Category: मध्यप्रदेश

  • शिवराज की पुंगी बजाने मैदान में उतरा सिंधिया राजघराना

    शिवराज की पुंगी बजाने मैदान में उतरा सिंधिया राजघराना

    -आलोक सिंघई-
    अटेर उपचुनाव में सिंधिया सल्तनत को चुनौती देना मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को मंहगा पड़ रहा है। किसानों की आड़ लेकर मुख्यमंत्री की हूटिंग शुरु होते ही उनके विरोधी जिस तरह लामबंद नजर आ रहे हैं उससे भाजपा हाईकमान चौंक गया है। सूत्र बताते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम पर प्रधानमंत्री सचिवालय सीधे नजर रखे हुए है । अपने साम्राज्य के सबसे मजबूत किले को ढहने से बचाने के लिए उसने रणनीति बदलने का मन बना लिया है। चूके चौहान साबित होने जा रहे शिवराज जी के विरोध में फूटी कांग्रेस अपने सत्ता आग्रह का स्वप्न साकार होता देखने लगी है। हालांकि तमाम अंतर्विरोधों के बाद भी भाजपा के रणनीतिकार विरोध के इस दावानल को शांत करने में जुट गए हैं पर उनके हर पांसे इस बार उलटे पड़ते दिखाई दे रहे हैं।

    सत्ता के तीन साल का उत्सव मनाती केन्द्र की भाजपा सरकार को मध्यप्रदेश में असंतोष के भंवर का सामना करना पड़ रहा है। इसका जवाब हाईकमान के पास तो है लेकिन वह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को हटाकर कोई नई मुसीबत मोल नहीं लेना चाहता। इसका मतलब ये भी नहीं कि शिवराज को केन्द्र की क्लीनचिट मिल चुकी है। फिलहाल तो राष्ट्रपति चुनाव की तैयारियों पर अपना ध्यान केन्द्रित करके मोदी सरकार अपने पांव मजबूत करने में जुट गई है। जबकि इधर शिवराज सरकार को संगठन की ओर से भरपूर संरक्षण दिया जा रहा है। इन सबके बीच भाजपा संगठन की राज्य इकाई भी निशाने पर आ गई है। भाजपा के भीतरी असंतोष ने संगठन की खिल्ली उड़ाना भी शुरु कर दिया है। जाहिर है कि निकट भविष्य में मुख्यमंत्री के साथ साथ प्रदेश भाजपा संगठन को भी अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा।

    अटेर उपचुनाव में जब भाजपा प्रत्याशी अरविंद भदौरिया लगभग आठ सौ वोट के मामूली अंतर से पराजित हुए तब किसी ने ये नहीं समझा था कि मुख्यमंत्री की फिसली जुबान भाजपा का सुख चैन भी छीन सकती है। बंदूक से निकली हुई गोली कभी वापिस हुई है। संगठन की तमाम लीपापोती के बाद भी पार्टी के खांटी नेता इस टीस को नहीं भुला पा रहे हैं। श्री चौहान ने तब सिंधिया घराने पर तंज कसते हुए कहा था कि स्वाधीनता संग्राम के दौर में सिंधिया राजघराने के लोगों ने अंग्रेजों के साथ मिलकर अटेर के आसपास के उन लोगों को काफी सताया जो वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का साथ दे रहे थे। इतिहास बदला नहीं जा सकता पर उस पर चिंतन मनन तो जरूर किया जा सकता है। शिवराज जी को भी चिंतन मनन का उतना ही अधिकार है जितना कि हर देश भक्त को है। प्रयास चिंतन का नहीं बल्कि लांछन का था। शिवराज जी और उनके सलाहकारों का सोचना था कि ऐसा बोलकर वे महारानी लक्ष्मीबाई की लोकप्रियता को सहलाकर अपने पक्ष में भुना पाएंगे। इसका असर ठीक उलटा हुआ। मनोविज्ञान को समझे बगैर किताबी अंदाज में की गई इस टिप्पणी ने न केवल कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया को भड़का दिया बल्कि भाजपा की जन्मदात्री लाबी को भी आहत कर दिया। बताते हैं कि इस बयान की पृष्ठभूमि में कई समीकरण बनते बिगड़ते रहे।

    सत्ता केन्द्र से लगातार बेदखली झेल रही कांग्रेस इस अवसर को भुनाने के लिए झट से ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ आ खड़ी हुई । सिंधिया किसानों के न्याय का झंडा लेकर अपने घराने के अपमान का बदला लेने निकल पड़े हैं जबकि सत्ता की सामूहिक लूट करके भाग निकले कांग्रेसी अपनी ऐशगाहों से निकलकर सिंधिया के बगलगीर होने लगे हैं। ऐसा नहीं कि कांग्रेसियों ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को अपना नेता मान लिया है बल्कि वे उस जहाज पर सवार होकर सत्ता संधान का स्वप्न देख रहे हैं जिसका ईंधन भाजपा के असंतोष के कुएं से निकला है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके कैलाशवासी सलाहकार सुंदरलाल पटवा की एकांगी राजनीति ने भाजपा के कई दिग्गजों को घायल कर रखा है। इनमें केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर, पंचायत मंत्री गोपाल भार्गव, श्रीमंत यशोधरा राजे सिंधिया, श्रीमती माया सिंह,विजय शाह, पूर्व मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, बाबूलाल गौर, प्रभात झा, कमल पटेल,लक्ष्मीकांत शर्मा जैसे और भी कई दिग्गज इनमें शामिल हैं। इनमें पूर्व वित्तमंत्री राघवजी भाई का प्रत्यक्ष हस्तक्षेप भले ही न दिखाई दे रहा हो पर विद्रोह को भड़काने में सुंदरलाल पटवा के विरोधियों की नाराजगी की भी बड़ी भूमिका है। श्री राघवजी भाई जैसे सफल वित्तमंत्री के मार्गदर्शन में भाजपा सरकार ने सत्ता शीर्ष के बड़े सोपान पार किए थे लेकिन व्यक्तिगत रंजिश के चलते स्व. सुंदरलाल पटवा ने कथित तौर पर शिवराज सिंह चौहान के माध्यम से राघवजी भाई का राजनीतिक वध कर डाला था।पटवा स्व. अर्जुनसिंह खेमे के नजदीक माने जाते थे और राघवजी सिंधिया राजघराने के साथ खड़े होते थे। इस कदम ने भी सिंधिया सल्तनत की गौरवगाथा को कलंकित किया था। मामला चूंकि कथित तौर पर चरित्रहीनता से जुड़ा था इसलिए तब राघवजी भाई का साथ देने कोई आगे नहीं आया।

    विदेशी निवेश को आमंत्रित करने में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जिन इन्वेस्टर समिटों की श्रंखला चलाई उन्हें सफल बनाने में तत्कालीन उद्योगमंत्री श्रीमती यशोधरा राजे सिंधिया की भी बड़ी भूमिका थी। विदेशों में बसे उद्योगपतियों को राजी करके मध्यप्रदेश में लाने के लिए सिंधिया घराने ने अपनी पुरानी साख का इस्तेमाल किया लेकिन बाद में श्री चौहान ने कथित तौर पर उन उद्योगपतियों पर पार्टी के नियम लाद दिए जिससे यशोधरा जी और शिवराज जी के बीच दूरियां बढ़ गईं। नतीजतन यशोधरा जी को प्रदेश का वैभव संवारने की इस मुहिम से किनारे कर दिया गया।

    श्री चौहान ने अपनी खीज मिटाने के लिए जिस तरह अटेर में सिंधिया के पूर्वजों पर हमला बोला उससे तो ये दूरियां खाई में बदल गईं। कांग्रेस की लूट और प्रताड़ना से तंग होकर भाजपा को सींचने वाली राजमाता स्व. विजयाराजे सिंधिया से जुड़े भाजपा के दिग्गज रणनीतिकारों ने भी इस बयान को उचित नहीं माना। उनका कहना था कि पूर्वजों ने यदि कोई गलती की भी थी तो उसके लिए क्या वर्तमान के समर्पित जनसेवकों को लांछित किया जाना चाहिए। जबकि राजमाता के त्याग और समर्पण ने भाजपा को आज इस मुकाम तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई हो। गौरतलब है कि गुलाम भारत में अंग्रेजों से सरेआम लोहा लेकर कोई भी सल्तनत अपने नागरिकों को सुरक्षित नहीं रख सकती थी। तात्याटोपे और लक्ष्मीबाई के साथ सिंधिया राजघराना भी अंग्रेजों से पिंड छुड़ाना चाहता था। इसकी रणनीति भी बनाई गई पर लक्ष्मीबाई की बैचेनी और एकला चलो की रणनीति ने इसे घाटे का सौदा बना दिया। लक्ष्मीबाई तो शहीद हो गईं पर उनकी रियाया को अंग्रेजों ने बहुत प्रताड़ित किया। ये बात सच है , लेकिन कांग्रेस के नेताओं ने जिस तरह इसके लिए सिंधिया राजघराने को दोषी ठहराया उसके चलते आज तक सिंधिया के वारिसों को कलंक का सामना करना पड़ रहा है।

    एक समय तो वो भी आया जब श्रीमती इंदिरा गांधी ने सिंधिया राजघराने को मटियामेट करने के लिए अपने खास सिपहसालार अयोध्यानाथ पाठक को ग्वालियर भेजा था। पाठक ने पुलिस अफसर रहते हुए सिंधिया घराने के प्रमुख दीवानों और मालगुजारों की हत्याएं करने का अभियान चला दिया। उन पर आपराधिक मुकदमे बनाए गए। उनके खजाने लूटे गए और सरेआम हत्याएं कर दीं गईं।पाठक को श्रीमती गांधी ने सात सात गैलेन्ट्री अवार्डों से सम्मानित किया। इस लूट से बैचेन होकर स्व. विजयाराजे सिंधिया ने अपने संसाधनों का इस्तेमाल करके भाजपा को कांग्रेस की चुनौती के रूप में तैयार किया था। वे खुद जगह जगह दौरे करतीं और भाजपा के संगठन की नींव मजबूत करती थीं। आज उसी भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ सिंधिया घराने को विद्रोह का शंखनाद करना पड़ रहा है। मजेदार बात तो ये है कि शिवराज सिंह को विरोध के लिए तैयार करने में षड़यंत्रकारी दिग्विजय सिंह ने बड़ी भूमिका निभाई है। दिग्विजय सिंह का परिवार कभी सिंधिया सल्तनत का कारिंदा रहा है। शिवराज सिंह चौहान के सलाहकारों में अपने भेदियों की घुसपैठ कराकर दिग्विजय सिंह ने कथित तौर पर अयोध्यानाथ पाठक के बेटे विकास पाठक को पुलिस मुख्यालय में एआईजी एकाऊंट के पद पर पदस्थ करवा दिया। पुलिस की पुरानी फाईलें खोलकर सिंधिया सल्तनत के प्रमुख सूत्रधारों पर लगाम कसी जाने लगी। जाहिर है एक बार फिर सिंधिया राजघराने को एकजुट होकर मैदान में लामबंद होना पड़ा है। इस फैसले में सिंधिया राजघराने के सभी दिग्गज शामिल हैं। फिर चाहे वे कांग्रेस में हों या भाजपा में।

    किसान आंदोलन के नाम पर कर्ज माफी की आवाज उठाने वाले उद्योगपति हों या फिर जीएसटी के कारण काली कमाई बंद होने से भयाक्रांत व्यापारी, सभी सिंधिया के इस संग्राम में साथ आ जुटे हैं। वे ज्योतिरादित्य सिंधिया को भले अपना नेता न मानें लेकिन वे शिवराज सिंह चौहान को उखाड़कर अपना शक्तिप्रदर्शन जरूर करना चाहते हैं। शिवराज सिंह चौहान की घोषणाओं के बावजूद रोजगार और लाभ से वंचित आम जनता भी इस अभियान में दर्शक के रूप में जुटने लगी है। कांग्रेसियों को इससे अपना भविष्य उज्जवल होता नजर आ रहा है। दिग्विजय सिंह की नाकाम सरकार से नाराज प्रदेश की जनता आज भी कांग्रेस को नेतृत्व देने तैयार नहीं है पर ज्योतिरादित्य सिंधिया की भूमिका से भाजपा को बड़ी क्षति पहुंचने की संभावना जरूर बनती नजर आ रही है।

  • कानून से बने राममंदिर और रुके गौहत्याः  जन न्याय दल

    कानून से बने राममंदिर और रुके गौहत्याः जन न्याय दल

    सागर/ 13 जून/बहुसंख्यक हिन्दुओं की आस्था के प्रतीक भगवान राम की विवादित जन्म स्थली अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनाने और देष में गौ-हत्या रोकने के लिये केन्द्र की भाजपानीत एन.डी.ए. सरकार संसद से कानून बनाने का मार्ग प्रषस्त करे।

    उक्ताषय के प्रस्ताव आज राजनैतिक पार्टी जन-न्याय दल राष्ट्रीय कार्य समिति ने सर्वसम्मति से पारित किये। श्री देवरहा- काम्पलेक्स स्थित पार्टी के मुख्यालय पर संपन्न हुई इस बैठक की अध्यक्षता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट बृजबिहारी चैरसिया ने की। पार्टी के प्रवक्ता आलोक सिंघई ने बताया कि बैठक में पार्टी के द्वारा कई महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय लिये गये हैं।
    निर्णयों की जानकारी देते हुये उन्होंने बताया कि राम मंदिर का निर्माण और गौ-हत्या को रोकना हिन्दुओं की आस्था और श्रद्धा का प्रष्न है। राम मंदिर निर्माण विवाद का हल अब बातचीत से और न्यायालय से निकलना बहुत मुष्किल लग रहा है। अतः इसके लिये काननू बनाया जाना आवष्यक है। पार्टी का मानना है कि जरूरत पढ़ने पर सरकार को लोकसभा व राज्यसभा का संयुक्त अधिवेषन बुलाकर कानून बनाना चाहिये।

    उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी में व्यापक विमर्ष के बाद यह सहमति बनी है कि जहाॅ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की वैचारिक सोच-देष की एकता और अखण्डता के लिये आवष्यक है वहीं राष्ट्रवादी हिन्दुत्व की विचारधारा ही सषक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकती है और इसके लिये अब हिन्दु चेतना राष्ट्रीय आवष्यकता है।

    उन्होंनें कहा कि उनकी पार्टी जन-न्याय दल का मानना है कि आर.एस.एस., विहिप, राम भक्तो, गौ-भक्तों संत-समाज सहित हिन्दुवादी संगठनों की प्रेरणा और सहयोग से बहुसंख्यक हिन्दुओं की वोटों के सहारे प्रचण्ड बहुमत पाकर केन्द्र में सरकार बनाने वाली भाजपा अब अपनी घोषित राष्ट्रवादी-हिन्दुत्व की नीतियों के विपरही जाकर कांग्रेस की ही नीतियों को स्वीकार करने में ज्यादा रूचि दिखा रही है। यह अल्पसंख्यक- तुष्टीकरण में डूबी कांग्रेस को देष की सत्ता से उखाड़ फेकने में सहयोग करनेवाली जनता के साथ धोखा है। उनकी पार्टी ने भाजपा से सवाल किया है कि वह हिन्दुओं के सामने यह स्पष्ट करे कि उसकी राष्ट्रवादी सोच देष के लिये आवष्यक है या कांग्रेस की नीतियां ।

    उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी जम्मू-कष्मीर समस्या के स्थायी निदान के लिये चाहती है कि केन्द्र की भाजपा सरकार वहां की साझा-सरकार को तत्काल खत्म करके जम्मू-कष्मीर के चरित्र को बदलने का फैसला करे। जम्मू-कष्मीर की भौगोलिक सीमाओं को तीन हिस्सों में बांटते हुये वहाॅ धारा-370 खत्म करे और शेष भारत से जम्मू कष्मीर मंे लोगों को ले जाकर वहां बसाये अथवा बसने दे। भाजपा अपनी मूल-सोच ‘‘एक देष में दो संविधान नहीं चलेंगे ?’’

    उन्होंने कहा कि देष में आंदोलित किसानों की समस्याओं के लिये उनकी पार्टी आर्थिक- असमानता की नीतियों की पोषक कांग्रेस और भाजपा को समान रूप से जिम्मेदार मानती है। सरकारी आर्थिक- सर्वे 2016 से इस बात की पुष्टि होती है कि जहाॅ 45 वर्षो में सरकारी नौकरों की आमदनी 300 गुना तक बढी है वहीं इसी अवधि में किसानों की आमदनी महज 19 गुना ही बढ़ी है। साथ ही नोट बंदी के दुष्प्रभाव भी अब किसानों को रूला रहे हैं।

    उन्होंने बताया कि उनकी पाटी राममंदिर बनाने और गौ-हत्या रोकने के लिये केन्द्र सरकार संसद में कानून बनाये जाने वाले प्रस्ताव के पक्ष- समर्थन में जनता के बीच जोयगी और जनमत तैयार करने के लिए विहिप, संत समाज, राम-भक्तो, गौ-भक्ता, व हिन्दु संगठनों से सहयोग मांगेगी।

    उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी ने निर्णय लिया है कि इन दोनों प्रस्तावों के साथ ही पार्टी के शराबबंदी आंदोलन को समाहित करके मध्यप्रदेष में ‘‘संकल्प-अभियान’’ प्रारंभ किया जा रहा है जिसके माध्यम से जनता को संकल्पित किया जावेगा एवं संकल्प पत्र भरनेक वालांे को उनकी पार्टी सम्मान पत्र देकर सम्मानित करेगी।

    उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी वर्ष 2018 में होने वाले मध्यप्रदेष विधानसभा के चुनावों में सभी विधानसभा क्षेत्रों में अपने प्रत्याषी खड़े करेगी। चुनाव संचालन के लिये प्रदेष स्तर पर और विधानसभा स्तर पर दो स्तरीय क्रमषः प्रबंधन समिति व संचालन समिति का गठन किया जावेगा। बैठक में सदस्य रमेष कुमार बौद्ध, गोपाल सिंह कुषवाहा, सीताराम चैरसिया, एडवोकेट, जे.पी. सोनी, जगदीष विष्वकर्मा, षिरीष यादव, संदीप कोरी, अनूप चैकसे, श्रीमति अनीता सेन, शोभा सोनी, हीराबाई बौद्व सहित राष्ट्रीय कार्य समिति सदस्य उपस्थित थे।

  • किसान आंदोलन ने राजनीतिक सर्जरी की राह सुझाई

    किसान आंदोलन ने राजनीतिक सर्जरी की राह सुझाई

    -आलोक सिंघई-
    देश को प्रखर राष्ट्रवाद की बुलंदियों पर ले जाने का संकल्प करने वाली भारतीय जनता पार्टी की शिवराज सिंह चौहान सरकार अपने प्राण बचाने के लिए गांधीवाद की बैसाखियां तलाश रही है। प्रदेश में भड़के किसान आंदोलन को शांत करने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान राजधानी के भेल दशहरा मैदान पर अनशन कर रहे हैं। हर जिले से लाए गए किसानों के प्रतिनिधिमंडल उनसे मुलाकात कर रहे हैं और कृषि विस्तार की दिशा में किए गए भारतीय जनता पार्टी सरकार के कार्यों से अपनी सहमति जता रहे हैं। जो किसान कल तक कथित तौर पर अपनी मांगों को लेकर आगजनी कर रहे थे वे इस टैंट में आकर अपनी भूल सुधार करने का संकल्प दोहरा रहे हैं। हालांकि आंदोलन का व्यापक आव्हान करने वाले राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ ने अनशन पर बैठे शिवराज को जेल भरो आंदोलन से करारा जवाब देने का फैसला लिया है पर फिलहाल प्रदेश में हिंसा का दौर जरूर थमता नजर आने लगा है।

    मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से अनशन स्थल पर चार बजे तक लगभग 15 बड़े और 234 छोटे किसान संगठनों ने मुलाकात की। हर संगठन ने एक मिनिट में अपनी समस्या मुख्यमंत्री को बता दी और उनसे समाधान का आश्वासन भी प्राप्त कर लिया। इस दौरान मुख्यमंत्री के मंत्रीमंडलीय सहयोगी भी वहीं मौजूद थे जिन्होंने विधायकों के साथ आए किसान प्रतिनिधियों का स्वागत किया। किसी भी हिंसक आंदोलन का इतना तेज समाधान आजादी की लड़ाई के दौरान खुद गांधीजी भी नहीं कर सके थे। मुख्यमंत्री का ये प्रयास निश्चित तौर पर भाजपा के प्रखर राष्ट्रवाद के लिए एक गहरा सबक साबित होने जा रहा है।

    मुख्यमंत्री श्री चौहान अपने राजनीतिक आका लालकृष्ण आडवाणी से करीबी के लिए जाने जाते हैं। स्व. प्रमोद महाजन ने श्री आडवाणी की इच्छा को देखते हुए ही श्री चौहान को मध्यप्रदेश की सत्ता पर आरूढ़ करवाया था। जाहिर है कि ये सरकार श्री आडवाणी के प्रखर राष्ट्रवाद को साकार करने के लिए ही भेजी गई थी। प्रदेश की जनता ने कांग्रेस के निष्कासन के जनादेश के बाद सत्ता भाजपा को सौंपी थी , भाजपा को पूरा अवसर भी मिला कि वह अपने राष्ट्रीय नेता की विचारधारा को सफल बनाए पर लगभग बारह सालों के शासन के बाद भी राष्ट्रवाद की ये परिभाषा गांधीवाद के वेंटीलेटर पर जीवन संघर्ष कर रही है। प्रदेश की जनता जानना चाहती है कि किसान आंदोलन की असली वजह क्या थी और अनशन ने उसे शांत करने में कैसे बडी भूमिका निभाई।
    विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के विधायक अजय सिंह ने आज पत्रकार वार्ता बुलाकर सरकार को भंग करने और राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की है। उनका कहना है कि सरकार को किसानों की समस्याओं का समाधान करना चाहिए। इसमें यदि कांग्रेस की कोई भूमिका हो तो वे उसे भी निभाने तैयार हैं। उनका कहना था कि इस मामले पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खामोश हैं। जाहिर है कि ये आंदोलन भारतीय जनता पार्टी के अंदरूनी सत्ता संघर्ष की उपज है।

    बात बहुत हद तक सही भी है। किसानों के इस आंदोलन को भाजपा के भीतर से भी बल मिलता रहा है। राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के अध्यक्ष पं. शिवकुमार शर्मा उर्फ कक्काजी खुद भाजपा के सहयोगी भारतीय किसान संघ के सदस्य रहे हैं। खासतौर से पंचायत एवं ग्रामीण मंत्री पं. गोपाल भार्गव से उनकी करीबी रही है। इस आंदोलन में सबसे बड़ी भूमिका तो ग्रामीण पृष्ठभूमि में राजनीति करने वाले नेताओं ने निभाई है।भाजपा के पूर्व संगठन महामंत्री और वर्तमान में राज्यपाल कप्तानसिंह सोलंकी ने कांग्रेस के अपदस्थ किए गए पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के साथ एक गुप्त अनुबंध किया था। जिसके चलते दिग्विजय सिंह के तमाम समर्थकों को भाजपा में जगह दी गई थी। ये पूरी फौज गांवों से ही आती थी और पंचायती राज व्यवस्था के दौरान दिग्विजय सिंह के लिए कार्य करती थी। श्री सोलंकी ने इसे भाजपा का जनाधार बढ़ाने वाला कदम बताया और उनका पंचायती राज नई सरकार में भी कायम रहा। इस समझौते के चलते ही पंचायतों को सत्कार फंड दिया जाने लगा जो बाद में पंचायतों के नेताओं का जेबखर्च बन गया। तमाम सरकारी योजनाओं को लागू करने में भी इन्हीं जन प्रतिनिधियों को प्राथमिकता दी गई। गांवों की राजनीति में सिद्धहस्त इन नेताओं ने भाजपा के कार्यकर्ताओं को भी अपने साथ मिला लिया और सरकारी योजनाओं को डकारने की मुहिम शुरु हो गई।

    सत्ता के तीसरे कार्यकाल मेंजब हाईकमान ने अनापशनाप फंड देने की परंपरा बंद कर दी तब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को ये गड़बड़ झाला समझ में आ चुका था। उन्होंने खुर्राट आईएएस अफसर आर.एस.जुलानिया के माध्यम से पंचायतों को दिए जाने वाले तमाम फंड रोक दिए। सबसे पहले तो सत्कार भत्ता रोका गया जिससे पंचायतों के बड़े दिग्गजों का जेबखर्च बंद हो गया। पंचायत सचिवों के माध्यम से हितग्राहियों का इतना सख्त परीक्षण कराया गया कि किसी भी योजना के लिए पात्र होना टेढ़ी खीर हो गया। भारी भ्रष्टाचार का सबब बनी प्रधानमंत्री रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को बंद कर दिया गया। इस बजट से दूसरे जमीनी काम काज कराए जाने लगे। हालांकि पंचायत मंत्री गोपाल भार्गव भी इससे बहुत खफा हुए क्योंकि यही योजना उनकी अवैध कमाई का बड़ा आधार बन चुकी थी। कुछ समय पहले पंचायत सचिवों और उनके सहयोगियों ने राजधानी भोपाल में आकर प्रदर्शन भी किया था लेकिन सरकार ने उसे सख्ती से दबा दिया। श्री जुलानिया ने तो पंचायत मंत्री के सामने ही मांगों की फाईल फेंककर अपनी नाराजगी भी जताई थी। इसके बाद श्री भार्गव और उनके समर्थकों ने सोचा कि पुरानी कमाई की योजनाओं को जारी रखने के लिए मुख्यमंत्री को झुकाया जाना जरूरी है। यही वजह थी कि किसान नेता कक्काजी के हाथ मजबूत कर दिए गए। तय किया गया कि आंदोलन तय समय पर पूरे प्रदेश में होगा। जैसे ही इस गुप्त समझौते की सूचना अफीम माफिया से जुड़े कम्युनिष्ट नेता अनिल यादव को मिली उन्होंने सरकार के खिलाफ विद्रोह का ऐलान कर दिया। उनके साथ मैदान में उतरे नशा तस्करों ने मोर्चा संभाला और नतीजा गोलीकांड के रूप में सामने आया। मंदसौर के तत्कालीन कलेक्टर स्वतंत्र कुमार ने गंभीरता को समझते हुए एसएएफ की जगह सीआरपीएफ को भेजकर दंगे पर त्वरित काबू पाने का प्रयास किया लेकिन जब हिंसा पर उतारू कथित किसानों ने उन पर ही हिंसक हमला कर दिया तो मैदानी अधिकारियों को गोलीकांड का सहारा लेना पड़ा। इसका कलंक झेल रही शिवराज सिंह चौहान सरकार को इंतजार है कि मामले की जांच रिपोर्ट सामने आ जाए ताकि वो अपना दाग धो सके। अनशन इसी श्रंखला से उपजा कदम है।

    कथित किसान आंदोलन की दूसरी सबसे बड़ी वजह बिजली सुधार थी। गांव का किसान सिंचाई के सीजन में तीन महीने के लिए बिजली का अस्थायी कनेक्शन लेता था जिसके लिए उसे लगभग बारह हजार रुपए का बिजली बिल चुकाना पड़ता था। अब नए हालात में मुख्यमंत्री स्थायी कृषि पंप योजना प्रारंभ कर दी गई। जिसमें प्रति हार्सपावर 1400 रुपए का बिल चुकाना पड़ता है। यदि किसान का पंप पांच हार्सपावर का है तो उसके लिए उसे चौदह हजार रुपए का बिल देना पड़ेगा। ये बिल उन्हें वर्ष के दौरान दो किस्तों में चुकाना था। किसानों को ये बढ़ी रकम देना मंजूर नहीं था और वे इस आंदोलन में कूद पड़े। फीडर विभक्तीकरण के बाद रहवासी इलाकों में बिजली की चोरी नहीं रोकी जा सकी है। इसलिए बिजली वितरण कंपनियों ने वहां स्थायी और अस्थायी कनेक्शन देना लगभग बंद कर दिया। जिनके घरों पर कनेक्शन लगे हैं उनके लिए हजारों रुपयों के बिजली बिल भेजे गए । उन ग्रामीणों का तर्क था कि जब हम बिजली का बिल ईमानदारी से देने के लिए तैयार हैं तो हमसे चोरी की गई बिजली का दाम क्यों वसूला जा रहा है। मांग वाजिब थी जिसने किसानों को भड़काने में बड़ी भूमिका निभाई। ये बात बिजली वितरण कंपनियों की बैठकों में पहले ही रखी जा चुकी थी। सरकार के दोनों अपर मुख्य सचिवों इकबाल सिंह बैंस और राधेश्याम जुलानिया ने जब चोरी गई बिजली के दाम सरकार की ओर से चुकाए जाने का प्रस्ताव खारिज कर दिया तो बिजली कंपनियों ने किसानों को खुली छूट दी कि वे जाकर सरकार से बात करें। बिजली चोर किसानों और ग्रामीणों को भड़काने में तीनों बिजली वितरण कंपनियों के प्रबंध संचालकों ने बड़ी भूमिका निभाई। पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के प्रबंध संचालक आकाश त्रिपाठी ने इंदौर और इसके आसपास के किसानों को आंदोलन के लिए उकसाया जिसका नतीजा पूरे मालवांचल में देखने मिला। पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के प्रबंध संचालक और मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी ने भी किसानों को उकसाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हालांकि मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के नवागत प्रबंध संचालक एम सेलवेन्द्रम तो अभी अपनी कंपनी की अंदरूनी कहानी समझने का प्रयास ही कर रहे हैं। पर इतना जरूर कहा जा सकता है कि बिजली सुधारों की नई व्यवस्था ने सब्सिडी के आदी हो चुके किसानों को भड़कने के लिए पर्याप्त चिंगारी सुलगाई।

    इस पूरे एपीसोड में मध्यप्रदेश पुलिस के खुफिया तंत्र की पोल भी खुल गई। पुलिस की ये विंग आज भी जन चर्चा के पुराने तरीकों को ही अपने अनुसंधान का केन्द्र बनाती है। उसके अफसर तेज बढ़ते मध्यप्रदेश और यहां की अर्थव्यवस्था के अनुरूप वैज्ञानिक अनुसंधान करने में फिसड्डी साबित हो रहे हैं। यही वजह है कि दंगों की चिंगारी पिछले तीन महीनों से सुलगते रहने की भनक भी पुलिस को नहीं मिल सकी। पुलिस की एसएएफ इकाईयां आपातकाल के लिए तैयार नहीं थीं इसलिए मंहगी कीमत चुकाकर रतलाम कलेक्टर को सीआरपीएफ की सेवाएं लेनी पड़ीं।

    यही हाल एक लाख पचासी हजार करोड़ के बजट वाले प्रदेश के सूचना संवाद तंत्र का रहा है। साढ़े सात करोड़ लोगों से संवाद करने के लिए जनसंपर्क विभाग के माध्यम से पांच हजार से अधिक पत्रकारों को अधिमान्यता दी गई है। दिग्विजय सिंह की सरकार पत्रकारों पर चालीस करोड़ रुपए खर्च करती थी ये बजट बढ़ाकर लगभग चार सौ करोड़ रुपए कर दिया गया है। फिजूलखर्ची और भ्रष्टाचार का आलम ये है कि ये राशी चैनलों, फिल्म निर्माण और ढेरों समाचार पत्रों के नाम पर खर्च की जाती है। हकीकत में इस राशि से सरकार के कामकाज लायक फीडबैक तंत्र आज तक तैयार नहीं हो सका है। जनसंपर्क विभाग संविदा नियुक्ति वाले एक रिटायर्ड अफसर के भरोसे है जिसे कुछ भ्रष्ट अफसरों के काकस के माध्यम से चलाया जा रहा है। मुख्यमंत्री के सचिव एस के मिश्रा के सीधे दखल और आयुक्त अनुपम राजन की उदासीनता ने फीडबैक की रही सही प्रणाली भी ध्वस्त कर दी है। खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लचर और अनिर्णय से भरी शैली ने जनता से संवाद का पूरा तंत्र ही फेल कर दिया है। जनता को ये तस्वीर दिख रही है पर सरकार इसे समझने तैयार नहीं है। यही वजह है कि आंदोलित किसानों ने फील्ड पर मौजूद पत्रकारों को खदेड़ने और पीटने में कोई गुरेज नहीं किया।

    गांवों में किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य आजादी के बाद से अब तक कभी नहीं मिल पाया। पहले कांग्रेस की सरकारें मूल्य देने के बजाए किसानों को चोरी के लिए उकसाती रहीं हैं। बिजली पानी की चोरी के सहारे किसान खेती करता था पर उत्पादन बढ़ाने की कोई पहल कभी नहीं की गई। आज शिवराज सिंह सरकार आधे अधूरे सुधार कार्यों के कारण निशाने पर है। वह पुरातन परंपराओं को अब तक बंद नहीं कर पाई है। किसानों की आय बढ़ाने लायक तंत्र भी अब तक विकसित नहीं कर पाई है जिससे कि किसान को निश्चिंतता हो सके। जिस सुशासन के वादे पर जनता ने भाजपा को सत्ता सौंपी थी वह किसानों को आज नजर नहीं आ रहा है। देश में चल रहे आर्थिक सुधारों की आंधी के साथ कदमताल कर पाने में असफल प्रदेश सरकार की ऊहापोह का असर किसानों पर भी पड़ा है। इससे उपजी चिंता ने किसानों के विद्रोह को दावानल का रूप दे दिया। जाहिर है कि इन हालात में बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक सर्जरी समय की मांग बन गई है जिसका फैसला भाजपा हाईकमान को लेना है।

  • ठेका खेती के आगे घुटना टेकती शिवराज सरकार

    ठेका खेती के आगे घुटना टेकती शिवराज सरकार


    -आलोक सिंघई-
    मध्यप्रदेश में पुलिस की गोली से किसानों के नरसंहार का कलंक भाजपा सरकार के माथे लगा है। इसे धोने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उपवास पर बैठने जा रहे हैं। उनके सलाहकारों ने समझाया है कि किसी भी जनांदोलन पर नियंत्रण पाने के लिए आपको गांधीवादी तरीका ही अपनाना होगा। गांधी जी के उपवास में बड़ी ताकत रही है। आजादी के संग्राम को नियंत्रित करने के लिए गांधीजी ने वही तरीका अपनाया था इसलिए भड़के हुए किसानों का दिल जीतने के लिए आपको भी उपवास पर बैठ जाना चाहिए। प्रदेश में मौजूदा किसान आंदोलन शिवराज जी के धूर्त सलाहकारों की चालबाजियों के कारण ही भड़का है। इससे निपटने के लिए वे एक और प्रहसन दुहराने जा रहे हैं। गांधीजी जब ये प्रहसन खेलते थे तब देश गुलाम था और आजादी देश के लोगों का सपना था। आज सत्तर सालों तक देश की आजादी का उत्सव मनाने के बाद जनमन का ये विश्वास जम चुका है कि वे आजाद मुल्क के वासी हैं। जाहिर है अब उनकी प्राथमिकताएं बदल गईं हैं। आजादी का अहसास देश के लोगों में भरने के लिए बाद की सरकारों ने बेलगाम छूटें दीं। जिसका लाभ चतुर लोगों ने तो उठाया पर खेतिहर मजदूर और किसान इससे वंचित रहे।

    शिवराज सिंह चौहान के शासनकाल में किसानों के हित की ढेरों योजनाएं चलाई गईं। खेती को मुनाफे के धंधे में बदलने का उनका अभियान कई सोपान पार कर चुका है। किसानों की अपेक्षाएं बहुत बढ़ चुकी हैं ।इसलिए किसानों को भड़काना भी सरल हो गया है। मौजूदा आंदोलन इन्हीं किसानों की आड़ लेकर भड़काया जा रहा है। इसके पीछे कौन है यह यक्ष प्रश्न सभी के दिमाग को मथ रहा है।शिवराज जी कह रहे हैं कि इसके पीछे कांग्रेस के गुंडे हैं। राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के अध्यक्ष पं. शिवकुमार शर्मा कह रहे हैं कि उनके आंदोलन को बदनाम करने के लिए साजिशन हिंसा कराई जा रही है। लोग कह रहे हैं कि जींस टीशर्ट पहिनकर गुंडों ने सार्वजनिक संपत्तियों को नुक्सान पहुंचाया है। उनके ही कारण आम नागरिकों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। मगर ये सभी बातें केवल अर्धसत्य हैं। इसका आधा सच खेती की ठेका पद्धति में छुपा हुआ है।

    कुछ सालों पहले भारत में ठेका पद्धति पर खेती करने का असफल प्रयोग किया गया था। बाद में कारगिल, ई चौपाल जैसी जिन कंपनियों ने बाजार में पूंजीकरण किया उन्होंने अपना कारोबार सीमित कर लिया। इसकी वजह थी कि उन्हें सब्सिडी पर आधारित कृषि व्यवसाय का सामना करना पड़ रहा था। अब स्थितियां बदल गईं हैं। ठेका खेती में पैसा लगाने के लिए भी कई कंपनियां सार्वजनिक धन का ही उपयोग करने की तैयारी कर रहीं हैं। रिलायंस जैसी कंपनी ने प्रदेश के कई सहकारी बैंकों को गोद लेने की लाबिंग शुरु कर दी है। कुछ सहकारी बैंकों के बोर्ड में तो कथित तौर पर उनके समर्थित किसानों का बहुमत हो चुका है। अब वे सरकार पर दबाव बना रहीं हैं कि इन बैंकों के पूंजीकरण के लिए उन्हें विश्व बैंक, एडीबी जैसे अंतर्राष्ट्रीय सूदखोरों से पैसा लेने की छूट दें। इसके लिए गारंटी सरकार को देनी है। यदि सरकार गारंटी देती है तो वे कंपनियां किसानों के नाम पर ये रकम आसानी से निकाल सकेंगे और अधिक मुनाफे वाले कारोबारों में लगा सकेंगे। इसके साथ साथ डूबने वाली रकम चुकाने की जवाबदारी सरकार की होगी।

    इन कंपनियों की अगुआई रिलायंस जैसी बड़ी कंपनी कर रही है। उसके मोबाईल जियो ने जिस तरह बाजार पर कब्जा जमाया है उससे अन्य कंपनियों के कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। अपने कारोबार के विस्तार के लिए रिलायंस शुरु से सरकार पर दबाव बनाता रहा है। जियो के टावर पुलिस थानों की जमीनों पर फोकट में लगाने के षड़यंत्र से इसी शुरुआत हुई थी। जब इस मामले को अदालतों में घसीटा जाने लगा तो कंपनी ने नाम मात्र का किराया देकर अपना कारोबार बढ़ा लिया। अब इसी तरह का हस्तक्षेप वह कृषि में करने जा रहा है।

    भूमि सुधारों के नाम पर किए जा रहे डिजिटलाईजेशन ने भी किसानों की जमीनों पर कब्जा जमाना शुरु कर दिया है। खेती को ठेके पर लेने वाली कंपनियां किसानों की जमीनें हड़पने की तैयारी कर रहीं हैं।इन जमीनों पर खेती करने से उन्हें किसानों के मंहगा किराया नहीं देना पड़ेगा। खेती को उद्योग का दर्जा दिए जाने की तैयारी ने उनका उत्साह बढ़ा दिया है। इसलिए यही कंपनियां सरकार पर दबाव बना रहीं हैं कि किसान की फसलों का मूल्य बढ़ाया जाए। अब तक सब्सिडी पर चलने वाले कृषि व्यवसाय के कारण खाद्यान्नों का मूल्य नियंत्रण में रहा है। बाजार की ताकतें अब चाहती हैं कि उन्हें खेती पर तो सब्सिडी मिले पर उनके उत्पाद को नियंत्रण के दबाव से मुक्त कर दिया जाए।इससे वे मनमानी कीमतों को अपना लागत मूल्य ज्यादा बताकर बढ़ा सकेंगी।

    इस अर्थ शास्त्र को समझे बगैर मौजूदा किसान आंदोलन की दशा और दिशा नहीं समझी जा सकती है। बेशक देश और प्रदेश का किसान नाराज है। न केवल किसान बल्कि व्यापारी, कर्मचारी और सभी तबकों के लोग नाराज हैं। नोटबंदी ने उनकी संपत्तियों को उजागर कर दिया है। उन्हें अब हर सेवा का अधिक मूल्य चुकाना पड़ रहा है। ये एक सामान्य कदम साबित होता यदि आम लोगों और किसानों की खरीद क्षमता बढ़ाने के प्रयास पहले किये जाते। लोगों की जेबें यदि भरती रहतीं तो वे कतई नाराज न होते पर दुहरी व्यवस्था ने उन पर खर्च का बोझ बढ़ा दिया है। आज किसानों का गेहूं तो समर्थन मूल्य पर खरीदा जा रहा है पर बाजार में उसी गेहूं से तैयार आटा बहुत मंहगे दामों पर बिक रहा है।बिस्कुट जैसे अन्य उत्पादों के कई ब्रांड तो दस गुना ज्यादा दामों पर बिक रहे हैं। इस विपणन शास्त्र का मुनाफा किसानों को नहीं मिल पा रहा है इसलिए उसका आक्रोश सड़कों पर आ कर फट रहा है। उसे हवा देने वाले कंपनियों के प्रमोटर इस नाराजगी को हिंसक बनाने से भी नहीं चूक रहे हैं।

    अब इन हालात में शिवराज जी कल से अनशन पर बैठकर गांधी वादी प्रयोगों को दुहराने जा रही हैं। जब अंग्रेजों ने जान लिया था कि हिंदुस्तान को अधिक समय तक प्रत्यक्ष गुलामी में नहीं रखा जा सकता तो उन्होंने गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस की मांगों के सामने समर्पण शुरु कर दिया था। गांधी जी सत्याग्रह करते और थोड़ी हीला हवाली के बाद अंग्रेज अपने हथियार डाल देते। कमोबेश यही इतिहास कल से एक बार फिर दुहराया जाने वाला है। किसान आंदोलन का समय 10 जून निर्धारित किया गया था। इसके बाद जेल भरो आंदोलन चलाया जाना है। अब इसके समानांतर मुख्यमंत्री जी धरने पर बैठने जा रहे हैं।किसानों का आव्हान किया जा रहा है कि वे उनसे मिलकर अपनी बात उन्हें बता सकते हैं। जाहिर है किसानों की इन्हीं सलाहों के नाम पर सरकार ठेका खेती करने वाली कंपनियों की कई मांगों को मंजूर करने का मन बना रही है। कहा जा सकता है कि किसान आंदोलन की आड़ में की गई गुंडागर्दी ने सरकार के घुटने लगभग टिका दिए हैं। अब तक सरकार ने जो मांगे स्वीकार की हैं उनसे किसानों की जीत तो पहले ही हो चुकी है। अब सरकार उनके नाम पर जो फैसले लेगी उनसे ठेका खेती के मैदान में उतरीं कंपनियों के हित भी संरक्षित किए जा सकेंगे। इसके साथ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की कुर्सी भी एक बार फिर सुरक्षित हो जाएगी।

  • शिवराज सिंह पाखंडी :शिवकुमार शर्मा

    शिवराज सिंह पाखंडी :शिवकुमार शर्मा

    -रमण रावल

    मालवा में 1 जून से किसानों के सडक़ पर आकर सब्जी, अनाज, दूध की गांव से3 निकासी रोक देने की पूरजोर कोशिश भले ही अचानक लिया गया फैसला लगे, लेकिन हकीकत यह है कि इसकी तैयारी अरसे से की जा रही थी। यह काम राष्ट्रीय स्वयं संघ की शैली से गुपचुप यदि हुआ तो इसके पीछे संघ के पुराने तपे हुए नेता शिवकुमार शर्मा की रणनीति है। यह और बात है कि वे अब संघ की छवि से मुक्त अपनी पहचान बन चुके हैं और म.प्र. की भाजपा सरकार को लोहे के चने चबवा रहे हैं। किसान आंदोलन की बागडोर थामे राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा याने कक्काजी दो टूक कहते हैं कि प्रदेश के हालात यदि बिगड़े हैं तो इसके पीछे एकमेव शिवराजसिंह चौहान की अदूरदृष्टि है। साथ ही वे यह भी कहने से परहेज नहीं करते कि शिवराजसिंह चौहान पूरी तरह से धोखेबाज , फर्जी राष्ट्रवादी , नौटंकीबाज , भ्रष्ट व विफल मुख्यमंत्री हैं।

    कक्काजी मंगवलार को शहर में थे और 6 जून को मंदसौर में आंदोलन करते हुए हुई 8 किसानों की हत्या(पुलिस गोलीबारी में मृत किसानों की हत्या करना ही वे निरुपित करते हैं) के संदर्भ में आगे की रणनीति को अंजाम देने इंदौर-उज्जैन के दौरे पर आये थए। जब उनसे पूछा गया कि किसान अचानक 1 जून से इतने उग्र प्रदर्शन पर कैसे उतारू हो गये तो वे बोले कि यह अचानक नहीं, सुनियोजित है। पहले की खामोशी तूफान का संकेत थी, जिसे प्रदेश सरकार समझ नहीं पायी तो यह उसकी विफलता है। देश के किसान को आजादी के बाद से ही लूटा जा रहा है, पहली बार वह चीख पड़ा तो सबको सुनाई दे रहा है।

    म.प्र. के किसानों के संदर्भ में वे साफ तौर पर भाजपा सरकार को कठघरे में खड़ा करते हैं। वे कहते हैं कि प्रदेश में जब 2003 में भाजपा की सरकार आयी तब कितान किसान क्रेडिट कार्ड योजना के तहत करीब 2 हजार करोड़ रुपये के कर्ज में था , जो अब 45 हजार करोड़ के कर्ज में डूब चुका है। यह ब्याज पर ब्याज वसूलने और हर साल फसल खराब होने के चलते लिये जा रहे नये कर्ज की वजह से हुआ है। वे बताते हैं कि 1880 में अंग्रेजों ने क्रूर शासक होते हुए भी बंगाल में दाम दुपट कानून बनाया था जिसके तहत कोई भी व्यक्ति मूलधन से दुगना ब्याज नहीं वसूल सकता है। जबकि अब सरकारें और राष्ट्रीयकृत बैंकें चक्रवृद्धि ब्याज की तरह वसूली कर रही है, जिससे किसान पीस रहा है।

    कक्काजी कहतेे हैं कि किसान की खेत जोतने की लागत बढ़ती जा रही है, महंगाई तेज गति से बढ़ रही है, लेकिन उसकी उपज का मूल्य लगातार गिरता जा रहा है। उदाहरण के जरिये वे बताते हैं कि 1970 में 2 क्विंटल गेहूं मेें एक तौला सोना आ जाता था, जबकि अब 20 क्विंटल गेहूं में एक तौला सोना आता है। जबकि व्यापारिक हिसाब से 20 क्विंटल गेहूं में 10 तौला सोना आना चाहिये। इस असमानता के लिये पूर्ववर्ती व मौजूदा सरकारें दोषी हैं। जो भाजपा सरकार कृषि कर्मण अवार्ड लेती है, जिसके नेता रात-दिन खेती को मुनाफे का धंधा बना देने की दुहाई देते हैं, उनके राज में किसान को लागत मूल्य से कम पर उपज बेचने की विवशता क्यों है?

    शिवकुमार शर्मा बताते हैं कि पंप में लगने वाला डीजल 15 पैसे लीटर से 60 रुपये लीटर हो गया, जो खाद की बोरी 60 रुपये में आती थी, वह 12सौ रुपये में मिल रही है, ट्रेक्टर के दाम 10 साल में दोगुने से अधिक हो गये, बीज, बिजली, मजदूरी , बैल की कीमत तक सबमें बेतहाशा वृद्धि हुई तो उपज के दाम भी आनुपातिक रूप से बढऩे चाहिये, लेकिन किसान के जागरुक नहीं होने, अपढ़, असंगठित होने से वह अपनी आवाज सही तरीके से सही जगह पहुंचा नहीं पाया और हर तरफ से लुटता रहा । जबकि उसकी फसल की बदौलत शहर का व्यापारी , खुदरा दुकानदार, बिचौलिया तक सब निहाल हो गये।

    कक्काजी कहते हैं कि इसमें भी सबसे बुरी स्थिति म.प्र. के किसानों की है। उनका कहना है कि आंध्र, तमिलनाडू , कर्नाटक, तेलंगाना , केरल, पंजाब , हरियाणा में किसानों को मुफ्त बिजली मिलती है, केवल 30 रुपये प्रतिमाह सर्विस चार्ज देना होता है, जबकि म.प्र. में 12 सौ रुपये प्रति हॉर्स पॉवर, प्रतिवर्ष के हिसाब से शु्ल्क वसूला जाता है। फिर किसान की फसल किसी एक वर्ष बिगड़ जाये तो उसकी भरपायी में 4-5 साल लग जाते हैं। इसके लिये अमेरिका की तरह व्यवस्था की जाना चाहिये। वहां चार तरह की प्रोत्साहन योजना है। ब्लू बॉक्स , रेड बॉक्स , यलो बॉक्स व एक्सपोर्ट सब्सिडी। इसके तहत शिक्षा, बीमारी, आकस्मिक संकट के समय सरकार किसान व उसके परिवार का पूरा खर्च वहन करती है। साथ ही निर्यात से विदेशी मुद्रा कमाने पर उपज के दाम के अलावा एक निश्चित रकम बोनस के रूप में भी मिलती है। इसलिये वहां किसान अपनी उपज का मूल्य तय करने में भी सक्षम है। जबकि हमारे यहां जो थोड़ी बहुत सब्सिडी सरकार देती भी है तो उसका अधिकांश हिस्सा भ्रष्ट अधिकारी हड़प लेते हैं।

    एक सवाल के जवाब मेें कक्काजी बताते हैं कि हमारे देश में भी राष्ट्रीय कृषि निर्धारण आयोग है, लेकिन यह अस्तित्वहीन हो चुका है। वे खुद भी कभी इसके सदस्य थे, किंतु जब देखा कि वह किसानों के हितों का पोषण करने में सक्षम नहीं है तो सदस्यता छोड़ दी। वे बताते हैं कि इस आयोग को किसानों का फायदा कराने में कतई दिलचस्पी नहीं है, बल्कि उसके अधिकारी कहते हैं कि वे तो यह देखते हैं कि लोगों को सस्ता अनाज कैसे मिल सके?

    कक्काजी ने आरोप लगाया कि प्रदेश भाजपा सरकार ने अपने लोगों के फायदे के लिये दिग्विजयसिंह के कृषिमंत्रित्व काल में बने मंडी अधिनियम को बदल कर किसान विरोधी कर दिया , जिसका एकमात्र उद्देश्य भाजपा के नेताओं को मंडी बोर्ड में काबिज कराना है, ताकि वे करोड़ो कमा सकें। इसके लिये पहले किसान के सीधे मंडी अध्यक्ष चुनने की व्यवस्था खत्म कर वार्डवार प्रतिनिधि चुनने का तरीका लाद दिया और वे अध्यक्ष चुनते हैं। इन प्रतिनिधियों को अध्यक्ष पद का प्रत्याशी करोड़ों रुपये खर्च कर खरीद लेता है , फिर मंडी अध्यक्ष बनकर करोड़ों कमाता है। तो जाहिर है कि वह किसानों का भला कैसे कर सकता है?

    मौजूदा किसान आंदोलन के संबंध में उनका कहना है कि किसानों की स्पष्ट मांग है कि किसानों को अन्य राज्यों की तरह बिजली मुफ्त दी जाये, खाद, ट्रेक्टर, बीज , कृषि उपकरण, दवा के दाम घटायें जायें , तभी उपज की लागत घटेगी और किसान सस्ते दाम पर उपज बेचकर भी मुनाफा कमा सकेगा। केवल वादे करने से किसानों की समस्या का निदान नहीं निकल सकता। शिवराजसिंह चौहान ने करीब 6500 वादे तो कर दिये हैं, लेकिन पूरे एक भी नहीं हुए । मालवा के बाद महाकौशल के किसान भी आंदोलन की राह पर जाने वाले हैं, लेकिन मौजूदा हालातों के मद्देनजर इस पर पुनर्विचार किया जायेगा। कक्काजी ने शिवराजसिंह चौहान के इस्तीफे व म.प्र. की भाजपा सरकार को बर्खास्त करने की मांग भी राष्ट्रपति से की है। उन्होंने कहा कि जो सरकार मंदसौर के निहत्थे किसानों पर गोली चलाकर 8 निर्दोष लोगों की जान ले सकती है , वह कभी-भी किसानों के हक में फैसले नहीं ले सकती।

    उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय किसान यूनियन, राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ व आम किसान यूनियन के बीच पूरी तरह से एकता व समन्वय है और इनमें से किसी ने भी किसानों की हड़ताल वापस लेने की अपील या समझौता नहीं किया है। सरकार अपने पिट्ठू संगठनों से अपील जारी करवाकर भ्रम फैला रही है, जिससे किसान अधिक आहत व उग्र महसूस कर रहा है।

  • जमीनें छिनने के भय ने खड़ा किया किसानों का बखेड़ा

    जमीनें छिनने के भय ने खड़ा किया किसानों का बखेड़ा

    -आलोक सिंघई-
    चौदह सालों बाद भारतीय जनता पार्टी की शिवराज सिंह सरकार किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य दिलाने के लिए कृषि लागत और विपणन आयोग गठित करने का फैसला करने जा रही है। पूरे कार्यकाल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान दौड़ दौड़कर किसानों से मुलाकात करने जाते रहे। इसके बावजूद उन्हें पता नहीं चल सका कि अन्नदाता की परेशानियां क्या हैं। पिछले दिनों उनके आत्मविश्वास का फुगावा इतने ऊंचे मगरे पर चढ़कर बोल रहा था कि कोई भी सलाह उन्हें आलोचना नजर आने लगी थी। कई दफे वे पत्रकारों से कहते रहे कि प्रेस के फीडबैक से ज्यादा लोगों की बातें तो वे सीधे मुलाकात में मालूम कर लेते हैं। सारी पारंपरिक चैनलों को लांघकर सीधे जनता से जुड़ने की ये मुहिम शिवराज जी ने अपने सलाहकारों के निर्देश पर चलाई थी। अब किसान आंदोलन से सबसे ज्यादा परेशान उनके वे सलाहकार हैं जो रात दिन तरह तरह की योजनाओं और विज्ञापनों से भाजपा के सुशासन की तस्वीर उकेरने में जुटे रहे हैं। कर्ज पर कर्ज लेकर चलाई जाने वाली इन योजनाओं की आड़ में भरपूर भ्रष्टाचार भी किया जा रहा है। उनका फीडबैक तंत्र बार बार इस भ्रष्टाचार जानकारियां दे रहा है लेकिन शिवराज जी कह रहे हैं कि किसानों को कांग्रेस ने बरगलाया है और उसकी आड़ में ही कुछ असामाजिक तत्वों ने किसान आंदोलन को हिंसक बना दिया है।

    शिवराज जी की ये बात बहुत हद तक सही बोल रहे है कि कांग्रेस ने रणनीति पूर्वक भाजपा के गुब्बारे में पिन चुभाई है। भाजपा कृषि कर्मण अवार्ड के नाम पर सीना ठोकते फिर रही थी लेकिन उत्साह के अतिरेक में उसका ये कदम भस्मासुरी साबित हो रहा है। मध्यप्रदेश में सुशासन का ढोल कितना पोला है इसकी असलियत किसान आंदोलन से उजागर हो गई है। सरकार के पास फीडबैक है कि इस आंदोलन को कांग्रेस के नेता हवा दे रहे हैं। कई वीडियो मौजूद हैं जिनमें कांग्रेस के नेता खुलकर किसानों को उकसा रहे हैं। शिवराज जी कांग्रेस को खलनायक बनाकर खुद को पाक साफ बताने की कोशिश कर रहे हैं। ये शैतान पर पत्थर फेंकने वाली कांग्रेसी सोच की ही नकल है। जब शिवराज सिंह को मध्यप्रदेश की कमान सौंपी गई थी तब तो ये युक्ति कारगर हो गई थी पर अब उनके कार्यकाल का पूरा रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने है। इसलिए कांग्रेस खलनायक होते हुए भी नाराजगी के निशाने पर नहीं है। जब जहाज भंवर में फंसता है तो उसके यात्री जो पकड़ में आता है उसका सहारा लेकर बचने का प्रयास करने लगते हैं। यही हाल शिवराज जी का हो रहा है। जब किसान आंदोलन भड़का तो उन्होंने जन संवाद की राह छोड़कर अपने विश्वस्त सहयोगियों पर ज्यादा भरोसा किया। कृषि मंत्री को मोर्चे पर न लगाकर उन्होंने गृहमंत्री ठाकुर भूपेन्द्र सिंह दांगी को मोर्चा सौंपा। गृहमंत्री पहले ही बयान में फंस गए। उन्होंने कह डाला कि पुलिस ने गोली नहीं चलाई। जबकि मंदसौर कलेक्टर स्वतंत्र कुमार ने बाद में कहा कि प्रशासन ने गोली चलाने के आदेश नहीं दिए बल्कि टीआई ने मौके की नजाकत देखकर गोली चलवाई। इससे साबित हो गया कि सरकार झूठ बोल रही है।

    फिर जिस तरह गोलीकांड में मारे गए किसानों को मुआवजा देने की जल्दबाजी की गई उसने भी उलटा असर दिखाया। गोलीकांड में मारे गए किसानों को एक करोड़ रुपयों का मुआवजा पहली बार सुना गया। युद्ध में सीमा पर मारे गए शहीदों को भी एक करोड़ रुपयों का मुआवजा नहीं दिया जाता है। शिवराज जी जिन किसानों को असामाजिक तत्व बता चुके हैं वे उनके लिए आखिर इतना मुआवजा क्यों दे रहे हैं ये आम जनता की समझ के परे है। इससे ये संकेत भी साफ मिल गया कि सरकार दबाव में है। राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ ने मुख्यमंत्री के इन बयानों के बाद अपनी रणनीति और ज्यादा आक्रामक कर ली। संघ के अध्यक्ष पं. शिवकुमार शर्मा कक्काजी ने 7 जून के बंद के आव्हान को पूरे उत्साह के साथ सफल बनाया। मंदसौर और आसपास के जिन जिलों में इन बयानों ने बंद को सफल बनाने में मदद की। भाग शिवराज भाग की तर्ज पर किसान आंदोलन सरकार को धमका रहा है और सरकार झुक झुककर कोर्निश बजा रही है।

    विशाल जनसमर्थन से सत्ता में आई भाजपा की ये हालत आखिर क्यों हुई इस पर भाजपा विचार करने भी तैयार नहीं है। घमंड से चूर भाजपा के नेता आखिर कर क्या रहे हैं इस पर भी चिंतन करने तैयार नहीं है। उसके नेताओं की दौलत विदेशों में ठिकाने लगाने में जुटे सलाहकार चपरासी बनकर ढुलाई में जुटे हैं पर भाजपा अपने कार्यकर्ताओं को आदर्शवाद के उपदेशों की घुट्टी पिला रही है। शिवराज सिंह के वित्तमंत्री किन किन सहेलियों को फ्लैट दिला रहे हैं ये बात सत्ता शीर्ष के कोई पदाधिकारी नहीं देखना चाहते। परिवहन मंत्री ने कांग्रेस की परंपराओं को कितनी कुशलता से आत्मसात किया इस पर चर्चा करना तो संभव नहीं है क्योंकि हाईकमान की सप्लाई लाईन थोड़ी बंद की जा सकती है। पंचायत मंत्री ने ग्रामीणों के नाम पर जारी योजनाओं में कैसे पलीता लगाया इस पर खुलकर बात करने की हिम्मत सत्ता शीर्ष ने कभी नहीं जुटाई। महिला और बाल विकास की योजनाएं जमीन पर नहीं तो कहां चलाई गईं इस पर सवाल पूछने की हिम्मत भाजपा ने तो कभी दिखाई ही नहीं बल्कि समाज के एकीकरण में जुटे संघ के पदाधिकारियों ने भी कभी इस दिशा में झांकने की कोशिश नहीं की।

    भाजपा के खिलाफ भड़कते जन आक्रोश की जरा सी झलक गांवों से ही मिल जाती है। भू राजस्व उगाही की बरसों पुरानी परंपरा को छोड़कर इस सरकार ने जो दस्तावेजों का डिजिटलाईजेशन किया वह नाराजगी की सबसे बड़ी वजह बन गया। किसानों के बीच ये बात फैल गई कि सरकार उनके खसरे खतौनी में हेरफेर करके उनकी जमीनें छीन रही है। सरकार के भ्रष्ट अधिकारियों ने जिन जमीनों को बेनामी बताकर खरीदना शुरु किया उससे इस अफवाह को बल मिला। पहले तो हाट बाजार के दिन पटवारी अपना बस्ता लेकर हाट में पहुंच जाता था और सौ पचास रुपए का सेवा शुल्क लेकर लोगों की जमीनों के रिकार्ड दुरुस्त कर देता था। ये सुविधा बहुत सस्ती और किसानों के लिए भरोसेमंद थी। इसमें तो उन जमीनों के रिकार्ड भी थे जो जमीनें वास्तव में थीं ही नहीं। या उन्हें विवादित जमीनों के बीच पट्टे देकर बांटा गया था। इसके बावजूद भुलावे के द्स्तावेज लेकर किसान खुश रहते थे। अब जब सैटेलाईट सर्वे के आधार पर जमीनों का दुरुस्तीकरण होने लगा है तब कई किसान अपनी कागजी जमीनों से भी बेदखल हो गए हैं। किसानों को वैकल्पिक जमीनें दिलाने का कोई प्रयास भाजपा के नेताओं ने नहीं किया है। अब वे सीमांत किसान मजदूर बनकर राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के हाथ मजबूत कर रहे हैं।

    राजस्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने जब ये विभाग संभाला तब पार्टी ने उनके सामने कई टारगेट रखे थे। श्री गुप्ता ने हमेशा की तरह उन मुद्दों पर तेजी से अमल शुरु कर दिया। राजस्व अमले ने जब जमीनों के खसरे खतौनी पलटने शुरु किए तो किसानों को लगा कि सरकार भूमि सुधारों के नाम पर उनकी जमीनें छीनकर बड़ी कंपनियों को सौंपने जा रही है। सरकार के सख्ती के निर्देशों की आड़ में राजस्व अमले के कमाई पसंद अफसरों और कर्मचारियों ने धड़ाधड़ जमीनों के नामांतरण भी करवाने शुरु कर दिए।ज्यादातर जमीनें ठेका खेती करने वाली यही कंपनियां खरीद रहीं हैं। नर्मदा पट्टी में भी उपजाऊ भूमियों की बंदरबांट शुरु हो गई। सरकार की नर्मदा सेवा यात्रा ने उन बिखरे वंचितों को लामबंद करने का काम कर दिया। कई जगह कांग्रेस और भाजपा के खेमे वाले किसानों के बीच तनातनी भी नाराजगी की वजह बनी। यही कारण था कि भारतीय किसान संघ से करीबी रखने वाले कई किसान भी टूटकर राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के बैनर तले इकट्ठे होने लगे। सरकार को इस पूरी कवायद की जानकारी पहले से थी। इसके बावजूद उसे ये अनुमान नहीं था कि किसान आंदोलन इतना आक्रामक हो जाएगा। खदबदाते आक्रोश को पं.शिवकुमार शर्मा ने बड़ी कुशलता से सरकार के खिलाफ लामबंद कर दिया है। हालात इतने बेकाबू हो चले हैं कि बार बार झूठ बोलने में जुटी शिवराज सिंह सरकार अपने ही बुने जाल में उलझती जा रही है। सरकार जिन आईएएस अफसरों को अपना तारणहार मान रही है वे ही उसके खिलाफ नाराजगी भड़काने की वजह बन रहे हैं। भाजपा के नेताओं की पोल भी इस आंदोलन में खुलती जा रही है। बड़े बड़े पदों पर बैठने वाले नेतागण कितने आधारहीन हैं ये भी सामने आता जा रहा है। सबसे बड़ी भद तो भारतीय किसान संघ की पिटी है। वह किसानों का भाग्यविधाता होने का दावा करता रहा है पर किसानों ने उसके नेताओं को कितने स्थानों पर दौड़ा दौड़ा कर हकाला ये स्वीकारने में उसके नेता शर्म महसूस कर रहे हैं।

    भाजपा का मौजूदा नेतृत्व मध्यप्रदेश में प्याज भी खाएंगे और जूते भी खाएंगे की तर्ज पर काम कर रहा है। उसे मुगालता है कि अन्नदाता कहकर वो किसानों को अपने पक्ष में मना लेगी पर ये सोचना निरी भूल साबित होगी। किसान अपनी फसल का लागत मूल्य भी न मिल पाने के कारण तो परेशान है ही। वह अन्य सरकारी नौकरियों में धड़ाधड़ बढ़ते वेतनमानों से भी खफा है। किसानों के जो बच्चे उच्च शिक्षा के लिए मोटी मोटी फीसें चुकाने के बाद भी बेरोजगारी झेल रहे हैं वे भी इस आंदोलन में कूद पड़े हैं। सरकार के चापलूस कह रहे हैं कि जींस टीशर्ट पहने लोग किसान नहीं हैं बल्कि वे किसानों के बीच घुस आए असामाजिक तत्व हैं। इन नामुरादों को इतनी भी समझ नहीं कि किसान और उसके युवा बच्चों में पहनावे को लेकर कई बदलाव आ चुके हैं। पहनावे के आधार पर उन्हें किसान न मानना किसी षड़यंत्र का हिस्सा तो हो सकता है पर सच्चाई नहीं।

    किसानों को ये बात समझ में आ गई है कि टाटा अपना माल बनाता है तो उसके दाम फिक्स हो जाते हैं। बाजार में मिलने वाले हर सामान का मूल्य तय होता है पर वह रात दिन खटकर जो खाद्यान्न पैदा करता है उसके दाम नीलामी में तय होते हैं। समर्थन मूल्य की बैसाखियों पर टिके होते हैं। वे जो माल तैयार कर रहे हैं उसके बगैर लोगों का जीवन भी संभव नहीं इसके बावजूद उन्हें उनके माल का लागत मूल्य भी नहीं मिल पा रहा है। वे लगातार घाटे में जा रहे हैं और इससे उनके ऊपर कर्ज बढ़ता जा रहा है। हर किसान इतना कुशल नहीं है कि वह खेतों से सोना बटोर सके। सभी किसानों के पास जमीनें भी नहीं हैं । इसीलिए भारतीय किसान संघ जैसे पुरातन पंथी संगठन के सामने नया नवेला राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ ज्यादा कारगर साबित हो रहा है। किसान को तो जमीन से बेदखल करने का भय दिखाकर डराया जा सकता है पर मजदूर के सामने खोने को कुछ नहीं है। भ्रष्टाचार करने वाली कांग्रेस की सरकारों की नकलपट्टी करके भाजपा ने अपने आप को अंधी गली में ला खड़ा किया है। उसे जो भूमि सुधार करने थे उसके लिए उसे किसी जादुई और प्रतिभाशाली नेता को मैदान में उतारना था। ये काम किसी घोषणा वीर या उसके सूदखोर मंत्री के बस का तो नहीं था।

  • सरकार असामाजिक तत्वों के हाथों में बोले कक्का शर्मा

    सरकार असामाजिक तत्वों के हाथों में बोले कक्का शर्मा

    मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन को कुचलने की तैयारी


    भोपाल,(पीआईसीएमपीडॉटकॉम )। मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन के हिंसक रूप अख्तियार कर लेने के बाद सरकार अब इस आंदोलन को कुचलने की तैयारी कर रही है। अनुषांगिक संगठन भारतीय किसान संघ के हड़ताल वापस लेने के ऐलान के बावजूद जब कई स्थानों पर हिंसक प्रदर्शन जारी रहे तब सरकार ने आरपार की लड़ाई लड़ने का मन बनाया है। उधर देश के किसान आंदोलन में मध्यप्रदेश के किसानों की अगुआई करने वाले राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ ने हड़ताल तोडने के सरकारी प्रयासों के खिलाफ नई जंग छेड़ दी है। जगह जगह गुपचुप समझौता करने वाले भारतीय किसान संघ के पुतले जलाए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आज भोपाल में पत्रकार वार्ता बुलाई और कहा कि मैं किसी का नाम तो नहीं लेना चाहता पर यह आंदोलन कुछ असामाजिक तत्वों के हाथों में चला गया है। सरकार हालात पर नजर रखे हुए है और जल्दी ही सख्त कार्रवाई भी की जाएगी। उधर इंदौर में पत्रकार वार्ता के बुलाकर राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ ने सरकार को आड़े हाथों लिया। मुख्यमंत्री के आरोप के जवाब में संघ के अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा ने कहा कि सरकार ही असामाजिक तत्वों के हाथों में आ गई है इसलिए उसे किसान भी दुश्मन नजर आने लगे हैं।

    मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सरकार किसानों की सभी वाजिब मांगों को मानने के लिए तैयार है। हम अन्नदाता के साथ हैं और उन्हें हरसंभव सहयोग दिलाने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार ने अरहर की दाल के मूल्यों की गिरावट को देखकर समर्थन मूल्य पर दाल खरीदने का फैसला लिया है। प्याज की खरीदी जल्दी ही शुरु की जाएगी। उन्होंने कहा कि बार बार की इस समस्या से किसानों को निजात दिलाने के लिए हम जल्दी ही खेती के रकबे की जानकारी सार्वजनिक करेंगे। किसानों को सलाह दी जाएगी कि यदि उन्होंने मांग के अनुरूप फसलें न बोईं तो उन्हें उपज का लागत मूल्य नहीं मिल पाएगा। श्री चौहान ने कहा कि भारतीय किसान संघ के आव्हान के बाद प्रदेश की मंडियों में अनाज, फल, सब्जी और दूध की आवक सुधरने लगी है।

    उन्होंने कहा कि ये आंदोलन कुछ असामाजिक तत्वों ने हथिया लिया है। वे किसानों को उन काल्पनिक मांगों को लेकर गुमराह कर रहे हैं जिन्हें पूरा करना संभव नहीं हैं। कुछ असामाजिक तत्वों ने तोड़फोड़ करके पुलिस पर हमला करने का भी प्रयास किया है। एक पुलिस अधिकारी की तो आंख ही फूट गई है। उसे इलाज के लिए चेन्नई भेजा गया है। उन्होंने कहा कि सरकार उपद्रवियों से सख्ती से निपटेगी।

    राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के अध्यक्ष पं. शिवकुमार शर्मा उर्फ कक्काजी का कहना है कि सरकार अपने खुद के वायदे से मुकर रही है। सरकार के कुशासन के कारण ही आज किसान दुर्दशा के शिकार हैं और उनके सामने अपनी जीवन लीला समाप्त करने की स्थितियां बनती जा रहीं हैं। उन्होंने कहा कि मूल्य सूचकांक के आधार पर फसलों का मूल्य दिए जाने के बाद ही किसानों की स्थितियां सुधारी जा सकती हैं। उन्होंने कहा कि सरकार केवल बड़े किसानों को देखकर फैसले कर रही है जबकि बड़ी संख्या में सीमांत और लघु किसान भी हैं जिनके हालात बदतर होते जा रहे हैं। सरकार किसानों की स्थितियां सुधारने की बातें तो बड़ी बड़ी करती है पर उसने कभी किसान को सक्षम बनाने का प्रयास नहीं किया है। पिछली सरकारों ने जिस तरह उद्योगपतियों के हित में फैसले लिए उसी तरह मौजूदा सरकार भी किसानों के नाम पर उद्योगपतियों और सूदखोरों को बढ़ावा दे रही है। उन्होंने सरकार के दमन चक्र के फैसले के जवाब में कहा कि किसान अपनी हड़ताल जारी रखेंगे ।

    गौरतलब है कि भारतीय किसान संघ से अलग हुए इस नए संगठन में प्रमुख पदों पर मजदूरों को भी पदासीन किया गया है। आंदोलन में बढ़ चढ़कर भागीदारी न कर पाने के कारण किसान तो खामोश बैठने लगे हैं पर इस आंदोलन की कमान अब किसानों के बजाए मजदूरों ने संभाल ली है। जाहिर है इन खेतिहर मजदूरों में सरकार के दमनचक्र को झेलने की ताकत अधिक है।

  • किसान आंदोलन में फूट के बीच हड़ताल वापिसी का ऐलान

    किसान आंदोलन में फूट के बीच हड़ताल वापिसी का ऐलान

    भोपाल, पीआईसीएमपीडॉटकॉम। राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के आव्हान पर प्रदेश भर में चल रहे किसान आंदोलन में आज फूट पड़ गई। सरकार समर्थित भारतीय किसान संघ ने आज उज्जैन में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से हुई चर्चा के बाद आंदोलन वापस लेने की घोषणा कर दी। संघ का कहना है कि सरकार ने किसानों की अधिकांश मांगें वापस ले लीं हैं इसलिए हम हड़ताल समाप्त कर रहे हैं। वहीं राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ ने अपनी पूर्व घोषित रणनीति के अनुसार दस जून तक हड़ताल जारी रखने का फैसला लिया है।आज इसी श्रंखला में देवास में रैली भी निकाली गई।जन न्याय दल ने कहा है कि बगैर सोचे समझे किसान आंदोलन को समाप्त करने के लिए सरकार ने जो फैसले किए हैं उससे जनता की गाढ़ी कमाई बर्बाद होने का खतरा बढ़ गया है।

    राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा कक्काजी ने कहा कि किसानों को लेकर भारतीय जनता पार्टी की असलियत अब उजागर हो गई है इसलिए पूर्व घोषित कार्यक्रम के अनुसार किसानों का आंदोलन दस जून तक विधिवत चलता रहेगा। उन्होंने कहा हम खुशहाली के दो आयाम, ऋण मुक्ति और पूरा दाम का नारा लेकर इस आंदोलन में उतरें हैं। आंदोलन पर जाने का फैसला हमारा था। न तो हमने सरकार से कोई बात की है और न ही सरकार ने हमसे संपर्क करने की पहल की है। इसलिए हम किसानों की मूलभूत मांगों के लिए अपना संघर्ष जारी रखेंगे।

    उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में वादा किया था कि वह सत्ता में आने पर किसानों के 44 हजार करोड़ के कर्जे माफ करेंगे। लागत के आधार पर किसानों को उनकी फसलों का पचास फीसदी लाभकारी मूल्य देंगे। सत्ता में आने के बाद वह अपने वायदों से मुकर रही है। शिव कुमार शर्मा ने कहा कि केन्द्र व राज्य की भाजपा सरकार किसान विरोधी सरकार है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आते से ही धान और गेहूँ पर मिलने वाला बोनस समाप्त कर दिया, किसान विरोधी जमीन विधेयक लाये, किसान क्रेडिट कार्ड पर ब्याज बढ़ाया, 18 बार कपास निर्यात को रोका जिससे घरेलू कपास उत्पादक किसानों की कमर टूट गई। मोजाम्बिक से तुअर दाल, ऑस्ट्रेलिया से गेहूँ और आलू मंगवाकर देश के किसानों की मेहनत पर पानी फेर दिया है।

    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से गन्ना उत्पादक किसानों का बकाया न होने की बात कही जो पूरी तरह से झूठी सिद्ध हुई है।शिव कुमार शर्मा ने देश के सभी किसानों को कर्ज से मुक्त करने और लागत से डेढ़ गुना अधिक मूल्य पर समस्त कृषि उपजों को खरीदने की माँग की है।
    उन्होंने कहा कि जब देश के उद्योगपतियों के कर्ज माफ किये जा सकते हैं, विभिन्न प्रकार के करों में छूट दी जा सकती है, विभिन्न प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध करवाने के लिये बड़ी राशि खर्च की जा सकती हैं, तब सभी किसानों को कर्ज से मुक्ति क्यों नहीं दी जा सकती? उन्होंने प्रश्न किया कि उद्योगपतियों और किसानों के लिए यह दोहरा मापदण्ड क्यों?
    श्री शर्मा ने कहा कि आजादी के बाद से ही पूरे देश में सिर्फ किसान को ही उसके उत्पादन का मूल्य तय करने का अधिकार नहीं देकर केन्द्र सरकार ने किसानों को कर्ज में डुबोकर दिन-प्रतिदिन तिल-तिल करके मरने के लिये छोड़ दिया है। यही एकमात्र कारण है कि देश के किसान प्रतिदिन आत्महत्या करने पर मजबूर हैं।

    यदि केन्द्र सरकार किसानों के समस्त कर्जों से ऋण मुक्त करती है और लागत मूल्य से डेढ़ गुना अधिक लाभकारी मूल्य देती है तो किसानों की आत्महत्या का दौर समाप्त हो जायेगा।
    राष्ट्रीय किसान महासंघ के राष्ट्रीय संयोजक और राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा ‘कक्काजी ने बताया कि केन्द्र सरकार को समस्त कृषि और उद्यानिकी से सम्बन्धित उपजों का लाभकारी मूल्य किसानों को देना चाहिये। साथ ही केन्द्र सरकार इन्हें क्रय करने की गारंटी भी दे।
    श्री शर्मा ने कहा कि केन्द्र सरकार वर्ष 2006 में देश के प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक पद्मविभूषण प्रो. एम.एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में गठित राष्ट्रीय किसान आयोग द्वारा तैयार पाँचवी और अन्तिम संशोधित राष्ट्रीय किसान नीति की अनुशंसाओं को लागू करे।

    केन्द्र सरकार किसान पेंशन योजना लेकर आये जिसमें किसान परिवार के मुखिया को 55 वर्ष की आयु से पेंशन के रूप में प्रति माह एक निश्चित राशि मिलना प्रारम्भ हो सके। किसानों के हित में नया भू-अर्जन कानून बनाया जाये। किसानों की भूमि को आरक्षित करें। औद्योगिकीकरण, शहरीकरण तथा विशेष आर्थिक प्रक्षेत्र हेतु कृषि योग्य भूमि अधिग्रहित नहीं की जाये। इसके लिये गैर-कृषि भूमि और बंजर भूमि ही अधिग्रहित की जाये। भू-अधिग्रहण के साथ ही पुनर्वास और पुनःस्थापन को जोड़ा जाये।

    उधर भारतीय किसान संघ के शिवकांत दीक्षित ने घोषणा की है कि सरकार ने उनकी सभी बातें मान लीं हैं इसलिए इस आंदोलन को स्थगित कर दिया गया है। उन्होंने किसानों से अपील करते हुए कहा कि मध्यप्रदेश सरकार किसान हितैषी सरकार है। वह सदैव किसानों के कल्याण के लिए कार्य करती है इसलिए किसान अब आंदोलन वापस ले लें।

    उन्होंने कहा कि सरकार की पहल प र अब कृषि उपज मंडी में बेचे जाने वाले उत्पादों की पचास फीसदी रकम तत्काल किसानों के बैंक खातों में पहुंच जाएगी। गर्मी में होने वाली मूंग की फसल को सरकार समर्थन मूल्य पर खरीदेगी। किसानों से प्याज की खरीदी पिछले साल की तरह होगी। सरकार अगले तीन चार दिनों में किसानों से आठ रुपए मूल्य पर प्याज खरीदेगी। सब्जी मंडियों को मंडी अधिनियम के दायरे में लाया जाएगा ताकि किसानों को अधिक आढ़त न देना पड़े। किसानों के लिए फसल बीमा योजना की अनिवार्यता को अब ऐच्छिक बना दिया जाएगा। नगर एवं ग्राम निवेश एक्ट में जो भी किसान विरोधी प्रावधान होंगे उन्हें हटा दिया जाएगा। आंदोलन रत किसानों पर दर्ज प्रकरण समाप्त कर दिए जाएंगे। सरकार की ओर से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के इन आश्वासनों के बाद आज भारतीय किसान संघ ने अपने पदाधिकारियों को आंदोलन शांत करने के निर्देश दिए हैं।

    किसानों के पक्ष में सरकार के इन फैसलों पर मिली जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रहीं हैं। जन न्याय दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष बृज बिहारी चौरसिया ने कहा है कि किसान आंदोलन सरकार की नाकामी का जीता जागता प्रमाण है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सरकारी मशीनरी पर अपना नियंत्रण खो चुके हैं इसलिए उन्हें सत्ता में रहने का नैतिक अधिकार नहीं है। श्री चौरसिया ने कहा कि मुख्यमंत्री स्वयं जनता के बीच कड़ी धूप में दौरे करते हैं जबकि उनके अफसर वातानुकूलित कक्षों से बाहर नहीं निकलते हैं। किसान कल्याण की राशि से विदेश यात्राएं करके अफसर गुलछर्रे उड़ा रहे हैं। कृषि पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। कितने रकबे पर कितनी फसल कैसे बोई जाएगी सरकार इसका आकलन नहीं कर पाती है। यही वजह है कि गैर जरूरी जिंसों की खेती धड़ल्ले से हो रही है जबकि जरूरी फसलें नहीं बोई जा रहीं हैं।

    सरकार कृषि कैलेन्डर का पालन नहीं करा पा रही है इससे किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य तक नहीं मिल पा रहा है। थोथे नारों से सरकार किसानों को बहला रही है जबकि लागत मूल्य तक न मिल पाने के कारण किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं। पिछली साल भी सरकार ने प्याज की खरीदी पर जनता की गाढ़ी कमाई के चार सौ करोड़ रुपए पानी की तरह बहा दिए थे। इस बार भी प्याज के भंडारण और वितरण की व्यवस्था नहीं की गई है और बगैर सोचे समझे किसानों की उपज खरीदने का पाखंड किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि किसानों के आंदोलन से जनता में भय व्याप्त है और व्यापारी जमाखोरी में लिप्त हैं।

  • ट्रम्प की लताड़ समझ नहीं आती क्या नेताजी

    ट्रम्प की लताड़ समझ नहीं आती क्या नेताजी

    जिस देश में ‘समृद्ध’ नेताओं की कमाई सरकारी दलाली पर निर्भर हो, जहाँ नौकरशाह रिश्वतखोर और उद्योगपति कर-चोर हों, उस देश के बारे में अगर डोनाल्ड ट्रम्प ये कहें कि भारत अरबों डालरों के दान और ग्रांट का भूखा है तो बुरा तो बहुत लगता है…लेकिन ट्रम्प की बात गलत नही है.
    ट्रम्प मुहंफट हैं, बेधडक हैं, इसलिए किसी अबूझ या कुभाषी की तरह अक्सर नंगा सच बोल जाते हैं. उन्होंने पेरिस की पर्यावरण संधि के संदर्भ में कहा कि भारत को विकसित देशों से सिर्फ अरबो-खरबों की ग्रांट चाहिए. भले ही भारत अपने यहाँ प्रदूषण कम करे या ना करे लेकिन खरबों डालर की ग्रांट पर उसकी निगाह है. ट्रम्प के इस भारत विरोधी बयान की निंदा होनी चाहिए लेकिन इस ग्रांट का बड़ा हिस्सा लूटने वाले नेता-नौकरशाह-उद्योगपतियों पर हम पर्दा क्यूँ डालें ?..

    आखिर कब तक महाशक्ति का सपना देखना वाला ये देश अंतर्राष्ट्रीय सहायता और दान के लिए हाथ पसारेगा ? क्या यही 1.30 अरब भारतियों का स्वाभिमान है ? क्या यही हमारी गैरत और आबरू है ? क्या देश को 2.60 अरब हाथ दुनिया से दान और भीख मांगने के लिए मिलें हैं ?

    हमारे बराबर या हमसे कुछ ही ज्यादा जनसँख्या वाला चीन है …जो तीन दशक पहले अर्थ व्यवस्था में हमसे पीछे था लेकिन आज वो दुनिया के आगे हाथ नही फैलाता है. आज, हमारा पडौसी चीन, अफ्रीका और कईं कमज़ोर एशियाई देशों का पेट पाल रहा है.

    और एक हम है …जो हमेशा दरिद्र पाकिस्तान को अपनी विदेश नीति के केंद्र में रखते हैं. कश्मीर हो आतंकवाद हो, नक्सल समस्या हो…पाकिस्तान सर्वविदित है. इधर घरेलू मामलों में हमारी राजनीति या यूँ कहें कि हर नीति, मुस्लिम, ओबीसी और दलित वोटबैंक पर केन्द्रित रहती है. नौकरी हो, सब्सिडी हो, कोई आयोग हो या बड़ा निर्णय हो, पिछड़े, दलित, मुस्लिम हम नही भूलते. क्यूंकि ये वोट की राजनीति में निर्णायक है. शायद यही वजह है कि हमारी सरकारें पाकिस्तान और वोटबैंक के जाल से कभी आगे बढ़कर इस देश को किसी बहुत ऊंचे लक्ष्य तक नही ले जा सकीं.

    हमने अर्थ क्रांति को कभी देश के अजेंडे पर सबसे ऊपर रखा ही नही. हमने ओद्योगिक उत्पादन को राष्ट्रीय लक्ष्य कभी माना ही नही. हम 21वी शताब्दी में भी खुले में शौच करने वाले लोगों को गली-गली, गाँव-गाँव ढूंढ रहे हैं. महानायक अमिताभ बच्चन देश के बच्चों से कह रहे हैं कि लोटा लेकर चलने वालों को ढूंढो. गाँव-गाँव ढूंढो. ये अलग बात है कि आज हमे ढूँढना तो नये जमशेदजी टाटा, घनश्याम दास बिरला या जमना लाल बजाज को है…लेकिन हम ढूंढ किसी और को रहे हैं. हमे ढूंढना तो उन युक्ति और निर्माण पुरुषों को है जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य से लोहा लेकर ब्रिटिश मिलों को पानी पिला दिया था. हमे ढूंढना तो उन्हें है जिन्होंने सौ बरस पहले देश में स्वदेशी कारखानों के नये मंदिर निर्माण किये थे.

    कम लोग जानते हैं कि 1950 के दशक में भारत विश्व की सातवीं बड़ी ओद्योगिक शक्ति था जब चीन अपनी गरीबी से संघर्ष कर रहा था. लेकिन हम अपनी ताकत धीरे धीरे खोते चले गये. हमने अपने कारखानों को पूजना बंद कर दिया. हमारे नेताओं की रूचि स्टील कारखानों और मिलों से हटकर , चिट फंड कम्पनी और भ्रष्ट बिल्डरों में बढ़ने लगी. हमारी अर्थ व्यवस्था में जमशेदजी जैसों का महत्व जाता रहा. हमारी नई अर्थ व्यवस्था के मानक झुनझुनवाला जैसे शेयर दलाल हो गये जो आईपीओ की बड़ी बड़ी डील के कुबेर बने. जिस देश के नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की सीईओ को ऑनलाइन ट्रेडिंग में कुछ दलालों को फायदा पहुंचाने का दोषी माना जाये उस देश के शेयर मार्किट का असली हाल क्या होगा ..ये कोई अर्थशास्त्री सहजता से समझ सकता हैं. जिस देश में फैक्ट्रियों की जगह शैल कम्पनियों के ज़रिये लाभ अर्जित करने की परम्परा हो वहां ओद्योगिक उत्पादन के श्रम और संकल्प में किसको दिलचस्पी होगी.

    बहरहाल वक़्त अभी गुजरा नही. भारत को बड़े कारखाने, भारी उद्योग के नये प्रतीक चाहिए. हर प्रदेश को कोई जमशेदजी चाहिए. हर प्रदेश को विश्वकर्मा का अवतार चाहिए. लेकिन सच ये है कि आज हमारे प्रदेश सुब्रोतो रॉय, पोंटी चढ्ढा या आम्रपाली और सुपर टेक जैसे बिल्डर और चिट फंड मालिक खोज रहे हैं. शायद सत्ता को ज़रुरत धन सम्पनता की नही धन संचय करने वालों की है. यही वजह है कि देश के सबसे बड़े प्रदेश यूपी में उद्योग का बहुत बुरा हाल है. अगर नॉएडा/ग्रेटर नॉएडा छोड़ दें तो पूरे प्रदेश में 1989 के बाद से कोई भी बड़ी इंडस्ट्री नही आई. कानपुर से लेकर बनारस तक और आगरा से लेकर गोरखपुर तक भारी उद्योग के क्षेत्र में तीस वर्षों से अकाल है.
    मित्रों, जिस समाज और सभ्यता में, हज़ारों वर्षों से युक्ति और निर्माण की अवधारणा रही हो वहां की दुर्दशा देख आज मन विचलित होता है. इसलिए भगवान् विश्वकर्मा का आज आशीर्वाद चाहिए. हे युक्ति, निर्माण और उपकरणों के देव विश्वकर्मा ! हे शिल्प शास्त्री ! हे उत्पादन और सम्पनता के जनक …अब आप ही अवतरित हो जाईये . वर्ना पाकिस्तान की आढ़ में ये चीन हमें निगल जाएगा. .

  • विलीनीकरण वर्षगांठ के बहाने एजेंडे पर लौटती भाजपा

    विलीनीकरण वर्षगांठ के बहाने एजेंडे पर लौटती भाजपा

    मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह सरकार अपनी असफलताओं से घबराकर पार्टी के पुराने एजेंडों पर लौटने लगी है। लगभग चौदह सालों बाद भाजपा ने भोपाल के विलीनीकरण की वर्षगांठ मनाकर ये जताने की कोशिश की है कि वह कांग्रेस की पिछली भ्रष्ट सरकारों से अलग है। हालांकि भाजपा के ये प्रयास अब ट्रेन चूकने के बाद किए जाने वाले प्रयास ही साबित हो रहे हैं। इसकी वजह ये है कि सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर शुरु हो गई है। मालवा के किसानों ने भारतीय किसान संघ के बैनर तले दूध और प्याज सड़कों पर फेंककर जनता की नब्ज दर्शाने का काम किया है। जनता के बीच कांग्रेस के कुशासन की बदबू अभी तक नहीं गई है। इसी के चलते वो अपनी प्यारी सरकार को लगातार बर्दाश्त कर रही है। इसके बावजूद अभी ये नहीं कहा जा सकता कि चुनाव की बेला में भी जनता का ये धीरज बरकरार रह पाएगा।

    भोपाल रियासत का भारत में विलीनीकरण आजादी के दो साल बाद हुआ ये बात आज की नई पीढ़ी को मालूम भी नहीं है। खुद शिवराज सिंह चौहान ने भोपाल के बोट क्लब पर आयोजित कार्यक्रम में कहा कि भोपाल के नवाब ने पाकिस्तान में मिलने की इच्छा के चलते हिंदुस्तान में विलीनीकरण स्वीकार नहीं किया था। तब भोपाल के नागरिकों ने आंदोलन चलाकर संघर्ष किया और फिर ये रियासत हिंदुस्तान का हिस्सा बनी। इस दौरान भोपाल के कई बहादुरों ने अपनी जान की बाजी लगाई। राजपूतों की तो एक पूरी टुकड़ी को धोखे से भोजन पर बुलाकर कत्ल कर दिया गया। भोपाल की खूनी बेगम ने अंग्रेजों की टुकड़खोरी करते हुए यहां के मुसलमानों और हिंदुओं की जायदाद हड़पी और उनका कत्ले आम किया। ये कहानियां राजा भोज की विरासत से कतई मेल नहीं खाती हैं। भाजपा और खासतौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बरसों से इस दिशा में काम करता रहा है। स्थानीय इतिहासकारों ने तथ्यों को संजोकर वे तमाम कड़ियां जोड़ीं जिनमें नवाब खानदान की गद्दारी की वजहें तलाशी गईँ हैं। अपना निजी वर्चस्व बनाने के लिए किस तरह अंग्रेजों के तलुए चांटे गए इसकी एक नहीं सैकड़ों कहानियां जनता के बीच सुनी सुनाई जाती हैं। नवाब के कुशासन को उचित साबित करने के लिए जो स्थानीय व्यापारी, कलाकार और पत्रकार उनकी जी हुजूरी में लगे रहते थे उनके वंशज आज भी कांग्रेस के बैनर तले सत्ता शीर्ष के करीब बने हुए हैं।

    सवाल ये है कि आरएसएस को अपनी विचारधारा का पैतृक संगठन मानती रही भाजपा ने चौदह सालों तक इस एजेंडे को क्यों छुपाए रखा। वह कांग्रेस की भ्रष्ट सरकार की तर्ज पर प्रदेश के संसाधनों के दोहन में क्यों जुटी रही। आधारभूत संरचनाओं के विकास की दिशा में भाजपा ने पिछली सरकारों की तुलना में बेशकीमती काम किया है। इसके बावजूद उस विकास की तर्ज वही रही जो कांग्रेस की शैली में भी झलकती थी। भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के बीच विकास की जो कीमत अदा की गई उसके चलते आज भी प्रदेश में रोजगार के संसाधन विकसित नहीं हो पाए हैं। कृषि क्षेत्र की उत्पादकता में प्रकृति का सहयोग यदि न मिला होता तो कृषि उत्पादन में भी मध्यप्रदेश कोई बड़ा बदलाव नहीं ला पाया है। खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में कहा कि हम रोजगार बढ़ाने की दिशा में बड़ा काम करने जा रहे हैं। इसके बावजूद मध्यप्रदेश की आह चौदह सालों के बाद भी वाह में नहीं बदल सकी है।

    विलीनीकरण दिवस के आयोजन में भी जन भावनाओं की ये तस्वीर साफ नजर आई।बाहुबली जैसी रिकार्डतोड़ सफल फिल्म की गायिका मधुश्री भट्टाचार्या का बेहतरीन आयोजन भी भोपाल की जनता को बोट क्लब पर नहीं खींच पाया। लोग एक अच्छे आयोजन से वंचित रह गए जबकि नगर निगम ने इस आयोजन के लिए रेडियो, टीवी, अखबारों पर भरपूर विज्ञापन भी चलाए। आयोजन के साथ साथ आतिशबाजी भी की गई जबकि रात के वक्त वन विहार के नजदीक इस तरह के आयोजन करना प्रतिबंधित है। इसकी एक वजह ये भी थी कि रमजान का महीना चल रहा है और इस दौरान मुस्लिम धर्मावलंबियों के लिए गीत संगीत के कार्यक्रमों में भाग लेने की इजाजत नहीं होती है। इबादत का दौर भले ही रात भर चलता हो पर लोग टीवी पर हो रहे प्रसारण भी नहीं देखते हैं। हाल में हमीदिया अस्पताल में मस्जिद बनाने की जिद में जो नौटंकी की गई उससे भी भोपाल की फिजा में नाराजगी फैली। जब दंगे के हालात पैदा कर रहे लोगों को पुलिस प्रशासन ने सख्ती से कुचला तो भी लोगों में ये दहशत थी कि कहीं बोट क्लब पर भी वही हालात न बन जाएं। इस पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का ये बयान कि गदर मचाने वालों को कुचल दिया जाएगा। इससे भी लोगों ने आयोजन से दूरी बनाए रखना ही उचित समझा।

    आखिर भाजपा पिछले चौदह सालों से क्या करती रही है जो वह जनता का वह विश्वास दुबारा नहीं पा सकी जो उसने दिग्विजय सिंह की भ्रष्ट सरकार के खिलाफ पाया था। वह अब तक अपने एजेंडे छोड़कर आखिर कहां कहां भटकती रही। जब देश ने तय कर दिया कि उसे सबका साथ सबका विकास कहने वाले हिंदुत्व से कोई गुरेज नहीं है। सांप्रदायिकता की कांग्रेस की परिभाषा से उसकी कोई सहमति नहीं। भाजपा का सौमनस्यवादी हिंदुत्व उसे स्वीकार है तो फिर भाजपा कांग्रेस की ऊल जलूल नीतियों की नकलपट्टी क्यों करती रही। नए चुनाव की ओर बढ़ती भाजपा को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा।

  • चुनौती को अवसर में बदलते नरेन्द्र मोदी

    चुनौती को अवसर में बदलते नरेन्द्र मोदी

    (मोदी फेस्ट 26 मई से 15 जून)

    - भरतचन्द्र नायक

    देश की जनता याद करती है कि 2004 मार्च-अप्रैल के दरम्यान जब कहा जाता था कि मंहगाई कमर तोड़ रही है। यूपीए सरकार जनता की समस्याओं के प्रति संवेदनशील होने के बजाय एक ही जबाव देकर कत्र्तव्य की इतिश्री समझ लेती थी कि मंहगाई विश्वव्यापी समस्या है। आये दिन भ्रष्टाचार और घोटाले जनचर्चा का विषय होते थे। सरकार का ध्यान सीएजी द्वारा भ्रष्टाचार का अनावरण कर दिये जाने के कारण झूठे तर्क देकर जनता के प्रति गैर जिम्मेदाराना मतिभ्रम पैदा करना रह गया था। न्यायालयों ने इनका संज्ञान लिया। यूपीए सरकार के मंत्रिगंण आरोपों के कठघरे में खड़े हुए। उनकी तिहाड़ यात्रा ने सवा अरब जनता का विश्वास खंडित कर दिया। सरकार किंकत्र्तव्य विमूढ़ और जनता हताश थी। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में 2014 लोकसभा चुनाव लड़े गये। सेकुलर ब्रिगेड ने बड़े इत्मीनान के साथ जनता को फुसलाया, प्रलोभित किया, बरगलाया तथा नरेन्द्र मोदी के चरित्र हनन में अपनी विशेषज्ञता प्रदर्शित करने में कसर नहीं छोड़ी। श्री नरेन्द्र मोदी ने निरर्थक आलोचना के प्रति गहन गंभीर सहिष्णुता का परिचय देते हुए जनता को गरीब हितैषी, भ्रष्टाचार मुक्त, विकासोन्मुखी सरकार देने का वायदा किया। लोकतंत्र में जनविश्वास सबसे बड़ी शक्ति है। नरेन्द्र मोदी ने हताशा से त्रस्त जनमानस में सकारात्मक ऊर्जा का संचार किया। जनता और भाजपा के बीच विश्वास का सेतु बना। 26 मई 2014 को जनादेश, प्रचंड बहुमत अर्जित कर नरेन्द्र मोदी ने नीतिगत अस्त-व्यस्तता के आलम में केन्द्र मंे प्रचंड बहुमत के बावजूद घटक दलों के साथ एनडीए सरकार का गठन किया। नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री पद से देश के प्रधानमंत्री का पद संभाला। तीन वर्ष के सरकार के कार्यकाल में एनडीए सरकार ने न तो जनविश्वास को खंडित किया और न ही पार्टी को लज्जित होने का अवसर आने दिया। काजल की कोठरी में बेदाग बने रहने का कीर्तिमान बनाकर जनता को सुखद परिवर्तन का अहसास कराया। देश विदेश में साफ-सुथरी, शुचितापूर्ण विकासोन्मुखी सरकार का सबूत पेश किया। मजे की बात यह है कि लोकसभा चुनाव 2014 के पश्चात हुए राज्यों के विधानसभा चुनावों, उपचुनावों में दिल्ली, बिहार और पंजाब को अपवाद मानें तो हर चुनाव में बाजी मारकर उन्होनें सिद्ध कर दिया कि करिश्माई नेतृत्व ने जो लहर पैदा की है वह अनवरत तीन साल मंे भी जस की तस बरकरार है। जनता का नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार पर अटल विश्वास है। सोलह राज्यों में पार्टी और घटक दलों की भागीदारी से सरकार है। नरेन्द्र मोदी की गणना दुनिया के श्रेष्ठ शासकों में ही नहीं उन्होनें अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को भी लोकप्रियता के मामले में पीछे धकेल दिया है। जीडीपी विकास में चीन को पीछे धकेला है।

    नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह चुनौतियों को अवसर में बदला, उनके नक्शेकदम पर चलकर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित भाई शाह ने पार्टी संगठन को कुशलतापूर्वक नेतृत्व देकर पार्टी को विश्व का सबसे बड़ा (12 करोड़ सदस्य संख्या वाला दल) राजनैतिक दल बना दिया है। अब तक चीन का वामपंथी दल इसका दावेदार था। सदस्यता में अंकों की कारीगरी नहीं मैदानी स्तर पर देश के हर राज्य में मतदान केन्द्र तक पार्टी का ऊर्जावान नेतृत्व खड़ा करके साबित कर दिया है कि राजनैतिक दल की सफलता नारों और वादों में नहीं मतदान केन्द्र पर खड़ी जुझारू विकासोन्मुखी कार्यकर्ताओं की टीम पर निर्भर है। जो आंचलिक समस्याओं के समाधान के लिए राह बन सके है। यह टीम तीन वर्षों की मोदी सरकार की यशोगाथा लेकर 26 मई से 15 जून 2017 तक मतदाताओं का आशीर्वाद लेने मैदान में उतरकर मतदाताओं से रूबरू हो रही है। मोदी फेस्ट के नाम से लोकप्रिय यह अभियान वन-वे ट्रैफिक नहीं, कार्यकर्ता मतदाता का सुख-दुःख में भागीदार बनकर जन समस्याओं औश्र उनके उचित समाधान में पूर्ण मनायोग से जुटे है। नरेन्द्र मोदी ने पिछले दिनों ‘मन की बात’ करके जनता से रागात्मक संबंध जोड़ा और इस दरम्यिान जन की बात सुनने के लिए ‘जन की बात’ अभियान को गति प्रदान कर लोकतंत्र की अनुभूति दी है। आजादी के बाद श्री नरेन्द्र मोदी ने जन-धन योजना आरंभ करके जीरो बैलेंस पर आम आदमी को बैंक खाता खोलने का अवसर दिया और इसे दुर्घटना बीमा का समावेशी बनाकर सामाजिक-आर्थिक कवच सुनिश्चित कर दिया। बीस करोड़ बैंक खाते खोलकर उनमें सब्सीडी दी जाने लगी है। जन-धन योजना और जीवन ज्योति बीमा योजना से सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हुई है। 1971 के गरीबी हटाओ अभियान से ठगी गयी जनता को पहली बार लगा कि मोदी सरकार कुछ परफार्मेन्स देने वाली सरकार है। लोकतंत्र में जन विश्वास ही राजनैतिक दल की सबसे बड़ी शक्ति होती है और इससे लोकतंत्र की विश्वसनीयता बढ़ती है। नरेन्द्र मोदी ने जन विश्वास के न्यासी की भूमिका में विलक्षण प्रतिभा दिखाकर करोड़ो लोगों को मुरीद बना लिया है।

    नरेन्द्र मोदी ने सत्ता के पटल पर अवतरित होते ही ऐलान किया कि ‘‘न खाऊंगा और न खाने दूंगा’’। सेकुलर ब्रिगेड ने ठाठ-बाट, सूट-बूट की सरकार जैसे जुमले गढ़े, लेकिन उसे हताश तो तब हुई जब तीन वर्षों में एक भी मामला भ्रष्टाचार, घोटाले का उसके हाथ नहीं लगा। लेकिन सिर्फ यही हताशा का कारण नहीं बन रहा। आजादी के बाद पहली बार सरकार में पं. नेहरू के समय सेना की जीप खरीदी जैसे घोटाले हुए। इंदिरा जी के कार्यकाल में तो स्टेट बैंक से तक फर्जी काल पर रकमें निकाली गयी। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने स्वीकार किया कि शासन-प्रशासन में गोलमाल है और जनता तक एक रू. भेजने में सिर्फ 15 पैसे पहुंचते है। मोदी सरकार ने सारी सब्सीडी हितग्राही के खाते में जमा कर दो लाख करोड़ रू. जो बिचैलियों की जेब में जाते थे, उन पर रोक लगा दी। जनता ने जहां इस पहल को जनोन्मुखी माना, वहीं बिचैलियो के रूप में इस रकम को हड़पने वालों की छाती पर सांप लौटने लगे और मोदी सरकार कीप्रगति देखने सराहने के बजाय दुष्प्रचार करनें में जुट गये। मोदी सरकार ने कालेधन और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी (विमुद्रीकरण) का ऐलान कर बड़े नोट (1000 और 500 के नोट) को प्रचलन से बाहर कर दिया। बैंको के सामने लाइने लगी और विपक्ष ने हाहाकर मचाया। लेकिन गरीब वर्ग ने अपने साथ अमीरों को कतार में खड़ा देखकर माना कि आर्थिक विषमता दूर करने और भ्रष्टाचार तथा कालेधन पर रोक लगाने में नोटबंदी कारगर कदम है। निम्म वर्ग और मध्यम वर्ग ने कठिनाई झेलते हुए नोटबंदी का स्वागत किया। नतीजा यह हुआ कि सरकारी खजाने में टैक्स संग्रह का रिकार्ड बन गया। नकदी की समस्या से जूझ रहे बैंक मालामाल हो गये और जन-जन को कर्ज मिलना आसान हो गया। 23 हजार करोड़ रू. कालाधन का खुलासा हो गया। नजरे बदलता है तो नजरिया बदल जाता है।

    नोटबंदी और जीएसटी कराधान जैसी साहसिक पहल ने देश विदेश में निवेशकों को प्रभावित कर दिया कि वास्तव में मोदी के नेतृत्व में गतिशील दूरदर्शी सरकार मिली है। किसान, गरीब, मजदूर, आम आदमी का कल्याण ही सरकार की असल प्रतिबद्धता है। नोटबंदी और जीएसटी से जहां देश का जीडीपी दहाई में पहुंचने जा रहा हे, वहीं महंगाई दर में 2 प्रतिशत की कमी आने से जनता अच्छे दिनों का अहसास करने जा रही है। मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी, असंगठित क्षेत्र में न्यूनतम पेंशन योजना, किसानों के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, सामाजिक आर्थिक कवच साबित हुई है। जनता का विश्वास अटल हुआ है कि श्री नरेन्द्र मोदी जो कहते है वह करके दिखाते है। भारतीय जनता पार्टी की कथनी और करनी में साम्य है। कृषि के मोर्चा पर मिली कामयाबी से इस क्षेत्र में विकास दर नकारात्मक से 4 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी आने से देश में बंपर कृषि उत्पादन हुआ। खाद्यान्न के मूल्य घटने से असल लाभ आम आदमी को मिल रहा है। देश के 14 करोड़ किसानों के लिए उनकी जमीन का स्वाईल हेल्थ (मृदा स्वास्थ्य परीक्षण) कार्ड किया जा रहा है। इससे किसान जमीन की तासीर पहचान कर न्यूनतम परिमाण में उर्वरक का इस्तेमाल करेगा और कृषि की लागत घटेगी। 2014 तक किसान यूरिया खाद के लिए भटकते थे। वितरण केन्द्रों पर कालाबाजारी होती थी। एनडीए सरकार ने यूरिया को नीम कोटेड बनाकर उसकी हेराफेरी समाप्त कर दी और उत्पादन बढ़ा दिया है। अब रासायनिक खाद मुंह मांगा बाजार में उपलब्ध है उस पर मिलने वाली सब्सीडी उत्पादकों और वितरकों की जेब में जाने के बजाय किसान के खाते में जमा हो रही है।

    मोदी सरकार ने पाॅलिसी पेरालिसिस के आरोप से सरकार को मुक्त किया है। जनहित में हर दिन फैसला होता है और अगले दिन प्रगति की निगरानी खुद नरेन्द्र मोदी करते है, जिससे राजनैतिक क्षेत्र और प्रशासन में नई कार्य संस्कृति विकसित हुई है। राजनैतिक और प्रशासकीय क्षेत्र में कर्महीन, आलसी, लापरवाह लोगों का सितारा अस्त हो रहा है। जनता मानती है कि मोदी सरकार काम करने वाली सरकार है, तीव्र गति से लिए जाने वाले फैसलों की देश में बेहद चर्चा है। सरकार ने कालाबाजारी खत्म करने के लिए 64 विभागों की 533 योजना में नकद सब्सीडी वितरण से बिचैलियों को अलविदा करने, राशि का हितग्राही के खातों में हस्तातंरण आरंभ कर दिया तो देश के बैंकों का आठ लाख करोड़ रू. कर्जदारों की गैर अदायगी के कारण डूबन्त खाते में जा रहा था, सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए रिजर्व बैंकों को निर्णयात्मक पहल करने के लिए शक्ति संपन्न बनाने के लिए बैंकिंग रेगुलेशन में संशोधन कर दिया है। इस कदम से रकम डकारने वाले औद्योगिक, वाणिज्यक क्षेत्र ऊहापोह में है, सरकार को घेरने की जुगत में है। लेकिन सरकार लोकधन की वसूली के लिए कृत संकल्प है। सरकार ने बेनामी संपत्ति को जप्त किये जाने के लिए कानून में संशोधन करके संपत्ति राजसात किये जाने की व्यवस्था करके दोहरी अर्थव्यवस्था के सृजन पर रोक लगा दी है। बेनामी संपत्ति संशोधन कानून-2016 ने काली अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़़ दी है। भ्रष्टाचार के फैलाव में नकदी और बड़े नोटों का प्रचलन खाद-पानी का काम करता है। मोदी सरकार ने कैशलेस इकाॅनोमी की दिशा में सर्तकतापूर्ण कदम बढ़ाया है। डिजिटल लेन-देन को लोकप्रिय बनाया गया है। आधार नंबर के जरिये लेनदेन में भीम एप्प, यूपीआई, यूएएसए जैसे माध्यमों को प्रोत्साहन देकर न्यूनतम कैश, मिनीमम कैश की पद्धति अपनाने पर बल दिया है।

    मोदी सरकार की नीतियों की दिशा और दशा से देश में सकारात्मक वातावरण बना है। सुदूर ग्रामों में चूल्हे के धुंआ से परेशान महिलाओं को जब उज्जवला योजना में केन्द्र सरकार ने निःशुल्क गैस कनेक्शन दिया, तब गांव-गांव तक यह संदेश पहुंचा कि यह जनहितैषी सरकार है। महिलाएं भी सरकार के राडार पर है, गैस चूल्हा का इस्तेमाल करने वाली बहनें मोदी सरकार के ‘सबका साथ-सबका विकास’ संदेश की संवाहक बन चुकी है। केन्द्र सरकार ने निजी क्षेत्र में स्वास्थ्य पर्यटन के रूप में विकसित अस्पतालों के खर्चीले बिलों को देखते हुए तय किया कि सरकारी अस्पतालों में सरकारी खर्च पर दवाईयां सुलभ हो। जहां बाजार से जीवन रक्षक दवाएं खरीदना अनिवार्य हो दवाईयां उपकरणों पर अनुचित मुनाफाखोरी न हो पाये। इसके लिए लाख रू. कीमत का स्टेंट सस्ता कर आम आदमी की पहुंच में लाया गया है। जेनेरिक दवाईयों के इस्तेमाल को तरजीह दी जा रही है। जेनेरिक दवाईयां ब्रांडेड दवाओं से कई गुना सस्ती होती है। इसके विक्रय केन्द्र शहरों में खोले जा रहे है। नरेन्द्र मोदी सरकार की ‘तीन साल बेमिसाल’ की उपलब्धियां जन-जन तक पहुंचाना लोकतंत्र में आवश्यक इसलिए भी है कि जनता सूचना के अधिकार से संपन्न है।

    मोदी फेस्ट के रूप में पार्टी संगठन और एनडीए सरकार ने इक्कीस दिन का जनसंपर्क महासंवाद अभियान आयोजित करके जन जिज्ञासा को शांत करने की अनूठी पहल की है। यह एक अवसर है जब पाॅलीटिक्ल क्लास और सिविल सोसायटी इस अभियान में प्रगति पर समावेशी बहस कर जनता जनता को विकास के प्रति जागरूक बना सकती है। विकास के इस स्वर्ण युग में कुछ कमियां भी हो सकती है। लेकिन एक बात तो तय है कि राष्ट्र के जीवन में तीन साल मूल्यवान साबित होने पर दो मत नहीं है। देश में अधोसरंचना विकास, आवासहीनों के सिर पर 2022 तक छत, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, मुद्रा बैंक, स्किल्ड इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया जैसे अभियानों ने युवकों में इल्म और हुनर की चाह पैदा की है। वे देश में बढ़ते रोजगार के अवसरों को छोड़ना नहीं चाहते। ब्रेन-ड्रेन की जगह ब्र्रेन गेन की जुगत लग गयी है। स्वच्छ भारत-स्वस्थ भारत, खुशहाल भारत का जो सपना स्वतंत्रता संग्राम सैनानियों ने देखा था, उस दिशा में अनुष्ठान शुरू हो चुका है। राष्ट्र के जीवन में तीन वर्ष की अवधि मूल्यांकन की दृष्टि से नगण्य है किंतु नीतियों बताती है कि दशा और दिशा सही है। गत तीन वर्षों में भारत में विकास का नया विहान हुआ है। योजना आयोग नीति आयोग में बदला है। टीम इंडिया का प्रादुर्भाव हो चुका है। नीति आयोग और जीएसटी परिषद में राज्यों का वर्चस्व बढ़ने से संविधान की संघवाद की भावना ने मूर्तरूप लिया है। राज्यों को केन्द्र से मिले वाले राज्यांश का 32 प्रतिशत से बढ़ाकर 42 प्रतिशत हो जाने से राज्यों की माली सेहत सुधरी है। अब तक मोदी सरकार राज्यों के बीच पक्षपात से बची है। यह भी एक लोकतांत्रिक उपलब्धि है।

  • संघ को साकार करने वाला जाणता राजा

    संघ को साकार करने वाला जाणता राजा


    -आलोक सिंघई-
    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना के कार्यकाल से ही समाज को संपूर्णता की ओर ले जाने का प्रयास करता रहा है। गद्दारी, परिवारवाद और अवसरवादिता ने उसे जितना बदनाम करने की कोशिश की वह दिन ब दिन निखरता चला गया। लाखों करोड़ों स्वयंस्वकों ने अपमान, कलंक और दुत्कार सहकर भी प्रखर राष्ट्रवाद की ज्वाला को लगातार जलाए रखा। ऐसे सैकड़ों स्वयंसेवकों को हम अपने आसपास देख सकते हैं जिन्होंने त्याग और तपस्या के उदाहरण प्रस्तुत किए और समाज के लिए जीते जागते मॉडल बन गए। स्व. अनिल माधव दवे उसी परंपरा के एक जाज्वल्यमान नक्षत्र रहे हैं। जीते जी उन्होंने जितने देशभक्तों को प्रेरित और प्रोत्साहित किया विदाई की बेला में वे उससे कई गुना अधिक चुंबकीय आकर्षण लेकर उपस्थित हुए। सौम्य व्यक्तित्व के धनी और प्रखर मेघा का तेज लिए हुए इस जाणता राजा के व्यक्तित्व को जितने नजरियों से तौला जाए उनके हिस्से वाला पलड़ा हर बार भारी साबित होता है।

    संघ से विदा लेकर जब वे राजनीति के क्षेत्र में उतरे तो उनसे मिलने वालों को हरदम यही आशा रही कि वे कभी मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री होंगे और प्रदेश को नई ऊंचाईयां प्रदान करेंगे। इसकी वजह भी थी कि वे कई बार मुख्यमंत्री बनाने का काम सहजता से कर चुके थे। जब प्रदेश में कांग्रेस के भ्रष्टतम शासनकाल की कालिख प्रदेश वासियों को बैचेन किए हुई थी तब भाजपा के थिंक टैंक जावली से ही दिग्विजय सिंह के लिए बंटाढार शब्द निकला। ये शब्द जनता की जुबान पर चढ़ गया और मतदाताओं को अपना फैसला करने में आसानी हुई। उस दौरान कांग्रेस की शासनशैली को इतनी बारीकियों से जनता के सामने प्रस्तुत किया गया कि लोगों ने समझ लिया कि कांग्रेस अपनी उम्र पूरी कर चुकी है।आज जब देश को कांग्रेस मुक्त करने की बात कही जाती है तो लोग इसे शेखचिल्ली का सपना कह देते हैं। उन्हें जरा भी भान नहीं कि उनकी सत्ता की चूलें उनके कुकर्मों ने किस तरह ढीली कर दीं हैं। देश की युवा पीढ़ी जब अराजकता फैलाने वालों की तुलना संघ के तपोनिष्ठ स्वयंसेवकों से करते हैं तो वे किसी प्रलोभन में आए बिना अपनी राह खुद चुन लेते हैं।

    स्व. अनिल दवे भाजपा के वे नगीने थे जिन्हें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बुलाकर मंत्री बनाया और अपने सहयोगी के रूप में उनका मार्गदर्शन प्राप्त किया। आज यदि देश में नदियों को विकास का इंजन बनाने का अभियान चल रहा है तो उसके पीछे स्व. अनिल दवे की ही सोच काम कर रही है। असम में नमामि ब्रह्मपुत्र अभियान, उत्तर प्रदेश में गंगा सफाई अभियान ऐसे ही उपक्रम हैं जो न केवल प्रदेशों को आत्मनिर्भर बना रहे हैं बल्कि पर्यावरण को संवारने में भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। मध्यप्रदेश में नमामि नर्मदे अभियान को फिजूलखर्ची बताने वाले कई ओछे राजनेता बदलाव की इस कुंजी को घूरा समझ रहे हैं जबकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसे बदलाव की बयार बना डाला है। अपने व्यस्ततम समय में बदलाव करके श्री चौहान ने न केवल नर्मदा के तटों पर फैली विशाल आबादी से सीधा संपर्क स्थापित किया बल्कि उन्होंने इस क्षेत्र में भारी निवेश को भी न्यौता दे डाला है। मध्यप्रदेश आज गेहूं के उत्पादन में तो सिरमौर हो ही चुका है, साथ में अब वह कृषि उत्पादों की विशाल श्रंखला का भी सरताज बनने जा रहा है। ये बदलाव न केवल नर्मदा के तटों से शुरु हो रहा है बल्कि प्रदेश की तमाम नदियों के किनारों पर भी पुष्पित हो रहा है। जो लोग नर्मदा घाटी की क्षमताओं से परिचित नहीं हैं वे इसे बहुत हल्के में ले रहे हैं लेकिन नर्मदा घाटी का करीब से अध्ययन कर चुके अनिल दवे काफी पहले यहां की परिस्थितिकी की क्षमता का आकलन कर चुके थे। आजादी के बाद उत्पादकता बढ़ाने के सैकड़ों प्रयोग हुए हैं। औद्योगिकीकरण की मंहगी लागत के बाद भी देश को उसका फल नहीं मिल सका है। इसकी तुलना में नदी घाटों को संवारने की सोच कितनी तेजी में अपना असर दिखा रही है ये कृषि जिन्सों की बढ़ती पैदावार से सहज की महसूस किया जा सकता है।

    आजादी के बाद कांग्रेस की अराजक राजनीति ने देश के लोगों को जितना गैरजिम्मेदार बनाया उसके चलते शासन करना किसी भी लोकतांत्रिक राजनेता के लिए बहुत कठिन हो गया था। कांग्रेस के शासक वे चाहे प्रधानमंत्री हों या मुख्यमंत्री सभी लुभावनी घोषणाओं का जाल फेंककर लोगों को कर्ज के दलदल में धकेलते रहे हैं। भाजपा के सामने भी यही चुनौती थी कि फोकटबाजी की अभ्यस्त जनता को वह कैसे सबल राष्ट्र बनाने की ओर ले जा सके। ये काम अचानक संभव नहीं था। आज जिस तरह नोटबंदी के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को आरोपों और चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है इतना प्रतिरोध कोई आम राजनेता झेल ही नहीं सकता था। स्व. अनिल दवे ये बात काफी पहले समझ चुके थे। इसलिए उन्होंने उन्हें मुख्यमंत्री बनाने वाली हर आवाज को नर्मदा के घर तक ही सीमित कर दिया। उन्होंने जब सुश्री उमा भारती की सरकार का हश्र देखा तो समझ लिया कि इतना गरिष्ठ पकवान खाने की आदत न तो प्रदेश के उद्योगपतियों को है और न ही प्रदेश का मीडिया इतना समझदार और सक्षम है कि वह ढर्रेबाजी को अनुशासित कर सके। इसलिए उन्होंने मध्यमार्ग पर चलने वाली शिवराज सरकार को ही भाजपा का चेहरा बनाए रखने का सूत्र दिया।

    शिवराज सिंह चौहान की भाजपा सरकार कांग्रेस की ही नीतियों पर चलने वाली सरकार साबित हुई और जिसने जनता के प्रतिरोध को बहुत हद तक शांत बनाए रखा। ये जादू शिवराज सिंह चौहान जैसा शांतचित्त और सेवा भावी राजनेता ही कर सकता था। भाजपा के भीतर से भी कई बार आवाजें उठीं कि ये सरकार भाजपा के बधियाकरण का प्रयास कर रही है। कांग्रेसियों को बेवजह स्पेस दिया जा रहा है। भाजपा की नीतियों को ताक पर धर दिया गया है। इस तरह की आवाजों के बीच शिवराज सिंह चौहान अनवरत जनता की योजनाओं को लागू करते चले गए। हालांकि कई बार चर्चा के दौरान अनिल दवे ने अपनी बैचेनी भी जाहिर की लेकिन उनका मानना था कि इससे बेहतर मार्ग फिलहाल कोई दूसरा नहीं हो सकता। जातियों और संप्रदायों की राजनीति के आदी हो चुके लोगों को पहले तो ये महसूस कराया जाए कि भाजपा सरकार उनके साथ भेदभाव नहीं करती है। कमोबेश उनका ये अनुमान सही भी साबित हुआ। आज शिवराज सिंह चौहान जिस तरह समाज के सभी तबकों में स्वीकार्य हैं ये अनिल दवे जैसे कुशल रणनीतिकार की ही देन थी। भाजपाईयों को कभी गांधी विरोधी और सांम्प्रदायिक होने का लेबल लगाकर बदनाम किया जाता था लेकिन गांधी मार्ग का अनुसरण करके अनिल दवे की रणनीति ने वो षड़यंत्रकारी लेबल उतार फेंका। वीर शिवाजी की छापामार शैली को लोकतांत्रिक राजनीति के मंच पर साकार करने वाले अनिल दवे आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके सन्मार्ग पर चलकर टकराव टालने वाली सोच निश्चित तौर पर देश को एक मजबूत राष्ट्र की ओर ले जाएगी। उन्होंने अपनी पारी बखूबी खेली अब उनकी पगडंडी को राजमार्ग बनाना अगली पीढ़ी के नेताओं की जिम्मेदारी है।
    (लेखक जन न्याय दल के प्रदेश प्रवक्ता भी हैं)

  • दुनिया के देशों जैसा नियंत्रित होगा रियल इस्टेट

    दुनिया के देशों जैसा नियंत्रित होगा रियल इस्टेट

    मंत्रि-परिषद के निर्णय

    भोपाल 25 अप्रैल।

    मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में आज हुई मंत्रि-परिषद की बैठक में महाप्रबंधक परियोजना एनटीपीसी लिमिटेड खरगोन को 2×600 मेगावॉट विद्युत परियोजना के लिए रेलवे पथ निर्माण के लिए ग्राम खेड़ी तहसील पुनासा जिला खंडवा की कुल 0.532 हेक्टेयर शासकीय भूमि चालू वित्तीय वर्ष की कलेक्टर गाइड लाइन अनुसार निर्धारित कर नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण की शर्तों पर आवंटित करने की अनुमति दी।

    मंत्रि-परिषद ने मध्यप्रदेश रियल एस्टेट विनियामक प्राधिकरण के लिए पदों की संरचना एवं अधिकारी-कर्मचारी के पदों को प्रतिनियुक्ति/संविदा आधार पर भरे जाने, स्वीकृत पदों की संख्या एवं वेतनमान के प्रस्ताव का अनुमोदन किया।

    मंत्रि-परिषद ने कोर्ट मैनेजर एवं सपोर्टिंग स्टाफ के सृजित पदों में से उच्च न्यायालय की स्थापना पर सृजित भृत्य के पद के वेतनमान में ग्रेड पे 1400 के स्थान पर 1300 संशोधित करने का निर्णय लिया।

    मंत्रि-परिषद ने संविदा आधार पर 31 मार्च 2017 तक निरंतर किए गए कोर्ट मैनेजर एवं उनके स्टाफ के पदों में से कार्यरत कोर्ट मैनेजर एवं सपोर्टिंग स्टाफ के पदों को 30 सितंबर 2017 तक अथवा नियमित कोर्ट मैनेजर एवं सर्पोटिंग स्टाफ के पदों पर भर्ती होने तक, जो भी पहले हो, निरंतर किये जाने का अनुसमर्थन किया।

    मंत्रि-परिषद ने अशासकीय स्वयंसेवा अनुदान प्राप्त संस्था अखिल भारतीय दयानंद सेवाश्रम संघ, नई दिल्ली, शाखा थांदला जिला झाबुआ द्वारा संचालित प्रवृत्तियों के लिए अनुदान सहायता प्राप्त करने के लिए अनुदान नियम 1985 एवं मध्यप्रदेश में पंजीयन कराए जाने के प्रावधान से 2015-16 से 10 वर्ष की छूट प्रदान की।

    मंत्रि-परिषद ने पूर्वता क्रम (आर्डर ऑफ प्रेसीडेन्स) 2011 की सारणी के सरल क्रमांक-30 में प्रमुख सचिव गृह के बाद प्रमुख सचिव मध्यप्रदेश शासन एवं प्रमुख सचिव मध्यप्रदेश विधानसभा को एक साथ जोड़े जाने का निर्णय लिया।

    मंत्रि-परिषद ने एम पी रोड डेव्लपमेंट कार्पोरेशन लिमिटेड के संचालन मंडल की 33 वीं बैठक 15 मार्च 2017 में पारित संकल्प के अंतर्गत निकास नीति का अनुमोदन किया।

  • चार पीढ़ियों के त्याग की श्रद्धांजलि हैं मोदी

    चार पीढ़ियों के त्याग की श्रद्धांजलि हैं मोदी

    – भरतचन्द्र नायक…
    भारत में लोकतंत्र ने अंगड़ाई ली है। लोकतंत्र परिपक्वता की ओर बढ़ता नजर आया और परंपराएं ध्वस्त हुई क्योंकि जनता ने सियासी खोखलापन नापसंद कर दिया। पात्रता के अवसरवाद से मुक्ति के बाद सबका साथ-सबका सशक्तिकरण लोकबोध बनता देखा गया। अमित शाह और नरेन्द्र मोदी की इस बात को लेकर आलोचना हुई कि उत्तर प्रदेश में एक भी अल्पसंख्यक को प्रत्याशी नहीं बनाया। लेकिन मतदान करने में अल्पसंख्यक आगे रहे और कमल की नुमाइंदगी पसंद की। यहां तक कि मुस्लिम महिलाओं ने कमल के समर्थन में तमाम फतबों और दबावों को दरकिनार करके गतिशील भारत की दिशा निर्धारित कर दी। देश-विदेश के राजनैतिक विश्लेषक इस बात पर हैरान-परेशान है कि विमुद्रीकरण ने 86 प्रतिशत बड़ी मुद्रा को चलन से बाहर कर बैंकों के सामने लंबी लाईनों में जनता को खड़ा कर दिया। फिर भी जनता ने नोटबंदी के कारण क्लेशित होने के बाद भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समर्थन में मतदान केन्द्रों पर भी कतारों को लंबा कर दिया। कारण स्पष्ट समझ में आया कि सात दशकों तक राजनीति के दिखाऊ मधुर तेवरों में हकीकत कम फसाना अधिक रहा है। नरेन्द्र मोदी ने देश की काली अर्थव्यवस्था में नस्तर लगाया और इसके पहले ताकीद कर दी कि नस्तर से तकलीफ होगी। लेकिन बनने वाले नासूर से आप और अगली पीढ़ी सुरक्षित हो जायेगी। नतीजा सामने आया उत्तर प्रदेश देश के सबसे बड़े सूबे में कमल खिला और ऐसा विशाल जनमत लगभग पौने चार दशक बाद जनता ने परोसा। सत्ता नस्तर लगाने वालों के हाथों में सौंपकर निश्चिन्त हो गयी। पग-पग पर विरोधाभास ने नरेन्द्र मोदी का प्रेतछाया के समान पीछा किया है और नहीं कहा जा सकता है कि यह सिलसिला कहां से कब तक चलेगा? लेकिन जैसा कि वरिष्ठ नेता वैंकेया नायडू ने कहा कि मोदी देश को दैवीय वरदान (गॉड गिफ्ट) है। विरोधाभास वास्तव में उनके लिए पारस स्पर्श देता आ रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मोदी को मौत के सौदागर के रूप में संबोधित क्या किया, गुजरात की जनता मोदी पर कुर्बान हो गयी और गुजरात में कांग्रेस का अवसान हो गया। सर्जिकल स्ट्राईक को राहुल बाबा ने सैनिकों के खून की दलाली कहकर जनता का मूड बिगाड़ दिया। पांच में से 4 राज्यों में जीत का सेहरा जनता ने मोदी के सिर बांध दिया।
    बाबरी मजिस्द विवाद के पक्षकार मोहम्मद अंसारी की गणना अल्पसंख्यकों के कट्टर पेरोकार के रूप में हुई है। लेकिन अंसारी मोदी पर ऐसे लटटू हो गये कि उन्होनें अल्पसंख्यकों का आव्हान किया और कहा कि आजादी के बाद पहला प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हुआ जो न तो राग द्वेष रखता और न ही लोक लुभावन नारे परोसकर जनता को छलता है। उसके लिए समूची कौम एक परिवार और नजर एक है। अल्पसंख्यकों के साथ वेमुरोब्बत बात वहीं कर सकता है जो निष्कपट है। हाल का एक वाकया भी गंभीर विमर्श की अपेक्षा करता है। आतंकवाद के विस्तार में सिमी के सपोलों ने सिर उठाया। मध्यप्रदेश में 6 सपोले पुलिस के हत्थे चढ़ गये। उत्तर प्रदेश में हरकत कर पाते इसके पहले ही हुई मुठभेड़ में सैफुल्ला हला हो गया। सेकुलर ब्रिगेड चुप कैसे रहता? उसे वोटों की सियासत का मनचाहा मौका मिल गया। मुठभेड़ पर सवाल दाग दिये गये। लेकिन आतंकवादी सरगना सैफुल्ला के वालिद जनाब सरताज ने सैफुल्ला की लाश लेने और दफन करने से इंकार करते हुए कहा कि जो वतन का नहीं हुआ वह मेरा लड़का कैसे हो सकता है। सेकुलर ब्रिगेड की सियासत की सरताज ने न केवल पोल खोल दी, बल्कि नरेन्द्र मोदी द्वारा की गयी सर्जिकल स्ट्राईक के औचित्य में चार चांद लगा दिये। कांग्रेस के वे सभी नेता चुप हतप्रभ रह गये जो ऐसे मौकों को सियासत के लिए भुनाने की ताक में रहते है। उन्होनें मुंबई आतंकी घटना, बटाला हाउस एनकाउंटर पर सवाल खड़े ही नहीं किये, बल्कि मुठभेड़ में शहीद हुए रक्षाकर्मियों की शहादत का अपमान भी किया। लगातार अल्पसंख्यकों को भ्रमित करके अल्पसंख्यकों के विश्वास को सेकुलर ब्रिगेड ने डिगा दिया। अब तक सेकुलरवादियों की अल्पसंख्यकों के भावनात्मक शोषण करने की फितरतों ने सेकुलरवाद के छद्म से अल्पसंख्यक ने तौबा कर ली। इसी का दुष्परिणाम कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को उत्तर प्रदेश के चुनाव में भोगना पड़ा। अल्पसंख्यकों के साथ दलितों, पिछड़ों, अति पिछड़ों ने भी नरेन्द्र मोदी की आर्थिक, सामाजिक नीतियों के समर्थन में एकमुश्त मतदान करने की ठान लिया। लोकसभा चुनाव 2014 में नरेन्द्र मोदी के समर्थन में भारतीय जनता पार्टी को जो समर्थन मिला था, ढ़ाई वर्ष बाद भी उसका बरकरार रहना भारतीय लोकतंत्र में विश्वसनीयता का एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। एंटी इन्कमबेंसी की प्रत्याशा में जो ताल ठोक रहे थे वे धराशायी हो गये। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में तीन चौथाई से अधिक बहुमत ने देश और दुनिया को चमत्कृत किया है। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसा तीन चौथाई बहुमत विधानसभा, लोकसभा चुनाव में पीढ़ी को एक बार ही मयस्सर होता है। 1952 के चुनावों में पं. जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में यह जीत नसीब हुई। बाद में गरीबी हटाओं देश को बचाओं जैसे आकर्षक नारे देकर इंदिरा जी को भी जनता ने मौका दिया। उनके अवसान के बाद 1984 में इंदिरा जी की दुःखद मौत के बाद जनता ने सहानुभूति वोट के रूप में राजीव गांधी को भी इस स्तर पर पहुंचाया। लेकिन 37 वर्ष बाद नरेन्द्र मोदी ने जैसा कहा कि देश की जनता की खिदमत में उनका 56 इंच का सीना चट्टान की तरह आगे रहेगा। उन्होनें 16वीं लोकसभा के चुनाव और उत्तर प्रदेश की 16वीं विधानसभा के चुनाव में अप्रत्याशित जीत हासिल कर साबित कर दिया कि वे सेवादारों की सैना में यदि सेनापति है तो बेरेक में रहकर हुक्म चलाना नहीं जानते, सीना मोर्चा पर हमेशा आगे रहता है। ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’, न चैन से बैठूंगा और न दूसरों को बैठने दूंगा। छाती ठोककर प्रमाणित कर दिखाया है। नरेन्द्र मोदी का कद पं. नेहरू, इंदिरा गांधी से आगे नहीं तो, पीछे भी नहीं है। यह अतिश्योक्ति नहीं। सात समन्दर पार विश्व संचार माध्यम जो अब तक नरेन्द्र मोदी के खिलाफ विष वमन करने में अग्रणी थे, वे ही फरमा रहे है कि नरेन्द्र मोदी की भारत की जनता ऐसी मुरीद है कि 2019 में 17वीं लोकसभा चुनाव में कमल खिलाने को आतुर है। आहट सोलहवीं विधानसभा (उ.प्र.) चुनावों से कर्णगोचर हो चुकी है। समाजशास्त्रियों, राजनैतिक विश्लेषकों और वरिष्ठ सियासतदारों का मानना है कि नरेन्द्र मोदी ने समाज के बिखराव के जो कारक अभी तक राजनेताओं ने ईजाद किये थे, उन्हें झुठला दिया है। उनकी नीतियों से पात्रता क्रम मिट चुका है। उन्होनें सबका साथ-सबका सशक्तिकरण मूलमंत्र साबित किया है। चाहे जन-धन योजना हो, मुद्रा बैंक योजना हो, उज्जवला योजना और 79 प्रकार की जो भी जन हितकारी योजनाएं है, उनमें एक ही सांचा है। भारत का नागरिक, शोषित, पीडि़त, वंचित, गरीब, अबाल, वृद्ध नर-नारी, किसान, मजदूर, युवा, महिला सब एक समान न्याय और समानता के अधिकार के हकदार है। पूर्ववर्ती कांग्रेस की यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने योजना भवन दिल्ली में बैठकर यह कहकर कि देश की संपदा पर पहला अधिकार अल्पसंख्यकों का है, अलगाव के बीज बो दिये थे। लेकिन नरेन्द्र मोदी ने लाग-लपेट बिना कहा कि देश की संपदा पर पहला अधिकार सवा अरब जनता का है, लेकिन प्राथमिकता में गरीब सर्वोच्च है। इसी का नतीजा है कि भारतीय जनसंघ के संस्थापक पं. दीनदयाल उपाध्याय के जन्मशताब्दी समारोह के वर्ष को नरेन्द्र मोदी ने देश के वंचितों, गरीबों को समर्पित कर गरीब कल्याण वर्ष के अनुरूप कार्यक्रम का संचालन किया है। नरेन्द्र मोदी को गरीबों में मसीहा की निगाह से देखे जाने के पीछे एक वजह यह है कि मोदी ने कहा है कि गरीब को राहत, डोल की जरूरत नहीं है। उसे ऐसे अवसर और परिस्थिति चाहिए जिसमें गरीब अपना बोझ उठा सके। इसका नतीजा यह होगा कि देश के मध्यम वर्ग के सिर का बोझ कम होगा। देश के संचालन में किफायत होगी और कराधान उदार मॉडल में पहुंच जायेगा। वास्तव में नरेन्द्र मोदी ने सामाजिक न्याय और सेकुलरवाद को ऐसा परिभाषित कर दिखाया है कि समाजवाद, वामपंथ और अन्य सभी वाद भूलुंठित हो चुके है। उत्तर प्रदेश में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में आशातीत विजय के एकाधिक कारण है जो अन्य दलों के लिए सबक बन सकते है। विजय के रूप में उत्तर प्रदेश की परिघटना में केन्द्र सरकार और भाजपा संगठन का मेलजोल का अपूर्व संगम रहा है। मोदी ने जहां राष्ट्रहित में संकुचित स्वार्थ को बलि चढ़ाने का साहस दिखाया और नोटबंदी करके अमीरांे और गरीबों को एक कतार में खड़ा करते हुए कहा कि आने वाले कल के लिए आज कुर्बान करना होगा। जनता ने तकलीफ भोगी लेकिन गरीब समझ गये कि देश के माफिया, भ्रष्टाचारी सब नोटबंदी के निशाने पर आ चुके है। विपक्ष ने जनता को बहकाने, विरोध करने के लिए उकसाया लेकिन जनता ने राष्ट्रीय हित में मोदी का साथ दिया। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने संगठन में केन्द्रीय कार्यालय से मतदान केन्द्र तक ऐसा संगठनात्मक ताना-बाना बुन डाला और पार्टी की सदस्य संख्या 12 करोड़ पहुंचाकर भारतीय जनता पार्टी को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी में गणना करा दी। देश में ऐसी परिस्थति बनी कि जनता ने महसूस किया कि यदि हम अपना और आने वाली पीढ़ी का भविष्य चाहते है तो राष्ट्रवाद की परिभाषा गढ़ें। राष्ट्रवाद के नाम पर नाक-भौंह सिकोड़ने वालों से देश को अधिक जोखिम है, जितना बाहर से नहीं। देश में सामाजिक, आर्थिक सुधार का जो सिलसिला आरंभ हुआ है, उससे दुनिया में भारत की साख में चार चांद लग गये है। श्री नरेन्द्र मोदी अंतर्राष्ट्रीय फलक पर नेता के रूप में स्थापित हो चुके है। विश्व शक्तियां भारत की ओर टकटकी लगाये है। 2014 के लोकसभा चुनाव में कमल की विजय के 32 माह बाद यदि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी का परचम शान से फहराया गया है तो मानना पड़ेगा कि नरेन्द्र मोदी युग का प्रादुर्भाव हो गया है। यह युग आरंभ तो हो गया है इसका सुदीर्घ भविष्य भी है। सुनहरा भविष्य भाजपा के लिए ही नहीं सवा अरब जनता के कल्याण के लिए समर्पित। नरेन्द्र मोदी ने सादा जीवन-उच्च विचार का जो सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक दर्शन गढ़ा हे, वास्तव में यह भारतीय जनसंघ और पार्टी के उन महामना नेताओं, जिनकी चार पीढ़ी खप गयी है, के प्रति सच्ची भावांजलि है।

  • विश्व बंधुत्व का उत्तम प्रदेश

    विश्व बंधुत्व का उत्तम प्रदेश

    आजाद हिंदुस्तान में भारतीय जनता पार्टी ने कई गैर कांग्रेसी सरकारें दी हैं। अन्य राजनीतिक दलों को भी गैर कांग्रेसी शासन देने का अवसर मिला है। इसके बावजूद कभी भारतीय संस्कृति का उद्घोष करती सरकारें अपने मुखौटे के साथ अवतरित नहीं हो सकीं हैं। मध्यप्रदेश को भारतीय संस्कृति पर आधारित राजनैतिक व्यवस्था देने वाली प्रयोग शाला के रूप में जाना जाता रहा है। यहां का चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय तो भारतीय संस्कृति पर आधारित राजनैतिक व्यवस्था की सबसे उत्कृष्ट लैब कहा जाता रहा है। इसके बावजूद जब उमा भारती के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की विशाल बहुमत वाली सरकार बनी तो वो फार्मूला बुरी तरह फेल हो गया। उमा भारती जिस जन, जंगल, जमीन, जानवर और जल का नारा लेकर सत्तासीन हुईं थीं वो फार्मूला विश्व आर्थिक प्रवाह के सामने न टिक सका। उमा भारती को बदलकर भाजपा ने बाबूलाल गौर के गोकुल ग्राम का सूत्र दिया वो भी न टिक सका और अंततः भाजपा को कांग्रेस के पूर्व निर्धारित विदेशी कर्ज आधारित विकास का माडल ही अपनाना पड़ा। इस माडल पर पिछले तेरह सालों से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सफल सरकार चला रहे हैं। मध्यप्रदेश पर कर्ज का भार जरूर बढ़ा है लेकिन ढांचागत विकास के पैमाने पर भाजपा की सरकार ने भरपूर लोकप्रियता बटोरी है। कर्ज का ब्याज चुकाने के लिए सरकार ने अपने संसाधनों का दोहन बढ़ाया है। टैक्स जुटाने के तरीके भी बदले हैं और प्रदेश की आय में भारी इजाफा किया है। इसके बावजूद वह रोजगार के साधन बढ़ाने के मोर्चे पर संघर्ष कर रही है। वजह साफ है कि प्रदेश में उत्पादकता का तंत्र आज भी आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है।यही वजह है कि मध्यप्रदेश की सरकार भले ही आनंद मंत्रालय के माध्यम से लोगों के दिलों में खुशियों भरा गुब्बारा फुलाने में जुटी हो पर यहां के जन मानस के बीच रह रहकर बढ़ती मंहगाई की कराह सुनाई देती रहती है।
    यूपी में भाजपा को इसी कसौटी पर परखा जा रहा है। पंजाब में मरती कांग्रेस को जीवनदान मिल जाने की वजह भी शायद यही रही है कि भाजपा की सरकारें जनता के बीच आनंद का भाव नहीं जगा पा रहीं हैं। ये बात सही है कि देश की युवा पीढ़ी कांग्रेस से मुक्ति चाहती है। वो कांग्रेस को अब ढोना नहीं चाहती। कांग्रेस कोई भी मुखौटा लगाए वो अब उसके कथित सामाजिक सद्भाव के छलावे में नहीं आना चाहती। कांग्रेस के नेता जब जब भाजपा पर असहिष्णु और साम्प्रदायिक होने के आरोप लगाते रहे हैं तब तब जनता भाजपा को सिर आंखों पर बिठाकर सत्ता में पहुंचाती रही है। यूपी की जनता ने भी लामबंद होकर समाजवादी पार्टी की पाखंडी राजनीति को धूल चटाई है। विकास बोलता के नारों को धूल धूसरित करते हुए जनता ने कोई संशय नहीं किया और भाजपा को दो टूक फैसला सुनाते हुए सत्ता में भेजा है। बहन मायावती के जातिवादी झांसे में न आकर दलित राजनीति की जो सच्चाई सामने आई उससे भी राजनीतिक पंडितों के अरमान धराशायी हो गए हैं।
    इन सबसे अलग योगी आदित्य नाथ लगातार आगे बढ़ते हुए जनता की कसौटी पर खरे उतरते गए। जो गोरखपुर कभी अपने माफिया आतंक के लिए जाना जाता था वहां हिंदु मुस्लिम सद्भाव की मिसाल कायम करके सकारात्मक राजनीति की आधारशिला रखने वाले योगी आज भरोसे की अग्निशिखा के रूप में सबके सामने हैं। इस हवन कुंड में सबके नाम की आहुतियां पड़ रहीं हैं। यूपी आज एकजुट है। विकास के पथ पर आगे बढ़ने के लिए तैयार है। इसके बावजूद भाजपा से लंबा दुराव रखने वाले जो राजनेता दुष्प्रचार में जुटे हैं उन्हें अब जनता ने जवाब देना शुरु कर दिया है। लोग सोशल मीडिया पर आकर बता रहे हैं कि उन्होंने जो फैसला किया है वो सोच समझकर किया है। उन्होंने सक्षम नेतृत्व को चुना है और उन्हें पूरा भरोसा है कि ये नेतृत्व यूपी के लिए हितकारी साबित होगा।
    यूपी के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनता को जिस विकास का भरोसा जताया है वह कोई लौह पुरुष ही साकार कर सकता है। अब तक पटरी से उतरकर घिसटती रही यूपी की राजनीति को बदलना किसी आम राजनेता के बस की बात है भी नहीं। न तो वहां जाति के आधार पर दिया गया नेतृत्व कारगर हो सकता है और न ही फार्मूलों से सरकार चलाई जा सकती है। वहां तो सख्त और कुशल प्रशासक की ही जरूरत रही है। ऐसा शासक जो राजनैतिक षड़यंत्रकारियों की गीदड़ भभकियों के सामने जरा भी न सकुचाए। आज जो लोग मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ पर दर्ज पुराने मुकदमों का हवाला देकर लांछन लगाने की कोशिश कर रहे हैं वे उनके लिए अमृत की बूंदें साबित हो रहे हैं। जनता जानती है कि तब योगी ने किस जांबाजी के साथ कानून व्यवस्था को बचाने में लोहे की दीवार बनकर जनता का साथ दिया था। आज यूपी की जनता को भरोसा है कि योगी के रूप में उन्हें एक सक्षम नेतृत्व मिल गया है। जाहिर है कि इन हालात में जनता का आशीर्वाद उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने में कोई कसर छोड़ने वाला नहीं है।

  • कल्याणी को गौरवी बनाने का समय

    कल्याणी को गौरवी बनाने का समय

    जड़ता को तोड़ना बड़ी बात होती है। समाज की जड़ता को तोड़ना तो आसमान से तारे तोड़ लाने जैसा दुष्कर कार्य है। ये संतोष की बात है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार कभी कभी खुद के होने का अहसास भी करा देती है।इसी तरह का संतोषजनक अहसास सरकार ने विधवा शब्द को विलोपित करने का कदम उठाकर दिलाया है। सरकारी कामकाज में अब विधवा शब्द की जगह कल्याणी शब्द का इस्तेमाल किया जाएगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि जिस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विकलांग शब्द को हटाकर दिव्यांग प्रयोग करके देश की आबादी के बड़े हिस्से में गौरव जगाने में सफलता पाई उसी तरह कल्याणी शब्द समाज की आधी आबादी के माथे पर दुर्भाग्यवश लगने वाले कलंक को जरूर धो पाएगा। महिला और बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनिस जब विधानसभा के शून्यकाल में सरकार के इस प्रयास का उल्लेख कर रहीं थीं तब उनके चेहरे पर खासा संतोष और गौरव का भाव झलक रहा था। बेशक उन्हें महिला जन प्रतिनिधि होने के नाते ये आजीवन संतोष करने लायक अवसर था। उन्होंने राजनीति के माध्यम से समाज को करीब से समझा है। वे जानती हैं कि हमारे पुरुष प्रधान समाज में स्त्री की स्वतंत्र चेतना को किस तरह अवसरों की बाट जोहना पड़ती है। महिला के सामने चुनौती होती है कि पहले तो वह खुद को अविचलित बनाए तब कहीं जाकर समाज के उत्पादक या रचनात्मक कार्य से जुड़ पाए। देश और समाज की उत्पादकता बढ़ाने में ये लिंग भेद बड़ी दीवार बनकर रुकावट पैदा कर रहा है। सदियों से हमारे समाज में स्त्री और पुरुष की भूमिका को दायरे में बांधकर देखा जाता रहा है। जब पारंपरिक समाज था तब भले ही ये दायरे उचित प्रतीत होते रहे हों पर आधुनिक दौर में ये वर्गीकरण निश्चित रूप से काफी मंहगा सौदा है। जब हमारी सारी गतिविधियां आर्थिक उत्पादकता बढ़ाने में ऐड़ी चोटी का जोर लगा रहीं हों तब हम स्त्री और पुरुष के रूप में समाज की शक्ति को बांटकर देखें ये न तो न्यायोचित है और न ही व्यावहारिक । सदियों से भारत में स्त्री की भूमिका को घरों में ही समेटकर रखने की प्रवृत्ति घुमड़ती रही है। समय समय पर कुछ बहादुर महिलाओं ने धारा का रुख मोड़कर भी दिखाया है पर ये बदलाव स्थायी नहीं हो पाया, क्योंकि उसका उदय किसी न किसी व्यक्तित्व के इर्द गिर्द ही होता रहा है। पहली बार किसी बहुमत प्राप्त लोकतांत्रिक सरकार ने इस तरह का बदलाव लाने की पहल की है। निश्चित रूप से इस पहल का स्वागत करना होगा।इसके लिए महिला विकास मंत्री अर्चना चिटनिस और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को बहुत बहुत साधुवाद। इस बदलाव के साथ सरकार की चुनौतियां और भी ज्यादा बढ़ गईं हैं। पति की असमय मृत्यु होने के वक्त अक्सर महिलाएं आत्मनिर्भर नहीं होती हैं। वैसे तो पुरुष भी बड़ी तादाद में आत्मनिर्भर नहीं हो पाए हैं। लोकतांत्रिक सरकारों की ये बड़ी असफलता रही है कि उन्होंने समाज के पैतृक व्यवसाय बंद करा दिए हैं और नए व्यवसाय सृजित नहीं कर पाई हैं। इन हालात में महिलाओं के दैनंदिनी खर्चों के लिए किसी रोजगार का ढांच खड़ा करना फिलहाल संभव नहीं दिखता है। सरकारी नौकरी में कृपा करके भर्ती करना निहायत मूर्खता भरा कदम साबित हुआ है जो पिछली कांग्रेस की सरकारों की नाकामी के जीते जागते सबूत के रूप में हमारे इर्द गिर्द रोज देखा जा सकता है।एनजीओ में नौकरी देकर भी ज्यादा महिलाओं को आत्मनिर्भर नहीं बनाया जा सका है। एकमुश्त राशि देकर या पेंशन देकर भी कल्याणी की सेवा करना कर्ज मे डूबी मध्यप्रदेश सरकार के लिए भी फिलहाल संभव नहीं दिखता। फिलहाल तो विधवा के कल्याणी बनने पर इतना ही संतोष किया जा सकता है कि उसे सामाजिक तिरस्कार से तो बचाया जा सकेगा। कल्याणी शब्द में जो सेवा भाव छिपा है उसके चलते स्त्रियों को नई किस्म की परेशानियों का भी सामना करना पड़ सकता है। सोचने लायक बात है कि बगैर पढ़ी लिखी, जायदाद से वंचित, शारीरिक रूप से अशक्त, छोटे छोटे बच्चों के पालन के बोझ से दबी हुई स्त्री कैसे कल्याणी बन सकती है। जब उसे ही देखभाल की जरूरत हो तो उसे मजबूर होकर कई बार समाज के क्रूर हाथों में खेलने पर मजबूर होना पड़ जाता है। फिर धीरे धीरे वह विधवा से कुलटा बन जाती है और जीवन की शाम उसे काशी के विधवाश्रमों में ही बिताना पड़ती है। सरकार को सोचना होगा कि कल्याणी शब्द की आड़ में क्या उसे देह का सौदा करने के लिए मजबूर तो नहीं किया जाने लगेगा। वास्तव में जब जीवन की दौड़ में स्त्री अकेली पड़ जाती है तब उसे अपने पैरों पर खड़े होना सबसे पहली प्राथमिकता होती है। क्या सरकार इस दिशा में भी कोई कदम उठाने जा रही है। सरकारी नौकरी इसका कोई समाधान नहीं है। एनजीओ के भरोसे बैठे रहना भी संभव नहीं है। वास्तव में सरकार को रोजगार मूलक वे प्रयास शुरु करने होंगे जिनसे न केवल स्त्री बल्कि कोई पुरुष भी बेकार न बैठा रहे। उसके हाथों को इतना काम तो जरूर मिले कि वह अपना और अपने परिवार का भरण पोषण कर सके। जब ये हालात बन जाएं तब जरूर कहा जा सकता है कि स्त्री भी अपनी शान कायम रख सकेगी। कल्याणी शब्द फिलहाल कुछ ज्यादा ही नरम दिखाई दे रहा है। सरकार की जवाबदारी है कि वह उसे अबला न बनने दे। सबला न भी बना पाए तो कम से कम उसे गौरवी तो जरूर बना रहने दे।

  • बीड़ी मजदूरों की भी पंचायत होः शैलेन्द्र जैन

    बीड़ी मजदूरों की भी पंचायत होः शैलेन्द्र जैन


    भोपाल, 08 मार्च। सागर विधानसभा क्षेत्र के विधायक शैलेन्द्र जैन ने आज श्रम विभाग के बजट पर चलने वाली चर्चा में कहा कि मैं जिस क्षेत्र से आता हूं वहां पर बीड़ी श्रमिकों की 33 हजार की संख्या है पूरे जिले में 66 हजार बीड़ी श्रमिक हैं. प्रदेश में अनेक तरह की पंचायतें हुईं उनके माध्यम से उनकी समस्याओं को दूर करने की दिशा में काम हुआ है, लेकिन बीड़ी श्रमिकों की पंचायत घोषणा करने के बाद भी अभी तक नहीं हो पाई है.

             उन्होंने कहा कि मैं समझता हूं कि कम लागत में अधिकतम लोगों को रोजगार दिया जा सकता है. यह संसार में अगर कोई कर सकता है तो बीड़ी उद्योग है. मैं मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि यह पंचायत बुलायी जाये. बीड़ी श्रमिकों की प्रदेश में बहुत अधिक संख्या है उनका कोई सम्मेलन यहां भोपाल में बुलाया जाये, यह उचित नहीं होगा. उनकी पंचायत सागर में या और कहीं पर की जाए जहां पर उनकी संख्या बहुत अधिक हो तो उसका लाभ बीड़ी श्रमिकों को होगा.

             श्री जैन ने कहा कि अभी तक बीड़ी श्रमिकों के आवास के लिये शासन ने 40 हजार रूपये के अनुदान की व्यवस्था की थी,हालांकि उस योजना में केन्द्र का योगदान बहुत ज्यादा है उसको बढ़ाकर के डेढ़ लाख रूपये प्रति हितग्राही कर दिया गया है. मैं इस बात के लिये केन्द्र सरकार एवं मध्यप्रदेश की सरकार को बधाई देना चाहता हूं. यह बीड़ी श्रमिकों के हित में एक अच्छा कदम है, लेकिन मैं यह मानता हूं कि अभी भी महंगाई के दौर में डेढ़ लाख रूपये कम है. हमने प्रधानमंत्री आवास योजना में देखा कि इस तरह के हितग्राहियों के लिये ढाई लाख रूपये की योजना है. वह व्यक्ति जो संनिर्माण कर्मकार मण्डल रजिस्टर्ड हैं उनको लगभग साढ़े तीन लाख रूपये अनुदान देने की व्यवस्था है तो मैं समझता हूं कि बीड़ी श्रमिकों के लिये डेढ़ लाख रूपये की जो राशि है वह कम है उसको बढ़ाकर के कम से कम 2 लाख रूपये किया जाये.

    उन्होंने कहा कि सागर में एक बीड़ी कामगार अस्पताल है वह काफी पुराना है, लेकिन यह देखने में आया है कि उस अस्पताल में इन्डोर पेशन्ट की भर्ती करने की व्यवस्था नहीं है जिसके चलते बीड़ी श्रमिक काफी परेशान होते हैं. वहां ओपीडी की संख्या तो अच्छी हो रही है, लेकिन एडमीशन कम हो पाते हैं. वह इस दिशा में काम करें. वहां स्वस्थ्य संबंधी उपकरणों की निहायत कमी है जांच कराने के लिए श्रमिकों को बाहर की अस्पतालों में तथा शासकीय अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है. बीड़ी श्रमिकों के हित में अगर अस्पतालों के उन्नयन काम करेंगे तो बहुत अच्छा होगा.

  • हिन्दुत्व से परहेज जनता से धोखाः जन-न्याय दल

    हिन्दुत्व से परहेज जनता से धोखाः जन-न्याय दल

    सागर/8 मार्च/ आर.एस.एस, विहिप संत-समाज सहित हिन्दुवादी संगठनों की प्रेरणा और सहयोग से बहुसंख्यक हिन्दुओं के वोटों के सहारे प्रचण्ड बहुमत पाकर केन्द्र में सरकार बनाने वाली भाजपा अब अपनी घोषित राष्ट्रवादी-हिन्दुत्व की नीतियों के विपरीत जाकर कांग्रेस की ही नीतियों को स्वीकार करने में ज्यादा रूचि दिखा रही है। यह कांग्रेस को देश की सत्ता से उखाड़ फेंकने में सहयोग करने वाली जनता के साथ धोखा है।
    यह बात आज पत्रकारवार्ता में राजनैतिक पार्टी जन-न्याय दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट बृजबिहारी चैरसिया ने कही। उन्होंने कहा कि हिन्दुत्व के मुद्दों को सिर्फ अपने स्वार्थो की पूर्ति के लिये इस्तेमाल करने वाली भाजपा को अब संघ की नीतियों को स्वीकार करने से परहेज करना मंहगा पड़ेगा। उन्होंने कांग्रेस की नीतियों को अंगीकार करती जा रही भाजपा से सवाल किया है कि अब जनता के सामने यह स्पष्ट करें कि उसकी राष्ट्रवादी सोच देश के लिये आवश्यक है या कांग्रेस की नीतियां। एक सवाल के जबाब में उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी का आर.एस.एस. से किसी भी प्रकार का संबंध नहीं है मगर संघ के हिन्दु सशक्तिकरण व एकजुट करने की वैचारिक-सोच को हम राष्ट्रीय आवश्यकता मानते हैं।
    मंदिर निर्माण के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि देश की जनता अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण के नाम पर पिछले दो दशकों से ठगी जा रही है जिससे आस्थावान राम भक्त भारी सदमे में है। उन्होंने कहा कि गौ-हत्या पर कानूनी प्रतिबंध भी अब सिर्फ भाजपा का जुमला बनकर रह गया है। देश में प्रतिदिन हो रही लाखों गायों की हत्या को उन्होंने चिंताजनक बताया। उन्होंने आश्चर्य जताते हुए कहा कि अब तो गौ-रक्षा करने वाले गौ-सेवकों को ही भाजपा के नेता फर्जी बताने लगे हैं। पत्रकारों से उन्होंने कहा कि राम राज्य की कल्पना में अपराध, शोषण व मंहगाई और भ्रष्टाचार का कोई स्थान नहीं होना चाहिये। लेकिन केन्द्र की भाजपाई सरकार की इन मुद्दों पर असफलता ने पौने तीन साल में ही देश की जनता को अंदर तक हिलाकर रख दिया है।
    एक सवाल के जबाब में उन्होंने कहा कि सभी जानते है कि आर.एस.एस. का वैचारिक आंदोलन छल-कपट की राजनीति से दूर रहकर राष्ट्रवादी ताकतों को मजबूत करने और गरीबों- पिछड़ों से उनके कल्याण के लिये किये गये वायदों को पूरा करने में भरोसा रखता है। लेकिन इसके ठीक विपरीत भाजपा के नेता सत्ता में आने के बाद से ही जनता के कल्याण के स्थान पर अगली बार पुनः सत्ता में काबिज होने की जुगत में लग गये है। इसके लिये ये कांग्रेस की तरह ही अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की दिशा में जाने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद के उद्देश्य से चुनाव जीती भाजपा का अब एक मात्र लक्ष्य सिर्फ चुनाव जीतना रह गया है। जिसके लिये अब वह विकास, मोदी की छवि, जातीय गणित और लुके-छिपे हिन्दूवाद की चार नावों पर सवार है।
    उन्होंने राम भक्तों, गौर-रक्षकों, संत समाज और हिन्दुवादी संगठनों से अपील की है कि वे भाजपा पर दबाब बनाये जिससे गरीबों- पिछडों से किये वायदों को वह पूरा करे। उन्होंने कहा कि जनादेश का सम्मान करते हुये संसद में कानून बनाकर तत्काल राम मंदिर बनाने, गौ- हत्या रोकने कानून बनाने आदि का मार्ग प्रशस्त करे। नोटबंदी के सवाल पर चैरसिया ने कहा कि हमें देश की अर्थव्यवस्था पर इसके परिणामों के आकलन के लिये डेढ़ वर्ष का इंतजार करना चाहिये। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार को अब कांग्रेस के समय हुये घोटालों की चुनावी राग अलाप बंद करके जनता को बताना चाहिये कि उसने किन-किन घोटालेबाजों को अब तक जेल भेजा है। विदेशी कालाधन देश में लाने के लिय क्या काम किया है। बेरोजगारों को कितने रोजगार दिलाये है।

  • सत्ता और सेक्युलर के नाते की अंतिम सांसें

    सत्ता और सेक्युलर के नाते की अंतिम सांसें

    (रा.स्व.सं, भाजसं से भाजपा तक)
    भरतचन्द्र नायक…

    ‘‘सूख हाड़ ले जात सठ स्वान, निरखि मृगराज’’ लंपटीय तासीर सत्ता लोलुपों का स्वभाव आदि काल से व्यवहार में देखा सुना गया। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से प्रेरित संगठन की प्रेरणा का यहीं जन्म होता है। अंगे्रजों ने बांटो और राज करो की मंषा से भारतीय समाज के विखंडन के बीज बोये। 1925 में राष्ट्र को एकता के सूत्र में गुंथित करने का अनुष्ठान आरंभ हुआ। समय ने करवट ली। भारत को आजादी मिली। लेकिन सत्ता में आने के साथ समाज को फिरकों में बांट कर तुष्टीकरण को परवान चढ़ाना सत्ता मठाधीशों ने मूल मंत्र अपना लिया। आवश्यकता ही अविष्कार की जननी होती है। राष्ट्रवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सांस्कृतिक गतिविधियों के विस्तार के लिए संगठन का जब विस्तार किया, जाति विहीन, राष्ट्र को समर्पित युवा शक्ति को एकता के सूत्र में पिरोने का संगठित प्रयास सफलता की सीढ़ियां चढ़ने लगा। तत्कालीन मठाधीशों की भुकुटियां तन गयी। संगठन को कुचलने की चेतावनियां मिली। लेकिन राष्ट्रवाद के प्रसार में न साहस थका और न कदम पीछे रहे। जैसे-जैसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पौधे को सींचा और उसका विस्तार हुआ इसकी छवि देशव्यापी बनती गयी और विदेशों में भी रा.स्व.सं. की चर्चा शुरू हो गयी। मजे की बात यह कि जैसे-जैसे संगठन का कलेवर विस्तृत हुआ, इसके विरूद्ध गलत अटकलबाजियां फैलाना सत्ता और सत्तोन्मुख तत्वों का शगल बन गया। संघ को शंका की दृष्टि से देखा जाने लगा। इसी का नतीजा था कि बार-बार सांस्कृतिक राष्ट्रवादी संगठन को कठघरे में में खड़ा किया गया। न्यायिक आयोग बने संगठन ने सामना किया और न्याय, नीति, नीयत की कसौटी पर संघ ने अपनी सांस्कृतिक धर्मिता की पवित्रता सिद्ध की। उसे क्लीनचिट मिली। लेकिन शंकालु होना सत्ता का स्वभाव है। यही सत्ता लोलुपता प्रपंच गढ़ती है। सांच को भी आंच पहुंचाती है। राजा इन्द्र ने इसी ईष्र्यावश कितने ऋषि मुनियों को लक्ष्य से भटकाने की कोशिश की। षड़यंत्र अतीत के साक्षी है। लेकिन स्वभावगत जो विफलता लगती है कि इन षड़यंत्रों की पोल खोलने का संघ ने प्रयत्न यदा कदा ही किया। जन भ्रम निवारण करने के लिए संघ ने जो खिड़की अब खोली है, उससे बहुत हद तक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को आहत करने वाले तत्वों के सिर से नकाब उतरा है।
    हाल के दौर में जब-जब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का ज्वार आया तथाकथित सेकुलरवादियों ने शक्ति भर भ्रम फैलाया। सम्मान लौटाकर विरोध करने वालों की पोल तो हाल में खुल गयी, जब कांगे्रस ने जुमे की नमाज पढ़ने तक के लिए अवकाश की घोषणा कर ली। साम्प्रदायिकता के बीज बोकर सेकुलरवाद का जश्न मनाना आज एक राजनैतिक फैशन बन गया है। भारतीय समाज का यह दुर्भाग्य है कि कांगे्रस और उसके साथी संगी सेकुलरवाद की मनमाफिक परिभाषा गढ़ते, समाज को छलते और साम्प्रदायिकता का विस्तार करते है। इससे देश और समाज भले कमजोर हो, इनकी निगाह महज वोटों और सत्ता पर केन्द्रित होती है। लेकिन साम्प्रदायिक हथकंडा का मर्म अब अल्पसंख्यक भी समझ चुके है। सेकुलरवादी अल्पसंख्यकों के हमदर्द नहीं उनकी चातकी दृष्टि सिर्फ वोटों पर है। अल्पसंख्यक प्रेम उनके लिए समाज के संगठित होने, कौम की तरक्की का साधन नहीं केवल सत्ता के लिए साध्य है।

    बाबरी मजिस्द विवाद के मुख्य पक्षकार हासिम अंसारी उत्तर प्रदेश की राजनीति के ऐसे चेहरे रहे है जो आगे बढ़ते थे तो सियासी तूफान आता था। अपने जीवन के आखिरी पड़ाव में हासिम अंसारी साहब ने फरमाया कि देश को नरेन्द्र मोदी जैसे नेताओं की जरूरत है। आजादी के बाद नरेन्द्र मोदी पहला शख्स है जिसने साफ सपाट बात की। उन्होनें ही मुस्लिम समाज से गुजारिश की कि विकास और न्याय का ढिंढ़ौरा नहीं पीटता, लेकिन साथ लेकर चलता है। मजे की बात यह है कि हासिम अंसारी की राम मंदिर विवाद के महंत रामचन्द्र दास से गहरी दोस्ती थी। लेकिन दोस्ती में मंदिर-मजिस्द विवाद आड़े नहीं आया। मुसलमान कौम ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर भरोसा जताया है, साथ ही संघ परिवार की मुसलमानों के साथ की गयी पहल सराही गयी। क्योंकि यहां सब एक मन होकर मुल्क की खिदमत का पैगाम है, वोटों की मारा-मारी नहीं है। जिन अल्पसंख्यकों को खौंफजदा करके कांगे्रस सहित सहयोगी दल उनके वोटों से सत्ता हासिल करने में कामयाब होते रहे है। संघ परिवार से उनके जुड़ाव ने सेकुलरवादियों के ताजिये ठंडे कर दिये है। संघ के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार ने अल्पसंख्यकों को भरोसे में लेते हुए कहा कि मुल्क के 25 करोड़ मुसलमानों के बिना भारतीयता अधूरी रहेगी। उन्होनें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इफ़्तार जलसा कर दुनिया के मुस्लिम नेताओं को दावत दे डाली। यथार्थ में देखा जाये तो भारतीय जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी के विकास तक अल्पसंख्यकों से रिश्तों में न तो खटास और न तकरार हुई। यह भी एक यर्थाथ है कि तकरार करने का रसायन पं. नेहरू के वक्त ही तैयार हो गया था, जब उन्होनें बाबरी मजिस्द की ताली फेंक दी और राजीव गांधी ने ताला खुलवा दिया। वास्तव में मुसलमानों से राष्ट्रवादी समुदाय का मेलजोल 9 जुलाई 1966 को ही शुरू हो गया था, जब अटलजी ने दिल्ली शाहजहांनी जामा मजिस्द के सामने अवाम के संपादक अनवर देहलवी को अपना प्रत्याशी बनाया था। अनवर देहलवी जनसंघ के खुर्राट नेता हुए और आज भी जनसंघ के कारपोरेटर के रूप में उनकी सेवाएं याद की जाती है। जहां तक संघ, जनसंघ और भाजपा का ताल्लुक है, इमाम उमर इलियासी जो कि भारत की 5 लाख मस्जिदों की आॅल इंडिया इमाम आॅर्गेनाईजेशन के अध्यक्ष है, का कहना है कि नफरत के बीज बोकर कोई मिठास वाले फल की उम्मीद नहीं की जा सकती। यह इंसानियत का उसूल है गढ़े मुर्दे उखाड़कर सियासत हो सकती है, मुल्क अवाम की भलाई नहीं कर सकते। लोग कहते है कि गर केन्द्र में भाजपा आयी तो अल्पसंख्यक मुसीबत भोगेंगे। लेकिन आशंका को अटल जी ने तो झुठलाया, नरेन्द्र मोदी ने आगे बढ़कर टीम इंडिया कहकर सबको गले लगाया है। आरक्षण को लेकर सर संघचालक और प्रचार प्रमुख का मानना है कि कौम को विकास की मुख्यधारा में लाना है। आरक्षण कोई खैरात नहीं एक रास्ता है, जिसे कायम रहना है लेकिन यह भी सोचने की बात है कि यह फिरका परस्ती को जारी रखने में सहायक बनता है। जब तक जाति पांति अवसर का पेरामीटर रहेगा, जातिविहीन भेदभाव रहित एक रस समाज की कल्पना क्लिष्ट बनी रहेगी। हिन्दू होने के रस का आस्वादन भली प्रकार संभव नहीं होगा।

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर भ्रांतियों का जाल फैलाने की मुहिम अब गड़रिया की टेर बनकर अनसुनी बन रही है। गड़रिया भेड़ें चराता है और मस्ती में गांव वालों को पुकारता कि शेर आ गया। गांव वाले परेशान हो गये। लेकिन जब शेर आया तो किसी ने गड़रिया का रूदन नहीं सुना। सत्ता और सेकुलकर का नाता अंतिम सांसे ले रहा है। सेकुलरिज्म का छद्म जनता समझ चुकी है। जन-जन समझता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा इंसानियत को जोड़ने वाली शक्ति है, इसका उद्देश्य समाज में सकारात्मकता लाना है, जिसे कोई भी नकारात्मक ताकत हानि नहीं पहुंचा सकती। यही कारण है कि शाखाओं का देश में ही नहीं विदेशों में भी विस्तार हो रहा है। युवाओं में संस्कृति, परंपरा, संस्कार, इतिहास, राष्ट्र भाव जगाने के केन्द्र के रूप में शाखा पुनीत गुरूकुल बनती जा रही है। इसमें उम्र का, जाति-पांति, सम्प्रदाय का कोई फर्क नहीं है। 18 वर्ष से कम आयु के लिए बाल भारती, बाल गोकुल संकुल है। विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों के युवकों के लिए शाखा बौद्धिक विकास, शारीरिक शौष्ठव के केन्द्र है। संघ द्वारा देश भर में 32 हजार 400 संस्थानों पर 50 हजार से अधिक शाखाएं लगायी जा रही है। 12 हजार 32 साप्ताहिक मिशन कार्यक्रम, 7233 मासिक मिशन कार्यक्रम चल रहे है। मजे की बात यह है कि एक मां ने जब बच्चे को संघ में जाकर राष्ट्रीय संस्कारों से संस्कृत होकर देखा तो राष्ट्र सेविका समिति की पे्ररणा मिली। आजादी के पूर्व ही राष्ट्र सेविका समिति को मौसी लक्ष्मीबाई केलकर ने जन्म दिया, जो पुष्पित फलित पल्लवित हो रही है, अपनी अस्सी वर्षीय यात्रा में संघ के संस्कारों का बीजारोपण कर नारीशक्ति का प्रस्फुटन किया है।

    जहां तक मुस्लिम बच्चों को संस्कारित करने का सवाल है, संघ के स्कूलों में 4700 मुस्लिम बच्चे संस्कारित हो रहे है। देशभर में 12364 विद्यालय बाल भारती के है, इनमें मुस्लिम बच्चे खुशी-खुशी प्रवेश पाते है। कश्मीर सहित सभी राज्यों में विद्या भारती के स्कूल है और इनमें 270 मुस्लिम आचार्य कार्यरत है। हिन्दुत्व के इन संस्कार केन्द्रों में एक सौ से अधिक ईसाई आचार्य भी है, जो हिन्दुत्व के संस्कारों को आगे बढ़ा रहे है। हिन्दू होने का एक अपना रस है, क्योंकि यहां इस्लाम का सम्मान करने की सुविधा है। कुरान और वाईविल को पवित्र कहने की सद्भावना विराजमान है। हिन्दू होने के कारण ही हम दुनिया की सारी आस्थाएं स्वीकार करके आल्हादित होते है। हिन्दु होकर आस्तिक रह सकते है और नास्तिक भी बने रह सकते है। ऐसा इसलिए है कि यहां नफरत हिंसा तुल्य मानते है। सहिष्णुता असीम है। हिन्दु होकर विवेक का इस्तेमाल कर सकते है। हिन्दु होने का एक आनंद यह भी है कि भौतिकवादी हो सकता है। आध्यात्मिक होने की छूट है, आस्तिकता से संतुष्ट होते है, इसलिए अंधविश्वास काफूर हो जाता है। अब विचारणीय प्रश्न यह है कि जो असहिष्णुता का इल्जाम लगाते है, वे कितने सहिष्णु है।

  • बडे़ बाबा के दर्शन को पहुंचे स्वामी रवीन्द्र कीर्ति

    बडे़ बाबा के दर्शन को पहुंचे स्वामी रवीन्द्र कीर्ति


    कुण्डलपुरः- विश्व की सबसे ऊँची 108 फुट आदिनाथ भगवान की मांगीतुंगी में स्थापना कराने वाले जम्बूदीप के पीठाधीश स्वस्ति स्वामी रवीन्द्र कीर्ति जी ने कुण्डलपुर पहुँचकर बडे़ बाबा आदिनाथ भगवान के दर्शन किए उन्होने अर्ग समर्पित कर छत्र चढाया उनके साथ कुण्डलपुर कमेटी के अध्यक्ष संतोष सिंघई, विद्ववान डॉ.भगचंद भागेन्दु, तहसीलदार रूपेश सिंघई विमल लहरी, अभय बनगांव, नवीन निराल, श्रेयांस लहरी, मुकेश शाह, शैलेन्द्र मयूर, सुनील वेजीटेरियन, दीपचन्द्र जैन, नरेन्द्र बजाज, अजित खडेरी, चन्द्र कुमार जैन, साथ रहे । बडे़ बाबा के मंदिर का उन्होने सूक्षमता से अवलोकन किया। इस अवसर पर कुण्डलपुर क्षेत्र कमेटी की ओर से उनका सम्मान किया गया। उन्होने कहा कि शीघ्र निर्माण पूर्ण होने से देश की सम्पूर्ण जैन समाज को गौरव एवं प्रसन्नता होगी। मंदिर का निर्माण सून्दर एवं सुचारू रूप से चल रहा है। उन्होने कहा कि सन् 2001 में महोत्सव के समय आया था तब से काफी परिवर्तन आ गया है। और मंदिर का निर्माण भी बहुत हो गया है, आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का आर्शीवाद प्राप्त है, इसीलिए यह कार्य शीघ्र पूर्ण होगा। मंदिर कमेटी को मेरी यह प्रेरणा है कि मंदिर निर्माण को प्राथमिकता के साथ समय सीमा में पूर्ण करने का प्रयास करें, उन्होने वर्द्यमान सागर के समीप शिखर मंदिरों के दर्शन किये।


    पीठाधीश स्वामी रवीन्द्र कीर्ति जी का हुआ भव्य अभिनंदन
    कुण्डलपुरः- विश्व की सबसे ऊँची 108 फुट आदिनाथ भगवान की मांगीतुंगी में स्थापना कराने वाले पीठाधीश रवीन्द्र कीर्ति जी के दमोह आगमन पर दिगम्बर जैन समाज के द्वारा भव्य स्वागत एवं अभिनंदन किया गया। वसुन्धरा नगर स्थित दिगम्बर जैन मंदिर के समीप स्थित विद्या चिन्मय संत भवन में स्वामी जी का समाज की ओर से अभिवंदना प्रशस्ति भेंट कर सम्मान किया गया।
    कार्यक्रम के आरंभ में मंगलाचरण के उपरान्त स्वामी जी ने बडे बाबा एवं छोटे बाबा आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के चित्र के समक्ष दीप प्रज्जवलन किया।

    समाज के वरिष्ठ विद्ववान डॉ.भागचन्द्र भागेन्दु जी ने स्वामी जी एवं धर्मपीठोें का परिचय दिया, इसके पश्चात् दिगम्बर जैन पंचायत के अध्यक्ष सुधीर सिंघई विमल लहरी,संतोष भारती, रूपेश सिंघई अभय बनगांव, अरविन्द्र इटोरया, सुभाष बमोरया, रूपचंद जैन, अजित जैन, सुनील वेजीटेरियन, दिलेश चौधरी, आनंद जैन ,महेन्द्र जैन आदि के साथ विभिन्न जैन मंदिरों के प्रतिनिधियों एवं पदाधिकारियों ने श्रीफल अर्पित कर स्वामी जी का आर्शीवाद प्राप्त किया।

    इस अवसर पर अपने उदगार् व्यक्त करते हुये। स्वामी जी ने कहा कि मै दमोह पहली वार आया हूँ और बुन्देलखण्ड के भक्तों से मिलने आया हूं, 15 वर्षो पूर्व कुण्डलपुर आया था, तथा वहां के नये मंदिर मॉडल का उद्घाटन करने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ था। मंदिर निर्माण कार्य को देखने की मेरी भावना थी, उन्होने कहा कि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज 40वर्षो से बुन्देलखण्ड में है, मुझे यहां आकर ज्ञात हो गया है ं चूंकि बुन्देलखण्ड के भक्तों की त्याग और त्यागियों के प्रति, श्रद्धा और भक्ति असीम है, यही कारण है कि आचार्य श्री इस क्षेत्र को नही छोड पा रहे, आचार्य श्री और आर्यिका शिरोमणि ज्ञानमती माता जी पूरे विश्व में धर्म की महति प्रभावना कर रहे है। पूज्य माता जी की पावन प्रेरणा से हमें विश्व की सबसे बडी प्रतिमा बनाने का सौभाग्य प्राप्त हो सका है जो कि गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हो चुका है, आज समाज को संगठन की बहुत आवश्यकता है। इसलिए हमें अपने समाज के अस्तित्व को बनायें रखना होगा। हमें खानदान और खानपान को बचाने की आवश्यकता है, तथा युवा पीढी को बचाये रखने के लिये संस्कारित करना जरूरी है।