Month: March 2020

  • दिल्ली से मजदूरों को किसने खदेड़ा

    दिल्ली से मजदूरों को किसने खदेड़ा

    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब देश में 21 दिनों के लॉक डाऊन की घोषणा की तो लोगों को लगा कि ये कैसे संभव होगा। प्रधानमंत्री ने हाथ जोड़कर अपील की और कहा कि लॉक डाऊन का मतलब पूरा बंद है। रेल और बसों का परिवहन भी रोक दिया गया। हवाई मार्ग पर भी रोक लगा दी गई। इसके बावजूद कुछ राज्यों में मजदूरों के घर लौटने की कवायद जारी है। प्रधानमंत्री ने राज्य सरकारों से जरूरत मंदों को खाना उपलब्ध कराने और खाद्य सामग्री की आपूर्ति जारी रखने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद केरल और दिल्ली से भारी संख्या में मजदूरों का पलायन हुआ है। दिल्ली में तो प्रशासनिक अधिकारियों ,मस्जिदों और आप पार्टी के कार्यकर्ताओं की ओर से ऐलान किया गया कि आपको डीटीसी की बसों से यूपी सीमा से लगे आनंद विहार बस अड्डे तक छोड़ा जा रहा है। योगी सरकार ने वहां बसें उपलब्ध कराईं हैं जिनसे आपको आपके घरों तक छोड़ा जाएगा। इस ऐलान के बाद हजारों लोगों की भीड़ बसों में भरकर यूपी बार्डर तक पहुंच गई।हजारों मजदूर तो पैदल ही घरों की ओर रवाना हो गए। जब उन्हें यूपी सरकार की बसें नहीं मिलीं तो वे पैदल ही बच्चों महिलाओं समेत अपने गांवों की ओर चल दिए।जब शोर मचा तो प्रशासन ने उनके लिए भोजन की व्यवस्था कराई और संक्रमण फैलने के खतरों के बीच इन मजदूरों को उनके घरों तक छोड़ा गया । इस पलायन ने पूरे देश में कोरोना संक्रमण फैलने की आशंका जगा दी है। राज्य सरकारों की गैर जिम्मेदारी का ये नमूना ठेठ दिल्ली में ही देखने मिला है।

    चीनी वायरस कोरोना के कहर से इन दिनों पूरी दुनिया हलाकान है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे महामारी घोषित किया है।भारत में लगभग एक हजार पचास मरीजों में कोरोना वायरस की पहचान की गई है। देश के विभिन्न अस्पतालों में उनका इलाज किया जा रहा है। इस वायरस के प्रति रोग प्रतिरोधक टीके के विकास के प्रयास चल रहे हैं लेकिन टीके का विकास इतनी जटिल प्रक्रिया है कि उसे तत्काल न तो बनाया जा सकता है और न ही पूरी दुनिया में उसे उपलब्ध कराया जा सकता है। भारत की विशाल आबादी के बीच इसे फैलने से बचाने के लिए आईसीएमआर और देश के विशेषज्ञों ने त्वरित उपाय के रूप में रोग के प्रसार की कड़ी तोड़ने की सलाह दी थी। ये तभी संभव था कि जब 130करोड़ लोगों को उनके घरों में ही रोक दिया जाए। चीन के वुहान राज्य में फैले कोरोना संक्रमण के बाद चीनी सरकार ने लगभग तीन अरब लोगों को अपने घरों में कैद करने का विशाल अभियान चलाया था। चीनी पुलिस और सेना ने लोगों को घरों तक सीमित करने के लिए सख्त कवायद की तब जाकर संक्रमण का फैलाव रोका जा सका। विश्व के अन्य देशों से सबक लेकर ही भारत में संपूर्ण लॉक डाऊन का फैसला लिया गया। इससे विश्व के कई देशों की तरह भारत की अर्थव्यवस्था को भी भारी क्षति पहुंचने का अंदेशा है, इसके बावजूद कोई अन्य विकल्प नहीं था।

    अमेरिका, इटली, जर्मनी,आस्ट्रेलिया ने चीन की स्थितियों से सबक नहीं लिया। नतीजतन इन देशों में कोरोना संक्रमण से मरने वालों की तादाद चीन के आंकड़ों को भी पार कर गई। भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने डाक्टरी सलाह को पूरे देश में लागू किया और संक्रमण दो चरण पार होने के बाद भी तीसरे चरण में नहीं पहुंच पाया है। तीसरे चरण का मतलब है कि महामारी घर घर तक फैल जाए। यदि ऐसा हो जाता तो भारत की स्वास्थ्य सुविधाएं अचानक अस्पताल पहुंचने वाली मरीजों की भीड़ से नहीं निपट सकती थीं। वैसे भी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिहाज से भारत दुनिया में 120 देशों के पीछे खड़ा है। भारत में सरकारी ढांचे की विफलताओं के बाद बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य को उद्योग का दर्जा देकर निजी निवेश से स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार के प्रयास किए गए हैं लेकिन इससे भारत के लोगों पर दोहरा बोझ पड़ रहा है। उन्हें इलाज निजी अस्पतालों में करवाना पड़ता है जबकि सरकारी तंत्र को पालने के लिए अपनी जेब से मोटी रकम खर्च करनी पड़ती है। मूर्खतापूर्ण ढंग से किए गए घटिया सरकारीकरण जिस तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा उसे देखकर कोरोना संकट ज्यादा भयावह नजर आने लगा है। अमीर देशों की स्वास्थ्य सुविधाएं जब कोरोना का कहर आते ही चरमरा गईं तो भारत में तो इसकी भयावहता का अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। मजदूरों के कल्याण का नारा देने वाली केरल की कम्युनिस्ट सरकार हो या कांग्रेस और कम्युनिस्ट की संकर सोच से उपजी दिल्ली की आप पार्टी सरकार सभी ने मजदूरों को उकसाकर वोट कबाड़ने की जो रणनीति अपनाई उससे कोरोना संकट का खतरा बढ़ गया है। इन सरकारों को लगा कि यदि कोरोना संकट बढ़ा तो हमारे अस्पताल आबादी के बोझ को सहन नहीं कर पाएंगे इसलिए भविष्य की बदनामी से बचने के लिए उन्होंने मजदूरों को खदेड़ना शुरु कर दिया। जब औद्योगिक विकास के लिए उन्हें मजदूर मिल रहे थे तो वे खुश थे क्योंकि इससे उन्हें राज्य में टैक्स अधिक मिलता था। लेकिन जब महामारी के आसन्न संकट का बोझ आता दिखा तो उन्होंने मजदूरों से सबसे पहले पिंड छुड़ाया। इस तरह की अमानवीयता दिल्ली की वो आप पार्टी सरकार कर रही है जिसने मोहल्ला क्लीनिक के नाम पर पूरे देश में स्वास्थ्य सुविधाओं का ढिंडोरा पीटा था। अब जबकि केन्द्र सरकार ने नाराजगी व्यक्त करते हुए वरिष्ठ अधिकारियों पर गैर जिम्मेदारी से काम करने की वजह से उन्हें हटाना शुरु कर दिया है तब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल टीवी पर आकर लोगों से अपने ही घरों में रुके रहने की अपील कर रहे हैं। भारत की राजनीति का ये अंधियारा पक्ष है जिसकी वजह से भारत आज भी छोटी सोच वाले विकासशील देश से आगे नहीं बढ़ पा रहा है। महामारी जैसे संकट से निपटने के लिए राज्यों की सरकारें यदि देश की नीति के साथ कदमताल नहीं कर पा रहीं हैं तो फिर इन सरकारों को बर्खास्त करके वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाना चाहिए ताकि देश को महामारी के प्रकोप से होने वाली क्षति से बचाया जा सके।

  • धन प्रबंधन से पहले देखें कुंडली

    धन प्रबंधन से पहले देखें कुंडली

    पं. अशोक पंवार मयंक

    धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष ये चार पुरुषार्थ हैं। अर्थ और काम भौतिक हैं,तथा मनुष्यों को इनकी आकांक्षा होना स्वाभाविक है। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा जो धन प्राप्ति की आकांक्षा न रखता हो। धन के बिना जीवन नीरस हो जाता है। जिनके पास धन होता है वे मजे में रहते हैं,एवं अपने नाती पोतों के लिए धन जोड़ते चले जाते हैं। धन हर एक कार्य कर देता है। ज्योतिष की दृष्टि से हम इसी विषय की चर्चा यहां करेंगे।

    धन स्थान का कुंडली में दूसरा घर होता है,एवं प्राप्ति(लाभ) स्थान 11 वें भाव को कहते हैं।जहां लाभ स्थान उत्तम होगा वहीं धन की बचत होगी। खर्च की स्थिति जानने के लिए कुंडली में 12 वां घर होता है। इसके साथ ही अन्य घरों का महत्व संक्षेप में निम्नानुसार है।

    1.लाभ स्थान में स्वग्रही गुरु और साथ में नेप्च्यून हो तो जातक की(जिसकी जन्म कुंडली हो) आय उत्तम होती है।

    2.लाभ स्थान में गुरु अकेला हो, तो जातक की आय स्थिर होती है। अगर गुरु के साथ शुक्र, बुध अथवा ग्यारहवें भाव का स्वामी हो तो आवक थोड़ी होती है।

    3.ग्यारहवें भाव में गुरु चंद्र की युति हो तो वारिसनामा मिलता है,तथा गुरु व चतुर्थेश हो, तो भी जातक धन संपत्ति का वारिस बनता है।

    4.धनेश, भाग्येश, लाभ स्थान में हो तो जातक की आवक बहुत होती है। अगर धनेश भाग्येश साथ में होकर 11 वें स्थान में हो तो जातक अत्यंत धनवान होता है।

    5.धनेश, भाग्येश में से कोई भी एक ग्रह लाभस्थान में हो और दूसरा बारहवें भाव में हो तो जातक की आर्थिक स्थिति सामान्य होती है।

    6.ग्यारहवें भाव पर बारहवें भाव के स्वामी की दृष्टि पड़े तो साधारण आय होती है।

    7.लाभेश छठे, आठवें या बारहवें स्थान में हो तो दूषित होने के कारण जातक की आर्थिक आय मध्यम होती है।

    8.ग्यारहवें स्थान का स्वामी शत्रु स्थान में या नीच का हो तो जातक की आय घटती है।

    9.ग्यारहवें भाव का स्वामी दशम भाव में हो तो आवक कम रहती है।

    10.ग्यारहवें भाव का स्वामी बारहवें भाव में हो या दशम भाव में हो तो भी आय से खर्च अधिक होता है।

    उपर्युक्त दस बिंदुओं में से आय कैसी होगी ये दर्शाया गया है। बचत बैंक बैलेन्स होगा या नहीं इसकी जानकारी इस प्रकार है।

    1.धन स्थान से आवक नहीं देखी जाती लेकिन इसे धन संचय या बैंक बैलेन्स का स्थान कहते हैं। धन स्थान के साथ बारहवें भाव की स्थिति का अध्ययन करना जरूरी है। क्योंकि बारहवां भाव जातक का है। आवक-जावक में से जो पैसा बचता है वही बचत होती है।

    2.धन स्थान में व लाभ स्थान में ये विशेषता है कि गुरु के साथ शुक्र की युति हो तो धन संचय में बाधा आती है। धन स्थान में गुरु हो और शुक्र लाभेश या भाग्येश होकर पड़ा हो अथवा धन स्थान में गुरु लाभ भाव में भाग्येश होकर पडा हो तो धन संचय में खूब वृद्धि होती है।

    3.अगर धन स्थान में भाग्य स्थान का परिवर्तन योग हो तो जातक की आय का काफी हिस्सा खर्च होता है। और उसके बाद भी काफी धन अनुपयोगी पड़ा रहता है।

    4.धन स्थान का स्वामी गुरु हो और कुंडली में शनि की युति हो अथवा धन स्थान का स्वामी शनि हो और गुरु की युति हो तो उसकी संपत्ति कोई दूसरा नहीं ले सकता। ऐसा जातक धन इकट्ठा करने वाला होता है।

    5.धन स्थान का स्वामी पराक्रम में हो तो जातक के पास पराक्रम द्वारा कमाया धन होता है यानि वह स्वप्रयत्नों से धन लाभ पाता है।

    6.धन स्थान और पराक्रम स्थान के स्वामी का एक दूसरी राशि में परिवर्तन हो और इस परिवर्तन योग में मंगल ग्रह हो तो जातक के पास धन रहता है और वह कंजूस प्रवृ़त्ति का होता है।

    7.धन स्थान का स्वामी कुंडली में पांचवे स्थान में पड़ा हो और शुक्र ग्रह युक्त हो या उस पर शुक्र ग्रह की दृष्टि पड़ रही हो या मित्र क्षेत्री हो तो उस व्यक्ति के पास अटूट संपदा होने में कोई शक नहीं है।

    8.अगर लाभ स्थान में सारे ग्रह पड़े हों एवं आसपास कोई ग्रह नहीं हो तो जातक की आय बहुत कम रहती है। या यूं कहें कि कामचलाऊ के अलावा धन नहीं रहता।

    9.धनस्थान का स्वामी कुंडली में लग्न चतुर्थ, सप्तम, दशम यानि केन्द्र में शुभ या मित्र ग्रह की युति में हों तो धन अच्छा जुड़ता है।

    धन स्थान व लाभ स्थान के विचार के बाद अब भाग्य स्थान बाकी रह गया है। भाग्य के बगैर सब अधूरा रहता है। अगर आपकी कुंडली में भाग्य स्थान बली न हो तो न तो धन रहेगा न लाभ तो आईए भाग्य के विषय में थोड़ा जान लें।

    सर्व प्रथम तो ये जानना आवश्यक है कि भाग्य स्थान का संबंध मात्र धन संपत्ति से नहीं होता इंसान के व्यक्तित्व,यश कीर्ति से भी इसका संबंध है।

    नवम भाव को भाग्य भवन कहते हैं। भाग्य का अर्थ धनवान होना नहीं होता बल्कि भाग्य शब्द का क्षेत्र बहुत बड़ा है। भाग्य के बल पर सब कुछ मिलता है, ये बात ध्यान में रखनी चाहिए।

    1 . मेष लग्न हो व भाग्य भाव में गुरु व चंद्र की युति हो तो जातक के धार्मिक होने के साथ साथ बाहिरी संबंध उचित होंगे। व माता सुख उत्तम रहता है। विद्या उत्तम होने के साथ साथ पुत्रवान होकर सुख भोगता है। यदि भाग्य भाव में शुक्र हो तो धन संपत्तिवान व स्त्री सुख उत्तम पाता है।

    स्त्रियों से लाभ भी मिलता है। अगर मंगल हो व शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ रही हो तो जातक शारीरिक सुख व आयु लाभ पाने वाला होता है। भाईयों का सहयोग उत्तम रहता है,लेकिन मातृ सुख से वंचित भी करता है। इस भाव में चंद्र, गुरु, शुक्र, सूर्य ही उपयुक्त रहते हैं। बाकी सभी ग्रह कुछ न कुछ अनिष्ट कारक ही रहते हैं।

    2.यदि जातक की वृषभ लग्न व नवम भाव में बुध पड़ा हो तो वह धन संपत्तिवान होगा। धन व्यापारिक लेखन, या बुद्धि के कार्यों से अर्जित करने वाला होगा। शनि राज्य से लाभ दिलाने वाला होगा। इसी प्रकार जातक को शुक्र भी स्व प्रयत्नों से नाना माया से या कला के क्षेत्र से अर्थालाभ दिलाने वाला होगा। इन ग्रहों की दृष्टि नवम भावपर पड़ रही होगी तो भी ये लाभ दिलाएगा।

    3,मिथुन लग्न वालों का भाग्य अधिकतर कष्टप्रद ही रहता है। व बहुत धीमी गति से आगे बढ़ते हैं क्योंकि अष्टम भाव मकर होता है। अतःशनि बाधक ग्रह बन जाता है।

    4.कर्क लग्न वाले भाग्यशाली ही होते हैं। यदि गुरु भाग्य भाव में होता तो वह स्वराशि मीन का होता है, व लग्न पर उच्च दृष्टि डालता है। सप्तम पराक्रम भाव पर शत्रु दृष्टि पड़ती है,लेकिन अशुभ फल न मिलकर शुभ फल ही मिलता है। पंचम भाव पर मित्र दृष्टि पड़ने से ये पंचम भाव को अमृतपान कराता है। अतःविद्या – पूजा आदि उत्तम होते हैं। शारीरिक सौंदर्य भी बढ़ता है लेकिन अक्सर इन्हें गंजेपन का भी रोग होता है। ये उच्च पदों पर भी आसीन होते हैं। यदि सूर्य गुरु की युति रही तो राजदूत न्यायाधीश राजनीति में प्रमुख एवं धनवान होते हैं। यदि शुक्र रहा तो इनके पास अटूट धन रहता है। व प्रारंभ से अंत तक धनाड्य रहते हैं। लाभ भी बहुत होकर वाहन अधिपति होते हैं।

    5 सिंह लग्न वालों के लिए सूर्य या सूर्य बुध की युति अति उत्तम होती है। ये जातक भी बिंदु क्रमांक चार के विवेचन के समान रहते हैं।

    6.कन्या लग्न वालों के लिए शुक्र या चंद्र या फिर शुक्र चंद्र की युति उत्तम रहकर धनवान बनाती है।

    7.तुला लग्न वालों के लिए बुध ग्रह उत्तम रहता है। बुध यदि नवम में हो या बारहवें भाव में हो तो भाग्य उत्तम रहता है। उसे बाहर के व्यापार विदेश या व्यापारी बाहिरी संबंधों से लाभ होता है। शनि भी अति शुभ माना जाएगा।

    8.वृश्चिक लग्न वालों को गुरु व चंद्र उत्तम बलशाली रहेंगे या इन ग्रहों की दृष्टि पड़ने पर भी भाग्य बलवान माना जाएगा।

    9.धनु लग्न वालों को गुरु व सूर्य भाग्यशाली ग्रह होकर भाग्य को बढ़ाने वाले होंगे। मंगल व चंद्र ग्रह भी शुभ रहेंगे।

    10 मकर लग्न वालों को शनि व बुध की स्थिति उत्तम भाग्यवर्धक रहेगी। शुक्र भी उत्तम फलदायक होंगे।

    11.कुंभ लग्न वालों को शनि शुक्र की स्थिति लाभप्रद होने के साथ भाग्यवर्धक रहेगी।

    12.मीन लग्न वालों को गुरु व मंगल की दृष्टि शुभ रहेगी। कहते हैं कि बिन भाग्य के सब सून ,भाग्यहीन व्यक्ति दरिद्र के समान होता है एवं भाग्य का होना धन संपत्ति में चार चांद लगा देता है।

  • परिवारवाद पर संघवाद की विजय का शंखनाद

    परिवारवाद पर संघवाद की विजय का शंखनाद

    शिवराज सिंह चौहान के चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही ये भी साबित हो गया है कि मध्यप्रदेश में संघवाद ने परिवारवाद को परास्त कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी की अब तक की विकासयात्रा में ये सबसे महत्वपूर्ण चरण था जिसमें कभी कांग्रेस के सुपरस्टार राजनेता रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सारी बाधाएं तोड़कर सत्ता की कमान उसे थमाई है। ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस के जिन 22 पूर्व मंत्रियों और विधायकों ने आगे बढ़कर कुंठित कमलनाथ सरकार के षड़यंत्रों को धराशायी किया वह परिवारवाद पर सबसे प्रभावी प्रहार साबित हुआ। कमलनाथ के नेतृत्व वाली कमलनाथ सरकार ने लगभग पंद्रह महीने के शासनकाल में वैमनस्यपूर्ण तरीके से प्रदेश के विभिन्न वर्गों को प्रताड़ित किया वह अब आपातकाल की तरह एक कलंकित इतिहास बन गया है। कांग्रेस के नेतागण भाजपा के बहाने जनता को गालियां देते रहे उससे मध्यप्रदेश का माहौल कलहपूर्ण बन गया था। आपराधिक वारदातों के बढ़ते आंकड़े और आर्थिक दुर्दशा से मुक्ति का ये स्वप्न इतनी जल्दी साकार हो सकेगा इसका अनुमान शायद भाजपा के शीर्ष नेताओं को भी नहीं था।

    शपथ लेने से पहले विधायक दल ने जब शिवराज सिंह चौहान को अपना नेतृत्व सौंपा तब शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि मैं कभी अपनी मां समान पार्टी को कलंकित नहीं होने दूंगा। साथ में उन्होंने दुहराया कि अब हम मिलजुलकर विकास का नया इतिहास लिखेंगे। उनके हर भाषण में ज्योतिरादित्य सिंधिया और कांग्रेस के विधायकों के प्रति आभार का भाव था। शायद शिवराज सिंह चौहान की यही विनम्रता उन्हें अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों के बीच अजात शत्रु बनाती है। यही वजह है कि पिछले विधानसभा चुनावों में माफ करो महाराज का नारा देने वाली शिवराज की भाजपा आज ज्योतिरादित्य सिंधिया से टकराव की वजह नहीं बन रही है।

    कांग्रेस के नेताओं को अब भी भरोसा नहीं हो पा रहा है कि उन्होंने अपनी ही कुल्हाड़ी से कैसे अपने ही पैरों को लहू लुहान कर डाला है। दरअसल पिछले पंद्रह सालों के दौरान राजनीति जो करवट ले चुकी है उसका अनुमान बुजुर्ग हो चुके कमलनाथ नहीं लगा पाए थे। उनका राजनीतिक दंभ ये समझने को तैयार ही नहीं था कि किसी विभागीय मंत्रालय की कार्यप्रणाली और प्रदेश के मुखिया की कार्यप्रणाली में भारी अंतर होता है। प्रदेश के मुखिया से लोगों की अपेक्षाएं होती हैं जिन्हें गैरकानूनी तबादले पोस्टिंग की कमीशनखोरी के अलावा भी अन्य साधनों से पूरा किया जा सकता है। कांग्रेस आज भी राबिनहुड की शैली की कबीलाई संस्कृति से बाहर नहीं आ सकी है। नेताओं के इर्द गिर्द बना कांग्रेस का संगठन केवल चंद हजार कार्यकर्ताओं की जरूरतें पूरी करने तक ही सिमटा रहा। जबकि प्रदेश के साढ़े सात करोड़ लोग अपनी अपेक्षाओं के लिए सरकार के प्रति उम्मीदें लगाए बैठे रह गए।

    कमलनाथ ने सरकारी तंत्र को अपनी आय का स्रोत मान लिया था।उनका सारा ध्यान सरकारी तंत्र को निचोड़ने में ही लगा रहा। शिवराज सिंह चौहान की विनम्रता को मूर्खता बताने वाले कमलनाथ ने सरकारी तंत्र को जूते की नोंक पर ऱखकर सरकार चलाने का जो प्रयोग किया वह चंद दिनों में ही धराशायी हो गया। अफसरशाही ने कमलनाथ के निर्देशों पर सौ फीसदी अमल शुरु कर दिया और जनहितैषी योजनाओं की समीक्षा सख्ती से कर डाली। नतीजा ये हुआ कि जो योजनाएं जनता के लिए सहारा बनी हुईं थीं वे दूर की कौड़ी साबित होने लगीं। परिवारवाद के एजेंट के रूप में कमलनाथ को गांधी परिवार ने मध्यप्रदेश भेजा था। वे सोनिया गांधी के विश्वसनीय थे इसलिए उन्होंने जागीरदार की तरह पार्टी हाईकमान के लिए चंदा वसूली शुरु कर दी। उनका सारा ध्यान प्रदेश के उस सरकारी तंत्र पर था जिसे राज्य के खजाने से हर महीने तीन हजार दो सौ करोड़ रुपए वेतन के रूप में दिए जाते हैं। अफसरों को टारगेट दिए गए कि उन्होंने टैक्स वसूली का टारगेट पूरा नहीं किया तो उन्हें वेतन नहीं दिया जाएगा। कई विभागों में वेतन बांटने का विलंब शुरु हो गया दो तीन महीनों का वेतन लंबित रहना सामान्य बात हो गई थी। यही वजह है कि कमलनाथ सरकार बड़ी तेजी से अलोकप्रिय हो गई।

    शिवराज सरकार ने पंद्रह सालों के प्रयोग के बीच ढेरों ऐसी योजनाएं चालू कीं थीं जिनसे आम जनता को सत्ता में भागीदार बनाया गया था। बेशक वे योजनाएं उत्पादक नहीं थीं लेकिन बाजार व्यवस्था को संतुलित बनाने में उनका योगदान अतुलनीय था। शिवराज की निवृत्तमान सरकार की सबसे बड़ी असफलता ये थी कि इतना लंबा अंतराल सत्ता पर काबिज रहने के बावजूद वह उत्पादकता नहीं बढ़ा पाई थी।इस वजह से हर महीने खजाने पर बोझ बढ़ता जा रहा था। पूर्व वित्तमंत्री राघवजी भाई ने आय को बढ़ाने का जो चमत्कार कर दिखाया था उससे ढेरों योजनाएं शुरु हो पाईं थीं। राघवजी भाई इससे अधिक योजनाएं चालू करने के पक्षधर नहीं थे क्योंकि इससे राज्य का वित्तीय प्रबंधन बिगड़ सकता था। उनकी विदाई के बाद शिवराज ने खजाने की चाभी जयंत मलैया को सौंप दी। मलैया उदार साबित हुए लेकिन इससे खजाना लुट गया। उनकी खजाना खाली है वाली प्रतिक्रिया को कमलनाथ ने सूत्र वाक्य बना लिया और अपने पूरे कार्यकाल में जन प्रतिनिधियों की मांग को शांत करने के लिए खजाना खाली है का राग अलापते रहे। जबकि उनके स्वयं के जिले छिंदवाड़ा में योजनाओं की बाढ़ लग गई। लगभग एक सौ तेरह हजार करोड़ रुपए की योजनाएं अकेले छिंदवाड़ा जिले में शुरु कर दीं गईं। इससे विधायकों में असंतोष फैल गया।

    ज्योतिरादित्य से कोटे से सत्ता में आए विधायकों की बैचेनी की वजह भी यही थी कि अफसर शाही उनकी बात ही नहीं सुन रही थी। कमलनाथ ने अफसरों की तैनाती की जवाबदारी दिग्विजय सिंह को ही सौंप दी थी। यही कहा जाने लगा था कि पर्दे के पीछे सरकार दिग्विजय सिंह चला रहे हैं। ये सच भी था, मंत्रालय से लेकर जिलों तक की कमान दिग्विजय़ सिंह के इशारे पर ही दी गई थी। उनके बेटे जयवर्धन सिंह को जिस तरह नगरीय प्रशासन विभाग देकर कमाई के अवसर दिए गए उससे विधायकों में असंतोष बढ़ गया। चुनाव के दौरान बेरोजगार युवाओं को चार हजार रुपए का बेरोजगारी भत्ता देने का झूठा वादा दिग्विजय सिंह की चतुराई भरी चाल थी जबकि सत्ता में आने के बाद वह योजना चालू ही नहीं की जा सकी।इतनी शर्ते लगाईं गईं कि योजना का लाभ युवाओं को दिया ही नहीं जा सकता था। जबकि निजी कमाई के लिए शहरों के मास्टर प्लान धड़ाधड़ लाए गए और शहरों में अराजकता का माहौल बना देने की तैयारी शुरु हो गई। यदि ये तख्तापलट न की जाती तो शहरों के रहवासी इलाकों में आम नागरिकों का रहना भी दूभर हो जाता।

    कमलनाथ सरकार ने जिस तरह राज्य को चंद परिवारों तक समेटने की मुहिम चलाई उसका लाभ उनके चंद उद्योगपति मित्रों को तो मिलना शुरु हो गया लेकिन आम जनता के पाले में सिर्फ प्रताड़ना आई। जनता को लूटकर परिवार को संवारने की ये शैली लोकतांत्रिक लगे इसके लिए कर्जमाफी और सस्ती बिजली का शिगूफा इस्तेमाल किया गया। इन योजनाओं का शोर तो बहुत हुआ लेकिन आम जनता फायदे का इंतजार करती रही। जिन आदिवासियों को बरगलाकर कमलनाथ ने उनकी बहुलता वाली सीटें जीतीं थीं जल्दी ही उनकी भी समझ में आ गया कि वे ठगे गए हैं। ब्राह्रमणों को बरगलाकर जिस सवर्ण समाज पार्टी ने शिवराज के बयान कोई माई का लाल आरक्षण समाप्त नहीं कर सकता को बदनामी का हथकंडा बनाया था उन्हें भी जल्दी अहसास हो गया कि उन्होंने कितनी बड़ी गलती की है।

    दरअसल आजादी की चाहत में देश ने कांग्रेस के जिस परिवारवाद को स्वीकार किया था उसे हटाने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी है। कांग्रेस जिस धर्मनिरपेक्षता की आड़ में टुकड़े टुकड़े गेंग बनकर समाज को विभाजित करती रही वहीं संघ समाज को जोड़ने की मुहिम चलाता रहा। संघ के करोड़ों कार्यकर्ताओं ने एक राष्ट्र के विचार के लिए अपने जीवन के स्वर्णिम बसंत न्यौछावर कर दिए हैं। इसके बाद भी उन्हें लांछन और बदनामियां ही झेलनी पड़ीं। बरसों के प्रयासों के बाद जब ज्योतिरादित्य जैसे युवा सितारे ने भाजपा में शामिल होकर संघ के सामाजिक सौहार्द्र के विचार पर अपनी मुहर लगाई है तब जाकर भारतीय जनता पार्टी को वैचारिक विजयश्री का आश्वासन मिल सका है। जो लोग ज्योतिरादित्य को गद्दार या अवसरवादी बताकर लांछित कर रहे हैं उन्हें जल्दी ही समझ में आ जाएगा कि लोगों को जोड़ने का ये विचार कैसे सबल राष्ट्र का प्रणेता साबित होता है। कोई लीडर कैसे समाज को हितकारी लक्ष्यों की ओर प्रवृत्त कर देता है।फिलहाल तो शिवराज सरकार को अपने पुराने ढर्रे से बाहर निकलकर अपनी पार्टी की मौलिक शैली का उद्घोष करना होगा। यही शैली संघवाद की विजयपताका साबित होगी।

  • छिंदवाड़ा मॉडल का फटा ढोल

    छिंदवाड़ा मॉडल का फटा ढोल

    कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाने के लिए कांग्रेस के जिन सयाने रणनीतिकारों ने छिंदवाड़ा मॉडल का ढोल पीटा था वे अब कहां हैं। जब छिंदवाड़ा माडल की कहानियां सुनाते कमलनाथ की कुंठित सत्ता का ढोल सरे चौराहे फट गया है तब वे सलाहकार जनता के सामने आने का साहस क्यों नहीं कर रहे हैं। कांग्रेस की सरकार के पतन के लिए असली जिम्मेदार तो वे ही हैं जिन्होंने कमलनाथ की उद्योगपति वाली छवि गढ़ने का काम किया था। नेहरू गांधी परिवार के कारिंदे के रूप में कमलनाथ बेहद असफल मुख्यमंत्री साबित हुए हैं। उन्होंने दस जनपथ के लिए रसद पानी जुटाने में भले ही सफलता पाई हो लेकिन मध्यप्रदेश की धरती पर वे एक लुटेरे शासक के रूप में ही पहचाने जाएंगे।सारी योजनाएं छिंदवाड़ा ले जाने और अन्य क्षेत्र के विधायकों के लिए खजाना खाली बताने की उनकी कंजूसी ने विधायकों को बेचैन कर दिया था। आते ही तबादलों और पोस्टिंग का जो ओछा कारोबार उन्होंने शुरु किया उसने प्रदेश भर में कोहराम मचा दिया।कांग्रेस की पिछली सरकारों ने ही अनाप शनाप नौकरियां बेचकर मध्यप्रदेश के वित्तीय प्रबंधन का कबाड़ा निकाला था। बाद की भाजपा सरकारों ने भी उसी माडल की लीक पकड़ ली। शिवराज सरकार के सलाहकार दिग्विजय सिंह और मुकेश नायक जैसे कांग्रेसी ही रहे हैं। लूट का जो साम्राज्य शिवराज सिंह चौहान की हवा हवाई शासनशैली की वजह से पनपा उससे प्रदेश में असंतोष को जगह बनाने का अवसर मिला था। शिवराज सिंह चौहान बेहद सफल कार्यकर्ता और प्रचारक रहे हैं।उन्होंने जनता के बीच लोकप्रियता भी पाई। इसके विपरीत वे कई मायनों में असफल भी साबित हुए। उन्होंने वोटरों की खेती की। तालियां बजवाने के लिए खैरातें बांटीं लेकिन वे प्रदेश को आत्मनिर्भर नहीं बना सके। इसे गरियाते कमलनाथ तो और भी फिसड्डी साबित हुए।उन्होंने आते ही जो झांकी पेली कि लोगों को लगा अब प्रदेश की समस्याओं का समाधान हो जाएगा। प्रदेश के मिलावटखोरों के खिलाफ शुद्ध के लिए युद्ध करते कमलनाथ का स्वागत किया गया लेकिन वे व्यापारियों के लुटेरे साबित हुए। उनके कार्यकाल में व्यापारियों से जो लूट खसोट की गई वह दर्दनाक थी। इसका सीधा असर प्रदेश की जनता पर पड़ा। व्यापारियों ने जरूरी सामानों की कीमतें बढ़ा दीं। अफसरों ने वसूली बढ़ा दी लेकिन मिलावटखोरी जस की तस रही। शहरों के मास्टर प्लान में अराजकता फैलाने के लिए भी कमलनाथ सरकार को कभी माफ नहीं किया जा सकेगा। रहवासी इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियां शुरु कर देना, अवैध संपत्तियों को रिश्वत लेकर वैध बना देना कमलनाथ के कारिंदों के लिए बाएं हाथ का खेल था। जिस तरह मंत्रालय के पांचवे तल पर कमलनाथ का गोपनीय आफिस चलता था उसे देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता था कि यहां कोई न कोई गलत काम जरूर हो रहा है। जनता से छिपाकर आखिर वे कौन सी जनता का भला करना चाह रहे थे। उनके कार्यकाल के फैसलों की विधिवत समीक्षा होनी चाहिए।इनमें से बहुत से फैसले निरस्त करने पड़ेंगे। प्रदेश की कानून व्यवस्था की स्थिति हो या वित्तीय व्यवस्था सभी की समीक्षा नए सिरे से करनी होगी तब जाकर पटरी से उतरी प्रदेश की गाड़ी को सीधा किया जा सकेगा। छिंदवाड़ा माडल का फटा ढोल तो सबने देख लिया है अब उस ढोल की पोल भी लोगों को दिखानी पड़ेगी। प्रयास करना होगा कि भविष्य में कोई राजनीतिक दल या सत्ता के दलालों का कोई गिरोह मध्यप्रदेश की सत्ता पर काबिज न हो सके। इसके लिए मौजूदा दलालों की फौज का सफाया करना जरूरी होगा।

  • इस कंबल परेड से सुधार की उम्मीद बेकार

    इस कंबल परेड से सुधार की उम्मीद बेकार

    रैगिंग की भाषा में बोला जाए तो इन दिनों मुख्यमंत्री कमलनाथ की कंबल परेड चल रही है। कांग्रेस के विधायकों ने सरकार की जो धुलाई की है उससे पार्टी के बड़े बड़े दिग्गजों की सांसें भी फूल गईं हैं। भाजपा तो अंधे के हाथों बटेर लग जाने से प्रसन्न है। कमलनाथ सरकार जितने दिनों तक इस बगावत को काबू में नहीं कर पाएगी उतने दिनों तक ये धुलाई जारी रहेगी। मुख्यमंत्री कमलनाथ कह रहे हैं कि हम सदन में पहले भी बहुमत साबित कर चुके हैं लेकिन अब ये हालत हो गई है कि कोई भी ऐरागैरा आकर बहुमत साबित करने का चैलेंज देने लग जाता है। दरअसल ये कमलनाथ सरकार की अलोकप्रियता का उद्घोष है जो वे स्वयं कर रहे हैं। सलाहकारों की बात मानकर उन्होंने विधायकों को कथित तौर पर बंधक बनाए रखने के मुद्दे पर पुलिस में प्राथमिकी दर्ज नहीं कराई है। यदि वे ऐसा कर देते तो साफ उजागर हो जाता कि उनकी सरकार अल्पमत में आ गई है। आज दिग्विजय सिंह ने जिस तरह बैंगलौर जाकर बागी विधायकों से मिलने के लिए धरना दिया उसे देखकर कहा जा सकता है कि बगावत के मैनेजर भाजपा के रणनीतिकारों की सलाह पर नहीं चल रहे हैं। दिग्विजय सिंह को विधायकों से न मिलने देने का फैसला बड़ा बचकाना था। यही वजह है कि दिग्विजय सिंह विधायकों को बंधक बनाए रखने का शोर मचा रहे हैं। उनका कहना है कि वे विधायकों को बंधक बनाए रखने के मुद्दे पर कर्नाटक हाईकोर्ट जाएंगे। कमलनाथ सरकार के तमाम रणनीतिकार और अदालत में पैरवी कर रहे वकील पुष्पेन्द्र दुबे भी कह रहे हैं कि विधायकों को बंधक बनाकर रखा गया है। यदि आज दिग्विजय सिंह को विधायकों से मिलने का मौका दे दिया जाता तो खुद ब खुद साबित हो जाता कि विधायक बंधक नहीं हैं। कैमरों के सामने सार्वजनिक मुलाकात में विधायक हाथ जोड़कर दिग्विजय सिंह से वे सभी बातें कह सकते थे जो वे पहले अपने वीडियो जारी करते वक्त कह चुके हैं। वे इस मुलाकात के मंच का उपयोग करके सारी दुनिया को सुना सकते थे कि वे कमलनाथ सरकार के साथ नहीं हैं,जाहिर है कि विधानसभा के मंच से भी ज्यादा बड़े कैनवास पर कमलनाथ सरकार की कंबल परेड बेहतरीन तरीके से की जा सकती थी। ये तो आकलन हम लोग बाहर बैठकर लगा सकते हैं कि बगावत के रणनीतिकार गलती कर रहे हैं लेकिन हमारा आकलन हमेशा सही नहीं हो सकता। जिन विधायकों ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में बहादुरी भरा फैसला लिया और सरकार को नसीहत देने का कदम आगे बढ़ाया निश्चित रूप वे किसी न किसी रणनीति पर काम जरूर कर रहे हैं। सिंधिया समर्थक विधायक आज भी कह रहे हैं कि महाराज सिंधिया जो कहेंगे हम वही करेंगे। वे दरअसल देख चुके हैं कि जिन आर्थिक सुधारों से ज्योतिरादित्य प्रदेश का काया कल्प करना चाहते थे उन्हें कमलनाथ की पुरातनपंथी सरकार लागू नहीं कर रही थी। गोस्वामी तुलसी दास कह गए हैं कि मुखिया मुख सो चाहिए खानपान को एक पाले पौसे सकल अंग तुलसी सहित विवेक। कमलनाथ इस कसौटी पर फिसड्डी साबित हुए हैं। उन्होंने प्रदेश के विधायकों, जन प्रतिनिधियों, पत्रकारों, नागरिकों से दूरी बनाई और मनमाने ढंग से बजट खर्च करने का अभियान चलाया। जनता को हित वंचित करके अपने सहयोगियों पर बेइंतहा संसाधन लुटाए और अपनी स्थिति मजबूत की। उम्र के असर से उनकी दृष्टि कमजोर हो गई है। उन्होंने अकेले छिंदवाड़ा में लगभग तेरह हजार करोड़ के निर्माण कार्य स्वीकृत करवा लिए और अन्य विधानसभा क्षेत्रों को रीता छोड़ दिया। यही वजह है कि साल भर से चेताने के बावजूद जब कमलनाथ जी की आदतें नहीं बदलीं तो उन्होंने विद्रोह जैसा फैसला किया। आजादी की लड़ाई में भी जब अंग्रेजों ने लूट का शोषणवादी तंत्र चलाया था तब भारत में विद्रोह की चिंगारी भड़की और दावानल बनी थी। आज के हिंदुस्तान में कमलनाथ की कूढ़ मगज सोच को आखिर कैसे झेला जा सकता था। जिस इंस्पेक्टर राज को नरसिम्हाराव की सरकार के कार्यकाल में डाक्टर मनमोहन सिंह दफन कर चुके थे उसे कमलनाथ दोबारा थोपने में जुटे थे। शुद्ध के लिए युद्ध के नाम पर व्यापारियों का शोषण और लूट का जो दुष्चक्र कमलनाथ सरकार ने चलाया उससे प्रदेश भर में जन आक्रोश भड़क गया था। तबादलों के माध्यम से पोस्टिंग का खुला खेल जिस तरह से साल भर में देखा गया उसने प्रदेश में अराजकता की स्थितियां निर्मित कर दीं हैं। बढ़ते अपराधों ने प्रदेश की शांति व्यवस्था भंग कर दी है। इसके बावजूद कमलनाथ दंड और दमन का दुष्चक्र चलाने में जुटे हैं। इतनी तगड़ी धुलाई के बाद भी उनकी भाषा शैली नहीं बदली है। पिछले दिनों जब उनसे पूछा गया कि ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा है कि कर्मचारियों और नागरिको से किए वादे पूरे नहीं हुए तो वे सड़क पर उतर जाएंगे तो कमलनाथ ने लगभग दुत्कारते हुए कहा, तो उतर जाएं। इस तरह की भाषा शैली और रवैये के बाद भी यदि कांग्रेस के विधायक चुप थे तो ये उनकी भलमन साहत थी। भाजपा में तो इस तरह के बर्ताव को कैडर की वजह से झेला जा सकता है लेकि कांग्रेस में जहां लीडरशिप आधारित संगठन हो वहां इस तरह के तुर्रमखां को कब तक बर्दाश्त किया जा सकता था। आज सारा दारोमदार ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों के रुख पर निर्भर कर रहा है। यदि वे अपने फैसले पर कायम रहते हैं तो कोई वजह नहीं कि कमलनाथ सत्ता से अपदस्त कर दिए जाएंगे। भाजपा के साथ शामिल होकर ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रदेश को एक अग्रगामी विकास की दिशा दे सकते हैं। लेकिन अब तक ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है। कांग्रेस के भीतर की ये बगावत यदि सफल हो जाती है तो ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रदेश के कद्दावर नेता के रूप में उभर जाएंगे। महल से अदावट रखने वाले भाजपाई ये नहीं चाहते। जाहिर है कि प्रदेश की आधुनिक आवश्यकताओं की कसौटी पर फेल हो चुके शिवराज सिंह चौहान भी नहीं चाहते कि भाजपा में कोई उनसे बड़ा लीडर बनकर उभरे। इसके बाद सत्ता की हांडी टूटने की आस लगाए बैठे नरेन्द्र सिंह तोमर, कैलाश विजयवर्गीय, नरोत्तम मिश्रा, भूपेन्द्र सिंह, गोपाल भार्गव भी नहीं चाहते कि गोविंद राजपूत और तुलसी सिलावट जैसे धाकड नेता उनके सामने चुनौती के रूप में उभरें। इन हालात में भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व को हस्तक्षेप करना पड़ेगा। यदि भाजपा का अंदरूनी महाभारत थम जाता है और ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा के नेताओं का साथ पाकर इस बगावत को सफल बना लेते हैं तो फिर प्रदेश को अबकी बार भाजपा और कांग्रेस की संकर सरकार मिलेगी जो प्रदेश के हितरक्षण के लिए नए कीर्तिमान स्थापित करेगी। ज्योतिरादित्य सिंधिया की बुआ वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे सिंधिया संगठन को किस सीमा तक बांधने में सफल होती हैं बगावत की सफलता उसी से आकी जाएगी। कमलनाथ तो इस बगावत को कुचलने की पूरी तैयारी कर रहे हैं। फिलहाल उन्हें सत्ता जाने की संभावनाओं से डरे हुए कांग्रेस विधायकों का समर्थन मिल रहा है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से यदि पलड़ा भाजपा के पक्ष में झुकता है तो कमलनाथ सरकार का अल्पमत संकट और भी ज्यादा गहरा हो जाएगा। देखना होगा कि ये बगावत सफल होती है या फिर आत्मसमर्पण की चौखट चूमती है। दोनों ही स्थितियों में कमलनाथ इस कंबल परेड से कोई सबक लेंगे इसकी संभावना फिलहाल तो नहीं दिखती।

  • कमलनाथ की कुर्सी बचाने में जुटे गोपाल रेड्डी

    कमलनाथ की कुर्सी बचाने में जुटे गोपाल रेड्डी

    भोपाल,17 मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)। तेज तर्रार आईएएस गोपाल रेड्डी को प्रदेश का प्रशासनिक मुखिया बनाकर मुख्यमंत्री कमलनाथ अपनी सत्ता के विरुद्ध हुई बगावत को काबू में करने का जतन करने में जुट गए हैं।रेड्डी के पद संभालते ही जेल विभाग ने पुरानी जेल के परिसर और भेल दशहरा मैदान को अस्थायी जेल में बदलने का आदेश जारी कर दिया है। ये तैयारी आने वाले दिनों में होने वाले किसी संभावित विद्रोह को देखते हुए की जा रही है। कमलनाथ यदि सुप्रीमकोर्ट और विधानसभा को धता बताते हुए कुर्सी छोड़ने पर राजी नहीं होते हैं तो संभावित जनांदोलनों पर नियंत्रण करने के लिए ये तैयारियां काम आ सकेंगीं।

    जेल विभाग के अवरसचिव अजय नथानियल ने विधानसभा के कार्यकाल के दौरान 13 अप्रैल तक ये नए जेल परिसर मान्य किए हैं। सरकार के खिलाफ होने वाले संभावित आंदोलनों में यदि अधिक लोग शामिल होते हैं तो उन्हें जेल पहुंचाने के बजाए इन परिसरों में ही निरुद्ध किया जा सकेगा। पुलिस और प्रशासन के बीच तालमेल जमाते हुए इस फैसले में प्रभारी पुलिस मुखिया रहे राजेन्द्र कुमार की सलाह की भूमिका मानी जा रही है।

    डीजी प्रशासन अकादमी बनाए गए सुधीरंजन मोहंती का कार्यकाल समाप्त होने के लगभग दो हफ्ते पहले की गई रेड्डी की नियुक्ति की वजह समझने में लोग सफल हो पाएं इससे पहले रेड्डी ने अपनी प्रशासनिक क्षमताओं पर पूरी तरह अमल शुरु कर दिया है।वे अपने त्वरित और दूरगामी फैसलों के लिए जाने जाते रहे हैं।

    सुधीरंजन मोहंती को इस महीने होने वाले रिटायरमेंट के बाद विद्युत नियामक आयोग का चेयरमेन बनना है। मुख्य सचिव पद पर रहते हुए ये नियुक्ति फिलहाल संभव नहीं थी। भले ही मुख्यमंत्री आदेश दे दें पर उसके ऊपर अमल तो मुख्य सचिव को ही करना पड़ता है। सरकार के खिलाफ उठी बगावत और अस्थिरता की स्थिति में यदि कमलनाथ सरकार बर्खास्त कर दी जाती है या सदन में बहुमत खो देती है तो फिर विद्युत नियामक आयोग की नियुक्ति का फैसला लटक सकता था। मुख्य सचिव के लिए ओएसडी बनाए जा चुके गोपाल रेड्डी की नियुक्ति भी नए हालात में खटाई में पड़ सकती थी।

    गोपाल रेड्डी ने पदभार संभालते ही अपने अनुकूल प्रशासनिक कसावट भी शुरु कर दी है। वे 1985 बैच के आईएएस हैं और लंबे समय से प्रदेश की प्रशासनिक जमावट से परिचित रहे हैं। समाज के सभी वर्गों से उनका जुड़ाव रहा है। ऐसे में माना जा रहा है कि कमलनाथ सरकार के खिलाफ उठ रहे असंतोष के स्वरों को वे संतुष्टि की आवाजों में बदल सकेंगे। इसके बावजूद फिलहाल कमलनाथ से नाराजगी के स्वर बहुत तेज हैं और उन्हें काबू में रखने के लिए राजदंड का प्रयोग करने की जरूरत भी पड़ रही है और नए मुखिया ने इस भूमिका पर अमल भी शुरु कर दिया है।

  • सत्ता के बूट से नहीं कुचली जाएगी ये बगावत

    सत्ता के बूट से नहीं कुचली जाएगी ये बगावत

    भोपाल,17मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)।मुख्यमंत्री कमलनाथ की कांग्रेस सरकार विदाई की बेला में है। उनकी पार्टी के ही 22 विधायकों ने अपनी सरकार के खिलाफ बगावत कर दी है। सरकार का प्रयास है कि उन विधायकों को डरा धमकाकर या पुटियाकर अपने खेमे में वापस लौटा लिया जाए और सरकार बचा ली जाए। बगावत को कुचलने के लिए कमलनाथ ने मुख्यसचिव और डीजीपी बदलकर प्रशासन और पुलिस के जेबी इस्तेमाल की तैयारी की है।इस तानाशाही भरे रवैये के बावजूद कमलनाथ की विदाई पल प्रतिबल और भी ज्यादा बलवती होती जा रही है। जैसे जैसे वे बगावत को कुचलने का षड़यंत्र रच रहे हैं उसका प्रतिरोध भी बढ़ता जा रहा है। सत्ता के इस दुरुपयोग से उन्होंने कांग्रेस के ही अन्य विधायकों की सहानुभूति भी खो दी है। सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद तो कमलनाथ के तमाम प्रयास नाकाफी साबित हो जाएंगे।

    बैंगलौर में बैठे विधायकों ने बाकायदा प्रेस वार्ता करके खुद के बंधक बनाने की बात झूठी साबित कर दी है। उन्होंने कहा कि हम अपनी मर्जी से सरकार के खिलाफ इस्तीफा देकर आए हैं और दुबारा चुनाव का सामना करने के लिए भी तैयार हैं। कमलनाथ सरकार जनहित के कार्यों की उपेक्षा कर रही थी हम इसलिए सरकार का विरोध कर रहे हैं। हमारे नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के काफिले पर जिस तरह सार्वजनिक तौर पर हमला किया गया उसे देखते हुए हमें अपनी सुरक्षा का खतरा है। सरकार हमें तोड़ने के लिए विविध हथकंडे अपना रही है। यदि हमें केन्द्रीय बलों की सुरक्षा दिलाई जाएगी तो हम भोपाल वापस आकर सदन के फ्लोर टेस्ट में भाग लेंगे। मध्यप्रदेश पुलिस सरकार के दबाव में है इसलिए हमें उस पर भरोसा नहीं है।

    सरकार के वित्तमंत्री तरुण भनोट और जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा बार बार कह रहे हैं कि विधायकों को यहां कोई खतरा नहीं है लेकिन कांग्रेस और कमलनाथ को करीब से समझने वाले विधायकों को सरकार के बयानों पर भरोसा नहीं है। दरअसल कमलनाथ ने डीजीपी वीके सिंह को हटाकर विवेक जौहरी को न केवल डीजीपी बना दिया है बल्कि उन्हें दो साल की सेवावृद्धि भी दे दी है। सरकार से उपकृत होने के बाद विवेक जौहरी ने पुलिस के और निजी बाऊंसर्स की सेवाएं सरकार को उपलब्ध कराई हैं। इन टोलियों में संविदा नियुक्ति वाले गुंडों को भी शामिल किया गया है। यही नहीं एक विधायक के नेतृत्व में गुंडों की एक टोली भी सक्रिय है जिसका मार्गदर्शन भोपाल के डीआईजी इरशाद वली कर रहे हैं।

    सरकार के प्रशासकीय नियंत्रण की कमान नए प्रशासनिक मुखिया गोपाल रेड्डी और प्रशासन अकादमी के डीजी बना दिए गए पूर्व सीएस सुधीरंजन मोहंती संभाल रहे हैं। कमलनाथ की जिस हेकड़ी भरी कार्यशैली की वजह से आज कांग्रेस की सरकार संकट में आई है उसके पीछे अफसर शाही का यही खुला दुरुपयोग प्रमुख वजह है। बागी विधायकों का दो टूक कहना है कि मुख्यमंत्री सचिवालय ने चुने हुए विधायकों को बाईपास करके अफसरों के माध्यम से लूट का तंत्र चला रखा है। उनके पास माफिया से मुलाकात के लिए तो समय है पर अपने विधायकों के लिए वक्त नहीं है।जनहितैषी योजनाएं बंद कर दी गई हैं या फिर उनका लाभ आम जनता को नहीं मिल पा रहा है।

    दरअसल जिस तरह से कमलनाथ की कार्यशैली को कांग्रेस के ही विधायकों ने नकार दिया है उससे सरकार अल्पमत में आ गई है। इस बगावत को कमलनाथ अपनी ही शैली में कुचलना चाह रहे हैं जो अब किसी भी तरह संभव नहीं है।कमलनाथ की विदाई तय है। यदि वे सत्ता में बने रहने के लिए गुंडागर्दी का सहारा लेने की कोशिश करेंगे तो मध्यप्रदेश में सत्ता संग्राम का खूनी माहौल बन जाएगा। इतिहास के आधार पर कमलनाथ इस बगावत को संविद सरकार के दौर से तुलना करके देख रहे हैं जबकि इस बार की बगावत ज्यादा परिष्कृत है और केन्द्र में भी एक ऐसी लोकतांत्रिक सरकार है जो किसी तानाशाही को छूट नहीं देगी।

  • महामहिम ने निकाली कमलनाथ की झूठी हेकड़ी

    महामहिम ने निकाली कमलनाथ की झूठी हेकड़ी

    भोपाल,15मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)। प्रदेश में बगावत के बाद अल्पमत में आई कमलनाथ सरकार की सारी हेकड़ी राज्यपाल महामहिम ने मुख्यमंत्री को भेजे अपने पत्र में ही निकाल दी है।उन्होंने कहा है कि विधायकों से प्राप्त जानकारी के अनुसार आपकी सरकार अल्पमत में आ चुकी है इसलिए राज्यपाल के अभिभाषण के तुरंत बाद आप सदन में विश्वासमत हासिल करें। यह कार्यवाही हर हाल में 16 मार्च को शुरु होगी और स्थगित,विलंबित या निलंबित नहीं की जा सकेगी।

    महामहिम लालजी टंडन ने मुख्यमंत्री कमलनाथ को 14 मार्च को लिखे पत्र में कहा है कि आपकी सरकार के 22 विधायकों ने अपने पद त्याग की सूचना विभिन्न माध्यमों से दी है। छह मंत्रियों के इस्तीफे विधानसभा ने भी मंजूर कर दिए हैं। ये स्थिति अत्यंत गंभीर है इसलिए प्रजातांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए आप सदन में विश्वास मत हासिल करें।

    कांग्रेस के पूर्व सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो जाने के बाद कांग्रेस के ही 22 सांसदों ने अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। वे विधायक बैंगलूरु के एक रिसार्ट में रह रहे हैं और वीडियो के माध्यम से उन्होंने पद त्याग की सूचना सार्वजनिक की है। कांग्रेस के कई अन्य मंत्रियों ने भी सुरक्षा की मांग करके सरकार के कामकाज के प्रति नाराजगी व्यक्त की है। इस्तीफा दे चुके जनसंपर्क मंत्री ने आज प्रेसवार्ता के माध्यम से आरोप लगाया कि कांग्रेस के 16 विधायकों को भाजपा ने बंदूक की नोंक पर बंधक बना रखा है। उन विधायकों पर सम्मोहित करने वाला जादू टोना किया गया है।

    इसी के साथ उन्होंने कैबिनेट बैठक में करोना वायरस के कहर की भी चर्चा का उल्लेख किया। कांग्रेस से जुड़े लोगों का कहना है कि होटल में ठहरे दो विधायकों में करोना वायरस से प्रभावित होने के लक्षण मिले हैं इसलिए वे सदन की कार्यवाही थोड़े दिनों के लिए स्थगित करने की मांग करेंगे। कैबिनेट बैठक के बाद सरकार के कई पूर्व मंत्रियों ने दावा किया कि कमलनाथ सरकार सदन में विश्वासमत हासिल कर लेगी। इन बड़बोले नेताओं ने खोखले दावे करते हुए कहा कि सरकार न केवल पांच साल का कार्यकाल पूरा करेगी बल्कि एक और बार सत्ता में आएगी।

    विकास की डींगें हांकते मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनके मंत्रियों की सारी हेकड़ी राज्यपाल लालजी टंडन के इस पत्र से आज निकल गई है। पूर्व वित्तमंत्री तरुण भानोट तो इसके बाद कहते सुने गए कि हमने किसानों के दो लाख तक के कृषि ऋण माफ करने का वादा किया था किसी भी प्रकार के ऋण माफ करने का वादा हमने कभी किया ही नहीं। इसी तरह अन्य वादों की असफलताओं को लेकर पूर्व मंत्रियों ने दबे स्वरों में स्वीकार किया कि सरकार की कई नीतियां अपेक्षाकृत रूप से सफल नहीं हो पाईं हैं। सरकार की नीतियों की असफलता की वजह से ही कांग्रेस के भीतर असंतोष फूटा और उनकी सरकार आज विदाई की दहलीज पर पहुंच गई है। हम मुख्यमंत्री कमलनाथ को उद्योगपति के रूप में प्रचारित किए जाने वाले वादों से प्रभावित हो गए थे जबकि सत्ता में आने के बाद वे सरकारी तंत्र और व्यापारियों की लूट के हथकंडे अपनाते देखे गए।

  • सिंधिया से ठलुए कांग्रेसी और बोगस भाजपाई दोनों खफा

    सिंधिया से ठलुए कांग्रेसी और बोगस भाजपाई दोनों खफा

    भोपाल,14 मार्च,(प्रेस सूचना केन्द्र)। मोदी अमित शाह की जोड़ी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्यसभा में भेजने का फैसला लेकर भारतीय राजनीति के परंपरावादी युग का अंत कर दिया है। इसके साथ ही चंद मुद्दों के इर्द गिर्द चकरघिन्नी बनी राजनीति की इबारतें भी वाशिंग मशीन के ड्रायर में रखे गीले कपड़ों के समान सींलन मुक्त होने लगीं हैं। इस एक अकेले मूव ने न केवल कांग्रेस बल्कि भारतीय जनता पार्टी के भी पिछलग्गू राजनेताओं को हतप्रभ कर दिया है। स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे ने कांग्रेसी राजनीति के शीर्ष दिनों में भी कर्मठ कार्यकर्ताओं की फौज जुटाकर जो संगठन खड़ा किया था वह आज सिफारिशी भाजपाईयों से भर गया है। चौदह सालों के शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में जो भाजपा चमचों की भी़ड़ बनकर रह गई थी वह सिंधिया के आगमन से उत्साहित तो है लेकिन उसमें भी भविष्य को लेकर संशय के स्वर उभर रहे हैं।

    लगभग बीस सालों तक कांग्रेस की राजनीति को शीर्ष मंच पर करीब से देखने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया का राजनीतिक प्रशिक्षण बहुत लंबा रहा है। बचपन से राजघराने में जन्म लेने के बाद आधुनिक राजनीति के पुरोधा स्वर्गीय माधवराव सिंधिया की सफल राजनीति को करीब से देखने वाले ज्योतिरादित्य को जनसेवा का पाठ अपने खानदान से मिला है। उनकी दादी स्वर्गीय विजयराजे सिंधिया ने जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी में बदले एक नए राजनीतिक दल को अपने राजघराने की विरासत से पाला पोसा था। वीर शिवाजी जिस तरह आधुनिक महाराष्ट्र की राजनीति की पहचान रहे हैं। मध्यप्रदेश में यही पहचान आज भी बालाजी बाजीराव पेशवा द्वितीय की कर्मठता से है। परम प्रतापी राजा भोज द्वितीय के शासन की जो सुगंध मध्यप्रदेश के स्मृतिपटल पर आज भी अंकित है उसे चिरस्थायी बनाने का काम बालाजी बाजीराव पेशवा ने किया था। पेशवा ने ही ग्वालियर में सिंधिया वंशजों को सल्तनत सौंपी थी। इसके बाद सिंधिया घराने के कई राजाओं ने उस राजनीति को आगे बढ़ाया।

    राजमाता विजयाराजे सिंधिया इस राजनीतिक गौरव की मशाल लेकर ही राजनीति में आईं थीं। उनके ऐश्वर्य और विरासत से ईर्ष्या करने वाली श्रीमती इंदिरा गांधी ने सिंधिया राजघराने को मटियामेट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लोकतंत्र और स्वाधीनता की दुहाई देकर अंग्रेजों की पिछलग्गू कांग्रेस का नेतृत्व करते हुए श्रीमती गांधी ने भारतीय राजनीति के तमाम ठिए ठिकानों को ध्वस्त करने का अभियान चलाया था। उनके कुछ सिपाहसालारों ने जिस तरह की कहानियां गढ़ीं उस पर अमल करते श्रीमती इंदिरागांधी ने सिंधिया सल्तनत को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। एसपी बनाकर भेजे गए स्वर्गीय अयोध्यानाथ पाठक को लगातार सात गैलेन्ट्री अवार्ड इसी सोच का सबूत हैं। इस दमन चक्र का ही नतीजा था कि चंबल घाटी डकैतों के आतंक से थर्राती रही। श्रीमती विजयाराजे सिंधिया के निधन के बाद भी भारतीय जनता पार्टी ने चंबल में सामाजिक न्याय की बड़ी लड़ाई लड़ी। उमा भारती के नेतृत्व में बनी भाजपा की सरकार तक ये परंपरा जारी रही। शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा ने डकैती उन्मूलन के नाम पर खेती को सिंचित करने का जो अभियान चलाया उससे न केवल चंबल बल्कि धार झाबुआ के आदिवासी अंचल में भी अपराधों का ग्राफ गिरा था।

    इस सबके बावजूद मध्यप्रदेश की राजनीति में आर्थिक विषयों के जानकार नेतृत्व की जरूरत महसूस की जाती रही है। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपनी राजनीतिक पारी शुरु करने से पहले आधुनिक अर्थशास्त्र की जो तैयारी की वह अब तक चलती रही राजनीति में फिट नहीं बैठती है। कांग्रेस की राजनीति तो इसके लिए बिल्कुल ही बोगस है। कांग्रेस गरीबी को संरक्षित करने की जिस राजनीति के तहत समाज को बांटने की विचारधारा लेकर चलती है उससे मध्यप्रदेश कभी गुजरात जैसा या उससे भी आधुनिक राज्य नहीं बन सकता है। दिग्विजय सिंह का बंटाढ़ार शासनकाल रहा हो या फिर शिवराज सिंह चौहान का कर्ज लेकर खैरात बांटने वाला दीर्घ शासनकाल सभी में प्रदेश की जनता की भरपूर उपेक्षा की गई। योजनाओं के नाम पर खैरात बांटकर वोट खरीदने की इस शैली का अंत कभी न कभी तो होना ही था। ये पहल कौन करता। कमलनाथ को उद्योगपति के रूप में प्रचारित करने वाला वर्ग राजनीति की इसी पाठशाला से आता है। बैंकों से कर्ज लेकर घाटे के उद्योग स्थापित करने वाली फर्जी उद्योगपतियों की लाबी इस राजनीति की सूत्रधार है। इस राजनीति से देश को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकानामी बना पाना किसी भी तरह संभव नहीं है।

    देश में धनाड्य राजनीति की इस उड़ान का पायलट कोई आर्थिक विषयों का जानकार ही हो सकता है। भाजपा के प्रवक्ता के रूप में काम करने वाले डायचे बैंक के पूर्व प्रबंध निदेशक जफर इस्लाम ने ज्योतिरादित्य सिंधिया में वे क्षमताएं देखीं और उन्हें भाजपा की राजनीति की तरफ मोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। भाजपा को उनकी दादी राजमाता सिंधिया ने सिंधिया सल्तनत की बागडोर से सींचा था। उनकी बुआएं श्रीमती यशोधरा राजे सिंधिया और राजस्थान की मुख्यमंत्री रहीं वसुंधरा राजे सिंधिया ने इस विरासत को सहेजकर रखा था। यशोधरा जी जब मध्यप्रदेश की उद्योगमंत्री थीं तो उन्होंने विश्व भर में फैले औद्योगिक घरानों को प्रदेश से जोड़ने का सफल अभियान चलाया था। शिवराज सिंह चौहान को संरक्षण देने वाली लाबी को ये पसंद नहीं था और उन्होंने इस अभियान को धराशायी कर दिया।

    कांग्रेस हो या भाजपा दोनों में इंदिरागांधी के बैंकों के राष्ट्रीयकरण वाले अभियान से लूट करने वाले दलालों का वर्चस्व रहा है। इस लाबी को कमलनाथ अनुकूल लगते हैं लेकिन ज्योतिरादित्य खटकते हैं। कांग्रेस की सरकार बनाने में मध्यभारत से लगभग चौबीस विधायकों का साथ रहा है। ज्योतिरादित्य सिंधिया से जुड़े यही विधायक और पूर्व मंत्री आज कमलनाथ सरकार के पतन की वजह बन रहे हैं। मध्यप्रदेश को यदि देश की नई अर्थनीति के साथ कदमताल करना है तो उसे कमलनाथ सरकार से मुक्ति पाना ही होगा। कमलनाथ सरकार के पतन के बाद जो भी नेतृत्व उभरेगा उसमें सिंधिया का असर जरूर रहेगा। ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्यसभा में भेजने के बाद भाजपा चाहे नरेन्द्र सिंह तोमर को प्रदेश की कमान थमाए या फिर उमा भारती या कैलाश विजयवर्गीय को ,शिवराज, नरोत्तम मिश्रा या बीडी शर्मा कोई भी हो ये लीडरशिप प्रदेश में मोदी सरकार की नीतियों को लागू करने में सफल साबित होगी।

    जाहिर सी बात है कि कर्ज आधारित अर्थव्यवस्था की राजनीति की पैरवी करने वाले गमले में उगे राजनेता प्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनता की अपेक्षाओं को अब तक पूरा नहीं कर पाए हैं। कमलनाथ तो छिंदवाड़ा के ही मुख्यमंत्री बनकर रह गए। उनके कार्यकाल में सरकारी क्षेत्र को जिस तरह लूट का अड़्डा बना दिया गया उससे जनता में भारी निराशा है। शिवराज सरकार की सारी कल्याणकारी योजनाओं को बंद करके कमलनाथ जिस सस्ती बिजली का ढिंडोरा पीट रहे हैं वह जनता के लिए मंहगा सौदा है। शिवराज सिंह चौहान की खैराती राजनीति की तरह ये भी मीठा जहर बनकर जनता को लुभा रहा है। जाहिर है कि ऐसे में आर्थिक विकास की मूलभूत राजनीति करने वालों का वर्चस्व बढ़ना इन ठलुओं और बोगस राजनेताओं को भला कैसे रुचेगा। वे भले ही खफा होते रहें लेकिन इतना तो तय है कि मध्यप्रदेश ने एक नई राजनीति की दिशा में अपने कदम बढ़ा लिये हैं। दिग्गी के चमचे इसे गद्दारी कहें या शिवराज विभीषण की उपमा दें लेकिन बदलाव की ये बयार फिलहाल थमने वाली नहीं है।

  • कोरोना वायरस का असर महामारी घोषित

    कोरोना वायरस का असर महामारी घोषित

    दिल्ली,13 मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)। चीन में तबाही मचाने वाला कोरोना वायरस अब पूरे विश्व में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है। चीन से बाहर 122 देशों में कोरोना वायरस के मामलों की पुष्टि हुई है. इन देशों में थाईलैंड, ईरान, इटली, जापान, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं. आइए जानते हैं कि इस वायरस के लक्षण और बचाव के तरीके क्या हैं.

    कोरोना वायरस का संबंध वायरस के ऐसे परिवार से है, जिसके संक्रमण से जुकाम से लेकर सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्या क्या है कोरोना वायरस? कोरोना वायरस का संबंध वायरस के ऐसे परिवार से है, जिसके संक्रमण से जुकाम से लेकर सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्या हो सकती है. इस वायरस को पहले कभी नहीं देखा गया है. इस वायरस का संक्रमण दिसंबर में चीन के वुहान में शुरू हुआ था. डब्लूएचओ के मुताबिक, बुखार, खांसी, सांस लेने में तकलीफ इसके लक्षण हैं. अब तक इस वायरस को फैलने से रोकने वाला कोई टीका नहीं बना है. क्या हैं इस बीमारी के लक्षण? इसके लक्षण फ्लू से मिलते-जुलते हैं. संक्रमण के फलस्वरूप बुखार, जुकाम, सांस लेने में तकलीफ, नाक बहना और गले में खराश जैसी समस्या उत्पन्न होती हैं. यह वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है. इसलिए इसे लेकर बहुत सावधानी बरती जा रही है. कुछ मामलों में कोरोना वायरस घातक भी हो सकता है. खास तौर पर अधिक उम्र के लोग और जिन्हें पहले से अस्थमा, डायबिटीज़ और हार्ट की बीमारी है. क्या हैं इससे बचाव के उपाय? स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय ने कोरोना वायरस से बचने के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं. इनके मुताबिक, हाथों को साबुन से धोना चाहिए. अल्‍कोहल आधारित हैंड रब का इस्‍तेमाल भी किया जा सकता है. खांसते और छीकते समय नाक और मुंह रूमाल या टिश्‍यू पेपर से ढककर रखें. जिन व्‍यक्तियों में कोल्‍ड और फ्लू के लक्षण हों उनसे दूरी बनाकर रखें. अंडे और मांस के सेवन से बचें. जंगली जानवरों के संपर्क में आने से बचें. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सात स्टेप्स विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सात आसान स्टेप्स बताए हैं, जिनकी मदद से कोरोना वायरस को फैलने से रोका जा सकता है और खुद भी इसके इंफेक्शन से बचा जा सकता है.

    भारत सरकार ने भी कोरोना वायरस के लक्षण मिलने पर तत्काल स्वास्थ्य केंद्र पर सूचना देने को कहा है. स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से 24 घंटे चलने वाला कंट्रोल रूम तैयार किया गया है. फोन नंबर 011-23978046 के माध्यम से कंट्रोल रूम में संपर्क किया जा सकता है. इसके अलावा ncov2019@gmail.com पर मेलकर के भी कोरोना वायरस के लक्षणों या किसी भी तरह की आशंकाओं के बारे में जानकारी ली जा सकती है.

    चीन और इटली में सबसे ज्यादा असरचीन और इटली में सबसे ज्यादा असर

    चीन में इस वायरस का बहुत ज्यादा असर पड़ा है. सबसे ज्यादा असर चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है. पहले ही चीन की अर्थव्यवस्था सुस्ती के दौर में है. लगभग 18 साल पहले सार्स वायरस से भी ऐसा ही खतरा बना था. 2002-03 में सार्स की वजह से पूरी दुनिया में 700 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी. इटली में भी अब तक 800 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं.

    क्या आप जानते हैं कि कोरोना वायरस यानी कि क्या आप जानते हैं कि कोरोना वायरस यानी कि Coronavirus disease (COVID-19) बहुत सूक्ष्म लेकिन प्रभावी वायरस है. कोरोना वायरस मानव के बाल की तुलना में 900 गुना छोटा है. आकार में इस छोटे वायरस ने पूरी दुनिया को डरा दिया है. इसका खौफ आज दुनियाभर में दिख रहा है.

  • विचारधारा की कंगाली से डूबती कांग्रेस

    विचारधारा की कंगाली से डूबती कांग्रेस

    भोपाल,12 मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)। ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आने और फिर राज्य सभा भेजे जाने की तैयारी ने देश के तमाम राजनैतिक पंडितों को चकित कर दिया है। अपने समर्थक विधायको के साथ कांग्रेस छोड़ने से मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार संकट में घिर गई है। सरकार को पतन से बचाने के लिए जो डैमेज कंट्रोल के प्रयास किए जा रहे हैं उन पर गौर करें तो साफ तौर पर यही उभरता है कि कांग्रेस ने अपनी हार मान ली है और वह एक लूजर की तरह कुतर्क गढ़ने का प्रयास कर रही है।

    बैंगलोर के रिसार्ट में ज्योतिरादित्य सिंधिया के जिन विधायकों को प्रशिक्षण सत्र में रखा गया है वहां जाकर सरकार बचाने की गुहार लगाने पहुंचे कमलनाथ कैबिनेट के सदस्य जीतू पटवारी ने एक पुलिस अधिकारी से बदतमीजी शुरु कर दी। प्रायोजित कैमरे के सामने की गई इस बहस को जीतू पटवारी से दुर्व्यवहार करना बताया गया। यहां प्रेस वार्ता में दिग्विजय सिंह ने कहा कि विधायकों को बंदी बनाकर रखा गया है ये लोकतंत्र की हत्या है। जबकि उनके कानूनी सहयोगी विवेक तन्खा ने कहा कि विधायकों के अपहरण को लेकर उनकी पार्टी अदालत जाएगी।

    अपना सबसे बड़ा स्तंभ भरभराकर गिर जाने पर सफाई देते राहुल गांधी ने कहा कि ज्योतिरादित्य मेरे साथ पढ़े हैं मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूं। वे अपने भविष्य को लेकर चिंतित हो गए थे इसलिए उन्होंने भाजपा में जाने जैसा कदम उठाया। वहां न तो उन्हें आदर मिलेगा और न ही वे आत्मसम्मान बरकरार रख पाएंगे।

    राजनीति की इस चौपड़ पर भाजपा ने कांग्रेस को न केवल शह दी बल्कि एमपी में उसकी सरकार की नींव खोदकर उसे मात भी दे दी है। जिस विचारधारा की बात राहुल गांधी कह रहे हैं उसे देश की जनता ने बहुत पहले ही छोड़ दिया था। तभी तो देश के कई राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं और केन्द्र में लगातार दूसरी बार जनता ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को दूसरी बार सत्ता में भेजा है। जाहिर है कि उसी कड़ी में ज्योतिरादित्य का कांग्रेस छोड़ना विचारधारा के इसी पतन का उद्घोष बन गया है।

    कांग्रेस की जिस विचारधारा की बात राहुल गांधी कर रहे हैं उसे तो पीवी नरसिम्हाराव की सरकार ने 1991 में ही छोड़ दिया था। तब तत्कालीन वित्तमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने जिस मुक्त बाजार वाली अर्थव्यवस्था को हरी झंडी दिखाई थी उसने कांग्रेस की खैरात बांटने वाली नीति को समाप्त कर दिया था। इंस्पेक्टर राज की समाप्ति की घोषणा करके उन्होंने ये तो बता दिया था कि देश अब नई दिशा में चल पड़ा है। देश के लोगों को पूंजी बनाने में अपना योगदान देना होगा। खैरात के नाम पर देश के गले में मुर्दा बनकर लटकने का दौर खत्म हो गया है। ये बात जरूर है कि कांग्रेस की पुरानी साम्यवादी, समाजवादी छाया वाली मानसिकता,अवसरवाद और अंग्रेजों की गुलामी भरी चापलूसी की सोच की कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार सार्वजनिक रूप से निंदा नहीं की थी। उन्होंने सिर्फ यही कहा कि आने वाले भारत के निर्माण के लिए हमें अब नए मार्ग पर चलना होगा।

    इसके विपरीत राहुल गांधी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के फैसले पर सवालिया निशान लगाते समय उनके उन समर्थक विधायकों मंत्रियों को भी दोषी ठहरा दिया जिन्होंने कांग्रेस की सोच को ठुकराने का फैसला लिया। ऐसा कहकर वे देश के उन करोड़ों लोगों की मानसिकता को भी दोषी ठहरा रहे हैं जिन्होंने भाजपा को सत्ता में भेजकर देश चलाने का अवसर दिया है। एक अपरिपक्व नेता की तरह बचकानी भूमिका निभाते राहुल गांधी ने तो लोकसभा चुनावों के दोरान बदतमीजी की सीमाएं लांघ डालीं थी। उनकी ही शैली की नकल करते हुए कमलनाथ ने मध्यप्रदेश में विधायकों, अफसरों और नागरिकों को दोषी ठहराने की मुहिम चलाई थी। शुद्ध के लिए युद्ध के नाम पर व्यापारियों को दोषी ठहराना, अफसरों के तबादले करके पोस्टिंग में मोटा चंदा लेकर उन्हें अपराधी साबित करना, पत्रकारों को दूसरा धंधा करने की सलाह देकर पूरी पत्रकारिता को कटघरे में खड़ा करना, माफिया के विरुद्ध संग्राम का शोर मचाकर हर उद्यमी को अपराधी बताने जैसी हरकतें कांग्रेस की उस मूल विचारधारा का ही हिस्सा रहीं हैं जिस पर आजादी के बाद से कांग्रेस चलती रही है। गौर से देखें तो अंग्रेजों के विरुद्ध जब देश के सामंतों जमींदारों और राजाओं ने स्वाधीनता संग्राम चलाया था तब अंग्रेजों ने शाक एब्जार्बर के रूप में कांग्रेस को खड़ा किया था। इसी कांग्रेस के हाथों देश की सत्ता सौंपकर अंग्रेजों ने परोक्ष तौर पर सामंतों और राजाओं पर निशाना साधा। बाद में इंदिरागांधी ने रोटी कपड़ा और मकान का स्वप्न दिखाकर मिलावटियों और जमाखोरों पर निशाना लगाया। अस्सी के दशक की उम्र पहुंचे कमलनाथ आज भी उसी फाम्रूले को दुहराकर शासन चलाना चाह रहे थे। जिसे देश और प्रदेश के तमाम लोगों ने ठुकरा दिया है।एमपी के विधायकों और मंत्रियों ने तो खुलकर इस विचारधारा का विरोध किया है। इसके बावजूद राहुल गांधी इसे सही बताकर ज्योतिरादित्य को गलत साबित करने पर तुले हुए हैं।

    देश की आम जनता को विविधता के नाम पर जातियों, वर्गों,संप्रदायों में बांटकर देखने की सोच आज के कारोबारी दौर में कैसे जारी रखी जा सकती है। इसके बावजूद कई बार असफल साबित हो चुकी इस सोच को कांग्रेस जबरिया देश पर लादना चाह रही है।

    राहुल गांधी और उनका दंभ एक पल भी विचार करने तैयार नहीं हैं कि एक साथ देश का बड़ा वर्ग उन्हें क्यों धक्के मारकर सत्ता से बाहर कर रहा है। दरअसल कांग्रेस की विचारधारा मौलिक नहीं थी बल्कि वह समय काल और परिस्थितियों की उपज थी। अंग्रेजों ने कांग्रेस को जिस मकसद के लिए खड़ा किया उसके तहत उसे बड़े लोगों पर हमला करके उन्हें शोषक साबित करना था और गरीब को सहलाकर उसका समर्थन हासिल करना था। इसके लिए जरूरी था कि समर्थन देने वाला बहुसंख्यक वर्ग गरीब ही रहे ताकि ज्यादा से ज्यादा वोट हासिल किए जा सकें। पूंजीवाद ने इस विचारधारा को बदल दिया है। ज्योतिरादित्य का पाली बदलने का वर्तमान फैसला इसी सोच की देन है। देश को गरीबी के दलदल से बाहर निकालने वाले तमाम विचारक आज मोदी सरकार की सोच से सहमत हैं। इसलिए ज्योतिरादित्य सिंधिया के फैसले पर नहीं बल्कि राहुल गांधी की सोच पर आश्चर्य करने की जरूरत है। वे गहरी जड़ता के शिकार हैं और बंदरिया के मृत बच्चे की तरह मर चुकी सोच को गले लगाकर बैठ गये हैं। राहुल सोनिया कांग्रेस की यही जड़ता कांग्रेस के पतन की वजह बन गई है।इसी सोच पर चल रही कमलनाथ सरकार आज अल्पमत में आ चुकी है शेष कांग्रेसी राज्यों में भी यही सोच सरकारों के पतन की वजह बनने जा रही है ये आने वाले समय में साफ नजर आने लगेगा।

  • सरकार या कार्पोरेट की मोहताज नहीं पत्रकार की साख

    सरकार या कार्पोरेट की मोहताज नहीं पत्रकार की साख

    स्व.भुवन भूषण देवलिया की पत्रकारिता आज भी प्रासंगिकःपीसी शर्मा

    भोपाल,8 मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)। स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया जैसे मूर्धन्य पत्रकारों ने सामाजिक जीवन में जो आदर्श प्रस्तुत किए हैं वह पत्रकारिता आज भी प्रासंगिक है। सरकारें या कार्पोरेट की मजबूरियां जो भी हों लेकिन इन सबके बीच प्रतिबद्ध पत्रकार समाज के प्रति अपनी पक्षधरता की मशाल लेकर आगे बढ़ते रहते हैं। पत्रकारों की यही सामाजिक प्रतिबद्धता समाज का मार्गदर्शन करती है और सम्मान पाती है। इस धरोहर को संजोकर रखने वाले नई पीढ़ी के पत्रकार आज आशा की नई किरण बनकर उभर रहे हैं। स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यान माला के अष्टम आयोजन में आज प्रदेश के जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा ने युवा पत्रकार और डिंडोरी में ईटीवी के पत्रकार भीमशंकर साहू को सम्मानित करते हुए ये विचार व्यक्त किए।

    मीडिया ःप्रतिबद्धता और पक्षधरता का सवाल विषय पर माधव राव सप्रे संग्रहालय में आयोजित इस व्याख्यानमाला में प्रमुख वक्ता के रूप में वरिष्ठ पत्रकार श्री नरेन्द्र कुमार सिंह, नागपुर के वरिष्ठ पत्रकार श्री एसएन विनोद,पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर, और कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार श्री कमल दीक्षित ने इस मुद्दे के विविध आयामों पर प्रकाश डाला। उन्होंने माना कि पत्रकार की साख आज भी कायम है लेकिन जिस तरह कार्पोरेट घरानों और सरकारों ने मीडिया संस्थानों के संचालन की बागडोर थाम ली है उसकी वजह से आज की पत्रकारिता भी सवालों के घेरे में आ गई है। पत्रकार और संपादक गण यदि बुद्धिमत्ता से काम करें तो वे समाज के सामने नए आदर्श प्रस्तुत कर सकते हैं।

    प्रमुख वक्ता के रूप में श्री नरेन्द्र कुमार सिंह ने कहा कि आम जनता पत्रकार को निष्पक्ष देखना चाहती है लेकिन जिस तरह से उनकी पक्षधरता की छवि बन रही है उसके चलते आज चैनलों के रिपोर्टरों को अपने लोगो छुपाने पड़ रहे हैं। विचारधारा के आधार पर उन्हें गोदी मीडिया या टुकड़े टुकड़े गेंग शब्दों से लांछित किया जा रहा है। सेलिब्रिटीज पत्रकारों के व्यवहार ने जनता के मन में पूरी पत्रकार बिरादरी के प्रति चिढ़ का भाव पनपा दिया है। इस दौर में हमें प्रयास करना होगा कि पत्रकारिता की पवित्रता प्रभावित न हो। पत्रकारिता का शाश्वत नियम है कि खबरों के तथ्यों से कोई छेड़छाड़ न हो। ऐसा करके हम समाज का सही मार्गदर्शन कर सकते हैं।

    प्रमुख वक्ता के रूप में ही नागपुर से आए वरिष्ठ पत्रकार एसएन विनोद ने कहा कि विश्वसनीयता की कसौटी पर पत्रकारिता पराजित हो चुकी है आज वह अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। जिसे मुख्य धारा की पत्रकारिता कहा जाता है उसके पत्रकारों से यदि चर्चा की जाए तो उनका उथलापन उजागर हो जाता है। पत्रकारिता की साख में आ रही गिरावट की सबसे बड़ी वजह यही है कि कार्पोरेट घरानों और सरकारों ने दोयम दर्जे के पत्रकारों की सहायता से अपना एजेंडा चलाकर पत्रकारिता को बाजारू बना दिया है। संपादक यदि बुद्धिमान है तो वह मीडिया के संचालकों को उचित राय देकर जनहित की खबरों का प्रकाशन या प्रसारण निर्बाध रख सकता है। दरअसल में कोई भी मीडिया संस्थान का संचालक नहीं चाहता कि उसके माध्यम की साख धूल धूसरित हो। यदि संपादक उन्हें तार्किक वजह बताएंगे तो वे कभी मीडिया के दुरुपयोग की इजाजत नहीं देंगे। पत्रकारों ने यदि सत्ता और बाजार के सामने समर्पण कर दिया तो न केवल पत्रकारिता खत्म हो जाएगी बल्कि लोकतंत्र भी जिंदा नहीं रह पाएगा।

    पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि नई पीढ़ी के पत्रकारों के लिए जरूरी है कि वे अपना नजरिया केवल राजनीति के इर्दगिर्द सीमित न रखें। राजनेताओ का फैसला तो जनता कर लेगी। हमें विकास के मुद्दों को अपनी पत्रकारिता का पैमाना बनाना होगा। जिस तरह से सोशल मीडिया के माध्यम से समाज अपनी ऊर्जा व्यर्थ कर रहा है उसे देखते हुए सरकार को देश में तीसरा प्रेस आयोग गठित करना चाहिए जो आज के संदर्भ में पत्रकारिता के ढांचे में मूलभूत सुधार करे। पत्रकारिता की खामियों को बतोलेबाजी से दूर नहीं किया जा सकता इसके लिए हमें संवाद की न्यायिक विवेचना करनी होगी तभी इसे सार्थक बनाया जा सकेगा।

    पत्रकारिता के गुरु कमल दीक्षित ने कहा कि पत्रकारिता को प्रतिबद्धता की ओर मोड़ने से पहले उसे भावनात्मक मुद्दों की रस्सियों से बांधा जाता है। चाहे दलित विमर्श हो या फिर जातिगत भेदभाव की संकरी गलियां,सभी में दिलों को द्रवित करने वाली कहानियां सुनाई जाती हैं। दुष्प्रचार या प्रचार का अस्त्र बनने वाली पत्रकारिता को बचाने के लिए जरूरी है कि पत्रकार तार्किक हों और तथ्यों के आधार पर खबरें लिखें। बस इतना करना ही पत्रकारिता के उद्देश्यों को पूरा कर देगा। जब पत्रकार अपने काम को कैरियर मानने लग जाते हैं तो फिर उन्हें संचालकों के अधिक मुनाफा कमाने वाले सोच की पैरवी करनी पड़ती है। यही एक व्यवसाय है जिसमें आय के तीन स्रोत हैं यदि नैतिकता की लगाम ढीली कर दी जाए तो फिर मुनाफा तो कमाया जा सकता है लेकिन साख नहीं। कई घटनाओं में पत्रकारों ने न्यूज पोर्टल के माध्यम से वैकल्पिकता तलाश ली है। यही वजह है कि आम पाठक का भरोसा भले ही मीडिया संस्थान से डिग रहा हो लेकिन उसकी नजर में पत्रकार आज भी भरोसे का शिलालेख है।

    सवाल जवाब के दौर में वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा ने कहा कि आज की पत्रकारिता के सामने कोई संकट नहीं हैं। मतभिन्नता तो हमेशा से रही है इससे घबराने की कोई जरूरत नहीं है। वक्त के साथ जो चलेगा वही जिंदा रहेगा। आपातकाल के दौरान जिस तरह से पत्रकारिता का दमन किया गया वैसे दुहराव की तो आज कल्पना भी नहीं की जा सकती। पत्रकार यदि तथ्यों की सच्चाई पर टिके रहें तो फिर पत्रकारिता की साख को कोई कमजोर नहीं कर सकेगा।

    स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यानमाला समिति की ओर से सर्वश्री राजेश सिरोठिया, श्री राजीव सोनी, श्री शिवकुमार विवेक, सुश्री अपर्णा दुबे ने अतिथियों को स्मृतिचिन्ह, और तुलसी का पौधा देकर उनका अभिनंदन किया।स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया की धर्मपत्नी श्रीमती कीर्ति देवलिया ने पुण्य आत्मा के स्मरण के लिए सभी आगंतुकों के प्रति भाव प्रवण धन्यवाद ज्ञापित किया। जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा ने स्वर्गीय देवलिया जी के तैल चित्र पर माल्यार्पण किया और उनके कृतित्वों का स्मरण किया। आभार प्रदर्शन वरिष्ठ पत्रकार शिव अनुराग पटैरिया ने किया। आयोजन में शहर के कई गणमान्य अतिथियों ने भी शिरकत की जिनमें डॉक्टर हितेश वाजपेयी, अनिल सौमित्र,राजीव गांधी कालेज के संचालक डॉ.साजिद अली, संजीव शर्मा, राजेश रावत,राकेश भट्ट शामिल थे। आयोजन समिति की ओर से सर्वश्री अशोक मनवानी, डॉअपर्णा एलिया, आशीष देवलिया, अनामिका जोशी, शैलजा आलोक सिंघई ने अतिथियों की आगवानी की। दूरदर्शन के एंकर आदित्य श्रीवास्तव ने कार्यक्रम का संचालन किया।

  • डीएनए जांच में सहयोग देगी पुलिस -डीजीपी राजेन्द्र कुमार

    डीएनए जांच में सहयोग देगी पुलिस -डीजीपी राजेन्द्र कुमार

    भोपाल में नव निर्मित उच्‍च तकनीक प्रयोगशाला में डीएनए जाँच शुरू

    भोपाल, 07 मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)। दृढ़ इच्‍छा शक्ति एवं संकल्‍पबद्ध होकर डीएनए के सभी लंबित सैम्‍पल की जाँच का काम अगले छ: माह के भीतर पूरा करें। इसके लिए तकनीकी स्‍टाफ एवं अन्‍य सुविधाएं मुहैया कराने में पुलिस मुख्‍यालय का पूरा सहयोग मिलेगा। यह बात पु‍लिस महानिदेशक राजेन्द्र कुमार ने एफएसएल वैज्ञानिकों एवं तकनीकी स्‍टाफ को संबोधित करते हुए कही। श्री राजेन्‍द्र कुमार ने यहाँ भदभदा रोड़ स्थित क्षेत्रीय न्‍याया‍लयिक विज्ञान प्रयोगशाला परिसर में नव निर्मित हाईटेक लेबोरेटरी कॉम्‍प्‍लेक्‍स (उच्‍च तकनीक प्रयोगशाला) में डीएनए परीक्षण कार्य का शनिवार को शुभारंभ किया। ज्ञात हो लगभग छ: करोड़ रूपये की लागत से निर्मित इस हाईटेक लेबोरेटरी कॉम्‍प्‍लेक्‍स भवन का लोकार्पण गत 26 फरवरी को मुख्‍यमंत्री द्वारा किया गया था।

          इस लेबोरेटरी के शुरू होने से डीएनए जाँच के क्षेत्र में मध्‍यप्रदेश में नया अध्‍याय जुड़ा है। अब प्रदेश में डीएनए जाँच के लिए अत्‍याधुनिक तकनीक से सुसज्जित दो प्रयोगशालाएँ हो गईं हैं। अभी तक केवल सागर की एफएसएल में ही डीएनए जाँच की सुविधा उपलब्‍ध थी। इस हाईटेक लैब में एनजीएस उपकरण भी लगाया गया है, जो भारत की किसी लैब में पहली बार लगा है। भोपाल में आधुनिकतम उपकरणों के साथ शुरू हुई इस प्रयोगशाला में डीएनए जाँच के साथ-साथ Cow Buffalo meat testing ( गाय एवं भैंस के मांस का परीक्षण) का काम भी होगा। यह लैब शुरू होने से पॉक्‍सो एक्‍ट एवं यौन अपराधों के निराकरण में तेजी आएगी।

          पुलिस महानिदेशक श्री राजेन्‍द्र कुमार ने मध्‍यप्रदेश एफएसएल के निदेशक से कहा कि प्रदेश में जब तक नई अन्‍य लैब शुरू नहीं होतीं तब तक डीएनए सैम्‍पल जाँच की पैडेंसी दूर करने के लिए सागर एवं भोपाल की लैब को 24 घंटे चालू रखने का प्रयास करें। तकनीकी स्‍टाफ की कमी दूर करने के लिए स्‍टाफ का युक्तियुक्‍तकरण किया जाए। उन्‍होंने हिदायत दी कि डीएनए जाँच करने में सक्षम स्‍टाफ को मैदानी स्‍तर से इन प्रयोगशाला में पदस्‍थ करें। साथ ही भरोसा दिलाया अन्‍य जरूरी सुविधाएं मुहैया कराने के लिए पुलिस मुख्‍यालय से हर संभव मदद मिलेगी। पुलिस महानिदेशक के आहृवान पर कार्यक्रम में मौजूद स्‍टाफ ने डीएनए पैडेंसी छ: माह के भीतर निपटाने का संकल्‍प लिया।

    श्री राजेन्‍द्र कुमार ने कहा कि डीएनए जाँच रिपोर्ट एक ऐसा साक्ष्‍य है, जिससे अपराधी को शत-प्रतिशत सजा दिलाई जा सकती है। उन्‍होंने कहा कि लैगिंक अपराधों एवं हत्‍या के प्रकरणों में न्‍यायालय द्वारा डीएनए सैम्‍पल जाँच रिपोर्ट की माँग खासतौर पर की जाती है। इसलिए डीएनए जाँच की गति हमें तेज करनी ही होगी। पुलिस महानिदेशक ने डीएनए जाँच के लिए प्रदेश की लेबोरेटरी में उच्‍च मानक स्‍थापित करने पर भी विशेष बल दिया। साथ ही कहा कि ऐसे पाठ्यक्रम बनाएं, जिनके डिप्‍लोमा व प्रमाण पत्र के आधार पर तकनीकी स्‍टाफ की पूर्ति की जा सके और न्‍यायालय में भी हमारा पक्ष मजबूत हो सके।

    आरंभ में पुलिस महानिदेशक ने दीप प्रज्‍ज्‍वलन कर डीएनए परीक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इस अवसर पर जी अखेतो सेमा अतिरिक्‍त पुलिस महानिदेशक तकनीकी सेवाएं मंचासीन थे। स्‍वागत उद्बोधन मध्‍यप्रदेश एफएसएल के निदेशक हर्ष शर्मा ने दिया। डीएनए लैब के प्रभारी डॉ अनिल कुमार सिंह ने बताया कि मध्‍यप्रदेश डीएनए जाँच में देश भर में अग्रणी है। डीएनए जाँच के आधार पर पिछले लगभग तीन वर्ष में मध्‍यप्रदेश में न्‍यायालय ने 34 मौत की सजाएं सुनाईं है, जो देश भर में सर्वाधिक हैं।

    कार्यक्रम में अतिरिक्‍त पुलिस महानिदेशक रेल श्रीमती अरूणा मोहन राव, अतिरिक्‍त पुलिस महानिदेशक महिला अपराध अन्‍वेष मंगलम, अतिरिक्‍त पुलिस महानिदेशक कल्‍याण विजय कटारिया, अतिरिक्‍त पुलिस महानिदेशक जेएनपीए डी.सी.सागर, अतिरिक्‍त पुलिस महानिदेशक प्रबंध डी.श्रीनिवास राव व अतिरिक्‍त पुलिस महानिदेशक योजना अनंत कुमार सिंह सहित अन्‍य वरिष्‍ठ पुलिस अधिकारी एवं एफएसएल के वैज्ञानिक व अधिकारी मौजूद थे।

  • दिमाग को बीमार करता गांजे का नशा

    दिमाग को बीमार करता गांजे का नशा

    भोपाल,7 मार्च,(प्रेस सूचना केन्द्र)। गांजा या भांग भारत के कमोबेश हर इलाके में प्रयोग किया जाता है। कानूनी रोक के बावजूद ये नशा सभी इलाकों में आसानी से उपलब्ध हो जाता है। इस नशे का इस्तेमाल करने वालों का कहना है कि इन नशे से कोई नुक्सान नहीं होता है। इसके विपरीत हालिया शोधों ने साबित किया है कि गांजे का नशा कई तरह की मानसिक बीमारियों को जन्म दे देता है। इसकी वजह नशे की लत होती है।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़ दुनिया भर में क़रीब डेढ़ करोड़ लोग रोज़ाना गांजे का किसी न किसी रूप में इस्तेमाल करते हैं। यह संख्या किसी भी और ड्रग्स से काफ़ी ज़्यादा है. इसका सबसे ज़्यादा ख़तरा युवाओं में ख़ासकर किशोरों को होता है।

    ताजा शोध बताते हैं कि किशोरों के गांजा इस्तेमाल करने से उनमें डिप्रेशन, शिज्नो फ्रेजिया जैसी मानसिक बीमारियों का ख़तरा बढ़ जाता है। शोध में सामने आया है कि गांजे का सेवन करने से दिमाग़ के दो महत्वपूर्ण न्यूरोट्रांसमीटरों पर असर पड़ता है। ये हैं सेरोटोनिन और नोराड्रेनलीन. ये दोनों दिमाग़ में भावनाओं को, ख़ासकर डर की भावना को नियंत्रित करते हैं।

    कनाडा के जो किशोर बहुत ज़्यादा गांजे का सेवन करते हैं. इससे उनमें डिप्रेशन की शिकायत बढ़ती जाती है।इसके अलावा उनमें डर से जुड़ी भावनाएं बहुत ज़्यादा बढ़ जाती हैं। चिंताजनक तो ये है कि गांजे और शराब का एक साथ सेवन भी बढ़ता जा रहा है। यूरोपीय संघ के ड्रग्स विशेषज्ञ इस नए ट्रेंड की भी खतरनाक मानते हैं। नशे की लत लग जाने के बाद युवा लड़के लड़कियां गांजे का धुआं, बीयर या फिर एक्सेटिसी की गोलियां भी साथ में लेते हैं जो बहुत खतरनाक साबित होता है।

    यूरोपीय संघ में नशाखोरी के मामलों पर निगाह रखने वाले अधिकारी कहते हैं कि ड्रग्ज और अल्कोहल की मिलावट बड़ी समस्या है। ख़ासकर युवाओं में पी कर धुत्त होना और उसके साथ ड्रग्स लेना एक साथ चलता है। ड्रग्स लेने वाले अकसर शराब के भी आदी होते हैं।”

    अगर बढ़ती उम्र में गांजे का सेवन किया जाता है तो मस्तिष्क में सेरोटोनिन की मात्रा कम होने लगती है। इससे भावनात्मक असंतुलन पैदा होता है और नोरेड्रेनलीन की मात्रा दिमाग़ में बढ़ने लगती है जिससे तनाव बढ़ने का जोखिम बढ़ता जाता है या व्यक्ति तनाव की स्थिति का मुक़ाबला ठीक से नहीं कर पाता।

    इसके अलावा गांजे से बना स्कंक बहुत ज़्यादा ख़तरनाक है और इससे शिज्नो फ्रेजिया होने का ख़तरा भी बढ़ जाता है। लंदन के किंग्स कॉलेज में मानसिक रोग संस्थान के शोध में सामने आया है कि स्कंक लेने वालों के मस्तिष्क में टेट्रा हाइड्रो कैनेबिनॉल नाम का रासायनिक पदार्थ बहुत बढ़ जाता है और इससे मानसिक बीमारियां होने का ख़तरा भी बढ़ जाता है।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि “कई नए तरह के उत्पाद बाज़ार में हैं जो बहुत ही आक्रामक तरीक़े से बेचे जाते हैं और अकसर इंटरनेट के ज़रिए. जांच या प्रतिबंधों को अनदेखा करके यह व्यापारी बहुत तेज़ी से काम करते हैं।”

    इसी तरह गांजे के कई अन्य उत्पाद हैं जो स्वास्थ्य पर बुरा असर डालते हैं। अब तक के शोधो से यह भी सामने आया है कि गांजे के पौधे का इलाज में भी इस्तेमाल होता है। कैंसर, एड्स और नॉशिया जैसी बीमारियों में इसका इस्तेमाल होता है, लेकिन ज़्यादा मात्रा में लेने पर इसके प्रभाव बहुत हानिकारक होते हैं क्योंकि टेट्राहाइड्रोकैनेबिनॉल या टीएचएस की ज़रा भी ज़्यादा मात्रा और इसका बार बार सेवन मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरे प्रभाव डालता है। इसीलिए इलाज के लिए जिन दवाओं को संश्लेषित करके बनाया गया है उनमें नशाकारी तत्व टीएचएस की मात्रा कम रखी जाती है।

    कैनेबिस, मैरियुआना या गांजा के नाम से जाना जाने वाला यह पौधा मूल रूप से मध्य और दक्षिण एशिया में पाया जाता है और नशे के अलावा गांजे के अन्य इस्तेमाल अलग अलग समाजों में हज़ारों साल से चले आ रहे हैं। भारत में हिमाचल क्षेत्र का गांजा और भांग अच्छे माने जाते हैं।जबकि मध्यप्रदेश में आंध्रप्रदेश के सीमांत इलाके से गांजे की तस्करी की जाती है। नेपाल में भी मांग उठ रही है कि जब कई यूरोपीय देशों ने इसकी खेती पर से प्रतिबंध हटा दिया है तो वहां भी इसकी खेती को कानूनी निगरानी में किया जाए इससे किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारी जा सकती है।

  • यस बैंक पचास हजार से ज्यादा रकम केवल उधारी पर देगा

    यस बैंक पचास हजार से ज्यादा रकम केवल उधारी पर देगा

    निर्मला सीतारमण- किसी की रकम नहीं डूबेगी

    नई दिल्ली,6 मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)रिजर्व बैंक आफ इंडिया ने यस बैंक से रुपए की निकासी पर पचास हजार रुपए की सीमा तय कर दी है।इससे ज्यादा रकम केवल उधारी पर दी जाएगी। इससे बाजार में अफरातफरी की स्थिति बन गई है। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने इस व्यवस्था को लेकर खाताधारकों को भरोसा दिलाया है कि उनका पैसा डूबने नहीं दिया जाएगा। बैंक के खाताधारकों का पैसा पूरी तरह सुरक्षित है। किसी भी खाताधारक को चिंतित होने की जरूरत नहीं है। रिजर्व बैंक के अधिकारी समस्या का समाधान निकालने में जुटे हुए हैं। ये भी सुनिश्चित किया जाएगा कि इस हालात के लिए दोषी कौन है।

    उन्होंने कहा कि पिछले कुछ महीनों से हम इन हालात पर लगातार नजर बनाए हुए हैं. RBI ने कई कदम उठाए हैं, एटीएम से कैश निकालने की लिमिट तय किए जाने पर निर्मला सीतारमण ने कहा कि मैं आपको बता दूं कि स्वास्थ्य, विवाह और अन्य आपातकालीन मुद्दों के लिए अतिरिक्त राशि की आवश्यकता को पूरा करने के लिए कदम उठाए गए हैं।

    इस बीच आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा कि हमने 30 दिनों के लिए यह लिमिट लगाई है. जल्द ही आरबीआई यस बैंक को संकट से निकालने के लिए तेजी से कार्रवाई करेगा। आरबीआई गवर्नर ने कहा, ‘आपको बैंक को समय देना होगा, प्रबंधन द्वारा उठाए जाने वाले जरूरी कदम को उठाने की कोशिश करनी होगी और उन्होंने कोशिश की. जब हमने पाया कि यह कोशिश काम नहीं कर रहा तो आरबीआई ने हस्तक्षेप किया.’

    भारतीय रिजर्व बैंक ने बृहस्पतिवार को नकदी संकट से जूझ रहे निजी क्षेत्र के यस बैंक के निदेशक मंडल को भंग करते हुए उस पर प्रशासक नियुक्त कर दिया है. इसके साथ ही बैंक के जमाकर्ताओं पर निकासी की सीमा सहित इस बैंक के कारोबार पर कई तरह की पाबंदियां लगा दी गई हैं. केंद्रीय बैंक ने अगले आदेश तक बैंक के ग्राहकों के लिए निकासी की सीमा 50,000 रुपये तय की है. फिलहाल यह रोक 5 मार्च से 3 अप्रैल तक लगी रहेगी. बैंक का नियंत्रण भारतीय स्टेट बैंक के नेतृत्व में वित्तीय संस्थानों के एक समूह के हाथ में देने की तैयारी की गई है. आरबीआई ने देर शाम जारी बयान में कहा कि यस बैंक के निदेशक मंडल को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया गया है और भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के पूर्व मुख्य वित्त अधिकारी (सीएफओ) प्रशांत कुमार को यस बैंक का प्रशासक नियुक्त किया गया है.

    इससे करीब छह माह पहले रिजर्व बैंक ने बड़ा घोटाला सामने आने के बाद शहर के सहकारी बैंक पीएमसी बैंक के मामले में भी इसी तरह का कदम उठाया गया था. करीब 15 साल पहले शुरू हुआ यस बैंक काफी समय से डूबे कर्ज की समस्या से जूझ रहा है. इससे पहले दिन में सरकार ने एसबीआई और अन्य वित्तीय संस्थानों को यस बैंक को उबारने की अनुमति दी थी.

    इसका अंदाजा इसस भी लगाया जा सकता है कि पिछले 15 महीनों में निवेशकों को 90 फीसदी तक का घाटा लग चुका है. सितंबर 2018 में इसका मार्केट कैपिटलाइजेशन 90 हजार करोड़ रुपये था, जो घटकर 9000 करोड़ रुपये बच गया है.

    यस बैंक से निकासी पर लिमिट के ऐलान के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ बैंकों के शेयरों में जोरदार उछाल दर्ज हुआ. केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 10 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के विलय की मंजूरी दे दी है. यह विलय एक अप्रैल से प्रभावी होगा. इससे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के शेयर 16 प्रतिशत तक की छलांग लगा गए. वहीं, दूसरी ओर सरकार द्वारा भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की अगुवाई वाले बैंकों के समूह को यस बैंक के अधिग्रहण की मंजूरी की खबरों के बीच निजी क्षेत्र के बैंक का शेयर 27 प्रतिशत तक चढ़ गया.

  • आबादी बढ़ी नहीं माफिया को खुश करने ले आए नया मास्टर प्लान

    आबादी बढ़ी नहीं माफिया को खुश करने ले आए नया मास्टर प्लान

    भोपाल,05 मार्च,(प्रेस सूचना केन्द्र)।भोपाल का विजन डाक्यूमेंट बताकर जारी किया गया नया मास्टर प्लान भू माफिया और ठेकेदारों की लाबी में उत्साह की वजह बन गया है। बजट से पहले कमलनाथ सरकार इसे अपना नवाचार बताकर इसे हर जिले और निकायों तक जारी करने की तैयारी कर रही है। जबकि दिग्विजय सिंह इसे लोकसभा चुनावों के दौरान जनता से किया गया अपना वादा पूरा करना बताकर वाहवाही लूटने का प्रयास कर रहे हैं। इस उछलकूद के बीच हकीकत ये है कि 1995 में जिस मास्टर प्लान को वर्ष 2005 के लिए घोषित किया गया था उसे शहर की आबादी 20 लाख होने तक के लिए पर्याप्त बताया गया था जबकि अभी 2020 तक भी शहर की आबादी 18 लाख नहीं हो पाई है इसके बावजूद नया मास्टर प्लान जारी कर दिया गया है।

    नगरीय प्रशासन मंत्री जयवर्धन सिंह ने आज भोपाल के मिंटो हाल में जो 2031 तक का प्रारूप जारी किया है उसमें अभी ये तय नहीं हो पाया है कि आधारभूत ढांचे के विकास के लिए आवश्यक धनराशि कहां से आएगी और उसे समयबद्ध रूप से कब तक पूरा किया जा सकेगा। सरकार जमीन के जिस मिश्रित भूमि उपयोग का ढिंढोरा पीट रही है वो दरअसल अराजकता और माफिया की मिलीभगत का ज्वलंत उदाहरण है। नगर तथा ग्राम निवेश संचालनालय के नगर निवेशकों का कहना है कि बीस मीटर चौड़ी सड़कों के रहवासी उपयोग की जमीनों को इस नए प्लान के अनुसार कमर्शियल किया जा सकेगा। जबकि जिन लोगों ने रहवासी इलाके में जमीनें खरीदकर मकान बनाए थे इस नियम से उनकी शांति छिन जाएगी और उनके घरों के आसपास व्यावसायिक आपाधापी शुरु हो जाएगी। नगर निवेश के नियमों के मुताबिक हर विकास प्लान में रहवासी इलाके के नजदीक व्यावसायिक उपयोग के लिए जमीन आरक्षित की जाती है। उसका रहवासी इलाके पर कोई प्रभाव भी नहीं पड़ता है, जबकि इस मास्टर प्लान में भू माफिया की गैरकानूनी गतिविधियों को संरक्षण देने के लिए बेजा छूट दी जा रही है।

    मध्यप्रदेश भूमि विकास नियम 2012 की धारा 9-10-11 के अनुसार जो लोग अनुमति लिए बगैर निर्माण कर रहे हैं या निर्माण कर चुके हैं वे सभी अवैध गतिविधियों के भागीदार होंगे। जिन्होंने भवन अनुज्ञा का पालन नहीं किया है उनके निर्माण अवैध हैं और शासन के राजस्व को क्षति पहुंचाने की मंशा के कारण ढहाए जाने योग्य हैं। इसके बावजूद नगर तथा ग्राम निवेश विभाग के अफसरों की मिलीभगत से उनके विरुद्ध कार्रवाई नहीं की गई है।

    नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम 1973 में साफ निर्देशित किया गया है कि जो व्यक्ति भूमि उपयोग के विरुद्ध निर्माण कार्य करेगा उसे सक्षम अधिकारी के निर्देश पर अर्थदंड से दंडित किया जाएगा। इस अपराध के लिए आरोपी को जेल भेजने तक का प्रावधान है। यही वजह है कि नगर तथा ग्राम निवेश विभाग के अफसर अतिक्रमणकारियों से सांठ गांठ करके आंखें मूंद लेते हैं। कर्तव्यहीनता करने वाले ऐसे अधिकारियों पर कार्रवाई किए बगैर नया मास्टर प्लान पूरी तरह औचित्य हीन है। अवैध निर्माण के ये कार्य बाकायदा अखबारों में इश्तेहार प्रकाशित करवाकर किए जा रहे हैं। ऐसे निर्माण खरीदे और बेचे जा रहे हैं इसके बावजूद सरकार नए मास्टर प्लान की कहानियां सुनाकर खुद को कर्तव्यनिष्ट बताने का प्रयास कर रही है।

    शासकीय भूमि के रखरखाव की जवाबदारी जिला प्रशासन के अधिकारियों की भी है। कई मामलों में नगर तथा ग्राम निवेश विभाग की ओर से जिला प्रशासन को अनुरोध भी किया लेकिन प्रशासनिक अधिकारी उस पर मौन साधकर बैठ जाते हैं। जब प्रशासनिक अमला शासकीय भूमियों के रखरखाव में असफल साबित हो रहा है तो फिर ऐसे मास्टर प्लानों का औचित्य क्या रह जाता है। जिला प्रशासन के अधिकारियों की लापरवाही के लिए उनके विरुद्ध भ्रष्ट आचरण अधिनियम और भू राजस्व संहिता के नियमों के तहत कार्रवाई न करके सरकार और शासन की ओर से गंभीर अनियमितताएं की जा रहीं हैं। इससे जहां शासन को भू राजस्व की क्षति हो रही है वहीं कई अवैध कालोनियां नागरिकों के लिए कई समस्याओं की वजह भी बनती जा रहीं हैं। इसके बावजूद सरकार मास्टर प्लान को जादुई चिराग साबित करने का प्रयास कर रही है।

    विद्वान राजा भोज ने लगभग 1000 साल पहले जिस भोजताल का निर्माण करवाकर पेयजल का बड़ा स्रोत विकसित किया था मौजूदा सरकारें उनके जल ग्रहण इलाकों में अतिक्रमणों पर भी रोक नहीं लगा पा रहीं हैं। ऐसे ही कई अतिक्रमणकारी सरकार के सहयोगी बने हुए हैं। जिस गति से जलग्रहण क्षेत्र में निर्माण को मंजूरियां मिलती रहीं हैं उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि अगले कुछ सालों में तालाब की मौत हो जाएगी। यही नहीं जल ग्रहण क्षेत्र में बनने वाले निर्माणों की वजह से नागरिकों को कई समस्याओं का भी सामना करना पड़ेगा जो मास्टर प्लान की मूल भावना के विपरीत हैं। जिस तरह जलग्रहण इलाकों में रासायनिक और कीटनाशकों के सहारे खेती की जा रही है उससे पेयजल में कई विषैले तत्व मिलने लगे हैं जिनके निवारण के लिए मास्टर प्लान में कोई प्रावधान नहीं किए गए हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि नया मास्टर प्लान आपाधापी में जारी किया है और इससे भू माफिया को अमीर बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

    नगरीय प्रशासन मंत्री के अनुसार देश का पहला जीआईएस आधारित मास्टर प्लान राजधानी भोपाल में आकार लेगा। नगरीय विकास एवं आवास मंत्री श्री जयवर्द्धन सिंह और जनसम्पर्क मंत्री श्री पी.सी. शर्मा ने मिन्टो हॉल में भोपाल मास्टर प्लान-2031 के प्रारूप का लोकार्पण किया। मंत्री श्री सिंह ने कहा कि मुख्यमंत्री कमल नाथ के नेतृत्व में राज्य शासन ने मात्र 14 माह में भोपाल विकास योजना का प्रारूप जन-सामान्य के समक्ष प्रस्तुत कर दिया है। उन्होंने कहा कि वर्ष 1995 में लागू विकास योजना की अवधि वर्ष 2005 तक थी। वर्ष 2005 से अब तक भोपाल में चली विकास गतिविधियाँ किसी योजना के अनुरूप नहीं हो पाईं। उन्होंने कहा कि भोपाल विकास योजना-2031 के प्रारूप में 1017 वर्ग किलोमीटर योजना क्षेत्र तथा 35 लाख जनसंख्या के मान से प्रावधान किया गया है। प्रारूप में आउटर और इनर रिंग रोड के प्रावधान के साथ अन्य सड़कों के विकास के लिये बेटरमेंट चार्जेस की व्यवस्था की गई है। प्रारूप mptownplan.gov.in पर उपलब्ध है। इस पर नागरिकों से सुझाव आमंत्रित किये गये हैं। सुझाव ऑनलाइन दिये जा सकते हैं।

    इस प्रारूप में राजधानी की प्राकृतिक सुंदरता और जल-संरचनाओं को सुरक्षित और संवर्धित करने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। योजना क्षेत्र के हरित और वन क्षेत्र में वृद्धि राज्य शासन की प्राथमिकता और प्रतिबद्धता है। नगरीय विकास मंत्री ने कहा कि भोपाल की सांस्कृतिक-ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित रखना हमारी प्राथमिकता में शामिल है। इस क्रम में बड़ा तालाब क्षेत्र के विकास के लिये लेक डेव्हलपमेंट अथॉरिटी का गठन किया जायेगा। शासन की मंशा बड़ा तालाब के लेक फ्रंट को जिनेवा या मुम्बई के मरीन ड्राइव के समान विकसित करने की है। उन्होंने स्मार्ट सिटी क्षेत्र में 23.5 हेक्टेयर क्षेत्र में पार्क तथा वन संरचनाएँ विकसित करने के प्रावधान की जानकारी देते हुए बताया कि स्मार्ट सिटी क्षेत्र में लगभग 50 हजार पौधे लगाये जायेंगे।

    श्री सिंह ने कहा कि विकास योजना में युवा पीढ़ी को बेहतर व्यवस्थाएँ देने के लिये एजुकेशनल- यूथ हब बनाने का प्रावधान किया गया है। योजना में स्लम-फ्री भोपाल की अवधारणा पर कार्य किया जायेगा। स्लम के स्थान पर हाईराइज बिल्डिंग बनाई जायेंगी, जिनमें स्लम में रहने वाले लोगों को शिफ्ट किया जायेगा।

    नगरीय विकास एवं आवास मंत्री श्री जयवर्द्धन सिंह ने कहा कि प्रारूप पर जन-सामान्य के सुझाव आमंत्रित किये गये हैं। प्रारूप की विस्तृत जानकारी भोपाल संभागायुक्त कार्यालय, कलेक्टर कार्यालय, नगर निगम तथा कार्यालय संयुक्त संचालक नगर तथा ग्राम निवेश में प्रदर्शित की जायेगी।

    जनसम्पर्क मंत्री श्री पी.सी. शर्मा ने यातायात के दबाव को कम करने के लिये मुम्बई की सी-लिंक के समान भोपाल में बड़े तालाब पर श्यामला हिल्स क्षेत्र से टी-लिंक विकसित करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने सदर मंजिल को संरक्षित कर मिन्टो हॉल के समान विकसित करने का सुझाव दिया। विधायक श्री आरिफ मसूद ने भी सम्बोधित किया।

    प्रमुख सचिव नगरीय विकास एवं आवास श्री संजय दुबे ने विकास योजना की मुख्य विशेषताओं जैसे नगर की बाहरी परिधि की ओर विकास द्वारा जनसंख्या को उस क्षेत्र में बसने के लिये प्रोत्साहित करने, वाहन क्षमता के अनुसार विकास योजना, पार्किंग प्रावधानों में सुधार, ऐतिहासिक तथा पर्यावरण धरोहरों के संरक्षण और प्रीमियम तल क्षेत्र अनुपात द्वारा राजस्व वृद्धि और टीडीआर के माध्यम से राजस्व की बचत संबंधी प्रावधानों पर प्रकाश डाला। संचालक नगर तथा ग्राम निवेश श्री स्वतंत्र सिंह ने मास्टर प्लान की विस्तार से जानकारी दी।

  • जनता से माफी मांगे दिग्विजय सिंह

    जनता से माफी मांगे दिग्विजय सिंह

    भोपाल(प्रेस सूचना केन्द्र)। पिछले दो दिनों से मुख्यमंत्री कमलनाथ और दिग्विजयसिंह ने भाजपा पर विधायकों को बंधक बनाने, लालच देने और सरकार गिराने के जो आरोप लगाए हैं, वे बेहद निंदनीय और घटिया हैं। ये कांग्रेस की उस मानसिकता को प्रकट करते हैं, जिसे लोकतंत्र में स्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐसा करके मुख्यमंत्री कमलनाथ और दिग्विजयसिंह ने न सिर्फ भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं बल्कि उन विधायकों का भी अपमान किया है, जो लाखों लोगों द्वारा चुने गए हैं। दुर्भाग्य से इन विधायकों में कांग्रेस के विधायक भी शामिल हैं। कांग्रेस का झूठ अब पूरी तरह उजागर हो गया है। राज्यसभा चुनाव की आपाधापी में यह शर्मनाक हरकत करने के लिए कांग्रेस के नेताओं को जनता, विधायकों और भाजपा कार्यकर्ताओं से माफी मांगनी चाहिए। यह बात भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष व सांसद श्री विष्णुदत्त शर्मा ने विधायकों द्वारा भाजपा पर लगाए जा रहे आरोपों को गलत बताए जाने पर मीडिया के सामने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कही।

    श्री शर्मा ने कहा कि पिछले एक-सवा साल में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार हर मोर्चे पर असफल रही है। इस सरकार ने जनहित का कोई काम नहीं किया है। सरकार और कांग्रेस के नेता अलग-अलग तरीकों से लूट-खसोट में लगे हुए हैं। सत्ता में आने के पहले जनता से जो वादे किए थे, उनमें से किसी वादे को पूरा नहीं किया। कांग्रेस सरकार ने इन सभी मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने, उसे भ्रमित करने के लिये यह राजनीतिक प्रपंच रचा था, ताकि जनता बाकी सब बातें भूल जाए। लेकिन इस तरह की निंदनीय हथकंडेबाजी को भारतीय जनता पार्टी सहन नहीं करेगी और कमलनाथ सरकार को इसका करारा जवाब देगी।

    प्रदेश अध्यक्ष श्री शर्मा ने कहा कि गोएवल्स ने कहा था कि एक झूठ को स्थापित के लिये 100 झूठ बोलना पड़ता है। कांग्रेस के नेता गोएवल्स की संतानों के गिरोह के रूप में उभरे हैं और उनके इस सिद्धांत को चरितार्थ कर रहे हैं। श्री शर्मा ने कहा कि कांग्रेस की हमेशा यही कोशिश रहती है कि कैसे झूठ बोला जाए। कमलनाथ सरकार झूठ बोलकर ही सत्ता में आई और अब सत्ता में बने रहने के लिये सौ झूठ का सहारा ले रही है। वहीं, पर्दे के पीछे से सरकार चलाने वाले मिस्टर बंटाढार दिग्विजय सिंह लगातार झूठ बोलते रहते हैं।

    श्री शर्मा ने कहा कि जिन विधायकों को प्रलोभन देने के आरोप लगाए जा रहे थे, उन सभी को मुख्यमंत्री आवास पर बुलाकर दबाव डाला गया। इसके बावजूद उन विधायकों का कहना है कि हमें भाजपा की ओर से कोई ऑफर नहीं मिला और न ही कोई हमें लेकर गया था। यह इस बात का प्रमाण है कि दिग्विजय सिंह और कमलनाथ सहित तमाम नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी को बदनाम करने के लिए झूठ फैलाया था। श्री शर्मा ने कहा कि सच्चाई क्या है, इसे कांग्रेस के नेता भी जानते हैं। कमलनाथ के मंत्री उमंग सिंगार ने कहा है कि यह सब कांग्रेसी खेमे में चल रही राज्यसभा जाने की लड़ाई है। सांसद विवेक तन्खा मानते हैं कि कांग्रेस के भीतर भारी असंतोष है, उसी के परिणामस्वरूप यह स्थितियां बन रही हैं, इसलिए मुख्यमंत्री को कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ देना चाहिए। मंत्री प्रदीप जायसवाल कहते हैं कि सरकार जाए या रहे, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। दिग्विजय सिंह के अनुज विधायक लक्ष्मण सिंह ईश्वर से दुआ कर रहे हैं कि मुख्यमंत्री को सद्बुद्धि आ जाए। वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया कहते हैं कि मुझे किसी हॉर्स ट्रेडिंग की जानकारी नहीं है। विधायक रामबाई का कहना था कि मुझे कोई कैसे उठा सकता है? कुल मिलाकर यह पूरा प्रपंच कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई का ठीकरा भाजपा पर फोड़ने के लिये रचा गया था।

    श्री शर्मा ने कहा कि जब से कमलनाथ सरकार बनी है, इसमें लगातार अंर्तद्वंद और अंर्तकलह चल रहा है। प्रदेश की जनता कांग्रेस सरकार को समझ चुकी है। यह सरकार माफियाओं की सरकार है। इन्होंने एक माफिया पर हाथ डाला और बाकी 99 माफियाओं से वसूली की है। भाजपा की सरकार ने कभी ऐसा नहीं किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस एक डूबता जहाज है और सभी इससे भाग रहे हैं। उन्होंने कहा कि दिग्विजय सिंह की वास्तविकता पूरा देश अच्छी तरह से जानता है। वे कितना झूठ बोलते हैं, किस तरह के देशद्रोही बयान देते, जनता को सब पता है। उन्होंने कहा कि दिग्विजयसिंह उन लोगों के साथ खड़े होते हैं, जो देश तोड़ने और आजादी के नारे लगाते हैं।

  • अपना दंगल अपने अखाड़े में

    अपना दंगल अपने अखाड़े में

    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोशल मीडिया से दूरी बनाने के संकेत दिए हैं। अपने फैसले पर उन्होंने देश से मुहर लगाने का अनुरोध भी किया है। मोदी को प्यार करने वाले देश के आम लोगों ने इससे इंकार करते हुए उनसे सोशल मीडिया पर सक्रिय बने रहने का अनुरोध किया है। इतने बड़े पैमाने पर जनसंवाद पहले कभी नहीं देखा गया है। इसके बावजूद प्रधानमंत्री का फैसला कई मायनों में उचित रणनीति पर अमल है। उन्हें अवश्य सोशल मीडिया से दूरी बना लेनी चाहिए।दरअसल पिछले दिनों जिस तरह षड़यंत्र पूर्वक कुछ विदेशी शक्तियों की आड़ लेकर देश के लुटेरे भारत के प्रधानमंत्री पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं उसे देखते हुए इस तरह का फैसला लिए जाने का समय आ गया है। कांग्रेस और वामपंथी राजनैतिक दल बरसों से भारतीय जनता पार्टी पर फासिस्टवादी होने का आरोप लगाते रहे हैं। उन्होंने ये आरोप खुद को लोकतांत्रिक बनाने के लिए गढ़ा है। ये आरोप वे हिटलर और मुसोलिनी की तानाशाही को प्रतीक बनाकर लगाते रहे हैं। इसके विपरीत भारतीय जनता पार्टी देश के लोकतांत्रिक ढांचे में विकसित किया गया राजनीतिक दल है। यहां फैसले सहमति से होते हैं। मोदी जैसे आम आदमी को इस पार्टी में सर्वोच्च हैसियत दी जाती है। जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणा से भारतीय जनता पार्टी ने अपना ढांचा तैयार किया है, उसके सर संघचालक की भूमिका संघ का कैडर निर्धारित करता है। कोई भी सरसंघचालक अपनी व्यक्तिगत इच्छा किसी पर या संघ पर नहीं थोप सकता है। कमोबेश यही हाल भारतीय जनता पार्टी का है। यहां भी कोई व्यक्ति अपनी तानाशाही नहीं चला सकता है। यहां भी फैसले सर्वसम्मति से लिए जाते हैं। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर बार बार ये दुष्प्रचार किया जाता है कि मोदी शाह की जोड़ी ने पार्टी के तमाम नेताओं को दरकिनार कर दिया है और अपना एजेंडा चला रहे हैं। सोशल मीडिया का जो बेलगाम चरित्र है उससे कोई चिरकुट सा व्यक्ति देश को जीवन समर्पित करने वाले राजनेताओं,सेनाध्यक्षों, डाक्टरों या समाजसेवियों की इज्जत तार तार कर देता है। उसे कोई रोकने वाला नहीं हैं। ये काम यदि अज्ञानता से किया जाए तो उन्हें ज्ञान से प्रकाशित किया जा सकता है लेकिन जब षड़यंत्र पूर्वक बार बार एक ही आरोप दुहराया जाता रहे तो निश्चित रूप से उस व्यवस्था को नियंत्रित किए जाने की जरूरत है। भारत में सीएए को लेकर फैसला देश के सर्वोच्च सदनों ने किया। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री बार बार स्पष्टीकरण देते रहे कि इससे भारत के किसी नागरिक को कोई खतरा नहीं है इसके बावजूद षड़यंत्र पूर्वक कई बाहिरी ताकतें भारत के मुसलमानों को गुमराह करने का एजेंडा चला रहीं हैं। देश भर में सीएए को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है और सरकार की जनहितैषी नीतियों को धता बताते हुए झूठा दुष्प्रचार किया जा रहा है। इस षड़यंत्र को विदेशी ताकतों के हाथों में केन्द्रित सोशल मीडिया की मदद से अंजाम दिया जा रहा है। जाहिर है कि इस षड़यंत्र को रोकना होगा और देश के विकास के लिए ये जरूरी हो गया है।चीन में फेसबुक ,ट्विटर, आदि नहीं चलते वहां का सोशल मीडिया प्लेटफार्म वीबो है। चीन में दस तरह के सोशल मीडिया प्लेटफार्म हैं लेकिन उनका नियंत्रण वैश्विक सोशल मीडिया प्लेटफार्मों के पास नहीं है। भारत के एक सौ तीस करोड़ लोगों के बीच संवाद का महामार्ग विकसित करने का क्षेत्र अभी खुला पड़ा है। इस क्षेत्र में बहुत कुछ अनुसंधान किए जाने भी जरूरी हैं। जाहिर है कि प्रधानमंत्री का सोशल मीडिया से मोहभंग एक दिन में नहीं उपजा है। यह सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। भारत का सोशल मीडिया प्लेटफार्म विकसित करके विदेशी ताकतों से भारत के मानस को बचाया जा सकता है। यहां की गई एक झूठी पोस्ट पूरे देश को गुमराह कर सकती है। भारत में चलाई जाने वाली झूठ की फेक्टरी पर तो नियंत्रण संभव है लेकिन विदेशी धरती से बैठकर चलाए जाने वाले झूठ के कारखानों पर रोक लगाना सूचना के इस वैश्विक महामार्ग के बीच बहुत खर्चीला है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ये घोषणा कई मायने रखती है। देश में अपना सोशल मीडिया प्लेटफार्म विकसित करने की दिशा में ये घोषणा महत्वपूर्ण कदम साबित होने वाली है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश की वो शख्सियत हैं जिनका एक विचार पूरे देश के बड़े जनमानस का भाव बदल देता है। देश में मोदी की साख बहुत ऊंची है। इस लिहाज से भारत को एक नए जनांदोलन की दिशा में मोड़ने का ये प्रयास सराहनीय है। जितनी जल्दी हो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस सोशल मीडिया को विदा कहें और अपने देश का नया सूचना अखाड़ा शुरु करने की पहल करें जहां होने वाले दंगल वास्तविक हों हालीवुड की फिल्मों की कहानियों की तरह आभासी नहीं।

  • बंद कमरे की चर्चा पर नहीं लग सकेगा एट्रोसिटी एक्ट

    बंद कमरे की चर्चा पर नहीं लग सकेगा एट्रोसिटी एक्ट

    इलाहाबाद,3 मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनयम, 1989 के तहत कथित अपराध “सार्वजनिक रूप” (पब्लिक व्यू) से होना चाहिए। न्यायमूर्ति राम कृष्ण गौतम ने स्पष्ट किया कि अगर किसी व्यक्ति को एससी/एसटी समुदाय का होने के कारण अपमानित किया जाता है और यह घटना बंद दरवाज़े के भीतर होती है तो इस पर एससी/एसटी अधिनियम लागू नहीं होता।

    यह आदेश जाँच विभाग के जांच अधिकारी केपी ठाकुर के आवेदन पर दिया गया है।उन्होंने अपने आवेदन में विनोद कुमार तनय के ख़िलाफ़ शिकायत की है। ठाकुर ने तनय को अपने कमरे में बुलाकर साक्ष्य की रिकॉर्डिंग को कहा था। तनय के साथ उसका एक सहकर्मी एमपी तिवारी भी था। ठाकुर ने इस पर आपत्ति की और उन्होंने तिवारी से इस प्रक्रिया में व्यवधान नहीं पहुँचाएँ और कमरे से बाहर चले जाएं। इसके बाद, तनय ने आवेदनकर्ता के ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 323, 504, 506 और एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3(1) (X) के तहत मामला दायर किया।

    जब निचली अदालत ने ठाकुर को अदालत में पेश होने को कहा तो उसने इस मामले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि ठाकुर पर जिस अपराध का आरोप लगाया अगया है वह “सार्वजनिक” नहीं है। अदालत ने कहा कि “यह जाँच अधिकारी का चैम्बर था जहाँ प्रेज़ेंटिंग ऑफ़िसर और जाँच अधिकारी मौजूद थे और यह नहीं कहा जा सकता कि वह एक आम स्थल था,” ।

    एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3(1) (X) स्पष्ट कहती है कि “अगर कोई व्यक्ति जो अनुसूचित जाति या जनजाति का सदस्य नहीं है – (x) अगर सार्वजनिक रूप से अनुसूचित जाति या जनजाति के किसी सदस्य को जानबूझकर धमकता है या अपमानित करता है।” इस बारे में गोरिगे पेंटैय्याह बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं अन्य, (2008) 12 SCC 531 का भी हवाला दिया जा सकता है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ‘पब्लिक व्यू’ ऐसी जगह है तहाँ तक आम लोगों की पहुँच है। जब यह किसी घर के अंदर है, तो यह पब्लिक व्यू नहीं हो सकता और इस आधारभूत बात के अभाव में, अधिनियम की धारा 3(1)(X) के तहत यह मामला नहीं बनता।

    अदालत ने इस बात पर भी ग़ौर किया कि शिकायतकर्ता ने पूरी प्रक्रिया के दौरान यह कभी नहीं बताया कि अनुसूचित जाति के होने के कारण उसे उस व्यक्ति ने अपमानित किया जो ख़ुद उस समुदाय का नहीं है। इसलिए यह बात भी इससे ग़ायब है। इस तरह ठाकुर के आवेदन को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया गया और उसके ख़िलाफ़ एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3(1) (X) के तहत जारी सम्मन को निरस्त कर दिया। पर अदालत ने अन्य आरोपों में हस्तक्षेप नहीं किया और कहा कि उन मामलों में सुनवाई जारी रहेगी। अदालत ने जाते जाते शिकायतकर्ता की इस बात के लिए भी खिंचाई की कि उसने पूछताछ के दौरान जाँच में रोड़ा अटकाने के लिए अपने एक सहयोगी के साथ वहाँ पहुँच गया था।