डॉ.
वेदप्रताप वैदिक
राष्ट्रीय
स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक
मोहन भागवत ने मध्यप्रदेश
यात्रा के दौरान ऐसा बयान दे
दिया है, जो
हिंदुत्व शब्द की परिभाषा ही
बदल सकता है। अभी तक भारत में
हिंदू किसे कहा जाता है और
अहिंदू किसे?
पहले अहिंदू को
जानें। जो धर्म भारत के बाहर
पैदा हुए, वे
अहिंदू यानी ईसाई,
इस्लाम,
पारसी,
यहूदी आदि!
जो धर्म भारत में
पैदा हुए, वे
हिंदू यानी वैदिक,
पौराणिक,
वैष्णव,
शैव,
शाक्त,
जैन,
बौद्ध,
सिख,
आर्यसमाजी,
ब्रह्म समाजी आदि।
इन तथाकथित हिंदू धर्म की
शाखाओं में चाहे जितना भी
परस्पर सैद्धांतिक विरोध हो,
उन सब को एक ही छत्र
के नीचे स्वीकार किया जाता
है। हिंदू-अहिंदू
तय करने के लिए किसी सिद्धांत
की जरूरत नहीं है। इस निर्णय
का आधार सैद्धांतिक नहीं,
भौगोलिक है।
इसे ही
आधार मानकर विनायक दामोदर
सावरकर ने प्रसिद्ध ग्रंथ
‘हिंदुत्व’ लिखा था। ‘हिंदुत्व’
की विचारधारा ने ही हिंदू
महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक
संघ को जन्म दिया था। सावरकरजी
की मान्यता थी कि जिस व्यक्ति
का ‘पुण्यभू’ और ‘पितृभू’
भारत में हो, वही
हिंदू है। यानी जिसका पूजा-स्थल,
तीर्थ,
देवी-देवता,
पैगंबर,
मसीहा,
पवित्र ग्रंथ आदि
भारत के बाहर के हों,
उसका पुण्यभू भी
बाहर ही होगा। उसे आप हिंदू
नहीं कह सकते चाहे भारत उसकी
पितृभूमि हो यानी उसके पुरखों
का जन्म स्थान हो। कोई भारत
में पैदा हुआ है लेकिन,
उसकी पुण्यभूमि
मक्का-मदीना,
यरुशलम,
रोम या मशद है तो
वह खुद को हिंदू कैसे कह सकता
है? सावरकरजी
की हिंदू की यह परिभाषा उस समय
काफी लोकप्रिय हुई,
क्योंकि उस समय
मुस्लिम लीग का जन्म हो चुका
था और इस्लाम के नाम पर अलग
राष्ट्र की मांग जोर पकड़ने
लगी थी। सावरकर का हिंदुत्व
उस समय राष्ट्रवाद का पर्याय-सा
बन गया था और लोग समझ रहे थे
कि लीगी सांप्रदायिकता का
यही करारा जवाब है। स्वयं
सावकर ने भारत के आज़ाद होने
के 15-20 साल
बाद अपने अभिमत पर पुनर्विचार
किया था।
लेकिन
संघ-प्रमुख
मोहन भागवत ने ‘पुण्यभू’ की
छूट देकर ‘हिंदू’ शब्द की
परिभाषा को अधिक उदार बना दिया
है। उन्होंने बैतूल के भाषण
में कहा कि हिंदुस्तान में
रहने वाला हर नागरिक उसी तरह
हिंदू कहलाएगा,
जैसे अमेरिका में
रहने वाला हर नागरिक अमेरिकी
कहलाता है, उसका
धर्म चाहे जो हो। उनके इस तर्क
को थोड़ा आगे बढ़ाएं तो यहां तक
जा सकता है कि किसी नागरिक के
पुरखे या वह स्वयं भी चाहे
किसी अन्य देश में पैदा हुआ
हो, यदि
उसे नागरिकता मिल जाए तो वह
खुद को अमेरिकी घोषित कर सकता
है। यानी किसी के हिंदू होने
में न धर्म आगे आएगा और न ही
उसके और उसके पुरखों का जन्म-स्थल।
यानी ‘पुण्यभू’ के साथ ‘पितृभू’
की शर्त भी उड़ गई। सैद्धांतिक
और भौगोलिक दोनों ही आधार इस
नई परिभाषा के कारण पतले पड़
गए।
यूं भी
हिंदू शब्द तो शुद्ध भौगोलिक
ही था। यह सिंधु का अपभ्रंश
है। सिंध से ही हिंद बना है।
प्राचीन फारसी में ‘स’ को ‘ह’
बोला जाता था,
जैसे सप्ताह को
हफ्ता! सिंध
का हिंद हो गया। स्थान का स्तान
हो गया। हिंद और स्तान मिलकर
‘हिंदुस्तान’ बन गया। हिंद
से ही ‘हिंदू’,
‘हिंदी’,
‘हिंदवी’,
‘हुन्दू’,
‘हन्दू’,
‘इंदू’,
‘इंडीज’,
‘इंडिया’ और ‘इंडियन’
आदि शब्द निकले हैं। विदेशियों
के लिए हिंदू शब्द भारतीय का
पर्याय है। जब मैं पहली बार
चीन गया तो चीन के विद्वान और
नेता मुझे ‘इंदुरैन’ ‘इंदुरैन’
बोलते थे। यों तो भारत का
प्राचीन नाम आर्यावर्त या
भारत या भरतखंड ही है। मैंने
वेदों, दर्शनशास्त्रों,
उपनिषदों,
आरण्यकों,
रामायण,
महाभारत या गीता
में कहीं भी हिंदू शब्द कभी
नहीं देखा। इस शब्द का प्रयोग
तुर्की, पठानों
और मुगलों ने पहले-पहल
किया। वे सिंधु नदी पार करके
भारत आए थे, इसलिए
उन्होंने इस सिंधु-पर
क्षेत्र को हिंदू कह दिया।
भारतीयों
ने विदेशियों या मुसलमानों
द्वारा दिए गए इस शब्द को
स्वीकार कर लिया,
क्या यह हमारी उदारता
नहीं है? ऐसे
में विदेशी मज़हबों के मानने
वालों को अपना कहने में हमें
एतराज क्यों होना चाहिए?
यदि इस देश में भारत
के 20-22 करोड़
लोगों को हम अपने से अलग मानेंगे
तो हम खुद को राष्ट्रवादी कैसे
कहेंगे? इस
देश को हम मजहब के आधार पर
बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक में
बांट देंगे। हम राष्ट्रवादी
नहीं होंगे बल्कि जिन्नावादी
होंगे। दुनिया में पाकिस्तान
ही एक मात्र देश है,
जो मजहब के आधार पर
बना है। पाकिस्तान की ज्यादातर
परेशानियों का कारण भी यही
है। भारत का निर्माण या अस्तित्व
किसी धर्म, संप्रदाय,
मजहब,
वंशवाद या जाति के
आधार पर नहीं हुआ है। इसीलिए
इसे सिर्फ ‘हिंदुओं’ का देश
नहीं कहा जा सकता है। हां,
इस अर्थ में यह
हिंदुओं का देश जरूर है कि जो
भी यहां का बाशिंदा है,
वह हिंदू है। मोहन
भागवत का मंतव्य यही है। यह
मंतव्य अत्यंत पवित्र है,
क्योंकि यह ‘हम’
और ‘तुम’ के भेद को खत्म करता
है। ‘हिंदू’ की इस परिभाषा
से सहमत होने का अर्थ है,
सभी पूजा-पद्धतियों
को स्वीकार करना। गांधीजी
इसे ही सर्वधर्म समभाव कहते
थे। इसे आधार बनाएं तो फिर
राष्ट्रवादिता से कोई भी अछूता
नहीं रह सकता। इसी दृष्टि से
मैं अपने अभिन्न मित्र और
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के
पूर्व सरसंघचालक स्व.
कुप्प सी.
सुदर्शन से कहा
करता था कि भारत के मुसलमानों
को राष्ट्रवादी धारा से जोड़ना
बेहद जरूरी है। मुझे खुशी है
कि राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के
जरिए वही काम आज हो रहा है। यह
कितनी अद्भुत बात है कि यह
मंच तीन तलाक का विरोध कर रहा
है और मुस्लिम समाज में अनेक
सुधारों की पहल भी कर रहा है।
ऐसी पहल सभी धर्मों में क्यों
नहीं होती?
यह इतिहास
का एक बड़ा सत्य है और अकाट्य
है कि किसी भी विचारधारा या
सिद्धांत या धर्म का जन्म चाहे
जिस देश में हुआ हो,
उसके मानने वालों
पर ज्यादा प्रभाव उनके अपने
देश की परंपरा का ही होता है।
इसी आधार पर दुबई के अपने एक
भाषण में अरब श्रोताओं के बीच
मैंने यह बात डंके की चोट पर
कह दी थी कि भारत का मुसलमान
दुनिया का श्रेष्ठतम मुसलमान
है, क्योंकि
भारत की हजारों साल की परम्परा
उसकी रगों में बह रही है। बादशाह
खान ने अब से लगभग 50
साल पहले मुझे काबुल
में कहा था कि मैं पाकिस्तानी
तो पिछले 19-20 साल
से हूं, मुसलमान
तो मैं हजार साल से हूं,
बौद्ध तो मैं ढाई
हजार साल से हूं और आर्य-पठान
तो पता नहीं, कितने
हजारों वर्षों से हूं। यदि
इस तथ्य को सभी भारतीय स्वीकार
करें तो सोचिए,
हमारा राष्ट्रवाद
कितना सुदृढ़ होगा।