Category: मध्यप्रदेश

  • किसान को खुशहाल बनाएंगे नए कानूनःकमल पटेल

    किसान को खुशहाल बनाएंगे नए कानूनःकमल पटेल

    अन्नदाताओं के जीवन में आसानी, समृद्धि, किसानी में आधुनिकता और प्रगति का मूल मंत्र लिए मोदी सरकार निरंतर कार्य कर रही है।इसका लाभ देश के करोड़ों किसानों को लगातार मिल रहा है।नए कृषि कानूनों के आने से यह सुनिश्चित हो गया है कि किसान अपनी फसलों को चाहे मंडी में बेचें या फिर मंडी के बाहर, ये उनकी मर्जी होगी। अब जहां किसान को लाभ मिलेगा वह बिना किसी अवरोध और रोक-टोक के वहां अपनी उपज बेच सकेगा।किसान पुत्र कृषिगत उद्योग धंधे अपने गांवों में ही लगा सकेंगे। किसान अब इन नवीन विधेयकों की बदौलत उद्योगपति भी बनेंगे।

    मोदी सरकार ने प्राथमिकता से स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशों के अनुरूप प्रगतिशील कदम उठाए है।देश के हर गांव का किसान अपनी फसलों की सुरक्षा को लेकर आश्वस्त रहे इसलिए भंडारण की आधुनिक व्यवस्थाएं बनाने, कोल्ड स्टोरेज बनाने और फूड प्रोसेसिंग के नए उपक्रम लगाने के लिए सरकार ने तेजी से कदम बढ़ाते हुए नए द्वार खोल दिए हैं।यदि बात न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की करें, तो मोदी सरकार किसानों को बेहतर लागत मूल्य देकर किसानों के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने में सफल हुई है। वर्ष 2014 के पूर्व और वर्ष 2014 के बाद एमएसपी का तुलनात्मक अध्ययन करें, तो हम पायेंगे कि विभिन्न फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य वर्ष 2014 के बाद निरंतर बढ़ा है। यूपीए सरकार में गेहूँ का एमएसपी 1400 रुपये प्रति क्विंटल था, जबकि आज 1975 रुपये प्रति क्विंटल है। मूंग दाल पर एमएसपी 4500 रुपये था, जबकि वर्तमान सरकार में 7200 रुपये है। मसूर दाल की एमएसपी 2950 रुपये से बढ़कर आज 5100 रुपये है। ज्वार 1520 रुपये से बढ़कर 2640 रुपये है। धान की एमएसपी 1310 रुपये से बढ़कर 1870 रुपये है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने हाल ही में मध्यप्रदेश के किसानों से बात करते हुए इन उपलब्धियों का जिक्र भी किया और पूरी विनम्रता से अन्नदाताओं के हितों के लिए सभी सकारात्मक कदम उठाने का भरोसा भी दिलाया।

    किसान हितों के लिए दूरगामी और प्रभावकारी योजनाएँ केन्द्र सरकार लागू कर रही है। नवीन कृषि विधेयक किसानों के आर्थिक सशक्तिकरण के मार्ग को सरल और सुगम बनाएंगे। यह विधेयक किसानों के आर्थिक उत्थान का मुख्य साधन बनेंगे। मध्यप्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान स्वयं किसान है और वे किसानों के हितों के लिए प्रतिबद्धता से कार्य करने के लिए जाने जाते हैं। वे लगातार प्रदेश के किसानों से संवाद कर रहे है। ये कानून उनके हित में हैं। मैंने हरदा जिले में किसान चौपाल अभियान प्रारंभ किया है। नवीन कृषि कानूनों के समर्थन में किसान चौपालों में नये कृषि कानूनों पर मैं स्वयं बात कर रहा हूँ। हम सभी को मिलकर नये कृषि कानूनों को लेकर किसानों से बातचीत करना चाहिए। इससे इन कानूनों को लेकर किसानों में फैले भ्रम को दूर किया जा सकेगा। सही मायनों में इन विधेयकों से किसानों की तकदीर और प्रदेश एवं देश की तस्वीर बदलेगी। इन विधेयकों में वे तमाम प्रावधान किए गए हैं, जिनसे किसानों में खुशहाली आये और वे समृद्द हों। राष्ट्र में सुख और समृद्धि बढ़े। अंततः हम सबका लक्ष्य अपने राष्ट्र की खुशहाली है और सरकार लोककल्याणकारी नीतियों से देश के करोड़ों लोगों के सपनों को साकार कर रही है।

    वर्ष 2014 के बाद केंद्र की मोदी सरकार की लोककल्याणकारी नीतियों से देश के किसानों के जीवन में बेहद सुधार हुआ है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना से किसानों के बैंक खातों में रुपये छ: हजार की राशि सीधे ट्रांसफर होती है। इतना ही नहीं प्रदेश सरकार भी मुख्यमंत्री किसान सम्मान योजना अंतर्गत चार हजार रुपये की अतिरिक्त राशि किसानों के खातों में ट्रांसफर कर रही है। यह क्रांतिकारी बदलाव है जिससे करोड़ों भोले-भाले किसानों को सीधे उनके बैंक खातों में पूरे पैसे मिलना सुनिश्चित किया है। देश के हर किसान को पानी मिले और हर खेत तक पानी पहुंचे इस दिशा में मोदी सरकार लगातार काम कर रही है और हजारों करोड़ रुपए खर्च करके इन सिंचाई परियोजनाओं को मिशन मोड में पूरा करने में जुटी है। इसके साथ ही मधुमक्खी पालन,पशुपालन पालन और मछली पालन को भी लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है।

    इस साल पंचायती राज स्थापना दिवस 24 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशभर के सरपंचों से बात करते हुए किसानों के जीवन में बदलाव के लिए प्रधानमंत्री स्वामित्व योजना की रूप में एक स्वर्णिम योजना की शुरुआत की थी। जिससे भारत  के किसान,ग्रामीण समाज का विकास और प्रगति से सीधे जुडने का मार्ग प्रशस्त हुआ है। प्रधानमंत्री स्वामित्व योजना के तहत गांवों में ड्रोन से गाँव,खेत और भूमि की मैपिंग की जा रही है। इससे गांवों में संपत्ति को लेकर विवाद खत्म हो जाएंगे। इससे भूमि की सत्यापन प्रक्रिया में तेजी और भूमि भ्रष्टाचार को रोकने में सहायता मिलेगी। पहले गांव की जमीन पर लोन मिलना मुश्किल होता था,इसी कारण जोत की जमीन बेचकर किसान परिवार शहर की ओर पलायन कर जाते थे। अब गांवों में भी लोग बैंकों से लोन ले सकेंगे और इन सब सुविधाओं के कारण ग्रामों के विकास कार्यों को प्रगति मिलेगी। जमीन की मैपिंग के बाद गांव के लोगों को उस संपत्ति का मालिकाना प्रमाण-पत्र दिया जाएगा। ग्रामीणों के पास स्वामित्व होगा तो उस संपत्ति के आधार पर ग्रामीण बैंक से लोन ले सकेंगे। नये विधेयकों के आने से किसान आगे बढ़कर उद्यमी बनेंगे। हम सब मिलकर आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश और आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करेंगे।

  • आंगनबाड़ियों में गाय का दूध देने का फैसला सराहनीयः संदीप डाकोलिया

    आंगनबाड़ियों में गाय का दूध देने का फैसला सराहनीयः संदीप डाकोलिया


    भोपाल,28 नवंबर( प्रेस सूचना केन्द्र) अखिल भारतीय जैन पत्रकार महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष संदीप डाकोलिया व प्रदेश महासचिव शिरीष सकलेचा का कहना है कि राज्य की शिवराज सिंह चौहान सरकार ने आंगनबाड़ियों में अंडे की जगह दूध देने के फैसले के अमल पर जो सक्रियता दिखाई है वह सराहनीय है। सरकार के इस निर्णय से पूरा अहिंसक समाज प्रसन्नता जाहिर कर रहा है।


    उन्होंने प्रेस से चर्चा में कहा कि कांग्रेस सरकार की पूर्व महिला एवं बाल विकास मंत्री इमरती देवी ने आंगनवाड़ी में बच्चों को अंडे देने का निर्णय लिया गया था। इस फैसले का अखिल भारतीय जैन पत्रकार महासंघ ने भी पुरजोर विरोध किया था।कमलनाथ सरकार के पतन के बाद अब प्रदेश की गौ प्रेमी सरकार ने इस निर्णय को पलटते हुए बच्चों को कुपोषण से मुक्त करने के लिए गाय के दूध देने का जो निर्णय लिया है वह सभी के हित में है।

    उन्होंने कहा कि गाय का दूध सभी तरह से पौष्टिक होता है। इसे सभी धर्म के लोग स्वीकार करते हैं। आंगनवाड़ी में अब सभी बच्चे एक साथ दूध ग्रहण कर सकेंगे ।किसी को कोई परहेज नहीं होगा।इस सराहनीय निर्णय के लिए अखिल भारतीय जैन पत्रकार महासंघ के पदाधिकारियों ने प्रदेश सरकार का साधुवाद ज्ञापित किया है।

    इस सरहानीय निर्णय के लिए अखिल भारतीय जैन पत्रकार महासंघ के पदाधिकारियों संस्थापक अध्यक्ष संजय लोढा, संरक्षक हिम्मत मेहता, ऋतुराज बुड़ावनवाला, सलाहकार राजेश नाहर, जवाहर डोसी उपाध्यक्ष देवेन्द्र सांड, पंकज पटवा, सचिव संदीप जैन, मयंक बाफना, संगठन सचिव विमल कटारिया, संयुक्त सचिव मेहुल बम, अरुण बुरड़, प्रचार सचिव प्रदीप जैन सिंगोली, गौरव दुग्गड़ आदि ने प्रदेश सरकार का साधुवाद ज्ञापित किया है.

  • भावनाओं के सूर्य भगवान गणेश

    भावनाओं के सूर्य भगवान गणेश

    के. विक्रम राव

    अगर इतिहासकार अलबरूनी की बात स्वीकारें तो श्रेष्ठतम सम्पादक हैं गणेश। इसे वेदव्यास ने भी प्रमाणित किया था। वर्तनी, लेखनी, प्रवाह और त्रुटिहीनता की कसौटी पर गणेश खरे उतरते है। इस पूरी गणेशकथा में हम श्रमजीवी पत्रकारों के लिये रूचिकर वाकया यह है कि गणेश सर्वप्रथम लेखक और उपसम्पादक हैं। यूं तो देवर्षि नारद को प्रथम घुमन्तू संवाददाता और संजय को सर्वप्रथम टीवी एंकर कहा जा सकता है, मगर गणेश का रिपोर्ताज में योगदान अनूठा है। मध्येशियाई इतिहासकार, गणितज्ञ, चिन्तक और लेखक अल बरूनी ने एक हजार वर्ष पूर्व लिखा था कि वेद व्यास ने ब्रह्मा से आग्रह किया था कि किसी को तलाशे जो उनसे महाभारत का इमला ले सके। ब्रह्मा ने हाथीमुखवाले गणेश को नियुक्त किया। वेदव्यास की शर्त यह थी कि गणेश लिखते वक्त रुकेंगे नहीं और वही लिखेंगेगे जो वे समझ पायेंगे। इससे गणेश सोचते हुए, समझते हुये लिखते रहे और व्यास भी बीच-बीच में विश्राम करते रहे। (एडवार्ड सी.सचान, अलबरूनीज इंडिया, मुद्रक एस. चान्द, दिल्ली, 1964, भाग एक, पृष्ट 134)।अब एक आधुनिक पहलू पर गौर करें। एडोल्फ हिटलर ने अपनी नेशनल सोशलिस्ट (नाजी) पार्टी का निशान (1930) स्वस्तिक बनाया था, तो प्राच्य के मनीषियों का व्यग्र होना सहज था। ओमकार स्वरूप गणेश के इस सौर प्रतीकवाले शुभ संकेत को उसने वीभत्स बना डाला था। हिटलर ने अपने अमांगलिक और अमानुषिक कार्ययोजना में इस वैदिक प्रतीक का जुगुप्सित प्रयोग किया था। स्वस्तिक को गणेश पुराण के अनुसार गजानन का स्वरूप तथा हर कार्यों में मांगलिक स्थापना हेतु शुरूआत को मानते हैं। श्रीगणेशाय नमः के उच्चारण के पूर्व स्वस्तिक चिन्ह बनाकर ”स्वस्ति न इन्द्रो बुद्धश्रवाः“ स्वस्तिवचन करने का विधान है। अपने स्वराष्ट्रवासी प्राच्यशास्त्री मेक्सम्यूलर को पढ़कर इस जर्मन नाजी तानाशाह ने अपने पैशाचिक अभीष्ट को हासिल करने हेतु स्वस्तिक को अपनाया था। लेकिन हिटलर का वही हश्र हुआ जो सूर्यपुत्र अहंतासुर का हुआ जिसका भगवान गजानन ने धूम्रवर्ण के अवतार में जगद् कल्याणार्थ वध किया। ब्रह्मा द्वारा कर्माध्यक्ष पद पाकर सूर्य को अहंकार हो गया था और तभी उनके नथुनों के वायु से अहंतासुर का जन्म हुआ था। वह भी अभिमानी होकर समस्त ब्रह्माण्ड का शासक, अमर तथा अजेय होना चाहता था। दैत्यगुरू शुक्राचार्य से गणेश मंत्र की दीक्षा प्राप्त कर अहन्तासुर राक्षस ने पार्वतीपुत्र की घोर उपासना की। भोले बाबा के आत्मज ने इस दैत्य को तथास्तु कहकर वर दे डाला। फिर वही हुआ जो हर दैत्य करता आया है। वही जो हिटलर ने गत सदी में किया था। पापाचार, नरसंहार, तबाही आदि। लाचार, निरीह देवताओं तथा मानवों ने गणेश की उपासना की। अपने भक्तों की रक्षा में गजानन ने उग्रपाश फेंक कर सभी असुरों का वध कर दिया। घमण्ड तजकर अहंतासुर गणेश का शरणागत हो गया। उसे आदेश मिला कि जहां गणेश की आराधना न होती हो वहीं जा कर वास करे।राजनीतिक रूप में गणेश का राष्ट्रवादी तथा जनकल्याणकारी उपयोग स्वाधीनता सेनानी, महाराष्ट्र केसरी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने हिटलर के आविर्भाव के पैंतीस वर्ष पूर्व पुणे में सर्वप्रथम किया था। अंग्रेजी साम्राज्यवादियों ने अपने भारतीय उपनिवेश में हर प्रकार की सार्वजनिक क्रियाशीलता पर प्रतिबंध लगा दिया था। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857) कुचल दिया गया था। शासकों ने भारतीयों को जाति तथा मजहब के आधार पर विभाजित कर दिया था। महाराष्ट्र के पेशवा शासक 1893 के पूर्व तक गणेश चतुर्थी भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाते थे। लोकमान्य तिलक ने इस धार्मिक उत्सव के जनवादी पहलू को पहचाना। उसे जनान्दोलन बनाया। तभी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना मुम्बई में हुये आठ वर्ष हो चुके थे। मगर सार्वजनिक आयोजन पर रोक बरकरार थी। हिन्दू चेतना को तिलक ने जगाया और जनपदीय स्तर से उठाकर गणेश चतुर्थी को राष्ट्रीय रूप दिया। चूंकि अन्य ईश्वरों की तुलना में गणेश किसी जाति या वर्ग विशेष के नहीं थे, अतः सर्वजन के इष्ट बन गये। गणेशोत्सव में सभी हिन्दू शरीक हो गये। उन्हीं दिनों तिलक के उग्र संपादकीय (समाचारपत्र मराठा तथा केसरी में) छपते थे जिनसे साम्राज्यवाद-विरोधी भावना को बल मिलता था। उनका सिंहनाद कि ”स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, मैं इसे लेकर रहूंगा“ काफी ख्यात हुआ। गणेश चतुर्थी को तिलक ने जनविरोध का माध्यम बनाया। बौद्धिक चर्चायें, नुक्कड़ नाटक, कविता पाठ, संगीत आदि माध्यम अपना कर गणेश चतुर्थी को मात्र लोकरंजन ही नहीं लोकराज के संघर्ष का मंच भी बनाया गया। स्वतंत्रता के बाद तो गणेश चतुर्थी को राष्ट्रीय पर्व की मान्यता मिल गई।गणेश के गृहस्थ होने की बात विवादित है। दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में, उन्हें ब्रह्मचारी मानते हैं। उत्तर भारत में प्रसंग भिन्न है। यह जानीमानी घटना है कि दोनों भ्राताओं (कार्तिकेय) में प्रतिस्पर्धा हुई कि पहले किसका पाणिग्रहण हो। दुनिया की परिक्रमा की शर्त रखी थी माता-पिता ने तो गणेश ने शार्टकट का रास्ता अपनाया और शिवपार्वती की परिक्रमा कर अपना दावा पुख्ता कर लिया। नाराज होकर देवताओं के सेनापति कार्तिकेय दक्षिण भारत में बस गये और अविवाहित रहे। गणेश की दो भार्या थीः ऋद्धि और सिद्धि तथा दो सन्ताने हुई क्षेम और लाभ जिसकी वणिकवर्ग और श्रेष्ठिजन पूजा करते हैं।यूं शिव ने देवताओं के शुभकार्य हेतु गणेश की सृष्टि की मगर अन्य गमनीय विभूतियां और विलक्षणतायें भी गणेश में हैं। शिव के रौद्ररूप की धार कम करना हो तो गणेशोपासना कीजिए। निर्विघ्नता, कर्मनाश और धर्मप्रवर्तन के अलावा गणेश ललित कलाओं और संस्कृति के संरक्षक हैं। एक बार वे मृदंग बजा रहे थे कुपित शिव ने उसे त्रिशूल से तोड़ दिया। तबला की उत्पत्ति तभी से हुई। जटिलता को सुगम बनाने में उन्हें महारत है जैसे भारीभरकम हाथीवाला शरीर नन्हे चूहे पर टिके, यह भौतिक संतुलन मुमकिन कर दिखाया।चूहे का ही प्रसंग है। एक बार सांप दिख गया था तो चूहा भागा और गड़बडा कर गणेश जी घराशायी हो गये। इस नजारे पर चन्द्रमा हंस पड़े। गणेश ने शाप दे दिया कि उसका आकार घटता बढ़ता रहेगा। तभी से चन्द्रमा के लिए बालेन्दु से पूर्णचन्द्र और फिर प्रतिपदा से अमावस तक का दौर चलता है। तो उस महान सम्पादक व लेखक वक्रतुण्ड, एकदन्त, गजवक्त्र, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज, धूम्रवर्ण, भालचन्द्र, विनायक, गणपति, गजानन को उनके जन्मोत्सव पर हमारा सादर नमन।K Vikram RaoMobile :9415000909E-mail: k.vikramrao@gmail.com

  • मास्टर प्लान में माफिया की घुसपैठ बोले बिहारीलाल जी

    मास्टर प्लान में माफिया की घुसपैठ बोले बिहारीलाल जी

    भोपाल,26 जून(प्रेस सूचना केन्द्र)। नगर विकास मंच मध्यप्रदेश के संयोजक बिहारीलाल जी का कहना है कि राजधानी के सुनियोजित विकास के लिए प्रस्तावित मास्टर प्लान के ड्राफ्ट में आमूलचूल बदलाव करना जरूरी है। ये मास्टर प्लान विधि सम्मत नहीं है और इसे इतनी जल्दबाजी में बनाया गया है कि इसके ऊटपटांग स्वरूप का लाभ लेते हुए माफिया ताकतों ने बेशकीमती जमीनों को हथियाने और बेचने का जाल बुन डाला है। भू माफिया ने राजधानी में रोजगार के अवसर विकसित किए बगैर लोगों को गांवों से खदेड़कर भीड़ जुटाने का षड़यंत्र रचा है। प्रदेश के समन्वित विकास के लिए प्रदेश के विभिन्न शहरों के मास्टर प्लान के साथ ही राजधानी का नगर निवेश भी किया जाना जरूरी हो गया है।

    आज एक पत्रकार वार्ता में नगर विकास मंच मध्यप्रदेश के पदाधिकारियों के साथ नगर तथा ग्राम निवेश विभाग मध्यप्रदेश के सेवानिवृत्त असिस्टेंट डायरेक्टर श्री बिहारी लाल ने कहा कि राजधानी के मास्टर प्लान के ड्राफ्ट में भारी गड़बड़ियां हैं। इसका महाविशाल स्वरूप वेवसाईट पर इस तरह दर्शाया गया है कि जिसे आम लोग पढ़ समझ नहीं सकते। इसके संपादित स्वरूप को पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित किया जाना जरूरी है। शहर के विकास में रुचि रखने वाले लोग इससे नगर विकास के संबंध में अपनी कीमती राय से शासन को अवगत करा सकेंगे। प्रेस वार्ता में मंच के अजय लखवानी समेत कई अन्य पदाधिकारी भी उपस्थित थे।

    उन्होंने कहा कि राजधानी की वर्तमान भूमियों के मानचित्र बनाकर उन्हें वार्डवार प्रदर्शित किया जाना जरूरी है ताकि लोग भविष्य की योजनाओं के संबंध में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकें। इस मास्टर प्लान को संक्षिप्त पुस्तक के रूप में और हिंदी भाषा में प्रकाशित किया जाना जरूरी है। मास्टर प्लान का ये ड्राफ्ट राजधानी के ही 284 गांवों की पंचायतों के अधिकारों का दमन कर रहा है। इससे पंचायतों के अधिकार समाप्त हो जाएंगे।

    श्री बिहारीलाल ने कहा कि एक ओर जब भारत सरकार आत्मनिर्भर भारत की योजना पर कार्य कर रही है वहां राजधानी में रोजगार के अवसर न होने पर ही अंधे शहरीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है।शहर में लगभग 50 हजार से ज्यादा आवासीय प्रकोष्ठ खाली पड़े हैं। इसके बावजूद माफिया ताकतें शहर में और भी ज्यादा भवन बनाने का षड़यंत्र रच रही है।चीन में विकास के नाम पर ऐसे ही कई शहर खाली पड़े हैं जिन्हें भूतिया शहर कहा जाता है।सरकार की ये जवाबदारी है कि वो बेतरतीब शहरीकरण को रोककर लोगों को मौजूदा आवासों की सुविधा उपलब्ध कराए।

    पत्रकार वार्ता में मौजूद नागरिकों ने जब उनसे सवाल किया कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में नगरीय विकास मंंत्री जयवर्धन सिंह किन माफिया ताकतों के इशारे पर ये मास्टर प्लान लागू कर रहे थे तो उन्होंने कहा कि कई अन्य ताकतें भी शहरी विकास की आड़ में अपना उल्लू सीधा करना चाह रहीं हैं। गौरतलब है कि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के इशारे पर कमलनाथ सरकार ने प्रदेश के कई शहरों में एक साथ मास्टर प्लान लागू करके गांवों से लोगों को खदेड़ने की तैयारी की थी,सरकार के अवसान के बाद ये स्थितियां बदल गईं हैं। इस स्थिति में शहरों और गांवों के समन्वित नियोजन की जरूरत महसूस की जा रही है। कोरोना के कहर के बाद तो इस योजना की प्रासंगिकता कई सवालों से घिर गई है।

  • कृतघ्न महाराष्ट्र सरकार

    कृतघ्न महाराष्ट्र सरकार

    कोरोना संकट के बाद चल रहे लंबे लॉक डाऊन ने सरकारों की धूल निकाल दी है। खुद को प्रदेशों और देश का भाग्य विधाता कहलाने वाली सरकारों की चूलें हिल गईं हैं। अधिकतर राज्यों की सरकारें अब लोगों को घरों पर बैठकर नहीं खिला पा रहीं हैं। उनके पास अनाज के तो भंडार हैं लेकिन उन्हें सप्लाई करने वाला ढांचा नहीं है। वे किसानों से खरीदा गया अनाज फोकट में नहीं बांट पा रहीं हैं। इसकी वजह से निम्न मध्यमवर्गीय लोगों में भगदड़ मच गई है। देश में असंतुलित विकास के ढांचे की वजह से महाराष्ट्र को निर्माण का हब तो बना दिया गया लेकिन उसमें आजादी के 73 सालों बाद भी जिम्मेदारी का भाव नहीं आया है। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों ने यूपी, बिहार,झारखंड, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में उद्योगों को अनुमति देने के बजाए महाराष्ट्र से समुद्र तटीय इलाकों में उद्योगों की भरमार कर दी थी। यही वजह है कि देश भर के कई राज्यों से करोड़ों लोग इन क्षेत्रों में कामकाज की तलाश में पहुंच गए। मुंबई और महाराष्ट्र में यूपी, बिहार, मध्यप्रदेश,पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से करीबन तीस लाख मजदूर रह रहे हैं। जब तक उद्योगों को सस्ते मजदूरों की जरूरत थी महाराष्ट्र ने उन्हें गले लगाया लेकिन अब जबकि लॉक डाऊन चल रहा है तब महाराष्ट्र की शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी सरकार मजदूरों से पल्ला झाड़ रही है। ऐसे ही औरंगाबाद से लौट रहे 16 मजदूरों की रेल की पटरियों पर मालगाड़ी से कुचलकर मौत हो गई है। सड़क मार्ग बंद होने की वजह से वे रेल की पटरियों के सहारे अगले स्टेशन पर किसी रेलगाड़ी की उम्मीद में जा रहे थे। थकान की वजह से वे पटरियों पर ही बैठ गए और थकान की वजह से उनकी आंख लग गई। इस बीच मालगाडी आ गई और वे मारे गए। इस दुर्घटना के बाद उद्धव सरकार की अमानवीय सोच की पूरे देश में निंदा हो रही है। अभी दो दिन पहले ही शिवसेना के मुखपत्र सामना ने संपादकीय में लिखा था कि राज्यों की सरकारें अपने मजदूरों को वापस नहीं आने दे रहीं हैं वे कह रहीं हैं कि सरकारें मजदूरों का कोरोना टेस्ट कराएं और फिर अपने खर्चे से उन्हें घर भेजें। वोट बैंक का कचरा अब किसी को अपने आंगन में नहीं चाहिए।जिन मजदूरों ने महाराष्ट्र के विकास में उसकी समृद्धि के लिए अपना जीवन नारकीय परिस्थितियों में होम कर दिया उन्हें शिवसेना की सोच आज वोट बैंक का कचरा बता रही है। ये शर्मनाक है। जब सरकारें उद्योगों को मंजूरी देती हैं तब वे उनके लिए आवश्यक मजदूरों की व्यवस्था करने की छूट भी देती हैं। उन मजदूरों के निवास भोजन की व्यवस्था करने की जवाबदारी भी लेती हैं। जब तक विकास की लोरियां सुनीं सुनाई जा रहीं थीं तब यही मजदूर महाराष्ट्र को अच्छे लग रहे थे और जब संकटकाल में उन्हें पालने की जवाबदारी आई है तो सरकार हाथ ऊंचे कर रही है। सरकार को ये होश ही नहीं है कि वह अपने मजदूरों के भोजन निवास की व्यवस्था कर पाए। वे अभागे मजदूर रेल की पटरियों पर जा रहे थे या उन्हें किसी ने मारकर पटरी पर फेंक दिया इसकी जांच होनी अभी बाकी है। पर इतना तो साफ है कि महाराष्ट्र सरकार अपना दायित्व निभाने में असफल रही है। अपने राज्य में निवास कर रहे मजदूरों का पालन करना उसकी जवाबदारी है। कोरोना का संक्रमण रोकने के लिए उन्हें मौजूदा स्थान पर ही रोकना जरूरी है। 135 करो़ड़ की आबादी वाले देश में केवल 56 हजार संक्रमितों को देखें तो केन्द्र सरकार की रणनीति कारगर रही है। लेकिन अब राज्य सरकारें यदि अपनी जवाबादारी नहीं निभाएंगी तो ये संक्रमण देश के अनेक राज्यों में गांव गांव तक फैल सकता है। एम्स के विशेषज्ञों ने भी चिंता व्यक्त की है कि जून जुलाई का महीना संक्रमण को फैलाने वाला साबित हो सकता है। जाहिर है कि सरकारों को दीर्घ रणनीति बनानी होगी और मजदूरों को सामाजिक दूरी बनाकर रोजगार और उत्पादन की कड़ी शुरु करनी होगी ताकि देश में भगदड़ न मचे और कोरोना से होने वाली संभावित मौतों को टाला जा सके।

  • इंस्पेक्टर राज से उद्योगों को राहत

    इंस्पेक्टर राज से उद्योगों को राहत

    भोपाल,5मई(प्रेस सूचना केन्द्र) उद्योगों और श्रमिकों के हित में 4 केन्द्रीय और 3 राज्य अधिनियमों में संशोधन की अधिसूचना जारी कर दी गई है। इसके साथ ही लोक सेवा प्रदाय गारंटी अधिनियम में 18 सेवाओं को एक दिन में देने का प्रावधान किया जा रहा है। मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने अधिकारियों के साथ बैठक में विभिन्न अधिनियमों में प्रस्तावित संशोधनों में बिन्दुवार चर्चा कर कोरोना के बाद उत्पन्न स्थिति में आगामी एक हजार दिनों में उद्योगों को विभिन्न रियायतें देने की जरूरत बताई थी। श्री चौहान ने आज के प्रतिस्पर्धी दौर में निवेश बढ़ाने और श्रमिकों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से श्रम कानूनों में आवश्यक संशोधन के प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए थे।

    कारखाना अधिनियम 1948 के अंतर्गत कारखाना अधिनियम 1958 की धारा 6,7,8 धारा 21 से 41 (एच), 59,67,68,79,88 एवं धारा 112 को छोड़कर सभी धाराओं से नवीन उद्योगों को छूट रहेगी। इससे अब उद्योगों को विभागीय निरीक्षणों से मुक्ति मिलेगी। उद्योग अपनी मर्जी से थर्ड पार्टी इंस्पेक्शन करा सकेंगे। रजिस्टर के संधारण में छूट मिलेगी। फेक्ट्री इंस्पेक्टर द्वारा जाँच एवं निरीक्षण से मुक्ति मिलेगी। उद्योग अपनी सुविधा में शिफ्टों में परिवर्तन कर सकेंगे।

    मध्यप्रदेश औद्योगिक संबंध अधिनियम 1960 में संशोधन के साथ इस अधिनियम के प्रावधान उद्योगों पर लागू नहीं होंगे। इससे किसी एक यूनियन से समझौते की बाध्यता समाप्त हो जायेगी। औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 में संशोधन के बाद नवीन स्थापनाओं को एक हजार दिवस तक औद्योगिक विवाद अधिनियम में अनेक प्रावधानों से छूट मिल जायेगी। संस्थान अपनी सुविधानुसार श्रमिकों को सेवा में रख सकेगा। उद्योगों द्वारा की गयी कार्यवाही के संबंध में श्रम विभाग एवं श्रम न्यायालय का हस्तक्षेप बंद हो जायेगा।

    मध्यप्रदेश औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम 1961 में संशोधन के बाद 100 श्रमिक तक नियोजित करने वाले कारखानों को अधिनियम के प्रावधानों से छूट मिल जायेगी। इससे श्रमिक निष्ठापूर्वक उत्पादन में सहयोग करेंगे। मध्यप्रदेश श्रम कल्याण निधि अधिनियम 1982 के अंतर्गत जारी किये जाने वाले अध्यादेश के बाद सभी नवीन स्थापित कारखानों को आगामी एक हजार दिवस के लिये मध्यप्रदेश श्रम कल्याण मण्डल को प्रतिवर्ष प्रति श्रमिक 80 रूपये के अभिदाय के प्रदाय से छूट मिल जायेगी। इसके साथ ही वार्षिक रिटर्न से भी छूट मिलेगी।

    लोक सेवा प्रदाय गारंटी अधिनियम 2010 के अंतर्गत जारी अधिसूचना के अनुसार श्रम विभाग की 18 सेवाओं को पहले तीस दिन में देने का प्रावधान था। अब इन सेवाओं को एक दिन में देने का प्रावधान किया गया है। कारखाना अधिनियम 1948, दुकान एवं स्थापना अधिनियम 1958, ठेका श्रम अधिनियम 1970, अंतर्राज्यीय प्रवासी कर्मकार अधिनियम 1979, मोटर परिवहन कर्मकार अधिनियम 1961, मध्यप्रदेश भवन एवं अन्य संनिर्माण कर्मकार अधिनियम 1996 और बीड़ी एवं सिगार कामगार (नियोजन की शर्ते) अधिनियम 1966 में पंजीयन के लिये ऑनलाइन आवेदन करने पर एक दिन में ही ऑनलाइन पंजीयन मिल जाएगा। इससे पंजीयन के लिये बेवजह कार्यालयों के चक्कर काटने से मुक्ति मिलेगी।

    दुकान एवं स्थापना अधिनियम 1958 में संशोधन के बाद कोई भी दुकान एवं स्थापना सुबह 6 से रात 12 बजे तक खुली रह सकेगी। इससे दुकानदारों के साथ ही ग्राहकों को भी राहत मिलेगी। पचास से कम श्रमिकों को नियोजित करने वाले स्थापनाओं में श्रम आयुक्त की अनुमति के बाद ही निरीक्षण किया जा सकेगा। निरीक्षण में पारदर्शिता होगी। कारखानों को दो रिटर्न के स्थान पर एक ही रिटर्न भरना पड़ेगा।

    ठेका श्रमिक अधिनियम 1970 में संशोधन के बाद ठेकेदारों को 20 के स्थान पर 50 श्रमिक नियोजित करने पर ही पंजीयन की बाध्यता होगी। 50 से कम श्रमिक नियोजित करने वाले ठेकेदार बिना पंजीयन के कार्य कर सकेंगे। इस अधिनियम में संशोधन के लिये प्रस्ताव केन्द्र सरकार को भेजा गया है।

    कारखाना अधिनियम के अंतर्गत कारखाने की परिभाषा में विद्युत शक्ति के साथ 10 के स्थान पर 20 श्रमिक और बगैर विद्युत के 20 के स्थान पर 40 श्रमिक किया गया है। इस संशोधन का प्रस्ताव भी केन्द्र शासन को भेजा गया है। इससे छोटे उद्योगों को कारखाना अधिनियम के पंजीयन से मुक्ति मिलेगी। इसके पूर्व 13 केन्द्रीय एवं 4 राज्य कानूनों में आवश्यक श्रम संशोधन किये जा चुके हैं।

  • अफसरशाही की काली भेड़ें

    अफसरशाही की काली भेड़ें


    पी.नरहरि,सचिव जनसंपर्कः अफसरशाही को लांछन से बचाने का प्रयास

    कोरोना वायरस के हमले ने पूरी दुनिया को भयाक्रांत कर दिया है।एक अदृश्य शत्रु के हमले से चीन से लेकर अमेरिका, इटली, फ्रांस, ब्रिटेन,स्पेन जैसे मुल्क तबाही के दौर में पहुंच गए हैं। कोरोना ने भारत में भी अपने पैर पसार लिए हैं। संकट के इस दौर में कई समाजों,वर्गों और विचारों के लोगों का चरित्र भी उजागर होने लगा है। कहा भी गया है धीरज,धर्म,मित्र अरु नारी आपतकाल परखिए चारी।वायरस का संक्रमण फैलने से रोकने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपील के बाद पूरा देश लॉक डाऊन से गुजर रहा है। ऐसा पहली बार हुआ है कि हवाई और रेल सेवाएं भी पूरी तरह बंद कर दी गईं हैं। केवल परिवहन के लिए इन संसाधनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। देश भर में खाद्य वस्तुओं की आपूर्ति जारी रहे इसके लिए सरकार युद्ध स्तर पर जुटी हुई है। पूरा देश प्रधानमंत्री के आव्हान पर कोरोना महामारी को परास्त करने के उपाय ढूंढ रहा है और अपने स्तर पर अमल भी कर रहा है।इन हालात में राज्य सरकारें और उनके प्रशासनिक अमले पर काम का दबाव बढ़ता जा रहा है। किसी भी युद्ध में जिस तरह फौजों के सामने जीने और मरने की जद्दोजहद होती है उसी प्रकार इस समय सरकारी अमला भी चुनौतियों से गुजर रहा है। कई बहादुर अफसर अपनी हिकमत अमली से परिस्थितियों को नियंत्रित कर रहे हैं। कोरोना वायरस की कोई वैक्सीन अभी तक ईजाद नहीं हो पाई है। वैज्ञानिक जुटे हैं और यदि किसी देश का कोई दल वैक्सीन ईजाद भी कर लेता है तो वैक्सीन को बाजार में उतारने में लंबा समय लगने का अनुमान है। यही वजह है कि पूरी दुनिया में खौफ का माहौल है, लोगों को लगता है कि इस अदृश्य शत्रु के सामने उनकी बहादुरी टिक नहीं पाएगी। सरकार ने आम लोगों से अपील की है कि वे अपने घरों में रहें और संक्रमण फैलाने वाले वाहक न बनें। घरों में सफाई रखी जाए और वायरस के वसा से बने खोल को नष्ट करने के लिए डिटर्जेंट, साबुन, अल्कोहल युक्त हैंडवाश, ब्लीचिंग पाऊडर जैसे क्लोरीनीकरण करने वाले रसायनों, पोटेशियम परमेंगनेट जैसे आक्सीकरण एजेंटों का इस्तेमाल करके सफाई रखें। सरकारी दफ्तरों में भी इन रसायनों का प्रयोग करके सफाई रखी जा रही है। इसके बावजूद कई अफसर कोरोना की चपेट में आ गए हैं। उन्हें कोरोंटाईन करके घरों में और अस्पतालों में रखा जा रहा है उनका उपचार किया जा रहा है। शासन ने उन अफसरों की सैकेन्ड लाईन भी तैयार कर दी है। प्रथम पंक्ति के बीमार होने पर दूसरी पंक्ति जवाबदारी संभालेगी। ये व्यवस्था प्राचीन काल से हर युद्ध की परिस्थिति में अपनाई जाती है। इसके बावजूद पहली बार देखा जा रहा है कि कई अफसरों ने खुद को ड्यूटी से बचाने के लिए खुद को कोरोन्टाईन कर लिया है। वे भयभीत हैं और अपने ही घरों में रहकर जवाबदारी संभालने की बात कह रहे हैं। देश में कई स्थानों से अफसरों के आत्महत्या करने की खबरें भी आ रहीं हैं।अपनी चिट्ठियों में उन्होंने लिखा है कि काम का दबाव अहसनीय है।बेशक ये दौर बड़ा वेदनाभरा है। कोई भरोसा नहीं कि कोई व्यक्ति कब संक्रमण की चपेट में आ जाए और उसकी मौत की वजह बन जाए। संक्रमित व्यक्तियों के ठीक होने की दर भी बहुत अधिक है इसके बावजूद वैज्ञानिक इलाज न मालूम होने के कारण गारंटी नहीं है कि हर संक्रमित व्यक्ति बच ही जाएगा। अब इन हालात में अफसरों का जिम्मेदारियों से भागना कोई अचंभा नहीं है। इसके बावजूद बहाने बनाकर फर्जी सर्टिफिकेट लेकर खुद कोरेंटाईन कर लेना किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं हो सकता। हमारे देश की सरकारें अपने संसाधनों से जो आय अर्जित करती हैं उनका तीन चौथाई से भी अधिक हिस्सा सरकारी अमले को पालने पर खर्च किया जाता है। विकास योजनाओं को पूरा करने के लिए सरकारें कर्ज लेती हैं और जिसका ब्याज जनता को चुकाना पड़ता है। इसलिए जनता के खजाने से वेतन लेने वाले अफसरों की जवाबदारी और भी अधिक बढ़ जाती है। वे घरों में घुसकर इस युद्ध को नहीं जीत सकते। बेशक उन्हें शहादत देनी पड़ सकती है पर इसकी चिंता करने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है। आम जनता का पेट काटकर अब तक उन्हें पाला जाता रहा है। न उत्पादकता बढ़ाने का दबाव और न ही धंधे में घाटे का खौफ,दिन भर की अफसरी और शाम को क्लब हाऊसों में मजा मौज इन अफसरों की जिंदगानी रही है। अब जबकि 21 दिनों के लॉक डाऊन में आम जनता मूलभूत जरूरतों के लिए वंचित है तब अफसरों का तंत्र यदि मैदान से रफूचक्कर हो जाएगा तो फिर जन समस्याओं का निवारण कैसे हो पाएगा।प्रदेश के जनसंपर्क सचिव पी.नरहरि ने इस मुद्दे पर चल रहीं खबरों को देखते हुए बाकायदा अपील की है कि अफसरों की बहानेबाजी की खबरें भ्रामक हैं। सभी अफसर अपना काम मुस्तैदी से कर रहे हैं। यदि वे बीमार हो जाते हैं तो इसे उनकी गैरजिम्मेदारी न बताया जाए। उनकी बात सही है अफसरों पर बेवजह लांछन लगाना उचित नहीं है। अब तक केवल सरकारी तंत्र ही तो है जो कानून और व्यवस्था संभाले हुए है। संकट के इस दौर में समस्या को समझना जरूरी है। तभी समाधान खोजा जा सकता है।अब तक सरकारी तंत्र में चापलूसों को जो महत्व दिया जाता रहा है उनकी वजह से ही सरकारी तंत्र पर अंगुलियां उठ रहीं हैं। ये समय कसावट का है। चापलूसों की भीड़ भले ही घरों में छुप जाए पर योद्धा अफसर तो मैदान में डटे ही हैं। इसलिए सिरे से सरकारी व्यवस्था को खारिज करना नाइंसाफी होगी,इसके बावजूद अफसरशाही में घुसी काली भेड़ों की पहचान तो उजागर होनी ही चाहिए।

  • दिल्ली से मजदूरों को किसने खदेड़ा

    दिल्ली से मजदूरों को किसने खदेड़ा

    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब देश में 21 दिनों के लॉक डाऊन की घोषणा की तो लोगों को लगा कि ये कैसे संभव होगा। प्रधानमंत्री ने हाथ जोड़कर अपील की और कहा कि लॉक डाऊन का मतलब पूरा बंद है। रेल और बसों का परिवहन भी रोक दिया गया। हवाई मार्ग पर भी रोक लगा दी गई। इसके बावजूद कुछ राज्यों में मजदूरों के घर लौटने की कवायद जारी है। प्रधानमंत्री ने राज्य सरकारों से जरूरत मंदों को खाना उपलब्ध कराने और खाद्य सामग्री की आपूर्ति जारी रखने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद केरल और दिल्ली से भारी संख्या में मजदूरों का पलायन हुआ है। दिल्ली में तो प्रशासनिक अधिकारियों ,मस्जिदों और आप पार्टी के कार्यकर्ताओं की ओर से ऐलान किया गया कि आपको डीटीसी की बसों से यूपी सीमा से लगे आनंद विहार बस अड्डे तक छोड़ा जा रहा है। योगी सरकार ने वहां बसें उपलब्ध कराईं हैं जिनसे आपको आपके घरों तक छोड़ा जाएगा। इस ऐलान के बाद हजारों लोगों की भीड़ बसों में भरकर यूपी बार्डर तक पहुंच गई।हजारों मजदूर तो पैदल ही घरों की ओर रवाना हो गए। जब उन्हें यूपी सरकार की बसें नहीं मिलीं तो वे पैदल ही बच्चों महिलाओं समेत अपने गांवों की ओर चल दिए।जब शोर मचा तो प्रशासन ने उनके लिए भोजन की व्यवस्था कराई और संक्रमण फैलने के खतरों के बीच इन मजदूरों को उनके घरों तक छोड़ा गया । इस पलायन ने पूरे देश में कोरोना संक्रमण फैलने की आशंका जगा दी है। राज्य सरकारों की गैर जिम्मेदारी का ये नमूना ठेठ दिल्ली में ही देखने मिला है।

    चीनी वायरस कोरोना के कहर से इन दिनों पूरी दुनिया हलाकान है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे महामारी घोषित किया है।भारत में लगभग एक हजार पचास मरीजों में कोरोना वायरस की पहचान की गई है। देश के विभिन्न अस्पतालों में उनका इलाज किया जा रहा है। इस वायरस के प्रति रोग प्रतिरोधक टीके के विकास के प्रयास चल रहे हैं लेकिन टीके का विकास इतनी जटिल प्रक्रिया है कि उसे तत्काल न तो बनाया जा सकता है और न ही पूरी दुनिया में उसे उपलब्ध कराया जा सकता है। भारत की विशाल आबादी के बीच इसे फैलने से बचाने के लिए आईसीएमआर और देश के विशेषज्ञों ने त्वरित उपाय के रूप में रोग के प्रसार की कड़ी तोड़ने की सलाह दी थी। ये तभी संभव था कि जब 130करोड़ लोगों को उनके घरों में ही रोक दिया जाए। चीन के वुहान राज्य में फैले कोरोना संक्रमण के बाद चीनी सरकार ने लगभग तीन अरब लोगों को अपने घरों में कैद करने का विशाल अभियान चलाया था। चीनी पुलिस और सेना ने लोगों को घरों तक सीमित करने के लिए सख्त कवायद की तब जाकर संक्रमण का फैलाव रोका जा सका। विश्व के अन्य देशों से सबक लेकर ही भारत में संपूर्ण लॉक डाऊन का फैसला लिया गया। इससे विश्व के कई देशों की तरह भारत की अर्थव्यवस्था को भी भारी क्षति पहुंचने का अंदेशा है, इसके बावजूद कोई अन्य विकल्प नहीं था।

    अमेरिका, इटली, जर्मनी,आस्ट्रेलिया ने चीन की स्थितियों से सबक नहीं लिया। नतीजतन इन देशों में कोरोना संक्रमण से मरने वालों की तादाद चीन के आंकड़ों को भी पार कर गई। भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने डाक्टरी सलाह को पूरे देश में लागू किया और संक्रमण दो चरण पार होने के बाद भी तीसरे चरण में नहीं पहुंच पाया है। तीसरे चरण का मतलब है कि महामारी घर घर तक फैल जाए। यदि ऐसा हो जाता तो भारत की स्वास्थ्य सुविधाएं अचानक अस्पताल पहुंचने वाली मरीजों की भीड़ से नहीं निपट सकती थीं। वैसे भी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिहाज से भारत दुनिया में 120 देशों के पीछे खड़ा है। भारत में सरकारी ढांचे की विफलताओं के बाद बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य को उद्योग का दर्जा देकर निजी निवेश से स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार के प्रयास किए गए हैं लेकिन इससे भारत के लोगों पर दोहरा बोझ पड़ रहा है। उन्हें इलाज निजी अस्पतालों में करवाना पड़ता है जबकि सरकारी तंत्र को पालने के लिए अपनी जेब से मोटी रकम खर्च करनी पड़ती है। मूर्खतापूर्ण ढंग से किए गए घटिया सरकारीकरण जिस तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा उसे देखकर कोरोना संकट ज्यादा भयावह नजर आने लगा है। अमीर देशों की स्वास्थ्य सुविधाएं जब कोरोना का कहर आते ही चरमरा गईं तो भारत में तो इसकी भयावहता का अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। मजदूरों के कल्याण का नारा देने वाली केरल की कम्युनिस्ट सरकार हो या कांग्रेस और कम्युनिस्ट की संकर सोच से उपजी दिल्ली की आप पार्टी सरकार सभी ने मजदूरों को उकसाकर वोट कबाड़ने की जो रणनीति अपनाई उससे कोरोना संकट का खतरा बढ़ गया है। इन सरकारों को लगा कि यदि कोरोना संकट बढ़ा तो हमारे अस्पताल आबादी के बोझ को सहन नहीं कर पाएंगे इसलिए भविष्य की बदनामी से बचने के लिए उन्होंने मजदूरों को खदेड़ना शुरु कर दिया। जब औद्योगिक विकास के लिए उन्हें मजदूर मिल रहे थे तो वे खुश थे क्योंकि इससे उन्हें राज्य में टैक्स अधिक मिलता था। लेकिन जब महामारी के आसन्न संकट का बोझ आता दिखा तो उन्होंने मजदूरों से सबसे पहले पिंड छुड़ाया। इस तरह की अमानवीयता दिल्ली की वो आप पार्टी सरकार कर रही है जिसने मोहल्ला क्लीनिक के नाम पर पूरे देश में स्वास्थ्य सुविधाओं का ढिंडोरा पीटा था। अब जबकि केन्द्र सरकार ने नाराजगी व्यक्त करते हुए वरिष्ठ अधिकारियों पर गैर जिम्मेदारी से काम करने की वजह से उन्हें हटाना शुरु कर दिया है तब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल टीवी पर आकर लोगों से अपने ही घरों में रुके रहने की अपील कर रहे हैं। भारत की राजनीति का ये अंधियारा पक्ष है जिसकी वजह से भारत आज भी छोटी सोच वाले विकासशील देश से आगे नहीं बढ़ पा रहा है। महामारी जैसे संकट से निपटने के लिए राज्यों की सरकारें यदि देश की नीति के साथ कदमताल नहीं कर पा रहीं हैं तो फिर इन सरकारों को बर्खास्त करके वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाना चाहिए ताकि देश को महामारी के प्रकोप से होने वाली क्षति से बचाया जा सके।

  • परिवारवाद पर संघवाद की विजय का शंखनाद

    परिवारवाद पर संघवाद की विजय का शंखनाद

    शिवराज सिंह चौहान के चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही ये भी साबित हो गया है कि मध्यप्रदेश में संघवाद ने परिवारवाद को परास्त कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी की अब तक की विकासयात्रा में ये सबसे महत्वपूर्ण चरण था जिसमें कभी कांग्रेस के सुपरस्टार राजनेता रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सारी बाधाएं तोड़कर सत्ता की कमान उसे थमाई है। ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस के जिन 22 पूर्व मंत्रियों और विधायकों ने आगे बढ़कर कुंठित कमलनाथ सरकार के षड़यंत्रों को धराशायी किया वह परिवारवाद पर सबसे प्रभावी प्रहार साबित हुआ। कमलनाथ के नेतृत्व वाली कमलनाथ सरकार ने लगभग पंद्रह महीने के शासनकाल में वैमनस्यपूर्ण तरीके से प्रदेश के विभिन्न वर्गों को प्रताड़ित किया वह अब आपातकाल की तरह एक कलंकित इतिहास बन गया है। कांग्रेस के नेतागण भाजपा के बहाने जनता को गालियां देते रहे उससे मध्यप्रदेश का माहौल कलहपूर्ण बन गया था। आपराधिक वारदातों के बढ़ते आंकड़े और आर्थिक दुर्दशा से मुक्ति का ये स्वप्न इतनी जल्दी साकार हो सकेगा इसका अनुमान शायद भाजपा के शीर्ष नेताओं को भी नहीं था।

    शपथ लेने से पहले विधायक दल ने जब शिवराज सिंह चौहान को अपना नेतृत्व सौंपा तब शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि मैं कभी अपनी मां समान पार्टी को कलंकित नहीं होने दूंगा। साथ में उन्होंने दुहराया कि अब हम मिलजुलकर विकास का नया इतिहास लिखेंगे। उनके हर भाषण में ज्योतिरादित्य सिंधिया और कांग्रेस के विधायकों के प्रति आभार का भाव था। शायद शिवराज सिंह चौहान की यही विनम्रता उन्हें अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों के बीच अजात शत्रु बनाती है। यही वजह है कि पिछले विधानसभा चुनावों में माफ करो महाराज का नारा देने वाली शिवराज की भाजपा आज ज्योतिरादित्य सिंधिया से टकराव की वजह नहीं बन रही है।

    कांग्रेस के नेताओं को अब भी भरोसा नहीं हो पा रहा है कि उन्होंने अपनी ही कुल्हाड़ी से कैसे अपने ही पैरों को लहू लुहान कर डाला है। दरअसल पिछले पंद्रह सालों के दौरान राजनीति जो करवट ले चुकी है उसका अनुमान बुजुर्ग हो चुके कमलनाथ नहीं लगा पाए थे। उनका राजनीतिक दंभ ये समझने को तैयार ही नहीं था कि किसी विभागीय मंत्रालय की कार्यप्रणाली और प्रदेश के मुखिया की कार्यप्रणाली में भारी अंतर होता है। प्रदेश के मुखिया से लोगों की अपेक्षाएं होती हैं जिन्हें गैरकानूनी तबादले पोस्टिंग की कमीशनखोरी के अलावा भी अन्य साधनों से पूरा किया जा सकता है। कांग्रेस आज भी राबिनहुड की शैली की कबीलाई संस्कृति से बाहर नहीं आ सकी है। नेताओं के इर्द गिर्द बना कांग्रेस का संगठन केवल चंद हजार कार्यकर्ताओं की जरूरतें पूरी करने तक ही सिमटा रहा। जबकि प्रदेश के साढ़े सात करोड़ लोग अपनी अपेक्षाओं के लिए सरकार के प्रति उम्मीदें लगाए बैठे रह गए।

    कमलनाथ ने सरकारी तंत्र को अपनी आय का स्रोत मान लिया था।उनका सारा ध्यान सरकारी तंत्र को निचोड़ने में ही लगा रहा। शिवराज सिंह चौहान की विनम्रता को मूर्खता बताने वाले कमलनाथ ने सरकारी तंत्र को जूते की नोंक पर ऱखकर सरकार चलाने का जो प्रयोग किया वह चंद दिनों में ही धराशायी हो गया। अफसरशाही ने कमलनाथ के निर्देशों पर सौ फीसदी अमल शुरु कर दिया और जनहितैषी योजनाओं की समीक्षा सख्ती से कर डाली। नतीजा ये हुआ कि जो योजनाएं जनता के लिए सहारा बनी हुईं थीं वे दूर की कौड़ी साबित होने लगीं। परिवारवाद के एजेंट के रूप में कमलनाथ को गांधी परिवार ने मध्यप्रदेश भेजा था। वे सोनिया गांधी के विश्वसनीय थे इसलिए उन्होंने जागीरदार की तरह पार्टी हाईकमान के लिए चंदा वसूली शुरु कर दी। उनका सारा ध्यान प्रदेश के उस सरकारी तंत्र पर था जिसे राज्य के खजाने से हर महीने तीन हजार दो सौ करोड़ रुपए वेतन के रूप में दिए जाते हैं। अफसरों को टारगेट दिए गए कि उन्होंने टैक्स वसूली का टारगेट पूरा नहीं किया तो उन्हें वेतन नहीं दिया जाएगा। कई विभागों में वेतन बांटने का विलंब शुरु हो गया दो तीन महीनों का वेतन लंबित रहना सामान्य बात हो गई थी। यही वजह है कि कमलनाथ सरकार बड़ी तेजी से अलोकप्रिय हो गई।

    शिवराज सरकार ने पंद्रह सालों के प्रयोग के बीच ढेरों ऐसी योजनाएं चालू कीं थीं जिनसे आम जनता को सत्ता में भागीदार बनाया गया था। बेशक वे योजनाएं उत्पादक नहीं थीं लेकिन बाजार व्यवस्था को संतुलित बनाने में उनका योगदान अतुलनीय था। शिवराज की निवृत्तमान सरकार की सबसे बड़ी असफलता ये थी कि इतना लंबा अंतराल सत्ता पर काबिज रहने के बावजूद वह उत्पादकता नहीं बढ़ा पाई थी।इस वजह से हर महीने खजाने पर बोझ बढ़ता जा रहा था। पूर्व वित्तमंत्री राघवजी भाई ने आय को बढ़ाने का जो चमत्कार कर दिखाया था उससे ढेरों योजनाएं शुरु हो पाईं थीं। राघवजी भाई इससे अधिक योजनाएं चालू करने के पक्षधर नहीं थे क्योंकि इससे राज्य का वित्तीय प्रबंधन बिगड़ सकता था। उनकी विदाई के बाद शिवराज ने खजाने की चाभी जयंत मलैया को सौंप दी। मलैया उदार साबित हुए लेकिन इससे खजाना लुट गया। उनकी खजाना खाली है वाली प्रतिक्रिया को कमलनाथ ने सूत्र वाक्य बना लिया और अपने पूरे कार्यकाल में जन प्रतिनिधियों की मांग को शांत करने के लिए खजाना खाली है का राग अलापते रहे। जबकि उनके स्वयं के जिले छिंदवाड़ा में योजनाओं की बाढ़ लग गई। लगभग एक सौ तेरह हजार करोड़ रुपए की योजनाएं अकेले छिंदवाड़ा जिले में शुरु कर दीं गईं। इससे विधायकों में असंतोष फैल गया।

    ज्योतिरादित्य से कोटे से सत्ता में आए विधायकों की बैचेनी की वजह भी यही थी कि अफसर शाही उनकी बात ही नहीं सुन रही थी। कमलनाथ ने अफसरों की तैनाती की जवाबदारी दिग्विजय सिंह को ही सौंप दी थी। यही कहा जाने लगा था कि पर्दे के पीछे सरकार दिग्विजय सिंह चला रहे हैं। ये सच भी था, मंत्रालय से लेकर जिलों तक की कमान दिग्विजय़ सिंह के इशारे पर ही दी गई थी। उनके बेटे जयवर्धन सिंह को जिस तरह नगरीय प्रशासन विभाग देकर कमाई के अवसर दिए गए उससे विधायकों में असंतोष बढ़ गया। चुनाव के दौरान बेरोजगार युवाओं को चार हजार रुपए का बेरोजगारी भत्ता देने का झूठा वादा दिग्विजय सिंह की चतुराई भरी चाल थी जबकि सत्ता में आने के बाद वह योजना चालू ही नहीं की जा सकी।इतनी शर्ते लगाईं गईं कि योजना का लाभ युवाओं को दिया ही नहीं जा सकता था। जबकि निजी कमाई के लिए शहरों के मास्टर प्लान धड़ाधड़ लाए गए और शहरों में अराजकता का माहौल बना देने की तैयारी शुरु हो गई। यदि ये तख्तापलट न की जाती तो शहरों के रहवासी इलाकों में आम नागरिकों का रहना भी दूभर हो जाता।

    कमलनाथ सरकार ने जिस तरह राज्य को चंद परिवारों तक समेटने की मुहिम चलाई उसका लाभ उनके चंद उद्योगपति मित्रों को तो मिलना शुरु हो गया लेकिन आम जनता के पाले में सिर्फ प्रताड़ना आई। जनता को लूटकर परिवार को संवारने की ये शैली लोकतांत्रिक लगे इसके लिए कर्जमाफी और सस्ती बिजली का शिगूफा इस्तेमाल किया गया। इन योजनाओं का शोर तो बहुत हुआ लेकिन आम जनता फायदे का इंतजार करती रही। जिन आदिवासियों को बरगलाकर कमलनाथ ने उनकी बहुलता वाली सीटें जीतीं थीं जल्दी ही उनकी भी समझ में आ गया कि वे ठगे गए हैं। ब्राह्रमणों को बरगलाकर जिस सवर्ण समाज पार्टी ने शिवराज के बयान कोई माई का लाल आरक्षण समाप्त नहीं कर सकता को बदनामी का हथकंडा बनाया था उन्हें भी जल्दी अहसास हो गया कि उन्होंने कितनी बड़ी गलती की है।

    दरअसल आजादी की चाहत में देश ने कांग्रेस के जिस परिवारवाद को स्वीकार किया था उसे हटाने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी है। कांग्रेस जिस धर्मनिरपेक्षता की आड़ में टुकड़े टुकड़े गेंग बनकर समाज को विभाजित करती रही वहीं संघ समाज को जोड़ने की मुहिम चलाता रहा। संघ के करोड़ों कार्यकर्ताओं ने एक राष्ट्र के विचार के लिए अपने जीवन के स्वर्णिम बसंत न्यौछावर कर दिए हैं। इसके बाद भी उन्हें लांछन और बदनामियां ही झेलनी पड़ीं। बरसों के प्रयासों के बाद जब ज्योतिरादित्य जैसे युवा सितारे ने भाजपा में शामिल होकर संघ के सामाजिक सौहार्द्र के विचार पर अपनी मुहर लगाई है तब जाकर भारतीय जनता पार्टी को वैचारिक विजयश्री का आश्वासन मिल सका है। जो लोग ज्योतिरादित्य को गद्दार या अवसरवादी बताकर लांछित कर रहे हैं उन्हें जल्दी ही समझ में आ जाएगा कि लोगों को जोड़ने का ये विचार कैसे सबल राष्ट्र का प्रणेता साबित होता है। कोई लीडर कैसे समाज को हितकारी लक्ष्यों की ओर प्रवृत्त कर देता है।फिलहाल तो शिवराज सरकार को अपने पुराने ढर्रे से बाहर निकलकर अपनी पार्टी की मौलिक शैली का उद्घोष करना होगा। यही शैली संघवाद की विजयपताका साबित होगी।

  • छिंदवाड़ा मॉडल का फटा ढोल

    छिंदवाड़ा मॉडल का फटा ढोल

    कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाने के लिए कांग्रेस के जिन सयाने रणनीतिकारों ने छिंदवाड़ा मॉडल का ढोल पीटा था वे अब कहां हैं। जब छिंदवाड़ा माडल की कहानियां सुनाते कमलनाथ की कुंठित सत्ता का ढोल सरे चौराहे फट गया है तब वे सलाहकार जनता के सामने आने का साहस क्यों नहीं कर रहे हैं। कांग्रेस की सरकार के पतन के लिए असली जिम्मेदार तो वे ही हैं जिन्होंने कमलनाथ की उद्योगपति वाली छवि गढ़ने का काम किया था। नेहरू गांधी परिवार के कारिंदे के रूप में कमलनाथ बेहद असफल मुख्यमंत्री साबित हुए हैं। उन्होंने दस जनपथ के लिए रसद पानी जुटाने में भले ही सफलता पाई हो लेकिन मध्यप्रदेश की धरती पर वे एक लुटेरे शासक के रूप में ही पहचाने जाएंगे।सारी योजनाएं छिंदवाड़ा ले जाने और अन्य क्षेत्र के विधायकों के लिए खजाना खाली बताने की उनकी कंजूसी ने विधायकों को बेचैन कर दिया था। आते ही तबादलों और पोस्टिंग का जो ओछा कारोबार उन्होंने शुरु किया उसने प्रदेश भर में कोहराम मचा दिया।कांग्रेस की पिछली सरकारों ने ही अनाप शनाप नौकरियां बेचकर मध्यप्रदेश के वित्तीय प्रबंधन का कबाड़ा निकाला था। बाद की भाजपा सरकारों ने भी उसी माडल की लीक पकड़ ली। शिवराज सरकार के सलाहकार दिग्विजय सिंह और मुकेश नायक जैसे कांग्रेसी ही रहे हैं। लूट का जो साम्राज्य शिवराज सिंह चौहान की हवा हवाई शासनशैली की वजह से पनपा उससे प्रदेश में असंतोष को जगह बनाने का अवसर मिला था। शिवराज सिंह चौहान बेहद सफल कार्यकर्ता और प्रचारक रहे हैं।उन्होंने जनता के बीच लोकप्रियता भी पाई। इसके विपरीत वे कई मायनों में असफल भी साबित हुए। उन्होंने वोटरों की खेती की। तालियां बजवाने के लिए खैरातें बांटीं लेकिन वे प्रदेश को आत्मनिर्भर नहीं बना सके। इसे गरियाते कमलनाथ तो और भी फिसड्डी साबित हुए।उन्होंने आते ही जो झांकी पेली कि लोगों को लगा अब प्रदेश की समस्याओं का समाधान हो जाएगा। प्रदेश के मिलावटखोरों के खिलाफ शुद्ध के लिए युद्ध करते कमलनाथ का स्वागत किया गया लेकिन वे व्यापारियों के लुटेरे साबित हुए। उनके कार्यकाल में व्यापारियों से जो लूट खसोट की गई वह दर्दनाक थी। इसका सीधा असर प्रदेश की जनता पर पड़ा। व्यापारियों ने जरूरी सामानों की कीमतें बढ़ा दीं। अफसरों ने वसूली बढ़ा दी लेकिन मिलावटखोरी जस की तस रही। शहरों के मास्टर प्लान में अराजकता फैलाने के लिए भी कमलनाथ सरकार को कभी माफ नहीं किया जा सकेगा। रहवासी इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियां शुरु कर देना, अवैध संपत्तियों को रिश्वत लेकर वैध बना देना कमलनाथ के कारिंदों के लिए बाएं हाथ का खेल था। जिस तरह मंत्रालय के पांचवे तल पर कमलनाथ का गोपनीय आफिस चलता था उसे देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता था कि यहां कोई न कोई गलत काम जरूर हो रहा है। जनता से छिपाकर आखिर वे कौन सी जनता का भला करना चाह रहे थे। उनके कार्यकाल के फैसलों की विधिवत समीक्षा होनी चाहिए।इनमें से बहुत से फैसले निरस्त करने पड़ेंगे। प्रदेश की कानून व्यवस्था की स्थिति हो या वित्तीय व्यवस्था सभी की समीक्षा नए सिरे से करनी होगी तब जाकर पटरी से उतरी प्रदेश की गाड़ी को सीधा किया जा सकेगा। छिंदवाड़ा माडल का फटा ढोल तो सबने देख लिया है अब उस ढोल की पोल भी लोगों को दिखानी पड़ेगी। प्रयास करना होगा कि भविष्य में कोई राजनीतिक दल या सत्ता के दलालों का कोई गिरोह मध्यप्रदेश की सत्ता पर काबिज न हो सके। इसके लिए मौजूदा दलालों की फौज का सफाया करना जरूरी होगा।

  • इस कंबल परेड से सुधार की उम्मीद बेकार

    इस कंबल परेड से सुधार की उम्मीद बेकार

    रैगिंग की भाषा में बोला जाए तो इन दिनों मुख्यमंत्री कमलनाथ की कंबल परेड चल रही है। कांग्रेस के विधायकों ने सरकार की जो धुलाई की है उससे पार्टी के बड़े बड़े दिग्गजों की सांसें भी फूल गईं हैं। भाजपा तो अंधे के हाथों बटेर लग जाने से प्रसन्न है। कमलनाथ सरकार जितने दिनों तक इस बगावत को काबू में नहीं कर पाएगी उतने दिनों तक ये धुलाई जारी रहेगी। मुख्यमंत्री कमलनाथ कह रहे हैं कि हम सदन में पहले भी बहुमत साबित कर चुके हैं लेकिन अब ये हालत हो गई है कि कोई भी ऐरागैरा आकर बहुमत साबित करने का चैलेंज देने लग जाता है। दरअसल ये कमलनाथ सरकार की अलोकप्रियता का उद्घोष है जो वे स्वयं कर रहे हैं। सलाहकारों की बात मानकर उन्होंने विधायकों को कथित तौर पर बंधक बनाए रखने के मुद्दे पर पुलिस में प्राथमिकी दर्ज नहीं कराई है। यदि वे ऐसा कर देते तो साफ उजागर हो जाता कि उनकी सरकार अल्पमत में आ गई है। आज दिग्विजय सिंह ने जिस तरह बैंगलौर जाकर बागी विधायकों से मिलने के लिए धरना दिया उसे देखकर कहा जा सकता है कि बगावत के मैनेजर भाजपा के रणनीतिकारों की सलाह पर नहीं चल रहे हैं। दिग्विजय सिंह को विधायकों से न मिलने देने का फैसला बड़ा बचकाना था। यही वजह है कि दिग्विजय सिंह विधायकों को बंधक बनाए रखने का शोर मचा रहे हैं। उनका कहना है कि वे विधायकों को बंधक बनाए रखने के मुद्दे पर कर्नाटक हाईकोर्ट जाएंगे। कमलनाथ सरकार के तमाम रणनीतिकार और अदालत में पैरवी कर रहे वकील पुष्पेन्द्र दुबे भी कह रहे हैं कि विधायकों को बंधक बनाकर रखा गया है। यदि आज दिग्विजय सिंह को विधायकों से मिलने का मौका दे दिया जाता तो खुद ब खुद साबित हो जाता कि विधायक बंधक नहीं हैं। कैमरों के सामने सार्वजनिक मुलाकात में विधायक हाथ जोड़कर दिग्विजय सिंह से वे सभी बातें कह सकते थे जो वे पहले अपने वीडियो जारी करते वक्त कह चुके हैं। वे इस मुलाकात के मंच का उपयोग करके सारी दुनिया को सुना सकते थे कि वे कमलनाथ सरकार के साथ नहीं हैं,जाहिर है कि विधानसभा के मंच से भी ज्यादा बड़े कैनवास पर कमलनाथ सरकार की कंबल परेड बेहतरीन तरीके से की जा सकती थी। ये तो आकलन हम लोग बाहर बैठकर लगा सकते हैं कि बगावत के रणनीतिकार गलती कर रहे हैं लेकिन हमारा आकलन हमेशा सही नहीं हो सकता। जिन विधायकों ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में बहादुरी भरा फैसला लिया और सरकार को नसीहत देने का कदम आगे बढ़ाया निश्चित रूप वे किसी न किसी रणनीति पर काम जरूर कर रहे हैं। सिंधिया समर्थक विधायक आज भी कह रहे हैं कि महाराज सिंधिया जो कहेंगे हम वही करेंगे। वे दरअसल देख चुके हैं कि जिन आर्थिक सुधारों से ज्योतिरादित्य प्रदेश का काया कल्प करना चाहते थे उन्हें कमलनाथ की पुरातनपंथी सरकार लागू नहीं कर रही थी। गोस्वामी तुलसी दास कह गए हैं कि मुखिया मुख सो चाहिए खानपान को एक पाले पौसे सकल अंग तुलसी सहित विवेक। कमलनाथ इस कसौटी पर फिसड्डी साबित हुए हैं। उन्होंने प्रदेश के विधायकों, जन प्रतिनिधियों, पत्रकारों, नागरिकों से दूरी बनाई और मनमाने ढंग से बजट खर्च करने का अभियान चलाया। जनता को हित वंचित करके अपने सहयोगियों पर बेइंतहा संसाधन लुटाए और अपनी स्थिति मजबूत की। उम्र के असर से उनकी दृष्टि कमजोर हो गई है। उन्होंने अकेले छिंदवाड़ा में लगभग तेरह हजार करोड़ के निर्माण कार्य स्वीकृत करवा लिए और अन्य विधानसभा क्षेत्रों को रीता छोड़ दिया। यही वजह है कि साल भर से चेताने के बावजूद जब कमलनाथ जी की आदतें नहीं बदलीं तो उन्होंने विद्रोह जैसा फैसला किया। आजादी की लड़ाई में भी जब अंग्रेजों ने लूट का शोषणवादी तंत्र चलाया था तब भारत में विद्रोह की चिंगारी भड़की और दावानल बनी थी। आज के हिंदुस्तान में कमलनाथ की कूढ़ मगज सोच को आखिर कैसे झेला जा सकता था। जिस इंस्पेक्टर राज को नरसिम्हाराव की सरकार के कार्यकाल में डाक्टर मनमोहन सिंह दफन कर चुके थे उसे कमलनाथ दोबारा थोपने में जुटे थे। शुद्ध के लिए युद्ध के नाम पर व्यापारियों का शोषण और लूट का जो दुष्चक्र कमलनाथ सरकार ने चलाया उससे प्रदेश भर में जन आक्रोश भड़क गया था। तबादलों के माध्यम से पोस्टिंग का खुला खेल जिस तरह से साल भर में देखा गया उसने प्रदेश में अराजकता की स्थितियां निर्मित कर दीं हैं। बढ़ते अपराधों ने प्रदेश की शांति व्यवस्था भंग कर दी है। इसके बावजूद कमलनाथ दंड और दमन का दुष्चक्र चलाने में जुटे हैं। इतनी तगड़ी धुलाई के बाद भी उनकी भाषा शैली नहीं बदली है। पिछले दिनों जब उनसे पूछा गया कि ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा है कि कर्मचारियों और नागरिको से किए वादे पूरे नहीं हुए तो वे सड़क पर उतर जाएंगे तो कमलनाथ ने लगभग दुत्कारते हुए कहा, तो उतर जाएं। इस तरह की भाषा शैली और रवैये के बाद भी यदि कांग्रेस के विधायक चुप थे तो ये उनकी भलमन साहत थी। भाजपा में तो इस तरह के बर्ताव को कैडर की वजह से झेला जा सकता है लेकि कांग्रेस में जहां लीडरशिप आधारित संगठन हो वहां इस तरह के तुर्रमखां को कब तक बर्दाश्त किया जा सकता था। आज सारा दारोमदार ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों के रुख पर निर्भर कर रहा है। यदि वे अपने फैसले पर कायम रहते हैं तो कोई वजह नहीं कि कमलनाथ सत्ता से अपदस्त कर दिए जाएंगे। भाजपा के साथ शामिल होकर ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रदेश को एक अग्रगामी विकास की दिशा दे सकते हैं। लेकिन अब तक ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है। कांग्रेस के भीतर की ये बगावत यदि सफल हो जाती है तो ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रदेश के कद्दावर नेता के रूप में उभर जाएंगे। महल से अदावट रखने वाले भाजपाई ये नहीं चाहते। जाहिर है कि प्रदेश की आधुनिक आवश्यकताओं की कसौटी पर फेल हो चुके शिवराज सिंह चौहान भी नहीं चाहते कि भाजपा में कोई उनसे बड़ा लीडर बनकर उभरे। इसके बाद सत्ता की हांडी टूटने की आस लगाए बैठे नरेन्द्र सिंह तोमर, कैलाश विजयवर्गीय, नरोत्तम मिश्रा, भूपेन्द्र सिंह, गोपाल भार्गव भी नहीं चाहते कि गोविंद राजपूत और तुलसी सिलावट जैसे धाकड नेता उनके सामने चुनौती के रूप में उभरें। इन हालात में भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व को हस्तक्षेप करना पड़ेगा। यदि भाजपा का अंदरूनी महाभारत थम जाता है और ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा के नेताओं का साथ पाकर इस बगावत को सफल बना लेते हैं तो फिर प्रदेश को अबकी बार भाजपा और कांग्रेस की संकर सरकार मिलेगी जो प्रदेश के हितरक्षण के लिए नए कीर्तिमान स्थापित करेगी। ज्योतिरादित्य सिंधिया की बुआ वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे सिंधिया संगठन को किस सीमा तक बांधने में सफल होती हैं बगावत की सफलता उसी से आकी जाएगी। कमलनाथ तो इस बगावत को कुचलने की पूरी तैयारी कर रहे हैं। फिलहाल उन्हें सत्ता जाने की संभावनाओं से डरे हुए कांग्रेस विधायकों का समर्थन मिल रहा है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से यदि पलड़ा भाजपा के पक्ष में झुकता है तो कमलनाथ सरकार का अल्पमत संकट और भी ज्यादा गहरा हो जाएगा। देखना होगा कि ये बगावत सफल होती है या फिर आत्मसमर्पण की चौखट चूमती है। दोनों ही स्थितियों में कमलनाथ इस कंबल परेड से कोई सबक लेंगे इसकी संभावना फिलहाल तो नहीं दिखती।

  • कमलनाथ की कुर्सी बचाने में जुटे गोपाल रेड्डी

    कमलनाथ की कुर्सी बचाने में जुटे गोपाल रेड्डी

    भोपाल,17 मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)। तेज तर्रार आईएएस गोपाल रेड्डी को प्रदेश का प्रशासनिक मुखिया बनाकर मुख्यमंत्री कमलनाथ अपनी सत्ता के विरुद्ध हुई बगावत को काबू में करने का जतन करने में जुट गए हैं।रेड्डी के पद संभालते ही जेल विभाग ने पुरानी जेल के परिसर और भेल दशहरा मैदान को अस्थायी जेल में बदलने का आदेश जारी कर दिया है। ये तैयारी आने वाले दिनों में होने वाले किसी संभावित विद्रोह को देखते हुए की जा रही है। कमलनाथ यदि सुप्रीमकोर्ट और विधानसभा को धता बताते हुए कुर्सी छोड़ने पर राजी नहीं होते हैं तो संभावित जनांदोलनों पर नियंत्रण करने के लिए ये तैयारियां काम आ सकेंगीं।

    जेल विभाग के अवरसचिव अजय नथानियल ने विधानसभा के कार्यकाल के दौरान 13 अप्रैल तक ये नए जेल परिसर मान्य किए हैं। सरकार के खिलाफ होने वाले संभावित आंदोलनों में यदि अधिक लोग शामिल होते हैं तो उन्हें जेल पहुंचाने के बजाए इन परिसरों में ही निरुद्ध किया जा सकेगा। पुलिस और प्रशासन के बीच तालमेल जमाते हुए इस फैसले में प्रभारी पुलिस मुखिया रहे राजेन्द्र कुमार की सलाह की भूमिका मानी जा रही है।

    डीजी प्रशासन अकादमी बनाए गए सुधीरंजन मोहंती का कार्यकाल समाप्त होने के लगभग दो हफ्ते पहले की गई रेड्डी की नियुक्ति की वजह समझने में लोग सफल हो पाएं इससे पहले रेड्डी ने अपनी प्रशासनिक क्षमताओं पर पूरी तरह अमल शुरु कर दिया है।वे अपने त्वरित और दूरगामी फैसलों के लिए जाने जाते रहे हैं।

    सुधीरंजन मोहंती को इस महीने होने वाले रिटायरमेंट के बाद विद्युत नियामक आयोग का चेयरमेन बनना है। मुख्य सचिव पद पर रहते हुए ये नियुक्ति फिलहाल संभव नहीं थी। भले ही मुख्यमंत्री आदेश दे दें पर उसके ऊपर अमल तो मुख्य सचिव को ही करना पड़ता है। सरकार के खिलाफ उठी बगावत और अस्थिरता की स्थिति में यदि कमलनाथ सरकार बर्खास्त कर दी जाती है या सदन में बहुमत खो देती है तो फिर विद्युत नियामक आयोग की नियुक्ति का फैसला लटक सकता था। मुख्य सचिव के लिए ओएसडी बनाए जा चुके गोपाल रेड्डी की नियुक्ति भी नए हालात में खटाई में पड़ सकती थी।

    गोपाल रेड्डी ने पदभार संभालते ही अपने अनुकूल प्रशासनिक कसावट भी शुरु कर दी है। वे 1985 बैच के आईएएस हैं और लंबे समय से प्रदेश की प्रशासनिक जमावट से परिचित रहे हैं। समाज के सभी वर्गों से उनका जुड़ाव रहा है। ऐसे में माना जा रहा है कि कमलनाथ सरकार के खिलाफ उठ रहे असंतोष के स्वरों को वे संतुष्टि की आवाजों में बदल सकेंगे। इसके बावजूद फिलहाल कमलनाथ से नाराजगी के स्वर बहुत तेज हैं और उन्हें काबू में रखने के लिए राजदंड का प्रयोग करने की जरूरत भी पड़ रही है और नए मुखिया ने इस भूमिका पर अमल भी शुरु कर दिया है।

  • सत्ता के बूट से नहीं कुचली जाएगी ये बगावत

    सत्ता के बूट से नहीं कुचली जाएगी ये बगावत

    भोपाल,17मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)।मुख्यमंत्री कमलनाथ की कांग्रेस सरकार विदाई की बेला में है। उनकी पार्टी के ही 22 विधायकों ने अपनी सरकार के खिलाफ बगावत कर दी है। सरकार का प्रयास है कि उन विधायकों को डरा धमकाकर या पुटियाकर अपने खेमे में वापस लौटा लिया जाए और सरकार बचा ली जाए। बगावत को कुचलने के लिए कमलनाथ ने मुख्यसचिव और डीजीपी बदलकर प्रशासन और पुलिस के जेबी इस्तेमाल की तैयारी की है।इस तानाशाही भरे रवैये के बावजूद कमलनाथ की विदाई पल प्रतिबल और भी ज्यादा बलवती होती जा रही है। जैसे जैसे वे बगावत को कुचलने का षड़यंत्र रच रहे हैं उसका प्रतिरोध भी बढ़ता जा रहा है। सत्ता के इस दुरुपयोग से उन्होंने कांग्रेस के ही अन्य विधायकों की सहानुभूति भी खो दी है। सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद तो कमलनाथ के तमाम प्रयास नाकाफी साबित हो जाएंगे।

    बैंगलौर में बैठे विधायकों ने बाकायदा प्रेस वार्ता करके खुद के बंधक बनाने की बात झूठी साबित कर दी है। उन्होंने कहा कि हम अपनी मर्जी से सरकार के खिलाफ इस्तीफा देकर आए हैं और दुबारा चुनाव का सामना करने के लिए भी तैयार हैं। कमलनाथ सरकार जनहित के कार्यों की उपेक्षा कर रही थी हम इसलिए सरकार का विरोध कर रहे हैं। हमारे नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के काफिले पर जिस तरह सार्वजनिक तौर पर हमला किया गया उसे देखते हुए हमें अपनी सुरक्षा का खतरा है। सरकार हमें तोड़ने के लिए विविध हथकंडे अपना रही है। यदि हमें केन्द्रीय बलों की सुरक्षा दिलाई जाएगी तो हम भोपाल वापस आकर सदन के फ्लोर टेस्ट में भाग लेंगे। मध्यप्रदेश पुलिस सरकार के दबाव में है इसलिए हमें उस पर भरोसा नहीं है।

    सरकार के वित्तमंत्री तरुण भनोट और जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा बार बार कह रहे हैं कि विधायकों को यहां कोई खतरा नहीं है लेकिन कांग्रेस और कमलनाथ को करीब से समझने वाले विधायकों को सरकार के बयानों पर भरोसा नहीं है। दरअसल कमलनाथ ने डीजीपी वीके सिंह को हटाकर विवेक जौहरी को न केवल डीजीपी बना दिया है बल्कि उन्हें दो साल की सेवावृद्धि भी दे दी है। सरकार से उपकृत होने के बाद विवेक जौहरी ने पुलिस के और निजी बाऊंसर्स की सेवाएं सरकार को उपलब्ध कराई हैं। इन टोलियों में संविदा नियुक्ति वाले गुंडों को भी शामिल किया गया है। यही नहीं एक विधायक के नेतृत्व में गुंडों की एक टोली भी सक्रिय है जिसका मार्गदर्शन भोपाल के डीआईजी इरशाद वली कर रहे हैं।

    सरकार के प्रशासकीय नियंत्रण की कमान नए प्रशासनिक मुखिया गोपाल रेड्डी और प्रशासन अकादमी के डीजी बना दिए गए पूर्व सीएस सुधीरंजन मोहंती संभाल रहे हैं। कमलनाथ की जिस हेकड़ी भरी कार्यशैली की वजह से आज कांग्रेस की सरकार संकट में आई है उसके पीछे अफसर शाही का यही खुला दुरुपयोग प्रमुख वजह है। बागी विधायकों का दो टूक कहना है कि मुख्यमंत्री सचिवालय ने चुने हुए विधायकों को बाईपास करके अफसरों के माध्यम से लूट का तंत्र चला रखा है। उनके पास माफिया से मुलाकात के लिए तो समय है पर अपने विधायकों के लिए वक्त नहीं है।जनहितैषी योजनाएं बंद कर दी गई हैं या फिर उनका लाभ आम जनता को नहीं मिल पा रहा है।

    दरअसल जिस तरह से कमलनाथ की कार्यशैली को कांग्रेस के ही विधायकों ने नकार दिया है उससे सरकार अल्पमत में आ गई है। इस बगावत को कमलनाथ अपनी ही शैली में कुचलना चाह रहे हैं जो अब किसी भी तरह संभव नहीं है।कमलनाथ की विदाई तय है। यदि वे सत्ता में बने रहने के लिए गुंडागर्दी का सहारा लेने की कोशिश करेंगे तो मध्यप्रदेश में सत्ता संग्राम का खूनी माहौल बन जाएगा। इतिहास के आधार पर कमलनाथ इस बगावत को संविद सरकार के दौर से तुलना करके देख रहे हैं जबकि इस बार की बगावत ज्यादा परिष्कृत है और केन्द्र में भी एक ऐसी लोकतांत्रिक सरकार है जो किसी तानाशाही को छूट नहीं देगी।

  • महामहिम ने निकाली कमलनाथ की झूठी हेकड़ी

    महामहिम ने निकाली कमलनाथ की झूठी हेकड़ी

    भोपाल,15मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)। प्रदेश में बगावत के बाद अल्पमत में आई कमलनाथ सरकार की सारी हेकड़ी राज्यपाल महामहिम ने मुख्यमंत्री को भेजे अपने पत्र में ही निकाल दी है।उन्होंने कहा है कि विधायकों से प्राप्त जानकारी के अनुसार आपकी सरकार अल्पमत में आ चुकी है इसलिए राज्यपाल के अभिभाषण के तुरंत बाद आप सदन में विश्वासमत हासिल करें। यह कार्यवाही हर हाल में 16 मार्च को शुरु होगी और स्थगित,विलंबित या निलंबित नहीं की जा सकेगी।

    महामहिम लालजी टंडन ने मुख्यमंत्री कमलनाथ को 14 मार्च को लिखे पत्र में कहा है कि आपकी सरकार के 22 विधायकों ने अपने पद त्याग की सूचना विभिन्न माध्यमों से दी है। छह मंत्रियों के इस्तीफे विधानसभा ने भी मंजूर कर दिए हैं। ये स्थिति अत्यंत गंभीर है इसलिए प्रजातांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए आप सदन में विश्वास मत हासिल करें।

    कांग्रेस के पूर्व सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो जाने के बाद कांग्रेस के ही 22 सांसदों ने अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। वे विधायक बैंगलूरु के एक रिसार्ट में रह रहे हैं और वीडियो के माध्यम से उन्होंने पद त्याग की सूचना सार्वजनिक की है। कांग्रेस के कई अन्य मंत्रियों ने भी सुरक्षा की मांग करके सरकार के कामकाज के प्रति नाराजगी व्यक्त की है। इस्तीफा दे चुके जनसंपर्क मंत्री ने आज प्रेसवार्ता के माध्यम से आरोप लगाया कि कांग्रेस के 16 विधायकों को भाजपा ने बंदूक की नोंक पर बंधक बना रखा है। उन विधायकों पर सम्मोहित करने वाला जादू टोना किया गया है।

    इसी के साथ उन्होंने कैबिनेट बैठक में करोना वायरस के कहर की भी चर्चा का उल्लेख किया। कांग्रेस से जुड़े लोगों का कहना है कि होटल में ठहरे दो विधायकों में करोना वायरस से प्रभावित होने के लक्षण मिले हैं इसलिए वे सदन की कार्यवाही थोड़े दिनों के लिए स्थगित करने की मांग करेंगे। कैबिनेट बैठक के बाद सरकार के कई पूर्व मंत्रियों ने दावा किया कि कमलनाथ सरकार सदन में विश्वासमत हासिल कर लेगी। इन बड़बोले नेताओं ने खोखले दावे करते हुए कहा कि सरकार न केवल पांच साल का कार्यकाल पूरा करेगी बल्कि एक और बार सत्ता में आएगी।

    विकास की डींगें हांकते मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनके मंत्रियों की सारी हेकड़ी राज्यपाल लालजी टंडन के इस पत्र से आज निकल गई है। पूर्व वित्तमंत्री तरुण भानोट तो इसके बाद कहते सुने गए कि हमने किसानों के दो लाख तक के कृषि ऋण माफ करने का वादा किया था किसी भी प्रकार के ऋण माफ करने का वादा हमने कभी किया ही नहीं। इसी तरह अन्य वादों की असफलताओं को लेकर पूर्व मंत्रियों ने दबे स्वरों में स्वीकार किया कि सरकार की कई नीतियां अपेक्षाकृत रूप से सफल नहीं हो पाईं हैं। सरकार की नीतियों की असफलता की वजह से ही कांग्रेस के भीतर असंतोष फूटा और उनकी सरकार आज विदाई की दहलीज पर पहुंच गई है। हम मुख्यमंत्री कमलनाथ को उद्योगपति के रूप में प्रचारित किए जाने वाले वादों से प्रभावित हो गए थे जबकि सत्ता में आने के बाद वे सरकारी तंत्र और व्यापारियों की लूट के हथकंडे अपनाते देखे गए।

  • सिंधिया से ठलुए कांग्रेसी और बोगस भाजपाई दोनों खफा

    सिंधिया से ठलुए कांग्रेसी और बोगस भाजपाई दोनों खफा

    भोपाल,14 मार्च,(प्रेस सूचना केन्द्र)। मोदी अमित शाह की जोड़ी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्यसभा में भेजने का फैसला लेकर भारतीय राजनीति के परंपरावादी युग का अंत कर दिया है। इसके साथ ही चंद मुद्दों के इर्द गिर्द चकरघिन्नी बनी राजनीति की इबारतें भी वाशिंग मशीन के ड्रायर में रखे गीले कपड़ों के समान सींलन मुक्त होने लगीं हैं। इस एक अकेले मूव ने न केवल कांग्रेस बल्कि भारतीय जनता पार्टी के भी पिछलग्गू राजनेताओं को हतप्रभ कर दिया है। स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे ने कांग्रेसी राजनीति के शीर्ष दिनों में भी कर्मठ कार्यकर्ताओं की फौज जुटाकर जो संगठन खड़ा किया था वह आज सिफारिशी भाजपाईयों से भर गया है। चौदह सालों के शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में जो भाजपा चमचों की भी़ड़ बनकर रह गई थी वह सिंधिया के आगमन से उत्साहित तो है लेकिन उसमें भी भविष्य को लेकर संशय के स्वर उभर रहे हैं।

    लगभग बीस सालों तक कांग्रेस की राजनीति को शीर्ष मंच पर करीब से देखने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया का राजनीतिक प्रशिक्षण बहुत लंबा रहा है। बचपन से राजघराने में जन्म लेने के बाद आधुनिक राजनीति के पुरोधा स्वर्गीय माधवराव सिंधिया की सफल राजनीति को करीब से देखने वाले ज्योतिरादित्य को जनसेवा का पाठ अपने खानदान से मिला है। उनकी दादी स्वर्गीय विजयराजे सिंधिया ने जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी में बदले एक नए राजनीतिक दल को अपने राजघराने की विरासत से पाला पोसा था। वीर शिवाजी जिस तरह आधुनिक महाराष्ट्र की राजनीति की पहचान रहे हैं। मध्यप्रदेश में यही पहचान आज भी बालाजी बाजीराव पेशवा द्वितीय की कर्मठता से है। परम प्रतापी राजा भोज द्वितीय के शासन की जो सुगंध मध्यप्रदेश के स्मृतिपटल पर आज भी अंकित है उसे चिरस्थायी बनाने का काम बालाजी बाजीराव पेशवा ने किया था। पेशवा ने ही ग्वालियर में सिंधिया वंशजों को सल्तनत सौंपी थी। इसके बाद सिंधिया घराने के कई राजाओं ने उस राजनीति को आगे बढ़ाया।

    राजमाता विजयाराजे सिंधिया इस राजनीतिक गौरव की मशाल लेकर ही राजनीति में आईं थीं। उनके ऐश्वर्य और विरासत से ईर्ष्या करने वाली श्रीमती इंदिरा गांधी ने सिंधिया राजघराने को मटियामेट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लोकतंत्र और स्वाधीनता की दुहाई देकर अंग्रेजों की पिछलग्गू कांग्रेस का नेतृत्व करते हुए श्रीमती गांधी ने भारतीय राजनीति के तमाम ठिए ठिकानों को ध्वस्त करने का अभियान चलाया था। उनके कुछ सिपाहसालारों ने जिस तरह की कहानियां गढ़ीं उस पर अमल करते श्रीमती इंदिरागांधी ने सिंधिया सल्तनत को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। एसपी बनाकर भेजे गए स्वर्गीय अयोध्यानाथ पाठक को लगातार सात गैलेन्ट्री अवार्ड इसी सोच का सबूत हैं। इस दमन चक्र का ही नतीजा था कि चंबल घाटी डकैतों के आतंक से थर्राती रही। श्रीमती विजयाराजे सिंधिया के निधन के बाद भी भारतीय जनता पार्टी ने चंबल में सामाजिक न्याय की बड़ी लड़ाई लड़ी। उमा भारती के नेतृत्व में बनी भाजपा की सरकार तक ये परंपरा जारी रही। शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा ने डकैती उन्मूलन के नाम पर खेती को सिंचित करने का जो अभियान चलाया उससे न केवल चंबल बल्कि धार झाबुआ के आदिवासी अंचल में भी अपराधों का ग्राफ गिरा था।

    इस सबके बावजूद मध्यप्रदेश की राजनीति में आर्थिक विषयों के जानकार नेतृत्व की जरूरत महसूस की जाती रही है। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपनी राजनीतिक पारी शुरु करने से पहले आधुनिक अर्थशास्त्र की जो तैयारी की वह अब तक चलती रही राजनीति में फिट नहीं बैठती है। कांग्रेस की राजनीति तो इसके लिए बिल्कुल ही बोगस है। कांग्रेस गरीबी को संरक्षित करने की जिस राजनीति के तहत समाज को बांटने की विचारधारा लेकर चलती है उससे मध्यप्रदेश कभी गुजरात जैसा या उससे भी आधुनिक राज्य नहीं बन सकता है। दिग्विजय सिंह का बंटाढ़ार शासनकाल रहा हो या फिर शिवराज सिंह चौहान का कर्ज लेकर खैरात बांटने वाला दीर्घ शासनकाल सभी में प्रदेश की जनता की भरपूर उपेक्षा की गई। योजनाओं के नाम पर खैरात बांटकर वोट खरीदने की इस शैली का अंत कभी न कभी तो होना ही था। ये पहल कौन करता। कमलनाथ को उद्योगपति के रूप में प्रचारित करने वाला वर्ग राजनीति की इसी पाठशाला से आता है। बैंकों से कर्ज लेकर घाटे के उद्योग स्थापित करने वाली फर्जी उद्योगपतियों की लाबी इस राजनीति की सूत्रधार है। इस राजनीति से देश को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकानामी बना पाना किसी भी तरह संभव नहीं है।

    देश में धनाड्य राजनीति की इस उड़ान का पायलट कोई आर्थिक विषयों का जानकार ही हो सकता है। भाजपा के प्रवक्ता के रूप में काम करने वाले डायचे बैंक के पूर्व प्रबंध निदेशक जफर इस्लाम ने ज्योतिरादित्य सिंधिया में वे क्षमताएं देखीं और उन्हें भाजपा की राजनीति की तरफ मोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। भाजपा को उनकी दादी राजमाता सिंधिया ने सिंधिया सल्तनत की बागडोर से सींचा था। उनकी बुआएं श्रीमती यशोधरा राजे सिंधिया और राजस्थान की मुख्यमंत्री रहीं वसुंधरा राजे सिंधिया ने इस विरासत को सहेजकर रखा था। यशोधरा जी जब मध्यप्रदेश की उद्योगमंत्री थीं तो उन्होंने विश्व भर में फैले औद्योगिक घरानों को प्रदेश से जोड़ने का सफल अभियान चलाया था। शिवराज सिंह चौहान को संरक्षण देने वाली लाबी को ये पसंद नहीं था और उन्होंने इस अभियान को धराशायी कर दिया।

    कांग्रेस हो या भाजपा दोनों में इंदिरागांधी के बैंकों के राष्ट्रीयकरण वाले अभियान से लूट करने वाले दलालों का वर्चस्व रहा है। इस लाबी को कमलनाथ अनुकूल लगते हैं लेकिन ज्योतिरादित्य खटकते हैं। कांग्रेस की सरकार बनाने में मध्यभारत से लगभग चौबीस विधायकों का साथ रहा है। ज्योतिरादित्य सिंधिया से जुड़े यही विधायक और पूर्व मंत्री आज कमलनाथ सरकार के पतन की वजह बन रहे हैं। मध्यप्रदेश को यदि देश की नई अर्थनीति के साथ कदमताल करना है तो उसे कमलनाथ सरकार से मुक्ति पाना ही होगा। कमलनाथ सरकार के पतन के बाद जो भी नेतृत्व उभरेगा उसमें सिंधिया का असर जरूर रहेगा। ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्यसभा में भेजने के बाद भाजपा चाहे नरेन्द्र सिंह तोमर को प्रदेश की कमान थमाए या फिर उमा भारती या कैलाश विजयवर्गीय को ,शिवराज, नरोत्तम मिश्रा या बीडी शर्मा कोई भी हो ये लीडरशिप प्रदेश में मोदी सरकार की नीतियों को लागू करने में सफल साबित होगी।

    जाहिर सी बात है कि कर्ज आधारित अर्थव्यवस्था की राजनीति की पैरवी करने वाले गमले में उगे राजनेता प्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनता की अपेक्षाओं को अब तक पूरा नहीं कर पाए हैं। कमलनाथ तो छिंदवाड़ा के ही मुख्यमंत्री बनकर रह गए। उनके कार्यकाल में सरकारी क्षेत्र को जिस तरह लूट का अड़्डा बना दिया गया उससे जनता में भारी निराशा है। शिवराज सरकार की सारी कल्याणकारी योजनाओं को बंद करके कमलनाथ जिस सस्ती बिजली का ढिंडोरा पीट रहे हैं वह जनता के लिए मंहगा सौदा है। शिवराज सिंह चौहान की खैराती राजनीति की तरह ये भी मीठा जहर बनकर जनता को लुभा रहा है। जाहिर है कि ऐसे में आर्थिक विकास की मूलभूत राजनीति करने वालों का वर्चस्व बढ़ना इन ठलुओं और बोगस राजनेताओं को भला कैसे रुचेगा। वे भले ही खफा होते रहें लेकिन इतना तो तय है कि मध्यप्रदेश ने एक नई राजनीति की दिशा में अपने कदम बढ़ा लिये हैं। दिग्गी के चमचे इसे गद्दारी कहें या शिवराज विभीषण की उपमा दें लेकिन बदलाव की ये बयार फिलहाल थमने वाली नहीं है।

  • अपना दंगल अपने अखाड़े में

    अपना दंगल अपने अखाड़े में

    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोशल मीडिया से दूरी बनाने के संकेत दिए हैं। अपने फैसले पर उन्होंने देश से मुहर लगाने का अनुरोध भी किया है। मोदी को प्यार करने वाले देश के आम लोगों ने इससे इंकार करते हुए उनसे सोशल मीडिया पर सक्रिय बने रहने का अनुरोध किया है। इतने बड़े पैमाने पर जनसंवाद पहले कभी नहीं देखा गया है। इसके बावजूद प्रधानमंत्री का फैसला कई मायनों में उचित रणनीति पर अमल है। उन्हें अवश्य सोशल मीडिया से दूरी बना लेनी चाहिए।दरअसल पिछले दिनों जिस तरह षड़यंत्र पूर्वक कुछ विदेशी शक्तियों की आड़ लेकर देश के लुटेरे भारत के प्रधानमंत्री पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं उसे देखते हुए इस तरह का फैसला लिए जाने का समय आ गया है। कांग्रेस और वामपंथी राजनैतिक दल बरसों से भारतीय जनता पार्टी पर फासिस्टवादी होने का आरोप लगाते रहे हैं। उन्होंने ये आरोप खुद को लोकतांत्रिक बनाने के लिए गढ़ा है। ये आरोप वे हिटलर और मुसोलिनी की तानाशाही को प्रतीक बनाकर लगाते रहे हैं। इसके विपरीत भारतीय जनता पार्टी देश के लोकतांत्रिक ढांचे में विकसित किया गया राजनीतिक दल है। यहां फैसले सहमति से होते हैं। मोदी जैसे आम आदमी को इस पार्टी में सर्वोच्च हैसियत दी जाती है। जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणा से भारतीय जनता पार्टी ने अपना ढांचा तैयार किया है, उसके सर संघचालक की भूमिका संघ का कैडर निर्धारित करता है। कोई भी सरसंघचालक अपनी व्यक्तिगत इच्छा किसी पर या संघ पर नहीं थोप सकता है। कमोबेश यही हाल भारतीय जनता पार्टी का है। यहां भी कोई व्यक्ति अपनी तानाशाही नहीं चला सकता है। यहां भी फैसले सर्वसम्मति से लिए जाते हैं। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर बार बार ये दुष्प्रचार किया जाता है कि मोदी शाह की जोड़ी ने पार्टी के तमाम नेताओं को दरकिनार कर दिया है और अपना एजेंडा चला रहे हैं। सोशल मीडिया का जो बेलगाम चरित्र है उससे कोई चिरकुट सा व्यक्ति देश को जीवन समर्पित करने वाले राजनेताओं,सेनाध्यक्षों, डाक्टरों या समाजसेवियों की इज्जत तार तार कर देता है। उसे कोई रोकने वाला नहीं हैं। ये काम यदि अज्ञानता से किया जाए तो उन्हें ज्ञान से प्रकाशित किया जा सकता है लेकिन जब षड़यंत्र पूर्वक बार बार एक ही आरोप दुहराया जाता रहे तो निश्चित रूप से उस व्यवस्था को नियंत्रित किए जाने की जरूरत है। भारत में सीएए को लेकर फैसला देश के सर्वोच्च सदनों ने किया। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री बार बार स्पष्टीकरण देते रहे कि इससे भारत के किसी नागरिक को कोई खतरा नहीं है इसके बावजूद षड़यंत्र पूर्वक कई बाहिरी ताकतें भारत के मुसलमानों को गुमराह करने का एजेंडा चला रहीं हैं। देश भर में सीएए को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है और सरकार की जनहितैषी नीतियों को धता बताते हुए झूठा दुष्प्रचार किया जा रहा है। इस षड़यंत्र को विदेशी ताकतों के हाथों में केन्द्रित सोशल मीडिया की मदद से अंजाम दिया जा रहा है। जाहिर है कि इस षड़यंत्र को रोकना होगा और देश के विकास के लिए ये जरूरी हो गया है।चीन में फेसबुक ,ट्विटर, आदि नहीं चलते वहां का सोशल मीडिया प्लेटफार्म वीबो है। चीन में दस तरह के सोशल मीडिया प्लेटफार्म हैं लेकिन उनका नियंत्रण वैश्विक सोशल मीडिया प्लेटफार्मों के पास नहीं है। भारत के एक सौ तीस करोड़ लोगों के बीच संवाद का महामार्ग विकसित करने का क्षेत्र अभी खुला पड़ा है। इस क्षेत्र में बहुत कुछ अनुसंधान किए जाने भी जरूरी हैं। जाहिर है कि प्रधानमंत्री का सोशल मीडिया से मोहभंग एक दिन में नहीं उपजा है। यह सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। भारत का सोशल मीडिया प्लेटफार्म विकसित करके विदेशी ताकतों से भारत के मानस को बचाया जा सकता है। यहां की गई एक झूठी पोस्ट पूरे देश को गुमराह कर सकती है। भारत में चलाई जाने वाली झूठ की फेक्टरी पर तो नियंत्रण संभव है लेकिन विदेशी धरती से बैठकर चलाए जाने वाले झूठ के कारखानों पर रोक लगाना सूचना के इस वैश्विक महामार्ग के बीच बहुत खर्चीला है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ये घोषणा कई मायने रखती है। देश में अपना सोशल मीडिया प्लेटफार्म विकसित करने की दिशा में ये घोषणा महत्वपूर्ण कदम साबित होने वाली है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश की वो शख्सियत हैं जिनका एक विचार पूरे देश के बड़े जनमानस का भाव बदल देता है। देश में मोदी की साख बहुत ऊंची है। इस लिहाज से भारत को एक नए जनांदोलन की दिशा में मोड़ने का ये प्रयास सराहनीय है। जितनी जल्दी हो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस सोशल मीडिया को विदा कहें और अपने देश का नया सूचना अखाड़ा शुरु करने की पहल करें जहां होने वाले दंगल वास्तविक हों हालीवुड की फिल्मों की कहानियों की तरह आभासी नहीं।

  • पोर्टल से मकान आबंटन सरल बोले प्रमुख सचिव गृह एस.एन.मिश्रा

    पोर्टल से मकान आबंटन सरल बोले प्रमुख सचिव गृह एस.एन.मिश्रा

    भोपाल,14 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। सरकारी कर्मचारियों और अफसरों को आवास आवंटन करने के लिए बनाए गए वेब पोर्टल ई – आवास ने अब जरूरत मंद अमले को सरकारी मकान आबंटित करने की व्यवस्था सरल बना दी है। इस पोर्टल की सुविधाओं के संबंध में आज भोपाल स्थित समस्त डीडीओ को नरोन्हा अकादमी में प्रशिक्षण दिया गया । प्रमुख सचिव गृह एस.एन.मिश्रा और संपदा संचालक आर.आर.भोसले ने भी प्रशिक्षण को संबोधित किया ।

    इस नए वेब पोर्टल से संपदा संचालनालय से शासकीय आवासों का बेहतर प्रबंधन किया जाएगा। शासकीय आवास के लिए अभी कर्मचारियों को 25 से 30 साल तक की प्रतीक्षा करनी पड़ रही है उसके स्थान पर उनको ई -आवास वेब पोर्टल के माध्यम से शासकीय आवासों का बेहतर प्रबंधन और पारदर्शिता के कारण 5 वर्ष में ही शासकीय आवास मिल सकेंगे।

    संपदा संचनालय भोपाल ई-गवर्नेंस पोर्टल www.sampada.mp.gov.in

    एनआईसी भोपाल के सहयोग से विकसित किया गया है। इसमें समस्त आहरण एवं संवितरण अधिकारियों को शासकीय सेवकों द्वारा आवास आवंटन हेतु ऑनलाइन भरे गए आवेदनों का सत्यापन करने का कार्य किया जाएगा जिसमें अपात्र आवेदनों को अस्थाई रूप से निरस्त करने का भी प्रावधान डीडीओ को दिया गया है इसके साथ ही जो भी आवेदन इसमें ऑनलाइन ही निरस्त किए किए गए होंगे उसकी भी जानकारी सीधे शासकीय सेवक को एवं उसके डीडीओ को भी मिल पाएगी । शासकीय कर्मचारियों को संपदा संचनालय के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। स्वीकृत आवेदनों की जानकारी एवं वेटिंग लिस्ट की भी जानकारी इस पोर्टल के माध्यम से शासकीय कर्मचारी प्राप्त कर सकेंगे ।

    अगले चरण में नवीन निर्मित किए जा रहे हैं वेब पोर्टल को कोष एवं लेखा संचनालय के आईएफएमएस आई पोर्टल से इंटीग्रेशन का कार्य लगभग पूर्णता की ओर है जिसमें कर्मचारी की वेतन आहरण एवं सेवानिवृत्त के डाटा के आधार पर संपदा संचनालय द्वारा स्थानांतरण सेवानिवृत्त दिवंगत आदि होने की स्थिति में आवास रिक्त कराए जाने की कार्यवाही की जा सकेगी । साथ ही शासकीय आवासों की लाइसेंस फीस की वसूली संबंधी कार्य भी नवीन पोर्टल के आधार पर की जा सकेगी ।

    इस अवसर पर कार्यक्रम में प्रमुख सचिव गृह एस.एन.मिश्रा,संचालक संपदा आर.आर.भोंसले, आवंटन अधिकारी संपदा मुकुल गुप्ता एवं सुनील जैन वरिष्ठ तकनीकी निदेशक भी उपस्थित थे ।

  • होलिका में गौकाष्ठ का  उपयोग करें- कलेक्टर

    होलिका में गौकाष्ठ का उपयोग करें- कलेक्टर

    भोपाल12 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)।कलेक्टर तरूण पिथोड़े और केन्द्रीय पर्यावरण विभाग के अधिकारियों के साथ हुई चर्चा में निर्णय लिया गया कि इस बार होलिका दहन में लकड़ी का उपयोग नहीं करते हुए अधिकाधिक गौकाष्ठ का उपयोग हो इसके लिए विशेष अभियान चलाकर नागरिकों और स्कूली विद्यार्थियों को जागरूक किया जाये । भोपाल जिले में शवदाह गृहों में भी गौकाष्ठ का उपयोग हो इसके लिए भी मुहिम चलाई जायेगी । पर्यावरणविद डॉ. योगेश सक्सेना ने बताया कि जिले की शासन सेअनुदान प्राप्त गौशालाएं गौकाष्ठ का निर्माण कर शवदाह गृहों एवं लकड़ी के टालों पर इसका विक्रय कर रोजगार का जरिया बनाया जा सकता है । इसी प्रकार सेन्ट्रल जेल भोपाल के कैदियों को भी गौकाष्ठ निर्माण कराकर रोजगार से जोड़ा गया है । इसके लिए गोकाष्ठ निर्माण की मशीन जेल परिसर में स्थापित की गई है ।

    पर्यावरण संरक्षण प्रदेश के लिए स्थाई जरूरतों में से एक है । पर्यावरण केसंरक्षण, बचाव और हरा भरा शीतल प्रदेश हो इसके लिए शासन प्रशासन हर संभव प्रयास कर रहा है । पेड़ों को कटने से बचाने के लिए गौकाष्ठ आधारित लकड़ी, कंडे और अन्य संसाधन आज पर्यावरण को सामान्य स्थिति में लाने के लिए उपयोग में लाए जा रहे हैं ।

    कमिश्नर एवं कलेक्टर भोपाल के इस अभियान से नवाचार हो रहे हैं । गौकाष्ठ के उपयोग से सघन जंगल, जलवायु और पर्यावरण को बचाने में मदद मिलेगी । गौकाष्ठ आधारित वस्तुएं पर्यावरण को नुकसान से बचाने के लिए उपयोग में लाई जा रही हैं ।इस ओर कईं सामाजिक संस्थाएं, समाजसेवी भी अपना योगदान कर रहे हैं । गौकाष्ठ के उपयोग से जहां पर्यावरण को नई ऊर्जा मिल रही है वहां इसके उपयोग से पर्यावरण और बेवक्त बदलते मौसम की प्रतिकूल परिस्थिति को बदलने में मदद मिल रही है । गौकाष्ठ के उपयोग से जहां पेड़ों को कटने से बचाने में मदद मिलेगी वहां इसके उपयोग से रोजगार के नवीन अवसरों का सृजन हो सकेगा । साथ ही विभिन्न संस्थाओं को, आजीविका मिशन और गौशालाओं को पर्याप्त व्यवस्था के साथ साथ उनकी आर्थिक स्थिति में भी बदलाव लाया जा सकेगा । महिलाओं को भी रोजगारसे जोड़ा जा सकेगा । इससे शासन प्रशासन की विभिन्न योजनाओं का लाभ विभिन्न संस्थाओं और शासकीय अशासकीय गौशालाओं को भी मिल सकेगा ।

    क्या है गौकाष्ठ

    गाय के गोबर से निर्मित कंडे रूपी लकड़ियां हैं । गौकाष्ठ के उपयोग से वातावरण में कार्बनडाई आक्साईड की मात्रा भी कम होती है और गौकाष्ठ की केलोरिक वेल्यू लकड़ी से अधिक और घनत्व ज्यादा होता है जो पर्याप्त मात्रा में ईधन के लिए भी अनुपयोगी है । गौकाष्ठ निर्मित वस्तुएं प्रदूषण को रोकने, बढ़ती जरूरतों के लिए उपयोगी साबित हो रही हैं । गौकाष्ठ दैनिक जीवन में भी बहुतायत उपयोगी साबित हो रही है, साथ ही कईं कार्यक्रमों में भी इसकी उपयोगिता प्रमाणित है । गौकाष्ठ के उपयोग से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के नए अवसर प्राप्त होंगे । साथ ही पूरे प्रदेश में लकड़ियों एवं अन्य वस्तुओं के जलाने से पर्यावरण को बचाया जा सकेगा । पेड़ों की अत्यधिक कटाई को रोकने में मदद मिलेगी एवं इसके दोहरे उपयोग से हम पर्यावरण के संरक्षण में भागीदार बनेंगे और वातावरण को शुद्ध बना सकेंगे ।

  • जनगणना कार्य में एमपी ने लगाया अड़ंगा

    जनगणना कार्य में एमपी ने लगाया अड़ंगा

    मंत्रि-परिषद के निर्णय

    भोपाल,5 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)।मुख्यमंत्री कमल नाथ की अध्यक्षता में मंत्रालय में हुई मंत्रि-परिषद की बैठक में ‘मध्यप्रदेश हाइब्रिड नवकरणीय ऊर्जा एवं एनर्जी स्टोरेज नीति’ लागू करने का निर्णय लिया। यह नीति मध्यप्रदेश राज्य में 3 परियोजनाओं के विकास के लिए लागू की जायेगी। इसमें हायब्रिड पॉवर परियोजना (एच.पी.पी.) में एक परियोजना स्थल पर दो या दो से अधिक नवकरणीय ऊर्जा स्त्रोतों से विद्युत उत्पादन होगा, जिसमें ऊर्जा भण्डारण भी शामिल हो सकता है।

    मंत्रि-परिषद ने शासकीय संकल्प पारित कर भारत सरकार से नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2019 को निरसित करने का आग्रह किया तथा ऐसी नयी सूचनाओं, जिन्हें राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) 2020 में अद्यतन करने के लिए चाहा गया है, को वापस लेने एवं उसके पश्चात ही राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के अधीन गणना करने का कार्य करने का भी आग्रह किया।

    ‘मध्यप्रदेश हाइब्रिड नवकरणीय ऊर्जा एवं एनर्जी स्टोरेज नीति’ के अंतर्गत इसके अलावा, नवकरणीय ऊर्जा के मौजूदा परियोजना स्थलों के सह-स्थित या स्टैंड-अलोन एनर्जी स्टोरेज संयंत्र स्थापित किये जा सकते हैं ताकि नवकरणीय ऊर्जा स्त्रोतों का समुचित उपयोग किया जा सके एवं ग्रिड स्थिरता की दिशा में प्रयास किये जा सकें। उपलब्ध अधोसंरचनाओं और नवकरणीय ऊर्जा स्त्रोतों की क्षमताओं के दोहन करने के लिए विभिन्न नवकरणीय ऊर्जा स्त्रोतों के हायब्रिडाईजेशन और विभिन्न प्रकार के ऊर्जा भण्डारण को बढ़ावा देने के लिए एक प्रगतिशील नीति की आवश्यकता प्रतिपादित की गई।

    मंत्रि-परिषद ने सामाजिक क्षेत्र में नि:शक्त, निर्धनों के लिए उत्कृष्ट कार्य करने वाली संस्थाओं को पुरस्कार के लिए इन्दिरा गाँधी समाजसेवा पुरस्कार 1992 में संशोधन कर पुरस्कार की राशि को एक लाख से बढ़ाकर 10 लाख करने का अनुसमर्थन किया।

    मंत्रि-परिषद ने मंत्रियों द्वारा दिये जाने वाले स्वेच्छानुदान की राशि में किसी एक प्रकरण के लिए वर्तमान में निर्धारित सीमा राशि 20 हजार रूपये को बढ़ाकर 40 हजार रूपये करने का निर्णय लिया गया। मंत्रि-परिषद ने नगरीय विकास एवं आवास विभाग की योजना ‘विधानसभा भवन एवं विधायक विश्राम गृह का विस्तारण ‘ को निरंतर रखने के लिए सैद्धांतिक स्वीकृति देने की मंजूरी दी।

    मंत्रि-परिषद ने स्कूल शिक्षा विभाग के अन्तर्गत राज्य स्कूल शिक्षा सेवा (शैक्षणिक संवर्ग) शर्तें एवं भर्ती नियम 2018 में परिवीक्षा अवधि, परिवीक्षा अवधि के वेतनमान एवं आरक्षण नियमों में किये गये संशोधन के प्रस्ताव का अनुसमर्थन किया। इसी प्रकार मध्यप्रदेश जनजातीय एवं अनुसूचित जाति शिक्षण संवर्ग, सेवा एवं भर्ती नियम 2018 में संशोधन करने का निर्णय भी लिया गया।

    मंत्रि-परिषद ने मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित राज्य सेवा परीक्षा में संबंधित राज्य सेवा परीक्षा नियम 2015 में भर्ती की प्रक्रिया के संबंध में संशोधन करने का निर्णय लिया और यह संशोधन राज्य सेवा परीक्षा 2019 से लागू करने की मंजूरी दी।

    मंत्रि-परिषद ने शासन के विभिन्न विभागों द्वारा क्रियान्वित की जाने वाली योजनाओं एवं परियोजनाओं, सतत विकास के लक्ष्य, आकांक्षी जिलों तथा विकासखण्डों की निरंतर प्रभावी मॉनीटरिंग के लिए राज्य योजना आयोग में क्रियाशील प्रोजेक्ट मॉनीटरिंग यूनिट का कार्यकाल अगले 5 वर्षों के लिए निरंतर रखने की मंजूरी दी। यूनिट में वर्तमान में कार्यरत सलाहकार एवं कार्यकारी पूर्व में स्वीकृत अवधि 31 मार्च 2020 तक कार्यरत रहेंगे। बैठक में एक अप्रैल 2020 से 31 मार्च 2023 तक की अवधि के लिए 31 पदों पर संविदा आधार पर नियुक्ति करने की मंजूरी दी गयी । इसमें प्रिंसिपल कंसलटेंट का एक, सीनियर कंसलटेंट के 10 और कंसलटेंट के 20 पद शामिल हैं। संविदा आधार पर चयन की प्रक्रिया योजना, आर्थिक एवं सांख्यिकी विभाग द्वारा निर्धारित की जायेगी।

    मंत्रि-परिषद ने प्रदेश में सूचना प्रौद्योगिकी परियोजनाओं के विकास एवं रख-रखाव करने के लिए राज्य स्तर पर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अधीन मैप-आई.टी. अन्तर्गत गठित सेन्टर ऑफ एक्सिलेंस के लिए बढ़ती चुनौतियों एवं इसके सुदृढ़ीकरण को ध्यान में रखते हुये कुल 16 नये पदों के सृजन की मंजूरी दी । सेन्टर ऑफ एक्सीलेंस द्वारा जिन विभागों के लिए कार्य किया जायेगा, उन विभागों से मैप-आई.टी. द्वारा निर्धारित मापदंड अनुसार शुल्क दिये जाने का अनुमोदन किया गया।

  • कमलनाथ की राजनीति को नसीहत की दरकार

    कमलनाथ की राजनीति को नसीहत की दरकार

    गुलाम भारत में अंग्रेजों के ऊटपटांग कानूनों के विरोध में तरह तरह से विरोध किया जाता रहा है। उसकी वजह ये थी कि अंग्रेजी सल्तनत ने भारत को लूटने के लिए वे कानून बनाए थे। बाद में जब एओ ह्यूम की कांग्रेस को गांधीजी ने अंग्रेजों से संवाद का माध्यम बनाया तब कानूनों का विरोध अदालतों में भी किया जाने लगा। आजाद हिंदुस्तान में गांधी कांग्रेस की नकलची इंदिरा कांग्रेस संसद में पारित कानूनों को लेकर जनता को भड़काने में लगी है। इंदिरा कांग्रेस के नेता अपनी इस शैली से खुद को महात्मा गांधी की कांग्रेस बताना चाह रहे हैं। वो ये तब कर रहे हैं जब पूरा देश एक नई दिशा में चल पड़ा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मेक इन इंडिया उत्पादन बढ़ाकर पूंजी का उत्पादन करना चाहता है जबकि कांग्रेस का मानस आज तक थानेदारी के माहौल से आगे नहीं बढ़ पाया है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की कार्यशैली की लाखों आलोचनाएं की जा सकती है। बेशक वे एक सफल शासक नहीं साबित हो पाए। इसके बावजूद वे एक ऐसे मुख्यमंत्री जरूर साबित हुए जिसने प्रदेश को आगे बढ़ने का अवसर दिया। जिसने प्रदेश के लोगों के कामकाज में बेवजह अड़ंगे नहीं लगाए। इसके विपरीत मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार आपातकाल की मनःस्थिति से बाहर नहीं आ पा रही है। सरकार का शुद्ध के लिए युद्ध अभियान हो या बजट की कैपिंग करने की कार्यशैली ये दोनों ही चौकीदारी के मानस से बाहर नहीं आ पा रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह चिल्ला चिल्लाकर बोलते रहे कि देश में अब इंस्पेक्टर राज की वापिसी नहीं होगी। इसके बावजूद उनकी ही पार्टी की सरकार ने मध्यप्रदेश को थानेदारी के जाल में उलझा दिया है। ये थानेदारी भी छुप छुपकर की जा रही है। जिस नागरिकता कानून को संसद ने बहुमत से पारित किया उसके खिलाफ राज्य सरकार कुछ ऐसा माहौल बना रही है जैसे संसद में बैठे लोग अंग्रेज हों और उनकी नियत देश का शोषण करने की है। जबकि हकीकत ठीक विपरीत है। खुद को उद्योगपति कहलाने वाले कमलनाथ बेहद कमजोर व्यवस्थापक साबित हो रहे हैं। पिछली सरकार की देखासीखी करके उनके वित्तमंत्री तरुण भानोट ने भले ही दो लाख 14 हजार करोड़ का बजट बना दिया हो लेकिन कमोबेश सभी विभागों को बजट की राशि देने में कटौती कर दी है। हर विभाग को कम से कम चालीस फीसदी बजट कम दिया जा रहा है। बजट की इस कटौती से हाहाकार मचा है। इससे निपटने के लिए उन्होंने मुस्लिमों को नागरिकता कानून के विरोध में भड़काना जारी रखा है। उनके एक विधायक आरिफ मसूद इस अभियान के सूत्रधार हैं। उन्होंने पुराने भोपाल के इलाकों में इतनी दहशत फैलाई कि लोगों ने अपनी दूकानें बंद रखने में ही भलाई समझी। विधायक आरिफ अकील के क्षेत्र में व्यापारियों ने बेखौफ होकर अपना कारोबार जारी रखा लेकिन आरिफ मसूद के इलाके में भारत बंद को सफल दिखाने के लिए दूकानें बंद कराई गईं। सरकार की शह इतनी दबी छुपी है कि पूरे प्रदेश में पुलिस तंत्र का एक हिस्सा बंद का समर्थन करते नजर आया। पुलिस के कुछ आला अधिकारियों का तो कहना था कि लोग यदि कानून का विरोध कर रहे हैं तो फिर उन्हें क्यों रोका जाए। ये पहली बार हो रहा है कि कोई सरकार अपने ही देश के कानून के विरोध को शह दे रही हो। निश्चित रूप से ये समझदारी भरा कदम नहीं है। इससे केन्द्र राज्य के बीच बेवजह कटुता का माहौल बन रहा है। मध्यप्रदेश की जनता के एक हिस्से ने कांग्रेस को सत्ता में काम करने का अवसर दिया है। उसका भी सोच प्रदेश का विकास करना है। जबकि राज्य सरकार इस सत्ता का उपयोग केन्द्र से टकराव के लिए कर रही है। उसकी इस खुन्नस से राज्य के हित प्रभावित हो रहे हैं। प्रदेश के लोगों की जीवचर्या में सहयोग देने की बात आती है तो कमलनाथ और उनके मंत्री कहने लगते हैं कि खजाना खाली है। जबकि राज्य को हर महीने उतनी ही आय हो रही है जितनी पिछली सरकार के कार्यकाल में हो रही थी। राज्य सरकार जीएसटी कलेक्शन बढ़ाने का माहौल भी नहीं बना पा रही है। मुख्यमंत्री अपने सचिवालय में मैराथन बैठकें करते रहते हैं। वे अधिकारियों पर अधिक राजस्व जुटाने के लिए दबाव बनाते हैं जबकि इसके बावजूद खजाने की आय नहीं बढ़ रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि तबादले और पोस्टिंग के धंधों की वजह से राज्य की आय का एक बड़ा हिस्सा काला धन बना रहा है। उसे रोकने के लिए सरकारी तंत्र छापेमारी कर रहा है। इस पूरी कवायद ने प्रदेश में तनाव के हालात बना दिए हैं। राज्य सरकार की इस अज्ञानता भरी कवायद की वजह से राज्य का माहौल तनावपूर्ण है। सीएए का विरोध करके राज्य सरकार ने खुद को फिजूल की उलझन में फंसा लिया है। प्रदेश के जिम्मेदार लोगों को चाहिए कि वे सरकार को नसीहत दें और प्रदेश की विकास यात्रा प्रशस्त करें।