Category: मध्यप्रदेश

  • सैडमैप में सेंध लगाकर सरकार गिराने में जुटा नौकरी माफिया

    सैडमैप में सेंध लगाकर सरकार गिराने में जुटा नौकरी माफिया


    भोपाल,10 सितंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर).देश में उद्यमिता को जनांदोलन बनाने में जुटे उद्यमिता विकास केन्द्र मध्यप्रदेश (सेडमैप) में एक बार फिर नौकरी माफिया ने घुसपैठ का प्रयास किया है।इस बार सरकारी तंत्र में सेंध लगाने के लिए सरकार में दखल रखने वाले एक संगठन की आड़ ली गई है।सूक्ष्म एवं लघु उद्योग मंत्री चेतन काश्यप को अंधेरे में रखकर रचा गया ये षड़यंत्र कामयाब भी हो सकता था लेकिन जिस तरह इस प्रयास की परतें खुल रहीं हैं उससे सरकार की बदनामी का एक नया शिलालेख तैयार होने लगा है।


    इस षडयंत्र का सूत्रधार कथित तौर पर रमन सिंह अरोरा नामक नौकरी माफिया बताया जा रहा है।ये व्यक्ति कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह के बेटे अजय सिंह के केरवा डैम स्थित रिसार्ट टचवुड का व्यवस्थापक भी बताया जाता है। इसने खुद की फर्म रतन एम्पोरियम बना रखी है जो सरकारी प्रतिष्ठानों में सिक्योरिटी गार्ड सप्लाई करने का ठेका लेती है। उसकी ये फर्म कथित तौर पर सरकारी दफ्तरों में फाईलें चोरी करवाने और अफसरों को रिश्वत देकर सरकारी धन को साईफन करवाने में जुटी रहती है।इसी वजह से कई सरकारी संस्थानों ने रीढ वाले अफसरों ने इसे ब्लैकलिस्टेड कर दिया है। खुद को उद्योगपति दर्शाने के लिए इसने कुछ समय पहले एक राष्ट्रीय अखबार से खुद को सम्मानित कराया था तभी से ये अफसरों और नेताओं पर दबाव बनाकर ठेके कबाड़ने की जुगाड़ कर रहा है।बताते हैं कि इसने अपने कई चमचों को प्रदेश के प्रमुख अखबारों में पे रोल पर नोकरी दिलवाई है जिनके माध्यम से ये सरकार को धमकाने के लिए उलटी सीधी खबरें प्लांट करवाता रहता है।


    जब इसकी फर्म को फर्जी बिलिंग और सुरक्षा गार्डों के वेतन में चिल्लरचोरी के आरोप में धरा गया तो इसने सूक्ष्म एवं लघु उद्योग विभाग के एक आला अधिकारी को बदनाम करने के लिए एक महिला अधिकारी से अश्लील चैट बनाकर वायरल किया था। इसकी पुलिस जांच हुई तो इसके कर्मचारी ने स्वीकार किया कि रमनवीर अरोरा ने ही उससे ये फर्जी चैट लिखवाया था।इस मामले में पुलिस जांच में सारे तथ्य उजागर हो गए हैं और संभावित जेल यात्रा से ये बुरी तरह बौखलाया हुआ है। इस षड़यंत्र के सूत्र विपक्ष के नेताओं से भी जुड़ रहे हैं इसलिए खुद को बचाने और सरकार को बदनाम करने के लिए इसने पूरा जाल बिछाया है।


    रमनवीर की रतन एम्परियम समेत जिन फर्मों और व्यक्तियों को एमएसएमई विभाग की निगरानी में चलने वाले सैडमैप संस्थान ने ब्लैकलिस्ट किया था उन्होंने इस बार सरकार को झांसा देने के लिए एक सांस्कृतिक संगठन से कथित तौर पर जुड़े हुए मंच की आड़ ली है।इस कहानी की पोल तब खुली जब एमएसएमई विभाग के सचिव डॉ.नवनीत कोठारी ने अचानक एक आदेश निकाला जिसमें सैडमैप की ईडी श्रीमती अनुराधा सिंघई(शर्मा) से लगभग सवा लाख पृष्ठों की जानकारी दो दिनों में देने का उल्लेख किया गया था। वे जवाब दे पातीं इसके पहले सचिव ने अनुराधा सिंघई को निलंबन का आदेश थमा दिया। एमएसएमई विभाग के एक जूनियर अधिकारी को आनन फानन में कार्यभार भी दिला दिया गया। इस अधिकारी ने सैडमैप पहुंचकर ईडी से कार्यभार छीन लिया और निगरानी के लिए लगाए गए कैमरे बंद करवा दिए। इस बदलाव को लोकप्रिय फैसला दर्शाने के लिए पर्दे के पीछे से सक्रिय रमनवीर और इसके गेंग में शामिल षड़यंत्रकारियों ने कर्मचारियों के बीच मिठाई बंटवाई और फटाके फोड़े। हालांकि इस असंवैधानिक कदम को मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने संज्ञान लिया है और केविएट लगाने पहुंचे सरकारी कानूनविदों को जमकर फटकार लगाई। अदालत ने कहा कि जब सैडमैप ने सारी कार्रवाई पारदर्शी तरीके से की है और अपने पिछले फैसले में हाईकोर्ट तमाम आरोपों की जांच करके ईडी को क्लीनचिट दे चुका है तब इस आपराधिक षड़यंत्र को छुपाने के लिए सरकार क्यों हाईकोर्ट पहुंच गई।


    गौरतलब है कि सैडमैप की ईडी अनुराधा सिंघई एक कुशल कंपनी सेक्रेटरी हैं और उन्होंने मोदी सरकार के मेक इन इंडिया अभियान को सफल बनाने के लिए अपने विभाग की मंशा अनुरूप पचास लाख रोजगार सृजित करने की मुहिम चला रखी है। उन्होंने इतने कम समय में CEDMAP जैसे संगठन को पूरी तरह बदलकर रख दिया है।उनके नेतृत्व में सैडमैप ने आधुनिक प्रबंधन के पारदर्शी तरीकों को अपनाकर वो कर दिखाया है जो पिछले तैतीस सालों के इतिहास में कभी नहीं हो सका था। उसी स्टाफ और वही अधिकारियों को साथ लेकर उन्होंने निजी क्षेत्र को रोजगार विस्तार के लिए आगे लाने में अभूतपूर्व योगदान दिया है।इस कार्य में उनका कंपनी प्रबंधक और कानूनी सलाहकार होने का सुदीर्घ अनुभव काम आ रहा है। मेक इन इंडिया अभियान हो या स्टार्टअप के माध्यम से देश की पूंजी और रोजगार के अवसर बढ़ाने का तरीका सिखाकर वे उद्यमियों को सफल बनाने में कारगर साबित हो रहीं हैं।उनके प्रयासों की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने अपने ही स्वशासी निकाय सैडमैप को भंडार क्रय नियम के अंतर्गत सरकारी विभागों और उपक्रमों के लिए अनुबंध आधारित सेवा कर्मी उपलब्ध कराने को अधिकृत कर दिया है।


    जब अनुराधा सिंघई की नियुक्ति की गई थी तो फर्जी बिलिंग और ठगी में धरे गए इस नौकरी माफिया ने आरोप लगाया कि उन्होंने फर्जी दस्तावेज दिए हैं। हाईकोर्ट ने अपनी जांच के बाद आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। जब सैडमैप लगभग बंद होने की कगार पर था और कर्मचारियों को लगभग दस दस महीनों से वेतन नहीं दे पा रहा था तब अनुराधा सिंघई की नियुक्ति की गई थी। इस संगठन को सरकार के बजट में से वेतन और प्रशासनिक खर्च नहीं दिया जाता है। ऐसे में उन्हें एक महीने का वेतन पाने के लिए, पहले पिछले 10 महीनों के लिए सभी कर्मचारियों के लिए राजस्व अर्जित करना था।श्रीमती सिंघई ने कुशल प्रबंधन की तकनीकें अपनाकर नियुक्ति के बाद अगस्त 2021 से ही पूरे स्टाफ को नियमित वेतन दिलवाना शुरु कर दिया। जब तक कर्मचारियों का बकाया भुगतान नहीं हो गया तब तक उन्होंने खुद का वेतन भी नहीं लिया। लगभग चार महीनों बाद उन्होंने खुद का वेतन लेना शुरु किया।


    इंडो यूरोपियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (IECCI) और कंपनी सेक्रेटरी प्रैक्टिस में सुश्री अनुराधा सिंघई के 21 वर्षों से अधिक का अनुभव रहा है। ये संगठन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त है और वे खुद संयुक्त राष्ट्र की आर्थिक और सामाजिक परिषद की विशेष सलाहकार रहीं हैं। उन्हें डब्ल्यूटीओ मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में शामिल होने का अवसर भी मिला। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र कार्यालय की ओर से बनाए गए भ्रष्टाचार विरोधी समीक्षा तंत्र के साथ विभिन्न मंचों पर विदेश में 4 बार भारत का प्रतिनिधित्व भी किया है। कुआलालंपुर, मलेशिया में ड्रग एंड क्राइम (यूएनओडीसी) और आयात संवर्धन केंद्र, हेग, नीदरलैंड। जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में काम कर चुकी इस कंपनी सेक्रेटरी ने न केवल सैडमैप बल्कि प्रदेश के उद्योग जगत में भी सरकार के भरोसे को जीवित करने में योगदान दिया है।


    फिलहाल तो सरकारी जांच एजेंसियां अब ये जानने का प्रयास कर रहीं हैं कि सैडमैप को चूना लगाकर खुद का घर भरने वाले षड़यंत्रकारी आर डी मंडावकर, शरद मिश्रा, दिनेश खरे, मनोज सक्सैना, आर के मिश्रा, प्रमोद श्रीवास्तव की संपत्ति उनकी आय से कई गुना अधिक कैसे हो गई । आरोप लगाया गया कि अनुराधा सिंघई ने कई पदों पर जैन लोगों को नियुक्त कर दिया है।श्रीमती सिंघई खुद जन्मजात ब्राह्रण हैं और वे अपनी टीम में केवल ईमानदार और योग्य लोगों का ही चयन करने पर जोर देती हैं। जब सभी आरोप फर्जी और ओछे साबित हुए और अदालती जांच में ये साबित हो गया कि वे एक कुशल प्रबंधन विशेषज्ञ हैं तो उन्हें पद से हटाने के लिए इस बार नया षड़यंत्र रचा गया है।


    अनुराधा सिंघई एक परिणाम प्रेरित कुशल शख्सियत हैं । उन्होंने भ्रष्टाचारियों के गिरोह में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया।भ्रष्टाचार के सभी रास्ते जब बंद कर दिए तो CEDMAP के कुछ अत्यधिक भ्रष्ट कर्मचारी उन्हें पद से हटाने में घटिया स्तर के नए षड़यंत्र रचने लगे। अब, जब CEDMAP अभूतपूर्व ऊंचाइयों पर पहुंच गया है, तो भ्रष्ट लोगों के इस समूह को काली कमाई का भारी स्कोप नजर आने लग गया है। उन्हें लगता है कि CEDMAP उनकी निजी दुकान है।

    अनुराधा सिंघई ने अपनी कुशल टीम के माध्यम से CEDMAP के इन भ्रष्ट कर्मचारियों के कई घोटालों और उनकी कार्यप्रणाली को बार बार उजागर किया है। घोटालों का खुलासा होने पर बाकायदा निदेशक मंडल की मंजूरी से इन काली भेड़ों की परियोजनाओं का विशेष फोरेंसिक ऑडिट कराया गया, जिसमें करोड़ों रुपये का घोटाला और गबन पाया गया। ये सभी कार्रवाई पूरे पारदर्शी तरीके से कराई गई जिसके मिनिट्स अब सभी जांच एजेंसियों और अदालत के सामने चीख चीखकर सत्ता माफिया की काली करतूतों की पोल खोल रहे हैं।

    कार्यभार संभालने के बाद उन्होंने कर्मचारियों की हेराफेरी के खिलाफ कई सख्त फैसले लिए थे, कुछ कर्मचारियों को निलंबित और बर्खास्त भी किया गया।सभी भ्रष्टाचारों पर रोक लगायी गई,कर्मचारियों को अपने वेतन के बदले अपना दायित्व पूरा करने के लिए जवाबदेह बनाया गया। इससे नौकरी माफिया को रिश्वत देकर भर्ती हुए मक्कार कर्मचारियों ने कपोल कल्पित बातें करनी शुरु कर दीं।कुछ भ्रष्ट मीडिया कर्मियों को मिलाकर बदनामी का बवंडर खड़ा किया गया जो बार बार जांच की कसौटियों पर औंधे मुंह गिरता रहा है।


    सभी सरकारी एजेंसियों ईओडब्ल्यू, लोकायुक्त और फिर हाईकोर्ट में सवाल उठाए गए,आरोप लगाए गए। जांच में वे निर्दोष और बेदाग पाई गईं। हाईकोर्ट ने 2022 और 2024 में ही नियुक्ति में अनियमितता को लेकर उनकी याचिका खारिज कर दी है। झूठी खबरें छाप चुके मीडिया संस्थानों की जब भद पिटी तो वे चुपके से दाएं बाएं होने लगे हैं। एमएसएमई विभाग के सचिव डॉ.नवनीत कोठारी ने जिस अधिकारी को कार्यभार संभालने भेजा है उसने जाते ही वहां से निकाले गए आरडी मांडवकर एवं अन्य अधिकारियों की फाईल निकलवाईं हैं बताया जाता है कि वे संस्थान से निकाले गए भ्रष्ट अधिकारियों को दुबारा नौकरी पर रखवाने का प्रयास कर रहे हैं।


    गौरतलब है कि सैडमैप उद्यमियों को प्रशिक्षण देकर उनका परिचय औद्योगिक संस्थानों से करवाता है। इस प्रक्रिया में जिन कर्मचारियों को नौकरी पर रखा जाता है उसका एक तयशुदा कमीशन सैडमैप को मिलता है। इस राशि से ही संस्थान के कर्मचारियों और अधिकारियों का वेतन दिया जाता है। अनुराधा सिंघई ने आते ही कर्मचारियों से किसी भी प्रकार का कमीशन लिया जाना निषिद्ध कर दिया था जिसकी वजह से औद्योगिक संस्थानों को अच्छे और प्रशिक्षित कर्मचारी मिलने की राह प्रशस्त हो गई थी।अब सरकारी नौकरियों में भी गुणवत्ता पूर्ण वर्कफोर्स आसानी से उपलब्ध होने लगा है। कंपनियों ने अपने एचआर डिपार्टमेंट में सैडमैप को सहयोगी बनाकर उससे अपने संस्थानों के अन्य कार्य भी करवाने शुरु कर दिए हैं। जिसकी वजह से संस्थान की आय बढ़ी है। ऐसे में कमीशनखोर नियुक्ति माफिया को लगने लगा है कि वह यहां अब अच्छी कमाई कर सकता है। केन्द्र और प्रदेश की सरकार जब युवाओं को रोजगार मुहैया कराने में हैरान परेशान घूम रही है तब सैडमैप उनके लिए आशा की किरण बनकर उभरा है।ऐसे में यदि नौकरी लगवाने के कार्य में रिश्वतखोरी की परंपरा फिर शुरु कर दी जाएगी तो ये सरकार की बदनामी का कारण तो बनेगी ही साथ में रोजगार दिलाने के सरकारी संकल्प पर भी कुठाराघात करेगी। नौकरी माफिया के माध्यम से विपक्ष तो सरकार गिराने के इस षड़यंत्र में खुलकर सामने खड़ा है,लेकिन एमएसएमई विभाग और सरकार दोनों कई महत्वपूर्ण मंचों पर अपनी जग हंसाई किस मजबूरी के तहत करवा रहे हैं, इसका खुलासा होना अभी बाकी है।

  • एमपी की नौकरशाही को वसूली के नतीजों की चिंता नहीं

    एमपी की नौकरशाही को वसूली के नतीजों की चिंता नहीं


    -आलोक सिंघई-
    डाक्टर मोहन यादव की भाजपा सरकार सरकारी तंत्र के मकड़जाल में बुरी तरह उलझ गई है। नीति आयोग ने आय बढ़ाने के जो निर्देश दिए हैं उनसे सरकारी मशीनरी अपना रिकार्ड तो अपडेट कर रही है लेकिन आम जनता की आय बढ़ाने में ये कवायद बुरी तरह असफल साबित हो रही है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने तो कर्ज लेकर खूब खैरात बांटी और भरपूर लोकप्रियता बटोरी। खुद प्रधानमंत्री को कहना पड़ा था कि वे मध्यप्रदेश के अतिलोकप्रिय मुख्यमंत्री हैं। अब ये शोर तो शांत हो गया है लेकिन सुशासन की जिद ने राज्य के उद्यमियों की बैचेनी बढ़ा दी है।बजट में अस्सी हजार करोड़ रुपए का स्थापना व्यय देकर मोहन यादव समझ रहे हैं कि इतना मंहगा प्रशासन राज्य के विकास में चार चांद लगा देगा ।हकीकत ये है कि बोगस अफसर और नाकारा सरकारी तंत्र प्रदेश के विकास की राह में बेड़ियां बन गया है। शिवराज सिंह चौहान की सरकार लगभग दो दशकों से कर्ज लेकर आधारभूत ढांचे के विकास का जो शोर मचा रही थी उसे अब मोहन यादव की सरकार केवल आंकड़ों में बदल रही है।पिछले लगभग दस महीनों से डाक्टर मोहन यादव सुशासन पर जोर दे रहे हैं। वे इस सुशासन का ख्वाब उस सरकारी तंत्र के माध्यम से साकार करने का प्रयास कर रहे हैं जो प्रदेश के खोखले विकास का जनक ही साबित हुआ है।
    सरकार ने उत्पादकता के जिन पैमानों पर काम शुरु किया है उनमें सबसे बड़ा राजस्व महा अभियान खोखली कवायद साबित हो रहा है। नए साफ्टवेयर के माध्यम से पटवारियों और वित्तीय प्रबंधन को जिस तरह से कसा गया है उससे सरकारी तंत्र में आक्रोश और उदासीनता बढ़ी है नतीजा सिफर रहा है। भूमिसुधार के साथ राजस्व महाअभियान 2 के नतीजे सामने आने लगे हैं। जनता से कहा गया था कि वह आनलाईन माध्यम से और तहसील स्तर पर अपनी शिकायत दर्ज कराए। लोग सरकारी अमले के पास पहुंचे भी ।उन्होंने सरकारी अमले की सेवा में कोर्निशें भी बजाईं पर परिणाम केवल शिकायत के कागज पर खात्मे तक ही पहुंच पाया। सरकारी अमले का प्रयास रहा कि फिलहाल शिकायत बंद हो जाए और हम सरकार को अपनी कार्रवाई सुनिश्चित करने की सूचना दे दें। ये प्रक्रिया भी आनलाईन ही थी इसलिए जवाब पुख्ता तरीके से दिया जा रहा है। ये कुछ वैसे विकास का नमूना है जिसके बारे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लाल किले की प्राचीर से और विदेशों में किए जाने वाले आयोजनों में दहाड़कर सुनाते हैं। देश के आंकड़ें बताते हैं कि जून तिमाही में जीडीपी ग्रोथ रेट पिछली 5 तिमाही में सबसे कम रही है। अप्रैल-जून 2024 तिमाही में भारत की GDP ग्रोथ रेट 6.7% दर्ज की गई है। ये तयशुदा लक्ष्य से कम है।
    मुख्य मंत्री अपील कर रहे हैं कि आप अपनी कृषि भूमियां बेचें नहीं क्योंकि सरकार की नीतियों से जल्दी ही खेतों पर पैसा बरसेगा। बेशक खेती पर मुनाफा बरसने की तमाम संभावनाएं खुली पड़ीं हैं। रूस यूक्रेन युद्ध हो या इस्राईल फिलिस्तीन संग्राम, समूचे विश्व में तीसरे विश्व युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं। ऐसे में भारत की जमीन विश्व की भूख शांत करने में उपयोगी साबित हो सकती है। इसके बावजूद सरकार इस अवसर को भुनाने लायक तंत्र विकसित नहीं कर पा रही है। तीन कृषि कानून देश की आर्थिक समृद्धि में सहायक साबित होने वाले थे। किसान की भी तकदीर बदल सकते थे। सरकार भले ही उन्हें देश भर में लागू न कर पाई हो लेकिन भाजपा शासित राज्यों पर तो कोई बंधन नहीं है कि वे अपनी कृषि का ढांचा इस तरह विकसित करें कि वे कृषि सुधारों के माडल बन जाएं। इसके विपरीत संघ के नाम पर भू माफिया जमीनों के दस्तावेजों का हेर फेर करने में जुटा हुआ है।
    फिलहाल जो आंकड़े हैं वे सरकारों के दावे की असलियत उजागर कर रहे हैं। MoSPI डेटा के अनुसार, चालू वित्त वर्ष 2024-25 की पहली तिमाही के लिए भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर धीमी होकर 6.7% हो गई है। भारत के सबसे अहम सेक्टर माने जाने वाला एग्रीकल्चर और माइनिंग सेक्टर में बड़ी गिरावट देखी गई है. एग्रीकल्चर सेक्टर में ग्रोथ घटकर दो फीसदी हो गई है जबकि पिछले वर्ष ये 3.7 प्रतिशत थी। ये बताता है कि जब दुनिया को खाद्यान्न की सबसे अधिक जरूरत है तब भारत का कृषि ढांचा बाजार की मांग का उपयोग नहीं कर पा रहा है। मध्यप्रदेश भी इससे अछूता नहीं है। एमपी में तो सरकारी खरीद घटती जा रही है और आढ़तियों के चंगुल में फंसा किसान हर चौराहे पर छला जा रहा है। आम आदमी की खरीद क्षमता घटने से बाजार की रौनक भी उड़ गई है। संगठित रोजगार के क्षेत्र तो प्रसन्न हैं पर असंगठित क्षेत्र के लिए चुनौतियां जस की तस बनी हुई हैं।
    सरकारी तंत्र सोच रहा है कि लाड़ली बहना,किसान सम्मान निधि और अन्य हितग्राही मूलक योजनाओं से उनका पेट काटा जा रहा है जबकि हकीकत ये है कि उद्योगों को बल देने के लिए बढ़ाए गए सरकारी तंत्र का स्थापना व्यय आम नागरिकों का कचूमर निकाल रहा है। अपनी उपयोगिता साबित करने के लिए सरकारी तंत्र ने जो सख्ती अपनाई है उससे भी जनता के बीच आक्रोश गहराता जा रहा है। पिछले दिनों मध्यप्रदेश के प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने जिस आक्रामक शैली में आंदोलन किए उनसे भी उजागर हो रहा है कि विपक्षियों को सरकार और जनता के बीच जमी मिठाई की सड़ांध महसूस हो रही है।इसके बावजूद संगठन के दंभ में डूबे भाजपा के नेतागण और सरकार अपने पैरों तले खिसकती जमीन की हकीकत से बेखबर है। तख्त और ताज का गुमान शासकों को एक सुनहरे संसार की सैर कराता है। मुख्यमत्री डॉक्टर मोहन यादव तो राजा विक्रमादित्य के सुशासन की सौंधी महक में पले बढ़े हैं।उम्मीद है कि उन्हें राजा विक्रमादित्य के सिंहासन की बत्तीस पुतलियों की गवाही अच्छे से याद होगी।

    (द सूत्र में प्रकाशित आलेख के संपादित अंश)

    https://thesootr.com/state/madhya-pradesh/garbhakaal-cm-mohan-yadav-alok-singhai-thesootr-bhopal-7051775

  • एमपी की पहचान बाघ को बचाएं बोले डॉ.मोहन यादव

    एमपी की पहचान बाघ को बचाएं बोले डॉ.मोहन यादव

    भोपाल,28 जुलाई(प्रेस इनफॉर्मेशन सेंटर).मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि यह हमारा सौभाग्य है कि मध्यप्रदेश सर्वाधिक बाघ वाला प्रदेश है। प्रदेश में बाघों की आबादी बढ़कर 785 पहुँच गई है। यह प्रदेश के लिये गर्व की बात है। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस पर प्रदेशवासियों को बधाई और शुभकामनाएँ दी हैं।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा है कि वन्य प्राणियों की सुरक्षा का कार्य अत्यंत मेहनत और परिश्रम का है। समुदाय के सहयोग के बिना वन्य प्राणियों की सुरक्षा संभव नहीं है। वन विभाग और वन्य प्राणियों की सुरक्षा में लगे सभी लोग बधाई के पात्र हैं, जिनके कारण मध्यप्रदेश एक बार फिर टाइगर स्टेट बन गया है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस पर जंगलों में बाघों के भविष्य को सुरक्षित करने और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने के लिए एकजुट होकर कार्य करने का संकल्प लेने का आहवान किया है।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि बाघों के संरक्षण के लिये संवेदनशील प्रयासों की आवश्यकता होती है जो वन विभाग के सहयोग से संभव हुई है। हमारे प्रदेश के राष्ट्रीय उद्यानों में बेहतर प्रबंधन से जहाँ एक ओर वन्य प्राणियों को संरक्षण मिलता है, वहीं बाघों के प्रबंधन में लगातार सुधार भी हुए हैं।

    वन्य प्राणियों के प्रति संवेदनशीलता

    वन्य प्राणियों के प्रति संवेदनशीलता का हाल ही में सीहोर जिले में एक उदाहरण सामने आया था। सीहोर जिले के बुदनी के मिडघाट रेलवे ट्रेक पर बाघिन के तीन शावक ट्रेन की चपेट में आ गये थे, जिसमें दो गंभीर रूप से घायल शावकों को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देश पर जिला प्रशासन और वन्य प्राणी चिकित्सकों की टीम द्वारा एक डिब्बे की विशेष ट्रेन से उपचार के लिये भोपाल लाया गया था।

  • इस लोकतंत्र को रीसेट होने दीजिए

    इस लोकतंत्र को रीसेट होने दीजिए


    आजादी का पर्व नजदीक है। भारतीय लोकतंत्र और स्वाधीनता को लेकर राग जयजयवंती गाने वालों की टोलियां बाजार में निकलने वाली हैं। जिसने भी लाभ की मिठाई पा ली वह इस लोकतंत्र की का गुणगान करने लग जाएगा। जो वंचित रहा निश्चित तौर पर वह गाली देगा। दरअसल हम सोचने को राजी नहीं कि लोकतंत्र और आजादी के उल्लास में हमने क्या गंवा दिया है।हमें सोचना होगा कि आखिर भारत की तरुणाई को लगभग आधी सदी तक किन्होंने तरह तरह के षड़यंत्रों में फंसाकर रखा । भारत में किसी प्रतिष्ठान को चलाना कितना दुरूह कार्य है ये मध्यप्रदेश सैडमैप के प्रयासों को देखकर समझा जा सकता है। मध्यप्रदेश सरकार ने ये संस्थान इसलिए बनाया था ताकि इसके माध्यम से प्रदेश के गौरवशाली प्रतिष्ठानों के लिए अच्छी गुणवत्ता का प्रशिक्षित मानव बल तैयार किया जा सके। डिग्रियां लेकर तो हर साल युवाओं की बड़ी वर्कफोर्स तैयार हो रही है। उनमें से नतीजे देने वाले युवाओं की तलाश भूसे में सुई तलाशने जैसी होती है। यही सोचकर सरकार ने एक गुणवत्ता पूर्ण संस्था के माध्यम से वर्कफोर्स उपलब्ध कराने का इंतजाम किया था। अब तक की यात्रा में सैडमैप ने प्रदेश के विकास में बड़ी भूमिका निभाई है। सरकारी संरक्षण होने की वजह से इस संस्थान को अधिक अवसर उपलब्ध हो जाते हैं। संस्थान सरकारी नहीं है और एक तरह से निजी संस्था है इसलिए इसमें वैयक्तिक लाभ लेने के भी अवसर उपलब्ध हो जाते हैं। केवल नैतिकता की झीनी चंदरिया ही सामाजिक दायित्वों की रक्षा कर पाती है। सैडमैप की कार्यकारी संचालक अनुराधा सिंघई के पहले तक जिन लोगों ने जवाबदारियां संभालीं उनमें से कई पर आरोप लगे। जांच एजेंसियों ने उनके घरों पर छापे भी मारे और कई गड़बड़ियां भी पाईं । यही वजह है कि अब कोई भी यहां नवाचार करने का प्रयास करता है उसे भी संदेह की निगाह से देखा जाने लगता है। मध्यप्रदेश शासन ने अनुराधा सिंघई को उनकी विश्वस्तरीय योग्यताओं को देखते हुए संस्थान संभालने की जवाबदारी दी है। उन्होंने जब यहां चल रहे नाकारेपन की गंदगी को साफ करना शुरु किया तो यहां अड्डा जमाए बैठी तरह तरह की माफिया ताकतों ने हल्ला मचाना शुरु कर दिया।अब तक इस संस्थान को लेकर भी उनकी उपलब्धियों पर चर्चा कम हुई अखबारी सुर्खियां बने फड़तूस बयानों को चटखारे लेकर खूब सुना सुनाया गया। उनकी नियुक्ति को चुनौती देने के लिए जो कहानियां सुनाई गईं उन्हें आधार मानकर स्थानीय अदालत ने पुलिस को जांच की जवाबदारी दे दी । ईडी की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका के जवाब में श्रीमती अनुराधा सिंघई ने उच्च न्यायालय के सामने अपना पक्ष प्रस्तुत किया और अदालत ने उन्हें अपना काम जारी रखने के लिए क्लीनचिट दे दी। अदालत ने झूठे तथ्यों के आधार पर अदालत और प्रशासन का समय बर्बाद करने वाले षड़यंत्रकारियों को भी फटकार लगाई है। अदालत की कड़ी पड़ताल के बाद तो अब इन षडयंत्रकारियों को बाज आना चाहिए। शासन को भी अपने उन महत्वाकांक्षी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आगे आना होगा जिनसे मध्यप्रदेश में सुशासन स्थापित होने जा रहा है। कुशल युवाओं को साथ लेकर एक सफल प्रदेश का निर्माण होने जा रहा है। प्रदेश में अब तक की जो राजनीति चलती रही है उसकी वजह से आज भी प्रदेश के विकास की रफ्तार गुजरात या अन्य राज्यों की तरह तेज गति नहीं पकड़ सकी है। अब तक की कांग्रेसी सरकारें रहीं हों या लगभग दो दशकों का भाजपा का शासनकाल दोनों के दौरान कभी बंधे बंधाए ढर्रे से आगे देखने की परंपरा विकसित नहीं हो पाई।संघ और भाजपा संगठन की आड़ लेकर भी कई बार षड़यंत्रकारियों ने सुशासन को ध्वस्त करने के प्रयास किए।इसके बावजूद कुछ प्रतिभाशाली अफसरों ने पहल करके रचनाधर्मी युवाओं को आगे लाने की जो मुहिम चलाई वह अब सफलीभूत होती नजर आने लगी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि कृषि पर बोझ घटाने के लिए हमें उद्यमिता को बढ़ावा देना होगा ताकि विशाल युवा वर्ग को हम नौकरियां उपलब्ध करा सकें। ऐसे में कंपनी सेकेट्री के रूप में लंबा अनुभव रखने वाली अनुराधा सिंघई जैसै प्रतिभाशाली प्रबंधकों पर हमें भरोसा करना होगा।उनके नेतृत्व में सैडमैप न केवल सरकारी प्रतिष्ठानों बल्कि कार्पोरेट जगत के लिए भी युवाओं की खेप तैयार कर रहा है। ऐसे में उन्हें सहारा देकर अवसर भी देना होगा ताकि प्रदेश एक नए दौर में प्रवेश कर सके। हम अपने पुरातनपंथी सोच को ही पकड़े बैठे रहेंगे और उसी के अनुसार लोगों को घुटने के स्तर पर लाते रहेंगे तो राज्य को ऊंचाईंयों तक नहीं पहुंचाया जा सकेगा। सेना की अग्निवीर योजना का विरोध करने वालों को अहसास भी नहीं कि पुरानी पेंशन स्कीम का शोर मचाकर वे युवाओं को किस अंधे कुएं में धकेल रहे हैं। कार्पोरेट सेक्टर में आरक्षण का षड़यंत्र करके किस तरह आरक्षित वर्ग के विशाल तबके को रोजगार के मंगलमयी अवसरों से वंचित कर रहे हैं। हमें पुराने शासकों और पुरानी सोच में ढल चुके लोगों को सख्ती से गो बैक कहना होगा। यदि लोकतंत्र के नाम पर लूजर्स को सत्ता के नजदीक जगह दी जाएगी तो विनर्स के माध्यम से रचे जा रहे नए संसार से हम प्रदेश को वंचित कर देंगे। हमें इस लोकतंत्र को नए संदर्भों में रीसेट होने देना होगा। सरकार ने अब तक अफवाहों पर ध्यान दिए बगैर स्वविवेक से फैसले लिए हैं। उसे इसी तरह आगे बढ़ते रहना होगा, तभी हम भारत माता के परम वैभव के लक्ष्य तक पहुंच पाएंगे।

  • अनुराधा सिंघई की नियुक्ति को हाईकोर्ट ने सही बताया

    अनुराधा सिंघई की नियुक्ति को हाईकोर्ट ने सही बताया

    पुलिस में दर्ज प्राथमिकी खारिज, शिकायत कर्ताओं को लगाई फटकार

    भोपाल। ईडी की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका क्रमांक 29833/2023 पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने अपना महत्वपूर्ण फैसला सुना दिया है। न्यायालय ने न केवल सेडमैप की कार्यकारी संचालक श्रीमती अनुराधा सिंघई की नियुक्ति को सही माना है, बल्कि उनके विरूद्ध लगाए गए सभी आरोपों को भी झूठा बताया है। कार्यकारी संचालक श्रीमती अनुराधा सिंधई की नियुक्ति उद्यमिता विकास केंद्र मध्यप्रदेश (सेडमैप) में 27 जुलाई 2021 को की गई थी। उनके कार्यभार संभालने से पहले ही नियुक्ति प्रक्रिया और उनकी योग्यता पर सवाल उठाए जाने लगे थे। अब कोर्ट का बहुप्रतीक्षित निर्णय आने के बाद यह साबित हो गया कि सभी आरोप झूठे और निराधार थे, जिससे विरोधियों को कोर्ट में पराजय का सामना करना पड़ा। न्यायालय के निर्णय के सम्मान में सेडमैप में खुशी मनाई गई। निर्णय आते ही ईडी श्रीमती अनुराधा सिंघई को सभी ओर से बधाइयां मिलना शुरू हो गईं।


    बता दें कि सेडमैप की कार्यकारी संचालक श्रीमती अनुराधा सिंघई की नियुक्ति के खिलाफ न केवल पुलिस थाना में झूठी और फर्जी शिकायत दर्ज कराई गई थी, बल्कि उन्हें परेशान करने के लिए न्यायालय में भी याचिका दायर की गई थी कि वह ईडी पद के लिए योग्य नहीं हैं और इस पद पर उनकी नियुक्ति में अनियमितताएं हुई हैं, लेकिन हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद अब सब कुछ स्पष्ट हो गया है, साथ ही विरोधियों के झूठ का भी पर्दाफाश हो गया है।


    दरअसल, भ्रष्टाचार के विरूद्ध ‘‘जीरो टॉलरेंस’’ की नीति पर अडिग कार्यकारी संचालक श्रीमती अनुराधा सिंघई को पद से हटाने के लिए पिछले तीन वर्षाें से कतिपय तत्वों द्वारा हर तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे थे। भ्रष्टाचार के मंसूबे पूरे न होते देख कुछ लोगों ने कार्यकारी संचालक की नियुक्ति को ही चुनौती दे डाली। बिना जांच पड़ताल किए एक के बाद एक प्रकरण दर्ज होने के बाद भी कार्यकारी संचालक श्रीमती अनुराधा सिंघई ने सबका डटकर मुकाबला किया, और जैसे-जैसे प्रकरण आगे बढ़ता गया, सभी को वास्तविकता का आभास होने लगा। ईडी के पक्ष में धीरे-धीरे लोग सामने आने लगे। कार्यकारी संचालक ने नियुक्ति सम्बंधी जो तथ्य प्रस्तुत किए, उनके सामने, विरोध में मुखर लोगों को हार मानने, के लिए विवश होना पड़ा।
    हालांकि इस मामले की बहस पिछले माह ही पूरी हो गई थी, परंतु कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। फैसला सुनने के बाद जहां सेडमैप के कर्मचारियों के चेहरे खिल उठे वहीं उद्यमिता भवन में खुशियां मनाई गईं। कार्यकारी संचालक ने कहा कि अदालत ने किसी भी धारा में उन्हें दोषी नहीं पाया। उन्हें न्याय प्रणाली पर पूरा भरोसा था। नियुक्ति सम्बंधी मामले में बीते तीन वर्षों से घिरीं कार्यकारी संचालक श्रीमती अनुराधा सिंधई ने गर्व से न्यायालय के फैसले का सम्मान किया। कर्मचारियों के बीच जीत की घोषणा करते ही उद्यमिता भवन में हर्ष की लहर दौड़ गई। उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व संस्था के एक भ्रष्ट समूह ने षड़यंत्रपूर्वक ईडी को पद से हटाने के इरादे से पुलिस थाने में भी एफ.आई.आर. दर्ज कराई थी, जिसमें गहन जांच-पड़ताल के बाद यह पाया गया कि ईडी सही हैं और भोपाल जिला और सत्र न्यायालय ने गहन जांच और विचार-विमर्श के बाद, कार्यकारी संचालक के खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों को झूठा करार दिया व एफ.आई.आर. खारिज कर दी गई।
    बताना चाहेंगे कि इससे पूर्व में हो चुकी विभागीय जांच में भी विभागीय अधिकारियों द्वारा श्रीमती अनुराधा सिंघई की नियुक्ति को सही ठहराया गया। अब हाईकोर्ट के निर्णय उपरांत उस पर मोहर लग गई है।
    हालांकि तीन साल तक कार्यकारी संचालक को कई आरोपों का सामना करना पड़ा, जिससे उनकी कार्यप्रणाली, उनकी उपलब्धियां और वित्तीय स्थिति के लिए उनकी प्रतिष्ठा पर आंच आने का खतरा मंडराने लगा था। कार्यकारी संचालक श्रीमती अनुराधा सिंघई ने फैसले के बाद सभी के प्रति आभार व्यक्त किया और राहत व्यक्त की।

    उन्होंने कहा कि न्यायालय का निर्णय एक कानूनी जीत से कहीं अधिक है। यह पारदर्शिता, नैतिक आचरण और भ्रष्टाचार के विरूद्ध छेड़ी गई मुहिम के प्रति अटूट आस्था का प्रतीक है। कानूनी विशेषज्ञों की एक प्रतिष्ठित टीम द्वारा हर प्रकार से मुकाबला किया गया और पूरी लगन से बहस की गई। एक अनुचित जांच का सामना करते हुए ईडी की प्रतिष्ठा पर गहरा असर पड़ा, परंतु चुनौतियों के बावजूद, उन्होंने अपनी बेगुनाही बरकरार रखी और कानूनी कार्यवाही में लगातार सहयोग किया।


    आरोपों के झूठा साबित होने पर अपनी प्रतिक्रिया में कार्यकारी संचालक श्रीमती अनुराधा सिंघई ने कहा कि आज उन्हें फिर से विश्वास हो गया कि ईश्वर के घर में देर है, अंधेर नहीं। उन्होंने कहा कि वे शुरू से स्वयं को निर्दाेष बता रहीं थीं। लेकिन किसी ने उनकी बात नहीं सुनी। आखिर सच की जीत हुई। न्यायालय का निर्णय आने के पश्चात कार्यकारी संचालक श्रीमती अनुराधा सिंघई ने अपने अधिवक्ताओं, परिवार, मित्रों, और प्रशंसकों के समर्थन के लिए, सभी की शुभकामनाओं के लिए उन्हें धन्यवाद दिया, जो इस कठिन समय के दौरान उनके समर्थन में अटूट रहे तथा जिनकी वजह से उन्हें साहस और संबल मिला और वे कठिनाइयों से जूझ सकीं, जिन्होंने पूरी प्रक्रिया में मार्गदर्शन प्रदान किया। उन सभी के प्रति उन्होंने धन्यवाद ज्ञापित किया।
    अनुराधा को ऐसे किया प्रताड़ित…!


    o संस्था में बाहरी एजेंसियों से मिला हुआ, कुछ कर्मचारियों का एक ऐसा अंदरूनी समूह (सिंडिकेट) था, जो वित्तीय अनियमितता में लिप्त था और संस्था के हितों से ऊपर अपने हितों को रखता था।
    o इस षडयंत्रकारी समूह ने ही कार्यकारी संचालक के कार्यभार संभालने से पूर्व ही दो प्रकरण दर्ज करा रखे थे, जिन्हें बाद में वापस ले लिया गया।
    o उसके बाद शुरू हुआ अनगिनत आर.टी.आई. (सूचना का अधिकार) लगाने और सी.एम. हेल्पलाइन में झूठी शिकायतों का सिलसिला
    o दुर्भावनापूर्ण इरादे और बुरी नियत से भद्दे, अशोभनीय पत्र लिखे गए
    o छवि धूमिल करने के इरादे से कई तरह की अफवाहें फैलाई गईं, कर्मचारियों को उनके विरूद्ध कार्य करने के लिए बरगलाया गया।
    o योग्यता और नियुक्ति को लेकर जनहित याचिका (पी.आई.एल.) क्रमांक 11889/2022 लगाई गई, जिसे माननीय उच्च न्यायालय ने दिनांक 23 मई 2022 को खारिज कर दिया और नियुक्ति को सही ठहराया।
    o कूटरचित, मिथ्या और भ्रामक दस्तावेज तैयार कर षडयंत्रपूर्वक आपराधिक प्रकरण दर्ज कराया गया, जो पुलिस जांच में झूठे पाए गए और न्यायालय ने भी पुष्टि करते हुए उन्हें खारिज कर दिया।
    o षडयंत्रकारी यहीं नहीं रूके, छवि धूमिल करने के लिए कतिपय तत्वों द्वारा गुमनाम, फर्जी और झूठी शिकायतें, अलग-अलग नामों से विभिन्न फोरम पर की जाती रहीं।
    o संस्था में कार्यरत कर्मचारियों के अतिरिक्त नवनियुक्त कर्मचारियों को ईडी के खिलाफ़ भड़काकर कार्य बाधित किया गया।
    o कोर्ट में अपील खारिज हो जाने से हताश लोगों ने मनगढ़ंता तरीके से मिथ्या, भ्रामक और काल्पनिक चैट बनाकर वायरल किया और चरित्र हनन का प्रयास किया। आपको बता दें कि क्राइम ब्रांच द्वारा जांच में साबित हो गया कि मनगढ़ंत और झूठी चैट बनाने के पीछे एक निष्कासित एजेंसी रतन एम्पोरियम का प्रबंधक रमनवीर अरोरा था। उसके विरूद्ध कोर्ट में चालान भी पेश हो गया है।
    o अपने मंसूबों में कामयाबी मिलते न देख और कोर्ट में अपील खारिज होने से हताश भ्रष्ट समूह की शह पर कई दफा ईडी की रैकी और पीछा करते हुए लोगों से भी जान का खतरा पाया गया, जिसकी शिकायत पुलिस कमिश्नर कार्यालय में की गई।
    o उक्त समूह द्वारा दहशत फैलाने का मकसद ईडी को मरवाने की कोशिश भी हो सकता है।
    o मीडिया को भी गुमराह करने की कोशिशें की गईं, झूठी, भ्रामक और मनगढ़ंता जानकारी देकर ईडी की छवि धूमिल करने और चरित्र हनन की साजिशें की गईं।


    § * योग्यता पर प्रश्नचिन्ह कैसे…?*
    o एक स्वशासी संस्था जो वर्ष 2021 में बंद की कगार पर थी और निरंतर कई वर्षों से घाटे में जा रही थी, उसे अपनी कार्यकुशलता से सफलतापूर्वक संचालित कर दिखाया। उन्होंने आर्थिक संकट की स्थिति में ईडी का कार्यभार संभालते हुए मात्र चार माह में 14 माह का (बीते 10 माह सहित) वेतन देकर संस्था को घाटे से उबार दिया।
    o ईडी के कार्यभार से पूर्व संस्था की हालत यह थी कि कर्मचारियों को 10 माह से वेतन नहीं मिल पा रहा था, जो कि उनके ज्वाइन करने के चार माह के भीतर ही 14 माह का वेतन प्रदान कर दिया गया और तब से अब तक कर्मचारियों को नियमित वेतन प्राप्त हो रहा है।
    o संस्था के क्षेत्रीय समन्वयकों की वित्तीय अनियमितता और दुराचार के कारण संविदा कर्मचारी और जिला समन्वयक काफी प्रताड़ित हो रहे थे, उनकी मुश्किलों को क्षेत्रीय समन्वयक का पद समाप्त करते हुए, दूर किया गया।
    o संस्था अपने अस्तित्व से लड़ रही थी और बेहद खराब छवि से गुजर रही थी, तब उन्होंने छवि निखारने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए और संस्था के प्रति विश्वास का वातावरण निर्मित करते हुए पहचान दिलाने का कार्य किया।
    o संस्था में गुणवत्ता पर ध्यान दिया गया। मैनपावर प्रभाग में चल रही विसंगतियों को दूर करते हुए सेडमैप को बतौर मॉनीटरिंग एजेंसी और फेसिलिटेटर के रूप में उभारा, जिसके परिणामस्वरूप मध्यप्रदेश भंडार क्रय नियम के अन्तर्गत प्रशिक्षण एवं आउटसोर्स सेवाओं के लिए संस्था को नामांकित किया गया।
    o संस्था के लक्ष्यों की प्रतिपूर्ति के लिए एक ब्लूपिं्रट तैयार किया गया, जिसके माध्यम से मध्यप्रदेश मंे कोई बेरोजगार न रहे, इस हेतु सभी को रोजगार-स्वरोजगार और आजीविका से जोड़ने का बीड़ा उठाया गया।
    o और भी कई ऐसे प्रेरक कार्य हैं जो शासन की मंशा के अनुरूप किये जा रहे हैं और उनके सुखद परिणाम भी आ रहे हैं।
    § क्या इसे कहेंगे अयोग्य होना?
    o जो कार्यभार संभालने के उपरांत महज 4-5 माह में ही संस्था को घाटे से उबार देता है।
    o जो गुणवत्ता पर ध्यान देते हुए संस्था को उत्तरोत्तर प्रगति की ओर अग्रसर करता है।
    o जो जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाते हुए भ्रष्टाचार के विरूद्ध कठोर कदम उठाता है।
    o जो संस्था के उद्देश्यों के अनुरूप रोजगार-स्वरोजगार और आजीविका संवर्धन के लिए नए-नए प्रयोग करता है।
    o जिन्हें कॉर्पाेरेट सामाजिक उत्तरदायित्व, क्लस्टर विकास, व्यवसाय मॉडलिंग, उद्यमिता, प्रशिक्षण, आजीविका, अनुसंधान और अध्ययन, कॉर्पाेरेट समाधान, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और सरकारी सलाह सहित विकास और कॉर्पाेरेट क्षेत्र में 21 वर्षों से अधिक का अनुभव है।
    o जो बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं और बिजनेस वुमेन ऑफ द ईयर सहित कई सामाजिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत हैं।
    o जो फैलो कंपनी सेक्रटरी की उपाधि से विभूषित हैं और वेद, वेदांग एवं उपनिषद में गहन अध्ययन के लिए सम्मानित हैं।
    o जो आजीविका संवर्द्धन के लिए किए जा रहे प्रयासों के लिए विदेशों में तीन बार भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं।
    o जिन्होंने अपनी कार्यकुशलता और दूरदर्शिता से संस्था का कायापलट किया है।


    फैसले के बाद विधि विशेषज्ञों की राय
    न्यायालय के फैसले पर सेडमैप के विधिक सलाहकार एडिशनल एडवोकेट जनरल श्री भरत सिंह और वरिष्ठ हाईकोर्ट एडवोकेट श्री पंकज दुबे ने प्रसन्नता प्रकट की। कार्यकारी संचालक श्रीमती अनुराधा सिंघई के पक्ष में न्यायालय का निर्णय आने के उपरांत खुशी जताते हुए एडिशनल एडवोकेट जनरल श्री भरत सिंह ने कहा कि ईडी वाकई बहुत साहसी और जुझारू हैं, जिन्होंने अकेले इस विषम परिस्थिति का सामना किया और बुराई को जड़ से हटाया। यदि देश में ऐसे और लोग हों तो प्रदेश का कायापलट करने से कोई नहीं रोक सकता। उन्होंने शासन की राजस्व चोरी को रोका है। उन्हें सम्मानित किया जाना चाहिए।
    वरिष्ठ हाईकोर्ट एडवोकेट श्री पंकज दुबे का भी कहना है कि ईडी की नियुक्ति को कोर्ट ने पूरी तरह से सही ठहराया है। कोर्ट ने माना कि ईडी की नियुक्ति पूरी तरह से सही है और सक्षम प्राधिकारी द्वारा उनकी नियुक्ति को सही ठहराया गया है वह काफी योग्य हैं। इसलिए सभी आरोप झूठे और बेबुनियाद साबित हुए।


    शिकायतकर्ता मनोज शर्मा निष्कासित अकाउंटेंट है जो कि वित्तीय अनियमितता में भ्रष्ट समूह में शामिल था। इसके लिए उसके द्वारा दुर्भावनापूर्ण तरीके से फर्जी और झूठी शिकायत की गई। माननीय कोर्ट ने उसे बुरी तरह फटकार लगाई है।
    विभागीय जांच के विरूद्ध आर.डी. मांडवकर जब हाईकोर्ट में स्टे लेने गया तो माननीय हाईकोर्ट जज ने स्टे की पिटीशन को खारिज करते हुए आर.डी. मांडवकर को भी फटकार लगाई थी। ईडी ने विभागीय जांच शुरू की तो उसने बदला लेने के लिए ईडी के विरूद्ध झूठी एफ.आई.आर. दर्ज कराई।


    माननीय न्यायालय का निर्णय भ्रष्ट समूह में शामिल मनोज शर्मा, शरद कुमार मिश्रा, आर.डी. मांडवकर और रमनवीर अरोरा समेत समस्त अंदरूनी कर्मचारी और बाहरी उनके सहयोगी साजिश में जुटे अन्य लोगों के लिए एक बड़ा सबक है।

  • सरकार चाहती रोजगार मिले पर कलेक्टर वेतन देने राजी नहीं

    सरकार चाहती रोजगार मिले पर कलेक्टर वेतन देने राजी नहीं


    भोपाल 20 जुलाई(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।सरकार के सूक्ष्म एवं लघु उद्योग विभाग ने जिन उद्यमियों को प्रशिक्षण देकर कुशल कामगार के रूप में जिलों में भेजा है उन्हें कई कलेक्टर वेतन ही नहीं देना चाहते हैं। गुना कलेक्टर ने ऐसे करीब दस कर्मचारियों से साल भर काम कराया और बाद में कर्मचारियों की चयन प्रक्रिया में शामिल सैडमैप को ये कहते हुए वापस लौटा दिया कि उन्हें काम करना नहीं आता है। कर्मचारियों ने अपना हक पाने के लिए शासन के दरवाजे खटखटाए हैं।


    मामला सैडमैप संस्था का है। इस अर्धशासकीय संस्था को सरकार ने नई पीढ़ी के उद्यमियों को प्रशिक्षित करने के लिए तैनात कर रखा है।संस्था विभिन्न रुचियों वाले उद्यमियों को प्रशिक्षण देकर तैयार करती है और कार्पोरेट व सरकारी संस्थानों को उपलब्ध कराती है। निजी क्षेत्रकी भी कई बड़ी कंपनियां कुशल कर्मचारियों के लिए सैडमैप को डिमांड भेजती हैं और उन्हें अपनी उद्यमिता बढ़ाने में मदद मिलती है। विभिन्न जिलों में पदस्थ संस्था के क्षेत्रीय अधिकारी युवाओं को उनकी रुचि के अनुरूप प्रशिक्षण उपलब्ध कराते हैं और शासन की निर्धारित दर पर सैडमेप को भी अपना खर्ची निकालने की जवाबदारी दी गई है। शासन सीधे तौर पर संस्था को अनुदान नहीं देता है।


    ताजा मामला गुना कलेक्टर सत्येन्द्र सिंह के उस इंकार से गरमाया है जिसमें उन्होंने चयन प्रक्रिया से चयनित कर्मचारियों का वेतन जारी करने से इंकार कर दिया। उनकी ओर से सैडमैप को पत्र जारी किया गया जिसमें कहा गया है कि वे कर्मचारी सक्षम नहीं हैं और उन्हें काम नहीं आता है। गुना कलेक्ट्रेट को ये अहसास तब हुआ जब उन कर्मचारियों ने कई महीनों का लंबित वेतन मांगते हुए कलेक्टर कार्यालय से संपर्क किया। कलेक्टर महोदय ने कर्मचारियों का वेतन तो जारी नहीं किया बल्कि उनके चयन का ठीकरा सैडमैप पर ही फोड़ दिया।


    गौरतलब है कि सैडमैप में इन पैनल्ड रूप से जुड़ी हुई एजाईल सिक्यूरिटी फोर्स प्राईवेट लिमिटेड फर्म की ओर से आयोजित चयन प्रक्रिया में जिला शिक्षा केन्द्र के परियोजना समन्वयक का भी एक प्रतिनिधि शामिल था। उनसे अपनी कसौटी पर जांचकर युवाओं का चयन किया था। लगभग साल भर तक परियोजना में काम करते रहने के बावजूद जब कर्मचारियों का वेतन नहीं दिया गया तब उन्होंने शोरगुल मचाना प्रारंभ कर दिया। उनकी जरूरतों को देखते हुए लगभग दो माह का वेतन सैडमैप ने अपने फंड से उपलब्ध कराया ताकि बजट जारी होने और वेतन मिलने तक कर्मचारियों का जीवनयापन हो सके।


    कलेक्टर गुना की ओर से जब कर्मचारियों को वेतन देने से इंकार कर दिया गया तब उन्होंने अपनी पीड़ा से शासन को अवगत कराया है। शोरगुल बढ़ता देख गुना कलेक्टर की ओर से जारी पत्र सार्वजनिक कर दिया गया जिसमें कर्मचारियों के चयन के लिए ठीकरा सैडमैप पर फोड़ा गया है।


    मामले में पेंच तो ये है कि यदि गुना जिला शिक्षा केन्द्र के समन्वयक के पास वेतन देने की हैसियत नहीं थी तो उन्होंने सैडमैप से कर्मचारी मांगे ही क्यों। कर्मचारियों का चयन भी उनके प्रतिनिधि ने स्वयं किया तब क्या कलेक्टर महोदय से अनुमति नहीं ली गई थी। गुना जिला प्रशासन यदि कर्मचारियों का वेतन देने में सक्षम नहीं था तो कलेक्टर महोदय ने उन्हें अन्य उद्यमों में रोजगार मुहैया कराने की जवाबदारी क्यों नहीं निभाई। लगभग साल भर कर्मचारियों से काम लिया गया और बाद में उनकी योग्यता पर सवालिया निशान लगाकर युवाओं के जीवन से खिलवाड़ क्यों किया गया।


    जनता के खजाने से लगभग अस्सी हजार करोड़ रुपयों का स्थापना व्यय वसूलने वाली नौकरशाही आखिर क्यों युवाओं को अपना दुश्मन मान रही है। इतना बड़ा बजट लेकर भी ये नौकरशाही उत्पादकता बढ़ाने के पैमाने पर लगातार फिसड्डी साबित होती जा रही है। तमाम कार्पोरेट संस्थान अपने कर्मचारियों की कुशलता बढ़ाने के लिए उन्हें नए नए प्रशिक्षण देते हैं ऐसे में सैडमैप से प्रशिक्षण पाकर सेवाएं उपलब्ध कराने वाले युवाओं के साथ ये खिलवाड़ क्यों किया जा रहा है इस पर शासन को विचार अवश्य करना होगा।

  • मुख्यमंत्री मोहन यादव की दहाड़ पर सदन में छाया सन्नाटा

    मुख्यमंत्री मोहन यादव की दहाड़ पर सदन में छाया सन्नाटा


    भोपाल,01 जुलाई(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्यप्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र में आज मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव ने पहली बार जिस सख्त लहजे में जवाब दिया उससे पूरे सदन में अचानक सन्नाटा फैल गया। कमोबेश दो दशक बाद पहली बार सदन के नेता की दहाड़ ने नेतृत्व की मौजूदगी का अहसास कराया है।


    मामला कथित नर्सिंग भर्ती घोटाले का था जिसमें विपक्ष ये कहते हुए आक्रामक था कि सरकार इस मुद्दे पर चर्चा नहीं कराना चाहती क्योंकि इससे उसकी नाकामियां उजागर होने वाली हैं। विपक्ष में बैठे कांग्रेस के कई सदस्य सफेद एप्रिन पहिनकर सदन में आए थे। चिकित्सा शिक्षा विभाग पर दिए गए स्थगन प्रस्ताव पर चर्चा कराए जाने के लिए उन्होंने सदन में दबाव बनाना शुरु किया था। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर से कहा कि हमारे तीस चालीस सदस्यों ने स्थगन प्रस्ताव देकर इस लोक महत्व के विषय पर चर्चा कराने की मांग की है। ये मामला युवाओं से जुड़ा है और परीक्षाओं व संचार घोटालों की वजह से वे परेशान हैं। इस विषय पर सदन में चर्चा की जानी चाहिए।


    इस पर संसदीय कार्य मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि मध्यप्रदेश विधानसभा एवं कार्य संचालन संबंधी पुस्तिका के पेज क्रमांक साठ पर साफ लिखा है कि जो मुद्दे किसी न्यायाधिकरण आयोग आदि के सामने विचाराधीन हैं उन विषयों पर चर्चा नहीं की जाती है। इन मामलों में जांच एजेंसी जांच कर रही है। प्रकरण न्यायालय में भी चल रहा है जजों की कमेटी इस मामले पर विचार कर रही है ऐसे में नियमों और परंपराओं के अनुसार इस विषय पर चर्चा नहीं हो सकती।


    इस पर उमंग सिंघार ने कहा कि हम तो नर्सिंग परीक्षा के संबंध में बात करना चाह रहे हैं। सीबीआई तो कालेजों की जांच कर रही है। ये मामला न्यायालय में नहीं है। कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि स्थगन प्रस्ताव में जो मुद्दा उठाया गया है वो न्यायालय में विचाराधीन है। उमंग सिंघार ने कहा कि हम तो नर्सिंग काऊंसिल पर सरकार के बनाए गए नियमों राजपत्र में प्रकाशन आदि के विषय में बात करना चाह रहे हैं। सरकार इस पर बात क्यों नहीं करना चाहती वह बच क्यों रही है।


    अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर ने कहा कि बजट का सत्र हो या न्यायालय में विचाराधीन प्रकरण उन पर सदन में चर्चा नहीं कराई जाती है क्योंकि चर्चा के दौरान कई तरह के आक्षेप भी लगा दिये जाते हैं जिनका जवाब न्यायालय के कार्य में हस्तक्षेप करना हो जाता है। इन्हीं सब चर्चाओं में पक्ष और विपक्ष के कई सदस्य तैश में आकर तर्क दे रहे थे ,शोरगुल के बीच अध्यक्ष ने सदन की कार्यवाही दोपहर एक बजे तक स्थगित कर दी।


    एक बार फिर जब सदन समवेत हुआ तो उमंग सिंघार ने एक बार फिर इस विषय पर चर्चा कराए जाने की मांग कर दी। इस पर कैलाश विजय वर्गीय ने कहा कि डाक्टर मोहन यादव की सरकार चर्चा से भाग नहीं रही है। ये कोई तात्कालिक घटना नहीं है तीन चार या पांच सत्र बीत चुके हैं पुराना मामला है इसलिए इस पर बजट चर्चा के दौरान आसानी से बात हो जाएगी।
    इस पर कांग्रेस के भंवर सिंह शेखावत ने गुस्से में भरकर कहा कि मामला कांग्रेस और भाजपा का नहीं है,प्रदेश के बच्चों के भविष्य का है। विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर ने उन्हें ये कहकर समझाने का प्रयास किया कि सरकार ने कह दिया है कि वह चर्चा कराने को तैयार है। इस पर श्री शेखावत गुस्से से बोले कि फिर चर्चा कराईए न। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बात को संभालते हुए कहा कि हम किसी विषय पर पीछे नहीं हट रहे हैं। जन हितैषी विषय पर चर्चा कराने को तैयार है। विधानसभा का कामकाज रोककर स्थगन लाने और ध्यानाकर्षण में अंतर होता है इसे अगली बार ले आईए फिर चर्चा करा लेंगे।


    इस पर भंवर सिंह शेखावत ने तंज कसते हुए कहा कि आप चर्चा से नहीं घबराते आप बहादुर हैं आपको इसका प्रमाण पत्र दिया जाएगा। जवाब में कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि हमें आपके प्रमाण पत्र की जरूरत नहीं है। उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने कहा कि ये सर्टिफिकेट आप अपने पास रख लें हम पारदर्शी तरीके से सरकार चलाते हैं । सभी मुद्दों पर कार्रवाई हो रही है और हम चर्चा के लिए तैयार हैं। इस पर भी श्री शेखावत शांत नहीं हुए उन्होंने कहा कि आप चर्चा क्यों नहीं कराना चाहते जिन्होंने भ्रष्टाचार किया है उन्हें आप बचाना चाह रहे हैं।


    इस मुद्दे पर लगभग शांत बैठे मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव ने कहा कि हमने शुरु से स्वर रखा है कि हम हर विषय पर चर्चा कराने को तैयार हैं। किसी मसले पर हमारी सरकार डरने वाली नहीं है और न ही हम पीछे हटने वाले हैं। आपके स्वर किसी भी स्तर तक जा सकते हैं लेकिन हम संयम के साथ स्पष्टता से अपनी बात रखना चाहते हैं। यदि कोई उत्तेजना से बात करेगा तो ये सुनने की आदत हमारी भी नहीं है।माननीय सदस्य गण सुन लें अपनी बात को संयमित तरीके से रखें। तीखे स्वरों में कही गई उनकी बात पर पूरे सदन में खामोशी छा गई। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने बात को संभालते हुए कहा कि हम विवाद के बजाए चर्चा कराना चाहते हैं। इस पर विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर ने सदन को आश्वस्त करते हुए कहा कि ये चर्चा ग्राह्यता पर नहीं हो रही है। दोनों पक्षों ने इस विषय पर फैसला लेने का अवसर मुझे दिया है इसलिए कल मैं किसी उचित नियम के तहत इस पर चर्चा कराऊंगा।

  • जनता ने तो चुन लिया मोदी मार्ग

    जनता ने तो चुन लिया मोदी मार्ग


    मोदी सरकार को जनता तीसरी बार सत्ता में भेजने जा रही है। अब तक पांच चरणों के चुनाव में साफ हो गया है कि भाजपा और एनडीए गठबंधन भारी जनसमर्थन से सरकार में पहुंच रहा है। ये जनादेश देश के विकास का जनादेश होगा। पहली बार न तो कोई सहानुभूित की लहर है और न ही जाति धर्म के दलालों की जोड़ तोड़। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सीधे जनता से संवाद कर रहे हैं और कारगर संवाद के माध्यम से अपनी सरकार के कार्यकलापों का उल्लेख करके कार्यकाल का जनादेश जुटा रहे हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी.नड्डा और अमित शाह के मार्गदर्शन में चल रहे इस महाभियान में दुनिया की सबसे विशाल लोकतांत्रिक पार्टी एक स्वर में चुनाव लड़ रही है। अंग्रेजों ने जब भारत के टुकड़े करके यहां धर्म आधारित फूट के बीज बोए थे तब उन्हें भी एहसास नहीं था कि कभी उनके तमाम प्रयासों को भारत का सनातन धता बता देगा। सनातन ने हमेशा से सभी धर्मों का सम्मान करना सिखाया है। वसुधैव कुटुंबकम का विचार पूरी दुनिया को परिवार मानने का संदेश देता है इसके बावजूद अंग्रेजों के प्रश्रय से पनपी कांग्रेस ने सतर सालों तक जाति ,धर्म,भाषा का ऐसा वैमनस्य बोया कि जनता सिर फुटौव्वल में ही लगी रही। सबको एक करने का विचार लिए जनसंघ हो या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इनके करोड़ों कार्यकर्ताओं की पीढ़ियां खप गईं। गरीबी दूर करने का स्वप्न दिखाकर नेहरू गांधी परिवार ने लगातार सत्तर सालों तक बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लूट का साझीदार बनाए रखा। बाबा रामदेव के पातंजलि आर्युवेद जैसे सैकड़ों प्रकल्पों ने देश को पहली बार बताया कि अहिंसात्मक चिकित्सा ही समाज को बेहतर जीवन दे सकती है। इसके पहले तो एलोपैथी के माध्यम से समाज को स्वास्थ्य प्रदान करने का ऐसा अभियान चलाया गया था कि लोगों को लगता था यदि उन्हें दवा नहीं मिली तो उनका जीवन नष्ट हो जाएगा। स्वयंसेवकों ने इतने विशाल देश को जीवन संयम की डोर में बांधकर जैसा पुनर्जागरण चलाया उन्हें समझाया कि सर्जरी जैसी उपचार विधि आपातकाल में जरूरी होती है स्वस्थ्य रहने के लिए तो जीवनशैली में बदलाव लाना होंगे। आज भी देश की बड़ी आबादी जीवनशैली जनित बीमारियों से ग्रस्त है। उन्हें नहीं मालूम कि बहुत छोेटे उपाय उनका जीवन खुशहाल बना सकते हैं। नरेन्द्र मोदी अपने चुनाव प्रचार अभियान को लोकतंत्र का उत्सव बताते हैं। इसके विपरीत शैतान पर कंकर फेंकने की सोच से भरे कांग्रेस के राहुल गांधी बदतमीजी की भाषा में प्रधानमंत्री को गाली देते फिरते हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी मुस्लिमों को उकसाकर दंगे करवाकर सत्ता में बने रहने का प्रयास कर रहीं हैं। अखिलेश यादव ,की समाजवादी पार्टी हो या केरल के वामपंथी सभी लड़ने मारने पर उतारू हैं।इसके विपरीत भाजपा के प्रचारक अपनी वोटर सूची का पन्ना संभाले लोगों से मतदान की अपील कर रहे हैं। चुनाव अभियान का असर ये है कि कांग्रेस का निराश मतदाता तो पोलिंग बूथ तक भी नहीं पहुंच रहा है। उसे लगता है कि इंडी गठबंधन की विचारधारा समय के साथ पिछड़ गई है। धारा 370 हो या राममंदिर निर्माण जैसे तमाम मुद्दों पर इस गठबंधन की पहले ही करारी हार हो चुकी है।आज वह खलनायक बनकर समाज के बीच खड़ा है ऐसे में आम जनता उससे दूरी बनाकर रखने में ही अपनी भलाई समझ रही है। जाहिर है इसका सीधा लाभ एनडीए गठबंधन को ही मिलना है। भाजपा की राज्य इकाईयां भले ही अब तक विकास की मुख्यधारा को आत्मसात नहीं कर पाईं हों लेकिन जिस तरह चुनाव प्रचार अभियान में हर बिंदु पर प्रवक्ता की तरह प्रकाश डाला गया उससे संगठन को बड़ा सहारा मिला है। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की पूर्ववर्ती सरकार आत्मनिर्भरता के मुद्दे पर बहुत कुछ नहीं कर पाई थी। ऐसे में जनता के बीच असंतोष भी बढ़ गया था लेकिन चुनाव अभियान ने जनता से जिस तरह संवाद किया उससे वो नाराजगी दूर हो गई। डॉ.मोहन यादव की सरकार अभी तक अपना काम शुरु नहीं कर पाई है वह भी चुनाव अभियान की जिम्मेदारी उठाए हुए है। भाजपा का केन्द्रीय प्रचार अभियान इतना सफल जन शिक्षण कर रहा है कि उससे आम नागरिक तक को अपना लक्ष्य साफ नजर आने लगा है। मध्यप्रदेश की डॉ.मोहन यादव सरकार से देश को भारी अपेक्षाएं हैं। देखना है कि विकास की जो समझ देश के बीच विकसित हुई है उसकी कसौटी पर वर्तमान सरकार किस हद तक सफल होती है. फिलहाल मतदान के दो चरण बाकी हैं और बहुत सारी प्रमुख सीटों पर मतदान होना है । प्रचार की लय इतनी सुरीली है कि देश टकटकी लगाए उसे सुन रहा है। वोट कर रहा है। जाहिर है कि सकारात्मक अभियान अपने बड़े लक्ष्य को भी आसानी से वेध लेगा। एनडीए लगभग चार सौ सीटों पर पहले ही काबिज है अब वह चार सौ पार की ओर बढ़ रहा है।

  • सरकार ने तय किया तो विकास पथ पर बढ़ चला सैडमैप

    सरकार ने तय किया तो विकास पथ पर बढ़ चला सैडमैप


    कांग्रेस में भगदड़ मची है और सभी समझदार देशभक्त पुरानी लीक छोड़कर भाजपा में शामिल हो रहे हैं। इसकी वजह विकास की वो इबारत है जो मोदी सरकार ने बुलंद आवाज के रूप में उद्घोषित की है। मुक्त बाजार व्यवस्था का आगाज तो भारत में पूर्व प्रधानमंत्री पी व्ही नरसिंम्हाराव की सरकार ने किया था लेकिन उस पर अमल करने का भगीरथ नरेन्द्र मोदी की भाजपा ही कर पाई है। राहुल कांग्रेस आज भी मानने तैयार नहीं है कि उनके पूर्वज कितनी बड़ी गलती कर रहे थे। वे बार बार कांग्रेस की उसी विचारधारा के सहारे फूट के बीज बोकर गरीबी को संरक्षित करने का प्रयास कर रहे हैं जो उनकी दादी श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता मजबूत करने के लिए लागू की थी। जातिगत जनगणना हो या सरकारीकरण सभी का फटा ढोल पीटती राहुल कांग्रेस आज भी देश में भ्रमजाल फैलाने में जुटी है। अडानी अंबानी को गालियां देकर राहुल गांधी और उनकी चिलम भरने वाले कांग्रेसी बार बार विकास के पैरों में बेडियां पहनाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन जनता अब इस भ्रमजाल से बाहर निकल चुकी है। मध्यप्रदेश की भाजपा पर जबसे शिवराज सिंह चौहान की कांग्रेस की पूंछ पकड़कर चलने वाली सरकार का साया हटा है तबसे राज्य की भाजपा देश के मूलभूत विचार पथ पर मजबूती से कदम बढ़ाती नजर आ रही है। सरकार के निगम,मंडलों और संस्थाओं में सरकार की बदली कार्यप्रणाली की छाप स्पष्ट तौर पर दृष्टिगोचर होने लगी है। डॉक्टर मोहन यादव सरकार ने उन फिजूल योजनाओं को बंद कर दिया है जिनके माध्यम से सत्ता माफिया अपना उल्लू सीधा करता था। गरीब कल्याण की बात कहकर माफिया के गुर्गे ठेके, सप्लाई ,निर्माण आदि में खजाने की चोरी करते थे। हालांकि आज भी इन मुफ्तखोरों पर पूरी तरह अंकुश नहीं लग पाया है इसके बावजूद सरकार के प्रतिष्ठान इन नई राह पर धीरे धीरे बढ़ चले हैं। सरकार को प्रशिक्षित कार्यबल उपलब्ध कराने के लिए बनाया गया सैडमैप अपने काम को कुशलता पूर्वक अंजाम दे रहा है। सरकार के संरक्षण में यहां ऐसा प्रबंधन अपना कार्य कर रहा है जिससे संस्थान की आय में कई गुना इजाफा हो गया है। सिक्योरिटी एजेंसी, प्रशिक्षण संस्थाओं और नियोक्ताओं की आड़ में मलाई काटने वाले माफिया को खदेड़कर बाहर कर दिए जाने से मुफ्तखोरों का एक बड़ा वर्ग आहत हो गया है। भारत सरकार हो या राज्य सरकार दोनों आगे बढ़ते इस संस्थान को लगातार अपना संरक्षण और संबल प्रदान कर रहे हैं। वे जानते हैं कि विरोध या गड़बड़ियों के आरोप लगाने वाले कौन हैंऔर क्यों तिलमिला रहे हैं। जिन प्रशिक्षण कार्यक्रमों को बंद किया गया है उनके विकल्प के रूप में जो ढांचा खड़ा किया जा रहा है वह युवाओं के लिए ज्यादा उपयोगी और कारगर है। सरकार पर बोझ घटाने में भी ये सुधारात्मक उपाय सहयोगी साबित हो रहे हैं। दरअसल आजादी के बाद से संरक्षण वाद और बेचारगी को सहारा देने का जो भाव सरकारों के बीच पनप गया था उससे इतर कोई भी उपाय लोगों को आक्रामक नजर आता है। लोगों को लगता है कि यदि सरकार ने कृपा नहीं की तो देश भूखों मर जाएगा। जबकि जनता के विकास कार्यों को संरक्षण देने का सबसे उचित तरीका यह है कि उन पर से मुफ्तखोरों का बोझ हटा दिया जाए। यदि माफिया के संरक्षण में पनप रहे ये मुफ्तखोर खदेड़ दिए जाएंगे तो जाहिर है कि सरकार की कार्यक्षमता में जो इजाफा होगा उसका लाभ सीधे आम जन को मिलने लगेगा। सैडमैप अपने आर्थिक संसाधनों को लगातार विकसित कर रहा है और अपनी उपयोगिता स्थापित करता जा रहा है। कमोबेश ऐसे ही सुधार तमाम निगम मंडलों के लिए अपरिहार्य है। सरकार को कारगर और उपयोगी समूहों का नेतृत्व कर्ता बनाना है तो जाहिर है कि गरीबी और बेचारगी के नाम पर फल फूल रहे माफिया की विदाई करना सबसे उचित फैसला होगा। इसका विरोध करने वालों को भी अपनी सोच पर एक बार ठहरकर आत्ममंथन करना चाहिए ताकि वे अपनी गलतियों को सुधार सकें।

  • सोशल मीडिया से विधि का ज्ञान बढ़ाएं,प्रतिक्रिया देने से बचें – सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधिपति श्री अभय एस. ओक

    सोशल मीडिया से विधि का ज्ञान बढ़ाएं,प्रतिक्रिया देने से बचें – सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधिपति श्री अभय एस. ओक

    भोपाल,14 जनवरी(मुकेश मोदी)। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधिपति श्री अभय एस. ओक ने सोशल मीडिया का उपयोग विधि का ज्ञान बढ़ाने, साथियों और परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य संबंधी जानकारियाँ लेने, अच्छे कार्यों को करने में प्रयोग करने की सलाह दी है। उन्होने न्यायाधीश को सोशल मीडिया पर दी जाने वाली प्रतिक्रियाओं पर ध्यान न देने और विभिन्न घटनाओं पर सोशल मीडिया के कमेंट पर प्रतिक्रिया न देने की सलाह दी है। वे आज भोपाल के रवीन्द्र भवन में मध्यप्रदेश न्यायाधीश संघ के दसवें द्विवर्षीय सम्मेलन के दूसरे एवं अंतिम दिन “आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और सोशल मीडिया का न्यायपालिका पर प्रभाव’’ पर अपना संबोधन दे रहे थे।

    न्यायाधिपति श्री अभय एस. ओक की अध्यक्षता और माननीय उच्च न्यायालय मध्यप्रदेश के मुख्य न्यायाधीश श्री रवि मलिमठ की उपस्थिति में अकादमिक सत्र में उन्होने आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और सोशल मीडिया के न्यायपालिका पर प्रभाव के संबंध में विस्तृत चर्चा की। उन्होने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का उपयोग दैनिक न्यायालयीन कार्यों में एक सहायक की तरह करें। यह मानव मस्तिष्क, मानवीय संवेदनाओं को प्रतिस्थापित नहीं कर सकता। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का प्रयोग करते समय सावधानीपूर्वक कार्य करें।

    उच्च न्यायालय मध्यप्रदेश के न्यायमूर्ति श्री रोहित आर्य और श्री विवेक रूसिया ने भी अपने अनुभवों को साझा करते हुए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का उपयोग सावधानीपूर्वक और सहायक कार्यों में करने की सलाह दी।

    माननीय सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधिपति माननीय श्री सूर्यकांत ने वीडियो मैसेज के माध्यम से मध्यप्रदेश न्यायाधीश संघ को शुभकामनाएँ देते हुए मध्यप्रदेश के न्यायाधीशों को उत्साहपूर्वक कार्य करने के लिये प्रोत्साहित किया।

    मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति माननीय श्री रवि मलिमठ ने कहा कि न्यायाधीशों को मेहनत और लगन और ईमानदारी से मानवीय संवेदनाओं के साथ कार्य करते हुए पक्षकारों की पीड़ा को विचार में लेने की अपेक्षा की। उन्होने कहा कि लंबित प्रत्येक मामला न्यायाधीशों के लिये एक ऋण की तरह है, जिसे न्यायाधीशों को त्वरित निराकृत कर विमुक्त होना चाहिये। मध्यप्रदेश न्यायाधीश संघ की वेबसाइट का अनावरण किया गया ।

    श्री सुबोध जैन, अध्यक्ष मध्यप्रदेश न्यायाधीश संघ द्वारा माननीय मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति के प्रति आभार प्रकट करते हुए एक अनूठे कार्यक्रम के आयोजन के लिये न्यायाधीशों को बधाई दी और भविष्य में इसी प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करने के लिये न्यायाधीशों को प्रोत्साहित किया।

    अधिवेशन में माननीय उच्च न्यायालय मध्यप्रदेश के तीनों खण्डपीठ के सभी न्यायामूर्ति उपस्थित थे। जिला न्यायालय के लगभग 1500 न्यायाधीश उपस्थित थे। न्यायाधीश संघ के सचिव श्री धर्मेन्द्र टाडा ने आभार व्यक्त किया ।

  • मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट से क्यों हटाए गए संजय बंदोपाध्याय

    मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट से क्यों हटाए गए संजय बंदोपाध्याय


    भोपाल,13 जनवरी (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। भारतीय प्रशासनिक सेवा में मध्यप्रदेश कैडर से 1988 बैच के अधिकारी संजय बंदोपाध्याय केन्द्र सरकार से दिए गए एक हजार करोड़ के काम शुरू भी नहीं कर पाए और उन्हें अचानक मध्यप्रदेश वापस भेज दिया गया।इससे सत्ता के गलियारों में तरह तरह की अटकलें लगाई जाने लगीं हैं। केन्द्रीय कार्मिक मंत्रालय से अचानक आदेश जारी होने के बाद ही मध्यप्रदेश के लोगों को पता चल सका कि मुख्य सचिव स्तर का कोई अधिकारी प्रदेश भेजा जा रहा है। कहा जाने लगा कि उनका रिटायरमेंट अगस्त महीने में है जबकि उन्हीं के बैच की अधिकारी वीरा राणा वर्तमान में मुख्य सचिव हैं जिनका रिटायरमेंट मार्च में होना है इसलिए चुनावों को संपन्न कराने के लिए बंदोपाध्याय को मुख्य सचिव बनाया जा सकता है।हालांकि इसके बाद जिस तरह की खबरें सत्ता के गलियारों में फैलीं हैं उनसे लगता है कि डाक्टर मोहन यादव सरकार फिलहाल उन्हें कोई दूसरा काम देने जा रही है।


    बताया जाता है कि केन्द्र में सचिव के समकक्ष होने के बावजूद भारत सरकार ने उन्हें सचिव नहीं बनाया है । वे भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण में दिसंबर 2021 से अध्यक्ष थे । यह निगम दरअसल पत्तन पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्रालय के ही अधीन आता है। जहाजरानी तथा जलमार्ग मंत्रालय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का सबसे प्रिय विभाग रहा है । मोदी सरकार ने जहाजरानी यानी शिपिंग मंत्रालय (Shipping Ministry) का नाम बदलकर मिनिस्ट्री ऑफ पोर्ट्स, शिपिंग और वाटरवेज (Ministry of Ports, Shipping and Waterways) कर दिया था। तभी से यह मंत्रालय बंदरगाह, जहाजरानी एवं जलमार्ग मंत्रालय के नाम से जाना जाने लगा।

    मोदी सरकार ने जैसी कार्यप्रणाली अपनाई है उससे ये विभाग देश का कमाऊ सपूत बन गय़ा है। विदेशी कारोबार बढ़ाने के लिए मंत्रालय ने दुनिया के व्यस्ततम बंदरगाहों पर अपना दखल बढ़ाया है। पिछले दिनों जलमार्गों पर बढ़ते लुटेरों के हमलों के बाद खुफिया सूत्रों को जानकारी मिली थी कि मंत्रालय के ही कुछ अधिकारी जानकारियां लीक करते थे। भारत के पोत परिवहन में अडंगा लगाने में कई विपक्षी राजनेताओं की गतिविधियां भी उजागर हो गईँ हैं। इन राजनेताओं ने कई जहाजरानी कंपनियों में अपना पैसा लगाया हुआ है और नियम कानूनों का पालन होने से उन्हें खासा टैक्स देना पड़ रहा है। इन जहाज कंपनियों के एजेंट लुटेरों के मुखबिरों के रूप में मंत्रालय में सक्रिय पाए गए थे।


    मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि जब श्री बंदोपाध्याय राज्य में ऊर्जा सचिव थे तब बिरसिंहपुर में 500 मेगावाट का बिजलीघर तैयार किया गया था। अपने वरिष्ठ अफसर राकेश साहनी के निर्देश पर उन्होंने बिजलीघर निर्माण में प्राप्त एक बडी धनराशि का निवेश दुबई के शेयर बाजार में करवाया था। बताते हैं कि ये राशि शेयर बाजार में डूब गई । तभी से उन्होंने किसी संभावित जांच से बचने के लिए भारत सरकार में पोस्टिंग करवा ली।


    पत्तन पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्रालय की कमान सौंपने के लिए जब किसी अधिकारी की खोज की जा रही थी तब बताते हैं कि संजय बंदोपाध्याय की कुंडली खुल गई और भारत सरकार ने उन्हें प्रमोशन देने के बजाए वापस भेज दिया। हालांकि उनके करीबी सूत्र बताते हैं कि श्री बंदोपाध्याय की पत्नी इंडियन इंजीनियरिंग सेवा की अधिकारी हैं और वर्तमान में जबलपुर में जनरल मैनेजर के पद पर पदस्थ हैं। श्री बंदोपाध्याय का रिटायरमेंट नजदीक है इसलिए उन्होंने घर वापिसी का फैसला लिया है।

  • स्काऊट आंदोलन को राघवजी जैसे तपस्वियों ने सफल बनायाः पारस जैन

    स्काऊट आंदोलन को राघवजी जैसे तपस्वियों ने सफल बनायाः पारस जैन


    भोपाल,09 जनवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर) भारत स्काउट एवं गाइड मध्य प्रदेश के पूर्व राज्य मुख्य आयुक्त, पूर्व राज्य सचिव व वर्तमान राज्य आयुक्त कब श्री दलबीर सिंह राघव आज हमारे बीच नहीं है मध्य प्रदेश ही नहीं अपितु राष्ट्रीय स्तर पर स्काउट आंदोलन के लिए है यह अपूर्णीय क्षति है, श्री राघव जी व्यक्ति नहीं व्यक्तित्व थे जिन्होंने स्काउटिंग आंदोलन को गति प्रदान करने के लिए अपनी निजी संपत्ति तक गिरबी रखकर इस पवित्र आंदोलन को आगे बढ़ाने का कार्य किया था। उन्होंने मध्य प्रदेश में जो स्काउटिंग का बीज बोया था वह आज बंट वृक्ष के रूप में हमारे सामने है हमारे द्वारा उनकी इस धरोहर को सहेज कर उनके आदर्शों पर चलना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी यह बात भारत स्काउट एवं गाइड मध्य प्रदेश के राज्य मुख्य आयुक्त श्री पारस चंद्र जैन ने आज स्वर्गीय श्री डी.एस. राघव जी की श्रद्धांजलि सभा के दौरान राज्य मुख्यालय के सभा कक्ष में स्काउट परिवार के समक्ष कहीं।
    श्री जैन ने स्वर्गीय श्री राघव जी के कर्मठ, निर्भीक व जनहितैषी जीवनकाल को याद करते हुए उन्हें मध्य प्रदेश में स्काउटिंग के पितृ पुरुष की संज्ञा से संबोधित किया । इस श्रद्धांजलि सभा में राज्य कोषाध्यक्ष श्री रमेश चंद्र शर्मा ने स्वर्गीय श्री डी.एस. राघव जी को याद करते हुए कहा कि उनमे विषम परिस्थितियों में कड़े निर्णय लेने की जो क्षमता थी वह विरले व्यक्तियों में होती है स्काउटिंग के प्रति उनका समर्पण किसी से छुपा नहीं है। राज्य सचिव श्री राजेश प्रसाद मिश्रा सेवा निवृत्त आईएएस ने स्वर्गीय श्री राघव जी को याद करते हुए कहा कि जब भी कही स्काउटिंग की बात होती है तो श्री राघव जी का नाम सबसे पहले आता है, उन्होंने अपने आप को स्काउटिंग व समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया था ऐसे व्यक्तित्व युगों पश्चात धरा पर जन्म लेते हैं।
    राज्य आयुक्त रोवर श्री राजीव जैन ने कहा कि स्वर्गीय श्री राघव जी ने अपनी धर्मपत्नी की स्मृति में एक विशाल हॉल का निर्माण गांधीनगर में करवाया है साथ ही कारगिल युद्ध के दौरान शहीद हुए अमर जवानों की स्मृति में अमर जवान कारगिल शहीद स्मारक बनवाया , प्रकृति व पर्यावरण संरक्षण के लिए स्वर्गीय श्री डी.एस. राघव जी ने जो कार्य किए हैं वह अतुलनीय है , गांधीनगर प्रशिक्षण केंद्र में जितने भी पौधे आज वृक्ष के रूप में है वह सभी उन्हीं की बदौलत है श्री राघव जी की दूरदृष्टिता इस बात से समझी जा सकती है कि गांधीनगर में पानी न होने के कारण पौधे पनप नही पा रहे थे तभी उन्होंने वहां लगभग एक एकड़ क्षेत्र में तालाब निर्माण करा कर उस जल संकट को दूर किया हम ऐसी महान विभूति के श्री चरणों में नमन करते हैं ।
    कर्मचारियों की ओर से श्री श्री राम सैनी ने श्री राघव जी के जीवन चरित्र पर विस्तृत रूप से प्रकाश डालते हुए मध्य प्रदेश में स्काउटिंग के प्रारंभिक काल में आई परेशानियां के समय स्वर्गीय श्री राघव जी की कार्यशैली व दूरदर्शिता से सबको अवगत कराते हुए वर्तमान में प्रदेश की स्काउटिंग के सफर को बयां किया । श्रद्धांजलि सभा का संचालन राज्य प्रशिक्षण आयुक्त स्काउट श्री बी.एल. शर्मा ने किया इस दौरान श्री संतोष यादव ,श्री सुरेश गोस्वामी, श्री एस साहू, श्री भारत सिंह यादव ,श्री रामेश्वर दयाल सेन ,श्री जयदीप सिंह, श्री मनोज कवर्शे ,श्री पदम सिंह चौहान, श्री देवेंद्र मालवीय, श्री विनोद मिश्रा,श्रीमती आशा चारव्या, श्रीमती कल्पना कुलश्रेष्ठ ,श्रीमती सुनीता पांडे ,श्रीमती निशा परतेती , श्रीमती संध्या श्रीवास्तव,श्री सुभाष श्रीवास, श्री विष्णु श्रीवास ,श्री राजेंद्र दुबे,श्री दीपक साऊलरकर, श्री कपिल रायकवार,श्री संजय कुमार ,श्री राजेंद्र धौलपुरिया, श्री जमाल कटारे,श्रीमती लाली सहित समस्त कार्यालय स्टाफ उपस्थित रहा । श्रद्धांजलि सभा में सभी ने स्वर्गीय श्री डी.एस. राघव जी सहित राज्य उपाध्यक्ष श्री प्रकाश चित्तौड़ा जी की माताजी के देहावसान ,श्री सुरेश गोस्वामी जी के पिताजी के देहावसान ,श्री रवि यादव जी की माता जी के देहावसान तथा श्रीमती कविता वर्मा की दादी जी के देहावसान पर गहन दुख प्रकट करते हुए 2 मिनट का मौन धारण कर दिवंगत आत्माओ की शांति हेतु ईश्वर से प्रार्थना की ।।

  • अब बिट्वीन द लाईंस भी देखना पड़ेगा मुख्यमंत्री जी

    अब बिट्वीन द लाईंस भी देखना पड़ेगा मुख्यमंत्री जी


    अवैध हड़ताल से देश को ठप करने वालों की औकात क्या इतनी हो सकती है कि वे जनता की सरकार को भी चुनौती देने लगें। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सारे तथ्यों पर विचार करके कहा कि हड़ताल अवैध है, सरकार जनसुविधाएं बहाल करे । ऐसे में प्रशासन को आगे बढ़कर गतिरोध हटाना ही था। हाईकोर्ट के निर्देश के बाद शाजापुर कलेक्टर जब पूरे देश को चुनौती देने वाले किसी अपराधी को ललकार लगाए तो उसमें भाषा के लालित्य पर सवाल नहीं उठाया जा सकता । देश के हमलावर को आत्मरक्षा में तैनात सैनिक बंदूक की गोली से मारे या लाठी से या फिर मुक्के लात से,ये थोड़ी देखा जाता । उसका तो उद्देश्य शत्रु पर विजय पाना है। कुछ लाल बुझक्कड़ बुद्धिजीवी ऐसे टसुए बहाने निकल पड़े कि सरकार ने अपने ही कलेक्टर को हटाकर मंत्रालय में बिठा दिया। इस पहले मूव ने सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। डॉक्टर मोहन यादव को जिन्होंने करीब से देखा है वे जानते हैं कि मुख्यमंत्री लीक पकड़कर चलने वालों में से नहीं हैं। इसके बावजूद सत्ता के इर्द गिर्द झुंड जमा लेने वाले दरबारियों के सामने तो राजा विक्रमादित्य की भी मति मारी जाए। लगभग दो दशकों में शिवराज सिंह चौहान ने अपने इर्द गिर्द चमचों और चिलमकारों की ऐसे फौज जमा कर रखी थी कि सरकार किसी और पटरी पर चली गई थी। इन कुकर्मों को छुपाने के लिए इन चमचों ने एक स्वर में इसे संघ का फरमान बताना शुरु कर दिया था। जन आक्रोश की इसी अभिव्यक्ति के रूप में कमलनाथ गिरोह को सत्ता में घुसपैठ का अवसर मिल गया था। ज्योतिरादित्य सिंधिया की एंट्री न हुई होती तो हालिया चुनाव भाजपा को विपक्ष में बैठकर लड़ना पड़ता। सिंधिया के आने के बावजूद सरकार का कामकाज इतना लचर और जड़ था कि उसे किसी नजरिए से सुशासन नहीं कहा जा सकता। ये तो गनीमत है कि जनता की और पार्टी कार्यकर्ताओं की टीस को भाजपा हाईकमान ने सुन लिया और शिवराज को पैवेलियन में भेजकर सत्ता परिवर्तन की जन आकांक्षा पूरी कर दी। समस्या ये है कि सत्ता के सिंहासन पर बदलाव अभी पूरी तरह नहीं हुआ है। शिवराज के बहरे सत्ताभोगियों को साथ लेकर सुशासन करने निकले मोहन यादव अभी तक अपना राज स्थापित नहीं कर सके हैं। किशोर कान्याल को हटाने के फैसले से इतना तो साफ झलकता है कि वे अपनी सोच और पार्टी की विचारधारा को स्थापित करने के लिए बदलाव करना चाहते हैं। ये बदलाव गलत मोड़ पर हुआ है। किशोर कान्याल मध्यप्रदेश के जमीनी प्रशासन को समझने वाले प्रतिभाशाली अफसर हैं। राज्य प्रशासनिक सेवा के कई जिम्मेदार पदों पर रहते हुए उन्होंने जमीनी हकीकत को करीब से देखा है। जनोन्मुखी शासन शैली का तो खुमार उन पर इतना अधिक है कि वे अपना हर कार्य सार्वजनिक तौर पर करते हैं। जब ड्राईवरों की हड़ताल पर चर्चा के लिए कलेक्टर के चेंबर में बातचीत चल रही थी तब भी उन्होंने मीडिया को चर्चा में उपस्थित रहने की अनुमति दे रखी थी। ड्राईवरों की हड़ताल को विपक्ष ने पूरे देश में कुछ इस तरह प्रचारित किया था मानों वे देश के कर्मठ सिपाही हैं और सरकार उन्हें कुचलकर मार देना चाहती है। हिट एंड रन पर बना कानून एक दिन में अस्तित्व में नहीं आया। पूरी सुविचारित प्रक्रिया से इसे तैयार किया गया है। विपक्ष का कहना था कि जब वे सदन में कम संख्या में मौजूद थे तब सरकार ने बगैर चर्चा के इसे पास करा लिया। जबकि हकीकत ये है कि विपक्ष के जो सदस्य सदन में मौजूद थे उन्होंने भी बिल का समर्थन किया था। कानून से ड्राईवरों को खतरा क्यों महसूस हो रहा है। यदि वे सही चल रहे हैं और कोई व्यक्ति अपनी गलती से उनके वाहन के नीचे कुचलकर मर जाता है तो इसे अदालत में साबित करके वे साफ बच सकते हैं। अब नेशनल हाईवे पर जंगल में यदि कोई दुर्घटना होती है जहां कोई जनता मौजूद नहीं है तो ड्राईवर को भागने की जरूरत क्या है। वह जाकर प्रशासन को सूचना दे सकता है कि फलां राहगीर शराब के नशे में या किसी तकनीकी खामी की वजह से उसके वाहन के नीचे आ गया है कृपया उसे उपचार उपलब्ध कराएं। कोई कानून इतना अंधा तो है नहीं कि गलती न होने के बावजूद ड्राईवर को सात साल की जेल और दस लाख रुपए के जुर्माने की सजा दे दे। सभी ट्रकों में अभी तक कैमरे और जीपीएस नहीं लगाए गए हैं। निजी कंपनियां थर्ड पार्टी बीमे का प्रीमियम समय पर भरती नहीं। राहगीरों की सुरक्षा वे सुनिश्चित करती नहीं। इस पर ड्राईवरों को ऐसा भयभीत कर दिया कि वे बेचारे कानून के भय से कांपने लगे। कानूनी प्रावधान यदि गलत हैं तो सही प्रक्रिया अपनाकर उन्हें बदला भी जा सकता है। इसके बावजूद विपक्ष और खासतौर पर कांग्रेस ने हो हल्ला मचाकर देश भर में भय का वातावरण निर्मित कर दिया। लोकहित में लड़ने वाले शूरवीर अधिकारियों को सलाम किया जाना चाहिए कि उन्होंने विपरीत हालात में भी मोर्चा संभाला और नागरिकों को जरूरी सामानों की सप्लाई बाधित नहीं होने दी। कलेक्टर महोदय की क्लीपिंग वायरल करने वाले टीआरपी प्रेमी पत्रकारों मौका हाथ से नहीं जाने दिया। दरअसल जिन पत्रकारों ने ये काम किया उनकी ये समझने की औकात भी नहीं थी कि सामाजिक दायित्वों का निर्वहन कैसे किया जाता है। शायद यही वजह है कि राजनेता और प्रशासन अक्सर मीडिया कर्मियों को विमर्श स्थल से बाहर खदेड़ देते हैं। सीधी भर्ती वाले आईएएस अफसरों की टीस तो समझी जा सकती है पर सत्ता पर आसीन राजा विक्रमादित्य की सोच में पले बढ़े राजनेता की आंख पर भी वे पट्टी बांध दें ये कैसे संभव हो सकता है। भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को तो कम से कम सुशासन का समर्थन करते हुए कलेक्टर को अपना संरक्षण देना था। वे भी एक गलत नारे की रौ में बह निकले। ये अंग्रेजों की विदेशी सरकार तो है नहीं। संवैधानिक कानून का विरोध करने के लिए अब जनांदोलन जरूरी नहीं है। कानून उनकी ही सरकार ने बनाया है वे अपनी ही सरकार से इसमें सुधार करवा सकते हैं। इसके लिए आंदोलन की तो जरूरत ही नहीं है। सरकार ने कानून को लागू करने की अवधि बढ़ाने की बात कहकर मौजूदा गतिरोध तो टाल दिया है लेकिन उसे नहीं भूलना चाहिए कि वह जनता की निर्वाचित सरकार है। दबाव की राजनीति करने वाले चंद बदमाशों के दबाव में वह अपने दायित्व से मुकर नहीं सकती। नए नए मुख्यमंत्री जी को भी यही सलाह है कि वे अब बिट्वीन द लाईन्स भी देखना शुरु करें। सत्ता के शीर्ष पर बैठकर जो दिखाया जाता है वह हमेशा सही नहीं होता।यदि इस तरह के फैसले सामने आएंगे तो फिर कौन अधिकारी जनहित की लड़ाई लड़ने की हिम्मत करेगा।

  • हिट एंड रन पर सरकार सख्त,मुख्यमंत्री के निर्देश नागरिक सेवाएं बहाल करें

    हिट एंड रन पर सरकार सख्त,मुख्यमंत्री के निर्देश नागरिक सेवाएं बहाल करें


    भोपाल,2 जनवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने आज मंत्रालय में कमिश्नर, कलेक्टर और एसपी के साथ वीसी के माध्यम से चर्चा कर ट्रक ड्राइवरों की हड़ताल के मद्देनजर किए जा रहे आवश्यक उपायों की जानकारी प्राप्त की और जरूरी निर्देश दिए। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि नागरिकों को आवश्यक सामग्री के लिए परेशानी नही हो, इसके लिए सभी जरूरी उपाय किए जाएं।


    मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को हड़ताल खत्म कराने के निर्देश दिए हैं। दो याचिकाओं पर मंगलवार को हुई सुनवाई में हाईकोर्ट ने कहा, ‘हड़ताल को तुरंत खत्म करवाया जाए। सरकार परिवहन बहाल करवाए।’ इस पर सरकार की तरफ से महाधिवक्ता ने कहा, ‘आज शाम तक इस मामले में अहम निर्णय लिया जा रहा है।’ ये याचिकाएं नागरिक उपभोक्ता मंच और अखिलेश त्रिपाठी की ओर से दायर की गईं।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि प्रदेश में पेट्रोल-डीजल की सप्लाई प्रभावित न हो। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि पेट्रोल-डीजल को लेकर कोई अवरोध पैदा करेगा तो उसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसके लिए सभी आवश्यक उपाय सुनिश्चित किए जाएं, जनता को किसी भी प्रकार का कष्ट न हो। पेट्रोल पंप और एलपीजी गैस के डीलर्स जिनके अपने वाहन हैं, उनके माध्यम से सप्लाई सुनिश्चित की जाए।


    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जबलपुर, ग्वालियर, कटनी, रीवा, उज्जैन, सागर समेत विभिन्न जिलों के कलेक्टर, एसपी से चर्चा करते हुए कहा कि किसी भी मार्ग पर अवरोध और बाधा न हो। रास्ते की सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करें। सभी डीलर्स, एसोसिएशन के साथ बैठक करें। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि हमारा मैदान में मूवमेंट दिखे। सोशल मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आदि प्लेटफार्म का उपयोग करते हुए स्थिति सामान्य होने की जानकारी दी जाए।

    बैठक में अपर मुख्य सचिव गृह डॉ. राजेश राजौरा, डीजीपी श्री सुधीर कुमार सक्सेना, मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव श्री राघवेंद्र सिंह सहित वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे।

  • अमीरी की आधारशिला पर खुशहाल बनेगा मध्यप्रदेशःगौतम टेटवाल

    अमीरी की आधारशिला पर खुशहाल बनेगा मध्यप्रदेशःगौतम टेटवाल


    भोपाल, 2 जनवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। कौशल विकास एवं रोजगार राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) गौतम टेटवाल ने कहा है कि हमारे युवा हमारी संपदा हैं। हम इस युवा शक्ति ऊर्जा को बेहतर दृष्टिकोण से संवार रहे हैं। इससे स्थायी रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे और युवाओं का जीवन स्तर बेहतर होगा. पिछली सरकारें गरीबी को संरक्षित करती रहीं हैं मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार अमीरी की आधारशिला पर काम कर रही है। इसके नतीजे जल्दी ही सबको खुशहाल बनाएंगे।


    उन्होंने मंगलवार को वल्लभ भवन क्र. 3 में कक्ष क्र. 318 में पूजा अर्चना कर पदभार ग्रहण किया। श्री टेटवाल ने विभागीय योजनाओं की जानकारी भी ली। इस दौरन अपर मुख्य सचिव तकनीकी शिक्षा एवं कौशल विकास श्री मनु श्रीवास्तव एवं अन्य अधिकारी उपस्थित थे।

    श्री टेटवाल ने एक मुलाकात में कहा कि प्रदेश अब रोजगार निर्माण के एक नए दौर में प्रवेश करने जा रहा है।अब तक भाजपा सरकार ने युवाओं के कौशल के आधार पर उनका जीवन संवारने के लिए विभिन्न उद्यमों की मदद ली थी। इस प्रक्रिया में युवाओं को फौरी राहत भी मिली । अब स्थायी रोजगार स्थापित करने के लिए हम वो फार्मूला लागू कर रहे हैं जिसके माध्यम से आत्मनिर्भर प्रदेश के निर्माण की राह प्रशस्त होगी। प्रदेश के करोड़ों युवा आज अपने हुनर के मुताबिक काम न मिलने के कारण परेशान हैं।अब सरकार जिन उद्यमों को बढ़ावा दे रही है उससे युवाओं के जीवन में समृद्धि आएगी और प्रदेश भी समृद्ध होगा।

  • उमाजी की अर्थनीति के असली हीरो चेतन काश्यप

    उमाजी की अर्थनीति के असली हीरो चेतन काश्यप


    दिग्विजय सिंह की दिग्भ्रमित सरकार को 2003 में घाटी पर उतारकर उमाश्री भारती ने जिस भारतीय जनता पार्टी की सरकार को सत्ता दिलाई थी वह सत्ता में आते ही आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश के फार्मूले पर काम करने लगी। वैश्विक सूदखोरों की लॉबी ने उमाजी के पंच ज अभियान को सत्ता से धकेलकर जिस कर्ज आधारित विकास की अर्थव्यवस्था को सत्तासीन कराया वह बीस सालों तक छायी रही । बिजली ,सड़क और पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए वैश्विक संस्थाओं ने राज्य को भरपूर कर्ज मुहैया कराया। शिवराज जी को इस दौर के लिए सत्ता में भेजा गया था तो उन्होंने आधारभूत ढांचे का धन जनता के बीच बांटकर खूब वाहवाही बटोरी। आज शिवराज सिंह चौहान जनता के बीच बड़ा ब्रांड बन चुके हैं लेकिन अब राज्य उस अंधी गली में पहुंच गया है कि उसे विकास के नए प्रतिमान तलाशने पड़ रहे हैं। नए मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव के सामने चुनौती है कि वे विकास के उत्पादक मॉडल को जमीन पर उतारें और राज्य की समस्याओं का उचित समाधान तलाशें । ऐसे में पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने रतलाम शहर के विधायक और डॉ.मोहन यादव केबिनेट के मंत्री चेतन काश्यप के माध्यम से जो संदेश दिया है वह गौर करने लायक है।
    रतलाम शहर के विधायक चेतन काश्यप अपनी दानशीलता और जमीनी विकास को महत्व देने के लिए मॉडल बन चुके हैं। उनके बेटे कारोबार करते हैं जबकि चेतन काश्यप राजनीति की रीढ़ बने हुए हैं। उन्होंने जिन प्रकल्पों को साकार किया है वे आत्मनिर्भर समाज के लिए मार्गदर्शक बन गए हैं। उन्होंने सौ लोगों को ऐसे आवास बनवाकर दिए हैं जो आत्मिर्भरता की राह पर चलकर समृद्ध हो रहे हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत उन्होंने रोजगार को जोड़कर सुखमय संसार की गारंटी सुनिश्चित की है। उनके विशाल आवास की भोजनशाला कार्यकर्ताओं और जरूरतमंदों को समाजसेवा का मंच देती है। पूरे नगर और आसपास के गांवों में चेतन काश्यप को लक्ष्मी पुत्र माना जाता है। लोग जानते हैं कि भाई जी यदि खड़े हैं तो वहां सुशासन खुद ब खुद हाथ बांधे खड़ा हो जाएगा। यही वजह है कि वे चुनाव में गली गली की धूल नहीं फांकते। जनता स्वयं उनके लिए चुनाव लड़ती है।ऐसे आदर्श लोक सेवक यदि हर विधानसभा को मिलने लगें तो एक पंचवर्षीय योजना में राज्य की काया ही पलट जाए।
    कांग्रेस जिस भाजपा को सेठों और बनियों की पार्टी कहकर उपहास उड़ाती थी उस भाजपा ने उन्हें पार्टी का कोषाध्यक्ष बनाया। राज्य की अर्थव्यवस्था में किस ढांचे की जरूरत है वे अच्छी तरह जानते हैं। पिछले दो दशकों में भाजपा ढांचागत विकास पर कार्य कर रही थी तब चेतन काश्यप की भूमिका का उपयोग किया जा सकता था लेकिन शिवराज जी और उनके बटोरनाथ मंत्री अपने काम में किसी प्रकार का खलल नहीं चाहते थे। यही वजह है कि उन्होंने चेतन काश्यप की प्रतिभा का इस्तेमाल करने पर कोई गौर नहीं किया। चेतन काश्यप रतलाम में जो गोल्ड सोक (सोने का बाजार)बनवा रहे हैं। वह जब आकार ले लेगा तो रतलाम देश की प्रमुख सोने की मंडी बन जाएगा। यहां बनने वाले गोल्ड के आभूषण दुबई की तरह देश और विदेश के लिए आकर्षण का केन्द्र बन जाएंगे। सोने के कारोबार को इससे पहले इतनी कुशलता से दुनिया में कहीं नहीं खड़ा किया गया है।ऐसे ढेरों विचार काश्यप की झोली में हर वक्त मौजूद रहते हैं।
    खुद चेतन काश्यप बताते हैं कि जैन साध्वी ने उन्हें प्रेरणा दी थी कि वे अपने हुनर और भाग्य की सौगात समाज के पिछड़े और दलित लोगों को मुख्यधारा में लाने के दें। तबसे काश्यप का लक्ष्य बन गया है कि वे विकास की दौड़ में पिछड़ चुके नागरिकों का जीवन संवारने में जुट गए हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब मध्यप्रदेश में अपने चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत की तो उन्होंने रतलाम शहर को ही चुना। पहली चुनावी सभा में उनके साथ चेतन काश्यप और मंदसौर के सांसद सुधीर गुप्ता भी मौजूद थे। सुधीर गुप्ता संसद में लोक लेखा समिति, वित्त समिति, रसायन व उर्वरक समितिके अलावा लोकसभा आवास समिति की जवाबदारी भी संभालते हैं। वे प्रधानमंत्री के उन प्रमुख सहयोगियों में शामिल हैं जो भाजपा की विकास की अवधारणा की आधारशिला हैं।
    चेतन काश्यप को मंत्री बनाकर डॉक्टर मोहन यादव सरकार ने जता दिया है कि मध्यप्रदेश अब भाजपा की उस सुविचारित विकास नीतियों पर अमल करने जा रहा है जो देश को न केवल पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बना देंगे बल्कि इस लक्ष्य से भी कई गुना आगे निकल जाएंगे। ऐसे में पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने चेतन काश्यप को सलाह देकर विकास के इस मॉडल के प्रति अपनी सहमति जताई है।
    उमा भारती अपने भाषणों में कहती रहीं हैं कि वे दलितों और पिछड़ों को विकसित तभी मानेंगी जब वे खुद शहरों के प्रमुख बाजारों में अपने प्रतिष्ठान खड़े करके देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देने लगें। समाज में वैमनस्य फैलाती कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी जैसे दलों के लिए भाजपा ने जो प्रतिमान खड़े किए हैं वे हतप्रभ कर देने लायक हैं। पचहत्तर सालों के बाद मध्यप्रदेश की सरकारी नौकरियों में मात्र चार लाख दलितों और पिछड़ों को रोजगार मिल सके हैं जबकि भारतीय जनता पार्टी ने अकेले लाड़ली बहना योजना से चालीस लाख दलितों के घर में आय का दीपक जला दिया है। अन्य योजनाओं का आंकड़ा देखा जाए तो पिछड़ों और दलितों की राजनीति करने वाले तमाम राजनीतिक दल अवाक रह जाएंगे। विकास का वामपंथी मॉडल जिन श्रमिकों की बात करता है भाजपा ने उन्हें समाज की उत्पादकता में हिस्सेदार बनाकर सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं। सत्ता संभालते ही मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव ने हुकुमचंद मिल और ग्वालियर की विनोद मिल के परिसमापन की जो पहल की वह भाजपा के श्रमिकों के प्रति समर्पण की आहट है।
    नई सरकार राज्य में पूंजी उत्पादन का जो मॉडल खड़ा करना चाह रही है उसकी झलक अभी से मिल गई है। उमा भारती ने चेतन काश्यप के बहाने एक बड़ी बहस को जन्म दिया है। वे कह रहीं हैं कि चेतन काश्यप को वेतन लेना चाहिए और अपने कर कमलों से उसे समाज की बेहतरी के लिए खर्च करना चाहिए। उनके सेवा कार्य तभी भाजपा के समर्पण के प्रकाश स्तंभ बन पाएंगे। आने वाले समय में राज्य एक बड़ी बहस में शामिल होने जा रहा है जिसमें एक ओर राज्य को कर्जदार बनाकर वाहवाही लूटने वाली लॉबी खड़ी होगी वहीं दूसरी ओर वित्तीय संसाधनों का विकास करके देश को बुलंदी पर पहुंचाने वाले स्वयंसेवक खड़े होंगे। तब विकास की अवधारणा का अंतर साफ समझा जा सकेगा।

  • सत्ता माफिया से मुक्ति दिलाने एमपी आया जाणता राजा

    सत्ता माफिया से मुक्ति दिलाने एमपी आया जाणता राजा


    कांग्रेस की अराजक सरकारों से मुक्ति के दो दशक बाद तक मध्यप्रदेश किताबी प्रयोगों से गुजरता रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने जिस पंच ज अभियान की नींव रखी थी वह साकार हो पाती इसके पहले ही अंतर्राष्ट्रीय सूदखोरों के एजेंटों ने मध्यप्रदेश की सत्ता हथिया ली थी। बाबूलाल गौर हों या शिवराज सिंह चौहान और थोड़े समय के लिए आए कांग्रेस के कमलनाथ सभी कर्ज आधारित अर्थव्यवस्था के पक्षधर रहे हैं। यही वजह है कि सरकारों का आकलन करने में जनता को खासी परेशानी महसूस होती थी। भाजपाई उन्हें एक तरह से कांग्रेसी ही नजर आते थे। जाहिर है कि जब विकास की अवधारणा कर्ज लेकर घी पीने के सूत्रवाक्य पर टिकी हो तो राज्य की उत्पादकता बढ़ाने की ओर किसका ध्यान जाता।कर्ज लेना और फिर सत्ता के इर्द गिर्द जुटे माफिया के माध्यम से उसे हड़प लेना सरकार की शैली बन गई थी। पहली बार महाकाल ने एमपी में सुशासन के लिए अपने ऐसे भक्त को भेजा है जो सुशासन की पाठशाला में तपकर सामने आया है।


    मुख्यमंत्री रहते हुए शिवराज सिंह चौहान ने किसानों का नाम जपना शुरु किया था। एमपी की कृषि ही एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जो बगैर निवेश किए खासी उत्पादकता देता है। औद्योगिक विकास में तो भारी निवेश करने के बाद भी उत्पादकता की कोई गारंटी नहीं होती। फिर जब उद्योगों को जबरिया थोपा गया हो तब तो वे अपनी स्थापना के समय ही उपसंहार का अध्याय भी लिख देते हैं। ऐसे में प्रदेश को आत्मनिर्भरता की परंपरा की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। शिवराज सिंह चौहान के होनोलुलु शासन से हर कोई खफा था लेकिन कांग्रेस न आ जाए इस भय से सभी खामोश रहते थे। हवाई जहाजों में फुदककर गांव खेड़ों में जाना और मैं हूं न कहकर लोगों को हूल देना कोई शिवराज सिंह चौहान से सीख सकता है।अभी ये भ्रम फैलाया जा रहा है कि मामा के जाने से लाड़ली बहना योजना बंद कर दी जाएगी,जबकि ये तो शासन की योजना है। ये बात लाड़ली बहनों को थोड़े दिनों में जरूर समझ में आ जाएगी।


    भाजपा के नेता रघुनंदन शर्मा ने तो शिवराज जी को घोषणावीर का तमगा देकर उनकी कार्यशैली पर सवालिया निशान लगा दिया था लेकिन अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के समर्थन से उनकी नैया चलती रही। क्या भाजपा और क्या कांग्रेसी सभी उनके समर्थन में खामोश रहे। शिवराज सिंह चौहान विनम्र शासक रहे हैं और बीस सालों बाद भी उनमें अहंकार नहीं पनप पाया है इसी वजह से उनकी सारी नाकामियों पर पार्टी और संगठन दोनों परदा डालते रहे। खोखली ललकार के सहारे उन्होंने सत्ता चलाने की कोशिश जरूर की लेकिन वे शुरु से लेकर अंत तक नौकरशाही और पुलिस प्रशासन पर लगाम नहीं लगा सके।


    भारतीय जनता पार्टी कार्यालय में जब विधायक दलकी बैठक हो रही थी तब पार्टी का संगठन और सरकार के नुमाइंदे सभी अपनी नाकामियों का सबूत पेश कर रहे थे। भारतीय जनता पार्टी संगठन ने कोई प्लान नहीं बनाया था कि जब नए नेता की घोषणा होगी तो किस तरह वो आने वाले नागरिकों, पदाधिकारियों या प्रेस को संबोधित करेंगे। बैठक समाप्त होते ही प्रेस के प्रतिनिधियों को जब फैसले की जानकारी मिली तो वे पार्टी कार्यालय में भीतर घुस गए। भारी धक्कामुक्की और अव्यवस्था के बीच जनता तक जानकारी पहुंचाने की कोई व्यवस्था नहीं थी।

    नए नेता के चयन की सूचना जनता तक पहुंचाने के लिए प्रेस मीडिया को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा।


    ऐसा लगता है कि ये अराजकता पार्टी के प्रदेश हाईकमान के निर्देश पर ही की गई थी। व्यवस्थित चुनाव प्रचार अभियान चलाने वाला भाजपा का संगठन फैसला सुनने के बाद ऐसा शून्य हो गया था कि उसने अव्यवस्था का लांछन नए नेता पर थोपने की तैयारी पहले से ही कर रखी थी। महिलाएं और युवा पत्रकार इसी धक्कामुक्की के बीच जनता को जानकारियां पहुंचा रहे थे। नाकाम पुलिस प्रशासन भी तैयार नहीं था। वह तय ही नहीं कर पाया कि किस तरह वह उत्साहित कार्यकर्ताओं के इस सैलाब का प्रबंधन कर पाएगा। माईक संभाले पुलिस के अधिकारी स्वयं अपनी अव्यवस्था के शिकार बने और भीड़ ने उन्हें धकेलकर गिरा दिया।

    विदा होती सत्ता ने नए मुख्यमंत्री के चयन की सूचना के मार्ग में दरवाजा बंद करके कई बाधाएं खड़ी कर दीं थीं.


    डॉ.मोहन यादव सख्त प्रशासक माने जाते हैं। वे स्वर्गीय वीरेन्द्र सखलेचा की तरह आदर्शवाद के तले दबने वाले व्यक्ति भी नहीं हैं। उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि समाज और भीड़ का प्रबंधन कैसे करना होता है। उज्जैन में लगने वाले कुंभ की व्यवस्था संभालने का उन्हें लंबा अनुभव है। ऐसे में जनता को क्या सुविधाएं कब उपलब्ध करवाना है वे अच्छी तरह जानते हैं। किन पाखंडियों की सत्ता में घुसपैठ रोकना है वे ये भी अच्छी तरह समझते हैं।समर्पित भाव से जनसेवा करने का उनका लंबा इतिहास है। पार्टी को जाति या वर्ग के दायरे से बाहर निकलकर व्यवस्था संभालने में भी उनकी युक्तियां सदैव से चर्चित रहीं हैं।

    भारत सरकार की योजनाएं हों या फिर राज्य सरकार की उन्होंने अपने क्षेत्र के लोगों को मुहैया कराने में रिकार्ड स्थापित किया है। योजनाओं को जरूरतमंदों तक पहुंचाना और इनमें घोटाला करने वालों को उनकी हैसियत बताना उनका प्रिय शगल है। इसलिए अराजकता के दौर के आदी हो चुके मध्यप्रदेश के सत्ता माफिया को अब सावधान हो जाना चाहिए। सत्ता की आड़ में बजट की चोरी करने वालों का गिरोह भी अब सावधान हो जाए तो ही बेहतर होगा क्योंकि सत्ता के लुटेरों की खाल खींचने वाला जांबाज अब मैदान पर आ गया है। ऐसे ठग समझ लें कि उनका सामना अब तक शिवराज जी जैसे भलेमानस से पड़ा था। पहली बार उन्हें जाणता राजा मिला है। जो एमपी को नई ऊंचाईयों पर ले जाने के लिए कमर कसकर तैयार है।फिर मोदीजी का डबल इंजन तो पहले ही उनके साथ मौजूद है।

  • आरएसएस से निष्कासित भाजपा नेता ने किया अतिक्रमण, एनजीटी ने मांगी राहत रिपोर्ट

    आरएसएस से निष्कासित भाजपा नेता ने किया अतिक्रमण, एनजीटी ने मांगी राहत रिपोर्ट


    एनजीटी ने दिया नागरिकों को राहत देने का निर्देश
    भोपाल,06 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। भारतीय जनता पार्टी सरकार की आड़ में कतिपय असामाजिक तत्वों ने प्रशासन को कुछ इस तरह पंगु बना दिया है कि वह नागरिकों के प्रति अपने दायित्वों को ही भूल चला है। चुनावी प्रक्रियाओं के चलते अब तक खामोश रही प्रशासनिक मशीनरी ने प्रकाश नगर में कल दौरा किया और अवैध निर्माण के चलते चोक हुई सीवेज लाईनों को खोलने के निर्देश दिए हैं। एनजीटी के आदेश के अनुपालन में प्रशासन ने अवैध निर्माण गिराने की तैयारी भी की है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि कि वे किसी राजनैतिक हस्तक्षेप को अब बर्दाश्त नहीं करेंगे और प्रशासन यदि अपना दायित्व नहीं निभाता है तो वे इस संबंध में वैकल्पिक तरीकों का भी इस्तेमाल करने से नहीं चूकेंगे।
    मामला गोविंदपुरा विधानसभा क्षेत्र स्थित प्रकाश नगर का है।यहां अनैतिक आचरण के चलते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से बर्खास्त किए गए एक असामाजिक तत्व ने सीवेट ट्रीटमेंट के प्लाट पर अवैध निर्माण खड़ा कर लिया है।नागरिकों के विरोध के बावजूद वह बेशर्मी से ढांचे का निर्माण करता जा रहा है। इस वजह से सीवेज ट्रीटमेंट के लिए छोड़े गए प्लाट की नालियां चोक हो गईं और कालोनी में पानी भर गया है।
    नागरिकों ने इस समस्या के खिलाफ पुलिस व प्रशासन को भी शिकायत की लेकिन चुनावी प्रक्रियाओं में उलझी भाजपा सरकार और अधिकारियों ने नागरिकों की परेशानी पर गौर नहीं किया। उस चरित्रहीन असामाजिक तत्व जो खुद को नेता और पत्रकार बताता है ने अवैध निर्माण जारी रखा। अब ये हालत हो गई है कि परिसर की नालियां चोक हो गईं हैं और नागरिकों को खासी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। भाजपा सरकार की आड़ में पनप रही गंदगी का ये अनूठा उदाहरण है।
    नागरिकों ने इस संबंध में जब एनजीटी की भोपाल बैंच को शिकायत की तो उसने प्रकरण क्रमांक ओए 139।2023 कृष्णारानी विरुद् मध्यप्रदेश शासन एवं अन्य के विरुद्ध 12 अक्टूबर 2023 को पारित आदेश के अनुपालन के निर्देश दिए हैं। एनजीटी के सदस्य सचिव आईएएस चंद्रमोहन ठाकुर ने नगर निगम कमिश्नर और भोपाल कलेक्टर को नागरिकों को राहत दिलाने के निर्देश दिए हैं। इस संबंध में एक कमेटी की भी स्थापना की गई है।इस आदेश के अनुपालन की रिपोर्ट 18 दिसंबर के पहले एनजीटी के समक्ष पेश की जानी है।
    गौरतलब है कि अतिक्रमण के कारण प्रकाश नगर रहवासियों को जलभराव और मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है। वार्ड 70,गोविंदपुरा की प्रकाश नगर, बिजली कॉलोनी, #Bhopal जहां पर अधिकतर रिटायर्ड MPEB के अधिकारी, बुजुर्ग महिलाएं रहते हैं वहां पर एक #भाजपा नेता के द्वारा नाले पर अतिक्रमण कर लिया गया और निर्माण प्रारंभ कर दिया । उसने संलग्न भूमि जो सेप्टिक टैंक के लिए निर्धारित थी उस पर भी निर्माण शुरु कर दिया है ।जिसके कारण सारे सीवरेज चेंबर ओवरफ्लो हो गये टॉयलेट गंदगी फैल गई और कई पेड़ धराशाई हो गए ।पिछले 3 माह से की जा रही विभिन्न विभागों एवं नेताओं को की गई शिकायतों का कोई निराकरण नहीं हुआ । विधायक, क्षेत्रीय पार्षद यहां तक कि संभाग आयुक्त ,कलेक्टर और #प्रदूषण निवारण मंडल में भी इसकी शिकायत की गई कि ओपन में जल-मल-मूत्र बह रहा है और सेप्टिक टैंक का निर्माण नहीं हो रहा। कथित भाजपा नेता के निजी स्वार्थ के कारण प्रकाश नगर के बुजुर्ग, महिलाओं, पुरुषों को अत्यंत दुख तकलीफों का सामना करना पड़ रहा है।

  • जरूरत थी संजीवनी की पूरा पहाड़ उठा लाए सरकार

    जरूरत थी संजीवनी की पूरा पहाड़ उठा लाए सरकार


    आलोक सिंघई
    चुनाव की बेला में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भोपाल में मीडिया सेंटर की आधारशिला रखने जा रहे हैं। भूमिपूजन के इस विशाल समागम में प्रदेश भर से पत्रकारों को ढो ढोकर लाया गया है। होटलों में ठहराया गया है। सरकार ये दर्शाने का जतन कर रही है कि कांग्रेस के बदमिजाज कमलनाथ की तुलना में मौजूदा सरकार पत्रकार हितैषी है।कमलनाथ कांग्रेस के छोटे से कार्यकाल को देखकर ये बात गले भी उतरती है। कमलनाथ ने जिस तरह मीडिया पर लांछन लगाए उसे देखते हुए तो शिवराज सिंह चौहान की भाजपा सरकार पत्रकारों को सम्मान देने वाली सरकार ही नजर आती है। इसके बावजूद उसे चुनाव की बेला में पत्रकार भवन का प्रहसन क्यों खेलना पड़ रहा है। लगातार साढ़े अठारह सालों तक मीडिया पर मोटा बजट खर्च करने वाली भाजपा सरकार को दूरदराज के छोटे पत्रकारों तक का आशीर्वाद क्यों बटोरना पड़ रहा है।पत्रकार खुद हतप्रभ हैं कि अचानक सरकार उन पर क्यों मेहरबान हो गई है।
    सत्ताधीशों का लंबा अनुभव रहा है कि चुनाव जिताने वाले अलग होते हैं और सत्ता का सुख लूटने वाले अलग हैं। भाजपा को लंबा शासन करने का अवसर मिला है। इसके बावजूद पिछले चुनावों में कांग्रेस को मिला मत प्रतिशत बताता है कि संगठन, जनता और पत्रकार कोई भी मतदान की आंधी की दिशा नहीं बदल सकते हैं। जनता के बीच से उठने वाली मनोभावों की आंधी जनमत बनाती है और वही सत्ता की असली कुंजी है। पिछले चार कार्यकालों में भाजपा सरकार ने पत्रकारों को कल्पनातीत तरीके से उपकृत किया है। उसका उपकार पाने वाले पत्रकारों की तादाद भी बहुत ज्यादा है। जब मनीष सिंह को जनसंपर्क आयुक्त बनाया गया तो उन्हें आश्चर्य हुआ कि सरकार इतना बडा बजट पत्रकारों पर खर्च करती है फिर भी सरकार के कार्यकलापों को सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने वाला कंटेट नदारद है। पिछली सरकारों के मंत्रियों, प्रशासकों ने इतने बोगस पत्रकार पाल रखे हैं जिनकी बुद्दि केवल चापलूसी की योग्यता रखती है। जनसंपर्क की भाषा बोलने वाले इन पत्रकारों ने दो दशकों में जन संवाद को इतना भौंथरा बना दिया है कि सरकार पर जनता का नजला गिरना सुनिश्चित है।


    चमचों की इस फौज में से असली पत्रकारों को तलाशना और फिर जनहित में उनका उपयोग करना भूसे में सुई तलाशने जैसा कठिन कार्य है। यही सोचकर आयुक्त महोदय ने हनुमान जी वाला फार्मूला अपना लिया। संजीवनी लाने के साथ साथ वे पूरा पर्वत ही उठा लाए हैं । सरकार ने उनके प्रयासों को हरी झंडी दिखाई क्योंकि वह पिछले चुनावों में मिली बारीक हार का जोखिम दुबारा नहीं उठाना चाहती थी। शिवराज जी आज आलोचना का केन्द्र बिंदु बने हुए हैं। उन्होंने भाग भागकर प्रचार किया और जनता से सीधा संवाद करने की कोशिश की । इस आपाधापी में वे भूल गए थे कि नौकरशाही कभी विधायिका का रूप नहीं ले सकती है। मोटी तनख्वाह पाने वाले अफसरों को इस बात से क्या लेना देना कि वे जिन पत्रकारों को पाल रहे हैं वे असरकारी संवाद कर रहे हैं या कि सिर्फ खानापूरी।


    राजधानी का पत्रकार भवन पिछले तीन दशकों से समस्या ग्रस्त रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने अपनी मनमानी को मीडिया के माध्यम से सही दर्शाने के लिए जिस ढांचे का गठन किया था वह आज खलनायक बन चुका है। एडीजी इंटेलीजेंस ए.एन सिंह के घिसे पिटे फार्मूले ने प्रदेश की पूरी पत्रकारिता को धूल धूसरित कर दिया है। कोई भी सैन्य या पुलिसिया सोच जन संवाद की भूमिका नहीं निभा सकता है। इसके बावजूद सत्ता माफिया ने अपने काले कारनामों को छुपाने के लिए इस ढांचे को बरकार रखा। एएन सिंह की सलाह पर तत्कालीन अर्जुनसिंह सरकार ने कम्युनिस्ट ढांचे में रंगे श्रमजीवी पत्रकार संघ का प्रोजेक्ट चलाया था। इसकी फंडिंग जनसंपर्क विभाग के बजट और पुलिस के मुखबिर तंत्र के लिए मिलने वाले एसएस फंड से की जानी थी। यही वजह थी कि प्रदेश की पत्रकारिता नागरिकों को नक्सली ,चरित्रहीन, भ्रष्टाचारी और शराबी के तौर पर पहचानने लगी।


    भाजपा सरकार के सत्ता में आते ही उमा भारती ने इस आततायी संगठन को उखाड़ फेंका। तभी उनके इर्द गिर्द जुट रहे लोधियों को निशाना बनाकर उमा भारती को कुर्सी छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया गया। इसके बाद वही ढाक के तीन पात वाली पुरानी कहानी चल पड़ी। बाबूलाल गौर तो अघोषित तरीके से अर्जुनसिंह जी के ही प्यादे थे। उन्होंने उमा भारती सरकार के फैसलों को पलट दिया। सरकार से वे सभी फाईलें गायब हो गईं जिन्हें लौह महिला और आयुक्त जनसंपर्क अरुणा शर्मा ने विशेष परिश्रम से तैयार किया था। इसके बाद आई शिवराज सरकार ने यही नीति जारी रखी। शिवराज सिंह के गुरु सुंदरलाल पटवा भाजपा में अर्जुनसिंह गुट के ही खासमखास माने जाते थे सो उन्होंने पत्रकार भवन पर वही पत्रकार विरोधी व्यवस्था कायम रखी। लगभग डेढ़ दशक के शासनकाल में पत्रकारों की तमाम मांगों पर सहमति जताने के बावजूद शिवराज सिंह ने इस व्यवस्था पर कोई प्रहार नहीं किया बल्कि पर्दे के पीछे वे इस बदनाम संगठन के पदाधिकारियों को उपकृत करते रहे।


    जनता ने पिछली बार जब इस व्यवस्था को पलटने का जनादेश दिया तो कमलनाथ सरकार ने आते ही पत्रकार भवन को जमींदोज करके पत्रकारों की बरसों पुरानी मांग पूरी कर दी थी। उनके इर्द गिर्द भी किताबी पत्रकारों का जमावड़ा हो गया था सो उन्होंने इन बदमाशों के साथ पूरी पत्रकार बिरादरी को लांछित करना शुरु कर दिया। यही वजह थी कि कमलनाथ की भ्रष्ट सरकार के उखाड़ फेंकने में मीडिया के सभी वर्गों ने भाजपा को भरपूर साथ दिया। भाजपा ने दुबारा सत्ता में आने के बाद कमलनाथ की नीति को जारी ऱखा और पत्रकारों से दूरियां बनाए रखीं। ये भी महज दिखावा साबित हुआ। लुटेरे पत्रकारों की फौज को जनसंपर्क के भ्रष्ट अधिकारियों ने दुबारा सरकार के गले में लटका दिया। नतीजतन असली पत्रकार फिर भी वंचित ही रहे। बल्कि वे खामखां जनता के निशाने पर आते रहे जबकि मलाई खाने वाला तबका तो सरकार के साथ मजे लूटता रहा।

    दरअसल स्व. माखनलाल चतुर्वेदी के एक बदमाश रिश्तेदार ने जनसंपर्क विभाग में रहते हुए दिग्विजय सिंह की सामंती सरकार की आंखों में धूल झोंककर जो विश्विद्यालय सरकार के गले में बांध दिया वह उसे डुबाने वाला बोझा साबित हो रहा है। बरसों से सरकारें अपने चमचों को इस विवि में उपकृत करती रहीं हैं। कभी दिग्विजय सिंह सरकार जो करती थी उसे भाजपा सरकार ने कई सौ गुना तरीके से किया। अन्य प्रदेशों से लाए गए हवा हवाई पत्रकारों को यहां पत्रकारिता का शिक्षक बनाया गया और उन्हें यूजीसी के निर्धारित वेतनमानों से उपकृत किया जाने लगा। वास्तव में पत्रकारिता की आड़ में एक ऐसे चरोखर खुल गई जिस पर पत्रकार भी खामोश थे।


    यही वजह है कि आज ऐसा लगता है कि सरकार पत्रकारों पर भारी बजट खर्च कर रही है लेकिन वह वास्तव में सरकार का जेबी प्रचार तंत्र है जो हर बार बोगस साबित होता रहा है।असली पत्रकार तो आज भी झुनझुना पकड़कर घूम रहा है। इस बार जब भाजपा सरकार को बिजली सड़क और पानी के नाम पर भारी बजट खर्च करने मिला तो निर्माण माफिया को लगने लगा है कि ये व्यवस्था जारी रहनी चाहिए। भ्रष्ट अफसरशाही के लिए इससे अनुकूल सरकार दूसरी कोई हो नहीं सकती। यही वजह है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान मैं हूं का नारा देते हुए भाजपा हाईकमान के निशाने पर आ गए हैं। बजट का आंकड़ा तो जारी करने वाली संस्थाओं की बैलेंस शीट से पढ़ा जा सकता है। जो रकम प्रदेश पर खर्च की गई उसकी तुलना में उत्पादकता कितनी बढ़ी। ये आंकड़े कितने असली और कितने फर्जी हैं इसे जांचना आज तकनीकी के दौर में कठिन नहीं है। सरकार के बजट का कितना हिस्सा माफिया की भेंट चढ़ गया इसका आकलन अच्छी तरह कर लिया गया है। यही वजह है कि शिवराज जी के शासनकाल को जनता की कसौटी पर तो बाद में परखा जाएगा अभी तो पार्टी के अंदरूनी आडिट ने इसका अध्ययन अच्छी तरह कर लिया है। जाहिर है कि सरकार ने अब पत्रकार भवन का नाम मीडिया सेंटर रखा है। वह नहीं चाहती कि फिर कोई माफिया इस पर कब्जा जमा ले और प्रदेश के विकास की कहानी को पटरी से उतार कर चलता बने।उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बार मीडिया सेंटर मध्यप्रदेश में प्रोफेशनल जनसंवाद कायम करेगा। हां यदि कोई जनहितैषी व्यक्ति सत्ता के शीर्ष पर आ जाए तो फिर जनधन लूटकर भागने वाले माफिया को भी जमींदोज किया जा सकेगा।

  • भाजपा के शक्ति संधान से चौखाने चित्त कमलनाथ कांग्रेस

    भाजपा के शक्ति संधान से चौखाने चित्त कमलनाथ कांग्रेस


    भाजपा ने तीसरी सूची में आदिवासी नेता रहे मनमोहन शाह बट्टी की बेटी मोनिका बट्टी को अमरवाड़ा से टिकिट देकर खलबली मचा दी है। कभी सनातन परंपरा के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले आदिवासी नेता मनमोहन शाह बट्टी की बेटी को चुनाव मैदान में उतारकर भाजपा ने कांग्रेस के अरमानों पर घड़ों पानी उढ़ेल दिया है। मनमोहन शाह बट्टी आदिवासी सम्मान का नारा देकर राजनीति में उतरे थे। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी बनाई। इस पार्टी ने समय समय पर अपनी मौजूदगी भी दर्ज कराई लेकिन राजनीतिक बदलाव लाना रेत में नाव खेने के समान होता है। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी में फूट भी पड़ी और पार्टी अप्रासंगिक भी हो गई। इसके बावजूद पिछले विधानसभा चुनावों में कमलनाथ कांग्रेस ने हीरालाल अलावा के नेतृत्व में जयस संगठन के नेतृत्व तले आदिवासियों को लामबंद करने में सफलता पा ली थी. आदिवासी वोट बैंक प्रदेश की 36 सीटों पर निर्णायक होता है। नतीजतन वोट का गणित गड़बड़ाया और भारतीय जनता पार्टी अधिक वोट पाने के बावजूद सत्ता से दूर रह गई थी। कमलनाथ की कूटनीति ने उन्हें सत्ता तक तो पहुंचा दिया था लेकिन शुचिता के अभाव ने सत्ता की लूट का जो नंगा नाच किया उससे क्षुब्ध होकर ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस के विधायकों ने विद्रोह कर दिया। कमलनाथ की सरकार औंधे मुंह गिर गई। तबसे भाजपा ने अपना खोया जनाधार वापस समेटने का अनुष्ठान शुरु कर दिया और आज वह मजबूत स्थिति में चुनावी कीर्तिमान स्थापित करने चल पड़ी है।
    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हालिया भोपाल दौरे के बाद तरह तरह की अटकलबाजियां शुरु हो गईं थीं लेकिन लोग तब भौंचक्के रह गए जब उनके दौरे के तुरंत बाद भाजपा हाईकमान ने अपने प्रत्याशियों की दूसरी सूची जारी कर दी। इस सूची में भाजपा ने तीन केन्द्रीय मंत्रियों और चार सांसदों को मैदान में उतारकर सभी को चौंका दिया। टिकिट बांटकर लौटे नरेन्द्र सिंह तोमर, प्रहलाद पटेल और फग्गन सिंह कुलस्ते को भी शायद अंदाजा नहीं था कि उन्हें मैदान में दो दो हाथ करना पड़ेंगे। बरसों से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की शासन शैली के खिलाफ शिकायतें आती रहीं हैं। भाजपा के कई दिग्गज स्वयं को मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं। खुद शिवराज सिंह चौहान बार बार खुद को चुनौतियों के सामने असहाय पाते रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनावों में जब उनकी सरकार चली गई तो उन्होंने ये कहते हुए संतोष व्यक्त किया था कि मैं मुक्त हो गया। आखिर उन्हें किसने बांध रखा था। खुला हाथ मिलने के बावजूद वे खुद को बंधक क्यों महसूस कर रहे थे।
    दरअसल शिवराज सिंह चौहान लगभग अठारह सालों तक प्रदेश में ऐसी सरकार चलाते रहे हैं जो सत्ता माफिया की गिरफ्त में जकड़ी रही है। वे चाहकर भी इस गिरोह पर लगाम नहीं लगा सके। इस माफिया गिरोह ने एक क्लब बना रखा है और सारे कमाऊ ठेके इसी गिरोह के चंगू मंगू हड़प लेते रहे हैं। सत्ता की इस लूटपाट में आईएएस अफसरों का एक गिरोह भी शामिल रहा है। आज राजधानी की सड़कों पर रोज वाहनों का जाम लगता है। इसकी वजह सत्ता की लूट से आई काली कमाई रही है। अरबों रुपयों का विदेशी कर्ज लेकर जन कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर जन धन की लूट ने ये हालात निर्मित किए हैं। कल्याणकारी योजनाएं सफल भी हुईं हैं जनता को उनका लाभ भी मिला है लेकिन ये लाभ उस कर्ज की तुलना में बहुत कम है जिसका ब्याज आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।
    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि मोदी है तो मुमकिन है।इस पर शिवराज के एक करीबी मंत्री ने कहा कि ये बड़बोला पन है किसी को अपने मुंह मियां मिट्ठू थोड़ी बनना चाहिए। भाजपा संगठन से जुड़े समर्पित स्वयंसेवक जानते हैं कि जिन नेताओं ने खुद को ब्रांड के रूप में स्थापित करके जनता के दिलों तक सफर किया है उन्होंने मतदाताओं को भरोसा दिलाने के लिए खुदकी मौजूदगी बताई है। कभी नारा दिया जाता था बच्चा बच्चा अटल बिहारी । शिवराज खुद मैं हूं न बोलकर लोगों को भरोसा दिलाने का प्रयास करते रहे हैं। इसके बावजूद उनकी सरकार की घोषणाएं सौ फीसदी सफल नहीं रहीं। यही वजह है कि भाजपा के ही वरिष्ठ नेता ने उन्हें घोषणा वीर की संज्ञा दे डाली थी।
    भाजपा हाईकमान के पास स्पष्ट फीड बैक था कि शिवराज सिंह चौहान के नाम को लेकर लोगों में बैचेनी है। खास तौर पर युवा वर्ग बदलाव चाहता है। उसने जबसे होश संभाला है भाजपा सरकार ही देखी है। ये सरकार न तो उसे रोजगार दे पाई न ही पूंजी निर्माण का कोई माहौल बना पाई है। ऐसे में कांग्रेस ने उसे पिछले विधानसभा चुनावों में बरगला लिया था। इस बार फिर ऐसा न हो इसके लिए हाईकमान ने शिवराज सिंह चौहान को हटाया तो नहीं है। इसकी वजह ये है कि शिवराज पर पिछले दो दशकों में भाजपा ने करोड़ों रुपए खर्च किए हैं। उन्हें ब्रांड के रूप में स्थापित किया है। इसलिए उन पर ही जवाबदारी है कि पार्टी को एक बार फिर सत्ता में लाएं। शिवराज के इर्द गिर्द जुटे सत्ता माफिया ने पंचायतों से लेकर स्वास्थ्य ,सड़क, बिजली, पानी और उद्योग सभी क्षेत्रों में जो लूट मचाई है उससे सभी खफा हैं। जाहिर है कि भाजपा को यदि 2024 में लोकसभा का चुनाव जीतना है तो उसे मध्यप्रदेश की अपनी सत्ता बचानी पड़ेगी। यही वजह है कि मोदी शाह की जोड़ी और भाजपा हाईकमान पूरी गंभीरता से मध्यप्रदेश में अपना परचम फहराने में जुट गए हैं।
    नरेन्द्र मोदी ने देश की अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डॉलर का टारगेट रखकर जो योजनाएं बनाई हैं उसमें वे कोई चूक नहीं होने देना चाहते हैं। कांग्रेस जहां डिफाल्टरों को पालने पोसने में जुटी रही है वहीं भाजपा ने किसानों और महिलाओं को अपना साथी बनाया है। आधी आबादी को मजबूती देकर वे अर्थ व्यवस्था में लंबी छलांग लगाना चाहते हैं। उन्होंने जाति,धर्म, वर्ग की राजनीति नहीं खेली। उन्होंने देश के विशाल वर्कफोर्स पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है। यही वजह है कि मोदी ने जब अपने भाषण में शिवराज सिंह चौहान का नाम नहीं लिया तो उनके समर्थक बौखला गए। उनके समर्थक एक मंत्री ने कहा कि जब शिवराज सिंह इस चुनावी रण के दूल्हे हैं तो उन्हें नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए। जबकि दूसरी सूची में जिन दिग्गजों और क्षेत्रीय क्षत्रपों को चुनाव में भेजकर भाजपा ने उन्हें चुनाव जिताने की जो जवाबदारी सौंपी है उससे साफ है कि भाजपा हाईकमान शिवराज का साफ विकल्प तैयार करना चाहती है। ये जनता की मांग पर लिया गया फैसला है जो भले ही कड़वा लगे पर समस्या का इससे अच्छा समाधान दूसरा नहीं हो सकता। इस फैसले से फिलहाल कांग्रेस तो चौखाने चित्त नजर आ रही है।