पुलिस महानिदेशक श्री सिंह ने किया ”स्टेटिस्टिकल डाटा-2020” पुस्तक का विमोचन
भोपाल, 10 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र). पुलिस मुख्यालय की योजना शाखा द्वारा पुलिस की अन्य शाखाओं के सहयोग से मध्यप्रदेश पुलिस के सांख्यकीय आंकड़ों को समाहित कर ”स्टेटिस्टिकल डाटा-2020” पुस्तक का प्रकाशन किया है। पुलिस महानिदेशक श्री विजय कुमार सिंह ने सोमवार को इस पुस्तक का विमोचन किया।
”स्टेटिस्टिकल डाटा-2020” पुस्तक को इस हिसाब से तैयार किया गया है, जिससे मध्यप्रदेश पुलिस की बेहतरी व क्षमता संवर्धन के लिए उपयोगी योजनाएं तैयार की जा सके। मध्यप्रदेश पुलिस के आधुनिकीकरण एवं उन्न्यन को ध्यान में रखकर इस पुस्तक को अंतिम रूप दिया गया है।
विमोचन कार्यक्रम में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक योजना श्री अनंत कुमार सिंह, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक प्रबंध श्री डी श्रीनिवास राव, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक निजी सुरक्षा एजेंसी श्री एम.एस.शर्मा, पुलिस महानिरीक्षक योजना श्री योगेश चौधरी, पुलिस महानिरीक्षक अपराध अनुसंधान श्री डी.श्रीनिवास वर्मा, सहायक पुलिस महानिरीक्षक संपदा श्री सुनील तिवारी व सहायक पुलिस महानिरीक्षक योजना श्री मनोज केडिया भी मौजूद थे।
अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक योजना श्री अनंत कुमार सिंह के मार्गदर्शन में तैयार हुई इस सांख्यिकी पुस्तक में पुलिस से संबंधित बुनियादी आंकड़े मसलन पुलिस में क्षेत्र के अनुपात में उपलब्ध मानव संसाधन अर्थात आई.जी., डीआईजी, एसपी, सीएसपी, एसडीओपी, सशस्त्र बल इत्यादि की संख्या उपलब्ध है। साथ ही कुल पुलिस थानों की संख्या के साथ-साथ महिला, अजाक, यातायात व सीआईडी थानों की संख्या भी पुस्तक में शामिल की गई है। रेंजवार पुलिस थानों में दर्ज अपराधों की स्थिति सहित मध्यप्रदेश से संबंधित भौगोलिक, प्रशासनिक व सामाजिक सांख्यकीय आंकड़े भी पुस्तक में प्रमुखता से शामिल किए गए हैं।
18 जिलों के 42 पुलिस अधिकारियों ने सीखीं उत्कृष्ट विवेचना की बारीकियाँ
भोपाल,07 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। पुलिस अधिकारी महिला अपराधों से संबंधित नये कानूनों की बारीकियाँ समझें और साक्ष्य आधारित, आधुनिक एवं स्मार्ट पुलिसिंग के जरिए महिला उत्पीड़न से संबंधित अपराधों की ऐसी विवेचना करें, जिससे कोई भी अपराधी बचने न पाए। यह बात पुलिस महानिदेशक विजय कुमार सिंह ने कही। श्री सिंह शुक्रवार को मध्यप्रदेश पुलिस अकादमी भौंरी में ”लैंगिक अपराधों की विवेचना में पुलिस की भूमिका” विषय पर संपन्न हुई मास्टर ट्रेनर्स की तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला के समापन सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा क्रिमनल जस्टिस सिस्टम के सभी अंगों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है, तभी हम पीड़ित को न्याय और अपराधी को सजा दिलाने में सफल होंगे।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा महिला अपराधों की विवेचना के संबंध में दिए गए दिशा-निर्देशों के परिपालन में पुलिस मुख्यालय की निर्देश पर यह कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यशाला में प्रदेश के 18 जिलों से आए उप निरीक्षक से लेकर अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक स्तर के 42 पुलिस अधिकारियों को खास तौर पर महिलाओं के उत्पीड़न से संबंधित अपराधों की उत्कृष्ट विवेचना करने के गुर सिखाए गए। समापन सत्र में विशेष पुलिस महानिदेशक प्रशिक्षण श्री संजय राणा, मध्यप्रदेश पुलिस अकादमी के निदेशक श्री के.टी.वाइफे एवं संयुक्त संचालक स्वास्थ्य सेवा डॉ वंदना खरे मंचासीन थीं।
पुलिस महानिदेशक श्री सिंह ने कहा कि महिला अपराधों की विवेचना के दौरान विशेष सावधानी व सतर्कता बरतने की जरूरत है। साक्ष्य जुटाने व डीएनए जाँच के लिए सैंपल भेजने से लेकर उसकी रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करने तक निर्धारित प्रोटोकॉल व समय-सीमा का पालन करें। उन्होंने पुलिस अधिकारियों से इस काम को चुनौती के रूप में लेकर अंजाम देने को कहा।
विशेष पुलिस महानिदेशक प्रशिक्षण श्री संजय राणा ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के पालन में एक साल के भीतर प्रदेश भर में विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित कर लगभग 650 पुलिस अधिकारियों को उत्कृष्ट विवेचना का प्रशिक्षण दिया जाएगा। उन्होंने कहा विशेषज्ञ रिसोर्स पर्सन का लाभ जिले स्तर तक पहुँचाने के लिए वीडियो कॉन्फ्रेसिंग के जरिए भी प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके लिए स्मार्ट क्लास तैयार किए जा रहे हैं।
कार्यशाला में विशेषज्ञों द्वारा यौन अपराधों की उत्कृष्ट विवेचना व वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाने की बारीकियां सहित इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए अन्य दिशा-निर्देशों के बारे में विस्तार पूर्वक बताया गया। यहाँ प्रशिक्षित किए गए सभी मास्टर ट्रेनर्स अपने-अपने जिलों में जाकर पुलिस अधिकारियों को प्रशिक्षित करेंगे।
समापन सत्र में पुलिस महानिदेशक ने सभी प्रशिक्षु अधिकारियों को प्रमाण-पत्र प्रदान किए। इस अवसर पर प्रशिक्षुओं ने भी अपना फीडबैक दिया और प्रशिक्षण को अत्यंत उपयोगी बताया। आरंभ में पुलिस प्रशिक्षण अकादमी के निदेशक श्री के.टी.वाईफे ने कार्यशाला की विषय वस्तु पर प्रकाश डाला। सभी अतिथियों को स्मृति चिन्ह के रूप में पुस्तकें भेंट की गईं। समापन सत्र का संचालन प्रशिक्षण अकादमी के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक श्री नीरज पाण्डेय ने किया। अंत में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक श्रीमती रश्मि पाण्डेय ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक प्रशिक्षण श्रीमती निमिषा पाण्डेय व मध्यप्रदेश पुलिस अकादमी के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक श्री कमल मौर्य सहित अन्य संबंधित अधिकारी मौजूद थे।
शंका समाधान के लिए शुरू होगी इनफोरमेशन डेस्क
पुलिस महानिदेशक श्री विजय कुमार सिंह ने मध्यप्रदेश पुलिस प्रशिक्षण अकादमी भौंरी की प्रशिक्षण व्यवस्था एवं सुविधाओं की सराहना की। साथ ही कहा कि यहाँ से प्रशिक्षण लेकर जाने वाले पुलिस अधिकारियों सहित अन्य विवेचना अधिकारियों की शंकाओं के समाधान के लिए अकादमी में एक इनफोरमेशन डेस्क शुरू की जाए।
भोपाल,21
जनवरी(प्रेस
सूचना केन्द्र)।
सागर में दलित को जिंदा जलाने
वाले युवकों को कांग्रेस के
नेताओं का खुला संरक्षण है
इसलिए पुलिस इस वारदात के असली
आरोपियों को बचा रही है। जिन
तीस पैंतीस लोगों ने पीड़ित
धन प्रसाद पुत्र निजाम अहिरवार
का घर घेरा था उन्हें पुलिस
ने आरोपी नहीं बनाया है। भारतीय
जनता पार्टी के पूर्व मंत्री
लाल सिंह आर्य ने आज पत्रकार
वार्ता में आरोप लगाया कि
सरकार दलितों को निशाना बना
रही है और अपना खोया वोट बैंक
लौटाने के लिए दलितों के बीच
अपने समर्थन वाला नेतृत्व
खड़ा करने का प्रयास कर रही
है।
उन्होंने
बताया कि सागर के मोतीनगर
थानाक्षेत्र के धर्मश्री
वार्ड की आवासीय कालोनी के
रहवासी धनप्रसाद अहिरवार को
आरोपियों ने मिट्टी का तेल
डालकर आग लगा दी और दरवाजे की
कुंडी भी बंद कर दी ताकि वो
किसी भी प्रकार से बच न पाए।
उसे साठ फीसदी जल जाने के बावजूद
सरकार से कोई मदद नहीं मिली
है। सरकार यदि उसे न्याय दिलाने
के लिए गंभीर होती तो उसे
सफदरजंग दिल्ली की बर्न यूनिट
में भर्ती करवाती और बेहतर
इलाज कराती। उसे बुंदेलखंड
मेडीकल कालेज की सिफारिश के
बाद हमीदिया अस्पताल के सामान्य
वार्ड में रखा गया है। इससे
सरकार के दलित विरोधी चेहरे
की असलियत उजागर हो गई है।
श्री
आर्य ने बताया कि भाजपा प्रदेश
अध्यक्ष राकेश सिंह ने इस
मामले को गंभीरता से लिया और
पीड़ित को न्याय दिलाने के
लिए एक टीम भी गठित की है। इस
टीम में श्री आर्य के साथ सागर
के विधायक शैलेन्द्र जैन,
नरयावली विधायक
प्रदीप लारिया और सूरज कैरों
व अन्य लोग घटना स्थल पर गए
थे। उन्हें बताया गया कि दो
दिन पहले बच्चों का विवाद
पुलिस थाने भी पहुंचा था लेकिन
पुलिस ने मामले को गंभीरता
से नहीं लिया। इसके बाद कालोनी
के ही छुट्टू, अज्जू
पठान, कल्लू
और इरफान ने कैरोसिन डालकर
धनप्रसाद को जिंदा जला दिया।
आज वह जीवन और मौत के बीच झूल
रहा है।
भाजपा
की ओर से श्री आर्य ने बताया
कि कांग्रेस की सरकार बनने
के बाद प्रदेश में दलितों पर
अत्याचार बढ़ रहे हैं। कांग्रेस
के नेता अपना खोया वोट बैंक
वापस पाने के लिए दलित समाज
के ऐसे लोगों को निशाना बना
रही है जिन्होंने दलितों को
वोट बैंक समझे जाने वाली राजनीति
का विरोध किया है। इसके लिए
वे मुस्लिमों को ढाल बनाकर
दलितों के बीच फूट डालने का
काम कर रहे हैं।
उधर
सागर विधायक शैलेन्द्र जैन
का कहना है कि पुलिस ने समय पर
कार्रवाई की होती तो अपराधियों
में खौफ होता और वे इस तरह की
वारदात करने की हिम्मत नहीं
जुटा पाते। प्रदेश की कानून
व्यवस्था खराब होने की वजह
से ये स्थितियां निर्मित हुई
हैं।
भारत
पर 514 अरब
डॉलर का कर्ज है और इस कर्ज का
अधिकतर हिस्सा या तो अनुत्पादक
है या फिर उसके मुनाफे पर चंद
लोग ऐश कर रहे हैं। इस कर्ज का
अधिकांश हिस्सा विदेशी बैंकों
में छिपाकर रखा गया है।विदेशी
धन वापस लाने का वायदा करके
सत्ता में आई भाजपा की मोदी
सरकार के लिए यह विदेशी कर्ज
एक अबूझ पहेली बन गया है। पहले
कार्यकाल में तो प्रधानमंत्री
नरेन्द्र मोदी ने टैक्स हैवन
देशों से नई संधियां करके
विदेशी बैंकों में रखे धन के
मालिकों को ढूंढ़ने का भरपूर
जतन किया। इसके बावजूद सरकार
को अधिक सफलता नहीं मिली। ये
जरूर पता चल गया कि बैंकों की
85 फीसदी
कर्ज की रकम जिन उद्योपतियों
ने गड़प ली है वे भारत में ही
सक्रिय हैं और फर्जी कंपनियों
से धन का उपयोग कर रहे हैं।
सरकार ने फर्जी कंपनियों को
भी ढूंढ़ निकाला और उनका धन
बरामद कर लिया। इसके बावजूद
जिस धन को शोधन के बाद बाकायदा
सीए की मंजूरी के बाद कंपनियों
में निवेश किया गया है उनसे
धन की वसूली की प्रक्रिया देश
भर में अपनाई जा रही है। कमलनाथ
सरकार भी उस व्यवस्था का हिस्सा
हैं जो देश में काले धन की
खोजबीन में जुटे हैं। उनसे
ये उम्मीद की जाती रही है कि
वे अपना काम जिम्मेदारी से
करेंगे और काला धन उजागर करने
में सहयोगी की भूमिका निभाएंगे।
इसके
विपरीत कमलनाथ की भूमिका
प्रोपेगंडा से अधिक साबित
नहीं हो रही है। वे शुद्द के
लिए युद्ध और भू माफिया के
विरुद्ध जिस तरह से अभियान
चला रहे हैं उसे लेकर वे ये
जताने का प्रयास कर रहे हैं
कि वे काले धन की वसूली के
प्रयास कर रहे हैं। वास्तव
में उनकी भूमिका देश से काला
धन उजागर करने की मुहिम को
पंचर करना अधिक नजर आ रहा है।
उन्होंने जिस तरह रेत के ठेकों
में देश की पूंजी हड़पने वाले
फर्जी उद्योगपतियों की भीड़
जुटाई है उसे देखकर उनकी भूमिका
की असलियत आसानी से समझी जा
सकती है। जिस रेत कारोबार से
प्रदेश को 250 करोड़
रुपए की आय होती थी और बाद में
इसे शिवराज सरकार ने मुक्त
कर दिया उससे कमलनाथ 1200
करोड़ रुपए
की आय होने की कहानियां सुना
रहे हैं। उनकी सरकार का कहना
है कि रेत माफिया पर अंकुश
लगाकर ये आय की जा रही है। इस
कारोबार के पुराने खिलाड़ी
धंधे से बाहर कर दिए गए हैं और
जिला स्तर पर नए ठेकेदारों
को खदानें आबंटित की गई हैं।
रेत खदानों के ठेके लेने वालों
में वे लोग शामिल हैं जिन पर
देश का अरबों रुपया जीम जाने
का आरोप है।
सरकार
ने जिन रेड्डी बंधुओं को रेत
कारोबार का सहयोगी बनाया है
और राज्य के लिए आय देने वाला
बताया जा रहा है उन रेड्डी
बंधुओं की असलियत कुछ और है।
मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़
और महाराष्ट्र की पुलिस उन्हें
सरगर्मी से तलाश रही है। उन
पर हजारों लोगों को झांसा देकर
उनके साथ बैंक धोखाघड़ी करने
का आरोप है।इसके बावजूद कमलनाथ
सरकार उन्हें राज्य को आय
कराने वाला निवेशक बता डाला
है। जो लोग बैंकों का हजारों
करोड़ रुपया पौंजी स्कीमों
से हड़प चुके हैं वे प्रदेश
को कितनी और कैसी आय कराएंगे
ये तो आने वाले समय में पता
चलेगा लेकिन तब तक कमलनाथ
सरकार ने उन्हें पुलिस से
रक्षा कवच जरूर उपलब्ध करा
दिया है।
इसके
विपरीत भारत सरकार का ध्यान
बंटाने के लिए राज्य सरकार
माफिया को ध्वस्त करने की
मुहिम चला रही है। इस मुहिम
में सैकड़ों निर्दोष व्यापारियों
और बिल्डरों की बलि चढ़ाई जा
रही है। राज्य सरकार की इस
मुहिम में अफसर, जज
और पुलिस सभी शामिल हैं। जिस
तरह की रिपोर्ट के आधार पर आम
नागरिकों को भयंकर माफिया,
मिलावटखोर,
जमाखोर बताया
जा रहा है वे आने वाले समय में
आपातकाल से भी ज्यादा भयावह
प्रताड़ना की असलियत सामने
लाने लाएंगे। लेकिन इससे
प्रदेश की विकास यात्रा बुरी
तरह तहस नहस हो रही है। जो लोग
छुटपुट कारोबार करके हजारों
लोगों को रोजगार देने का काम
कर रहे थे वे भी खुद को असहाय
महसूस कर रहे हैं। सरकार की
मुहिम से बचने के लिए व्यापारियों
ने न केवल भारी भरकम टैक्स
चुकाना जारी रखा है बल्कि वे
राजनीतिक चंदे की मुंहमांगी
रकम भी देने को मजबूर किए जा
रहे हैं। जिन लोगों को माफिया
बताकर प्रशासन ने उनके ठिकाने
तहस नहस कर डाले हैं उनमें से
अधिकतर केवल दस्तावेजों की
कमी की वजह से निशाना बने हैं।
जिन अफसरों और दलालों ने उन्हें
झांसा देकर कारोबार बढ़ाने
में मदद की अब वही लोग उन्हें
माफिया साबित करने में जुटे
हुए हैं।
सरकार
की इस मुहिम से आम जनता परेशान
है और काला धन बनाने वाला माफिया
अपनी बुलंदियां छू रहा है।
वह न केवल काला धन बचाने में
सफल हो रहा है बल्कि निर्दोष
लोगों को डरा धमकाकर उनसे अवैध
वसूलियां भी कर रहा है। ये
हालत कमोबेश वैसी ही है जैसे
कभी इंदिरा गांधी के आपातकाल
के दौरान सामने आई थी। बेशक
कमलनाथ कह रहे हैं कि निर्दोष
लोगों को घबराने की जरूरत नहीं
है लेकिन जब प्रशासन और तंत्र
उन्हें आरोपी बना देता है तब
वे अपनी बेगुनाही साबित ही
नहीं कर पाते और सरकार के
दमनचक्र का शिकार हो जाते हैं।
ऐसे
ही एक पनीर कारोबारी के विरुद्ध
हाईकोर्ट ने बाईस पेज का फैसला
दिया और उसे दोषी बताते हुए
मामले की सुनवाई अधिक जजों
की खंडपीठ से कराने का निर्देश
दिया। जिस मामले को कोई बच्चा
भी षड़यंत्र पूर्वक रचा गया
बता सकता है उसे हाईकोर्ट
मानने तैयार नहीं है। हाईकोर्ट
के ही एक विद्वान न्यायाधीश
कह रहे हैं कि वह व्यक्ति
निर्दोष है और उसे बरी किया
जाना चाहिए लेकिन दूसरे जज
केवल अपना तमगा बढवाने और
कमलनाथ की गुड बुक में आने के
लिए अपनी विद्वत्ता का प्रदर्शन
किए जा रहे हैं।
वास्तव
में समय आ गया है जब देश की
सर्वोच्च संस्थाएं इन मामलों
पर गौर करें और राज्य सरकार
की पक्षपातपूर्ण नीतियों पर
लगाम लगाएं। ये तो साफ हो चुका
है कि मध्यप्रदेश एक बार फिर
आपातकाल दो के दौर से गुजर रहा
है लेकिन ये आपातकाल भारत की
मानवता के लिए कलंक न बन जाए
इसके लिए आगे बढ़कर इस पर रोक
लगाना समय की मांग बन गई है।
खंडवा(अनवर मंसूरी)। इंदिरा सागर बांध जलाशय में मत्स्य आखेट का कार्य कर रही सिमरन फिशरीज के कर्मचारियों की गुंडागर्दी देखने को मिली जिसमे उंडेल के एक युवक रामू नायक को मछली चोरी के शक में पकड़ कर बेरहमी से पीटा गया है।
सोशल मीडिया में जारी वीडियो में सिमरन फिशरीज के कर्मचारी युवक से मारपीट करते नजर आ रहे हैं। मामला जावर थाना क्षेत्र के उंडेल गाँव का है। मारपीट करने वाले सिमरन फिशरीज के दबिश इचार्ज सुंदरेश ओर उनकी टीम बताई जा रही है। जिनके खिलाफ पुलिस ने नामजद केस दर्ज किया है।
जावर थाने के अनुसार मामला 2 दिन पुराना बताया जा रहा है। मारपीट का वीडियो वायरल होने के बाद ग्रामीणों का गुस्सा फूटा और वे थाना जावर पहुंचे। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ मामला कायम करके छानबीन शुरु कर दी है।
इधर मारपीट का शिकार हुए युवक का हाथ हुआ फेक्चर है। और उसे गंभीर चोटें आई है।
मध्यप्रदेश एटीएस को बड़ी सफलता, सिमी के दो सदस्य दो दिन के भीतर पकड़े
भोपाल,13 दिसंबर (प्रेस सूचना केन्द्र)। मध्यप्रदेश पुलिस के आतंक विरोधी दस्ता (एटीएस) को बड़ी कामयाबी मिली है। एटीएस ने दो दिन के भीतर प्रतिबंधित संगठन सिमी के दो सस्दयों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार किये गए सिमी सदस्यों में एजाज व इलियास शामिल हैं। आरोपी एजाज पिछले 13 वर्षों से एवं आरोपी इलियास पिछले 18 वर्षों से फरार था। विभिन्न राज्यों की गुप्तचर एजेंसियों को इन दोंनों आरोपियों की तलाश थी।
अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक एटीएस श्री राजेश गुप्ता ने बताया कि सिमी के सदस्य एजाज शेख पिता मोहम्मद अकरम निवासी जाकिर हुसैन मार्ग बुरहानपुर को एटीएस ने पुख्ता सूचना के आधार पर गत 12 दिसंबर को पाला बाजार बुरहानपुर से पकड़ा है। एजाज के खिलाफ एटीएस मुंबई में विधिविरूद्ध क्रियाकलाप निवारण अधिनियम की धारा 10,13 के तहत आरोप दर्ज है। गिरफ्तारी के बाद आरोपी एजाज को सीजेएम न्यायलय बुरहानपुर में पेश किया गया है। साथ ही महाराष्ट्र एटीएस को भी उसकी गिरफ्तारी के संबंध में सूचना दे दी गई है।
मध्यप्रदेश एटीएस द्वारा इसी तरह दिल्ली स्पेशल सेल की मदद से आरोपी इलियास शेख पिता मोहम्मद अकरम निवासी शाहीन नगर ओखला दिल्ली को 13 दिसंबर को दिल्ली से गिरफ्तार किया गया है। इलियास के खिलाफ बुरहानपुर थाना कोतवाली में भारतीय दंड विधान की धारा 153ए एवं विधिविरूद्ध क्रियाकलाप निवारण अधिनियम की धारा 11,13 के तहत प्रकरण दर्ज है। साथ ही एटीएस थाना मुंबई में भी इलियास के खिलाफ विधिविरूद्ध क्रियाकलाप निवारण अधिनियम की धारा 11,13 के तहत प्रकरण कायम है।
अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक एटीएस श्री गुप्ता ने बताया कि इलियास को फिलहाल मुंबई एटीएस को सौंपा गया है। इसे बुरहानपुर कोतवाली में दर्ज प्रकरण में रिमांड पर लिया जाएगा। अन्य सूत्र बताते हैं कि दोनों आतंकी एहतेशाम सिद्दीकी और अब्दुल सुभान कुरैशी उर्फ तौकीर के साथ जुड़े थे.
लगभग चौदह साल का शिव राज प्रशासनिक तौर पर प्रदेश का सबसे लचर शासनकाल कहा जा रहा है। जबकि शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश को परिवार की तरह चलाया। सबको काम करने और आगे बढ़ने का अवसर दिया। शिवराज की इस शासनशैली से आम नागरिकों ने तो संतोष महसूस किया लेकिन कांग्रेस का कहना है कि शिव के राज में माफिया ताकतों ने अपना आतंक फैला रखा था । अब मुख्यमंत्री कमलनाथ की सरकार ने प्रदेश के लगभग बीस माफिया ताकतों को कथित तौर पर पहचाना है। वह अब माफिया के विरुद्ध संघर्ष का ऐलान कर रही है। इस कड़ी में उसने इंदौर से लोकस्वामी अखबार के संपादक जीतू सोनी को खलनायक की तरह पेश करने का अभियान चलाया है। उसके जीतू सोनी के लगभग छह ठिकाने धराशायी कर दिये गए हैं। होटल से लेकर घर और ऐसे तमाम परिसरों पर तोड़फोड़ की गई जिन पर जीतू सोनी का दावा रहा है। सरकार की इस कार्रवाई से प्रदेश के लोग हैरान हैं। प्रेस जगत के लोग भी खासे खफा हैं। जिन्होंने जीतू सोनी की कार्यशैली देखी है वे उसे एक सदाशयी पत्रकार के रूप में जानते हैं। ऐसा बहादुर जिसने सत्ता के बुलंद बुर्जों की काली करतूतें भी ठप्पे से अपने अखबार में प्रकाशित कीं। जीतू सोनी का साम्राज्य पिछले तीस सालों में तमाम झंझावातों के बीच लगातार बढ़ता चला। कांग्रेस की सरकारें हों या भाजपा की सभी ने उनकी पत्रकारिता को सलाम किया और उनके डांसबार को एक उपयोगी कारोबार माना। उनके होटल माईहोम को शराब पिलाने का लाईसेंस प्राप्त था। वह होटल पुलिस प्रशासन,अफसरों और अपराधियों सभी का लोकप्रिय स्थान रहा है। मुंबई की तर्ज पर न केवल इंदौर बल्कि प्रदेश और देश भर के बिगड़े नवाब इस डांस बार में आते रहे हैं। जीतू सोनी अच्छे व्यवस्थापक रहे और उन्होंने बार बालाओं समेत इस कारोबार से जुड़े लोगों को सुरक्षित ठिकाना उपलब्ध कराया। शराबखोरी के बीच होने वाली गुंडागर्दी को नियंत्रित करने के लिए उनके पास बाऊंसर्स की टीम थी। इसके बावजूद उन्होंने कभी प्रशासन से टकराव नहीं लिया। अब कमलनाथ सरकार खजाना खाली होने का शोर मचाकर समाज के सभी तबकों से वसूली अभियान चला रही है। शुद्ध के लिए युद्ध अभियान की आड़ में व्यापारियों के चंदा और टैक्स वसूली का अभियान चलाया गया। इसके बाद अब सरकार कथित तौर पर माफिया के विरुद्ध अभियान चला रही है। दरअसल सरकार का लक्ष्य प्रदेश से राजस्व संग्रहण की उगाही बढ़ाना तो है ही साथ में कांग्रेस का पार्टी फंड भी जुटाया जा रहा है। यह काम गुंडागर्दी के किया जा रहा है और इसके लिए आड़ जनता की ली गई है। शुद्ध के लिए युद्ध अभियान में जिन्होंने चंदा दिया और टैक्स भरना शुरु कर दिया उनके विरुद्ध तो कोई कार्रवाई नहीं की गई लेकिन जिन्होंने न चंदा दिया और न ही टैक्स भरने का तंत्र विकसित किया उनके विरुद्ध रासुका जैसी कार्रवाईयां की गईं। इस दौरान कई व्यापारियों के तो कारोबार बंद हो गए और उससे जुड़े कर्मचारी भी बेरोजगार हो गए। जीतू सोनी को पुलिस और प्रशासन गुंडातत्वों पर नियंत्रण पाने के लिए इस्तेमाल करता रहा है। जो काम पुलिस या निगम प्रशासन नहीं कर पाता वह जीतू सोनी के बाऊंसर्स की मदद से पूरे कराए जाते थे।पहली बार पुलिस ने अपने ही पाले पोसे इस तंत्र के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की है। जीतू सोनी पर तेईस मुकदमे लाद दिए गए हैं,तीस हजार रुपए का इनाम घोषित कर दिया गया है,विदेश भागने पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी चल रही है। ऐसा करके कमलनाथ सरकार कानून के सहारे अपना आतंक का राज स्थापित करना चाह रही है। जीतू सोनी के अखबार लोकस्वामी ने हनी ट्रेप कांड की किस्तें छापनी शुरु कीं थीं। अफसरों और नेताओं के जिस गठजोड़ ने सरकार में रहकर प्रदेश के कर्ज के दलदल में धकेला और भ्रष्टाचार के माध्यम से भारी धन जुटाया वे अय्याशी में लिप्त हो गए। जीतू सोनी को पुलिस और प्रशासन ने जिस जिम्मेदारी के लिए तैयार किया था उन्होंने वह बखूबी निभाई। अय्याशियों की ये खबर उनके अखबार ने जैसे ही छापना शुरु की सत्ता शीर्ष के इंद्र का सिंहासन डोल गया। मंत्रालय के कई अफसरों को लगा कि यदि वे चुप रहे तो उनकी तो भद पिट जाएगी। नतीजतन उन्होंने पुलिस का इस्तेमाल करके जीतू सोनी को धराशायी करने की मुहिम चला दी। पिछले तीस सालों से जो जीतू सोनी समाज का उपयोगी उपकरण था वो आज कुख्यात माफिया बना दिया गया है। अखबारों के बीच भी आतंक फैल गया है। भारत सरकार के कार्पोरेट कार्य मंत्रालय से अरबों रुपयों का लोन जुटाकर जो कथित बड़े अखबार प्रकाशित हो रहे हैं उनकी तो औकात भी नहीं थी कि वे अपने समान भ्रष्टाचार की गंगा में नहाने वाले सत्ताधीशों पर कीचड़ उछाल सकें। यही वजह है कि वे कथित बड़े अखबार सरकार की कार्रवाई को सही ठहराने में जुट गए। अवसरवादी पत्रकारों के एक समूह ने भी इस अवसर को लपक लिया और वे जीतू सोनी को खलनायक बताने वाली कहानियां छापने दिखाने लगे। इसके बावजूद आज पत्रकारों का बड़ा तबका सरकार की कार्रवाई से खफा है। वह जानता है कि सरकार उन भ्रष्ट और अय्याश अफसरों नेताओं के नेटवर्क को बचाने का काम कर रही है जिन्होंने विकास के नाम पर प्रदेश को बेचने का काम किया है। जीतू सोनी को अपराधी बताने वालों को तय करना होगा कि समाज की वैचारिक गंदगी को साफ करने वाला लोकस्वामी ज्यादा बड़ा अपराधी है या फिर प्रदेश को अरबों रुपयों के कर्ज में डुबाने वाले गद्दार नेता, अफसर या ठेकेदार । आज मध्यप्रदेश विकास के पथ पर दौड़ रहा है। उसे काली अर्थव्यवस्था के पथ पर दौड़ाने वाले नेता, अफसर,ठेकेदार न केवल प्रदेश बल्कि देश की विकास यात्रा को भी क्षति पहुंचा रहे हैं। जब हिंदुस्तान पांच ट्रिलियन डालर की इकानामी बनने को अग्रसर है तब सत्ता माफिया प्रदेश के आय के संसाधनों पर कब्जा जमाने की जंग लड़ रहा है। कमलनाथ सरकार जाने अनजाने में इस वैश्विक माफिया का औजार बन रही है। सरकार के ये कार्यकलाप अवश्य ही निंदनीय हैं। कमलनाथ सरकार तब समानांतर अर्थव्यवस्था को फूलने फलने का अवसर दे रही है जब नोटबंदी के बाद भारत सरकार ने रुपये की ताकत बढ़ाने का अभियान चलाया था। देश की नीतियों से इस टकराव के बीच प्रदेश की विकास यात्रा क्षतिग्रस्त हो रही है। सरकार को अपने फैसले पर फिरसे चिंतन करना चाहिए। सरकार पर माफिया का शिकंजा इसी तरह बढ़ता रहा तो आने वाले समय में ब्राजील या इटली की तरह माफिया सरकार से भी बड़ी ताकत बन जाएगा जो घातक सिद्ध होगा।
भोपाल,30 सितंबर(दुर्गेश रायकवार)भारतीय संस्कृति और परम्परा हमेशा से गौरवशाली रही है। हमारे परिवारों में बच्चों को देवतुल्य माना गया है। यह माना जाता है कि उनका मन कच्ची माटी सा होता है और उसे जिस सांचे में ढालो, वह वैसा ही बन जाता है। नन्हीं बच्चियों को लेकर हमारा समाज अपने जन्म से संवेदनशील रहा है लेकिन बदलते दौर में सारे मानक बदल रहे हैं और हमारी गौरवशाली संस्कृति और परम्परा को घात पहुंचा रहे हैं। इन विपरीत और शर्मनाक स्थिति को नियंत्रण में करने के लिए कानून सख्त से सख्त कदम उठाता रहा है। बच्चों के साथ जिस तरह से बर्बर यौन व्यवहार किया जा रहा है, वह भारतीय समाज के लिए शर्मनाक है। बच्चों को यौन उत्पीडऩ से बचाने के लिए वर्ष 2012 में एक कानून बनाया गया था जिसे पॉक्सो कानून यानी की प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट 2012 जिसको हिंदी में लैंगिक उत्पीडऩ से बच्चों के संरक्षण का अधिनियम 2012 कहा जाता है। इस कानून के बाद भी अपराधों में कमी नहीं आने के कारण कानून को और सख्त बनाया गया है। हाल ही में 2019 में पाक्सो एक्ट में संशोधन कर अपराधी को दंड दिए जाने के लिए कड़े प्रावधान किए गए हैं।
प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट 2012 के तहत अलग-अलग अपराध में पृथक-पृथक सजा का प्रावधान है। और यह भी ध्यान दिया जाता है कि इसका पालन कड़ाई से किया जा रहा है या नहीं। इस अधिनियम में सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय बाल संरक्षण मानकों के अनुरूप प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति यह जानता है कि किसी बच्चे का यौन शोषण हुआ है तो उसे इसकी रिपोर्ट नजदीकी थाने में देनी चाहिए, यदि वो ऐसा नहीं करता है तो उसे छह महीने के कारावास और आर्थिक दंड से दंडित किया जा सकता है।
उल्लेखनीय है कि 18 साल से कम किसी भी मासूम के साथ अगर दुराचार होता है तो वह पॉक्सो एक्ट के तहत आता है। इस कानून के लगने पर तुरंत गिरफ्तारी का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त अधिनियम की धारा 11 के साथ यौन शोषण को भी परिभाषित किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि यदि कोई भी व्यक्ति अगर किसी बच्चे को गलत नीयत से छूता (बेड टच करता) है या फिर उसके साथ गलत हरकतें करने का प्रयास करता है या उसे पोर्नोग्राफी दिखाता है तो यह धारा 11 के तहत दोषी माना जाएगा। इस धारा के लगने पर दोषी को तीन साल तक की सजा हो सकती है।
इस कानून की धारा चार में वो मामले आते हैं जिसमें बच्चे के साथ कुकर्म या फिर दुष्कर्म किया गया हो। इस अधिनियम में सात साल की सजा से लेकर उम्रकैद तक का प्रावधान है, साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है। धारा छह के अंतर्गत वो मामले आते हैं जिनमें बच्चों के साथ कुकर्म, दुष्कर्म के बाद उनको चोट पहुँचाई गई हो। इस धारा के तहत 10 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है। अगर धारा सात और आठ की बात की जाए तो उसमें ऐसे मामले आते हैं जिनमें बच्चों के गुप्तांग में चोट पहुँचाई जाती है। इसमें दोषियों को पाँच से सात साल की सजा के साथ जुर्माना का भी प्रावधान है।
पाक्सो एक्ट बाल संरक्षक की जिम्मेदारी पुलिस को सौंपता है। इसमें पुलिस को बच्चे की देखभाल और संरक्षण के लिए तत्काल व्यवस्था बनाने की जिम्मेदारी दी जाती है। जैसे बच्चे के लिए आपातकालीन चिकित्सा उपचार प्राप्त करना और बच्चे को आश्रय गृह में रखना इत्यादि। पुलिस की यह जिम्मेदारी बनती है कि मामले को 24 घंटे के अंदर बाल कल्याण समिति की निगरानी में लाए जिससे समिति बच्चे की सुरक्षा और संरक्षण के लिए जरूरी कदम उठा सके।
इस अधिनियम में बच्चे की मेडिकल जाँच के लिए प्रावधान भी किए गए हैं। यह भी निर्देश हैं कि जाँच बच्चे के लिए कम से कम पीड़ादायक हो। मेडिकल जाँच बच्चे के माता-पिता या किसी अन्य व्यक्ति की उपस्थिति में किया जाना चाहिए, जिस पर बच्चे का विश्वास हो और बच्ची की मेडिकल जाँच महिला चिकित्सक द्वारा ही की जानी चाहिए। अधिनियम में इस बात का ध्यान रखा गया है कि न्यायिक व्यवस्था के द्वारा फिर से बच्चे पर किसी भी प्रकार का दबाव नहीं बनाया जाए। इस नियम में केस की सुनवाई एक विशेष अदालत द्वारा बंद कमरे में कैमरे के सामने दोस्ताना माहौल में किया जाने का प्रावधान है। इस दौरान बच्चे की पहचान गुप्त रखने की कोशिश की जानी चाहिए। पुलिस की यह जिम्मेदारी बनती है कि मामले को 24 घंटे के अन्दर बाल कल्याण समिति की निगरानी में लाये। विशेष न्यायालय, उस बच्चे को दिए जाने वाली मुआवजा राशि का निर्धारण कर सकता है, जिससे बच्चे के चिकित्सा उपचार और पुनर्वास की व्यवस्था की जा सके। अधिनियम में यह कहा गया है कि बच्चे के यौन शोषण का मामला घटना घटने की तारीख से एक वर्ष के भीतर निपटाया जाना चाहिए।
पॉक्सो अधिनियम में संशोधन बाल यौन अपराध के पहलुओं से उचित तरीके से निपटने के लिए किया गया है। एक आधिकारिक बयान में कहा गया है कि अधिनियम की धारा 4, 5 और 6 में संशोधन किए जाने का प्रस्ताव किया गया है, ताकि बच्चों का आक्रामक यौन उत्पीडऩ करने के मामले में मौत की सजा सहित कठोर सजा का प्रावधान हो सके। इसमें कहा गया है कि यह संशोधन, देश में बाल यौन अपराध की बढ़ती हुई प्रवृत्ति को रोकने के लिए कठोर उपाय करने की जरूरत के तहत, किया जा रहा है। इसके मुताबिक अधिनियम में 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा परिभाषित किया गया है। यह लैंगिक रूप से निरपेक्ष कानून है। संशोधन में प्राकृतिक संकटों और आपदाओं के समय बच्चों के यौन अपराधों से संरक्षण और आक्रामक यौन अपराध के उद्देश्य से बच्चों की जल्द यौन परिपक्वता के लिए उन्हें किसी भी तरीके से हार्मोन या कोई रासायनिक पदार्थ देने के मामले में अधिनियम की धारा 9 में संशोधन किया गया है।
इस कानून के तहत बच्चों का यौन उत्पीडऩ करने वाले दोषियों को उम्रकैद के साथ मौत की सजा का प्रावधान किया गया है। कानून में बच्चों का यौन उत्पीडऩ करने के उद्देश्य से उन्हें दवा या रसायन आदि देकर जल्दी युवा करने को गैर जमानती अपराध बनाया गया है। इस अपराध के लिए पाँच साल तक की कैद का प्रावधान है।
बाल पोर्नोग्राफी की बुराई से निपटने के लिए पॉक्सो अधिनियम, 2012 की धारा 14 और धारा 15 में भी संशोधन किया गया है। बच्चों से संबद्ध पोर्नोग्राफिक सामग्री को नष्ट नहीं करने/डिलीट नहीं करने पर जुर्माना लगाने का प्रस्ताव किया गया है। साथ ही, इस तरह की चीजों को अदालत में साक्ष्य के तौर पर पेश करने सहित कुछ मामलों को छोड़ कर अन्य किसी भी तरह के इस्तेमाल में जेल या जुर्माना, या दोनों सजा हो सकती है।
नए प्रावधान में चाइल्ड पोर्नोग्राफी की परिभाषा तय की गई है, जिसमें चाइल्ड पोर्नोग्राफी की फोटो, वीडियो, कार्टून या फिर कंप्यूटर जेनरेटेड इमेज को दंडनीय अपराध की जद में लाया गया है। इससे जुड़ी सामग्री रखने पर 5000 से लेकर 10 हजार रुपये तक के जुर्माने के दंड की व्यवस्था की गई है। लेकिन अगर कोई ऐसी सामग्री का व्यवसायिक इस्तेमाल करता है तो उसे जेल की सख्त सजा होगी।
इसमें व्यापारिक उद्देश्य के लिए किसी बच्चे की किसी भी रूप में पोर्नोग्राफिक सामग्री का भंडारण करने या उस सामग्री को अपने पास रखने के लिए दंड के प्रावधानों को अधिक कठोर बनाया गया है। यह संशोधन देश में बाल यौन उत्पीडऩ की बढ़ती प्रवृत्ति को रोकने की जरूरत के तहत सख्त उपाय करने के लिए किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश देते हुए कहा है कि वह हर जिले में विशेष न्यायालयों की स्थापना करें। इनकी स्थापना ऐसे जिलों में की जानी चाहिए जहाँ अधिनियम के तहत 100 या उससे अधिक मामले लंबित हैं। कोर्ट ने कहा कि विशेष अदालतों को 60 दिनों के अंदर-अंदर बच्चों पर यौन उत्पीडऩ के मामलों की सुनवाई शुरू करने की कोशिश करनी चाहिए। साथ ही यह भी कहा है कि वह चार हफ्तों में इसकी प्रगति रिपोर्ट दाखिल करें। यह अधिनियम पूरे भारत पर लागू होता है, पॉक्सो कानून के तहत सभी अपराधों की सुनवाई, एक विशेष न्यायालय द्वारा कैमरे के सामने बच्चे के माता पिता या जिन लोगों पर बच्चा भरोसा करता है, उनकी उपस्थिति में होती है।
पाक्सो एक्ट को और सख्त बनाये जाने के बाद बच्चों को अधिक सुरक्षा की उम्मीद की जा सकती है। कानून के साथ-साथ इस दिशा में सामाजिक जागरूकता की भी आवश्यकता है। बच्चों के साथ दुर्व्यहार रोकने के लिए सबको सजग होना होगा क्योंकि जागरूकता से ही अपराधों पर नियंत्रण पाया जा सकेगा।
भोपाल,28
सितंबर(प्रेस
सूचना केन्द्र)।
मध्यप्रदेश में कांग्रेस की
सरकार आने के बाद मोबाईल लूट
और चैन खींचने की घटनाओं में
तेजी से इजाफा हुआ है। इससे
निपटने के लिए पुलिस ने मोबाईल
खोजने की यूनिट को पुरानी
विधानसभा के सामने स्थित नए
कंट्रोल रूम में कंप्यूटरीकृत
सेंटर में शिफ्ट कर दिया है।
मोबाईल
लुटेरों से निपटने के लिए बनाए
इस नए ठिकाने पर गुमशुदा
मोबाईलों की सर्च की व्यवस्था
की गई है। पुलिस की साईबर सेल
यूनिट ने बढ़ती मोबाईल लूट
की घटनाओं के मद्देनजर ये
सेंटर जन सुविधा केन्द्र के
रूप में विकसित किया है जबकि
मोबाईल नेटवर्क के विश्लेषण
की जिम्मेदारी साईबर क्राईम
विंग को दी गई है।
राजधानी
के सभी सार्वजनिक स्थलों पर
मोबाईल लुटेरों ने अपनी
गतिविधियां बढ़ा दीं हैं। वे
बेखौफ होकर जेबकतरी,
मोबाईल चोरी
और चैन स्नेचिंग जैसी वारदातों
को अंजाम दे रहे हैं। इन सभी
स्थानों पर सरकारी प्रबंधन
ने न तो कैमरों की व्यवस्था
की है और न ही निगरानी तंत्र
विकसित किया है। पुलिस की
कार्यप्रणाली भी फील्ड आधारित
नहीं रही है इसलिए लुटेरों
के हौसले बुलंद होते जा रहे
हैं।
खासतौर
पर आरटीओ दफ्तर, अस्पतालों
और हाट बाजारों में जेबकतरों
के गिरोह बेखौफ होकर वारदातें
कर रहे हैं जिनके सामने पुलिस
पूरी तरह असहाय साबित हो रही
है। पुलिस प्रशासन के निकम्मेपन
का ही नतीजा है कि चोरी किए गए
अधिकतर मोबाईल ढूंढ़े नहीं
जा सके हैं। भोपाल पुलिस ने
गुम मोबाईल की रिपोर्ट लिखवाने
के लिए नए पुलिस कंट्रोल रूम
की तीसरी मंजिल पर पूरी यूनिट
शुरु की है।
भोपाल
जिले की सीमा में मोबाईल गुम
हो जाने पर सूचनाएं इसी नए
कंट्रोल रूम के सेंटर पर जमा
किए जा रहे हैं। भोपाल पुलिस
की वेवसाईट www.bhopalpolice.com/lostphone.html
पर जो फार्म
दिया गया है उसकी दो प्रतियों
में यहां शिकायत की जा सकती
है। आवेदन प्रस्तुत करते समय
वोटर कार्ड या अन्य किसी पहचान
पत्र के साथ मोबाईल बिल की
फोटोकापी भी प्रस्तुत करनी
होगी। दो प्रतियों में भरे
इस फार्म के अलावा संबंधित
थाने में दिए गए आवेदन की
फोटोकापी भी लगानी होगी। आवेदन
जमा करने का समय प्रातः 11
बजे से शाम 5
बजे तक है।
अवकाश के दिन आवेदन पत्र जमा
नहीं किए जाएंगे। मोबाईल मिलने
पर फार्म में दिए गए नंबरों
पर सूचना भेजी जाएगी। ध्यान
रहे यहां मोबाईल गिर जाने या
फिर गुम जाने पर ही फार्म लिया
जाएगा। मोबाईल चोरी या छीने
जाने की रिपोर्ट संबंधित पुलिस
थाने में ही करनी होगी।
अब
इस नई व्यवस्था के चलते क्राइम
ब्रांच में साइबर मामलों की
जांच नहीं होगी. वहीं
पेंडिंग 1530 मामलों
को भी क्राइम ब्रांच से साइबर
क्राइम ब्रांच में ट्रांसफर
कर दिया गया है.दो
साल में क्राइम ब्रांच के पास
पहुंची 1530 शिकायतों
को अब साइबर क्राइम ब्रांच
को सौंपा गया है. इस
ब्रांच की जिम्मेदारी एएसपी
संदेश जैन को दी गई. जिले
में सात एएसपी रैंक के अधिकारियों
के पदों में से ये भी एक पद है.
एससपी संदेश
जैन ने बताया कि क्राइम ब्रांच
पहुंचने वाले फरियादी साइबर
क्राइम ब्रांच आना शुरू हो
गए हैं. एक
दिन में करीब 25 शिकायतें
आ रही हैं. शिकायतों
की जांच के लिए अलग-अलग
टीमों को जिम्मेदारी दी गई
है. जांच
को प्रभावी तरीके से कर निराकरण
भी कम समय में किया जा रहा है.
साइबर क्राइम
से जुड़ी शिकायतें पूरे मध्य
प्रदेश में लगातार बढ़ती जा
रही हैं. ऐसे
में पुलिस ने भी इस चुनौती से
निपटने के लिए जमीनी स्तर पर
काम करना शुरू कर दिया है.
अब प्रदेश स्तर
पर नहीं, बल्कि
जिला स्तर पर बनाई जा रही साइबर
क्राइम ब्रांच इससे जुड़े
अपराधों की जांच कर रही है.
इसकी शुरुआत
भोपाल से की गई. आने
वाले दिनों में दूसरे बड़े
महानगरों में जल्द शुरू किया
जाएगा.
भोपाल,1सितंबर(प्रेस
सूचना केन्द्र)।
क्वालिटी के मापदंडों को लेकर
रासुका लगाए जाने ले नाराज
व्यापारियों ने लामबंद होकर
सरकार के निर्णय का विरोध शुरु
कर दिया है। स्वास्थ्य मंत्री
तुलसी सिलावट से चर्चा के बाद
व्यापारियों ने सरकार की ओर
से चलाए जा रहे शुद्ध के लिए
युद्ध अभियान को अव्यावहारिक
बताया है। व्यापारियों का
कहना है कि सरकार यदि अपने
अभियान को तर्कसंगत नहीं
बनाएगी तो व्यापारियों की ये
नाराजगी गंभीर रूप ले लेगी।
कनफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट), खाद्य पेय एवं मिष्ठान विक्रेता संघ,नमकीन व्यापारी संघ,मावा व्यापारी संघ दूध डेरी प्रोडक्ट एसोसिएशन ने एकजुट होकर शनिवार को होटल पलाश मे पत्रकारवार्ता आयोजित रखी और अभियान की आड़ में व्यापारियों से की जा रही ज्यादतियों का विरोध किया। कैट के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कैलाश अग्रवाल ने बताया कि शासन एवं प्रशासन की ओर से व्यापारियों पर दर्ज किए जा रहे आपराधिक प्रकरणों और रासुका की कार्रवाई को लेकर संगठन ने मध्यप्रदेश शासन के मंत्री आरिफ अकील और तुलसी सिलावट जी से मुलाकात की थी। उन्होंने हमें आश्वासन दिया है कि अब व्यापारियों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज नहीं किए जाएंगे और रासुका की कार्रवाई नहीं होगी। व्यापारियों ने भी अपनी ओर से आश्वासन दिया कि वे मिलावट को जड़ से मिटाने में सरकार का पूरा सहयोग करेंगे।
कैट के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राधेश्याम माहेश्वरी कहा कि हम भी चाहते हैं कि मिलावट पूरी तरह से खत्म हो। साथ ही हम भी मिलावट खोरों के विरुद्ध चलाई जा रही मुहिम में सहयोग करेंगे। मिलावटियों की वजह से बाजार में कीमतों का निर्धारण नहीं हो पाता है जिससे उपभोक्ताओं को अच्छी गुणवत्ता का माल नहीं मिलता है।
कैट के प्रवक्ता विवेक साहू ने कहा की हम शासन एवं प्रशासन को यह भी कहना चाहते हैं कि आज यह बात समझने की जरूरत है कि हर व्यापारी मिलावट नहीं करता है। 100 में सिर्फ 5 फीसदी लोग ही ऐसे होंगे जो ये ग़लत काम करते है लेकिन ऐसे लोगो के कारण आज पूरा व्यापारी वर्ग जो 50-60सालो से ईमानदारी से काम करता आ रहा है एवं जिनकी तीन तीन पीढ़ियां अपने इस पेशे को बचाए रखने के लिए कार्य कर रही है वो सरकार के निशाने पर आ गए है और उसे भी जांच के नाम पर परेशान किया जा रहा है।उन्होंने कहा कि खाद्य सामग्री के नाम पर जो अपराधी तत्व नकली माल सप्लाई कर रहे हैं उन पर कार्रवाई से किसी को आपत्ति नहीं है लेकिन गुणवत्ता को आधार बनाकर व्यापारियों पर जो रासुका लगाई जा रही है वह अत्याचार है।मानवीय संवेदनाओं की हत्या है। यदि सरकार चाहे तो वह स्वयं दूध, मावा, मिठाई बनवाए और जनता को उपलब्ध कराए।
खाद्य पेय एवं मिष्ठान विक्रेता संघ के मुरली हरवानी ने कहा की हमारे व्यापारियों को भय के माहौल में कार्य करना पड़ रहा है। शासन को चाहिए कि वह हमें भयमुक्त वातावरण प्रदान करें और हम भी अपनी ओर से प्रयास करेंगे कि हम मिलावट अभियान में शासन का सहयोग करें।
पत्रकार वार्ता में कैट के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कैलाश अग्रवाल, राधेश्याम महेश्वरी, प्रवक्ता विवेक साहू मुरली हरवानी, मोहन शर्मा, संजीव अग्रवाल, राकेश जैन, संजय अग्रवाल, विजय नेमा, रमेश चंचल, पंकज टंग, कुबेर सिंह, रितेश विजयवर्गीय, शरद अग्रवाल, प्रमोद कुमार गुप्ता, मोहित सचदेव, प्रकाश राठौर, रमेश बनियानी, प्रदीप सोनी, प्रियंका अजमेरा, अजीत कुमार जैन, मुकेश साहू, दर्पण कुमार जैन, प्रेम यादव समेत कई अन्य व्यापारी भी उपस्थित थे।
भोपाल,25अगस्त(प्रेस सूचना केन्द्र)। पूर्व मंत्री डॉ.नरोत्तम मिश्रा की ललकार को अब हाईकोर्ट का भी संबल मिल गया है। बहुचर्चित ई टेंडर घोटाला अदालत की देहरी पर हवा हवाई साबित होने लगा है।साक्ष्यों के परीक्षण के बाद हाईकोर्ट ने प्रमुख आरोपी नंदकुमार ब्रह्मे की जमानत मंजूर कर ली है। इसके बाद अन्य आरोपियों के भी बच निकलने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। सत्तासीन कांग्रेस की ओर से प्रमुख विपक्षी दल को घेरने के लिए आरोप लगाए जा रहे थे अब उसके अरमानों पर पानी फिरता नजर आने लगा है।
जस्टिस
राजीव कुमार दुबे की सिंगल
बेंच ने ब्रह्मे की जमानत
याचिका मंजूर कर ली है। नंद
किशोर ब्रह्मे मध्यप्रदेश
स्टेट इलेक्ट्रानिक्स डेवलपमेंट
कार्पोरेशन भोपाल में ओएसडी
के पद पर तैनात थे। उन्हें
2012 में ई
टेंडर प्रक्रिया का नोडल
अधिकारी बनाया गया था। उन पर
आरोप है कि उन्होंने ई टेंडर
प्रक्रिया में घालमेल करके
कई ठेकेदारों को लाभ पहुंचाया।
वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल खरे और
अधिवक्ता अभिनव श्रीवास्तव
ने इस मामले की पैरवी की।
उन्होंने अदालत को बताया कि
टेंडर जारी करने की प्रक्रिया
से ब्रह्मे का कोई संबंध नहीं
था।
मध्य प्रदेश पुलिस
आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ
(ईओडब्ल्यू) ने
बीजेपी शासन के दौरान हुए कथित
ई-टेंडर घोटाले की
जांच के सिलसिले में पूर्व
मंत्री और बीजेपी नेता नरोत्तम
मिश्रा के दो पूर्व निजी सचिवों
को भी गिरफ्तार किया था.
ईओडब्ल्यू की टीम ने
इन दो कर्मचारियों के ठिकानों
की तलाशी भी ली थी,जिसके
आधार पर कांग्रेस खेमे से
पूर्ववर्ती भाजपा सरकार पर
ई टेंडर घोटाला करने के आरोप
लगाए जाने लगे थे।इसके जवाब
में पूर्व मंत्री मिश्रा ने
कमलनाथ सरकार को सबूतों के
साथ सामने आने की चुनौती देते
हुए कहा कि मामले में केवल
छोटी मछलियों को निशाना बनाया
जा रहा है.
ईओडब्ल्यू के
महानिदेशक के एन तिवारी कहते
रहे हैं कि दो सरकारी अधिकारियों
वीरेंद्र पांडे और नीलेश
अवस्थी (पूर्व मंत्री
नरोत्तम मिश्र के दोनों पूर्व
सचिव) को ई-टेंडरिंग
प्रक्रिया में अनियमितता के
मामले में गिरफ्तार करके हमने
बड़ी कड़ी जोड़ ली है। पांडे
नरोत्तम मिश्रा के सहायक रहे
हैं जबकि नीलेश अवस्थी लॉ
विभाग का चपरासी है और मिश्रा
के बंगले पर फोन सुनने की ड्यूटी
पर तैनात था।
ईओडब्ल्यू की
कार्रवाई पर पूर्व मंत्री
नरोत्तम मिश्रा ने इसे राजनीति
से प्रेरित कार्रवाई करार
दिया. उन्होंने
कहा, ”जब ई-टेंडरिंग
प्रक्रिया में छेड़छाड़ की
बात सामने आई, तो
हमने जांच का आदेश दिया था.
इसके विपरीत वर्तमान
सरकार ने उन एजेंसियों को ठेके
दिये हैं जिनके खिलाफ पिछली
सरकार ने इस अनियमितताओं में
जांच का आदेश दिया था.” मिश्रा
ने कहा, ”मैं कमलनाथ
को चुनौती देता हूं कि वे तथ्यों
और प्रमाणों के साथ आगे आएं.
जिसमें हमें छेड़छाड़
की शिकायतें मिलीं थीं वे सभी
टेंडर हमने रद्द कर दिये थे.
न तो काम पूरा हुआ,
न ही उन्हें कोई भुगतान
किया गया.”
नरोत्तम मिश्रा का कहना है कि ई टेंडर को मंजूरी देने वाली समितियों में प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव और सचिव स्तर के अधिकारी शामिल होते हैं. यह जानने के बावजूद सरकार ने छोटी मछलियों को पकड़ने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार इस मामले में फिजूल मेहनत कर रही है, थोड़े समय बाद वह जान जाएगी कि भाजपा सरकार ने कितनी ईमानदारी से जनहित के कार्य किए थे। मालूम हो कि इस साल 10 अप्रैल को ईओडब्ल्यू ने 3,000 करोड़ रुपये के ई-टेंडर घोटाले में सात कंपनियों, सरकारी विभागों और अन्य (अज्ञात) राजनेताओं सहित अधिकारियों के खिलाफ मामले दर्ज किए थे.
भोपाल,18
अगस्त(प्रेस
सूचना केन्द्र)।
मुख्यमंत्री कमलनाथ ने पुलिस
कमिश्नर प्रणाली को एक कमेटी
के हवाले करके उसे अपने अनुकूल
बनाने की कवायद भले ही शुरु
कर दी हो लेकिन इस विषय पर जितनी
कवायद हो चुकी है उसके चलते
मध्यप्रदेश के प्रमुख शहरों
में इस प्रणाली को लागू करने
से वे इंकार नहीं कर पाएंगे।इसके
संकेत मिलने लगे हैं। भोपाल
और इंदौर में एसएसपी प्रणाली
लागू करके इस संबंध में सभी
प्रायोगिक प्रक्रिया पूरी
की जा चुकी है और अब सिर्फ
मजिस्ट्रेटी अधिकार देकर इस
प्रणाली को कारगर बनाया जाना
बाकी रह गया है।
कानून
और व्यवस्था की जवाबदारी
भारतीय लोकतंत्र में राज्य
को सौंपी गई है। इसके बावजूद
राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे
पर राज्य की जिम्मेदारी है
कि वह केन्द्रीय एजेंसियों
की सिफारिशों पर अमल भी करे।
यही वजह है कि पिछली शिवराज
सिंह चौहान सरकार ने भी पुलिस
कमिश्नर प्रणाली को लागू करने
की पूरी कवायद कर ली थी। चुनावों
के मद्देनजर उसे लागू करने
की प्रक्रिया जरूर नहीं अपनाई
गई थी। अब कमलनाथ सरकार की
जवाबदारी है कि वह इसे कैसे
लागू करे।
चुनावी
संग्राम के दौरान राज्य पुलिस
ने पुलिस कर्मियों को साप्ताहिक
अवकाश दिए जाने और नई भर्तियां
किए जाने के मुद्दे पर कमलनाथ
सरकार का साथ दिया था। अब जब
कमलनाथ सरकार में आ चुके हैं
तब वे पुलिस के मुद्दों पर
पूरी तरह असफल साबित हो रहे
हैं। राज्य का खजाना खाली होने
का हल्ला मचाकर उन्होंने पुलिस
की भर्तियां भी टाल दी हैं और
पुलिस कर्मियों को साप्ताहिक
अवकाश दिए जाने की व्यवस्था
भी लागू नहीं हो पाई है। ऐसे
में पुलिस के आला अफसरों का
दबाव है कि भले की महानगरों
से शुरुआत हो पर प्रदेश में
पुलिस कमिश्नर प्रणाली की
शुरुआत कर दी जानी चाहिए। इससे
कानून और व्यवस्था के विषय
में पुलिस को जो बेवजह लांछन
झेलना पड़ रहे हैं उससे राहत
मिल सकेगी।
कमलनाथ
सरकार ने स्वाधीनता दिवस के
अवसर पर पुलिस कमिश्नर प्रणाली
की घोषणा किए जाने के संकेत
दिए थे। ऐन वक्त पर सरकार ने
राज्य प्रशासनिक सेवा के
अधिकारियों के प्रतिनिधि
मंडल की आशंकाओं पर गौर करते
हुए घोषणा टाल दी। अब सरकारी
सूत्रों की ओर से तर्क दिया
जा रहा है कि इस प्रणाली का
अध्ययन कराया जाएगा तब इसे
लागू किया जाएगा। हालांकि इस
संबंध में पुलिस सूत्रों का
कहना है कि कमिश्नर प्रणाली
के संबंध में सारी कवायद पूरी
की जा चुकी है और अब इसे सिर्फ
लागू करना बाकी है।
दरअसल
कानून व्यवस्था के लिए जिम्मेदारी
तो पुलिस की है पर फैसले लेने
का अधिकार राजस्व अमले पर है।
कलेक्टर तय करते हैं कि एसडीएम
कैसे कानून व्यवस्था पर नियंत्रण
रखें। आज देश के 71 महानगरों,
मेट्रो शहरों
में कमिश्नर प्रणाली लागू
हैं। वैसे दस लाख तक की आबादी
वाले शहरों में पुलिस कमिश्नर
प्रणाली लागू किए जाने का
प्रावधान है। कलेक्टर के पास
डिस्ट्रीक मजिस्ट्रेट की
शक्तियां होती हैं। इसके तहत
रासुका लगाने, जिलाबदर
करने, संवेदनशील
हालातों में फायरिंग,
लाठी चार्ज
की इजाजत देने व धारा 144
व कर्फ्यू
घोषित करने के अधिकार हैं।
इसी प्रकार धारा 151 व
अन्य प्रतिबंधात्मक कार्रवाई
में जमानत दिए जाने व नहीं दिए
जाने के फैसले भी कलेक्टर करते
हैं. कमिश्नरी
लागू हो जाने के बाद कलेक्टर
की ये तमाम शक्तियां पुलिस
कमिश्नर को हंस्तारित हो
जाएंगी और कलेक्टर की भूमिका
महज राजस्व अधिकारी की रह
जाएगी।
जहां
तक पुलिस प्रणाली में सुधार
और संशोधित एक्ट को लागू करने
की बात है तो अब तक कई राज्यों
ने इस पर अमल नहीं किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने संशोधित
पुलिस एक्ट को लागू करने के
आदेश भी दिए थे, जिसमें
नए एक्ट के तहत राज्य सुरक्षा
आयोग गठित करके पुलिस के कामकाज
की निगरानी करके सरकार को
रिपोर्ट सौंपने की सिफारिश
की गई थी। सरकार को आयोग की
रिपोर्ट मानना होगी इससे सरकार
की मनमर्जी पर रोक लग सकेगी।डीजीपी,
आईजी,
डीआईजी की
नियुक्ति के लिए वरिष्ठता और
सेवा रिकार्ड का आधार ही मापदंड
माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट
का मानना था कि पुलिस के कामकाज
में राजनैतिक हस्तक्षेप रोका
जाए।
वर्तमान
व्यवस्था पुलिस को जांच और
कानून के पालन के अधिकार तो
देती है पर अपराध पर अंकुश
लगाने की जवाबदारी उसकी नहीं
है। इसके लिए उसे प्रशासनिक
अफसरों और अदालत पर निर्भर
रहना पड़ता है। यही वजह है कि
कई पुलिस अधिकारी प्रतिनियुक्ति
पर अन्य विभागों में चले जाते
हैं या फिर कविताएं लिखने और
किताबें लिखने में जुट जाते
हैं। अपराध पर अंकुश लगाने
में उनकी रुचि नहीं रहती है।
अपराध रोकने के तंत्र पर भारी
संसाधन खर्च करने के बावजूद
अपराधियों का जाल अपना काम
बदस्तूर जारी रखता है।
मध्यप्रदेश
में कमलनाथ सरकार के सामने
अपराधों पर नियंत्रण रखने की
चुनौती तो है लेकिन वह अपराधों
की जड़ को उजागर नहीं होने
देना चाहती।कल्याणकारी योजनाओं
के नाम पर जारी बजट को हड़पने,मकानों
की जमाखोरी करने, खेती
की जमीनों की आड़ में काला धन
सफेद करने वाले, सरकारी
ठेकों को हड़पने के लिए अपराधियों
का सहारा लेने वाले, टैक्स
चोरी करने वाले व्यापारी,
आयकर चोरी करने
वाले फर्जी एनजीओ जैसों की
वजह से जो आपराधिक जंजाल पनपता
है उसे भी सरकार उजागर नहीं
होने देना चाहती। यही वजह है
कि पुलिस कमिश्नर प्रणाली को
विभिन्न बहानों से टालने की
जुगत हो रही है। इसके बावजूद
अब देश जिस आर्थिक प्रणाली
की ओर बढ़ चला है उसमें फर्जी
पुलिस पालना किसी भी शासन
व्यवस्था के लिए संभव नहीं
रहा है। जाहिर है कि ऐसे हालात
में कमलनाथ चाहकर भी पुलिस
कमिश्नर प्रणाली को रोक नहीं
पाएंगे। वे मुख्यमंत्री हैं
प्रदेश के मालिक नहीं,
ये बात जितनी
जल्दी समझ लेंगे उतनी जल्दी
टकराव से बचकर जन समस्याओं
का समाधान कर पाएंगे।
भोपाल। मध्यप्रदेश की पत्रकारिता को अनैतिक ठकुरासी के इशारे पर कलंकित करने वाले शलभ भदौरिया को लंबे अंतराल के बाद अदालत ने दंडित किया है। पत्रकार और अदालतें तो बार बार इंगित करती रहीं हैं कि मध्यप्रदेश के चौथे स्तंभ में सुधार की जरूरत है लेकिन सत्ता माफिया के इस प्रतीक पुतुल ने लगभग तीन दशकों तक पत्रकारिता के चेहरे पर कालिख पुतवाने का काम जारी रखा। एमपी वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के शलाका पुरुष राधावल्लभ शारदा की जिजीविषा और धैर्य ने पत्रकारों के इस कलंक को अब उसके अंजाम तक पहुंचाने में सफलता पाई है। प्रेस जगत में अदालत के इस फैसले की भूरी भूरी प्रशंसा की जा रही है।
इस अपराधी ने झूठे दस्तावेज पेश कर सरकारी विज्ञापन की राशि हडपी और डाक विभाग को भी धोखे में रखा था। राज्य आर्थिक अनवेषण ब्यूरो भोपाल ने इस शिकायत पर 23 फरवरी 2006 को प्रकरण क्रमांक 05/06 दर्ज किया था। जिसमें सुनवाई करते हुए प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश भोपाल ने आरोपी मध्यप्रदेश श्रमजीवी पत्रकार संघ के अध्यक्ष शलभ भदौरिया को 3 साल के कारावास और 50 हजार रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई है।प्रकरण धारा 120बी, 420, 467, 468, 471 भादवि में दर्ज हुआ था।
उल्लेखनीय
है कि एमपी वर्किंग जर्नलिस्ट
यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष
राधावल्लभ शारदा ने वर्ष 2003
में राज्य आर्थिक
अनवेषण ब्यूरो भोपाल में
शिकायत दर्ज करवाई थी जिस पर
माननीय न्यायालय ने अपना
निर्णय सुनाया। इस प्रकरण
में फरियादी गुलाब सिंह राजपूत
थाना प्रभारी रा.आ.अप.
अन्वेषण ब्यूरो भोपाल
और संदेही/आरोपियों
में शलभ भदौरिया एवं विष्णु
वर्मा विद्रोही थे।सुनवाई
के दौरान ही विष्णु वर्मा की
मौत हो चुकी है। प्रकरण की
विवेचना भोपाल इकाई के पुलिस
अधीक्षक सुधीर लाड़ ने की।
न्यायालय
ने पाया कि आरोपियों ने आंध्र
प्रदेश में रजिस्टर्ड तेलगू
समाचार पत्र के आरएनआई प्रमाण
पत्र और अन्य फर्जी दस्तावेज
लगाकर सरकारी विज्ञापन प्राप्त
किए। इसी प्रकार आरोपी शलभ
भदौरिया ने फर्जी दस्तावेज
लगाकर डाक पंजीयन भी करवाया
और अवैध रूप से आर्थिक लाभ भी
प्राप्त किया। ये प्रकरण काफी
समय पहले सरकारों की निगाह
में आ चुका था इसके बावजूद ये
व्यक्ति कई फर्जी नामों से
सरकारी सुविधाओं का हितग्राही
बना रहा।
इस
व्यक्ति के विरुद्ध प्रदेश
और राजधानी के पत्रकार लगभग
तीन दशकों से ही अपनी खबरें
प्रकाशित करते रहे हैं। इसके
बावजूद सरकारों में घुसपैठ
बनाने वाला सत्ता माफिया इसे
संरक्षण देकर जिंदा बनाए रखता
था। अब जबकि सोशल मीडिया की
मजबूत उपस्थिति दर्ज हो चुकी
है तब मुख्यमंत्री कमलनाथ ने
भी मीडिया को उपदेश जारी करने
की परंपरा शुरु कर दी है। जाहिर
है कि इस फैसले से मुख्यमंत्री
को भी मीडिया के बीच पलते रहे
ठगों को पहचानने में आसानी
हो जाएगी।
भोपाल,10
जुलाई(प्रेस
सूचना केन्द्र)।मध्यप्रदेश
पुलिस ने बालाघाट में दो इनामी
नक्सलियों को सीधी मुठभेड़
में मार गिराया है। मंगलवार
को हुई इस मुठभेड़ में मारे
गए नक्सली टाण्डा दलम के सदस्य
बताए गए हैं। पुलिस महानिदेशक
व्हीके सिंह ने इसे एक बड़ी
उपलब्धि बताया है। गौरतलब है
कि छह सालों बाद पुलिस की
नक्सलियों से ये सीधी मुठभेड़
हुई है।
पुलिस
मुख्यालय में आयोजित पत्रकार
वार्ता में आज पुलिस महानिदेशक
विजय कुमार सिंह, एडीजी
नक्सल जी.पी.सिंह
और बालाघाट के आईजी के पी
वेंकटेश्वर राव ने घटनाक्रम
पर विस्तृत जानकारियां दीं।
डीजीपी ने प्रेस को दिए संबोधन
में बताया कि पुलिस मुठभेड़
में जो दो नक्सली मारे गए हैं
उन पर महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़
और मध्यप्रदेश में कुल चौदह
लाख रुपये का इनाम घोषित किया
गया था।
उन्होंने
बताया कि पुलिस को जानकारी
मिली थी कि बालाघाट जिले के
नेवरवाही गांव के पुजारी टोला
के एक मकान में नक्सलियों की
बैठक आयोजित होने वाली है।
इस सूचना के आधार पर हॉक फोर्सऔर
पुलिस अधीक्षक बालाघाट ने
कार्ययोजना बनाई। अपने अभियान
में देवरवेली से हॉक फोर्स
के 17 जवानों
को घटनास्थल पर भेजा गया। ये
इलाका लांजी पुलिस थाने के
क्षेत्र में होने के कारण
लांजी के एसडीओपी और थाना
प्रभारी भी पहुंच गए।
पुलिस
टीम को रेकी करने पर पता चला
कि वहां वर्दीधारी नक्सली
हथियारों के साथ मौजूद हैं।
सूचना पक्की होने पर पुलिस
की चार टीमों ने प्रेम लाल
टेकाम के उस मकान को चारों ओर
से घेर लिया। आवाज होने पर कुछ
लोग टार्च लेकर घर से बाहर आए
तो पुलिस ने उन्हें समर्पण
करने को कहा। इसके जवाब में
नक्सलियों ने गोलियां चलाना
शुरु कर दीं। हॉक फोर्स के तीन
प्रधान आरक्षक तब तक मकान के
नजदीक पहुंच चुके थे। उन्होंने
भी जवाबी गोलीबारी शुरु कर
दी।
पुलिस
को पता चला था कि मकान में पांच
नक्सली मौजूद हैं। पुलिस
गोलीबारी के बीच तीन नक्सली
अंधेरे का फायदा उठाकर जंगल
में भाग गए। मोर्चा संभालने
वाले एक पुरुष और एक महिला
नक्सली को पुलिस ने गोलीबारी
के बीच मार गिराया। नक्सली
युवक मंगेश की उम्र लगभग 21
साल थी और उसके
पास सशस्त्र बलों से चुराई
गई एसएलआर बरामद की गई है।
जबकि युवती के पास से 315
बोर की रायफल
थी। नक्सली युवक मंगेश उर्फ
अशोक छत्तीसगढ़ के ही राजनांदगांव
के कुर्रेझर गांव का निवासी
था। वह टाण्डा एरिया कमेटी
का सदस्य था। जबकि महिला नक्सली
की पहचान नंदे उम्र 19
वर्ष निवासी
बस्तर के रूप में की गई है।
पुरुष
नक्सली के पास से पुलिस ने
एसएलआर राईफल,उसकी
तीन मैगजीन, दो
वायरलेस सेट, मोबाईल
चार्जर, टार्च,
केल्कुलेटर,
पिट्ठू बैग,
नकद 1720
रुपए,दो
डायरी बरामद की गई हैं। मृत
महिला नक्सली के पास से 315
बोर की राईफल
के साथ 13 राऊंड,
फुल थ्रू ,
छाता,
चाकू,
सुई धागा और
पेन आदि सामग्री बरामद हुई
है।
पुलिस ने नक्सली गतिविधियों पर रोकथाम करने पहुंचे जवानों पर हमला करने के आरोप में अज्ञात नक्सलियों के विरुद्ध लांजी थाने में अपराध क्रमांक 200। 19 धारा 307,120 बी, 147, 148, 149 और भारतीय दंड विधान की धारा 25। 27 आर्म्स एक्ट के साथ साथ धारा 11,13 विधि विरुद्ध क्रियाकलाप अधिनियम पंजीकृत करके विवेचना शुरु की है। मृत नक्सलियों पर मध्यप्रदेश राज्य ने 3-3 लाख, छत्तीसगढ़ राज्य ने 5-5 लाख, और महाराष्ट्र राज्य ने 6-6 लाख का इनाम घोषित किया गया था।
पुलिस महानिदेशक ने बताया कि देवरलांजी के थोड़े से इलाके में नक्सलियों का मूवमेंट रहा है। पिछले चुनाव के दौरान नक्सलियों की कई गतिविधियां मंडला, डिंडोरी और अमरकंटक के इलाकों में भी देखी गईं थीं। बालाघाट में भी कई आपराधिक दलों के बीच नक्सलियों से जुड़ाव की सूचनाएं मिलती रहीं हैं। इन्हें देखते हुए ये तो नहीं कहा जा सकता कि प्रदेश में नक्सलवाद बढ़ा है लेकिन ये बात साफ है कि मध्यप्रदेश पुलिस ने नक्सलवाद को समाप्त करने के लिए अपने कदम आगे बढ़ाए हैं। उन्होंने कहा कि एनकाऊंटर करने वाले पुलिस कर्मियों को उनकी बहादुरी के लिए पुरस्कार भी दिए जाएंगे।
भोपाल,17मई(प्रेस
सूचना केन्द्र)।
भाजपा की लोकसभा प्रत्याशी
साध्वी प्रज्ञा ने आम चुनाव
के अंतिम दौर में महात्मा
गांधी के हत्यारे नाथूराम
गोडसे की देशभक्ति पर जैसे
ही बयान दिया भूचाल आ गया। खुद
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी
ने इसे खारिज किया और कहा कि
वे इसके लिए मन से साध्वी को
माफ नहीं कर पाएंगे। प्रश्न
फिल्म अभिनेता कमल हासन के
गोडसे को आतंकवादी बताए जाने
पर था लेकिन इस पर समूची भाजपा
बैकफुट पर आ गई।
इसकी एक बड़ी वजह 19 मई को होने जा रहा आम चुनाव का अंतिम चरण भी है। गांधी देश के लोकप्रिय व्यक्तित्व हैं और उनके हत्यारे को देशभक्त बताना राजनीतिक रूप से उचित नहीं था।साध्वी का बयान आसानी से देश के आम मतदाता के गले उतरने वाला नहीं था । इसलिए आनन फानन में भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा को माफी मांगने के निर्देश दिए। उनके समर्थन में बहस को गांधीवाद पर लाने के प्रयास करने वाले अनिल सौमित्र को तो भाजपा ने निलंबित ही कर दिया। अनुशासन समिति उनके बयानों पर स्पष्टीकरण लेगी और फिर तय किया जाएगा कि पार्टी इन बयानों को कैसे देखे। हालांकि तब तक आम चुनाव का अंतिम दौर बीत जाएगा।
महात्मा गांधी की हत्या के बाद उनके व्यक्तित्व की जिस तरह मीमांसा की गई है उससे भारत में गांधी को महापुरुष माना जाता है। दुनिया भी उन्हें शांतिदूत मानती है। जिस तरह उन्होंने सत्य और अहिंसा को लेकर प्रयोग किए उससे गांधी के व्यक्तित्व की विशालता का पता चलता है। उनके व्यक्तित्व का एक पक्ष हत्या के लिए फांसी पाने वाले नाथूराम गोडसे ने भी अपने बयानों में रेखांकित किया है। हालांकि तत्कालीन कांग्रेसी सरकारों
ने उन विचारों पर लिखी पुस्तक
यह कहते हुए प्रतिबंधित कर
दी कि बापू के हत्यारे को महिमा
मंडित नहीं किया जा सकता।
चुनाव
प्रचार के अंतिम दौर में आयोजित
पत्रकार वार्ता में भाजपा
अध्यक्ष अमित शाह ने एक सवाल
के जवाब में कहा कि जिस तरह
मालेगांव बम धमाके की आड़ में
हिंदुओं को आतंकवादी बताने
का षड़यंत्र किया गया हमने
उसके विरुद्ध साध्वी प्रज्ञा
को मैदान में उतारकर अपना
सत्याग्रह दर्ज कराया है।
साध्वी प्रज्ञा को इस मामले
में झूठा फंसाया गया था। एनआईए
अदालत ने विचारण के बाद इसीलिए
उन पर से आतंकवादी निरोधक
कानून(मकोका)
हटाया था।
साध्वी
प्रज्ञा तथा कथित हिंदू आतंकवाद
की शिकार रहीं हैं। कांग्रेस
पार्टी की ओर से भाजपा पर हिंसा
को समर्थन देने के जो आरोप
लगाए जाते रहे हैं उसे षड़यंत्र
बताने के लिए ही साध्वी प्रज्ञा
को प्रत्याशी बनाया गया था।
जरूरत थी कि साध्वी प्रज्ञा
इस मुद्दे पर खूब बोलतीं। वे
बताती कि हिंदू आतंकवाद के
षड़यंत्र का वे कैसे शिकार
बनीं। उनके बयान कांग्रेस के
लिए संकट खड़े करने वाले साबित
हो सकते थे। इसीलिए कांग्रेस
ने अपनी चिरपरिचित शैली में
इस पर चर्चा को रोकने की रणनीति
बनाई और उसे सफल बनाने में
कामयाब भी हुई। कांग्रेस के
इस षड़यंत्र में उसके भाजपाई
सहयोगियों ने बढ़ चढ़कर सहयोग
दिया। उनके हर बयान को वे भाजपा
के लिए संकट में डालने वाला
बताते रहे और अपनी ओर से
स्पष्टीकरण देने के बजाए
साध्वी से बयान वापस लेकर माफी
मंगवाने की रणनीति
अपनाते रहे।
जब साध्वी प्रज्ञा ने बाबरी ढांचा और राम मंदिर के संदर्भ में बयान दिया तो भाजपा के इन्हीं बौड़म रणनीतिकारों ने बयान वापस करवा दिया। जबकि ये बयान बहुसंख्यक वोट दिलाने में मददगार था। हेमंत करकरे के अत्याचारों का उल्लेख करने पर इसे मराठी भाषियों को नाराज करने वाला बताकर माफी मंगवा दी गई। जब कमलहासन ने गोडसे को देश का पहला आतंकवादी बताया तो साध्वी प्रज्ञा ने अपनी जानकारी के आधार पर उन्हें देशभक्त बता दिया। दरअसल वे जिस अभिनव भारत नाम के संगठन से कथित तौर पर जुड़ी रहीं हैं वो संगठन देश विरोधी ताकतों को चुनौती देने के लिए जाना जाता है। इस संगठन ने बापू वध के उस पक्ष को भी करीब से देखा सुना है जिसे आम लोग नहीं जानते। न केवल कांग्रेस बल्कि कई भाजपा की सरकारें भी चाहती रहीं हैं कि जनता देश के जरूरी मुद्दों के बजाए काल्पनिक कहानियों में ही उलझी रहे। कुछ इसी रणनीति के चलते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा हाईकमान को भी सीमित जानकारियां पहुंचाई गईं हैं।
अनिल सौमित्रःसाध्वी प्रज्ञा को जनता की आवाज बनाने की कीमत चुकाई
भाजपा मीडिया विभाग के प्रमुख अनिल सौमित्र ने साध्वी के बयान के दुष्परिणामों से पार्टी को बचाने के लिए निजी हैसियत से जो स्पष्टीकरण दिया और बहस को मोदी सरकार के गांधीवादी कार्यों की ओर मोड़ने का प्रयास किया उस पर भी राज्य भाजपा ने निलंबन की अज्ञानता भरी जल्दबाजी दिखाई। श्री सौमित्र का कहना था कि भारत तो सनातनी देश है। इसका कभी निर्माण नहीं किया गया। यहां कोई भी महापुरुष धरती माता का सुपुत्र होता है पिता या पति नहीं।निर्माण तो पाकिस्तान का हुआ था। अंग्रेजों ने इसके लिए बाकायदा षड़यंत्र किया जिसकी कीमत देश के हिंदू मुस्लिम दोनों समुदायों के नागरिकों को चुकानी पड़ी। ये विभाजन गांधी जी के दो शिष्यों जवाहरलाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना के आपसी टकराव की वजह से हुआ था। अंग्रेजी भाषा में देश बनाने वाले को फादर आफ द नेशन कहा जाता है। इस लिहाज से गांधी तो पाकिस्तान के राष्ट्रपिता हुए। श्री सौमित्र ने कहा कि कांग्रेस के नेतागण ही कहते हैं कि इंदिरा गांधी जी ने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए। इस लिहाज से बंगलादेश बनाए जाने पर उन्हें बंगलादेश की माता कहा जाना चाहिए।
तर्कों
और तथ्यों के आधार पर ये बातें
पहली बार नहीं कही गईं हैं।
देश के कई मूर्धन्य विद्वानों
ने महात्मा गांधी के व्यक्तित्व
की मीमांसा करते हुए ये बातें
कही हैं। देश के कई विद्वान
और संगठन इनसे सहमत हैं और समय
समय पर ये कहते भी रहते हैं।
भाजपा अपना जनाधार बढ़ाने
के लिए इन देशभक्त संगठनों
से सहयोग भी लेती रहती है। इन
संगठनों से जुड़े लोग राष्ट्रवादी
संगठन आरएसएस से भी जुड़े रहे
हैं। इस लिहाज से वे भाजपा से
भी जुड़े रहे हैं। इस आम चुनाव
में जब भाजपा का संगठन खुलकर
मैदान में नहीं था तब अनिल
सौमित्र ने अपने संपर्कों के
जरिए आगे बढ़कर साध्वी प्रज्ञा
के प्रचार की कमान संभाली थी।
इस लिहाज से वे भाजपा के उन
दिग्गजों के निशाने पर आ गए
थे जो कांग्रेस के दिग्विजय
सिंह के साथ खड़े ठेकेदारों
के गिरोह से जुड़े रहे हैं।
यही समूह चुनाव में साध्वी
प्रज्ञा के बयान और भाषण रोकने
की रणनीति पर काम कर रहा था।
अब जबकि चुनाव अंतिम चरण में
पहुंच गया है तब ये गिरोह अपने
षड़यंत्र उजागर न होने देने
के लिए किसी को जिम्मेदार
ठहराने का प्रयास कर रहा था।
अनिल सौमित्र का ताजा बयान
उनके लिए बहाना बन गया।
पिछले पंद्रह सालों के शासनकाल में भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने पार्टी की विचारधारा को मजबूत न होने देने के लिए भरसक प्रयास किए । पार्टी का मुखपत्र रही चरैवेति चरैवेति पत्रिका और अन्य प्रकाशनों को भी छिन्न भिन्न कर दिया गया। प्रदेश में स्वस्थ परिचर्चा न हो इसके लिए मालवीय नगर के पत्रकार भवन को भी आपराधिक तत्वों के हाथों में सौंपकर गूंगा बना दिया गया। यही वजह है कि देश के मूलभूत मुद्दों पर जब भी कोई चर्चा होती है पत्रकार और नागरिक सभी ज्ञानशून्य और दिशा शून्य नजर आते हैं। प्रदेश में सत्ता माफिया की लूट को छुपाने के लिए भी इसी षड़यंत्र का सहारा लिया गया। पहली बार साध्वी प्रज्ञा के मैदान में आ जाने से इस गिरोह को अपनी रणनीति असफल होती नजर आने लगी है। इस गिरोह को साध्वी प्रज्ञा एक बड़ी बाधा नजर आ रहीं हैं। पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के खिलाफ षड़यंत्र करने वाला ये गिरोह अब साध्वी प्रज्ञा और उन्हें समर्थन देने वालों के विरुद्ध भी साजिशें रच रहा है। देखना है कि खुद को जनता का चौकीदार कहने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस मामले पर क्या भूमिका निभा पाते हैं। यदि जनता उन्हें एक बार फिर सत्ता सौंपती है भूमिका भी तभी तय होगी।
साध्वी प्रज्ञाःभगवा आतंकवाद कहकर हिंदुत्व को बदनाम किया गया, हम तो सबका साथ सबका विकास चाहते हैं।
भोपाल,9
मई(प्रेस
सूचना केन्द्र)।
भगवा आतंकवाद का शोर मचाकर
मालेगांव बम धमाके के असली
आरोपियों को छुड़ाने और साध्वी
प्रज्ञा को आतंकी बताने की
साजिश एनआईए की अदालत में
धराशायी हो गई। आतंकवाद विरोधी
दस्ते(एटीएस) का
षड़यंत्र अब केवल सामान्य
मुकदमे में बदल गया है जो इतना
आधारहीन है कि जल्दी समाप्त
हो जाएगा। मुंबई हाईकोर्ट के
वकील और साध्वी प्रज्ञा
प्रताड़ना कांड की हर कड़ी
से वाकिफ रणजीत सांगले ने एक
पत्रकार वार्ता में इस षड़यंत्र
की सभी बारीकियों का खुलासा
किया और इसे सत्ता माफिया का
षड़यंत्र बताया।
भारत
रक्षा मंच के राष्ट्रीय मंत्री
श्री सांगले ने बताया कि एटीएस
के प्रमुख स्वर्गीय हेमंत
करकरे और उनके सहयोगियों ने
अपनी कथित छानबीन के बाद जो
कहानी तैयार की थी वो एनआईए
की अदालत में हवा हवाई साबित
हुई। एनआईए ने साध्वी प्रज्ञा
और उनके सहयोगियों पर लगाया
मकोका हटा दिया और केवल सामान्य
धाराओं में मुकदमा चलाने की
इजाजत दी है। कानूनी प्रक्रियाओं
का पालन जरूरी है इसलिए ये
मुकदमा चलाया जा रहा है । इस
मुकदमे में इतनी खामियां हैं
कि वो अदालत में नहीं टिक पाएगा।
उन्होंने
बताया कि कांग्रेस के खेमे
से साध्वी प्रज्ञा को आतंकवादी
कहकर बदनाम किया जाता रहा है।
ये कहा जाता है कि वे बीमार
थीं इसलिए अदालत ने उन्हें
जमानत दे दी। हकीकत ये है कि
न्यायालय को उनके विरुद्ध
प्रथम दृष्टया ही बमकांड में
शामिल होने के सबूत नहीं मिले।
वे स्त्री हैं और साढ़े आठ साल
उन्होंने विचाराधीन अवस्था
में न्यायिक हिरासत में गुजारे
हैं। हिरासत में रहते हुए ही
उन्हें कैंसर जैसे रोग ने जकड़
लिया। उन्हें पर्याप्त इलाज
नहीं मिल पा रहा था इसलिए
स्वास्थ्य को अतिरिक्त कारण
समझकर उनकी जमानत मंजूर की
गई।
तत्कालीन
गृहमंत्री पी चिदंबरम ने संसद
में झूठा आश्वासन दिया था कि
हम गैर कानूनी गतिविधियां
प्रतिबंधक कानून और उसके अधीन
बनाए गए अधिनियमों का दुरुपयोग
रोकने के लिए न्यायाधीश स्तर
का परिवीक्षा अधिकारी नियुक्त
करेंगे। उसकी रिपोर्ट पर ही
सबूतों की जांच की जाएगी। इसके
बावजूद मुकदमे की समीक्षा के
लिए कोई स्वतंत्र न्यायिक
अधिकारी नियुक्त नहीं किया।
विधि विभाग के सरकारी अधिकारी
की राय पर साध्वी प्रज्ञा की
गिरफ्तारी की गई थी जिससे
सरकार की नियत उजागर होती है।
श्री
सांगले ने बताया कि 2008 में
घटित मालेगांव बम धमाके में
मारे गए और घायल व्यक्तियों
की जो रिपोर्ट अदालत में
प्रस्तुत की उसमें 101
घायलों के
इंज्यूरी सर्टिफिकेट फर्जी
साबित हुए। छह मृत व्यक्तियों
की पोस्ट मार्टम रिपोर्ट के
आधार पर डाक्टरों ने अदालत
में कहा कि मृतकों के शरीर पर
बम धमाके के निशान नहीं मिले
थे। कुछ मृत शरीरों में से तो
बंदूक की गोलियां तक बरामद
हुईं जिससे बम धमाके की कहानी
ही काल्पनिक साबित हो रही है।
ऐसा लगता है कि वहां कम क्षमता
का बम तो फटा लेकिन किन्हीं
असामाजिक तत्वों ने बंदूकों
से गोलियां भी चलाईं थीं।
उन्होंने
कहा कि बम धमाके के बाद साध्वी
की मोटरसाईकिल मिलने की कहानी
भी कई घुमावदार रास्तों से
जोड़ी गई जिससे भगवा आतंकवाद
की कहानी एक षड़यंत्र साबित
होती है।
रणजीत सांगलेःभगवा आतंकवाद के पीछे सत्ता माफिया
गौर
तलब है कि भगवा आतंकवाद को हवा
देने का काम गृहमंत्री पी
चिदंबरम और सुशील कुमार शिंदे
के कार्यकाल में हुआ। शिवराज
पाटिल और दिग्विजय सिंह ने
कई स्थानों पर जिस तरह से इस
मुद्दे का हौआ खड़ा किया उससे
भी स्पष्ट होता है कि ये एक
षड़यंत्र था। बाटला हाऊस
एनकाऊंटर में इंस्पेक्टर
मोहन शर्मा की शहादत को जिस
तरह से बदनाम करने का षड़यंत्र
किया गया उससे तो जांच एजेंसियों
से जुड़े लोग साफ समझ गए थे कि
हिंदू मुस्लिम वैमनस्य फैलाने
के लिए भगवा आतंकवाद की कहानी
को बल दिया जा रहा है।
भोपाल
लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस
प्रत्याशी और प्रदेश के जन
विद्रोह के बाद हटाए गए पूर्व
मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह
अपने सहयोगियों के माध्यम से
जिस तरह साध्वी प्रज्ञा को
आतंकवादी साबित करने का जो
प्रयास आज भी कर रहे हैं उससे
भी कांग्रेस के षड़यंत्रों
का खुलासा हो रहा है। उनकी
दूसरी पत्नी और पत्रकार अमृता
राय अपने मित्रों के माध्यम
से जो कहानियां प्रसारित करने
का प्रयास कर रहीं हैं उससे
भी भगवा आतंकवाद को लेकर दिग्गी
खेमे की सक्रियता उजागर हो
रही है। दिग्विजय सिंह हिंदू
विरोधी छवि से बचने के लिए
कहते रहे हैं कि उन्होंने कभी
भगवा आतंकवाद नहीं शब्द इस्तेमाल
नहीं किया बल्कि संघी आतंकवाद
कहा था। जबकि हकीकत ये है कि
अभिनव भारत जैसे संगठन हिंदुत्व
की विचारधारा के तो समर्थक
रहे हैं पर आरएसएस से उनका
सीधा जुड़ाव नहीं था।
हाल
ही में देश के कई अखबारों में
कर्नाटक की पत्रकार गौरी लंकेश
की हत्या के लिए बनाई गई एसआईटी
की क्लोजर रिपोर्ट का हवाला
देकर खबरें छपवाई गईं हैं।
जिनमें कथित तौर पर वही कहानी
दुहराई गई है जो मालेगांव बम
धमाके और समझौता एक्सप्रेस
धमाके में एटीएस ने रची थी।
ये कहानी एनआईए की सख्त छानबीन
में आधारहीन साबित हो चुकी
है। इसके बावजूद कांग्रेस का
दुष्प्रचार तंत्र इसे लगातार
दुष्प्रचारित कर रहा है। भोपाल
में साध्वी प्रज्ञा के दावे
के बाद जिस तरह कंप्यूटर बाबा
के नेतृत्व में बाबाओं की
तंत्र साधना और परेड कराई गई
उससे भी कांग्रेस का षड़यंत्र
जनता के सामने आ गया है। कई
बाबाओं ने कैमरे के सामने
स्वीकार किया कि उन्हें दक्षिणा
देकर बुलाया गया था। जाहिर
है कि 12 मई
हो होने वाले मतदान में भोपाल
की जनता इस मुद्दे पर अपनी राय
जरूर देगी।
भोपाल,3
मई(प्रेस
सूचना केन्द्र)।
साध्वी प्रज्ञा को बमकांड के
झूठे आरोप में फंसाकर हिंदुओं
को आतंकवादी बताने का षड़यंत्र
कांग्रेस के नेता दिग्विजय
सिंह और उनके सहयोगियों ने
रचा था। इससे वे पूरी दुनिया
में हिंदुओं को उसी तरह संदिग्ध
बनाने की साजिश कर रहे थे जिस
तरह पाकिस्तान के नागरिकों
को कई देशों में शंका की दृष्टि
से देखा जाता है। मालेगांव
बम धमाके में साध्वी प्रज्ञा
को जिस पुरानी मोटरसाईकिल से
रिश्ता जोड़कर गिरफ्तार किया
गया था वह पुलिस ने आठ दिन बाद
बरामद की, जिससे
साबित होता है कि ये सोची समझी
साजिश थी।
भारतीय
जनता पार्टी के राष्ट्रीय
प्रवक्ता और ख्यातनाम पत्रकार
प्रेम शुक्ल ने आज भोपाल में
आयोजित बुद्धिजीवियों की चाय
पर चर्चा में ये बात कही। भारत
में आतंकवाद से हिंदुओं को
जोड़ने के विषय पर लिखी गई चार
पुस्तकों पर चर्चा के दौरान
देश की आतंकवादी घटनाओं की
पृष्ठभूमि की पड़ताल करने का
प्रयास किया गया।इस दौरान
भगवा आतंक एक षड़यंत्र किताब
के लेखक आरवीएस मणि और द ग्रेट
इंडियन कांस्पिरेसी के लेखक
प्रवीण तिवारी ने आतंकी घटनाओं
की पृष्ठभूमि पर अपने नजरिए
का खुलासा किया। कार्यक्रम
की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार
रामेश्वर मिश्र पंकज ने की।
आयोजक के तौर पर राष्ट्रीय
सुरक्षा जागरण मंच की महासचिव
रेशम सिंह ने अपना मार्गदर्शन
दिया। मंच की ओर से कार्यक्रम
का संचालन विचारक अनिल सौमित्र
ने किया।
अपने
वक्तव्य में प्रेम शुक्ल ने
कहा कि बाबरी विध्वंस के बाद
राजनीति में जिस तरह भाजपा
का उदय हुआ उसे देखते हुए
कांग्रेस ने हिंदू आतंकवाद
की कहानी रचकर देश को बदनाम
करने की साजिश रची। मालेगांव
में फोड़ा गया बम जहां बनाया
गया उसकी मिट्टी और बम रखने
के लिए इस्तेमाल साईकिल बरामद
करके आतंकवादियों को भी गिरफ्तार
कर लिया गया था। सफदर नागौरी
के नार्को एनालिसिस टेस्ट
में सारी कहानी सामने आ गई।
पुलिस ने मुंबई हमले की साजिश
में उजागर हुए डेविड कोलमेन
हेडली ने भी इसी कहानी को
सत्यापित किया।इसके बावजूद
पुलिस ने लंबे समय तक चालान
पेश नहीं किया और बाद में आरोपी
संदेह का लाभ देकर छोड़ दिए
गए।
इसकी
वजह तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज
पाटिल, दिग्विजय
सिंह और सुशील कुमार शिंदे
जैसे नेता थे। किन्हीं विदेशी
ताकतों के साथ मिलकर इन्होंने
देश के खिलाफ षड़यंत्र किया।
मालेगांव बम धमाके में अचानक
एटीएस साध्वी प्रज्ञा भारती,समीर
कुलकर्णी, कर्नल
पुरोहित, असीमानंद
और अन्य के नाम सामने लाए गए।
कहा गया कि आरएसएस की विचारधारा
से जुड़े इन लोगों ने ये बम
फोड़ा था। इस कहानी का आधार
साध्वी प्रज्ञा की वो कथित
मोटरसाईकिल थी जिसे इन लोगों
की गिरफ्तारी के आठ दिनों बाद
बरामद किया गया। हिंदू आतंकवाद
की कहानी दिग्विजय सिंह ने
ही रची थी।यदि 26।11हमले
में अजमल कसाब नहीं पकड़ा जाता
और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी
आईएसआई की भूमिका का खुलासा
नहीं होता तो मारे गए आतंकवादियों
के फर्जी हिंदू नामों वाले
परिचयपत्रों और हाथों में
बंधे कलावा के आधार पर हिंदू
आतंकवाद को प्रमाणित कर दिया
जाता।
उन्होंने
बताया कि जब ये घटना हुई थी तब
कांग्रेस नेता अहमद पटेल ने
दबाव डालकर हसन कपूर को मुंबई
पुलिस का मुखिया बनवाया गया
था। उनके हस्तक्षेप से इन
घटनाओं के साक्ष्य मिटाने की
साजिश की गई। अजीज बर्नी की
जिस विवादित पुस्तक को आनन
फानन में लिखवाया गया और
दिग्विजय सिंह उसका विमोचन
करने पहुंचे उसमें कहा गया
कि हेमंत करकरे हिंदू आतंकवाद
के कारण मारे गए। जबकि उस
दुष्टात्मा का निधन आतंकवादियों
की गोली से हुआ था। उन्होंने
कहा कि देश में अब तक जो आतंकवादी
पकड़े गए या मारे गए वे अजमेर
शरीफ की दरगाह, फातिमा
की दरगाह को तो निशाना बनाते
रहे लेकिन उन्होंने कभी किसी
देवबंदी मस्जिद को निशाना
नहीं बनाया। श्री शुक्ल ने
आव्हान किया कि जिन लोगों ने
साध्वी प्रज्ञा को नौ सालों
तक अमानवीय प्रताड़ना दी जनता
उन्हें सौ सालों तक के लिए
सत्ता से बाहर फेंक देगी।
जब
देश में ये आतंकवादी घटनाएं
चल रहीं थीं तब गृह मंत्रालय
में अवर सचिव रहे आरवीएस मणि
ने जब देशभक्तों के खिलाफ इन
षडयंत्रों को करीब से देखा
तो उन्होंने इसका राज फाश करने
का बीड़ा उठाया। उन्होंने
भगवा आतंक एक षड़यंत्र नाम
से लिखी पुस्तक में पूरे
षड़यंत्र के दस्तावेजी प्रमाण
भी प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने
पुस्तक में लिखी बातों के
संबंध में बताया कि गृहमंत्री
चिदंबरम ने 2010 में
देवबंद जाकर भगवा आतंकवाद
शब्द कहकर देश के लोगों को ही
अपराधी बताने का काम किया था।
एटीएस ने ही समझौता एक्सप्रेस
के आतंकवादियों को भाग निकलने
में मदद की। बाटला हाऊस एनकाऊंटर
को फर्जी बताकर दिग्विजय सिंह,
सोनिया गांधी
जैसे नेताओं ने बहादुर अफसर
मोहन शर्मा की शहादत का मजाक
उड़ाया था। इस तरह कांग्रेस
ने आतंकवाद को अल्पसंख्यकों
पर अत्याचार बताकर न केवल
मुस्लिमों की हत्याएं करवाईं
बल्कि हिंदू आतंकवाद जैसा
झूठा शब्द रचकर देश के मूल
नागरिकों को बदनाम करने का
काम किया था।
आतंक
से समझौता पुस्तक के लेखक
प्रवीण तिवारी ने कहा कि जिस
दिन स्वामी विवेकानंद के शरीर
के भगवा रंग के कपड़ों को आतंक
से जोड़ने की साजिश की गई उसे
देखकर हर आम भारतीय का मन दुखी
हुआ था। एटीएस ने आतंकवाद की
जड़ें खोदने वाले कर्नल पुरोहित
और उनके सहयोगियों को ही इस
कांड में आरोपी बना दिया और
असली दोषियों को बच निकलने
की पृष्ठभूमि तैयार की। भाजपा
की प्रत्याशी प्रज्ञा भारती
भी इस षड़यंत्र का शिकार हुई
थीं। उन्हें लौमहर्षक प्रताड़ना
दी गई। आज हर राष्ट्रभक्त
नागरिक का दायित्व है कि वो
देश के विरुद्ध षड़यंत्र करने
वालों को दंडित करे।
कार्यक्रम
की अध्यक्षता करते हुए साहित्यकार
रामेश्वर मिश्र पंकज ने कहा
भारत की अस्मिता का अपमान करने
वाले दिग्विजय सिंह,
चिदंबरम जैसे
लोगों को सजा देने का दायित्व
अब जनता का है।आयोजन में श्रोता
के रूप में शामिल सूर्यकांत
केलकर ने कहा कि भारत रक्षा
मंच से जुड़े एड्व्होकेट हिंदू
आतंकवाद जैसा शब्द रचने के
दोषी लोगों के विरुद्ध कानूनी
कार्रवाई करेंगे। एड्व्होकेट
साधना पाठक ने कहा कि जब हम
अपने वकील साथियों को लेकर
साध्वी प्रज्ञा के बयान लेने
जाते थे तब हमने उनकी असहनीय
वेदना को करीब से महसूस किया
था। उन्होंने कहा कि निर्दोष
नागरिकों के विरुद्ध षड़यंत्र
करने वालों के विरुद्ध हम अब
तक लगभग उदार रहे हैं,
पर अब समय आ
गया है कि जब हम उन्हें आगे
बढ़कर दंडित करें।
भोपाल,18 मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)। वायुसेना के पूर्व सैनिकों और अफसरों ने भारतीय सेना की कार्रवाईयों पर सवाल उठाने वालों को तमीज सिखाने के लिए खुली चेतावनी दी है। उनका कहना है कि जो सैनिक देश पर जान न्यौछावर करने तैयार रहते हैं उनकी कार्रवाई को घटिया राजनीति का मुद्दा न बनाया जाए। जिस तरह से कुछ नेताओं ने पुलवामा आतंकी हमले और उसके बाद वायुसेना की एयर स्ट्राईक को लेकर आधारहीन आरोप लगाए हैं उन्हें अब सावधान हो जाना चाहिए। बगैर नाम लिए कांग्रेस के एक पूर्व मुख्यमंत्री के बयानों पर भी वायुसेना के पूर्व अफसरों ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई है।
टॉप ब्रॉस पूर्व सैनिक एवं अधिकारी संघ भोपाल की ओर से रिटायर्ड विंग कमांडर डॉ.यू.के.चौधरी ने कहा कि कांग्रेस और कुछ अन्य राजनीतिक दल देश की सुरक्षा के मुद्दों पर जिस तरह से घटिया राजनीति कर रहे हैं वो सेना का अपमान है। सर्जिकल और एयर स्ट्राईक सैन्य बलों का विशेषाधिकार है। हम सुरक्षा के मुद्दों पर पूरे चिंतन मनन के साथ कार्रवाई करते हैं। देश की सुरक्षा हमारी जवाबदारी है। हम इसकी मंहगी कीमत भी चुकाते हैं। इसके बावजूद कुछ राजनेता काल्पनिक आरोपों के आधार पर सेना की कार्रवाई पर भ्रम फैला रहे हैं। जिन्हें सेना की कार्रवाई पर शक है वे सबूत पेश करें। हमसे सबूत मांगकर शत्रुओं को शक्तिशाली बनाने की गद्दारी न करें।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर राजनीति बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इसके लिए हम राष्ट्रपति और राज्यपाल महोदय को ज्ञापन भी सौंप रहे हैं। बातचीत के दौरान पूर्व सैन्य अधिकारियों ने कहा कि हम बाहिरी दुश्मनों के साथ साथ देश के भीतर के दुश्मनों से भी निपटना जानते हैं। छोटे मोटे शत्रुओं का इलाज तो कंबल परेड से ही किया जा सकता है लेकिन गद्दारों का इलाज उसी तरह करना पड़ेगा जैसे हम शत्रुओं का करते हैं।
जबरिया घर में घुसकर कब्जा जमाने वाले इन लोगों पर कार्रवाई करने से पुलिस भी घबरा रही है,जाहिर है ये भविष्य में बड़े आपराधिक टकराव की वजह भी बन सकती है।
भोपाल,17
फरवरी(प्रेस
सूचना केन्द्र)।
कांग्रेस के सत्ता में आते
ही कई अपराधियों ने अपना पुराना
कारोबार शुरु कर दिया है। वे
सामाजिक न्याय के नाम पर ऐसी
वारदातों को अंजाम दे रहे हैं
जिनसे मध्यप्रदेश में कारोबार
करना भरोसेमंद नहीं रहा है।
कमलनाथ सरकार की पुलिस भी
असमंजस में है और वो ऐसे मामलों
में हाथ नहीं डाल रही है। जो
कारोबारी सौदे, विवादों
की वजह से अदालतों में हैं
उनमें भी अपराधी तत्वों ने
लूटमार शुरु कर दी है।
भोपाल
के शाहपुरा थाना क्षेत्र स्थित
बावड़िया कला के लक्ष्मी परिसर
में भवन क्रमांक 14 पर
राहुल रघुवंशी के नेतृत्व
में 40-50 लोगों
की भीड़ ने जबरिया कब्जा कर
लिया। इस परिसर का निर्माण
गौरा कंस्ट्रक्शन ने किया
है। प्रोप्राईटर विश्वजीत
दुबे ने इस संबंध में घटना की
दिनांक 4 फरवरी
2019 को
शाहपुरा पुलिस थाने को सूचित
किया और सुरक्षा की मांग भी
की। पुलिस ने हस्तक्षेप से
इंकार कर दिया, कहा
कि मामला अदालत में है इसलिए
आप वही अपनी बात रखें।
पुलिस की बात आधी सही है मकान का दीवानी मामला अदालत में लंबित है, जबकि जबरिया हमला करके कब्जा कर लेने का मामला फौजदारी है। इसके बावजूद पुलिस ने फरियादी को चलता कर दिया। बाद में पुलिस से जुड़े कुछ लोगों ने बताया कि सुरेन्द्र और राहुल रघुवंशी पूर्व मंत्री हजारीलाल रघुवंशी के परिवार से जुड़े हैं, और सरकार के प्रभावी लोगों ने कहा है कि पुलिस इसमें हस्तक्षेप न करे।
इस मकान के लिए श्रीमती उर्मिला रघुवंशी की ओर से लक्ष्मी प्रापर्टीज से मार्च 2007 में निर्माण अनुबंध किया गया था। तब इस मकान की कीमत 34 लाख थी। इसकी खरीद के लिए उर्मिला रघुवंशी ने 21 लाख रुपए बिड़ला होम फायनेंस से लोन लेकर चुका दिए। बाद में एक लाख रुपए नकद भी दिए। शेष 12 लाख रुपए का भुगतान शेष था जिसका चैक देकर उन्होंने बिल्डर से रजिस्ट्री भी करवा ली। बाद में चैक बाऊंस हो गया। जब शेष भुगतान नहीं मिला तो विक्रेता ने अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन होने पर भवन का आधिपत्य खरीददार को हस्तांतरित नहीं किया। भवन का आधिपत्य समय सीमा में हस्तांतरित हो सकता था लेकिन उर्मिला रघुवंशी की ओर से एक प्रकरण क्रमांक 406 ए। 2014 श्रीमान षष्ठम व्यवहार न्यायाधीश वर्ग 2 भोपाल के सामने प्रस्तुत किया गया जिसमें स्थायी निषेधाज्ञा चाही गई थी। अदालत ने उर्मिला रघुवंशी का प्रकरण खारिज कर दिया क्योंकि वे अपना आधिपत्य साबित नहीं कर पाईं। अदालत ने पाया कि चैक बाऊंस करवाकर भवन का पूरा भुगतान नहीं किया गया है।इसलिए न्यायालय ने फैसला दिया कि संपत्ति पर गौरा कंस्ट्रक्शन का ही आधिपत्य है।
चैक
बाऊंस के मामले में भी अदालत
ने उर्मिला रघुवंशी,
पत्नी सुरेन्द्र
सिंह रघुवंशी को दोषी पाया।अदालत
के इस फैसले के खिलाफ उर्मिला
रघुवंशी ने दूसरी अदालत में
ये कहते हुए अपील की कि बिल्डर
ने चैक बाऊंस होने की सूचना
उन्हें समय अवधि में नहीं दी
थी,इसलिए
अब वे भुगतान देने के लिए
उत्तरदायी नहीं हैं।गौरा
कंस्ट्रक्शन ने आधिपत्य अपने
पास ही रखा और इस धोखाधड़ी को
हाईकोर्ट में चुनौती दी। तबसे
ये प्रकरण विचाराधीन है।
भाजपा की सरकार रहते समय तो राहुल रघुवंशी और उसके परिजनों ने अदालत के प्रकरण पर चुप्पी साधे रखी पर कांग्रेस की सरकार आने के बाद घेराबंदी करके 4 फरवरी को मकान पर कब्जा कर लिया। इस मकान में गौरा कंस्ट्रक्शन के 15 लाख रुपए के टाईल्स रखे थे। सामान लेने पहुंचे विश्वजीत दुबे को उर्मिला और राहुल रघुवंशी ने धमकाया कि मकान पर हमारा कब्जा है और आपसे जो बन सके कर लो। अब हमारी सरकार है। हम शेष रुपए भी नहीं देंगे और इतने लंबे अंतराल के कारण जो कीमत बढ़ चुकी है वो भी नहीं देंगे।
सरेआम संपत्ति की इस लूट की शिकायत पर जब पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की तो फरियादी विश्वजीत दुबे ने आईजी इरशाद वली और एसएसपी संजय साहू के सामने भी इस आपराधिक मामले में हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई। इसके बावजूद पुलिस ने पूरे मामले में चुप्पी साध रखी है।
सवाल ये है कि जब किसी खरीददार ने संपत्ति की कीमत ही नहीं चुकाई तो वो उस पर अपना कब्जा कैसे जता सकता है। अनुबंध की शर्तें तो तभी पूरी होती जब रजिस्ट्री के वक्त दिये गए चैक का भुगतान हो जाता। उर्मिला रघुवंशी, सुरेन्द्र रघुवंशी और राहुल रघुवंशी की ओर से जानबूझकर ये धोखाघड़ी की गई है इसके बावजूद पुलिस उनके कब्जे को लूट का आपराधिक कृत्य मानने तैयार नहीं है। सुरेन्द्र रघुवंशी पर कई अन्य आपराधिक मामले भी दर्ज हैं। इसके बावजूद पुलिस की चुप्पी बता रही है कि कांग्रेस की कमलनाथ सरकार कारोबारियों को लूटने से बचाने में रुचि नहीं दिखा रही है। जब कारोबारियों पर अपराधी इस तरह हावी होंगे तो ईज आफ डूइंग के लिए साख बना चुके मध्यप्रदेश में जो असुरक्षा का माहौल बनन लगा है उसमें निवेशकों को उनकी सुरक्षा का भरोसा कैसे दिलाया जा सकता है। शांति का टापू कहा जाने वाला मध्यप्रदेश यदि अब लुटेरों का स्वर्ग बन जाएगा तो इसका खमियाजा आम जनता को भुगतना पड़ेगा क्योंकि असुरक्षा के इस माहौल में कोई भी निवेशक यहां आने की हिम्मत नहीं करेगा।
अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक महिला अपराध ने ऊर्जा डेस्क की समीक्षा बैठक ली
भोपाल, 15 जनवरी 2019। अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक महिला अपराध अन्वेष मंगलम ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से 12 जिलों के एसपी के साथ ऊर्जा (URJA-अर्जेन्ट रिलीफ फॉर जस्ट एक्शन) डेस्क की समीक्षा बैठक की। उन्होंने कहा कि महिला अपराधों के संबंध में ऊर्जा डेस्क महिला पीडि़ता की शिकायतों पर संवेदनशीलता एवं सहानुभूति के साथ कार्यवाही करें तथा उन्हें एहसास करायें कि वे सही स्थान पर आई हैं और उन्हें न्याय मिलेगा। किसी भी तरह से केवल खानापूर्ति न की जाए सिर्फ और सिर्फ सटीक कार्यवाही हो।
श्री मंगलम ने सभी एसपी को निर्देशित किया कि ऊर्जा डेस्क के लिए आवश्यक संसाधन मुहैया करवाकर अधिकारी एवं कर्मचारियों की नियमित रूप से ड्यूटी लगाकर सही कार्यवाही के लिए सतत मॉनिटरिंग करें। ऊर्जा हेल्प डेस्क में कार्यरत सभी अधिकारी एवं कर्मचारियों को निर्धारित कार्यक्रम अनुसार प्राथमिकता के आधार पर प्रशिक्षण दिलाया जाए। ऊर्जा हेल्प डेस्क के लिए आवश्यक संसाधनों एवं अन्य जरूरतों के लिए पुलिस मुख्यालय की संबंधित शाखा को यथाशीघ्र मांग प्रेषित की जाए। उन्होंने कहा कि ऊर्जा डेस्क में समर्थ, संवेदनशील एवं कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी/कर्मचारियों को रखा जाए। श्री मंगलम ने कहा कि स्थानीय सामाजिक, धार्मिक एवं अन्य संगठनों सहित ग्राम रक्षा समिति, आशा कार्यकर्ता, दीदी आदि के सहयोग से थानों के आसपास के अंचलों में महिला अपराधों के प्रति जागरुकता एवं ऊर्जा डेस्क के संबंध में जानकारी देने के लिए व्यापक एवं कारगर प्रयास किए जाएं। ऊर्जा डेस्क में आई महिला पीडि़ता की शिकायत सुनने के लिए हर समय अधिकारी/कर्मचारी मौजूद रहें। ऊर्जा डेस्क का माहौल ऐसा हो जिसमें पीडि़ता बेझिझक एवं निडर होकर अपनी बात रख सके साथ ही उसे यह एहसास हो कि वह सही जगह आई है और उसे न्याय मिलेगा। ऊर्जा डेस्क स्टाफ वॉट्सअप ग्रुप से जुड़कर निर्देशों, सूचनाओं एवं अन्य किसी भी जानकारी का त्वरित आदान-प्रदान करें। उन्होंने कहा कि ऊर्जा डेस्क से संबंधित कार्यवाही गंभीर एवं सटीक हो इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं है। श्री मंगलम ने 12 जिलों के सभी एसपी से ऊर्जा हेल्प डेस्क के संबंध में एक-एक करके विस्तृत जानकारी ली एवं निर्देश दिए।
उल्लेखनीय है कि पुलिस महानिदेशक श्री ऋषि कुमार शुक्ला ने माह सितंबर 2018 में जहांगीराबाद में ऊर्जा (अर्जेन्ट रिलीफ फॉर जस्ट एक्शन) डेस्क का शुभारंभ किया था।प्रदेश के 12 जिलों विदिशा, रतलाम, इंदौर, भोपाल, बैतूल, सिवनी, बालाघाट, रीवा, जबलपुर, पन्ना, मुरैना एवं ग्वालियर के 180 थानों में पीडि़त महिलाओं की शिकायतें एवं समस्याएं सुनने के लिए तीन श्रेणियों में ऊर्जा हेल्प डेस्क स्थापित किए गए हैं। प्रथम वर्ष इन 180 थानों में ऊर्जा डेस्क के कार्य करने के बाद प्राप्त हुए वैज्ञानिक डेटा के आधार पर महिला अपराधों एवं अपराध पीडि़ताओं के बचाव के लिए आगे की नीति एवं कार्यवाही की योजना बनाई जाएगी। इस अवसर पर सहायक पुलिस महानिरीक्षक श्रीमती शालिनी दीक्षित, सुश्री इमरीन शाह, श्री एम.एस.मुजाल्दे, श्री मलय जैन, एवं रिसर्च टीम के सदस्य उपस्थित थे।