Category: मध्यप्रदेश

  • शिक्षा में अराजकता से कैसे निपटेंगे जावड़ेकर

    शिक्षा में अराजकता से कैसे निपटेंगे जावड़ेकर

    -आलोक सिंघई-

    दंभ से सराबोर भारत के शैक्षणिक संस्थानों में –या विद्या सा मुक्तये– का नारा लगाने वालों की भरमार है। जुगत भिड़ाकर या चयन के अवैज्ञानिक मापदंडों का लाभ लेकर स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक में फर्जी शिक्षकों की भीड़ गुजारा भत्ता पा रही है। यही वजह है कि सफलता के मापदंडों पर भारत का युवा सोशल मीडिया तक ही पहुंच पाया है। सवा सौ करोड़ का देश पेटेंट पाने के पैमाने पर फिसड्डी साबित हो रहा है। सरकारें बदल गईं हैं, पर शैक्षणिक संस्थानों का ढर्रा वही है। देश को विश्वगुरु बनाने का सपना पाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मुर्दों में जान फूंकने की कितनी भी कोशिश करें लेकिन जब तक उनकी पार्टी भाजपा इन फर्जी शिक्षकों के स्थान पर असली मुक्तिदाताओं को नहीं बिठाती तब तक बदलाव की शुरुआत भी कैसे हो सकती है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने शैक्षणिक संस्थाओं में अपना जनाधार बढ़ा लिया है इसके बावजूद युवाओं की इस बैचेनी को भांपने में भाजपा की सरकारें पूरी तरह असफल साबित हो रहीं हैं।

    सागर के डाक्टर सर हरिसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के पूर्व छात्रों ने आगामी 14- 15 अप्रैल को पूर्व विद्यार्थियों की एल्युमनी मीट बुलाई है। पूर्व छात्रों के मिलने का ऐसा अवसर कोई पहली बार नहीं आया है। जमाने भर के शैक्षणिक संस्थानों में विद्यार्थी इस तरह के आयोजन करते रहते हैं। सागर के भी कुछ पुरा छात्रों ने इस प्रथा की नकल करने की कोशिश की,लेकिन उनका प्रयास कुछ अलग ही अंदाज में सामने आया है। पत्रकारिता विभाग से निकले ये छात्र देश भर के विभिन्न शहरों में ख्यातनाम पत्रकार बन चुके हैं। उन्हें मलाल है कि कभी इस विभाग के जिन छात्रों को कटंगी के रसगुल्ले की तरह खास प्यार मिलता था वो अब क्यों नहीं मिल रहा है। उनका प्यारा संस्थान आज देश के कई अन्य पत्रकारिता पढ़ाने वाले संस्थानों के बराबर ऊंचाई तक भी क्यों नहीं पहुंच पाया । आज इस संस्थान में गिने चुने विद्यार्थी ही क्यों प्रवेश लेते हैं। उन्हें आग में तपाकर कुंदन बनाने का प्रयास कहां गुम हो गया है। ऐसे तमाम सवाल हैं जिनके जवाब ढूंढ़े जा रहे हैं। पुरा छात्रों ने इस एल्युमनी मीट के लिए जो वाट्सएप समूह बनाया है उसमें चल रहे संवाद उस बैचेनी का उद्घोष कर रहे हैं।

    इस संस्थान की विकास यात्रा अलबेली है। बोफोर्स कांड की गूंज जब पूरे देश में चल रही थी,तब आकाशवाणी के एक प्रसारण केन्द्र पर जीवित प्रसारण के दौरान अनोखी घटना घटित हो गई। एक बच्चे ने बोल दिया गली गली में शोर है राजीव गांधी चोर है। देश में कांग्रेस का दबदबा था और ये कल्पना में भी नहीं सोचा जा सकता था कि सरकारी मीडिया से इस तरह की आवाज भी आ सकती है। जाहिर है कि जागरूक जनता ने इस घटना को गंभीरता से लिया। अखबारों में भी ये खबर प्रकाशित की गई। अब जो विद्यार्थी पत्रकारिता की पढ़ाई में प्रवेश लेना चाहते हैं वे कितने जागरूक हैं ये जानने के लिए प्रवेश परीक्षा में उस आकाशवाणी केन्द्र का नाम पूछा गया था। सवाल सीधा था, प्रवेशार्थियों की जागरूकता जानने के लिए पूछा गया था। पत्राकारीय अभिरुचि जानने का इससे अच्छा पैमाना कोई दूसरा नहीं हो सकता था। इसके बावजूद कांग्रेस की चिलम भरने वाले छात्र संगठनों ने इसे उछालना शुरु कर दिया। इस प्रश्नपत्र को बनाने वाले पत्रकारिता के मूर्धन्य शिक्षक प्रदीप कृष्णात्रे पर सवाल उठाए जाने लगे। भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन के कतिपय गुंडों ने अभिव्यक्ति की आजादी के प्रतिमान गढ़ने वाली इस फैक्टरी पर हमला कर दिया। प्रदीप कृष्णात्रे का मुंह काला करके विश्विद्यालय परिसर में जुलूस निकाला गया। इस तरह की घटना झकझोर देने वाली थी। देश भर के समाचार पत्रों ने इस घटना को गंभीरता से लिया। नवभारत टाईम्स, जनसत्ता समेत तमाम अखबारों ने इस कलंकित घटना का विरोध करते हुए संपादकीय लिखे। मामला अदालत पहुंचा। सालों चला। घटना के बाद इस विभाग की सक्रियता और भी बढ़ गई। शिक्षकों ने दुगुने उत्साह से विद्यार्थी गढ़ना शुरु कर दिया। इसके बावजूद राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ता गया और प्रतिभाशाली शिक्षकों ने विभाग से पलायन कर लिया। इस बीच अभियुक्त को कांग्रेस की सरकारों ने पुरस्कृत करते हुए विश्वविद्यालय के इसी विभाग में मीडिया असिस्टेंट जैसी गैर शैक्षणिक नौकरी देकर उपकृत करवा दिया। इसके बाद विवि और इसके पत्रकारिता विभाग की साख धूलधूसरित हो गई। बाद में विद्यार्थी तो निकले लेकिन फील्ड पर वे ही सफल हो सके जिनमें खुद कुछ कर गुजरने की जिजीविषा थी। विभाग की निरंतर गिरती साख का नतीजा ये है कि आज वहां चंद विद्यार्थी ही डिग्री लेने पहुंचते हैं।

    ये बात पत्रकारिता के शीर्ष पर पहुंच चुके विभाग के पूर्व विद्यार्थियों को आज भी सालती है कि जिस संस्थान को अपनी समर्पित शिक्षा के कारण शीर्ष पर होना था वो आज गुमनामी के अंधेरे में क्यों धकेला जा रहा है। समय बदला, सरकारें बदलीं लेकिन विश्वविद्यालय का ढर्रा नहीं बदला। केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिलने के बाद कभी ये प्रयास नहीं किए गए कि देश को कुशल संवाद से आगे ले जाने वाले मीडिया कर्मी कैसे तैयार किए जाएं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय हो या विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, या देश का शैक्षणिक ढांचा संवारने वाला कोई अन्य संस्थान कोई भी अब तक इस पत्रकारिता संस्थान की खोई साख नहीं लौटा सका है। इस कसमसाहट ने ही इस बार एल्युमनी मीट की चाहत को परवान चढ़ा दिया है।

    सागर का पुरा छात्र सम्मेलन अब केवल गलबहियां करने का अरमान लिए नहीं आयोजित नहीं हो रहा है। इसमें कई सवाल घुमड़ रहे हैं। क्या देश की शिक्षा कभी क्षुद्र राजनीतिक चंगुल से आजाद हो सकेगी। शैक्षणिक संस्थानों में चापलूसी या कृपा के नाम पर जो गंदगी जमा हो गई है उसे आखिर कब तक पाला पोसा जाता रहेगा। मोदी सरकार अपनी पूर्ववर्ती सरकारों से आखिर किस नजरिए से अलग है। उसने देश को जो भ्रष्टाचार गंदगी और अयोग्यता से मुक्ति दिलाने का स्वप्न दिखाया था वो क्या कभी पूरा होगा। आखिर अच्छे दिन कब आएंगे। डिग्रियों की आड़ में ज्ञान के संरक्षण और संवर्धन की हत्या कब तक की जाती रहेगी। मानव संसाधन और विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर आखिर कर क्या रहे हैं । देश के शैक्षणिक ढांचे में सुधार की उनकी क्या योजना है। पत्रकारिता के पुरा छात्रों को ही यदि अपने प्रिय संस्थान को सुधारने और संवारने का कार्य करना है तो फिर सरकार की जरूरत ही क्या है। सरकार की ये बेरुखी क्या देश में किसी अराजकता को पनपने का अवसर तो नहीं दे रही । कल यदि शैक्षणिक संस्थानों में सुधार और बदलाव की आकांक्षा गुटीय टकराव की वजह बन गई तो फिर उससे कैसे निपटा जा सकेगा।

    ये तमाम ज्वलंत सवाल न केवल सागर के डाक्टर सर हरिसिंह गौर विवि कुनबे के बीच सुलग रहे हैं वे चाहते हैं कि उनका प्यारा पत्रकारिता संस्थान एक बार फिर अपनी पहचान स्थापित करे। यहां से निकले पत्रकारिता के शावक देश में बदले निजाम का संदेश फैलाएं। देश के आम जनमानस को भी बदलाव की बयार का इंतजार है। सरकार को यदि अपनी उपस्थिति दिखानी है तो उसे कोई ठोस कदम उठाकर दिखाने होंगे। शेर बूढ़ा हो जाए तो उसके मुंह पर मक्खियां भिनकने लगती हैं, पर जब शेर दहाड़ता नजर आ रहा हो तब उसके मुंह पर मक्खियां भिनकने लग जाएं तो साफ है कि उसने मक्खियों से ही यारी कर ली है।

    (लेखक स्वयं डाक्टर सर हरिसिंह गौर विवि के पत्रकारिता और जनसंचार विभाग के पूर्व छात्र हैं)

  • सत्ता हमारी साध्य नहीं कहने वाले कुशाभाऊ ठाकरे

    सत्ता हमारी साध्य नहीं कहने वाले कुशाभाऊ ठाकरे



    –भरत चंद नायक-

    भुवन भास्कर भी संध्या को अस्ताचल पहुंचकर विश्राम करते हैं, लेकिन कुछ ऐसे व्यक्तित्व के धनी लोग भी होते हैं जो अपने जीवन की संध्या में लोक कल्याण की भावना से अपने ध्येय की पूर्ति में जुटे रहते है। अपने-अपने परिवार और संगे संबंधियों से अनासक्त होकर जीवन पथ पर चलते रहते हैं। जीवन में विश्राम उनके लिए विलासिता के समान होते हैं। ऐसे समर्पण भाव से जीने वालों के लिए समाज और देश ही परिवार बन जाता है। भारतीय जनता पार्टी की स्थापना से लेकर 1980 में भारतीय जनता पार्टी के गठन के साक्षी बने पितृ पुरूष कुशाभाऊ ठाकरे एक ऐसे ही महापुरूष हुए जिन्होंने अपना जीवन पुष्प राष्ट्रवाद के पोषण के लिए मातृभूमि की बलिवेदी पर आर्पित कर दिया।

    कहते है कि अपनों के लिए तो संसार जीता है जो दूसरों के लिए जीते है उनका जीवन धन्य है। मध्यप्रदेश में कुशाभाऊ ठाकरे राष्ट्रवाद के प्रवर्तन और भारतीय जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी के गठन और विस्तार के प्रतीक पुरूष रहे लेकिन इस विकास यात्रा में सत्ता प्राप्ति से बढकर उनका ध्येय राष्ट्रनिष्ठ कार्यकर्ताओं का निर्माण करना रहा। कार्यकर्ता निर्माण की उनमें अद्धुत क्षमता थी। उन्हें कार्यकर्ता की क्षमता, उसके बौद्धिक स्तर की पहचान थी जिसका श्रेय उनका कार्यकर्ताओं से तादात्म्य स्थापित करने की कला को है। प्रदेश के लाखों कार्यकर्ताओं को उन्होंने संवारा। हर कार्य के लिए कार्यकर्ता और हर कार्यकर्ता को दायित्व उनकी कार्य संस्कृति थी। अविराम कार्यकर्ताओं के बीच रहना। कार्यकर्ताओं की सुनना और उन्हें संतुष्ट करना उनकी दिन चर्या थी। इससे उनके संपर्क में आने वाला अजनबी व्यक्ति भी उनका मुरीद हो जाता था। देखा गया कि कुछ लोग उनके संपर्क में आते और विचारधारा से असहमत हो जाते थे। उनकी असहमति का वे सम्मान करते हुए कहते थे कि सतत संवाद और संपर्क में वही असहमत व्यक्ति आने वाले दिनों में कार्यकर्ता बनेगा और उसका सहयोग हमें मतदाता के रूप में मिलने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता है।

    कुशाभाऊ ठाकरे अपने से असहमति होने वालों को विशेष तरजीह देते और कभी गांठ नहीं बांधते थे, जिससे हर विरोधकर्ता व्यक्ति उनका विश्वास भाजन बन जाता था। उन्होंने जो कार्य संस्कृति और पद्धति विरासत में छोडी यदि उसका अनुगमन किया जाता तो वास्तव में पार्टी संगठन में गुट नहीं गट बनते। कार्यकर्ता किसी व्यक्ति के प्रति नहीं संगठन के प्रति उत्तरदायी रहता। इस दिशा में आज स्थिति विचारणीय है। हम पितृपुरूष के जीवन आदर्शो के प्रति गंभीर रहेंगे तो वास्तव में संगठन का यह दावा सोलह आना सही साबित होगा कि भाजपा के लिए सत्ता साध्य नहीं। सत्ता समाज में सुखद परिवर्तन लाने का साधन मात्र है। यही ठाकरे जी का जीवन दर्शन था।

    संगठन और पार्टी के विकास की दिशा में ठाकरे जी के योगदान को कुछ पृष्ठों में समेटना वास्तव में असंभव है। लेकिन यथार्थ यही है कि जब डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी पं. नेहरू के मंत्रिमंडल में रहते हुए राष्ट्रवाद के प्रवर्तन के बजाए तुष्टीकरण देखकर आहत हुए उन्होंने श्री गुरूजी से परामर्श कर राष्ट्रवाद को समर्पित दल भारतीय जनसंघ की स्थापना का बीडा उठाया। देशव्यापी संगठन और दल के गठन के लिए कार्यकर्ताओं की खोज खबर आरंभ हुई। पं. दीनदयाल, नानाजी देशमुख, दत्तोपंत ठेंगडी जैसे चुनिंदा कार्यकर्ताओं का चयन किया गया। मध्य भारत क्षेत्र के लिए कुशाभाऊ ठाकरे धुरी मान लिए गए। कुशाभाऊ ठाकरे एक थैला लिए, पैरो में टायर की चप्पल पहनकर निकल पडे। उन्होंने मध्य भारत क्षेत्र की लंबाई चैड़ाई कुछ इस तरह नापी कि गांव गांव में जनसंघ की पहचान बनी। किसानों, छोटे मोटे उद्यम में लगे लोगों मजदूरों और युवा वर्ग को अपनेपन का अहसास हुआ। संगठन शिल्प में निष्णात ठाकरेजी के समर्पण भाव ने जन जन में विश्वास पैदा किया। दिन भर यात्रा और संध्या रात्रि में जन जन की चैपाल में सुख दुख की बातों के बीच उन्होंने राष्ट्रवाद का अलख जगाया। तत्कालीन सरकार की जनविरोधी नीतियों का प्रखरता से विरोध किया और जनता की जागरूकता का विकास किया। फलस्वरूप मध्यप्रदेश में कांग्रेस का एकाधिकार समाप्ति की ओर बढा। सहयोगी दलों में संवाद ने सेतु का काम किया। पहली बार कांग्रेस से सत्ता छीनकर संविद सरकार बनाने में उनका अप्रतिम योगदान रहा लेकिन सरकार चले जाने से तत्कालीन भारतीय जनसंघ की भूमिका का इतिहास बदला हो ऐसा नहीं हुआ है।

    5 मार्च 1990 में मध्यप्रदेश की पहली भारतीय जनता पार्टी की सरकार का गठन हुआ। तब भारतीय जनता पार्टी प्रदेश में दो तिहाई बहुमत से सत्ता पर काबिज हुई थी। कुशाभाऊ ठाकरे सत्ता साकेत से दूर संगठन में तल्लीन रहे। उन्होंने तत्कालीन सरकार को राष्ट्रवाद की पटरी से नहीं उतरने दिया लेकिन इस दरम्यान वे सत्ता साकेत से दूर तथापि एक रेफरी की तरह व्हिसिल ब्लोवर बने रहे। यह भारतीय जनता पार्टी और पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ की पुण्याई थी कि राज्यों में सरकारे बनी। अयोध्या में ढांचा गिराए जाने पर आए राजनैतिक झंडावात में भारतीय जनता पार्टी की सरकार कुर्बान हो गयी। लेकिन नीति और नीयत जब साफ होती है तो नैतिक साहस बड़े बड़े किले ध्वस्त हो जाते है। कुशाभाऊ ठाकरे को मध्यप्रदेश संगठन से प्रथक राष्ट्रीय जिम्मेदारी सौंप दी गयी। लेकिन कुशाभाऊ ठाकरे ने जिस शिशु संगठन का संगोपन किया उसका मोह नहीं छोड़ पाए और मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी और उनके कार्यकर्ताओं से संबंध विच्छेद नहीं हुआ। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में तत्कालीन एनडीए की अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार के दौर में कुशाभाऊ ठाकरे ने सत्ता से दूर रहते हुए अम्पायर की भूमि का भली प्रकार बिना रागद्वेष निर्वाह किया। शरीर से दुर्बल हो जाने के बावजूद उनकी मनस्थिति हमेशा जीवंत रही और उन्होंने मध्यप्रदेश संगठन और कार्यकर्ताओं का विस्मरण नहीं किया। उनकी रूग्णावस्था में कार्यकर्ता उन्हें देखने जब दिल्ली पहुंचे वे सभी की खैर ख्वाह लेते रहे और पूरी व्यवस्था करते थे।

    कुशाभाऊ ठाकरे ने भारतीय जनता पार्टी के स्थापना दिवस पर कहा था कि जनसंघ के रूप में राजनैतिक यात्रा आरंभ करते हुए हमारी कुछ प्रतिबद्धताएं थी। राष्ट्र की एकता, प्रजातांत्रिक मूल्यों पर आधारित राजनीति और भारत को एक शक्तिशाली देश बनाना। जनसंघ छोटा दल था लेकिन कमजोर नहीं था। हमारी कोशिश प्रेशर ग्रुप बनाने की रही थी। देश की प्रमुख पार्टी न होने के बाद भी हमारी साख और इकबाल था कि बिना हमें विश्वास में लिए देश की राजनीति पर विचार संभव नहीं था। ध्येय लेकर बढे है। देश की सुरक्षा की चिंता, राष्ट्रीय अस्मिता को जिंदा रखना था और होगा। भारतीय जन संघ और भारतीय जनता पार्टी की आगे बढ़ने का कारण हमारे कार्यकर्ताओं ने भारत की आत्मा से संवाद किया है। जनता की तलित भावनाओं को समझा है उनसे तादात्म्य स्थापित किया है। आत्मा को छूने के साथ हमने अपना लक्ष्य सामने रखा है। हम राज्यों में केन्द्र में सरकार में रहे, न रहे जनता के मर्म को समझना है और उससे एकाकार होना है। जनता का विश्वास ही पूंजी है इसे ईमान की तरह संरक्षित रखना है। तो पार्टी जनमानस पर हमेशा शासन करती रहेगी। कर्तव्यबोध की चुनौती को खुले मन से स्वीकार करे और सशक्त भारत का लक्ष्य पूरा करेंगे। उनकी ध्येय निष्ठा आने वाली पीढी के लिए दीप स्तंभ का कार्य करेगी।

  • सफल संवाद के लिए विचार के नए मुखौटों को पहचानें

    सफल संवाद के लिए विचार के नए मुखौटों को पहचानें



    स्व.भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यान 2018 के मंथन से निकला पत्रकारिता का ताजा फार्मूला
    भोपाल,4 मार्च,(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।पत्रकारिता विचार यात्रा से बाजार यात्रा तक विषय पर आयोजित स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यान 2018 में मीडिया के असमंजस पर कुछ नायाब फार्मूले सामने आए हैं। व्याख्यान माला में भाग लेने वाले विद्वानों और पत्रकारों का मानना है कि जबसे देश ने पूंजीवाद की राह पकड़ी है तबसे जनसंचार के साधन समाजोन्मुख रास्ता भूल चले हैं। समाज केन्द्रित पत्रकारिता के बगैर सफल संवाद संभव नहीं है इसलिए पत्रकारों को पूंजीवादी दौर में उभरे विचार के नए मुखौटों को पहचानना सीखना होगा। मीडिया संस्थानों की बुराई किए बगैर यदि हम मर्यादाओं का पालन करेंगे तो हमारा सफल संवाद समाज को भी स्वीकार्य होगा।
    डॉ.सर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के प्राध्यापक स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया की स्मृति में ये लगातार छटवां सफल आयोजन था। इस आयोजन में मुख्य अतिथि के रूप में मध्यप्रदेश शासन के राजस्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता, दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक प्रकाश दुबे, नईदिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार ने पत्रकारिता विचार यात्रा से बाजार यात्रा तक विषय पर आयोजित व्याख्यान में अपने अपने नजरिए से पत्रकारिता के संवाद को सार्थक बनाने के रास्ते सुझाए। अध्यक्षीय उद्बोधन में माधव राव सप्रे संग्रहालय के स्थापक पद्मश्री विजय दत्त श्रीधर ने विषय का प्रवर्तन किया।

    इस अवसर पर दैनिक भास्कर ग्वालियर के पत्रकार अनिल पटैरिया को उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए ग्यारह हजार रुपए के स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया स्मृति पत्रकारिता सम्मान से अलंकृत किया गया। उन्हें राजस्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने शाल श्रीफल भेंटकर प्रशस्ति पत्र भी दिया गया। आयोजकों ने सभी आमंत्रित वक्ताओं को स्मृति चिन्ह और तुलसी के पौधे देकर सम्मानित किया। मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण के साथ आयोजन का विधिवत शुभारंभ हुआ। अतिथियों ने स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया के चित्र पर माल्यार्पण भी किया। स्वागत भाषण वरिष्ठ पत्रकार शिव अनुराग पटैरिया ने दिया। कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए समिति की ओर से जनसंपर्क अधिकारी अशोक मनवानी ने अतिथिओं और आगंतुकों के प्रति आभार प्रकट किया। आयोजन के उपरांत अनौपचारिक सत्र भी आयोजित किया गया जिसमें वक्ताओं ने श्रोताओं की जिज्ञासाओं का समाधान किया। सहभोज का आयोजन भी किया गया।

    अध्यक्षीय उद्बोधन में पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि आत्मआलोचना के नाम पर हम लोग आत्म निंदा में जुट जाते हैं। बाजार और पत्रकारिता के रिश्ते चिंताजनक नहीं हैं। पत्रकार यदि सूझबूझ से लिखेंगे तो उन्हें कभी मालिकों की ओर से तनाव नहीं झेलना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि गायत्री परिवार के (हम सुधरेंगे जग सुधरेगा ) नीतिवाक्य की रोशनी में हमें आगे बढ़ते रहना होगा।

    विषय का तकनीकी विश्लेषण करते हुए वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार ने कहा कि सागर में पत्रकारिता के प्रशिक्षण के दौरान हम सभी सहपाठियों को स्व.देवलिया जी का स्नेह मिला। उनके ही मार्गदर्शन पर हमने दिल्ली में अपनी जमीन तलाशी। उन्होंने कहा कि आज के जनसंचार में भावनात्मक अपीलें की जाती हैं जिनमें नीतियां दफन हो जाती हैं। लोकतंत्र में चुनाव जीतना ही अंतिम लक्ष्य हो गया है। आज के राजनेताओं ने जनता के मुद्दों के समाधान खोजना बंद कर दिया है। जबसे बाजारवाद की स्वीकार्यता बढ़ी है और साम्यवाद का अंत हुआ है तबसे मीडिया प्रोपेगंडा करने लगा है। ये मॉडल सत्ताधीशों को भी मुफीद पड़ता है और धनपशुओं के लिए भी भरपूर नतीजे लाने वाला है। यही वजह है कि आज बाजार स्वयं एक विचार बन गया है। उसने कई पुराने विचारों की जगह ले ली है। मीडिया में विचारों का यही फंडामेंटलिज्म(कट्टरपंथ) हावी हो गया है। इसलिए जो लोग कहते हैं कि आज का मीडिया विचार हीन हो गया है मैं उसका खंडन करता हूं। आज तो फेसबुक और गूगल जैसे सोशल मीडिया भी बाजार को नियंत्रित कर रहे हैं। दरअसल मीडिया ने अपने मुखौटे बदल लिए हैं और इन बदले मुखौटे में छिपे मीडिया के नियंताओं की पहचान जरूरी हो गई है। इसे पहचाने बगैर हम मीडिया को जनता के करीब नहीं ले जा सकते।

    दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक प्रकाश दुबे ने कहा कि स्वर्गीय देवलिया जी ने गुरु द्रोणाचार्य की तरह शिष्य तो बनाए पर उन्होंने कभी एकलव्य की तरह शिष्यों से उनका अंगूठा नहीं मांगा। उनके पास आसपास की घटनाओं की सटीक जानकारी होती थी। यूनीवार्ता के प्रतिनिधि रहते हुए उन्होंने समाज से गहरा नाता बना लिया था। उन्होंने कहा कि आज बाजार की ताकतें और सत्ता का दबाव बेशक मीडिया को नियंत्रित कर रहा है लेकिन ये समाचार संस्थान कभी नहीं चला सकते। यदि ऐसा होता तो देश पर एकछत्र राज्य करने वाली कांग्रेस और उसका गांधी परिवार नेशनल हेराल्ड समूह को भी चला सकती थी। उन्होंने कहा कि तमाम दावों के बावजूद प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया का दबदबा बढ़ता चला गया है।

    श्री प्रकाश दुबे ने यूनियन कार्बाइड गैस कांड की घटना के माध्यम से बताया कि जब अमेरिकी राष्ट्रपति के दबाव मे देश की सत्ता ने अपने मुख्यमंत्री को बाकायदा फोन करके दबाव डाला था। राज्य सरकार ने इसके बाद अपने प्रिय अधिकारी के संरक्षण में यूका के अपराधी वारेन एंडरसन को देश से बाहर भेजने में बडी भूमिका निभाई थी,तब भी एक छोटे से अखबार के पत्रकार राजकुमार केसवानी ने अपने अखबार में खबर छापकर यूनियन कार्बाइड को झुकने पर मजबूर कर दिया था। विश्व जनमत के कारण आज तक यूनियन कार्बाइड उस मुकदमे को बंद नहीं करा सकी है। अखबार की ताकत अपार है इसलिए बाजार कितना भी आततायी क्यों न हो जाए हम उससे डरने वाले नहीं हैं।

    मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित राजस्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने कहा कि आज बाजार के साथ साथ विचार, सत्ताधीशों और धनपशुओं सभी की मर्यादाएं टूट रहीं हैं। बाजार के आशय अनेक स्थानों पर बदलते रहते हैं। इसलिए बाजार किसी विचार को दबा सके ये अब संभव नहीं है। सोशल मीडिया की ताकत आज इतनी बढ़ गई है कि समर्थक या विरोधी विचारों की अभिव्यक्ति किसी न किसी तरह हो ही जाती है। ये हमें तय करना है कि हम लोगों के विश्वास की रक्षा कैसे करें। हम मर्यादाओं का पालन करेंगे तो विचार की रक्षा भी होगी और पाठक तक उसकी यात्रा भी निर्बाध रूप से संभव हो सकेगी।

    व्याख्यान माला के अंत में सर्वश्री शंभुदयाल गुरु, विनय द्विवेदी, आरएस अग्रवाल, अनिल सौमित्र, और कई अन्य आगंतुकों ने वक्ताओं से सवाल पूछे। समाधान करने की जवाबदारी मुकेश कुमार और प्रकाश दुबे दोनों ने संभाली। मुकेश कुमार ने कहा कि जिस तरह तेल, आटा, मिठाई में मिलावट हमें मंजूर नहीं। हम उसका विरोध करते हैं। उसी प्रकार हमें मीडिया में मिलावट का भी विरोध करना होगा। जो मीडिया लोकतंत्र के खिलाफ ही खडा़ हो जाए उसे हम गोदी मीडिया कहकर पीछे न लौट आएं उसे सुधारने के लिए भी आगे आएं।

    प्रकाश दुबे ने कहा कि हम अपनी भूमिका उस मोची के समान मानते हैं जिसे फटा जूता ही नजर आता है। वह उसे सुधारने का जतन भी करता है। इसलिए हम अपनी भूमिका निभाते रहें तो विचार की यात्रा को सार्थक बना सकेंगे।

    कार्यक्रम के आरंभ में स्वागत उद्बोधन में शिव अनुराग पटैरिया ने कहा कि स्वर्गीय देवलिया जी की उंगली पकड़कर हमने आदर्श पत्रकारिता शुरु की थी। आज यदि हम उन आदर्शों की बात करें तो बदले हालात में उन्हें अप्रासंगिक समझा जाएगा। आयोजन का ये अनुष्ठान हमने जबसे प्रारंभ किया है तबसे सभी मित्रों और सहयोगियों का योगदान हमें मिलता रहा है।

  • मिठलबरा राजनीति की उपासना

    मिठलबरा राजनीति की उपासना



    हिंदुस्तान की राजनीति अनुत्पादक, उद्देश्यहीन और ठहरी हुई बांझ महसूस की जा रही है। कांग्रेस से निराश हो चुके लोग आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भाजपा के बारे में भी निराशाजनक बातें कहते नजर आते हैं। हालांकि जो लोग यूपीए और एनडीए की सरकारों के आधारभूत अंतर को समझते हैं वे जानते हैं कि बदली सत्ता पहले की तुलना में क्या नए लक्ष्य छूने निकल पड़ी है। इसके बावजूद अपनी राजनीतिक विधा को बुलंद करने में जुटे सत्ताच्युत राजनेता ये मानने तैयार नहीं हैं कि बदलते वक्त ने उनकी राजनीतिक शैली को विदा कर दिया है। मध्यप्रदेश विधानसभा के बजट सत्र में दिवंगत विभूतियों को श्रद्धांजलि देने का क्रम चल रहा था। अध्यक्ष डाक्टर सीतासरन शर्मा ने पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी को जमींदारी उन्मूलन के लिए कार्य करने वाला विधिवेत्ता और संसदविद् बताया । मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी के प्रति श्रद्धांजलि देने के लिए कई सम्मानजनक संबोधन प्रेषित किए। वाजिब भी था, जिस विधानसभा की गरिमा आजादी के बाद संवाद आधारित लोकतंत्र से सजाई संवारी गई हो उसके पुरोधाओं को नई पीढ़ी की ओर से सम्मान दिया जाना लाजिमी है।

    नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कहा कि श्रीनिवास तिवारी को विंध्य का टाईगर कहा जाता था। उन्होंने बेरोजगारी मिटाने के लिए पूरे जीवन काम किया। वे विंध्य क्षेत्र के विकास के लिए विशेष प्रयास करते थे। श्री तिवारी का अपने लोगों के लिए कोई कानून कायदा नहीं होता था। वे हरदम प्रयास करते थे कि कानून के अंदर आदमी का संरक्षण कैसे किया जाए। उनके विचार ,सिद्धांत और सपने आज भी अधूरे हैं। वे चाहते थे कि गरीबी दूर हो पर अभी इसके बारे में बहुत कुछ किया जाना बाकी है। विधानसभा उपाध्यक्ष डाक्टर राजेन्द्र कुमार सिंह इस माहौल में कुछ ज्यादा ही भाव विभोर हो गए। उन्होंने कहा कि समाजवादी सोच के कारण वे परंपरागत रूप से विद्रोही स्वभाव के रहे। इसलिए वे हरदम सरकार से लड़ने के अंदाज में रहते थे। जब विंध्यप्रदेश का विलय मध्यप्रदेश में हो रहा था तब उन्होंने इसका विरोध किया था। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि श्री तिवारी की अष्टधातु की प्रतिमा रीवा में या विधानसभा परिसर में स्थापित की जाए। श्रीनिवास तिवारी के प्रति सम्मान का ये भाव स्वाभाविक है। श्री तिवारी भरी सभा में कहते थे कि श्री राजेन्द्र सिंह मेरे तीसरे बेटे समान हैं। जाहिर है इस आशीर्वाद का प्रतिफल देने का भाव श्री सिंह के मन में आना ही चाहिए। विधानसभा में श्रद्धांजलि आयोजन के इस संवाद में कुछ बातें निकलकर सामने आ रहीं हैं। निश्चित रूप से श्रीनिवास तिवारी इतने बड़े कद के नेता थे कि जीते जी तो उन्हें नजरंदाज करना संभव ही नहीं था। आज भी उन्हें भुलाना संभव नहीं है। जाहिर है कि मध्यप्रदेश के इतिहास में श्रीनिवास तिवारी का नाम हमेशा आदर के साथ याद किया जाएगा। इसके बावजूद कुछ बातें चिंतन करने योग्य हैं। श्रीनिवास तिवारी जब राजनीति में आए तब जमींदारी प्रथा मौजूद थी। जाहिर है कि नई पीढ़ी के युवकों में तब जमींदारी की आड़ में चलने वाले शोषण के प्रति घृणा का भाव हुआ करता था। इसके बाद साम्यवाद के हिंदुस्तानी संस्करण समाजवाद ने भी पूंजीपतियों के प्रति नफरत का भाव पल्लवित पोषित किया। गांधीवाद जरूर सेठों की पैरवी करता था लेकिन कांग्रेस का मौजूदा नेतृत्व तो चूं चूं का मुरब्बा था। गरीबी हटाओ का नारा देने वाली इंदिरा कांग्रेस मंच पर तो सेठों को गाली देती थी पर मंच की आड़ में वह पूंजीपतियों को पोषित करती रही । इसी ऊहापोह में श्रीनिवास तिवारी ने अपनी राजनीतिक सोच को जमीन पर उतारने का प्रयास किया। आज अजय सिंह सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि श्री तिवारी के स्वप्न अभी साकार नहीं हो पाए हैं। जाहिर है कि जो स्वप्न जमीनी बुनियाद पर न खड़े हों वे साकार हो भी कैसे सकते हैं।

    श्रीनिवास तिवारी अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में ही बहुत सारे विवादों में घिरे रहे। विधानसभा में जातिगत और क्षेत्रगत भेदभाव पर आधारित फर्जी नियुक्तियों को लेकर तो विधानसभा सचिवालय ने उनके खिलाफ प्राथमिकी तक दर्ज कराई थी। ये प्रकरण अभी लंबित है। उनके कार्यकाल के दौरान करोड़ों का मोसंबी जूस पिलाए जाने का घोटाला हो या सचिव सत्यनारायण शर्मा की उपस्थिति में गोलीकांड जैसे मामले सभी विधानसभा को कलंकित करते रहे। इसके बाद विधानसभा में फर्जी नियुक्तियों ने तो राजनीतिक हलकों में भारी कोहराम मचाया। आईएएस जे.एल.बोस ने इस मामले की जांच की तो उन्हें गंभीरता का अहसास हुआ। उन्होंने जब इस रिपोर्ट के बारे में सत्ताधीशों को बताया तो वे अचंभित रह गए। इसके बाद रहस्यमयी तौर पर कतिपय असामाजिक तत्वों ने उनसे रिपोर्ट भरी अटैची छीन ली और भाग गए। उन्होंने अपनी सिफारिश में किसी न्यायाधीश से इस मामले की जांच कराने की जरूरत बताई थी। जस्टिस शचीन्द्र द्विवेदी की अध्यक्षता में हुई न्यायिक जांच में ये घोटाला और भी गंभीर रूप में सामने आया। उनके असामयिक निधन से मामले पर पर्दा पड़ता नजर आने लगा। उन्होंने तथ्यात्मक जांच रिपोर्ट में मामले की प्राथमिकी दर्ज करने की सिफारिश की थी। इसके बावजूद ये मामला बरसों तक लंबित रहा। अंततः विधानसभा सचिवालय ने इस मामले में प्राथमिकी दर्ज कराई जिसके बाद आज भी ये मामला लंबित पड़ा है। विधानसभा के प्रमुख सचिव पद पर डा.ए.के.पयासी की नियुक्ति कैसे हुई ये गोलमाल आज तक लोगों को अचंभे में डाल देता है। शिक्षक से नगर निगम और फिर विधानसभा में उनका पहुंचना। इसी दौरान डिग्रियां पा लेना जैसे मामले सर्वज्ञात हैं। इसके बावजूद राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ने इस मामले पर पर्दा डाल रखा है। आज भी विंध्यक्षेत्र के ब्राह्मण जाति के लोग विधानसभा में भृत्य और मार्शल जैसे पदों से अपनी आजीविका चला रहे हैं। ये सब इसलिए क्योंकि तुरत नतीजे देने की ललक में श्रीनिवास तिवारी ने युवाओं को सरकारी नौकरियां देने की कांग्रेसी नीति का अनुकरण किया। बल्कि कहा जाए कि अपने नाते रिश्तेदारों को सरकारी नौकरियां दिलाने में उन्होंने लूट भरी नीति अपनाई। जिस पत्रकार ने उनका विरोध किया उसे उन्होंने विधानसभा परिसर में घुसने से प्रतिबंधित कर दिया। रीवा के माफिया तत्वों ने इस लूट का विरोध करने वाले अफसरों, कर्मचारियों को तरह तरह से प्रताड़ित किया। किसी को लूप लाईन में फिंकवा दिया तो किसी की सेवा पुस्तिकाएं बिगाड़ दीं। मध्यप्रदेश के इतिहास में इस तरह की लूट और अराजकता कभी नहीं देखी गई। दिग्विजय सिंह सरकार ये सब देखकर भी खामोश थी, क्योंकि दिग्विजय सिंह को अपने सारे काले कारनामों पर विधानसभा की मुहर लगवाना पड़ती थी।

    आज जो लोग मृत व्यक्ति को श्रद्धांजलि देने के नाम पर आदर व्यक्त कर रहे हैं उनकी बात तो समझी जा सकती है पर जो लोग श्रीनिवास तिवारी की परंपरा को अष्टधातु में ढालकर पीढ़ियों का मार्गदर्शन करने की बात कह रहे हैं उन्हें अपनी सोच पर पुनर्विचार करना चाहिए। आखिर हम नई पीढ़ी को क्या संस्कार देना चाहते हैं। लोगों को खुश करने के लिए उनकी मुंह पर मीठी बातें करने वालों को मिठलबरा कहा जाता है। किसी भी राजनीति का उद्देश्य यदि केवल लोगों को खुश करना और उनसे वोट पाना हो वह कभी देश और समाज के स्थापित लक्ष्यों को नहीं पा सकती। कांग्रेस की सरकारों ने इन कुसंस्कारों को संरक्षण दिया इसलिए वे रसातल में चलीं गईं। जिस भाजपा ने उनके कार्यकाल में उन गलत नीतियों का विरोध किया वह आज क्यों खामोश बैठी है ये बात जरूर चिंताजनक है। सरकार यदि विंध्य क्षेत्र के विकास के लिए काम कर रही है तो उसे श्रीनिवास तिवारी के पैदा किए गए माफिया गिरोह से डरने की जरूरत नहीं है। खुद विंध्य के बुद्धिजीवी इस माफिया गिरोह को कभी समर्थन नहीं देते थे। वे तो केवल इसलिए खामोश रहते थे क्योंकि उन्हें अपनी जानमाल की चिंता होती थी।

    माध्यमिक शिक्षा बोर्ड परीक्षा की नियंत्रक ताजवर रहमान साहनी को प्रताड़ित करने का मामला तब खूब सुर्खियों में आया था जब खुद श्रीनिवास तिवारी ने उन्हें अपने क्षेत्र के नकलचोर स्कूलों की मान्यता बहाल करने और रिजल्ट सुधारने के लिए धमकाया था। उसी रात रहस्यमय स्थितियों में श्रीमती साहनी की मौत भी हो गई थी। इस तरह के सैकड़ों किस्से मध्यप्रदेश की राजनीति में आज भी सुने सुनाए जाते हैं। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह सही कह रहे हैं कि विंध्य क्षेत्र की गलियां और चौपाल इस तरह के सैकड़ों आख्यानों से सराबोर हैं। इसके बावजूद आज के सत्ताधीश उनकी गलतियों से सबक क्यों नहीं लेना चाहते। यदि स्वर्गीय तिवारी जी की नीतियां मुखिया की छवि के अनुकूल होतीं तो क्या विंध्य क्षेत्र आज भी बेरोजगारी का दंश झेल रहा होता। मध्यप्रदेश की दिग्विजय सिंह सरकार बंटाढार साबित हुई होती। जरूरत है कि आज की राजनीति उन गलतियों से सबक ले, उन्हें दुहराने से बचे तभी हम आत्मगौरव की ओर बढ़ सकते हैं। ध्यान रहे भाजपा सरकार को भारत माता का वैभव अमर करने से लिए सत्ता में भेजा गया है। वह यदि इस लक्ष्य से भटककर सस्ती लोकप्रियता के फेर में पड़ी रहेगी तो प्रदेश की जनता उसकी भी परधनिया खोलने में देरी नहीं लगाएगी।

  • अंधों की आड़ में राजनीतिक पाखंड

    अंधों की आड़ में राजनीतिक पाखंड

    देश में पूंजीवाद के दरवाजे खोलने वाली कांग्रेस कल्याणकारी राज्य का पाखंड छोड़ने तैयार नहीं है। भोपाल में अंधों की पिटाई के बाद भी कांग्रेस का इसी तरह का स्यापा सामने आया। वोट बैंक की राजनीति करते हुए कांग्रेसी आज भी देश को गुमराह करने की नीतियां जारी रखे हुए है। जबकि पीवी नरसिम्हाराव ने इसी कांग्रेस में रहते हुए भारत के नवनिर्माण में जो योगदान दिया है उसे कभी नहीं भुलाया जा सकता। सबसे बड़ी बात तो ये कि उन्होंने कांग्रेस की तमाम बदमाशियों के बीच देश को पूंजीवाद के रास्ते पर ले जाने का करिश्मा कर दिखाया था। आजादी के बाद से नेहरू इंदिरा की कांग्रेस देश पर कल्याणकारी राज्य का पाखंड थोपती रही है। गरीबी हटाओ का नारा देने वाली इंदिरा गांधी ने तो गरीबी हटाओ के पाखंड तले गरीब बचाओ अभियान चला दिया। यानि लोग गरीब ही बने रहें ताकि हम गरीबी हटाओ की राजनीति करते रहें। कांग्रेस के शासनकाल में देश से गरीबी कभी नहीं हटी बल्कि करोड़पति घरानों के हाथों में देश की दौलत सिमटती गई। आज जब मोदी जेटली की जोड़ी देश को आर्थिक सुधारों की दौड़ में शामिल करने में जुटे हैं तब उन पर लांछन लगाए जा रहे हैं। इसके लिए कांग्रेसी डाक्टर मनमोहन सिंह तक का इस्तेमाल करने में नहीं चूक रहे। जबकि डाक्टर मनमोहन सिंह ने ही वित्तमंत्री रहते हुए भारत में पूंजीवाद का ड्राफ्ट तैयार किया था। अपने प्रधानमंत्रित्व काल में भी उन्होंने आर्थिक सुधारों पर अमल करने का प्रयास किया। इसके बावजूद बीस सालों की कसरत के बाद भी वे देश को पूंजीवाद के रास्ते पर नहीं चला सके। क्योंकि हर बार धूर्त कांग्रेसियों की गेंग उनके रास्ते में रोड़े खड़े कर देती थी। ये गेंग चुनाव हारने का भय दिखाती रहती थी। इस दोहरी मानसिकता की सजा भी कांग्रेस को भोगनी पड़ी। कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई।देश में समानांतर अर्थव्यवस्था के पैरवीकोर भाजपाई भी यही भूमिका निभा रहे हैं। कांग्रेसियों का मोदी को गाली देना स्वाभाविक है लेकिन भाजपाई जिस तरह से मोदी जेटली को कोस रहे हैं वह देखसुनकर उनकी मूर्खता पर हंसी आना स्वाभाविक है। नौकरी मांगने की जिद पर बैठे उकसाए गए अंधों ने जब अपनी जिद नहीं छोड़ी तो शिवराज सिंह चौहान की पुलिस ने उन्हें पकड़कर घर पहुंचा दिया। ये एक सकारात्मक कदम था। इसके बावजूद कांग्रेसियों और विचारशून्य पत्रकारों ने इसे अंधों की पिटाई और पुलिस बर्बरता बताकर सरकार को खूब लानतें भेजीं। ये आज भी मानने तैयार नहीं हैं कि पूंजीवाद का मतलब आर्थिक सुशासन होता है। इसमें समाज की उत्पादक शक्तियों के अलावा किसी को भी उत्पादन की प्रक्रिया में जगह नहीं दी जा सकती है। जिन नौकरियों के लिए सामान्य लोग और पढ़े लिखे सक्षम युवा बेरोजगार घूम रहे हैं उन नौकरियों पर अंधों को कैसे भर्ती किया जा सकता है। क्या ये खैरात बांटने वाले किसी रजवाड़े का शासन है। पूंजीवाद में अंधे हों या अनाथ बच्चे,मंदबुद्धि बालक बालिकाएं हों या बुजर्ग सभी के लिए व्यवस्थित केम्प में रखने की व्यवस्था दी गई है। अनाथालय,वृद्धाश्रम को बाकायदा बैलेंसशीट में स्थान उपलब्ध है।मंदबुद्धि बच्चों के पालन के लिए केम्प चलाने वालों को टैक्स में छूट का प्रावधान है। इसके लिए मनमानी नहीं बल्कि सुविचारित प्रक्रिया है। यदि कोई युवा अंधा है तो उसे नौकरी पर भेजने की क्या जरूरत है। क्या समाज इतना नाकारा है कि उनका पालन भी नहीं कर सकता है। उनके लिए बाकायदा गुजारे भत्ते की व्यवस्था करना समाज की जवाबदारी है। इसके बावजूद कांग्रेस के साथी और कुछ नादान पत्रकार अंधों को नौकरी दिए जाने की वकालत करते देखे जाते हैं। इनमें वही लोग प्रमुख हैं जिन्होंने किसी न किसी षड़यंत्र के तहत आर्थिक आजादी पाई है। समाज की उत्पादकता बढ़ाने के बजाए वे अधिकारों की बात करते हैं। बेशक अंधों, अनाथों, बुजुर्गों को जीवित रहने का अधिकार है। पर इसके लिए जरूरी नहीं कि वे जब नौकरी करेंगे तभी उन्हें जीने का हक मिलेगा। समाज को अब ये समझ लेना चाहिए कि नौकरी की खैरात बांटने का दौर अब बीत चला है। अनुत्पादक सरकारी नौकरियां बांटकर कांग्रेस की सरकारों ने देश का भट्टा बिठाल दिया। भाजपा की सरकारें भी इस कुशासन को नहीं बदल पा रहीं हैं। शिवराज सिंह सरकार ने यदि अंधों को धरने से उठाकर घर भेजा है तो ये सकारात्मक संदेश है।निःशक्तजनों के लिए सरकार की कई योजनाएं हैं वे उनका लाभ उठाएं और सुख के गीत गुनगुनाएं। किन्हीं षड़यंत्रकारियों के बहकावे में आकर अधिकारों की बहसबाजी न करें। यह संदेश आंखों से विहीन लोगों के साथ साथ दिमाग की आंखों से वंचित लोगों तक भी पहुंच गया होगा हम यही उम्मीद करते हैं।

  • भीमा कोरेगांव की आड़ में दलित एजेंडा

    भीमा कोरेगांव की आड़ में दलित एजेंडा

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    भारत की राजनीति में वोट कबाड़ने वाले मुद्दे सदैव छा जाते हैं। कांग्रेस ने जिस दलित वोट बैंक को अपने फायदे के लिए उकसाया था वो एक समय बेलगाम हो गया। कांसीराम ने इस वोट बैंक का महत्व समझा और देश की राजनीति में एक नई इबारत लिखी। अब जबकि दलितों के अधिकारों का मुद्दा समयातीत हो चला है तब उसे एक बार फिर गरमाने का प्रयास किया जा रहा है। भीमा कोरेगांव में दो सौ साल पहले जो अंग्रेज पेशवा भिड़ंत हुई थी उसमें पेशवाओं की फौज की टुकड़ी पीछे हट गई थी। ये युद्ध वास्तव में पेशवाओं की 28000 सेना से नहीं बल्कि अरब सैनिकों वाली 2000 की टुकड़ी से हुआ था। जब अंग्रेज पेशवाओं, होल्करों,सिंधियाओं, गायकवाड़ों को संधियों के माध्यम से तोड़ चुके थे और भारतीय दलितों और मुसलमानों को फौज में शामिल करके अपनी फौजें मजबूत बना चुके थे तब ये स्थितियां निर्मित हुईं थीं। ये जीवन भर अविजित रहने वाले बाजीराव पेशवा नहीं बल्कि उसके बाद पेशवा द्वितीय के दौर की घटना है।

    ये भारत में अंग्रेजी राज की स्थापना के दौरान हुए संघर्षों की भी कहानी है, जिसके बाद अंग्रेजी हुकूमत ने देश में मजबूती से अपने कदम जमाए थे। इसीलिए दलित राजनीति करके भारत में फूट की इबारत लिखी गई।भारतीय समाज वैसे भी चार हिस्सों में बंटा था। इसलिए बाद में कांसीराम के नेतृ्त्व में एकत्रित दलित इसे मनुवादी व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष का ऐलान कहते रहे। कांग्रेस ने भी अंग्रेजों की तरह फूट के इस गणित को समझा और भारत में अंग्रेजी राज के नए संस्करण की नींव रखी।तबसे वह हर बार यही प्रयास करती रही है कि दलित एजेंडा चलाकर फूट के बीज बोए। आज भारत में पेशवाओं की तरह पतन की दहलीज पर पहुंच चुकी कांग्रेस अपने जीवन का संघर्ष कर रही है। इसलिए वह जिग्नेश मेवाणी या उमर खालिद जैसे समाज को बांटने वाले नेताओं के सहारे दलितों को समाज की मुख्यधारा से काटने की कोशिश कर रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यदि सबका साथ सबका विकास के नारे का उद्घोष करते हैं तो कांग्रेस उमर खालिद जैसे नेताओं को संरक्षण देने की वकालत करती है जो भारत तेरे टुकड़े होंगे ईंशाअल्लाह जैसे नारे लगाते रहे हैं।

    भारत में दलित राजनीति का दौर बीत चला है, क्योंकि समाज में दलितों को लेकर कोई भेदभाव नहीं बचा है। इसके बावजूद नौकरियों और प्रमोशन में आरक्षण जैसे मुद्दों पर लूट का चक्र चलाने वाले दलितों को उकसाकर कांग्रेस अपना उल्लू सीधा करना चाह रही है। कांग्रेस को अपना भाग्य संवारने या बिगाड़ने का पूरा हक है। इसके बावजूद भाजपा को किसने रोका कि वह अपने ऐेजेंडे पर चलकर भारत का संपूर्ण विकास न करे। भाजपा ने अपने वास्तविक नेताओं के बीच से जिन फर्जी और कागजी नेताओं को सत्ता की बागडोर सौंपी है उनके चलते आज तक वैमनस्य की ये राजनीति समाप्त नहीं हो सकी है। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सबके विकास की बात तो करता है पर वो विकास उसी तबके का कर रहा है जो पहले से समृद्ध हैं। रिश्वतें दे सकने में सक्षम हैं। जिसके चलते विकास की दौड़ में पहले से पिछड़े लोग आज भी पिछड़ते जा रहे हैं। कांग्रेस ने सरकारी नौकरियों में जिन्हें जगह दी थी वही आज भी नौकरियां कब्जा रहे हैं। दलितों के नाम पर जिन फर्जी दलितों को नौकरियां दी गईं हैं वे अपने संसाधनों का वितरण सहधर्मी बंधुओं में नहीं कर रहे हैं। जाहिर है कि भेदभाव और असमानता का वही दौर आज भी जारी है जो कांग्रेस विरासत में छोड़ गई है। दलितों के सत्तासीन होने से भी ये हालात नहीं बदले। बल्कि शोषकों का एक नया तबका मैदान पर खड़ा हो गया जिसने संसाधनों का पूरा वितरण सोख लिया। देश में जिन जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं वहां उनके शासकों ने कांग्रेस की नीतियों में कोई बड़ा फेरबदल नहीं किया। ज्यादातर राज्यों में भाजपा ने कांग्रेस के पूर्व सत्ताधीशों से गलबहियां कर लीं और संसाधनों की लूट शुरु कर दी। महाराष्ट्र में भी यही सब हुआ है।शिवसेना को पछाड़ने के चक्कर में भाजपा ने दलितों के प्रति नरम रवैया अपनाना शुरु कर दिया। पर वे ये भूल गए कि दलित कभी हमारा या तुम्हारा नहीं होता। जब आप उसे दलित कह देते हैं तो वह केवल दलितों का ही होता है। भाजपा ने कांग्रेस को परास्त करने के लिए जो कांग्रेस की सोच को अपनाया है वही इस मौजूदा दंगों की वजह बन गयी है। अब उसे इन दंगाईयों से सख्ती से निपटना होगा। यदि भाजपा के नेता इन दंगों को कुचलने में कायमाब नहीं होते हैं और चोरी छुपे चलाए जा रहे दलित एजेंडे को पंचर नहीं करते हैं तो ये आग इसी तरह नए नए रूप में भड़कती रहेगी। देश ने भाजपा को विकास के लिए चुना है। जातिगत राजनीति को चलते रहने देने के लिए नहीं। मध्यप्रदेश में भी दंगे के इस गणित को फलित करने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन यहां उसके लायक खाद पानी नहीं है।

    भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को चाहिए कि वो समय रहते अपनी गलती सुधारे। उसे देश को जाति धर्म के आधार पर बांटकर देखने वाली नीति पर सख्त प्रतिबंध लगाना होगा। आने वाले चुनावों के चक्कर में वो समाज को बांटने वाली जिन नीतियों को छूना भी नहीं चाहती उनके समानांतर उसे तीव्र विकास की जंग छेड़नी होगी। तभी वह कांग्रेस की बोई खरपतवार का उन्मूलन कर सकती है। वैसे भाजपा का जन्म जिस फार्मूले पर हुआ था उस पर न चलकर वह पहले ही कांग्रेस की पूंछ पकड़ चुकी है। जाहिर है कि ऐसे में उसे कोई अवतारी नेतृत्व ही शुभ मार्ग पर ला सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आर्थिक सुधारों पर जो ध्यान लगाया है उसे असफल करने में जुटे व्यापारी और शोषक तबके को गियर में लिए बगैर सरकार इन घटनाओं को नहीं रोक सकती। उसे अपनी राज्य सरकारों के कान उमेंठने होंगे तभी वह सबको साथ लेकर देश की तस्वीर बदल सकेगी।

  • कांग्रेस के चीनी फार्मूले का पराभव

    कांग्रेस के चीनी फार्मूले का पराभव


    गुजरात में कांग्रेस के पराभव ने हिंदुस्तान में विदेशी राज की चूलें हिला दीं हैं। भारत में पैर जमाने वाले विदेशियों की पोल भी खुल गई और इसके बावजूद सत्ता नसीब न हो सकी। ये काम गुजरात में ही संभव था। किसी अन्य राज्य में ये दंगल हुआ होता तो भारत में विदेशियों का पंथ प्रशस्त हो गया होता। विदेशी शक्तियो ने एक बार फिर कांग्रेस के नेतृत्व में कथित सुधारवादी मुखौटे की आड़ में सत्ता संधान शुरु किया है। संघ और उससे जुड़े राष्ट्रवादियों को ये जानकर सुख का अहसास हो रहा है कि गुजरात में उनकी समर्थित सरकार बच गई। यही नहीं पिछले चुनाव की तुलना में उसे आठ फीसदी अधिक जन समर्थन भी हासिल हुआ है। इसके बावजूद ये चुनाव न केवल गुजरात बल्कि पूरे हिंदुस्तान के लिए खतरे की घंटी साबित हुआ है। अधिक मत मिलने के बावजूद भाजपा मौजूदा 116 सीटों में से भी केवल 99 सीटें हासिल कर सकी है। जबकि जीत के लिए उसे 93 सीटें चाहिए थीं।वहीं शोरशराबे और झूठे वादों की झड़ी लगाकर कांग्रेस 182 सीटों में से 77 जीत गई। जबकि पिछली बार उसके पास 61 सीटें थीं। पिछले चुनाव की तुलना में लगभग तीन फीसदी मतदान कम होने से भाजपा को क्षति पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा था जो सही साबित हुआ। भाजपा अपनी उम्मीदों से कम सीटें जीत सकी लेकिन इसके बावजूद जनता पर उसका भरोसा कायम रहा है।वहीं कांग्रेस तमाम तिकड़मों के बावजूद जनता का भरोसा नहीं जीत सकी। मत विभाजन से उसे वोट भी अधिक मिले और उसने सोलह सीटें भी अधिक पाईं हैं। बहुत सीटों पर हार जीत का अंतर भी कम हुआ है। इसकी वजह स्पष्ट ध्रुवीकरण है। लोगों ने भाजपा या कांग्रेस में से किसी एक को जिताने की कोशिश की जिसके चलते गुजरात में नियंत्रित मत विभाजन देखने में आया है। इस जीत में भाजपा के लिए कई संदेश छुपे हैं। सबसे बड़ा संदेश तो ये है कि भाजपा के सबका साथ सबका विकास के नारे ने विरोधियों को एकजुट कर दिया है। वे भाजपा को हराने के लिए किसी से भी हाथ मिलाने तैयार हैं। जमीन पर भाजपा के नेटवर्क की तुलना में कोई दल पासंग में नहीं ठहरता इसके बावजूद चुनावी रणनीति के बल पर वोट कबाड़ने में कांग्रेस कामयाब रही है। कांग्रेस ने पिछले कुछ सालों से संगठन को आऊटसोर्स करना शुरु कर दिया है। उसने भाजपा विरोधी देशी विदेशी ताकतों के सहारे संगठन खरीदने का भरपूर प्रयास किया, वो कामयाब भी हुई पर जीत नहीं पा सकी। गुजरात में पिछले कुछ सालों में सबसे अधिक चीनी कंपनियों का निवेश हुआ है। जीएसटी और नोटबंदी के बाद इन विदेशी कंपनियों की आर्थिक गतिविधियां उजागर होने लगीं हैं। तभी से इन कंपनियों ने गुजरात के बहाने मोदी सरकार को उखाड़ने की तैयारी की थी। बेरोजगार युवाओं के सहारे कांग्रेस ने हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश राठोर जैसे युवाओं को संगठन आऊटसोर्स किया। कांग्रेस ने इन युवाओं के जातिगत गणित के पीछे संगठन की रचना की। ये रणनीति पूरी तरह सफल हो सकती थी, लेकिन एन वक्त पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रौद्र रूप अपनाकर इस षड़यंत्र को कुचल डाला। इसमें संघ का जमीनी नेटवर्क, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की कुशल रणनीति, भाजपा कार्यकर्ताओं के बूथ मैनेजमेंट और भाजपा के तमाम जाने पहचाने मुद्दों का बड़ा योगदान रहा। भाजपा ने अपने लगभग सभी फार्मूले इस्तेमाल कर विदेशियों के षड़यंत्र को धराशायी कर दिया है। इन विदेशियों में सबसे प्रभावी भूमिका चीनी कंपनियों ने निभाई है। उन्होंने ही इस चुनाव में सबसे अधिक धन उपलब्ध कराया। वो तो सूरत के व्यापारियों की देशभक्ति और जिद थी जिसके सामने ये चाल नहीं चल सकी। जब भाजपा विरोधी षड़यंत्रकारी चिंतक चुनाव के दौरान कह रहे थे कि लड़कों ने मोदी को मैदान में उतरने पर मजबूर कर दिया तब वे उन विदेशी ताकतों की जय की इबारत लिख रहे थे। भाजपा को ये भी अहसास हो गया होगा कि विदेशी निवेश आकर्षित करने के चक्कर में उन्होंने कई वैश्विक शक्तियों का भी आव्हान कर लिया है। ये ताकतें हिंदुस्तान में एक कमजोर सरकार की आकांक्षी हैं। इसके लिए वे कोई भी कीमत देने को तैयार हैं। भाजपा को गुजरात के अनुभव के बाद अब पूरे देश में अपनी सरकारों पर नए तरीके से लगाम लगानी होगी। विकास की खजूर पर टंगी परिभाषा को जमीन पर लाना होगा। बड़े बांध,सड़कें, कारखाने और फ्लाईओवर लोगों का जीवन सरल तो बना सकते हैं पर रोजगार बिना वे भी असंतोष की वजह बन सकते हैं। कांग्रेस की नकलपट्टी करते हुए भाजपा की सरकारें जिस तरह लोगों को सरकारी नौकरियों का प्रलोभन दे रहीं हैं ये आगे चलकर कांग्रेस की ही तरह भाजपा के विनाश की वजह बनने जा रही हैं। भाजपा को ध्यान रखना होगा कि देश पूंजीवाद के मार्ग पर चल रहा है। इसलिए उसे लोगों को नौकर नहीं बादशाह बनाने के लिए तैयार होना होगा। उसे ध्यान रखना होगा कि नौकरशाही जिस तरह कांग्रेस के पतन की वजह बनी वही आगे चलकर भाजपा का नामोनिशान मिटाने की प्रमुख वजह भी बनेगी। भाजपा यदि लोगों को पैसा कमाने में मदद नहीं कर सकी तो उसका विकास का गुजराती माडल कभी भी दरक सकता है।

  • विकास की खंती को आदिकालीन कानून से भरने की कोशिश

    विकास की खंती को आदिकालीन कानून से भरने की कोशिश


    -आलोक सिंघई-
    बारह साल से कम उम्र की बेटियों से व्यभिचार करने वालों को फांसी की सजा से दंडित करने का कानून बनाकर शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने जनभावनाओं के समुंदर पर अपना परचम फहराने की कोशिश की है। इस काम के लिए सरकार को बारह साल लग गए। चित्रकूट के उपचुनाव के नतीजों ने सरकार को ये दिव्यज्ञान प्रदान किया कि जन आकांक्षाओं के ज्वार में टिके रहने के लिए किसी न किसी पतवार का प्रयोग करना अब जरूरी हो गया है। मुख्यमंत्री का ये तीर इतना तीखा था कि प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस भी धराशायी हो गई। उसके सामने मजबूरी थी कि वह इस दंड विधि संशोधन विधेयक का समर्थन करे। अब ये कानून मध्यप्रदेश विधानसभा ने पारित करके केन्द्र की ओर भेज दिया है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का कहना है कि उनके इस प्रयास को पूरे देश में समर्थन मिलना चाहिए। पूरा देश विचार करे कि वो समाज के आधे हिस्से के प्रति कैसा बर्ताव करना चाहता है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विधानसभा में लाए गए इस संशोधन विधेयक पर चर्चा करते हुए कहा कि स्त्री के प्रति पूरे देश में जो सम्मान का भाव रहा है वो हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है। हम स्त्री को देवी के रूप में पूजते हैं और मां के रूप में उसका आदर सम्मान करते हैं। ये बात सही है कि गाय और गौरी दोनों भारतीय संस्कृति की गौरवपूर्ण मिसालें रहीं हैं। भारत में स्त्री के साथ गाय को भी पूजा जाता है। इस संस्कार पर भारत के हर नागरिक को गर्व है। इसलिए सरकार ने जो नया कानून बनाया है वो जनभावनाओं से उपजा कानून है। संसद को चाहिए कि वो इस कानून पर विचार करे, अन्य राज्यों में इस पर चर्चा कराए और इसे सर्वसम्मति से पारित करवाकर उसे कानून की शक्ल प्रदान करे। भारतीय दंड संहिता में जो कानून बनाए गए उन पर इसी तरह विस्तृत विमर्श किया गया था। वो भी तब जबकि पूरे देश में संचार के आधुनिक साधन मौजूद नहीं थे। पहले किसी कानून को बनने में यदि बरसों लगते थे तो आज ये काम चंद दिनों में पूरा हो सकता है। जन संचार के आधुनिक साधन बरसों का काम चुटकियों में पूरा कर सकते हैं निश्चित तौर पर इस कानून के विमर्श की दिशा में शिवराज सिंह सरकार का ये प्रयास बड़ा महत्वपूर्ण कहा जाएगा। देश और समाज को न केवल स्त्री के प्रति अपने नजरिए को बदलना पड़ेगा बल्कि कई अन्य कानूनों पर भी देश में व्यापक विमर्श करने का वक्त अब आ गया है। वहीं जब देश ने 1991 में तय कर लिया कि वो अब पूंजीवाद के रास्ते पर चलेगा तो उसके लिए ऐसे तमाम कानून अप्रासंगिक हो गए जो कभी समाजवादी, साम्यवादी,या गांधीवादी सोच के बीच बनाए गए थे। स्त्री और पुरुष को समान मानना भी इसी दिशा का एक बड़ा बदलाव है। ये बात भी सही है कि स्त्री और पुरुष भले शारीरिक और मानसिक तौर पर भिन्न हैं पर वोट के धरातल पर उनकी कीमत एक समान है। उत्पादकता के धरातल पर भी उनका मूल्य एक समान है। इसके बावजूद जातिगत आरक्षण के समान लिंग आधारित आरक्षण भारतीय समाज की कड़वी हकीकत है। पूंजीवाद के मार्ग पर चलते समय हमें स्त्री और पुरुष को लिंगभेद से ऊपर उठकर उत्पादकता का समान उपकरण मानना जरूरी हो गया है। जाहिर है कि स्त्री को पुरुष के समान ही वेतन और लाभ दिए जाने जरूरी हैं। पूंजीवाद इसके साथ साथ स्त्री की उत्पादकता को भी जोड़ता है।उसे मातृत्व अवकाश, देर रात की पाली में सुरक्षा, शारीरिक भिन्नता के आधार पर काम में अंतर जैसी शर्तें लागू हैं पर आरक्षण जैसी असमानता को अनुपयोगी माना गया है। अब उस पर भी उत्पादकता को बरकरार रखने का दबाव आ गया है। इन हालात में स्त्री पुरुष की भूमिका में सांगोपांग विमर्श समय की जरूरत बन गया है। जो लोग कह रहे हैं कि इस नए कानून का दुरुपयोग,अनुसूचित जाति भेदभाव विरोधी कानून और स्त्री अस्मिता को बचाने के लिए बनाए गए पुराने कानूनों की तरह हो सकता है उनकी बात में दम है। इसके बावजूद वे भी पुरातनपंथी सोच के दायरे में ही विचार कर रहे हैं। दरअसल पूंजीवाद की राह अपना लेने के बाद हमें अपने तमाम कानूनों पर नए सिरे से विचार करना जरूरी हो गया है।क्योंकि उन कानूनों के प्रावधानों का अब औचित्य ही नहीं है। मध्यप्रदेश सरकार की सबसे बड़ी विफलता ये है कि पिछले चौदह सालों के कार्यकाल में उसकी सरकारों ने केवल आधारभूत ढांचे के विकास पर ही जोर दिया है। मंहगे कर्ज और प्रदेश के संसाधनों को भी अधो संरचना के नाम पर निछावर कर दिया गया। अब जबकि बेरोजगारों की फौज अराजकता पर उतर आई है तब सरकार इसे कानूनों के जाल से बांधने का निरर्थक प्रयास कर रही है। केन्द्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने सत्ता संभालने के बाद कहा था कि वो बेकार के कानूनों को हटा देगी। उसने इस दिशा में कई प्रयास भी किए। इसके बावजूद अब खुले समाज की ओर बढ़ते हिंदुस्तान को कानूनों की नई बेड़ियों में जकड़ने के जो प्रयास किए जा रहे हैं वे विकास की रफ्तार पर लगाम लगाने वाले ही साबित होने वाले हैं। अब तक भाजपा की सरकारों ने यदि देश को विकास पथ पर अग्रसर किया होता तो ये नौबत ही न आती। जिस समाज का साक्षात्कार विकास की ऊंची ऊंची अट्टालिकाओं से हो जाता है वो फिर लिंगभेद आधारित भेदभाव और शोषण की फिजूल फितरतों से ऊपर उठ जाता है। शिवराज सिंह सरकार का कानून बनाने का प्रयास फिलहाल मजबूरी में हाथ पांव मारने से ज्यादा कुछ नहीं कहा जाएगा। अभी इस कानून को लंबा रास्ता तय करना है। इसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिलनी है।संसद और न्यायपालिका की हरी झंडी मिलनी है। तब जाकर इसे भारतीय दंड संहिता में जगह मिल सकेगी। सबसे बडी बात तो ये है कि ये कानून यदि बन भी जाता है तो पूंजीवाद की ओर बढते देश में ये निरर्थक रहेगा। जो समाज पूंजी बनाने में जुट जाए उसे इतनी फुर्सत नहीं होती कि वह स्त्री पर अत्याचार करके अपना समय बर्बाद करे।उसके लिए तो स्त्री वैसे ही पूंजी उत्पादन का एक सहज उपकरण साबित होती है,जैसे पुरुष । देश के राजनेताओं को इस पर गहन चिंतन करना होगा तभी जाकर हम संतुलित समाज का लक्ष्य पा सकेंगे।

  • नोटबंदी पर खामोशी घातक

    नोटबंदी पर खामोशी घातक

    नोटबंदी का एक साल पूरा होने के बाद भी देश में तू तू मैं मैं का दौर चल रहा है। भारत जैसे विशाल देश में नोटबंदी का फैसला एक बड़ी चुनौती रहा है। डा. नरसिम्हाराव की सरकार ने जब 1991 में मुक्त बाजार व्यवस्था लागू की तब वह भयाक्रांत थी। उसे भय था कि इससे कहीं देश की जनता भड़क न जाए। आजादी के बाद से जो देश नियोजित की गई अर्थव्यवस्था का दंश झेल रहा हो भला उसे खुले आसमान की सर्द हवाएं कैसे बर्दाश्त हो सकती हैं।इसके बावजूद देश ने नरसिम्हाराव की मंशा को समझा और उनकी सरकार को अपना आशीर्वाद दिया। उनके वित्तमंत्री डा मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री बनकर उसी नीति को आगे बढ़ाया। व्यापारी और कारोबारी सभी खामोशी से इस बदलाव को देख रहे थे। इसकी वजह ये थी कि विकास के नाम पर आर्थिक जंजाल में फंसे देशवासियो को उम्मीद थी कि पूर्ववर्ती कांग्रेसी सरकारों ने जातिवाद, संप्रदायवाद के नाम पर जिन फोकटियों को उनके सिर लाद दिया है कम से कम अब उनसे मुक्ति मिल जाएगी। लेकिन आज नोटबंदी के एक साल पूरा होने पर वे महसूस कर रहे हैं कि उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका है। नोटबंदी लागू होने के बाद बाजार से पुराने नोट तो गायब हो गए पर नए नोट बाजार में सप्लाई नहीं हो पाए। यही वजह थी कि बाजार में चलने वाली रोजमर्रा की उपभोकता वस्तुओं के खरीददार ही नहीं बचे। एक झटके से घरों में रखा पैसा तो खाते तक पहुंचा पर नोट के अभाव में लोगों ने खरीददारी बंद कर दी। अब जबकि नोटबंदी के समर्थन में आंकड़े सामने आ गए हैं तब ये कहा जा सकता है कि नोटबंदी ने लाभ तो पहुंचाया पर उतना नहीं जितने का अनुमान था। इसके बावजूद आज कांग्रेस के साथ भाजपा के सद्सय भी सरकार और खासतौर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गाली दे रहे हैं।प्रधानमंत्री की ये बात भी सही है कि पहले केन्द्र सरकार एक रुपया भेजती थी तो 85 पैसे जनता तक पहुंचते थे। अब एक रुपया सीधा जनता के खाते में पहुंचता है। सबसे बड़ी बात तो ये कि समानांतर अर्थव्यवस्था में मौजूद काला धन अपने मालिक के नाम पर बैंकों में पहुंचा। लोगों ने भले ही फर्जी खातों से रकम जमा कराई हो पर अब उस रकम पर टैक्स वसूली का मार्ग प्रशस्त हो गया है। भाजपा को अपने इस महाअभियान पर लगातार बोलना चाहिए था। लोगों को बताना था कि वे बदली परिस्थिति में क्या करें। लोगों की कठिनाई दूर होती तो वे ही नोट बंदी के ब्रांड एंबेसेडर बन गए होते। वे ही नोटबंदी को सफल बनाते। भाजपा ने एक साल पूरा होने पर नोटबंदी के फायदे गिनाना शुरु किया है। राज्यों में शासन कर रही उनकी सरकारें भी नोटबंदी पर असमंजस के हालात से जूझ रहीं हैं। भाजपा की राज्य इकाइयों ने यदि समय रहते मैदानी मोर्चा संभाला होता तो उन्हें इन हालात का सामना नहीं करना पड़ता जिनसे देश आज जूझ रहा है। भाजपा को इन बदले हालात पर खुलकर जनता का साथ देना चाहिए। जनता का साथ पाने का इससे अच्छा मौका उसे फिर कभी नहीं मिल पाएगा। कमोबेश यही स्थिति जीएसटी की है। जीएसटी पर भी भाजपा बोलने से कतरा रही है। भाजपा कैडर बेस पार्टी है। इसके बावजूद उसका कैडर नोटबंदी और जीएसटी को समझाने में बुरी तरह असफल साबित हो रहा है।यदि उसकी जगह कांग्रेस की सरकार होती तो लोग अब तक उसके कार्यकर्ताओं को गली कूंचों में धुन रहे होते। भाजपा को अपनी पूरी क्षमता के साथ जनता से संवाद करना होगा। उसे अपने फर्जी और थोपे हुए नेताओं से मुक्ति पानी होगी। जमीनी नेताओं को विश्वास में लेना होगा। उन्हें नोटबंदी और जीएसटी पर प्रशिक्षण देना होंगे। तब जाकर उन्हें मैदानी मोर्चा संभालना होगा। अभी चुनाव को वक्त है।यदि समय रहते भाजपा ने अपना दायित्व ठीक तरह से निभाया तो उसे देश के जनमानस का वैसा ही प्यार मिलता रहेगा जैसा देश ने मोदी सरकार को चुनते वक्त बरसाया था।

  • मंहगी पड़ेगी सड़कों के बतंगड़ की साजिश

    मंहगी पड़ेगी सड़कों के बतंगड़ की साजिश


    -आलोक सिंघई-
    ठेठ देहाती किसान जब शहर जाता है तो वहां बिकते मठे को देखकर वो ये जरूर बोलता है कि इससे तो ज्यादा अच्छा हमारा गांव है जहां घर घर मही मिल जाता है। कुछ इसी तरह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अमेरिका के वाशिंगटन पहुंचकर जब वहां की खराब सड़कें देखीं तो बरबस बोल उठे कि इससे अच्छी सड़कें तो हमारे मध्यप्रदेश की हैं। उनकी इस प्रतिक्रिया को देश में गौरव के बोल समझा जा सकता था। आम नागरिक की प्रतिक्रिया यही होती कि हमारी सरकार ठीक दिशा में काम कर रही है। इसके विपरीत भारत के संवाद तंत्र के बतोलेबाजों ने सड़कों का बतंगड़ बना दिया। कुछ ने बगैर सोचे समझे इस सुर में अपने सुर भी मिला दिए। वे इस बतंगड़ के गुबार में छिपे साजिशकर्ताओं को नहीं पहचान पाए। कुछ ने तो पहचानने का जतन भी नहीं किया। राजनैतिक विरोधी होने का कथित धर्म समझकर कई बंधु मैदान में खम ठोकने भी जुट गए।

    जिन लोगों ने कांग्रेस की दिग्विजय सिंह सरकार का कुशासन करीब से देखा है वे भी मध्यप्रदेश में सड़कों के विस्तार से संतुष्ट नहीं हैं। होना भी नहीं चाहिए। प्रदेश में सड़कों की दुर्दशा भी कुछ यही है। बरसों के प्रयासों के बावजूद ऐसी ढेरों सड़कें हैं जो आज भी अपने निर्माण की बाट जोह रहीं हैं। इससे बड़ी संख्या उन सड़कों की हैं जिन पर सरकारी बजट की कुछ बूंदें हर साल गिरती हैं और मलहम पट्टी करके उन्हें चलने फिरने लायक बना दिया जाता है। वर्ष 2003 का विधानसभा चुनाव बिजली, सड़क और पानी के मुद्दे पर ही लड़ा गया था। कांग्रेस के बंटाढार मुख्यमंत्री दिग्गी का कहना था कि उनकी सरकार ने मानव विकास सूचकांकों पर ज्यादा ध्यान दिया इसलिए आधारभूत ढांचे के विस्तार के मामले में उनकी सरकार थोड़ा पिछड़ गई। जबकि हकीकत ये थी कि जाति, धर्म और वर्गों को बांटने में सिद्धहस्त कांग्रेस की सरकार ने पंचायती राज व्यवस्था जैसा नया शिगूफा छोड़ा था। गरीबी हटाओ के नारे पर हजारों करोड़ रुपए फूंक दिए थे। इसी तरह की ढेरों फर्जी योजनाओं पर जनता का बजट फूंक दिया गया और निर्माण कार्यों को कमीशन बाजी की भेंट चढ़ा दिया गया। मध्यप्रदेश की जनता ने इतनी नाकारा और बेशर्म सरकार इससे पहले नहीं देखी थी। नतीजतन उसने लगभग जन क्रांति के माध्यम से उस सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया। अपदस्थ दिग्गी को जेल भेजने का जनादेश उसके राघौगढ़ में जमा दौलत और रिलायंस जैसे समूहों में बेनामी निवेश के चलते हाहाकारी साबित हो सकता था। निर्माण की चुनौतियों से जूझने में लगी भाजपा की सरकारों ने विवाद बढ़ाने के बजाए निर्माण पर ज्यादा ध्यान दिया। नतीजतन आज मध्यप्रदेश की सड़कों की तस्वीर बदल चुकी है।

    भाजपा की सरकार ने सत्ता में आते ही 2004 में मध्यप्रदेश सड़क विकास निगम का गठन किया। इसका उद्देश्य खासतौर पर राज्य के राजमार्गों के निर्माण और उन्नयन के लिए किया गया था। प्रदेश की अधो संरचना के उन्नयन की जवाबदारी भी इसी निगम को दी गई। गठन के बाद से निगम ने 10039 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया है। अकेले निजी पूंजी निवेश से लगभग 5862 किलोमीटर लंबी सड़कें बनाई गईं। इन सड़कों के रखरखाव की जवाबदारी भी इन्हीं कंपनियों को दी गई। हालांकि सड़कों के साथ नालियां न बनाए जाने से हर बरसात में ये सड़कें भी क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। ठंड के सीजन में इसीलिए हर साल करोड़ों रुपए मरम्मत के नाम पर फूंकना पड़ते हैं।

    मध्यप्रदेश सड़क विकास निगम ने एशियन डेवलपमेंट बैंक से चार चरणों में 11000 लाख डॉलर का कर्ज लिया और ये सडकें बनवाईं। भारत सरकार की वीजीएफ योजना का भी खूब लाभ उठाया गया और मध्यप्रदेश सबसे ज्यादा वायबिलिटी केप फंडिंग पाने वाला राज्य बन गया। धड़ाधड़ लिए गए इन कर्जों से सरकार के पास इतना अधिक धन आया कि मध्यप्रदेश सड़क विकास निगम ने स्टेट डाटा सेंटर, मध्यप्रदेश सड़क विकास निगम का प्रशासनिक भवन, मुंबई का मध्यलोक भवन, नई दिल्ली का मध्यांचल भवन और मध्यप्रदेश भवन, क्रिस्टल आईटी पार्क जैसे भवन भी बना डाले। निगम की ओर से सिंगरौली में बीओटी योजना में एयरपोर्ट भी बनाया जा रहा है। निगम की आय से विदिशा, रतलाम, और शहडोल जिलों में चिकित्सा महाविद्यालयों, इंदौर में श्रमोदय विद्यालय भी बनवाए जा रहे हैं।

    अमेरिका की सड़कों की तुलना करने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बयान का बतंगड़ बनाने वालों की मंशा केवल इसी से भांपी जा सकती है कि वे जनता के बीच असंतोष के बीज बोकर सड़कों के नाम पर और भी ज्यादा कर्ज लेने की जरूरत जगाना चाहते हैं। सड़क विकास निगम ने अगले दस सालों की जो कार्ययोजना बनाई है उसमें राज्य के राजमार्गों की लंबाई बढ़ाकर 15000 किलोमीटर करना शामिल है। राज्य के बजट, मंडी बोर्ड और बहुपक्षीय एजेंसियों से जुटाए जाने वाले वित्तीय संसाधनों से सामान्य जिला मार्गों को मुख्य जिला मार्गों के रूप में उन्नयन किया जाना है। शहरों के ट्रेफिक से निपटने के लिए रिंग रोड बनाए जाने हैं। सभी मार्गों के लिए एकीकृत सड़क प्रणाली शुरु की जा रही है। जिसमें सभी सड़क निर्माण एजेंसियों की सड़कों को शामिल कर लिया गया है।

    गौरतलब है कि कांग्रेस के बंटाढार प्रदेश में भाजपा ने सत्ता में आकर आधारभूत संरचनाओं के विकास का महाअभियान तो चलाया लेकिन अब लोगों के सब्र का बांध टूटने लगा है। प्रदेश की जनता रोजगार, भोजन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मसलों पर सत्ता के खिलाफ लामबंद होने लगी है। आधारभूत संरचनाओं के विकास में रबड़ी पाने वाली एजेंसियां और उनके दलाल साफ तौर पर समझते हैं कि यदि इन जन आकांक्षाओं पर लगाम नहीं लगाई गई तो सड़कों के विकास के नाम पर अधिक कर्ज लेने का उनका अभियान ठंडा पड़ जाएगा। इसलिए इसी लाबी ने मुख्यमंत्री की एक सहज प्रतिक्रिया को जनता के बीच बखेड़ा बना दिया। सोशल मीडिया के बयानवीर हों या खुद को समर्पित समाजसेवी बताने वाले मीडिया कर्मी सभी एक सुर में दलालों की इच्छाओं में पंख लगाने जुट गए हैं। आज जब प्रदेश में कई हजार गुना मंहगी सड़कों का उद्देश्य उत्पादकता बढ़ाना होना था वहां आज पर्यटन जैसे खर्चीले अभियान को बढ़ावा दिया जा रहा है। जाहिर है ये उलटबांसी जन असंतोष की वजह बनने जा रही है,क्योंकि जनता की स्वतः स्फूर्त आय की भरपाई कोई भी सरकार एक रुपए के गेहूं चावल या दीन दयाल रसोई से नहीं कर सकती। भाजपा के रणनीतिकारों को ये अच्छी तरह समझ लेना चाहिए।

  • मुझे मेरी बन्डी मिल गईः संत हिरदाराम जी

    मुझे मेरी बन्डी मिल गईः संत हिरदाराम जी

    – सुरेश आवतरामानी –

    परमहंस संत हिरदाराम साहिब जी का 112 वां अवतरण दिवस 21 सितम्बर 2017 को है । इस शुभ अवसर पर अनायास संत जी से जुड़ी एक घटना का स्मरण हो आया है । वर्ष 1999 में आन्ध्र प्रदेश और ओड़ीसा के तटवर्तीय इलाकों में भयानक तूफान और मूसलाधार बारिश हुई थी फलस्वरूप समुद्र ने अपना तट छोड़ दिया था और उसका पानी रिहायशी इलाको में घुस आया था । इस प्रलयंकारी तबाही से बड़ी संख्यां में तटवर्ती इलाको के लोग काल क गाल में समा गये थे । हजारों की संख्या में पशु और पक्षी मर गये थे । चैतरफा विनाशकारी दृश्य फैला हुआ था । केन्द्र और राज्य सरकार अपने स्तर पर तो लोगों की मदद के लिये काम कर रही थीं, लेकिन वे प्रयत्न किंचित अपर्याप्त दिख रहे थे । बहुत सी स्वयंसेवी संस्थाएं भी इस प्राकृतिक आपदा की स्थिति से लोगों को उबारने के लिये प्रयत्नशील थीं ।

    उन दिनों मध्यप्रदेश में डाॅ. भाई महावीर राज्यपाल थे । एक दिन प्रातः महामहिम राज्यपाल ने राजभवन में मुझे बुलाकर परमहंस संत हिरदाराम साहिब जी के दर्शन करने की इच्छा प्रकट की तथा कहा कि कुटिया फोन करके संत जी से भेेंट का समय निर्धारित करवाएं । उन दिनों मैं महामहिम राज्यपाल के प्रेस अधिकारी के पद पर सेवारत था । राज्यपाल की आज्ञा के अनुसार मैंने सिद्ध भाऊ जी को फोन पर राज्यपाल की इच्छा से उन्हें अवगत कराया । सिद्ध भाऊ ने संत जी से आज्ञा लेकर अगले ही दिन प्रातः 9 बजे महामहिम राज्यपाल को कुटिया लेकर आने की बात कही । डाॅ. भाई महावीर और उनकी धर्मपत्नि श्रीमति कृष्णा कुमारी तथा उनके परिजन निर्धारित समय पर कुटिया पहुंचे । प्रोटोकाॅल की दृष्टि से कुटिया में राज्यपाल और उनके परिवार के लिये कुर्सियां लगायी गयी थी । सामने तानो के (स्टूल नुमा) एक छब्बे पर परम्परा अनुसार संत जी का आसन लगाया गया था। लेकिन महामहिम राज्यपाल ने उस समय दाहिनी टांग में साइटिका का असह्य दर्द होने के बावजूद भी संत जी के सामने जमीन पर बैठना पसंद किया । राज्यपाल से आग्रह के बाद भी उन्होनें कुर्सी पर बैठने के लिये विनम्रता पूर्वक इन्कार कर दिया । संत जी उस समय एक फटी हुई बंडी पहने हुए थे तथा नीचे एक अंगोछा बांधे हुए थे । महामहिम राज्यपाल के लिये यह एक आश्चर्यजनक प्रसंग था कि इतने बड़े सिद्ध पुरूष के तन पर कपड़े तक फटे हुए हैं । डाॅ. भाई महावीर ने संत जी से आग्रह किया कि वे उन्हें एक नई बंडी सिलवाकर देना चाहते हैं । राज्यपाल से यह सुनने पर संत जी थोड़ा मुस्कराए और कहा कि वे उनकी बंडी स्वीकार करेंगें पर उसके पहले उनकी एक शर्त है । संत हिरदाराम जी ने राज्यपाल से कहा कि ओड़ीसा और आन्ध्रप्रदेश के तटवर्ती इलाकों में प्रलयंकारी बाढ़ से हजारों की संख्या में लोग काल कवलित हो गये हैं । जो दुधमुहें बच्चे बच गये हैं, उनको पीने के लिये दूध तक भी उपलब्ध नहीं है । यूनीसेफ ने मिल्क पाउडर अहमदाबाद हवाई अड्डे पर पहुंचा दिया है लेकिन सामान का परिवहन करने वाला विमान तत्काल उपलब्ध न होने के कारण वह दूध भी भुवनेश्वर नहीं पहुंच पा रहा है । इसी प्रकार विवेकानन्द केन्द्र की दिल्ली शाखा के स्वयं सेवकों ने बड़ी संख्या में तम्बू और अन्य राहत सामग्री दिल्ली स्टेशन तक पहुंचा दी है। लेकिन दिल्ली स्टेशन पर खाली मालगाड़ी का प्रबंध न होने के कारण उस सामग्री का परिवहन भी नहीं हो पा रहा है । संत जी ने डाॅ. भाई महावीर को कहा कि यथासमय यह सामग्री यदि जरूरतमंदों को उपलब्ध नहीं होगी तो उन्हें किसी प्रकार की राहत नहीं मिल सकेगी । संत जी ने राज्यपाल से यह अपेक्षा की कि वे शासन और प्रशासन के शीर्ष स्तर पर अपने अच्छे संबंधों का उपयोग करते हुए अहमदाबाद विमान तल पर माल ढुलाई विमान और दिल्ली रेल्वे स्टेशन पर एक खाली माल गाड़ी का प्रबंध करवायें ।

    संत जी के दर्शन के बाद राज्यपाल, राजभवन वापस लौट आये और उन्होंने अविलम्ब तत्कालीन रेल मंत्री और नागरिक उड्डयन मंत्री से फोन पर बात की । दोपहर में अनकरीब 3 बजे सिद्ध भाऊ जी का गर्वनर साहब को एक फोन मिला, जिसमें सिद्ध भाऊ जी ने डाॅ. भाई महावीर को संत जी का संदेश दिया । भाऊ जी ने राज्यपाल को बताया कि संत जी ने कहा है कि उन्हें राज्यपाल की बन्डी मिल गयी है । वस्तुतः राज्यपाल द्वारा केन्द्रीय मंत्रियों से टेलीफोन पर बात करने के तुरंत बाद अहमदाबाद में एक कारगो विमान तथा दिल्ली स्टेशन पर एक खाली गाड़ी उपलब्ध करा दी गई थी और उनमें राहत सामग्री और मिल्क पाउडर आदि का लदान भी शुरू हो गया था । डाॅ. भाई महावीर को संत जी का यह विस्मयकारी संदेश मिलने पर वे अवाक रह गये । कुछ देर बाद उन्होंने कहा कि करने वाले तो स्वयं संत जी ही थे, इस प्रसंग में व्यर्थ में ही उनका नाम हो रहा है । डाॅ. भाई महावीर ने कहा कि आज के युग मे भी हमारे समाज में ऐसे महापुरूष विद्यमान हैं जिनके बल पर यह संसार चल रहा है ।

    संत की सीख

    यह बात वर्ष 2002 की है। उन दिनों डाॅ. भाई महावीर मध्यप्रदेश के राज्यपाल थे। वे महीने में कम से कम एक बार परमहंस संत हिरदाराम साहिब जी के दर्शन के लिए बैरागढ़ स्थित कुटिया में आया करते थे। डाॅ. भाई महावीर का राज्यपाल पद का कार्यकाल लगभग समाप्त होने वाला था। यह बात उन्होंने परमहंस संत हिरदाराम साहिब जी को बताई। इस पर संत जी ने तत्कालीन राज्यपाल को कहा कि इससे क्या फर्क पड़ता है कि आप गवर्नर रहें या न रहें, सेवा और सिमरन तो कहीं भी किया जा सकता है। इस बात पर डाॅ. भाई महावीर ने संत हिरदाराम जी को बताया कि वे राज्यपाल बनने के पहले दिल्ली के डी.ए.वी. स्कूल के प्राचार्य थे और उन्होंने अपना लगभग पूरा जीवन अध्यापन कार्य में बिताया है। इस पर संत हिरदाराम साहिब जी ने उन्हें कहा कि विद्यादान बहुत बड़ा काम है। राज्यपाल पद से निवृत्त के बाद भी आप पुनः विद्यादान के क्षेत्र में सेवा कर सकते हैं।

    इस पर डाॅ. भाई महावीर ने परमहंस संत हिरदाराम साहिब जी को बताया कि उनके स्वर्गीय पिता भाई परमानन्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। अंग्रेजों ने उन्हें क्रान्तिकारी गतिविधियों में लिप्त होने के कारण फांसी की सजा सुनाई थी लेकिन महात्मा गांधी और एनी बीसेन्ट के प्रयासों से बाद में अंग्रेजों ने उनकी सजा फांसी से बदलकर काले पानी में बदल दी थी। अंडमान निकोबार स्थित सेल्युलर जेल में आज भी भाई परमानन्द के कारावास काल के स्मृति अवषेष रखे हुए हैं। डाॅ. भाई महावीर ने संत हिरदाराम साहिब को बताया कि वे गुरू तेग बहादुर के समकालीन भाई मतिदास और भाई जतिदास के तेरहवें वंशज हैं। औरंगजेब द्वारा हिन्दुओं के सामुहिक धर्मान्तरण के लिए चलाई गई मुहिम में औरंगजेब ने दिल्ली के शीशगंज गुरूद्वारे के पास भाई मतिदास और भाई जतिदास को आरे से चिर वाकर मरवा डाला था।

    संत हिरदाराम साहिब जी डाॅ. भाई महावीर के इतने बड़े बलिदानी कुनबे के वंशज होने के संबंध में जानकारी मिलने पर वे एकदम मौन हो गए। परमहंस संत हिरदाराम साहिब जी को गुरू वाणी में अगाध श्रद्धा थी। दसों गुरूओं की श्रंखला में गुरू तेग बहादुर के समकालीन सहयोगी होने की बात सुनकर संत हिरदाराम साहिब जी अभीभूत हो गए और काफी देर तक आँखें मूंद कर गुरूओं का स्मरण करने लगे। डाॅ. भाई महावीर ने संत हिरदाराम साहिब जी को यह भी बताया कि वे दिल्ली में कड़कड़डूमा क्षेत्र में अपने स्वर्गीय पिता देवता तुल्य भाई परमानन्द की स्मृति में एक विद्यालय खोलना चाहते हैं। सरकार ने उन्हें इस प्रयोजन के लिए लगभग पौने दो एकड़ जमीन भी दे दी है। इस जमीन पर विद्यालय भवन निर्माण के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी ने षिलान्यास भी कर दिया है लेकिन धनाभाव के कारण वे उस विद्यालय भवन का निर्माण नहीं करवा पा रहे हैं। डाॅ. भाई महावीर के मुंह से यह बात सुनते ही संत हिरदाराम साहिब जी ने कहा कि किसी शुभ काम में धन की कमी आड़े नहीं आनी चाहिए। तब डाॅ. भाई महावीर ने उन्हें कहा कि वैसे तो विद्यालय का पूरा प्रोजेक्ट लगभग चार करोड़ रूपए का है, लेकिन उसके प्रथम चरण में कक्षा एक से बारहवीं तक की कक्षाओं का निर्माण करवाने पर लगभग एक करोड़ रूपए खर्च होगा। संत हिरदाराम साहिब जी ने यह सुनते ही श्रद्धेय सिद्ध भाऊ जी की तरफ देखते हुए उन्हें कहा कि वे विदेषों में अप्रवासी भारतीयों को डाॅ. भाई महावीर की पारिवारिक पृष्ठभूमि तथा समाज और देश के लिए उनके योगदान का उल्लेख करते हुए जानकारी भेजें तथा विद्यालय भवन निर्माण करवाने के लिए अपेक्षित धन का प्रबंध करने के प्रयास करें। संत जी द्वारा इतना भर कह देने के बाद उनके सेवाभावी शिष्य सक्रिय हो गए और बहुत थोड़े दिनों में विद्यालय भवन के प्रथम चरण के लिए अपेक्षित धनराशि का संग्रहण हो गया और बहुत ही जल्दी दिल्ली के कड़कड़डूमा क्षेत्र में यह विद्यालय भवन बनकर तैयार भी हो गया। इस बीच डाॅ. भाई महावीर मध्यप्रदेष के राज्यपाल पद से भी निवृत्त हो गए थे।

    कुछ महीनों बाद डाॅ. भाई महावीर पुनः परमहंस संत हिरदाराम साहिब जी के दर्शन के लिए कुटिया पधारे। संत जी ने डाॅ. भाई महावीर से कहा कि वे विद्यार्थियों की प्रातःकालीन प्रार्थना सभा में स्वयं उपस्थित रहा करें तथा उन्हें प्रतिदिन शाला आने के पहले अपने माता-पिता के चरणस्पर्श करके विद्यालय आने की सीख देवें। डाॅ. भाई महावीर ने बाद में ऐसा ही किया। वे प्रतिदिन अपने दिल्ली स्थित निवास न्यू राजेन्द्र नगर से कड़कड़डूमा स्थित स्कूल जाने लगे और प्रार्थना सभा में बालकों को अपने माता-पिता के चरणस्पर्ष करने के बाद स्कूल आने की सीख देने लगे। इस विद्यालय के बालकों ने जब ऐसा करने शुरु किया तो दिल्ली के उस मध्यम वर्गीय परिवारों के इलाके के अभिभावकोें ने अपने बच्चों के इस व्यवहार को महानगरीय संस्कृति और जीवन शैली से विपरीत कुछ बदला हुआ पाया। मध्यम वर्गीय परिवार के ये अभिभावक समझने लगे कि इस विद्यालय में आधुनिक शिक्षा के साथ ही उदात्त भारतीय जीवन मूल्यों की षिक्षा भी दी जा रही है। विद्यार्थियों के इस बदले हुए सकारात्मक आचरण से उनके माता-पिता बहुत प्रभावित होने लगे और बहुत ही जल्दी यह विद्यालय आस-पड़ोस के अन्य क्षेत्रों में काफी लोकप्रिय हो गया। उसका नतीजा यह निकला कि इस विद्यालय ने एक वर्ष के अन्दर ही अपनी पूर्ण क्षमता दो हजार विद्यार्थियों के प्रवेश की पूरी कर ली ।

    परमहंस संत हिरदाराम जी द्वारा अपने जीवनकाल में बैरागढ, भोपाल में शुरु किए गए मिठी गोविन्दराम स्कूल के बालकों को भी प्रतिदिन अपने माता-पिता के चरणस्पर्श करने के बाद विद्यालय आने की सीख दी जाती है। कुछ दिनों के बाद संत हिरदाराम साहिब जी ने डाॅ. भाई महावीर से जानकारी चाही कि क्या उन्हें विद्यालय संचालन के लिए और अधिक धन की आवश्यकता है? इस पर उन्होंने संत जी के सम्मुख हाथ जोड़ लिए और कहा कि आपके द्वारा दी गई सीख पर अमल करने का यह परिणाम निकला है कि अब हमारे स्कूल में प्रवेश के बहुत सारे इच्छुक विद्यार्थियों को वापस लौटाने की नौबत आने लगी है। उन्होंने बताया कि यह स्कूल अपनी क्षमता से भी अधिक भर गया है और अब स्कूल प्रबंधन को धन की कोई कमी नहीं है। स्कूल की भावी योजनाएं वे स्कूल द्वारा ही अर्जित राशि से कार्यान्वित कर सकते हैं। डाॅ. भाई महावीर ने कहा कि संतों की सीख सदा सुखकारी और कल्याणकारी होती है। (आलेख-सुरेश आवतरामानी)

    पक्षियों को दाना-पानी

    दान करने से धन बढ़ता है परंतु दान भी पात्र व्यक्ति के पास जाए तो उसका लाभ है, अपात्र व्यक्ति को दिया हुआ दान भी निरर्थक है। वनों की कटाई तथा सरोवरों के सूख जाने के कारण पक्षियों की अनेक प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। पशु-पक्षी भूख, प्यास और उष्मा के दुष्प्रभाव से मर रहे हैं। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हो रही जीव हत्या के लिए मनुष्य ही जिम्मेदार है। पक्षी अपना पूरा जीवन जी सकें इसके लिए मनुष्य को ही पहल करनी होगी। प्रत्येक परिवार में यदि बच्चे प्रतिदिन घर की छत पर एक सकोरा पानी तथा थोड़ा अन्न रखें तो उनके अंतर्मन से निकलने वाले आषीर्वाद उन बच्चों के जीवन को ही बदलने का सामथ्र्य रखते हैं। जैसे मूल्यहीन वस्तु अनुपयोगी मानी जाती है वैसे मूल्यहीन जीवन का भी कोई उद्देश्य नहीं होता। जो बच्चे बचपन से पक्षियों को दाना-पानी देते हैं उनके बाल हृदय में करूणा के भाव उत्पन्न होते हैं। आज कल प्रायः यह दिखता है कि संवेदनशीलता की कमी के कारण लोग सड़क पर पड़े घायल व्यक्ति की मदद के बजाय मुंह मोड़ कर चले जाते हैं। जिस हृदय में दर्द नहीं है वह किसी आत्मीय जन की पीड़ा हरने में भी कितना काम आएगा।
    जीवन जीने का अधिकार मनुष्यों के साथ ही पषु-पक्षियों को भी है। मनुष्य तो अपने इस अधिकार की रक्षा पशु-पक्षियों का जीवन लेकर भी करता है। परन्तु ये मूक जीव अपने जीवन की रक्षा भी नहीं कर पाते। ऐसे में हमारे परिवारों के सुसंस्कृत बच्चे यदि पक्षियों के संरक्षण का बीड़ा उठा लें तो वे न केवल एक प्रजाति को विलुप्त होने से बचा लेंगे बल्कि अपना लोक-परलोक भी सवार लेंगे। हमारी पुरातन परम्पराओं में यह सिखाया गया है कि ‘‘पर हित सरस धरम नहीं भाई‘‘ अथवा ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः‘‘। इन उदात्त जीवन मूल्यों और संस्कारों से ही न केवल मानव मात्र बल्कि इस ब्रह्माण्ड के जैविक संसार का भी हित निहित है। दान को गुप्त रखने की बात कही गई है। गुप्त दान का प्रभाव मनुष्य के जीवन को सुखमय करने का सामर्थ्य रखता है। पक्षी मूक होते हैं, उनकी क्षुद्धा को तृप्त करने के लिए किया गया दान भी गुप्त ही रहता है। पक्षियों को किया गया दान भी मनुष्य के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।

  • छात्रवृत्ति जिसे दें उसका आधार नंबर लिखेंःआर्य

    छात्रवृत्ति जिसे दें उसका आधार नंबर लिखेंःआर्य

    भोपाल,23 अगस्त(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।
    अनुसूचित जाति कल्याण राज्य मंत्री लाल सिंह आर्य ने निर्देश दिये हैं कि विभाग की सभी छात्रवृत्ति योजना को आधार नम्बर से लिंक किया जाये। उन्होंने निर्देश दिये कि विभाग में सामग्री खरीदी जेम के माध्यम से ही हो। श्री आर्य आज अनुसूचित जाति कल्याण विभाग की गतिविधियों की समीक्षा कर रहे थे। इस मौके पर प्रमुख सचिव आशीष उपाध्याय और आयुक्त श्रीमती दीपाली रस्तोगी उपस्थित थी।

    विभिन्न योजनाओं का कम्प्यूटर डॉटाबेस तैयार किया जाये

    श्री आर्य ने कहा कि अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के बच्चों के लिये संचालित विभिन्न योजना का डॉटाबेस तैयार किया जाये। योजनाओं का कम्प्यूटर के माध्यम से ऐनालेसिस हो। उन्होंने निर्देश दिये कि मुख्यमंत्री बच्चों से सीधा संवाद स्थापित कर सके, ऐसी व्यवस्था बनाये। इसके लिये सूचना प्रौद्योगिकी विभाग से सहयोग लिया जाये।

    श्री आर्य ने विभिन्न योजनाओं में जिला स्तर पर की गई कार्यवाही की मॉनीटरिंग को कहा। उन्होंने कहा कि इस संबंध में कलेक्टर, संभागीय अधिकारी और जिला संयोजक को पत्र जारी किया जाये। श्री आर्य ने निर्देश दिये कि पिछले वर्ष अस्पृश्यता निवारणार्थ किन पंचायतों का सम्मान किया गया और इस वर्ष कौन-सी पंचायतों का चयन किया गया है, इसकी जानकारी मंगवाई जाये। उन्होंने अस्पृश्यता निवारण शिविर की जानकारी भी एकत्रित करने को कहा।

    सोशल मीडिया के जरिये उपलब्धि का हो प्रचार-प्रसार

    श्री लाल सिंह आर्य ने विभाग की उपलब्धियों को सोशल मीडिया के जरिये प्रचारित करने के निर्देश दिये। उन्होंने अनुसूचित जाति और आदिम जाति कल्याण विभागों की योजनाओं की उपलब्धियों और लाभार्थियों की संख्या आदि का प्रचार-प्रसार करने को कहा। उन्होंने विशेष अवसरों का एक वार्षिक रूट चार्ट तैयार करने के निर्देश भी दिये।

    क्रीड़ा महाकुंभ या ओलपिंक जैसे कार्यक्रम की शुरूआत

    राज्य मंत्री श्री आर्य ने लोकप्रिय खिलाड़ी से समारोह में खेलकूद गतिविधियों के उत्कृष्ट खिलाड़ियों का सम्मान करवाने को कहा। उन्होंने खेल प्रतिभाओं को निखारने के लिये राज्य स्तर पर बड़े शहरों में क्रीड़ा महाकुंभ या ओलपिंक जैसे कार्यक्रम की शुरूआत करने को कहा।

    दो से 5 अक्टूबर स्वच्छता और वृक्षारोपण के होंगे कार्यक्रम

    श्री आर्य ने दो अक्टूबर महात्मा गाँधी जयंती से 5 अक्टूबर महर्षि वाल्मीकी के प्रकटोत्सव तक छात्रावास और आश्रम शालाओं में स्वच्छता अभियान और वृक्षारोपण का अभियान चलाने के निर्देश दिये। उन्होंने अभियान में स्थानीय जन-प्रतिनिधियों को भी जोड़ने को कहा।

    बाल संसद शुरू करने के निर्देश

    श्री आर्य ने नेतृत्व विकास शिविर में भारत या मध्यप्रदेश दर्शन कार्यक्रम को जोड़ने के निर्देश दिये। साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत, ‘राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका’ विषय पर बच्चों की बाल-संसद शुरू करने को भी कहा। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर के विषय पर वाद-विवाद प्रतियोगिता करने और डाक्यूमेन्ट्री फिल्म दिखाने के निर्देश दिये।

    अधिकारियों की तरह कर्मचारियों का भी हो प्रशिक्षण

    राज्य मंत्री श्री लाल सिंह आर्य ने इस साल का अधिकारियों का प्रशिक्षण प्रशासन अकादमी के माध्यम से करवाने को कहा। उन्होंने ग्वालियर, जबलपुर, इंदौर और भोपाल में जिला स्तरीय कर्मचारियों का प्रशिक्षण करने को भी कहा। उन्होंने स्व-सहायता समूह को ऋण देने के पूर्व प्रशिक्षण देने की योजना भी तैयार करने के निर्देश दिये। श्री आर्य ने अनुसूचित जाति कल्याण विभाग में अमले की कमी की पूर्ति करने के लिये आदिम जाति कल्याण विभाग से अमला लेने का प्रस्ताव देने को कहा।

    निर्माणाधीन भवनों के कार्यों की होगी समीक्षा

    श्री आर्य ने अनुसूचित जाति-जनजाति की विद्यार्थियों को आवास सहायता योजना को लोकसेवा गारंटी से जोड़ने और विभागीय छात्रावास का मूल्यांकन करवाने को कहा। श्री लाल सिंह आर्य ने पीआईयू के जरिये बनाये जा रहे भवन निर्माण की प्रगति और समय-सीमा की जानकारी के साथ समीक्षा बैठक करने को कहा।

    बताया गया कि अंतर्जातीय विवाह प्रोत्साहन योजना में वर्ष 2016-17 में 110 जोड़ों को लाभान्वित किया गया। वर्ष 2015-16 में 152 स्व-सहायता समूह को लाभान्वित किया गया। पीआईयू के जरिये 120 छात्रावास भवन बनाये जा रहे हैं। ऑनलाइन पद्धति के जरिये लगभग 22 लाख विद्यार्थियों को प्री और पोस्ट मेट्रिक छात्रवृत्ति दी जा रही है।

  • शिवलिंग के बहाने लड़कियों की सोच पर कुठाराघात

    शिवलिंग के बहाने लड़कियों की सोच पर कुठाराघात

    भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रवादी सोच को लेकर सत्ता में पहुंची है। इसके बावजूद पार्टी के कई पुरातनपंथी आज भी राजनीति में धर्म की मिलावट करने से बाज नहीं आ रहे हैं। उन्हें लगता है कि यदि उन्होंने जनता को धर्म की अफीम नहीं चटाई तो शायद वह दुबारा कांग्रेस की ओर मुड़ जाए और भाजपा को फिर निर्वासन झेलना पड़े। शायद यही कारण है कि सत्ता के गलियारों में यदा कदा धार्मिकता का बुखार महामारी बनकर उभरता रहता है। इसका लाभ लेने के लिए तैयार अवसरवादी कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते और वे धर्म में आस्थाएं दर्शाकर खुद को सरकार का हनुमान बताने में जुट जाते हैं। कुछ इसी तरह की पहल भोपाल में लड़कियों के एक सरकारी स्कूल की प्रिंसिपल ने कर डाली। मध्यप्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग की धींगामुश्ती के बीच भोपाल के इस सरकारी स्कूल में पोस्टिंग करवा लेने में सफल प्राचार्या निशा कामरानी को अपनी उपयोगिता सिद्ध करने की जल्दी पड़ी थी। सत्ताधारी दल के कतिपय बड़े नेताओं की कृपा से इस स्कूल में पदस्थ हुईं प्राचार्या ने अपनी स्वामिभक्ति दिखाने के चक्कर में सरकार की सोच की पोल खोल दी। उसने बालसभा कार्यक्रम के अंतर्गत मिट्टी के शिवलिंग बनाने की पूजा आयोजित कर डाली। बाकायदा पंडितजी बुलाए गए। हवन हुआ। लाऊडस्पीकर पर विधिविधान से हुई पूजा छह घंटे चली। इस दौरान छात्राएं और शिक्षिकाएं पूजा में शामिल हुईं। हालांकि स्कूल की मुस्लिम शिक्षिका और छात्राओं ने पूजा में शामिल होने से साफ इंकार कर दिया। इस पर उन्हें एक अलग कमरे में बिठा दिया गया।

    पूजा संचालन का माईक प्राचार्या महोदया ने संभाल रखा था। उन्होंने लड़कियों से कहा कि यदि वे विधि विधान से शिवलिंग बनाएंगी तो परीक्षा में पास हो जाएंगी और उन्हें जल्दी नौकरी मिल जाएगी।लड़कियों से कहा गया कि वे आम की पत्तियों को अंगूठी मानकर अपनी उंगली में धारण कर लें। छात्राओं से सूत के कलावे का स्पर्श करवाकर कहा गया कि भगवान ने उनकी भेंट स्वीकार कर ली है। अब पूजा में शामिल सभी छात्राएं आसानी से पास हो जाएंगी।उन्हें सुंदर जीवन भी मिल जाएगा।इस पूजन कार्यक्रम के लिए लड़कियों से चंदा जुटाया गया था। एक शिक्षिका के रिटायरमेंट का आयोजन भी पूजा के बाद किया गया। जिसमें भोज का चंदा भी छात्राओं ने जुटाया था। इसके लिए शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और भाजपा के स्थानीय नेताओं को भी आमंत्रित किया गया था। प्राचार्या महोदया ने बाकायदा अपने मोबाईल फोन से मैसेज भेजकर ये आमंत्रण वितरित किए थे। हालांकि कई अधिकारियों ने बहाने बनाकर आयोजन से बच निकलने की जुगत भी भिड़ा ली।
    इस संबंध में जब प्राचार्या महोदया से पूछा गया कि हिंदू तुष्टिकरण करने वाले इस गैर संवैधानिक कार्य के लिए उन्होंने किससे अनुमति ली थी तो उन्होंने कहा कि मैंने तो सभी अधिकारियों और नेताओं को सूचित किया था। सभी ने सहमति जताई थी,लिखित अनुमति आने में समय लगता इसलिए मैंने शिक्षिकाओं के सहयोग से ये आयोजन कर लिया।हालांकि इस दौरान उन्होंने संवाददाता का मोबाईल कैमरा छीन लिया और कहा कि यदि उनकी ये बातें जनता के बीच आ जाएंगी तो दंगा हो जाएगा। स्वयं प्राचार्या निशा कामरानी ने कहा कि इस आयोजन से चमत्कार हुआ है और स्कूल में प्रेम का वातावरण निर्मित हो गया है। अब हम भविष्य में ईद मिलन समारोह भी आयोजित करेंगे। उनसे पूछा गया कि आप साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण फैलाकर आखिर छात्राओं को क्या शिक्षा देना चाहती हैं तो उन्होंने कहा कि हम तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान को बल देने के लिए उन्हें आध्यात्मिकता से जोड़ने का प्रयास कर रहे थे। इस दौरान लड़कियों ने जो शिवलिंग बनाए उनसे उनकी रचना धर्मिता सामने आई है।

    प्राचार्या निशा कामरानी से जब पूछा गया कि आप इस पूजा को जिस तरह परीक्षा पास करने और नौकरी पा लेने का फार्मूला बता रहीं थीं वो कैसे संभव है। इस पर उन्होंने जवाब दिया कि पूजा विधान की प्रक्रिया से लड़कियों को आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं से दूर रखने का प्रयास किया गया है। आजकल लड़कियां असफलताओं के कारण आत्महत्याएं कर रहीं हैं इसलिए उन्हें पूजा के माध्यम से खुद को भगवान के सुपुर्द करने की शिक्षा दी गई है। यदि वे अपने कर्म का श्रेय भगवान के सुपुर्द करना सीख जाएंगी तो उन्हें बेवजह असफलता का तनाव नहीं झेलना पड़ेगा।

    भारतीय दर्शन में विद्या को मुक्तिदाता बताया गया है। संस्कृत में इसे …. या विद्या सा मुक्तये …..कहा गया है। बच्चों की तर्कशक्ति और सवाल पूछने की शक्ति को बढ़ाने के लिए ……..विज्ञान आओ करके सीखें ………के वाक्य तमाम स्कूलों में लगाए जाते हैं। प्रख्यात शिक्षाविद इवान इलिच ने तो शायद इसीलिए……. डी स्कूलिंग सोसायटी….. पुस्तक लिखकर ये जताने का प्रयास किया कि स्कूल विद्यार्थियों की मौलिकता को कुचल देते हैं इसलिए स्कूलों को भंग कर देना चाहिए। इसके बावजूद भोपाल के कमला नेहरू स्कूल में छात्राओं को …..जान लेने …..के बजाए …..मान लेने…. की शिक्षा दी जा रही है। ये बात तो इसलिए उजागर हो गई क्योंकि राजधानी में शिक्षा के कारोबार को जानने बूझने वाले लोग आसानी से उपलब्ध हैं। जाहिर है कि भक्तों की नाकारा फौज तैयार करने में जुटे प्रदेश के हजारों स्कूलों में क्या चल रहा है ये इस घटना से आसानी से समझा जा सकता है।

    जब प्राचार्या से कहा गया कि आपने स्कूल में पूजा और शिवलिंग निर्माण का आयोजन करके गैर संवैधानिक अपराध कर डाला है। संविधान में धर्म निरपेक्षता का प्रावधान इस उद्देश्य से डाला गया है कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से धार्मिक मान्यताओं को मानने की तो आजादी है लेकिन सार्वजनिक तौर पर उन्हें सर्व धर्म समभाव रखना होगा। इसी कानूनी बाध्यता के कारण देश की सरकार सबका साथ सबका विकास का नारा लेकर चल रही है। इस पर प्राचार्या महोदया ने कहा कि कुछ लोग उनके खिलाफ षड़यंत्र कर रहे हैं। इसमें कुछ पत्रकार भी शामिल हैं । इनके बारे में वे सब जानती हैं और समय आने पर उनके नाम उजागर करेंगी।जब उनसे पूछा गया कि नाबालिग बच्चियों को वे संघर्ष के लिए तैयार करने के बजाए समर्पण की सीख क्यों दे रहीं हैं। तो उन्होंने कहा कि उन पर भगवान की विशेष कृपा है इसलिए वे विरोधियों के जाल से हमेशा बच जाती हैं।

    प्राचार्या निशा कामरानी शासकीय नौकरी में आने के बाद से लगातार विवादों में घिरी रहीं हैं। सिक्किम के नवोदय विद्यालय जाने और वापस आने की कहानी भी उनकी जुगाड़ गाथा को समृद्ध बनाती है। माननीय उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस राजेन्द्र मेनन ने अपने फैसले में उन्हें अयोग्य पाया था। इसके बावजूद उन्होंने एक बार फिर राजधानी के प्रमुख स्कूल के प्राचार्य को धकियाकर ये कुर्सी कबाड़ ली। स्कूल शिक्षा विभाग के लगभग बीस अधिकारियों कर्मचारियों के विरुद्ध वे शिकायतें कर चुकीं हैं। एक शिकायत को तो पुलिस ने प्राथमिक जांच के बाद न केवल नस्तीबद्ध किया बल्कि निशा कामरानी को फटकार भी लगाई कि वे शिकायतें करने से पहले अपने गिरेबान में झांककर जरूर देखें।

    बालीवुड की चर्चित फिल्म है ….चांदनी चौक टू चायना… इस फिल्म का हीरो सिद्धू (अक्षय कुमार) आलू को अपना भगवान मानकर उसकी पूजा करता है। जब कुछ चीनी गुंडे उसे पीटते हैं तो वह अपने उस आलू भगवान से विनती करता है कि वो उसे गुंडों से बचाए। तब भगवान तो प्रकट नहीं होते बल्कि एक चीनी नागरिक जो निर्वासन भोग रहा था वो आकर उसे बचाता है। इसके बाद वह हीरो को युद्धकला में इतना पारंगत बना देता है कि हीरो सिद्धू उस चीनी माफिया का नाश कर देता है।

    आज जब एक बार फिर चीनी सेनाएं सीमा पर खड़ीं हमें युद्ध के लिए ललकार रहीं हैं तब मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार के स्कूल अपने विद्यार्थियों को ईश्वरवादी बनाकर चुनौतियों से भागना सिखा रहे हैं। हथियार डाल देने वाली ये सोच भला चीनी सेनाओं का मुकाबला कैसे कर पाएगी। सरकार की इस सोच के बारे में जब शिक्षा मंत्री विजय शाह की प्रतिक्रिया जानना चाही तो उन्होंने चुप्पी साध ली। स्कूल शिक्षा विभाग के आयुक्त नीरज दुबे से जब इस संबंध में पूछा गया तो उन्होंने ये कहकर पल्ला झाड़ लिया कि उन्हें इस घटना की जानकारी ही नहीं है। जिला शिक्षा अधिकारी ये कहकर बच निकले कि उन्हें क्यों झगड़े में फंसा रहे हो। दरअसल में शिवराज सिंह सरकार का पूरा शिक्षा तंत्र नई पीढ़ी को लाचार और असहाय बनाने पर तुला हुआ है। प्रदेश की नई पीढ़ी शिक्षा माफिया के हाथों लूटी जा रही है। डिग्रियां कबाड़ने में जुटे युवा बेरोजगारी झेलने के लिए अभिशप्त हैं। जबकि हर असफलता का ठीकरा कांग्रेस की पूर्ववर्ती भ्रष्ट सरकारों पर थोपने में सिद्धहस्त हो चुके भारतीय जनता पार्टी के नेतागण अपनी जवाबदारी स्वीकारने को तैयार ही नहीं हैं। प्रदेश को लगातार कर्ज के दलदल में धकेलने में जुटी ये सरकार सवाल खड़े करने वाले युवाओं से घबराती है ।शायद इसीलिए षड़यंत्र पूर्वक निशा कामरानी जैसी प्राचार्या को राजधानी के प्रमुख स्कूल में तैनात करके ये माडल वह प्रदेश के अन्य स्कूलों के लिए भी प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही है। इस स्कूल से निकली छात्राएं जिन 1400 घरों में जाकर संघर्ष की जगह समर्पण का भाव जगाएंगी वहां एक लाचार समाज ही तो जन्म लेगा। सरकारी योजनाओं के लिए कर्ज का साम्राज्य चलाने वाले विदेशी सूदखोरों का भी शायद यही उद्देश्य है जिसे शिवराज सिंह सरकार बखूबी पूरा कर रही है।

  • शिवलिंग के बाद अब छात्राओं की फैशन परेड

    शिवलिंग के बाद अब छात्राओं की फैशन परेड

    प्राचार्या ने पत्रकार का कैमरा छुड़ाया,बोलीं मंत्रियों से करीबी नाता
    भोपाल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।राजधानी के सरकारी स्कूल में छात्राओं से मिट्टी के शिवलिंग बनवाने वाली प्राचार्या निशा कामरानी का कहना है कि उन्होंने इस आयोजन की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों को वाट्सएप पर भेज दी थी। इसके लिए उनकी अनुमति की क्या जरूरत। इसी श्रंखला में अब एक क्रीम कंपनी के सहयोग से मिस इंडिया को स्कूल में बुलाया जा रहा है। छात्राएं उनके साथ फैशन परेड करेंगी और इससे लड़कियों को बाजार की जरूरतें समझाई जाएंगी। छात्राओं ने शिवलिंग के अलावा जो भी शिल्प बनाए हैं उनसे उनके सौंदर्यबोध की झलक मिलती है।उनके इस बयान का मोबाईल वीडियो बनाने वाले पत्रकार का फोन प्राचार्या के निर्देश पर जब्त कर लिया गया। धमकाते हुए कहा कि मेरे कई मंत्रियों से निकट के संबंध हैं और इसीलिए मैंने ज्यादातर अखबारों में खबर नहीं छपने दी है।

    सरकारी नौकरी में शामिल होने के बाद लगातार विवादों में रहीं भोपाल के शासकीय कमला नेहरू कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय टीटीनगर की प्राचार्या निशा कामरानी ने महीने भर के भीतर सरकार के लिए नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। माननीय उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस राजेन्द्र मेनन ने Nisha kamRani Vs. State of Madhya Pradesh & Others के निपटारे के दौरान Writ Petition No : 11004/2012 को यह कहते हुए खारिज किया था कि निशा कामरानी का अपने स्कूल के शिक्षकों पर कोई नियंत्रण नहीं था। उनका तबादला जांच कमेटी की रिपोर्ट के बाद किया गया इसलिए उनका आरोप बेबुनियाद है कि पक्षपात के चलते उनके लगातार तबादले किए जाते हैं। इसके बावजूद अपने राजनीतिक संबंधों के प्रभाव से उन्होंने राजधानी के इस प्रमुख स्कूल में प्राचार्या का पद हथिया लिया। जबकि इससे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारियों की शिकायत पर उन्हें तूमड़ा के स्कूल में ट्रांसफर किया गया था।

    शिक्षा विभाग के सूत्रों का कहना है कि प्राचार्या महोदया को जींस और टॉप पहिनकर आने के कारण पूर्व शिक्षा मंत्री श्रीमती अर्चना चिटनिस ने हटाया था। शिक्षा राज्यमंत्री दीपक जोशी के नाम की दुहाई देने वाली श्रीमती कामरानी कई बार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बारे में भी तरह तरह की डींगें हांकती हैं जिसकी आडियो रिकार्डिंग सोशल मीडिया पर भी उपलब्ध है। सिक्किम नवोदय विद्यालय से लेकर शिवलिंग बनवाने तक ढेरों किस्से हैं जिन्हें शिक्षा जगत से जुड़े लोग चटखारे लेकर सुनाते हैं। छात्राओं से पैर पड़वाना और गुरु दक्षिणा लेना उनका प्रिय शगल है।अपने संकुल से जुड़े स्कूलों के चंदा जुटाकर वे इस तरह के आयोजन करती हैं। इसी तरह की एक शिकायत की विभागीय जांच लोक शिक्षण संचालनालय में लंबित है जिसे नस्तीबद्ध करवाने के लिए उन्होंने कई राजनेताओं से कमिश्नर को फोन भी करवाए हैं।

    सूत्रों का कहना है कि स्कूल में बगैर अनुमति शिवलिंग बनाने का आयोजन करने के मसले पर आज एसडीएम दिशा नागवंशी ने प्राचार्या महोदया से पूछताछ की है। इस जांच में पता चला है कि किसी शिक्षिका के रिटायरमेंट आयोजन के लिए 200 -200 रुपए भंडारे के नाम पर चंदे के रूप में जुटाए गए थे । कई छात्राओं ने भी चंदा दिया, जबकि स्कूल की छात्राओं को अपने टिफिन का भोजन खाकर ही संतोष करना पड़ा।

    उनसे जब पूछा गया कि हिंदू तुष्टिकरण के इस आयोजन का ये गैर कानूनी कार्य उन्होंने क्यों किया तो उन्होंने कहा कि मैंने कुछ गलत नहीं किया है। कुछ लोग मेरे खिलाफ षड़यंत्र कर रहे हैं इसलिए वे पत्रकारों को रिश्वत देकर मेरे खिलाफ समाचार प्रकाशित करवा रहे हैं। वे लोग कौन हैं और ऐसा कैसे कर सकते हैं तो इसके बारे में उन्होंने कहा कि मेरे पास सबूत हैं जिन्हें मैं जल्दी ही उजागर करूंगी। हालांकि उन्होंने इस विवाद के उजागर होने के बाद स्कूल की मुस्लिम लड़कियों से पत्र लिखवाए हैं जिनमें लिखवाया गया है कि शिवलिंग बनवाने के फैसले से उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने तो इस आयोजन का प्रसाद भी खाया था। प्राचार्या महोदया ने कहा कि जल्दी ही वे ईद मिलन का आयोजन भी करने जा रहीं हैं जिससे लोगों को धार्मिक सौहार्द्र का संदेश दिया जाएगा।

    सामान्य घरों से आने वाली नाबालिग छात्राओं को बहकाकर निशा कामरानी जिस तरह उन्हें अपने समर्थन में लामबंद कर रहीं हैं इस पर शिक्षा विभाग के आला अधिकारी कुछ बोलने तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि प्राचार्या महोदया अपने राजनीतिक संबंधों के चलते किसी पर भी कीचड़ उछाल सकती हैं। शिक्षा विभाग के ही कई अधिकारी कर्मचारी आज भी उनकी शिकायतों का खमियाजा भुगत रहे हैं। इसलिए अब सरकार ही कोई उचित फैसला ले सकती है।

  • मुस्लिम छात्राओं ने शिवलिंग बनाने से किया इंकार

    मुस्लिम छात्राओं ने शिवलिंग बनाने से किया इंकार

    प्राचार्या बोलीं शिवलिंग बनाओ पास हो जाओगी,अच्छी नौकरी मिलेगी

    भोपाल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार युवाओं को रोजगार देने के पैमाने पर फिसड्डी साबित हुई है। जनता के धन पर उद्योगपतियों को निमंत्रण देते फिरे मुख्यमंत्री खुद इस बात से हैरान हैं कि आखिर उद्योगपति मध्यप्रदेश क्यों नहीं आना चाहते। रोजगार के मापदंडों पर सरकार को लगातार मिल रही असफलता से परेशान लोगों ने अब सरकार के बजाए ईश्वर के भरोसे ही रहना शुरु कर दिया है। राजधानी के सरकारी स्कूल में तो प्रिंसिपल महोदया ने अन्य शिक्षिकाओं के साथ मिलकर छात्राओं से मिट्टी के शिवलिंग बनवाए । सावन के महीने में किए गए इस आयोजन में प्राचार्या महोदया ने छात्राओं के कहा कि उन्हें अच्छे नंबरों में पास होना है और अच्छी नौकरी पानी है तो पूरी भक्ति के साथ शिवलिंग बनाएं।हालांकि कुछ मुस्लिम छात्राओं ने जब शिवलिंग बनाने से इंकार कर दिया तो उन्हें स्कूल से छुट्टी दे दी गई।

    भगवान भरोसे चल रही भाजपा की शिवराज सिंह चौहान सरकार को आयोजन वाली सरकार कहा जाता है। ये सरकार साल भर तरह तरह के आयोजन करती रहती है। इन आयोजनों में जनता का धन फूंक दिया जाता है पर समस्याओं के स्थायी समाधान नहीं तलाशे जाते हैं। यही वजह है कि मध्यप्रदेश में बेरोजगारी चरम पर है। हालत ये है कि बेरोजगारी के चलते स्कूली बच्चों का भी शिक्षा से मोह भंग होने लगा है।

    राजधानी के ह्दय स्थल तात्याटोपे नगर में स्थित शासकीय कमला नेहरू कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में आज मिट्टी के शिवलिंग बनाने का आयोजन किया गया। प्राचार्या निशा कामरानी ने बाल सभा आयोजन के अंतर्गत शिवलिंग निर्माण का ये आयोजन रखा था। उन्होंने पिछले माह ही इस स्कूल में प्राचार्या के रूप में कार्यभार संभाला है। इसके पहले वे लोक शिक्षण संचालनालय में वर्चुअल क्लास का कामकाज देखतीं थीं। अपने राजनीतिक संबंधों के चलते उन्होंने यहां पदस्थ पूर्व प्राचार्य आर.एन.शर्मा को तूमड़ा पहुंचवा दिया और राजधानी के इस प्रमुख स्कूल की कुर्सी संभाल ली। बताते हैं आते ही उन्होंने शिक्षिकाओं को समझा दिया कि अब इस स्कूल में वही होगा जो सरकार चाहेगी। सूत्र बताते हैं कि स्कूल शिक्षा मंत्री विजय शाह की पहल पर उन्हें इस स्कूल की जवाबदारी थमाई गई है।

    मिट्टी के शिवलिंग निर्माण के इस आयोजन के बाद लड़कियों के नाम पर भंडारा भी खिलाया गया। इस आयोजन में शिक्षा विभाग के अधिकारियों और स्थानीय राजनेताओं को भी आमंत्रित किया गया था।जबकि लड़कियों को इसमें शामिल नहीं किया गया। मंच पर जब पंडितजी पूजा करवा रहे थे तब प्रचार्या महोदया माईक संभालें थीं। वे लड़कियों से कह रहीं थीं कि पूरे मनोयोग से शिवलिंग बनाओ। उनका अभिषेक करो। इस पूजा का फल मिलेगा। तुम सभी अच्छे नंबरों से पास हो जाओगी और अच्छी नौकरी मिलेगी।

    नाम न छापने की शर्त पर स्कूल की ही कुछ शिक्षिकाओं ने कहा कि सरकारी स्कूलों में इस तरह के आयोजन गलत हैं। धर्म विशेष के आयोजनों से अन्य समाजों की छात्राओं को तकलीफ भी हुई है पर इसके संबंध में आयोजन कर्ता ही कुछ बता सकते हैं। प्राचार्य महोदया की संदिग्ध गतिविधियों से शिक्षिकाओं और शिक्षा विभाग के जानकारों में असंतोष है पर सरकार के रवैये को देखते हुए वे फिलहाल खामोश हैं।

  • टकराव की राजनीति का अंत

    टकराव की राजनीति का अंत

    मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के सबसे लंबे मुख्यमंत्रित्व काल में भले ही रोजगार के साधन विकसित न हो पाए हों लेकिन टकराव की राजनीति ने सकारात्मक दिशा जरूर पकड़ ली है। ये भी अपने आप में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। बरसों से टांग खिंचाऊ राजनीति के चलते राजनीतिज्ञों के बीच खेमे बाजी बढ़ती रही थी। कांग्रेस की सरकारें तो अलग अलग नेताओं के गुटों के लिए ही जानी जाती थीं। जनता को खंड खंड विभाजित करने की दिशा में काम करने वाली कांग्रेस की यही खंडित सोच अंततः कांग्रेस के पतन का कारण बनी । इसके बाद जब मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें आईं तब भी कुछ बरसों तक यही खंडित सोच राजनीति पर हावी रही। अब जबकि मुख्यमंत्री प्रदेश में नेतृत्व का सबसे लंबा कार्यकाल पूरा करके नया रिकार्ड बनाने जा रहे हैं तब ये टकराव की राजनीति पूरी तरह तिरोहित होती नजर आ रही है। मध्यप्रदेश विधानसभा के पावस सत्र में राजनीति की यही तस्वीर उभरी है। हालांकि तोड़ने की राजनीति करने वालों को ये नई किस्म की राजनीति रास नहीं आ रही है। वे स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि वो विपक्ष कैसे संभव है जो सरकार की सकारात्मक कार्यप्रणाली का भी विरोध न करे। दरअसल अब तक यही माना जाता रहा है कि विपक्ष यानि सरकार का विरोधी गुट। उसका तो काम ही सरकार का विरोध करना है। जबकि नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने बरसों पुरानी इस परिपाटी को अपने छोटे भाई शिवराज सिंह चौहान की कार्यशैली को समझकर इस टकराव की राह ही छोड़ दी है। ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे की तर्ज पर नजर आने वाला विपक्ष कल ठगा सा रह गया जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दो टूक शब्दों में कह दिया कि किसानों का कर्ज माफ करने की विपक्ष की मांग वो नहीं मानेंगे। वे किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य देने का वादा तो करते हैं लेकिन उसका कर्ज माफ करके वे किसान को पंगु नहीं बनाएंगे। इस घटिया राजनीति को नकारकर शिवराज सिंह चौहान ने अपनी बुलंद राजनीति का परिचय दिया है। नेता प्रतिपक्ष ने भी इसका बेवजह विरोध नहीं किया। कांग्रेस के दिग्गज उनकी इस शैली से भौंचक्के रह गए। दूसरे दिन उन्होंने अपने राहुल भैया पर दबाव बनाया कि उनकी भूमिका तो सरकार का विरोध करने की है। उन्हें अपना विरोध जरूर दर्ज कराना चाहिए था। जाहिर है पार्टी के दिग्गजों के दबाव के आगे उन्होंने दूसरे दिन सरकार के कर्ज माफी की घोषणा न करने से नाराज होकर सदन का बहिर्गमन कर दिया। हालांकि दूसरे दिन इस तरह के विरोध का कोई औचित्य नहीं था फिर भी कांग्रेस के नेताओं ने अपनी तोड़ने वाली सोच को जारी रखकर अपनी ओछी परंपरा का परिचय दे ही डाला। कांग्रेस के नेताओं के साथ समस्या यही है कि वे समझने तैयार नहीं कि वक्त बदल गया है। नर्मदा का पानी हमेशा बहता रहता है और क्षण भर बाद किसी भी स्थान से पानी की नई लहर गुजर जाती है। कांग्रेस के दिग्गज चाहते तो वक्त की नजाकत समझ सकते थे लेकिन वो समझने तैयार नहीं हैं। उन्होंने जिन घटिया हथकंडों से देश की जनता को हांका है वे उन फंडों को छोड़ना नहीं चाहते। वो सोचते हैं कि उनकी पुरानी कार्यशैली ही उन्हें देश की सत्ता पर लौटा देगी। जो अब कभी संभव नहीं है। टकराव की राजनीति के अंत का ये चमत्कार आखिर शिवराज सिंह चौहान ने किया कैसे। इस पर विचार करें तो बड़ा सरल का फार्मूला सामने आता है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को उनके राजनीतिक गुरु सुंदरलाल पटवा ने राजनीति में आगे बढ़ाया था। सुंदरलाल पटवा अर्जुन सिंह के करीबी माने जाते रहे हैं। अर्जुन सिंह ने ठाकुरों की राजनीति के सहारे मध्यप्रदेश में अपना वर्चस्व जमाया था। अपनी राजनीति को जमाए रखने के लिए उन्होंने न केवल अपनी पार्टी के सहयोगियों बल्कि विपक्षी भाजपा के भी दिग्गजों को अपना सहयोगी बनाया था। जब कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें कमजोर करने की कोशिश की तो उन्होंने दो बार विपक्षी सुंदरलाल पटवा को सरकार में आने में मदद की । भाजपा में राघवजी भाई जैसे लोगों ने तब इसी बात को लेकर सुंदरलाल पटवा का विरोध भी किया था। भाजपा हाईकमान से भी उन्होंने इस गठबंधन को अवैध बताते हुए शिकायत भी की थी। इसका परिणाम बरसों बाद राघवजी भाई को भुगतना पड़ा। पटवा जी के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उसी परंपरा को जारी रखा है। जिसमें बड़े भाई के रूप में अजय सिंह राहुल भैया शुरु से सहयोगी की भूमिका निभा रहे हैं। ये राजनीतिक समझदारी न केवल सत्ता शीर्ष बल्कि व्यापारिक संबंधों में भी जारी है। कई बड़े औद्योगिक घरानों का साम्राज्य इस दोस्ती की मिसाल के रूप में मौजूद है। ये एक तरह से प्रदेश के लिए बहुत अच्छा है। कारोबारी एकता से विकास की यशोगाथा लिखने का ये माहौल प्रदेश के लिए हितकारी है। कम से कम औद्योगिक स्थिरता से प्रदेश का विकास रथ ठीक दिशा में चल तो रहा है। उधर अजय सिंह अच्छी तरह जानते हैं कि जिस तरह कांग्रेस ने कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया को फ्री हैंड दे रखा है उसके चलते उनकी मुख्यमंत्री बनने की अभिलाषा पूरी नहीं हो पाएगी। जाहिर है इन हालात को देखते हुए खुद का साम्राज्य मजबूत किया जाए और भविष्य के लिए राजनीतिक ऊर्जा बचाए रखने का इंतजाम किया जाए यही बुद्धिमानी है। इस अनूठी यारी में पार्टीगत प्रतिद्वंदिता को ताक पर रखकर अपने विरोधियों को निपटाने में भी सहयोग और परस्पर विश्वास की युति देखी जा रही है। शिवराज जी को प्रदेश की राजनीति से हटाकर केन्द्र में पहुंचाने का जतन करने वाले नेताओं को एक एक कर निपटाया जा रहा है।राजनीति के जानकार किसानों पर मंदसौर में हुए गोलीकांड के मामले को स्थगन के माध्यम से सदन में उठाए जाने को फिक्सिंग बता रहे हैं। उनका कहना है कि इस स्थगन ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को अपनी सरकार का पक्ष जनता के सामने रखने का मौका दिया है। इससे कांग्रेस की भद भी पिटी है। जाहिर है प्रदेश के नेताओं को इस राजनीतिक परिपाटी को अच्छी तरह समझना होगा। वे विकास की इस यात्रा में सहयोगी के रूप में बने रहेंगे तो उनके अच्छे दिन चलते रहेंगे। यदि विरोध करने की राजनीति न छोड़ी तो फिर जयहिंद।

  • किसान आंदोलन पर उलटा पड़ा कांग्रेस का दांव

    किसान आंदोलन पर उलटा पड़ा कांग्रेस का दांव

    भोपाल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। मध्यप्रदेश विधानसभा में आज नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने जब किसान आंदोलन पर स्थगन लाने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया तब सभी समझ रहे थे कि अब भाजपा सरकार को खासी परेशानी होगी लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने चर्चा कराने का ये प्रस्ताव तत्काल स्वीकार कर लिया। इसके बाद भाजपा के नेताओं किसानों के लिए किए गए अपनी सरकार के जो कामकाज गिनाए उसके बाद तो सारी बाजी पलट गई। हर नेता ने कांग्रेस की सरकारों की खामियां गिनाईँ और किसान आंदोलन की सारी हकीकत सदन में उजागर कर दी। पंचायत मंत्री गोपाल भार्गव ने तो किसान आंदोलन पर कांग्रेस को आड़े हाथों लिया।

    उन्होंने कहा कि ये आंदोलन सिर्फ उसी हिस्से में था जहाँ पर अफीम का उत्पादन होता है, डोडा चूरा का उत्पादन होता है, हमारे बुन्देलखण्ड के 5 जिलों में कहीं नहीं है, भिण्ड जिले में नहीं है, ग्वालियर चंबल संभाग में कहीं नहीं है. यह स्पष्ट रूप से इस बात का प्रतीक है कि पूरा का पूरा मामला तस्करों के द्वारा प्रेरित था, जिसके लिए यहाँ पर स्थगन लाया गया, उनकी मदद के लिए स्थगन लाया गया, मेरा आरोप है.उन्होने कहा अलाभकारी मूल्य की बात हो रही है. किसान का भावनात्मक शोषण कर रहे हैं. अध्यक्ष महोदय, किसान बहुत भावुक होता है और भावुक होने के कारण ही उसे लोग प्रेरित करते हैं. मैं एक जगह अपने क्षेत्र में सुन रहा था, एक करोड़ रुपये की मुख्यमंत्री जी ने घोषणा की, कुछ लोग हमारे ही क्षेत्र में कहने लगे एक करोड़ मिल जाएँगे तुम लटक जाओ और वे दूसरी पार्टी के लोग थे, मैं उनके बारे में कुछ कहना नहीं चाहता. क्या उनको ऐसा कहना चाहिए? अध्यक्ष महोदय, मैं इस बात को कहना चाहता हूँ कि यदि हम वास्तव में किसानों के हितैषी हैं और हम वास्तव में किसान हैं, तो अपनी सब्जियों को, अपने खाद्यान्न को, अपने दुग्ध उत्पादन को, अपने दूध को, हम सड़कों पर नहीं बहा सकते, हम नालियों में नहीं फेंक सकते और सब्जियों को हम कुचल नहीं सकते. अध्यक्ष महोदय, सरकार ने किसानों के लिए क्या नहीं किया? साढ़े चार हजार करोड़ रुपये पिछले साल फसल बीमा का मिला, साढ़े चार हजार करोड़ रुपया, लगभग राहत राशि का मिला. नौ हजार करोड़ रुपये की राशि पिछले साल किसानों के लिए मिली. आपकी सरकार के समय 100-100, 50-50, रुपये के चेक मिलते थे और जहाँ तक फायरिंग की बात है, फायरिंग की बात के लिए आप याद कर लो मुलताई की 1998 की घटना, 29 किसान मारे गए थे और वाहवाही करने के लिए तो इन्होंने असत्य एनकाउण्टर तक किसानों का किया. अध्यक्ष महोदय, शिवपुरी जिले में रामबाबू गडरिया को मारने की एक घटना हुई. तमगे लगा लिए, प्रमोशन हो गया, आउट आफ टर्न और अध्यक्ष महोदय, जिनको मारा था, वह निकले 3 किसान, खेत में पानी बराने के लिए जा रहे थे, उनके लिए मार दिया गया और तत्कालीन मुख्यमंत्री जी ने, सच है कि नहीं? आप बताएँ. सच है कि नहीं वह 3 किसान मारे गए थे? और उसके बाद में टी.आई. को डी.एस.पी. और डी.एस.पी. को एस.पी. बना दिया, सार्वजनिक सम्मेलन कर के,बताइये यह सही है और आप किसानों के हित की बात करते हैं? इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि बात करना है तो तर्क के साथ में करें. हमारी सरकार ने पिछले 13 वर्षों में अनेकों काम किये हैं, उन सब के लिए बात होनी चाहिए. अध्यक्ष महोदय, मैं बहुत विनम्रतापूर्वक हमारे प्रतिपक्ष के सदस्यों से कहना चाहता हूं. अपने मित्रों से कहना चाहता हूं कि आत्मा पर हाथ रखकर आप बोलें कि क्या किसान के हित में इस सरकार ने पिछले वर्षों में कोई काम नहीं किया? बहुत-सी बातें सुसाइड की सामने आईं. माननीय अध्यक्ष महोदय, प्रतिपक्ष के सदस्यों ने यह नहीं बताया कि उन किसानों के पास कितने सुसाइड नोट मिले? कोई वीडियों क्लिपिंग उनके पास मिली क्या? आज कल तो घर-घर में मोबाईल हो गये हैं, मोबाईल की कहीं कोई क्लिपिंग मिली चूंकि किसानों की संख्या ज्यादा है, तादाद ज्यादा है इस कारण से यह माना जाता है कि स्वाभाविक रूप से किसान यदि दर्ज है, रिकार्ड में उसके नाम से कुछ जमीन दर्ज है, घर के भी झगड़े होते हैं, पारिवारिक विवाद होते हैं, अन्य प्रकार की समस्यायें होती हैं, बीमारियाँ होती हैं इस कारण से यदि किसान आत्महत्या करते हैं तो उसके पीछे यह न माना जाना चाहिए वह कर्जदार ही हैं. कई किसान ऐसे हैं जिनके घर में पर्याप्त राशि मिली है लेकिन उन्होंने मृत्यु को प्राप्त किया है.

    हमारे बहुत वरिष्ठ सदस्य रामनिवास जी हैं, इसी सत्र में आपके प्रश्न का एक उत्तर आया है. इस उत्तर में स्पष्ट है कि फसल की विफलता के कारण जो मृतक किसानों की संख्या है वह जीरो है.कर्ज के कारण 6, गरीबी से 2, नशे की लत के कारण 37, बीमारी से परेशान होकर 68, संपत्ति के कारण 5, पारिवारिक कारणों से 51, अन्य कारणों से 20 इस प्रकार कुल 189 किसानों की अलग-अलग कारणों से पिछले छह माह में मृत्यु राज्य के अंदर हुई है. अध्यक्ष महोदय, हम यह नहीं सकते है कि यह किसान ने दिवालिया होकर, किसान ने कर्ज के कारण, किसान ने प्रताड़ित होकर आत्महत्या कर ली. अध्यक्ष महोदय, नीति आयोग की जो रिपोर्ट आई है उसमें यह बात आई है और जहाँ तक किसानों का जो सुसाइड रेट है वह हमारे राज्य में सबसे नीचे है. लेकिन इसका भी हमें बहुत अफसोस है, दुख है. हमारा कोई भी भाई मरता है, चाहे वह किसान हो, व्यापारी हो, परीक्षा में अनुत्तीर्ण छात्र हो या किसी भी वर्ग का आदमी हो, खेतिहर श्रमिक हो, कोई भी हो सभी के लिए तकलीफ होती है, दुख होता है. लेकिन कुछ घटनायें ऐसी रहती हैं जिनको हम और आप कोई भी नहीं रोक सकते हैं लेकिन हमें नीतियाँ ऐसी बनानी चाहिए, क्रियान्वयन इतना पारदर्शी रखना चाहिए कि जितना संभव हो सके राज्य में इस प्रकार की घटनाएं रुके.

    अध्यक्ष महोदय, यदि पार्टीगत बात करते हैं कि बीजेपी की सरकार होने के कारण यहाँ पर आत्महत्यायें हो रही हैं, तो मैं आपको पढ़कर बता रहा हूं, आत्महत्या का परसेंट पांडिच्चेरी में 43.2 है जबकि वहाँ आपकी कांग्रेस की सरकार है, सिक्किम में गैर भाजपा सरकार है वहाँ 37.5 परसेंट है, तेलंगाना में गैर भाजपा सरकार है वहाँ 27 परसेंट है, तामिलनाडु में अन्नाद्रुमक या द्रुमुक की सरकारें रही हैं, वहाँ 22 परसेंट है,केरल में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार है वहाँ 21 परसेंट है, त्रिपुरा में कम्युनिस्ट पार्टी की मार्क्सवादियों की सरकार है वहाँ 19 परसेंट है, कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है वहाँ 17 परसेंट है, पश्चिम बंगाल में तृणमूल की सरकार है वहाँ 15 परसेंट है , महाराष्ट्र में पूर्व में जब आपकी कांग्रेस की सरकार थी,उस समय का रेट है 14 परसेंट और मध्यप्रदेश में यह रेट 13 परसेंट है. हालांकि यह 13 परसेंट भी नहीं होना चाहिए. यह हम सब लोगों के लिए चिंता की बात है कि देश में किसी भी किसान की मृत्यु हो, किसी भी वर्ग के व्यक्ति की मृत्यु हो. हमें लोक कल्याणकारी सरकार के लिए प्रयास यह करना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति की मृत्यु अभाव के कारण ना हो. लेकिन कुछ घटनायें ऐसी होती हैं जिनको हम रोक नहीं सकते हैं. माननीय गोविंद सिंह जी ने बहुत-सी बातें कहीं औऱ अनेकों सदस्यों ने प्रश्न लगाये हैं, जो स्थगन सूचनायें दी हैं. मैं इतना ही निवेदन करना चाहता हॅूं कि गोली चलाना कोई अच्‍छी बात नहीं है. जैसा गृहमंत्री जी ने अपने उत्‍तर में कहा है 109 कर्मचारी घायल हुए और कई बहुत गंभीर रूप से घायल हुए, परमानेंटली आंख डैमेज हो गई. अब उस कर्मचारी की आंख कभी सुधर नहीं सकती. क्‍या यह किसी विदेशी ने आकर किया था ? यह तो सब हमारे लोग थे और हमारे लोगों के लिए प्रेरित करने का काम, भड़काने का काम यदि किसी ने किया है तो वह ऐसे असामाजिक तत्‍वों ने किया, जो कतई सामाजिक नहीं थे, कतई अच्‍छे लोग नहीं थे. अन्‍य लोग थे और मैं कांग्रेसी मित्रों से भी कहना चाहता हॅूं कि राजनीति करने के लिए हमारे पास बहुत से विषय पडे़ हैं. बहुत-सी समस्‍याएं हैं. आज भी देश और प्रदेश बहुत-सी समस्‍याओं से जूझ रहा होगा. लेकिन मैं यह कहना चाहता हॅूं कि किसानों के शवों के ऊपर राजनीति नहीं करना चाहिए.

    माननीय अध्‍यक्ष महोदय, श्री पी.के.यादव की आंख क्षतिग्रस्‍त हो गई है. कांग्रेस के मित्र हैं मैं नाम नहीं लेना चाहता. इसमें काफी नाम लिखे हुए हैं. जिन्‍होंने सक्रिय रूप से भाग लिया. वीडियोग्राफी है. हम कहना चाहते हैं कि राजनीति होगी जब मकाम होगा, उस समय तय कर लेंगे कि राजनीति की दिशा क्‍या होगी. बिजली की बात, सिंचाई की बात, फर्टिलाइजर की बात, उत्‍तम सीड की बात है. आज आप अपनी आत्‍मा पर हाथ रखकर बताएं कि क्‍या पहले से बेहतरी नहीं आयी है ? वर्ष 2003 के पहले जब मैं विधायक था. मैं एमएलए रेस्‍ट हाउस के फैमिली ब्‍लॉक में रहता था. मैंने वे दिन देखे हैं जब रेस्‍ट हाउस में सुबह 6 बजे से सुबह 10 बजे तक बिजली बंद रहती थी, जबकि हम लोग विधायक थे. एक प्रकार से सरकार के अंग थे लेकिन मैंने सुबह-सुबह मोमबत्‍ती में, लालटेन में अखबार पढे़ हैं क्‍योंकि मुझे स्‍थगन और ध्‍यानाकर्षण सूचनाएं देना पड़ती थीं. क्‍या हमने वह दिन नहीं देखें हैं. हर किसानों के पास जनरेटरों का अंबार लग गया था. विद्युत उत्‍पादन कितना था, मोटर बाईंडिंग के लिए वायर नहीं मिलता था. वह काले दिन थे. हमारे सभी वरिष्‍ठ सदस्‍य बैठे हैं. क्‍या हम वह भूल जाएंगे. याद नहीं करेंगे. हम विद्युत उत्‍पादन के मामले में बहुत बेहतरी में आएं हैं. रबी की फसल की आधी जमीन असिंचित पड़ी रहती थी. आज वह पूरी सिंचित है. कृषि उत्‍पादन बढ़ा है और कई गुना बढ़ा है. गर्व से कहने की बात है कि हम आज कृषि उत्‍पादन के मामले में और जीडीपी के मामले में पंजाब और हरियाणा से भी आगे हैं. (मेजों की थपथपाहट) यह नीति आयोग की रिपोर्ट है. यह पूरा का पूरा प्रामाणिक है. कृषि उत्‍पादन के मामले में, सिंचाई के मामले में आगे हैं. सिंचाई कितनी बढ़ गई है. जब आप लोगों की सरकार थी कृषि ग्रामीण विकास बैंक से ऋण लिया जाता था, हर महीने 24 परसेंट इंट्रेस्‍ट लगता था, आप लोगों को याद होगा और जब कम्‍युलेट होता था तो वह 40 परसेंट तक हो जाता था. कभी कोई किसान अपनी जमीन वापस नहीं ले पाया और हम लोगों ने तय किया कि आज भी हजारों एकड़ जमीन एलडीपी में बंधक रखी हुई है. माननीय मुख्‍यमंत्री जी ने कहा और हम सभी लोगों ने भी तय किया कि एक इंच जमीन भी हम नीलाम नहीं होने देंगे, भले ही पैसा वापस आए अथवा नहीं आए. (मेजों की थपथपाहट) सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक, अपेक्‍स बैंक की दरें सहकारिता के क्षेत्र में जो हमारे बैंक हैं उनकी दरें कभी 24 परसेंट, 22 परसेंट हुआ करती थी घटते-घटते 7, 5, 4, 3 और आते ही हमने शून्‍य कर दी. लोग आश्‍चर्य करते हैं कि बिना ब्‍याज का ऋण और उसके ऊपर मूल में भी छूट है. 10000 रूपए का ऋण लेंगे तो 9000 रूपए वापस करने पडे़गे तो उसमें 1000 रूपए की भी छूट क्‍या किसान के लिए यह सुविधाएं नहीं मिलीं ? व्‍यवस्‍थाएं नहीं मिलीं ? आज मैं यह कहना चाहता हॅूं कि हमें दिल पर हाथ रखकर इस बात को सोचना चाहिए कि हमने क्‍या बेहतर किया और हमें आज बैठकर चर्चा करना चाहिए कि हम क्‍या बेहतर से बेहतर और ज्‍यादा कर सकते हैं. हमने कृषि केबिनेट बनायी और कृषि केबिनेट में वे तमाम फैसले जो किसानों के हित में हो सकते हैं लगातार बैठकें करके हम लोगों ने लागू किया है. घटना के बारे में मुख्‍यमंत्री जी ने केबिनेट की फिर बैठक की और उसके बाद बाहर से विशेषज्ञ बुलाए. दिल्‍ली के पूसा से आईसीएआर के विशेषज्ञ बुलाए गए और विस्‍तृत रूप से यह चर्चा हुई कि हम बेहतर मार्केटिंग कैसे कर सकते हैं ? उत्‍पादन में तो हम आगे हो गए लेकिन हम मार्केटिंग बेहतर से बेहतर कैसे कर सकते हैं ? यह सबको जानकारी है कि नाफेड आज कमजोर आर्थिक स्‍थिति में चल रहा है. चने की, मसूर की, अरहर की, मूंग की जो खरीद होनी चाहिए वह आज नाफेड के माध्‍यम से पूरी तरह से नहीं हो रही है, तो सरकार ने एक हजार करोड़ रुपये यानि कि 10 अरब रुपये का अपना स्‍वयं का मूल्‍य स्‍थरीकरण के लिए फंड बनाया जो कि हिंदुस्‍तान के इतिहास में, मध्‍यप्रदेश के इतिहास में पहली बार हुआ है. एक हजार करोड़ रुपये का फंड स्‍थाई सर्विस के लिए सरकार ने इसलिए बनाया कि यदि घाटा होता हो तो हो जाए, लेकिन मध्‍यप्रदेश के किसी किसान को घाटा न हो, उसे अपनी जान न देनी पड़े.

    अध्‍यक्ष महोदय, रोज अखबारों में प्‍याज की खबर आ रही है, कह दिया गया है कि 8 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव से प्‍याज खरीदेंगे और यदि खराब हो जाए तो भी किसान को नुकसान नहीं होने देंगे, एक बार सरकार के लिए नुकसान हो जाए, हम अपनी 10 योजनाओं में कटौती कर देंगे, लेकिन किसान के पेट पर लात नहीं मारने देंगे.

    अध्‍यक्ष महोदय, दर्जनों बातें ऐसी हैं, जिनके कारण मैं अपने विपक्ष के साथियों से कहना चाहता हूँ कि हमें खुले दिल से, राज्‍य के किसानों के हित में और अन्‍य सभी वर्गों के हित में काम करना चाहिए तो मुझे लगता है कि मध्‍यप्रदेश में जैसे हम बेहतर स्‍थिति में आए हैं और ज्‍यादा बेहतर कर सकते हैं अन्‍यथा वही पुराने दिन लौट आएंगे. मुझे स्‍मरण है कि आस्‍ट्रेलिया का वह लाल गेहूँ, लोग तो क्‍या जानवर भी नहीं खाते थे जो ये इम्‍पोर्ट करवाते थे, आस्‍ट्रेलिया के वे लाल गेहूँ खाने के बुरे दिन न आएं. अब तो मुझे खुशी है कि मध्‍यप्रदेश की शरबती और मध्‍यप्रदेश का बासमती आस्‍ट्रेलिया वाले खा रहे हैं तो यह हम लोगों के कारण हुआ है.

    अध्‍यक्ष महोदय, मैं माननीय सदस्‍यों से कहना चाहता हूँ कि ये जो हमारी प्रवृत्‍ति है, इस प्रवृत्‍ति में हमें परिवर्तन करना पड़ेगा. किसान के मुद्दे को लेकर हर गाँव में, हर कस्‍बे में, जिला मुख्‍यालय पर या जगह-जगह पर मजमे करके हम शायद यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि मध्‍यप्रदेश कृषि के मामले में पिछड़ा है, किसान दु:खी है, लेकिन इससे पूरे प्रदेश की बदनामी होती है, पूरे प्रदेश की अवमानना होती है. यदि मेरी अवमानना होगी, भारतीय जनता पार्टी के सदस्‍य की अवमानना होगी तो मैं सदस्‍य तो हूँ ही, लेकिन एक नागरिक भी हूँ. इस कारण से मैं कहना चाहता हूँ कि आपकी भी अवमानना होगी.

    मैं पूर्व में बोल चुका हूं, फसल बीमा का 4660 करोड़ रुपया, पिछले साल ही किसानों के लिए दिया गया है. मैं सदस्यों को बताना चाहता हूं कि आपको सुनकर आश्चर्य होगा. सीहोर जिले में कुल 26 करोड़ रुपया प्रीमियम का जमा हुआ था और बदले में 443 करोड़ रुपया सीहोर जिले के लिए बंटा है. विदिशा में 21 करोड़ रुपया प्रीमियम का जमा हुआ था, 310 करोड़ रुपया बंटा है. रायसेन में 18 करोड़ रुपया प्रीमियम में जमा हुआ था, 172 करोड़ रुपया बंटा है. सागर जिले में 16 करोड़ रुपया प्रीमियम का जमा हुआ था, 254 करोड़ रुपया बंटा है, बुन्देलखंड में बंटा है. मैं इसीलिए इन बातों को कह रहा हूं, जो माननीय श्री के.पी. सिंह साहब कह रहे थे. इसकी रेलिवेंसी है, इसकी सम्बद्धता है, इसका औचित्य है और इसीलिए भी है कि जहां आत्महत्या की बात आती है, जहां गोली चालन की बात आती है, जहां घटनाओं की बात आती है, वहां इन तथ्यों को भी देखना पड़ेगा कि हमने कृषि के क्षेत्र में क्या-क्या किया है. राहत राशि भी लगभग 4600 करोड़ रुपए हमने दी है. इसके बाद में आरबीसी 6 (4) में जितने संशोधन हुए, जितने सुधार हुए, और ज्यादा किया है कि यदि किसान की भैंस, बैल की मृत्यु हो जाय, वह बह जाय, दुर्घटना में, करंट में, सर्प के काटने से कुछ हो जाय, अभी तक तो आदमी के लिए नियम था, मुख्यमंत्री जी ने उसमें पशुओं तक में नियम कर दिया.

    अध्यक्ष महोदय, मैं यह कहना चाहता हूं कि सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, यह क्या रेलिवेंट नहीं है? रेलिवेंसी है, इस कारण से मैं इन बातों को कहना चाहता हूं. आरबीसी 6 (4) में लगातार सुधार हुआ है. गेहूं का उपार्जन 70 लाख टन गेहूं खरीदा गया है, उन्हीं प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़कों से मंडियों में उपार्जन केन्दों पर आया, इसलिए इन बातों को कह रहा हूं. सॉइल हेल्थ कॉर्ड, घर जाकर सॉइल हेल्थ कॉर्ड बनाने का काम हो रहा है, हमारा इसके लिए ग्रामोदय अभियान चला. सबसे बड़ी बात जो मुख्यमंत्री जी ने कही है कि अब हम खसरा, खतौनी की नकल एक-एक किसान के घर पर जाकर देंगे ताकि किसी प्रकार के भ्रष्टाचार की कोई गुंजाईश प्रदेश में नहीं रहे. इससे बड़ी क्या उपलब्धि हो सकती है? (अध्यक्ष महोदय, अनेकों बातें हैं, इतना ही कहना चाहता हूं कि मध्यप्रदेश एक शांति का टापू है और जब से हमारे यहां डाकू उन्मूलन हुआ है, मध्यप्रदेश में इस प्रकार की कोई घटना घटित नहीं हुई है, जिससे इस प्रदेश के ऊपर कोई कलंक आए, इस प्रदेश के ऊपर कोई कालिख आए, इस प्रदेश के ऊपर कोई ऊंगली उठाए. यह प्रदेश हम सबका है, मेरा भी है, आपका भी है, सभी का है. हम सभी मध्यप्रदेशवासी शान के साथ में यह कह सकते हैं कि हम कृषि उत्पादन के मामले में देश में अव्वल हैं और जब अव्वल हैं तो स्वाभाविक रूप से यह स्वतः सिद्ध है कि किसान भी सुखी होगा ही, क्योंकि यह कृषि उत्पादन कहां से बढ़ता है, किसान की समृद्धता से और जब किसान समृद्ध है तो मैं यह मानकर चलता हूं कि कोई कारण ऐसा नहीं है कि जिसमें हमें पुलिस का प्रयोग करना पड़े, प्रशासन का प्रयोग करना पड़े, कोई अप्रिय स्थिति न आए और यदि लाई जाती है तो निश्चित रूप से हम सभी के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है.

    अध्यक्ष महोदय, मैं माननीय सदस्यों से यही कहना चाहता हूं. बहुत लोग आ रहे हैं. मंदसौर के लिए आप तीर्थ मत बनाएं, यह अच्छी परंपरा नहीं है, इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि इससे एक प्रदूषण का वातावरण भी बनता है. राहुल भैया भी वहां पर गये थे, आप भी गये थे. राहुल गांधी जी गये थे और नानी जी के यहां से जब से लौटे हैं तो नानी जी की कहानियां तो बड़ी शिक्षाप्रद होती थीं, पता नहीं नानी जी ने राहुल भैया को कैसी कहानी सुनाई होगी मुझे तो नहीं मालूम, लेकिन यहां पर नानी याद आ जाएगी, हम नहीं बताना चाहते, इसलिए आप सब इसको नहीं करें. अध्यक्ष महोदय, जो आपने समय दिया, उसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद.

  • चीनी माल की टैक्स चोरी रोकेगा जीएसटी

    चीनी माल की टैक्स चोरी रोकेगा जीएसटी

    राहुल लाल

    चीनी माल से तबाह हो रहे भारतीय उद्योगों के लिए जीएसटी एक नई आशा की किरण बनकर कवच के रूप में सामने आया है। अब तक जो चीनी माल चोरी छुपे भारत के बाजारों में भेजा जा रहा था उसे अब देशी माल से चुनौती का सामना करना पड़ेगा। जीएसटी लागू होने के बाद चीनी माल बेचने वाले व्यापारी हमारे टैक्स तंत्र की खामियों का लाभ नहीं ले पाएंगे। भारत के वैश्विक तौर पर लगातार उभरने से चीन की परेशानियां बढ़ती जा रहीं हैं। चीन ने भारत-भूटान के साथ सीमा-विवाद पर नया दांव चला है. चीन ने नक्शा जारी कर भारत और भूटान के अधिकार क्षेत्र वाली सिक्किम सेक्टर की जमीनों पर दावा किया है. चीन ने नक्शे में डोका ला और डोकलाम के भारत-चीन-भूटान के त्रिकोणीय जंक्शन को चिह्नित कर दावा किया है कि 1890 में ब्रिटिश-चीन संधि के तहत यह इलाका उनके अधिकार क्षेत्र में आता है. 2014 में चीन ने अरुणाचलप्रदेश और जम्मू-कश्मीर को अपना अभिन्न अंग बताया था. तब भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी चीन के दौरे पर गए थे. भारत ने तब चीन के इस मानचित्र पर कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कहा था कि नक्शा जारी करने से जमीनी हकीकत नहीं बदलती.

    चीन ने भारत पर दबाव बनाने के लिए नाथू ला की तरफ से मानसरोवर यात्रा पर तो पहले खराब मौसम का बहाना लगाकर रोका, फिर तो सिक्किम क्षेत्र से सेना वापसी की मांग रख दी. इसपर भारत ने नाथू ला वाले मानसरोवर यात्रा को ही स्थगित कर दिया. चीन मोदी-ट्रंप की प्रथम मुलाकात से भी बौखला गया है. यही कारण है कि चीनी मुखपत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ में मोदी-ट्रंप की प्रथम मुलाकात की तीखी आलोचना की. परंतु चीन की बौखलाहट यहीं नहीं रुकी. चीन ने भारत को फिर से 1962 की याद दिलाते हुए चेतावनी देने की कोशिश की, जिसका भारतीय रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने स्पष्ट शब्दों में जवाब दिया कि चीन वर्तमान भारत को 1962 का भारत समझने का भूल न करे.

    एक जुलाई मध्यरात्रि को जिस तरह कर एकीकरण के मूलभूत परिघटना में जीएसटी क्रियान्वित किया गया, वह भारतीय संघवाद के अंतर्गत ‘सहकारी संघवाद’ का एक बहुत बढ़िया उदाहरण है। यह चीन के आक्रामक रवैए का मुंहतोड़ जवाब भी है. जीएसटी के कारण भारत ने सीमा पर बगैर तनाव बढ़ाए चीन को तगड़ी चुनौती दे डाली है।

    जीएसटी के लागू होने से चिरप्रतीक्षित ‘एक राष्ट्र, एक टैक्स’ की अवधारणा क्रियान्वित हो गई है. 15 अगस्त 1947 मध्य रात्रि को देश को अंग्रेजों के प्रत्यक्ष अधीनता से मुक्ति मिली, अब 1 जुलाई 2017 को मध्य रात्रि को संसद के उसी सेंट्रल हॉल से देश को पुराने 17 करों तथा उपकरों से मुक्ति मिली. चीन ने अपने सीमावर्ती क्षेत्र पर उत्कृष्ट आधारभूत संरचनाओं का निर्माण किया है, जबकि संसाधनों के अभाव के कारण भारत-चीन सीमा पर भारतीय क्षेत्र में आधारभूत संरचना का अभाव है. लेकिन जीएसटी लागू होने तथा काला धन पर सरकार के कठोर रवैया से अब सरकार के पास पर्याप्त संसाधन होंगे, जिससे सीमा प्रबंधन पर भी पूर्ण ध्यान दिया जा सकेगा.

    जीएसटी का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे चीन के माल के दबाव से तबाह हो रहे छोटे भारतीय व्यापारी तथा बाजार फिर से सशक्त हो जाएंगे. चीन को सीमा पर लड़े बिना हराने का पूर्ण इंतजाम भी जीएसटी से हो रहा है.

    चीन का सस्ता माल देश की अर्थव्यवस्था को जर्जर कर रहा है. पिछले वर्ष दीपावली से देश में चीनी माल के बहिष्कार का आंदोलन भी चलता रहता है, क्योंकि चीनी माल का आयात होने के बावजूद वह घरेलू निर्माण से सस्ता होता है. सरकार ने इस चीनी लूट से बचने के लिए आयातित एवं घरेलू वस्तुओं पर समान कर लगाने की व्यवस्था कर ली है. जीएसटी लागू होने के बाद चीनी माल अब भारतीय माल से सस्ता नहीं होगा अर्थात् चीन का समान अब भारतीय कारोबारियों की कमर नहीं तोड़ सकेगा.

    राजस्व सचिव हसमुख अढ़िया के अनुसार जीएसटी ‘मेक इन इंडिया’के लिए भी महत्वपूर्ण है. अब तक एक्साइज ड्यूटी के तहत सीवीडी लगाया जा रहा था. उसके अलावा आयातित वस्तुओं पर सिर्फ 4 प्रतिशत स्पेशल एडिशन ड्यूटी (SAD) लगा रहे थे. इस 4 प्रतिशत एसएडी का मतलब यह था कि घरेलू उद्योग को जो वैट देनी पड़ती थी, उसी तरह आयातित को 4% स्पेशल एडिशन ड्यूटी लगाते थे. एक तरह से राज्यों को 14% वैट के बदले में आयातित वस्तु पर 4% एसएडी लगाया जा रहा था. इस तरह स्पष्ट रुप में देख सकते हैं कि घरेलू उद्योगों पर तो कर बोझ 14% था, जबकि आयातित वस्तुओं पर केवल 4%. परंतु जीएसटी आने के बाद घरेलू उद्योगों पर टैक्स का जितना बोझ है, उतना ही आयातित पर भी लगेगा. इससे घरेलू उद्योगों को न केवल बल मिलेगा अपितु भारतीय घरेलू उद्योग भी चीनी माल को आसानी से बाजार में चुनौती दे सकेंगे. इसी कारण पहले आयातित माल सस्ता पढ़ रहा था, जबकि घरेलू महंगा. इससे घरेलू उद्योग चीनी आयातित माल का सामना कर सकेंगे.

    इसी तरह पहले ‘सी’ फॉर्म भरकर व्यापारी सीएसटी में इंटरस्टेट ले जाने की जानकारी देते थे, लेकिन वह माल दूसरे राज्य जाता ही नहीं था, बल्कि उसी राज्य में बेच दिया जाता था. इस तरह व्यापारी केवल 2 प्रतिशत टैक्स देकर काम चला लेता था तथा राज्य के 14% वैट से बचा रह जाता था. अब जीएसटी में यह संभव नहीं है. अब अगर दूसरे राज्य ले भी जाना है, तो उसे पूरा का पूरा टैक्स भरना होगा. राजस्व सचिव के अनुसार 2% के दर से भी राज्यों के राजस्व में कम से कम 50-60 हजार करोड़ बचेंगे, जिसका प्रयोग पुन: राष्ट्र निर्माण हेतु अवश्य हो सकेगा.

    इसके अतिरिक्त जीएसटी से देश में निवेश में वृद्धि होगी तथा निवेश की गई राशि का भी ‘मेक इन इंडिया’ के लिए अधिकतम प्रयोग हो सकेगा. विदेशी निवेश के क्षेत्र में भी अब भारत चीन को कड़ी चुनौती दे सकेगा. इस तरह जीएसटी से जहां भारत में चीनी माल के लिए प्रतिस्पर्धा कठोर होगा, वहीं निवेश में भी चीन को कड़ी चुनौती मिलेगी.

    जीएसटी से देश एक आधुनिक कर प्रणाली की ओर आगे बढ़ रहा है जो पारदर्शिता के साथ काले धन और भ्रष्टाचार को रोकने का अवसर प्रदान करती है. सरकार ने कालाधन, जमाखोरी पर कार्रवाई करने हेतु एक चक्रव्यूह की रचना की है, जिसका असली दरवाजा जीएसटी ही है. विदेश में जमा कालाधन पर प्रहार के बाद नोटबंदी ने कैश गुमनामी को खत्म किया. पैन को आधार से जोड़ने का का भी क्रांतिकारी परिणाम भविष्य में दिखने को मिलेगा. इसके अतिरिक्त सरकार ने बेनामी कानून में संशोधन करके भी भ्रष्टाचार पर कड़ी चोट की है।(चौक साभार)

  • कांग्रेस को तमाचे में चमके सिंधिया

    कांग्रेस को तमाचे में चमके सिंधिया

    -आलोक सिंघई-
    सागर में कलेक्ट्रेट का घेराव कर रहे उद्दंड कार्यकर्ताओं को नसीहत देने के बहाने नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल भैया ने एक कार्यकर्ता के गाल पर थप्पड़ रसीद कर दिया। कांग्रेस के इस प्रदर्शन को नेतृत्व देने के लिए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव भी पहुंचे थे। ज्योतिरादित्य सिंधिया खेमे के प्रतिनिधि कहे जाने वाले गोविंद सिंह भी घटना स्थल पर मौजूद थे। अचानक घटित इस घटनाक्रम से सभी भौंचक्के रह गए। सत्ता से बेदखली के बरसों बाद किसान आंदोलन के सहारे सक्रिय कांग्रेस इन दिनों बदली बदली नजर आ रही है। हर एक कार्यकर्ता का अभिनंदन किया जा रहा है। सारे नेतागण उन्हें लाड़ प्यार से सहेज रहे हैं क्योंकि भाजपा के लंबे शासनकाल के बाद कार्यकर्ताओं को सहेजना एक चुनौती हो गया है। ऐसे माहौल में जब आज कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का जन्मदिन है तब सागर में कार्यकर्ता को पड़ा नेता प्रतिपक्ष का तमाचा कई संकेत दे रहा है। कांग्रेस हाईकमान को इसका आशय समझना होगा। राजनीतिक हलकों में ये तमाचा कांग्रेस की मौजूदा हालत का पूरा सच बयान कर रहा है।

    कांग्रेस शुरु से संगठन विहीन राजनीतिक दल रहा है। कभी कांग्रेस को संगठित करने का प्रयास दिल से नहीं किया गया। जितने भी अधिवेशन हुए वे नेताओं के इर्द गिर्द हुए और उन्हीं के माध्यम से कांग्रेस सत्ता हासिल करती रही है। जब किसी नए नेता का उदय होता है तब कार्यकर्ताओं की आस्थाएं बदल जाती हैं। वे जुगाड़ जमाकर नेता के इनर सर्किल में पहुंचते हैं और अपने वाजिब गैर वाजिब काम करवाकर अपनी आस्था की फीस वसूलने का जतन करते हैं। जो इसमें सफल हो जाता है वो थोड़ा बड़ा कार्यकर्ता बन जाता है। जो असफल रहता है वो छुटभैया नेता के रूप में चंदा वसूली में जुट जाता है। कांग्रेस का यही संगठन देश में अराजकता और धींगामुश्ती का पर्याय रहा है। इन हालात को समझते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं को भारतीय जनता पार्टी में भेजा। प्रशिक्षण संवर्गों का आयोजन किया। कार्यकर्ताओं को संस्कारित करने का अभियान चलाया। उन्हें समाजसेवा का धर्म सिखाया। बोलना सिखाया। फिर उन्हें भाजपा में नेतृत्व दिलाने का प्रयास भी किया। ये बात अलग है कि उनमें से अधिकतर प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं को बाद में सत्ता के मद ने गुमराह भी किया। इसके बावजूद भाजपा में आज बड़ी संख्या में ऐसे कार्यकर्ता भी हैं जो राजनीति या समाजसेवा को देश सेवा के धर्म से जोड़कर देखते हैं।

    ऐसा नहीं कि कांग्रेस में सारे के सारे चोर, मक्कार, अराजक, गुंडा तत्व हैं। कांग्रेस के कार्यकर्ता भी भारतीय परिवेश में ही पले बढ़े हैं। वे जानते हैं कि समाज को एकजुट रखने के लिए हमें अपना आचरण कैसा रखना चाहिए। हमारी भूमिका क्या और हमारे दायित्व क्या हैं, हमारी सीमाएं क्या हैं ये भी समय समय पर कांग्रेस के नेता अपने कार्यकर्ताओं को सिखाते रहते हैं। सागर में कांग्रेस कार्यकर्ता को पड़ा तमाचा भी कुछ इसी तरह का प्रशिक्षण संवर्ग का हिस्सा कहा जा सकता है। हाल ही में मंदसौर में कांग्रेस पर किसान आंदोलन में हिंसा भड़काने का आरोप लगा है। पूरे देश में कांग्रेस को किसान आंदोलन का खलनायक माना जा रहा है। इन हालात में कांग्रेस को फूंक फूंककर कदम रखने की जरूरत है। जाहिर है कि अजय सिंह अपनी मौजूदगी में किसी भी किस्म की अराजकता का लांछन नहीं झेलना चाहते हैं। उन्होंने कांग्रेस के नेता से माला पहिनने का आग्रह ठुकराया या एक कार्यकर्ता को थप्पड़ रसीद कर दिया इससे उनकी मनःस्थिति और कांग्रेस की अंतर्कलह की आहट को साफ तौर पर सुना जा सकता है।

    राहुल गांधी के जन्मदिन पर राहुल भैया अजय सिंह का ये थप्पड़ कांग्रेस को सबक सिखाने से ज्यादा खुद को पाक साफ रखना ज्यादा प्रतीत होता है। साथ में हाईकमान के लिए संकेत भी है कि वो अपने राजनैतिक विरोधियों के जाल में फंसने वाले नहीं हैं। सुरखी के पूर्व विधायक गोविंद सिंह ज्योतिरादित्य खेमे के प्रतिनिधि माने जाते हैं। कभी उन्होंने प्रदेश की ठाकुर लाबी से भी करीबी स्थापित करने की कोशिश की थी। बाद में उन्होंने सिधिया खेमा पकड़ लिया। हालांकि इसके बावजूद वे दिग्विजय सिंह खेमे के माध्यम से भी अपनी सत्ता का परचम फहराते रहे हैं। उनकी पिछली पराजय अर्जुनसिंह खेमे के खास सहयोगी संतोष साहू की बेटी के हाथों हुई थी। उनकी बेटी पारुल साहू केशरी ने भाजपा के प्रत्याशी के तौर पर 2013 का विधानसभा चुनाव लड़ा और टसल के बीच गोविंद राजपूत को हराकर विधानसभा पहुंची।पारुल साहू के भाजपा में जाने से कांग्रेस की शक्ति घट गई और तमाम राजनीतिक हथकंडे अपनाने के बाद भी गोविंद ये चुनाव हारे थे। भाजपा के पास लगातार सत्ता से पोषित हो चुके गोविंद सिंह को हराने लायक प्रत्याशी था भी नहीं इसलिए उसके सलाहकारों ने कांटे से कांटा निकालकर सुरखी सीट पर अपना परचम फहराया था।

    अब गोविंद राजपूत के सामने अपने बिखरी शक्ति एक बार फिर सहेजने की चुनौती है। इसलिए उन्होंने आज के प्रदर्शन में अजय सिंह को आमंत्रित किया था। अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि अजय सिंह को खबर मिली थी कि इस प्रदर्शन को हिंसक बनाकर उन्हें कलंकित करने की तैयारी की जा रही है। उन्हें पता था कि उनके हर कदम की वीडियो ग्राफी भी होगी। इसके बावजूद उनकी भावनाएं उनकी गतिविधियों से साफ उजागर हो गईं। जब कांग्रेस के कार्यकर्ता सर्किट हाऊस में अजय सिंह का स्वागत कर रहे थे तब उन्होंने कार्यकर्ताओं से फूलों के गुलदस्ते तो स्वीकार कर लिए पर एक कांग्रेसी नेता संदीप सबलोक की माला ये कहते हुए पहिनने से इंकार कर दिया कि वे माला नहीं पहिनते। इस घटना का भी वीडियो जल्दी ही वायरल हो गया। इसी तरह जब वे आंदोलन कर रहे कार्यकर्ताओं को पुलिस बैरिकेड तोड़ने से रोक रहे थे तभी उन्होंने एक कार्यकर्ता को झांपड़ रसीद कर दिया। अजय सिंह फूंक फूंककर कदम रख रहे थे लेकिन कांग्रेस कार्यकर्ता को मारे गए थप्पड़ ने सारे किए धरे पर पानी फेर दिया। उनके विरोधियों का मकसद भी यही था जिसमें वे बहुत हद तक सफल भी हो गए।

    इस घटनाक्रम से कांग्रेस की अंदरूनी उथल पुथल की झलक साफ देखी जा सकती है। पहली बात तो ये है कि संगठित और प्रशिक्षित भारतीय जनता पार्टी से मुकाबला करने में आज भी कांग्रेस मीलों दूर खड़ी है। स्व. सुभाष यादव की विरासत पर काबिज उनके सुपुत्र अरुण यादव कांग्रेस के पुराने संगठन की कमान तो संभाल चुके हैं लेकिन वे नवागत कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देने में बुरी तरह नाकामयाब साबित हुए हैं। वास्तव में ये उनके बस की बात भी नहीं है। कांग्रेस में जब किसी को कोई जवाबदारी दी जाती है तो पार्टी की तरफ से उसे रसद पानी उपलब्ध नहीं कराया जाता है। गुटों में बंटी कांग्रेस के नेतागण सत्ता की शक्तियां अपने गुटों तक ही समेटकर रखते हैं। जाहिर है अरुण यादव सफल हों ये कोई नहीं चाहता। कांग्रेस के आम कार्यकर्ताओं का मानना है कि सुभाष यादव ने अपने कार्यकाल में अपेक्स बैंक और सहकारिता आंदोलन के माध्यम से भरपूर संसाधन जुटा लिए थे। पार्टी आलाकमान भी ये अपेक्षा रखता है कि अब अरुण यादव उस विरासत को संभाल रहे हैं तो वे अपने हाथ खुले रखकर संगठन को संवारने का काम करेंगे। हाल ही में खलघाट पर कांग्रेस के प्रदर्शन ने भी पार्टी की आपसी सिर फुटौव्वल को बढ़ावा दिया। इस प्रदर्शन में किसान तो पहुंचे ही साथ में कमलनाथ, दिग्विजय सिंह,ज्योतिरादित्य सिंधिया,सुरेश पचौरी, भी पहुंचे। अरुण यादव के प्रचार तंत्र ने इस आंदोलन में से कथित तौर पर अजय सिंह को गायब करने की कोशिश की। जाहिर है कि अब सागर की घटना ने उनकी ही परीक्षा कापी में सवालिया निशान लगा दिया है। हाईकमान तक ये संकेत पहुंच चुका है कि अराजकता का आरोप झेल रही कांग्रेस को संगठित और प्रशिक्षित करने का काम अब तक सिफर ही है।

    राजनीति के इस दांव पेंच के बीच अजय सिंह से जुड़े सूत्र कह रहे हैं कि उन्होंने कार्यकर्ता को झांपड़ नहीं मारा। उनकी इस बचकानी सफाई पर भला कोई यकीन भी कैसे करे। जब इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया हो तब उनकी ओर से आई इस सफाई का कोई मतलब ही नहीं है। अजय सिंह को स्वीकारना ही पड़ेगा कि उन्होंने अराजक कार्यकर्ता को समझाने के लिए थप्पड़ की भाषा का इस्तेमाल किया था। अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदियों के बिछाए जाल को काटने के फेर में अजय सिंह एक छोटी सी गलती कर गए हैं जो उनके राजनैतिक बायोडाटा में दर्ज भी हो गई है। ज्योतिरादित्य सिंधिया को अब तक कांग्रेस हाईकमान ने पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री का अधिकृत चेहरा घोषित नहीं किया है। इसके बावजूद कांग्रेस के कार्यकर्ता सिंधिया की ओर आशा भरी निगाहों से देखने लगे थे। अजय सिंह के थप्पड़ ने कार्यकर्ताओं उस अभिलाषा को और हवा दे दी है।