Category: मध्यप्रदेश

  • अंधा करने वाले डॉक्टर दंडित होंगेःसिलावट

    अंधा करने वाले डॉक्टर दंडित होंगेःसिलावट

    आंखों की रोशनी खोने वाले दस मरीजों का इलाज शंकर नेत्रालय चेन्नई के डॉक्टर करेंगे

    भोपाल,17 अगस्त(प्रेस सूचना केन्द्र)। लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री तुलसीराम सिलावट ने इंदौर के एक निजी अस्पताल में 10 मरीजों के आँखों के ऑपरेशन के बाद उनकी आँखों की रोशनी प्रभावित होने की घटना को अमानवीय बताया है। उन्होंने कहा कि प्रभावित मरीजों के इलाज के लिये राज्य सरकार ने देश के ख्याति प्राप्त शंकर नेत्रालय के डॉ. राजू रमन को कॉल किया है। डॉ. रमन रविवार, 18 अगस्त को सुबह इंदौर पहुँच रहे हैं। मंत्री श्री सिलावट ने बताया कि प्रभावित मरीजों को इंदौर के चोइथराम नेत्रालय में शिफ्ट कर दिया गया है।

    मंत्री श्री सिलावट ने बताया कि प्रभावित मरीजों की आँखों का पूरा इलाज राज्य सरकार द्वारा नि:शुल्क कराया जायेगा। उन्होंने कहा कि घटना की जाँच के लिये उच्च-स्तरीय इन्क्वायरी कमेटी गठित की गई है। कमेटी ने जाँच का काम शुरू कर दिया है। कमेटी को यथाशीघ्र जाँच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिये कहा गया है। श्री सिलावट ने बताया कि कमेटी की जाँच रिपोर्ट के आधार पर दोषी चिकित्सकों एवं अस्पताल के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जायेगी।

  • वैश्विक खेती को अपनाए भारत बोले कमलनाथ

    वैश्विक खेती को अपनाए भारत बोले कमलनाथ

    भोपाल,16 अगस्त(प्रेस सूचना केन्द्र)। मुख्यमंत्री कमल नाथ ने केन्द्र सरकार से आग्रह किया है कि वह जेनेटिकली मोडीफाइड बीज के संबंध में नीतिगत निर्णय ले, जिससे भारत ऐसी टेक्नालाजी अपनाने में पीछे नहीं रह जाये, जो पूरे विश्व को बदल रही है। इसके बिना भारत का बहुत बड़ा नुकसान हो जायेगा। उन्होंने अत्यावश्यक वस्तु अधिनियम में सुधार लाने की भी वकालत की, जिससे किसानों के हित में अप्रत्याशित परिस्थितियों से निपटने में मदद मिल सके।

      मुख्यमंत्री कमल नाथ ने  नीति आयोग की भारत के कृषि परिदृश्य के कायाकल्प के लिये गठित मुख्यमंत्रियों की उच्चाधिकार समिति की आज मुम्बई में हुई बैठक में अपने सुझाव दिये। उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ उच्चाधिकार समिति के सदस्य हैं।
    
        मुख्यमंत्री ने कहा कि कृषि न सिर्फ आर्थिक बल्कि सामाजिक मुद्दा भी है। उन्होंने कहा कि किसानों की सोच में बदलाव आया है। धोती पहनने वाले किसान और आज के पेंट-जींस पहनने वाले किसान के नजरिये में फर्क है। मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत के किसान अमेरिका, यूरोपियन यूनियन की व्यवस्थाओं से मुकाबला नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि विश्व व्यापार संगठन से हुए समझौतों के चलते किसी भी प्रकार का कृषि आयात किसानों के हित में नहीं है। उन्होंने किसानों के हित में जैविक खाद्यान्न के संकुलों की पहचान कर इसकी मार्केटिंग करने की जरूरत बताई।  श्री नाथ ने सुझाव दिया कि खाद्य प्रसंस्करण की संभावनाओं वाले क्षेत्रों की पहचान कर उन्हें भरपूर सहयोग देने की आवश्यकता है।        
    
        श्री कमल नाथ ने कहा कि किसानों को कीमतों का आकलन कर के कृषि आदान का ब्रांड चुनने की आजादी होना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसानों, किसान उत्पादन संगठनों, व्यापारिक सोसायटी और बाजार के बीच परस्पर सामंजस्य और तालमेल बैठाना होगा। उन्होंने कहा कि उपार्जन मॉडल को भी सुधारने की जरूरत है। श्री कमल नाथ ने खेती में यंत्रीकरण को बढ़ाने पर जोर देते हुए कहा कि कृषि क्षेत्र में जीआईएस/जीपीएस जैसी आधुनिक तकनीकी के उपयोग से भी लाभ होगा।
    
       मुख्यमंत्री कमल नाथ ने बैठक में मध्यप्रदेश के कृषि क्षेत्र में किए गए सुधारों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि किसानों के उत्पाद संगठनों को लाइसेंस और संचालन संबंधी जरूरतों को शिथिल किया गया है ताकि उन्हें बेहतर दाम मिलें। सिंगल लाइसेंस और मंडियों के बाहर भी खरीदी करने की अनुमति दी गई है। नीलामी के लिये इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफार्म स्थापित करने का काम चल रहा है। 
  • कांग्रेस के वसूली अभियान ने मचाया बाजार में कोहराम

    कांग्रेस के वसूली अभियान ने मचाया बाजार में कोहराम

    भोपाल,(प्रेस सूचना केन्द्र)।औद्योगिक विकास की राह चलते मध्यप्रदेश में सत्ता बदलने के साथ साथ उद्योपतियों से संवाद का तरीका भी बदल गया है। भाजपा की शिवराज सिंह चौहान की सरकार जहां कर्ज आधारित अर्थव्यवस्था से उन्हें पैसा बनाने के अवसर उपलब्ध करा रही थी वहीं कमलनाथ की कांग्रेस सरकार ने उद्योपतियों की वसूली बैठक शुरु कर दी है। भाजपा को जो उद्योगपति स्वेच्छा से चंदा मुहैया करा रहे थे उन्हें कमलनाथ जी ने कार्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के छिंदवाड़ा माडल के नाम पर भारी भरकम जवाबदारियां थमा दीं हैं।हाल की मुंबई यात्रा में मुख्यमंत्री ने सामाजिक विकास के नाम पर उ्दयोपतियो को जो जवाबदारियां थमाई हैं उससे उद्योगपतियों के बीच कोहराम मच गया है।उद्योगपतियों ने व्यापारियों को दिए जाने वाले प्रोत्साहन फंड जब्त कर लिए हैं जिससे पूरे बाजार में भूचाल आ गया है।

    कांग्रेस का विकास माडल हमेशा से अमीरों को लूटकर गरीबों को बांटने के कबीलाई फार्मूले पर टिका रहा है। मुक्त बाजार व्यवस्था के पूंजीवादी माडल ने इस नीति को पूरी तरह धराशायी कर दिया था। कमलनाथ दुबारा उसी घिसे पिटे फार्मूले को लागू करने का प्रयास कर रहे हैं। पंद्रह साल के भाजपा शासनकाल में भले ही इस पुराने फार्मूले की विदाई न हो पाई हो लेकिन इंस्पेक्टर राज की चूलें जरूर हिल गईं थीं। यही वजह था कि राज्य का बजट भी बढ़ा और फलने फूलने के एवज में उद्योगपतियों ने भाजपा को भरपूर चंदा भी दिया। अब जबकि कमलनाथ की कांग्रेस को अपनी सरकार बचाने के लिए हर दिन मशक्कत करना पड़ रही है तब उनकी कांग्रेस खुलकर चंदा उगाही के मैदान में कूद पड़ी है।

    कांग्रेस की पोल तो केवल उद्योपतियों की उस सूची से ही खुल जाती है जिन्हें वो प्रदेश में औद्योगिक विकास के लिए आमंत्रित करने का दावा कर रही है। इनमें अंबानी, अडानी से लेकर महिंद्रा और हीरो जैसी कंपनियां प्रमुख हैं जिनका कारोबार मध्यप्रदेश में पहले से फैला हुआ है। राज्य मंत्रालय का भवन बनाने वाले शापोरजी पालोनजी समूह को ही इतनी बड़ी जवाबदारी थमाई गई है जिससे विधायकों को भी मालामाल कर दिया जाएगा। सूत्र बताते हैं कि कमलनाथ ने मुख्यमंत्री बनने के बाद उद्यमियों से साफ कह दिया है कि यदि उन्हें प्रदेश में अपना कारोबार करना है तो अपनी आय का पंद्रह फीसदी हिस्सा पार्टी के अघोषित फंड में देना होगा। इधर कांग्रेस और भाजपा के भाग निकलने को बेकरार विधायकों को आश्वासन दिया जा रहा है कि उनका भरपूर सम्मान किया जाएगा इसलिए वे सरकार गिराने के अभियान से दूर ही रहें।

    कमल नाथ ने मुंबई में रिलायंस ग्रुप के चेयरमेन मुकेश अंबानी, बिरला ग्रुप के कुमार मंगलम, टाटा ग्रुप के चंद्रशेखर, महिंद्रा एंड महिंद्रा ग्रुप के पवन गोयनका, टाटा पावर के प्रवीर सिन्हा, ग्रेसिम के दिलीप गौर, आर.पी.जी. ग्रुप के हर्ष गोयनका, एसीसी सीमेंट के दिलीप अखूरी, अहिल्या हेरीटेज होटल्स के यशवंत होलकर एवं नरसी मुंजी के अमरीश पटेल से वन-टू-वन चर्चा की इन सभी के कारोबार पहले से ही मध्यप्रदेश में संचालित हैं।

    कांफ्रेंस में बजाज फाइनेंस के एम.डी. संजीव बजाज, जुबिलेंट लाइफ एंड सांइसेस लिमिटेड के वाइस प्रेसीडेंट अमरदीप सिंह, महिंद्रा हॉलिडेज एण्‍ड रिसोर्ट इंडिया लिमि. के चेयरमेन अरुण नंदा, टाटा केपिटल लिमि. के हेड बिजनेस डेव्हलपमेंट कश्मीरा मेवावाला, थाइसनग्रुप-इण्डस्ट्रीज प्रा.लि. के सीईओ विवेक भाटिया, ट्यूबेक्स इंडिया लिमि. के चेयरमेन अजय सम्बरानी, एचडीएफसी बैंक के ग्रुप हेड राकेश सिंह, वेरेटिव एनर्जी लिमि. के एम.डी. सुनील खन्ना, कौंसुलेट जनरल ऑफ जापान के कौंसुलेट जनरल मिशियो हराडा, टाटा पॉवर लिमि. के एमडी प्रवीर सिन्हा, टाटा कंसलटेंसी लिमि. के वाइस प्रेसीटेंड तेज भाटिया, रिलायंस इण्डस्ट्रीज लिमि. के स्टॉफ चेयरमेन निलेश मोदी, रिलायंस इण्डस्ट्रीज लिमि. के बिजनेस यूनिट हेड संजय रॉय, हिन्दुजा के ग्रुप हेड कार्पोरेट आर. केनन, एसीसी सीमेंट के एमडी नीरज अखोरी, इण्डो-स्पेस के मैनेजिंग डायरेक्टर राहुल नायर, टाटा मोटर लिमि. नेशनल हेड सुशांत नायक, ग्रेसिम इण्डस्ट्रीज लि. के ज्वाइंट डायरेक्टर अजय सरदाना, केमोट्रोल्स इण्डस्ट्रीज प्रा.लि. चेयरमेन के. नंदकुमार, हिन्दुस्तान यूनिलीवर लिमि. एक्जीक्यूटिव डेयरेक्टर प्रदीप बेनर्जी, हिन्दुस्तान यूनिलीवर लिमि. लीड साउथ एशिया कनिका पाल, इनोक्स लिमि. डायरेक्टर सिद्धार्थ जैन, प्रॉक्टर एंड गेम्बल चीफ एक्जीक्यूटिव मधुसूधन गोपालन, अहिल्या एक्सप्रिंसेस डायरेक्टर यशवंत होलकर, सिप्ला लिमि. वाइस प्रेसीटेंड निखिल बेसवान, इंटरनेशनल बायोटेक पार्क लिमि. सीईओ प्रशांता के. बिसवाल, टीसीजी रियल एस्टेट चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर प्रताप चटर्जी, एप्टेक लिमि. डायरेक्टर नीनंद करपे, केपिटल फू़ड प्रा.लि. सीईओ नवीन तिवारी, करगोम फूड्स लिमि. एमडी रोहित भाटिया, एरिस एग्रो लिमि. मैनेजिंग डायरेक्टर राहुल मीरचंदानी, टाटा कन्सलटिंग इंजीनियर्स लिमि. चेयरमेन अशोक सेठी, गोदावरी बायो रिफाइनर्स लिमि. सीईओ समीर सोमिया, एसीजी-एसोसियेटेड केप्सूल चेयरमेन अजीत सिंह से मुख्यमंत्री कार्यालय से सीधा संपर्क किया गया। इन सभी ने सरकार को सीएसआर की दो फीसदी राशि विकास कार्यों के लिए खर्च करने का आश्वासन तो दिया ही है साथ में चंदे की किस्त भी पहुंचानी शुरु कर दी है। सीएसआर की राशि तो शिवराज सिंह सरकार के कार्यकाल में भी खर्च होती थी लेकिन तब उद्योगपतियों पर कोई दबाव नहीं था।पहली बार सरकार ने उन्हें स्पष्ट टारगेट दिए गए हैं।जिससे उद्योपतियों के साथ साथ व्यापारियों में भी कोहराम मच गया है, क्योंकि उद्योगपतियों ने चंदे के टारगेट पूरे करने के लिए व्यापारियों के इंसेंटिव बंद कर दिए हैं।

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  • कश्मीर के कलंक को सिंधिया के मुखौटे से छिपाती कांग्रेस

    कश्मीर के कलंक को सिंधिया के मुखौटे से छिपाती कांग्रेस

    कश्मीर से धारा 370 हटाकर मोदी सरकार ने देश के विकास का राजमार्ग प्रशस्त कर दिया है।सत्तर सालों से नासूर की तरह टीस झेल रहा कश्मीर भी एक नए युग में प्रवेश कर रहा है।जब सारे देश में रियासतों का एकीकरण हो रहा था तब एक अनोखा कश्मीर ही था जो भारतीय गणतंत्र में विलीन हुए बगैर अपनी अलग पहचान बनाने की रट लगाए था। इसकी पृष्ठभूमि पं. जवाहर लाल नेहरू ने तैयार की थी। सेब के बगीचों को अपनी राजनैतिक रियासत बनाने के लोभ ने नेहरू की भूमिका इतनी संकीर्ण बना दी थी कि वे कश्मीर के कथित विद्रोह से संरक्षक बन गए थे। बाद में चिकित्सकों की एसोसिएशन के माध्यम से उन्होंने डाक्टरों के (प्रिस्क्रिप्शन) परचे में रोगियों को रोज सेब खाने की हिदायत लिखवानी शुरु करवा दी। पूरे देश के रोगियों को तभी से अंग्रेजी दवाओं के डाक्टर सेब खिलवा रहे हैं। जबकि आयुर्वेदिक चिकित्सा में रोगियों को लाल टमाटर पर काला नमक और काली मिर्च बुरककर खिलाने की सलाह दी जाती है। यही वजह है कि 72 सालों से समूचा भारत कश्मीर समस्या झेल रहा है। तबसे देश के हजारों जवान कश्मीर की सरजमीं को बचाए रखने के लिए अपनी शहादत दे चुके हैं। लाखों कश्मीरियों ने कथित जेहाद के नाम पर अपनी जान गंवाई है। विशेष दर्जे की वजह से हर साल भारत को कश्मीर पर भारी धन खर्च करना पड़ता है। सैन्य आधुनिकीकरण के नाम पर भारी रक्षा बजट खर्च करना पड़ता है। अब उम्मीद की जा रही है कि कश्मीर समस्या हमेशा के लिए सुलझ सकेगी।

    देश की सबसे बड़ी पंचायत में जब धारा 370 (1) के अन्य सभी प्रावधानों को निरस्त करने की बहस चल रही थी तब गांधी परिवार की वजह से ही कांग्रेस इस बिल का विरोध कर रही थी। कांग्रेस ने गुलाम नबी आजाद को अपनी आवाज बनाया। उन्होंने धारा 370 बरकरार रखने की जबर्दस्त पैरवी की। समर्थन में कहा गया कि यदि ये धारा हटाई जाती है तो कश्मीर का उग्रवाद फिलिस्तीन के समान शोला बन जाएगा। सरकार की दृढ़ इच्छा शक्ति के आगे ये प्रतिरोध नहीं टिक सका। अंततः धारा 370 की बेड़ियों से कश्मीर आजाद हो ही गया। आने वाले पंद्रह अगस्त को मोदी सरकार ने देश के लिए सबसे बड़ी सौगात अभी से दे दी है।

    ये सौभाग्य की बात है कि इन दिनों कांग्रेस अध्यक्ष विहीन है। इस वजह से सांसदों के बीच वो संगठनात्मक कसावट नहीं है जो किसी बिल पास कराने या खारिज कराने के लिए जरूरी होती है। यही वजह है कि जब कांग्रेस इस बिल के विरोध में मतदान कर रही थी तब कई सांसद खुलकर सरकार के साथ आ गए।कांग्रेस के चीफ व्हिप भुवनेश्वर कलीता ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा कि पार्टी ने मुझे देश के मूड के खिलाफ व्हिप जारी करने को कहा था। पार्टी आत्महत्या कर रही है। मैं इसका भागीदार नहीं बनना चाहता। दीपेन्द्र हुड्डा और मिलिंद देवड़ा ने भी पार्टी से अलग रुख अपनाया। जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि आजादी के समय जो भूल हुई थी उसे सुधारा जाना स्वागत योग्य है। नतीजा ये रहा कि जम्मू कश्मीर को दो केन्द्र शासित प्रदेशों में बांटने का बिल जब राज्यसभा में पेश हुआ तो इसके पक्ष में 125 और विरोध में 61 वोट पड़े। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने बिल का विरोध किया जबकि बसपा जैसे विरोधी दल समर्थन में रहे। इस घटना ने कांग्रेस की रणनीतिक हार को उजागर कर दिया है।

    अब जबकि पूरे देश में इस फैसले का जबर्दस्त अभिनंदन किया जा रहा है तब कांग्रेस अपनी भूल सुधारने की निरर्थक कोशिश कर रही है। राहुल गांधी के करीबी ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ट्वीट करके कहा कि वे सरकार के इस फैसले का समर्थन करते हैं। साथ में ये पुछल्ला भी जोड़ दिया कि यदि सरकार संवैधानिक तरीकों का पालन करती तो ज्यादा अच्छा होता। जबकि सरकार ने ये कदम कानूनी एहतियात के अंतर्गत उठाया है। जिस संसद की आड़ लेकर राष्ट्रपति से ये कानून लागू करवाया गया था उसी संसद की सलाह पर राष्ट्रपति ने कानून को रदद् कर दिया। कहा गया कि जम्मू कश्मीर की विधानसभा ने इसे स्वीकार किया था और उसकी अनुमति के बगैर धारा को नहीं हटाया जा सकता। जबकि अभी कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लगा हुआ है। जाहिर है ऐसे में किसी प्रकार की संवैधानिक अड़चन आड़े नहीं आती है।

    कांग्रेस की रणनीति हर कदम पर असफल साबित हुई है। जब धारा 370 हट चुकी है और कश्मीर के भीतर भी इसे लेकर सहमति का भाव बन चुका है तब कांग्रेस अपनी करतूतों पर लीपापोती करती नजर आ रही है। इसी रणनीति के चलते ज्योतिरादित्य सिंधिया से ये बयान जारी करवाया गया है। हालांकि इसका कोई औचित्य नहीं है। न तो वे इन दिनों किसी संवैधानिक पद पर हैं और न ही निर्वाचित जन प्रतिनिधि हैं। इसके बावजूद उनका बयान पार्टी के भीतर उठते असहमति के स्वरों को सहारा देने की कवायद जरूर है। यही वजह है कि अब पार्टी के कई नेतागण सरकार के फैसले का समर्थन ये कहते हुए कर रहे हैं कि ये देशहित का मसला है इसलिए वे इससे सहमत हैं।

    जो लोग ये अटकलें लगा रहे हैं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया पार्टी से असहमत हैं और उनकी नाराजगी मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार को अस्थिर कर सकती है वे केवल कांग्रेस को मुखौटे को वास्तविकता का जामा पहनाने का प्रयास कर रहे हैं। इसके बावजूद सिंधिया के बयान कांग्रेस के इस मुखौटे की सच्चाई उजागर कर रहे हैं। सिंधिया समर्थक मंत्रियों से बयान जारी करवाकर ऐसा बताने की कोशिश की गई कि सिंधिया की राय ही पार्टी की राय है। ये भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस सिंधिया को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना सकती है। हालांकि इसकी संभावना बहुत कम है। सिंधिया को मध्यप्रदेश कांग्रेस का ही बड़ा धड़ा अपना नेता नहीं मानता है। ऐसे में राहुल गांधी भी चाहें कि वे सिंधिया को अपना प्रतिनिधि अध्यक्ष बना दें तो वे कारगर साबित नहीं होंगे।

    ये बात भी सही है कि कांग्रेस इन दिनों ऊहापोह से गुजर रही है। उसे अपनी नीतियों पर नए सिरे से विचार करना जरूरी हो गया है। आजादी के दौर की कांग्रेस को छोड़कर इंदिरा कांग्रेस ने जो एकाधिकारवादी रणनीति अपनाई थी वो बाजारवाद की आंधी में अप्रासंगिक हो चली है। ऐसे में कांग्रेस को तय करना होगा कि वो अपने ही नेताओं के बनाए सरकारीकरण के ढांचे का विरोध कैसे करे।फिलहाल तो कांग्रेस के सामने खुद का अस्तित्व बचाए रखने की बड़ी चुनौती है। इसलिए वो चाहकर भी सिंधिया के मुखौटे के पीछे भी अपना चेहरा नहीं छुपा पा रही है।

  • बगैर प्रसाद कैसे मिले आशीर्वाद

    बगैर प्रसाद कैसे मिले आशीर्वाद

    मध्यप्रदेश सरकार ने लोकप्रियता बटोरने के लिए आपकी सरकार जनता के द्वार कार्यक्रम शुरु किया है। इस कार्यक्रम के माध्यम से सरकारी अफसर केम्प लगाकर जन समस्याओं का निदान करेंगे।नई बोतल में पुरानी शराब की तरह सरकार का ये कार्यक्रम जनता के बीच संवाद कायम करने का प्रयास है।प्रदेश की अधिसंख्य आबादी ने कांग्रेस को सत्ता नहीं सौंपी है। भाजपा को मिले मतों की संख्या कांग्रेस को मिली मत संख्या से अधिक है। जाहिर है कि जनता का बहुत बड़ा तबका कांग्रेस की नीतियों से इत्तेफाक नहीं रखता है। इसके बावजूद कांग्रेस सीटों के गणित की वजह से सत्ता में आ गई है।यही वजह है कि सरकार की नीतियों के प्रति जनता के बीच संतोष का भाव अब तक नहीं पनप पाया है।मुख्यमंत्री कमलनाथ ये बात अच्छी तरह जानते हैं। यही वजह है कि वे सत्ता का संचालन राज्य मंत्रालय में बैठकर ही चला रहे हैं। उन्हें मालूम है कि जब तक वे जनता को कुछ चमत्कार करके नहीं दिखा सकते तब तक जनता के बीच जाने पर उनका स्वागत फीके अंदाज में ही किया जाएगा। यही वजह है कि उनकी सरकार समस्याओं का इलाज करने के बजाए उन पर हाथ फेरने का उपाय अधिक कर रही है। सरकारी तंत्र जनता की समस्याओं के निदान के लिए जवाबदार है और उसके लिए सरकारी व्यवस्था ने बाकायदा बारह मासी दफ्तर लगाकर तैनात किया है। इसके बावजूद जनता की समस्याएं नहीं सुलझ पाती हैं। इसकी वजह सरकारी अफसरों और कर्मचारियों की लापरवाही और लालफीताशाही जिम्मेदार है। इसका समाधान अधिकाधिक योजनाओं को सरकारी तंत्र से मुक्ति दिलाकर ही किया जा सकता है। सरकार इसका समाधान उसी सरकारी तंत्र पर निर्भर होकर करना चाह रही है। राजीव गांधी की पंचायती राज व्यवस्था इसी सरकारी तंत्र को बाईपास करने का प्रयास था। पूर्व वर्ती दिग्विजय सिंह की सरकार ने भी इसी तरह की योजना चलाकर गांव गांव जाने का प्रयास किया था। वह योजना भ्रष्टाचार का विकेन्द्रीकरण बन गई थी। बुरी तरह असफल उस योजना की वजह से ही राज्य में भाजपा की सरकार का उदय हुआ था। पंद्रह सालों की भाजपा सरकार इस योजना से इतनी डरी हुई थी कि शिवराज सिंह चौहान ने कभी दुबारा अफसरों को बाईपास करने का साहस नहीं किया। वे अपनी सरकार अफसरों पर ही आश्रित रहकर चलाते रहे। यही वजह थी कि उनकी सरकार के कार्यकाल में भाजपा के कार्यकर्ता और नेता हमेशा शिकायत करते रहे कि अफसर हमारी बात नहीं सुनते हैं। कमलनाथ ने सरकार में आते ही अफसरों पर शिकंजा कसना शुरु कर दिया। तबादलों की बयार लाकर उन्होंने पहले तो अफसरों की जड़ें ढीली कीं और फिर कार्यकर्ताओं की शिकायतों पर उन्हें फुटबाल बना दिया। आज ये हालत है कि भारी चंदा देकर मनचाही पोस्टिंग पर पहुंचे अफसर को भी भरोसा नहीं कि वो अपनी पोस्टिंग पर बना रहेगा। एक अदना सा कार्यकर्ता यदि उसके कामकाज से असंतुष्ट होता है तो अफसर को उसकी पोस्टिंग से हटा दिया जाता है। सरकार अपनी इस नीति से अफसरशाही को लोकशाही में बदलने का प्रयास कर रही है। बरसों पुराने ये प्रयास बार बार असफल रहे हैं। अफसरों के चयन की प्रक्रिया और लोकतंत्र का ढर्रा इतना बिगड़ चुका है कि अब इसे कारगर प्रशासन का रूप दे पाना असंभव है। इसके बावजूद कमलनाथ प्रदेश में तीस साल पुराने सरकारीकरण को सफल बनाने का प्रयास कर रहे हैं। जो व्यवस्था प्रदेश और देश के विकास के लिए अनुत्पादक साबित हो चुकी है कमलनाथ उसे सफल होता दिखाने का प्रयास कर रहे हैं।मध्यप्रदेश राज्य अपनी इस अनुत्पादक व्यवस्था पर हर महीने तीन हजार दो सौ करोड़ रुपए खर्च करता है।वेतनमान बढ़ाए जाने के बाद इस व्यवस्था पर खर्च और भी ज्यादा बढ़ गया है। इसकी तुलना में राज्य को होने वाली मासिक आय घटी है। राजनैतिक चंदा वसूली की वजह से खजाने को होने वाली आय पर चोट पहुंची है। सरकार का लक्ष्य है कि इस कवायद से वह उस राजस्व को एकत्रित कर पाने में सफल होगी जो आज भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है। राज्य के बजट में टैक्स का आकलन भी बढ़ाकर किया गया है। राज्य सरकार यदि फिजूलखर्ची रोकने में सफल होती तो वह जनता के बीच अपनी लोकप्रियता बढ़ा सकती थी। फिलहाल तो सरकारी कवायद का सीधा असर जनता की जेब पर पड़ रहा है। सरकारी उठापटक का खमियाजा जनता को भुगतना पड़ रहा है। जिस तरह खाद्य वस्तुओं के सैंपल भरे जा रहे हैं और इसकी आड़ में भारी चंदा वसूली की जा रही है उसका बोझ अंतिम पंक्ति में पड़े आम नागरिक को उठाना पड़ रहा है। शायद यही लोकतंत्र की वह मंहगी कीमत है जो आम जनता को भुगतनी पड़ रही है।अगस्त का महीना आजादी के आकलन का महीना माना जाता है। जनता जाति, धर्म, संप्रदाय, बाजारवाद के जिन मुद्दों के बीच उलझी है उसके बीच वह इन मूलभूत मुद्दों का चिंतन आमतौर पर नहीं कर पाती है। सरकार को और राजनेताओं को इस विषय पर चिंतन जरूर करना चाहिए। फिलहाल तो सरकार का ये प्रयास होना चाहिए कि वो जनता के भरोसे को कैसे कायम रख पाती है। 

  • कमलनाथ एमपी में फिर ले आए इंस्पेक्टर राज

    कमलनाथ एमपी में फिर ले आए इंस्पेक्टर राज

    भारत की राजनीति में खुले बाजार की अर्थव्यवस्था का श्री गणेश करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री पीव्ही नरसिंम्हाराव और डाक्टर मनमोहन सिंह का अनुमान था कि देश अब आर्थिक विकास की ओर अग्रसर हो जाएगा। डाक्टर मनमोहन सिंह तो बार बार कहते रहे कि भारत में इंस्पेक्टर राज अब कभी नहीं लौटेगा। तीन दशकों तक हिंदुस्तान उसी राह पर चलता रहा। आज भी हिंदुस्तान पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का अनुष्ठान कर रहा है। इसके विपरीत मध्यप्रदेश में एक बार फिर इंस्पेक्टर राज लौट आया है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सत्ता का जो फार्मूला इस्तेमाल किया है उससे कांग्रेस की सत्ता में वापिसी तो हो ही गई साथ में अजेय मानी जाने वाली भाजपा के भीतर भी भगदड़ मच गई है। भाजपा के होश तो तब उड़े जब कांग्रेस ने भरी विधानसभा में उसके दो विधायक अपने पाले में खड़े कर लिए। अब भाजपा अपने विधायकों को समेटने में जुटी हुई है और विधायक हैं कि वे कमलनाथ की राजनीति से सहमत होते नजर आ रहे हैं।

    कमलनाथ की राजनीति की ये कलाकारी आखिर क्यों जादू की तरह विधायकों के सिर चढ़कर बोल रही है। इसे समझने के लिए भाजपा के पंद्रह साल पुराने शासनकाल पर गौर करना होगा। वर्ष 2003 में बिजली, सड़क और पानी के मुद्दे पर भाजपा सत्ता में आई थी। उसने पंद्रह सालों तक इस पर खूब काम किया। भारी भरकम कर्ज लेकर आधारभूत संरचना का विकास भी किया गया। जनता के लिए सरकार ने विभिन्न तरह की योजनाएं चलाईं जिनके हितग्राहियों ने भी पर्याप्त लाभ उठाया। हितग्राहियों से ज्यादा लाभ अफसरों ने उठाया। उन्होंने जनता के लिए जारी योजनाओं में भारी भ्रष्टाचार किया और धन संग्रह भी किया। सातवें वेतनआयोग की सिफारिशों की वजह से अफसरों और कर्मचारियों का वेतन भी खासा बढ़ता गया। आज ये स्थिति है कि हर महीने सरकार अपने अमले को 3200 करोड़ रुपए वेतन भत्तों के नाम पर देती है। जबकि उसकी आय लगभग चार हजार करोड़ रुपए मासिक है।

    मुख्यमंत्री कमलनाथ अपने भाषणों में बार बार कहते हैं कि भाजपा की सरकार खाली खजाना छोड़कर गई है। जबकि हकीकत ये है कि पिछली सरकार का बजट आधिक्य 137 करोड़ रुपए था। उसने चालीस हजार करोड़ की अर्थव्यवस्था को एक लाख छह हजार करोड़ की विशाल अर्थव्यवस्था का स्वरूप देने में सफलता पाई थी।हर महीने सरकार के खजाने में चार हजार दो सौ करोड़ रुपए आ ही जाते हैं। आज प्रदेश में बिजली सरप्लस है। सड़कों का जाल तैयार है। पेयजल की उपलब्धता बढ़ी है। सिंचाई का रकबा 6 हजार हेक्टेयर से बढ़कर 33 हजार हेक्टेयर हो चुका है। इसके बावजूद भाजपा की शिवराज सिंह सरकार न तो औद्योगिक विस्तार कर सकी और न ही रोजगार के अवसर पैदा कर सकी। यही वजह है कि उसके खिलाफ असंतोष की आग भीतर ही भीतर सुलगती रही।

    पिछले विधानसभा चुनावों में स्पष्ट मतविभाजन की वजह से भाजपा के वोट तो बढ़े लेकिन वोटों की बढ़त के साथ साथ कांग्रेस ने अधिक विधायक लेकर सत्ता छीन ली। भाजपा के नेता बार बार कहते हैं कि कांग्रेस की सरकार अल्पमत की है। इसकी वजह ये है कि 230 सदस्यों वाली विधानसभा में कांग्रेस के पास 114 विधायक हैं जबकि भाजपा 108 विधायकों के साथ दूसरा बड़ा राजनीतिक दल है। बहुमत के लिए कांग्रेस को 116 विधायकों की जरूरत थी। उसने चार निर्दलीयों, 2 बसपा और एक सपा के विधायकों को साथ लेकर आरामदायक बहुमत जुटा लिया। दो भाजपा विधायकों शरद कोल और नारायण त्रिपाठी के आ जाने से उसकी स्थिति और मजबूत हो गई है। इस फेरबदल ने मुख्यमंत्री कमलनाथ का आत्मविश्वास बढ़ा दिया है।

    अब कमलनाथ पुरानी कांग्रेस के अपने फार्मूले पर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। रोज रोज अफसरों के तबादलों की सूचियां निकल रहीं हैं। तबादले करवाने, मनचाही पोस्टिंग करवाने और तबादले निरस्त करवाने वालों की भीड़ सत्ता के गलियारों में जुट गई है। विधायक विश्रामगृह की रंगीनियां लौट आईँ हैं। राज्य मंत्रालय के गलियारे कार्यकर्ताओं से पट गए हैं। इसका लक्ष्य अफसरों और कर्मचारियों की वह आरामतलब फौज है जिसे हर महीने सरकारी खजाने से 3200 करोड़ रुपए वेतन के रूप में मिलते हैं। सरकारी अमले का वेतन अधिक है और खर्च बहुत कम है। साथ में भ्रष्टाचार से जुटाया धन भी इफरात है। बैंकों में भी इसी वर्ग ने भारी रकम जमा कर रखी है। धन की हवस इस वर्ग के बीच इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि वे अपनी मनचाही पोस्टिंग के लिए दो करोड़ रुपए का चंदा भी आसानी से देने के लिए तैयार हैं। आईएएस,आईपीएस और आईएफएस जैसे प्रशासनिक संवर्ग की सेवाओं के लिए तो चंदे का आंकड़ा और भी ऊंचा है।

    तबादले पोस्टिंग का ये कारोबार कांग्रेस के मंत्रियों, विधायकों और कार्यकर्ताओं के बीच फलफूल रहा है। कार्यकर्ताओं की फौज राजनैतिक चाहत से ऊपर उठकर ये काम पूरी जिम्मेदारी से कर रही है। सरकार के शीर्ष पदों पर बैठे नेताओं का प्रयास है कि इसमें कार्यकर्ताओं के बीच चंदे का बंटवारा भी व्यापक तरीके से करा दिया जाए। नतीजतन विधायकों के बीच मुख्यमंत्री कमलनाथ आज आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि सरकारी पदों पर कोई योग्य व्यक्ति बैठे या अयोग्य इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। प्रदेश की आय बढ़ाने का फायदा भी तब है जब विकास कार्यों के लिए अत्यधिक कर्ज लेना हो। अभी राज्य की जो आय है उससे तो सरकारी कामकाज के लिए पर्याप्त कर्ज मिलता ही रहेगा।

    सरकार ने अफसरों का खजाना बढ़ाने के लिए हर विभाग में इंस्पेक्टर राज बढ़ा दिया है। दूध,मावा, पनीर आदि के सेंपल लिए जा रहे हैं। अभी अभी पौने तीन सौ सेंपल धड़ाधड़ लिए गए। खाद्य विभाग के पास न तो इन सैंपलों को समय सीमा में चैक करने की पर्याप्त सुविधा है और न ही सैपलों का परीक्षण करने के लिए बुलाई गई मशीन चालू हो पाई है। इसके बावजूद धड़ाधड सेंपल उठाए जा रहे हैं। जनता के बीच सरकार की ये सक्रियता जरूर चर्चा का केन्द्र बन गई है।जनता और दुग्ध कारोबारियों के बीच जो अविश्वास पनपने लगा है उससे सरकार की अन्य गतिविधियों और वादों की ओर से जनता का ध्यान हट गया है।

    तबादलों की ये बयार जेल, स्वास्थ्य, शिक्षा, वन, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी, लोक निर्माण विभाग, जल संसाधन से लेकर तमाम विभागों में चल रही है।जो कांग्रेस कभी राजाओं,सामंतों को खलनायक बताकर जन आक्रोश की लहर पर सवार हुआ करती थी वो आज भ्रष्ट अफसरों, व्यापारियों, को निशाने पर ले रही है। कांग्रेस का ये चिरपरिचित फार्मूला जनता के बीच आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है और यही कमलनाथ की सरकार की फिलहाल नजर आ रहीं सफलताओं की कुंजी भी है।

  • पाकिस्तान जैसा मुल्क और नहीं चाहिए बोले गोलोक बिहारी राय

    पाकिस्तान जैसा मुल्क और नहीं चाहिए बोले गोलोक बिहारी राय

    भोपाल,4 जुलाई(प्रेस सूचना केन्द्र)।राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच के राष्ट्रीय महामंत्री गोलोक बिहारी राय का कहना है कि पिछले 70 सालों से हमने पाकिस्तान को मजबूत पड़ौसी के तौर पर खड़ा होते देखने की नीति अपनाई थी इसके बावजूद पाकिस्तान ने हर बार प्रतिफल के रूप में हमें घाव ही दिए। वह अपने ही नागरिकों को सुखी जीवन देने में असफल रहा है, इसकी वजह से कई प्रांतों में वहां के स्थानीय लोग अपनी अस्मिता के लिए लड़ रहे हैं। अब समय आ गया है कि हम अपनी नीति बदलें और अपनी अस्मिता के लिए लड़ रहे स्थानीय लोगों को अपना नैतिक समर्थन दें। ये नीति यूरोपीय देशों की तरह सह अस्तित्व के भाव को मजबूत करेगी और दक्षिण पश्चिम एशिया में शांति और समृद्धि भी बढ़ाएगी।

    आज राजधानी के विश्व संवाद केन्द्र में आयोजित एक संगोष्ठी में पाकिस्तान कल आज और कल विषय पर विभिन्न वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए।संगोष्ठी का आयोजन स्पंदन के सहयोग से किया गया था। कार्यक्रम में प्रमुख वक्तव्य राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच के राष्ट्रीय महामंत्री गोलोक बिहारी राय ने दिया। अध्यक्षता पूर्व पुलिस महानिदेशक एस.के.राऊत ने की। विषय की प्रस्तावना अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और विदेश नीति के अध्येता डॉ. अरविंद तिवारी ने रखी। प्रसिद्ध विचारक रामेश्वर शुक्ल,कुसुमलता केडिया समेत कई अन्य गणमान्य लोगों ने भी इस संगोष्ठी में भाग लिया। इस दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच की नवगठित भोपाल इकाई की भी घोषणा की गई। कार्यक्रम का संचालन देवांजन बोस ने और आभार प्रदर्शन आशुतोष ने किया।

    श्री गोलोक बिहारी राय ने कहा कि कुंभ के दौरान 14 फरवरी को जब पुलवामा हमले की सूचना पहुंची तो कुंभ मेला परिसर के तमाम पंडालों में बैचेनी की लहर दौड़ गई थी। लाखों धर्मप्रेमी नागरिकों के बीच किसी राष्ट्रीय विषय पर विषाद की इस घटना को देखकर साफ समझा जा सकता है देश से जुड़े हर भारतीय की संवेदनाएं राष्ट्र के साथ किस गहराई से एकाकार हैं। इसी के बाद 14 मार्च को देश के कुछ चिंतकों ने फैसला किया कि अब वे और पाकिस्तान नहीं चाहेंगे। इसी चिंता ने नो मोर पाकिस्तान आंदोलन को जन्म दिया और अब देश में इस विषय पर जनमत तैयार किया जा रहा है कि हम पाकिस्तान जैसे असफल विचार को और समर्थन नहीं देंगे। जो लोग इस विचार के खिलाफ पाकिस्तान में ही रहकर संघर्ष कर रहे हैं हम उन्हें अपना नैतिक समर्थन देंगे। जिस तरह यूरोप के छोटे छोटे देश एक साथ रहकर विकास की ऊंचाईयां छूने में सफल हुए हैं उसी तरह हम भी दक्षिण एशिया के विकास में, अपने पड़ौसी बलूचों और अन्य नागरिकों को अपना नैतिक समर्थन देंगे। यह कार्य हम अपने अपने शहर में रहकर भी कर सकते हैं।

    उन्होंने कहा कि जिस तरह बंगलादेश के लोगों ने सोचा कि हम बंगला भाषी हैं तो उर्दू भाषियों के अत्याचार क्यों सहें और इसी विचार ने एक नए देश को जन्म दे दिया। बंग्लादेश के लोगों ने मार्च 1971 में खुद को बंगला राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत किया था और 16 दिसंबर 1971 को बंगलादेश का एक नए देश के रूप में उदय हो गया था। भारत की सेना ने निश्चित रूप से इसमें बड़ी भूमिका निभाई थी लेकिन तब सूचना का तंत्र कमजोर हुआ करता था और मुक्तिवाहिनी के नेतृत्व में संग्राम लड़ रहे बंग्लादेशियों को इस संघर्ष की मंहगी कीमत चुकानी पड़ी थी। आज पूरी दुनिया के देश पाकिस्तान को आतंकवाद का जन्मदाता मानते हैं। पूरी दुनिया में कहीं भी आतंकवादी वारदातें होती हैं तो उनकी जड़ें पाकिस्तान में पाई जाती हैं। इस आपराधिक गतिविधियों में पूरा पाकिस्तान शामिल नहीं है। वहां के लोग इस नीति से असहमत हैं और कई प्रांतों में अपनी अस्मिता अलग स्थापित करने की लड़ाई चल रही है। पाकिस्तान के फौजी हुक्मरान उन्हें बंदूक के बल पर एक राष्ट्र के तले खड़े होने को मजबूर कर रहे हैं।ऐसे में वहां के समुदायों को अपनी पहचान स्थापित करना अधिक कठिन नहीं होगा।

    उन्होंने कहा कि पाकिस्तान शुरु से कई वैश्विक शक्तियों के हाथ का खिलौना बना रहा है। चीन ने सिल्क रूट के जरिए या अन्य अभियानों के माध्यम से पाकिस्तान को मंहगा कर्ज दे रखा है। जिसे चुकाना पाकिस्तान के बस की बात नहीं है। पाकिस्तान में बड़ी संख्या में चीन के निवेशक पहुंच चुके हैं। कई पाकिस्तानियों ने तो अपने मकान केवल इसलिए खाली छोड़ रखे हैं कि वे उन्हें चीन से आने वाले लोगों को किराए पर दे सकेंगे। सिल्क रूट के हर दो तीन सौ किलोमीटर पर चीनी भाषा मंदारिन सिखाने वाले स्कूल खुल गए हैं। बडी़ संख्या में पाकिस्तानी लड़कियां चीनी रेडलाईट एरिया में भेजी गईं हैं। ऐसे में भारत को अपनी नीति बदलनी होगी और पाकिस्तान के उद्यमी समुदायों को उनकी अस्मिता स्थापित करने के अभियानों को अपना नैतिक समर्थन देना होगा।

    उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ही विश्व में ऐसा अनोखा देश है जहां की राष्ट्रीयता इस्लाम है। दुनिया का कोई देश धर्म को राष्ट्रीयता से जोड़कर नहीं देखता। यही वजह है कि धर्म की आड़ में पनपी अनैतिकता ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था चौपट कर दी है। उन्होंने बताया कि पाकिस्तानी दार्शनिक डॉ. अबरार ने तो इन हालात को देखकर कहा है कि वर्ष 2027 तक पाकिस्तान नाम की चिड़िया विलुप्त हो जाएगी। हमें अपनी वैश्विक यात्रा जारी रखना है इसके लिए पाकिस्तान का अब और न होना जरूरी है। भारत के पडौ़स में छोटे देश होंगे तो वे अपनी विकास यात्रा आसानी से जारी रख सकते हैं। पाकिस्तान जिस विचार पर अलग हुआ था उसकी असफलता छुपाने के लिए वहां के शासक गलतियों पर गलतियां किए जा रहे हैं जिससे समूचे दक्षिण एशिया की विकास यात्रा प्रभावित हो रही है।

    कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पूर्व पुलिस महानिदेशक एसके राऊत ने कहा कि पहले देश की राष्ट्रीय नीति गोपनीय रखी जाती थी लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच ने जिस तरह देश भर में जनसंवाद का आंदोलन छेड़ा उसके बाद अब देश की विदेश नीति में आम जनता के विचार भी सहयोगी साबित हो रहे हैं। चीन को लेकर सरकार की जो भी विदेश नीति हो पर देश में नागरिकता बोध का केन्द्र राष्ट्र बन जाने के बाद विदेशी माल का बहिष्कार करने का भाव तो जनता के बीच जागया ही जा सकता है। पाकिस्तान में लोग सफल राष्ट्र के रूप में खड़े होने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हमारा नैतिक समर्थन उन्हें भी सुखी बनाएगा और भारत की विकास यात्रा को भी ऊंचाईयों तक ले जाएगा। उन्होंने आव्हान किया कि ज्यादा से ज्यादा लोग राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच से जुड़ें और भारत को विश्व कल्याण के लिए नेतृत्व करने वाला देश बनाने में सहयोगी बनें।

  • आकाश की रिहाई की पहल करे सरकार

    आकाश की रिहाई की पहल करे सरकार

    कैलाश विजयवर्गीय के बेटे आकाश विजयवर्गीय ने मकान गिराने गए नगर निगम के अफसर को क्रिकेट के बैट से धुन डाला। अदालत ने इसे सरकारी काम में हस्तक्षेप बताते हुए आकाश को चौदह दिन की हिरासत में भेज दिया। मीडिया ने इसे विधायक की गुंडागर्दी बताते हुए सरकार की चिरौरी करना शुरु कर दी। इंदौर में इसे लेकर बावेला मचा है। आकाश ने अपने बयान में कहा कि लोक निर्माण मंत्री सज्जन सिंह वर्मा के रिश्तेदार(करीबी) ने वो पुराना मकान खरीद लिया था। नगर निगम का अमला बारिश के मौसम में उसे गिराने पहुंचा था। ये कवायद पिछले साल भी की गई थी। परिवार ने बेघर होने के बचने के लिए मोहलत मांगी तो निगम के अफसर ने महिलाओं को पैर पकड़कर बाहर घसीटना शुरु कर दिया। बगैर महिला पुलिस बुलाए ये कार्रवाई आनन फानन में इसलिए की गई क्योंकि निगम के अमले ने मकान खाली करने की सुपारी ली थी। जब इस बदतमीजी की खबर लोगों को मिली तो भीड़ इकट्ठी हो गई। लोगों ने इंदौर 3 के विधायक होने के नाते आकाश को बुला लिया। निगम का बायस नाम का अफसर खुद को कर्तव्यनिष्ठ बताने में जुटा था और लोगों में नाराजगी बढ़ती जा रही थी। विधायक ने निगम अमले को भीड़ के आक्रोश से बचाने के लिए उन्हें दस मिनिट में वापस लौट जाने को कहा। इस पर भी बायस नहीं माना और ज्यादा पुलिस बल को जुटाने का प्रयास करने लगा। निगम के अमले ने जो अप्रिय स्थितियां निर्मित की उसका नतीजा ये हुआ कि आकाश विजयवर्गीय ने क्रिकेट के बैट से धक्का देकर अफसर को घटना स्थल से जाने को कहा। सरकार के कारिंदों ने इस घटना के लिए विधायक को दोषी बताते हुए उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने का दबाव बनाना शुरु कर दिया।मकान खाली कराने की कवायद सामाजिक दबाव के साथ राजी खुशी से भी की जा सकती थी। भोपाल में चल रही कैबिनेट बैठक में ये मामला इसी नजरिए से रखा गया। सरकार ने बगैर सोचे समझे पुलिस को हरी झंडी दिखा दी। सरकार के उत्साही गृह मंत्री बालाबच्चन और लोक निर्माण मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने आग में घी डालने का काम किया और पुलिस ने आकाश को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। आकाश के वकील इस घटनाक्रम को सही ढंग से प्रस्तुत नहीं कर पाए। कैलाश विजय वर्गीय पर घटना की निंदा करने का दबाव बनाने वाले पत्रकार को जब नसीहत दी गई कि वह जज बनने का प्रयास न करे तो उसे भी मीडिया ने प्रेस की आजादी पर हमला बताना शुरु कर दिया। दरअसल इस पूरे घटनाक्रम में अफसरों ने सरकार को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। इंदौर में नगर निगम का अमला जिस तरह भू माफिया बनकर काम कर रहा था उसके कारण ये अप्रिय स्थितियां निर्मित हुई हैं। नगर निगम का अमला पिछले एक साल से इस परिवार के विस्थापन और समझाईश में क्यों असफल हुआ इसकी वजह नहीं खोजी जा रही है। यदि मकान मंत्रीजी के करीबी ने भी खरीदा था तो निगम का अमला सदाशयता पूर्वक रहवासी परिवार के विस्थापन की कार्रवाई कर सकता था। बारिश के मौसम में परिवार को सुरक्षित ठिकाने पर पहुंचाना निगम की जवाबदारी थी। निगम के पास इसके कई वैकल्पिक प्लान मौजूद थे। इसके बावजूद जिस तरह से परिवार की महिलाओं से बदसलूकी की गई उसके कारण तनाव पनपना स्वाभाविक था। जब इंदौर में ही हजारों परिवार विवादित प्रापर्टीज पर जमे हैं और निगम का अमला उन्हें खाली नहीं करा पा रहा है तो एक निरीह परिवार पर बहादुरी दिखाने की जरूरत निगम के अमले को क्यों पड़ गई। सरकार के काबिना मंत्री को ऐसी क्या जल्दबाजी थी जो उन्होंने निगम के अमले पर मकान खाली करने का दबाव बना डाला। दरअसल इंदौर का ये विवादित मकान शहर के विकास के कारण बहुत मंहगा स्थान बन चुका है। इसी वजह से मकान मालिक ने उसे मंहगी कीमत में बेच दिया। अब उस मंहगी प्रापर्टी को बाजार में बेचने लायक माल बनाने के लिए ही निगम के माध्यम से उसे जर्जर प्रापर्टी घोषित कराया गया था। जबकि मकान इस स्थिति में नहीं है कि खुद ब खुद गिर जाएगा। निगम कमिश्नर से लेकर अतिक्रमण अमले तक सभी इस प्रक्रिया में शामिल रहे। बेशक इस बेदखली को कानूनी रूप दिया गया है। इसके बावजूद मानवीय दृष्टिकोण से बेदखली को सहज बनाने में इंदौर नगर निगम पूरी तरह असफल साबित हुआ। निगम के किसी अफसर को ये छूट नहीं कि वो अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए नागरिकों पर बर्बरता करने लग जाए। यदि निगम का अमला अपनी कार्रवाई को रणनीतिक रूप से अंजाम देता तो ये हालात नहीं बनते। निगम के अमले को भीड़ के आक्रोश से बचाने के लिए विधायक आकाश विजयवर्गीय ने जिस हिकमतअमली का प्रयोग किया उसकी सराहना की जानी चाहिए। इसके बावजूद सरकार के चिलमखोर उसे विधायक की बदसुलूकी बताने की कोशिश कर रहे हैं। मुख्यमंत्री कमलनाथ हों या सरकार के आला अफसरान सभी को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। आकाश विजयवर्गीय पर कानून का डंडा चलाना आज इंदौर में सरकार की ज्यादति माना जा रहा है। इस घटनाक्रम ने आकाश को जन जन का नेता बना दिया है।सिख संस्कृति में तो लोकहित के लिए लड़ने वाले को शूरवीर कहा जाता है। निगम के अमले की असफलता को छुपाने के लिए सरकार जिस तरह राजनीतिक विद्वेष से ग्रसित होकर अधिकारों का दुरुपयोग कर रही है उससे अल्पमत की सरकार के प्रति जन आक्रोश बढ़ने लगा है। सरकार के सभी नेता कह रहे हैं कि कानून अपना काम करेगा। उन्होंने घटना की निंदा करना और बयान देना भी शुरु कर दिया। अब जबकि घटना का दूसरा पहलू भी सामने आ गया है तब सरकार को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। इंदौर में नगर निगम के अमले को खदेड़ने का अभियान सरकार को खदेड़ने का जनआंदोलन न बनने पाए इसके पहले सरकार को सदाशयता दिखाते हुए विधायक आकाश विजयवर्गीय की रिहाई के लिए आगे आना चाहिए। निगम के अमले को जनता से बदसुलूकी करने के लिए भी दंडित किया जाना चाहिए।मौजूदा हालात में यही उचित होगा।

  • गरीबों को भी मिलेगा आरक्षण का लाभ

    गरीबों को भी मिलेगा आरक्षण का लाभ

    भोपाल/इन्दौर मेट्रो रेल के लिए त्रिपक्षीय करार को मंजूरी 
    मंत्रि-परिषद के निर्णय 

    भोपाल,26 जून(प्रेस सूचना केन्द्र)। मुख्यमंत्री कमल नाथ की अध्यक्षता में मंत्रालय में हुई मंत्रि-परिषद की बैठक में  आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ई.डब्ल्यू.एस) को 10 प्रतिशत आरक्षण की मंजूरी दी गई। आरक्षण का लाभ उन लोगों को मिलेगा, जिनकी सभी स्त्रोतों से आय 8 लाख सालाना से ज्यादा नहीं हो, उनके स्वामित्व में 5 एकड़ से ज्यादा कृषि भूमि ना हो (इसमें उसर, बंजर, बीहड़ और पथरीली जमीन शामिल नहीं है), नगर निगम क्षेत्र में 1200 वर्ग फीट मकान/फ्लैट से ज्यादा आकार का आवास न हो, नगर पालिका क्षेत्र में 1500 वर्ग फीट मकान/फ्लैट और नगर पंचायत क्षेत्र में 1800 वर्ग फीट मकान/फ्लैट से ज्यादा आकार का आवास न हो, को आरक्षण का लाभ मिल सकेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में कोई सीमा निर्धारित‍नहीं की गई है।

     बार लायसेंस व्यवस्था का सरलीकरण

    मंत्रि-परिषद द्वारा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए होटल बार लायसेंस व्यवस्था में संशोधन किया गया है। इसके तहत एक से अधिक तल पर रेस्तरां बार संचालित करने की अनुमति के लिए प्रत्येक अतिरिक्त बार के लिए 10 प्रतिशत अधिक लायसेंस फीस ली जाएगी। नवीन होटल बार लायसेंस के लिए होटल में कम से कम 25 कमरे होने का प्रावधान किया गया है। बार लायसेंस के लिए मदिरा की निर्धारित धारण क्षमता में 25 प्रतिशत की वृद्धि की गई।

    मंत्रि-परिषद द्वारा रिसोर्ट बार (एफ.एल.3क) लायसेंस के लिए निर्धारित मापदण्डों में संशोधन एवं वन्य पर्यटन क्षेत्रों के अतिरिक्त अन्य पर्यटन क्षेत्रों में लायसेंस स्वीकृत किये जाने का निर्णय लिया गया। होटल बार (एफ.एल.3) रिसोर्ट बार (एफ.एल.3क), सिविलियन क्लब बार (एफ.एल.4) और व्यवसायी क्लब(एफ.एल.4ए) लायसेंसी को 15 प्रतिशत अतिरिक्त राशि जमा कराकर परिसर में अन्यत्र मदिरा की सुविधा उपलब्ध कराये जाने की अनुमति प्रदान की गई। इसके अतिरिक्त, विशिष्ट श्रेणी के होटलों के समान होटल बार एवं क्लब लायसेंस को विदेशी मदिरा भण्डागार से मदिरा प्रदाय की सुविधा की स्वीकृति दी गई। साथ ही समुचित राजस्व सुनिशिचत करने के लिए बार लायसेंसों के लिए वेट एवं जीएसटी के अन्तर्गत पंजीकृत होने की शर्त एवं उसकी देयता  अनिवार्य होगी। 

    भोपाल/इन्दौर मेट्रो रेल के लिए त्रिपक्षीय करार

    मंत्रि-परिषद द्वारा भोपाल एवं इन्दौर मेट्रो रेल के लिए केन्द्र शासन, राज्य शासन एवं मध्यप्रदेश मेट्रो रेल कम्पनी लिमिटेड के बीच त्रिपक्षीय करार (एमओयू) किये जाने की स्वीकृति प्रदान की गई। राज्य शासन की ओर से मुख्य सचिव तथा मध्यप्रदेश मेट्रो रेल कम्पनी के मैनेजिंग डायरेक्टर को करार किये जाने के लिए अधिकृत किया गया।

    मंत्रि-परिषद द्वारा वाणिज्यिक कर विभाग के अन्तर्गत सूचना एवं प्रौद्योगिकी योजना की निरंतरता वर्ष 2019-20 के लिए 41.65 करोड़ रूपये की स्वीकृति प्रदान की गई।

  • सब्सिडी के बाद भी बिजली संकट चिंताजनक बोले कमलनाथ

    सब्सिडी के बाद भी बिजली संकट चिंताजनक बोले कमलनाथ

    मुख्यमंत्री की म.प्र. यूनाइटेड फोरम फॉर पावर इंप्लाईज एवं इंजीनियर्स एसोसिएशन के प्रतिनिधि-मंडल से चर्चा 

    भोपाल,25 जून(प्रेस सूचना केन्द्र)। मुख्यमंत्री कमल नाथ ने कहा है कि विद्युत उपभोक्ताओं की समस्याओं के समाधान से ही विद्युतकर्मियों की दिक्कतों का हल संभव है। विद्युतकर्मी बिजली उपभोक्ताओं को निरंतर और गुणवत्तापूर्ण सेवाएँ उपलब्ध करवाएँ। सरकार उनके हितों का पूरा संरक्षण करेगी। श्री नाथ आज मंत्रालय में मध्यप्रदेश यूनाइटेड फोरम फॉर पावर इंप्लाईज एवं इंजीनियर्स एसोसिएशन के प्रतिनिधि मंडल से चर्चा कर रहे थे।

    मुख्यमंत्री श्री नाथ ने कहा कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में विद्युत उपभोक्ताओं को निर्बाध बिजली मिले, जिससे वे संतुष्ट हों और विद्युत विभाग की खराब छवि में सुधार आए। इसके लिए सभी विद्युत वितरण कंपनी के कर्मचारी समर्पण भावना से काम करें। मुख्यमंत्री ने कहा कि आज सभी विद्युतकर्मियों को आत्म-चिंतन करने की आवश्यकता है। विद्युत उपभोक्ताओं के हित संरक्षण के साथ विद्युतकर्मियों की परेशानी दूर करने के लिए सरकार हर वह निर्णय लेगी, जो प्रदेश में विद्युत वितरण की व्यवस्था को सुदृढ़ बनाएगा।

    विद्युत उपभोक्ताओं की संतुष्टि सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता

    मुख्यमंत्री ने कहा कि बिजली की अघोषित कटौती और विद्युत वितरण व्यवस्था सुचारु न होने के कारण सरकार को नागरिकों की सबसे ज्यादा आलोचना का शिकार होना पड़ा है। उन्होंने कहा कि जरूरत इस बात की है कि विद्युत विभाग अपनी छवि सुधारने के लिए काम-काज में व्यापक सुधार लाए। मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारी सबसे बड़ी चिंता यह है कि प्रदेश में विद्युत व्यवस्था स्थाई रूप से सुदृढ़ बने। इसके लिए हमें दीर्घकालीन उपायों पर विचार करना होगा। उन्होंने कहा उपभोक्ताओं की संतुष्टि सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसके साथ कोई भी समझौता नहीं किया जाएगा।

    उच्च गुणवत्ता के विद्युत उपकरण ही खरीदें

    मुख्यमंत्री श्री नाथ ने कहा कि हमें माँग और आपूर्ति के बीच में सामंजस्य लाना होगा। ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन में हो रहे घाटे को कम करने की दिशा में भी ठोस कदम उठाने होंगे। विद्युत चोरी पर सख्ती के साथ अंकुश लगाना होगा। श्री नाथ ने कहा कि उच्च गुणवत्ता के उपकरण ही खरीदे जाएँ। इसके लिए निगरानी आधारित व्यवस्था बनानी होगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि आज सरकार सब्सिडी की बड़ी राशि विद्युत मंडल को दे रही है। उसके बाद भी कृषि और गैर कृषि क्षेत्रों में विद्युत व्यवस्था को लेकर असंतोष है, यह चिंता का विषय है। मुख्यमंत्री ने ऊर्जा के गैर पारंपरिक स्रोत पर भी विचार करने को कहा। इससे सस्ती बिजली का उत्पादन होगा और सरकार पर पड़ने वाले वित्तीय भार में भी कमी आएगी।

    मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ ने एसोसिएशन के सभी अधिकारियों-कर्मचारियों से कहा कि वे प्रदेश में विद्युत वितरण में सुधार लाने, ट्राँसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन को कम करने और उच्च गुणवत्ता के उपकरण क्रय करने के संबंध में एक समग्र योजना बना कर दें। मुख्यमंत्री ने कहा कि वे एसोसिएशन से सतत् संवाद के लिए उपलब्ध है। जब भी आवश्यकता हो, वे उनसे मिल सकते हैं।

    बैठक में मुख्य सचिव श्री एस.आर. मोहंती और अपर मुख्य सचिव ऊर्जा श्री आई.सी.पी. केशरी उपस्थित थे।

  • हीरा खदान सौदे में आदिवासियों की आड़

    हीरा खदान सौदे में आदिवासियों की आड़

    छतरपुर के बक्स्वाहा की हीरा खदान की किंबरलाईट पाईपलाईन नीलाम करने की मंजूरी कमलनाथ सरकार ने अपनी कैबिनेट से ले ली है। सरकार का अनुमान है कि इस खदान के नीलाम करने से राज्य को साठ हजार करोड़ रुपए की आमदनी हो जाएगी। इससे सरकार को भारी तरलता मिल जाएगी और वह कमलनाथ को विकास पुरुष बताने का अपना अभियान सफल बना लेगी। इस सिलसिले में मुख्यमंत्री कमलनाथ दो बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिल चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनसे आदिवासी इलाकों में विस्थापन की समस्या को लेकर कार्रवाई प्रचलन में होने की बात कही थी। सरकार पर दबाव बनाने के लिए कमलनाथ सरकार ने आदिवासियों को अन्य इलाकों में पट्टे की जमीन वितरित करने का अभियान शुरु करने की तैयारी कर डाली। ये जानकारी पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को मिल गई और उन्होंने आदिवासियों की ट्रेक्टर ट्राली रैली निकालकर कमलनाथ सरकार को ही घेर दिया। आनन फानन में मुख्यमंत्री कमलनाथ ने आदिवासियों की सभी मांगें मान लेने की घोषणा कर दी। शिवराज सिंह चौहान ने इसे आदिवासियों की जीत बताकर श्रेय लूटना शुरु कर दिया।

    हालांकि शिवराज सिंह चौहान की इस भूमिका पर जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा ने प्रेस कांफ्रेंस करके कहा कि पिछले पंद्रह सालों में वे आदिवासियों की समस्याओं का समाधान नहीं कर सके। जब हमारी सरकार ने आदिवासियों के हित में फैसले लिए हैं तो वे श्रेय लूटने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि शिवराज सिंह को दिल्ली जाकर केन्द्र सरकार से मांग करनी चाहिए ताकि आदिवासियों के लिए लंबित मांगों पर भारत सरकार सकारात्मक फैसले ले सके।

    आदिवासियों को वनभूमियों पर पट्टे देने के मामले लंबे समय से लंबित पड़े थे। जंगलों को सुरक्षित रखने के लिए पिछली शिवराज सिंह सरकार वनभूमियों से विस्थापन का अभियान चलाती रही थी। इससे आदिवासियों में आक्रोश फैल गया था। विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने आदिवासियों को उन्हीं जमीनों पर पट्टे देने का वादा किया था। इसके चलते कांग्रेस को 31 आदिवासी बाहुल्य सीटों पर विजय मिली थी। मुख्यमंत्री कमलनाथ को अफसरों ने सलाह दी थी कि जमीनों पर कब्जे को लेकर प्रकरण लंबित हैं। ज्यादातर मामलों में आदिवासियों के नाम पर जंगल माफिया ने अतिक्रमण किया है। मुख्यमंत्री ने तमाम आपत्तियों को दरकिनार करते हुए पट्टे देने को मंजूरी दे दी। सरकार ने फैसला लिया है कि यदि कोई सरपंच भी चाहे तो आदिवासियों को जमीनों पर पट्टे दे सकता है।

    हालांकि आदिवासियों के इस अधिकार के पीछे असली वजह छतरपुर की वो हीरा खदान है जिसे नीलाम करने का लक्ष्य लेकर कांग्रेस सरकार ने कर्जमाफी और बेरोजगारी भत्ते जैसे वादे किये थे। सरकार के पास आर्थिक संसाधन नहीं हैं। इसकी वजह से ये घोषणाएं पूरी नहीं हो पा रहीं हैं। बिजली बिल आधा करने का वादा भी पूरा नहीं हो पा रहा है। जनता को भारी भरकम बिजली बिल चुकाना पड़ रहे हैं। इसे देखते हुए कमलनाथ सरकार आदिवासियों को आगे करके खदानों की लीज मंजूर करने के लिए केन्द्र पर दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। रेतखदानें नीलाम करके तो कमलनाथ कांग्रेस ने अपने नेताओं को धंधे पर लगाना शुरु कर ही दिया है। अब उसे हीरा खदान नीलाम करने का टारगेट पूरा करना है। केवल इस खदान के नीलाम हो जाने से सरकार को एकमुश्त आय का स्रोत मिल जाएगा।

    भारत सरकार ने फिलहाल इस खदान को नीलाम न करने की रणनीति बनाई है। भारत सरकार का विचार है कि जब दुनिया भर के हीरा खनिज खदानें समाप्त हो जाएंगी तब वह इस खदान को नीलाम करेगी। पिछले पंद्रह सालों में शिवराज सिंह सरकार भी ये खदान नीलाम नहीं कर पाई थी। जबकि कमलनाथ कांग्रेस का लक्ष्य केवल इस हीरा खदान को नीलाम करना है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भी देवभोग हीरा खदान के माध्यम से डी बियर्स से संबंधों के लिए बदनाम हो चुके हैं। अब कमलनाथ इस हीरा खदान को लेकर आदिवासियों को लामबंद करने में जुट गए हैं। उन्होंने वनभूमियों पर अतिक्रमण के तमाम प्रकरणों को अनदेखा करके जंगलों की लूट की छूट दे दी है।

    दरअसल खुद को विकास पुरुष बताने वाले मुख्यमंत्री कमलनाथ को अपनी सरकार के छह महीने बीत जाने पर ही काफी सफलता अनुभव हो रही है। सरकार बन जाने और तमाम उलटबांसियों के बाद भी चलते रहने का भरोसा खुद कांग्रेस के नेताओं को भी नहीं रहा है। जनता और सरकार के बीच जैसी संवादहीनता पनप गई है उसे देखते हुए मुख्यमंत्री कमलनाथ ने आज राज्य मंत्रालय में प्रवक्ताओं की बैठक बुलाई और उनसे सरकार के उल्लेखनीय कामकाजों के बारे में जनता से संवाद करने का निर्देश दिया।

    हीरा खदान पर भारत सरकार की मंजूरी मिलती है या नहीं ये तो आगे आने वाला समय ही बताएगा पर कमलनाथ सरकार को आर्थिक संसाधन जुटाने में जो परेशानी आ रही है उसके चलते प्रदेश में आक्रोश तेजी से भड़क रहा है।नगरीय निकायों के चुनावों की तैयारियां चल रहीं हैं और सरकार ने पत्रकारों के विज्ञापनों की उधारी भी नहीं चुकाई है। ऐसे में पत्रकारों की ओर से सरकार के कामकाज की तटस्थ समीक्षा शुरु हो गई है। जिसके चलते कमलनाथ सरकार को भय है कि प्रदेश में जन विद्रोह पनप सकता है। इसे देखते हुए कमलनाथ सरकार तेजी से खैरात बांटने के फैसले ले रही है। जबकि छिंदवाड़ा माडल का हवाला देकर सत्ता में आए कमलनाथ का औद्योगिक प्रबंधन चौखाने चित्त हो गया है। सरकार अपने पुराने ठेकेदारों को ही भुगतान नहीं कर पा रही है ऐसे में नए रोजगार सृजित करना सरकार के बस में नहीं है। सरकार को अपने कर्मचारियों को हर महीने 3200 करोड़ रुपए का वेतन भुगतान करना पड़ता है, जबकि उसकी आय में चार सौ करोड़ से ज्यादा की गिरावट आ गई है। ये रकम सरकारी अमले के सहयोग से कथित तौर पर कालाबाजार में पहुंचाया जा रहा है। कमलनाथ और उनके मंत्री बार बार झूठ बोलते हैं कि पिछली सरकार खजाना खाली करके गई है जबकि सरकार को हर महीने कर, लीज आदि से लगभग 4500 करोड़ की आय होती है। इसके बावजूद कमलनाथ सरकार अठारह हजार करोड़ से ज्यादा का कर्ज ले चुकी है। देखना है कि गहरे आर्थिक संकट से जूझती कमलनाथ सरकार इन चुनौतियों के बीच सफल हो पाती है या फिर भाजपा नेताओं के आक्रमण के चलते दम तोड़ देती है।

  • भगवा को आतंकवादी बताने वाले दिग्विजय सिंह अब खुद के हिंदू होने के प्रमाणपत्र बंटवाने लगे

    भगवा को आतंकवादी बताने वाले दिग्विजय सिंह अब खुद के हिंदू होने के प्रमाणपत्र बंटवाने लगे

    भोपाल,29 अप्रैल (प्रेस सूचना केन्द्र)।भाजपा की लोकसभा प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा के खिलाफ षड़यंत्र करके भगवा को आतंकवादी बताने वाले दिग्विजय सिंह अब खुद के हिंदू होने के प्रमाणपत्र बंटवा रहे हैं। जैसे जैसे मतदान की तारीख नजदीक आ रही है उन्होंने साधु संतों की फौज सड़कों पर उतार दी है जो लोगों को कांग्रेस प्रत्याशी दिग्विजय सिंह के हिंदू होने के प्रमाण पत्र बांट रहे हैं। आज ऐसे ही एक कथित महामंडलेश्वर को पत्रकारों के तीखे सवालों ने ऐसे झमेले में डाल दिया कि वे पहले तो पांच क्विंटल मिर्ची से यज्ञ करने फिर समाधि लेने की धमकी देने लग गए।

    कांग्रेस प्रवक्ता फिरोज सिद्दीकि के साथ एक होटल में पत्रकार वार्ता आयोजित करने वाले इस साधु स्वामी बैराग्यानांद ने खुद को निरंजनी अखाड़े के महामंडलेश्वर बताया और कहा कि मैं दिग्विजय सिंह की जीत की गारंटी लेकर आया हूं । अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए मैं पांच क्विंटल मिर्च से यज्ञ करूंगा, और उनकी जीत के लिए समाधि भी लगाऊंगा।पत्रकारों ने उनसे पूछा था कि वे भगवा आतंकवाद की परिभाषा रचकर हिंदुओं को बदनाम करने वाले कांग्रेस के दिग्विजय सिंह की पैरवी क्यों कर रहे हैं। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि नर्मदा की परिक्रमा करके दिग्विजय सिंह खुद को हिंदू साबित कर दिया है।

    पत्रकारों ने सवाल किया कि जो व्यक्ति सत्ता में रहकर साध्वी उमा भारती के बारे में अनर्गल प्रलाप करता था, साध्वी प्रज्ञा को भगवा आतंकवाद की कहानी में प्रताड़ना दिलवाता रहा आप उसकी पैरवी क्यों कर रहे हैं। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि जगतगुरु स्वामी स्वरूपानंद ने अपना आशीर्वाद देकर उन्हें धर्म की सेवा में लगाया है इसलिए बीस हजार साधू घर घर जाकर दिग्विजय सिंह की जीत के लिए वोट मांगेंगे।

    कांग्रेस प्रत्याशी की पैरवी करते हुए बैराग्यानंद अपना आपा खो बैठे और पत्रकारों पर ही अनर्गल आरोप लगाने लगे इस पर कई पत्रकार उखड़ गए और उन्होंने कहा कि हम चुनाव में कोई पार्टी नहीं हैं जो आप हमसे ही सवाल कर रहे हैं। इस बीच कई पत्रकारों से उनका विवाद होने लगा और संचालन कर रहे कांग्रेस प्रवक्ता फिरोज सिद्दीकि ने पत्रकार वार्ता समाप्त कर दी।

  • नए जूते पहिनकर परिवारवाद को कुचलने चलीं साध्वी प्रज्ञा

    नए जूते पहिनकर परिवारवाद को कुचलने चलीं साध्वी प्रज्ञा

    -आलोक सिंघई-

    आमचुनाव में साध्वी प्रज्ञा का नाम आते ही पूरे देश में एक बहस छिड़ गई है। मालेगांव बम धमाके को साम्प्रदायिक रंग देने के लिए जिस तरह से भगवा आतंकवाद की कहानी गढ़ी गई वो परिवारवाद को बचाए रखने के षड़यंत्रों का जीवंत दस्तावेज बन गई है। जिन जिन देशों में परिवारवाद ने सत्ता को अपने घर की चेरी बनाया उन सभी देशों में बाद में तानाशाही का नृशंस तांडव देखने मिला है। पीड़ित और शोषित जनता ने जब उस तानाशाही को कुचला तब जाकर वे देश विकास की सीढ़ियां चढ़ने में कामयाब हुए। साध्वी प्रज्ञा के माध्यम से मोदी सरकार ने उसी जनांदोलन का आव्हान किया है जो परिवारवाद और उसके पापों से देश को निजात दिला सकता है। भाजपा का ये प्रयास कई स्थानों पर तल्ख रूप में भी सामने आया है। पार्टी ने अपने ही कई दिग्गजों के टिकिट काट दिए और नए चेहरों को चुनावी समर में उतारा है। इस बदलाव ने भाजपा के भीतर ही घमासान मचा दिया है। चुनावी टिकिट की मारामारी में इसे मोदी शाह की हेकड़ी बताने का प्रयास किया गया, जबकि नई पीढ़ी के आम मतदाता इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं।

    परिवारवाद, वंशवाद,यारवाद, पैसावाद जैसे शब्द गढ़ने वाले छद्म बुद्धिजीवी केवल किसी परिवार विशेष के सदस्यों को राजनीति में उतारे जाने पर ह्ल्ला मचाते हैं। वे इसके असर और उसके पापों पर चर्चा नहीं करते। यही वजह है कि परिवारवाद का हल्ला तो मचता है लेकिन उससे मुक्ति दिलाने की राह नहीं दिखती। वो कारण भी नहीं समझ आते जो परिवारवाद के लिए खाद पानी का काम करते हैं। नेहरू गांधी परिवार को देश की समस्याओं की जड़ माना जाता है। भारत में 55 वर्षों तक इसी परिवार का शासन रहा है।इसे बनाए रखने के लिए उसके कारिंदों ने तरह तरह के पाप किए। रियासतों, खानदानों को गरीबी दूर करने के नाम पर लूटा। परिवारवाद के खिलाफ अलख जगाने वालों को देशद्रोही बताकर जेलों में सड़ने के लिए मजबूर कर दिया। आज जब इस परिवारवाद के खिलाफ आवाज बुलंद हो रही है तब इस परिवार की जेबी संस्था बन चुकी कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में देशद्रोह कानून को समाप्त करने का वादा किया है। उन कानूनी प्रावधानों को हटाने की बात कही जा रही है जो देश की सेना को कवच प्रदान करते हैं। ये इसलिए हो रहा है क्योंकि मौजूदा सरकार इसी के सहारे कश्मीर में वंशवाद की बेल को काट रही है।

    साध्वी प्रज्ञा एक राष्ट्रवादी परिवार की बेटी हैं। उनके पिता डाक्टर के रूप में जनसेवा करते थे। बचपन से समाजसेवा के संस्कार मिले तो लोगों को करीब से देखने का मौका मिला। जनता को परेशान करने वाले गुंडों से लड़कर उन्होंने जाना कि सरकारें किस तरह असामाजिक तत्वों को प्रश्रय देती हैं। बस यहीं से उनकी राह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर मुड़ गईं। देश को परिवार मानने वालों की ये जमात जगह जगह अपना प्रभाव बढ़ा रही थी। इस पर अंकुश लगाने के लिए इसके उभरते चेहरों पर धब्बे लगाना परिवारवाद की सूची में शामिल था। वर्ष 2002 में जब शिवसेना सुप्रीमो बाला साहब ठाकरे ने पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई की साजिशों से बढ़ती आतंकवादी घटनाओं के खिलाफ हिंदुओं के आत्मघाती दस्तों को तैयार करने का आव्हान किया तो भारत की जांच एजेंसियों ने संभावित घटनाओं पर निगाह रखने के लिए एक अनुसंधान विंग तैयार की थी। इस विंग का उद्देश्य था कि इसकी आड़ में कोई आपराधिक साजिशें न आकार लेने लगें। कहा गया कि मुंबई के सीरियल बमकांड की वजह से 1993 के बाद से एटीएस और एनआईए ने इन अनुसंधानों में महारथ हासिल कर लिया था। यही एक वजह थी कि हेमंत करकरे और उनके सहयोगियों को काम करने की बहुत आजादी मिली। बाद में इसी आजादी का दुरुपयोग आर्थिक साम्राज्य खड़ा करने के लिए किया जाने लगा।

    केन्द्रीय गृहमंत्री रहे सुशील कुमार शिंदे इस सारी कवायद से वाकिफ थे। इस छानबीन की जानकारी के आधार पर दुबई,यूएई के कारोबारियों से भी उनका गहरा संबंध स्थापित हो चुका था।गांधी परिवार के विश्वस्त होने के नाते दिग्विजय सिंह भी उनके करीब आ चुके थे। सूत्र बताते हैं कि जब रिलाइंस पेट्रोकेमिकल्स बाजार से पूंजी उठा रही थी तब दिग्विजय सिंह ने भी उसमें बड़ा निवेश किया था। बाद में गांधी परिवार के हस्तक्षेप के कारण ये कारोबार ठप हो गया और सभी निवेशकों को भारी घाटा उठाना पड़ा। इस प्रक्रिया में दिग्विजय सिंह भी तेल लाबी के नजदीक आ चुके थे। भारत में तेल की खपत बढ़ाने के लिए राजीव गांधी की सरकार ने सार्वजनिक परिवहन की जगह कार बाजार को संरक्षण देना शुरु कर दिया था। ये नीतियां जारी रहें इसके लिए लोगों को आपसी तू तू मैं मैं में उलझाना जरूरी था। बताते हैं कि इसी षड़यंत्र के तहत देश में कई स्थानों पर कम प्रहारक क्षमता वाले बम धमाके किए गए। इसे हिंदू मुस्लिम रंग देने के लिए ही मालेगांव में नमाज पढ़ने जाते मुसलमानों के बीच बम फोड़ा गया।

    दिग्विजय सिंह अपने मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल में साध्वी प्रज्ञा की जांबाजी के किस्से सुन चुके थे। प्रज्ञा से जुड़े सहयोगी संगठनों पर जांच एजेंसियों की निगाह रखे जाने के कारण वे उस नेटवर्क से भी परिचित थे। यही वजह थी कि मालेगांव बम धमाके में हिंदू संगठनों की संलिप्तता दिखाने के लिए साध्वी को आरोपी बनाया गया। प्रताड़ना के बाद उन्हें अपना गवाह बनाकर भगवा आतंकवाद की कहानी को साबित करने का प्रयास भी किया गया। हालांकि इन सबसे डटकर मुकाबला करती हुई साध्वी प्रज्ञा साफ बाहर आ गईं। हेमंत करकरे की मौत के बाद एनआईए को एटीएस की जांच की असलियत मालूम पड़ गई थी।

    आज जब साध्वी प्रज्ञा भोपाल लोकसभा सीट से दिग्विजय सिंह के विरुद्ध मैदान में हैं तब परिवारवाद को बचाने के लिए किए जाने वाले षड़यंत्रों पर गौर किया जाना जरूरी है। परिवारवाद की आड़ में कैसे कैसे आर्थिक षड़यंत्र चलते हैं इन पर गौर करना भी जरूरी है। आपके आसपास ऐसे लोग भरे पड़े हैं जो अनैतिक साधनों का इस्तेमाल करते हुए परिवार को समृद्ध बनाने में जुटे रहते हैं। जो समाज के संसाधनों का उपयोग तो बेशर्मी से करते हैं पर उसे संवारने के लिए कोई प्रयास सफल नहीं होने देते। खुद दिग्विजय सिंह ने गांधी परिवार की तरह अपनी विरासत को संवारने के लिए कैसे सार्वजनिक व्यवस्थाओं को चौपट किया इसकी मिसाल उनके शासनकाल में देखी गई थी। आज भी उनके परिवार के सदस्य राजनीति के मैदान में हैं। हेमंत करकरे के सुपुत्र और दिग्विजय सिंह के सुपुत्र के बीच मित्रता के आधार क्या हैं इसे परखने के लिए किसी को दूर जाने की आवश्यकता नहीं हैं। परिवारवाद के षड़यंत्रों की तो कड़ी हर क्षेत्र में मौजूद है लेकिन राष्ट्रवाद के बहाने इन षड़यंत्रों का खुलासा होना और उन्हें धराशायी करने का ये अवसर भारत में पहली बार आया है।

    दिग्विजय सिंह को मध्यप्रदेश की जनता ने जनक्रांति के माध्यम से हराया था। एक बार फिर जब दिग्विजय सिंह परिवारवाद के शीर्ष पर पहुंचने का जतन कर रहे हैं तब मोदी सरकार ने परिवारवादी षड़यंत्रों की प्रताड़ना झेल चुकी साध्वी प्रज्ञा को मैदान में उतारा है। भोपाल के लोगों को तय करना है कि वे परिवारवाद को संरक्षण देना चाहते हैं या फिर राष्ट्रवाद को। यूं तो सारे देश में ये माडल एक समान रूप से लागू होता है पर भोपाल में इसकी अग्निपरीक्षा हो रही है और साध्वी प्रज्ञा ने नए जूते पहिनकर इससे निपटने की तैयारी कर ली है।

  • हिंदुत्व की नई परिभाषा में है सच्चा राष्ट्रवाद

    हिंदुत्व की नई परिभाषा में है सच्चा राष्ट्रवाद

    डॉ. वेदप्रताप वैदिक

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत ने मध्यप्रदेश यात्रा के दौरान ऐसा बयान दे दिया है, जो हिंदुत्व शब्द की परिभाषा ही बदल सकता है। अभी तक भारत में हिंदू किसे कहा जाता है और अहिंदू किसे? पहले अहिंदू को जानें। जो धर्म भारत के बाहर पैदा हुए, वे अहिंदू यानी ईसाई, इस्लाम, पारसी, यहूदी आदि! जो धर्म भारत में पैदा हुए, वे हिंदू यानी वैदिक, पौराणिक, वैष्णव, शैव, शाक्त, जैन, बौद्ध, सिख, आर्यसमाजी, ब्रह्म समाजी आदि। इन तथाकथित हिंदू धर्म की शाखाओं में चाहे जितना भी परस्पर सैद्धांतिक विरोध हो, उन सब को एक ही छत्र के नीचे स्वीकार किया जाता है। हिंदू-अहिंदू तय करने के लिए किसी सिद्धांत की जरूरत नहीं है। इस निर्णय का आधार सैद्धांतिक नहीं, भौगोलिक है।

    इसे ही आधार मानकर विनायक दामोदर सावरकर ने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘हिंदुत्व’ लिखा था। ‘हिंदुत्व’ की विचारधारा ने ही हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जन्म दिया था। सावरकरजी की मान्यता थी कि जिस व्यक्ति का ‘पुण्यभू’ और ‘पितृभू’ भारत में हो, वही हिंदू है। यानी जिसका पूजा-स्थल, तीर्थ, देवी-देवता, पैगंबर, मसीहा, पवित्र ग्रंथ आदि भारत के बाहर के हों, उसका पुण्यभू भी बाहर ही होगा। उसे आप हिंदू नहीं कह सकते चाहे भारत उसकी पितृभूमि हो यानी उसके पुरखों का जन्म स्थान हो। कोई भारत में पैदा हुआ है लेकिन, उसकी पुण्यभूमि मक्का-मदीना, यरुशलम, रोम या मशद है तो वह खुद को हिंदू कैसे कह सकता है? सावरकरजी की हिंदू की यह परिभाषा उस समय काफी लोकप्रिय हुई, क्योंकि उस समय मुस्लिम लीग का जन्म हो चुका था और इस्लाम के नाम पर अलग राष्ट्र की मांग जोर पकड़ने लगी थी। सावरकर का हिंदुत्व उस समय राष्ट्रवाद का पर्याय-सा बन गया था और लोग समझ रहे थे कि लीगी सांप्रदायिकता का यही करारा जवाब है। स्वयं सावकर ने भारत के आज़ाद होने के 15-20 साल बाद अपने अभिमत पर पुनर्विचार किया था।

    लेकिन संघ-प्रमुख मोहन भागवत ने ‘पुण्यभू’ की छूट देकर ‘हिंदू’ शब्द की परिभाषा को अधिक उदार बना दिया है। उन्होंने बैतूल के भाषण में कहा कि हिंदुस्तान में रहने वाला हर नागरिक उसी तरह हिंदू कहलाएगा, जैसे अमेरिका में रहने वाला हर नागरिक अमेरिकी कहलाता है, उसका धर्म चाहे जो हो। उनके इस तर्क को थोड़ा आगे बढ़ाएं तो यहां तक जा सकता है कि किसी नागरिक के पुरखे या वह स्वयं भी चाहे किसी अन्य देश में पैदा हुआ हो, यदि उसे नागरिकता मिल जाए तो वह खुद को अमेरिकी घोषित कर सकता है। यानी किसी के हिंदू होने में न धर्म आगे आएगा और न ही उसके और उसके पुरखों का जन्म-स्थल। यानी ‘पुण्यभू’ के साथ ‘पितृभू’ की शर्त भी उड़ गई। सैद्धांतिक और भौगोलिक दोनों ही आधार इस नई परिभाषा के कारण पतले पड़ गए।

    यूं भी हिंदू शब्द तो शुद्ध भौगोलिक ही था। यह सिंधु का अपभ्रंश है। सिंध से ही हिंद बना है। प्राचीन फारसी में ‘स’ को ‘ह’ बोला जाता था, जैसे सप्ताह को हफ्ता! सिंध का हिंद हो गया। स्थान का स्तान हो गया। हिंद और स्तान मिलकर ‘हिंदुस्तान’ बन गया। हिंद से ही ‘हिंदू’, ‘हिंदी’, ‘हिंदवी’, ‘हुन्दू’, ‘हन्दू’, ‘इंदू’, ‘इंडीज’, ‘इंडिया’ और ‘इंडियन’ आदि शब्द निकले हैं। विदेशियों के लिए हिंदू शब्द भारतीय का पर्याय है। जब मैं पहली बार चीन गया तो चीन के विद्वान और नेता मुझे ‘इंदुरैन’ ‘इंदुरैन’ बोलते थे। यों तो भारत का प्राचीन नाम आर्यावर्त या भारत या भरतखंड ही है। मैंने वेदों, दर्शनशास्त्रों, उपनिषदों, आरण्यकों, रामायण, महाभारत या गीता में कहीं भी हिंदू शब्द कभी नहीं देखा। इस शब्द का प्रयोग तुर्की, पठानों और मुगलों ने पहले-पहल किया। वे सिंधु नदी पार करके भारत आए थे, इसलिए उन्होंने इस सिंधु-पर क्षेत्र को हिंदू कह दिया।

    भारतीयों ने विदेशियों या मुसलमानों द्वारा दिए गए इस शब्द को स्वीकार कर लिया, क्या यह हमारी उदारता नहीं है? ऐसे में विदेशी मज़हबों के मानने वालों को अपना कहने में हमें एतराज क्यों होना चाहिए? यदि इस देश में भारत के 20-22 करोड़ लोगों को हम अपने से अलग मानेंगे तो हम खुद को राष्ट्रवादी कैसे कहेंगे? इस देश को हम मजहब के आधार पर बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक में बांट देंगे। हम राष्ट्रवादी नहीं होंगे बल्कि जिन्नावादी होंगे। दुनिया में पाकिस्तान ही एक मात्र देश है, जो मजहब के आधार पर बना है। पाकिस्तान की ज्यादातर परेशानियों का कारण भी यही है। भारत का निर्माण या अस्तित्व किसी धर्म, संप्रदाय, मजहब, वंशवाद या जाति के आधार पर नहीं हुआ है। इसीलिए इसे सिर्फ ‘हिंदुओं’ का देश नहीं कहा जा सकता है। हां, इस अर्थ में यह हिंदुओं का देश जरूर है कि जो भी यहां का बाशिंदा है, वह हिंदू है। मोहन भागवत का मंतव्य यही है। यह मंतव्य अत्यंत पवित्र है, क्योंकि यह ‘हम’ और ‘तुम’ के भेद को खत्म करता है। ‘हिंदू’ की इस परिभाषा से सहमत होने का अर्थ है, सभी पूजा-पद्धतियों को स्वीकार करना। गांधीजी इसे ही सर्वधर्म समभाव कहते थे। इसे आधार बनाएं तो फिर राष्ट्रवादिता से कोई भी अछूता नहीं रह सकता। इसी दृष्टि से मैं अपने अभिन्न मित्र और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक स्व. कुप्प सी. सुदर्शन से कहा करता था कि भारत के मुसलमानों को राष्ट्रवादी धारा से जोड़ना बेहद जरूरी है। मुझे खुशी है कि राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के जरिए वही काम आज हो रहा है। यह कितनी अद्‌भुत बात है कि यह मंच तीन तलाक का विरोध कर रहा है और मुस्लिम समाज में अनेक सुधारों की पहल भी कर रहा है। ऐसी पहल सभी धर्मों में क्यों नहीं होती?

    यह इतिहास का एक बड़ा सत्य है और अकाट्य है कि किसी भी विचारधारा या सिद्धांत या धर्म का जन्म चाहे जिस देश में हुआ हो, उसके मानने वालों पर ज्यादा प्रभाव उनके अपने देश की परंपरा का ही होता है। इसी आधार पर दुबई के अपने एक भाषण में अरब श्रोताओं के बीच मैंने यह बात डंके की चोट पर कह दी थी कि भारत का मुसलमान दुनिया का श्रेष्ठतम मुसलमान है, क्योंकि भारत की हजारों साल की परम्परा उसकी रगों में बह रही है। बादशाह खान ने अब से लगभग 50 साल पहले मुझे काबुल में कहा था कि मैं पाकिस्तानी तो पिछले 19-20 साल से हूं, मुसलमान तो मैं हजार साल से हूं, बौद्ध तो मैं ढाई हजार साल से हूं और आर्य-पठान तो पता नहीं, कितने हजारों वर्षों से हूं। यदि इस तथ्य को सभी भारतीय स्वीकार करें तो सोचिए, हमारा राष्ट्रवाद कितना सुदृढ़ होगा।

  • सिंधी अस्मिता से खिलवाड़ बर्दाश्त नहींः केसवानी

    सिंधी अस्मिता से खिलवाड़ बर्दाश्त नहींः केसवानी

    भोपाल। सिंधु एजुकेशनल वेल्फेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष दुर्गेश केसवानी के नेतृत्व में सिन्धी समाज का एक प्रतिनिधि मंडल ने आज मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी से मिलकर इन्दौर के कांग्रेस उम्मीदवार पंकज संघवी के समर्थक द्वारा भाजपा प्रत्याशी शंकर लालवानी एवं सिंधी समाज को अपशब्द कहने वाले के कठोर कार्यवाही की मांग की है।  प्रतिनिधिमण्डल ने कहा कि आदर्श आचार संहिता लागू किये जाने के बाद भी कांग्रेस के इंदौर क्षेत्र से प्रत्याशी पंकज संधवी अपने समर्थक श्रेयश झवर के माध्यम से भाजपा उम्मीदवार शंकर लालवानी को सिंधी दलाल बताया गया है। सिंधी समाज को गोली मारने का कथन कहा गया है। जिसकी शिकायत की वीडियो चुनाव को सौंपी है। शंकर लालवानी भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं एवं सिंधी समाज के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। पंकज संघवी के समर्थक श्रेयश झवर द्वारा ऐसे कथन करने एवं इस अभद्रतापूर्ण टिप्पणी एवं भाषा का प्रयोग करने से प्रत्येक सिंधी समाज के लोगों को ठेस पहुँची है।  शिकायत में कहा है कि शंकर लालवानी न सिर्फ भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता है, सिंधी समाज आदर के केन्द्र भी हैं। उन पर ऐसी अभद्र टिप्पणी करने से सम्पूर्ण सिंधी समाज में रोष है। इसलिये इस प्रकरण को संज्ञान में लेकर आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले इन्दोर क्षेत्र से कांग्रेस के प्रत्याशी श्री पंकज सिंघवी एवं उनकें समर्थक श्रेयश झवर पर नियमानुसार वैधानिक कार्यवाही करने की मांग की।  इस अवसर पर चन्द्रकुमार तक्तानी, जयकिशन आहुजा, श्री महेश शर्मा, मनोज रायचंदानी, रवि सतवानी, रोहित जसवानी, दिनेश दुलानी, श्याम वाधवानी, हरिष कुमार, यश कुमार, संतोष ललवानी, नीरज कुमार सहित अनेक लोग उपस्थित थें। 

  • प्रज्ञा सच्ची राष्ट्रभक्तः विनय सहस्त्र बुद्धे

    प्रज्ञा सच्ची राष्ट्रभक्तः विनय सहस्त्र बुद्धे

                    भोपाल। देशद्रोही मानसिकता के लोग चुनाव लड़ सकते हैं तो भारत माता की एक बिटिया और सच्ची राष्ट्रभक्त भोपाल की प्रतिनिधि क्यों नहीं बन सकती। यह बात भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, मप्र के प्रभारी एवं राज्यसभा सांसद डॉ. विनय सहस्त्रबुद्धे ने बुधवार को टीटी नगर स्थित गैमन परिसर बी ब्लाक में भोपाल लोकसभा क्षेत्र के मुख्य चुनाव कार्यालय का उद्घाटन अवसर पर कही। कार्यक्रम का उद्घाटन मंचासीन पदाधिकारियों ने भारत माता, पंडित दीनदयाल उपाध्याय और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के चित्रों पर दीप प्रज्जवलित कर किया। कार्यक्रम का संचालन जिला अध्यक्ष विकास विरानी एवं आभार आलोक संजर ने माना।

    भगवा आतंकवाद शब्दावली के पीछे घिनौनी राजनीति

                    डॉ. सहस्त्रबुद्धे ने कहा कि भगवा आतंकवाद शब्दावली के गैर जिम्मेदाराना उपयोग के पीछे घिनौनी राजनीति है, जो कार्यकर्ता के नाते हमें समझलेनी चाहिए और जनता के बीच जाकर उसे समझाना चाहिए। आतंकवाद को कुछ लोगों ने मजहब विशेष से जोडऩे की कोशिश की। आतंक की प्रवृत्ति का संबंध एक मजहब विशेष, भगवा रंग के साथ जोडऩा इस संस्कृति का अपमान है। मोदी सरकार ने तलाक पीड़ित मुस्लिम बहिनों के लिए कानून लाने की कोशिश की तो विपक्ष ने सहयोग नहीं किया। साध्वी प्रज्ञा चुनाव मैदान में वोट बैंक की राजनीति को खत्म करने के लिए उतरी हैं इसलिए भोपाल नगरी को एक नया इतिहास रचने का अवसर मिला है। हमें समाज के सभी वर्गों में जाकर बताना है कि साध्वी प्रज्ञा भोपाल के विकास, 26लाख जनता की आकांक्षा को लेकर चुनाव लड़ रही हैं। साध्वी ने सोशल मीडिया पर अपील की है कि आम जनता की अपेक्षाओं को समाहित कर भोपाल का नया स्वरूप बनाया जाएगा।

    यह चुनाव विकास बनाम बंटाढार का है

                    पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं सांसद श्री प्रभात झा ने कहा कि इस चुनाव का महत्व अलग प्रकार से बन गया है। जिस उददेश्य के लिए यह चुनाव हो रहा है, उससे इस कार्यालय की प्रतिष्ठा और अधिक बढ़ जाती है। भोपाल लोकसभा का चुनाव सामान्य न होकर विकास बनाम बंटाढार का चुनाव है, इसलिए हम अपनी-अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करेंगे। कार्यालय के उद्घाटन का संदेश हम अपने कार्य की गति और बढ़ाएंगे। उन्होंने कहा कि ये चुनाव अपने आप में एक इतिहास बनाएगा। इसका अर्थ यह नहीं कर्मभूमि से किए कर्म से जो न्याय युद्ध शुरू हुआ है। उस न्याय युद्ध में न्याय होगा। ईश्वर न्याय करेगा और साध्वी प्रज्ञा चुनाव जीतेंगी। यह इसलिए होगा क्योंकि हम सब विश्वास भाव से काम करेंगे। हम सब साध्वी प्रज्ञा के प्रतीक के रूप में काम करेंगे। कार्यालय और कार्यकर्ता की मर्यादा बढ़ेगी। हमें और अधिक तेजी से जुटना है।

                    कार्यक्रम में लोकसभा प्रभारी जसवंत हाड़ा, प्रदेश उपाध्यक्ष रामेश्वर शर्मा, प्रदेश मंत्री श्रीमती कृष्णा गौर, संभागीय संगठन मंत्री आशुतोष तिवारी, महापौर आलोक शर्मा, प्रदेश प्रवक्ता श्री राहुल कोठारी, भगवानदास सबनानी, डॉ. हितेश वाजपेयी, श्री अंशुल तिवारी, श्री सत्यार्थ अग्रवाल सहित जिला पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता उपस्थित रहे। 

  • कर्ज में डूबी मैट्रो मंहगी पड़ेगी

    कर्ज में डूबी मैट्रो मंहगी पड़ेगी

    दिल्ली9 मार्च,( विनायक चटर्जी)। कुछ सप्ताह पहले लंदन अंडरग्राउंड ने अपना परिचालन शुरू होने की 156वीं वर्षगांठ मनाई। वह दुनिया के शुरुआती रेल तंत्रों में से एक है और उसने दर्जनों शहरी परिवहन नेटवर्क के डिजाइन को प्रभावित किया है। यहां तक कि उसके मशहूर मानचित्र तक का अनुकरण किया गया। दिल्ली मेट्रो में ‘माइंड द गैप (दूरी का ध्यान रखें)’ जैसी उसकी मौलिक घोषणा और उसके मानचित्र को देखने पर लगता है कि उस पर लंदन अंडरग्राउंड मेट्रो का असर है। ऐसा तब है जबकि दिल्ली मेट्रो को पैदा हुए अभी सिर्फ 16 वर्ष हुए हैं। यानी वह लंदन अंडरग्राउंड के कई सालों बाद अस्तित्व में आई है। 

    परंतु बुनियादी ढांचा क्षेत्र में नए होने का एक अर्थ बेहतर होना भी होता है क्योंकि बाद में बनने वाली परियोजनाएं, पिछली परियोजनाओं की सफलता और विफलता से काफी कुछ सीख चुकी होती हैं। बड़े और हवादार स्टेशन, आधुनिक रेल ट्रैक और डिब्बे तक दिल्ली मेट्रो तकनीकी तौर पर न केवल लंदन अंडरग्राउंड बल्कि कई अन्य पुरानी मेट्रो रेल व्यवस्थाओं मसलन न्यूयॉर्क मेट्रो आदि से भी काफी बेहतर है। 

    दिल्ली मेट्रो बहुत तेजी से प्रगति कर रही है। उसके बुनियादी विकास के आंकड़े सफलता की कहानी स्वयं कहते हैं। दिल्ली मेट्रो के ट्रैक की कुल लंबाई अब करीब 327 किलोमीटर हो चुकी है जो लंदन अंडरग्राउंड की 402 किमी की लंबाई के काफी करीब है। लंदन में 270 स्टेशन हैं जबकि दिल्ली में 236 स्टेशन हैं। दिल्ली जल्दी ही उसे पार कर सकता है। उसने 20 वर्ष में कमोबेश वह हासिल कर लिया है जहां तक पहुंचने में लंदन को 150 वर्ष लग गए हैं। 

    परंतु इसे अगर दूसरे तरीके से देखें तो दिल्ली मेट्रो को अभी भी अपनी समकक्ष मेट्रो रेल परियोजनाओं की तुलना में लंबी दूरी तय करनी है। लंदन अंडरग्राउंड में रोजाना 50 लाख लोग यात्रा करते हैं जबकि दिल्ली में हर रोज यात्रा करने वालों की तादाद 25 लाख है। हालांकि लंदन की आबादी दिल्ली की आबादी की तुलना में आधी है। दिल्ली मेट्रो के यात्रियों की तादाद 2017-18 में इससे ठीक एक वर्ष पहले की तुलना में कम ही हुई है। 

    यात्रियों की संख्या में इस कमी के लिए कई लोग लगातार दोबारा किराये में इजाफे को जिम्मेदार बताते हैं। सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वॉयरनमेंट की एक रिपोर्ट में कहा गया कि दिल्ली मेट्रो, वियतनाम की हनोई मेट्रो के बाद दुनिया की दूसरी सबसे महंगी मेट्रो सेवा है। यह आकलन एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति द्वारा अपनी मासिक आय में से मेट्रो यात्रा किराये के रूप में व्यय की जाने वाली औसत राशि पर आधारित है। हालांकि दिल्ली मेट्रो ने स्वयं इसका विरोध करते हुए कहा कि किराये में बढ़ोतरी काफी समय के बाद की गई है। कहा गया कि इस अवधि में राजधानी में औसत वेतन में बढ़ोतरी के साथ किराया उतना ज्यादा नहीं रह गया है। 

    परंतु दिल्ली मेट्रो की यात्रा करने वालों की संख्या मुंबई की उपनगरीय रेल से महज एक तिहाई है। मुंबई की उपनगरीय रेल सेवा अपने आप में लंदन अंडरग्राउंड जैसी ही अहमियत रखती है। दिल्ली मेट्रो के नेटवर्क का विस्तार होने के साथ यह अंतर कम होता जाएगा लेकिन एक सवाल बरकरार है कि आखिर दिल्ली मेट्रो के प्रदर्शन का आकलन किस मानक पर किया जाए? इसके अलावा देश भर में शुरू हो रही नई मेट्रो रेल परियोजनाओं को क्या सबक लेने की आवश्यकता है? उनमें से कई तो दिल्ली मेट्रो के ही ढर्रे पर आगे बढ़ रही हैं।

    दुनिया भर में शहरी मेट्रो तंत्र से जुड़े अहम निर्णयों को इस बात से जूझना पड़ रहा है कि समाज के सभी धड़ों तक उसकी पहुंच और किराये को व्यवहार्य बनाए रखने के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए और इस दौरान सेवा को वित्तीय रूप से भी व्यवहार्य बनाए रखा जाए। यूरोप के अधिकांश देशों और अमेरिका में परिचालन लागत और यात्री किराये के बीच का अनुपात ऐसा है कि राजस्व जुटाने के लिए उनको सब्सिडी अथवा अन्य उपाय अपनाने पड़ते हैं। दिल्ली मेट्रो के किराये में बढ़ोतरी के बाद दिल्ली अथवा केंद्र सरकार की सब्सिडी पर इसकी निर्भरता कम हुई है। दिल्ली मेट्रो अपने परिचालन के लिए इन दो सरकारों पर काफी हद तक निर्भर रही है।

    एक बार फिर न्यूयॉर्क मेट्रो और लंदन मेट्रो के परिचालन पर नजर डालना श्रेयस्कर होगा। लंदन अंडरग्राउंड मेट्रो की यात्री किराये से लागत वसूल करने की क्षमता न्यूयॉर्क की तुलना में कहीं बेहतर है। यह यात्रियों से इतना किराया वसूल कर लेती है कि वह अपनी परिचालन लागत के अतिरिक्त कुछ राशि जुटा ले। इस मामले में न्यूयॉर्क मेट्रो का प्रदर्शन सबसे कमजोर है।

    ऐसा किराये के ढांचे में अंतर की वजह से भी है। लंदन और दिल्ली जैसे मेट्रो तंत्र दूरी या क्षेत्र आधारित मॉडल पर काम करते हैं जहां कोई यात्री जितनी अधिक दूरी तक यात्रा करता है, उतना अधिक किराया चुकाता है। न्यूयॉर्क जैसे शहरों में यात्री किराया तयशुदा है, भले ही वह कितनी भी दूर तक सफर करे। ऐसी व्यवस्था उन उपभोक्ताओं के लिए मुफीद है जो गरीब हैं और कार्यस्थल के आसपास रहने का बोझ नहीं उठा सकते।

    साफ जाहिर है कि न्यूयॉर्क मेट्रो प्रणाली लंदन की तुलना में खासी सस्ती है। हालांकि इसकी भी एक कीमत है जो चुकानी पड़ती है। सब्सिडी के अभाव में कम किराया होने के चलते एक अवधि के बाद सेवा मानकों में कमी आनी शुरू हो जाती है। पटरियों और डिब्बों का रखरखाव और उनकी गुणवत्ता और उन्नयन का काम भी प्रभावित होता है। अचल संपत्ति विकास से कुछ हद तक नुकसान की भरपाई होगी लेकिन देश में तमाम मेट्रो प्रणालियों के पास यह सुविधा नहीं होगी। 

    आखिरकार, सरकारों को अपना पैसा खपाते हुए मेट्रो प्रणालियों को सब्सिडी प्रदान करनी ही होगी। वरना उन्हें किराया इतना अधिक रखना होगा कि गरीब यात्री उसका बोझ ही वहन न कर पाएं। ऐसे में  समाज का वह तबका प्रभावित होगा जिसे इस तेज और किफायती सार्वजनिक परिवहन प्रणाली से सबसे अधिक लाभ होगा। इतना ही नहीं यह शहर की सड़कों को वाहनों के जाम से मुक्त रखने काम भी करता है। ऐसे में हमें सही चयन करना होगा।(लेखक फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।) 

  • मंत्रालय से नहीं पंचायतों से चलती है सरकार बोले कमलनाथ

    मंत्रालय से नहीं पंचायतों से चलती है सरकार बोले कमलनाथ

    योजनाओं को प्रभावी बनाने क्रियान्वयन की प्रक्रिया की होगी समीक्षा 

    भोपाल,5 मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)।मुख्यमंत्री कमल नाथ ने कहा है कि सरकार मंत्रालय से नहीं, पंचायतों से चलती है। पंचायत व्यवस्था योजनाओं और कार्यक्रम के क्रियान्वयन की धुरी है। अच्छी योजनाओं का क्रियान्वयन भी अच्छा होना चाहिये, अन्यथा वे सफल नहीं होगी। उन्होंने कहा कि योजनाओं को ज्यादा से ज्यादा प्रभावी बनाने के लिये योजनाओं के क्रियान्वयन की प्रक्रिया की समीक्षा  की जायेगी।

    मुख्यमंत्री ने  जिला एवं जनपद-पंचायतों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों से कहा कि वे वर्तमान समय के संदर्भ में योजनाओं के क्रियान्वयन के तौर-तरीकों की समीक्षा कर अपने सुझाव दें। सरकार के सहभागी नहीं, सहयोगी बनें। श्री नाथ आज प्रशासन अकादमी में जिला एवं जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों की बैठक को संबोधित कर रहे थे।

    मुख्यमंत्री कमल नाथ ने कहा कि हमारे देश और प्रदेश की अर्थ-व्यवस्था गाँव से जुड़ी है। इसलिये फोकस ग्रामीण क्षेत्र पर है। पंचायत राज इसकी धुरी है । सरकार की योजनाओं का सफलतापूर्वक क्रियान्वयन करने की जिम्मेदारी जिला जनपद पंचायत के सीईओ और पंचायत सचिव की है। उन्होंने कहा कि कई योजनाएँ ऐसी हैं, जो पन्द्रह से बीस साल पहले बनीं। उनका क्रियान्वयन आज वैसा ही नहीं हो सकता है। उसमें परिवर्तन करने की आवश्यकता होगी। उन्होंने मनरेगा और प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना का उल्लेख करते हुए कहा कि वे इन योजनाओं के निर्माण से स्वत: जुड़े हैं। यूपीए सरकार में जब ये योजनाएँ बनी थीं, तब इसके क्रियान्वयन को लेकर कई सुधार करवाये थे। उन्होंने कहा कि समय बदला है, तो सरकार को यह भी बतायें कि क्रियान्वयन की प्रक्रिया में कौन से परिवर्तन करना है ताकि ज्यादा से ज्यादा ग्रामीण क्षेत्रों को लाभ मिले।

    लक्ष्य उत्कृष्ट क्रियान्वयन का बनाये

    मुख्यमंत्री कमल नाथ ने कहा कि सरकार की योजनाओं और कार्यक्रमों की क्रियान्वयन व्यवस्थाओं की समीक्षा और सर्वे कराया जायेगा। पुरानी योजनाओं में क्या परिवर्तन कर सकते हैं, उनके जरिए और अधिक लोगों को कैसे लाभ पहुँचा सकते हैं, ये तथ्य सर्वे का आधार होंगे। उन्होंने जिला और जनपद पंचायत के सीईओ को जनता और सरकार के बीच की कड़ी बताते हुए कहा कि क्रियान्वयन में बदलाव हो, इसकी जिम्मेदारी भी उनकी है।

    बेहतर उपयोग हो ग्रामीण क्षेत्रों के बजट का

    मुख्यमंत्री ने कहा कि आज हमारे देश का हो चाहे प्रदेश का, बजट का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण विकास पर खर्च होता है। ग्रामीण क्षेत्रों का प्रमुख व्यवसाय खेती-किसानी है। किसानों की क्रय शक्ति किस तरह बढ़ायें, इस पर भी हमें सोचना होगा। उन्होंने कहा कि कर्ज माफी स्थाई समाधान नहीं है, यह एक राहत है । इसके आगे यह सोचना होगा कि किसानों के अधिक उत्पादन का कैसे उपयोग करें, क्योंकि इससे ही उनकी आय को दोगुना कर सकते हैं, उनकी क्रय शक्ति को बढ़ा सकते हैं। किसानों की क्रय शक्ति से ही हमारी बहुत सी छोटी-छोटी आर्थिक गतिविधियाँ जुड़ी हैं, जो लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाती हैं। इस चुनौती को हम कैसे सफलता में बदलें, इसमें आप सभी को महत्वपूर्ण दायित्व का निर्वहन करना है।

    जल-संरक्षण बड़ी चुनौती

    मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ ने कहा कि आने वाले दस वर्षों में पानी की उपलब्धता हमारे लिये सबसे बड़ी चुनौती होगी।  इसके लिये हमें विशेष प्रयास करने की जरूरत है। वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को हमें मजबूत बनाना होगा।

    सड़क से सिर्फ आवागमन ही नहीं, निवेश भी आता है

    मुख्यमंत्री ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में बनने वाली सड़कों से सिर्फ आवागमन की सुविधा नहीं होती। सड़क निर्माण से कई प्रकार का निवेश भी आता है, जो लोगों के रोजगार का माध्यम बनता है। हमें इन अवसरों का लाभ उठाना चाहिये।

    सरकार में सहयोगी बनें

    मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ ने कहा कि आज मध्यप्रदेश की शासन व्यवस्था बदली है। हम नई सोच, नई दृष्टि के साथ एक विकासोन्मुखी-जनोन्मुखी प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना करने जा रहे हैं। हमारा लक्ष्य है कि इस प्रदेश में हर व्यक्ति को भोजन, पानी, आवास के साथ एक बेहतर जीवन जीने का वातावरण मिले।  इस नई  व्यवस्था में आपको साथ चलना है। मध्यप्रदेश के विकास का एक नया नक्शा बनाना हमारा संकल्प है। इसमें न केवल आप भागीदारी करें बल्कि सहयोगी भी बनें।

    पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री श्री कमलेश्वर पटेल ने कहा कि प्रदेश की 70 प्रतिशत आबादी के चहुँमुखी विकास की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी जिला एवं जनपद के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों की है। विकास की एक सुनियोजित अवधारणा जमीन पर क्रियान्वित होना चाहिये। इस दिशा में प्रभावी तरीके से काम करने की आवश्यकता है।

    श्री पटेल ने कहा कि मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ की स्पष्ट सोच है कि सरकार आम जनता के हित के लिये बनी है। इसलिये पंचायत से जुड़ी सभी संस्थाओं का दायित्व है कि वे ग्रामीण क्षेत्र की समस्याओं का अपने ही स्तर पर निदान करें ताकि हमारे ग्रामीण भाइयों को भटकना न पड़े। उन्होंने योजनाओं और विभिन्न आर्थिक गतिविधियों के बीच बेहतर तालमेल बनाने को कहा। श्री पटेल ने कहा कि सरकार त्रि-स्तरीय पंचायत राज को सुदृढ़ बनाने के लिये काम कर रही है। इसी कड़ी में मुख्यमंत्री की पहल पर पंचायत पदाधिकारियों की स्वेच्छानुदान राशि में वृद्धि के आदेश जारी भी हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न योजनाओं के अधूरे कार्यों को प्राथमिकता से पूरा किया जाये।

    अपर मुख्य सचिव श्रीमती गौरी सिंह ने विभागीय उपलब्धियों की जानकारी दी। जिला एवं जनपद के सीईओ ने अपने-अपने क्षेत्र में ग्रामीण योजनाओं के सफल क्रियान्वयन की जानकारी भी दी। इस मौके पर मुख्यमंत्री ने नदी पुनर्जीवन पर केन्द्रित पुस्तक का विमोचन भी किया।

  • सरकार अफसरों को बदल सकती है दलालों को नहीं- श्रवण गर्ग

    सरकार अफसरों को बदल सकती है दलालों को नहीं- श्रवण गर्ग

    भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यान माला में चुनाव,समाज और मीडिया पर विचारोत्तेजक चर्चा



    मीडिया का बेअसर हो जाना चिंताजनक बोले जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा


    भोपाल, 3 मार्च।बढ़ते बाजार वाद ने समाज और मीडिया के बीच की दूरियां कुछ इस तरह बढ़ा दी हैं कि चुनावी राजनीति मौलिक सामाजिक मुद्दों से भटक गई है। सत्ता के इर्द गिर्द ऐसे लोग जमा हो गए हैं जो सत्ता का दुरुपयोग करने में सिद्धहस्त हैं। सरकारें तबादले करके अफसरों को तो बदल सकती हैं लेकिन दलालों और बिचौलियों को बदलना संभव नहीं होता है। वे हर सरकार को घेर लेते हैं और सरकार की जड़ें काट देते हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी बेहतरीन कार्य किया जा रहा है लेकिन सत्ता को घेरने वाले लोग असली पत्रकारों का हक छीन लेते हैं। ये विचार वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने आज राजधानी में आयोजित भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यान में व्यक्त किए।इसी विषय पर जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा ने कहा कि कुछ मामलों में मीडिया का दुरुपयोग किए जाने से उसकी साख प्रभावित हुई है जो चिंताजनक है।


    डॉ.सर हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता और जनसंचार विभाग अध्यक्ष रहे एवं वरिष्ठ पत्रकार भुवन भूषण देवलिया की जयंती आज राजधानी में गरिमामयी के अवसर पर आयोजित व्याख्यान में स्वर्गीय देवलिया की पत्रकारिता के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला गया। विदिशा के पत्रकार गोविंद सक्सेना को इस अवसर पर राज्य स्तरीय भुवन भूषण देवलिया पत्रकारिता सम्मान से विभूषित किया गया। इसमें उन्हें 11 हजार रूपये का चेक,शाल श्रीफल एवं प्रशस्तिपत्र प्रदान किया गया। चुनाव, समाज और मीडिया विषय पर आयोजित व्याख्यान में मुख्य अतिथि के तौर पर मध्यप्रदेश शासन के जनसंपर्क मंत्री पी.सी.शर्मा,प्रमुख वक्ताओं के रूप में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग और पटना से आए वरिष्ठ पत्रकार शशिधर खां, विशिष्ट अतिथि के रूप में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि भोपाल के कुलपति दीपक तिवारी, ने विषय के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार और सप्रे संग्रहालय के स्थापक विजयदत्त श्रीधर ने की। कार्यक्रम का संचालन लब्ध प्रतिष्ठित उद्घोषक विनय उपाध्याय ने किया। आभार प्रदर्शन जनसंपर्क अधिकारी अशोक मनवानी ने किया।


    मुख्य अतिथि और जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा ने कहा कि पहले अखबारों में यदि सत्ता प्रतिष्ठानों के खिलाफ दो लाईनें भी छप जाती थीं तो सरकारें कार्रवाई के लिए मजबूर हो जाती थीं,आज स्थिति ये हो गई है कि अखबारों में छपी बातों को गंभीरता से नहीं लिया जाता। हम भी प्रदेश की राजनीति करते हैं लेकिन पिछले पंद्रह सालों तक जब सरकार में नहीं थे तब हमारी गतिविधियां अखबारों की सुर्खियां नहीं बन पाती थीं। हमें कह दिया जाता था कि विज्ञापन आ जाने के कारण आपकी खबर नहीं छप पाई है। आज कांग्रेस की सरकार सभी को समान अवसर उपलब्ध करा रही है। यही वजह है कि गोविंद सक्सेना जैसे मेधावी पत्रकार आगे आ रहे हैं। ऐसे पत्रकारों का सम्मान समाज में पत्रकारिता की साख बढ़ाने में सहयोगी साबित होगा। राजनीति और पत्रकारिता का चोली दामन का साथ है। हम लोग अपने मददगार पत्रकारों और निंदा करने वाले पत्रकारों सभी से सीखते हैं और राजनीति को कारगर बनाने का प्रयास करते हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि स्वर्गीय देवलिया जी की स्मृति में आयोजित व्याख्यान में किए गए मंथन का लाभ समाज के सभी वर्गों को मिलेगा।


    प्रमुख वक्ता के रूप में व्याख्यान माला को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने कहा कि देश में बहुत सारे पत्रकार अच्छा कार्य कर रहे हैं। वे जोखिम भी उठाते हैं और समाज के संवाद को सफल भी बनाते हैं।राजनीति पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि सरकारें अफसरों के तबादले तो कर देती हैं लेकिन दलालों और बिचौलियों की भूमिका नहीं बदल पातीं। यही वजह है कि सत्ता प्रतिष्ठान को घेरने वाले बिचौलिए जनता की आवाज सरकार तक नहीं पहुंचने देते। उन्होंने कहा कि डाक्टर राम मनोहर लोहिया कहते थे हमारी और सरकार की भूमिका कभी नहीं बदलती। हम हर सरकार के गलत कार्यों का विरोध करते हैं और हर सरकार सत्ता में आकर हमें जेल भेजने में जुट जाती है।


    उन्होंने कहा कि वर्ल्ड इकानामिक फोरम ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें उसने भारत के मीडिया को सर्वाधिक भ्रष्ट बताया है। उन्होंने कहा कि कोई बलात्कार पीड़िता जब अपने ऊपर हुए अत्याचार की शिकायत करने थाने जाए और उसके साथ दुबारा बलात्कार हो जाए तो क्या इसे न्याय मिलना कहा जा सकता है। इसी तरह सभी जगह से निराश होकर जब लोग मीडिया के पास जाते हैं तो उन्हें एक नए किस्म के शोषण का सामना करना पड़ता है। जो पत्रकार जमीनी रिपोर्टिंग करते हैं और उन्हें सामाजिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है उनके लिए मीडिया संस्थानों या पत्रकार संगठनों का रक्षा कवच भी नहीं मिल पाता है। इसके बावजूद हमें जमीनी पत्रकारों को संरक्षण देना होगा। हमें सरकार से सवाल पूछने और जानकारी देने की परंपरा जारी रखनी होगी। हमें अपने कर्तव्य के लिए जेल जाने की सीमा तक तैयार रहना होगा तभी हम स्वर्गीय देवलिया जी को सच्ची श्रद्धांजलि दे सकेंगे।


    पटना से आए वरिष्ठ पत्रकार शशिधर खान ने कहा कि डिजिटल युग ने मीडिया का कुछ ऐसा कायापलट कर दिया है कि हम पेड और फेक न्यूज के दौर में पहुंच गए हैं। प्रेस की आजादी का लाभ उठाकर कई बार घटनाओं की मीडिया ट्रायल शुरु हो जाती है। मीडिया फोरम उपभोक्ता की पसंद का डाटा पोस्ट कर रहे हैं जिससे आम लोगों की निजता खतरे में पड़ गई है। आज तो कोर्ट में अर्जी की सुनवाई होने से पहले ही मीडिया पर बहसें शुरु हो जाते हैं। इन बहसों में पीड़ित पक्ष तक शामिल नहीं होता है. यही वजह है कि कुछ मनगढ़ंत बातें भी कुछ ही मिनिटों में वायरल होकर पूरी दुनिया में फैल जाती हैं. हमें मीडिया की प्रमाणिकता को बचाने के लिए आगे आना होगा। हम ये साबित करें कि मीडिया की खबरें आम लोगों की बतोलेबाजी से अलग होती हैं, तभी इस पेशे की गरिमा बचाई जा सकती है।


    माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति दीपक तिवारी ने कहा कि अखबारों की सुर्खियों के आधार पर लोग समाज का मूड भांपने का प्रयास करते हैं जबकि ये सच नहीं होता। इसी प्रकार सोशल मीडिया पर वे लोग अपना एजेंडा थोप देते हैं जिनके पास धन है और उनके कुछ निहित स्वार्थ हैं। उन्होंने कहा कि जनता बीच से लोग लोग लीडर्स के रूप में उभरते हैं उन्हें लोड लेना होगा। उन्हें समाज विरोधी बातों पर रोक लगाने के लिए आगे आना होगा। आज दुनिया भर के मीडिया जगत में भारत के मीडिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं ये चिंताजनक है। चुनाव के दौर में नेताओं को व्यापक जनहित की बातों को सामने लाना होगा तभी हम सामजिक बदलाव कर पाएंगे। उन्होंने कहा कि स्वर्गीय देवलिया सर ने युवाओं को प्रेरणा देकर सामाजिक बदलाव की अलख जगाई थी हम उस मशाल को जलाए रखेंगे और समाज का मार्गदर्शन करते रहेंगे।


    अध्यक्षीय उद्बोधन में पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि छोटी जगहों पर आज भी जमीनी पत्रकारिता की जा रही है। कार्पोरेट मीडिया कुछ तयशुदा मु्द्दों को उभारकर सत्ता को साधने का प्रयास कर रहा है। चुनाव के इस दौर में यदि हम अगले दो तीन महीनों तक टीवी और अखबार देखना बंद रखें तो हम देश की सत्ता का चयन ईमानदारी से कर पाएंगे।


    कार्यक्रम के आरंभ में भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यानमाला समिति भोपाल की ओर से अतिथियों का पुष्प गुच्छ देकर अभिनंदन किया गया। समिति की ओर से डा . अपर्णा एलिया, अशोक मनवानी, आलोक सिंघई,अरुणा दुबे, पिंकी देवलिया ने अतिथियों का अभिनंदन किया। आशीष देवलिया ने अतिथियों को तुलसी के पौधे देकर पर्यावरण की रक्षा का संकल्प दुहराया। इस अवसर पर देवलिया जी के क्रतित्व एवं व्यक्तित्व पर केन्द्रित स्मृति ग्रंथ पत्रकारिता के भूषण का विमोचन हुआ । इसका संपादन वरिष्ठ पत्रकार सतीश एलिया ने किया है। कार्यक्रम में समिति के सदस्य वरिष्ठ पत्रकार शिव अनुराग पटैरिया, अजय त्रिपाठी तथा अमित कुमार, पूर्व सूचना आयुक्त आत्मदीप , शिवकुमार विवेक,वरिष्ठ पत्रकार आनंद पांडे , प्रमोद भारद्वाज,वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी अरविंद दुबे, अवनीश सोमकुंवर, अजय उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार केएस शाइनी, शिफाली, दीप्ति चौरसिया, राजेन्द्र धनोतिया, प्रभु पटेरिया, गिरीश शर्मा, प्रेम पगारे, शिव हर्ष सुहालका, संजीव शर्मा,अमिताभ श्रीवास्तव, मुकेश मोदी,सुरेन्द्र द्विवेदी, प्रकाश साकल्ले, सुमन त्रिपाठी,शैलजा सिंघई, ममता यादव समेत बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक और पत्रकार मौजूद थे।

  • अपने ही चक्रव्यूह में उलझते कमलनाथ

    अपने ही चक्रव्यूह में उलझते कमलनाथ

    मुख्यमंत्री कमलनाथ की अब तक की राजनीति को चाहने वालों की लंबी जमात है। उनकी कार्यशैली के दीवाने नेता भी हैं और आम जनता भी। छिंदवाड़ा के लोग बरसों से उनकी सुलझी राजनीति के कायल रहे हैं। एक बार जब जनता ने उन्हें पराजय से दंडित किया तब भी उनके प्रति दीवानगी और सम्मान कम नहीं हुआ। लोगों को अपनी गलती का अहसास हुआ और बाद में उन्होंने अपनी गलती सुधारी भी। कमलनाथ के चाहने वालों को अब भी भरोसा है कि वे कथित छिंदवाड़ा माडल की तर्ज पर मध्यप्रदेश की कायापलट देंगे। सत्ता संभालने के लगभग छियासठ दिन बीतने के बाद लोगों की ये सोच संशय से घिरती नजर आ रही है। कांग्रेस की कमलनाथ सरकार ने जो फैसले लिए हैं, जो मंशाएं जाहिर की हैं और जमीन पर उसकी जो कार्यशैली नजर आ रही है उसे देखकर कहा जा सकता है कि कमलनाथ अपने ही चक्रव्यूह में उलझते जा रहे हैं।

    कमलनाथ की अब तक की राजनीति कभी सत्ता का केन्द्र नहीं रही है। वे या तो गांधी परिवार की नीतियों के पैरवीकोर रहे हैं या फिर अपनी राज्य सरकारों के सलाहकार की भूमिका में रहे हैं। उनके हाथों में केन्द्र सरकारों का बजट रहा जिससे उन्होंने राज्यों और जनता को उपकृत करने की भूमिका भी निभाई। पहली बार उन्हें सीमित बजट से राजनीतिक महल खड़ा करने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। उनके करिश्मे का जैसा प्रचार चुनाव के दौरान किया गया था उससे लोगों की अपेक्षाएं बढ़ती जा रही हैं। लोगों में बैचेनियां बढ़ रहीं हैं उन्हें अब भी लग रहा है कि आज नहीं तो कल कमलनाथ जी अपने पिटारे में छिपी धन की थैली निकालेंगे और मध्यप्रदेश की तस्वीर पलटकर रख देंगे।

    दो महीनों के शासनकाल की गतिविधियों को देखने के बाद ये कहा जा सकता है कि ऐसा कुछ होने नहीं जा रहा है। कांग्रेस सरकार की दो महीनों की रिकार्डशीट बेहद धुंधली है।वे न तो कोई बड़ा निवेश लाने में सफल हुए हैं और न ही पूंजी उत्पादन की कोई इबारत लिख पाए हैं। हां पिछली सरकार की योजनाओं की कतरब्यौंत करने का असफल प्रयास करते जरूर नजर आ रहे हैं।जिन योजनाओं पर उन्होंने कैंची चलाई उन्हें दुबारा जारी करके उन्होंने अपनी राजनीतिक अपरिपक्वता का भी उदाहरण पेश किया है। उनकी राजनीति सरकार के बजट को खर्च करने के इर्दगिर्द ही घूमती रही है। पहली बार उन्हें एक साथ कई आयामों के लिए पूंजी उत्पादन की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है जिसमें वे असफल साबित हो रहे हैं।

    इसकी एक बड़ी वजह आगामी लोकसभा चुनाव भी हैं।उन पर लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की सीटें बढ़ाने का जबर्दस्त दबाव है। इसके लिए वे लगातार लोकप्रियतावादी योजनाओं की घोषणाओं का जादू फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। बहुचर्चित किसान कर्जमाफी योजना से वे किसानों को बैंकों से नो ड्यूज दिलाने जा रहे हैं।किसानों का कर्ज चुकाने के लिए सरकार के पास कोई जमाराशि नहीं है। इसके लिए वे बैंकों की साख का सहारा ले रहे हैं। निश्चित तौर पर इसी महीने से वे किसानों को ये प्रमाण पत्र दिलवाना शुरु कर देंगे। वचनपत्र का ये वायदा पूरा होने से किसान प्रसन्न भी होंगे,लेकिन नया गल्ला सरकार नहीं खरीद रही है इससे किसान परेशान हैं।

    कमलनाथ की सरकार को किसानों की जिस फौज का सामना करना पड़ रहा है उससे वे खासे तनाव में भी हैं। पूर्व मंत्री डॉ.नरोत्तम मिश्र ने विधानसभा को बताया कि कार्यमंत्रणा समिति की बैठक के बाद अनौपचारिक चर्चा में मुख्यमंत्री कमलनाथ जी ने पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह से कहा कि आपने कृषि का उत्पादन इतना अधिक बढ़ा दिया कि अधिक उत्पादन ही समस्या बन गई है। दरअसल में कांग्रेस जिस रोजगार बढ़ाने की बातें सोच रही है या कर रही है उसे भाजपा की सरकार पहले ही कृषि क्षेत्र में बढ़ा चुकी है। कमलनाथ जी की सोच अभी भी उद्योगों के विस्तार से आगे नहीं निकल पा रही है,जबकि इसके लिए न तो सरकार के पास धन है और न ही निवेशक।उन्होंने दुनिया घूमी है,वे विकसित देशों की चकाचौंध से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं जबकि प्रदेश की हकीकत इसके विपरीत है।

    कांग्रेस सरकार के नेतागण जमीनी हकीकत समझने तैयार नहीं हैं। हवा हवाई बातें उनकी कार्यशैली का आधार हैं। सदन में कांग्रेस विधायक लक्ष्मण सिंह कह रहे थे कि पिछली सरकार अरबों रुपया विज्ञापन में बांट गई है इसलिए प्रदेश पर एक लाख अस्सी हजार करोड़ का कर्ज हो गया है। जबकि जमीनी हकीकत ये है कि मध्यप्रदेश का कर्ज आज भी तयशुदा सीमा से अधिक नहीं है।

    कमलनाथ ने सार्वजनिक कार्यक्रम में ये कहकर सनसनी फैला दी थी कि मैं अखबारों में अपनी फोटो नहीं छपवाना चाहता। आपको जो छापना हो छापें। हमारी सरकार विज्ञापन की सरकार नहीं है। बेहतर होगा कि आप लोग कोई दूसरा कारोबार कर लें। जबकि अपनी ही कही गई बातों के विपरीत कमलनाथ की सरकार अपने साठ दिनों में प्रचार के नाम पर 35 करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है। शिवराज सरकार ने मध्यप्रदेश की अर्थव्यवस्था को दो लाख दस हजार करोड़ रुपए के आंकड़े तक पहुंचाया था।इसमें से प्रचार पर खर्च साढ़े तीन सौ करोड़ रखा जाता था।इसकी अस्सी फीसदी राशि तो सरकारी प्रचार तंत्र की स्थापना, सत्कार और वाहनों पर ही खर्च हो जाती थी। मीडिया इंडस्ट्री आज बड़ा रूप ले चुकी है और वो इस बजट पर टिकी हुई नहीं है। तभी तो एक बड़े मीडिया संस्थान को कांग्रेस के कथित प्रयासों से तीन हजार करोड़ की आय कराई गई है। आज भी तमाम बड़े मीडिया संस्थानों की आय का महज तीस फीसदी धन सरकारी सेक्टर से आता है। जिसमें मध्यप्रदेश सरकार का हिस्सा तो और भी कम है। इसके बावजूद कमलनाथ सरकार और उसके मंत्री अपनी असफलताओं को छुपाने के लिए मीडिया को आधारहीन आरोपों से बदनाम कर रहे हैं।इसकी वजह स्वयं मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनके अनुभवहीन सलाहकारों की जमात है।

    कमलनाथ के करीबी और वित्तमंत्री तरुण भनोट अपनी सरकार पर दलाली के आरोपों से खफा हैं। उन्होंने सदन में कहा कि यदि सरकार जनहित के काम कर रही है तो क्या हम लोग दलाली खा रहे हैं।उन्हें सार्वजनिक तौर पर बताना होगा कि वे कौन से जनहित के कार्य हैं जिनके लिए दलालों की फौज वल्लभ भवन और विधानसभा में टूटी पड़ रही है। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों के थोपे गए सरकारी तंत्र को पालने के लिए राज्य को हर महीने तीन हजार दो सौ करोड़ रुपए स्थापना व्यय करना पड़ता है। इस व्यय का अधिकांश हिस्सा अनुत्पादक है। राज्य की आय तो सरकारी तंत्र को पालने और कर्ज का ब्याज चुकाने में ही खर्च हो जाती है। इसके बावजूद तबादलों के धंधे में लिप्त कमलनाथ सरकार प्रदेश की तस्वीर बदलने की डींगें हांक रही है।निश्चित तौर पर आने वाले समय में ये असंतोष की बड़ी वजह बनेगी। जिसका खमियाजा कांग्रेस को लोकसभा चुनावों में तो उठाना ही पड़ेगा साथ में पहली बार मध्यप्रदेश अपराध और अराजकता के दलदल में फंसने जा रहा है जिसके लिए आम जनता को अभी से तैयार रहना होगा।

    (लेखक जन न्याय दल के प्रदेश प्रवक्ता भी हैं। यह आलेख मीडिया पर लगाए जा रहे अनर्गल आरोपों के जवाब में लिखा गया है।)