिदिन 350 से 400 किलोमीटर हो जायेगी। इससे व्यापारिक गतिविधियों में तेजी आयेगी। जीएसटी के टैक्स स्लेब की चर्चा करते हुए श्री मलैया ने कहा कि जीएसटी में कर की 5 दरें 0, 5, 12, 18 और 28 प्रतिशत हैं। केवल 19 प्रतिशत वस्तुएँ ऐसी हैं, जिन पर कर की दर उच्चतम अर्थात 28 प्रतिशत है। शेष 81 प्रतिशत वस्तुओं पर 18 प्रतिशत या उससे कम की दरें हैं। वित्त मंत्री श्री मलैया ने जीएसटी को देश के संघीय ढाँचे की बेहतर मिसाल बताया।

    राजस्व मंत्री श्री उमाशंकर गुप्ता ने कहा कि जीएसटी का निर्णय देश की तरक्की और आम जनता की भलाई के लिये लिया गया है। उन्होंने व्यापारियों से जीएसटी के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखने की सलाह दी। सहकारिता राज्य मंत्री श्री विश्वास सारंग ने कहा कि जीएसटी को लागू करने का निर्णय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का साहसिक कदम है। इसके अच्छे प्रभाव आने वाले वर्षों में देखने को मिलेंगे। प्रमुख सचिव वाणिज्यिक कर श्री मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि देश के संविधान को बनाने के लिये जितनी चर्चा नहीं हुई थी, उससे ज्यादा जीएसटी कानून को बनाने के लिये हुई है। उन्होंने कहा कि जीएसटी कानून में लगातार चर्चा के बाद जनता के हितों को देखते हुए संशोधन किये जायेंगे। उन्होंने हाल ही में किसानों के हित में फर्टिलाइजर में जीएसटी की दर कम किये जाने का उल्लेख किया। कार्यशाला में वाणिज्यिक कर आयुक्त श्री राघवेन्द्र सिंह और सेंट्रल एक्साइज के चीफ कमिश्नर श्री हेमंत भट्ट ने जीएसटी के प्रावधानों के बारे में जानकारी दी। कार्यशाला का संचालन वित्त मंत्री के विशेष कर्त्तव्यस्थ अधिकारी श्री नितिन नांदगांवकर ने किया। कर सलाहकार श्री आर.एस. महेश्वरी ने व्यापारियों की समस्याओं का समाधान किया।

  • जीएसटी को सहकारी संघवाद बता रही भाजपा

    जीएसटी को सहकारी संघवाद बता रही भाजपा

    भोपाल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम) जीएसटी लागू होने के बाद अनुमान लगाया जा रहा है कि इससे सबसे अधिक क्षति भारतीय जनता पार्टी को होगी। उसके समर्थकों में सबसे ज्यादा व्यापारी वर्ग शामिल है और जीएसटी लागू होने से सबसे ज्यादा क्षति उन्हें ही पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है। भाजपा ने इन हालात को समझते हुए जीएसटी के समर्थन में नारा देना शुरु कर दिया है कि भाजपा जिस सांस्कृतिक संघवाद की आवाज उठाती रही है वो अब सहकारी संघवाद की भावना के साथ देश को आर्थिक समृद्धि भी प्रदान करेगी। व्यापारी वर्ग अपनी पार्टी के इस फैसले से कदमताल करने चल पड़ा है। उसे भरोसा दिलाया जा रहा है कि खातों की इस फेरबदल में यदि व्यापारियों को वास्तविक क्षति पहुंचेगी तो सरकारी तंत्र उन्हें आवश्यक छूटें भी प्रदान करेगा।

    अभी तो ये उम्मीद की जा रही है कि जीएसटी परिषद जल्दी ही मौजूदा व्यवस्था की अपूर्णताओं को दूर करेगी। इन कमियों में कर दरों की बहुलता, विभिन्न रियायतें और प्रक्रियात्मक जटिलता शामिल हैं। इसके लिए काफी हद तक कर नौकरशाही जवाबदेह है जो राज्य और केंद्र दोनों जगहों पर नियंत्रण को नकार रही है। लेकिन जीएसटी के लागू होने को केवल आर्थिक नीति सुधार के रूप में देखना नरेंद्र मोदी सरकार की उपलब्धि को कमतर आंकने जैसा है। इसमें छुपा राजनीतिक संदेश भी उतना ही अहम है। जीएसटी पर बनाई गई आम राजनीतिक सहमति भी काफी कुछ कहती है। भाजपा की राजनीति के लिए भी जीएसटी उतना ही अहम है जितना कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए।देखा जाए तो भाजपा इससे तीन महत्वपूर्ण संदेश भी दे रही है।

    पहला, जीएसटी की शुरुआत का इस्तेमाल सत्ताधारी दल बेहद सावधानी से अपनी सहकारी संघवाद की राजनीति के प्रचार के रूप में कर रहा है। वह ऐसा करके देश को याद दिला रहा है कि उनके लिए सहकारी संघवाद आस्था का विषय है और नई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था उस विचार की प्रतिबद्धता का उदाहरण है। यह बात अहम है क्योंकि सत्ता में आने के पहले मोदी समेत भाजपा के सभी नेता कहते रहे हैं कि सत्ता में आने के बाद वे सहकारी संघवाद की नीति को आगे बढाएंगे।

    बीते तीन सालों में कई बार भाजपा सरकार नीतिगत सुधारों में इस सिद्धांत का पालन करने में नाकाम रही है।उम्मीद की गई थी कि नीति आयोग राज्यों की मदद से देश भर में नीतिगत सुधारों को इसी विचार के अधीन आगे ले जाएगा परंतु ऐसा हुआ नहीं। भूमि अधिग्रहण विधेयक में संशोधन करने में विफल रहने के बाद मोदी सरकार ने संकेत दिया था कि वह राज्यों में ऐसे ही सुधार लाएगी। इसी प्रकार श्रम कानूनों की जटिलताओं मे राहत देने के लिए राज्यों को प्रोत्साहित किया गया कि वे अपने यहां के श्रम कानूनों में बदलाव करें। हालांकि बाद में इस बात पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया कि राज्यों ने इस दिशा में क्या कदम उठाए? राज्यों की ओर से कृषि उपज विपणन और अचल संपत्ति संबंधी सुधारों के क्रियान्वयन में भी ऐसी ही ढिलाई बरती गई। जबकि केंद्र ने इन कानूनों में उचित बदलाव कर दिए थे।

    अब लगता है कि जीएसटी का लागू होना शायद पहला बड़ा सुधार है जहां केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को साथ लेकर कदम उठाया है। निश्चित तौर पर सहकारी संघवाद का प्रदर्शन करते हुए राज्यों को इस बात के लिए आश्वस्त किया गया कि उनके किसी भी राजस्व नुकसान की भरपाई की जाएगी। इसी प्रकार राज्य सरकारों की बात भी सुनी गई। जीएसटी परिषद की अब तक हुई 18 बैठकों में सभी फैसले बिना किसी मतदान के सबकी सहमति से लिए गए।

    यही कारण है कि संसद के केंद्रीय कक्ष में जब जीएसटी की शुरुआत की गई तो तमाम राज्यों और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता वहां मौजूद थे। केंद्र सरकार ने जीएसटी को बाकायदा सहकारी संघवाद के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित करने मे कामयाबी पाई। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी कहा कि तमाम राजनीतिक दलों और सरकारों तथा केंद्र के बीच सहयोग से ही जीएसटी का स्वप्न हकीकत में बदल सका।

    दूसरा बड़ा संदेश यह है कि अब जीएसटी की शुरुआत को सरकार की कालेधन से लड़ाई के अंग के रूप में पेश किया जा रहा है। यह सच है कि जीएसटी बड़े पैमाने पर लेनदेन को कर दायरे में लाएगा जो अन्यथा इससे बाहर रहते। सरकार ने चुनाव में भी कालेधन से निपटने का वादा किया था। भाजपा चुनाव के दौरान ही काले धन के खिलाफ लड़ने का वादा करती रही है। अब उसका जीएसटी लागू करने का फैसला काले धन के खिलाफ नोटबंदी से ज्यादा कारगर कदम साबित होने जा रहा है।

    मौजूदा सरकार का कारोबारियों और दुकानदारों से करीबी जुड़ाव है। पार्टी ने एक ऐसा कदम उठाया है जो इस समूह को ही सबसे अधिक प्रभावित करने वाला है। यह उसका राजनीतिक वर्ग है और जीएसटी का सीधा संबंध इसी वर्ग से है। भाजपा नेता भी यह स्वीकार करने में नहीं हिचकते कि कारोबारी जगत के नाराज साथियों को जीएसटी अनुशासित करेगा। इससे यह संकेत मिलता है कि भाजपा ने कारोबारी वर्ग के साथ रिश्ते को नए रूप में ढाला है। जीएसटी का लागू होना इस बदलाव की पुष्टि करता है। भाजपा के नेता कह रहे हैं कि जीएसटी से फर्जी खाते रखने का चलन तो समाप्त होगा लेकिन व्यापारियों की साख में जबर्दस्त इजाफा होगा।

  • जीएसटी सबसे बड़ा टैक्स सुधारःचीनी मीडिया की राय

    जीएसटी सबसे बड़ा टैक्स सुधारःचीनी मीडिया की राय

    पेइचिंग(भाषा) |

    भारत में जीएसटी लागू किए जाने पर चीन के सरकारी मीडिया ने सलाह दी है। चीन के अखबार ग्लोबल टाइम्स ने अपने एक लेख में कहा, ‘भारत में जीएसटी का पारित होना बड़ा कदम है। लेकिन, इसके क्रियान्वयन के लिए भारत को चीन की तरह ‘सशक्त नेतृत्व’ की जरूरत है।’ ग्लोबल टाइम्स ने एक लेख में कहा कि लंबे समय से प्रतीक्षित जीएसटी आखिरकार भारत में प्रभाव में आ गया और यह 1947 में भारत को मिली आजादी के बाद का सबसे बड़ा टैक्स सुधार है।

    उसने कहा, ‘अब मुख्य सवाल यह है कि क्या इस नए टैक्स सिस्टम को देश के 29 प्रांतों में प्रभावी ढंग से स्थापित किया जा सकता है और इसमें कितना समय लगेगा।’ अखबार ने कहा, ‘नोटबंदी और जीएसटी के साथ भारत अपनी अर्थव्यवस्था को एकरूपता देने के लिए व्यापक सुधारों को आगे बढ़ा रहा है और इसको आगे बढ़ाने में बड़े अवरोध होंगे।’

    अखबार ने कहा, ‘चीन में तेज आर्थिक विकास के लिए नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू कराने वाले सशक्त नेतृत्व जैसे ही नेतृत्व की भारत को जरूरत है ताकि वहां पूरे देश में सुधारों को लेकर पूर्ण अनुपालन हो सके।’ अखबार ने लिखा, ‘नीतियों को लागू करने के मामले में भारत अब भी चीन से कहीं पीछे है।’ हालांकि अखबार ने यह भी टिप्पणी की कि जीएसटी सही दिशा में उठाया गया, एक कदम है और भविष्य में इससे बड़े लाभ होंगे।

  • जीएसटी से सस्ती होंगी सेवाएं

    जीएसटी से सस्ती होंगी सेवाएं

    भोपाल,एस न्यूज इंडिया(अक्षांश चतुर्वेदी)। जी एस टी के विरोध व समर्थन में नेता बनने की फिराक में अपने-अपने तरीके से अफवाहें फैला रहे हैं जी एस टी की सही पड़ताल करने के लिए हमारे संवाददाता ने कर सलाहकारों से जीएसटी के संबंध में बातचीत की जिसके मुख्य अंश इस प्रकार है !

    *GST* सरल रूप में जानिए:
    नमो सरकार 1 जुलाई को गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) लागू करने जा रही है। सभी वस्तुओं एवं सेवाओं के लिए टैक्स की दरें तय हो गईं और करीब-करीब सभी नियमों को भी हरी झंडी मिल गई। लॉन्चिंग के लिहाज से अब जो थोड़ी-बहुत कमियां बच गई होंगी, उन्हें दूर करने के लिए 30 जून को जीएसटी काउंसिल की एक और मीटिंग होगी। आइये सब जानते हैं जीएसटी के बारे में सबकुछ…

    *1. क्या है जीएसटी?*
    वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) एकीकृत कर प्रणाली है। इसमें सभी अप्रत्यक्ष कर को मिला दिया गया है। अब हर राज्य में अलग-अलग कर नहीं लगेगा बल्कि देशभर के लिए एक जीएसटी होगा।

    *2. क्या जीएसटी उपभोक्ता को भी देना होगा?*
    इसमें सेवा कर भी शामिल है। इसलिए एसी रेस्त्रां में खाने, ट्रेन-हवाई यात्रा और अन्य सेवाओं पर उपभोक्ता को भी जीएसटी चुकाना होगा। लेकिन इसे संबंधित सेवा प्रदाता वसूलेंगे और जमा करेंगे।

    *3. क्या जीएसटी में सबको रिटर्न भरना होगा?*
    नहीं। केवल 20 लाख रुपये से अधिक का कारोबार करने वाले व्यक्ति या संस्थाएं ही जीएसटी चुकाएंगी।

    *4. आम आदमी को जीएसटी से कैसे फायदा होगा?*
    एक कर होने से कर के ऊपर कर नहीं चुकाना पड़ेगा। इससे वस्तु एवं सेवाएं सस्ती होंगी।

    *5. क्या जीएसटी में सभी तरह की वस्तुओं और सेवाओं पर कर की दर समान है?*
    नहीं। इसके तहत कर की चार श्रेणी है। इसमें 5 फीसदी,12 फीसदी, 18 फीसदी और 28 फीसदी है।
    *6. खाने-पीने के समान पर कितना कर लगेगा?*
    जीएसटी के तहत खाने-पीने के ज्यादातर सामान पर कोई कर नहीं है। जबकि कुछ वस्तुओं पर सबसे निचली दर पांच फीसदी की श्रेणी में रखा गया है।

    *7. क्या दूध और घी पर जीएसटी लगेगा?*
    दूध को जीएसटी से बाहर रखा गया है। जबकि घी पर जीएसटी लगेगा

    *8. काजू पर जीएसटी की दर क्या है?*
    इसपर पांच फीसदी जीएसटी लगेगा। पहले इसपर 12 फीसदी जीएसटी लगाने का प्रस्ताव था जिसे बाद में घटा दिया गया।

    *9. क्या बिक्री कर और वैट अलग से चुकाना होगा?*
    नहीं। जीएसटी में बिक्री कर, उत्पाद शुल्क, और मूल्यवर्द्धित कर (वैट) सबको मिल दिया गया है। इसलिए इन्हें अलग से चुकाने की जरूरत नहीं होगी।

    *10. क्या जीएसटी से चुंगी कर खत्म हो जाएगा?*
    हां। अब राज्यों में प्रवेश कर (चुंगी) खत्म हो जाएगा। इसे भी जीएसटी में मिला दिया गया है।

    *11. क्या जीएसटी से आयकर का बोझ घटेगा?*
    आयकर का जीएसटी से सीधे कोई संबंध नहीं है। लेकिन जीएसटी की वजह से कर वसूली बढ़ेगी तो भविष्य में इससे आयकर की दरों में राहत की उम्मीद कर सकते हैं।

    *12. जीएसटी से मकान के दाम बढ़ेंगे या कम होंगे?*
    इससे मकान के दाम घटेंगे। वर्तमान में निर्माणाधीन मकान पर 4.5 फीसदी का सेवा कर लगता है जो जीएसटी में बढ़कर 12 फीसदी हो जाएगा। इसके बावजूद मकान के दाम घटेंगे क्योंकि अभी निर्माण सामग्री पर उत्पाद शल्क, वैट और चुंगी कर है। लेकिन वतर्मान समय में इनका कोई इनपुट क्रेडिट (रिफंड) नहीं मिलता है। जबकि जीएसटी में पूरा क्रेडिट मिलेगा और बिल्डर इन सब चीजों पर जो कर चुकाएगा वह उसे वापस मिल जाएगा।

    *13. जीएसटी से कैसा सस्ता होगा मकान?*
    यदि ठेकेदार दो हजार रुपये प्रति वर्गफुट के हिसाब से बिल्डर से 18 फीसदी सेवा कर 360 रुपये प्रति वगर्फुट वसलूता है। इसके बाद बिल्डर फ्लैट का दाम तीन हजार रुपये प्रति वगर्फुट रखता है तो 12 फीसदी जीएसटी की दर 360 रुपये प्रति वगर्फुट कर बनेगा। 360 रुपयेप्रति वगर्फुट जीएसटी ठेकेदार पहले ही दे चुका है तो इस स्थिति मेंबिल्डर को कोई कर नहीं चुकाना होगा। इस स्थिति में खरीदार से भी वह सेवा कर नहीं वसूल सकता है।

    *14. हर माह की बिक्री का रिटर्न भरने की तारीख क्या होगी?*
    जीएसटी कानून के तहत एक महीने में की गई सभी प्रकार की बिक्री या कारोबार के लिए रिटर्न अगले महीने की 10 तारीख तक भरनी है। इसीलिए अगर जीएसटी 1 जुलाई से लागू होता है, तो बिक्री का आंकड़ा 10 अगस्त तक अपलोड करना है।

    *15. क्या रिटर्न के लिए कोई प्रारूप है जिसे देखकर रिटर्न भरा जा सकेगा?*
    25 जून तक जीएसटीएन पोर्टल पर एक्सेल शीट जारी की जाएगी। इससे करदाताओं को उस प्रारूप के बारे में पता चलेगा जिसमें सूचना देनी है।

    *16. रिटर्न का ब्योरा भरने का तरीका क्या होगा?*
    एक्सेल शीट में कंपनियों को रसीद (इनवायस) संख्या, खरीदार का जीएसटीआईएन, बेचे गये सामान या सेवाएं, वस्तुओं का मूल्य या बिक्रीकी गई सेवाएं, कर प्रभाव तथा भुगतान किए गये कर जैसे लेन-देन का ब्योरा देना होगा।

    *17. रिटर्न फॉर्म कब से मिलना शुरू होगा?*
    जीएसटी रिटर्न फार्म जुलाई के मध्य में उपलब्ध कराया जाएगा

    *18. किराने की दुकान में ग्राहक पांच-10 रुपए का भी सामान खरीदते हैं। क्या उनका भी बिल बनाना पड़ेगा?*
    खरीदार बिल मांगता है तो उसे देना पड़ेगा। नहीं चाहिए तो 200 रुपए से कम के सभी लेन-देन के बदले पूरे दिन में एक बिल बना सकते हैं। इनके खरीदार आम ग्राहक यानी अनरजिस्टर्ड होने चाहिए।

    *19. क्या सबको एक जैसा बिल बनाना है?*
    नहीं। जीएसटी करदाता इसका डिजाइन तैयार करने के लिए स्वतंत्र हैं।हालांकि, बिल बनाने के नियम के मुताबिक कुछ जरूरी जानकारियां उस परहोनी चाहिए।

    *20. जीएसटीएन पर पंजीकरण दोबारा कब शुरू होगा?*
    25 जून से जीएसटीएन पर पंजीकरण शुरू होगा।

    *21. क्या जीएसटी के लिए हमेशा इंटरनेट की जरूरत?*
    नहीं। केवल जीएसटी रिटर्न के लिए महीने में एक बार इंटरनेट की जरूरत होगी। हर रोज कंप्यूटर पर ब्योरा दर्ज करने की भी जरूरत नहींहै।

    *22. बिल ऑफ सप्लाई क्या है? कौन जारी करेगा?*
    कर से छूट वाली वस्तुएं एवं सेवाओं के लिए जो बिल बनेगा उसे बिल ऑफ सप्लाई कहा जाएगा। पंजीकृत व्यक्ति बिल की जगह इसे जारी करेगा। इसमें भी आम ग्राहक (अनरजिस्टर्ड ) व्यक्ति को 200 रुपए से कम की आपूर्ति के लिए बिल जरूरी नहीं है।

    *23. रिसीट और रिफंड वाउचर क्या है?*
    पंजीकृत कारोबारी को किसी वस्तु एवं सेवा के लिए अग्रिम (एडवांस) भुगतान मिलता है तो उसके बदले उसे रिसीट वाउचर बनाना पड़ेगा। बाद में वस्तु एवं सेवा की आपूर्ति नहीं हुई तो पैसे लौटाते वक्त रिफंडवाउचर बनेगा।

    *24. क्रेडिट और डेबिट नोट कब जारी होंगे?*
    आपूर्तिकर्ता ने जिस कीमत का कर का बिल बनाया और बाद में पता चला किकीमत कम है। तब वह क्रेडिट नोट जारी करेगा। इसी तरह यदि बाद में पताचलता है कि कीमत ज्यादा है तो डेबिट नोट जारी होगा। इसी तरह खरीदार ने सामान लौटाया या सामान की मात्रा कम निकली तब भी आपूर्तिकर्ता क्रेडिट नोट जारी करेगा।

    *25. क्या छोटे कारोबारियों के लिए बिल पर प्रोडक्ट कोड नंबर (एचएसएन) लिखना जरूरी है?*
    नहीं। जिनका सालाना कारोबार 1.5 करोड़ रुपए तक है उन्हें बिल पर एचएसएन कोड लिखने की जरूरत नहीं है।

    *26. टैक्स की रसीद या बिल कौन और कब जारी करेगा?*
    इसे जीएसटी के दायरे में आने वाले उत्पाद की आपूर्ति करने वाला पंजीकृत व्यक्ति जारी करेगा। सामान के लिए बिल उसे भेजने से पहले या भेजते वक्त जारी होगा। सेवाओं का बिल या रसीद आपूर्ति के 30 दिनबाद तक जारी किया जा सकता है।

    *27. क्या जीएसटी से महंगाई बढ़ने की आशंका है?*
    नहीं। सरकार का आकलन है कि जीएसटी से खुदरा महंगाई दो फीसदी तक घट सकती है।

  • स्किल समिट में अफसर बताएंगे रोजगार कैसे बढ़ाएं

    स्किल समिट में अफसर बताएंगे रोजगार कैसे बढ़ाएं

    भोपाल 29 मई। भोपाल में एक जून को होशंगाबाद रोड स्थित होटल आमेर ग्रीन में ग्लोबल स्किल एण्ड एम्पलायमेंट पार्टनरशिप समिट होने जा रही है। इसके लिये सभी तैयारियाँ की जा रही हैं। समिट में 6 सेमिनार भी होंगे, जिसमें विषय-विशेषज्ञ रोजगार के अवसर बढ़ाने पर व्याख्यान देंगे। समिट में उदघाटन सत्र प्रात: 9.30 बजे होगा। केन्द्रीय कौशल विकास एवं उद्यमिता राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री राजीव प्रताप रूड़ी मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहेंगे। उदघाटन सत्र की अध्यक्षता मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान करेंगे। समिट में देश-विदेश के 1500 प्रतिभागी मौजूद रहेंगे।

    वेबसाइट के माध्यम से रजिस्ट्रेशन

    ग्लोबल स्किल एण्ड एम्पलॉयमेंट पार्टनरशिप समिट में वेबसाइट के माध्यम से अब तक 2578 रजिस्ट्रेशन किये जा चुके हैं। इसमें 527 कम्पनी द्वारा 3 लाख 52 हजार 295 व्यक्ति को रोजगार उपलब्ध करवाने के लिये इंटेन्शन टू एम्पलाई तथा 332 कम्पनी द्वारा 2 लाख 96 हजार 129 युवाओं को कौशल विकास प्रदान करने के लिये इंटेन्शन टू स्किल दर्ज किये गये हैं।

    6 सत्र में होगी चर्चा

    ग्लोबल स्किल एण्ड एम्पलॉयमेंट पार्टनरशिप समिट के दौरान 6 सत्र होंगे। ‘विनिर्माण क्षेत्र में कौशल विकास और रोजगार के अवसर” पर होने वाले सत्र में उद्योग एवं रोजगार मंत्री श्री राजेन्द्र शुक्ल विचार रखेंगे। पूर्व मुख्य सचिव श्री अंटोनी डिसा का भी उदबोधन होगा। सत्र में विषय-विशेषज्ञ और उद्योग संघ के पदाधिकारी सत्र में पूछे जाने वाले सवालों का उत्तर देंगे।

    ‘उच्च शिक्षा के माध्यम से रोजगार के अवसर” विषय पर उच्च शिक्षा मंत्री श्री जयभान सिंह पवैया का उदबोधन होगा। प्रमुख सचिव उच्च शिक्षा श्री आशीष उपाध्याय ‘मध्यप्रदेश में उच्च शिक्षा का परिदृश्य” विषय पर वक्तव्य देंगे। प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा श्रीमती गौरी सिंह और विषय-विशेषज्ञ प्रतिभागियों के सवालों के उत्तर देंगे। समिट में ‘मध्यप्रदेश में स्व-रोजगार के अवसर” विषय पर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री संजय-सत्येन्द्र पाठक विचार रखेंगे। प्रमुख सचिव सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विभाग श्री व्ही.एल. कांताराव प्रदेश में रोजगार की संभावनाओं पर प्रस्तुतिकरण देंगे। प्रतिभागियों को स्व-रोजगार को सुगम बनाने में बैंक और वित्तीय संस्थाओं की भूमिका की जानकारी दी जायेगी।

    समिट के अगले सत्र में ‘युवाओं में कौशल उन्नयन के माध्यम से रोजगार के अवसर” पर प्रमुख सचिव तकनीकी शिक्षा और कौशल विकास श्रीमती कल्पना श्रीवास्तव प्रस्तुतिकरण देंगी। तकनीकी शिक्षा राज्य मंत्री श्री दीपक जोशी सत्र में अपना उदबोधन देंगे। महिलाओं के कौशल उन्नयन पर महिला-बाल विकास मंत्री श्रीमती अर्चना चिटनिस का उदबोधन होगा। प्रमुख सचिव महिला-बाल विकास श्री जे.एन. कंसोटिया प्रस्तुतिकरण के माध्यम से प्रदेश में महिलाओं के रोजगार के अवसरों पर विशेष जानकारी देंगे। ‘पर्यटन के क्षेत्र में कौशल विकास” विषय पर पर्यटन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री सुरेन्द्र पटवा का वक्तव्य होगा। पर्यटन विकास निगम के अध्यक्ष श्री तपन भौमिक प्रदेश में पर्यटन की संभावना पर विचार रखेंगे। सत्र के दौरान विषय-विशेषज्ञ प्रतिभागियों के सवालों का जवाब भी देंगे। छह सत्र के बाद समिट का समापन सत्र होगा।

  • हम देशसेवा कार्यों से करते हैं बातों से नहीं

    हम देशसेवा कार्यों से करते हैं बातों से नहीं


    कैथोलिक धर्मसभा में परिवार के महत्व पर चिंतन
    भोपाल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। भारतीय कैथोलिक धर्माध्यक्षीय सभा(सी.सी.बी.आई)ने भोपाल में परिवार के महत्व पर सात दिवसीय चिंतन कार्यक्रम आयोजित किया है। इस धर्मसभा में टूटते परिवारों को संवारकर राष्ट्र के विकास के तरीकों पर चिंतन किया जाएगा। धर्मसभा का आयोजन मुंबई से पधारे सी.सी.बी.आई के अध्यक्ष ओस्वाल्ड कार्डीनल ग्रेसीयस के मार्गदर्शन में किया जा रहा है।
    एशिया की सबसे बड़ी और विश्व की चौथी सबसे बड़ी धर्माध्यक्षीय महासभा में पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए भोपाल के आर्च बिशप लियो कार्नेलियो ने कहा कि हम अपने सेवा कार्यों से राष्ट्र सेवा करते हैं। केवल बयानबाजी पर हमारा कोई भरोसा नहीं। इस लिहाज से हम राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक हैं। उन्होंने कहा कि राजधानी में होने जा रहे इस आयोजन में हम परिवारों की सकारात्मक ऊर्जा का विस्तार करने और परिवारों को टूटने से बचाने जैसे कई मुद्दों पर विचार करेंगे। हमारे 132 धर्म प्रांतों और 182 धर्माध्यक्षों की धर्मसभा इन सूत्रों पर अमल करके राष्ट्र को मजबूत बनाने की दिशा में कार्य कर रहे हैं। पत्रकार वार्ता को सीसीबीआई के उपाध्यक्ष फिलीपे नेरी फेराव, महासचिव वर्गीज चक्कालाकल, उप महासचिव फादर इस्टीफन अलाटारा ने भी संबोधित किया।
    श्री ओस्वाल्ड कार्डीनल ग्रेसीयस ने कहा कि इस सम्मेलन के माध्यम से हम परिवारों में प्यार और खुशी का विस्तार करके सामाजिक ढांचे को मजबूती प्रदान करने के फार्मूलों पर चर्चा करेंगे। इस आयोजन में देश भर में फैली हमारी संस्थाओं के कामकाज पर विमर्श किया जाएगा। इसके साथ साथ हम उन संस्थाओं के कारोबार का भी सिंहावलोकन करेंगे। उन्होंने कहा कि गोवा समेत जिन चर्चों को विमुद्रीकरण के बाद आयकर के नोटिस प्राप्त हुए हमने उन सभी का जवाब दे दिया है। हम भारतीय संविधान के कानूनी दायरे में रहकर अपना कार्य करते हैं और पूरी जवाबदारी के साथ वैधानिक संव्यवहार करते हैं।उन्होंने कहा कि विमुद्रीकरण के बाद अन्य कारोबारों की तरह सभी धार्मिक संस्थाओं को भी अपने खातों और मुद्राओं के नवीनीकरण की प्रक्रिया करनी पड़ी है। इसमें हम कोई अलग नहीं हैं।
    धर्मांतरण के मुद्दे पर आर्चबिशप लियो कार्नेलियो ने कहा कि कोई भी किसी को जबरन अपना धर्म बदलने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। हम लोगों को जगाने और प्रेम से रहने का संदेश देते हैं।लोगों का धर्म परिवर्तन करना उनका मनोभाव है। ये केवल ईश्वर की कृपा से ही हो सकता है। हम देश में कम संख्या में हैं इसलिए हम पर आरोप लगा दिए जाते हैं। उन्होंने सवाल किया कि घर वापिसी जैसे कार्यक्रमों को क्या धर्मांतरण नहीं कहा जाएगा।
    मध्यप्रदेश में ईसाई समाज के सामने क्या चुनौतियां हैं इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि यहां के मुख्यमंत्री हों या सरकार कोई भी संवैधानिक दायरे में ही काम करते हैं। इनसे हमें कभी कोई परेशानी महसूस नहीं हुई। कुछ छुटपुट लोग यदा कदा हिंसा फैलाते रहते हैं जिनमें आमतौर पर न्याय नहीं हो पाता है।
    परिवार वाद बनाम राष्ट्रवाद के बीच विरोधाभासों के सवाल पर आर्चबिशप ने कहा कि राष्ट्रवाद का विचार हम सभी पर समान रूप से लागू होता है। हम अपने कार्यों से राष्ट्र की सेवा करते हैं, नारा लगाकर थोथी राष्ट्रभक्ति करना हमारा स्वभाव नहीं है। हम देश के प्रति पूरी बफादारी रखते हैं और देश को मजबूत बनाने के अपने लक्ष्यों पर पूरी ईमानदारी के साथ अमल भी करते हैं।
    प्रेस को जानकारी देते हुए कांन्फ्रेंस आफ कैथोलिक बिशप्स आफ इंडिया के भोपाल चैप्टर के मीडिया प्रभारी फादर मारिया स्टीफन ने बताया कि 29 वीं अखिल भारतीय कैथोलिक धर्माध्यक्षीय महासभा का आयोजन कल 31 जनवरी से 8 फरवरी 2017 तक किया जा रहा है। भोपाल धर्म प्रांत आशानिकेतन केम्पस स्थित पास्ट्रल सेंटर में इस आयोजन की मेजबानी करेगा। इस आयोजन का मूल एजेंडा परिवारों में प्रेम के आनंद को बढ़ाना है। हम देश भर में फैले अपने धर्म प्रांतों के माध्यम से आम नागरिकों के बीच प्रेम का जो ताना बाना बुन सकते हैं उन तरीकों पर चर्चा करके हम अपनी कार्यप्रणाली में कसावट लाने का प्रयास करेंगे।
    महासभा की शुरुआत यूखारिस्तीय पूजन विधि समारोह के साथ होगी। उद्घाटन सभा की अध्यक्षता भारतीय कैथोलिक धर्माध्यक्षीय महासभा एवं एशियाई कैथोलिक धर्माध्यक्षीय महासभा के अध्यक्ष एवं मुंबई के महाधर्माध्यक्ष ओस्वाल्ड कार्डिनल ग्रेशियस करेंगे।
    इस आयोजन में सीसीबीआई के नए पदाधिकारियों का चुनाव भी किया जाएगा। बैठक में भारतीय कलीसिया की वर्तमान स्थिति पर भी विचार विमर्श किया जाएगा।

  • कृषि को उद्योग बनाने की तैयारी-भाजपा

    कृषि को उद्योग बनाने की तैयारी-भाजपा

    सागर। भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश कार्यसमिति बैठक के दूसरे सत्र में संभागशः बैठकें आयोजित की गयी। तृतीय सत्र में कृषि प्रस्ताव पार्टी के प्रदेश महामंत्री श्री बंशीलाल गुर्जर ने प्रस्तुत किया। समर्थन किसान मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष श्री रणवीर सिंह रावत एवं पार्टी के प्रदेश मंत्री श्री बुद्धसेन पटेल ने किया।
    चौथे सत्र में नर्मदा सेवा यात्रा को लेकर पार्टी के प्रदेश महामंत्री श्री विष्णुदत्त शर्मा का उदबोधन, प्रशिक्षण वर्ग को लेकर प्रशिक्षण प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक श्री अरविन्द कवठेकर, जन्मशताब्दी विस्तारक वर्ग को लेकर प्रदेश मंत्री श्री पंकज जोशी एवं प्रदेश के जनजातीय क्षेत्र 52 नगरपालिकाओं को लेकर प्रदेश उपाध्यक्ष श्री रामेश्वर शर्मा ने विस्तार से प्रकाश डाला।
    कृषि प्रस्ताव इस प्रकार है –
    कृषि प्रस्ताव
    भाईयों और बहनों,
    सागर की पावन धरा पर आप सभी का स्वागत, अभिनन्दन। यह भूमि हमारी नैत्री राजमाता विजयाराजे सिंधिया की जन्म स्थली हैं। आप सभी जानते हैं कि यह दानवीर डॉ. हरिसिहं गौर की जन्म स्थली हैं। उन्होने शिक्षा के लिये अपने आप को समर्पित किया तथा जीवन की सारी कमाई जनता को शिक्षित करने के लिये लगाकर सागर विश्व विद्यालय की स्थापना की। यह लाखा बंजारा की समर्पण स्थली हैं। सागर महान चिन्तक आचार्य रजनीश की चिन्तन स्थली हैं। प्रसिद्ध कवि पदमाकर की नगरी हैं।

    भाईयों और बहनों, जब देश 1947 में आजाद हुआ तब देश की जनसंख्या 33 करोड़ के लगभग थी। 75 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या गांव में रहती थी। 75 प्रतिशत नागरिक खेती करते थे। देश की जी.डी.पी. में कृषि का योगदान 60 प्रतिशत था। आजादी के बाद किसानों को उम्मीद थी की अब हमारी सरकार बनी हैं। खेती के दिन अच्छे आयेंगे व देश की जी.डी.पी. में खेती का योगदान 75 प्रतिशत हो जायेगा। लेकिन हुआ इसका उल्टा तत्कालीन सरकारों ने देश के 75 प्रतिशत जनसंख्या के धंधे को अपने एजेण्डे में स्थान नहीं दिया,उन्होने खेती व किसानों की उपेक्षा की, परिणाम हमारे समाने हैं। देश की आजादी के 70 साल बाद भी गावों में 70 प्रतिशत जनसंख्या रहती हैं। 62 से 65 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर आश्रित हैं। देश की जी.डी.पी. में कृशि का योगदान लगभग 14 प्रतिशत हैं। अब हम कल्पना कर सकते हैं की 65 प्रतिशत जनसंख्या 14 प्रतिशत में गुजारा करती हैं तो उनकी हालत क्या होगी।

    भाईयों और बहनों, खेती की दुर्दशा को जिस महापुरूश ने पहली बार पहचाना वो हैं हमारे पूर्व प्रधानमंत्री मा. अटल बिहारी वाजपेयी जी। मा. अटल जी ने अपनी सरकार के एजेण्डे में कृशि व किसान को प्रमुख स्थान पर रखा पहली बार खेती में वित्तीय प्रवाह को तेज करते हुये किसान क्रेडिट कार्ड योजना व आपदा प्रबंधन के लिये फसल बीमा योजना प्रारंभ की। हमें खुशी हैं कि मा. अटल जी की इसी परम्परा को आगे बढाने में मा. नरेन्द्र मोदी जी की नेतृत्व वाली केन्द्र की एन.डी.ए. सरकार एवं मा. शिवराजसिंह जी चौहान के नेतृत्व वाली मध्यप्रदेश की भा.ज.पा. सरकार महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

    भाईयों और बहनों, हम सब जानते हैं की म.प्र. की आय का प्रमुख साधन कृशि हैं। म.प्र. की कृशि एवं किसान वर्श 2003 से पूर्व असहाय थे। म.प्र. की गिनती अति पिछडे़ राज्यों में होती थी। राज्य की कृषि विकास दर राष्ट्रीय कृषि विकास दर से कम होती थी। 2003 में भा.ज.पा. सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री मा. शिवराजसिंह जी चौहान ने कृशि व किसान को सरकार के एजेण्डें में प्रमुख स्थान पर लिया। कृषि उत्पादन में सहयोगी तमाम योजनाओं पर सरकार ने तेज गति से काम किया, उसी का परिणाम हैं की आज म.प्र. की कृषि विकास दर 24.99 प्रतिशत तक पहुंची हैं।
    मित्रों कभी कृषि के लिये उद्योग के दर्जे की मांग की जाती रही हैं, वजह बहुत साफ हैं उद्योग में वित्तीय प्रवाह की निरंतरता (वित्तीय प्रबंधन) तथा आपदा प्रबंधन की व्यवस्था, विद्युत प्रदाय में प्राथमिकता। वित्तीय प्रवाह में ब्याज अनुदान नवीन उद्योगों को उत्पादन के आरंभिक वर्शो में विभिन्न करो से छुट आदि सुविधाएं दी जाती हैं। इसलिये किसान उद्योगों की सुविधाओं को देखकर कृशि के लिये उद्योग के दर्जे की मांग करते रहे हैं।

    भाईयों और बहनों, म.प्र. में मा. शिवराजसिंह जी चैहान के नेतृत्व वाली भा.ज.पा सरकार ने किसानों की खेती को उद्योग के दर्जे वाली भावना को समझते हुये उस पर काम करना आरंभ किया। सरकार ने उन प्राथमिकताओं को कृशि में अपनाया जो उद्योगों के प्रोत्साहन में अपनायी जाती हैं।
    वित्तीय प्रबंधन:-म.प्र. सरकार भा.ज.पा. की मा. शिवराजसिंह चैहान के नेतृत्व वाली सरकार ने कृशि में वित्तीय प्रबंधन में अभूतपूर्व काम किया हैं। कृशि में निजी निवेश के साथ-साथ शासकीय स्तर पर सहकारिता के माध्यम से ब्याज दरों को कम करते – करते अब जीरो प्रतिशत ब्याज दर पर अब किसानों को कर्ज दिये जा रहे हैं। इस वर्श 15000 हजार करोड़ रूपये के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को प्राप्त करने का निर्णय म.प्र. सरकार ने लिया हैं। इससे कृशि में वित्तीय प्रवाह तेज हुआ तथा कृशि विकास का लक्ष्य प्राप्त करते हुये दलहन-तिलहन उत्पादन में देश में हम अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। खाद्यान्न उत्पादन मे हम दुसरे स्थान पर हैं। दुग्ध उत्पादन में राश्ट्रीय वृद्धि दर 6.27 प्रतिशत हैं वही मध्यप्रदेश में वृद्धि दर 12.70 प्रतिशत रही हैं।

    निर्बाध विद्युत प्रदाय:-भा.ज.पा. सरकार से पहले कांग्रेस सरकार के समय खेती के लिये बिजली की स्थिति बहुत खराब थी। 4 घण्टे भी बिजली किसानों को नहीं मिल पा रही थी। आज म.प्र. के किसानों को निर्बाध 10 घण्टे बिजली कृशि कार्य के लिये दी जा रही हैं। निर्बाध बिजली मिलने से किसानों के काम करने का उत्साह बढ़ा हैं।

    हमारी म.प्र. सरकार ने कृशि विद्युत प्रवाह की निरंतरता के लिये 90 हजार से अधिक अस्थाई कनेक्शनों को स्थाई कनेक्शन करने के लिये 1100 सौ करोड़ से अधिक का अनुदान दिया हैं। कृशि के लिये उपयोग की जानी वाली बिजली बिलों को 2 तिहाई भुगतान म.प्र. सरकार द्वारा किया जा रहा हैं तथा सरकार ने किसानों को बिजली बिलों के भुगतान के लिये 3830 करोड़ रूपये को टेरिफ सब्सिडी के लिये बजट प्रावधान किया हैं। साथ ही 5 एच.पी. के कृशि पम्पों, थ्रेशरों तथा एक बत्ती विद्युत प्रदाय हेतु 2000 हजार करोड रू. का प्रावधान किया हैं। कृशि सिंचाई के लिये जहां आसानी से विद्युत आपूर्ति नहीं की जा सकती वहां सरकार द्वारा किसानों को सौर उर्जा के उपयोग के लिये अनुदान पर सोलर पम्प योजना लागु की जा रही हैं।

    हर खेत को पानी-हर हाथ को काम:- पं. दीनदयाल उपाध्याय जी की संकल्पना हर खेत को पानी हर हाथ को काम को साकार करने के लिये भा.ज.पा नेतृत्व वाली मध्यप्रदेश सरकार ने सिंचाई के लिये 6752 करोड़ रूपय, नर्मदा घाटी विकास के लिये 1212 करोड़ रूपये के बजट प्रावधान कर सिंचाई का रकबा 40 लाख हेक्टर तक पहुंचाकर हर हाथ को काम के लक्ष्य को प्राप्त करने की ओर तेजी से अपने कदम बढायें हैं।
    आपदा प्रबंधनः-म.प्र. देश का ऐसा राज्य हैं जहां कृशि में आपदा प्रबंधन में अग्रणीय भूमिका म.प्र. सरकार ने निभाई हैं। गत वर्श अतिवर्शा व अवर्शा के कारण फसलों की बर्बादी की आपदा प्रदेश में आयी। मा. मुख्यमंत्री शिवराजसिंह जी चैहान ने आपदा के समय किसानों के बीच जाकर उन्हे भरोसा दिलाया की म.प्र. सरकार किसानों के साथ हैं। इसी भरोसे का परिणाम हैं कि किसान आपदा के समय भी मैदान में डटा रहा।
    मा. मुख्यमंत्री ने नुकसानी की परिस्थितियों को देखते हुये किसानों को 4700 करोड़ रूपये से अधिक का मुआवजा तत्काल वितरण कराया, साथ ही उन्हे भरोसा दिलाया की सरकार किसानों को फसल बीमा भी दिलायेंगी। मा. मुख्यमंत्री जी ने बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन से 10 दिसम्बर को फसल बीमा राशि का वितरण किया व पूरे म.प्र. के लाखों किसान परिवारों को 4414 करोड़ रूपये से अधिक की फसल बीमा राशि वितरीत की गई। आज हम कह सकते हैं की म.प्र. आपदा प्रबंधन में अग्रणी भूमिका निभा रहा हैं।

    बेहतर विपणन:-म.प्र. की भा.ज.पा सरकार उत्पादन में तो अग्रणी भूमिका निभा रही हैं। साथ ही किसानों के उत्पाद की बेहतर बिक्री की व्यवस्था भी सरकार द्वारा की जा रही हैं। विमुद्रीकरण के बाद पूरे देश की मण्डियों में खरीदी-बिक्री बंद हो गई, उस समय मा. मुख्यमंत्री शिवराजसिंह जी चैहान ने आगे आते हुये किसानों की फसलों की खरीदी का भरोसा दिलाया, साथ ही किसानों की उपज धान सर्मथन मूल्य पर खरीदी सुनिश्चित की। मण्डियों में अन्य फसलों की बिक्री का भुगतान निर्बाध गति से आर.टी.जी.एस., एन.एफ.टी. व चेक व्यवस्था से सुनिश्चित कर किसानों की कृशि उपज का बेहतर विपणन सुनिश्चित किया गया हैं। हम कह सकते हैं कि म.प्र. देश का पहला ऐसा राज्य हैं जहां विमुद्रीकरण के बाद सर्वप्रथम किसानों की फसलों की बिक्री प्रारंभ हुई व सभी राज्यों ने म.प्र. का अनुसरण किया हैं।

    भाईयों और बहनों, मा. नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार ने कृशि में क्रांतिकारी परिर्वतन लाने के लिये महत्वपूर्ण पहलें की हैं:-
    प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना:-
    · किसानों को प्राकृति आपदा किट व्याधि प्रकोप आदि के कारण फसलों में होने वाले आर्थिक नुकसान से बचाने के लिये तथा कृषि के क्षैत्र में रिस्क मेनेजमेंट की व्यवस्था बनाने तथा वित्तिय सुदृढ़ता प्रदान करने किसानों को कृशि के माध्यम से सत्त आय प्राप्त हो तथा कृषि क्षैत्र में स्थायीत्व देने के लिये इस योजना को लाया गया हैं। इस वर्ष म.प्र. के लगभग 40 लाख किसानों ने इस योजना में भागीदारी की है।

    कृषि के लिये वित्तीय प्रबंधन:-हमारेयशस्वी प्रधानमंत्री मा. नरेन्द्र मोदी जी ने कृषि व किसानों को खेती के लिये बेहतर वित्तीय प्रबंधन के लिये अब तक का सार्वाधिक ऋण लक्ष्य 9 लाख करोड़ रूपये के बजट प्रावधान किये। साथ ही ब्याज अनुदान के लिये 15 हजार करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया हैं।केन्द्र सरकार ने कृशि बजट बढ़ाकर 35984 करोड़ रूपये किया गया हैं। साथ ही पानी को अपनी प्राथमिकता सूची में रखते हुये प्रधानमंत्री कृशि सिंचाई योजना को मिशन मोड पर लाते हुये इसके अधिन 28.5 लाख हेक्टेयर क्षैत्रफल को लाया गया हैं।

    · नाबार्ड में लगभग 20000 (बीस हजार करोड़) रूपये की प्रारंभिक निधि से एक समर्पित दीर्घावधिक सिंचाई निधि सृजित की गई जिससे सिंचाई योजनाओं का काम सत्त चलता रहे।
    · मनरेगा के तहत वर्शापोशित क्षेत्रों में 5 लाख फार्म तालाबों और कुओं तथा जैविक खाद के उत्पादन के लिये 10 लाख कम्पोस्ट गड्ढों का निर्माण कार्य प्रारंभ किया जा रहा हैं।
    · नीम कोटेड यूरिया वितरण व्यवस्था:- प्रधानमंत्री मा. नरेन्द्र मोदी जी ने यूरिया की कालाबाजारी रोकने तथा यूरिया का गैर कृषि उपयोग रोकने के लिये नीम कोटेड यूरिया किसानों को वितरण किये जाने का निर्णय किया, जिससे नीम कोटेड यूरिया की उच्च गुणवत्ता से उत्पादन बढ़ा तथा कालाबाजारी रूकी।

    राष्ट्रीय कृषि बाजार:- देश के कृषि विपणन को बेहतर बनाने के लिये राष्ट्रीय कृषि बाजार के साथ साझे ई-बाजार की व्यवस्था करने के लिये एकीकृत कृशि विपणन ई-प्लेटफार्म प्रारंभ किया गया। जिससे देश के किसानों को पूरे विश्व बाजार की जानकारी मिल सकेगी साथ ही विश्व बाजार के भाव भी किसान जान सकेंगे। बडे़ खरीददार भी राष्ट्रीय कृषि बाजार से जुड़कर सीधे किसानों की कृषि उपज खरीदने का लाभ ले सकेंगे। बिचोलियों की भूमिका समाप्त होगी। किसान शोषण से छुटकारा पायेगा तथा किसानों को उनकी उपजों का अच्छा मूल्य प्राप्त हो सकेंगा। म.प्र. की 51 मण्डियां ई-नेम से जुड रही हैं। इससे कृशि विपणन और बेहतर होगा।
    विमुद्रीकरण एक सशक्त आर्थिक परिर्वतन:- मा. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने 8 नवम्बर 2016 को देश के इतिहास में एक सशक्त आर्थिक कदम उठाते हुये 1000 व 500 के नोट को बंद किया इसके अन्य फायदों के साथ-साथ आर्थिक जगत में भारतीय अर्थ व्यवस्था सुदृढ़ होगी, उससे विकास तेजी से होगा। इसका लाभ किसानों को सर्वप्रथम देने के लिये मा. प्रधानमंत्री जी ने 31 दिसम्बर 2016 को देश को संबोधित करते हुये किसानों के लिये सशक्त पहलंे की हैं:-
    1. किसानों के कृशि ऋण पर 60 दिन का ब्याज भारत सरकार चुकायेगी। इस पहल से किसानों को लगभग 18 हजार करोड़ रूपये का लाभ होने का अनुमान हैं, जो किसानों के लिये बड़ी सौगात हैं।
    2. किसानों के 3 करोड़ किसान क्रेडिट कार्ड को रूपी कार्ड में बदला जायेगा।
    3. किसानों को सहकारी संस्थाओं के माध्यम से दिये जाने वाले कर्ज को दुगना करने के लिये 20 हजार करोड़ रूपये की अतिरिक्त व्यवस्था नाबार्ड के माध्यम से की जायेगी।
    भाईयों और बहनों, हमारी सरकारें सुगम वित्तीय प्रबंधन के माध्यम से बेहतर जल प्रबंधन करते हुये उत्पादन बढाने के साथ-साथ उत्पादकता बढाने की व्यवस्थाएंकर रही हैं। साथ ही किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के साथ-साथ मूल्य संर्वधित मूल्य दिलाने की भी सरकारें पहलें कर रही हैं। हम पूरा विश्वास करते हैं कि हमारी सरकारों की पहलों से 2022 तक किसानों की आमदनी दुगनी करने के लक्ष्य को प्राप्त करेंगे। इस प्रस्ताव के माध्यम से हम प्रधानमंत्री मा. नरेन्द्र मोदी जी, मुख्यमंत्री मा. शिवराजसिंह चौहान जी को धन्यवाद देते हैं।
    बहुत-बहुत धन्यवाद
    ’’ जय जवान – जय किसान – जय मध्यप्रदेश – भारत माता की जय ’’

  • कर्ज से गुलछर्रे उड़ाने वालों की दहशत

    कर्ज से गुलछर्रे उड़ाने वालों की दहशत

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    देश में विमुद्रीकरण की आंधी ने जनता के नाम पर कर्ज लेकर गुलछर्रे उड़ाने वाले तथाकथित उद्योगपतियों की नींदें उड़ा दी हैं। विकास योजनाओं के नाम पर कर्ज लेने वाले और गुल्ली करने वाले राजनेताओं की भी जान सांसत में है। उन्होंने विकास योजनाओं पर लिए साफ्ट लोन की राशि को गुल्ली कर लिया था।ये धन उन्होंने मंहगी ब्याज दरों पर भूमाफिया, बिल्डरों, उद्योगपतियों को उपलब्ध करा रखा था ।अबउसे ताबड़तोड़ ढंग से वापस जमा करने की चुनौती ने उनकी नींदें उड़ा दी हैं। नतीजा ये है कि नेताओं और उद्योगपतियों के इस गठजोड़ ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना लगाना शुरु कर दिया है। आज मध्यप्रदेश के एक अखबार ने संपादकीय लिखा है जिसमें कहा गया है कि सरकार लोगों को नहींसमझा पाई है कि उसने जनता की गाढ़ी कमाई और महिलाओं के बचाकर रखे गए धन को हलक में हाथ डालकर निकाल लिया है वह लोगों के विकास में ही उपयोग की जाएगी। इस तरह की हल्की बातों को कहकर ये गैर जिम्मेदार अखबार विमुद्रीकरण के फैसले के खिलाफ जनमत तैयार करने का काम कर रहा है। ये अखबार ये भी कह रहा है कि विमुद्रीकरण का फैसला केवल और केवल प्रधानमंत्री मोदी ने लिया है। ये बात सही है कि विमुद्रीकरण का फैसला लिए जाते समय पूरी गोपनीयत बरती गई थी। लेकिन ये फैसला सुविचारित ढंग से देश के जिम्मेदार लोगों ने लिया है। सेना के तीनों अध्यक्षों को इसके लिए विश्वास में लिया गया। रिजर्व बैंक के अफसरों, वित्तीय सलाहकारों, और उन तमाम लोगों को भरोसे में लिया गया जो देश की नीति निर्धारण में बड़ी भूमिका निभाते हैं। इसके बावजूद बौखलाए सूदखोर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ जनमत जगाने में जुट गए हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि उन्होंने वैश्विक मुद्राकोषों से लिए गए जिस साफ्टलोन को मंहगी ब्याजदरों पर बाजार में चला रखा था उसे वे समयसीमा के भीतर वापस कैसे जमा करा सकेंगे। यदि उन्होंने ये धन घोषित नहीं किया तो वह मिट्टी हो जाएगा, और यदि घोषित करते हैं तो जेल जाने के हकदार होंगे। शायद इसीलिए वे जनता की परेशानियों का हवाला देकर तरह तरह की खबरें अखबारों में छपवा रहे हैं। उन घटनाओं को खबर बनाया जा रहा है जिसमें लोग बैक की लाईनों में खड़े होकर अपनी कमजोरियों के कारण बेहोश हो गए या उनकी मौत हो गई। ये सब माहौल वे बना रहे हैं जिन्हें जनता का धन हड़प करने के कारण अपनी मौत करीब नजर आ रही है। खुद भारतीय जनता पार्टी के नेता इस फैसले से अचंभित हैं। उन्हें लग रहा है कि ये फैसला उनकी मौत की वजह बनने जा रहा है। अब तक विकास के नाम पर भाजपा की सरकारों ने भी कांग्रेस की सरकारों की ही तरह भारी कर्ज ले रखा था। इस धन को उन्होंने फर्जी कंपनियों के माध्यम से शेयर मार्केट में भी लगा ऱखा था। जमीनों के भाव अनाप शनाप बढ़ाकर उन्होंने रियल स्टेट सेक्टर में भी भारी निवेश कर ऱखा था। मकानों की जमाखोरी को बढ़ावा देकर वे उस साफ्टलोन से करोड़ों रुपए उलीच रहे थे। सरकार के इस एक फैसले ने उनकी तमाम अय्याशियों को धरातल पर ला दिया है। इसलिए वे ऊपरी तौर से तो भले ही प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ कर रहे हैं लेकिन छिपकर वे भारत सरकार पर भी प्रहार करने से बाज नहीं आ रहे हैं। वे भूल गए हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमेशा से भारतीय अर्थव्यवस्था को नई कसावट देने का पक्षधर रहा है। भाजपा और आरएसएस के चिंतकों का एक बड़ा वर्ग नोटों से महात्मा गांधी की फोटो हटाने के पक्षधर रहे हैं। सच भी तो है महात्मा गांधी अपरिग्रह के पक्षधर थे और वे पूंजी के अधिक उपयोग के विरोधी थे। गांधीवाद वास्तव में पूंजी के विरोध पर टिका था जबकि पूंजीवाद लोगों की भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करके सुलझे समाज के निर्माण की बात करता है। ये दोनों विचार परस्पर विरोधी हैं इसलिए अब गांधी को विसर्जित करने का समय आ गया है। महात्मा गांधी को मुख्य धारा से हटाए बगैर हम सुखी समाज के निर्माण का अपना लक्ष्य नहीं पा सकते हैं। अब जबकि भारत ने पूंजीवाद के रास्ते पर पच्चीस सालों तक चलने के बाद ठोस फैसले लेकर पूंजीवाद को सफल बनाने की रणनीति पर काम शुरु कर दिया है तब ये सूदखोरों की लाबी इस फैसले की आलोचना में जुट गई है। वास्तव में विमुद्रीकरण का फैसला जनता के लिए जितना परेशान नहीं कर रहा उतना ये भ्रष्टाचारियों और शोषकों सिर पर लटकी तलवार साबित हो रहा है।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना सिर्फ एक बात पर की जा सकती है कि वे नए नोटों को गांधी से मुक्ति नहीं दिला सके हैं। शायद उन्होंने पूंजी को मजबूती देने के लिए अभी गांधी से पंगा लेने से बचने की रणनीति अपनाई है। इसके बावजूद विमुद्रीकरण जिस तरह देश की मुद्रा को मजबूती देने मे मील का पत्थर साबित होने वाला है उससे गरीबों के नाम पर शोषण का दुष्चक्र चलाने वालों की नींदें तो उड़ गई हैं। जनता को उसके अपने हित की रक्षा में लड़ रही इस सरकार के हाथ मजबूत करने के लिए आगे आना होगा। प्रधानमंत्री ने वाकई बड़ा पंगा लिया है और हमें समझना होगा कि राष्ट्रभक्ति के इस अनुष्ठान में आगे बढ़कर अपना योगदान देेने का सही वक्त आ गया है।

  • धन की धुलाई में जुटे लोगों पर गाज गिरेगी

    धन की धुलाई में जुटे लोगों पर गाज गिरेगी

    The Prime Minister, Shri Narendra Modi being received on his arrival at Varanasi, Uttar Pradesh on November 14, 2016.
    The Prime Minister, Shri Narendra Modi being received on his arrival at Varanasi, Uttar Pradesh on November 14, 2016.

    नईदिल्ली(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।
    18-नवंबर, 2016

    अपने काले धन को नए नोटों में परिवर्तित करने के लिए अन्य व्यक्तियों के बैंक खातों का उपयोग करने वाले कर चोरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी

    इस उद्देश्‍य के लिए अपने बैंक खातों के दुरुपयोग की अनु‍मति देने वाले लोगों पर उकसाने के लिए आयकर अधिनियम के तहत मुकदमा चल सकता है, सरकार ने लोगों से अपील की है कि वे काले धन को परिवर्तित करने वालों के लालच में न आएं और इस तरीके से काले धन को सफेद करने के अपराध में भागीदार न बनें तथा इसे समाप्‍त करने में सरकार से जुड़कर उसकी मदद करें

    सरकार ने पहले इस आशय की घोषणा की थी कि कारीगरों, कामगारों, गृहणियों इत्‍यादि द्वारा बैंकों में जमा की जाने वाली छोटी राशियों पर आयकर विभाग वर्तमान आयकर छूट सीमा के 2.5 लाख रुपये रहने के तथ्‍य को ध्‍यान में रखते हुए कोई भी सवाल नहीं करेगा। इस बीच, ऐसी जानकारियां मिली हैं कि कुछ लोग अपने काले धन को नये नोटों में बदलने के लिए अन्‍य व्‍यक्तियों के बैंक खातों का उपयोग कर रहे हैं, जिसके लिए उन खाताधारकों को इनाम भी दिया जा रहा है जो अपने खातों के इस्‍तेमाल की अनुमति देने पर सहमत हो जाते हैं। इस तरह की गतिविधि जन धन खातों में भी होने की सूचना मिली है।
    यह स्‍पष्‍ट किया गया है कि यदि यह बात साबित हो जाती है कि किसी बैंक खाते में जमा की गई राशि खाताधारक के बज़ाय किसी और व्‍यक्ति की है तो इस तरह की कर चोरी पर आयकर के साथ-साथ जुर्माना भी लगाया जा सकता है। यही नहीं, जो व्‍यक्ति इस उद्देश्‍य के लिए अपने खाते के दुरुपयोग की अनुमति देगा उस पर उकसाने के लिए आयकर अधिनियम के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है।
    हालांकि, अपनी ही नकद बचत राशि को बैंक खाते में जमा करने वाले वास्‍तविक व्‍यक्तियों से कोई भी सवाल नहीं पूछा जायेगा।

  • चाईना बोला तो मिर्ची लगी

    चाईना बोला तो मिर्ची लगी

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    चीन के सरकारी मीडिया का कहना है कि चीनी माल पर प्रतिबंध लगाने के मामले में भारत केवल भौंक सकता है चीनी माल का मुकाबला नहीं कर सकता। देसी अंदाज में की गई इस टिप्पणी से पूरे हिंदुस्तान में नाराजगी का माहौल है। इसकी वजह ये है कि आम भारतीय केवल बात नहीं करता वह बदलाव के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता है। हिंदुस्तान के साधुओं की तपस्या और युद्ध के मैदान में मौत को गले लगा लेने वाले रणबांकुरों की बहादुरी देखकर हिंदुस्तानियों की असीमित शक्तियों का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। इसलिए ये बयान आम भारतीयों को कचोट रहा है। चीन का सरकारी मीडिया हो या स्वयं सरकार किसी को ये मुगालता नहीं पालना चाहिए कि हिंदुस्तान कुछ नहीं कर सकता। इस तरह का ओछा बयान देने से ज्यादा नुक्सान चीन का ही होने वाला है। यदि सवा सौ करोड़ हिंदुस्तानियों ने ठान लिया तो वे चीन के माल की होलियां जलाकर पूरा कारोबार ठप कर देंगे।

    चीनियों को नहीं भूलना चाहिए कि अंग्रेजों को भगाने के लिए इसी हिंदुस्तान में विदेशी कपड़ों की होलियां जलाई जाती रहीं हैं। ये बात अलग है कि आजादी के बाद नेहरू इंदिरा की धूर्त कांग्रेस ने देश के लहू में मक्कारी का जहर भर दिया है। एक महान देश को जातियों, संप्रदायों में बांट दिया है। आरक्षण के जहर से प्रतिभाओं को सरेराह कत्ल किया है। सुअर सरकारीकरण थोपकर देश की मुद्रा को भिखारी बना दिया है। आज अड़सठ रुपए का डालर बिके तो जाहिर है कि आम हिंदुस्तानी कितनी भी मेहनत क्यूं न कर ले पर वह चीन के बराबर सस्ता माल नहीं दे सकता। चीन की मुद्रा इतनी ताकतवर है कि वह कच्चे माल को बहुत थोड़ी लागत लगाकर बाजार में फेंक देता है। अब इतने सस्ते माल का मुकाबला भला कोई भी देश कैसे कर सकता है। चीन ने इसी हिकमत के बल पर न केवल हिंदुस्तान बल्कि दुनिया के तमाम देशों के बाजारों को अपने माल से पाट दिया है। वो ये सब केवल इसलिए कर सका क्योंकि वहां लोकतंत्र नहीं है। आम आदमी को मनचीता करने की आजादी नहीं है। जबकि हिंदुस्तान में तो जितने मुंह उतनी बातें। हर नागरिक शहंशाह है। राजतंत्र के दौर में एक राजा होता था जो यदि अच्छा हो तो पूरा राज्य सुगंधित विकास से भर जाता था और यदि मूर्ख हो तो कुशासन का अभिशाप उस राज्य को दूसरे शासक के हाथों विजित करा देता था। चीन का ये भड़काऊ बयान उस दौर में आया है जब हिंदुस्तान की महान जनता ने कांग्रेस के कुशासन को उखाड़ फेंका है। उसने उम्मीदों की एक नई सुबह के इंतजार में सत्ता की बागडोर नरेन्द्र मोदी जैसे सशक्त नेतृत्व के हाथों में सौंपी है।

    नरेन्द्र मोदी भारतीय जनता पार्टी की उस पाठशाला में पले बढ़े हैं जिसे संघ के तपोनिष्ठ स्वयंसेवकों ने अपने खून पसीने से सींचा है। नरेन्द्र मोदी जैसे हजारों लाखों स्वयंसेवक आज न केवल भारतीय जनता पार्टी बल्कि देश के अन्य राजनैतिक दलों का भी संचालन कर रहे हैं। पराजित होकर सत्ताच्युत हो चुकी कांग्रेस में भी संघ की ज्वाला में तपे निखरे स्वयंसेवक मौजूद हैं। ये वो लोग हैं जो भारत माता की आराधना करते हैं। ये वो लोग हैं जो देश के लिए मर मिटने में पल भर का वक्त भी नहीं लगाते हैं। यही वजह है कि हम चीन के इस मुगालते भरे कटाक्ष का स्वागत करते हैं। हम चीनी मीडिया को इस बात के लिए भी धन्यवाद देते हैं कि उसने हमें झकझोरने का काम तो किया। यही बात यदि भारतीय मीडिया के पत्रकार बंधु कहते तो सत्ता के मद में डूबे स्वयंभू देशभक्त उन पर तरह तरह की तोहमतें थोप देते। कोई उन पर वामपंथी, नक्सली, सनकी, बिका हुआ होने का लेबल चिपका देता तो कोई विपक्षी कांग्रेसियों की शह पर दिया गया बयान बताकर खारिज करने का श्रम करके अपने आकाओं से नंबर बढ़वाने का जतन करने लग जाता। ये अच्छी बात है कि ये बयान चीन के मीडिया ने दिया है। उसने न केवल भारत को भौंकने वाला लाचार देश बताया बल्कि ये भी कहा कि नरेन्द्र मोदी के मेक इन इंडिया अभियान का कोई मतलब नहीं। इसकी वजह उसने बताई कि भारत में भारी भ्रष्टाचार है। चीनी मीडिया ने अपने निवेशकों को भी सलाह दी है कि वे भारत में कतई निवेश न करें।

    चिंताजनक बात तो ये है कि चीनी मीडिया का ये बयान तब आया है जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जैसे कई नेता चीन की जमीन पर जाकर वहां के उद्योगपतियों को निवेश का न्यौता देते फिर रहे हैं। लगता है कि नेताओं के ये प्रयास चीन के उद्योगपतियों और सरकार का भरोसा नहीं जीत पाए हैं। ये बात भी सही है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह विश्व पटल पर पाकिस्तान में आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए चीन को सवालों के घेरे में खड़ा किया उससे भी चीन बौखलाया हुआ है। अमेरिका से बढ़ती नजदीकियों से भी चीन के रणनीतिकार परेशान महसूस कर रहे हैं। इसके बावजूद चीन के मीडिया ने जो बात कही है उसके लिए भारत के शासकों को अपने गिरेबान में जरूर झांकना पड़ेगा। कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री पी.व्ही.नरसिंम्हाराव और डाक्टर मनमोहन सिंह ने कड़ा दिल करके देश को नेहरू इंदिरा काल की गद्दार नीतियों से बाहर निकालने का भरपूर जतन किया। वे खुलकर तो नहीं कह सकते थे कि इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण और अंधे सरकारीकरण को थोपकर देश को गरीबी के दलदल में धकेल दिया था। इसलिए उन्होंने कार्पोरेटीकरण को बढ़ावा देकर एक समानांतर अर्थव्यव्यवस्था खड़ी करने का प्रयास किया। ये बात अलग है कि इससे आम नागरिकों पर दोहरा बोझ पड़ने लगा है। एक ओर तो वे कार्पोरेटीकरण जनित मंहगाई की मार झेलने के लिए खुले बाजार के हवाले कर दिए गए हैं वहीं राष्ट्रीयकरण के नाम पर थोपे गए अनुत्पादक सरकारी तंत्र को भी पालने पोसने के लिए मजबूर हैं। कांग्रेस के पतन के बाद जरूरत थी कि भारत जल्दी से जल्दी इस थोपे गए सरकारीकरण के जाल से खुद को मुक्त कर लेता।

    कांग्रेस की विदाई के बाद भाजपा की सरकारें भी कमीशनखोरी के चक्कर में कांग्रेस की ही पूंछ पकड़कर चलने लगीं। इसलिए देश में एक बार फिर निराशा का माहौल फैलने लगा है। इससे निजात दिलाने के लिए भाजपा के नेता खोखले बयानों की राजनीति कर रहे हैं। वे जनता को वैचारिक तौर पर राहत महसूस कराने का प्रयास कर रहे हैं जबकि इससे कोई समाधान निकलने वाला नहीं है। ये बात दुनिया भर के निवेशकों को भी मालूम है। यही वजह है कि जापान जैसा मित्र देश और उसके उद्योगपति भी भारत में निवेश करने से कतरा रहे हैं। धूर्त सरकारीकरण से घबराकर जापान की संस्था ने मध्यप्रदेश में मैट्रो रेल की जायका जैसी संस्था को भी कर्ज देने के मामले में चुप्पी साध ली है। चीन का मीडिया क्या बोलता है हम उसकी चिंता न भी करें तो हमें अपने हालात पर गौर जरूर करना होगा। कर्ज लेकर चलने वाली विकास योजनाओं को हम यदि विकास बताते रहेंगे तो फिर हमारी शुतर्मुर्गी भूमिका देश को एक नए झमेले में डाल देगी। यदि हम कांग्रेस को गाली देते रहे और युवाओं को रोजगार मुहैया नहीं करा सके तो ध्यान रखें हम एक नई उथलपुथल को पनपने का अवसर दे रहे हैं। हिंदुस्तान के शासकों और उनकी भोंदू नौकरशाही को आत्मचिंतन करना ही होगा। उन्हें ध्यान रहे कि ये दौर पूंजीवाद का है और कानून का डंडा केवल शासकों के हाथ का नौकर नहीं होता।

  • अब उपभोक्ता फ्रेंडली कानून बने

    अब उपभोक्ता फ्रेंडली कानून बने

    bharatchandra nayak
    भरतचन्द्र नायक……

    लोककल्याणकारी राज्य में उत्पाद उत्पादकों, वितरकों और विचैलियों से आम उपभोक्ताओं को रक्षा कवच के लिए सरकारें वैद्यानिक कवच प्रदान करती है। उपभोक्ता संरक्षण कानूनों की रचना का यही उद्देश्य है। एमआरपी की व्यवस्था की गई, लेकिन एमआरपी की आड़ में ऐसी लूट आरंभ हो गई कि एमआरपी पर मनमाना रिवेट दिया जाने लगा। गोया एमआरपी भी लूट का जरिया बन गई। ऐसे में केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण मंत्रालय की यह पहल उत्साहवर्द्धक लगती है कि सरकार आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं के दाम तय करेगी। खुदरा बाजार में दाल, दूध, चीनी, खाद्य तेलों और दूसरी वस्तुओं की कीमतों को लेकर एक कड़े कानून की उम्मीद की जा रही है। आशा की जाती है कि मौजूदा हालात में पेक्ड और खुली वस्तुओं के मूल्यों का अंतर घट जायेगा। यदि यह होता है तो बाजार में मूल्यों को लेकर क्रांतिकारी बदलाव आयेगा। लेकिन देखने में आया है कि मूल्य निर्धारण का संकेत मिलते ही घी के उत्पादकों ने घी के दामों में 30 से 40 प्रतिशत मूल्य वृद्धि करके त्योहारों का स्वाद कसैला कर दिया है। यह बात तय है कि सिर्फ कानून ही इस धींगा मस्ती पर नियंत्रण नहीं कर सकता उपभौकता संरक्षण यदि ऐसा होता तो 1860 में बने कानून अपनी प्रासंगिकता नहीं खो देते। उपभोक्तावाद का पलड़ा बाजारवाद से भारी करना होगा। इसके लिए भी हमें राष्ट्र की चेतना को जगाना होगा। कानून के प्रति सम्मान की भावना और दंड का भय पैदा करना होगा। छत्रपति शिवाजी ने एक वक्त आधिकारियों को कहा उनकी आज्ञा के बिना दुर्ग का प्रवेश द्वार नहीं खोला जायेगा। इसी बीच छत्रपति के पुत्र ने प्रवेश द्वार खोलने की इच्छा व्यक्त की और सेना के अधिकारी ने महाराज के पुत्र की इच्छा पूरी कर दी। छत्रपति शिवाजी ने सेनापति और स्वयं के पुत्र को बंदी बनाकर न्यायपति के समक्ष पेश करने का आदेश दिया जहां दोनों को दंड मिला।

    आर्थिक उदारीकरण से विश्व में आर्थिक प्रक्रिया तेज हुई है। विकास का तानाबाना बुना गया है। लेकिन जो भावना एकात्म मानवदर्शन में निहित है उसका प्रादुर्भाव न तो पूंजीवाद से होता दिखता है और न वामपंथ से। ‘‘सरवाईबिल आफ दी फिटेस्ट’’ की कहावत चरितार्थ हुई है। उत्पाद के उत्पादन की प्रक्रिया, इसमें शामिल अवयव, इनका मानव पर प्रभाव, इनकी लागत और इनका विक्रय मूल्य फैक्टरियों के सूचना पट पर हो यह ताकीद परोक्ष में कानून की भावना है। लेकिन देखने की बात है कि इसका पालन बिरले स्थान पर ही होता हैं हैरत की बात है यह ताकीद यदि तत्कालीन यूनियन कार्बाइट जैसे कारखाने ने भी अपनाई होती तो भोपाल के नाम दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी सदा के लिए नत्थी नहीं हो जाती। लाखों जिन्दगियां तबाही से बच जाती, उनके इलाज में सुविधा होती आज तक सरकारें और रसायन विश्लेषक इस बात की खोज कर रहे हैं कि यूनियन कारवाईट फैक्टरी से लीक गैस निकली और हजारों बेगुनाह लोगों को मौत की नींद सुला गई। उसका किस योग से उत्पादन हो गया और प्राण घातक गैसों से पीड़ित इन्सानों के लिए क्या उपचार कारगर होगा। अंधेरे में ही चिकित्सा जगत मरीजों का इलाज कर रहाह ै। जिस युग में हम पारदर्शिता की बात करते हैं उत्पादक अपने हितों की हिफाजत के लिए इन्सान के जीवन से खिलवाड़ करने में कतई गुरेज नहीं करते। उपभोक्तावाद पर बाजारवाद कितना शिंकजा कस चुका है यह इसकी एक मिसाल हैं।

    मिलावट खोरी उद्योग बनी
    भारत दुनिया में दुग्ध उत्पादन में शीर्ष पर है। यहां शाकाहार में दूध को पोषण आहार के रूप में प्रतिष्ठा है। दूध-दही अमृत माना जाता हैं देवताओं को भोग में इस्तेमाल होता है। शैशव का पोषण आहार है, लेकिन दूध में मिलावाट शहरों और गांवों में आम बात हो चुकी हैं पहले दूध में पानी मिलाने की शिकायत पर गौर होता था लेकिन अब पानी में दूध मिलाना आम हो चुका है और उपभोक्ता मौन है, क्योंकि जायें तो जायें कहाॅं?

    फूड सिक्योरिटी एंड स्टेंडर्ड अथारिटी आफ इंडिया का अध्ययन बताता है कि 68 प्रतिशत दूध मिलावटी हैं इसमें 33 प्रतिशत वह दूध है जो कंपनियां ब्रांड के साथ पैकेट में बंद करके बेचती हैं। सवाल उठता है कि कानून और कानून के रखवाले होते हुए हम इस मिलावट खोरी को रोक क्या नहीं पा रहे हैं? दूध में डिटर्जेन्ट, काॅस्टिक सोडा, ग्लूकोज सफेद पेंट और रिफाइन्ड तेल की मिलावट पाई जाती है। यूरिया और ग्लूकोज मिलाकर बनाये गये दूध को भी जांच दलों ने पकड़ा है। 2013 में एक जनहित याचिका की सुप्रीम कोर्ट में सुनवायी हुई है। खंडपीठ ने कहा था कि दूध की मिलावट करने वालों को उम्र कैद दी जाना चाहिए। मानव स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वालों के विरूद्ध कड़े दंड के लिए राज्यों को कानून में संशोधन करना चाहिए। इसपर कुछ राज्यों उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा में अमल हुआ। उम्र कैद का संशोधन हुआ है, लेकिन अभी भी कुछ राज्यों में फुड सिक्यूरिटी एंड स्टेंडर्ड एक्ट में मिलावट पर अधिकतम 6 माह की सजा का प्रावधान है।
    उपभोक्ता के हित में बहुत कुछ किये जाने की जरूरत है। अनुचित व्यापार व्यवहार वाले झूठ विज्ञापनों की भरमार है। इसमें बड़े-बड़े किरदारों को ब्रांड ऐम्बेसेडर बनाकर भोलीभाली जनता को गुमराह किया जाता है। भारी रकम लेकर बड़े-बड़े फिल्मी सितारे, खिलाड़ी, प्रतिष्ठित व्यक्ति विज्ञापनों में अपनी साख और प्रतिष्ठा को बट्टा लगाने में नहीं शर्माते हैं। एक तेल के विज्ञापन पर जनहित याचिका में उत्पादक के साथ ब्रांड एम्बेसेडर को भी न्यायालय कड़ी चेतावनी दे चुका है, लेकिन चांदी की चमक में नैतिकता काफूर हो चुकी है।

    सबसे दुखद और त्रासद बात यह है कि इन मिलवट खोरों के कारण राष्ट्र क नाम कलुषित हो रहा है। भारत की गिनती दुनिया के सर्वाधिक मिलावटखोर कुपोषित देशों में होने लगी है। खेत से लेकर बाजार तक खाद्य पदार्थाें को लगातार प्रदूषित करने की होड लगी है। हम धर्म-अधर्म को लाभ के कारण भूल चुके हैं। खैरात में भी मिलावट करके कौन से पुण्य कमा रहे हैं इस बात से भी व्यापारी उत्पादक तनिक भी भयभीत नही हैं। हाल ही में भोपाल में अतिवृष्टि से बाढ़ में निचली बसाहटों के रहवासी सबकुछ लुटा बैठे। राज्य सरकार ने पीड़ित परिवारों को पचास-पचास किलों राशन देकर राहत की व्यवस्था की, नागरिक आपूर्ति निगम ने तुरत-फुरत वितरण के लिए भण्डार खोल दिया। लेकिन पीड़ित परिवारों चेहरों पर शिकुन तब आ गई जब उन्होंने पाया कि गेहूॅ में मिट्टी के बाजाय मिट्टी के ढेले थे। राजधानी का मामला ठहरा। उच्च स्तरीय जांच का आदेश दिया गया। जांच कमेटी बैठी, सक्रिय हुई इसके बाद पता नही ंचला कि क्या हुआ। मिलावट से निपटने में सरकार, उपभोक्ता मंत्री की भी जिम्मेदारी है, लेकिन कंपनियां, उत्पादक, विक्रेता भी अपनी जिम्मेेवारी से मुकर नहीं सकते हैं।

    मिलावट महीना और मौज
    लोकतंत्र प्रशासन का सर्वोत्तम तंत्र है, लेकिन इसकी उदारता को लाचारी में बदला जा रहा है, जिससे प्रशासन बिगडै़ल हो गया है। कानून जनहित के संरक्षण के लिए होता है लेकिन वह विफल हो रहा है। जिन्हें उपभोक्ता कवच बनने का दायित्व है वे पहले उनकी फिक्र करते हैं जो हरमाह ‘‘महिना’’ इनाम तोहफा भेंट करते हैं। अदालतें जब तब कई फैसले सुनाकर उपभौक्ता को राहत पहुंचाती है, लेकिन अदालती प्रक्रिया भी कठिन और व्यय साध्य है। जब तक इसे सरल नहीं बनाया जाता न्याय पालिका से भी उपभोक्ता हित संरक्षण की अपेक्षा दिवा स्वप्न ही है।

  • पशु भूखे हैं भोजन बचाओःविद्यासागर जी

    पशु भूखे हैं भोजन बचाओःविद्यासागर जी

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    अनाज बचाओ ताकि मूक पशुओं को भी साफ भोजन मिलेःआचार्य विद्यासागर जी

    भोपाल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। विख्यात संत आचार्य विद्यासागर जी महाराज ने कहा है कि देश में कृषि उत्पादों के संधारण की चाक चौबंद व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। आपात स्थितियों के लिए देश में इतना खाद्यान्न मौजूद होना चाहिए कि इंसान तो क्या जानवरों को भी साफ भोजन की कमी न हो। आचार्य श्री से भेंट करने पहुंचे कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन से उन्होंने कहा कि देश का विकास तेजी से हो रहा है पर कीटनाशक रहित साफ खाद्यान की कमी होती जा रही है। मूक पशुओं को पेट भरने के लिए कचरा खाने पर मजबूर होना पड़ रहा है। सरकार को बहुत सावधानी से व्यवस्था में सुधार की कमान संभालनी होगी।

    आचार्यश्री से भेंट के बाद चर्चा में कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन ने कहा कि खाद्यान्न के प्रसंस्करण और परिरक्षण के संदर्भ में ये बात सही है कि भंडारण की उचित व्यवस्था न होने के कारण हमारे खाद्यान्न का बहुत सारा हिस्सा बर्बाद हो जाता है। उन्होंने कहा कि हमने आचार्यश्री को आश्वस्त किया कि सरकार इस दिशा में काम कर रही है। सरकार इसके लिए नए भंडारगृह बनाने और भंडारण की तकनीक के प्रशिक्षण पर भी खासा जोर दे रही है।

    श्री बिसेन ने बताया कि आचार्य श्री ने कृषि मंत्री के नाते उनसे कहा कि हम लोग अपने भोजन को तो साफ सुथरा रखने का प्रयास करते हैं पर पशुओं को कचरा खाने के लिए भी दर दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं। उन्होंने कहा कि वे सड़कों पर आए दिन पशुओं को भोजन के अभाव में भटकता देखते हैं । ये स्थिति गौ पालन से सुधारी जा सकती है। आखिर क्यों हमारे पशुधन को भोजन के लिए भटकना पड़े। यदि हम केवल भोजन की बर्बादी रोक सकें तो पशुओं को बगैर किसी अतिरिक्त खर्च के पेट भरने लायक भोजन दिया जा सकता है।

    उन्होंने बताया कि आचार्यश्री ने उन्हें गौवंश के पालन और उनके स्वास्थ्य की देखभाल से होने वाले सामाजिक फायदों के बारे में जन चेतना जगाने की सलाह दी। आचार्य़श्री का कहना था कि गौवंश की देखभाल सुधारने का माहौल बनाकर बड़ी हद तक कुपोषण से निपटा जा सकता है। उन्होंने कहा कि पशुओं को पौष्टिक आहार मिलेगा तो समाज के लिए मिलने वाला पौष्टिक दूध बड़ी आबादी का कुपोषण स्वमेव दूर कर देगा। उन्होंने कहा कि आज भी बड़ी आबादी पौष्टिक भोजन से वंचित है। सरकार कृषि और पशुपालन की व्यवस्था सुधारने पर जोर देगी तो प्रदेश और देश की उत्पादकता बढ़ाने की दिशा में हम बहुत कम खर्च में ज्यादा उपलब्धियां हासिल कर सकेंगे।

    श्री बिसेन ने कहा कि आचार्य़श्री की भावनाओं पर गौर करते हुए हम जैविक खेती और खाद्य प्रसंस्करण के कार्यक्रमों को नई ऊर्जा से चलाने की तैयारी कर रहे हैं। सरकार का प्रयास रहेगा कि कृषि उत्पादों से किसान की माली हालत तो सुधरे ही साथ में उसकी मेहनत से उपजाया गया खाद्यान्न जरूरतमंदों के हाथों में पहुंचे। उन्होंने कहा कि आचार्यश्री ने उनसे कहा कि हम तो अपने मिलने जुलने वालों से हमेशा कहते हैं कि जूठन के रूप में खाद्यान्न की बर्बादी नहीं होनी चाहिए। यदि हम अपने बच्चों को पौष्टिक भोजन नहीं दिला पाएंगे तो हमारे देश की नई पीढ़ी वांछित सफलताएं कैसे अर्जित कर पाएगी। श्री बिसेन ने कहा कि मैं अपने भाषणों में आचार्यश्री के इस मार्गदर्शन का उल्लेख हमेशा करूंगा और लोगों से खाद्यान्न की बर्बादी रोकने की अपील करूंगा।

    कृषि मंत्री श्री बिसेन ने कहा कि हालिया ओलंपिक खेलों में भारत के खिलाड़ियों के प्रदर्शन को देखकर एक बार फिर पौष्टिक भोजन युवाओं तक पहुंचाने की ओर देश का ध्यान गया है। इसे देखते हुए सरकार ने जनता की जरूरत के मुताबिक खाद्यान्न पैदा करने का कैलेण्डर बनाया है। इसके अनुसार किसानों को उनके खेत की मिट्टी और मौसम के मुताबिक खाद्यान्न उत्पादन की सलाह दी जा रही है।

  • केंपा राशि से फिर लग सकेंगे जंगल

    केंपा राशि से फिर लग सकेंगे जंगल

    केंपा बिल पारित हो जाने से एक बार फिर जंगलों को नया जीवन देने का मार्ग सुलभ हो गया है।केन्द्रीय मंत्री अनिल दवे इसे क्रांतिकारी पहल बता रहे हैं।
    केंपा बिल पारित हो जाने से एक बार फिर जंगलों को नया जीवन देने का मार्ग सुलभ हो गया है।केन्द्रीय मंत्री अनिल दवे इसे क्रांतिकारी पहल बता रहे हैं।

    प्रतिपूरक वनीकरण निधि कानून की सामयिकता……
    भरतचन्द्र नायक…..
    वन संपत्ति प्रकृति का अनुपम उपहार है। वनों के क्षरण को लेकर लगातार चिंता व्यक्त की जाती रही है और विरोधाभास यह भी है कि इसके लिए वन प्र्रान्तर में रहने वाले उन आदिवासियों के सिर ठीकरा फोड़ा जाता रहा है, जो आदिकाल से वनों के न्यासी सिद्ध हुए है। संपत्ति की लालसा और प्रगति की चाह में हमनें आधारभूत मानवीय संस्कारों को तिलांजलि दे दी है। वन संपत्ति की अवधारणा को पूंजी में परिवर्तित कर लिया है। लेकिन आदिवासी, वनवासियों ने हमेशा निजी संपत्ति की उस धारणा को नकारा है जो सभ्य समाज कहे जाने वाले समुदाय का प्रिय शगल है। आदिकाल से वे जानते रहे है कि प्रकृति के शोषण की लालसा इंसान के लिए आपदा का आमंत्रण है। प्रकृति के साथ तादाम्य, मानवेत्तर प्राणियों के साथ सह अस्तित्व का जीवन जीना आदिवासी परंपरा का अटूट हिस्सा है। वैश्वीकरण ने निजी संपत्ति की धारणा को प्रबल किया, पूंजी का वर्चस्व बढ़ा। मानवीय, जीव-जगत, वन-संपदा के सरोकार तिरोहित हो गये, जिसनेे वन संपत्ति के दोहन के बजाय शोषण का मार्ग खोल दिया। वनों के अंधाधुंध शोषण से जहां प्राकृतिक संतुलन गड़बड़ा गया, वहीं वन्य प्राणी आश्रय की खोज में शहरों की आरे झांकने लगे, बाघ, मगर के बाद अजगर के कदम बसाहट की ओर बढ़ते देखे जा रहे है। वहीं आखेट करने वालों ने मौके का फायदा उठाकर वन्य प्राणियों का शिकार करना शौक और व्यवसाय बनाकर ‘कोढ़ में खाज’ पैदा कर दी।। देर आयत-दुरूस्त आयत, केन्द्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार ने प्रतिपूरक वनीकरण को प्राथमिकता दी। राज्यों से इससे सरोकार जोड़ने के लिए पूर्व में निधि गठित की गयी थी, लेकिन इस निधि के परिचालन के लिए संवैधानिक व्यवस्था न होने से राज्यों से प्राप्त क्षतिपूर्ति वनीकरण की 40 हजार करोड़ रू. की राशि फिक्सड़ डिपाॅजिट में जमा रही। ब्याज तो बढ़ता गया लेकिन राज्य इस निधि से अंशदान के लिए तरसते रहे। मोटे तौर पर तय किया गया था कि एक हेक्टेयर वन भूमि के गैर-वन के लिए उपयोग होने पर दो हेक्टेर में क्षतिपूर्ति वनीकरण किया जाये, जो सिर्फ औपचारिक तौर पर कागजों पर होता रहा।

    संसद के पावस सत्र की यह एक उपलब्धि कही जायेगी कि संसद ने दो ऐसे बिल सर्वोच्च प्राथमिकता से पारित कर दिये जिससे एक ओर आर्थिक क्रांति की आशा की जा सकती है। पहला वस्तु एवं सेवा कर विधेयक है एवं दूसरा प्रतिपूरक वनीकरण निधि विधेयक है, जो वनों के बारें में परंपरागत सोच के स्थान पर वैज्ञानिक आधार पर वनीकरण को देशव्यापी बनानें और वन्य जीवों को सहेजने, संवारनें में मील का पत्थर सिद्ध होगा। वनवासियों के जीवन स्तर में सुधार होगा। केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अनिल माधव दवे ने आशा व्यक्त की है कि इससे देश को जलवायु परिवर्तन की तपिश से मुक्ति मिलने में सहायता मिलेगी। जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने में भारत वैसे भी प्रयासवान अग्रणी मुल्क है, इस विधेयक के अमल में आने सेे ‘सोने में सुहागा’ होगा।
    प्रतिपूरक वनीकरण निधि विधेयक का सरोकार वन से संबद्ध सभी पक्षों की बेहतरी से होगा। वनों पर आश्रित समुदाय की आजीविका, वनों, चरागाहों, दलदली क्षेत्र समेत प्राकृतिक पारितंत्र के संरक्षण, सुरक्षा, पुर्नवास पर सुविचारित प्रणाली के तहत उपयोग में लायी जायेगी। यह भी एक वास्तविकता है कि दुनिया में वन आश्रित अर्थव्यवस्था भारत की पुरातन परंपरा है, बड़ी संख्या में आबादी वनों पर निर्भर है। वनों की उपयोगिता औद्योगिक प्रयोजन के अलावा, कार्बन को सोखने, बाढ़ की विभीषिका को रोकने, मिट्टी को सरंक्षित रखने, मिट्टी की गुणवत्ता बढ़ाने के अलावा जलवायु के अनुकूलन के लिए भी है। हम वन को वृक्षों का समूह मानकर रह जाते है। लेकिन वन जीवित परितंत्र है जो जैव विविधता को आश्रय देते है और परिस्थितीय प्रतिकूल विकृति पर लगाम लगाता है। प्रतिपूरक वनीकरण निधि (सीएपी) विधेयक केंपा सभी सरोकारों को एक सूत्र में पिरोता है। इससे यह भी कहा जा सकता है कि इससे पंचायती राज व्यवस्था की भावना समृद्ध होगी। पंचायत की भूमिका और वर्चस्व पर आंच नहीं आयेगी। संसद में इस आशय की प्रतिबद्धता अनिल माधव दवे व्यक्त कर भी चुके है।

    ‘‘केंपा का दिलचस्प सफर’’

    प्रतिपूरक वनीकरण निधि विधेयक और इसके परिचालन के लिए अनिवार्य प्रतिपूरक वनीकरण निधि प्राधिकरण केंपा के लिए पूर्व में सारे काम तदर्थवादी भावना से मनमाने ढंग से चल रहे थे। राज्यों में वनभूमि ली जाती, क्षतिपूर्ति राशि एक हेक्टेयर के बदले में दो हेक्टेयर वन विस्तार की योजना बनती, कागजी जमा खर्च होता रहता था। अस्सी के दशक में वनों के सिकुड़ने का अहसास होने पर वन पर्यावरण क्षेत्र में केन्द्र का वर्चस्व होने के लिए व्यवस्था की गयी। राज्यों की परियोजना बिजली घर, बांध, सड़क, बिजली लाईन ले जाने, कारखाना, खनिज उत्खनन, स्कूल जैसे सार्वजनिक कार्यों के लिए भूमि की आवश्यकता पर निर्णय लेने का अधिकार केन्द्र से निहित हो गया। 2008 में केन्द्र सरकार ने प्रतिपूरक वनीकरण निधि विधेयक तैयार किया। विधेयक लोकसभा में पारित हो गया, लेकिन राज्यसभा में बहस के लिए प्रस्तुत नहीं हो सका। इसी दरम्यिान लोकसभा विघठित हो गई। परिणाम स्वरूप विधेयक लेप्स हो गया। प्रतिपूरक निधि झमेले में पड़ गयी। तब लेखा महानिरीक्षक ने प्रतिपूरक निधि को शासकीय लेखा से परे जमा करने का सुझाव दिया। सर्वोच्च न्यायालय से तदर्थ केंपा के बारें में मार्गदर्शन लेने की आवश्यकता महसूस की गयी, जिससे प्रतिपूरक वनीकरण राशि लोक लेखा का अंश बन सके। इसी परिप्रेक्ष्य में 2014 मंे वन पर्यावरण मंत्रालय ने केंपा की स्थायी रूप से शुरूआत की। केन्द्र और राज्यों में निधि संचालन के लिए प्रथक-प्रथक प्राधिकार स्थापित करने का खाका तैयार कर अंतिम निर्णय के लिए सर्वोच्च न्यायालय को सौंप दिया। अभी तक सर्वोच्च न्यायालय से इस संबंध में सहमति अपेक्षित है। वनों की क्षतिपूर्ति और प्रतिपूर्ति वनीकरण निधि के उपयोग की त्वरा को देखते हुए केन्द्र सरकार ने लोकसभा में प्रतिपूरक वनीकरण निधि विधेयक-2015 लोकसभा में प्रस्तुत कर दिया। 13 मई 2015 को लोकसभा ने विधेयक विज्ञान-टेक्नोलाॅजी संसदीय स्थायी समिति के विचारार्थ भेज दिया। समिति की राज्यों, केन्द्र शासित प्रदेशों और इससे संबद्ध व्यक्तियों, संस्थाओं के साथ बैठकों का लंबा दौर चला। 26 अनुशंसाएं की गयी, जिनमें से 20 अनुशंसाएं मंजूर कर ली गयी। विधेयक में 49 संशोधन कर दिये गये। लोकसभा ने मई 2016 में विधेयक पारित कर दिया। 28 जुलाई 2016 को राज्यसभा ने भी विधेयक पर अपनी मोहर लगाते हुए तदर्थवाद से मुक्ति दिला दी। केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री अनिल माधव दवे ने राज्यसभा को विश्वास दिलाया है कि एक वर्ष बाद जनता की आपत्ति पर पुनः विचार किया जायेगा और नियमों का जन सुविधा की दृष्टि से पुनार्वलोकन किया जायेगा।

    केंपा बिल के पारित हो जाने के साथ जमा राशि 40 हजार करोड़ रू. और ब्याज की राशि करीब 2000 करोड़ रू. देश के प्रदेशों में प्रतिपूर्ति वनीकरण के लिए निर्धारित प्रक्रिया के अंतर्गत उपयोग किये जायेंगे। इससे प्रत्यक्ष रोजगार की दृष्टि से 15 करोड़ मानव दिवस का रोजगार सृजन होगा। दुनिया के वन क्षेत्र का 40 प्रतिशत वन क्षेत्र भारत के बिगड़े वन के रूप में मौजूद है। इसे हरि परिधानाच्छादित करने का बीड़ा उठाया जाना है। इससे वनवासी, पिछड़ी जाति बहुल वसाहटों मंे जहां रोजगार के अवसर बढ़ेंगे वहीं वन-पर्यावरण के प्रति जन-जागरूकता का ज्वार उठेगा। इमारती लकड़ी, काष्ठ, पशुचारा की उन्नत किस्में वनोपज के साथ विपुल क्रांति लायेगी जिससे इन क्षेत्रों में निवासियों के जीवन स्तर में सुधार होगा। केंपा विधेयक के कानून के रूप में अमल में आते ही केन्द्र और राज्य स्तर पर स्थायी संस्थागत सरंचना तैयार होगी जो इस निधि के विधि और तर्क संगत उपयोग पर नजर रखेगी। यह निधि ऐसे खाते में जमा होगी जो लेप्स नहीं होगा, किन्तु ब्याज की निरंतरता बनी रहेगी। संसद और विधानसभा निगरानी के लिए सक्षम होगी। एक मानीटरिंग समूह भी गठित किया जायेगा। प्रतिपूरक वनीकरण निधि जो 40 हजार करोड़ प्लस 2000 करोड़ रू. ब्याज है में से 90 प्रतिशत राज्यों को और 10 प्रतिशत केन्द्र के हिस्से में आयेगी। इस दरम्यिान राज्यों में वनभूमि गैर-वन के उपयोग में ली जायेगी, उससे क्षतिपूर्ति राशि की उगाही गयी राशि राज्यवार लोक निधि मद में जमा की जायेगी। वन सरंक्षण कानून-1980 में वनभूमि गैर-वन के प्रयोजन के लिए दिये जाने की अनुमति के साथ यह शर्त रखी है कि इस क्षतिपूर्ति राशि के प्राप्त होने पर उसका उपयोग क्षतिपूर्ति वनीकरण, जलग्रहण क्षेत्र के उपचार, वन्य-जीव प्रबंधन और वन भूमि के प्रत्यावर्तन से उत्पन्न समस्याओं के समाधान पर किया जायेगा। अब इस दिशा में नियमों का कड़ाई से पालन होगा।

    केन्द्र सरकार ने पर्यावरण सरंक्षण कानून-1985 के तहत प्रतिपूरक वनीकरण निधि प्रबंधन और नियोजन प्राधिकरण केंपा का गठन किया था, लेकिन व्यवस्था प्रभावशील नहीं हो सकी थी। नये परिप्रेक्ष्य में केंपा व्यवस्था को संवैधानिक स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है और विश्व में जलवायु परिवर्तन के दौर की चुनौती से निपटने के जो उपाय विश्वव्यापी चल रहे है, उसमें भारत की अग्रणी भूमि तय करनें में यह व्यवस्था निश्चित रूप से सार्थक सिद्ध होगी।