Category: मध्यप्रदेश

  • सम्मान से शुरु हुआ सहकारिता के उप अंकेक्षकों का नया साल

    सम्मान से शुरु हुआ सहकारिता के उप अंकेक्षकों का नया साल


    भोपाल,7 जनवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। सहकारिता विभाग के प्रदेश भर से आए अंकेक्षकों ने आज राजधानी में नव वर्ष मिलन समारोह 2023 मनाया । श्यामला हिल्स स्थित होटल विंड एंड वेव्वज में आयोजित इस कार्यक्रम में विभाग के वरिष्ठ अफसरों ने भी शिरकत की और प्रदेश में सहकारिता आंदोलन को नई ऊंचाईयां देने के लिए अंकेक्षकों को प्रोत्साहित किया। अफसरों ने कहा कि जनता की वित्तीय संस्थाओं को साफसुथरा बनाकर प्रदेश को विकास की नई ऊंचाईयों तक पहुंचाया जा सकता है। इसके लिए अंकेक्षक बिना डरे जिस मुस्तैदी से कार्य कर रहे हैं वह सराहनीय है । उनका काम सरल बनाने के लिए सरकार की मंशा के अनुरूप सभी उपाय किए जाएंगे।
    मुख्य अतिथि के तौर पर कार्यक्रम में शामिल सहकारिता विभाग के संयुक्त आयुक्त अभय खरे ने कहा कि आमतौर पर सरकारी बैठकों में अनौपचारिक वार्तालाप नहीं हो पाता है। गंभीर दायित्वों का निर्वहन करने वाले आडिटरों को चुनौतियों का सामना अकेले करना पड़ता है। इस तरह के सामाजिक कार्यक्रम अफसरों और कर्मचारियों में उमंग का संचार करते हैं जिसका लाभ प्रदेश के आम आदमी को मिलता है। आडिटरों को जो स्मृति चिन्ह दिए गए वे दैनंदिनी कामकाज के बीच उन्हें प्रकाश स्तंभ की तरह प्रोत्साहित करते रहेंगे।
    कार्यक्रम के मुख्य आयोजक उप अंकेक्षक मुकंद राव भैंसारे ने कहा कि प्रदेश भर की सहकारी संस्थाओं की लेखा पुस्तिकाओं की शुद्धता और सत्यता का परीक्षण करने का काम दुरूह होता है। अशुद्धियों और कपट का परीक्षण करना और उनकी रोकथाम के उपाय करने से आडिटरों को नाराजगी का सामना भी करना पड़ता है। ऐसे में उन्हें शासन की ओर से प्रोत्साहन और संबल मिलता रहे तो सहकारिता आंदोलन को सफल बनाया जा सकता है। भारत सरकार की ओर से सहकारिता के क्षेत्र में जो तकनीकी सुधार किए गए हैं उनसे वित्तीय गड़बड़ियों को रोकना सरल होता जा रहा है।
    नववर्ष मिलन समारोह में अंकेक्षकों ने गीत संगीत की रंगारंग प्रस्तुतियां दीं। कविता पाठ और चुटकुलों से उपस्थित अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच संवाद की नई कड़ी का सूत्रपात किया गया। महिला उप अंकेक्षकों ने अपनी प्रस्तुतियों से सभी अधिकारियों को संवाद के नए धरातल पर ला दिया। कई अधिकारियों ने कहा कि वे रिटारमेंट की आयु तक पहुंच गए लेकिन कभी विभाग की ओर से उनकी पीठ नहीं थपथपाई गई। पहली बार स्मृति चिन्ह पाकर उन्हें अपनी जीविका सार्थक महसूस हो रही है।


    कार्यक्रम में संयुक्त आयुक्त सहकारिता बीएस शुक्ला,प्रबंध संचालक अपेक्स एवं संयुक्त आयुक्त पीएस तिवारी,सहकारिता विभाग के सचिव मनोज सिन्हा, संयुक्त आयुक्त अनिल वर्मा, उपायुक्त सहकारिता एवं सचिव मार्कफेड यतीश त्रिपाठी, उपायुक्त शिवेन्द्र पांडेय, उपायुक्त आरएस विश्वकर्मा, उपायुक्त श्रीमती अनिता उइके, श्रीमती श्वेता रावत, सहायक आयुक्त संजय सिंह, मप्र कार्यपालिक तृतीय वर्ग सहकारिता विभाग कर्मचारी संघ के प्रांताध्यक्ष संजय सिंह, शोधकर्ता अविनाश सिंह समेत पूरे प्रदेश के आए उप अंकेक्षकों ने आयोजन में हिस्सा लिया। उप अंकेक्षक वर्ग की ओर से वरिष्ठ अधिकारियों और कर्मचारियों को स्मृति चिन्ह भेंट किए गए। श्री भैंसारे ने आयोजन को सफल बनाने वाली टीम के सदस्यों श्री रामचंद अहिरवार, श्री विनोद जैन, एवं अन्य अंकेक्षकों व उप अंकेक्षकों के योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन बार बार होंगे और राज्य के विकास में अपना योगदान देने वाले उप अंकेक्षकों को पुरस्कृत भी किया जाएगा।

  • चौपाल से चलती है शिवराज सिंह सरकार बोले गोविंद सिंह राजपूत

    चौपाल से चलती है शिवराज सिंह सरकार बोले गोविंद सिंह राजपूत

    अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा जारी, आज आएगा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का जवाब

    भोपाल,21 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्य प्रदेश विधानसभा के शीतकालीन सत्र में तीसरे दिन बुधवार को सदन की कार्यवाही गहमागहमी भरी रही . कई सालों बाद सदन में लगभग साढ़े तेरह घंटों तक चर्चा जारी रही। सुबह ग्यारह बजे समवेत हुआ सदन समयकाल बढ़ाने के साथ रात्रि 12.37 बजे तक चलता रहा। कार्यवाही के दौरान कई बार पक्ष और विपक्ष के नेताओं में तीखी बहस देखने को मिली. कांग्रेस की ओर से नेता प्रतिपक्ष डॉ.गोविंद सिंह ने ये प्रस्ताव प्रस्तुत किया जिस पर हुई चर्चा ने सत्ता पक्ष को अपने कामकाज पर सफाई देने का अवसर मिल गया। कई बार तो विपक्ष स्वयं अपने आरोपों में घिरता नजर आया।


    कांग्रेस के अविश्वास प्रस्ताव पर प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कल गुरुवार को जवाब प्रस्तुत करेंगे. इधर विधानसभा सत्र के महत्वपूर्ण तीसरे दिन सदन की कार्यवाही के दौरान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख कमलनाथ नदारद रहे. पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ बुधवार को विदिशा जिले के सिरोंज जिले के दौरे पर थे . जबकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पूरी कार्यवाही के दौरान मौजूद रहे.


    सदन में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा में कांग्रेस विधायक जीतू पटवारी ने कहा कि सरकारी पैसे से भाजपा ने अपने दफ्तर में 40 करोड़ रुपए का खाना खिला दिया. जीतू पटवारी के इस बयान पर नगरीय प्रशासन राज्यमंत्री ओपीएस भदौरिया भडक़ उठे. मंत्री भदौरिया अपनी सीट से उठकर विपक्ष की और बढऩे लगे जिस पर विपक्षी नेताओं ने हंगामा शुरु कर दिया. मामले को बढ़ता देख स्पीकर ने जैसे तैसे मामले को शांत कराया. इसके बाद जीतू पटवारी ने पुन: बोलना शुरू किया.


    हंगामे के बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सज्जन सिंह वर्मा ने ओपीएस भदौरिया को बिल्ली कहकर संबोधित किया. सज्जन सिंह वर्मा ने कहा कि ओपीएस अपने क्षेत्र में भीगी बिल्ली बने फिरते हैं और यहां पहलवानी बता रहे हैं। पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा के तेवर इसलिए तेज हो रहे थे. क्योंकि पूर्व मंत्री जीतू पटवारी के वक्तव्य के दौरान मंत्री ओपीएस भदौरिया अपनी सीट से उठ खड़े हुए ,जिन्हें मंत्री रामखेलावन सिंह बार बार हाथ पकडक़र बिठाते नजर आए.

    परिवहन मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने कहा कि कमलनाथ सरकार में हम अपने क्षेेत्र के गरीब नागरिकों के नाम गरीबी रेखा में जुड़वाने के लिए प्रयास करते रहे लेकिन डेढ़ साल तक पोर्टल ही नहीं खोला गया। जबकि शिवराज सिंह चौहान की सरकार आते ही पच्चीस लाख लोगों के नाम गरीबी रेखा में जोड़ दिए गए। कांग्रेस सरकार अप्राकृतिक मृत्यु होने पर पचास हजार रुपए हर्जाना देती थी जबकि शिवराज सरकार ने चार लाख रुपए मुआवजा देना शुरु कर दिया। ये सरकार भोपाल के मंत्रालय से नहीं बल्कि प्रदेश के चौपालों से चलने वाली सरकार है।

    सुश्री हिना लिखीराम कांवरे ने सरकार की कार्यप्रणाली को घेरे में लेते हुए कहा कि गृहमंत्री बड़े बड़े दावे करते हैं कि उनके शासनकाल में डकैतों,नक्सलियों पर कार्रवाई हुई है लेकिन हकीकत ये है कि बालाघाट और इसके आसपास नक्सलवादियों ने इतने घर बना लिए हैं कि सरकार किस किस घर में घुसकर उन्हें मार पाएगी। आतंकी हरकतों की वजह से कान्हा नेशनल पार्क में पर्यटक आखिर क्यों आएंगे। बालाघाट को नक्सली अपना रेस्ट जोन मानते हैं। नक्सलियों ने इलाके के नागरिकों का हक छीना है वहां कोई उद्योगपति अपना कारोबार शुरु नहीं करना चाहते।


    शीतकालीन विधानसभा सत्र के तीसरे दिन की कार्रवाई में पक्ष और विपक्ष के नेताओं में व्यंग्य तंज का भी दौर चला. नेता प्रतिपक्ष गोविंद सिंह ने कहा कि हमने अविश्वास प्रस्ताव में जो मुद्दे उठाए, उनपर जवाब देना चाहिए. इस पर मंत्री गोपाल भार्गव वने कहा कि आपने आज क्या भाषण दिया वो आपको खुद याद नहीं होगा. इस पर संसदीय मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने तंज कसते हुए कहा कि नेता प्रतिपक्ष गोविंद सिंह तो ढोर डॉक्टर हैं.

  • विदेशी धन कमाने का माध्यम बनी एमपी की वन संपदा

    विदेशी धन कमाने का माध्यम बनी एमपी की वन संपदा


    वनमंत्री विजय शाह ने बताया 20 से 26 दिसंबर तक भोपाल के लाल परेड ग्राऊंड में लगेगा 9 वां अंतर्राष्ट्रीय हर्बल मेला
    भोपाल,18 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। वनों से प्राप्त जड़ी बूटियां वनवासियों की समृद्धि का साधन बन रही हैं और विदेशी मुद्रा कमाने का साधन भी बन गईं हैं। मध्यप्रदेश सरकार के वन विभाग की रणनीति की कामयाबी की ये कहानी वर्ष 2011 से आयोजित हो रहे अंतर्राष्ट्रीय हर्बल मेलों की वजह से लिखी जा सकी है। लगातार नौवें वर्ष आयोजित किए जा रहे इस वन मेले की सफलता से उत्साहित राज्य के वन विभाग ने इस बार 20 से 26 दिसंबर तक लगातार सात दिनों तक इस मेले की मेजबानी करने की तैयारी की है। वनमंत्री कुंवर विजय शाह ने आज भोपाल में आयोजित पत्रकार वार्ता में बताया कि वनवासियों की समृद्धि के लिए इस बार भी वनसंपदा के विक्रेताओं और खरीददारों को आपस में जोड़कर राज्य सरकार वनौषधियों की मंडी को सफल बनाएगी।
    कुंवर विजय शाह ने पत्रकारों के सवालों के जवाब में बताया कि लगातार आयोजित होने वाले वनमेलों से वन संपदा अब वैश्विक बाजारों में पहचान बनाने लगी हैं। महुए के च्वनप्राश की लोकप्रियता इतनी तेजी से बढ़ रही है कि वन समितियों ने अब महुआ इकट्ठा कराकर उसकी मिठाई, अचार और च्वनप्राश जैसे उत्पादों की मार्केटिंग शुरु कर दी है। लघुवनोपज संघ को लंदन से अठारह क्विंटल महुआ उपलब्ध कराने का आर्डर मिला है। इस तरह कई अन्य वनौषधियां भी विदेशी मुद्रा कमाने का साधन बन रहीं हैं।

    वनमंत्री कुंवर विजय शाह ने बताया कि सरकार के प्रयासों से वनवासियों को रोजगार के नए साधन मिले हैं.इस अवसर पर लघुवनोपज संघ के एमडी पुष्कर सिंह भी उपस्थित थे.


    श्री शाह ने बताया कि इस सात दिवसीय आयोजन के लिए भारत के बारह राज्यों के साथ भूटान, नेपाल और इंडोनेशिया की सरकारों ने भी अपनी भागीदारी सुनिश्चित की है। मेले में चौबीस दिसंबर को बायर सेलर मीट का आयोजन किया जाएगा जिससे स्थानीय वनसंपदा के विक्रेताओं के लिए वैश्विक बाजार के खरीदार भी उपलब्ध हो सकेंगे। कई सरकारी और गैर सरकारी प्रतिष्ठान भी मेले में अपने उत्पादों के स्टाल लगा रहे हैं। पिछले साल इस मेले में लगभग सवा लाख लोग पहुंचे थे इस बार सात दिनों के मेले में इससे भी ज्यादा तादाद में दर्शक और खरीददार पहुंचेंगे।
    उन्होंने बताया कि मध्यप्रदेश की वनौषधियों में लोगों की रुचि को देखते हुए वन विभाग ने कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया है.मेले में प्रसिद्ध गायक विनोद राठौर, हास्य कलाकार सुनील पाल, कबीर कैफे, आदिवासी लोक नृत्य जैसे कई कार्यक्रमों का आयोजन होगा।
    इस मेले की थीम हर बार की तरह लघुवनोपज से आत्मनिर्भरता रहेगी। पिछले साल बड़ी कंपनियों ने ग्रामीण वनोपज समितियों से 14 करोड़ रुपए के अनुबंध किए थे। इस बार हमें लगभग बीस करोड़ रुपए से अधिक के अनुबंध होने का अनुमान है। हमारा प्रयास है कि विक्रेताओं को सीधे खरीददार उपलब्ध हों और वे दलालों के चंगुल में न फंसें। ये सारे प्रयास मप्र लघुवनोपज संघ और वन विभाग के सहयोग से सफल हो पाए हैं।

  • किसान अब ऊर्जादाता भी बनेगाःगडकरी

    किसान अब ऊर्जादाता भी बनेगाःगडकरी

    भोपाल,7 नवंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। केन्द्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री श्री नितिन गडकरी ने कहा है कि मध्यप्रदेश में कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य हुआ है। मुख्यमंत्री श्री चौहान के नेतृत्व में मध्यप्रदेश को निरंतर कृषि कर्मण पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है। अब मध्यप्रदेश कृषि उत्पादों का निर्यात भी करने लगा है। किसान अन्नदाता के साथ अब ऊर्जादाता भी बनेगा।

    केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री श्री गडकरी ने मंडला में मंडला और डिंडोरी जिले के लिए 1261 करोड़ रूपये लागत की 5 सड़क परियोजना का शिलान्यास किया। केन्द्रीय मंत्री श्री गडकरी ने कहा कि मंडला में प्रकृति का निवास है, यह रानी दुर्गावती की भूमि है तथा यहाँ कान्हा जैसा विश्व प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यान है। जनजातीय कार्यों के विकास के लिए सड़कें अत्यंत जरूरी हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री श्री चौहान, केंद्रीय राज्य मंत्री श्री फग्गन सिंह कुलस्ते सहित स्थानीय जन-प्रतिनिधियों द्वारा दिए गए सड़क विकास के प्रस्तावों पर विस्तृत अध्ययन कर योजनाओं को स्वीकृति दी जाएगी।

    केन्द्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री श्री गडकरी ने देशभर में ऊर्जा के क्षेत्र में परिवहन मंत्रालय द्वारा प्रारंभ की गई नई परियोजनाओं की विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने मध्यप्रदेश में परिवहन के क्षेत्र में इलेक्ट्रिक बसों के संचालन की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि मंडला, डिंडौरी एवं अन्य जनजातीय क्षेत्रों में बाँस के उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सकता है। बाँस से भविष्य में इथेनॉल का निर्माण होगा, जिससे परिवहन एवं अन्य क्षेत्रों के लिए ऊर्जा पैदा की जा सकेगी। केन्द्रीय मंत्री श्री गडकरी ने कान्हा-बालाघाट क्षेत्र में सड़क विकास के लिए नए प्रोजेक्ट को ‘गति शक्ति योजना’ में शामिल करने की बात कही।

    मंडला-जबलपुर हाई-वे का गुणवत्तापूर्ण निर्माण कराने के निर्देश

    केन्द्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री श्री गडकरी ने मंडला-जबलपुर हाई-वे के बारे में चर्चा की। उन्होंने हाई-वे निर्माण में गुणवत्ता से असंतुष्टि जाहिर की और मंडला एवं आसपास के क्षेत्र की जनता को सड़क से हुई परेशानी के लिए मंच से माफी मांगी। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को निर्देशित किया कि राष्ट्रीय राजमार्ग के पुराने कार्य को रिपेयर करें तथा सड़क के खराब हिस्से के निर्माण के लिए जल्द नया टेंडर जारी करें। केन्द्रीय मंत्री श्री गडकरी ने आगामी वर्षों में अलग-अलग परियोजनाओं से सड़क एवं पुलों के विकास के बारे में चर्चा की।

    नर्मदा एक्सप्रेस-वे पर अध्ययन जारी

    केन्द्रीय मंत्री श्री गडकरी ने कहा कि केन्द्र सरकार द्वारा देश के सभी धार्मिक स्थानों तक पहुँचने के लिए लगातार बारह-मासी सड़कों का निर्माण जारी है। उन्होंने अमरकंटक से लेकर धार-झाबुआ तक नर्मदा एक्सप्रेस-वे के निर्माण के संबंध में कहा कि इस मार्ग के निर्माण के लिए मंत्रालय द्वारा अध्ययन जारी है। इस मार्ग के विकास से नर्मदा प्रदक्षिणा करने वाले श्रद्धालुओं को निश्चित रूप से लाभ होगा। केन्द्रीय मंत्री श्री गडकरी ने मध्यप्रदेश में मेडिकल की पढ़ाई हिंदी भाषा में भी प्रारंभ करने पर मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान को सभी विद्यार्थियों की ओर से शुभकामनाएँ दी। उन्होंने कहा कि गरीब एवं वंचित वर्गों तक विकास को पहुँचाना हमारा संकल्प है।

    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि राज्य सरकार चारों तरफ सड़कों के जाल बिछाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। उन्होंने मंडला और डिंडोरी जिले के लिए केंद्र सरकार द्वारा दी गई नई 5 सड़क परियोजना की स्वीकृति के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं केंद्रीय मंत्री श्री गडकरी को धन्यवाद दिया। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने बताया कि वर्ष 2003 के बाद प्रदेश सरकार द्वारा अब तक 3 लाख किलोमीटर से अधिक लंबाई की सड़कें बनाई जा चुकी हैं। उन्होंने कहा कि नर्मदा उद्गम से लेकर धार-झाबुआ तक ’नर्मदा एक्सप्रेस-वे’ बनाने का प्रस्ताव है। ‘नर्मदा एक्सप्रेस-वे’ के दोनों ओर औद्योगिक क्षेत्र के विकास का प्रयास किया जाएगा, जहाँ स्थानीय उत्पादों पर आधारित उद्योग लगाए जाएंगे।

    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि सरकार विकास के कार्यों में कमी नहीं होने देगी। उन्होंने मंडला-डिंडौरी क्षेत्र में घर-घर पानी पहुँचाने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकार के कार्यों की जानकारी दी। उन्होंने सीएम जनसेवा अभियान में मंडला जिले में प्राप्त तथा स्वीकृत आवेदनों की जानकारी देते हुए बताया कि जिले में कुल एक लाख 84 हजार 753 आवेदन में से एक लाख 56 हजार 944 को स्वीकृत किया जा चुका है। उन्होंने केन्द्रीय मंत्री श्री गडकरी से कान्हा क्षेत्र को मुख्य सड़क मार्गों से जोड़ने तथा नर्मदा सौन्दर्यीकरण और विकास के लिए नए प्रस्तावों को स्वीकृति प्रदान करने का आग्रह किया। मुख्यमंत्री ने मंडला जिले में नए सीएम राईज स्कूलों के संचालन, विशेष कोचिंग के माध्यम से नीट परीक्षा में जनजाति बहुल जिलों के विद्यार्थियों की सफलता तथा मध्यप्रदेश में मेडिकल की पढ़ाई हिंदी माध्यम में शुरू किए जाने की जानकारी दी।

    15 नवंबर से लागू होगा ’पेसा एक्ट’

    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि 15 नवंबर को प्रदेश में जनजातीय गौरव दिवस मनाया जाएगा। इसमें प्रदेश में पंचायत से लेकर जिला स्तर तक समारोहपूर्वक अनेक कार्यक्रम होंगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि 15 नवंबर से ही संपूर्ण प्रदेश में सामाजिक समरसता के साथ ’पेसा एक्ट’ भी लागू किया जाएगा। उन्होंने मेडिकल कॉलेज के भूमि-पूजन के लिए जल्द मंडला आने की बात भी कही।

    सड़क परियोजनाओं के शिलान्यास महाकौशल क्षेत्र के लिए अत्यंत गौरव का पल

    केंद्रीय इस्पात एवं ग्रामीण विकास राज्य मंत्री श्री फग्गन सिंह कुलस्ते ने कहा कि पाँच सड़क परियोजना का शिलान्यास महाकौशल क्षेत्र के लिए अत्यंत गौरव का पल है। उन्होंने सड़क परियोजनाओं की स्वीकृति के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी एवं सड़क परिवहन मंत्री श्री गडकरी का मंडला एवं डिंडोरी की जनता तथा स्थानीय जन-प्रतिनिधियों की ओर से अभिनंदन किया। श्री कुलस्ते ने जबलपुर-नैनपुर बाईपास, कान्हा क्षेत्र को प्रमुख मार्गों से जोड़ने, नैनपुर-सिवनी हाई-वे, मंडला-लखनादौन के लिए नई परियोजनाओं की स्वीकृति का आग्रह किया।

    केन्द्रीय मंत्री श्री गडकरी विजनरी, दृष्टिवान तथा नवाचार के धनी

    प्रदेश के लोक निर्माण कुटीर एवं ग्रामोद्योग मंत्री श्री गोपाल भार्गव ने केंद्रीय मंत्री श्री गडकरी को नई सड़क परियोजनाओं की स्वीकृति के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने वर्ष 2014 के बाद से मध्यप्रदेश में सड़क एवं अन्य बड़ी परियोजनाओं के विकास कार्यों की जानकारी दी। मंत्री श्री भार्गव ने सड़क, पुलिया एवं फ्लाईओवर निर्माण के क्षेत्र में बेहतरीन कार्य करने वाले केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री श्री गडकरी को विजनरी, दृष्टिवान एवं नवाचार का धनी बताया।

    कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। केन्द्रीय मंत्री श्री गडकरी तथा मुख्यमंत्री श्री चौहान का स्थानीय जन-प्रतिनिधियों ने कलगी-साफा पहना कर स्वागत किया। कार्यक्रम में 5 सड़क परियोजना पर आधारित लघु फिल्म का प्रदर्शन किया गया। अतिथियों ने सड़क परियोजनाओं पर आधारित प्रदर्शनी का अवलोकन भी किया।

    कार्यक्रम में राज्यसभा सांसद सुश्री संपतिया उईके, विधायकगण सर्वश्री देवसिंह सैयाम, डॉ. अशोक मर्सकोले और श्री नारायण पट्टा, जिला पंचायत अध्यक्ष श्री संजय कुशराम, नगरपालिका अध्यक्ष श्री विनोद कछवाहा और जिला पंचायत उपाध्यक्ष श्री कमलेश टेकाम उपस्थित रहे।

  • पुरानी पेंशन बहाली बनी राजनैतिक हथकंडा

    पुरानी पेंशन बहाली बनी राजनैतिक हथकंडा

    डॉ.अजय खेमरिया

    सत्ता के लिए राष्ट्र के दीर्धकालिक हित क्या वाकई महत्वहीन होते हैं।वस्तुतः संसदीय राजनीति का चरित्र कुछ ऐसा ही ढलता जा रहा है।इस समय देश में सरकारी कार्मिकों के लिए पुरानी पेंशन का मुद्दा खूब छाया हुआ है।गले तक कर्ज में डूबे पंजाब ने अपने 1.60 लाख कार्मिकों के लिए एनपीएस के स्थान पर पुरानी पेंशन बहाली के लिए कदम बढ़ाएं हैं।राजस्थान,छत्तीसगढ़ ,झारखंड पहले ही एनपीएस को अपने यहां बंद कर 1972 की पेंशन योजना को बहाल करने की घोषणा कर चुके है।मप्र में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वित्त विभाग को इस मामले का परीक्षण करने के लिये कहा है और देर सबेर मप्र भी अगले कुछ महीनों में अपने 4.5 लाख कर्मचारियों को पुरानी पेंशन बहाल करने वाला राज्य होगा।गुजरात में कांग्रेस एवं आप भी अपने वादों में इसे दोहरा रहे हैं।स्पष्ट है पुरानी पेंशन मुद्दा एक चुनावी हथकंडा बन गया है और इसकी बहाली में राजनीतिक दल सत्ता की चाबी अंतर्निहित मान चुके हैं।यह जानते समझते हुए भी कि सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन देना सही मायनों में आर्थिक रूप से एक जोखिमपूर्ण नीति है।यह भी एक तरह से रेवड़ी संस्कृति ही है जिसका सामाजिक न्याय या सुरक्षा के साथ कोई तार्किक औऱ युक्तियुक्त संबंध नही है।2004 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 1972 के पेंशन उपबन्धों के स्थान पर भागीदारी केंद्रित एनपीएस योजना को आकार दिया था जिसे बाद में यूपीए सरकार ने भी परिवर्धित रूप से सशक्त बनाया।बंगाल को छोड़कर सभी राज्यों ने इसे अपने यहां लागू किया और आज भी सभी राज्यों एवं केंद्र के कार्मिकों के लिए यह लागू ही है।पुरानी पेंशन असल में 70 के दशक की सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों की मांग पर निर्भर थी।यह रिटायरमेंट के समय अंतिम वेतन पर 50 फीसदी रकम को पेंशन के रूप में निर्धारित करती थी और कर्मचारी की मृत्यु उपरांत कुछ अंतर के बाद परिवार पेंशन में यानी पत्नी के नाम हो जाती हैं। यह वह दौर था जब वेतन आज की तरह ऊंचे नही थे।औसत आयु भी कम थी।इसमें कर्मचारियों को सीधे कुछ भी नही देना होता था जबकि एनपीएस में उन्हें 10 फीसद का अंशदान देना होता है।सरकार भी अपनी ओर से 14 फीसद जमा कर पेंशन फंड में अपना योगदान देतीं हैं।इस एनपीएस के स्थान पर कर्मचारियों द्वारा पुरानी पेंशन को बहाल करने के लिए संगठित रूप से देश भर में दबाव बनाया जा रहा है।सरकार में बैठे और बाहर सत्ता में आने को आतुर राजनीतिक दलों को लगता है कि कर्मचारियों के थोक वोट बैंक से उनकी किस्मत खुल सकती है, इसलिए वे इस योजना के पुराने एवं पश्चावर्ती दुष्परिणामों से वाकिफ होने के बाबजूद आगे बढ़ रहे है।ऐसा इसलिए क्योंकि हर दल को लगता है कि उसकी घोषणा से उस राज्य में तत्काल आर्थिक संकट खड़ा नही होगा इस स्थिति में 10 से 15 साल लगेंगे। इसलिए सत्ता के लिए 15 साल की कड़वी सच्चाई को आज क्यों स्वीकृति दी जाए।वस्तुतः पुरानी पेंशन उस समाजवादी सोच की उपज रही है जिसने राज्य की अवधारणा में नागरिकों को राज्य पर आश्रित बनाकर रखना चाहा है।आज भारत समाजवाद से आगे वैशविक आर्थिक शक्ति के रूप में अपनी जगह बना रहा है।1991 के बाद से जिन आर्थिक नीतियों पर देश आगे बढ़ा है वहां पुरानी पेंशन जैसे प्रकल्प स्वीकार नही हैं।सवाल यह भी कि 2004में इस पुरानी पेंशन को एनपीएस में बदलने की आवश्यकता ही क्यों पड़ी?असल मे 1990 तक आते आते केंद्र एवं राज्यों की अधिकतर सरकार अपने कार्मिकों को समय पर वेतन एवं पेंशन देनें की स्थिति में नही रह गई थीं।58 साल में रिटायरमेंट की आयु 60 फिर कुछ मामलों में 62 औऱ 65 तक कर दी गई। और यह भी तथ्य है कि आज औसतन आयु के मामले में भी 15 से 20 बर्ष का इजाफा हुआ है।ऐसे में पुरानी पेंशन का बोझ करदाताओं के साथ अन्याय तो है ही साथ ही लोकधन के समावेशी वितरण पर भी सवाल उठाता है।

    सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के मुताबिक राज्यों के अपने राजस्व में पेंशन खर्च का हिस्सा तेजी से बढ़ रहा है। यह 1990 तक 8.7 फीसद था और 2020-21 तक बढ़कर करीब 26 फीसद पर आ चुका था। चुनावी लिहाज से अगर राज्य पुरानी पेंशन पर वापिस आते हैं तो परिणाम बहुत खतरनाक हो सकते हैं। यह राज्यों की खस्ताहाल वित्तीय स्थिति को और जर्जर कर देगा।

    एसबीआई रिसर्च के आंकड़ों को देखे तो अधिकतर राज्य अपने कुल राजस्व संग्रहन का अधिकांश हिस्सा अपने कार्मिकों के वेतन,भत्ते,पेंशन पर खर्च कर रहे हैं। बिहार 58.9%उत्तराखंड 58.3%झारखंड 31.5%पश्चिम बंगाल 32.8% कुल राजस्व का खर्च सरकारी कार्मिकों पर खर्च हो रहा है।जिस राजस्थान ने एनपीएस को खत्म करने का निर्णय लिया है वहां हालात यह है कि कुल राजस्व के 58 हजार करोड़ में से 48 हजार करोड़ वेतन भत्तों औऱ 19 हजार करोड़ पेंशन पर खर्च करने पड़ते रहे हैं।उत्तरप्रदेश में कुल 6 लाख करोड़ के बजट में से 55 फीसद अपने कर्मचारियों के वेतन,पेंशन पर जा रहा है।पंजाब में पिछले पांच साल में 44 फीसद कर्ज बढ़ा है और वह अपने डेढ़ लाख करोड़ के बजट में से करीब 61 हजार करोड़ कर्मचारियों के वेतन पेंशन पर खर्च कर रही है।मप्र में भी करीब 52फीसद बजट की राशि इसी मद में व्यय की जा रही है।कुल मिलाकर सभी राज्यों की कहानी एक सी ही है।

    बुनियादी सवाल यह है कि क्या यह आर्थिक सामाजिक न्याय के नजरिये से उचित है? देश मे करीब 12 करोड़ लोग 60 साल से ऊपर है जिनमें से 90 फीसद को किसी प्रकार की संस्थागत पेंशन नही मिलती है।साढ़े पांच करोड़ विधवा महिलाएं इस देश मे है जो अफ्रीका औऱ तंजानिया की कुल आबादी से अधिक हैं।इनमें से अधिकतर आर्थिक सुरक्षा कवच से बाहर है।दुरूह सरकारी तंत्र की दया पर इनमें से कुछ को ही 300 से 600 रुपए मासिक पेंशन मिलती है।देश मे करीब 3 करोड़ दिव्यांग भी है जिन्हें कमोबेश इसी राशि के समतुल्य पेंशन नसीब होती है।31 मार्च 2022 तक एनपीएस में केंद्र सरकार के 2283671 एवं बंगाल छोड़कर राज्यों के मिलाकर कुल 7860657 सरकारी कर्मचारी पंजीबद्ध हैं।यह संख्या 2004 के बाद सरकारी सेवा में आने वालों की है शेष इस तिथि से पहले के भी कार्यरत है जिन्हें पुरानी पेंशन योजना 1972 के तहत लाभ मिलने हैं।एनपीएस में कारपोरेट के 140492,असंगठित क्षेत के 2291660,स्वावलंबन क्षेत्र के 4186943 लोग भी शामिल हैं।अकेले सरकारी कार्मिकों का 7860657 करोड़ एनपीएस में जमा है।जो जीडीपी का करीब 2.4 फीसद है।चुनावी मुहाने पर खड़े राज्यों को लगता है कि वे इस मामले से चुनाव जीत सकते है लेकिन ताजा उत्तरप्रदेश ,उत्तराखंड के उदाहरण सामने है जहां भाजपा को विपक्षी दल इस वादे के बाबजूद हरा नही पाए हैं।बेहतर होगा केंद्र सरकार की तरह सभी राज्य सरकारे भी इस मांग को राष्ट्रीय हितों के साथ विश्लेषित करने का साहस दिखाएं।ऐसा नही होना चाहिये कि विपक्षी दल भाजपा के विरुद्ध इसे एक चुनावी हथियार के रूप में प्रयुक्त करें।राज्यों को यह भी सोचना होगा कि उन्होंने 2004 में इस एनपीएस को अपनाया ही क्यों था?देश में वास्तविक जरूरतमंदों को सामाजिक आर्थिक सुरक्षा का कवच कैसे उपलब्ध हो इस दिशा में चुनावी नही एक सर्वस्पर्शी औऱ समावेशी दृष्टि की आवश्यकता है।एक बार एनपीएस के दायरे में शामिल कुल कर्मचारियों की संख्या और वास्तविक जरूरतमंदों की संख्या का तुलनात्मक अध्ययन भी किया जाना चाहिए।

  • रामराज को अब महाकाल का भी आशीर्वाद

    रामराज को अब महाकाल का भी आशीर्वाद


    क्रांतिदीप अलूने
    शिव सर्वगत अचल आत्मा है, शिव की आराधना शक्ति की आराधना है। शिव अव्यक्त है, उनके सहस्त्रों रूप है। भारत की विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत को “श्री महाकाल लोक” में जिस सुंदर ढंग से प्रदर्शित किया गया है वह अतुलनीय है। यहाँ शांति और निश्चिन्तता के साकार रूप शिव ही शिव है। “श्री महाकाल लोक” सनातन संस्कृति की पौराणिकता,ऐतिहासिकता और गौरवशाली परम्परा का अद्भुत संगम और अद्वितीय नूतन रूप है। इसे जिस भव्यता और सुंदरता से प्रदर्शित किया गया है, वह चमत्कृत कर देता है।

    दरअसल प्राचीन पुण्य सलिला माँ क्षिप्रा के तट पर बसी प्राचीनतम नगरी उज्जैन का “श्री महाकाल लोक” भगवान शिव के भक्तों के स्वागत के लिए तैयार है। महाकाल मंदिर के नवनिर्मित कॉरिडोर को 108 स्तंभ पर बनाया गया है, 910 मीटर का ये पूरा महाकाल मंदिर इन स्तंभों पर टिका होगा। महाकवि कालिदास के महाकाव्य मेघदूत में महाकाल वन की परिकल्पना को जिस सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया था, सैकड़ों वर्षों के बाद उसे साकार रूप दे दिया गया है। दुनिया भर से उज्जैन आने वाले शिव भक्तों के लिए यह शिव महिमा का सम्पूर्ण अनुभव देने का अनूठा और अद्भुत प्रयास है।

    “श्री महाकाल लोक” आधुनिक व्यवस्थाओं और संसाधनों से भी परिपूर्ण बनाया गया है। इसकी व्यवस्था इतनी उत्कृष्ट है कि भक्तों और पर्यटकों को अभिभूत कर देगी। मंदिरों के साथ ही पूजा सामग्री और हार-फूल की दुकानों को भी विशिष्ट तरीके से लाल पत्थर से बनाया गया है,जिन पर सुंदर नक्काशी की गई है। “श्री महाकाल लोक” के निर्माण से भगवान शिव की जिन कथाओं का महाभारत, वेदों तथा स्कंद पुराण के अवंती खंड में उल्लेख है, उनका जीवंत अनुभव शिव भक्त धर्मनगरी उज्जैन में कर पाएंगे। महाकाल ज्योतिर्लिंग एक मात्र ज्योतिर्लिंग है जो दक्षिणमुखी है। सनातन धर्म में महाकाल के दर्शन जीवन का एक महत्वपूर्ण और आवश्यक भाग माना जाता है, जिससे शांति मिलती है। इसलिए लाखों भक्त नित्य इस देव स्थान पर आते हैं। “श्री महाकाल लोक” के जरिए शिव के सभी स्वरूप एक स्थान पर लाना मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार का ऐसा दुर्लभ कार्य है जिसकी और कोई मिसाल नहीं हो सकती।

    शिव मंगल, शुभ और सौभाग्यसूचक देव है, वे सदाशिव है, जो ब्रह्मा से सृष्टि रचवाते है, विष्णु से उसका पालन करवाते है तथा रूद्र से उसका नाश करवाते है। “श्री महाकाल लोक” में शिव, शम्भू, शशिशेखर के सहस्त्रों रूप और उनकी महिमा को सुंदर ढंग से उकेरा गया है। शिवलिंग सार्वभौमिक रूप से सृजन का प्रतीक है और “श्री महाकाल लोक” भारतीय सांस्कृतिक विरासत को साक्षात् प्रतिबिम्बित कर रहा है। यहाँ शिव का मृत्युंजय रूप भी है, जिसकी उपासना से मृत्यु को भी मात दी जा सकती है। यहाँ महादेव भी है जिसकी उपासना से हर ग्रह नियंत्रित रहता है।

    मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान स्वयं शिव भक्त है, वे सावन माह की शाही सवारी में कई वर्षों से शामिल होते रहे है। उनके कार्यकाल में वर्ष 2016 में उज्जैन में ऐतिहासिक सिंहस्थ सम्पन्न हुआ था। व्यवस्थाओं और संसाधनों की दृष्टि से इसे भारत का अब तक का सबसे सफलतम धार्मिक आयोजन माना जाता है। वे उज्जैन को धार्मिक पर्यटन नगरी के रूप में उभारने को लेकर प्रतिबद्ध रहे और इसी के दृष्टिगत सिंहस्थ के ठीक बाद वर्ष 2017 में “श्री महाकाल लोक” की योजना बनी। यह करोड़ों भारतीयों का सौभाग्य है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी भी शिव भक्त है और उनके नेतृत्व में देश भर में आध्यात्मिक और धार्मिक स्थानों का निरंतर कायाकल्प हो रहा है। इस प्रकार प्रधानमंत्री की दूरदर्शिता तथा मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की कार्यकुशलता से ही “श्री महाकाल लोक” का सपना साकार हो सका है।

    हम सभी जानते हैं कि महाकाल दर्शन का बड़ा धार्मिक महत्व है। इसे मोक्ष प्रदान करने वाला स्थल माना जाता है। स्कंदपुराण के अनुसार इसे मंगल ग्रह की उत्पत्ति का स्थान माना जाता है। उज्जैन का इतिहास अनादि काल से माना जाता है और राजनीतिक, आध्यात्मिक और साहित्यिक दृष्टि से भी इसे उत्कृष्ट स्थान माना जाता है। भारत की पौराणिक और धार्मिक महत्व की सात प्रसिद्ध पुरियों या नगरियों में उज्जैन प्रमुख स्थान रखता है बल्कि यहाँ साक्षात दैवीय शक्तियों का आज भी वास है। उज्जयिनी को विशाला, प्रतिकल्पा, कुमुदवती, स्वर्णश्रंगा और अमरावती के नाम से भी जाना जाता है तथा यहाँ स्थित महाकालेश्वर मंदिर भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। पुराणों, महाभारत और कालिदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में इस मंदिर का मनोहर वर्णन मिलता है।

    उज्जैन में “श्री महाकाल लोक” के निर्माण का फायदा न केवल शिव भक्तों को मिलेगा बल्कि रोजगार और पर्यटन की दृष्टि से भी यह फलदायी होगा। “श्री महाकाल लोक” में लाखों लोग एक साथ भ्रमण कर सकते हैं और रुकने की दृष्टि से भी इसे सर्व सुविधायुक्त बनाया गया है। अब शिव भक्त यहाँ महाकाल के दर्शन के लिए आएंगे भी और आराम से वे रुक भी सकेंगे। ऐसे में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। उज्जैन के पास मंदसौर का प्रसिद्ध पशुपतिनाथ का मंदिर, मांडू और ओंकारेश्वर भी है। अत: मध्य प्रदेश में मालवा का यह सम्पूर्ण क्षेत्र धार्मिक कॉरिडोर के रूप में पहचान बनाने में निश्चित ही सफल होगा। मालवा के क्षेत्र को शांत और मौसम के लिहाज से उत्कृष्ट माना जाता है, अब “श्री महाकाल लोक” की लोकप्रियता और आकर्षण से इस क्षेत्र में नये-नये उद्योग भी बढ़ेंगे। बहरहाल उज्जैन में नवनिर्मित “श्री महाकाल लोक” भारत के धार्मिक और आध्यात्मिक स्थानों के लिए उत्कृष्ट उदाहरण बनने जा रहा है। सांस्कृतिक विरासत,रोजगार और पर्यटन के अदभुत केंद्र के रूप में दुनिया भर में अपना विशिष्ट स्थान बनाने में यह सफल होगा, इसकी स्वर्णिम संभावनाएं है।

  • पीएफआई पर प्रतिबंध पर्याप्त नहीं

    पीएफआई पर प्रतिबंध पर्याप्त नहीं


    पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के ठिकानों पर राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण(एनआईए) के छापों ने देश में राजनैतिक रूप से गुमराह तबके की असलियत को उजागर कर दिया है। ये कड़वी सच्चाई है कि लगभग एक सौ तीस करोड़ की आबादी के विशाल हिंदुस्तान में बड़ा तबका आज भी मूलभूत जरूरतों के लिए जद्दोजहद कर रहा है। केन्द्रीय मंत्री और भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी ने भी स्वीकार किया है कि भारत धनवान देश है लेकिन यहां की जनता गरीब है, लोग बेरोजगारी और भुखमरी से जूझ रहे हैं। यहां आज भी जातिवाद, अस्पृश्यता और मंहगाई ने लोगों का जीवन दूभर कर रखा है। उनकी इस स्वीकारोक्ति के बावजूद ये भी सच्चाई है कि देश की अधिसंख्य आबादी अपना जीवनस्तर सुधारने की हरसंभव कोशिशें कर रही है। इसके विपरीत कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपना जीवन संवारने के लिए आतंक से आधिपत्य का रास्ता चुनने का ख्वाब देख रहे हैं। इन पर प्रहार समय की मांग है। एनआईए और तमाम सुरक्षा एजेंसियों ने बड़ी कुशलता से पीएफआई के अड्डों पर छापों में और स्लीपर सेल से जुड़े लोगों को गिरफ्तार किया है। पीएफआई के सहयोगी संगठनों और राजनैतिक विंग सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी आफ इंडिया (एसडीपीआई) में भी सक्रिय लोगों की गिरफ्तारियां हुईं हैं। लंबी छानबीन के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने जो तथ्य जुटाए हैं उनकी वजह से छापों की अहमियत बढ़ गई है। ये भी तय है कि सबूतों के आधार पर पकड़े गए लोगों की सजा अभी से मुकर्रर हो गई है। साक्ष्य इतने अकाट्य हैं कि आतंक और विद्रोह का जाल फैलाने वालों का शेष जीवन अब जेलों में ही कटेगा। इन तथ्यों की जानकारी अभी देश के लोगों को नहीं है यही वजह है कि एनआईए के छापों को लोग राजनीति से प्रेरित बता रहे हैं। न केवल मुसलमानों बल्कि उन्हें अपना वोट बैंक मानने वाले लालू प्रसाद यादव और मायावती जैसे नेताओं ने भी छापों पर नाराजगी जताना शुरु कर दिया है। मुस्लिम समुदाय के ज्यादातर व्यक्ति यही कहते सुने जा रहे हैं कि भाजपा और खासतौर पर आरएसएस के इशारे पर ये कार्रवाई अपने विरोधियों को कुचलने के लिए की गई है। जबकि हकीकत ये है कि विदेशों से करोड़ों रुपयों का धन गरीबों के कल्याण के नाम पर लाया जा रहा था और उसका इस्तेमाल आतंकी वारदातों को अंजाम देने के लिए किया जा रहा था। ये कहा जाता था कि अरब देशों की तेल समृद्धि का बड़ा हिस्सा जकात के नाम पर देश को मिलता है। धर्म के प्रचार प्रसार के लिए भी अरब देशों से जो धन आता है उससे गरीब मुस्लिम आबादी का कल्याण किया जा रहा है। ये बात ऊपरी तौर पर सही भी नजर आती है। देश भर में खुले मदरसों के माध्यम से जो धार्मिक शिक्षा दी जाती है उससे कई प्रतिभाशाली बच्चे भी सामने आते हैं लेकिन वे तो तब भी उभरते जब उन्हें देश के सरकारी स्कूलों में शिक्षा मिली होती। ईसाईयों ने भी शिक्षा में जो निवेश किया है उससे भी दुनिया के लिए अच्छे पेशेवर मिले हैं। इसका मतलब ये तो नहीं कि वे आतंक की नर्सरी भी बन गए। एनआईए को मदरसों और जकात की आड़ में आतंकियों को फंडिंग किए जाने के जितने स्पष्ट सबूत मिले हैं उससे साफ जाहिर होता है कि भारत जैसे विशाल बाजार पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के लिए दुनिया की कई शक्तियां किस तरह देश को गृह युद्ध की ओर धकेल रहीं हैं। इस्लामिक स्टेट ऑफ़ इराक एंड सीरिया यानी आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन देश की तरुणाई को गुमराह करने के लिए क्या क्या हथकंडे अपना रहे हैं इसके भी सबूत एनआईए के हाथ लगे हैं। स्कूल, कालेजों के परिसरों में कैंपस फ्रंट आफ इंडिया( सीएफआई) और नेशनल वीमेंस फ्रंट( एनडब्ल्यूएफ) के माध्यम से कैसे बच्चों को साफ्ट टारगेट के रूप में गुमराह किया जाता है ये भी चिंताजनक है। यही वजह है कि सबूतों को देखते हुए मुस्लिम आबादी का बड़ा हिस्सा अपनी नाराजगी तो जता रहा है लेकिन उसने इस कार्रवाई में कोई व्यवधान नहीं डाला है। भारत के मुसलमान प्रगतिशील माने जाते हैं। यही वजह है कि दुनिया के आतंकी संगठन भारत के मुसलमानों पर भरोसा नहीं करते हैं। मुस्लिम आतंकियों के निशाने पर रहने वाले आरएसएस को भी भारत के मुसलमान अब तिरछी निगाह से नहीं देखते हैं। उन्हें ये तो पता है कि आरएसएस हिंदुत्व की विचारधारा का समर्थन करता है लेकिन वे ये भी जानते हैं कि हिंदुत्व की विचारधारा सर्वपंथ समभाव के घोषित विचार पर कार्य करती है। आरएसएस ने कभी मुस्लिम धर्म को न तो नकारा है न ही उस पर कोई प्रहार किया है। भारत में मुसलमान आज भी अपनी योग्यता के बल पर ऊंचाईयां छू सकता है। यही वजह है कि भारत में आतंक के पर फैलाने का प्रयास टांय टांय फिस्स हो गया है। अब सरकार को सोचना होगा कि आखिर वे क्या वजहें थीं जिसके चलते लोग भारत की साम्प्रदायिक एकता में सेंध लगाने की जुर्रत भी करते हैं। मोदी सरकार ने कई मूलभूत समस्याओं पर प्रहार किया है। इसके बावजूद सरकार के आंख,नाक, कान ,हाथ और पैर जिस तंत्र पर टिके हैं उनकी कार्यक्षमता लगभग शून्य है। मध्यप्रदेश के कृषि मंत्री कमल पटेल ने तो सार्वजनिक तौर पर कहा है कि हम दो लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था में से साठ हजार करोड़ रुपए केवल तनख्वाह बांटते हैं इसके बावजूद सरकारी तंत्र जन समस्यायों के निराकरण की जवाबदारी नहीं निभा पा रहा है। सरकार ने जो हितग्राही मूलक योजनाएं बनाई हैं उनका लाभ भी जनता को नहीं मिल पा रहा है। लगभग अठारह साल से काम कर रही शिवराज सिंह चौहान सरकार अब तक इसी सरकारी तंत्र के सहारे अपने राजनैतिक उद्देश्य पाने का प्रयास करती रही है। उसके मंत्री विधायक और कार्यकर्ता बार बार चेताते रहे हैं कि सरकारी अफसर जनता की योजनाओं को लागू नहीं कर रहे हैं लेकिन इस तंत्र ने पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं को योजनाओं की रिश्वत देकर खामोश कर दिया। आज जब चुनाव की बेला आ रही है तब भाजपा के नेतागण अपनी अक्षमता और असफलता का ठीकरा अफसरशाही पर थोप रहे हैं। इससे जनता की समस्याओं का समाधान कैसे हो सकेगा। मोदी सरकार भी यदि यही शैली अपना ले तो जाहिर है कि जनता को अपनी जरूरतों के लिए अन्य साधनों की ओर रुख करना होगा। आतंकी साजिशों ने भारत की इसी कमजोरी का फायदा उठाने की चेष्ठा की है। इसका अर्थ ये भी हुआ कि सरकार भले ही अपनी सुरक्षा एजेंसियों के सहारे आतंक के साजिशकर्ताओं को पकड़कर जेलों में ठूंस दे लेकिन दहशत फैलाने की ये परंपरा बंद नहीं होगी। भारत की अर्थव्यवस्था में बड़ी हिस्सेदारी डॉलर के आयात पर निर्भर होती है। सरकार का प्रयास भी होता है कि किसी भी बहाने डॉलर देश में आते रहें । यही कारण है कि कल्याणकारी गतिविधियों के लिए विदेशों से धन लाने वालों को सरकार टैक्स में भी राहत देती है। अब यदि उस धन का इस्तेमाल आतंकियों गतिविधियों के लिए किया जाने लगे तो भारत की विकास प्रक्रिया षड़यंत्रों की भेंट चढ़ जाएगी। इसे रोकने के लिए एनआईए ने जो कार्रवाई की है उसका समर्थन किया जाना चाहिए। इसके साथ साथ ये भी जरूरी है कि सरकार पूरी पारदर्शिता से अपनी विकास प्रक्रियाएं चलाए जिससे असंतोष को जड़ें जमाने का अवसर न मिले। आरएसएस और भाजपा को अपने कार्यकर्ताओं का भी प्रशिक्षण इस तरह से करना चाहिए ताकि वे अपनी भड़काऊ बयानबाजियों से लोगों को विद्रोह का मार्ग अपनाने के लिए मजबूर न करें। पीएफआई पर प्रतिबंध पर्याप्त नहीं है इससे आगे बढ़कर हमें एक ऐसी विचारधारा का सूत्रपात करना होगा जो न केवल भारत बल्कि विश्व में भी मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करे।

  • अफसरशाही की गर्राहट

    अफसरशाही की गर्राहट


    आदिवासियों को कुत्ता कहकर उनकी औकात बताने वाले एसपी अरविंद तिवारी को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हड़बड़ाहट में हटा दिया है। झाबुआ के कलेक्टर सोमेश मिश्रा को भी हटाया गया है। उन पर आरोप था कि वे सरकारी योजनाओं की डिलीवरी नहीं कर पा रहे थे। पिछले विधानसभा चुनावों में आदिवासियों की नाराजगी से भाजपा अपनी सरकार खोने का दंश झेल चुकी है। इस बार भी भाजपा चिंतित है। यदि आदिवासियों के आक्रोश को न थामा गया तो उसे इस बार भी सरकार बनाना कठिन हो जाएगा। आदिवासी ही नहीं भाजपा के सबसे बड़े जनाधार पिछड़ा वर्ग की बेचैनी भी भाजपा के लिए चिंता का सबब बनी हुई है। पिछले चुनाव में ब्राह्रण मतदाताओं ने जिस तरह अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए भाजपा से विद्रोह किया वह भी भाजपा के लिए भय की एक वजह बनी हुई है। यही कारण था कि भाजपा ने ब्राह्मण अफसरों ,नेताओं और ठेकेदारों को भरपूर लूट की छूट दी। अब भाजपा इस मुहाने पर आ गई है जहां सभी तबके उसे ब्लैकमेल कर रहे हैं। कमलनाथ कांग्रेस विद्रोह की इस खेती को करने में पूरी शिद्दत से जुटी हुई है।हालत ये है कि कमलनाथ राहुल गांधी की पदयात्रा और विधानसभा जैसे मौकों में भी उलझने से बच रहे हैं। भाजपा की स्थिति भई गति सांप छछूंदर जैसी हो गई है। तमाम हितग्राही मूलक योजनाएं बनाने और कांग्रेस से जनता की सहज नफरत के बावजूद भाजपा को चुनावी दौड़ में हांफी आ रही है।मध्यप्रदेश के शासकों की अकुशलता इसकी सबसे बड़ी वजह रही है।शिवराज सरकार को लगभग अठारह साल काम करने का मौका मिला। अथाह बहुमत ने उन्हें भरपूर आजादी दी। इसके बावजूद उनकी सरकार अब तक जनता की कसौटी पर खरी नहीं उतर पाई है। दिग्विजय सिंह की भ्रष्ट सरकार 2003 में सत्ताच्युत हुई थी। उन्होंने पंचायती राज के माध्यम से सत्ता के समानांतर तंत्र खड़ा करने का असफल प्रयास किया था। वह प्रयास बुरी तरह औंधे मुंह गिरा। इसकी पृष्ठभूमि में पंचायतों और प्रतिनिधियों का भ्रष्टाचार प्रमुख वजह रही थी। अफसरशाही को उन्होंने जिस तरह गली का कुत्ता बनाया उससे अफसरशाही ने भाजपा के प्रतिनिधि बनकर उमा भारती की सरकार को रिकार्डतोड़ सफलता दिलाई थी। उमा भारती ने तो अफसरशाही को उत्पादकता के लिए कसा लेकिन उनके बाद बाबूलाल गौर और फिर शिवराज दोनों ने अफसरशाही के इस अहसानों के बदले में सत्ता की बागडोर उसे ही थमा दी। शुरु से भाजपा के नेता और मंत्री बोलते रहे हैं कि अफसर उनकी नहीं सुनते। वे जो प्रस्ताव अफसरों के पास बनाकर देते हैं उन्हें वे रद्दी की टोकरी में फेंक देते हैं। भाजपा के नेताओं का ये दर्द सही था और आज भी बरकरार है। अफसरशाही ने शिवराज के कार्यकाल में जो मलाई कूटी है उसे अफसरों पर पड़े छापों और रंगे हाथों पकड़े गए अफसरों की संख्या देखकर आसानी से समझा जा सकता है। भाजपा ने खुद अफसरशाही की गोदी में बैठकर हितग्राही मूलक योजनाओं का भरपूर लाभ उठाया है। अपने कार्यकर्ताओं को दोनों हाथों में लड्डू थमाए। संघ के नाम पर तो चिरकुटों तक ने सरकारी खजाने को मनचाहे ढंग से उलीचा। अफसरशाही और भाजपा की इस लूट में जनता उपेक्षित होती रही। यदा कदा जनता के बीच भी योजनाओं का लाभ पहुंचा जिससे असंतोष अब तक हिंसक विद्रोह का रूप नहीं ले सका है।लोगों को अब भी लगता है कि शायद कभी उनकी भी लाटरी लग जाए, जो अब संभव नहीं है। कमलनाथ इसी असंतोष को उभारने का जतन कर रहे हैं। दिल्ली के बाद पंजाब में आप पार्टी ने भाजपा की धन बटोरने वाली शैली को मुफ्त बिजली के वादे से धराशायी किया है। राहुल गांधी भी अपनी यात्रा में भाजपा को अडानी अंबानी की सरकार कह रहे हैं।कांग्रेस वैसे भी पूंजीपतियों को शैतान बताकर उन पर कंकर फेंककर तालियां बजवाती रही है। कांग्रेस का ये पुराना तरीका उसे एक बार फिर जीवन दे रहा है। भाजपा के नेतागण असहाय हैं वे अपने लिए धन जुटाने वाले अफसरों उद्योगपतियों और ठेकेदारों पर आखिर कैसे प्रहार कर सकते हैं। झाबुआ के कलेक्टर एसपी को हटाकर शिवराज सिंह ने आदिवासियों को खुश करने का फौरी प्रयास किया है। भाजपा के मुख्यमंत्री जिनमें शिवराज सिंह चौहान सबसे अव्वल हैं वे चोरी छिपे मोदी सरकार की नीतियों को जन असंतोष की वजह बताते रहे हैं। ये बात बहुत हद तक सही भी है। मोदी सरकार ने टैक्स वसूलने और सब्सिडी बंद करने में जो तेजी दिखाई है उससे जनता में असंतोष फैला है। इसके बावजूद शिवराज सिंह चौहान और अन्य राज्यों की सरकारें जनता को इन बदली परिस्थितियों के बीच जिंदा रहने की कला नहीं सिखा पाई हैं। कांग्रेस की मुफ्तखोरी वाली राजनीति को बंद कभी न कभी तो होना ही था लेकिन भाजपा ने अधूरे प्रहार किए हैं। वह न तो मुफ्तखोरी की नीतियां पूरी तरह बंद कर पाई है और न ही जनता को धन बनाने की कला सिखा पाई है। जाहिर है इससे असंतोष बढ़ रहा है। उस पर झाबुआ एसपी अरविंद तिवारी की नशे में धुत्त बदतमीजी और प्रशासनिक अकुशलता की वजह से कलेक्टर सोमेश मिश्र ने आदिवासियों के असंतोष को हवा दे दी है। जाहिर है मुख्यमंत्री ने मजबूरी में उन्हें हटाया है। सोमेश मिश्र ने कलेक्टरी से पहले आयुष्मान मिशन के सीईओ की जवाबदारी संभाली थी। कलेक्टरी भी उन्हें इनाम के तौर पर मिली थी। जब भाजपा की शिवराज सरकार अफसरों की मैदानी पोस्टिंग उपकृत करने के अंदाज में करती रही है तो फिर अफसर मैदान में जाकर अपना करिश्मा आखिर क्यों न दिखाएंगे। जाहिर है मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार को अपने किए कर्मों का फल मिलना शुरु हो गया है। भाजपा की अकुशलता कांग्रेस के लिए भाग्य से छींका टूटने वाली साबित हो रही है। पिछले चुनाव में भी कांग्रेस के भाग्य से छींका टूटा था उसने सत्ता में आकर यही लूट का दौर चलाया था। अब यदि जनता भाजपा से नाराज होती है तो उसे एक बार फिर कमलनाथ जैसा नागनाथ सौगात में मिलेगा।अफसरशाही तो मदमस्त है ही।

  • नगर निगम के कमर्शियल टैक्स के विरोध में होटल संचालकों ने महापौर को दिया ज्ञापन

    नगर निगम के कमर्शियल टैक्स के विरोध में होटल संचालकों ने महापौर को दिया ज्ञापन


    भोपाल,1 सितंबर। नगर पालिक निगम की ओर से लगाए गए व्यावसायिक कर के विरोध में आज महाराणा प्रताप नगर के होटल संचालकों ने महापौर मालती राय को ज्ञापन दिया। जिसमें उन्होंने इस नए टैक्स को अव्यावहारिक और शोषणकारी बताया है। इस टैक्स को लेकर व्यापारियों ने पहले भी आपत्ति दर्ज कराई थी लेकिन टैक्स भरने की अंतिम समय सीमा 31 अगस्त बीत जाने की वजह से मिलने वाली छूट की समयावधि भी बीत गई है। व्यापारियों ने यह टैक्स हटाकर टैक्स भरने की तिथि एक बार बढ़ाने की मांग भी की है।

    नगर निगम की फिजूलखर्ची और स्मार्ट सिटी के कर्ज का बोझ व्यापारियों पर डालने से वे आंदोलित हैं.


    महापौर श्रीमती मालती राय से मुलाकात करने पहुंचे एमपीनगर भोपाल होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन ने व्यावसायिक लाईसेंस की प्रक्रिया बदलने को असंगत और बोझ बताया है। एसोसिएशन के अध्यक्ष और होटल आर्च मैन्योर के प्रोप्राईटर एस.एन.माहेश्वरी ने बताया कि इस नए टैक्स से सारे व्यापारी परेशान हैं। कोरोना काल की मंदी की वजह से न तो कारोबार है और न ही व्यापारी अब तक घाटे से उबर पाए हैं। इसके बावजूद निगम ने एक नया टैक्स लाद दिया है। उन्होने महापौर को बताया कि ये टैक्स संपत्तिकर, पानी बिजली और कचरा कर के अलावा वसूला जा रहा है। इस टैक्स में सभी व्यावसायिक संपत्तियों के क्षेत्रफल के आधार पर टैक्स की गणना की गई है। ये अव्यावहारिक है और इतना ज्यादा है कि आम व्यापारी इसे चुकाने में सक्षम नहीं है। ऐसे में इस टैक्स को पूरी तरह हटाया जाए और जो लोग ये टैक्स जमा कर चुके हैं उस राशि को अगले साल के टैक्स में समायोजित किया जाए।
    श्री माहेश्वरी ने बताया कि पहले नगर निगम होटल के कमरों के आधार पर आय की गणना करता था और उस पर कर लगाया जाता था। नई व्यवस्था में होटल के खुले क्षेत्र और बाथरूम, बरामदे आदि को भी टैक्स के दायरे में लिया गया है जबकि इन स्थानों से आय नहीं होती है। व्यापारियों ने इस टैक्स का विरोध तभी से करना शुरु कर दिया था जब नगर निगम के राजस्व अमले ने उन्हें मांग पत्र सौंपे थे। व्यापारियों की आपत्ति पर निगम ने कोई फैसला नहीं लिया और कर भरने की समय सीमा भी निकल गई।
    व्यापारियों ने कहा कि ये टैक्स नगर निगम कमिश्नर श्री वीएस चौधरी कोलसानी ने तब मंजूर कराया था जब नगर निगम की चुनी हुई परिषद भंग की जा चुकी थी। इस फैसले में आम नागरिकों के बीच रायशुमारी नहीं की गई थी। हैदराबाद की तर्ज पर लागू की गई इस व्यवस्था को तब लागू किया गया है जब भीषण मंदी का दौर चल रहा है। ऐसे में चुनी हुई परिषद को इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।
    ज्ञापन देने वालों में भोपाल
    हॉस्टल एसोसिएशन के अध्यक्ष एमपी नगर कोचिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष संजय तिवारी एवं कई पदाधिकारी शामिल थे।
    महापौर श्रीमती मालती राज ने संघ के पदाधिकारियों को आश्वासन दिया है कि उनकी मांगों को दो-तीन दिन के अंदर कुछ ना कुछ निराकरण अवश्य करेंगे।
    संघ के कुछ पदाधिकारियों का कहना है कि अगर निर्णय उनके पक्ष में नहीं जाता तो वह उच्च न्यायालय की शरण में जाने के लिए तैयारी कर रहे हैं

  • स्वच्छता में अव्वल भारत नगर के लोगों ने उल्लास से मनाया स्वाधीनता दिवस

    स्वच्छता में अव्वल भारत नगर के लोगों ने उल्लास से मनाया स्वाधीनता दिवस


    भोपाल,15 अगस्त( प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान में बढ़ चढ़कर भागीदारी निभाने वाले राजधानी के भारत नगर के वासियों ने स्वाधीनता दिवस उल्लास के साथ मनाया । स्वाधीनता के अमृत महोत्सव पर 13 अगस्त 15 अगस्त तक विभिन्न कार्यक्रमों की श्रंखला चलाई गई। तिरंगा अभियान से ही ये उत्साह परवान चढ़ने लगा था और भारी वर्षा के बीच झंडावंदन करके रहवासियों ने विकसित भारत के लक्ष्य के प्रति अपना संकल्प दुहराया।
    स्वच्छता के मापदंडों पर खरा उतरने वाले भारत नगर को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने द्वितीय पुरस्कार से सम्मानित किया था। भोपाल नगर पालिक निगम क्षेत्र में अव्वल आने वाली ये एकमात्र रहवासी समिति है जिसका संचालन राज्य का सहकारिता विभाग कर रहा है। विभाग की ओर से नियुक्त प्रशासक मुकुंद राव भैंसारे के आव्हान पर रहवासियों ने विभिन्न चरणों में स्वाधीनता दिवस के आयोजन किए थे। इस अवसर पर श्री भैंसारे ने ध्वजारोहण करके मुख्य समारोह का मार्गदर्शन किया। कार्यक्रम का संचालन श्री एम.के.सचदेव ने किया। आजादी की 75 वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित रंगारंग कार्यक्रम में अमर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। सभी वक्ताओं ने भारत को प्रगति की नई ऊंचाईयों तक ले जाने का संकल्प दुहराया।

    स्वाधीनता के अमृत महोत्सव में भागीदारी निभाने वाले युवाओं ने झंडावंदन के साथ सांस्कृतिक आयोजन में भी भाग लिया।


    ध्वजारोहण समारोह में भारत नगर के सभी गणमान्य नागरिकों ने भारी वर्षा के बावजूद अपनी भागीदारी निभाई। सर्वश्री सुदर्शन राजपूत, के.सी.शर्मा, श्री नामदेव,श्री जेपी सिंह,श्री शेडगै जी,सुश्री दिव्या अत्री ,सुश्री पल्लवी शर्मा,सुश्री सुनीता विश्वकर्मा, सुश्री सुषमा चौकसे, सुश्री अल्पना ,सुश्री अनुजा मजूमदार,श्री महेन्द्र कोकाटे,श्री गोपेश तारे, श्री अनिल त्यागी, श्री शैलेन्द्र गुजरावत, श्री एस.के.चौकसे, समेत बड़ी संख्या में बच्चे और युवाजन भी उपस्थित थे।

    भारत नगर की मातृशक्ति ने स्वाधीनता दिवस समारोह को सतरंगी आभा से सराबोर कर दिया।


    स्मरण रहे कि भरत नगर सोसायटी को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्वच्छता के पैमाने पर द्वितीय पुरस्कार से सम्मानित किया है। एक साल में दो बार इस सोसायटी को स्वच्छता की दिशा में उल्लेखनीय योगदान के लिए पुरस्कृत किया गया है।राजधानी में 475 हाउसिंग गृह निर्माण समितियां और 125 रहवासी समितियां हैं। इनके बीच भारत नगर की गृह निर्माण समिति का संचालन कुशलता पूर्वक किया जा रहा है।समिति की ओर से स्वाधीनता दिवस समारोह में लगभग 45 रहवासियों को स्वच्छता प्रमाण पत्र प्रदान किए गए। समारोह में शामिल युवाओं और बच्चों को मिठाई का वितरण भी किया गया।

  • कोरोना की बूस्टर डोज जरूर लगवाएं बोले स्वास्थ्य मंत्री डॉ.प्रभुराम चौधरी

    कोरोना की बूस्टर डोज जरूर लगवाएं बोले स्वास्थ्य मंत्री डॉ.प्रभुराम चौधरी

    भोपाल, 21 जुलाई( प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. प्रभुराम चौधरी ने कहा कि सभी पात्र व्यक्ति कोविड टीके की प्रिकॉशन (बूस्टर) डोज अवश्य लगवायें। कोविड वैक्सीन अमृत महोत्सव में कोविड-19 प्रिकॉशन डोज 18 वर्ष से अधिक आयु के सभी पात्र व्यक्तियों को नि:शुल्क लगाया जा रहा है। स्वास्थ्य मंत्री डॉ. चौधरी आज होटल अशोक लेक व्यू के ओपन थियेटर में ड्राइव इन वैक्सीनेशन का शुभारंभ कर रहे थे।

    स्वास्थ्य मंत्री डॉ. चौधरी ने कहा कि एम.पी. टूरिज्म, यूनीसेफ और एनएचएम द्वारा ड्राइव इन वैक्सीनेशन का नवाचार किया गया है। इसके लिये अशोक लेक व्यू होटल के ओपन थियेटर परिसर में टीकाकरण केन्द्र बनाया गया है। यहाँ पर कोई भी पात्र व्यक्ति वाहन ड्राइव करते हुए टीकाकरण केन्द्र में पहुँच कर वाहन में बैठे-बैठे कोविड-19 प्रिकॉशन डोज लगवा सकता है। यह सुविधा दिव्यांग और वृद्धजन के लिये आसानी से टीका लगवाने में मददगार है। स्वास्थ्य मंत्री डॉ. चौधरी ने कहा कि इस नवाचार से पहले टीकाकरण अभियान में 50 हजार से अधिक व्यक्तियों को कोविड-19 के टीके लगाये गये।

    स्वास्थ्य मंत्री डॉ. चौधरी ने कहा कि कोविड टीका बहुत महत्वपूर्ण है। टीकाकरण के बाद आई तीसरी लहर में कोविड टीका ने सुरक्षा प्रदान की और जिन्हें कोरोना हुआ, उनमें से बहुत कम को अस्पताल जाना पड़ा। स्वास्थ्य मंत्री डॉ. चौधरी ने सभी नागरिकों से अपील की है कि कोरोना की प्रिकॉशन डोज अवश्य लगवायें। डायरेक्टर एनएचएम (टीकाकरण) डॉ. संतोष शुक्ला, जनरल मैनेजर एम.पी. टूरिज्म श्री के.आर. साद, श्री एस.पी. सिंह, संचार विशेषज्ञ यूनिसेफ मध्यप्रदेश श्री अनिल गुलाटी और डॉ. वंदना भाटिया उपस्थित थीं।

  • भाजपा जन स्वास्थ्य बढ़ाने में फेल – यश भारतीय 

    भाजपा जन स्वास्थ्य बढ़ाने में फेल – यश भारतीय 

    भोपाल,19 जून(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर) समाजवादी पार्टी मप्र युवजन सभा प्रदेश अध्यक्ष यश भारतीय ने आरोप लगाया है, भाजपा की केंद्र और राज्य सरकारों ने मिलकर शासकीय स्वास्थ्य व्यवस्था चौपट करते हुए निजी और महंगी स्वास्थ्य सेवाओं को फायदा पहुंचाया है । भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल(बीएमएचआरसी) को पूरी तरह से बर्बाद किया, एम्स में भी व्यवस्था चौपट है ,राज्य चिकित्सालय के हालत ये है की मुख्यमंत्री एवं उनके मंत्री , बड़े अधिकारी सभी निजी स्वास्थ्य व्यवस्था पर ही विश्वास दिखाते है ।

    पूर्व में भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री रहते दौरा कर चुके है एम्स का, जिसमे तमाम कमियां विधार्थियो ने बताई थी लेकिन वह आज भी वैसे की वैसे ही बनी हुई है, नए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ मनसुख मंडाविया जी के आने के बाद भी । एम्स में आज भी पूरी फैकल्टी नही है, न ही मरीजों को पूरा इलाज मिल रहा है और न ही विधार्थियो को सही चिकित्सा शिक्षा प्राप्त हो रही है ऐसे में बीएमएचआरसी को मेडिकल कॉलेज बनाने जैसी बातें साफ तौर पर बेमानी है । 

    राज्य चिकत्सा मंत्री विश्वास सारंग जी भोपाल में रहते हुए इतने लापरवाह है की हमीदिया अस्पताल,जय प्रकाश नारायण अस्पताल, काटजू अस्पताल की व्यवस्था सुचारू रूप से संचालित  नही करवा पा रहे है । प्रदेश और राजधानी वासियों को अभी भी बच्चों के वार्ड में लगी आग का मंजर अभी भी भूले नहीं भूलता जिसमें न मुख्यमंत्री सक्रिय थे और न ही उनके मंत्री ।

    भाजपा के लोग केवल झूठे बयान,झ्ठे वादों से जनता को भ्रमित कर रहे है, आमजन की धार्मिक भावना उकसा कर सत्ता पर काबिज है। अब जनता इनसे इनकी ही योजना का हिसाब मांग रही है, वो चाहे कृषि कानून हो या अग्निवीर । भाजपा के लोग अपनी योजनाओं को ही सही तरीके से जनता को नही बता पाते क्योंकि तानाशाही तरीके से जनता के ऊपर निर्णय थोप दिए जा रहे है बिना किसी तैयारी के ,बिना किसी विरोधी दलों से चर्चा करते हुए ।

  • सहकारिता से जीती भारत नगर ने स्वच्छता की जंग

    सहकारिता से जीती भारत नगर ने स्वच्छता की जंग

        

    भोपाल,9 जून(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब लाल किले से स्वच्छता का संदेश दिया था तब किसी ने नहीं सोचा था कि हिंदुस्तान के शहर और गांव इस दिशा में नई करवट लेने जा रहे हैं। आज देश के कई शहरों में स्वच्छता को लेकर जो जंग छिड़ी है उसने सड़कों और गलियों की तस्वीर बदलकर रख दी है। राजधानी भोपाल में स्वच्छता को लेकर जो बदलाव हुए हैं उसके लिए किसी तंत्र को बदले बगैर जनता बढ़ चढ़कर भागीदारी कर रही है। शहर की भारत नगर गृह निर्माण सहकारी समिति के प्रशासक मुकुंद राव भैसारे ने जब कालोनी की मूलभूत समस्यायों का समाधान शुरु किया तो लोगों ने आगे आकर स्वच्छता अभियान में अपना योगदान देना आरंभ कर दिया। आज यह गृह निर्माण सहकारी समिति मूलभूत समस्याओं का निराकरण करके पुरस्कार जीत रही है इसके साथ संस्था के खाते में बचत की राशि भी बढ़ती जा रही है।

    यह संस्था कभी बुरे हालात से भी गुजरती रही है। घरों में पानी नहीं आता था,सीवेज की लाईनें चोक थीं, सड़कें बदहाल थीं और जगह जगह कचरे के ढेर नजर आते थे। समिति का प्रबंधन संभालने वालों की सक्रियता न होने की वजह से मनमानी का आलम था और लोग कहीं भी कबाड़ा जमा करते रहते थे। गृह निर्माण समिति के संधारण का शुल्क लोग इसलिए नहीं जमा करते थे क्योंकि आए दिन घोटालों की कहानियां सुनने मिलती थीं। रहवासियों ने जगह जगह शिकायतें कीं लेकिन कोई समाधान नजर नहीं आता था। सहकारिता विभाग के आयुक्त ने कड़ा फैसला लिया और समिति को भंग करके प्रशासक की नियुक्ति कर दी। ये जवाबदारी विभाग के उप अंकेक्षक मुकुंद भैसारे को दी गई।

    सहकारिता विभाग के आयुक्त संजय गुप्ता ने अपने नवाचारों से शुरु किया सहकारिता आंदोलन का नया दौर.

    जब शासन ने मुकुंद भैसारे को भेजा तब रहवासी बहुत परेशान थे और शिकायतें लेकर दर दर भटक रहे थे। 20 जनवरी 2021 को संस्था भंग हो चुकी थी और लोगों को लगता था कि अब उनकी समस्याएं लालफीताशाही के बीच उलझकर रह जाएंगी। श्री भैसारे ने पानी, सफाई, बिजली सप्लाई जैसे मुद्दों को सुलझाने के लिए अपनी प्रशासनिक दक्षता का प्रयोग किया और धीरे धीरे शिकायतें सुलझने लगीं। हर विभाग से जुड़े प्रभारी अधिकारियों को प्रेरित करके उन्होंने कालोनी की काया बदलना शुरु कर दी। समिति के पास केवल एक सफाई कर्मचारी था लेकिन जन सहयोग और भोपाल नगर पालिक निगम की टीम को साथ लेकर उन्होंने सफाई का महासंग्राम शुरु कर दिया। लोगों ने जब अपने गली मोहल्ले में ये सक्रियता देखी तो महिलाओं समेत कई नागरिकों ने इस अभियान में सहयोग शुरु कर दिया। बच्चों की टोलियां काम में हाथ बंटाने लगीं। महिलाओं का समूह सफाई कर्मचारियों की प्रेरणा बन गया।

    श्री भैसारे ने गृह निर्माण समिति के दफ्तर की भी काया पलट कर डाली। पुराने पड़े पाईपों को वेल्डिंग करवाकर उन्होंने तिरंगा फहराने के लिए झंडा स्थल का निर्माण करवाया। समिति के आय व्यय पत्रकों को सिलसिलेबार संजोया। लोगों को प्रेरित किया कि वे यदि लंबित सहयोग राशि का भुगतान कर देते हैं तो कई सुविधाएं बढाई जा सकती हैं। चोक पड़ी पाईपलाईनों को चालू करवाते ही लोगों के घरों में पेयजल की सप्लाई शुरु हो गई। इस पानी ने लोगों में जो उत्साह का संचार किया कि वे आगे बढ़कर अपनी सहयोग राशि जमा करने लगे। जनसहयोग की भागीदारी से  श्री भैसारे ने नगर पालिक निगम की योजनाओं को लागू करवाना शुरु कर दिया। जगह जगह कचरे के डिब्बे रखवाए गए। सार्वजनिक लाईनों का बिजली भुगतान  होते ही कालोनी की सड़कें रात में जगमग होने लगीं।

    भारत नगर सहकारी समिति को स्वच्छता का पुरस्कार देकर प्रसन्न हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान.

    ये ऐसा अवसर था जब देश भर में स्वच्छता सर्वेक्षण को लेकर नगरीय निकाय बढ़ चढ़कर भागीदारी दिखा रहे थे। कोरोना की वजह से लाक डाऊन था और सफाई अमला पूरी तरह मुस्तैद था। इसी समय का लाभ लेकर श्री भैसारे ने गृह निर्माण समिति के कामकाज में जान फूंक दी। नगर पालिक निगम ने स्वच्छता के जो मापदंड तय किए थे उन पर श्री भैसारे ने सिलसिलेबार ढंग से अमल शुरु कर दिया। वर्ष 21-22 के स्वच्छता सर्वेक्षण के तहत 11 जनवरी 2022 को रहवासी समितियों ने प्रथम द्वितीय और तृतीय पुरस्कार प्राप्त किए। संपूर्ण भोपाल जिले में भारत गृह निर्माण सहकारी समिति को तृतीय पुरस्कार मिल गया।जब भोपाल नगर पालिक निगम के कमिश्नर ने ये पुरस्कार दिया तो कालोनी में हर्ष की लहर फैल गई। लोगों ने बढ़ चढ़कर सहयोग देना शुरु कर दिया।

    इसी श्रंखला में भारत सरकार ने स्मार्ट सिटी जैसी नई प्रोत्साहन योजना शुरु की। मध्यप्रदेश सरकार ने अपनी अन्य कालोनियों की तस्वीर बदलने के लिए अप्रैल 2022 में दुबारा जोन वार पुरस्कार देने की घोषणा की। भोपाल की 38 रहवासी वेलफेयर समितियों के सामने पुरुस्कार पाने का लक्ष्य था। इसके तहत प्रथम पुरस्कार के रूप में पांच लाख रुपए के निर्माण कार्य कराए जाने थे। द्वितीय पुरस्कार के रूप में तीन लाख रुपए के कार्य कराने की घोषणा की गई थी। इसके लिए सर्वेक्षण हुआ और जोन 15 की भारत गृह निर्माण सहकारी समिति को दूसरे पुरुस्कार के रूप में चुना गया। समिति का काम इतना सिलसिलेबार और लयबद्ध था कि प्रशासन ने एक ही वर्ष में उसे दो बार पुरस्कृत किया। इसका सारा श्रेय सहकारिता विभाग की ओर से प्रशासक के रूप में नियुक्त श्री भैसारे को ही जाता है।

    श्री भैसारे ने समिति की आर्थिक स्थिति सुधारी,और सुधारों को जमीन पर क्रियान्वित किया। इससे सहकारिता के माध्यम से रहवासियों की समस्यायों का समाधान करने का नया उदाहरण सामने आया है। ये पहला अवसर है जब किसी सहकारी समिति के प्रशासक ने जन सहयोग से किसी रहवासी क्षेत्र की समस्याओं का समाधान कर दिखाया हो। कई बड़े बिल्डर हजारों रुपए की सहयोग राशि जुटाने के बावजूद ये चमत्कार नहीं दिखा पा रहे थे जबकि श्री भैसारे ने मात्र 350 रुपए की सहयोग राशि के बलबूते कालोनी की तस्वीर बदलकर रख दी।

    भोपाल नगर पालिक निगम ने स्वच्छता पुरस्कार देकर रहवासियों के सफल मॉडल को रेखांकित किया..

    सहकारिता के क्षेत्र में इस बडी उपलब्धि से श्री भैसारे उत्साहित हैं। स्थानीय नागरिकों ने समिति के सफल संचालन के लिए कई बदलाव भी किए हैं। सहकारी समिति ने कालोनी में सड़कें रोशन करने के लिए सोलर लाईटें,बगीचों में पाथ वे का निर्माण और कैमरे लगाने के लिए भी प्रस्ताव तैयार किए हैं। इस लक्ष्य  की पूर्ति के लिए हर रहवासी की ओर से मिलने वाली सहयोग राशि 500 रुपए कर दी गई है और जल्दी ही  जरूरतें भी पूरी हो जाएंगी । इससे स्ट्रीट लाईट का हर महीने आने वाला बिजली का बिल भी शून्य हो जाएगा। साथ ही साथ अतिरिक्त बिजली बेचकर समिति अपने रखरखाव के लिए अतिरिक्त आय कर सकेगी। कैमरों से अपराध नियंत्रण में सहयोग मिलेगा। इस तरह के कई अभियानों के लिए भी लोग मशविरा कर रहे हैं।

    एक रचनात्मक व्यक्ति की उपस्थिति से स्थितियां किस तरह बदल जाती हैं ये भी श्री भैसारे ने साबित कर दिया है। जो लोग लोकतांत्रिक व्यवस्था को कोसते फिरते थे वे आज सहकारिता की शक्ति का अहसास कर रहे हैं। मध्यप्रदेश में सहकारी आंदोलन को पलीता लगाने की तो कई कहानियां सुनी और सुनाई जाती हैं लेकिन सहकारिता की ये बुलंद तस्वीर केवल भोपाल से निकलकर सामने आई है। इसके लिए श्री भैसारे जैसे अधिकारियों की पहचान और उन्हें जवाबदारी देने की पहल अब सरकार को करनी होगी।

  • भोपाल विलीनीकरण के सेनानियों को पुष्पांजलि

    भोपाल विलीनीकरण के सेनानियों को पुष्पांजलि

    भोपाल,1 जून(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, भोपाल विलीनीकरण दिवस एक जून के अवसर पर विलीनीकरण शहीद स्मृति द्वार पर कार्यक्रम में सम्मिलित हुए। राज्य सभा सांसद श्री जे.पी. नड्डा विशेष रूप से उपस्थित थे। चिकित्सा शिक्षा मंत्री श्री विश्वास सारंग, सांसद श्री वी.डी. शर्मा, पूर्व महापौर श्री आलोक शर्मा तथा विलीनीकरण आंदोलन के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिजन सम्मिलित हुए।

    मुख्यमंत्री श्री चौहान तथा सांसद श्री नड्डा ने शहीद स्मृति द्वार पर स्थापित रानी कमलापति की प्रतिमा पर नमन किया। साथ ही भोपाल विलीनीकरण आंदोलन के स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति में पुष्पांजलि अर्पित की गई। कार्यक्रम में स्वतंत्रता सेनानियों के परिजन का सम्मान भी किया गया। भोपाल की स्वतंत्रता की 73 वीं वर्षगांठ हर्ष और उल्लास के साथ मनाई गई।

  • एक वैभवशाली राष्ट्र के निर्माण में हम सब अपना योगदान दें : विश्वास सारंग

    एक वैभवशाली राष्ट्र के निर्माण में हम सब अपना योगदान दें : विश्वास सारंग

    • राज्य स्तरीय स्व. भुवन भूषण देवलिया पत्रकारिता पुरस्कार से पत्रकार जयराम शुक्ल सम्मानित
    • पत्रकारिता और राष्ट्रवाद पर विद्वानों ने रखे सारगर्भित विचार

    भोपाल। स्व भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यानमाला समिति की तरफ से रविवार को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि के सभा कक्ष में पत्रकारिता और राष्ट्रवाद पर एक विमर्श का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मप्र के चिकित्सा शिक्षा मंत्री विश्वास सारंग थे जबकि अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा ने की। कार्यक्रम में प्रसार भारती बोर्ड के अध्यक्ष जगदीश उपासने, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. केजी सुरेश, भारतीय जनसंचार परिषद नई दिल्ली के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार राजेश बदल ने प्रमुख वक्ता के रूप में अपने ओजस्वी। विचारों से विषय की गम्भीरता को प्रतिपादित किया। जबकि इस विमर्श में विषय प्रवर्तन का कार्य स्वदेश भोपाल के संपादक शिवकुमार ‘विवेक’ ने किया। इस अवसर पर विंध्य क्षेत्र से नाता रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार जयराम शुक्ल को राज्य स्तरीय स्व. भुवन भूषण देवलिया पत्रकारिता पुरस्कार से प्रदेश के चिकित्सा मंत्री विश्वास सारंग ने सम्मानित किया।
    भुवनभूषण देवलिया पत्रकारिता सम्मान का इस वर्ष ग्यारहवां वर्ष था। प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार श्री शुक्ल को सक्रिय और सार्थक लेखन के लिए सम्मान प्रदान किया गया। पुरस्कार स्वरू श्री शुक्ल को 11 का चेक, शॉल श्रीफल के साथ स्मृति चिन्ह भेंट किये गए।
    इस अवसर पर पत्रकारिता और राष्ट्रवाद पर अपने विचार रखते हुए प्रदेश के चिकित्सा मंत्री विश्वास सारंग ने कहा कि जब पत्रकारिता किसी बात को कहती है तो वह नीचे तक जाती है, इसलिए पत्रकार को राष्ट्रवादी होना ही चाहिए। उन्होंने कहा कि हम सब मिलकर एक वैभवशाली राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे, यह समय की मांग और हमारा राष्ट्र प्रेम भी है। श्री सारंग ने कहा कि कोई भी राष्ट्र सही रूप में तब बनता है जब उसका संघीय ढांचा मजबूत हो। इसे बनाने में आंचलिक पत्रकारिता का बड़ा योगदान है। श्री सारंग ने इस बात पर दुःख जताते हुए कहा कि आजादी के पचहत्तर साल बाद भी हमें यदि राष्ट्रवाद पर चर्चा करनी पड़े तो यह सोचनीय है। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद तो कारखाना निर्माण और पुल निर्माण की बात तो होती रही पर व्यक्ति निर्माण पर किसी ने चर्चा नहीं की। उन्होंने इस बात पर संतोष जाहिर करते हुए कहा कि स्व भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यानमाला समिति ने जो आज विषय रखा है वह प्रासंगिक है। समिति निरन्तर यह आयोजन कर रही है जो सराहनीय है। श्री सारंग ने कहा कि उनकी अपने जीवन में कभी देवलिया जी से भेंट नहीं हुई लेकिन उनके शागिर्दों से बहुत तारीफ़ सुनी है। ऐसे योग्य गुरु और काबिल पत्रकार नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करते हैं, श्रेष्ठ कार्य के लिए उनके प्रेरक भी बनते हैं। ऐसी विभूति को नमन करता हूं। श्री सारंग ने शुरुआत में स्व भुवन भूषण देवलिया जी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की।

    वर्तमान पत्रकारिता में राष्ट्रबोध का संकट : उपासने

    विचार गोष्ठी को ऑनलाइन सम्बोधित करते हुए प्रसार भारती बोर्ड के अध्यक्ष जगदीश उपासने ने कहा कि राष्ट्र के प्रति प्रेम और ईमानदारी का भाव हो तभी पत्रकारिता सार्थक हो सकती है और तभी लोकतांत्रिक व्यवस्था भी सफल रहेगी। श्री उपासने ने कहा कि बहुत से लोगों को लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आने के बाद राष्ट्रवाद बढ़ गया है, जबकि ऐसा नहीं है। यह राष्ट्रवाद नहीं बल्कि राष्ट्रबोध कहा जा सकता है, जिसका संकट पत्रकारिता में दिख रहा है। किसी भी राष्ट्र के पत्रकार हो या निवासी उनमें राष्ट्रबोध तो होना ही चाहिए। 2013 की एक घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्रबोध नीचे के स्तर से ही नही ऊपर के स्तर से ही गायब है। श्री उपासने ने कहा कि जो लोग समन्वयवादी संस्कृति की बात करते हैं वह कहीं नहीं है, यह बात सिर्फ भारत में होती है जबकि हम समन्वयवादी नहीं हैं पर सब को स्वीकार कर लेते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि सात हजार पुरानी हमारी संस्कृति है तो यह बोध किसको आएगा। श्री उपासने ने जोर देते हुए कहा कि यदि जब तक एक भी व्यक्ति जीवित रहेगा हमारा भारत और हमारी संस्कृति जीवित रहेगी। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र का आनन्द यही है कि आप विरोध तो करें पर किसी का मजाक न बनाएं। पत्रकारिता के पक्षधर होने पर कड़ी आपत्ति जताते हुए प्रसार भारती बोर्ड अध्यक्ष ने कहा कि जिनका काम ही सही सूचना देना है वह स्वयं ही अज्ञानी हैं। श्री उपासने ने पत्रकारों को सलाह देते हुए कहा कि अपनी विचारधारा को सिर्फ सम्पादकीय पेज पर जगह दें, पर समाज में मतभेद पैदा न करें।

    पत्रकारिता राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत होनी चाहिये : प्रो. सुरेश

    पत्रकारिता और राष्ट्रवाद पर अपने विचार व्यक्त करते हुए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति केजी सुरेश ने कहा कि पत्रकारिता किसी विचारधारा की नहीं होनी चाहिए बल्कि पत्रकारिता राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत होनी चाहिए। बालकोट हमले का जिक्र करते हुए सुरेश प्रोफेसर सुरेश ने कहा कि कुछ ऐसे विषय पर हमें अपनी सरकार पर विश्वास करना ही चाहिए, न कि किसी दूसरे देश की सेना के प्रवक्ता और या दूसरे राष्ट्र के समाचार पत्रों पर, यह हमारा राष्ट्र प्रेम नहीं है । 1971 के युद्ध का जिक्र करते हुए प्रोफेसर सुरेश ने कहा कि उस समय पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के दो टुकड़े इसलिए कर दिए थे क्योंकि संपूर्ण राष्ट्र उनके साथ था और यही राष्ट्रवाद है। प्रो. सुरेश ने कहा कि राष्ट्रवाद को इतिहास के पन्नों में गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया। उसे नाजीवाद और फासीवाद की तरह संकुचित तरीके से जनता के सामने प्रस्तुत किया गया। उन्होंने कहा कि भारत के अलग-अलग जगहों, मठ-मंदिरों या अन्य स्थानों में जो विभिन्न प्रकार की संस्कृति दिखाई देती है, वही हमारा राष्ट्रत्व है और वही भारत का राष्ट्रबोध है। यूक्रेन का जिक्र करते हुए विपक्षी दलों के बयान को हास्यास्पद करार देते हुए प्रो. सुरेश ने कहा कि आप इसलिए विरोध कर रहे कि एक व्यक्ति या दल आपको पसंद नहीं है। वहां फंसे भारतीयों को लेने कोई मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री नहीं जाएंगे, पर सरकार ने अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए 4 मंत्री भेजे हैं, जो लोगों को सुरक्षित निकालकर ला रहें। उन्होंने कहा कि सरकार की आलोचना राष्ट्र विरोध नहीं है पर वह परिस्थितियों पर निर्भर होनी चाहिए

    75 सालों में हम अपना राष्ट्र चरित्र नहीं बना पाए : बादल

    पत्रकारिता और राष्ट्रवाद विषय पर व्याख्यान माला को सम्बोधित करते हुए राज्यसभा टीवी के पूर्व निदेशक एवं वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने कहा कि मुझे यह कहते हुए अफसोस हो रहा है कि इन 75 सालों में हम अपना राष्ट्र चरित्र नहीं बना पाए। श्री बादल ने कहा कि यदि हम देश के प्रति ईमानदार नहीं हैं तो हम राष्ट्रद्रोही हैं। उन्होंने कहा कि एक हजार साल से हमारा हिंदुत्व खतरे में नहीं था पर इस सियासी पुट का नतीजा है। उन्होंने कहा कि सियासत ने हमें बांट दिया है, कोई भी दल इसमें कम नहीं है। सब अपने-अपने स्वार्थ के लिए इस तरह के प्रपंच रच रहे हैं। श्री बादल ने कहा कि सियासतदानों ने इसे धंधा बना दिया है। स्व भुवन भूषण देवलिया का जिक्र करते हुए श्री बादल ने कहा कि वह राष्ट्रप्रेम करते थे और अन्य सभी में भी राष्ट्रप्रेम जगाते थे। स्व. आज हर पत्रकार के ह्रदय में विराजमान हैं। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता देश का चौथा स्तम्भ है, यह बड़ी जिम्मेदारी उस समय हमें बुजुर्गों ने दी है, उसे हमें पूरी ईमानदारी से निभाना है।

    यह विभाजनकारी ताकतों को उखाड़ फेंकने का समय : प्रो. द्विवेदी

    पत्रकारिता और राष्ट्रवाद विषय पर व्याख्यान माला में प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा कि हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं। यह समय विभाजन करने वाली ताकतों को पूरी तरह से उखाड़ फेंकने का संकल्प लेने का समय है। उन्होंने कहा कि आजादी के समय हमारे नायको और पत्रकारों की लड़ाई स्वराज की थी। आज देश को जोड़ें रखने वाली शक्ति के सामने यह एक बड़ी चुनौती है। जो स्थान-स्थान पर संघर्षों को हवा दे रहे हैं उनको पहचानने की जरुरत है। प्रो. द्विवेदी ने सवाल उठाते हुए कहा कि हिंदुस्तान में क्या सब कुछ गलत ही हो रहा है। इस षड्यंत्र के कर्ताओं को देखिए किस तरह तिल का ताड बना रहे हैं। मानवता विरोधी विचार हमारे संकट को बढ़ा रहे हैं। उन्होंने कहा कि हम किसी एक विचार, धर्म या पंत को मानने वाले नहीं है। हम भारत को जाने, उसे बनाएं, छोटी-छोटी बातों पर लड़कर उसे महान नहीं बनाएं बल्कि समाज को तोड़ने की जगह जोड़ने वाले तथ्य को लेकर चलना होगा। प्रो. द्विवेदी ने कहा कि भारत बोध का जागरण ही एकमात्र मंत्र है। अनादि काल से जो हमारी शक्ति रही है उसे भारत पर विश्वास रहा है। मीडिया को इस देश की एकता व बहुलता को स्थापित करना होगा, यही हमारा राष्ट्रवाद है क्योकि पत्रकारिता समाज से जुड़ा विषय है। उन्होंने कहा कि पत्रकारों की पॉलिटिकल लाइन तो होनी चाहिए पर पार्टी लाइन नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय जीवन की लोक चेतना ही हमारी मूल चेतना है। मीडिया राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दें।

    मीडिया समाज में घोल रहा जाति का जहर : शर्मा

    व्यख्यान माला की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा ने कहा कि आजादी के पहले और बाद की पत्रकारिता में बड़ा अंतर आ गया है। आजादी के समय का एक भी अखबार या पत्रिका आज प्रकाशित नहीं हो रही है। उन्होंने कहा कि 1807 में अंग्रेजों ने देश और समाज को बांटने का जो कार्य किया था आज समाज उसी से जकड़न में पूरी तरह फंस गया है। उन्होंने कहा कि आज पत्रकारिता देश को जाति के नाम पर बांटने का काम कर रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि जो अंग्रेजों और मुगलों के प्रिय रहे सिर्फ वही हमारे पाठ्यपुस्तक का हिस्सा क्यों रहे हैं। श्री शर्मा ने कहा कि भारत में जाति प्रथा नहीं थी, बल्कि वर्ण व्यवस्था थी। अंग्रेजों ने हमारी परंपरा को नुकसान पहुंचाने के लिए देश में जातिगत जहर घोलने का काम किया जिसकी शिकार पत्रकारिता भी हो गई। उन्होंने कहा कि वैभव के कारण ही हमारा देश सोने की चिड़िया कहलाता था। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को भीड़ के साथ राष्ट्रवाद को जगाकर चलना होगा।

    पत्रकारिता राष्ट्रबोध की प्रखर अभिव्यक्ति थी : विवेक

    व्याख्यानमाला में विषय प्रवर्तन करते हुए स्वदेश के संपादक शिवकुमार विवेक ने कहा कि यह वास्तव में आंचलिक पत्रकारिता का सम्मान है। उन्होंने कहा कि आंचलिक पत्रकारिता का स्वरूप बढ़ रहा है। उस समय चौपाल ही पत्रकारिता की कक्षा होती थी। श्री विवेक ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन का फलसफा ही राष्ट्रवाद था। पत्रकारिता राष्ट्रबोध की प्रकार अभिव्यक्ति थी। उन्होंने कहा कि अंग्रेज एक साम्राज्यवादी सत्ता के बोधक थे। वह हमारी संस्कृत और व्यवस्था को खराब कर कर रहे थे। आज भी राष्ट्रवाद की जरूरत है। हमारी भाषा पर आज भी अतिक्रमण है, ऐसे में हमारी पत्रकारिता ही परे चले जाए तो सोचने की जरूरत है।
    कार्यक्रम में स्व. देवलिया की धर्मपत्नी श्रीमती कीर्ति देवलिया भी उपस्थित हुईं। कार्यक्रम में सतीश एलिया, आशीष देवलिया, डा अर्पणा और राजीव सोनी ने अतिथियों का स्वागत किया। संचालन आदित्य श्रीवास्तव ने किया। अंत में भुवनभूषण देवलिया स्मृति व्याख्यान माला समिति के सदस्य अशोक मनवानी ने आभार व्यक्त किया।कार्यक्रम में स्मारिका का विमोचन मंत्री श्री सारंग और अन्य अतिथियों ने किया।

  • सात दशकों बाद साकार हुआ भोपाल विलीनीकरण का स्वप्न

    सात दशकों बाद साकार हुआ भोपाल विलीनीकरण का स्वप्न


    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भाजपा सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से देश की तस्वीर बदलने का जो अभियान चलाया है उससे एक नया भारत खड़ा होने लगा है। दंभ से भरी नेहरू सरकार ने आजादी के बाद देश में बड़े कारखाने, बड़े बांध और बड़े वित्तीय संस्थान तैयार करने की नीति अपनाई थी। उस वक्त समझा जाता था कि बड़े प्रतिष्ठानों से रिसकर पूंजी का प्रवाह देश के निचले तबके तक पहुंचेगा। धीमी रफ्तार के इस विकास को गति देने के लिए श्रीमती इंदिरागांधी ने सार्वजनिक उपक्रमों और सरकारी संस्थानों के माध्यम से पंचवर्षीय योजनाएं लागू कीं। जब ये नीति मुंह के बल गिरी और भारी भ्रष्टाचार ने जनता का जीवन दूभर कर दिया तो श्रीमती गांधी के इंस्पेक्टर राज ने छापेमारी करके सुशासन लागू करने का अभियान चलाया। ये भी बुरी तरह असफल हुआ और देश लगभग पचास साल पीछे सरक गया। प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव की सरकार ने नई आर्थिक नीतियां लागू करके नेहरू गांधी परिवार की गलतियों को सुधारने का क्रांतिकारी फैसला लिया। नतीजे अच्छे आए लेकिन डाक्टर मनमोहन सिंह की सरकार उन आर्थिक सुधारों को लागू नहीं कर पाई। इसकी वजह कांग्रेसियों का वो मानस था जो कल्याणकारी राज्य की ठगनीति से इतर कुछ और नहीं देखना चाहता था। अटल बिहारी की सरकार ने देश के गांवों को सड़कों सेजोड़ने का भगीरथ किया। इसके बाद बेरोजगारी की जो तस्वीर सामने आई उसे देखकर सरकारें हिल गईं। मोदी सरकार ने बड़े औद्योगिक घरानों का खजाना भरने के स्थान पर गांव स्तर तक पूंजी का प्रवाह खोलने के कई अभियान चलाए हैं। नए एलईडी मोदी बल्ब से देश को रोशन करने ,गांवों को खुले में शौच से मुक्ति, कचरे वाले को घरों तक पहुंचाने के अभियानों की सफलता के बाद अब प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से पूंजी का प्रवाह समाज के अंतिम छोर तक पहुंचाने का चमक्तारिक प्रयास सफल बनाया है।
    राज्य सरकारों ने मोदी सरकार के इन अभियानों को अपने अपने अंदाज में लागू किया है। मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार ने लगभग एक लाख हितग्राहियों को प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ देकर शहरों और गांवों में रंग भरने में सफलता पाई है। गांव गांव तक आवास योजना में श्रमिकों को तो काम मिल ही रहा है साथ में लोगों को अपने मकानों को सुविधाजनक बनाने का अवसर भी मिलने लगा है। शिवराज सिंह चौहान सरकार ने इस बदलती तस्वीर को स्थानीय जरूरतों और पहचानों से जोड़कर अभियान की सफलता को नया स्वरूप दिया है। भोपाल की बदलती तस्वीर ने उन अरमानों को साकार किया है जिन्हें विलीनीकरण के बाद से भोपाल के जनमानस ने अपने दिलों में संजोकर रखा था। अंग्रेजों की सरकार ने जब भारत को आजादी देने का मन बनाया तो उसने धर्म के आधार पर फूट के बीज भी बो दिए थे। पाकिस्तान के विभाजन को तत्कालीन शासकों ने न केवल स्वीकार किया बल्कि पाकिस्तान परस्ती की ज़ड़ों में मट्ठा डालने के बजाए उन्हें पालने पोसने की नीति भी अपना ली। पंडित जवाहर लाल नेहरू का ध्वज जिस तरह जिन्ना के सामने झुका रहा उसकी वजह से नेहरू को लगता था कि यदि उन्होंने पाकिस्तान के प्रति प्रेम रखने वाले नवाबों और रिसायतों पर जोर जबर्दस्ती की तो वे विद्रोह भी खडा कर सकते हैं। यही वजह थी कि जब सारा हिंदुस्तान आजादी के गीत गा रहा था तब भोपाल के नवाब खुद को पाकिस्तान के साथ जोड़े जाने की रट लगाए हुए थे। भारत सरकार के पास इस बात की पूरी खबर थी लेकिन सरकार ने वेट एंड वाच की नीति अपनाई। कांग्रेस के नेताओं को कहा गया कि वे स्थानीय शासकों को मनाएं और भारत के साथ रहने के लिए तैयार करें। भौगौलिक तौर पर कुछ रियासतें पश्चिमी पाकिस्तान से दूर भी थीं। इसके बावजूद उन्हें पूर्वी पाकिस्तान की तरह अलग रियासतें बनाकर अपना तख्तो ताज बचाने की उम्मीद थी। कांग्रेस के स्थानीय नेताओं ने विलीनीकरण का आंदोलन चलाया और भारी शहादतें देने के बाद अंततः रानी कमलापति के राज्य को हथियाकर बनाए गए भोपाल को नई पहचान मिल सकी।
    तबसे लेकर अब तक लगभग सात दशकों का लंबा अंतराल बीत चुका है जब भोपाल को उसकी पहचान देने का स्वप्न साकार होता नजर आने लगा है। भोपाल की आजादी के वक्त स्थानीय तरुणाई को अपनी नई राह और नई मंजिल बहुत नजदीक नजर आ रही थी। सरकार के भरोसे विकास की जो इबारत कांग्रेस के शासकों ने लिखी उससे ये मंजिल मीलों दूर खिसक गई। भ्रष्टाचार और गरीबी को संरक्षण देने की इस नीति ने अपनी विरोधी भारतीय जनता पार्टी को व्यापारियों की पार्टी के रूप में खूब बदनाम किया। भाजपा के नेताओं को कांग्रेस के इस दुष्प्रचार से इतना डर लगता था कि जब वीरेन्द्र कुमार सखलेचा की सरकार ने अफसरों की लगाम कसी तो उनके विरोधियों ने तरह तरह के आरोप लगाकर उनकी सरकार गिरवा दी। उसके बाद सुंदरलाल पटवा की सरकार अफसरशाही के सामने झुकी सरकार के रूप में सामने आई। दिग्विजय सिंह की भ्रष्ट सरकार को जब जनता ने धक्के मारकर सत्ता से बाहर भेज दिया तबसे भाजपा की सरकारें अफसरशाही के साथ कदमताल करती रहीं हैं। मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों ने देश के सामने नवनिर्माण का वैकल्पिक मार्ग प्रशस्त किया है।
    भ्रष्ट सरकारी तंत्र की वजह से जो धनराशि विभिन्न छेदों से भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती थी मौजूदा नीति ने हितग्राही के खाते में सीधे भुगतान पहुंचाकर उस खामी को दूर कर दिया है। आज न तो सरकारी तंत्र और भ्रष्ट राजनेताओं का कमीशनखोरी का नेटवर्क सफल हो पा रहा है और न ही विकास की रफ्तार पर कोई ब्रेक बाकी रहा है। यही वजह है कि भोपाल संभाग और जिलों में हितग्राही मूलक योजनाओं को साकार करना सफल हो पा रहा है। भोपाल के नवाब के हाथों से सत्ता छीनकर जनता के हाथों में देने के बावजूद यहां के लोगों का जीवन रोशन करने का जो लक्ष्य अब तक पूरा नहीं हो पाया उसमें मानों पर लग गए हैं।
    वैसे तो विलीनीकरण के स्वप्न को जमीन पर उतारने के लिए अभी कई पायदान बाकी हैं। लगभग पच्चीस हजार घुसपैठियों ने भोपाल के आम नागरिक के संसाधनों पर डाका डाल दिया है। फुटपाथों गलियों में अतिक्रमण हो गया है। गंदी बस्तियों की तादाद बढ़ गई है। वोट बैंक के लिए कांग्रेस के जिन नेताओं ने झुग्गी माफिया खड़ा किया था वे आज अपने इलाकों में प्रधानमंत्री आवास योजना का प्रचार करने में जुटे हुए हैं। इसकी वजह है कि भले ही उन्हें कमीशन नहीं मिल पा रहा है पर उन्हें लगता है कि उनका वोटर कम से कम इस योजना को उनकी मेहनत का फल ही मान ले तो उनका भविष्य सुरक्षित हो सकता है।
    शहर का मास्टर प्लान अब तक राजधानी की तस्वीर नहीं बदल पाया है। भीड़ भरे इलाकों में अस्पतालों का निर्माण, बीच सड़कों पर पुरानी कारों की बिक्री के बाजार, गैरेज, और धुलाई ने राजधानी को भिखमंगों का शहर बनाकर रख दिया है। सरकारी दफ्तरों के आसपास लगने वाले सब्जी और कपड़ा बाजारों ने यातायात की व्यवस्था चौपट कर रखी है। अवैध निर्माणों की कोई मानीटरिंग नहीं है। यही वजह है कि चौड़ी सड़कें भी संकरी गलियों में तब्दील हो गईँ हैं। कभी बुलडोजर मंत्री के रूप में बाबूलाल गौर ने शहर की इस जरूरत को रेखांकित किया था। बाद की भाजपा सरकारों ने शहर में कई मूलभूत बदलाव किए हैं। फ्लाईओवर और चौराहों के चौड़ीकरण ने हालांकि राहत दी है लेकिन बढ़ते चार पहिया वाहनों की संख्या ने उन सारे सुधारों की हवा निकाल दी है। सार्वजनिक परिवहन का कोई विश्वसनीय और समय का पाबंद नेटवर्क अब तक नहीं तैयार हो सका है। धर्मस्थलों के नाम पर किए जाने वाले अतिक्रमणों ने शहर की खूबसूरती को लील लिया है।यही नहीं धर्म के नाम पर बढ़ रहीं दूकानों ने जनमानस को भी विकास की मुख्यधारा से परे धकेल दिया है।
    नवाबकालीन भवनों की हालत जर्जर हो चुकी है और वे जनता की आज की जरूरतों के लिए भी उपयोगी नहीं रह गए हैं। आज कंप्यूटरीकरण के दौर में न तो उन भवनों में स्थान बाकी है न ही बिजली हवा पानी की मूलभूत जरूरतें पूरी हो पा रहीं हैं। दिग्विजय सिंह सरकार ने पुराने भवनों की मरम्मत कराकर कथित विरासतों को बचाने का पाखंड जरूर किया था लेकिन जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी ये इमारतें खंडहर होती जा रहीं है। अब समय आ गया है कि शहर का अंधाधुंध विस्तार रोकने के लिए पुर्नघनत्वीकरण योजना का सख्ती से पालन किया जाए। इन जर्जर इमारतों को धराशायी करके आज की जरूरतों के अनुसार भवनों का निर्माण कराया जाए। जो लोग विरासतों को सहेजे रखने का शोर मचाकर जनजीवन को दूभर बनाने का षड़यंत्र रच रहे हैं उनके लिए पुराने इतिहास को किताबों में संजोकर रखा जा सकता है।
    शहरों को विकास का इंजन बनाने के लिए नियोजकों ने ग्रीन और ब्लू मास्टर प्लान तैयार किय़े थे। वृक्षारोपण को सफल बनाने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को स्वयं एक वृक्ष रोज लगाने के लिए आगे आना पड़ा है। ताल तलैयों की नगरी मानी जाने वाली राजधानी के अधिकांश जलग्रहण क्षेत्र दूषित पड़े हुए हैं। भोपाल तालाब की सफाई के लिए जो भोज वैटलैंड परियोजना चलाई गई थी उसने आम जनता पर कर्ज का पहाड़ तो खड़ा कर दिया लेकिन भोपाल तालाब की नई तस्वीर आज भी अधूरी है। तालाब का पानी सेप्टिक टैंक से भी ज्यादा गंदा बना हुआ है। उसमें आक्सीजन का स्तर नहीं बढ़ पाया है। सरकार और शासन को तय करना होगा कि आखिर वह आम नागरिकों को सम्मान जनक जीवन का माहौल कब तक मुहैया करा पाएगा।

  • पहला स्वतंत्रता संग्राम और भोपाल – सीहोर की शहादत

    पहला स्वतंत्रता संग्राम और भोपाल – सीहोर की शहादत

    राजेश बेन

    आज़ादी के अमृत महोत्सव के इस वर्ष में हम याद कर रहे हैं अपने उन क्रांतिकारियों को जिन्होंने भारत माता को आज़ाद करवाने के लिए पहले-पहल क्रांति की ज्वाला प्रज्जवलित की थी। भोपाल से शुरू हुआ आज़ादी के इस पहले संग्राम ने अंग्रेजों के शासन को जोरदार टक्कर दी। मातृभूमि को स्वतंत्र कराने वाले इन वीरों को देश कभी भी भूल नहीं सकेगा।

    अब से 164 साल पहले यानि 15 जनवरी 1858 को शाम 6 बजे कर्नल हयूरोज ने 149 क्रांतिकारियों को सीहोर कॉन्टिन्जेण्ट में एक लाइन में खड़ा कर गोली मार दी। भोपाल गजेटियर का संदर्भ 149 क्रांतिकारियों को लम्बी लाइन में खड़ा कर गोली मारने की पुष्टिकर्ता है तो सीहोर में जनश्रृति और एक प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र की रिपोर्ट में इस संख्या को 356 बताया गया है।

    भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम की कहानी भी रोंगटे खड़े करने वाली है और आज की तथा आने वाली पीढ़ी के लिये प्रेरणादायी है। 

    प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की कहानी कुछ ऐसी है कि अप्रैल, 1857 में भोपाल बेगम को पत्थर पर लिखकर छपाई गई क्रांति कारियों की (लिथोग्राफ) एक उदघोषणा प्राप्त हुई, जिसमें अंग्रेजों को निकाल बाहर करने और नष्ट करने का आव्हान किया गया था। बेगम ने इस घोषणा में कहीं गई बातें ब्रिटिश एजेन्ट को सूचित कर दी और इस प्रकार अंग्रेजों के प्रति अपनी वफादारी का सबूत दे दिया। 

    जब यह महान क्रांति मई, 1857 में भारत को आन्दोलित करने वाली थी उस समय भोपाल कॉन्टिन्जेन्ट सीहोर मुख्यालय में 60 तोपची,  206 घुड़सवार सैनिक तथा 600 पैदल सैनिक थे,  अर्थात् कुल मिलाकर 866 सैनिक थे, जिनमें सभी भारतीय थे। इस कॉन्टिन्जेन्ट के साथ केवल 6 अंग्रेज थे। इस कॉन्टिन्जेन्ट की एक टुकड़ी बेरछा में तैनात की गई किन्तु वहां कमान संभालने वाला एक भी अंग्रेज नहीं था।

     मेरठ तथा दिल्ली में हुई घटनाओं का समाचार सबसे पहले 13 मई, 1857 को इन्दौर में प्राप्त हुआ। परिणामस्वरूप, विद्रोह के अकस्मात् फैलने की आशंका से कर्नल ड्यूरेन्ड ने 14 मई को सीहोर को भोपाल कान्टिजेन्ट की 2 तोपें,  पैदल सैनिकों की 2 कंपनियां तथा घुड़सवारों के दो सैन्य दल भेजने के लिये अत्यावश्यक संदेश भेजा।

    20 मई को इन्दौर पहुँचने के लिये सैन्य दल भेज दिया गया और भोपाल क्षेत्र पर आसन्न संकट की छाया छाई रही। पड़ोस में और भारत के अन्य भागों में जो कुछ भी हो रहा था, उससे भोपाल रियासत की प्रजा प्रभावित हुये बिना नहीं रह सकी। मध्य भारत के लिये गर्वनर जनरल के एजेन्ट राबर्ट हैमिल्टन ने भारत सरकार के सेकेट्ररी को लिखा कि सामान्यत: दिल्ली, लखनऊ तथा रोहिलखंड में जो कुछ भी हो रहा था, उससे भोपाल के अनेक निवासी प्रभावित थे। भोपाल के मुसलमान लोग मुगल सम्राट बहादुर शाह से सहानुभूति रखते थे और हिन्दु लोग नाना साहब पेशवा से सहानुभूति रखते थे। “

    कैप्टन हुचिन्सन ने यह देखा कि भोपाल के अभिजात लोगों में ईसाई विरोधी तथा अंग्रेज विरोधी भावना बहुत अधिक थी। नियाज मुहम्मद खान, फौजदार मुहम्मद खा, बदी मुहम्मद खान, त्रिभुवन लाल जैसे महतवपूर्ण नेता तथा अनेक अन्य लोग उस समय वर्तमान व्यवस्था से असंतुष्ट थे। वे सिकन्दर बेगम के शासन के इसलिये विरोधी थे क्योंकि वह कम्पनी सरकार के अंगूठे नीचे थी। जब अवसर आया तो ऐसे व्यक्तियों ने विद्रोह में प्रमुखता से भाग लिया। “

    इस बीच 1 जुलाई, 1857 को इन्दौर के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। उन्हें दंडित करने के लिये भोपाल कॉन्टिन्जेन्ट कैवलरी के लगभग पचहत्तर सैनिकों का एक दल बुलाया गया । किन्तु कमांडर ट्रैवर्स को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि पूरे दल में से केवल 6 सैनिकों ने उसकी आज्ञा मानी। अन्तत: अंग्रेजों को इंदौर छोड़कर जाना पड़ा। कर्नल डयूरेन्उ और उस दल के लोग, जिसमें 17 अधिकारी, 8 महिलायें और 2 बच्चे शामिल थे, भोपाल कॉन्टिनेन्ट के कुछ सैनिकों की रक्षा में उसी दिन सीहोर चले गये। वे लोग 3 जुलाई को आष्टा और 4 जुलाई को सीहोर चले गये। सिकंदर बेगम ने उन्हें आश्रय और संरक्षण दिया। सिकंदर बेगम को अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ा। उसकी माँ तथा मामाओं ने उससे आग्रह किया कि वह अंग्रेजों के विरूद्ध धर्मयुद्ध घोषित कर दे। शहर के मौलवी भी जिहाद का उपदेश दे रहे थे और उसके सैनिकों ने भी उसे आतंकित किया। किन्तु सिकन्दर बगेम नहीं मानी। कर्नल ड्यूरेन्ड तथा उसके दल के साथ वह होशंगाबाद गईं, जहां वे 8 जुलाई को सुरक्षित पहुँच गये।

    9 जुलाई को सीहोर के पॉलिटिकल एजेन्ट मेजर रिचर्डस ने 20 यूरोपियों के साथ सीहोर छोड़ दिया। सीहोर छोड़ते समय उसने स्टेशन का प्रभार कुछ समय के लिये सिकंदर बेगम के अधिकारियों को सौंप दिया, किन्तु सभी व्यावहारिक प्रयोजनों उसका प्राधिकार कुछ भी नहीं था। कॉन्टिन्जेण्ट के सैनिकों ने सीहोर कैन्टोनमेण्ट पर कब्जा कर लिया। उन्होंने अंग्रेजों के बंगलों, डाकघर और सीहोर चर्च को लूट लिया। इस अवसर पर विद्रोही नेता शुजात खान पिंडारी ने मुख्य अधिकारी को मार डाला तथा बेरछा स्थित कम्पनी के खजाने को लूट लिया। जब सिकंदर बेगम ने सीहोर के सैनिकों को शुजात खान के विरूद्ध कार्रवाई करने का आदेश दिया तो उन्होंने आदेश मानने से इंकार कर दिया। इसके पहले के बेगम बदला लेतीं, सीहोर कैवलरी के रिसालदार ने 6 अगस्त, 1857 को खुले तौर पर विद्रोह की घोषणा कर दी। सैनिकों ने सीहोर कैन्टोंमेण्ट की 9 पौंडर तोपों तथा एक 24 पौंडर हो‍विट्जर को अपने कब्जे में ले लिया तथा उन्हें कैवलरी लाइन्स में रख दिया। बेगम ने सीहोर के सैनिकों के विद्रोह को कुचलने के लिये भोपाल से एक सैन्य बल भेजा। भोपाल के सैनिक भी उतने ही क्रांतिकारी थे, जितने सीहोर के सैनिक यद्यापि उन्होंने बेगम के पक्ष में सीहोर के खजाने को बचा लिया। तथापि सीहोर के अधिकांश क्रांतिकारी जिन्हें छोड़ दिया गया था, अन्तत: कानपुर जा पहुँचे और उन्होंने नाना साहब के झंडे के नीचे वीरतापूर्वक युद्ध किया।

    जुलाई, 1857 से लेकर नवंबर, 1857 तक सीहोर तथा उसके आसपास के क्षेत्र में इन्हीं क्रांतिकारियों का वर्चस्व रहा। विद्रोह के रोकने के लिये बेगम ने एक मैत्री विभाग की स्थापना की। उन्होंने सभी ओर से भागकर आये अंग्रेजों को सहायता दी और उन्हें सुरक्षा दी। इतना ही नहीं बल्कि अपने राज्य क्षेत्रों के बाहर भी उत्तर में काल्पी तक अनाज और चारा भेजकर और सागर तथा बुन्देलखण्ड में शान्ति स्थापित करने के लिये सैनिक टुकडियां भेजकर अंग्रेजों की भरसक सहायता की। अंबापानी के जागीरदार फाजिल मुहम्मद खान तथा आदिल मुहम्मद खान पर जिन्होंने विद्रोह कर दिया था, बेगम द्वारा तुरन्त हमला किया गया और उनकी संपदायें छीन ली गईं जबकि राहतगढ़ के हठी किलेदार को, जिसने अंग्रेजों को प्रवेश नहीं करने दिया था, पकड़ लिया गया तथा सूली पर चढ़ा दिया गया। इस बीच वह सीहोर में पुन: शांति स्थापित करने में सफल हो गई और अनेक क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया, जिन्हें बाद में फांसी दे दी गई।

    दिसम्बर, 1857 में ह्यूरोज ने विद्रोह को कुचलने के लिये सेना की कमान सम्हाली, 8 जनवरी को इन्दौर से रवाना होकर वह 15 जनवरी, 1858 को सीहोर पहुँचा। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, सीहोर में अनेक क्रांतिकारी पहले से बन्द थे और कोर्ट मार्शल की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनमें से 149 क्रांतिकारियों को न्यायालयों ने दोषी पाया तथा उन्हें गोली मार देने की सजा सुनाई गई। इस दण्डादेश के क्रियान्वयन का कार्य तीसरे यूरोपियन सैनिकों को सौंपा गया। सूर्यास्त के समय कैदियों को बाहर लाया गया और उन्हें एक लंबी पंक्ति में खड़ा कियागया और संकेत देते ही उन्हें गोली मार दी गई लेकिन उनमें से एक व्यक्ति बच निकला।

    जब मृत्युदंड देने की कार्रवाई पूरी हो गई तो अंधेरा हो गया और 15 जनवरी की उस लंबी, भयानक रात में तीसरे यूरोपियन बिग्रेड का एक अधिकारी और सैनिक क्रांतिकारियों के शवों की पंक्ति पर पहरा देते रहे और बिग्रेड 16 जनवरी को सुबह 3 बजे राहतगढ़ की ओर बढ़ गई।

    हमारे पहले क्रांतिकारियों को नमन

    (लेखक संभागीय जनसम्पर्क कार्यालय में उप संचालक हैं।)

  • फतवों की बोली और संविधान से विरोधाभास

    फतवों की बोली और संविधान से विरोधाभास


    ( डॉ अजय खेमरिया)

    देश में लागू किशोर न्याय अधिनियम कहता है कि एक बालक 18 साल की आयु पूरा करने पर बालिग यानी वयस्क माना जायेगा।मताधिकार कानून भी यही परिभाषा देता है लेकिन उप्र के सहारनपुर स्थित देवबंद इस्लामी अध्ययन केंद्र कहता है कि 15 साल के बालक या बालिका को बालिग माना जाना चाहिये।हेग घोषणापत्र से बंधे भारत में बाल सरंक्षण और पुनर्वास के लिए किशोर न्याय अधिनियम को संसद ने पारित किया है लिहाजा इसके सभी उपबन्ध सभी नागरिकों पर लागू है।दत्तकग्रहण यानी बच्चों को गोद लेनें के लिए देश में एक विहित प्रक्रिया संस्थित है जो यह सुनिश्चित करती है कि गोद लिए जाने वाले हर बच्चे को अपने नए परिवार में वे सभी अधिकार हांसिल होगें जो उसे जैविक मातापिता से मिलते है यानी उत्तराधिकार से लेकर सम्पति तक।देवबंद की तालीमी दुनियां एक अलग फतवा जारी कर इस कानून को पलट रही है और यह निर्देश देती है कि गोद लिए गए किसी भी बालक को जैविक संतान की तरह किसी प्रकार के अधिकार नही मिल सकते है।यही नही यह फतवा कहता है कि ऐसा बालक परिवार के अन्य बच्चों के साथ 15 बर्ष की आयु के बाद कोई सुमेलन नही रखेगा।मसलन अगर किसी मुस्लिम दम्पति ने अपने दो पुत्रों के बाद किसी बेटी को विधिक प्रक्रिया के अनुरूप गोद लिया है तो वह बेटी अपने परिवार में पहले से मौजूद दो भाइयों के साथ बहन के रिश्ते में नही रह सकती है।यहां तक कि ऐसे बच्चे के साथ उसकी मां को भी पर्दा करना पड़ेगा।
    हाल ही में देवबंद उलूम के इन फतवों के विरुद्ध एक लिखित शिकायत राष्ट्रीय बाल सरंक्षण आयोग को प्राप्त हुई जिसकी जांच के बाद आयोग के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगों ने एक पत्र उतरप्रदेश के मुख्य सचिव को भेजा है।इस पत्र में देवबंद के उन दस फतवों का उल्लेख है जो किशोर न्याय अधिनियम समेत भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14,15,21 के अलावा आईटी एक्ट की धारा 69 के खुले उल्लंघन को रेखांकित करते हैं।आयोग के अध्यक्ष श्री कानूनगो इन फतवों को विधि के शासन के विरुद्ध भी निरूपित करते है।रोचक तथ्य यह है कि एक फतवा बालिकाओं की शिक्षा ऐसे स्कूलों में कराने को प्रतिबंधित करने की बात करता है जहां कक्षा 9 के बाद पढ़ाने का कार्य पुरुष शिक्षकों के द्वारा कराया जाता है।मुस्लिम बेटियों को सहशिक्षा देनें वाले स्कूलों में दाखिले को देवबंद के फतवे हराम घोषित कर रहे है।
    देश में लागू शिक्षा का अधिकार कानून बच्चों के शारीरिक दंड को निषिद्ध करता है लेकिन देवबंद के फतवे में इसे शरिया के अनुरूप बताकर उचित निरूपित किया गया है।यानी मदरसे में शिक्षक अगर चाहें तो बच्चों के साथ मारपीट कर सकते है।
    अगर किसी मुस्लिम परिवार की बेटियां किसी केंद्रीय विद्यालय या सहशिक्षा व्यवस्था वाले स्कूल में पढ़ती है तो क्या कक्षा 9 के बाद उन्हें इस स्कूल में पढ़ाया जा सकता है?इस विषय पर जारी देवबंद का फतवा स्पष्ट रूप से कहता है कि गैर इस्लामिक माहौल में जहां उस स्कूल की गणवेश पहनना अनिवार्य हो बेटियों को पढ़ाना हराम है और तत्काल किसी ऐसे स्कूल में उनका दाखिला कराया जाए जो इस्लामिक हो और शरिया के अनुसार वहाँ पुरुष शिक्षक न हो।
    देवबंद इस बात को भी प्रतिबंधित करता है कि अगर किसी स्कूल में ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से भी मुस्लिम बच्चों को मंदिर,चर्च या अन्य धार्मिक पूजा स्थलों की सैर कराई जाए।ऐसे ही तमाम फतवों से देवबंद की आधिकारिक बेबसाइट भरी पड़ी है।खासबात यह है कि इन सवालों को उठाने वाले उच्च शिक्षित मुस्लिम है।देवबंद भारत में मुस्लिम दर्शन की बहावी धारा का सबसे प्रभावशाली और व्यापक अध्ययन केंद्र है।इसकी स्थापना बुनियादी रूप से खलीफा की धार्मिक सम्प्रभुता को वैचारिक रुप से मजबूत करने के उद्देश्य से की गई थी।सवाल यह है कि भारत में जिसे स्कॉलरों की संस्था कहा जाता है वहां नागरिकों के लिए संविधान प्रदत्त अधिकारों एवं संसद द्वारा निर्मित कानूनों की अनुपालना के लिए प्रेरित करने के स्थान पर शरियत के अबलंबन की शिक्षा क्यों दी जा रही है।इन फतवों से आखिर किसका भला हो सकता है इस सवाल के जबाब में कोई मुस्लिम स्कॉलर सामने नही आना चाहता है उल्टे बाल सरंक्षण आयोग पर साम्प्रदायिक नजरिये से काम के आरोप लगाए जा रहे है।इस्लामिक स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन ऑफ इंडिया एसआईओ के राष्ट्रीय सचिव फवाज शाहीन ने एक बयान जारी कर इस मामले का बचाव करते हुए कहा है कि ”फतवे, निजी एवं सामाजिक जीवन से जुड़े विभिन्न मुद्दों के संदर्भ में केवल धार्मिक विद्वानों के निजी विचार होते हैं”।यहां बुनियादी सवाल यह है कि जब नागरिकता संशोधन कानून पर देश भर में विरोध के स्वर अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा बुलंद किये जा रहे थे तब संविधान को आगे रखा जा रहा था।नागरिक हितों को संवैधानिक सरंक्षण की दलील दी जा रहीं थी और देवबंद इसी संविधान द्वारा प्रदत्त समता और शिक्षा के अधिकार को छोड़कर शरिया की अनुपालना की वकालत कैसे कर सकता है।कैसे किशोर न्याय कानून से विपरीत गोद लिए जाने वाले बालकों के हकों के विरुद्ध धार्मिक आड़ लेकर क्रूरता और बाल शोषण की सलाह दे सकता है?फतवे अगर कानून नही है तो क्या इस बात की गारंटी है कि कोई भी इन्हें जीवन में अपनाता नही है।जिस व्यापकता के साथ देवबंद की आधिकारिक बेबसाइट पर कुलीनवर्गीय लोग इस विमर्श को आगे बढ़ा रहे है उससे स्पष्ट है कि भारत में संवैधानिक व्यवस्थाओं के प्रति एक बड़ा वर्ग सुविधाजनक अनुज्ञा की मानसिकता से जीना चाहता है।बेहतर हो देवबंद जैसे संस्थान जिनकी पहुँच भारत में करोड़ों मुसलमानों तक इस बात की शिक्षा का प्रसार करे कि देश के कानून ही सर्वोपरि है यह न केवल नागरिकों के हित में है अपितु उन मासूमों के रूप में अल्लाह की इबादत भी है जिसे खुदा का घर कहा गया है।दुनियां के घोषित इस्लामिक राष्ट्रों ने भी नवाचारों एवं नवोन्मेष के बल पर तकनीकी,प्रौधोगिकी औऱ आधुनिकता के सहारे खुद को बदला है लेकिन भारत में इस्लामिक कट्टरतावादी अभी भी करोड़ों बच्चों को आधुनिकता और शिक्षा की रोशनी से दूर रखना चाहते है।हजारों करोड़ के दान से चलने वाले देवबंद जैसे संस्थानों के कर्ताधर्ता खुद तो उन्नत जीवनशैली और संसाधनों के उपयोग में आगे है लेकिन करोड़ों बेटियों को शरीयत के नाम पर आगे बढ़ने से रोककर देश और कौम दोनों का नुकसान कर रहे है।
    (सदस्य किशोर न्याय बोर्ड मप्र )

  • हाईब्रिड शिक्षा में सफल पीढ़ी बनाने की अपार संभावनाएं : राज्यपाल श्री पटेल

    हाईब्रिड शिक्षा में सफल पीढ़ी बनाने की अपार संभावनाएं : राज्यपाल श्री पटेल

    भोपाल 18 जनवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने कहा है कि हाईब्रिड शिक्षा में व्यक्ति और क्षेत्रपरक, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और उसके विस्तार की असीम संभावनाएँ हैं। उन्होंने कहा है कि ऑनलाइन डिजिटल प्लेटफॉर्म और संस्था में शिक्षा के समन्वित स्वरूप हाईब्रिड शिक्षा के नए आयामों के बेहतर उपयोग पर विचार करना ज़रूरी है। श्री पटेल केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के विद्यालयों के संगठन सहोदय के 27वें दो दिवसीय वार्षिक सम्मेलन के समापन समारोह को आभासी माध्यम से आज राजभवन में संबोधित कर रहे थे।
    राज्यपाल श्री मंगुभाई पटेल ने कहा कि पिछले दो सालों के दौरान कोरोना ने हमारे जीवन जीने का ढंग बदल दिया है। पढ़ाई-लिखाई से लेकर काम के तरीके और मनोरंजन के साधन सब बदल गए हैं। हाईब्रिड शिक्षा आपदा से मिला अवसर है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण पहुँचविहीन क्षेत्रों के वंचित वर्गों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुँचाने की चुनौतियों के समाधान हाईब्रिड शिक्षा में खोजे जाने चाहिए। वंचित वर्गों और क्षेत्रों के छात्रों के लिए वर्चुअल रियलिटी के द्वारा शिक्षण की व्यवस्था की पहल की जानी चाहिए। वंचित वर्गों को शिक्षा के नए अवसर दिलाने और निवेश बढ़ाने के प्रयास भी जरूरी हैं।
    राज्यपाल श्री पटेल ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के द्वारा भारतीय सनातन संस्कृति की मूल भावनाओं और 21वीं सदी की जरूरतों के लिए उपयुक्त भावी पीढ़ी के निर्माण का अवसर दिया है। वैश्विक परिदृश्य में रोजगार की संभावनाओं के दृष्टिगत शिक्षा में कौशल उन्नयन पर विशेष ध्यान दिया जाना समय की मांग है। छात्र-छात्राओं में देश के वृहत्तर आर्थिक संदर्भों और वैश्विक अर्थ-व्यवस्था की समझ विकसित करना जरूरी है। पाठ्यक्रमों में सामाजिक व्यवहार और नेतृत्व क्षमता संबंधी कौशल को भी शिक्षा का अंग बनाया जाना आवश्यक है। पाठ्यक्रम में ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों और विषय-सामग्री को शामिल किया जाए जो विद्यार्थियों को हमारी गौरवशाली संस्कृति की विविधता में एकता को देखने का समग्र नजरिया प्रदान करें।
    कांफ्रेंस के प्रारम्भ में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के चेयरमैन श्री मनोज आहूजा ने स्वागत उद्बोधन दिया। बोर्ड के डायरेक्टर एकेडमिक श्री जोसेफ एमानुअल ने आभार माना।

  • ग्रेडिंग के आधार पर पुरस्कृत होंगी प्रदेश की पंचायतें

    ग्रेडिंग के आधार पर पुरस्कृत होंगी प्रदेश की पंचायतें

    भोपाल,10 जनवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि प्रदेश की पंचायतों के कार्य की ग्रेडिंग की जायेगी तथा जो पंचायतें अच्छा कार्य कर रही हैं, उन्हें पुरस्कृत किया जायेगा। हर पंचायत की विकास योजना बनाई गई है, उस पर अमल कर ‘स्मार्ट विलेज’ बनाये जायेंगे।

    मुख्यमंत्री श्री चौहान आज मंत्रालय में पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के कार्यों की समीक्षा कर रहे थे। उन्होंने विभाग द्वारा गाँव-गाँव में कचरा संग्रहण एवं परिवहन के लिये बनाये गये ‘मोबाइल एप’ का लोकार्पण भी किया।

    पंचायत एवं ग्रामीण विकास राज्य मंत्री रामखेलावन पटेल, मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस, सीईओ मध्यप्रदेश डे राज्य आजीविका मिशन एल.एम. बेलवाल तथा संबंधित अधिकारी उपस्थित थे।

    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि प्रदेश में स्व-सहायता समूहों द्वारा 127 “दीदी कैफे” संचालित किये जा रहे हैं। ये स्वल्पाहार केन्द्रों के रूप में सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं। आने वाले समय में वल्लभ भवन, विंध्याचल, सतपुड़ा आदि स्थानों पर भी “दीदी कैफे” खोले जायेंगे।

    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि प्रदेश में प्लास्टिक कचरा निपटान के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य हो रहा है। गाँव-गाँव से प्लास्टिक कचरा संग्रहण की व्यवस्था की गई है, जहाँ से प्लास्टिक कचरा संग्रहण केन्द्रों तक पहुँचेगा और वहीं से इसकी बिक्री होगी। प्रदेश में 28 प्लास्टिक संग्रहण केन्द्र खोले जा रहे हैं, जिनका संचालन स्व-सहायता समूह की महिलाओं द्वारा किया जायेगा। प्रदेश में लगभग 9 हजार किलोमीटर सड़कों के निर्माण में वेस्ट प्लास्टिक का उपयोग किया जा रहा है।

    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि प्रदेश में 42 हजार से अधिक पुरानी जल-संरचनाओं के पुनउर्द्वार का कार्य प्रारंभ किया गया है। यह कार्य मनरेगा एवं अन्य योजनाओं से कराया जा रहा है। इससे बड़े क्षेत्र में सिंचाई, मछली-पालन, सिंघाड़ा उत्पादन आदि गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।

    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि प्रदेश में समुदाय आधारित ग्रामीण पर्यटन में “होम-स्टे” योजना सफलता से संचालित की जा रही है। योजना के प्रति पर्यटकों में अच्छा उत्साह दिख रहा है। निवाड़ी जिले के लदपुरा ग्राम तथा पन्ना जिले के मदला ग्रामों में ‘होम-स्टे’ में बड़ी संख्या में पर्यटक रुक रहे हैं। योजना की सफलता के लिये मुख्यमंत्री श्री चौहान ने सभी संबंधितों को बधाई दी गई।

    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि हर गाँव के इतिहास, गौरव, पहचान, संस्कृति, महापुरुषों आदि को पुन: स्थापित करने के लिये सरकार द्वारा निर्णय लिया गया है कि प्रत्येक गाँव में हर वर्ष “ग्राम स्थापना दिवस” मनाया जायेगा। उन्होंने आगामी अप्रैल माह से इस संबंध में कार्यवाही के निर्देश दिये।

    हमारे उत्पाद “जैम” और “अमेजन” पर बिकें

    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने निर्देश दिये कि प्रदेश में महिला स्व-सहायता समूहों एवं अन्य द्वारा तैयार किये गये उत्पाद जैम पोर्टल एवं अमेजन जैसे मार्केटिंग प्लेटफार्म पर बिकें, इसके लिये सघन प्रयास किये जायें।

    समूहों को ऋण स्वीकृति में प्रदेश देश में प्रथम

    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि स्व-सहायता समूहों को ऑनलाइन माध्यम से ऋण प्रकरण प्रस्तुत करने तथा ऋण स्वीकृति में मध्यप्रदेश देश में प्रथम रहा है। वर्ष 2021-22 में एक लाख 40 हजार 576 ऋण प्रकरण स्वीकृत किये गये। स्वीकृत प्रकरणों में ऋण वितरण की त्वरित कार्यवाही के लिये मुख्यमंत्री द्वारा निर्देश दिये।

    हर गाँव में हो ग्राम संगठन

    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने निर्देश दिये कि राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन में हर गाँव में ग्राम संगठन बनें। वर्तमान में प्रदेश में 32 हजार 874 ग्राम संगठन हैं। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने सभी 45 हजार गाँवों में ग्राम संगठन बनाने के निर्देश दिये।

    74 प्रतिशत प्रधानमंत्री आवास पूर्ण

    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि प्रधानमंत्री आवास योजना में वर्ष 2024 तक सभी को आवास दिये जाने का लक्ष्य है। योजना में प्रदेश को 30 लाख 39 हजार आवास का लक्ष्य मिला है, जिसके विरुद्ध प्रदेश में 29 लाख 78 हजार (97.3 प्रतिशत) आवास स्वीकृत किये जा चुके हैं तथा 22 लाख 65 हजार (74 प्रतिशत) आवास पूर्ण किये जा चुके हैं। प्रमुख सचिव श्री उमाकांत उमराव ने बताया कि प्रधानमंत्री आवास के हितग्राहियों को शासन की 36 प्रकार की योजनाओं का लाभ दिया जा रहा है। इनमें राशन प्रदाय, नल-बिजली कनेक्शन, गैस कनेक्शन, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि योजनाएँ शामिल हैं।

    सभी गाँवों को ‘ओडीएफ-प्लस’ बनाना है

    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि स्वच्छ भारत मिशन में वर्ष 2024-25 तक प्रदेश के सभी गाँवों को ‘ओडीएफ-प्लस’ बनाना है। इसमें सभी घरों में शौचालय, 80 प्रतिशत घरों में कम्पोस्ट पिट, 80 प्रतिशत घरों में तरल अपशिष्ट प्रबंधन तथा सभी ग्रामों में प्लास्टिक अपशिष्ट संग्रहण एवं पृथकीकरण कार्य किये जाने हैं। प्रदेश के 1154 गाँव को अभी तक ‘ओडीएफ-प्लस’ बनाया जा चुका है। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने निर्देश दिये हैं कि इस बात का पूरा ध्यान रखा जाये कि नये बनने वाले घर बिना शौचालय के न हो।

    ग्राम सड़क निर्माण में प्रदेश देश में प्रथम

    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के क्रियान्वयन एवं गुणवत्तापूर्ण सड़कों के निर्माण में मध्यप्रदेश देश में शीर्ष पर है। योजना से प्रदेश की 17 हजार 541 बसाहटों को जोड़ा जाना था, जिसके विरुद्ध 17 हजार 506 (99.80 प्रतिशत) बसाहटों को सड़क से जोड़ा जा चुका है। प्रदेश के 250 एवं इससे अधिक जनसंख्या के जनजातीय ग्राम तथा 500 एवं अधिक जनसंख्या के अन्य सभी ग्राम प्रधानमंत्री सड़क से जुड़ गये हैं।

    मनरेगा के भुगतान में न हो विलंब

    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने निर्देश दिये कि मनरेगा में कराये गये कार्यों के भुगतान में विलंब नहीं होना चाहिये। उन्होंने इस संबंध में केन्द्रीय मंत्री श्री गिरिराज सिंह से बातचीत कर लंबित भुगतान के लिये बजट की माँग की। केन्द्रीय मंत्री ने अश्वस्त कराया कि शीघ्र ही बजट दिया जायेगा।

    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने मुख्यमंत्री भू-अधिकार योजना, पेसा अधिनियम के क्रियान्वयन, सॉलिड लिक्विड वेस्ट मैनेजमेंट, देवारण्य योजना के संचालन, पोषण-आहार संयंत्रों के हस्तांतरण आदि के संबंध में भी अधिकारियों को निर्देश दिये।