Category: मध्यप्रदेश

  • इस कंबल परेड से सुधार की उम्मीद बेकार

    इस कंबल परेड से सुधार की उम्मीद बेकार

    रैगिंग की भाषा में बोला जाए तो इन दिनों मुख्यमंत्री कमलनाथ की कंबल परेड चल रही है। कांग्रेस के विधायकों ने सरकार की जो धुलाई की है उससे पार्टी के बड़े बड़े दिग्गजों की सांसें भी फूल गईं हैं। भाजपा तो अंधे के हाथों बटेर लग जाने से प्रसन्न है। कमलनाथ सरकार जितने दिनों तक इस बगावत को काबू में नहीं कर पाएगी उतने दिनों तक ये धुलाई जारी रहेगी। मुख्यमंत्री कमलनाथ कह रहे हैं कि हम सदन में पहले भी बहुमत साबित कर चुके हैं लेकिन अब ये हालत हो गई है कि कोई भी ऐरागैरा आकर बहुमत साबित करने का चैलेंज देने लग जाता है। दरअसल ये कमलनाथ सरकार की अलोकप्रियता का उद्घोष है जो वे स्वयं कर रहे हैं। सलाहकारों की बात मानकर उन्होंने विधायकों को कथित तौर पर बंधक बनाए रखने के मुद्दे पर पुलिस में प्राथमिकी दर्ज नहीं कराई है। यदि वे ऐसा कर देते तो साफ उजागर हो जाता कि उनकी सरकार अल्पमत में आ गई है। आज दिग्विजय सिंह ने जिस तरह बैंगलौर जाकर बागी विधायकों से मिलने के लिए धरना दिया उसे देखकर कहा जा सकता है कि बगावत के मैनेजर भाजपा के रणनीतिकारों की सलाह पर नहीं चल रहे हैं। दिग्विजय सिंह को विधायकों से न मिलने देने का फैसला बड़ा बचकाना था। यही वजह है कि दिग्विजय सिंह विधायकों को बंधक बनाए रखने का शोर मचा रहे हैं। उनका कहना है कि वे विधायकों को बंधक बनाए रखने के मुद्दे पर कर्नाटक हाईकोर्ट जाएंगे। कमलनाथ सरकार के तमाम रणनीतिकार और अदालत में पैरवी कर रहे वकील पुष्पेन्द्र दुबे भी कह रहे हैं कि विधायकों को बंधक बनाकर रखा गया है। यदि आज दिग्विजय सिंह को विधायकों से मिलने का मौका दे दिया जाता तो खुद ब खुद साबित हो जाता कि विधायक बंधक नहीं हैं। कैमरों के सामने सार्वजनिक मुलाकात में विधायक हाथ जोड़कर दिग्विजय सिंह से वे सभी बातें कह सकते थे जो वे पहले अपने वीडियो जारी करते वक्त कह चुके हैं। वे इस मुलाकात के मंच का उपयोग करके सारी दुनिया को सुना सकते थे कि वे कमलनाथ सरकार के साथ नहीं हैं,जाहिर है कि विधानसभा के मंच से भी ज्यादा बड़े कैनवास पर कमलनाथ सरकार की कंबल परेड बेहतरीन तरीके से की जा सकती थी। ये तो आकलन हम लोग बाहर बैठकर लगा सकते हैं कि बगावत के रणनीतिकार गलती कर रहे हैं लेकिन हमारा आकलन हमेशा सही नहीं हो सकता। जिन विधायकों ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में बहादुरी भरा फैसला लिया और सरकार को नसीहत देने का कदम आगे बढ़ाया निश्चित रूप वे किसी न किसी रणनीति पर काम जरूर कर रहे हैं। सिंधिया समर्थक विधायक आज भी कह रहे हैं कि महाराज सिंधिया जो कहेंगे हम वही करेंगे। वे दरअसल देख चुके हैं कि जिन आर्थिक सुधारों से ज्योतिरादित्य प्रदेश का काया कल्प करना चाहते थे उन्हें कमलनाथ की पुरातनपंथी सरकार लागू नहीं कर रही थी। गोस्वामी तुलसी दास कह गए हैं कि मुखिया मुख सो चाहिए खानपान को एक पाले पौसे सकल अंग तुलसी सहित विवेक। कमलनाथ इस कसौटी पर फिसड्डी साबित हुए हैं। उन्होंने प्रदेश के विधायकों, जन प्रतिनिधियों, पत्रकारों, नागरिकों से दूरी बनाई और मनमाने ढंग से बजट खर्च करने का अभियान चलाया। जनता को हित वंचित करके अपने सहयोगियों पर बेइंतहा संसाधन लुटाए और अपनी स्थिति मजबूत की। उम्र के असर से उनकी दृष्टि कमजोर हो गई है। उन्होंने अकेले छिंदवाड़ा में लगभग तेरह हजार करोड़ के निर्माण कार्य स्वीकृत करवा लिए और अन्य विधानसभा क्षेत्रों को रीता छोड़ दिया। यही वजह है कि साल भर से चेताने के बावजूद जब कमलनाथ जी की आदतें नहीं बदलीं तो उन्होंने विद्रोह जैसा फैसला किया। आजादी की लड़ाई में भी जब अंग्रेजों ने लूट का शोषणवादी तंत्र चलाया था तब भारत में विद्रोह की चिंगारी भड़की और दावानल बनी थी। आज के हिंदुस्तान में कमलनाथ की कूढ़ मगज सोच को आखिर कैसे झेला जा सकता था। जिस इंस्पेक्टर राज को नरसिम्हाराव की सरकार के कार्यकाल में डाक्टर मनमोहन सिंह दफन कर चुके थे उसे कमलनाथ दोबारा थोपने में जुटे थे। शुद्ध के लिए युद्ध के नाम पर व्यापारियों का शोषण और लूट का जो दुष्चक्र कमलनाथ सरकार ने चलाया उससे प्रदेश भर में जन आक्रोश भड़क गया था। तबादलों के माध्यम से पोस्टिंग का खुला खेल जिस तरह से साल भर में देखा गया उसने प्रदेश में अराजकता की स्थितियां निर्मित कर दीं हैं। बढ़ते अपराधों ने प्रदेश की शांति व्यवस्था भंग कर दी है। इसके बावजूद कमलनाथ दंड और दमन का दुष्चक्र चलाने में जुटे हैं। इतनी तगड़ी धुलाई के बाद भी उनकी भाषा शैली नहीं बदली है। पिछले दिनों जब उनसे पूछा गया कि ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा है कि कर्मचारियों और नागरिको से किए वादे पूरे नहीं हुए तो वे सड़क पर उतर जाएंगे तो कमलनाथ ने लगभग दुत्कारते हुए कहा, तो उतर जाएं। इस तरह की भाषा शैली और रवैये के बाद भी यदि कांग्रेस के विधायक चुप थे तो ये उनकी भलमन साहत थी। भाजपा में तो इस तरह के बर्ताव को कैडर की वजह से झेला जा सकता है लेकि कांग्रेस में जहां लीडरशिप आधारित संगठन हो वहां इस तरह के तुर्रमखां को कब तक बर्दाश्त किया जा सकता था। आज सारा दारोमदार ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों के रुख पर निर्भर कर रहा है। यदि वे अपने फैसले पर कायम रहते हैं तो कोई वजह नहीं कि कमलनाथ सत्ता से अपदस्त कर दिए जाएंगे। भाजपा के साथ शामिल होकर ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रदेश को एक अग्रगामी विकास की दिशा दे सकते हैं। लेकिन अब तक ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है। कांग्रेस के भीतर की ये बगावत यदि सफल हो जाती है तो ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रदेश के कद्दावर नेता के रूप में उभर जाएंगे। महल से अदावट रखने वाले भाजपाई ये नहीं चाहते। जाहिर है कि प्रदेश की आधुनिक आवश्यकताओं की कसौटी पर फेल हो चुके शिवराज सिंह चौहान भी नहीं चाहते कि भाजपा में कोई उनसे बड़ा लीडर बनकर उभरे। इसके बाद सत्ता की हांडी टूटने की आस लगाए बैठे नरेन्द्र सिंह तोमर, कैलाश विजयवर्गीय, नरोत्तम मिश्रा, भूपेन्द्र सिंह, गोपाल भार्गव भी नहीं चाहते कि गोविंद राजपूत और तुलसी सिलावट जैसे धाकड नेता उनके सामने चुनौती के रूप में उभरें। इन हालात में भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व को हस्तक्षेप करना पड़ेगा। यदि भाजपा का अंदरूनी महाभारत थम जाता है और ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा के नेताओं का साथ पाकर इस बगावत को सफल बना लेते हैं तो फिर प्रदेश को अबकी बार भाजपा और कांग्रेस की संकर सरकार मिलेगी जो प्रदेश के हितरक्षण के लिए नए कीर्तिमान स्थापित करेगी। ज्योतिरादित्य सिंधिया की बुआ वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे सिंधिया संगठन को किस सीमा तक बांधने में सफल होती हैं बगावत की सफलता उसी से आकी जाएगी। कमलनाथ तो इस बगावत को कुचलने की पूरी तैयारी कर रहे हैं। फिलहाल उन्हें सत्ता जाने की संभावनाओं से डरे हुए कांग्रेस विधायकों का समर्थन मिल रहा है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से यदि पलड़ा भाजपा के पक्ष में झुकता है तो कमलनाथ सरकार का अल्पमत संकट और भी ज्यादा गहरा हो जाएगा। देखना होगा कि ये बगावत सफल होती है या फिर आत्मसमर्पण की चौखट चूमती है। दोनों ही स्थितियों में कमलनाथ इस कंबल परेड से कोई सबक लेंगे इसकी संभावना फिलहाल तो नहीं दिखती।

  • कमलनाथ की कुर्सी बचाने में जुटे गोपाल रेड्डी

    कमलनाथ की कुर्सी बचाने में जुटे गोपाल रेड्डी

    भोपाल,17 मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)। तेज तर्रार आईएएस गोपाल रेड्डी को प्रदेश का प्रशासनिक मुखिया बनाकर मुख्यमंत्री कमलनाथ अपनी सत्ता के विरुद्ध हुई बगावत को काबू में करने का जतन करने में जुट गए हैं।रेड्डी के पद संभालते ही जेल विभाग ने पुरानी जेल के परिसर और भेल दशहरा मैदान को अस्थायी जेल में बदलने का आदेश जारी कर दिया है। ये तैयारी आने वाले दिनों में होने वाले किसी संभावित विद्रोह को देखते हुए की जा रही है। कमलनाथ यदि सुप्रीमकोर्ट और विधानसभा को धता बताते हुए कुर्सी छोड़ने पर राजी नहीं होते हैं तो संभावित जनांदोलनों पर नियंत्रण करने के लिए ये तैयारियां काम आ सकेंगीं।

    जेल विभाग के अवरसचिव अजय नथानियल ने विधानसभा के कार्यकाल के दौरान 13 अप्रैल तक ये नए जेल परिसर मान्य किए हैं। सरकार के खिलाफ होने वाले संभावित आंदोलनों में यदि अधिक लोग शामिल होते हैं तो उन्हें जेल पहुंचाने के बजाए इन परिसरों में ही निरुद्ध किया जा सकेगा। पुलिस और प्रशासन के बीच तालमेल जमाते हुए इस फैसले में प्रभारी पुलिस मुखिया रहे राजेन्द्र कुमार की सलाह की भूमिका मानी जा रही है।

    डीजी प्रशासन अकादमी बनाए गए सुधीरंजन मोहंती का कार्यकाल समाप्त होने के लगभग दो हफ्ते पहले की गई रेड्डी की नियुक्ति की वजह समझने में लोग सफल हो पाएं इससे पहले रेड्डी ने अपनी प्रशासनिक क्षमताओं पर पूरी तरह अमल शुरु कर दिया है।वे अपने त्वरित और दूरगामी फैसलों के लिए जाने जाते रहे हैं।

    सुधीरंजन मोहंती को इस महीने होने वाले रिटायरमेंट के बाद विद्युत नियामक आयोग का चेयरमेन बनना है। मुख्य सचिव पद पर रहते हुए ये नियुक्ति फिलहाल संभव नहीं थी। भले ही मुख्यमंत्री आदेश दे दें पर उसके ऊपर अमल तो मुख्य सचिव को ही करना पड़ता है। सरकार के खिलाफ उठी बगावत और अस्थिरता की स्थिति में यदि कमलनाथ सरकार बर्खास्त कर दी जाती है या सदन में बहुमत खो देती है तो फिर विद्युत नियामक आयोग की नियुक्ति का फैसला लटक सकता था। मुख्य सचिव के लिए ओएसडी बनाए जा चुके गोपाल रेड्डी की नियुक्ति भी नए हालात में खटाई में पड़ सकती थी।

    गोपाल रेड्डी ने पदभार संभालते ही अपने अनुकूल प्रशासनिक कसावट भी शुरु कर दी है। वे 1985 बैच के आईएएस हैं और लंबे समय से प्रदेश की प्रशासनिक जमावट से परिचित रहे हैं। समाज के सभी वर्गों से उनका जुड़ाव रहा है। ऐसे में माना जा रहा है कि कमलनाथ सरकार के खिलाफ उठ रहे असंतोष के स्वरों को वे संतुष्टि की आवाजों में बदल सकेंगे। इसके बावजूद फिलहाल कमलनाथ से नाराजगी के स्वर बहुत तेज हैं और उन्हें काबू में रखने के लिए राजदंड का प्रयोग करने की जरूरत भी पड़ रही है और नए मुखिया ने इस भूमिका पर अमल भी शुरु कर दिया है।

  • सत्ता के बूट से नहीं कुचली जाएगी ये बगावत

    सत्ता के बूट से नहीं कुचली जाएगी ये बगावत

    भोपाल,17मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)।मुख्यमंत्री कमलनाथ की कांग्रेस सरकार विदाई की बेला में है। उनकी पार्टी के ही 22 विधायकों ने अपनी सरकार के खिलाफ बगावत कर दी है। सरकार का प्रयास है कि उन विधायकों को डरा धमकाकर या पुटियाकर अपने खेमे में वापस लौटा लिया जाए और सरकार बचा ली जाए। बगावत को कुचलने के लिए कमलनाथ ने मुख्यसचिव और डीजीपी बदलकर प्रशासन और पुलिस के जेबी इस्तेमाल की तैयारी की है।इस तानाशाही भरे रवैये के बावजूद कमलनाथ की विदाई पल प्रतिबल और भी ज्यादा बलवती होती जा रही है। जैसे जैसे वे बगावत को कुचलने का षड़यंत्र रच रहे हैं उसका प्रतिरोध भी बढ़ता जा रहा है। सत्ता के इस दुरुपयोग से उन्होंने कांग्रेस के ही अन्य विधायकों की सहानुभूति भी खो दी है। सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद तो कमलनाथ के तमाम प्रयास नाकाफी साबित हो जाएंगे।

    बैंगलौर में बैठे विधायकों ने बाकायदा प्रेस वार्ता करके खुद के बंधक बनाने की बात झूठी साबित कर दी है। उन्होंने कहा कि हम अपनी मर्जी से सरकार के खिलाफ इस्तीफा देकर आए हैं और दुबारा चुनाव का सामना करने के लिए भी तैयार हैं। कमलनाथ सरकार जनहित के कार्यों की उपेक्षा कर रही थी हम इसलिए सरकार का विरोध कर रहे हैं। हमारे नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के काफिले पर जिस तरह सार्वजनिक तौर पर हमला किया गया उसे देखते हुए हमें अपनी सुरक्षा का खतरा है। सरकार हमें तोड़ने के लिए विविध हथकंडे अपना रही है। यदि हमें केन्द्रीय बलों की सुरक्षा दिलाई जाएगी तो हम भोपाल वापस आकर सदन के फ्लोर टेस्ट में भाग लेंगे। मध्यप्रदेश पुलिस सरकार के दबाव में है इसलिए हमें उस पर भरोसा नहीं है।

    सरकार के वित्तमंत्री तरुण भनोट और जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा बार बार कह रहे हैं कि विधायकों को यहां कोई खतरा नहीं है लेकिन कांग्रेस और कमलनाथ को करीब से समझने वाले विधायकों को सरकार के बयानों पर भरोसा नहीं है। दरअसल कमलनाथ ने डीजीपी वीके सिंह को हटाकर विवेक जौहरी को न केवल डीजीपी बना दिया है बल्कि उन्हें दो साल की सेवावृद्धि भी दे दी है। सरकार से उपकृत होने के बाद विवेक जौहरी ने पुलिस के और निजी बाऊंसर्स की सेवाएं सरकार को उपलब्ध कराई हैं। इन टोलियों में संविदा नियुक्ति वाले गुंडों को भी शामिल किया गया है। यही नहीं एक विधायक के नेतृत्व में गुंडों की एक टोली भी सक्रिय है जिसका मार्गदर्शन भोपाल के डीआईजी इरशाद वली कर रहे हैं।

    सरकार के प्रशासकीय नियंत्रण की कमान नए प्रशासनिक मुखिया गोपाल रेड्डी और प्रशासन अकादमी के डीजी बना दिए गए पूर्व सीएस सुधीरंजन मोहंती संभाल रहे हैं। कमलनाथ की जिस हेकड़ी भरी कार्यशैली की वजह से आज कांग्रेस की सरकार संकट में आई है उसके पीछे अफसर शाही का यही खुला दुरुपयोग प्रमुख वजह है। बागी विधायकों का दो टूक कहना है कि मुख्यमंत्री सचिवालय ने चुने हुए विधायकों को बाईपास करके अफसरों के माध्यम से लूट का तंत्र चला रखा है। उनके पास माफिया से मुलाकात के लिए तो समय है पर अपने विधायकों के लिए वक्त नहीं है।जनहितैषी योजनाएं बंद कर दी गई हैं या फिर उनका लाभ आम जनता को नहीं मिल पा रहा है।

    दरअसल जिस तरह से कमलनाथ की कार्यशैली को कांग्रेस के ही विधायकों ने नकार दिया है उससे सरकार अल्पमत में आ गई है। इस बगावत को कमलनाथ अपनी ही शैली में कुचलना चाह रहे हैं जो अब किसी भी तरह संभव नहीं है।कमलनाथ की विदाई तय है। यदि वे सत्ता में बने रहने के लिए गुंडागर्दी का सहारा लेने की कोशिश करेंगे तो मध्यप्रदेश में सत्ता संग्राम का खूनी माहौल बन जाएगा। इतिहास के आधार पर कमलनाथ इस बगावत को संविद सरकार के दौर से तुलना करके देख रहे हैं जबकि इस बार की बगावत ज्यादा परिष्कृत है और केन्द्र में भी एक ऐसी लोकतांत्रिक सरकार है जो किसी तानाशाही को छूट नहीं देगी।

  • महामहिम ने निकाली कमलनाथ की झूठी हेकड़ी

    महामहिम ने निकाली कमलनाथ की झूठी हेकड़ी

    भोपाल,15मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)। प्रदेश में बगावत के बाद अल्पमत में आई कमलनाथ सरकार की सारी हेकड़ी राज्यपाल महामहिम ने मुख्यमंत्री को भेजे अपने पत्र में ही निकाल दी है।उन्होंने कहा है कि विधायकों से प्राप्त जानकारी के अनुसार आपकी सरकार अल्पमत में आ चुकी है इसलिए राज्यपाल के अभिभाषण के तुरंत बाद आप सदन में विश्वासमत हासिल करें। यह कार्यवाही हर हाल में 16 मार्च को शुरु होगी और स्थगित,विलंबित या निलंबित नहीं की जा सकेगी।

    महामहिम लालजी टंडन ने मुख्यमंत्री कमलनाथ को 14 मार्च को लिखे पत्र में कहा है कि आपकी सरकार के 22 विधायकों ने अपने पद त्याग की सूचना विभिन्न माध्यमों से दी है। छह मंत्रियों के इस्तीफे विधानसभा ने भी मंजूर कर दिए हैं। ये स्थिति अत्यंत गंभीर है इसलिए प्रजातांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए आप सदन में विश्वास मत हासिल करें।

    कांग्रेस के पूर्व सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो जाने के बाद कांग्रेस के ही 22 सांसदों ने अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। वे विधायक बैंगलूरु के एक रिसार्ट में रह रहे हैं और वीडियो के माध्यम से उन्होंने पद त्याग की सूचना सार्वजनिक की है। कांग्रेस के कई अन्य मंत्रियों ने भी सुरक्षा की मांग करके सरकार के कामकाज के प्रति नाराजगी व्यक्त की है। इस्तीफा दे चुके जनसंपर्क मंत्री ने आज प्रेसवार्ता के माध्यम से आरोप लगाया कि कांग्रेस के 16 विधायकों को भाजपा ने बंदूक की नोंक पर बंधक बना रखा है। उन विधायकों पर सम्मोहित करने वाला जादू टोना किया गया है।

    इसी के साथ उन्होंने कैबिनेट बैठक में करोना वायरस के कहर की भी चर्चा का उल्लेख किया। कांग्रेस से जुड़े लोगों का कहना है कि होटल में ठहरे दो विधायकों में करोना वायरस से प्रभावित होने के लक्षण मिले हैं इसलिए वे सदन की कार्यवाही थोड़े दिनों के लिए स्थगित करने की मांग करेंगे। कैबिनेट बैठक के बाद सरकार के कई पूर्व मंत्रियों ने दावा किया कि कमलनाथ सरकार सदन में विश्वासमत हासिल कर लेगी। इन बड़बोले नेताओं ने खोखले दावे करते हुए कहा कि सरकार न केवल पांच साल का कार्यकाल पूरा करेगी बल्कि एक और बार सत्ता में आएगी।

    विकास की डींगें हांकते मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनके मंत्रियों की सारी हेकड़ी राज्यपाल लालजी टंडन के इस पत्र से आज निकल गई है। पूर्व वित्तमंत्री तरुण भानोट तो इसके बाद कहते सुने गए कि हमने किसानों के दो लाख तक के कृषि ऋण माफ करने का वादा किया था किसी भी प्रकार के ऋण माफ करने का वादा हमने कभी किया ही नहीं। इसी तरह अन्य वादों की असफलताओं को लेकर पूर्व मंत्रियों ने दबे स्वरों में स्वीकार किया कि सरकार की कई नीतियां अपेक्षाकृत रूप से सफल नहीं हो पाईं हैं। सरकार की नीतियों की असफलता की वजह से ही कांग्रेस के भीतर असंतोष फूटा और उनकी सरकार आज विदाई की दहलीज पर पहुंच गई है। हम मुख्यमंत्री कमलनाथ को उद्योगपति के रूप में प्रचारित किए जाने वाले वादों से प्रभावित हो गए थे जबकि सत्ता में आने के बाद वे सरकारी तंत्र और व्यापारियों की लूट के हथकंडे अपनाते देखे गए।

  • सिंधिया से ठलुए कांग्रेसी और बोगस भाजपाई दोनों खफा

    सिंधिया से ठलुए कांग्रेसी और बोगस भाजपाई दोनों खफा

    भोपाल,14 मार्च,(प्रेस सूचना केन्द्र)। मोदी अमित शाह की जोड़ी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्यसभा में भेजने का फैसला लेकर भारतीय राजनीति के परंपरावादी युग का अंत कर दिया है। इसके साथ ही चंद मुद्दों के इर्द गिर्द चकरघिन्नी बनी राजनीति की इबारतें भी वाशिंग मशीन के ड्रायर में रखे गीले कपड़ों के समान सींलन मुक्त होने लगीं हैं। इस एक अकेले मूव ने न केवल कांग्रेस बल्कि भारतीय जनता पार्टी के भी पिछलग्गू राजनेताओं को हतप्रभ कर दिया है। स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे ने कांग्रेसी राजनीति के शीर्ष दिनों में भी कर्मठ कार्यकर्ताओं की फौज जुटाकर जो संगठन खड़ा किया था वह आज सिफारिशी भाजपाईयों से भर गया है। चौदह सालों के शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में जो भाजपा चमचों की भी़ड़ बनकर रह गई थी वह सिंधिया के आगमन से उत्साहित तो है लेकिन उसमें भी भविष्य को लेकर संशय के स्वर उभर रहे हैं।

    लगभग बीस सालों तक कांग्रेस की राजनीति को शीर्ष मंच पर करीब से देखने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया का राजनीतिक प्रशिक्षण बहुत लंबा रहा है। बचपन से राजघराने में जन्म लेने के बाद आधुनिक राजनीति के पुरोधा स्वर्गीय माधवराव सिंधिया की सफल राजनीति को करीब से देखने वाले ज्योतिरादित्य को जनसेवा का पाठ अपने खानदान से मिला है। उनकी दादी स्वर्गीय विजयराजे सिंधिया ने जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी में बदले एक नए राजनीतिक दल को अपने राजघराने की विरासत से पाला पोसा था। वीर शिवाजी जिस तरह आधुनिक महाराष्ट्र की राजनीति की पहचान रहे हैं। मध्यप्रदेश में यही पहचान आज भी बालाजी बाजीराव पेशवा द्वितीय की कर्मठता से है। परम प्रतापी राजा भोज द्वितीय के शासन की जो सुगंध मध्यप्रदेश के स्मृतिपटल पर आज भी अंकित है उसे चिरस्थायी बनाने का काम बालाजी बाजीराव पेशवा ने किया था। पेशवा ने ही ग्वालियर में सिंधिया वंशजों को सल्तनत सौंपी थी। इसके बाद सिंधिया घराने के कई राजाओं ने उस राजनीति को आगे बढ़ाया।

    राजमाता विजयाराजे सिंधिया इस राजनीतिक गौरव की मशाल लेकर ही राजनीति में आईं थीं। उनके ऐश्वर्य और विरासत से ईर्ष्या करने वाली श्रीमती इंदिरा गांधी ने सिंधिया राजघराने को मटियामेट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लोकतंत्र और स्वाधीनता की दुहाई देकर अंग्रेजों की पिछलग्गू कांग्रेस का नेतृत्व करते हुए श्रीमती गांधी ने भारतीय राजनीति के तमाम ठिए ठिकानों को ध्वस्त करने का अभियान चलाया था। उनके कुछ सिपाहसालारों ने जिस तरह की कहानियां गढ़ीं उस पर अमल करते श्रीमती इंदिरागांधी ने सिंधिया सल्तनत को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। एसपी बनाकर भेजे गए स्वर्गीय अयोध्यानाथ पाठक को लगातार सात गैलेन्ट्री अवार्ड इसी सोच का सबूत हैं। इस दमन चक्र का ही नतीजा था कि चंबल घाटी डकैतों के आतंक से थर्राती रही। श्रीमती विजयाराजे सिंधिया के निधन के बाद भी भारतीय जनता पार्टी ने चंबल में सामाजिक न्याय की बड़ी लड़ाई लड़ी। उमा भारती के नेतृत्व में बनी भाजपा की सरकार तक ये परंपरा जारी रही। शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा ने डकैती उन्मूलन के नाम पर खेती को सिंचित करने का जो अभियान चलाया उससे न केवल चंबल बल्कि धार झाबुआ के आदिवासी अंचल में भी अपराधों का ग्राफ गिरा था।

    इस सबके बावजूद मध्यप्रदेश की राजनीति में आर्थिक विषयों के जानकार नेतृत्व की जरूरत महसूस की जाती रही है। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपनी राजनीतिक पारी शुरु करने से पहले आधुनिक अर्थशास्त्र की जो तैयारी की वह अब तक चलती रही राजनीति में फिट नहीं बैठती है। कांग्रेस की राजनीति तो इसके लिए बिल्कुल ही बोगस है। कांग्रेस गरीबी को संरक्षित करने की जिस राजनीति के तहत समाज को बांटने की विचारधारा लेकर चलती है उससे मध्यप्रदेश कभी गुजरात जैसा या उससे भी आधुनिक राज्य नहीं बन सकता है। दिग्विजय सिंह का बंटाढ़ार शासनकाल रहा हो या फिर शिवराज सिंह चौहान का कर्ज लेकर खैरात बांटने वाला दीर्घ शासनकाल सभी में प्रदेश की जनता की भरपूर उपेक्षा की गई। योजनाओं के नाम पर खैरात बांटकर वोट खरीदने की इस शैली का अंत कभी न कभी तो होना ही था। ये पहल कौन करता। कमलनाथ को उद्योगपति के रूप में प्रचारित करने वाला वर्ग राजनीति की इसी पाठशाला से आता है। बैंकों से कर्ज लेकर घाटे के उद्योग स्थापित करने वाली फर्जी उद्योगपतियों की लाबी इस राजनीति की सूत्रधार है। इस राजनीति से देश को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकानामी बना पाना किसी भी तरह संभव नहीं है।

    देश में धनाड्य राजनीति की इस उड़ान का पायलट कोई आर्थिक विषयों का जानकार ही हो सकता है। भाजपा के प्रवक्ता के रूप में काम करने वाले डायचे बैंक के पूर्व प्रबंध निदेशक जफर इस्लाम ने ज्योतिरादित्य सिंधिया में वे क्षमताएं देखीं और उन्हें भाजपा की राजनीति की तरफ मोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। भाजपा को उनकी दादी राजमाता सिंधिया ने सिंधिया सल्तनत की बागडोर से सींचा था। उनकी बुआएं श्रीमती यशोधरा राजे सिंधिया और राजस्थान की मुख्यमंत्री रहीं वसुंधरा राजे सिंधिया ने इस विरासत को सहेजकर रखा था। यशोधरा जी जब मध्यप्रदेश की उद्योगमंत्री थीं तो उन्होंने विश्व भर में फैले औद्योगिक घरानों को प्रदेश से जोड़ने का सफल अभियान चलाया था। शिवराज सिंह चौहान को संरक्षण देने वाली लाबी को ये पसंद नहीं था और उन्होंने इस अभियान को धराशायी कर दिया।

    कांग्रेस हो या भाजपा दोनों में इंदिरागांधी के बैंकों के राष्ट्रीयकरण वाले अभियान से लूट करने वाले दलालों का वर्चस्व रहा है। इस लाबी को कमलनाथ अनुकूल लगते हैं लेकिन ज्योतिरादित्य खटकते हैं। कांग्रेस की सरकार बनाने में मध्यभारत से लगभग चौबीस विधायकों का साथ रहा है। ज्योतिरादित्य सिंधिया से जुड़े यही विधायक और पूर्व मंत्री आज कमलनाथ सरकार के पतन की वजह बन रहे हैं। मध्यप्रदेश को यदि देश की नई अर्थनीति के साथ कदमताल करना है तो उसे कमलनाथ सरकार से मुक्ति पाना ही होगा। कमलनाथ सरकार के पतन के बाद जो भी नेतृत्व उभरेगा उसमें सिंधिया का असर जरूर रहेगा। ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्यसभा में भेजने के बाद भाजपा चाहे नरेन्द्र सिंह तोमर को प्रदेश की कमान थमाए या फिर उमा भारती या कैलाश विजयवर्गीय को ,शिवराज, नरोत्तम मिश्रा या बीडी शर्मा कोई भी हो ये लीडरशिप प्रदेश में मोदी सरकार की नीतियों को लागू करने में सफल साबित होगी।

    जाहिर सी बात है कि कर्ज आधारित अर्थव्यवस्था की राजनीति की पैरवी करने वाले गमले में उगे राजनेता प्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनता की अपेक्षाओं को अब तक पूरा नहीं कर पाए हैं। कमलनाथ तो छिंदवाड़ा के ही मुख्यमंत्री बनकर रह गए। उनके कार्यकाल में सरकारी क्षेत्र को जिस तरह लूट का अड़्डा बना दिया गया उससे जनता में भारी निराशा है। शिवराज सरकार की सारी कल्याणकारी योजनाओं को बंद करके कमलनाथ जिस सस्ती बिजली का ढिंडोरा पीट रहे हैं वह जनता के लिए मंहगा सौदा है। शिवराज सिंह चौहान की खैराती राजनीति की तरह ये भी मीठा जहर बनकर जनता को लुभा रहा है। जाहिर है कि ऐसे में आर्थिक विकास की मूलभूत राजनीति करने वालों का वर्चस्व बढ़ना इन ठलुओं और बोगस राजनेताओं को भला कैसे रुचेगा। वे भले ही खफा होते रहें लेकिन इतना तो तय है कि मध्यप्रदेश ने एक नई राजनीति की दिशा में अपने कदम बढ़ा लिये हैं। दिग्गी के चमचे इसे गद्दारी कहें या शिवराज विभीषण की उपमा दें लेकिन बदलाव की ये बयार फिलहाल थमने वाली नहीं है।

  • अपना दंगल अपने अखाड़े में

    अपना दंगल अपने अखाड़े में

    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोशल मीडिया से दूरी बनाने के संकेत दिए हैं। अपने फैसले पर उन्होंने देश से मुहर लगाने का अनुरोध भी किया है। मोदी को प्यार करने वाले देश के आम लोगों ने इससे इंकार करते हुए उनसे सोशल मीडिया पर सक्रिय बने रहने का अनुरोध किया है। इतने बड़े पैमाने पर जनसंवाद पहले कभी नहीं देखा गया है। इसके बावजूद प्रधानमंत्री का फैसला कई मायनों में उचित रणनीति पर अमल है। उन्हें अवश्य सोशल मीडिया से दूरी बना लेनी चाहिए।दरअसल पिछले दिनों जिस तरह षड़यंत्र पूर्वक कुछ विदेशी शक्तियों की आड़ लेकर देश के लुटेरे भारत के प्रधानमंत्री पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं उसे देखते हुए इस तरह का फैसला लिए जाने का समय आ गया है। कांग्रेस और वामपंथी राजनैतिक दल बरसों से भारतीय जनता पार्टी पर फासिस्टवादी होने का आरोप लगाते रहे हैं। उन्होंने ये आरोप खुद को लोकतांत्रिक बनाने के लिए गढ़ा है। ये आरोप वे हिटलर और मुसोलिनी की तानाशाही को प्रतीक बनाकर लगाते रहे हैं। इसके विपरीत भारतीय जनता पार्टी देश के लोकतांत्रिक ढांचे में विकसित किया गया राजनीतिक दल है। यहां फैसले सहमति से होते हैं। मोदी जैसे आम आदमी को इस पार्टी में सर्वोच्च हैसियत दी जाती है। जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणा से भारतीय जनता पार्टी ने अपना ढांचा तैयार किया है, उसके सर संघचालक की भूमिका संघ का कैडर निर्धारित करता है। कोई भी सरसंघचालक अपनी व्यक्तिगत इच्छा किसी पर या संघ पर नहीं थोप सकता है। कमोबेश यही हाल भारतीय जनता पार्टी का है। यहां भी कोई व्यक्ति अपनी तानाशाही नहीं चला सकता है। यहां भी फैसले सर्वसम्मति से लिए जाते हैं। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर बार बार ये दुष्प्रचार किया जाता है कि मोदी शाह की जोड़ी ने पार्टी के तमाम नेताओं को दरकिनार कर दिया है और अपना एजेंडा चला रहे हैं। सोशल मीडिया का जो बेलगाम चरित्र है उससे कोई चिरकुट सा व्यक्ति देश को जीवन समर्पित करने वाले राजनेताओं,सेनाध्यक्षों, डाक्टरों या समाजसेवियों की इज्जत तार तार कर देता है। उसे कोई रोकने वाला नहीं हैं। ये काम यदि अज्ञानता से किया जाए तो उन्हें ज्ञान से प्रकाशित किया जा सकता है लेकिन जब षड़यंत्र पूर्वक बार बार एक ही आरोप दुहराया जाता रहे तो निश्चित रूप से उस व्यवस्था को नियंत्रित किए जाने की जरूरत है। भारत में सीएए को लेकर फैसला देश के सर्वोच्च सदनों ने किया। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री बार बार स्पष्टीकरण देते रहे कि इससे भारत के किसी नागरिक को कोई खतरा नहीं है इसके बावजूद षड़यंत्र पूर्वक कई बाहिरी ताकतें भारत के मुसलमानों को गुमराह करने का एजेंडा चला रहीं हैं। देश भर में सीएए को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है और सरकार की जनहितैषी नीतियों को धता बताते हुए झूठा दुष्प्रचार किया जा रहा है। इस षड़यंत्र को विदेशी ताकतों के हाथों में केन्द्रित सोशल मीडिया की मदद से अंजाम दिया जा रहा है। जाहिर है कि इस षड़यंत्र को रोकना होगा और देश के विकास के लिए ये जरूरी हो गया है।चीन में फेसबुक ,ट्विटर, आदि नहीं चलते वहां का सोशल मीडिया प्लेटफार्म वीबो है। चीन में दस तरह के सोशल मीडिया प्लेटफार्म हैं लेकिन उनका नियंत्रण वैश्विक सोशल मीडिया प्लेटफार्मों के पास नहीं है। भारत के एक सौ तीस करोड़ लोगों के बीच संवाद का महामार्ग विकसित करने का क्षेत्र अभी खुला पड़ा है। इस क्षेत्र में बहुत कुछ अनुसंधान किए जाने भी जरूरी हैं। जाहिर है कि प्रधानमंत्री का सोशल मीडिया से मोहभंग एक दिन में नहीं उपजा है। यह सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। भारत का सोशल मीडिया प्लेटफार्म विकसित करके विदेशी ताकतों से भारत के मानस को बचाया जा सकता है। यहां की गई एक झूठी पोस्ट पूरे देश को गुमराह कर सकती है। भारत में चलाई जाने वाली झूठ की फेक्टरी पर तो नियंत्रण संभव है लेकिन विदेशी धरती से बैठकर चलाए जाने वाले झूठ के कारखानों पर रोक लगाना सूचना के इस वैश्विक महामार्ग के बीच बहुत खर्चीला है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ये घोषणा कई मायने रखती है। देश में अपना सोशल मीडिया प्लेटफार्म विकसित करने की दिशा में ये घोषणा महत्वपूर्ण कदम साबित होने वाली है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश की वो शख्सियत हैं जिनका एक विचार पूरे देश के बड़े जनमानस का भाव बदल देता है। देश में मोदी की साख बहुत ऊंची है। इस लिहाज से भारत को एक नए जनांदोलन की दिशा में मोड़ने का ये प्रयास सराहनीय है। जितनी जल्दी हो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस सोशल मीडिया को विदा कहें और अपने देश का नया सूचना अखाड़ा शुरु करने की पहल करें जहां होने वाले दंगल वास्तविक हों हालीवुड की फिल्मों की कहानियों की तरह आभासी नहीं।

  • पोर्टल से मकान आबंटन सरल बोले प्रमुख सचिव गृह एस.एन.मिश्रा

    पोर्टल से मकान आबंटन सरल बोले प्रमुख सचिव गृह एस.एन.मिश्रा

    भोपाल,14 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। सरकारी कर्मचारियों और अफसरों को आवास आवंटन करने के लिए बनाए गए वेब पोर्टल ई – आवास ने अब जरूरत मंद अमले को सरकारी मकान आबंटित करने की व्यवस्था सरल बना दी है। इस पोर्टल की सुविधाओं के संबंध में आज भोपाल स्थित समस्त डीडीओ को नरोन्हा अकादमी में प्रशिक्षण दिया गया । प्रमुख सचिव गृह एस.एन.मिश्रा और संपदा संचालक आर.आर.भोसले ने भी प्रशिक्षण को संबोधित किया ।

    इस नए वेब पोर्टल से संपदा संचालनालय से शासकीय आवासों का बेहतर प्रबंधन किया जाएगा। शासकीय आवास के लिए अभी कर्मचारियों को 25 से 30 साल तक की प्रतीक्षा करनी पड़ रही है उसके स्थान पर उनको ई -आवास वेब पोर्टल के माध्यम से शासकीय आवासों का बेहतर प्रबंधन और पारदर्शिता के कारण 5 वर्ष में ही शासकीय आवास मिल सकेंगे।

    संपदा संचनालय भोपाल ई-गवर्नेंस पोर्टल www.sampada.mp.gov.in

    एनआईसी भोपाल के सहयोग से विकसित किया गया है। इसमें समस्त आहरण एवं संवितरण अधिकारियों को शासकीय सेवकों द्वारा आवास आवंटन हेतु ऑनलाइन भरे गए आवेदनों का सत्यापन करने का कार्य किया जाएगा जिसमें अपात्र आवेदनों को अस्थाई रूप से निरस्त करने का भी प्रावधान डीडीओ को दिया गया है इसके साथ ही जो भी आवेदन इसमें ऑनलाइन ही निरस्त किए किए गए होंगे उसकी भी जानकारी सीधे शासकीय सेवक को एवं उसके डीडीओ को भी मिल पाएगी । शासकीय कर्मचारियों को संपदा संचनालय के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। स्वीकृत आवेदनों की जानकारी एवं वेटिंग लिस्ट की भी जानकारी इस पोर्टल के माध्यम से शासकीय कर्मचारी प्राप्त कर सकेंगे ।

    अगले चरण में नवीन निर्मित किए जा रहे हैं वेब पोर्टल को कोष एवं लेखा संचनालय के आईएफएमएस आई पोर्टल से इंटीग्रेशन का कार्य लगभग पूर्णता की ओर है जिसमें कर्मचारी की वेतन आहरण एवं सेवानिवृत्त के डाटा के आधार पर संपदा संचनालय द्वारा स्थानांतरण सेवानिवृत्त दिवंगत आदि होने की स्थिति में आवास रिक्त कराए जाने की कार्यवाही की जा सकेगी । साथ ही शासकीय आवासों की लाइसेंस फीस की वसूली संबंधी कार्य भी नवीन पोर्टल के आधार पर की जा सकेगी ।

    इस अवसर पर कार्यक्रम में प्रमुख सचिव गृह एस.एन.मिश्रा,संचालक संपदा आर.आर.भोंसले, आवंटन अधिकारी संपदा मुकुल गुप्ता एवं सुनील जैन वरिष्ठ तकनीकी निदेशक भी उपस्थित थे ।

  • होलिका में गौकाष्ठ का  उपयोग करें- कलेक्टर

    होलिका में गौकाष्ठ का उपयोग करें- कलेक्टर

    भोपाल12 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)।कलेक्टर तरूण पिथोड़े और केन्द्रीय पर्यावरण विभाग के अधिकारियों के साथ हुई चर्चा में निर्णय लिया गया कि इस बार होलिका दहन में लकड़ी का उपयोग नहीं करते हुए अधिकाधिक गौकाष्ठ का उपयोग हो इसके लिए विशेष अभियान चलाकर नागरिकों और स्कूली विद्यार्थियों को जागरूक किया जाये । भोपाल जिले में शवदाह गृहों में भी गौकाष्ठ का उपयोग हो इसके लिए भी मुहिम चलाई जायेगी । पर्यावरणविद डॉ. योगेश सक्सेना ने बताया कि जिले की शासन सेअनुदान प्राप्त गौशालाएं गौकाष्ठ का निर्माण कर शवदाह गृहों एवं लकड़ी के टालों पर इसका विक्रय कर रोजगार का जरिया बनाया जा सकता है । इसी प्रकार सेन्ट्रल जेल भोपाल के कैदियों को भी गौकाष्ठ निर्माण कराकर रोजगार से जोड़ा गया है । इसके लिए गोकाष्ठ निर्माण की मशीन जेल परिसर में स्थापित की गई है ।

    पर्यावरण संरक्षण प्रदेश के लिए स्थाई जरूरतों में से एक है । पर्यावरण केसंरक्षण, बचाव और हरा भरा शीतल प्रदेश हो इसके लिए शासन प्रशासन हर संभव प्रयास कर रहा है । पेड़ों को कटने से बचाने के लिए गौकाष्ठ आधारित लकड़ी, कंडे और अन्य संसाधन आज पर्यावरण को सामान्य स्थिति में लाने के लिए उपयोग में लाए जा रहे हैं ।

    कमिश्नर एवं कलेक्टर भोपाल के इस अभियान से नवाचार हो रहे हैं । गौकाष्ठ के उपयोग से सघन जंगल, जलवायु और पर्यावरण को बचाने में मदद मिलेगी । गौकाष्ठ आधारित वस्तुएं पर्यावरण को नुकसान से बचाने के लिए उपयोग में लाई जा रही हैं ।इस ओर कईं सामाजिक संस्थाएं, समाजसेवी भी अपना योगदान कर रहे हैं । गौकाष्ठ के उपयोग से जहां पर्यावरण को नई ऊर्जा मिल रही है वहां इसके उपयोग से पर्यावरण और बेवक्त बदलते मौसम की प्रतिकूल परिस्थिति को बदलने में मदद मिल रही है । गौकाष्ठ के उपयोग से जहां पेड़ों को कटने से बचाने में मदद मिलेगी वहां इसके उपयोग से रोजगार के नवीन अवसरों का सृजन हो सकेगा । साथ ही विभिन्न संस्थाओं को, आजीविका मिशन और गौशालाओं को पर्याप्त व्यवस्था के साथ साथ उनकी आर्थिक स्थिति में भी बदलाव लाया जा सकेगा । महिलाओं को भी रोजगारसे जोड़ा जा सकेगा । इससे शासन प्रशासन की विभिन्न योजनाओं का लाभ विभिन्न संस्थाओं और शासकीय अशासकीय गौशालाओं को भी मिल सकेगा ।

    क्या है गौकाष्ठ

    गाय के गोबर से निर्मित कंडे रूपी लकड़ियां हैं । गौकाष्ठ के उपयोग से वातावरण में कार्बनडाई आक्साईड की मात्रा भी कम होती है और गौकाष्ठ की केलोरिक वेल्यू लकड़ी से अधिक और घनत्व ज्यादा होता है जो पर्याप्त मात्रा में ईधन के लिए भी अनुपयोगी है । गौकाष्ठ निर्मित वस्तुएं प्रदूषण को रोकने, बढ़ती जरूरतों के लिए उपयोगी साबित हो रही हैं । गौकाष्ठ दैनिक जीवन में भी बहुतायत उपयोगी साबित हो रही है, साथ ही कईं कार्यक्रमों में भी इसकी उपयोगिता प्रमाणित है । गौकाष्ठ के उपयोग से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के नए अवसर प्राप्त होंगे । साथ ही पूरे प्रदेश में लकड़ियों एवं अन्य वस्तुओं के जलाने से पर्यावरण को बचाया जा सकेगा । पेड़ों की अत्यधिक कटाई को रोकने में मदद मिलेगी एवं इसके दोहरे उपयोग से हम पर्यावरण के संरक्षण में भागीदार बनेंगे और वातावरण को शुद्ध बना सकेंगे ।

  • जनगणना कार्य में एमपी ने लगाया अड़ंगा

    जनगणना कार्य में एमपी ने लगाया अड़ंगा

    मंत्रि-परिषद के निर्णय

    भोपाल,5 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)।मुख्यमंत्री कमल नाथ की अध्यक्षता में मंत्रालय में हुई मंत्रि-परिषद की बैठक में ‘मध्यप्रदेश हाइब्रिड नवकरणीय ऊर्जा एवं एनर्जी स्टोरेज नीति’ लागू करने का निर्णय लिया। यह नीति मध्यप्रदेश राज्य में 3 परियोजनाओं के विकास के लिए लागू की जायेगी। इसमें हायब्रिड पॉवर परियोजना (एच.पी.पी.) में एक परियोजना स्थल पर दो या दो से अधिक नवकरणीय ऊर्जा स्त्रोतों से विद्युत उत्पादन होगा, जिसमें ऊर्जा भण्डारण भी शामिल हो सकता है।

    मंत्रि-परिषद ने शासकीय संकल्प पारित कर भारत सरकार से नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2019 को निरसित करने का आग्रह किया तथा ऐसी नयी सूचनाओं, जिन्हें राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) 2020 में अद्यतन करने के लिए चाहा गया है, को वापस लेने एवं उसके पश्चात ही राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के अधीन गणना करने का कार्य करने का भी आग्रह किया।

    ‘मध्यप्रदेश हाइब्रिड नवकरणीय ऊर्जा एवं एनर्जी स्टोरेज नीति’ के अंतर्गत इसके अलावा, नवकरणीय ऊर्जा के मौजूदा परियोजना स्थलों के सह-स्थित या स्टैंड-अलोन एनर्जी स्टोरेज संयंत्र स्थापित किये जा सकते हैं ताकि नवकरणीय ऊर्जा स्त्रोतों का समुचित उपयोग किया जा सके एवं ग्रिड स्थिरता की दिशा में प्रयास किये जा सकें। उपलब्ध अधोसंरचनाओं और नवकरणीय ऊर्जा स्त्रोतों की क्षमताओं के दोहन करने के लिए विभिन्न नवकरणीय ऊर्जा स्त्रोतों के हायब्रिडाईजेशन और विभिन्न प्रकार के ऊर्जा भण्डारण को बढ़ावा देने के लिए एक प्रगतिशील नीति की आवश्यकता प्रतिपादित की गई।

    मंत्रि-परिषद ने सामाजिक क्षेत्र में नि:शक्त, निर्धनों के लिए उत्कृष्ट कार्य करने वाली संस्थाओं को पुरस्कार के लिए इन्दिरा गाँधी समाजसेवा पुरस्कार 1992 में संशोधन कर पुरस्कार की राशि को एक लाख से बढ़ाकर 10 लाख करने का अनुसमर्थन किया।

    मंत्रि-परिषद ने मंत्रियों द्वारा दिये जाने वाले स्वेच्छानुदान की राशि में किसी एक प्रकरण के लिए वर्तमान में निर्धारित सीमा राशि 20 हजार रूपये को बढ़ाकर 40 हजार रूपये करने का निर्णय लिया गया। मंत्रि-परिषद ने नगरीय विकास एवं आवास विभाग की योजना ‘विधानसभा भवन एवं विधायक विश्राम गृह का विस्तारण ‘ को निरंतर रखने के लिए सैद्धांतिक स्वीकृति देने की मंजूरी दी।

    मंत्रि-परिषद ने स्कूल शिक्षा विभाग के अन्तर्गत राज्य स्कूल शिक्षा सेवा (शैक्षणिक संवर्ग) शर्तें एवं भर्ती नियम 2018 में परिवीक्षा अवधि, परिवीक्षा अवधि के वेतनमान एवं आरक्षण नियमों में किये गये संशोधन के प्रस्ताव का अनुसमर्थन किया। इसी प्रकार मध्यप्रदेश जनजातीय एवं अनुसूचित जाति शिक्षण संवर्ग, सेवा एवं भर्ती नियम 2018 में संशोधन करने का निर्णय भी लिया गया।

    मंत्रि-परिषद ने मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित राज्य सेवा परीक्षा में संबंधित राज्य सेवा परीक्षा नियम 2015 में भर्ती की प्रक्रिया के संबंध में संशोधन करने का निर्णय लिया और यह संशोधन राज्य सेवा परीक्षा 2019 से लागू करने की मंजूरी दी।

    मंत्रि-परिषद ने शासन के विभिन्न विभागों द्वारा क्रियान्वित की जाने वाली योजनाओं एवं परियोजनाओं, सतत विकास के लक्ष्य, आकांक्षी जिलों तथा विकासखण्डों की निरंतर प्रभावी मॉनीटरिंग के लिए राज्य योजना आयोग में क्रियाशील प्रोजेक्ट मॉनीटरिंग यूनिट का कार्यकाल अगले 5 वर्षों के लिए निरंतर रखने की मंजूरी दी। यूनिट में वर्तमान में कार्यरत सलाहकार एवं कार्यकारी पूर्व में स्वीकृत अवधि 31 मार्च 2020 तक कार्यरत रहेंगे। बैठक में एक अप्रैल 2020 से 31 मार्च 2023 तक की अवधि के लिए 31 पदों पर संविदा आधार पर नियुक्ति करने की मंजूरी दी गयी । इसमें प्रिंसिपल कंसलटेंट का एक, सीनियर कंसलटेंट के 10 और कंसलटेंट के 20 पद शामिल हैं। संविदा आधार पर चयन की प्रक्रिया योजना, आर्थिक एवं सांख्यिकी विभाग द्वारा निर्धारित की जायेगी।

    मंत्रि-परिषद ने प्रदेश में सूचना प्रौद्योगिकी परियोजनाओं के विकास एवं रख-रखाव करने के लिए राज्य स्तर पर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अधीन मैप-आई.टी. अन्तर्गत गठित सेन्टर ऑफ एक्सिलेंस के लिए बढ़ती चुनौतियों एवं इसके सुदृढ़ीकरण को ध्यान में रखते हुये कुल 16 नये पदों के सृजन की मंजूरी दी । सेन्टर ऑफ एक्सीलेंस द्वारा जिन विभागों के लिए कार्य किया जायेगा, उन विभागों से मैप-आई.टी. द्वारा निर्धारित मापदंड अनुसार शुल्क दिये जाने का अनुमोदन किया गया।

  • कमलनाथ की राजनीति को नसीहत की दरकार

    कमलनाथ की राजनीति को नसीहत की दरकार

    गुलाम भारत में अंग्रेजों के ऊटपटांग कानूनों के विरोध में तरह तरह से विरोध किया जाता रहा है। उसकी वजह ये थी कि अंग्रेजी सल्तनत ने भारत को लूटने के लिए वे कानून बनाए थे। बाद में जब एओ ह्यूम की कांग्रेस को गांधीजी ने अंग्रेजों से संवाद का माध्यम बनाया तब कानूनों का विरोध अदालतों में भी किया जाने लगा। आजाद हिंदुस्तान में गांधी कांग्रेस की नकलची इंदिरा कांग्रेस संसद में पारित कानूनों को लेकर जनता को भड़काने में लगी है। इंदिरा कांग्रेस के नेता अपनी इस शैली से खुद को महात्मा गांधी की कांग्रेस बताना चाह रहे हैं। वो ये तब कर रहे हैं जब पूरा देश एक नई दिशा में चल पड़ा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मेक इन इंडिया उत्पादन बढ़ाकर पूंजी का उत्पादन करना चाहता है जबकि कांग्रेस का मानस आज तक थानेदारी के माहौल से आगे नहीं बढ़ पाया है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की कार्यशैली की लाखों आलोचनाएं की जा सकती है। बेशक वे एक सफल शासक नहीं साबित हो पाए। इसके बावजूद वे एक ऐसे मुख्यमंत्री जरूर साबित हुए जिसने प्रदेश को आगे बढ़ने का अवसर दिया। जिसने प्रदेश के लोगों के कामकाज में बेवजह अड़ंगे नहीं लगाए। इसके विपरीत मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार आपातकाल की मनःस्थिति से बाहर नहीं आ पा रही है। सरकार का शुद्ध के लिए युद्ध अभियान हो या बजट की कैपिंग करने की कार्यशैली ये दोनों ही चौकीदारी के मानस से बाहर नहीं आ पा रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह चिल्ला चिल्लाकर बोलते रहे कि देश में अब इंस्पेक्टर राज की वापिसी नहीं होगी। इसके बावजूद उनकी ही पार्टी की सरकार ने मध्यप्रदेश को थानेदारी के जाल में उलझा दिया है। ये थानेदारी भी छुप छुपकर की जा रही है। जिस नागरिकता कानून को संसद ने बहुमत से पारित किया उसके खिलाफ राज्य सरकार कुछ ऐसा माहौल बना रही है जैसे संसद में बैठे लोग अंग्रेज हों और उनकी नियत देश का शोषण करने की है। जबकि हकीकत ठीक विपरीत है। खुद को उद्योगपति कहलाने वाले कमलनाथ बेहद कमजोर व्यवस्थापक साबित हो रहे हैं। पिछली सरकार की देखासीखी करके उनके वित्तमंत्री तरुण भानोट ने भले ही दो लाख 14 हजार करोड़ का बजट बना दिया हो लेकिन कमोबेश सभी विभागों को बजट की राशि देने में कटौती कर दी है। हर विभाग को कम से कम चालीस फीसदी बजट कम दिया जा रहा है। बजट की इस कटौती से हाहाकार मचा है। इससे निपटने के लिए उन्होंने मुस्लिमों को नागरिकता कानून के विरोध में भड़काना जारी रखा है। उनके एक विधायक आरिफ मसूद इस अभियान के सूत्रधार हैं। उन्होंने पुराने भोपाल के इलाकों में इतनी दहशत फैलाई कि लोगों ने अपनी दूकानें बंद रखने में ही भलाई समझी। विधायक आरिफ अकील के क्षेत्र में व्यापारियों ने बेखौफ होकर अपना कारोबार जारी रखा लेकिन आरिफ मसूद के इलाके में भारत बंद को सफल दिखाने के लिए दूकानें बंद कराई गईं। सरकार की शह इतनी दबी छुपी है कि पूरे प्रदेश में पुलिस तंत्र का एक हिस्सा बंद का समर्थन करते नजर आया। पुलिस के कुछ आला अधिकारियों का तो कहना था कि लोग यदि कानून का विरोध कर रहे हैं तो फिर उन्हें क्यों रोका जाए। ये पहली बार हो रहा है कि कोई सरकार अपने ही देश के कानून के विरोध को शह दे रही हो। निश्चित रूप से ये समझदारी भरा कदम नहीं है। इससे केन्द्र राज्य के बीच बेवजह कटुता का माहौल बन रहा है। मध्यप्रदेश की जनता के एक हिस्से ने कांग्रेस को सत्ता में काम करने का अवसर दिया है। उसका भी सोच प्रदेश का विकास करना है। जबकि राज्य सरकार इस सत्ता का उपयोग केन्द्र से टकराव के लिए कर रही है। उसकी इस खुन्नस से राज्य के हित प्रभावित हो रहे हैं। प्रदेश के लोगों की जीवचर्या में सहयोग देने की बात आती है तो कमलनाथ और उनके मंत्री कहने लगते हैं कि खजाना खाली है। जबकि राज्य को हर महीने उतनी ही आय हो रही है जितनी पिछली सरकार के कार्यकाल में हो रही थी। राज्य सरकार जीएसटी कलेक्शन बढ़ाने का माहौल भी नहीं बना पा रही है। मुख्यमंत्री अपने सचिवालय में मैराथन बैठकें करते रहते हैं। वे अधिकारियों पर अधिक राजस्व जुटाने के लिए दबाव बनाते हैं जबकि इसके बावजूद खजाने की आय नहीं बढ़ रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि तबादले और पोस्टिंग के धंधों की वजह से राज्य की आय का एक बड़ा हिस्सा काला धन बना रहा है। उसे रोकने के लिए सरकारी तंत्र छापेमारी कर रहा है। इस पूरी कवायद ने प्रदेश में तनाव के हालात बना दिए हैं। राज्य सरकार की इस अज्ञानता भरी कवायद की वजह से राज्य का माहौल तनावपूर्ण है। सीएए का विरोध करके राज्य सरकार ने खुद को फिजूल की उलझन में फंसा लिया है। प्रदेश के जिम्मेदार लोगों को चाहिए कि वे सरकार को नसीहत दें और प्रदेश की विकास यात्रा प्रशस्त करें।

  • टीन शेड जैन मंदिर में गणतंत्र दिवस पर झंडावंदन

    टीन शेड जैन मंदिर में गणतंत्र दिवस पर झंडावंदन

    भोपाल,26 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)।भोपाल समाज समिति, भोपाल के तत्त्वावधान में टीन शेड जैन मंदिर के प्रांगण में झण्डा वंदन कर 71 वें गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। देश भक्ति से परिपूर्ण कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में सुश्री “मितुल प्रदीप” उपस्थित रहीं।

    सुश्री मितुल, जन जन के रक्त में देशभक्ति का संचार करने वाले कालजयी गीत “ए मेरे वतन के लोगो” जैसे अनेक देशभक्ति गीतों के रचियता कवि प्रदीप की पुत्री हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता देश के अंतराष्ट्रीय स्तर के वरिष्ठ कवि एवं गीतकार श्री कुंवर बैचेन ने की। कुंवर बैचेन जी की रचनाएं देश के 7 राज्यों के कॉलेज एवं स्कूल के पाठ्यक्रमों में सम्मिलित है। उनकी अब तक 35 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है साथ ही एक महाकाव्य भी प्रकाशित हो चुका है। लगभग 60 दशकों से भी अधिक समय से काव्य मंचो का प्राधिनित्व कर रहे कवि कुंवर बैचेन के काव्यों पर लगभग 24 पीएचडी अवार्ड हो चुकी हैं एवं 8 पीएचडी शोध चलायमान हैं।

    मुख्य अतिथि ने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए अपने संबोधन में कवि प्रदीप की दो संदेशों के विषय में कहा । पहला संदेश “हम लाये हैं तूफान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के” को दृष्टिगत रखते हुए बच्चों को संबोधित करते हुए दिया कि ये देश को संभालने वाले अब ये बच्चे है जो भावी भारत के कर्णधार हैं। दूसरे संदेश में “इंसान का इंसान से हो भाईचारा, यही संदेश हमारा’ को दृष्टिगत रखते आज के परिदृश्य में कवि प्रदीप द्वारा लिखी गयी पंक्तियों को आचरण में अंगीकार करने की अपील उन्होंने की। श्री कुंवर बैचेन ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में सकारात्मकता पर जोर देते हुए कहा कि इस समय हमें एकता के सूत्र में बधने की आवश्यकता है तभी राष्ट्र तरक्की कर पायेगा। अपने गीत “भले ही हम में तुम में कुछ, ये रूप रंग का भेद हो..है खुशबुओं में फर्क क्या गुलाब हम गुलाब तुम” के माध्यम से आज के परिदृश्य में समाधान बताने की चेष्टा की साथ ही अपने गीत ” है हमारा नमन है वतन के लिए” के माध्यम से देशभक्ति के जज़्बातों को ज़ाहिर किया।

    कार्यक्रम में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी श्री शोभित जैन आई.ए. एस, टीन शेड जैन मंदिर के अध्यक्ष अमर जैन, संस्था के अध्यक्ष राकेश सिंघई, श्री सेठी जी एवं अन्य गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।कार्यक्रम का सफल संचालन श्री शशांक जैन, आई.टी कंसलटेंट द्वारा किया गया एवं आभार प्रदर्शन अमर जी जैन द्वारा किया गया।

  • रबर की गुड़िया का खेल नहीं कलेक्टरी

    रबर की गुड़िया का खेल नहीं कलेक्टरी

    रबर की गुड़िया और खिलौनों से खेलने वाले बच्चे पूरी जिंदगी उस साए से मुक्त नहीं हो पाते हैं। चाहे वे कितनी ही बड़ी जवाबदारी क्यों न संभाल लें लेकिन उन्हें लगता है कि वे गुड़िया से ही खेल रहे हैं और वह कोई जवाब नहीं देगी। उसके जवाब भी उन्हें ही देना होंगे। ऐसा ही कुछ राजगढ़ की कलेक्टर निधि निवेदिता और डिप्टी कलेक्टर प्रिया वर्मा के साथ घट रहा है।जिला दंडाधिकारी का पद पाने के बाद भी उन्हें लगता है कि वे बच्चों का खेल खेल रहीं हैं। गलती करने पर उन्हें लाड़ से डपटने वालों को छोड़कर किसी का सामना नहीं करना पड़ेगा। वे भूल रहीं हैं कि वे जनता की अनुबंधित नौकर हैं। उन्हें जनता ने अपनी व्यवस्थाओं की जवाबदारी निभाने के लिए नौकरी पर रखा हुआ है। अफसरी का ज्यादा अनुभव न होने की वजह से उन्हे लगता है कि उनकी जवाबदारी जनता के प्रति नहीं बल्कि शासकों के प्रति है। अंग्रेजों की प्रेरणा से बनी अफसरशाही शुरु से ही शासकों के प्रति झुकाव रखती रही है।इस समस्या के निदान के लिए ही स्वर्गीय राजीव गांधी ने पंचायती राज की अवधारणा को पूरे देश में लागू किया था। जिस दिग्विजय सिंह ने पंचायती राज व्यवस्था को प्रदेश में सख्ती से लागू किया वही आज बिगड़े दिमाग वाली अफसरों का बचाव कर रहे हैं। उन्हें तो अपनी सरकार केवल इसलिए गंवानी पड़ी थी क्योंकि पंचायती राज व्यवस्था अराजकता की भेंट चढ़ गई थी और अफसरशाही ने उनकी सरकार का वध कर दिया था। इसी अफसरशाही की असफलताएं गिनाकर कांग्रेस की मौजूदा सरकार सत्ता में आई है। इसके बावजूद सत्ता में आने के बाद वह अफसरों की गुलामी करने लगी है। राजगढ़ के कुछ जागरूक नागरिक जब नागरिकता संशोधन कानून का समर्थन कर रहे थे तब उन्हें जरा भी भान नहीं था कि जिस सरकारी अमले पर कानून लागू करवाने की जिम्मेदारी है वे ही उनके ऊपर हमला कर देंगे।उस समय वे शांतिपूर्ण तरीके से विरोध जता रहे थे। उनके हाथों में तिरंगा झंड़ा था। कमलनाथ सरकार ने चूंकि राजनीतिक एजेंडे के तहत विरोध प्रदर्शन को अनुमति न देने का अघोषित आदेश दिया है इसलिए खुद को सरकार का सिपाहसालार बताने के लिए कुछ अफसरों में होड़ सी लग गई है। जाहिर है कि राजगढ़ की कलेक्टर और डिप्टी कलेक्टर को भी राज्य सरकार की चिलम भरने में जुटना ही था। जिस बेखौफ अंदाज में कलेक्टर ने नारे लगाते कार्यकर्ता को झांपड़ रसीद किया और जिस गुंडई भरे लहजे में डिप्टी कलेक्टर ने तिरंगा धारियों को घसीटा उससे तो ऐसा ही लग रहा था मानों अंग्रेजों के टुकड़खोर आजादी के परवानों पर जुल्म ढा रहे हों। इस बदतमीजी का जवाब खून खराबे से भरा भी हो सकता था। भीड़ चूंकि हिंसक नहीं थी और न ही हिंसा का उसका कोई इरादा था इसलिए किसी शैतान प्रदर्शनकारी ने डिप्टी कलेक्टर की चोटी खींचकर उसे याद दिलाया कि वह सीमा लांघ रही है। पुलिस के बीचबचाव से भले ही दोनों अफसर बच गईं हों लेकिन जनता के बीच इसकी प्रतिक्रिया अच्छी नहीं है। इस घटना से नाराज भाजपा के कार्यकर्ता जब प्रदर्शन कर रहे थे तो पूर्व मंत्री बद्री यादव ने भावनाओं के अतिरेक में कुछ ज्यादा ही काल्पनिक कहानी सुना डाली। उन्होंने कहा कि यहां की कलेक्टर कांग्रेसियों को तो गोदी में बिठाकर दूध पिलाती है लेकिन भाजपा के कार्यकर्ताओं को थप्पड़ मारती है। हंसी ठिठोली के अंदाज में कही गई इस बात ने तूल पकड़ लिया और डिप्टी कलेक्टर की शिकायत पर बद्रीयादव की गिरफ्तारी और जमानत की प्रक्रिया भी की गई। दूध दुहना और लोगों को पिलाना बद्रीयादव का खानदानी काम रहा है। इसी वजह से उन्होंने कलेक्टर के कांग्रेस प्रेम को दर्शाने के लिए इस जुमले का इस्तेमाल कर डाला। जब प्रतिक्रियाएं आईं तो उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने यह कहते हुए माफी भी मांग ली कि उनकी बात का गलत अर्थ न निकाला जाए। हालांकि जब बात बिगड़ती है तो उसकी कई तस्वीरें सामने आती हैं।एक एएसआई और पटवारी ने कलेक्टर के दुर्व्यवहार को लेकर ही शिकायत कर डाली। जिसमें कलेक्टर ने उन्हें भी थप्पड़ मारा था। अब कलेक्टर साहिबा की मानसिक दशा का दूसरा ही पक्ष सामने आने लगा है। जाहिर है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के आला अधिकारियों और उन्हें मध्यप्रदेश कैडर में भेजने वाले केन्द्रीय कार्मिक मंत्रालय को ऐसी मानसिकता वाली अफसर की कार्यशैली पर गंभीरता से विचार करना चाहिए जो जनता के प्रति असहिष्णु हो। फौरी प्रतिक्रिया के तौर पर निधि निवेदिता और प्रिया वर्मा को निलंबित किया जाना चाहिए। राज्य सरकार से फिलहाल ये उम्मीद इसलिए नहीं की जाती क्योंकि भाजपा की ओर से इस घटना को लेकर अफसरों का विरोध किया जा रहा है। सबसे बड़ी बात तो ये है कि अफसरों को नसीहत देने वाले मुख्यमंत्री कमलनाथ महिला अफसरों के मामले में थोड़े ज्यादा सहिष्णु हैं। शायद यही वजह है कि उनकी कांग्रेस भाजपा के प्रदर्शन को महिलाओं का अपमान बताने में जुटी है। वीडियो क्लीपिंग्स में जो हकीकत सामने आई है उसमें साफ दिख रहा है कि किसी भी प्रदर्शन कारी ने महिला अफसरों से बदतमीजी नहीं की थी। इसके बावजूद महिला अफसरों ने सीमाएं लांघकर कार्यकर्ताओं पर हमला किया। प्रिया वर्मा तो अपनी अफसर से जुगलबंदी करने की रौ में इतना बह गईं कि उन्होंने भीड़ में घुसकर तिरंगा लिए व्यक्तियों को चुन चुनकर घसीटना शुरु कर दिया। गैर जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई करने की जवाबदारी निश्चित रूप से राज्य सरकार की है। उसे इन अफसरों को तत्काल हटाकर निलंबित करना चाहिए। उनके व्यवहार की जांच कराई जानी चाहिए और केन्द्र को सूचित किया जाना चाहिए।ये भी सुनिश्चित किया जाए कि जो अफसर भीड़ को नियंत्रित करने के बजाए उसे भड़काने की मानसिकता रखते हों उन्हें भविष्य में कभी मैदानी पोस्टिंग न दी जाए। कमलनाथ सरकार से फिलहाल ऐसे किसी सख्त कदम की उम्मीद नहीं की जा सकती। जो सरकार नागरिकता संशोधन कानून जैसे संसद से पारित व्यवस्था को लेकर अनर्गल बयानबाजी कर रही हो उससे जिम्मेदाराना व्यवहार की अपेक्षा भी क्यों की जाए। केन्द्र सरकार ने आईएएस अफसरों की व्यवस्था सुधारने की दिशा में कई प्रयास किए हैं। निश्चित रूप से ऐसे बिगड़े अफसरों के भविष्य का फैसला उसे करना चाहिए। सबसे बड़ी जवाबदारी तो भाजपा जैसे राजनीतिक दलों और आम नागरिकों की है।जनता के प्रति सड़ांध भरी मानसिकता लेकर नौकरी में आ गए इन अफसरों की शैली को अदालत में चुनौती दी जानी चाहिए। उनकी योग्यता की छानबीन कराई जाए और उन्हें पदमुक्त किया जाए ताकि सरकार और जनता के बीच संवादहीनता की स्थितियां न बनें। जिन अफसरों को जनता और सरकार के बीच संवाद की कड़ी बनना चाहिए यदि वे रोड़ा बन रहे हों तो बेहतर है इस रोड़े को जल्दी से जल्दी रास्ते से हटाया जाए। क्योंकि कलेक्टरी कोई रबर के गुड्डे गुड़ियों का खेल नहीं है। कमलनाथ सरकार इस पर गौर करे तो अच्छा ही होगा।

  • स्थापित उद्योगों के सहारे एमपी के सीईओ दिखना चाहते हैं कमलनाथ

    स्थापित उद्योगों के सहारे एमपी के सीईओ दिखना चाहते हैं कमलनाथ

    अरुण पटेल

    बतौर मुख्यमंत्री अपने कार्यकाल के अंतिम कुछ सालों में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अक्सर बढ़चढ़ कर यह दावा करते रहे कि वे मुख्यमंत्री नहीं बल्कि प्रदेश के सीईओ हैं, लेकिन सच्चे अर्थों में प्रदेश के वास्तविक सीईओ के रुप में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और मुख्यमंत्री कमलनाथ अपनी एक ऐसी छवि गढ़ रहे हैं जिसमें राजनेता के साथ ही एक कुशल प्रशासक के भी गुण मौजूद दिखाई पड़ने लगे हैं। कमलनाथ के पास विकास की वैश्‍विक दूरदृष्टि होने के साथ ही विकास का मॉडल स्थानीय जमीनी आवश्यकताओं के अनुसार क्या हो, इन दोनों का समन्वय उनके व्यक्तित्व में है। प्रशासनिक व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने और ‘वक्त है बदलाव का’ अपना चुनावी वायदा पूरा करने की दिशा में कमलनाथ सरकार आगे बढ़ रही है। दशकों बाद मंत्रालय में मुख्यमंत्री के रुप में एक ऐसा चेहरा विराजमान है जिसकी प्रशासन पर मजबूत पकड़ बन रही है और वे आला अधिकारियों को बताते हैं कि उन्हें क्या करना है और कैसे होगा। कमलनाथ का कहना है कि मेरी सरकार ‘आउटसोर्स’ की नहीं है। अब जब अधिकारी मेरे पास आते हैं और कैसे क्या करना है पूछते हैं तो मैं उन्हें बताता हूं कि कैसे काम करना है और क्या काम करना है एवं सरकार कैसे चलती है।


    मेरी सरकार आउटसोर्स की सरकार नहीं है यह कहते हुए कमलनाथ पूर्ववर्ती शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार पर तंज कसते हैं। समझा जाता है कि पूर्ववर्ती शिवराज सरकार के कार्य संचालन के मामले में उनकी यह पक्की धारणा रही है कि उस समय पांच-छह अधिकारियों को सरकार आउटसोर्स कर दी थी और वे जो चाहते थे वही होता था। जहां तक कमलनाथ का सवाल है चाहें वे मुख्यमंत्री हों, मंत्री रहे हों या सांसद उनकी कार्यशैली स्वाभाविक रुप से सीईओ की ही रही है, जबकि शिवराज पहली बार सीधे मुख्यमंत्री बने थे और उन्होंने अपने ढंग से सरकार चलाई थी। पहले और दूसरे कार्यकाल में शिवराज ने भी सामाजिक सरोकारों से जुड़ी खासकर लाडली लक्ष्मी और मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन तथा मुख्यमंत्री कन्यादान योजना जैसी कुछ ऐसी योजनायें चलाई थीं, जिनके चलते उनका अपना एक आभामंडल बना था और बहनों के भाई एवं भांजे-भांजियों के मामा तथा वृद्धजनों के लिए श्रवण कुमार बन गए थे। लेकिन यह भी सही है कि उनके कार्यकाल के आखिरी दो-तीन सालों में जैसा कमलनाथ कह रहे हैं वैसी ही स्थिति बन गयी थी।


    राजनीतिक हल्कों में यह बात मानी जाती थी कि कमलनाथ एक साथ वैश्‍विक सोच एवं जमीनी आवश्यकताओं के साथ पिछड़े से पिछड़े इलाके को कैसे विकसित किया जाए यह भलीभांति जानते हैं। आला प्रशासनिक अधिकारी और मध्यप्रदेश आईएएस एसोसिएशन के अध्यक्ष आई.सी.पी. केशरी कहते हैं कि हमारे सी.एम. डायनमिक ग्लोबल हैं और हम सब राज्य की उम्मीदों पर खरे उतरेंगे। आईएएस आफीसर्स एसोसिएशन की सर्विस मीट 2020 के उद्घाटन अवसर पर केशरी ने कहा कि नये आने वाले अफसरों को शायद अपने मुख्यमंत्री के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं है, इसकी वजह यह है कि उन्होंने उनके साथ काम नहीं किया है। उन्होंने एक उदाहरण देकर कहा कि जिनेवा में डब्ल्यूटीओ के सम्मेलन में एक बार किसानों के हितों को लेकर 90 देशों के मंत्रियों ने कमलनाथ के नेतृत्व में वाकआउट कर दिया था। एक बार विकासशील देशों के लिए पश्‍चिमी देशों की एक बैठक में अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश भी आये थे, उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने परिचय कराते हुए कहा कि ये वाणिज्यिक मंत्री कमलनाथ हैं, इसके पूर्व ही बुश बोल उठे कि मैं इन्हें जानता हूं, इन्होंने हमारे मंत्रियों को परेशान किया हुआ है। इस पर कमलनाथ ने कहा कि ऐसा नहीं है हमारे अच्छे सम्बन्ध हैं, उनकी इस हाजिर जवाबी के कारण सभी उनकी ओर देखने लगे थे।


    कांग्रेस अक्सर शिवराज सरकार पर भू-माफिया, खनन माफिया को फलने-फूलने का आरोप लगाती रही थी। चुनाव के समय भी कांग्रेस ने इसे एक बड़ा मुद्दा बनाया था। उसका आरोप था कि पिछले भाजपा सरकार के कार्यकाल के दौरान रेत माफिया, भू-माफिया, बिल्डर माफिया और अनेक प्रकार के माफिया इस कदर तेजी से उभरे थे कि एक प्रकार से प्रदेश माफियाओं के मकड़जाल में फंस गया था। कांग्रेस का कहना है कि इन सभी माफियाओं पर अपने-पराये या राजनीतिक प्रतिबद्धताओं से परे समान रुप से कड़ी कार्रवाई कमलनाथ कर रहे हैं और इसमें किसी प्रकार के हस्तक्षेप को प्रश्रय नहीं मिल पा रहा है। अपने चुनावी वायदों को तेजी से पूरा करने के साथ ही कमलनाथ की प्राथमिकता प्रदेश में नये उद्योग लगाने की रही है और इस मामले में एक यथार्थवादी दृष्टिकोण से वे आगे बढ़ रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस मीडिया विभाग के उपाध्यक्ष अभय दुबे का दावा है कि प्रदेश में औद्योगिक निवेश का एक विश्‍वसनीय माहौल बना है और लगभग 30 हजार करोड़ रुपये के निवेश के प्रोजेक्ट की बुनियाद बीते एक साल के कार्यकाल में रखी गई है। लगभग 70 हजार करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट के लिए, उन्हें भूमि आवंटन सम्बन्धी प्रक्रिया भी पूरी कर ली गयी है। उनका कहना है कि मध्यप्रदेश में औद्योगिक निवेश के परिवेश को देखा जाए तो पिछले पन्द्रह साल की तुलना में कमलनाथ सरकार का एक साल का कार्यकाल भाजपाई शासन का पर्दाफाश कर रहा है और भाजपा के पन्द्रह साल की अवधि प्रदेश के औद्योगिक निवेश के लिए अभिशाप साबित हुई है। दुबे का आरोप है कि शिवराज सरकार के समय 2007 से 2016 तक आयोजित अनेकों ग्लोबल इन्वेस्टर समिट में बड़े पैमाने पर औद्योगिक निवेश में 17 लाख करोड़ के गननचुम्बी निवेश के दावे किए गए थे, किन्तु नतीजा सिफर रहा और केवल 50 हजार करोड़ का ही निवेश आ पाया। दुबे का दावा है कि कमलनाथ सरकार औद्योगिक निवेश का स्वर्णिम भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर रही है और उसने 30 हजार करोड़ रूपये की बुनियाद भी रख दी है जबकि समूचा देश केन्द्र की भाजपा सरकार की अदूरदृष्टि के चलते भयंकर आर्थिक मंदी की चपेट में आ गया है, जबकि मध्यप्रदेश में निवेशकों की कतार लग गयी है। मध्यप्रदेश का पीथमपुर हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा फार्मा हब बन गया है। यहां सिपला फार्मा ने 600 करोड़ रुपये के निवेश की बुनियाद यहां रखी है। जो बड़े निवेशक आये हैं उनमें अजंता फार्मा ने 500 करोड़ रुपये का निवेश किया है। न्यू जर्सी की कम्पनी पार फार्मा ने 400 करोड़ का निवेश किया है मेक्लाईड नेे भी 400 करोड़ का निवेश किया है। इसके साथ ही उन्होंने आंकड़ों के हवाले से औद्योगीकरण की दिशा में बढ़ते प्रदेश का खाका भी प्रस्तुत किया।

    एक तरफ मुख्यमंत्री कमलनाथ जहां प्रदेश का औद्योगिक परिवेश बदलने के लिए भिड़े हुए हैं तो वहीं वे उन पर किए जा रहे किसी भी तंज का जवाब उसी लहजे में देने से नहीं चूक रहे। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष व केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने जबलपुर में सीएए के समर्थन में एक रैली को सम्बोधित करते हुए कमलनाथ पर निशाना साधा और कहा कि वे सोनिया मैडम के दरबार में अपनी सीआर सुधारने में लगे हैं और जोरशोर से बोल रहे हैं कि प्रदेश में सीएए लागू नहीं होगा। उनकी उम्र चिल्लाने की नहीं रही है, स्वास्थ्य बिगड़ जायेगा। इस पर कमलनाथ ने भी पलटवार करते हुए कहा कि मेरी उम्र नहीं काम देख रही है प्रदेश की जनता, 365 दिनों में 365 वायदे पूरे किए हैं हमारी सरकार ने, आप प्रदेश की जनता और जनादेश दोनों का अपमान कर रहे हैं। हमने एक साल में प्रदेश में बदलाव लाकर दिखा दिया है और वायदे पूरे कर जनता का भरोसा कायम रखा है, हम काम में विश्‍वास रखते हैं झूठे वायदों में नहीं। इसी उम्र में जनता ने मुझ पर भरोसा कर भाजपा के कई युवा उम्मीदवारों की उम्मीद पर पानी फेरा है। आप कांग्रेस को नहीं जनता को समझाइए जो इस सच को जानती है कि केन्द्र सरकार अपनी असफलताओं को छुपाने के लिए सीएए और एनआरसी जैसे कानून थोपने का काम कर रही है। कमलनाथ ने शाह को सलाह दी कि अधिक बेहतर होता आप सीएए के समर्थन में रैली व जनसभा के लिए उन राज्यों में जाते जहां हिंसा हुई है। प्रदेश की शान्त धरती पर कानून के नाम पर गुमराह करने व फिजा खराब करने के लिए आपके यहां आने की आवश्यकता नहीं है। 

    यह लेख सुबह सवेरे से आभार सहित लिया गया है। इसका मकसद मुख्यमंत्री कमलनाथ की आकांक्षाओं को अपने पाठकों तक पहुंचाना मात्र है। लेखक को उपलब्ध कराए गए तथ्यों ,वक्तव्यों, राय आदि से प्रेस इंफार्मेशन सेंटर की सहमति होना आवश्यक नहीं है।

  • प्रदेश को आर्थिक शक्ति बनाएं अफसरों से बोले कमलनाथ

    प्रदेश को आर्थिक शक्ति बनाएं अफसरों से बोले कमलनाथ

    तीन दिवसीय आईएएस सर्विस मीट 2020

    भोपाल 17 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। मुख्यमंत्री कमल नाथ ने कहा है कि देश में मध्यप्रदेश ही ऐसा प्रदेश है, जो विविधताओं से सम्पन्न है और पूरे विश्व में भारत ही ऐसा देश है, जो विविधताओं से पूर्ण है। इस विविधता को सकारात्मक ऊर्जा में बदलना होगा। उन्होंने कहा कि विविधता में भारत की बराबरी करने वाला देश सिर्फ सोवियत संघ था। आज वह अस्तित्व में नहीं है क्योंकि उसमें भारत जैसी सोच-समझ और सहिष्णुता की संस्कृति नहीं थी। यही भारत की पहचान है। मुख्यमंत्री आरसीवीपी नरोन्हा प्रशासन अकादमी में आईएएस सर्विस मीट 2020 के शुभारंभ सत्र को संबोधित कर रहे थे।

    मुख्यमंत्री कमल नाथ ने कहा कि जो आईएएस अधिकारी अपनी सेवा यात्रा के मध्य में हैं और जो सेवा पूरी करने वाले हैं, वे चिंतन करें कि मध्यप्रदेश को वे कहाँ छोड़कर जाना चाहते हैं। जो अधिकारी अपनी सेवा यात्रा की शुरूआत कर रहे हैं, वे सोचें कि मध्यप्रदेश को कहाँ देखना चाहते हैं। श्री कमल नाथ ने प्रशासनिक अधिकारियों को न्याय देने वाला बताते हुए कहा कि संविधान में उल्लेखित स्वतंत्रता और समानता जैसे मूल्यों की सीमाएँ हो सकती हैं लेकिन न्याय की कोई सीमा नहीं है। यह हर समय और परिस्थिति में दिया जा सकता है। दृष्टिकोण में परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों के पास जो क्षमता और कौशल है, वह सामान्यत: राजनैतिक नेतृत्व के पास नहीं रहता। राजनैतिक नेतृत्व बदलते ही प्रशासनिक तंत्र का भी नया जन्म होता है लेकिन ज्ञान, कला, कौशल नहीं बदलते।

    मुख्यमंत्री ने नए परिवर्तनकारी विचारों (न्यू आइडिया आफ चेंज) के लिए तीन पुरस्कार देने की बात कही। उन्होंने कहा कि इसके लिए पूर्व मुख्य सचिवों की एक ज्यूरी बनाई जाएगी, जो सर्वोत्कृष्ट आईडिया चुनेगी।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि हर राज्य की अपना प्रोफाईल होती है। सबको मिलकर मध्यप्रदेश का प्रोफाईल बनाना होगा। वर्तमान प्रोफाईल को बदलना होगा। मध्यप्रदेश की नई पहचान बनानी होगी। इसके लिए जरूरी है कि प्रदेश में ज्यादा से ज्यादा आर्थिक गतिविधियाँ उत्पन्न हों। उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी हर पल बदल रही है। पूरा भारत बदल रहा है। ज्ञान और सूचना के भंडार तक आज जो पहुँच बढ़ी है, वह पहले नहीं थी। उन्होंने कहा कि विश्व में सबसे ज्यादा महत्वाकांक्षी जनसंख्या भारत में है। ये जनसंख्या युवाओं की है। बदलते समय में महत्वाकांक्षाएँ भी बदल रही हैं। अब यह देखना है कि इन्हें कैसे अपनाएं।

    श्री कमल नाथ ने कहा कि मध्यप्रदेश कृषि आधारित अर्थ-व्यवस्था का प्रदेश है। वर्तमान समय में अधिक उत्पादन की चुनौती है। खाद्यान्न की कमी अब चुनौती नहीं रही। उन्होंने कहा कि परिवर्तन तब दिखेगा, जब धोती-पायजामा पहनने वाला किसान आधुनिक खेती करते हुए जींस और शर्ट वाला किसान बन जाये।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती हमारी नई पीढ़ी की है। उन्होंने कहा कि हर साल बड़ी संख्या में कौशल सम्पन्न युवा तैयार होते हैं। उन्हें रोजगार की जरूरत है। उन्होंने कहा कि रोजगार आर्थिक गतिविधियों का एक घटक है। इसलिए आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ाना चुनौतीपूर्ण काम है। उन्होंने कहा कि हर सरकार की अपनी कार्य-शैली होती है। अपनी अच्छाईयाँ और कमजोरियाँ होती हैं। प्रशासनिक अधिकारियों की नई पीढ़ी को यह देखना होगा कि मध्यप्रदेश को किस दिशा में जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश एक आर्थिक शक्ति बनने की संभावना रखता है। मध्यप्रदेश के पास लॉजिस्टिक लाभ है। यहाँ का बाजार और व्यापार पूरे देश से जुड़ सकता है। सिर्फ नजरिए में परिवर्तन लाने की देर है। इसके लिए नया सीखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि क्या सीखते हैं, इससे ज्यादा जरूरी है कि कैसे सीखते हैं।

    मुख्य सचिव एस.आर. मोहंती ने आईएएस मीट के आयोजन की पृष्ठभूमि की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यह नई ऊर्जा और अनुभव को एक साथ लाने का अवसर है ताकि यह कार्य-शैली में भी बना रहे और इसका भरपूर लाभ समाज को मिले।

    अपर मुख्य सचिव सर्वश्री एम.गोपाल रेड्डी, मनोज श्रीवास्तव एवं प्रमुख सचिव मलय श्रीवास्तव ने अतिथियों को स्मृति-चिन्ह भेंट किये। प्रारंभ में मध्यप्रदेश आईएएस एसोसिएशन के अध्यक्ष आई.सी.पी. केशरी ने अपने स्वागत भाषण में मुख्यमंत्री को आधुनिक, उदार, डॉयनामिक और विश्व-दृष्टि से सम्पन्न नेता बताते हुए कहा कि वे 159 देशों का भ्रमण कर चुके हैं । वे किसानों के हित में 19 मंत्रियों के साथ विश्व व्यापार संगठन की बैठक का विरोध करने वाले नेता हैं। उनके नेतृत्व में देश में ऑटोमोबाइल सेक्टर में क्रांतिकारी परिवर्तन आया।

    इस अवसर पर वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी एवं प्रख्यात लेखक पवन वर्मा और प्रशासन अकादमी की महानिदेशक सुश्री वीरा राणा उपस्थित थी। 

  • कांग्रेस की माफिया राजनीति का रुदन

    कांग्रेस की माफिया राजनीति का रुदन

    शिवसेना सुप्रीमो बाला साहब ठाकरे के उत्तराधिकारी बनने का ख्वाब देश के कई लोग देखते रहते हैं। संजय राऊत भी उनमें से एक हैं। भारत की राजनीति में बाला साहब ठाकरे को कांग्रेस की परिवारवादी सोच से उपजी निराशा के अंधकार में चमकते सूर्य की तरह देखा गया। गैर कांग्रेसवाद का प्रयोग भारतीय राजनीति के कई महारथियों ने किया लेकिन बालासाहब ठाकरे ने उसे अंजाम तक पहुंचाया। आज भाजपा की गुटबाजी और एकाधिकार वादी राजनीति ने हालात बदल दिए हैं। आज शिवसेना उसी कांग्रेस के साथ आ खड़ी हुई है जिसके जेहन में माफिया शब्द गहरे तक घर जमाए बैठा है। राजाओं, सामंतवादियों के बाद अंग्रेजों और फिर आजाद भारत में जमाखोरों, मिलावटियों को ब्लैकमेल करके राजनीति की इबारत लिखती रही कांग्रेस के नेता आज भी वही पुराना धंधा चमकाने का प्रयास कर रहे हैं। कांग्रेस के साथ सत्तासीन होने के बाद शिवसेना भी इस धंधे से रोजी कमाने की जुगत भिड़ा रही है। भारत का जल व्यापार पहले निजी हाथों में था। आजादी से पहले सिंधिया घराने ने जल व्यापार में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई थी। विदेशों तक फैला जल कारोबार सिंधिया घराने की आय का बड़ा स्रोत था। जिसकी मदद से सिंधिया घराने ने अपेक्षाकृत रूप से अच्छी राजनीति की परिपाटी विकसित की। इस राजनीति को भारत की आजादी से ग्रहण लग गया। जब श्रीमती इंदिरा गांधी सत्ता में आईं तो उन्होंने सिंधिया घऱाने की आय के इस बड़े स्रोत पर कब्जा जमाने की रणनीति पर काम किया। मुंबई के अंडरवर्ल्ड डॉन करीम लाला तब समुद्री कारोबार पर माफिया गतिविधियों की वजह से गहरा नियंत्रण रखते थे। हाजी मस्तान ने भी तस्करी के कारोबार से काफी दौलत बनाई थी। इंदिरा गांधी अच्छी तरह जानती थीं कि उन्हें यदि समुद्री कारोबार पर नियंत्रण करना है तो उन्हें इस धंधे की नस कहे जाने वाले माफिया डॉनों की मदद लेनी होगी। इंदिरा गांधी की इस मंशा को महाराष्ट्र की राज्य सरकारों और पुलिस कमिश्नरों ने पूरा किया।ये बात सही है कि मुंबई का पुलिस कमिश्नर कौन होगा ये अंडरवर्ल्ड ही तय करता था। जहाजरानी मंत्रालय के अधीन बाद में बने केन्द्रीय अंतर्देशीय जल परिवहन निगम को स्थापित करके समुद्री कारोबार के बड़े खिलाड़ियों को दस जनपथ ने धंधे से बाहर कर दिया। निजी कंपनियों के जहाज धड़ाधड़ डूबने लगे, उन पर अग्निकांड होने लगे। उन्हें लूटा जाने लगा और सुरक्षा कारणों की वजह से उन्हें सरकारीकरण की जरूरत महसूस हुई जिसे आगे जाकर अंजाम दिया गया। सोने से भरे जहाज पर विस्फोट और धंधे की बर्बादी की कहानियां देश में आज तक सुनी और सुनाई जाती हैं। तब ये कहा गया कि सरकार की सुरक्षा में समुद्री कारोबार बेहतर ढंग से काम करेगा। ये हुआ भी। भारत का समुद्री कारोबार बढ़ा भी उस पर माफिया का शिकंजा आटे में नमक की तरह बना भी रहा। जब दाऊद इब्राहिम ने करीम लाला के वर्चस्व को तोड़ा तब उसे सरकार की आड़ में धंधे पर काबिज हो चुके राजनेताओं से भी जूझना पड़ा। राजनीति और माफिया के इस गठजोड़ प्रेम और दुश्मनी की कई कहानियां हैं।बाद में राजनेताओं ने निगम की आड़ में निजी मुनाफा काटने का धंधा विकसित कर लिया। आज श्रीमती इंदिरा गांधी के करीम लाला से कथित मुलाकात की कहानी ने देश में भूचाल ला दिया है उसकी वजह कुछ और है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गुजरात में बंदरगाहों की आय बढ़ाकर राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने का सफल प्रयोग कर चुके हैं। भारत की सत्ता संभालने के बाद उन्होंने यही प्रयोग मुंबई में दुहरा दिया। इसकी वजह से जल परिवहन निगम की आड़ में मुनाफा उलीच रहे कारोबारियों को दस्त होने लगे। जो जहाजरानी निगम घाटे की घाटी पर लुढ़क रहा था वो मुनाफा देने लगा। इस धंधे के पुराने खिलाड़ी बाहर होने लगे और नए खिलाड़ियों का उदय होने लगा। धंधे पर इसी पकड़ को बचाने के लिए शिवसेना का झगड़ा भाजपा से हुआ और सत्ता की नई इबारत लिख दी गई। आज कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना सभी से जुड़े व्यापारी सत्ता का पाला बदल रहे हैं। उन्हें अपने साथ रोके रखने की कवायद बड़ी कठिन साबित हो रही है। कानून और व्यवस्था राज्य का विषय होता है। इसलिए उन कारोबारियों को चमकाने के लिए संजय राऊत ने करीम लाला और इंदिराजी की मुलाकात की कहानी सुनाई है। वे बताना चाहते हैं कि आज शिवसेना माफिया के सहारे वही खेल दुहरा सकती है जिसे इंदिराजी ने कभी जहाजों की रानी को डुबाने के लिए इस्तेमाल किया था।काग्रेस के कुछ राजनेता इसे इंदिराजी की तौहीन बता रहे हैं लेकिन सच तो ये है कि माफिया के सहारे सत्ता चलाने का खेल कांग्रेस हमेशा से खेलती रही है। मध्यप्रदेश में भी उसका एक सामंत यही खेल खेल रहा है। बड़े और सफल कारोबारियों को माफिया बताकर वह अपना सिक्का चलाना चाह रहा है। मुंबई में शिवसेना गठबंधन हो या मध्यप्रदेश में कांग्रेस सभी को ये जान लेना चाहिए कि वक्त बदल चुका है। रशिया का साम्यवाद इसी माफिया के सहारे सत्ता चलाने की वजह से सत्ता से बाहर धकेला गया था। देश में भी कारोबार को बढ़ाने वाली सत्ता को पसंद किया जाता है। धंधों की जड़ों में मठा डालकर उन पर कब्जा जमाने की हवस की उम्र बहुत छोटी होती है। ये तो गनीमत है कि भाजपा के बौड़म राजनेता मोदी सरकार की चाल से कदमताल नहीं कर पा रहे हैं। वे आज भी कांग्रेस की पिछलग्गू राजनीति से मुक्त नहीं हो पाए हैं।जरूरत किसी एक सशक्त नेता की है जो कारोबारियों को एकसूत्र में बांधकर मजबूती और संरक्षण दे सके। जिस दिन ये हो गया तो माफिया के सहारे सत्ता चलाने वाली राजनीति की विदाई सुनिश्चित हो जाएगी।

  • मकर संक्रांति अब साठ सालों तक 15 जनवरी को ही मनेगी

    मकर संक्रांति अब साठ सालों तक 15 जनवरी को ही मनेगी

    भोपाल,14 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)।आम चर्चा में कहा जाता है कि मकर संक्रांति ही ऐसा पर्व है जो हर साल चौदह जनवरी को आता है। लेकिन अब ये पर्व 15 जनवरी को पड़ रहा है। इसे देखते हुए लोग असमंजस में हैं कि संक्रांति अब 15 जनवरी को क्यों हो रही है?

    खगोल शास्त्र की गणनाओं को देखें तो 2008 से 2080 तक मकर संक्राति 15 जनवरी को ही होगी। विगत 72 वर्षों से (1935 से) प्रति वर्ष मकर संक्रांति 14 जनवरी को ही पड़ती रही है।इसीलिए लोगों के बीच तारीख को लेकर भ्रम की स्थिति बनना स्वाभाविक है।जबकि 2081 से आगे 72 वर्षों तक अर्थात 2153 तक यह 16 जनवरी को रहेगी।

    ज्ञातव्य रहे, कि सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश (संक्रमण) का दिन मकर संक्रांति के रूप में जाना जाता है। इस दिवस से, मिथुन राशि तक में सूर्य के बने रहने पर सूर्य उत्तरायण का तथा कर्क से धनु राशि तक में सूर्य के बने रहने पर इसे दक्षिणायन का माना जाता है।

    सूर्य का धनु से मकर राशि में संक्रमण प्रति वर्ष लगभग 20 मिनिट विलम्ब से होता है। स्थूल गणना के आधार पर तीन वर्षों में यह अंतर एक घंटे का तथा 72 वर्षो में पूरे 24 घंटे का हो जाता है।

    यही कारण है, कि अंग्रेजी तारीखों के मान से, मकर-संक्रांति का पर्व, 72 वषों के अंतराल के बाद एक तारीख आगे बढ़ता रहता है।

  • आरक्षित वर्गों का बैकलाग 20 जून तक भरें-भुवनेश पटेल

    आरक्षित वर्गों का बैकलाग 20 जून तक भरें-भुवनेश पटेल

    भोपाल,11 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। मप्र पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, जनजाति एवं अल्पसंख्यक कर्मचारी संघ- अपाक्स के प्रांताध्यक्ष भुवनेश कुमार पटेल का कहना है कि पिछले पंद्रह सालों से आरक्षित वर्गों का बैकलाग भरने की प्रक्रिया बहुत धीमी चल रही है,पात्रताधारी लोग निर्धारित आयुसीमा पार करते जा रहे हैं इसलिए सरकार को वंचित वर्ग को लाभ दिलाने के लिए बैकलाग के खाली पदों की सौ फीसदी भरपाई 20 जून तक पूरी कर लेनी चाहिए। आज राजधानी में आयोजित अपाक्स की बैठक में उन्होंने सरकार से अनुरोध किया है कि इस अवधि में ये कार्य बखूबी निटपाया जा सकता है और इसकी तिथि को आगे बढ़ाने की नौबत भी नहीं आएगी।

    अपाक्स के पदाधिकारियों के बीच विमर्श के बाद उन्होंने कहा कि शासन की भर्ती प्रक्रिया की चयन समितियों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग सभी के प्रतिनिधियों को अलग अलग नामित किया जाए। अपाक्स परिवार ने इन सदस्यों को चिन्हित भी कर लिया है जिससे सरकार को फैसला लेने में आसानी होगी।

    श्री पटेल ने कहा कि शासन ने भर्ती प्रक्रिया में 70 फीसदी स्थान प्रदेश के मूल निवासियों के लिए आरक्षित किए हैं इसलिए निजी क्षेत्र में भी इस प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने कहा कि आरक्षित संवर्ग के अधिकारियों कर्मचारियों से जुड़े शिकायत के प्रकरणों में सहानुभूति पूर्वक विचार किया जाए और उन्हें शासन की मंशानुसार संरक्षण प्रदान किया जाए।

    राज्य प्रशासनिक सेवा से आईएएस सेवा में पदोन्नति के लिए जो 33.3 प्रतिशत पद आरक्षित हैं उनमें से पंद्रह प्रतिशत पद गैर राज्य प्रशासनिक सेवा में आरक्षित हैं। इन पदों की पूर्ति भी भाजपा शासन ने पिछले पंद्रह सालों के दौरान नहीं की है। इन पदों पर भी पदोन्नति की प्रक्रिया अभी शेष है जिसे तत्काल पूरा किया जाना चाहिए। बैठक में लंबित डीए की पांच प्रतिशत राशि का भुगतान शीघ्र किए जाने की मांग भी की गई।

    बैठक में विभिन्न कर्मचारी संगठनों के प्रतिनिधि गण सर्व श्री वीरेन्द्र खोंगल, जितेन्द्र सिंह, ओ.पी. कटियार, रामविश्वास कुशवाह, राजकुमार चंदेल, सीएस यादव, प्रकाश मालवीय,अनिल वाजपेयी समेत प्रदेश के सभी पदाधिकारियों और प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

  • गेहूं के भंडार भरे,केन्द्र उठाने तैयार नहीं बोले प्रद्युम्न सिंह

    गेहूं के भंडार भरे,केन्द्र उठाने तैयार नहीं बोले प्रद्युम्न सिंह

    भोपाल,08 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। मध्यप्रदेश के खाद्य मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर का कहना है कि राज्य ने किसानों का गेहूं खरीदकर किसानों को राहत दी है लेकिन केन्द्र अब वह गेहूं नहीं उठा रहा है। इसके चलते राज्य को केन्द्र से भुगतान भी नहीं हो पा रहा है। केन्द्र सरकार ऐसा करके किसानों के हितों पर चोट पहुंचा रही है।

    साल भर की विभागीय उपलब्धियों पर चर्चा करते हुए श्री तोमर ने कहा कि कमलनाथ सरकार ने किसानों से किया गया कर्ज माफी का वायदा पूरा किया है। किसानों को बोनस देकर भी राज्य सरकार ने किसानों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पूरी की है। इसके बावजूद केन्द्र के असहयोग के चलते वह किसानों को अधिक लाभ नहीं दे पा रही है।

    केन्द्र से ठीक रेपो न होने की वजह से किसानों को होने वाली असुविधा के लिए क्या राज्य सरकार अपनी अयोग्यता को स्वीकार करती है पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि राज्य की ओर से लगातार केन्द्र सरकार से वार्ता की जाती रही है। लगभग तीन चरणों की बातचीत हो चुकी है लेकिन अभी तक केन्द्र ने न तो गेहूं उठाया है और न ही इसके एवज में राशि का भुगतान किया है।उन्होंने कहा कि केन्द्र की ओर से किसानों को दिए जाने वाले बोनस का भी भुगतान नहीं किया जा रहा है।

    खाद्य मंत्री से जब पूछा गया कांग्रेस पार्टी ने किसानों से किए गए वायदे केन्द्र से पूछकर तो नहीं किए थे इसके बावजूद अपनी असफलताओं का ठीकरा वे केन्द्र सरकार पर क्यों फोड़ रहे हैं ये पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि सरकार अपना काम बखूबी कर रही है।

    मंहगाई नियंत्रित कर पाने में राज्य सरकार की असफलताओं के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि सरकार माफिया के विरुद्ध कार्रवाई कर रही है। जो लोग जनता को ठगने का काम कर रहे थे और पिछले पंद्रह सालों में वे फलते फूलते रहे अब सरकार उन पर अंकुश लगाने का काम कर रही है।

  • बीमा योजना से कर्मचारियों की चिकित्सा प्रतिपूर्ति बंद

    बीमा योजना से कर्मचारियों की चिकित्सा प्रतिपूर्ति बंद


    मंत्रि-परिषद के निर्णय 

    भोपाल,4 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। कमल नाथ की अध्यक्षता में आज मंत्रालय में हुई मंत्रि-परिषद की बैठक में मुख्यमंत्री कर्मचारी स्वास्थ्य बीमा योजना को लागू करने का निर्णय लिया गया। योजना से लगभग 12 लाख 55 हजार कर्मचारी/अधिकारी लाभांवित होंगे।बीमा योजना लागू होने से कर्मचारियों को दी जाने वाली चिकित्सा प्रतिपूर्ति की व्यवस्था बंद कर दी जाएगी।

    इस योजना का लाभ प्रदेश के सभी नियमित शासकीय कर्मचारी, सभी संविदा कर्मचारी, शिक्षक संवर्ग, सेवानिवृत्त कर्मचारी, नगर सैनिक, आकस्मिक निधि से वेतन पाने वाले पूर्ण कालिक कर्मचारियों और राज्य की स्वशासी संस्थाओं में कार्यरत कर्मचारियों को मिलेगा। इसके अलावा निगम/मण्डलों में कार्यरत कर्मचारियों एवं अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों के लिए योजना वैकल्पिक होगी।

    मुख्यमंत्री कर्मचारी स्वास्थ्य बीमा योजना में बाहय रोगी ओपीडी के रूप में प्रतिवर्ष 10 हजार रूपये तक का नि:शुल्क उपचार अथवा नि:शुल्क दवाओं का वितरण किया जाएगा। सामान्य उपचारों के लिए प्रत्येक परिवार को प्रतिवर्ष 5 लाख रूपये और गंभीर उपचारों के लिए 10 लाख रूपये तक की नि:शुल्क चिकित्सा सुविधा प्राप्त होगी। दस लाख से अधिक के उपचार के लिए राज्य स्तरीय मेडिकल बोर्ड द्वारा विशेष अनुमति दी जा सकेगी।

    मंत्रि-परिषद ने महिला-बाल विकास विभाग द्वारा शत-प्रतिशत सहायित भारत सरकार की योजना वन स्टाप सेन्टर को प्रदेश के 51 जिलों में संचालित एवं निरंतर रखने की मंजूरी दी। इसके लिये 560 नये पद सृजित करने की भी मंजूरी दी गयी।

    मंत्रियों का स्वेच्छानुदान अब एक करोड़

    मंत्रि-परिषद ने मंत्रियों की वार्षिक स्वेच्छानुदान की राशि 50 लाख से बढ़ाकर एक करोड़ रूपये करने की मंजूरी दी। इसी प्रकार, राज्य मंत्रियों की वार्षिक स्वेच्छानुदान राशि को 35 लाख से बढ़ाकर 60 लाख किया गया है।

  • कर्ज लादकर माफी का वादा निभा रही कमलनाथ सरकार

    कर्ज लादकर माफी का वादा निभा रही कमलनाथ सरकार

    भोपाल,3 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। कमल नाथ की अगुआई में बनी राज्य सरकार पर प्रदेश की जनता से किए गए वादों को पूरा करने की जिम्मेदारी पहले दिन से ही रही है। किसानों, आदिवासियों, कर्मचारियों, युवाओं सहित सभी लोग प्रदेश में इस बदलाव को आशा और अपेक्षा की नजर से देख रहे थे। सरकार ने आते ही मिली वित्तीय रिक्तता, आर्थिक मंदी जैसी विषम परिस्थिति और वित्तीय मामलों में केन्द्र सरकार के रवैये से जन अपेक्षाओं पर पूरा उतरना नई सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण रहा। नई सरकार के सामने राज्य के सामाजिक, आर्थिक और भौतिक ढांचे को अधिक मजबूत बनाने का मुख्य लक्ष्य था। यह सब सशक्त आर्थिक आधार और बेहतर वित्तीय प्रबंधन के बिना संभव नहीं था। राज्य सरकार ने इस परिस्थिति से निपटने के लिये बेहतर वित्तीय प्रबंधन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। इससे शासकीय विभागों को अनिवार्य व्ययों के लिए निरंतर राशि उपलब्ध कराना संभव हुआ।

    प्रदेश की उन्नति और सबके हितों की रक्षा सुनिश्चित करने के क्रम में सर्वोच्च प्राथमिकता हमारी अर्थ-व्यवस्था के प्रमुख आधार किसान को दी गई। जय किसान फसल ऋण माफी योजना से संबंधित विभागों से समन्वय कर पात्र किसानों के दो लाख रूपये तक के कालातीत ऋण तथा 50 हजार रूपये तक के चालू ऋण माफ किए गए। योजना में बैंकों द्वारा एक मुश्त समझौता योजना में 1950 करोड़ रूपये का ऋण माफ किया गया। कुल मिलाकर 20 लाख से अधिक किसानों के 7 हजार करोड़ रूपये से अधिक के ऋण माफ किए गए।

    प्रदेश की तेज प्रगति के लिये सुचारू और सुगम परिवहन व्यवस्था अत्यंत आवश्यक है। राज्य सरकार ने परिवहन की आवश्यक अधोसंरचना सुनिश्चित करने के उददे्श्य से सड़कों के निर्माण के लिए एशियन डेव्हलपमेंट बैंक से 3 हजार 400 करोड़ रूपये (490 मिलियन यूएस डालर) प्राप्त करने का निर्णय लिया। इसी प्रकार, इन्दौर मेट्रो रेल परियोजना के लिए न्यू डेव्हलपमेंट बैंक से 1600 करोड़ रूपये (225 मिलियन यूएस डालर) प्राप्त करने का निर्णय लिया।

    राज्य सरकार की योजनाओं और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में हमकदम और आपदा प्रबंधन के आधार, शासकीय सेवकों की बेहतरी के प्रयास तुरंत शुरू किये गये। शासकीय सेवकों को सातवें वेतनमान के ऐरियर्स की द्वितीय किस्त का भुगतान किया गया। साथ ही सार्वजनिक निगम/मण्डलों के कर्मचारियों को सातवें वेतनमान के एरियर्स के लिए कार्यवाही की गई। शिक्षक संवर्ग को कोषालयीन व्यवस्था से जोड़ा गया। शासकीय सेवकों की पेंशन स्वीकृति और भुगतान प्रक्रिया को सरल किया। वेतन विसंगतियों और सेवा शर्तों पर विचार के लिए कर्मचारी आयोग गठित किया गया।

    राज्य सरकार द्वारा प्रदेश के आदिवासी समुदाय के सर्वागींण विकास के लिए भी अभिनव प्रयास किये जा रहे हैं। वित्त विभाग द्वारा प्रदेश के 89 आदिवासी बहुल विकासखण्डों में विशेष अभियान चलाते हुए 7 हजार 331 व्यक्तियों के जन-धन खाते में ओवर ड्रॉफ्ट की सीमा स्वीकृत कर 35 हजार 709 नये खाते खोले गये।

    राज्य सरकार की सकारात्मक सोच के साथ समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की कोशिश कुशल आर्थिक प्रबंधन के आधार पर ही सफल हो रही है। वित्त विभाग द्वारा जनवरी से नवम्बर 2019 तक पूंजीगत मद में 30 हजार 709 करोड़ रूपये व्यय किये गये। यह इसी अवधि के पिछले वर्ष के व्यय से 1304 करोड़ रूपये अधिक है। पूंजीगत व्यय से संबंधित प्रमुख विभागों को अप्रैल 2018 से नवम्बर 2018 की अवधि की तुलना में अप्रैल 2019 से नवम्बर 2019 की अवधि में अधिक राशि उपलब्ध करायी गई। गृह विभाग को 247 करोड़ 57 लाख की तुलना में 363 करोड़ 58 लाख, वन विभाग को 253 करोड़ 38 लाख की तुलना में 342 करोड़ 12 लाख, शहरी विकास एवं पर्यावरण विभाग को 483 करोड़ 23 लाख की तुलना में 775 करोड़ 91 लाख, लोक निर्माण विभाग को 5454 करोड़ 78 लाख की तुलना में 5562 करोड़ 04 लाख, नर्मदा घाटी/जल संसाधन विभाग को 5709 करोड़ 51 लाख की तुलना में 6280 करोड़ 60 लाख, लोक स्वाथ्य यांत्रिकी विभाग को 1179 करोड़ 49 लाख की तुलना में 1635 करोड़ एक लाख तथा ग्रामीण विकास विभाग को 1743 करोड़ 63 लाख की तुलना में 2343 करोड़ 10 लाख रूपये की धनराशि उपलब्ध करायी गई। प्रदेश में बैंकों द्वारा ऋण में वृद्धि की दर भी राष्ट्रीय स्तर से अधिक रही है।

    सबके हितों की रक्षा और प्रदेश की उन्नति सुनिश्चित करने के अपने संकल्प की पूर्ति के लिये आवश्यक वित्तीय आधार उपलब्ध कराने के लिए राज्य सरकार लगातार सक्रिय है।