भारत सरकार की नीतियों को श्रमिक विरोधी बताते हुए देशव्यापी हड़ताल का आव्हान किया गया। हड़ताल लगभग असफल रही। इससे देश की गतिविधियों पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा। जबकि इस हड़ताल में संगठित क्षेत्र के 25 लाख श्रमिकों की भागीदारी का दावा किया गया था। इस लिहाज से ये हड़ताल श्रमिक आंदोलनों की विदाई का दस्तावेज बन गया है। इसकी वजह ये है कि ये श्रमिक जिन क्षेत्रों से आते हैं वे क्षेत्र अब भारत की मुख्यधारा नहीं रहे हैं। बीएसएनल हो या सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक इनके समानांतर पूरा ढांचा कार्पोरेट सेक्टर में खड़ा हो चुका है। रेलवे जिस निजीकरण का विरोध कर रहा है वह कार्पोरेट सेक्टर के सहारे पूरी तरह यंत्रवत काम करने लगा है। ऐसे में हड़तालियों की बात कौन सुनेगा। हड़तालियों ने अपना समर्थन जुटाने के लिए असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को लुभाने के लिए न्यूनतम वेतन 21 हजार रुपए करने का नारा दिया। ये नारा वे दे रहे हैं जिनके वेतन पचास हजार रुपए से अधिक हैं और वे अपना वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर हड़ताल कर रहे हैं। संगठित क्षेत्र के पांच सात प्रतिशत कर्मचारी या श्रमिक यदि ये मांग करें कि नब्बे फीसदी नागरिकों का पेट काटकर आप हमारे वेतन भत्ते बढ़ा दें तो इसे कैसे न्यायोचित माना जा सकता है। फिर ये आवाज भी जनता की गरीबी दूर करने के नाम पर लगाई जाए तो इसे कैसे उचित ठहराया जाए। इसके बावजूद देश के श्रमिक संगठन अपनी हड़ताल को मजदूर की आवाज बता रहे हैं। इसे केन्द्र सरकार की हठधर्मिता के विरुद्ध संग्राम बताया जा रहा है। देश के कुछ मूर्ख बुद्धिजीवी श्रमिक संगठनों की इस मांग को जायज बता रहे हैं। देश का पूरा ढांचा बदल चुका है। इसके बावजूद कांग्रेस और उनके वामपंथी सहोदर अपना पुराना घिसा पिटा रिकार्ड बजाने में जुटे हुए हैं। डाक्टर मनमोहन सिंह जैसे उनके मार्गदर्शक कर्जमाफी जैसे आम जनता को ठगने वाले चुनावी वायदे पर चुप्पी साधे बैठे हैं। दरअसल देश बदल चुका है और उसे नए हालात को समझने वाले जन नेताओं की दरकार है। नई पीढ़ी के बीच से उभरने वाले नेता इस जरूरत को महसूस करें और अपनी नई भूमिका निभाएं तो देश का ज्यादा भला हो सकता है।
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सस्ती बिजली के पाखंड की आड़ में रिकार्डतोड़ वसूली
भोपाल,4 दिसंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। प्रदेश के पावर सेक्टर के इतिहास में नवंबर 2019 का माह मील के पत्थर के रूप में दर्ज हो गया है। नवंबर में राजस्व संग्रह 2017 करोड़ रुपये का हुआ है, जो नवंबर 2018 की तुलना में 413 करोड़ अधिक है। इस प्रकार लगभग 26 प्रतिशत अधिक राजस्व मिला है जो अब तक का प्रदेश का एक माह का सर्वाधिक राजस्व संग्रह है। इसके लिये ऊर्जा मंत्री श्री प्रियव्रत सिंह ने बिजली उपभोक्ताओं और तीनों विद्युत वितरण कंपनी के स्टॉफ को बधाई दी है।
गौरतलब है कि वर्ष 2018 में जुलाई से नवंबर की तुलना इस वर्ष 2019 से की जाए तो इन महीनों में 1687 करोड़ का अधिक राजस्व संग्रह हुआ है। इसी प्रकार प्रति यूनिट नगद राजस्व वसूली गत वर्ष 2 रुपये 34 पैसे की तुलना में इस वर्ष नवंबर में 4 रुपये 14 पैसे हो गई है। यह गत वर्ष के इसी माह से 77 प्रतिशत अधिक है।
प्रदेश की तीनों वितरण कंपनियों ने राजस्व संग्रह में अब तक का उत्कृष्ट योगदान दिया है। पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी द्वारा नवंबर 2019 में 596 करोड़, मध्य क्षेत्र कंपनी द्वारा 587 करोड़ एवं पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी द्वारा 834 करोड़ रुपए का राजस्व संग्रह किया गया। पिछले वर्ष इसी अवधि में पूर्व क्षेत्र कंपनी द्वारा 452 करोड़, मध्य क्षेत्र कंपनी द्वारा 488 करोड एवं पश्चिम क्षेत्र कंपनी द्वारा 664 करोड़ रुपए का राजस्व संग्रह किया गया था। इस नवंबर माह में पूर्व क्षेत्र कंपनी द्वारा 31.71 प्रतिशत, मध्य क्षेत्र कंपनी द्वारा 20.38 प्रतिशत व पश्चिम क्षेत्र कंपनी द्वारा 25.63 प्रतिशत अधिक राजस्व संग्रह किया गया। यह कंपनी गठन के बाद किसी एक माह में सर्वाधिक है।
ऊर्जा मंत्री ने कहा है कि सरकार प्रदेश के शहरों और ग्रामों में 24 घंटे तथा किसानों को घोषित अवधि में 10 घंटे निर्बाध विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कृत-संकल्पित है।
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बंदर हीरा खदान को मंजूरी बिना बेचने की तैयारी
बंदर हीरा खदान लेने के लिये 5 कम्पनियों ने प्रस्तुत किया दावा
तकनीकी बिड का मूल्यांकन 27 नवम्बर को पूर्ण किया जायेगा : मंत्री जायसवालभोपाल,14 नवंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। खनिज साधन मंत्री प्रदीप जायसवाल ने बताया है कि छतरपुर जिले की वर्षों से अनुपयोगी बंदर हीरा खदान लेने के लिये 5 बड़ी कम्पनियों ने 13 नवम्बर को खुली प्रथम चरण की तकनीकी निविदाओं में बिड जमा कर अपना दावा प्रस्तुत किया है। ये कम्पनियाँ हैं भारत सरकार का उपक्रम नेशनल मिनरल डेव्हलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एनएमडीसी), एस्सेल माइनिंग (बिरला ग्रुप), रूंगटा माइन्स लिमिटेड, चेंदीपदा कालरी (अडानी ग्रुप) तथा वेदांता कम्पनी।
मंत्री श्री जायसवाल ने बताया कि 55 हजार करोड़ रुपये की यह खदान रियो टिंटो कम्पनी ने छोड़ी थी। देश की इस सबसे बड़ी खदान के नीलामी प्रकरण में भारत सरकार के नियमानुसार लगभग 56 करोड़ रुपये की सुरक्षा निधि जमा कराई जानी थी। इसके लिये आवेदक कम्पनी की नेटवर्थ कम से कम 1100 करोड़ रुपये होना आवश्यक था।
खनिज साधन मंत्री ने बताया कि 13 नवम्बर की निविदा कार्यवाही के बाद अब तकनीकी बिड के मूल्यांकन का कार्य 27 नवम्बर, 2019 को पूर्ण किया जायेगा। इसके बाद 28 नवम्बर को प्रारंभिक बोली खोली जाएगी और उसके अगले दिन ऑनलाइन नीलामी सम्पादित की जाएगी।
उल्लेखनीय है कि छतरपुर जिले में लगभग 3.50 करोड़ कैरेट के हीरे के भण्डार का अनुमानित मूल्य 55 हजार करोड़ रुपये है। इस पर राज्य शासन को प्राप्त होने वाली रॉयल्टी की दरों के आधार पर नीलामी सम्पन्न की जाएगी।
बक्सवाहा में हीरे की मौजूदगी का पता लगने के बाद आस्ट्रेलिया की रियो टिन्टो कंपनी ने बंदर प्रोजेक्ट को लीज पर लेकर यहां भारी मात्रा में हीरा पाए जाने का सर्वे किया था। इसके बाद उसने करोड़ों रूपए के हीरे सर्वेक्षण के नाम पर निकाले थे।
जब कंपनी से सरकार का अनुबंध खत्म हो गया और आगे के कार्य की अनुमति नहीं मिली तो कंपनी अपना सामान समेटकर चली गई। अब इसी प्रोजेक्ट को फिर से नीलाम किया जा रहा है।
अब देश की जानी-मानी कंपनियों ने हीरा खनन में अपनी रूचि दिखाई है। कंपनी के प्रतिनिधियों ने बंदर प्रोजेक्ट की भौगोलिक स्थिति समझने हेतु जंगल का दौरा किया और प्रोजेक्ट के बारे में जांच-पड़ताल की। जानकारी के मुताबिक बंदर डायमंड माइंस प्रोजेक्ट की नीलामी में अनेक कंपनियों ने रुचि दिखाई है।
आदित्य बिरला ग्रुप, अडानी ग्रुप, वेदांता ग्रुप, रूंगटा ग्रुप, एसेल ग्रुप, क्यूरा ग्रुप जैसी कंपनियों ने बकस्वाहा पहुँच कर बंदर प्रोजेक्ट की जानकारी ली साथ ही भौगोलिक स्थिति जानकर परिस्थितियों से रूबरू होकर प्रोजेक्ट के संबंध में चर्चाएं की गई जिसमें मुख्य रुप से भूमि सम्बन्धी और जंगल से सम्बंधित चर्चाएं हुई ।
कलेक्टर मोहित बुंदस ने बताया कि डायमंड प्रोजेक्ट के लिए निरीक्षण करने टीमें आई हैं। इस प्रोजेक्ट में रूचि रखने वाली कंपनियों की टीमों ने निरीक्षण करने के बाद विभिन्न बिन्दुओं पर चर्चा की।
यहां का प्रोजेक्ट शुरू होने से लोगों को रोजगार मिलेगा और बक्स्वाहा का नाम पूरे विश्व में हीरा खदान के रूप में जाना जाएगा।
इस प्रोजेक्ट का रकबा 356 हेक्टेयर है जिसमें से करीब 13 हेक्टेयर जंगल ऐसा है जो पन्ना टाईगर रिजर्व से लगा हुआ है साथ ही इमली घाट जहां ये खदान लगाई जानी है वहां जाकर भी कंपनियों ने मुआयना किया और वहां की स्थिति जानी।
बकस्वाहा ब्लॉक के हीरा खदान देखने पहुँची कंपनियों के साथ नरेंद्र सिंह परमार सचिव मध्यप्रदेश शासन, मोहित बुंदस कलेक्टर छतरपुर, अनुपम सहाय डीएफओ, तिलक सिंह एसपी, मनोज मालवीय एसडीएम बिजावर के साथ जिले का अमला मौजूद रहा।
प्रदेश शासन के सचिव नरेन्द्र सिंह परमार ने बताया कि बंदर हीरा खनन प्रोजेक्ट बक्स्वाहा की नीलामी प्रक्रिया की शुरूआत 5 अगस्त से शुरू की गई। प्रोजेक्ट की बोली 60 हजार करोड़ से शुरू होगी।
परमार ने बताया कि विभिन्न कंपनियों के प्रतिनिधियों से प्रोजेक्ट के बारे में चर्चा हुई है। पन्ना में रखे बक्स्वाहा के डायमंड को देखने के बाद प्रतिनिधियों ने भौगोलिक स्थिति जानने की इच्छा जताई थी। उन्हें यहां लाया गया है ताकि वे वस्तु स्थिति से भी अवगत हो सकें।
यहां आने वालों में 6 कंपनियों के प्रतिनिधि शामिल हैं। उधर डीएफओ अनुपम सहाय का कहना है कि पूरा प्रोजेक्ट वन क्षेत्र का है इसलिए एनओसी जारी होगी लेकिन यह भी देखना होगा कि इस जंगल को कहां स्थानांतरित किया जाए ताकि अच्छे किस्म का जंगल तैयार हो सके।
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मंदी नहीं,विकास जारी बोलीं वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण
नयी दिल्ली,14 सितंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)।हाऊसिंग प्रोजेक्ट को गति देेने के लिए भारत सरकार दस हजार करोड़ रुपए उपलब्ध कराएगी। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने शनिवार को बताया कि सरकार ने अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए कई उपाय किए हैं।जो लोग मंदी की बात कह रहे हैं उनके अनुमान ताजा आंकड़ों के सामने काल्पनिक साबित हुए हैं। उन्होंने बताया कि सहायता ऐसी परियोजनाओं को ही मिलेगी, जो दिवाला संहिता के तहत एनसीएलटी में जाने या गैर-निष्पादित संपत्ति (एनपीए) घोषित होने से बची हुई हैं.
वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने यहां अर्थव्यवस्था को नरमी से उबारने के लिए एक और पैकेज की घोषणा करते हुए कहा कि निर्माणाधीन परियोजनाओं के वित्त-पोषण के लिए सरकार करीब 10 हजार करोड़ रुपये की सहायता देगी. उन्होंने कहा कि इस काम में बाहरी निवेशकों से भी करीब इतनी ही राशि उपलब्ध होने का अनुमान है. उन्होंने कहा कि इससे किफायती तथा मध्य आय वर्ग के लिए बनायी जा रही आवासीय परियोजनाओं को पूरा करने में मदद मिलेगी. उन्होंने कहा कि इस कोष का प्रबंधन पेशेवर लोग करेंगे.
वित्तमंत्री ने कहा कि भवन निर्माण के लिए कर्ज पर ब्याज दर को कम किया जायेगा तथा इन पर ब्याज की दर को 10 साल की सरकारी प्रतिभूतियों के यील्ड (निवेश-प्रतिफल) से जोड़ा जायेगा. उन्होंने कहा कि सरकारी नौकरी वाले लोग आवास की मांग में अहम योगदान देते हैं. इस व्यवस्था के तहत सरकारी नौकरी वाले अधिक लोगों को नया घर खरीदने का प्रोत्साहन मिलेगा. उन्होंने कहा कि डेवलपरों को विदेश से पूंजी जुटाने में मदद करने के लिए विदेश से लिये जाने वाले वाणिज्यिक ऋण से संबंधित गाइडलाइन आसान बनाई जाएगी।मुद्रास्फीति नियंत्रित और औद्योगिक उत्पादन में सुधार के स्पष्ट संकेत
के साथ ही, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शनिवार को कहा कि मुद्रास्फीति नियंत्रण में है और औद्योगिक उत्पादन में सुधार के स्पष्ट संकेत दिख रहे हैं. उन्होंने अर्थव्यवस्था के लिए राहत की तीसरी किस्त की घोषणा करते हुए एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि मुद्रास्फीति चार फीसदी के लक्ष्य से अच्छी-खासी नीचे है. सरकार ने रिजर्व बैंक को खुदरा मुद्रास्फीति चार फीसदी से नीचे रखने का लक्ष्य दिया है. हालांकि खुदरा मुद्रास्फीति अगस्त में कुछ तेज होकर 3.21 फीसदी पर पहुंच गयी, लेकिन यह अब निर्धारित दायरे में है.सीतारमण ने कहा कि 2018-19 की चौथी तिमाही में औद्योगिक उत्पादन से संबंधित सारी चिंताओं के बाद भी जुलाई, 2019 तक हमें सुधार के स्पष्ट संकेत दिखाई देते हैं. उन्होंने कहा कि आंशिक ऋण गारंटी योजना समेत गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) में ऋण का प्रवाह सुधारने के कदमों की घोषणा के परिणाम दिखाई देने लगे हैं. उन्होंने कहा कि कई एनबीएफसी को फायदा हुआ है. उन्होंने कहा कि गोवा में जीएसटी परिषद की बैठक से एक दिन पहले वह अर्थव्यवस्था में ऋण प्रवाह की समीक्षा करने के लिए 19 सितंबर को सार्वजनिक बैंकों के प्रमुखों से मुलाकात करेंगी.
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने निर्यातकों के लिए ऋण प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के लिए ऋण आवंटन के संशोधित नियमों (पीएसएल) की घोषणा की. इससे निर्यातकों को 36,000 करोड़ रुपये से लेकर 68,000 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त वित्त पोषण मिलेगा. सीतारमण ने कहा कि निर्यातकों को ऋण के लिए पीएसएल नियमों की समीक्षा की जायेगी. दिशानिर्देशों पर भारतीय रिजर्व बैंक के साथ विचार-विमर्श चल रहा है.
सीतारमण ने यहां संवाददाताओं से कहा, ‘‘इससे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के तहत निर्यात ऋण के लिए 36,000 करोड़ रुपये 68,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त पूंजी उपलब्ध होगी. उन्होंने कहा कि वाणिज्य विभाग के तहत एक अंतर-मंत्रालयी समूह निर्यात क्षेत्र को वित्त पोषण की सक्रिय निगरानी करेगा. इसके अलावा, निर्यात ऋण गारंटी निगम (ईसीजीसी) निर्यात ऋण बीमा योजना का दायरा बढ़ायेगा.
सीतारमण ने कहा कि इस पहल की सालाना लागत 1,700 करोड़ रुपये आयेगी. साथ ही, यह ब्याज दर समेत निर्यात ऋण की पूरी लागत को विशेषकर लघु एवं मझोले कारोबारों के लिए कम करने में मदद करेगी. उन्होंने यह भी घोषणा की कि मुक्त व्यापार समझौता उपयोग मिशन की भी स्थापना की जायेगी.
इसका मकसद निर्यातकों को उन देशों से शुल्क छूट दिलाने में मदद करना है, जिनके साथ भारत ने संधि की है. इसके अलावा, देश में चार स्थानों पर हस्तशिल्प, योग, पर्यटन, कपड़ा और चमड़ा क्षेत्रों के लिए वार्षिक शॉपिंग फेस्टिवल आयोजित किये जायेंगे.
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व्यापारियों को ई कामर्स पर आना ही पड़ेगाःकमलनाथ
भोपाल,4 सितंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। कनफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स कैट के पदाधिकारियों ने कैट के राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीण खंडेलवाल जी के नेतृत्व में बल्लभ भवन में माननीय मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ से मुलाकात की।व्यापारियों की समस्याओं के जवाब में उन्हें मुख्यमंत्री ने सुझाया कि यदि व्यापार को सुरक्षित रखना है और बढ़ाना है तो मौजूदा व्यवस्था के साथ साथ कारोबारियों को ई कामर्स का इस्तेमाल भी बढ़ाना होगा। यह प्लेटफार्म व्यापार की चुनौतियों से निपटने में मददगार साबित होगा।
कैट के प्रवक्ता विवेक साहू ने हुए बताया कि भेंट के दौरान माननीय मुख्यमंत्री ने कहा कि विश्वभर में बढ़ते ऑनलाइन कारोबार को देखते हुए अब यह आवश्यक हो गया है कि आने वाले समय में व्यापारियों को ई-कॉमर्स पर लाना होगा। हम अपने व्यवसाय को ऑफलाइन के साथ-साथ आनॅलाइन पर भी रखे ।
उन्होंने आगे कहा है कि हम मध्यप्रदेश में इसे अभियान के रूप में चलायेंगे।कैट के महामंत्री प्रवीण खंडेलवाल ने मुख्यमंत्री को बताया कि कैट एक पोर्टल तैयार करने जा रहा है जो व्यापारियों को ऑनलाइन व्यापार करने के लिए प्रेरित करेगा जिसमें विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राएं भी इसमें प्रतिभागी रहेंगे।हम उन्हें रोजगार के अवसर प्रदान करेंगे और छोटे कारोबारियों को बिना किसी आर्थिक भार के ई-कॉमर्स का उपयोग सिखाने में भी मददगार साबित होंगे।
चर्चा में मुख्यमंत्री ने कहा कि मंडियों में किसानों को नगद भुगतान आवश्यक है क्योंकि बैंकों में कैश उपलब्ध ना होने की स्थिति में किसान को परेशानी होती है। अतः इसके लिए हम केन्द्र सरकार से बात करेंगे और व्यापरियों को परेशानी ना हो एवं किसान को भी उसकी फसल का पैसा मिले इसके लिए हम एक योजना बनाकर कार्य करेंगे।
इस अवसर पर उन्होंने कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के ‘‘बैज‘‘ का लोकार्पण किया। कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के मध्यप्रदेश अध्यक्ष भूपेन्द्र जैन ने मुख्यमंत्री को पहला बैज लगाकर सम्मानित किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश के युवाओं को स्वावलंबी बनाने के लिए महिला उद्यमियों को विकास के लिए हर जिले में मुद्रा लोन शिविर लगाये जायेंगे और विश्वविद्यालय स्तर पर स्टार्टअप समिट होगी।
मुख्यमंत्री ने कैट के प्रस्ताव को थाना स्तर पर व्यापारिक समितियां बनाने के लिए पुलिस महानिदेशक को आवश्यक दिशा-निर्देश देने का आश्वासन दिया।
मुख्यमंत्री ने मध्यप्रदेश में व्यापारियों और कारोबारियों को आमंत्रित करते हुए कहा कि जो अधिक से अधिक रोजगार देगा उसके लिए राज्य शासन हरसंभव मदद करेगी। इस अवसर पर कैट के राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीण खंडेलवाल ने कैट, सीएससी, मास्टर कार्ड एवं ग्लोबल लिंकर ई-कॉमर्स बिजनिस की परिकल्पना से मुख्यमंत्री को अवगत कराया। मुख्यमंत्री ने कहा कि जिला स्तर पर कलेक्टर की अध्यक्षता में जो व्यापारिक समितियां बन रही हैं उनमें एवं अन्य जिला स्तरीय कमेटियों में कैट को उचित प्रतिनिधित्व मिलेगा। कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) मध्यप्रदेश राज्य शासन के साथ मिलकर प्रदेश के आर्थिक विकास के लिए कार्य करे।
राष्ट्रीय वरिष्ठ उपाध्यक्ष कैलाश अग्रवाल, राधेश्याम महेश्वरी, ग्लोबल लिंकर के समीर वकील, कैट के सोशल मीडिया प्रभारी सुमित अग्रवाल, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राधेश्याम माहेश्वरी, सेन्ट्रल जोन कोर्डिनेटर रमेश गुप्ता, प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र जैन, महामंत्री मुकेश अग्रवाल, प्रवक्ता विवेक साहू, संयुक्त सचिव मनोज चौरसिया, अजय चौरिया, अविचल जैन, नरेन्द्र मांडिल आदि उपस्थित थे।
इससे पूर्व प्रतिनिधिमंडल ने राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सुनील कुमार से भेंट की और व्यापारियों को ई-कॉमर्स में परिवर्तन करने के लिए विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं का सहयोग मांगा। इसे कुलपति ने स्वीकर किया और 9 सितम्बर से उनकी ट्रेनिंग प्रारंभ होगी।
इसी श्रंखला में आज एमपी नगर स्थित गौरव होटल में विदेशी व्यापारियों के साथ बैठक का आयोजन किया गया ।बैठक के मुख्य अतिथि प्रवीण खंडेलवाल ने व्यापारियों को संबोधित करते हुए कहा कि आज का समय डिजिटल युग का हैं और उसके बिना व्यापार करना नामुमकिन है जो व्यापारी आज के दौर में डिजिटल तकनीक नहीं अपना आएगा वह धीरे-धीरे अपना व्यापार को खोता जाएगा। -

सार्वजनिक क्षेत्र के छह और बैंकों का विलय,अब केवल 12 बचेंगे

The Union Minister for Finance and Corporate Affairs, Smt. Nirmala Sitharaman addressing a press conference, in New Delhi on August 30, 2019. The Secretary, Department of Financial Services, Shri Rajiv Kumar is also seen.
नईदिल्ली,30 अगस्त(प्रेस सूचना केन्द्र) नरेन्द्र मोदी सरकार ने आज बैंकों की बड़ी विलय योजना की घोषणा की, जिससे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की संख्या एक ही झटके में 18 से घटकर 12 रह जाएगी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) ओरियन्टल बैंक ऑफ कॉमर्स और यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया का अधिग्रहण करेगा। इसी तरह वहीं केनरा बैंक में सिंडिकेट बैंक का, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में आन्ध्रा बैंक और कॉर्पोरेशन बैंक तथा इंडियन बैंक में इलाहाबाद बैंक का विलय होगा। सीतारमण ने कहा कि इन 10 बैंकों की जगह केवल 4 बैंक रह जाएंगे और सरकार चालू वित्त वर्ष के दौरान 70,000 करोड़ रुपये के पुर्नपूंजीकरण में से करीब 55,250 करोड़ रुपये की पूंजी इन्हीं बैंकों में डालेगी।
बैंकों के विलय की घोषणा करते हुए वित्त मंत्री और वित्त सचिव राजीव कुमार ने बार-बार दोहराया कि इस निर्णय से किसी कर्मचारी की नौकरी नहीं जाएगी। कुमार ने कहा कि प्रस्तावित विलय की समयसीमा इन दस बैंकों के बोर्डों से परामर्श करने के बाद तय की जाएगी। उन्होंने कहा, ‘इस निर्णय से नौकरियों पर किसी तरह की आंच नहीं आएगी। जिन बैंकों में इनका विलय होगा, वे विलय होने वाले बैंकों के कर्मचारियों को बनाए रखेंगे।’
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा, ‘बैंक एकीकरण के दो चरण पहले ही किए जा चुके हैं और अपनी बैंकिंग व्यवस्था को मजबूत बनाने तथा 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य हासिल करने के लिए हम एक बार फिर विलय करना चाहते हैं। हम नई पीढ़ी के और बड़े बैंक बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिनकी अधिक कर्ज देने की क्षमता हो।’ उन्होंने कहा, ‘इंडियन ओवरसीज बैंक, यूको बैंक, बैंक ऑफ महाराष्ट्र और पंजाब एण्ड सिंध बैंक पहले की तरह काम करते रहेंगे क्योंकि ये मजबूत क्षेत्रीय बैंक हैं।’ वित्त मंत्री ने बैंकों के लिए नए परिचालन सुधारों की भी घोषणा की।
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निदेशक मंडल अब महाप्रबंधक से ऊपर के दर्जे के अधिकारियों का प्रदर्शन आधारित मूल्यांकन करेंगे। बैंक अपने मुख्य जोखिम अधिकारी को बाजार के अनुकूल पारितोषिक पर नियुक्त कर सकेंगे। बोर्ड को वरिष्ठ प्रबंधन के कार्यकाल की योजना तय करने की आजादी होगी। इसके अलावा गैर-आधिकारिक निदेशकों की फीस में इजाफा किया जाएगा, बोर्ड समितियों को तार्किक बनाया जाएगा और प्रबंधन समिति की कर्ज मंजूर करने की सीमा बढ़ाकर 100 फीसदी तक की जाएगी ताकि उच्च मूल्य के ऋण प्रस्तावों पर ज्यादा ध्यान दिया जा सके। इसके साथ ही बड़े सरकारी बैंकों में कार्यकारी निदेशकों की संख्या मौजूदा तीन से बढ़ाकर चार की जाएगी।
पीएनबी में ओरियन्टल बैंक और यूनाइटेड बैंक का विलय होने के बाद वह 17.95 लाख करोड़ रुपये के कारोबार, 11,437 शाखाओं और 10.44 लाख करोड़ रुपये की जमा के साथ देश का दूसरा सबसे बड़ा बैंक बन जाएगा। एकीकृत इकाई की गैर-निष्पादित आस्तियां 6.61 फीसदी रहने का अनुमान है, जो ओरियन्टल बैंक ऑफ कॉमर्स के एनपीए से अधिक लेकिन पीएनबी और यूनाइटेड बैंक से कम है।केनरा बैंक और सिंडिकेट बैंक का विलय होने के बाद कारोबार के लिहाज से वह देश का चौथा सबसे बड़ा बैंक होगा, जबकि शाखाओं के हिसाब से तीसरा सबसे बड़ा बैंक बन जाएगा। एकीकृत इकाई के पास कुल जमा राशि 8.59 लाख करोड़ रुपये होगी और शुद्घ एनपीए अनुपात 5.62 फीसदी होगा।
यूनियन बैंक, आन्ध्रा बैंक और कॉर्पोरेशन बैंक के एकीकरण से देश का पांचवां सबसे बड़ा सरकारी बैंक बनेगा। इसकी एकीकृत जमा 8.20 लाख करोड़ रुपये और शुद्घ एनपीए अनुपात 6.30 फीसदी होगा, जो यूनियन बैंक के एनपीए से कम लेकिन आन्ध्रा बैंक और कॉर्पोरेशन बैंक के एनपीए से अधिक है। इंडियन बैंक और इलाहाबाद बैंक के एकीकरण से देश का सातवां सबसे बड़ा सरकारी बैंक बनेगा, जिसकी कुल जमा राशि 4.56 लाख करोड़ रुपये होगी और एनपीए अनुपात 4.39 फीसदी होगा।क्रिसिल रेटिंग्स के वरिष्ठ निदेशक कृष्णन सीतारमण ने कहा, ‘इतने बड़े स्तर पर एकीकरण से कुछ समय के लिए कामकाज की शैली के अंतर, मानव संसाधन को संभालने, बैंक शाखाओं को तर्कसंगत बनाने एवं तकनीकी एकीकरण करने जैसी चुनौतियों से जूझना पड़ सकता है। अगर इसे सही तरीके से क्रियान्वित किया गया तो मध्यम अवधि में इसका लाभ होगा और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ज्यादा प्रभावी तरीके से प्रतिस्पद्र्घा कर सकेंगे।’भारी-भरकम विलय की घोषणा वित्त सचिव, वित्त मंत्री और सार्वजनिक क्षेत्र के 10 बैंकों के मुख्य कार्याधिकारियों की बैठक के बाद की गई।
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रिजर्व बैंक की सालाना आय 146.5% बढ़ी
नई दिल्ली,31 अगस्त (प्रेस सूचना केन्द्र) RBI (भारतीय रिजर्व बैंक) ने बुधवार को अपनी सालाना रिपोर्ट पेश की। इसके अनुसार, केंद्रीय बैंक की बैलेंस शीट में 13.42 फीसद का इजाफा हुआ है और यह 41.03 लाख करोड़ रुपये रहा। वहीं, ब्याज से होने वाली आय 2018-19 में 146.59 फीसद बढ़कर 1.93 लाख करोड़ रुपये रही। अपने वार्षिक रिपोर्ट में RBI ने कहा है कि ब्याज से होने वाली उसकी आय 44.62 फीसद बढ़कर 1.06 लाख करोड़ रुपये रही और अन्य स्रोतों से होने वाली आय 30 जून 2019 के अनुसार, 86,199 करोड़ रुपये रही जो एक साल पहले की अवधि में 4,410 करोड़ रुपये थी।
RBI ने कहा कि 30 जून 2019 के अनुसार, सरकारी प्रतिभूतियों में उसका निवेश 57.19 फीसद बढ़कर 6.29 लाख रुपये से 9.89 करोड़ रुपये रहा। इसमें लिक्विडिटी मैनेजमेंट ऑपरेशंस के दौरान 3.31 लाख करोड़ रुपये की सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद शामिल है। रिजर्व बैंक का विदेशी विनिमय लाभ बढ़कर 28,998 करोड़ रुपये रहा। पिछले वर्ष इसमें 4,067 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था।
2018-19 में सरकार को ट्रांसफर की जाने वाली सरप्लस राशि रिजर्व बैंक के बोर्ड द्वारा इस हफ्ते अपनाए गए इकोनॉमिक कैपिटल फ्रेमवर्क अपनाए जाने के बाद समायोजन के आधार पर 1.76 लाख करोड़ रुपये रहा। यह नया फ्रेमवर्क 27 अगस्त को बिमल जालान कमेटी द्वारा दिए गए सुझावों का एक हिस्सा है। सरकार को दी जाने वाली राशि में फरवरी में दिया गया 28,000 करोड़ रुपया भी शामिल है।
30 जून 2019 के अनुसार, RBI के पास 618.16 मेट्रिक टन सोना था जो 30 जून 2018 को 566.23 मेट्रिक टन था। इस साल के दौरान 51.93 मेट्रिक टन सोना और बढ़ा है।
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चार हजार खाद्य नमूने उठाए केवल छह नकली निकले
भोपाल,27 अगस्त(प्रेस सूचना केन्द्र)। कमलनाथ सरकार ने जनता की सहानुभूति हासिल करने के लिए जो शुद्ध के लिए युद्ध चलाया उसका नतीजा टांय टांय फिस्स साबित होने लगा है। खोदा पहाड़ और निकली चुहिया जैसी कहावत इस अभियान को देखते हुए सटीक साबित हो रही है। प्रदेश भर में जिन 3840 व्यापारियों के प्रतिष्ठानों से खाद्य नमूने जब्त किए उनमें से मात्र छह नमूने प्रतिबंधित निकले हैं। जबकि सरकार ने प्रदेश में बिक रहे 70 फीसदी खाद्य पदार्थों के नकली होने का शोर मचाया था।
अधिकृत सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार पिछले महीने 19 जुलाई से कथित तौर पर मिलावट के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के जो नतीजे सामने आए हैं उनमें मात्र छह नमूनों में प्रतिबंधित पदार्थ पाए गए हैं। आज 28 अगस्त तक जिन 723 नमूनों की जांच रिपोर्ट सामने आई है उनमें से 374नमूने मानक स्तर के पाए गए हैं। नमूनों में से 277 जांच में अवमानक निकले हैं। ब्रांड की कसौटी पर 27 को मिथ्या ब्रांड पाया गया है। यानि कि उन्हें बेचने के लिए ब्रांड नाम की अनुमति नहीं ली गई थी। 23 सैंपलों में मिलावट पाई गई है, यानि उनमें पाम आईल या अन्य खाद्यान्नों के अंश पाए गए हैं। सोलह नमूनों को असुरक्षित पाया गया है उनमें यूरिया या डिटर्जेंट पाऊडर जैसे पदार्थों के अंश पाए गए हैं।

केवल छह नमूनों में प्रतिबंधित पदार्थों की मौजूदगी पता चली है।ये नमूने उन्हीं व्यापारियों से बरामद हुए हैं जिनके बारे में लंबे समय से नकली खाद्यान् बनाने की शिकायतें मिलती रहीं थीं। इन्हीं की आड़ में सरकार ने धड़ाधड़ छापेमारी करके पूरे प्रदेश में भय का वातावरण निर्मित कर दिया। बीते राखी के त्यौहार के दौरान या तो उपभोक्ताओं ने इन खाद्यान्नों का इस्तेमाल नहीं किया या फिर उन्होंने ब्रांडेड कंपनियों के खाद्य पदार्थ खरीदकर त्यौहार मनाया।
गौरतलब है कि राज्य सरकार के पास इतने बड़े अभियान को चलाने लायक अमला नहीं है। फूड लेबोरेटरी में रेंडम सैंपल लेने और जांच करने की व्यवस्था है लेकिन एक साथ हजारों नमूनों की तत्काल जांच की सुविधा नहीं है। इसके बावजूद सरकार ने न केवल अभियान चलाकर व्यापारियों पर हल्ला बोला बल्कि कई जिलों के कलेक्टरों ने व्यापारियों के विरुद्ध रासुका के अंतर्गत कार्यवाही करके भय का माहौल बना दिया है।
राखी के अवसर पर व्यापारियों ने ज्ञापन देकर अनुरोध किया था कि खादय नमूनों को दूकानों से लिया जाए। परिवहन के दौरान जो नमूने लिए जाते हैं उनसे विक्रेताओं की धरपकड़ नहीं हो पाती है। इससे न ही खाद्यान्न निर्माताओं की पहचान संभव हो पाती है। व्यापारियों का कहना है कि खाद्य अमले ने इसके बाद रणनीति बदली थी लेकिन इस पूरे अभियान से कच्चा धंधा करने वाले व्यापारियों को खासी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। जबकि ये अभियान ईमानदार व्यापारियों को परेशान किए बगैर भी चलाया जा सकता था।
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बिजली मंहगी कर खरीदे जाएंगे नए मीटर
भोपाल।मध्यप्रदेश में बिजली बिल हाफ करने का वादा करके सत्ता में लौटी कांग्रेस सरकार ने अगले महीने से उपभोक्ताओं को मंहगी बिजली बेचने की तैयारी कर ली है। खजाना खाली होने का हवाला देकर सरकार ने अठारह हजार करोड़ रुपए के घाटे को पाटने और बिजली मीटरों की खरीद के लिए पैसा जुटाने के लिए बिजली के दाम बढ़ाने का फैसला लिया है। लगातार बढ़ती वितरण क्षति को पाटने की जवाबदारी भी अब आम उपभोक्ता को उठाना पड़ेगी।
बिजली मंत्री प्रियव्रत सिंह की सिफारिशों को मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अनुमति देकर बिजली कंपनियों को अतिरिक्त धन जुटाने की ये जवाबदारी सौंपी है। सरकार ने इसी साल नवंबर महीने तक पूरे बिजली कनेक्शनों पर नए मीटर लगाने की समय सीमा तय की है। इसके लिए बिजली कंपनियों को अतिरक्त धन राशि की जरूरत थी। जिसे बढ़ी दरों से ही जुटाया जाएगा। उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली दिलाने के लिए सरकार सब्सिडी दे सकती थी लेकिन सरकार ने उपभोक्ताओं से ही ये धन जुटाने की तैयारी की है।
मध्य प्रदेश विद्युत नियामक आयोग ने बिजली कंपनियों की सिफारिशों को मानते हुए बिजली की दरों में सात फीसदी दाम बढ़ाने की अनुमति दे दी है।इसके बाद सरकार की अनुमति से बिजली मंडल ने घरेलू, गैर घरेलू और व्यावसायिक उपभोक्ताओं की बिजली दरों में इजाफा किया है। नई दरें 17 अगस्त से लागू होंगी। राज्य की बिजली कंपनियों ने बिजली दरों में 12 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की मांग की थी,मगर आयोग ने बिजली दरों में सात प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी की अनुमति दी है। इससे राज्य के लोगों को अब सितंबर माह से बिजली के ज्यादा दाम चुकाने होंगे।
नई बिजली दरों का फैसला गुरुवार की रात को आयोग ने किया। नई दरों के अनुसार, घरेलू कनेक्शन की बिजली दरें 5.1 प्रतिशत, गैर घरेलू कनेक्शन की दर में 4.9 प्रतिशत और व्यावसायिक कनेक्शन की दरों में सात प्रतिशत तक का इजाफा किया गया है।

आयोग ने बिजली उपभोक्ताओं के लिए पांच स्लैब तय किए हैं, जिसके मुताबिक घरेलू उपभोक्ता को मासिक 30 यूनिट तक का उपयोग करने पर 3.25 रुपये प्रति यूनिट, 50 यूनिट तक बिजली के उपयोग पर 4.05 रुपये प्रति यूनिट, 51 से 150 यूनिट के उपयोग पर दर 4.95 रुपये प्रति यूनिट, 151 यूनिट से 300 यूनिट के उपयोग पर 6.30 रुपये प्रति यूनिट और 300 यूनिट से ज्यादा बिजली का उपयेाग करने पर 6.50 रुपये प्रति यूनिट की राशि का भुगतान करना होगा।
आयोग बिजली दरों के निर्धारण के लिए बनाए गए पांच स्लैब पर नजर दौड़ाई जाए तो पता चलता है कि पुरानी दरों के मुकाबले 20 से 30 पैसे प्रति यूनिट तक इजाफा हुआ है। पहले चार स्लैब थे, अब पांच स्लैब बनाए गए हैं।
एक तरफ जहां बिजली दरों में बढ़ोत्तरी की गई है, वहीं वैवाहिक उद्यानों, सामाजिक व वैवाहिक कार्यक्रमों के आयोजन, धार्मिक समारोह के लिए अस्थाई बिजली कनेक्शनों की दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है।
इसी तरह ई-वाहन और ई-रिक्शा के चार्जिंग केंद्र की बिजली दरें भी पूर्ववत रखी गई हैं। इसके साथ ही कृषि उपभोक्ताओं को सब्सिडी के अतिरिक्त प्रति हार्सपावर प्रति वर्ष 700 रुपये का भुगतान करना होगा, जबकि 10 हार्सपॉवर से ज्यादा के कृषि उपभेाक्ताओं को सब्सिडी के अतिरिक्त प्रति वर्ष 1400 रुपये का भुगतान करना होगा।
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खेती में राज्यों की धींगामुश्ती रोकेगी समवर्ती सूची
सुरिंदर सूद
किसानों की समस्याओं पर गठित एम एस स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय आयोग (नैशनल कमीशन ऑन फार्मर्स) ने कृषि क्षेत्र को राज्य सूची से स्थानांतरित कर समवर्ती सूची में रखने की सिफारिश की थी। अफसोस की बात है कि इस महत्त्वपूर्ण सिफारिश पर उतना ध्यान नहीं दिया गया है, जितनी जरूरत थी। कृषि विषय अगर समवर्ती सूची में लाया जाता है तो इससे कृषि एवं किसानों से जुड़े मसलों पर केंद्र सरकार अपेक्षाकृत अधिक निर्णायक कदम उठा पाएगी, साथ ही राज्य सरकारों के अधिकारों पर भी कोई खास असर नहीं होगा। फिलहाल केंद्र को उन कृषि विकास एवं किसानों के लिए कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए भी राज्य सरकारों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिनका वित्त पोषण यह स्वयं कर रहा है।
वास्तव में कृषि क्षेत्र को राज्य सरकार की मर्जी पर छोडऩा भारत सरकार अधिनियम, 1935 की ‘देन’ कही जा सकती है। उस समय इसके पीछे तर्क यह दिया गया था कि चूंकि, कृषि क्षेत्र विशेष पेशा है और मुख्य तौर पर स्थानीय कृषि-पारिस्थितिकी वातावरण और मूल स्थानों पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है, इसलिए प्रांतीय सरकारें इस क्षेत्र की बेहतर देखभाल कर सकती हैं। उन दिनों कृषि कार्य केवल खाद्य जरूरतें पूरी करने के लिए किए होते थे और खाद्यान्न की खरीद-बिक्री सीमित स्तर पर होती थी। किसानों से जुड़ीं समस्याएं भी स्थानीय स्तर तक ही सीमित थीं।
आधुनिक समय में परिस्थितियां काफी बदल गई हैं। आधुनिक समय में कृषि क्षेत्रीय सीमाओं में बंधा नहीं रह गया है और अब राज्यों के बीच व्यापारिक सौदे इसका हिस्सा बन गए हैं। इतना ही नहीं, कृषि अब अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों खासकर व्यापार, उद्योग और सेवा से भी जुड़ गया है। अब कोई एक राज्य कृषि के संबंध में कोई निर्णय लेता है तो इसका प्रभाव दूसरे राज्यों की कृषि-अर्थव्यवस्था पर भी देखा जाता है। लिहाजा कृषि क्षेत्रों पर राज्यों के बेरोकटोक नियंत्रण से समस्याएं खड़ी हो रही हैं और इनका प्रतिकूल असर पड़ रहा है।
स्वामीनाथन समिति की पांचवीं और अंतिम रिपोर्ट अक्टूबर 2006 में जारी हुई थी, जिसमें कृषि को समवर्ती सूची में स्थानांतरित करने का प्रस्ताव दिया गया था। रिपोर्ट में इस ओर ध्यान दिलाया गया था कि फसलों का समर्थन मूल्य, संस्थागत साख और कृषि-जिंस कारोबार-घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय- आदि से जुड़े निर्णय केंद्र सरकार द्वारा लिए जाते हैं। कुछ महत्त्वपूर्ण कानून, जिनका कृषि क्षेत्र पर व्यापक असर पड़ा है, संसद ने बनाए हैं, जो केंद्र की देख-रेख में काम करते हैं। पौधे की नस्लों की सुरक्षा एवं किसानों के अधिकार कानून, जैविक विविधता कानून और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून कुछ ऐसे ही उदाहरण हैं। इनके अलावा ग्रामीण ढांचा, सिंचाई एवं अन्य कृषि विकास कार्यक्रमों के लिए ज्यादातर राशि केंद्र ही मुहैया कराता है। आयोग ने कहा, ‘कृषि समवर्ती सूची में आने से किसानों की सेवा और कृषि की संरक्षा केंद्र एवं राज्य दोनों का उत्तरदायित्व बन जाएंगे।’
कृषि को समवर्ती सूची में लाने की सिफारिश के पीछे कुछ और कारण भी हैं। कुछ राज्य सरकारों के असहयोग करने से किसानों की समस्याएं दूर करने एवं उनकी आय बढ़ाने के लिए शुरू की गईं केंद्र की कुछ योजनाएं अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रही हैं। उदाहरण के लिए फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम किसान) और प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (पीएम आशा) कुछ ऐसी ही योजनाएं हैं, जिनका पूर्ण लाभ नहीं मिल पा रहा है। इतना ही नहीं, कृषि विपणन, जमीन पट्टा, अनुबंध आधारित कृषि आदि से जुड़े कुछ महत्त्वपूर्ण सुधार भी कुछ खास बदलाव नहीं ला पा रहे हैं। एक बार फिर कुछ राज्यों का असहयोग इसके लिए जिम्मेदार रहा है।
किसानों की आय दोगुनी करने की संभावनाएं तलाशने के लिए गठित दलवाई समिति ने भी कृषि विपणन को समवर्ती सूची में रखने पर जोर दिया है। समिति के अनुसार इससे कृषि मंडियों में व्यापक सुधार, इनकी परिचालन क्षमता में इजाफा और ग्रामीण विपणन तंत्र के विस्तार में केंद्र सरकार को आसानी होगी। दलवाई समिति की रिपोर्ट ने कृषि को समवर्ती सूची में स्थानांतरित करने की दलील और मजबूत कर दी है। इससे पहले भी किसी विषय को एक सूची से दूसरी सूची में डालने के लिए संविधान में संशोधन हो चुके हैं। उदाहरण के लिए 1976 में 42वें संशोधन में वन एवं वन्यजीव सुरक्षा सहित पांच विषय राज्य से निकालकर समवर्ती सूची में डाल दिए गए। विषय की महत्ता और इससे मिलने वाले संभावित लाभों को देखते हुए सभी राजनीतिक दलों को कृषि को राज्य सूची से स्थानांतरित कर समवर्ती सूची में रखने के लिए एक और संविधान संशोधन को समर्थन देना चाहिए। कृषि और किसान दोनों इससे लाभान्वित होंगे।
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खनन की मंजूरी दे केन्द्रःकमलनाथ
प्राइज डेफिसिट योजना के 575.90 करोड़ मांगे
मुख्यमंत्री कमल नाथ की प्रधानमंत्री से मुलाकात,भोपाल,4 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र) मुख्यमंत्री कमल नाथ ने नई दिल्ली में आज प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की और कृषि एवं खनन से जुड़े मुददों पर विस्तार से चर्चा की। श्री नाथ ने राज्य की आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिये माइनिंग लीज पाने की पात्रता रखने वाले 27 प्रकरण में जल्द से जल्द निर्णय लेने का अनुरोध किया। श्री कमल नाथ ने प्रधानमंत्री को विस्तार से बताया कि मध्यप्रदेश के करीब 170 आवेदन हैं जो खदान एवं खनिज (विकास एवं नियमन) अधिनियम की धारा 10-ए और 2-बी के अंतर्गत माइनिंग लीज अनुदान पाने की पात्रता रखते हैं। इन प्रस्तावों पर जल्द निर्णय होने से राज्य की आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।
मुख्यमंत्री ने बताया कि जनवरी 2015 में खदान और खनिज (विकास एवं नियमन) अधिनियम मध्यप्रदेश जैसे राज्य जिला खनिज कोष के नये प्रावधानों का लाभ उठा रहे हैं। साथ ही वे अधोसंरचना के विकास और खनन गतिविधियों से प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के लिये अन्य संकेतकों को सुधारने में भी योगदान दे रहे हैं।
प्राइज डेफिसिट योजना के 575.90 करोड़ रूपये जारी करने का आग्रह
मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ ने प्रधानमंत्री का ध्यान तिलहन के लिये प्राइज डेफिसिट भुगतान योजना के क्रियान्वयन लागत की शेष राशि 575.90 करोड़ रूपये शीघ्र जारी करने का आग्रह किया है। उन्होंने प्रधानमंत्री समर्थन मूल्य तय करने के पूर्व के निर्णय को आगे बढाते हुए अभियान के क्रियान्वयन के संबंध में ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि अभियान के माध्यम से किसानों को उनकी उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने के लिये राज्य सरकार प्रतिबद्ध है।
श्री नाथ ने श्री मोदी को बताया कि मध्यप्रदेश सरकार ने 1951.80 करोड़ रूपये किसानों को भुगतान किये थे जो न्यूनतम समर्थन मूल्य और आदर्श विक्रय मूल्य का अंतर था। उन्होंने कहा कि यदि यह फसल नाफेड द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर उपार्जित होती तो प्रशासनिक लागत और हानि करीब 2800 करोड़ आती।
मुख्यमंत्री ने लागत में 50 प्रतिशत की भागीदारी भारत सरकार द्वारा करने के निर्णय को देखते हुए शेष 575.90 करोड़ रूपये शीघ्र जारी करवाने का आग्रह किया ।
सोयाबीन के लिये म.प्र. का लक्ष्य 26.92 लाख मीट्रिक टन करने का आग्रह
मुख्यमंत्री ने सोयाबीन के लिये प्राइज डेफिसिट योजना में राज्य के उत्पादन का 40 प्रतिशत यानी 26.92 लाख मीट्रिक टन लक्ष्य तय करने का आग्रह किया है।
श्री नाथ ने कहा कि प्राइज डेफिसिट योजना की गाइडलाइन में राज्य को दिये लक्ष्य को उत्पादन का 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 40 प्रतिशत करने के तरीके का उल्लेख नहीं किया गया है जबकि यही मूल्य समर्थन योजना की गाइडलाइन में अंकित है। उन्होंने प्राइज डेफिसिट योजना में परिवर्तन करने का आग्रह करते हुए कहा कि इससे उत्पादन के 25 प्रतिशत के लक्ष्य को 40 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकेगा।
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यूरिया संकट पर मुख्यमंत्री कमलनाथ के उपाय सफल
कृषि विकास एवं किसान कल्याण विभाग लगातार कर रहा है समीक्षा
भोपाल,21 दिसंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)।मुख्यमंत्री कमल नाथ के प्रयासों से प्रदेश में किसानों के लिये रबी सीजन में यूरिया सहित अन्य उर्वरकों की आपूर्ति बढ़ी है। इसके लिये कृषि एवं किसान कल्याण विभाग केन्द्र के रेल और रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय से लगातार सम्पर्क कर रहा है। उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री कमल नाथ ने किसानों की जरूरतों को देखते हुए गुरुवार को मंत्रालय में वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक में यूरिया की उपलब्धता की समीक्षा की थी। प्रदेश को जल्द ही यूरिया की 12 रेक्स मिलेंगी।
प्रमुख सचिव, कृषि विकास एवं किसान कल्याण डॉ. राजेश राजौरा के अनुसार एनएफएल और चम्बल फर्टिलाइजर अपने प्लांटों से मध्यप्रदेश को तेजी से यूरिया की आपूर्ति करेंगे। नेशनल फर्टिलाइजर लिमिटेड (एनएफएल) का गुना प्लांट मध्यप्रदेश को ही यूरिया की आपूर्ति करने पर तेजी से विचार कर रहा है।
वर्तमान में ग्वालियर के रेक पाइंट में 2600 मीट्रिक टन यूरिया पहुँच रहा है। इस पाइंट से ग्वालियर, दतिया और मुरैना जिले के किसानों को आपूर्ति होगी। शाजापुर में 3194 मीट्रिक टन, मण्डीदीप में 2700 मीट्रिक टन, हरपालपुर में इफ्को कम्पनी का 3139 मीट्रिक टन यूरिया पहुँच रहा है। इससे छतरपुर जिले के किसानों को यूरिया की आपूर्ति होगी। मण्डीदीप रेक पाइंट में एनएफएल कम्पनी का 3000 मीट्रिक टन, खण्डवा में 3194 मीट्रिक टन, गुना में 3017 मीट्रिक टन, सतना में 2600 मीट्रिक टन यूरिया दो दिनों में पहुँचने वाला है। खण्डवा में 1951 मीट्रिक टन यूरिया आज ही पहुँचा है। इसके वितरण की व्यवस्था के संबंध में कलेक्टर्स को निर्देश दे दिये गये हैं। मण्डीदीप रेक पाइंट में 24 दिसम्बर तक इफ्को का 3194 मीट्रिक टन यूरिया और पहुँचेगा, जिसका वितरण रायसेन, भोपाल और सीहोर जिले के किसानों को किया जायेगा।
रेल मंत्रालय भी कर रहा है सहयोग
भारत सरकार के रेल मंत्रालय के एडीशनल मेंबर (ट्रेफिक) श्री अनुराग ने आज प्रदेश के किसान-कल्याण और कृषि विकास विभाग को पत्र लिखकर जानकारी दी है कि उर्वरकों की 9 रैक ट्रांजिट में हैं, जो एक-दो दिन में प्रदेश को प्राप्त हो जायेंगी। पूर्व में देश के बंदरगाहों से डीएपी को ही उठाव करने की प्राथमिकता थी। मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ के प्रयासों के फलस्वरूप अब देशभर के किसानों के लिये यूरिया के रैक्स उठाने के लिये देश के अन्य राज्यों को भी प्राथमिकता दी जा रही है।
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गांव को बाजार की गुलामी से कैसे मिले आजादी
लेखक : प्रभाकर केलकर ,भारतीय किसान संघ
पिछले महीनो में देश के अनेक राज्यों में किसानों द्वारा अपनी मांगो को लेकर विधानसभा एवं संसद घेराव के मार्च का सिलसिला तेज हुआ है। किसान संगठनो की अलग अलग सभाऐं हो रही है। जिनमें अनेक राजनैतिक दलों के झण्डे एवं नेता भी शामिल होतें है और उत्तेजक भाषणों के साथ ये कार्यक्रम किसी अगली योजना के एलान के साथ समाप्त होते हैं… हर सभाओ में प्रमुख मुद्दे 1.कर्जमाफी 2. पेंशन 3. लाभकारी मूल्य 4.न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) होते हैं ,लेकिन समाधान की पहल नज़र नहीं आती है।
विगत 30 वर्षो में अनेक सरकारें बनी अनेक योजनाए भी सामने आयी , पूरे देश में किसानों के नाम पर लगभग 3 लाख करोड़ की कर्जमाफी भी हुई लेकिन इन उपायों के वाबजूद किसानों की समस्याऐं समाप्त नही हुई । ये एक कटु सत्य है।
उपरोक्त समस्याओं के उपाय पर विचार करने से पहले इसका विशलेषण करने का प्रयास करेगें कि देश के संचालन में कौन सी विचारधारा काम करती है। इसके लिये हमें देश व दुनिया में चलने वाली विचारधाराओं पर भी विचार करना होगा।
सामान्यतः तीन प्रकार की विचारधाराऐं दिखाई पड़ती है-
1. साम्यवादी विचारधारा
2. पूंजीवादी विचारधारा
3. भारत की स्वावलम्बी आत्मनिर्भर समाज की विचारधारा।
1.साम्यवादी विचारधारा- सबसे पहलें साम्यवादी विचारधारा पर विचार करते है, साम्यवादी विचारधारा के अनुसार ‘‘सर्वहारा की विजय एवं शासन’’ का नारा दिया जाता है। लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं दिखाई देता। अन्त में वहां पर पोलित ब्यूरो एवं एक पार्टी (साम्यवादी विचारधाराओं वाली) का शासन हो जाता है। जिसका उदाहरण चीन एवं रूस आदि देश है।
समाज को सुखी करने के नाम पर वे किसान , मजदूरों एवं समाज को सरकारी संसाधनों का बांटना एक उपाय मानते है जैसे -कर्जमाफी, पेंशन योजना आदि। इसका परिणाम यह होता है कि समाज या जनता सरकार पर निर्भर होती चली जाती है। वे चाहते भी यहीं हैं कि कोई व्यक्ति स्वतन्त्र विचार करके उनके किसी कार्य में हस्तक्षेप न करे। यदि कोई समूह स्वतन्त्र अभिव्यक्ति का प्रयत्न करता है तो उसे गोलियों से भून दिया जाता है ,जिसका जवलन्त उदाहरण चीन में 70 के दशक में हजारों छात्रों एवं युवाओं को मौत के घाट उतरा गया । रूस में तो ऐसे सेकड़ो उदाहरण है और इसलिये ऊपर से देश शक्तिशाली व अन्दर से वही देश खोखला दिखाई देता है। जनता को स्वतन्त्रता की अभिव्यक्ति के किसी भी प्रकार के अधिकार नहीं होते हैं।
2. पूंजीवादी विचारधारा – यह व्यवस्था धीरे-धीरे बडे उद्योगपतियों व पॅूजीपतियों द्वारा लोकतान्त्रिक सत्ता का नियन्त्रण करती है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण अमेरिका के साथ-साथ अन्य लोकतांत्रिक देश भी है। अमेरिका के राष्ट्रपति पूॅजीपतियों के इशारों पर चलने के लिये मजबूर हो जाती है। भारत में जब मानसेन्टों बीज कम्पनी को अतिरिक्त दाम घटानें के लिये बाध्य किया और अनेक प्रतिबन्ध लगाये तब मानसेन्टों बीज कम्पनी के द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति को कहने पर उन्होनें भारत पर दबाव बनाकर उन प्रतिबन्धों को तत्काल हटाने के लिये मजबूर किया।यह घटना 2017 मे घटित हुई थी।
पूंजीवाद का बोध वाक्य है ‘‘सर्वश्रेष्ठ की विजय’’ जिसका अर्थ है जो सबसे ताकतवर है उसका सभी संसाधनों पर अधिकार होगा। आज अमेरिका एवं अन्य अति विकसित देश इसी विचारधारा पर चलते दिखाई दे रहे है इन देशों द्वारा संसार के लगभग 80 प्रतिशत संसाधनों का उपयोग किया जाता है और प्रकृति का अति शोषण होता है ये देश अपनी ऐशोआराम की जिन्दगीं जीने के लिये एवं सुख सुविधाओं के लिये कार्बन एवं अन्य गैंसो का अतिशय उत्सर्जन करते हैं जिससे पूरी पृथ्वी का प्रदूषण खराब हो रहा है। पूंजीवादी व्यवस्था में पिछड़े देशों का शोषण होता है। पूंजीवादी देशों में असहाय, निर्धन व दिव्यांग जनता नारकीय जीवन जीने के लिये बाध्य होती है।
3.भारतीय प्राचीन अर्थव्यवस्था- 1. जिसके अनुसार एक व्यक्ति कमायेगा , पूरे परिवार को खिलायेगा।
2.पूंजीपतियों के लिये न्यासी सिद्धांत 3. शासन के लिये धर्म आधारित शासन चलाने की अनिवार्यता।
1. एक व्यक्ति कमायेगा व दस को खिलायेगा का अर्थ है कि परिवार का मुखिया मेहनत करके कमायेगा व परिवार का पालन-पोषण करेगा।
2. न्यासी सिद्धांत का अर्थ है पूंजीपति व्यापारी आदि परिवार खर्च के अलावा बचे हुए धन के समाज हित के लिये संरक्षक न्यासी होगें। जिसके उदाहरण है- सेठ , व्यापारी आदि के द्वारा पूरे देश में धर्मशालाऐ, तीर्थ क्षेत्रों का निर्माण व अन्न क्षेत्रों का संचालन आदि किया जाना हैं और हम देखते है कि यह अनादि काल से चला आ रहा है। पूरे विश्व में केवल भारत के अन्दर ही यह अनुठी व्यवस्था है , दुनिया में किसी भी देश में धर्मशाला बनाने का विचार नहीं है ।
3.शासन/राज्य-राजा राज व्यवस्था, लोकतांत्रिक या गणराज्य मे धर्म यानि कानून के निर्देशों के अनुसार चलाते थें व हैं तथा ये तीनों मिलकर आत्मनिर्भर, स्वावलम्बी समाज का निर्माण करते है। जो वह समाज सरकार पर निर्भर नही होता है। जिससे समाज में स्वतन्त्र विचार पनपनें के लिए योग्य वातावरण बना रहता है। उपरोक्त विचारों की छाया मे वर्तमान किसान व मजदूरों को देखे तो सरकारे , संसाधनों को बांटकर इन वर्गो को परावलम्बी व पंगू बना रही हैं।
किसानो को आत्मनिर्भर बनाने के लिये हमारी निम्न उपाय हो सकते हैः-
1.उधोगपति-पूंजीपति , व्यापारि आदि अपने बचे हुए धन का समाज को सामथ्र्यवान बनाने के लिए उपयोग करें। जैसे कमाई के साधन देकर आत्मनिर्भर बनाऐ उदाहरण के लिए- सिलाई मशीन चलाने की ट्रेनिंग देकर उन्हें मशीन प्रदान करना आदि।
2.सरकारे कर्जमाफी व पेंशन आदि के स्थान पर किसानों को प्रति एकड़ प्रति वर्ष निश्चित प्रोत्साहन राशि प्रदान करे।
3.अनाज खरीदी के साथ प्रति क्विंटल प्रोत्साहन राशि दें व फसल बीमा के स्थान पर किसान सुरक्षा कोष बनाएं जिसमें से किसानों की फसल हानी होने पर उन्हें तत्काल सहायता प्रदान की जा सके।इस कोष में पेसों की स्थाई व्यवस्था के लिए इस कोष को देश की कृषि उपज मंण्डियों से जोड़ देना चाहिए।
4.किसानों से कौनसी फसल बोना है, खरीदी की गैरेन्टी के साथ सरकारें अनुबन्ध कर सकती हैं।
विगत अनेक वर्षो से कृषि वैज्ञानिकों द्वारा अनाज की आत्मनिर्भरता को लेकर देश के पूरे फसल चक्र में परिवर्तन कर दिया गया हैं, ‘‘इसके अन्तर्गत बहु फसली खेती के स्थान पर एक फसली खेती को प्रोत्साहन दिया गया हैं’’। यह प्रणाली किसानों के लिए हानिकारक बन गई हैं। पहले के समय में किसान बारह महिनों में लगभग 24 फसलें लेता था, इस कारण उसके घर मे सर्वदा कुछ ना कुछ अनाज बना रहता था। आज अनेक राज्यों में बरसाती मौसम में केवल सोयाबीन पैदा करते हैं जिसे खाया नही जा सकता हैं।
कुछ विद्वान लोग किसानों को सोने का भाव, कर्मचारियों के वेतन एवं किसानों की आय की तुलना करते हैं, जबकि कर्मचारी केवल तीन प्रतिशत हैं और सोना बहुत कम लोग खरीद कर रख पाते हैं जैसे- एक कृषि उपज मंण्डी में एक सौ व्यापारी होते हैं और दस हजार किसान वहां अनाज बेचते हैं। स्वाभाविक रूप से व्यापारियों की आय किसानों से अधिक रहेगी और दोनों की तुलना करना उचित नहीं होगा।
यहां उल्लेखनीय है कि किसानों को भी रासायनिक खाद, रासायनिक दवाई, पेस्टीसाईड, उन्नत बीज, कृषि यन्त्र आदि के लिए बाजारों पर निर्भर रहना पड़ता हैं, जिससे किसानों की खेती की लागत अत्यधिक मात्रा में बढ़ गई हैं। बाजारों पर निर्भर रहकर किसान एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था कभी भी आत्मनिर्भर नहीं हो सकती हैं और ग्रामीण भारत हमेशा गरीबी या आर्थिक तंगी में फॅसा रहेगा। कृषि वैज्ञानिकों को चाहिए कि वे रासायनिकों के उपयोग के स्थान पर किसानों को जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित करें। किसानों को चाहिए कि वे गाय आधारित जैविक खेती एवं पशुपालन के साथ खेती करें। ग्रामीण भारत में जब तक कुटिर एवं लघु उद्योगों को पुनः प्रारम्भ नहीं किया जायेगा तब तक ग्रामीण भारत आत्मनिर्भर, स्वावलम्बी भारत का चित्र नहीं बन सकता हैं।
“जिस देश का समाज रोजगार के लिए सरकार, उद्योग एवं व्यापारियों पर निर्भर रहता है वह गुलामी की राह चलता हैं। जो समाज स्वरोजगार युक्त स्वाभिमान सम्पन्न जीवन जीता है वह निरन्तर सम्पन्नता में आगे बढ़ता जाता हैं’’ और दुनिया में उसकी साख बढ़ती जाती हैं। वर्तमान में हमारे देश मे ठीक इसका उल्टा होता हुआ दिखाई देता है। 1947 से पूर्व देश गुलाम था ,गाँव आत्मनिर्भर थे। वर्तमान में देश स्वतंत्र है लेकिन गाँव गुलाम हो गया है वह पूरी तरह बाज़ार पर निर्भर हो गया है। इस निर्भरता को कम करने से ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार संभव है।
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न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी दर्ज़ा देना उचित
क्या आपको पता है संविधान ने किसान को क्या अधिकार दिए हैं? एमएसपी को कानूनी दर्जा देने से क्या होगा किसानों को फायदा, क्योंकि कोर्ट भी कर चुका है किसानों को संविधानिक अधिकार देने की तरफदारी.. पढ़िए इस लेख में
शुभम कुमार
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने पहले वित्त बजट भाषण में उल्लेख किया था कि केंद्र सरकार 2022 तक किसानों की आय को दोगुनी करने का इरादा रखती है। नीति आयोग ने इसे लेकर 2017 में एक शोध पत्र भी जारी किया था, जिसमें सरकार किसानों की आय वृद्धि के लिए कौन से कदम उठाएगी इसका पूरा ब्यौरा था। सरकार ने फसल बीमा पॉलिसी, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी), मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड, इनपुट प्रबंधन, प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना, प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना, जैसे किसानों के लिए विभिन्न फायदेमंद नीतियां शुरू की हैं। हालांकि, किसानों के लिए सबसे बड़ी बाधा इन नीतियों का गैर-प्रवर्तन या अनुचित कार्यान्वयन रही है। चिंता की बात यह है कि इतने प्रयासों के बाद भी देश के अधिकतर किसानों के लिए खेती करना एक दर्दनाक अनुभव है।
आर्थिक सर्वेक्षण (2017-18) के अनुसार कृषि क्षेत्र में 2.1% की वृद्धि होने की संभावना है, जबकि औद्योगिक क्षेत्र में 4.4% और सेवा क्षेत्र में 8.3% पर बढ़ने की संभावना है। कृषि क्षेत्र में धीमी विकास दर एक चिंता का विषय है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी-2015-16) के आंकड़ों के मुताबिक कृषि क्षेत्र में 11,370 लोगों ने आत्महत्या की थी। पिछले दो वर्षों से नए आंकड़े जारी नहीं हुए। एनसीआरबी के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि कृषि मजदूरों में आत्महत्या की दर में उछाल आया है, जो की चिंता का विषय है। इसके पीछे मुख्य कारण कृषि गतिविधियों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव है, यानी सूखे या बाढ़ के कारण फसल का बर्बाद होना है। हाल ही में ”कृषि और अन्य ग्रामीण श्रमिकों (संरक्षण और कल्याण) विधेयक, 2018” को राज्य सभा में पेश किया गया है। इस विधेयक का मुख्य लक्ष्य है कृषि और ग्रामीण श्रमिकों को शोषण के खिलाफ सुरक्षात्मक और कल्याणकारी उपाय प्रदान करना।
1960 के दशक में, हरित क्रांति ने कृषि क्षेत्र में बहुत सकारात्मक प्रभाव डाला और कृषि के आधुनिक तरीकों के साथ फसल उपज में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। हरित क्रांति के बाद सरकार ने सरकार और किसानों को सीधे जोड़ने के लिए एक चैनल स्थापित करने पर काम किया, ताकि किसानों को अपनी फसलों के लिए वाजिब न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल सके। हालांकि, बहुत से इलाकों में किसानों की अभी भी विनियमित थोक बाजारों तक पहुंच नहीं है और इसके कारण वे न्यूनतम समर्थन मूल्य की तुलना से कम दरों पर स्थानीय बाजारों में अपनी फसल बेचते हैं। एक शोध के अनुसार यह पाया गया है कि केवल 9.14% किसान अपनी फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य से अवगत हैं और भारत में केवल 6% किसान अपनी फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य प्राप्त करने में सक्षम हैं, बाकी किसान अपनी फसल को सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य की तुलना से कम कीमत पर बेचते हैं। इसी बिंदु पर ग़ौर करते हुए 2016 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने ‘डॉ गणेश उपाध्याय बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया’ मामले में केंद्र सरकार और राज्य सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी दर्जा प्रदान करने के लिए एक उपयुक्त कानून लाने का सुझाव दिया था। कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) ने भी अपने शोध के उपरांत केंद्र सरकार से सिफ़ारिश की है कि एक क़ानून द्वारा किसानों को अपने उत्पाद को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेचने का कानूनी अधिकार प्रदान करना चाहिए।
अखिल भारतीय किसान संघ समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) के नेतृत्व में अधिकांश किसान भारत भर में लंबे समय से विरोध कर रहे हैं। किसानों की मुख्य मांग यह रही है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की जाए और इसे कानूनी दर्ज़ा दिया जाए। हाल ही में दो सांसद, श्री राजू शेट्टी और श्री के. के. रागेश, ने लोक सभा और राज्य सभा में ”किसानों को कृषि वस्तुओं के लिए गारण्टी लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्यों का अधिकार विधेयक, 2018” (विधेयक) पेश किया है। यह विधेयक उत्तराखंड उच्च न्यायलय के फैसले और CACP की सिफारिशों के उपरोक्त सुझावों के साथ समन्वय में है। एआईकेएससीसी द्वारा दलील के अनुसार यह विधेयक किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य को ”कानूनी अधिकार” के रूप में दावा करने और शिकायत निवारण तंत्र भी प्रदान करेगा। विधेयक को कई प्रमुख क्षेत्रीय दलों से व्यापक स्वीकृति और समर्थन मिला है। यह विधेयक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में उपभोक्ताओं के संरक्षण के लिए आवश्यक वस्तुओं अधिनियम, 1955 या उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 जैसे क़ानून बहुत पहले से हैं। लेकिन किसानों के अधिकार और उनके संरक्षण के लिए ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। 2001 में खाद्य और कृषि संगठन सम्मेलन के दौरान खाद्य और कृषि के लिए संयंत्र आनुवांशिक संसाधनों पर अंतर्राष्ट्रीय संधि को मंजूरी दे दी गई थी, जिसके पश्चात भारत ने संयंत्र किस्मों और किसानों के अधिकार अधिनियम, 2001 पारित किया, जिससे प्रजनकों और किसानों के अधिकारों को मान्यता दी गयी। इसी प्रकार न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी अधिकार देना बहुत आवश्यक है क्यों कि कल्पना कीजिये कि भारत के संविधान में अनुच्छेद 32 नहीं होता, मसलन अगर मौलिक अधिकारों का हनन होता और उनके संरक्षण के लिए अगर कोई उपाय नहीं होता तो मौलिक अधिकार अप्रभावी हो जाते। उल्लंघनों के मामले में किसी भी कानूनी सहारे के बिना किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देना संवैधानिक उपचार के अधिकार के बिना संविधान से तुलना की जा सकती है।
बात अगर किसानों के संवैधानिक अधिकारों की करें तो भारत का संविधान स्पष्ट रूप से किसानों को कोई अधिकार नहीं देता है। परन्तु भारतीय संविधान का भाग IV (अनुच्छेद 36-51) राज्य नीतियों के निर्देशक सिद्धांतों (डीपीएसपी) से संबंधित है, जो राज्य के सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों को दर्शाते हैं। राज्य डीपीएसपी के निर्देशक सिद्धांतों के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक की सामाजिक और आर्थिक स्थिति सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय उपाय करती है। ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे नगर निगम के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया था कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार के अहसास के लिए आजीविका का अधिकार आवश्यक है। उपर्युक्त संवैधानिक प्रावधानों, उच्चतम न्यायालय एवं उत्तराखंड उच्च न्यायालय के फैसले को पढ़ा जाए तो यह साफ़ है की किसानों को अपनी गरिमा की रक्षा के लिए आजीविका के पर्याप्त साधनों को सुरक्षित करने के लिए कुछ कानूनी अधिकार दिया जाना चाहिए, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित है अगर संविधान के अनुच्छेद 38(2) और अनुच्छेद 39(अ) को संयुक्त तौर से पढ़ें तो यह साफ़ हो जाएगा कि राज्य असमानता को खत्म करने और नागरिकों को आजीविका के पर्याप्त साधनों को सुरक्षित करने के अवसर प्रदान करने के लिए आवश्यक उपाय करेगा। उपर्युक्त संवैधानिक प्रावधानों, उच्चतम न्यायालय एवं उत्तराखंड उच्च न्यायालय के फैसले को पढ़ा जाए तो यह साफ़ है की किसानों को अपनी गरिमा की रक्षा के लिए आजीविका के पर्याप्त साधनों को सुरक्षित करने के लिए कुछ कानूनी अधिकार दिया जाना चाहिए, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित है। साथ ही साथ किसानों को शोषण से बचाने के लिए एक सुरक्षा तंत्र प्रदान करने की स्पष्ट आवश्यकता है।
-लेखक डॉ राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, लखनऊ के छात्र हैं।
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निजीकरण न किया तो फिर पूंजी खा जाएंगे बैंक
बैंक इस समय चारों तरफ से घिरे हुए हैं। देश की अर्थव्यवस्था का इंजन सेवा क्षेत्र हो गया है जिसे लोन की जरूरत कम है। बड़े उद्योग सीधे बॉड के माध्यम से पूंजी उठा रहे हैं
डॉ. भरत झुनझुनवालाबैंक इस समय चारों तरफ से घिरे हुए हैं। देश की अर्थव्यवस्था का इंजन सेवा क्षेत्र हो गया है जिसे लोन की जरूरत कम है। बड़े उद्योग सीधे बॉड के माध्यम से पूंजी उठा रहे हैं। छोटे उद्योग पस्त है और इनकी लोन लेने की क्षमता ही नहीं रह गई है।
विकास दर में गिरावट आने से खपत के लिए कम ही लोन दिए जा रहे हैं। ऊपर से सार्वजनिक बैंकों में कुप्रबंधन एवं भ्रष्टाचार व्याप्त है। इस स्थिति में सरकार को दो कदम उठाने चाहिए। छोटी मैनुफैक्चरिंग एवं सेवा क्षेत्र को ईकाइयों को संरक्षण देना चाहिए।
मेक इन इंडिया को छोटे उद्योगों की तरफ मोडऩा चाहिए। साथ-साथ सार्वजनिक बैंकों का निजीकरण कर देना चाहिए। इनका डूबना निश्चित है। डूबे इसके पहले इनकी बिक्री कर देना चाहिए जैसे चतुर दुकानदार एक्सपायरी के पहले दवा को बेच देता है।
सर्वविदित है कि सरकारी बैंकों की हालत खस्ता है। इन्हें पुनजीर्वित करने को सरकार छोटे सार्वजनिक बैंकों का बड़े सार्वजनिक बैंकों के साथ विलय करने पर विचार कर रही है। बड़े बैंकों की कार्यकुशलता अच्छी होने से इनके द्वारा छोटे बैंकों को पुनजीर्वित किया जा सकता है। लेकिन बड़े बैंकों के सामने स्वयं खतरा मंडरा रहा है। वास्तव में देश के बैंकिंग सेक्टर का मूल चरित्र ही बदलता जा रहा है।
इकानॉमिक ग्रोथ में अब क्रेडिट की भूमिका ही सिकुड़ती जा रही है। वर्ष 2015 में हमारे सम्पूर्ण बैंकिंग सेक्टर द्वारा दिए गए लोन में 10.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। वर्ष 2016 में यह वृद्धि घट कर 5.1 प्रतिशत रह गई है। यानी कुल लोन बढ़ रहे हैं परन्तु बढ़त की गति कम होती जा रही है जैसे कार का एक्सलरेटर हल्का होता जा रहा है। इस स्थिति में स्वाभाविक है कि कमजोर बैंक दबाव में शीघ्र आएंगे जैसे अकाल के समय छोटे किसान पहले प्रभावित होते हैं।
लोन की मांग कम होने का प्रमुख कारण है कि अर्थव्यवस्था का इंजन सेवा क्षेत्र हो गया है। इस क्षेत्र में साफ्टवेयर, होटल, ट्रांसपोर्ट, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि सेवाएं आती हैं जिनमें किसी भातैक माल जैसे कपड़े अथवा सब्जी का उत्पादन नहीं होता है।
बीते 5 वर्षों में सेवा क्षेत्र में 51 प्रतिशत की ग्रोथ हुई जबकि मैन्युफैक्चरिंग में 32 प्रतिशत की। ऐतिहासिक तौर पर देखा जाए तो सेवा क्षेत्र का दबदबा बढ़ता जा रहा है। सेवाओं के व्यापार में लोन की जरूरत कम पड़ती है।
जैसे साफ्टवेयर के निर्माण में 25,000 रुपए के एक कम्प्यूटर से वर्ष में 10-20 लाख रुपए के साफ्टवेयर का उत्पादन किया जा सकता है। अथवा एक कम्प्यूटर से वर्ष में लगभग 3-4 लाख रुपए के आनलाइन ट्यूशन दिए जा सकते हैं।
तुलना में मैनुफैक्चरिंग में जमीन, फैक्ट्री शेड तथा मशीन में भारी निवेश की जरूरत पड़ती है। इसलिए मैनुफैक्चरिंग सेक्टर के फिसलने के साथ-साथ लोन की मांग कम होती जा रही है। हमारी बैंकिंग व्यवस्था के दबाव में आने का यह प्रमुख कारण दिखता है।
दूसरा कारण बॉड मार्केट का विस्तार है कंपनियों द्वारा वर्तमान में भारी मात्रा में बॉड जारी किए जा रहे हैं। बॉड जारी करने को कंपनी द्वारा अपनी प्रापर्टी को रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी में गिरवी रखा जाता है।
गिरवी रखी गई प्रापर्टी के सामने कंपनी द्वारा फुटकर निवेशकों को बॉड जारी किए जाते हैं। किसी विशेष स्थिति में कंपनी अगर डूब गई तो सरकार द्वारा गिरवी प्रापर्टी की नीलामी करके निवेशक को उनकी रकम लौटाने की व्यवस्था रहती है। इससे खुदरा निवेशक सुरक्षित महसूस करते हैं और बॉड खरीदते हैं। इस प्रक्रिया में कंपनी द्वारा ब्याज की सम्पूर्ण रकम निवेशक को मिलती है।
बैंकों के माध्यम से लोन लेने में भी मूल रूप से यही प्रक्रिया अपनाई जाती है। कंपनी द्वारा अपनी प्रापर्टी को बैंक के पास गिरवी रख दिया जाता है। इस प्रापर्टी के सामने बैंक लोन देता है। कंपनी को लोन देने के लिए बैंक द्वारा खुदरा निवेशकों से फिक्स डिपाजिट में रकम ली जाती है। लोन देने वाले खुदरा निवेशक तथा लोन लेने वाली कंपनी के बीच बैंक बिचौलिए की भूमिका निभाता है।
जैसे बैंक द्वारा 7 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से खुदरा निवेशक से रकम ली जाती है और 12 प्रतिशत की दर से उसी रकम से कंपनी को लोन दिया जाता है। बॉड तथा बैंक दोनों ही तरह से खुदरा निवेशक द्वारा ही निवेश की गई रकम को कंपनी तक पहुंचाया जाता है। बीते समय में बॉड के मार्केट का विकास हो जाने के कारण कंपनियां बॉड के माध्यम से सीधे खुदरा निवेशक से लोन ज्यादा ले रही हैं।
कंपनी 10 प्रतिशत की दर से बॉड जारी करती है तो खुदरा निवेशक को 10 प्रतिशत का ब्याज मिलता है। बैंक को कमीशन नहीं मिलता है। बैंकों का धंधा मंद पड़ गया है। बीते 4 वर्षों में कुल लोन में बैंकों का हिस्सा 45 प्रतिशत से घट कर 22 प्रतिशत रह गया है जबकि बॉड का हिस्सा 22 प्रतिशत से बढ़कर 33 प्रतिशत हो गया है। वर्तमान समय में बैंकों के खस्ता हाल होने का यह दूसरा कारण है।
हमारे सार्वजनिक बैंकों की मूल समस्या प्रबन्धन आदि की नहीं है। मूलरूप से बैंकों की जमीन ही खिसक गई है। सार्वजनिक बैंकों में इसके अतिरिक्त कुप्रबन्धन एवं भ्रष्टाचार की भी समस्या है। छोटे सार्वजनिक बैंकों का बड़े सार्वजनिक बैंकों के विलय से छोटे बैंकों में व्याप्त कुप्रबन्धन की समस्या का कुछ निदान हो सकता है। परन्तु बैंकों की जमीन के खिसकने से उत्पन्न मूल समस्या का समाधान विलय से हासिल नहीं हो सकता है।
बॉड जारी करने की प्रक्रिया पेचीदी होती है। इसे बड़ी कंपनियों द्वारा ही अपनाया जा सकता है। खुदरा निवेशकों में भरोसा बनाने के लिए भारी एडवर्टाइज़मेंट देने होते हैं एवं रोड शो करने होते हैं। इसलिए छोटी कंपनियों को बैंकों पर ही निर्भर रहना होता है। लेकिन बीते समय में सरकार द्वारा लागू की गई नीतियों ने छोटे उद्योगों को पस्त कर दिया है।
सरकार का प्रयास है कि मेक इन इंडिया जैसी योजनाओं के तहत बड़े, आधुनिक एवं आटोमेटिक मशीनों का उपयोग करने वाले उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए। फलस्वरूप छोटे उद्योगों को मिल रहा संरक्षण कम हो गया है।
इसके बाद नोटबंदी के कारण इनके ग्राहक लुप्त हो गए। अब जीएसटी की जटिल व्यवस्था इनके लिए अभिशाप बन गई है। इस कारण छोटे उद्योगों द्वारा लोन कम ही लिए जा रहे हैं। बड़े उद्योग बॉड मार्केट के चलते बैंकों के हाथ से फिसल गए हैं।
छोटे उद्योग स्वयं मृतप्राय हो रहे हैं। अत: सेवा एवं मैनुफैक्चरिंग दोनों क्षेत्रों में बैंकों का धंधा कमजोर पड़ रहा है। बचता है खपत का क्षेत्र जैसे कार अथवा मकान के लिए दिए गए लोन। यह क्षेत्र अभी भी जीवित हैं। परन्तु देश की आर्थिक विकास दर में गिरावट आने के कारण आम आदमी की क्रय शक्ति घट रही है और यह क्षेत्र भी दबाव में है।
बैंक इस समय चारों तरफ से घिरे हुए हैं। देश की अर्थव्यवस्था का इंजन सेवा क्षेत्र हो गया है जिसे लोन की जरूरत कम है। बड़े उद्योग सीधे बॉड के माध्यम से पूंजी उठा रहे हैं। छोटे उद्योग पस्त है और इनकी लोन लेने की क्षमता ही नहीं रह गई है।
विकास दर में गिरावट आने से खपत के लिए कम ही लोन दिए जा रहे हैं। ऊपर से सार्वजनिक बैंकों में कुप्रबंधन एवं भ्रष्टाचार व्याप्त है। इस स्थिति में सरकार को दो कदम उठाने चाहिए। छोटी मैनुफैक्चरिंग एवं सेवा क्षेत्र को ईकाइयों को संरक्षण देना चाहिए।
मेक इन इंडिया को छोटे उद्योगों की तरफ मोडऩा चाहिए। साथ-साथ सार्वजनिक बैंकों का निजीकरण कर देना चाहिए। इनका डूबना निश्चित है। डूबे इसके पहले इनकी बिक्री कर देना चाहिए जैसे चतुर दुकानदार एक्सपायरी के पहले दवा को बेच देता है।
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जीएसटी से मिली विकास की गारंटी
– भरतचन्द्र नायक
गत सप्ताह जीएसटी परिषद ने अठासी वस्तुओं और सेवाओं पर टेक्स के रेट में कटौती कर घरेलु उपभोक्ता उत्पाद के मूल्य में सात आठ प्रतिशत तक उपभोक्ताओं राहत पहुंचाने का अपना मंतव्य जाहिर कर दिया है। इन वस्तुओं और सेवाओं पर 28 प्रतिशत जीएसटी था जिसे घटाकर 18 प्रतिशत और 12 प्रतिशत तक कर दिया है। टेक्स की दरों में कमी का लाभ उपभोक्ता को मिले इसमें दो राय नहीं है, लेकिन इसमें भी अगर मगर लगाकर उत्पादक राहत से उपभोक्ताओं को वंचित कर देते हैं। हांलाकि ऐसी दशा में समस्या से निपटने के लिए भी केंद्र सरकार ने मुनाफा विरोधी प्राधिकरण एन्टी प्राफिटियरिंग निकाय की व्यवस्था की है और उसने पिछले अवसर पर टेक्स घटने पर उत्पाद को और वितरकों को आगाह भी किया था। उसने पुराने एमआरपी पर संशोधित एमआरपी रेपर पर लिखकर घटे हुए टेक्स लाभ ग्राहकों को पहुंचाने को कहा था, लेकिन सामान्य तह ऐसी राहत महसूस नहीं की गई। टेक्स में राहत दिये जाने से केंद्र सरकार पर 70 हजार करोड़ रू. का बोझ पड़ा है। केंद्र सरकार ने 14 प्रतिशत राजस्व नहीं बढ़ने पर राज्यों को पांच साल की भरपाई का भरोसा दिया है। अच्छा है कि इस बार कुछ उत्पादकों ने स्वयं स्फूर्त होकर घरेलु उपभोक्ता वस्तुओं पर टेक्स घटती का लाभ उपभोक्ता को देने की घोषणा की है। ऐसा करने वालों में गोदरेज, एलजी इंडिया, पेनासोनिक इंडिया, जैसे संस्थान अग्रणी हैं। उद्योग जगत की इस सदस्यता का दूसरे उत्पादकों को अनुकरण कर समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व बोध दिखाना चाहिए। इसके साथ इन संस्थानों ने केंद्र से अपेक्षा की है कि विदेशों से आयात किये जाने वाले घरेलु सामान एप्लाएंसज पर लगने वाला आयात शुल्क बढ़ाया जाए। इसे बढ़ाकर घरेलु उद्योगों को केंद्र सरकार प्रोत्साहित करें। ऐसे समय जब विकसित देश संरक्षणवाद का सहारा ले रहे हैं भारत सरकार को भी देशी उद्योगों की आकांक्षा के अनुरूप आयात नीति में संशोधन करके उद्योगों को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है।जीएसटी को आरंभ हुए एक साल हो चुका है। जीएसटी राजस्व संग्रह में धीरे-धरे स्थिरता परिलक्षित हो रही है। औसतन यह राजस्व संग्रह 95 हजार करोड़ तक पहुंच चुका है। जनता अपेक्षा करती है कि अमुक वस्तु पर टेक्स कम हो। इसके अनुरूप जीएसटी परिषद विचार भी करती है। जब टेक्स में कटौती की जाती है तो सियासत शुरू हो जाती है। लेकिन असलियत यह है कि टेक्स कटौती को सियासी हथकंडा नहीं कहा जा सकता। क्यांेकि इसका दारोमदार जीएसटी परिषद पर है, जिसमें राज्यों की भी केंद्र के साथ भागीदारी है। जीएसटी परिषद वास्तव में भारतीय संघवाद का सबसे बड़ा प्रतीक है। जिसने जीएसटी को अल्प समय में पटरी पर लाकर जनता और उत्पादकों को कमोवेश सत्रह बेरियरों की बेड़ी से मुक्ति दिला दी है। परिवहन की रफ्तार बढ़ा दी है। इन डेढ़ दर्जन टेक्सों के बदले में जीएसटी जैसा एकीकृत टेक्स लगा है जिसकी प्रक्रिया को लेकर हौआ खड़ा किया जा रहा था, लेकिन परिषद ने नियमों का सरलीकरण करके इसे सुगम, सरल और आसान बना दिया है। फिर जो डेढ़ दर्जन टेक्स समाप्त हुए हैं वे मिलाकर बत्तीस प्रतिशत होते थे। जबकि जीएसटी की सबसे अधिक दर 28 प्रतिशत है।
जीएसटी को लेकर राजनैतिक दलों को शिकायत है और वे एक ही स्लेव में सभी वस्तुओं और सेवाओं को शामिल करना चाहते हैं जो न तो उचित है और न संभव है। इस लिए जीएसटी को लेकर उद्योग जगत और उपभोक्ताओं में फैलाये जा रहे भ्रम से बचा जाना चाहिए। आखिर तीन दशकों के विचार विमर्ष के बाद ही 1 जुलाई 2017 से जीएसटी अमल में आया है। राज्यों की शिकायत दूर करते हुए मोदी सरकार ने आने वाले 5 वर्षों तक राज्यों को क्षतिपूर्ति करने का भरोसा दिलाया है और इस आश्वासन पर अमल भी शुरू हो गया है। दरअसल यूीपए सरकार के दौरान तो कांग्रेस ने राज्यों को क्षतिपूर्ति देना असंभव बताकर हाथ खीच लिऐ थे। इसलिए कांग्रेस को तो जीएसटी प्रणाली में मीनमेख निकालने का नैतिक अधिकार नहीं है।
जीएसटी टेक्स निर्धारण के लिए पांच श्रेणियां मौजूदा है। माना जा रहा है कि इतनी अधिक श्रेणियों जब कभी भटकाव पैदा करती है। इसका उपाय खोजने के बारे में परिषद में गहन विचार विमर्ष बताता है कि आने वाले दिनों में पांच श्रेणियों की जगह तीन स्लेव शेष रहेंगे, लेकिन इसमें जल्दवाजी नहीं की जा सकती क्योंकि इससे राज्यों को मिलने वला राजस्व जुड़ा है, राज्यों की आम सहमति आवश्यक होगी। पूर्व वित्तमंत्री श्री पी. चिदंबरम जो यूपीए सरकार में प्रभावशाली मंत्री रहे। जीएसटी के अमल के असमर्थ रहे हैं अब आपत्ति इस बात पर कह रहे हैं कि जिन 88 वस्तु सेवाओं पर टेक्स घटाया गया। वह 2017 में भी घटाया जाना संभव था। अब इसका सटीक उत्तर तो यही हो सकता है कि टेक्स कम करने अथवा बढ़ाने में किसी विशेष राजनैतिक दल अथवा जैसा चिदम्बरम का आरोप है, अकेली भाजपा ही उत्तरदायी नहीं है। परिषद में प्रतिनिधित्व करने वाले राज्यों का पूरा हस्तक्षेप है और सहमति से ही फैसला लिया जाता है। इसलिए जनता बीच में भाजपा को लाना बेमानी है। अर्थशास्त्री ही नहीं समाज शास्त्री और आमजन जनता है कि सरकारों का संचालन टेक्स कराधान और उसके संग्रह पर निर्भर रहता है। इसलिए सीधी सी बात है कि जीएसटी कराधान की शुरूआत ही इस सोच के साथ हुई कि इससे राज्यों और केंद्र को आर्थिक क्षति न पहुंचने पाये। जैसे-जैसे जीएसटी कराधान में स्थिरता आती गई। सोच विचार के साथ वस्तु और सेवा पर लगने वाले टेक्स पर रियायत देने पर परिषद ने विचार आरंभ किया और यह सिलसिला जारी रहेगा। एक वर्ष में 384 वस्तुओं पर से टेक्स कम किया गया है। अब चूंकि जीएसटी का कर संग्रह 95 हजार करोड़ रू. तक औसतन पहुंच गया है। जीएसटी करों में राहत देने पर परिषद विचार करने में सक्षम होगी। इससे उपभोक्ता वस्तुओं के दामों में कमी आना निश्चित है। इससे मुद्रास्फीति भी घटेगी। राज्यों की क्षतिपूर्ति करने में श्री नरेंद्र मोदी सरकार की सदाशयता प्रशंसनीय कही जाएगी। क्योंकि यूपीए सरकार में जब सेंट्रल सेल्स टेक्स तीन से दो प्रतिशत किया था। डाॅ. मनमोहन सिंह सरकार ने राज्यों को वायदा किया था कि राज्यों के नुकसान की केंद्र भरपाई करेगा। परंतु यूपीए सरकार वायदे से मुकर गई और उसने 2011-12 की क्षतिपूर्ति कभी नहीं की।मजे की बात है कि अब जनता जीएसटी को मूल्य स्थिरता का माध्यम मानने लगी है। यही कारण है कि पेट्रोलियम उत्पादों की अस्थिर कीमतों से चिन्तित उपभोक्ता डीजल, पेट्रोल को भी जीएसटी के नेट में लाने की मांग करने लगे हैं। उपभोक्ताओं का मानना है कि यदि डीजल पेट्रोल जीएसटी कराधान के अंतर्गत लाया गया तो वास्तव में उपभोक्ता अच्छे दिनों का अहसास जरूर करेंगे। यह भी धारणा बनाई जा रही है कि दरों में कमी चुनावी आहट को सुनकर हो रही है और व्यापरी घरानों की आकांक्षा पूरी की जा रही है लेकिन वास्तव में यह सोच सियासत का बदरूप चेहरा है। जीएसटी जैसे ऐतिहासिक आर्थिक क्रांतिकारी सुधार को चुनावी नजरिये से देखना कतई उचित नहीं है।
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गरीब को सेठ बनाने की दिशा में बड़ा कदम रही नोटबंदी
भोपाल,12 जून(पीआईसी)। सत्ता के गलियारों में उद्योगपतियों को इंतजार करते देखने का दौर अब बीत चला है। मोदी सरकार ने नोटबंदी करके समानांतर अर्थव्यवस्था पर जो चोट की है उसके चलते अब उद्योगपतियों को सत्ताधीशों के दरवाजे हाजिरी देना जरूरी नहीं रहा है। नतीजा ये है कि आर्थिक विकास में लगे कार्पोरेट घटाने आसानी से अपना कारोबार बढ़ा रहे हैं। छोटे स्तर पर जिन समूहों ने नोटबंदी के बाद जीएसटी की व्यवस्था को समझ लिया था उन्होंने भी अपने कारोबार में सुधार किया है। नतीजतन देश अर्थव्यवस्था में तेजी आई है।
वित्तमंत्री अरुण जेटली का विश्वास है कि यदि आप देश के लिए पैसा बना रहे हैं तो आपको हमारे दरवाजे पर सिर झुकाने की जरूरत नहीं है। नियमों में बदलाव की इस नई परंपरा से शेयर बाजार तेजी की ओर अग्रसर हो रहा है। जीएसटी को लागू करने और आर्थिक सुधारों को लागू करने की दिशा में देश के औद्योगिक घराने सरकार के साथ इसलिए खड़े नजर आ रहे हैं क्योंकि इससे उनके संसाधनों की बर्बादी रुकी है। वित्तीय प्रबंधन के छिद्र बंद हुए हैं, जिससे मुनाफे की बर्बादी रुकी है।
चार साल पहले अर्थव्यवस्था कमजोर रुपए, छीजते विदेशी मुद्रा भंडार, राजकोषीय और चालू खाते के ऊंचे घाटे और दहाई में महंगाई से जद्दोजहद कर रही थी.इस बार2018 में वृहत अर्थव्यवस्था के संकेतकों में खासा सुधार आया है—क्रिसिल के एक विश्लेषण के मुताबिक, खुदरा कीमतों की महंगाई 2015-2018 में औसतन 4.7 फीसदी रही है, जबकि इससे पहले के पांच साल में यह औसतन 10.2 फीसदी रही थी; चालू खाते का घाटा बीते चार साल में घटकर आधा रह गया है और विदेशी मुद्रा भंडार में अच्छा-खासा इजाफा हुआ है. रुपए का अवमूल्यन पहले के पांच साल के 5.5 फीसदी के मुकाबले घटकर 1.7 फीसदी पर आ गया है.
जीएसटी और दिवालिया तथा शोधन अक्षमता संहिता (आइबीसी) जैसे सुधार कारोबार करने के उसूलों में आमूलचूल बदलाव लाने का भरोसा बंधा रहे हैं. आइबीसी ने असरदार ढंग से बता दिया है कि कर्ज लेकर उसे न चुकाने का बेलगाम और बेशर्म तरीका अब और काम नहीं आएगा.
सरकार ने कर अनुपालन को बढ़ाने और नोटबंदी के साथ आमदनी की घोषणा योजना के जरिए और ज्यादा लोगों को औपचारिक अर्थव्यवस्था के दायरे में लाने की एकजुट कोशिशें की हैं. जिससे प्रत्यक्ष करों की वसूली में तेज बढ़ोतरी हुई है, बावजूद इसके कि जीडीपी की ग्रोथ पिछले दो वित्तीय साल में धीमी पड़ी है. शुरुआती गड़बडिय़ों के बावजूद हिंदुस्तान के अप्रत्यक्ष कर आधार में जीएसटी के लागू होने के बाद 50 फीसदी से ज्यादा का इजाफा हुआ है.
कर और जीडीपी का अनुपात 2014 के वित्तीय साल के 5.7 फीसदी से बढ़कर 2018 के वित्तीय साल में 6 फीसदी पर पहुंच गया. प्रत्यक्ष कर संग्रह वित्तीय साल 2016 के 0.6 फीसदी से बढ़कर 2018 के वित्तीय साल में 1.9 फीसदी पर पहुंच गया.
हालांकि नोटबंदी के अंतिम नतीजों पर अभी फैसला होना बाकी है और कुछ अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि इससे जीडीपी की ग्रोथ में 1-2 फीसदी की सेंध लग सकती है, पर इसका असर प्रत्यक्ष कर (खासकर आयकर) के बढ़े हुए अनुपालन में साफ दिखाई देता है.
इसके बावजूद देखा जा रहा है कि नौकरियां 7.4 फीसदी की वृद्धि दर के साथ कदमताल करते हुए नहीं बढ़ी हैं और कारोबार करने में आसानी की फेहरिस्त में हिंदुस्तान की ऊंची छलांग के बाद भी निजी निवेश परवान नहीं चढ़ सके हैं.
सामान्य मॉनसून और बंपर फसल के बावजूद 2018 में ग्रामीण अर्थव्यवस्था मुश्किलों से घिरी रही. कृषि की असल जीडीपी ग्रोथ वित्तीय साल 2010-14 के 4.3 फीसदी से तकरीबन आधी घटकर 2015-18 के वित्तीय साल में 2.4 फीसदी पर आ गई. बड़ी तादाद में नौकरियां देने वाले निर्माण क्षेत्र को नोटबंदी और जीएसटी की मार सहनी पड़ी है.
ईंधन की बढ़ती कीमतों ने एक बार फिर अर्थव्यवस्था के सामने चुनौतियां खड़ी कर दीं हैं। इससे चालू खाते के घाटे पर सीधा असर पड़ेगा और यह महंगाई की आग में घी का काम कर सकती है. पेट्रोल-डीजल के दाम ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच रहे हैं और ऐसे में खुदरा तेल पर केंद्र और राज्य सरकारों के शुल्कों को कम करने की मांग तेज हो रही है.
अगले साल सरकार को चुनाव की चुनौती से जूझना है। इस बीच कई राज्यों के बीच भी चुनाव की तैयारियां शुरु हो चुकी हैं। जाहिर है कि सरकार को जीएसटी और नोटबंदी जैसे मुद्दों पर जनता के बीच सभी तथ्य सिलसिलेबार रखने होंगे उसे बताना होगा कि किस तरह नोटबंदी करके देश ने एक बड़ा लक्ष्य हासिल किया है तभी वो जनता की नाराजगी से बच पाएगी।
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किसानों तक पहुंच गया देश का कृषि बाजार
राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना से जुड़ीं मध्यप्रदेश की 58 कृषि उपज मण्डियाँ
भोपाल,4 जून(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।देश के अन्नदाता का सोना बिचौलियों के हाथों पड़ने के कारण अब तक खेती किसानी का जीवन एक अबूझ पहेली बना हुआ है। शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने इस दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए अब सभी कृषि उपज मंडियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार से जोड़ दिया है। कृषि बाजार (ई-नाम) एक पैन-इण्डिया इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल है। यह कृषि उपजों के लिये एकीकृत राष्ट्रीय बाजार का निर्माण करने का सशक्त माध्यम है। कृषि उपज मण्डी से संबंधित सभी सूचनाओं और सेवाओं के लिये यह ई-नाम पोर्टल सिंगल विण्डो सेवा प्रदान कर रहा है। इस पोर्टल में उपज के आगमन और कीमतों तथा उपज को खरीदने और बेचने के व्यापारिक प्रस्तावों के प्रावधान को शामिल किया गया है। प्रदेश में ई-नाम पोर्टल के माध्यम से अभी तक 58 कृषि उपज मण्डियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार से जोड़ा जा चुका है।
http://www.enam.gov.in/NAM/home/index.html
इस अभिनव पहल से प्रदेश की 58 कृषि उपज मण्डियाँ राष्ट्रीय कृषि बाजार से जुड़ गईं हैं। 13 कपास मण्डियों को भी राष्ट्रीय कृषि बाजार से जोड़ा जा रहा है।ई-नाम पोर्टल पर 49 लाख क्विंटल कृषि जिन्सों का व्यापार भी हो चुका है।
प्रदेश में ई-नाम पोर्टल की शुरूआत भोपाल की पण्डित लक्ष्मीनारायण शर्मा कृषि उपज मण्डी करोंद से की गई। योजना के पहले चरण में प्रदेश की 19 चयनित कृषि उपज मण्डियों को इस पोर्टल से जोड़ा गया। ई-नाम पोर्टल से जुड़ी कृषि उपज मण्डियों में 6 जिन्सों पर ऑनलाईन ट्रेडिंग की जा रही है। योजना के दूसरे चरण में 30 और तीसरे चरण में 8 कृषि उपज मण्डियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना में शामिल किया गया है। अब तक प्रदेश की 58 कृषि उपज मण्डियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना से जोड़ा जा चुका है।
इसके साथ ही, 13 कपास मण्डियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना से जोड़ने का कार्य तेजी से पूर्ण किया जा रहा है। प्रदेश में राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना में अब तक करीब 12 लाख किसानों से 19 हजार लायसेंस धारी व्यापारियों ने ई-प्लेटफार्म के माध्यम से करीब 49 लाख क्विंटल कृषि जिन्सों का व्यापार किया है। प्रदेश में ई-नाम पोर्टल की सभी 58 मण्डियों में कृषि उपज के गुणवत्ता परीक्षण के लिये वृहद एसेइंग एण्ड ग्रेडिंग लैब स्थापित करने की कार्यवाही की जा रही है। ई-नाम पोर्टल में देश के 18 राज्यों में मध्यप्रदेश की स्थिति गेट एन्ट्री और एसेइंग में प्रथम तथा बिड क्रिएशन और सेल ऐग्रीमेंट में तृतीय रही है। ज्ञातव्य हैकि देश में अप्रैल 2016 से प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने ऑनलाइन राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना की शुरूआत की थी। इसका मकसद किसानों को उनकी उपज का राष्ट्रीय स्तर पर सही दाम दिलवाना है।
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यूपीए की सरकारो ने डुबाए बैंक
नईदिल्ली( अनिल जैन)।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बैंकिंग और रियल एस्टेट क्षेत्र की बिगड़ी हालत के लिए पिछली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। मोदी ने बुधवार को कहा कि उनकी सरकार अब उन नीतियों को सुधार रही है। इससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और खासकर छोटी और मझोली कंपनियों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में मदद मिलेगी।संप्रग की सरकारों ने बैंकों पर दबाव डालकर ऐसे उद्योगपतियों को कर्ज दिलाया था जो केवल कागजी खानापूर्ती करते थे।
गुजरात में दूसरे और अंतिम चरण के लिए होने वाले मतदान से पहले मोदी ने छोटे और मंझोले उद्योगपतियों से हमदर्दी जताते हुए कहा कि कई बड़े औद्योगिक घराने उनके बकाये का भुगतान समय पर नहीं कर रही हैं। उन्होंने कहा कि अब इन कंपनियों को ई-मार्केटप्लेस के जरिये सीधे सरकार को अपना माल बेचने की अनुमति दे दी गई है। इससे पहले मोदी के गृह राज्य गुजरात में सूक्ष्म, लघु और मझोली इकाइयों ने वस्तु एवं सेवा कर का विरोध किया था। मोदी ने यह कहकर तसल्ली दी थी कि जीएसटी से उन्हें वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में मदद मिलेगी। अब यही बात वे बैंकिंग सुधार के सिलसिले में कह रहे हैं।
औद्योगिक संस्था फिक्की की 90वीं वार्षिक आम बैठक को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि वित्तीय समाधान एवं जमा बीमा विधेयक के बारे में लोगों को गुमराह किया जा रहा है। उन्होंने जमाओं की सुरक्षा के बारे में फैलाए जा रहे भ्रम को दूर करने में फिक्की से मदद करने को कहा। प्रधानमंत्री बनने के बाद यह पहला मौका था जब मोदी ने किसी राष्ट्रीय उद्योग निकाय की बैठक को संबोधित किया। मोदी ने आयात पर निर्भरता खत्म करने और देश में ही उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कारोबारी समुदाय से मदद करने को कहा।
मोदी ने कहा, ‘पुराने कानूनों को खत्म किया जा रहा है और नए कानून बन रहे हैं। हम यूरिया, कपड़ा, उड्डयन, परिवहन और स्वास्थ्य के क्षेत्र में नई नीति लाए हैं।’ उन्होंने कहा कि नई कपड़ा नीति से एक करोड़ रोजगार पैदा होंगे जबकि यूरिया नीति के कारण किसी नए संयंत्र को जोड़े बिना 18 से 28 लाख टन उत्पादन बढ़ा है। मोदी ने कहा कि उनकी सरकार ने रक्षा, निर्माण, खाद्य प्रसंस्करण और वित्तीय सेवा सहित 21 क्षेत्रों में 87 बड़े सुधार किए हैं। इन सुधारों के कारण पिछले 3 साल में विदेशी मुद्रा भंडार में 100 अरब डॉलर का इजाफा हुआ है और यह 400 अरब डॉलर के पार पहुंच गया है। उन्होंने कहा, ‘निर्माण क्षेत्र में अब तक जितना भी विदेशी प्रत्यक्ष निवेश आया है उसमें से 70 फीसदी पिछले 3 साल मे आया है जबकि वायु परिवहन के क्षेत्र में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश 75 फीसदी बढ़ा है।’
मोदी ने आंकड़ों का सहारा लेकर यह संदेश देने की कोशिश की कि अर्थव्यवस्था पटरी पर है। उन्होंने कहा कि यात्री वाहनों की बिक्री नवंबर में सालाना आधार पर 14 फीसदी बढ़ी है, व्यावसायिक वाहनों की बिक्री में 50 फीसदी का इजाफा हुआ है, तिपहिया वाहनों की बिक्री 80 फीसदी बढ़ी है और दोपहिया वाहनों की बिक्री में 23 फीसदी से ज्यादा का इजाफा हुआ है। प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार की नीतियों के कारण विश्व बैंक की ताजा सूची में कारोबार आसान बनाने के मामले में भारत ने 30 पायदान की छलांग लगाई है। सरकार ने मुद्रा योजना के तहत पिछले 3 साल में 4.5 लाख करोड़ रुपये का ऋण देकर 3 करोड़ नए उद्यमी बनाए हैं।
मोदी ने कहा कि स्टार्ट अप कंपनियों के लिए सिडबी ने फंड ऑफ फंड्स बनाया है जबकि सरकार ने वैकल्पिक निवेश फंड की अनुमति दी है। प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार की गरीबोन्मुखी योजनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि 2014 से महिलाओं के लिए मुफ्त रसोई गैस, सभी परिवारों के लिए बैंक खाते, युवाओं को ऋण और सस्ते मकानों की योजनाएं लागू की गई हैं।
उन्होंने कहा कि जनधन योजना के तहत 30 करोड़ से अधिक लोगों के बैंक खाते खोले गए हैं। उन्होंने एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि जिन ग्रामीण इलाकों में ये खाते खोले गए हैं वहां महंगाई कम हुई है। प्रधानमंत्री ने कहा कि उद्योग जगत ने जीएसटी की मांग की थी। उन्होंने कहा, ‘मुझे याद है कि जब मैं गुजरात का मुख्यमंत्री था तो उद्योग प्रतिनिधिमंडल जीएसटी लागू करने की मांग को लेकर मेरे पास आया करता था।’ उन्होंने कहा कि देश के रेस्तराओं ने जीएसटी में कमी का फायदा अपने ग्राहकों को नहीं दिया है, जबकि जनता की असुविधा को देखते हुए सरकार ने दरों को दुबारा संयोजित भी किया ।
मोदी ने कहा कि जीएसटी से बैंक क्रेडिट प्रवाह बढ़ेगा, कच्चे माल की गुणवत्ता बढ़ेगी और लॉजिस्टिक लागत में कमी आएगी। उन्होंने कहा कि सरकार चाहती है कि छोटे कारोबारी भी जीएसटी को अपनाएं, भले ही उनका टर्नओवर कुछ लाख ही क्यों न हो। ऐसा नहीं है सरकार उनसे राजस्व कमाना चाहती है लेकिन इससे पारदर्शिता आएगी। 20 लाख रुपये तक सालाना टर्नओवर वाले कारोबारियों को जीएसटी से दूर रखा गया है।
मोदी ने पिछली संप्रग सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि उसने कुछ उद्योगपतियों को कर्ज देने के लिए बैंकों पर दबाव डाला। पिछली सरकार के अर्थशास्त्रियों ने विरासत के रूप में हमें बैंकिंग प्रणाली की गैर निष्पादित परिसंपत्तियां दी थीं। यह राशि राष्ट्रमंडल खेलों, कोयला और 2जी स्पेक्ट्रम घोटालों से बड़ी थी। उन्होंने कहा कि पिछली सरकार के दौरान मध्य वर्ग के लोगों ने अपनी मेहनत की कमाई बिल्डरों को दीं लेकिन उन्हें मकान नहीं मिला। मोदी ने सवाल किया, ‘क्या पिछली सरकार रेरा जैसा कानून नहीं बना सकती थी।’
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पूंजी को ठगों से बचाने सरकार लाई नया कानून

बैंककारी विनियमन संशोधन विधेयक 2017
नई दिल्ली। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कर्ज के दबाव में फंसी कंपनियों के प्रवर्तकों को आस्वस्त करते हुए कहा कि उनके पुराने फंसे कर्ज एनपीए की समस्या का समाधान करने के लिये लाए गए नए दिवाला एवं शोधन अक्षमता कानून का मकसद उन्हें बाहर करना नहीं बल्कि कर्ज वसूली सुनिश्चित करने के साथ साथ उनका बचाव करना भी है।कर्ज लेने वालों को बेहतर कर्ज संस्कृति विकसित करने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा, ‘वह पुरानी व्यवस्था जिसमें कर्ज देने वाला कर्जदार का पीछा करते करते थक जाता था और आखिर में उसे कुछ हाथ नहीं लगता था अब समाप्त हो चुकी है। यदि कर्ज लेने वाले को व्यवसाय में बने रहना है तो उसे अपने कर्ज की किस्त-ब्याज को समय पर चुकाना होगा अन्यथा उसे दूसरे के लिए रास्ता छोड़ना होगा।’ जेटली देश के प्रमुख वाणिज्य और उद्योग मंडल सीआईआई द्वारा आयोजित एक बैठक को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा, ‘एनपीए समस्या के समाधान के पीछे वास्तविक उद्देश्य संपत्तियों को समाप्त करना नहीं है, बल्कि इन व्यवसायों को बचाना है। यह काम चाहे इन कंपनियों के मौजूदा प्रवर्तक खुद करें अथवा अपने साथ नया भागीदार जोड़कर करें या फिर नए उद्यमी आएं और यह सुनिश्चित करें कि इन मूल्यवान संपत्तियों को संरक्षित रखा जा सके।’
कर्ज वसूली सुनिश्चित करने वाले नए कानून को कर्जदाताओं को मजबूती देने वाले प्रावधान के रूप में देखा जा रहा है। बैंक और कर्ज देने वाली विभिन्न संस्थाएं 8 लाख करोड़ रुपये के फंसे कर्ज से जूझा रही हैं। समूचे फंसे कर्ज में अकेले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की ही 75 प्रतिशत तक राशि है।
उन्होंने नए दिवाला और शोधन अक्षमता कानून की जरूरत को बताते हुए कहा कि ऋण वसूली न्यायाधिकरणों के अपना काम प्रभावी तरीके से नहीं करने और उनके असफल रहने की वजह से यह कानून लाना पड़ा है। उन्होंने कहा कि प्रतिभूतिकरण और वित्तीय आस्तियों का पुनर्गठन एवं प्रतिभूति हितों का प्रवर्तन सरफेसी कानून शुरू के दो तीन सालों के दौरान एनपीए को प्रभावी ढंग से नीचे लाने में सफल रहा था। लेकिन उसके बाद ऋण वसूली न्यायाधिकरण उतने प्रभावी नहीं रहे जितना समझा गया था, जिसकी वजह से नया कानूना लाना पड़ा।


















