पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के ठिकानों पर राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण(एनआईए) के छापों ने देश में राजनैतिक रूप से गुमराह तबके की असलियत को उजागर कर दिया है। ये कड़वी सच्चाई है कि लगभग एक सौ तीस करोड़ की आबादी के विशाल हिंदुस्तान में बड़ा तबका आज भी मूलभूत जरूरतों के लिए जद्दोजहद कर रहा है। केन्द्रीय मंत्री और भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी ने भी स्वीकार किया है कि भारत धनवान देश है लेकिन यहां की जनता गरीब है, लोग बेरोजगारी और भुखमरी से जूझ रहे हैं। यहां आज भी जातिवाद, अस्पृश्यता और मंहगाई ने लोगों का जीवन दूभर कर रखा है। उनकी इस स्वीकारोक्ति के बावजूद ये भी सच्चाई है कि देश की अधिसंख्य आबादी अपना जीवनस्तर सुधारने की हरसंभव कोशिशें कर रही है। इसके विपरीत कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपना जीवन संवारने के लिए आतंक से आधिपत्य का रास्ता चुनने का ख्वाब देख रहे हैं। इन पर प्रहार समय की मांग है। एनआईए और तमाम सुरक्षा एजेंसियों ने बड़ी कुशलता से पीएफआई के अड्डों पर छापों में और स्लीपर सेल से जुड़े लोगों को गिरफ्तार किया है। पीएफआई के सहयोगी संगठनों और राजनैतिक विंग सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी आफ इंडिया (एसडीपीआई) में भी सक्रिय लोगों की गिरफ्तारियां हुईं हैं। लंबी छानबीन के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने जो तथ्य जुटाए हैं उनकी वजह से छापों की अहमियत बढ़ गई है। ये भी तय है कि सबूतों के आधार पर पकड़े गए लोगों की सजा अभी से मुकर्रर हो गई है। साक्ष्य इतने अकाट्य हैं कि आतंक और विद्रोह का जाल फैलाने वालों का शेष जीवन अब जेलों में ही कटेगा। इन तथ्यों की जानकारी अभी देश के लोगों को नहीं है यही वजह है कि एनआईए के छापों को लोग राजनीति से प्रेरित बता रहे हैं। न केवल मुसलमानों बल्कि उन्हें अपना वोट बैंक मानने वाले लालू प्रसाद यादव और मायावती जैसे नेताओं ने भी छापों पर नाराजगी जताना शुरु कर दिया है। मुस्लिम समुदाय के ज्यादातर व्यक्ति यही कहते सुने जा रहे हैं कि भाजपा और खासतौर पर आरएसएस के इशारे पर ये कार्रवाई अपने विरोधियों को कुचलने के लिए की गई है। जबकि हकीकत ये है कि विदेशों से करोड़ों रुपयों का धन गरीबों के कल्याण के नाम पर लाया जा रहा था और उसका इस्तेमाल आतंकी वारदातों को अंजाम देने के लिए किया जा रहा था। ये कहा जाता था कि अरब देशों की तेल समृद्धि का बड़ा हिस्सा जकात के नाम पर देश को मिलता है। धर्म के प्रचार प्रसार के लिए भी अरब देशों से जो धन आता है उससे गरीब मुस्लिम आबादी का कल्याण किया जा रहा है। ये बात ऊपरी तौर पर सही भी नजर आती है। देश भर में खुले मदरसों के माध्यम से जो धार्मिक शिक्षा दी जाती है उससे कई प्रतिभाशाली बच्चे भी सामने आते हैं लेकिन वे तो तब भी उभरते जब उन्हें देश के सरकारी स्कूलों में शिक्षा मिली होती। ईसाईयों ने भी शिक्षा में जो निवेश किया है उससे भी दुनिया के लिए अच्छे पेशेवर मिले हैं। इसका मतलब ये तो नहीं कि वे आतंक की नर्सरी भी बन गए। एनआईए को मदरसों और जकात की आड़ में आतंकियों को फंडिंग किए जाने के जितने स्पष्ट सबूत मिले हैं उससे साफ जाहिर होता है कि भारत जैसे विशाल बाजार पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के लिए दुनिया की कई शक्तियां किस तरह देश को गृह युद्ध की ओर धकेल रहीं हैं। इस्लामिक स्टेट ऑफ़ इराक एंड सीरिया यानी आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन देश की तरुणाई को गुमराह करने के लिए क्या क्या हथकंडे अपना रहे हैं इसके भी सबूत एनआईए के हाथ लगे हैं। स्कूल, कालेजों के परिसरों में कैंपस फ्रंट आफ इंडिया( सीएफआई) और नेशनल वीमेंस फ्रंट( एनडब्ल्यूएफ) के माध्यम से कैसे बच्चों को साफ्ट टारगेट के रूप में गुमराह किया जाता है ये भी चिंताजनक है। यही वजह है कि सबूतों को देखते हुए मुस्लिम आबादी का बड़ा हिस्सा अपनी नाराजगी तो जता रहा है लेकिन उसने इस कार्रवाई में कोई व्यवधान नहीं डाला है। भारत के मुसलमान प्रगतिशील माने जाते हैं। यही वजह है कि दुनिया के आतंकी संगठन भारत के मुसलमानों पर भरोसा नहीं करते हैं। मुस्लिम आतंकियों के निशाने पर रहने वाले आरएसएस को भी भारत के मुसलमान अब तिरछी निगाह से नहीं देखते हैं। उन्हें ये तो पता है कि आरएसएस हिंदुत्व की विचारधारा का समर्थन करता है लेकिन वे ये भी जानते हैं कि हिंदुत्व की विचारधारा सर्वपंथ समभाव के घोषित विचार पर कार्य करती है। आरएसएस ने कभी मुस्लिम धर्म को न तो नकारा है न ही उस पर कोई प्रहार किया है। भारत में मुसलमान आज भी अपनी योग्यता के बल पर ऊंचाईयां छू सकता है। यही वजह है कि भारत में आतंक के पर फैलाने का प्रयास टांय टांय फिस्स हो गया है। अब सरकार को सोचना होगा कि आखिर वे क्या वजहें थीं जिसके चलते लोग भारत की साम्प्रदायिक एकता में सेंध लगाने की जुर्रत भी करते हैं। मोदी सरकार ने कई मूलभूत समस्याओं पर प्रहार किया है। इसके बावजूद सरकार के आंख,नाक, कान ,हाथ और पैर जिस तंत्र पर टिके हैं उनकी कार्यक्षमता लगभग शून्य है। मध्यप्रदेश के कृषि मंत्री कमल पटेल ने तो सार्वजनिक तौर पर कहा है कि हम दो लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था में से साठ हजार करोड़ रुपए केवल तनख्वाह बांटते हैं इसके बावजूद सरकारी तंत्र जन समस्यायों के निराकरण की जवाबदारी नहीं निभा पा रहा है। सरकार ने जो हितग्राही मूलक योजनाएं बनाई हैं उनका लाभ भी जनता को नहीं मिल पा रहा है। लगभग अठारह साल से काम कर रही शिवराज सिंह चौहान सरकार अब तक इसी सरकारी तंत्र के सहारे अपने राजनैतिक उद्देश्य पाने का प्रयास करती रही है। उसके मंत्री विधायक और कार्यकर्ता बार बार चेताते रहे हैं कि सरकारी अफसर जनता की योजनाओं को लागू नहीं कर रहे हैं लेकिन इस तंत्र ने पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं को योजनाओं की रिश्वत देकर खामोश कर दिया। आज जब चुनाव की बेला आ रही है तब भाजपा के नेतागण अपनी अक्षमता और असफलता का ठीकरा अफसरशाही पर थोप रहे हैं। इससे जनता की समस्याओं का समाधान कैसे हो सकेगा। मोदी सरकार भी यदि यही शैली अपना ले तो जाहिर है कि जनता को अपनी जरूरतों के लिए अन्य साधनों की ओर रुख करना होगा। आतंकी साजिशों ने भारत की इसी कमजोरी का फायदा उठाने की चेष्ठा की है। इसका अर्थ ये भी हुआ कि सरकार भले ही अपनी सुरक्षा एजेंसियों के सहारे आतंक के साजिशकर्ताओं को पकड़कर जेलों में ठूंस दे लेकिन दहशत फैलाने की ये परंपरा बंद नहीं होगी। भारत की अर्थव्यवस्था में बड़ी हिस्सेदारी डॉलर के आयात पर निर्भर होती है। सरकार का प्रयास भी होता है कि किसी भी बहाने डॉलर देश में आते रहें । यही कारण है कि कल्याणकारी गतिविधियों के लिए विदेशों से धन लाने वालों को सरकार टैक्स में भी राहत देती है। अब यदि उस धन का इस्तेमाल आतंकियों गतिविधियों के लिए किया जाने लगे तो भारत की विकास प्रक्रिया षड़यंत्रों की भेंट चढ़ जाएगी। इसे रोकने के लिए एनआईए ने जो कार्रवाई की है उसका समर्थन किया जाना चाहिए। इसके साथ साथ ये भी जरूरी है कि सरकार पूरी पारदर्शिता से अपनी विकास प्रक्रियाएं चलाए जिससे असंतोष को जड़ें जमाने का अवसर न मिले। आरएसएस और भाजपा को अपने कार्यकर्ताओं का भी प्रशिक्षण इस तरह से करना चाहिए ताकि वे अपनी भड़काऊ बयानबाजियों से लोगों को विद्रोह का मार्ग अपनाने के लिए मजबूर न करें। पीएफआई पर प्रतिबंध पर्याप्त नहीं है इससे आगे बढ़कर हमें एक ऐसी विचारधारा का सूत्रपात करना होगा जो न केवल भारत बल्कि विश्व में भी मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करे।
Category: संपादकीय
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पीएफआई पर प्रतिबंध पर्याप्त नहीं
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अफसरशाही की गर्राहट
आदिवासियों को कुत्ता कहकर उनकी औकात बताने वाले एसपी अरविंद तिवारी को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हड़बड़ाहट में हटा दिया है। झाबुआ के कलेक्टर सोमेश मिश्रा को भी हटाया गया है। उन पर आरोप था कि वे सरकारी योजनाओं की डिलीवरी नहीं कर पा रहे थे। पिछले विधानसभा चुनावों में आदिवासियों की नाराजगी से भाजपा अपनी सरकार खोने का दंश झेल चुकी है। इस बार भी भाजपा चिंतित है। यदि आदिवासियों के आक्रोश को न थामा गया तो उसे इस बार भी सरकार बनाना कठिन हो जाएगा। आदिवासी ही नहीं भाजपा के सबसे बड़े जनाधार पिछड़ा वर्ग की बेचैनी भी भाजपा के लिए चिंता का सबब बनी हुई है। पिछले चुनाव में ब्राह्रण मतदाताओं ने जिस तरह अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए भाजपा से विद्रोह किया वह भी भाजपा के लिए भय की एक वजह बनी हुई है। यही कारण था कि भाजपा ने ब्राह्मण अफसरों ,नेताओं और ठेकेदारों को भरपूर लूट की छूट दी। अब भाजपा इस मुहाने पर आ गई है जहां सभी तबके उसे ब्लैकमेल कर रहे हैं। कमलनाथ कांग्रेस विद्रोह की इस खेती को करने में पूरी शिद्दत से जुटी हुई है।हालत ये है कि कमलनाथ राहुल गांधी की पदयात्रा और विधानसभा जैसे मौकों में भी उलझने से बच रहे हैं। भाजपा की स्थिति भई गति सांप छछूंदर जैसी हो गई है। तमाम हितग्राही मूलक योजनाएं बनाने और कांग्रेस से जनता की सहज नफरत के बावजूद भाजपा को चुनावी दौड़ में हांफी आ रही है।मध्यप्रदेश के शासकों की अकुशलता इसकी सबसे बड़ी वजह रही है।शिवराज सरकार को लगभग अठारह साल काम करने का मौका मिला। अथाह बहुमत ने उन्हें भरपूर आजादी दी। इसके बावजूद उनकी सरकार अब तक जनता की कसौटी पर खरी नहीं उतर पाई है। दिग्विजय सिंह की भ्रष्ट सरकार 2003 में सत्ताच्युत हुई थी। उन्होंने पंचायती राज के माध्यम से सत्ता के समानांतर तंत्र खड़ा करने का असफल प्रयास किया था। वह प्रयास बुरी तरह औंधे मुंह गिरा। इसकी पृष्ठभूमि में पंचायतों और प्रतिनिधियों का भ्रष्टाचार प्रमुख वजह रही थी। अफसरशाही को उन्होंने जिस तरह गली का कुत्ता बनाया उससे अफसरशाही ने भाजपा के प्रतिनिधि बनकर उमा भारती की सरकार को रिकार्डतोड़ सफलता दिलाई थी। उमा भारती ने तो अफसरशाही को उत्पादकता के लिए कसा लेकिन उनके बाद बाबूलाल गौर और फिर शिवराज दोनों ने अफसरशाही के इस अहसानों के बदले में सत्ता की बागडोर उसे ही थमा दी। शुरु से भाजपा के नेता और मंत्री बोलते रहे हैं कि अफसर उनकी नहीं सुनते। वे जो प्रस्ताव अफसरों के पास बनाकर देते हैं उन्हें वे रद्दी की टोकरी में फेंक देते हैं। भाजपा के नेताओं का ये दर्द सही था और आज भी बरकरार है। अफसरशाही ने शिवराज के कार्यकाल में जो मलाई कूटी है उसे अफसरों पर पड़े छापों और रंगे हाथों पकड़े गए अफसरों की संख्या देखकर आसानी से समझा जा सकता है। भाजपा ने खुद अफसरशाही की गोदी में बैठकर हितग्राही मूलक योजनाओं का भरपूर लाभ उठाया है। अपने कार्यकर्ताओं को दोनों हाथों में लड्डू थमाए। संघ के नाम पर तो चिरकुटों तक ने सरकारी खजाने को मनचाहे ढंग से उलीचा। अफसरशाही और भाजपा की इस लूट में जनता उपेक्षित होती रही। यदा कदा जनता के बीच भी योजनाओं का लाभ पहुंचा जिससे असंतोष अब तक हिंसक विद्रोह का रूप नहीं ले सका है।लोगों को अब भी लगता है कि शायद कभी उनकी भी लाटरी लग जाए, जो अब संभव नहीं है। कमलनाथ इसी असंतोष को उभारने का जतन कर रहे हैं। दिल्ली के बाद पंजाब में आप पार्टी ने भाजपा की धन बटोरने वाली शैली को मुफ्त बिजली के वादे से धराशायी किया है। राहुल गांधी भी अपनी यात्रा में भाजपा को अडानी अंबानी की सरकार कह रहे हैं।कांग्रेस वैसे भी पूंजीपतियों को शैतान बताकर उन पर कंकर फेंककर तालियां बजवाती रही है। कांग्रेस का ये पुराना तरीका उसे एक बार फिर जीवन दे रहा है। भाजपा के नेतागण असहाय हैं वे अपने लिए धन जुटाने वाले अफसरों उद्योगपतियों और ठेकेदारों पर आखिर कैसे प्रहार कर सकते हैं। झाबुआ के कलेक्टर एसपी को हटाकर शिवराज सिंह ने आदिवासियों को खुश करने का फौरी प्रयास किया है। भाजपा के मुख्यमंत्री जिनमें शिवराज सिंह चौहान सबसे अव्वल हैं वे चोरी छिपे मोदी सरकार की नीतियों को जन असंतोष की वजह बताते रहे हैं। ये बात बहुत हद तक सही भी है। मोदी सरकार ने टैक्स वसूलने और सब्सिडी बंद करने में जो तेजी दिखाई है उससे जनता में असंतोष फैला है। इसके बावजूद शिवराज सिंह चौहान और अन्य राज्यों की सरकारें जनता को इन बदली परिस्थितियों के बीच जिंदा रहने की कला नहीं सिखा पाई हैं। कांग्रेस की मुफ्तखोरी वाली राजनीति को बंद कभी न कभी तो होना ही था लेकिन भाजपा ने अधूरे प्रहार किए हैं। वह न तो मुफ्तखोरी की नीतियां पूरी तरह बंद कर पाई है और न ही जनता को धन बनाने की कला सिखा पाई है। जाहिर है इससे असंतोष बढ़ रहा है। उस पर झाबुआ एसपी अरविंद तिवारी की नशे में धुत्त बदतमीजी और प्रशासनिक अकुशलता की वजह से कलेक्टर सोमेश मिश्र ने आदिवासियों के असंतोष को हवा दे दी है। जाहिर है मुख्यमंत्री ने मजबूरी में उन्हें हटाया है। सोमेश मिश्र ने कलेक्टरी से पहले आयुष्मान मिशन के सीईओ की जवाबदारी संभाली थी। कलेक्टरी भी उन्हें इनाम के तौर पर मिली थी। जब भाजपा की शिवराज सरकार अफसरों की मैदानी पोस्टिंग उपकृत करने के अंदाज में करती रही है तो फिर अफसर मैदान में जाकर अपना करिश्मा आखिर क्यों न दिखाएंगे। जाहिर है मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार को अपने किए कर्मों का फल मिलना शुरु हो गया है। भाजपा की अकुशलता कांग्रेस के लिए भाग्य से छींका टूटने वाली साबित हो रही है। पिछले चुनाव में भी कांग्रेस के भाग्य से छींका टूटा था उसने सत्ता में आकर यही लूट का दौर चलाया था। अब यदि जनता भाजपा से नाराज होती है तो उसे एक बार फिर कमलनाथ जैसा नागनाथ सौगात में मिलेगा।अफसरशाही तो मदमस्त है ही। -

बेअसर रही पिछड़ा वर्ग का वोट बैंक छीनने की राजनीति
अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति का अनुसरण करने वाली कांग्रेस पार्टी इन दिनों मध्यप्रदेश में इसी पुरातन फार्मूले का प्रयोग कर रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में कमलनाथ कांग्रेस ने आदिवासियों को बरगलाकर सत्ता पाने में जो सफलता पाई थी उससे उत्साहित होकर उन्होंने इस बार पिछड़ों को निशाना बनाया है। पिछड़ा वर्ग के इस बड़े वोट बैंक की खेती करने की शुरुआत वैसे तो कांग्रेस की अर्जुनसिंह सरकार ने की थी लेकिन उसे परिणाम मूलक बनाने का काम भारतीय जनता पार्टी ने किया । पिछड़ा वर्ग से ही लगातार तीन मुख्यमंत्री देकर भाजपा ने इस बड़े वोट बैंक को संवारने में सफलता पाई है। इस मजबूत वोट बैंक में सेंध लगाने की हसरत पाले कमलनाथ कांग्रेस ने कानूनी दांव पेंच से अपनी पार्टी को जिस तरह पिछड़ों का हितैषी बताने का अभियान चलाया उसने राज्य की राजनीति में भारी भूचाल मचा दिया। कई दिनों तक लगता रहा कि पिछड़ों की ये पैरवी कांग्रेस को बड़ा जनाधार दिलवाएगी। कमलनाथ के इस दांव के सूत्रधार राज्यसभा सांसद विवेक तनखा बने। उन्होंने कमलनाथ के मीडिया प्रभारी सैय्यद जाफर और अन्य की याचिकाओं को लेकर अदालती लड़ाई लड़ी। विशेष विमान से इन योद्धाओं को सुप्रीम कोर्ट भेजा गया और बड़ी धनराशि खर्च करके अदालत में पिछड़ों को आरक्षण की रोटेशन प्रणाली का पालन करवाने की पैरवी की गई। ये दांव उल्टा पड़ा और अदालत ने इसे फेब्रिकेटेड मानते हुए खारिज कर दिया। रिपट पड़े की हर गंगे करने वाले कमलनाथ ने सरकार पर दबाव बनाना शुरु कर दिया कि वह पिछड़ों को आरक्षण दिलाने के लिए अदालत जाए। विधानसभा में जो स्थगन प्रस्ताव लाया गया उसमें कांग्रेस ने सरकार पर आरोप लगाने की कोशिश की थी कि वह पिछड़ों को आरक्षण का लाभ न देकर पंचायतों के जो चुनाव करवा रही है उससे प्रदेश के एक बड़े वर्ग के हितों की अनदेखी होगी। कमलनाथ और उनकी चिल्लर पार्टी ने सदन में जिस तरह इस मुद्दे को उठाया उससे तो कांग्रेस छोड़कर भाजपा में गए विधायकों मंत्रियों को भी एकबारगी लगा कि सरकार पर किया जा रहा ये वार बहुत घातक साबित होगा। पर ऐसा कुछ हुआ नहीं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, उनके सहयोगी गृहमंत्री डाक्टर नरोत्तम मिश्रा और नगरीय विकास एवं आवास मंत्री ठाकुर भूपेन्द्र सिंह ने जिस तरह इस राजनीतिक वार का डटकर सामना किया उससे विपक्ष की धार भौंथरी हो गई। भूपेन्द्र सिंह जो कि स्वयं पिछड़ा वर्ग से आते हैं उन्होंने कहा कि यदि हमारी सरकार पर लगाए जा रहे आरोपों में थोड़ी भी सच्चाई हुई और मैंने जिन कानूनी प्रक्रियाओं का हवाला दिया है उनमें यदि कोई झूठी साबित हुईं तो मैं राजनीति छोड़ दूंगा। पिछड़ा वर्ग के हित के लिए मैं जान देने को भी तैयार हूं। कमलनाथ ने सदन में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर दबाव बनाया कि वे पिछड़ा वर्ग को लेकर जो दावे कर रहे हैं उसके लिए उनकी सरकार को अदालत जाकर आरक्षण सुनिश्चित करना चाहिए। मुख्यमंत्री ने विपक्ष के आरोपों पर तीखे हमले किए। उन्होंने कहा कि भाजपा ने पिछड़े वर्ग से लगातार तीन मुख्यमंत्री देकर इस वर्ग को जितनी नौकरियां दी हैं या अन्य लाभ दिलाए हैं उन्हें वे सदन के पटल पर रखने को तैयार हैं। हमने पिछड़े वर्ग को सत्ता का लाभ दिलाने का पाखंड नहीं किया बल्कि उसे लाभ दिलाया है। हमने सभी समाजों और वर्गों के विकास की जो राजनीति की है उससे समाज में सामंजस्य बढ़ा है और सभी वर्गों को लाभ मिला है। जिस 27 प्रतिशत आरक्षण न दिलाए जाने के आरोप हम पर लगाए जा रहे हैं, हमने पिछड़े वर्ग के लोगों को उससे भी कई गुना ज्यादा लाभ दिया है। हमें इसके लिए किसी अग्निपरीक्षा देने की जरूरत नहीं है। उन्होंने सदन के नेता के रूप में कहा कि हमने जाति धर्म की संकीर्णताओं से ऊपर उठकर जनहित को सर्वोपरि रखा है। जिस तरह कमलनाथ कांग्रेस की टीम वैमनस्य फैलाने की राजनीति कर रही है हम उसका जवाब देने में सक्षम हैं। सरकार के रुख ने कांग्रेस से भाजपा में आए नेताओं के सामने घिरे असमंजस को भी दूर कर दिया है और जनता में फैलाए जा रहे भ्रम को भी हटा दिया है। कांग्रेस के इस वार ने सरकार को समय से पहले सावधान कर दिया है कि वह कांग्रेस की इस वैमनस्य फैलाने वाली राजनीति के लिए भी भविष्य में तैयार रहे। -

कृतघ्न महाराष्ट्र सरकार

कोरोना संकट के बाद चल रहे लंबे लॉक डाऊन ने सरकारों की धूल निकाल दी है। खुद को प्रदेशों और देश का भाग्य विधाता कहलाने वाली सरकारों की चूलें हिल गईं हैं। अधिकतर राज्यों की सरकारें अब लोगों को घरों पर बैठकर नहीं खिला पा रहीं हैं। उनके पास अनाज के तो भंडार हैं लेकिन उन्हें सप्लाई करने वाला ढांचा नहीं है। वे किसानों से खरीदा गया अनाज फोकट में नहीं बांट पा रहीं हैं। इसकी वजह से निम्न मध्यमवर्गीय लोगों में भगदड़ मच गई है। देश में असंतुलित विकास के ढांचे की वजह से महाराष्ट्र को निर्माण का हब तो बना दिया गया लेकिन उसमें आजादी के 73 सालों बाद भी जिम्मेदारी का भाव नहीं आया है। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों ने यूपी, बिहार,झारखंड, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में उद्योगों को अनुमति देने के बजाए महाराष्ट्र से समुद्र तटीय इलाकों में उद्योगों की भरमार कर दी थी। यही वजह है कि देश भर के कई राज्यों से करोड़ों लोग इन क्षेत्रों में कामकाज की तलाश में पहुंच गए। मुंबई और महाराष्ट्र में यूपी, बिहार, मध्यप्रदेश,पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से करीबन तीस लाख मजदूर रह रहे हैं। जब तक उद्योगों को सस्ते मजदूरों की जरूरत थी महाराष्ट्र ने उन्हें गले लगाया लेकिन अब जबकि लॉक डाऊन चल रहा है तब महाराष्ट्र की शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी सरकार मजदूरों से पल्ला झाड़ रही है। ऐसे ही औरंगाबाद से लौट रहे 16 मजदूरों की रेल की पटरियों पर मालगाड़ी से कुचलकर मौत हो गई है। सड़क मार्ग बंद होने की वजह से वे रेल की पटरियों के सहारे अगले स्टेशन पर किसी रेलगाड़ी की उम्मीद में जा रहे थे। थकान की वजह से वे पटरियों पर ही बैठ गए और थकान की वजह से उनकी आंख लग गई। इस बीच मालगाडी आ गई और वे मारे गए। इस दुर्घटना के बाद उद्धव सरकार की अमानवीय सोच की पूरे देश में निंदा हो रही है। अभी दो दिन पहले ही शिवसेना के मुखपत्र सामना ने संपादकीय में लिखा था कि राज्यों की सरकारें अपने मजदूरों को वापस नहीं आने दे रहीं हैं वे कह रहीं हैं कि सरकारें मजदूरों का कोरोना टेस्ट कराएं और फिर अपने खर्चे से उन्हें घर भेजें। वोट बैंक का कचरा अब किसी को अपने आंगन में नहीं चाहिए।जिन मजदूरों ने महाराष्ट्र के विकास में उसकी समृद्धि के लिए अपना जीवन नारकीय परिस्थितियों में होम कर दिया उन्हें शिवसेना की सोच आज वोट बैंक का कचरा बता रही है। ये शर्मनाक है। जब सरकारें उद्योगों को मंजूरी देती हैं तब वे उनके लिए आवश्यक मजदूरों की व्यवस्था करने की छूट भी देती हैं। उन मजदूरों के निवास भोजन की व्यवस्था करने की जवाबदारी भी लेती हैं। जब तक विकास की लोरियां सुनीं सुनाई जा रहीं थीं तब यही मजदूर महाराष्ट्र को अच्छे लग रहे थे और जब संकटकाल में उन्हें पालने की जवाबदारी आई है तो सरकार हाथ ऊंचे कर रही है। सरकार को ये होश ही नहीं है कि वह अपने मजदूरों के भोजन निवास की व्यवस्था कर पाए। वे अभागे मजदूर रेल की पटरियों पर जा रहे थे या उन्हें किसी ने मारकर पटरी पर फेंक दिया इसकी जांच होनी अभी बाकी है। पर इतना तो साफ है कि महाराष्ट्र सरकार अपना दायित्व निभाने में असफल रही है। अपने राज्य में निवास कर रहे मजदूरों का पालन करना उसकी जवाबदारी है। कोरोना का संक्रमण रोकने के लिए उन्हें मौजूदा स्थान पर ही रोकना जरूरी है। 135 करो़ड़ की आबादी वाले देश में केवल 56 हजार संक्रमितों को देखें तो केन्द्र सरकार की रणनीति कारगर रही है। लेकिन अब राज्य सरकारें यदि अपनी जवाबादारी नहीं निभाएंगी तो ये संक्रमण देश के अनेक राज्यों में गांव गांव तक फैल सकता है। एम्स के विशेषज्ञों ने भी चिंता व्यक्त की है कि जून जुलाई का महीना संक्रमण को फैलाने वाला साबित हो सकता है। जाहिर है कि सरकारों को दीर्घ रणनीति बनानी होगी और मजदूरों को सामाजिक दूरी बनाकर रोजगार और उत्पादन की कड़ी शुरु करनी होगी ताकि देश में भगदड़ न मचे और कोरोना से होने वाली संभावित मौतों को टाला जा सके।
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दिल्ली से मजदूरों को किसने खदेड़ा
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब देश में 21 दिनों के लॉक डाऊन की घोषणा की तो लोगों को लगा कि ये कैसे संभव होगा। प्रधानमंत्री ने हाथ जोड़कर अपील की और कहा कि लॉक डाऊन का मतलब पूरा बंद है। रेल और बसों का परिवहन भी रोक दिया गया। हवाई मार्ग पर भी रोक लगा दी गई। इसके बावजूद कुछ राज्यों में मजदूरों के घर लौटने की कवायद जारी है। प्रधानमंत्री ने राज्य सरकारों से जरूरत मंदों को खाना उपलब्ध कराने और खाद्य सामग्री की आपूर्ति जारी रखने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद केरल और दिल्ली से भारी संख्या में मजदूरों का पलायन हुआ है। दिल्ली में तो प्रशासनिक अधिकारियों ,मस्जिदों और आप पार्टी के कार्यकर्ताओं की ओर से ऐलान किया गया कि आपको डीटीसी की बसों से यूपी सीमा से लगे आनंद विहार बस अड्डे तक छोड़ा जा रहा है। योगी सरकार ने वहां बसें उपलब्ध कराईं हैं जिनसे आपको आपके घरों तक छोड़ा जाएगा। इस ऐलान के बाद हजारों लोगों की भीड़ बसों में भरकर यूपी बार्डर तक पहुंच गई।हजारों मजदूर तो पैदल ही घरों की ओर रवाना हो गए। जब उन्हें यूपी सरकार की बसें नहीं मिलीं तो वे पैदल ही बच्चों महिलाओं समेत अपने गांवों की ओर चल दिए।जब शोर मचा तो प्रशासन ने उनके लिए भोजन की व्यवस्था कराई और संक्रमण फैलने के खतरों के बीच इन मजदूरों को उनके घरों तक छोड़ा गया । इस पलायन ने पूरे देश में कोरोना संक्रमण फैलने की आशंका जगा दी है। राज्य सरकारों की गैर जिम्मेदारी का ये नमूना ठेठ दिल्ली में ही देखने मिला है।
चीनी वायरस कोरोना के कहर से इन दिनों पूरी दुनिया हलाकान है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे महामारी घोषित किया है।भारत में लगभग एक हजार पचास मरीजों में कोरोना वायरस की पहचान की गई है। देश के विभिन्न अस्पतालों में उनका इलाज किया जा रहा है। इस वायरस के प्रति रोग प्रतिरोधक टीके के विकास के प्रयास चल रहे हैं लेकिन टीके का विकास इतनी जटिल प्रक्रिया है कि उसे तत्काल न तो बनाया जा सकता है और न ही पूरी दुनिया में उसे उपलब्ध कराया जा सकता है। भारत की विशाल आबादी के बीच इसे फैलने से बचाने के लिए आईसीएमआर और देश के विशेषज्ञों ने त्वरित उपाय के रूप में रोग के प्रसार की कड़ी तोड़ने की सलाह दी थी। ये तभी संभव था कि जब 130करोड़ लोगों को उनके घरों में ही रोक दिया जाए। चीन के वुहान राज्य में फैले कोरोना संक्रमण के बाद चीनी सरकार ने लगभग तीन अरब लोगों को अपने घरों में कैद करने का विशाल अभियान चलाया था। चीनी पुलिस और सेना ने लोगों को घरों तक सीमित करने के लिए सख्त कवायद की तब जाकर संक्रमण का फैलाव रोका जा सका। विश्व के अन्य देशों से सबक लेकर ही भारत में संपूर्ण लॉक डाऊन का फैसला लिया गया। इससे विश्व के कई देशों की तरह भारत की अर्थव्यवस्था को भी भारी क्षति पहुंचने का अंदेशा है, इसके बावजूद कोई अन्य विकल्प नहीं था।
अमेरिका, इटली, जर्मनी,आस्ट्रेलिया ने चीन की स्थितियों से सबक नहीं लिया। नतीजतन इन देशों में कोरोना संक्रमण से मरने वालों की तादाद चीन के आंकड़ों को भी पार कर गई। भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने डाक्टरी सलाह को पूरे देश में लागू किया और संक्रमण दो चरण पार होने के बाद भी तीसरे चरण में नहीं पहुंच पाया है। तीसरे चरण का मतलब है कि महामारी घर घर तक फैल जाए। यदि ऐसा हो जाता तो भारत की स्वास्थ्य सुविधाएं अचानक अस्पताल पहुंचने वाली मरीजों की भीड़ से नहीं निपट सकती थीं। वैसे भी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिहाज से भारत दुनिया में 120 देशों के पीछे खड़ा है। भारत में सरकारी ढांचे की विफलताओं के बाद बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य को उद्योग का दर्जा देकर निजी निवेश से स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार के प्रयास किए गए हैं लेकिन इससे भारत के लोगों पर दोहरा बोझ पड़ रहा है। उन्हें इलाज निजी अस्पतालों में करवाना पड़ता है जबकि सरकारी तंत्र को पालने के लिए अपनी जेब से मोटी रकम खर्च करनी पड़ती है। मूर्खतापूर्ण ढंग से किए गए घटिया सरकारीकरण जिस तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा उसे देखकर कोरोना संकट ज्यादा भयावह नजर आने लगा है। अमीर देशों की स्वास्थ्य सुविधाएं जब कोरोना का कहर आते ही चरमरा गईं तो भारत में तो इसकी भयावहता का अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। मजदूरों के कल्याण का नारा देने वाली केरल की कम्युनिस्ट सरकार हो या कांग्रेस और कम्युनिस्ट की संकर सोच से उपजी दिल्ली की आप पार्टी सरकार सभी ने मजदूरों को उकसाकर वोट कबाड़ने की जो रणनीति अपनाई उससे कोरोना संकट का खतरा बढ़ गया है। इन सरकारों को लगा कि यदि कोरोना संकट बढ़ा तो हमारे अस्पताल आबादी के बोझ को सहन नहीं कर पाएंगे इसलिए भविष्य की बदनामी से बचने के लिए उन्होंने मजदूरों को खदेड़ना शुरु कर दिया। जब औद्योगिक विकास के लिए उन्हें मजदूर मिल रहे थे तो वे खुश थे क्योंकि इससे उन्हें राज्य में टैक्स अधिक मिलता था। लेकिन जब महामारी के आसन्न संकट का बोझ आता दिखा तो उन्होंने मजदूरों से सबसे पहले पिंड छुड़ाया। इस तरह की अमानवीयता दिल्ली की वो आप पार्टी सरकार कर रही है जिसने मोहल्ला क्लीनिक के नाम पर पूरे देश में स्वास्थ्य सुविधाओं का ढिंडोरा पीटा था। अब जबकि केन्द्र सरकार ने नाराजगी व्यक्त करते हुए वरिष्ठ अधिकारियों पर गैर जिम्मेदारी से काम करने की वजह से उन्हें हटाना शुरु कर दिया है तब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल टीवी पर आकर लोगों से अपने ही घरों में रुके रहने की अपील कर रहे हैं। भारत की राजनीति का ये अंधियारा पक्ष है जिसकी वजह से भारत आज भी छोटी सोच वाले विकासशील देश से आगे नहीं बढ़ पा रहा है। महामारी जैसे संकट से निपटने के लिए राज्यों की सरकारें यदि देश की नीति के साथ कदमताल नहीं कर पा रहीं हैं तो फिर इन सरकारों को बर्खास्त करके वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाना चाहिए ताकि देश को महामारी के प्रकोप से होने वाली क्षति से बचाया जा सके।
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छिंदवाड़ा मॉडल का फटा ढोल
कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाने के लिए कांग्रेस के जिन सयाने रणनीतिकारों ने छिंदवाड़ा मॉडल का ढोल पीटा था वे अब कहां हैं। जब छिंदवाड़ा माडल की कहानियां सुनाते कमलनाथ की कुंठित सत्ता का ढोल सरे चौराहे फट गया है तब वे सलाहकार जनता के सामने आने का साहस क्यों नहीं कर रहे हैं। कांग्रेस की सरकार के पतन के लिए असली जिम्मेदार तो वे ही हैं जिन्होंने कमलनाथ की उद्योगपति वाली छवि गढ़ने का काम किया था। नेहरू गांधी परिवार के कारिंदे के रूप में कमलनाथ बेहद असफल मुख्यमंत्री साबित हुए हैं। उन्होंने दस जनपथ के लिए रसद पानी जुटाने में भले ही सफलता पाई हो लेकिन मध्यप्रदेश की धरती पर वे एक लुटेरे शासक के रूप में ही पहचाने जाएंगे।सारी योजनाएं छिंदवाड़ा ले जाने और अन्य क्षेत्र के विधायकों के लिए खजाना खाली बताने की उनकी कंजूसी ने विधायकों को बेचैन कर दिया था। आते ही तबादलों और पोस्टिंग का जो ओछा कारोबार उन्होंने शुरु किया उसने प्रदेश भर में कोहराम मचा दिया।कांग्रेस की पिछली सरकारों ने ही अनाप शनाप नौकरियां बेचकर मध्यप्रदेश के वित्तीय प्रबंधन का कबाड़ा निकाला था। बाद की भाजपा सरकारों ने भी उसी माडल की लीक पकड़ ली। शिवराज सरकार के सलाहकार दिग्विजय सिंह और मुकेश नायक जैसे कांग्रेसी ही रहे हैं। लूट का जो साम्राज्य शिवराज सिंह चौहान की हवा हवाई शासनशैली की वजह से पनपा उससे प्रदेश में असंतोष को जगह बनाने का अवसर मिला था। शिवराज सिंह चौहान बेहद सफल कार्यकर्ता और प्रचारक रहे हैं।उन्होंने जनता के बीच लोकप्रियता भी पाई। इसके विपरीत वे कई मायनों में असफल भी साबित हुए। उन्होंने वोटरों की खेती की। तालियां बजवाने के लिए खैरातें बांटीं लेकिन वे प्रदेश को आत्मनिर्भर नहीं बना सके। इसे गरियाते कमलनाथ तो और भी फिसड्डी साबित हुए।उन्होंने आते ही जो झांकी पेली कि लोगों को लगा अब प्रदेश की समस्याओं का समाधान हो जाएगा। प्रदेश के मिलावटखोरों के खिलाफ शुद्ध के लिए युद्ध करते कमलनाथ का स्वागत किया गया लेकिन वे व्यापारियों के लुटेरे साबित हुए। उनके कार्यकाल में व्यापारियों से जो लूट खसोट की गई वह दर्दनाक थी। इसका सीधा असर प्रदेश की जनता पर पड़ा। व्यापारियों ने जरूरी सामानों की कीमतें बढ़ा दीं। अफसरों ने वसूली बढ़ा दी लेकिन मिलावटखोरी जस की तस रही। शहरों के मास्टर प्लान में अराजकता फैलाने के लिए भी कमलनाथ सरकार को कभी माफ नहीं किया जा सकेगा। रहवासी इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियां शुरु कर देना, अवैध संपत्तियों को रिश्वत लेकर वैध बना देना कमलनाथ के कारिंदों के लिए बाएं हाथ का खेल था। जिस तरह मंत्रालय के पांचवे तल पर कमलनाथ का गोपनीय आफिस चलता था उसे देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता था कि यहां कोई न कोई गलत काम जरूर हो रहा है। जनता से छिपाकर आखिर वे कौन सी जनता का भला करना चाह रहे थे। उनके कार्यकाल के फैसलों की विधिवत समीक्षा होनी चाहिए।इनमें से बहुत से फैसले निरस्त करने पड़ेंगे। प्रदेश की कानून व्यवस्था की स्थिति हो या वित्तीय व्यवस्था सभी की समीक्षा नए सिरे से करनी होगी तब जाकर पटरी से उतरी प्रदेश की गाड़ी को सीधा किया जा सकेगा। छिंदवाड़ा माडल का फटा ढोल तो सबने देख लिया है अब उस ढोल की पोल भी लोगों को दिखानी पड़ेगी। प्रयास करना होगा कि भविष्य में कोई राजनीतिक दल या सत्ता के दलालों का कोई गिरोह मध्यप्रदेश की सत्ता पर काबिज न हो सके। इसके लिए मौजूदा दलालों की फौज का सफाया करना जरूरी होगा।
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कांग्रेस की माफिया राजनीति का रुदन
शिवसेना सुप्रीमो बाला साहब ठाकरे के उत्तराधिकारी बनने का ख्वाब देश के कई लोग देखते रहते हैं। संजय राऊत भी उनमें से एक हैं। भारत की राजनीति में बाला साहब ठाकरे को कांग्रेस की परिवारवादी सोच से उपजी निराशा के अंधकार में चमकते सूर्य की तरह देखा गया। गैर कांग्रेसवाद का प्रयोग भारतीय राजनीति के कई महारथियों ने किया लेकिन बालासाहब ठाकरे ने उसे अंजाम तक पहुंचाया। आज भाजपा की गुटबाजी और एकाधिकार वादी राजनीति ने हालात बदल दिए हैं। आज शिवसेना उसी कांग्रेस के साथ आ खड़ी हुई है जिसके जेहन में माफिया शब्द गहरे तक घर जमाए बैठा है। राजाओं, सामंतवादियों के बाद अंग्रेजों और फिर आजाद भारत में जमाखोरों, मिलावटियों को ब्लैकमेल करके राजनीति की इबारत लिखती रही कांग्रेस के नेता आज भी वही पुराना धंधा चमकाने का प्रयास कर रहे हैं। कांग्रेस के साथ सत्तासीन होने के बाद शिवसेना भी इस धंधे से रोजी कमाने की जुगत भिड़ा रही है। भारत का जल व्यापार पहले निजी हाथों में था। आजादी से पहले सिंधिया घराने ने जल व्यापार में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई थी। विदेशों तक फैला जल कारोबार सिंधिया घराने की आय का बड़ा स्रोत था। जिसकी मदद से सिंधिया घराने ने अपेक्षाकृत रूप से अच्छी राजनीति की परिपाटी विकसित की। इस राजनीति को भारत की आजादी से ग्रहण लग गया। जब श्रीमती इंदिरा गांधी सत्ता में आईं तो उन्होंने सिंधिया घऱाने की आय के इस बड़े स्रोत पर कब्जा जमाने की रणनीति पर काम किया। मुंबई के अंडरवर्ल्ड डॉन करीम लाला तब समुद्री कारोबार पर माफिया गतिविधियों की वजह से गहरा नियंत्रण रखते थे। हाजी मस्तान ने भी तस्करी के कारोबार से काफी दौलत बनाई थी। इंदिरा गांधी अच्छी तरह जानती थीं कि उन्हें यदि समुद्री कारोबार पर नियंत्रण करना है तो उन्हें इस धंधे की नस कहे जाने वाले माफिया डॉनों की मदद लेनी होगी। इंदिरा गांधी की इस मंशा को महाराष्ट्र की राज्य सरकारों और पुलिस कमिश्नरों ने पूरा किया।ये बात सही है कि मुंबई का पुलिस कमिश्नर कौन होगा ये अंडरवर्ल्ड ही तय करता था। जहाजरानी मंत्रालय के अधीन बाद में बने केन्द्रीय अंतर्देशीय जल परिवहन निगम को स्थापित करके समुद्री कारोबार के बड़े खिलाड़ियों को दस जनपथ ने धंधे से बाहर कर दिया। निजी कंपनियों के जहाज धड़ाधड़ डूबने लगे, उन पर अग्निकांड होने लगे। उन्हें लूटा जाने लगा और सुरक्षा कारणों की वजह से उन्हें सरकारीकरण की जरूरत महसूस हुई जिसे आगे जाकर अंजाम दिया गया। सोने से भरे जहाज पर विस्फोट और धंधे की बर्बादी की कहानियां देश में आज तक सुनी और सुनाई जाती हैं। तब ये कहा गया कि सरकार की सुरक्षा में समुद्री कारोबार बेहतर ढंग से काम करेगा। ये हुआ भी। भारत का समुद्री कारोबार बढ़ा भी उस पर माफिया का शिकंजा आटे में नमक की तरह बना भी रहा। जब दाऊद इब्राहिम ने करीम लाला के वर्चस्व को तोड़ा तब उसे सरकार की आड़ में धंधे पर काबिज हो चुके राजनेताओं से भी जूझना पड़ा। राजनीति और माफिया के इस गठजोड़ प्रेम और दुश्मनी की कई कहानियां हैं।बाद में राजनेताओं ने निगम की आड़ में निजी मुनाफा काटने का धंधा विकसित कर लिया। आज श्रीमती इंदिरा गांधी के करीम लाला से कथित मुलाकात की कहानी ने देश में भूचाल ला दिया है उसकी वजह कुछ और है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गुजरात में बंदरगाहों की आय बढ़ाकर राज्य की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने का सफल प्रयोग कर चुके हैं। भारत की सत्ता संभालने के बाद उन्होंने यही प्रयोग मुंबई में दुहरा दिया। इसकी वजह से जल परिवहन निगम की आड़ में मुनाफा उलीच रहे कारोबारियों को दस्त होने लगे। जो जहाजरानी निगम घाटे की घाटी पर लुढ़क रहा था वो मुनाफा देने लगा। इस धंधे के पुराने खिलाड़ी बाहर होने लगे और नए खिलाड़ियों का उदय होने लगा। धंधे पर इसी पकड़ को बचाने के लिए शिवसेना का झगड़ा भाजपा से हुआ और सत्ता की नई इबारत लिख दी गई। आज कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना सभी से जुड़े व्यापारी सत्ता का पाला बदल रहे हैं। उन्हें अपने साथ रोके रखने की कवायद बड़ी कठिन साबित हो रही है। कानून और व्यवस्था राज्य का विषय होता है। इसलिए उन कारोबारियों को चमकाने के लिए संजय राऊत ने करीम लाला और इंदिराजी की मुलाकात की कहानी सुनाई है। वे बताना चाहते हैं कि आज शिवसेना माफिया के सहारे वही खेल दुहरा सकती है जिसे इंदिराजी ने कभी जहाजों की रानी को डुबाने के लिए इस्तेमाल किया था।काग्रेस के कुछ राजनेता इसे इंदिराजी की तौहीन बता रहे हैं लेकिन सच तो ये है कि माफिया के सहारे सत्ता चलाने का खेल कांग्रेस हमेशा से खेलती रही है। मध्यप्रदेश में भी उसका एक सामंत यही खेल खेल रहा है। बड़े और सफल कारोबारियों को माफिया बताकर वह अपना सिक्का चलाना चाह रहा है। मुंबई में शिवसेना गठबंधन हो या मध्यप्रदेश में कांग्रेस सभी को ये जान लेना चाहिए कि वक्त बदल चुका है। रशिया का साम्यवाद इसी माफिया के सहारे सत्ता चलाने की वजह से सत्ता से बाहर धकेला गया था। देश में भी कारोबार को बढ़ाने वाली सत्ता को पसंद किया जाता है। धंधों की जड़ों में मठा डालकर उन पर कब्जा जमाने की हवस की उम्र बहुत छोटी होती है। ये तो गनीमत है कि भाजपा के बौड़म राजनेता मोदी सरकार की चाल से कदमताल नहीं कर पा रहे हैं। वे आज भी कांग्रेस की पिछलग्गू राजनीति से मुक्त नहीं हो पाए हैं।जरूरत किसी एक सशक्त नेता की है जो कारोबारियों को एकसूत्र में बांधकर मजबूती और संरक्षण दे सके। जिस दिन ये हो गया तो माफिया के सहारे सत्ता चलाने वाली राजनीति की विदाई सुनिश्चित हो जाएगी।
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प्रज्ञा से झुलसने वालों को रद्दी में फेंको
भोपाल की सांसद प्रज्ञा सिंह को भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय की समिति का सदस्य बना दिए जाने से विघ्न संतोषी ताकतों के पिछवाड़े मिर्ची लग गई है। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब साध्वी प्रज्ञा सिंह के प्रति सार्वजनिक तौर पर नाराजगी व्यक्त की थी तो उन्हें रक्षा समिति जैसे महत्वपूर्ण कार्य की जवाबदारी कैसे दी जा सकती है। भोपाल की सांसद से चिढ़ने वालों की फेरहिस्त बड़ी लंबी है। जबसे साध्वी प्रज्ञा को भाजपा ने सांसद के रूप में प्रोजेक्ट किया था तबसे उन्हें विवादों में घसीटने के प्रयास लगातार होते रहे हैं। अब जबकि वे 21 सदस्यों वाली रक्षा समिति की सदस्य बनाई गईं हैं तब यही विघ्न संतोषी अपना पिछवाड़ा संभालते हुए उछलने लगे हैं। साध्वी प्रज्ञा सिंह को 2008 में हुए मालेगांव बम धमाके का आरोपी बनाकर कांग्रेस के कुछ षड़यंत्रकारियों ने हिंदू आतंकवाद की नई परिभाषा गढ़ी थी। इसे खूब प्रचारित किया गया। कर्नल श्रीकांत पुरोहित को भी इस बम धमाके में आरोपित किया गया था जिन्हें बाद में निर्दोष पाया गया और अब वे सेना में दुबारा अपना काम संभाल चुके हैं। दरअसल तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल और उसके बाद कांग्रेस के ही सुशील कुमार शिंदे ने इस बम धमाके को हिंदू बनाम मुस्लिम झड़प का रूप देने का प्रयास किया था। कांग्रेस के ही दिग्विजय सिंह ने इसे हिंदू आतंकवाद का नाम देते हुए साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का अभियान चला दिया। देश में लंबे समय तक ये बम धमाका जातिगत वैमनस्य की वजह बना रहा। अब जबकि एनआईए की गढ़ी गई कहानी झूठी साबित हो रही है तब देश का एक बड़ा तबका इस पर संशय महसूस कर रहा है। इस मामले की सुनवाई कर रहे जज ने भी सवाल पूछा कि यदि एनआईए की कहानी झूठी है तो बम धमाका किसने किया था। दरअसल एनआईए के तत्कालीन अफसरों के माध्यम से कांग्रेस सरकार ने जिस तरह बम धमाके को साम्प्रदायिक रंग देने का प्रयास किया उससे आज भी लोग असमंजस महसूस कर रहे हैं। मालेगांव के बम धमाके में 7 लोगों की मौत हुई थी और सौ से अधिक लोग जख्मी हो गए थे। इस धमाके के वास्तविक आरोपियों को तो जांच के दायरे से बाहर कर दिया गया और आतंक के खिलाफ काम करने वालों को आरोपी बना दिया गया। जाहिर है कि अब जबकि साध्वी प्रज्ञा को देश की रक्षा समिति का सदस्य बना दिया गया है तब उनके खिलाफ षड़यंत्र रचने वाला बड़ा समूह आहत महसूस करेगा ही। अब समय आ गया है कि जब भारत की सेना और नागरिकों पर हिंदू आतंकवाद जैसा लांछन लगाने में असफल होने के बाद जो लोग बैचेन हो रहे हैं उनकी आपत्तियों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया जाना चाहिए। भारत में आतंकवाद फैलाने वालों पर कड़ी कार्रवाई होने से जो लोग परेशान महसूस करते हैं उनकी चिंता की जाएगी तो फिर भारत में भी एक नया पाकिस्तान बन जाएगा। आज पाकिस्तान ऐसे ही आतंकवादियों से परेशान है। भारत में इस आतंक की कमर तोड़ने के लिए सेना और सरकार को जो भी उपाय बन पड़ें बेखौफ होकर करने चाहिए। इसमें किसी आतंकवादी के मानवाधिकारों की चिंता करने वालों की भी खबर ली जाना जरूरी है।जो लोग आतंकवाद की पैरवी करते फिरते हैं उनके लिए साध्वी प्रज्ञा भारती के रक्षा समिति में चयनित होने पर चिंतित होना लाजिमी है। देश की सुरक्षा के प्रति चिंतन करने का काम वही लोग कर सकते हैं जो देश के लिए मरने मिटने के लिए तैयार हों। अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए तैयार हों। साध्वी प्रज्ञा सिंह मालेगांव बम धमाके के प्रताड़ना तंत्र से चोखी साबित होकर वापस आईं हैं। भोपाल की जनता ने षड़यंत्रकारी दिग्विजय सिंह को भारी मतों से हराकर उन्हें संसद भेजा है। महात्मा गांधी की हत्या निश्चित तौर पर निंदनीय और गलत थी। देश महात्मा गांधी की क्षति पूर्ति कभी नहीं कर सकता। इसके बावजूद नाथूराम गोड़से की देशभक्ति पर सवाल खड़े करना उन लोगों की सीमित दृष्टि का ही नतीजा है जो खरगोश की तरह आंखें बंद करके दुश्मन के चले जाने का भ्रम पालते फिरते हैं। साध्वी प्रज्ञा के बयानों पर लाख सवाल उठाए जाएं पर उनकी देशभक्ति शंका से परे है। रक्षा मंत्रालय या भारत सरकार के जिन भी लोगों ने साध्वी को ये महत्वपूर्ण जवाबदारी दी है उन्होंने देश को संदेश देने का प्रयास किया है कि वे रक्षा के मुद्दे पर किन्हीं भी सीमाओं तक जा सकते हैं। निश्चित रूप से भारत में आतंक फैलाने की मंशा रखने वालों के लिए ये कड़ा संदेश है।इसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है।
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बगैर प्रसाद कैसे मिले आशीर्वाद
मध्यप्रदेश सरकार ने लोकप्रियता बटोरने के लिए आपकी सरकार जनता के द्वार कार्यक्रम शुरु किया है। इस कार्यक्रम के माध्यम से सरकारी अफसर केम्प लगाकर जन समस्याओं का निदान करेंगे।नई बोतल में पुरानी शराब की तरह सरकार का ये कार्यक्रम जनता के बीच संवाद कायम करने का प्रयास है।प्रदेश की अधिसंख्य आबादी ने कांग्रेस को सत्ता नहीं सौंपी है। भाजपा को मिले मतों की संख्या कांग्रेस को मिली मत संख्या से अधिक है। जाहिर है कि जनता का बहुत बड़ा तबका कांग्रेस की नीतियों से इत्तेफाक नहीं रखता है। इसके बावजूद कांग्रेस सीटों के गणित की वजह से सत्ता में आ गई है।यही वजह है कि सरकार की नीतियों के प्रति जनता के बीच संतोष का भाव अब तक नहीं पनप पाया है।मुख्यमंत्री कमलनाथ ये बात अच्छी तरह जानते हैं। यही वजह है कि वे सत्ता का संचालन राज्य मंत्रालय में बैठकर ही चला रहे हैं। उन्हें मालूम है कि जब तक वे जनता को कुछ चमत्कार करके नहीं दिखा सकते तब तक जनता के बीच जाने पर उनका स्वागत फीके अंदाज में ही किया जाएगा। यही वजह है कि उनकी सरकार समस्याओं का इलाज करने के बजाए उन पर हाथ फेरने का उपाय अधिक कर रही है। सरकारी तंत्र जनता की समस्याओं के निदान के लिए जवाबदार है और उसके लिए सरकारी व्यवस्था ने बाकायदा बारह मासी दफ्तर लगाकर तैनात किया है। इसके बावजूद जनता की समस्याएं नहीं सुलझ पाती हैं। इसकी वजह सरकारी अफसरों और कर्मचारियों की लापरवाही और लालफीताशाही जिम्मेदार है। इसका समाधान अधिकाधिक योजनाओं को सरकारी तंत्र से मुक्ति दिलाकर ही किया जा सकता है। सरकार इसका समाधान उसी सरकारी तंत्र पर निर्भर होकर करना चाह रही है। राजीव गांधी की पंचायती राज व्यवस्था इसी सरकारी तंत्र को बाईपास करने का प्रयास था। पूर्व वर्ती दिग्विजय सिंह की सरकार ने भी इसी तरह की योजना चलाकर गांव गांव जाने का प्रयास किया था। वह योजना भ्रष्टाचार का विकेन्द्रीकरण बन गई थी। बुरी तरह असफल उस योजना की वजह से ही राज्य में भाजपा की सरकार का उदय हुआ था। पंद्रह सालों की भाजपा सरकार इस योजना से इतनी डरी हुई थी कि शिवराज सिंह चौहान ने कभी दुबारा अफसरों को बाईपास करने का साहस नहीं किया। वे अपनी सरकार अफसरों पर ही आश्रित रहकर चलाते रहे। यही वजह थी कि उनकी सरकार के कार्यकाल में भाजपा के कार्यकर्ता और नेता हमेशा शिकायत करते रहे कि अफसर हमारी बात नहीं सुनते हैं। कमलनाथ ने सरकार में आते ही अफसरों पर शिकंजा कसना शुरु कर दिया। तबादलों की बयार लाकर उन्होंने पहले तो अफसरों की जड़ें ढीली कीं और फिर कार्यकर्ताओं की शिकायतों पर उन्हें फुटबाल बना दिया। आज ये हालत है कि भारी चंदा देकर मनचाही पोस्टिंग पर पहुंचे अफसर को भी भरोसा नहीं कि वो अपनी पोस्टिंग पर बना रहेगा। एक अदना सा कार्यकर्ता यदि उसके कामकाज से असंतुष्ट होता है तो अफसर को उसकी पोस्टिंग से हटा दिया जाता है। सरकार अपनी इस नीति से अफसरशाही को लोकशाही में बदलने का प्रयास कर रही है। बरसों पुराने ये प्रयास बार बार असफल रहे हैं। अफसरों के चयन की प्रक्रिया और लोकतंत्र का ढर्रा इतना बिगड़ चुका है कि अब इसे कारगर प्रशासन का रूप दे पाना असंभव है। इसके बावजूद कमलनाथ प्रदेश में तीस साल पुराने सरकारीकरण को सफल बनाने का प्रयास कर रहे हैं। जो व्यवस्था प्रदेश और देश के विकास के लिए अनुत्पादक साबित हो चुकी है कमलनाथ उसे सफल होता दिखाने का प्रयास कर रहे हैं।मध्यप्रदेश राज्य अपनी इस अनुत्पादक व्यवस्था पर हर महीने तीन हजार दो सौ करोड़ रुपए खर्च करता है।वेतनमान बढ़ाए जाने के बाद इस व्यवस्था पर खर्च और भी ज्यादा बढ़ गया है। इसकी तुलना में राज्य को होने वाली मासिक आय घटी है। राजनैतिक चंदा वसूली की वजह से खजाने को होने वाली आय पर चोट पहुंची है। सरकार का लक्ष्य है कि इस कवायद से वह उस राजस्व को एकत्रित कर पाने में सफल होगी जो आज भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है। राज्य के बजट में टैक्स का आकलन भी बढ़ाकर किया गया है। राज्य सरकार यदि फिजूलखर्ची रोकने में सफल होती तो वह जनता के बीच अपनी लोकप्रियता बढ़ा सकती थी। फिलहाल तो सरकारी कवायद का सीधा असर जनता की जेब पर पड़ रहा है। सरकारी उठापटक का खमियाजा जनता को भुगतना पड़ रहा है। जिस तरह खाद्य वस्तुओं के सैंपल भरे जा रहे हैं और इसकी आड़ में भारी चंदा वसूली की जा रही है उसका बोझ अंतिम पंक्ति में पड़े आम नागरिक को उठाना पड़ रहा है। शायद यही लोकतंत्र की वह मंहगी कीमत है जो आम जनता को भुगतनी पड़ रही है।अगस्त का महीना आजादी के आकलन का महीना माना जाता है। जनता जाति, धर्म, संप्रदाय, बाजारवाद के जिन मुद्दों के बीच उलझी है उसके बीच वह इन मूलभूत मुद्दों का चिंतन आमतौर पर नहीं कर पाती है। सरकार को और राजनेताओं को इस विषय पर चिंतन जरूर करना चाहिए। फिलहाल तो सरकार का ये प्रयास होना चाहिए कि वो जनता के भरोसे को कैसे कायम रख पाती है।
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आकाश की रिहाई की पहल करे सरकार
कैलाश विजयवर्गीय के बेटे आकाश विजयवर्गीय ने मकान गिराने गए नगर निगम के अफसर को क्रिकेट के बैट से धुन डाला। अदालत ने इसे सरकारी काम में हस्तक्षेप बताते हुए आकाश को चौदह दिन की हिरासत में भेज दिया। मीडिया ने इसे विधायक की गुंडागर्दी बताते हुए सरकार की चिरौरी करना शुरु कर दी। इंदौर में इसे लेकर बावेला मचा है। आकाश ने अपने बयान में कहा कि लोक निर्माण मंत्री सज्जन सिंह वर्मा के रिश्तेदार(करीबी) ने वो पुराना मकान खरीद लिया था। नगर निगम का अमला बारिश के मौसम में उसे गिराने पहुंचा था। ये कवायद पिछले साल भी की गई थी। परिवार ने बेघर होने के बचने के लिए मोहलत मांगी तो निगम के अफसर ने महिलाओं को पैर पकड़कर बाहर घसीटना शुरु कर दिया। बगैर महिला पुलिस बुलाए ये कार्रवाई आनन फानन में इसलिए की गई क्योंकि निगम के अमले ने मकान खाली करने की सुपारी ली थी। जब इस बदतमीजी की खबर लोगों को मिली तो भीड़ इकट्ठी हो गई। लोगों ने इंदौर 3 के विधायक होने के नाते आकाश को बुला लिया। निगम का बायस नाम का अफसर खुद को कर्तव्यनिष्ठ बताने में जुटा था और लोगों में नाराजगी बढ़ती जा रही थी। विधायक ने निगम अमले को भीड़ के आक्रोश से बचाने के लिए उन्हें दस मिनिट में वापस लौट जाने को कहा। इस पर भी बायस नहीं माना और ज्यादा पुलिस बल को जुटाने का प्रयास करने लगा। निगम के अमले ने जो अप्रिय स्थितियां निर्मित की उसका नतीजा ये हुआ कि आकाश विजयवर्गीय ने क्रिकेट के बैट से धक्का देकर अफसर को घटना स्थल से जाने को कहा। सरकार के कारिंदों ने इस घटना के लिए विधायक को दोषी बताते हुए उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने का दबाव बनाना शुरु कर दिया।मकान खाली कराने की कवायद सामाजिक दबाव के साथ राजी खुशी से भी की जा सकती थी। भोपाल में चल रही कैबिनेट बैठक में ये मामला इसी नजरिए से रखा गया। सरकार ने बगैर सोचे समझे पुलिस को हरी झंडी दिखा दी। सरकार के उत्साही गृह मंत्री बालाबच्चन और लोक निर्माण मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने आग में घी डालने का काम किया और पुलिस ने आकाश को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। आकाश के वकील इस घटनाक्रम को सही ढंग से प्रस्तुत नहीं कर पाए। कैलाश विजय वर्गीय पर घटना की निंदा करने का दबाव बनाने वाले पत्रकार को जब नसीहत दी गई कि वह जज बनने का प्रयास न करे तो उसे भी मीडिया ने प्रेस की आजादी पर हमला बताना शुरु कर दिया। दरअसल इस पूरे घटनाक्रम में अफसरों ने सरकार को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। इंदौर में नगर निगम का अमला जिस तरह भू माफिया बनकर काम कर रहा था उसके कारण ये अप्रिय स्थितियां निर्मित हुई हैं। नगर निगम का अमला पिछले एक साल से इस परिवार के विस्थापन और समझाईश में क्यों असफल हुआ इसकी वजह नहीं खोजी जा रही है। यदि मकान मंत्रीजी के करीबी ने भी खरीदा था तो निगम का अमला सदाशयता पूर्वक रहवासी परिवार के विस्थापन की कार्रवाई कर सकता था। बारिश के मौसम में परिवार को सुरक्षित ठिकाने पर पहुंचाना निगम की जवाबदारी थी। निगम के पास इसके कई वैकल्पिक प्लान मौजूद थे। इसके बावजूद जिस तरह से परिवार की महिलाओं से बदसलूकी की गई उसके कारण तनाव पनपना स्वाभाविक था। जब इंदौर में ही हजारों परिवार विवादित प्रापर्टीज पर जमे हैं और निगम का अमला उन्हें खाली नहीं करा पा रहा है तो एक निरीह परिवार पर बहादुरी दिखाने की जरूरत निगम के अमले को क्यों पड़ गई। सरकार के काबिना मंत्री को ऐसी क्या जल्दबाजी थी जो उन्होंने निगम के अमले पर मकान खाली करने का दबाव बना डाला। दरअसल इंदौर का ये विवादित मकान शहर के विकास के कारण बहुत मंहगा स्थान बन चुका है। इसी वजह से मकान मालिक ने उसे मंहगी कीमत में बेच दिया। अब उस मंहगी प्रापर्टी को बाजार में बेचने लायक माल बनाने के लिए ही निगम के माध्यम से उसे जर्जर प्रापर्टी घोषित कराया गया था। जबकि मकान इस स्थिति में नहीं है कि खुद ब खुद गिर जाएगा। निगम कमिश्नर से लेकर अतिक्रमण अमले तक सभी इस प्रक्रिया में शामिल रहे। बेशक इस बेदखली को कानूनी रूप दिया गया है। इसके बावजूद मानवीय दृष्टिकोण से बेदखली को सहज बनाने में इंदौर नगर निगम पूरी तरह असफल साबित हुआ। निगम के किसी अफसर को ये छूट नहीं कि वो अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए नागरिकों पर बर्बरता करने लग जाए। यदि निगम का अमला अपनी कार्रवाई को रणनीतिक रूप से अंजाम देता तो ये हालात नहीं बनते। निगम के अमले को भीड़ के आक्रोश से बचाने के लिए विधायक आकाश विजयवर्गीय ने जिस हिकमतअमली का प्रयोग किया उसकी सराहना की जानी चाहिए। इसके बावजूद सरकार के चिलमखोर उसे विधायक की बदसुलूकी बताने की कोशिश कर रहे हैं। मुख्यमंत्री कमलनाथ हों या सरकार के आला अफसरान सभी को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। आकाश विजयवर्गीय पर कानून का डंडा चलाना आज इंदौर में सरकार की ज्यादति माना जा रहा है। इस घटनाक्रम ने आकाश को जन जन का नेता बना दिया है।सिख संस्कृति में तो लोकहित के लिए लड़ने वाले को शूरवीर कहा जाता है। निगम के अमले की असफलता को छुपाने के लिए सरकार जिस तरह राजनीतिक विद्वेष से ग्रसित होकर अधिकारों का दुरुपयोग कर रही है उससे अल्पमत की सरकार के प्रति जन आक्रोश बढ़ने लगा है। सरकार के सभी नेता कह रहे हैं कि कानून अपना काम करेगा। उन्होंने घटना की निंदा करना और बयान देना भी शुरु कर दिया। अब जबकि घटना का दूसरा पहलू भी सामने आ गया है तब सरकार को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। इंदौर में नगर निगम के अमले को खदेड़ने का अभियान सरकार को खदेड़ने का जनआंदोलन न बनने पाए इसके पहले सरकार को सदाशयता दिखाते हुए विधायक आकाश विजयवर्गीय की रिहाई के लिए आगे आना चाहिए। निगम के अमले को जनता से बदसुलूकी करने के लिए भी दंडित किया जाना चाहिए।मौजूदा हालात में यही उचित होगा।
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दस लाख कारोबारियों पर चोट
सरकार ने गुमाश्ता कानून में कराए गए पंजीकरण को हर पांच साल में नवीनीकृत कराने का नियम समाप्त कर दिया है। अब मध्यप्रदेश में दुकान और स्थापना अधिनियम-1958 के प्रावधानों के तहत छोटे दुकानदारों, स्थापनाओं एवं स्टार्ट-अप को बार-बार दुकानों के लाईसेंस का नवीनीकरण नहीं कराना होगा। कमलनाथ सरकार का कहना है कि ऐसा करके उसने छोटे दुकानदारों और कारोबारियों को ईज आफ डूइंग बिजिनेस की तहजीब से झंझट मुक्त कर दिया है। इस निर्णय से प्रदेश के लगभग 10 लाख से अधिक छोटे दुकानदार, स्थापना व्यवसाई और स्टार्ट-अप लाभान्वित होंगे। नई व्यवस्था के अनुसार दुकानदार और स्थापनाओं को पूरे व्यवसाय अवधि में एक बार ऑनलाइन पंजीयन कराना होगा। पंजीयन कराने के बाद भविष्य में व्यवसाय के स्वरूप में परिवर्तन होने पर ही अपने पंजीयन में संशोधन कराना होगा।साथ ही पंजीयन की विभिन्न श्रेणियों को खत्म कर मात्र दो श्रेणी तक ही सीमित किया जा रहा है।पहली नजर में यह कदम बहुत जनोन्मुखी नजर आता है। सरकार और उसकी संस्था कांग्रेस भी यही प्रचारित कर रही है। जबकि हकीकत में ये बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सुभीते के लिए उठाया गया कदम है। वालमार्ट जैसी संस्थाओं ने भारत में अपना कारोबार फैलाने के लिए बाजार की आजादी स्थापित करने की मांग लंबे समय से उठा रखी है। छोटे उपभोक्ताओं के दबाव के कारण ही वालमार्ट के ब्रांडों को केवल थोक कारोबार की इजाजत दी गई है। वे अपना माल केवल थोक उपभोक्ताओं को बेच सकते हैं। इसके लिए उन्हें थोक उपभोक्ताओं के गुमाश्ता प्रमाण पत्र को ग्राहकी का आधार बनाना होता है। जाहिर है कि हर साल या पांच साल में जारी किए जाने वाले गुमाश्ता प्रमाणपत्र को वालमार्ट में हर बार नवीनीकृत कराना होता है। जैसे ही गुमाश्ता अनुमति का समय बीत जाता है वैसे ही वालमार्ट उस प्रमाणपत्र पर कारोबार नहीं कर सकता। इससे वालमार्ट के तमाम ब्रांड भारत में खासा घाटा उठा रहे हैं। उनकी मांग है कि उन्हें फुटकर कारोबार की इजाजत दी जाए। वालस्ट्रीट के दिग्गज मार्गन स्टेनली का कहना है कि भारत में वालमार्ट को यहां के नियमों के कारण घाटा हो रहा है। अमेरिकी रिटेल कंपनी वालमार्ट ने भारत के जिस प्रमुख ई कामर्स प्लेटफार्म फ्लिपकार्ट में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई थी उसे वह बेच सकती है। ये उसी तरह होगा जैसे 2017 में अमेजन ने चीन को छोड़ दिया था। ब्रोकरेज फर्म मार्गन स्टेनली का कहना है कि भारत में ई कामर्स में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश(एफडीआई) के जो नए नियम बने हैं उनसे वालमार्ट और अमेजन जैसे दिग्गज भी हिल गए हैं। वालमार्ट ने मई 2018 में भारत की सबसे बड़ी ई कामर्स कंपनी फ्लिपकार्ट में 77 प्रतिशत हिस्सेदारी करीब 1.07 लाख करोड़ रुपए में खरीदी थी। स्थानीय कारोबारियों ने तबसे ई कामर्स कंपनियों के खिलाफ अभियान चला रखा है। कारोबारियों का कहना है कि ई कामर्स के कारण उनका कारोबार तबाह हो रहा है।इसके बाद मोदी सरकार ने एफडीआई के नियमों में जो बदलाव किए उनके चलते फ्लिपकार्ट को अपने मौजूदा प्रोडक्टस में से 25प्रतिशत को हटाना पड़ रहा है। इसमें स्मार्टफोन और इलेक्ट्रानिक्स के आईटम भी शामिल हैं। सप्लाई चेन और एक्सक्लूसिव डील्स को लेकर नियमों में बदलाव से इलेक्ट्रानिक सेगमेंट पर बड़ा प्रभाव पड़ रहा है। जबकि फ्लिपकार्ट की 50 फीसदी कमाई इसी केटेगरी से आती है। हालत ये हो गई है कि अमेजन को अपने दो टाप सेलर्स क्लाऊडटेल और एपैरियो को भी हटाना पड़ा है। क्योंकि इन दोनों में अमेजन की हिस्सेदारी थी। एक फरवरी से लागू नए नियमों के मुताबिक एफडीआई वाली ई कामर्स कंपनियां मार्केटप्लेस पर उन कंपनियों का सामान नहीं बेच सकेंगी जिनमें उन्होंने निवेश कर रखा है। इसी तरह वे एक्सक्लूसिव बिक्री के लिए भी करार नहीं कर सकती हैं। अमेजन ने तो इन नियमों का विरोध करते हुए एक फरवरी से अपने प्लेटफार्म पर किराना प्रोडक्ट्स की बिक्री रोक दी है। भारत में निवेश करने वाली इन्हीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव के आगे झुकते हुए मध्यप्रदेश सरकार ने गुमाश्ता कानून की रीढ़ तोड़ दी है। अब जो प्रमाण पत्र एक बार जारी हो जाएंगे वे लगातार अस्तित्व में रहेंगे। इससे इन विदेशी कंपनियों को अपना ग्राहक आधार बढ़ाने में मदद मिलेगी। एक तरह से ये रिटेल बाजार में कब्जा जमाने की ओर बढ़ता कदम ही होगा। हालिया विधानसभा चुनावों में व्यापारियों ने भारी चंदा देकर भाजपा को हराने और कांग्रेस को सत्ता में लाने की मुहिम चलाई थी। सरकार के इस फैसले से उन्हें निराशा होगी। सरकार दावा कर रही है कि उसके इस फैसले से दस लाख छोटे व्यापारियों को सरलता हो जाएगी। जबकि हकीकत ये है कि सरकार के इस फैसले से दस लाख छोटे व्यापारियों की रोजी रोटी छिनने का संकट बढ़ गया है। भारत में पूंजीवाद लाने के लिए खुले बाजार को छूट देने की पहल 1991 में नरसिम्हाराव सरकार के वित्तमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह की पहल पर की गई थी। इसके बाद एनडीए की मनमोहन सिंह सरकार ने उन नीतियों को आगे बढ़ाया। आज जब मोदी सरकार देश की समृद्धि बढ़ाने की उसी दिशा में आगे बढ़ रही है तब उन नीतियों की आलोचना की जा रही थी। राज्य में कमलनाथ सरकार उन्हीं वैश्विक नीतियों को लागू कर रही है जिसका विरोध स्थानीय कारोबारी लंबे समय से करते रहे हैं। जाहिर है कि सरकार का यह फैसला एक बार फिर टकराव का माहौल निर्मित करेगा।
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गोपाल लीला की स्वीकार्यता
पंडित गोपाल भार्गव की लीलाओं का जादू पिछले पैंतीस सालों से रहली गढ़ाकोटा क्षेत्र की जनता के सिर चढ़कर बोलता रहा है। जब प्रदेश में कांग्रेस की सरकारें हुआ करतीं थीं तब भी इलाके के लोग अपने गोपाल को विधानसभा भेजते थे। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने इस तिलिस्म को तोड़ने के लिए अपने अठारह मंत्रियों की भीड़ गढ़ाकोटा ले जाकर सम्मेलन किया था। उनका मानना था कि जनता के बीच वे गोपाल भार्गव की लोकप्रियता को कुचल देंगे। प्रदर्शन करते गोपाल भार्गव को पुलिस ने गिरफ्तार करके जनता को डराने की कोशिश भी की,लेकिन इसके बावजूद गोपाल भार्गव चुनाव जीते। विधानसभा में उन्होंने बीड़ी मजदूरों की बेबसी और उन्हें बीमे का लाभ दिलाने की आवाज उठाई जिसे दिग्विजय सिंह सरकार ने स्वीकार किया। तबसे गोपाल भार्गव और दिग्विजय सिंह के बीच सदाशयता के संबंध विकसित हुए जो आज तक बरकरार हैं।भाजपा की ओर से राजनाथ सिंह ने एक बार फिर उन्हें नेता प्रतिपक्ष घोषित करके संवाद का ऐसा पुख्ता पुल तैयार कर दिया है जो प्रदेश के विकास के लिए सोने में सुहागा साबित होने जा रहा है।उनके नेता प्रतिपक्ष के रूप में भाजपा सकारात्मक प्रतिरोध का नया अध्याय लिखने जा रही है।गोपाल भार्गव को ये जवाबदारी तब मिली है जब वे राजनैतिक परिपक्वता के शिखर पर पहुंच गए हैं।लंबे समय से सरकार में कैबिनेट मंत्री रहते हुए उन्होंने राजनीति को करीब से देखा समझा है।सत्ता पक्ष के कई वरिष्ठ मंत्री भी जब भाजपा के सत्ता से बाहर जाते समय उनका बंगला खाली होने का इंतजार कर रहे थे तब भार्गव ने ये कहते हुए टाल दिया कि अभी इंतजार करिए।जाहिर था कि वे पार्टी और कांग्रेस दोनों के ही नेताओं को आश्वस्त कर चुके थे कि अब उनकी बारी है। उमा भारती की सरकार में भी गोपाल भार्गव की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है। जब स्वर्गीय प्रमोद महाजन ने सारे विरोध को दरकिनार करते हुए शिवराज जी को मध्यप्रदेश की सत्ता की बागडोर पकड़ा दी थी तब गोपाल भार्गव या कैलाश विजयवर्गीय जैसे दिग्गज नेता यदि विद्रोह को हवा देते तो शिवराज को सत्तासीन नहीं किया जा सकता था। पार्टी के प्रति अनुशासन का वो शीर्ष दौर था जब सभी ने शिवराज जी को नेता के रूप में स्वीकार किया और चौदह सालों तक बखूबी साथ दिया। शिवराज जी को मुख्यमंत्री बनाए रखने वाली उद्योगपतियों,अफसरों और ठेकेदारों की जिस लाबी ने भाजपा के बधियाकरण की मुहिम चलाई उसी ने इस बार नखदंत विहीन भाजपा को सत्ता से बाहर खड़ा करवा दिया। शिवराज जी के कार्यकाल में जमीन से कटे दूसरी पंक्ति के जिन नेताओं को सत्ता के करीब ला खड़ा किया गया वे समय आने पर असरहीन साबित हुए।कई के तो चुनाव सामने देखकर हाथ पैर फूल गए थे। उनमें से कई ऐसे भी थे जो चुनाव के वक्त शिवराज का साथ छोड़कर दूर खड़े थे। पार्टी संगठन का ढांचा इस कदर तोड़ दिया गया था कि संगठन की आवाज बेअसर साबित हुई और मैदान में खड़े विद्रोही भाजपा की हार की बड़ी वजह बने।अब ऐसे वक्त गोपाल भार्गव को सदन में पार्टी का नेतृत्व करने का अवसर मिला है। हार से हताश भाजपा के विधायकों को अब भी भरोसा नहीं हो रहा कि वे सत्ता से बाहर किए जा चुके हैं,वो भी उस कांग्रेस के हाथों जो मैदान से नदारद थी। नेता प्रतिपक्ष की दौड़ में शिवराज सिंह चौहान की ओर से पूर्व मंत्री राजेन्द्र शुक्ल का नाम उठाया गया था। तर्क दिए जा रहे थे कि विंध्य क्षेत्र में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा रहा है इसलिए उन्हें नेता प्रतिपक्ष के रूप में अवसर दिया जाना चाहिए। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की पसंद के रूप में पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा का नाम भी लिया जा रहा था। सवर्ण समाज के नाम पर उन्हें नेता प्रतिपक्ष के रूप में प्रचारित भी किया गया। उनके विरोध में कहा गया कि वे बमुश्किल चुनाव जीते हैं जबकि जनसंपर्क महकमा उनके पास था। पार्टी के भीतर संगठन के कई वरिष्ठ कार्यकर्ता भी नरोत्तम के खिलाफ थे। उन्होंने प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे और राजनाथ सिंह तक अपनी नापसंदगी की बात पहुंचाई। अमित शाह का कथित करीबी होने के कारण कोई खुलकर नहीं बोल रहा था। इसलिए जवाबदारी राजनाथ जी को सौंप दी गई। राजनाथ सिंह ने रायशुमारी के आधार पर अमित शाह के सामने गोपाल भार्गव का नाम रखा जिसे उन्होंने तत्काल अपनी मंजूरी दे दी। इसके साथ ही मध्य प्रदेश में रहली विधानसभा क्षेत्र से आठवीं बार विधायक बने पंडित गोपाल भार्गव विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष घोषित कर दिए गए। सोमवार को भारतीय जनता पार्टी के विधायक दल की बैठक में भार्गव को नेता चुना गया। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने गोपाल भार्गव को विधायक दल का नेता चुने जाने का प्रस्ताव रखा, जिसका पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने समर्थन किया। इसके बाद केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भार्गव को निर्विरोध रूप से भाजपा विधायक दल का नेता निर्वाचित किए जाने का एलान किया। जाहिर है कि गोपाल भार्गव आज की भाजपा के सर्वमान्य नेता के रूप में सामने आए हैं। शिवराज गुट के पतन के बाद भाजपा हाईकमान राज्य भाजपा को ऩए सिरे से संगठित होते देखना चाहता है। गोपाल भार्गव इस काम में निपुण हैं। विधानसभा में भाजपा अपने 109 विधायकों के साथ मजबूत स्थिति में है। जाहिर है कि बरसों बाद प्रदेश को एक मजबूत विपक्ष मिला है। गोपाल भार्गव कभी पाखंडी राजनीति के पक्षधर नहीं रहे हैं। जाहिर है कि उनके नेतृत्व वाला विधायक दल भी सकारात्मक और ठोस राजनीति का पैरवीकोर रहेगा। ऐसा पहली बार ही होगा जब इतना सशक्त और सकारात्मक विपक्ष प्रदेश को मिला है जो राज्य में नई राजनीति की इबारत लिखेगा।
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दलितों को भड़काने वालों तक पहुंचे डंडे की मार
देश की सर्वोच्च अदालत यानि सुप्रीम कोर्ट ने साफ कह दिया है कि वो अनुसूचित जाति के हित संरक्षण के लिए बने कानून के खिलाफ नहीं है। इस कानून के दुरुपयोग के संबंध में उसने जो संशोधन सुझाए हैं सरकार को उन्हें अमल में लाना चाहिए। काशीनाथ महाजन की याचिका पर दिए गए फैसले के संबंध में अन्य याचिकाओं को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने खुली अदालत में सरकार के पक्ष को सुनने के लिए समय भी दिया है। जाहिर है इस संबंध में फैली भ्रांतियों का निराकरण समय रहते ठीक प्रकार से हो चुका है। वैसे भी अदालत के फैसले को समझे बगैर जो लोग निजी स्वार्थों के लिए दलितों को भड़काने का प्रयास कर रहे थे उनकी भी कलई खुल गई है। इस फैसले के संबंध में जो अपीलें बाद में की गईं ये प्रक्रिया पहले भी अपनाई जा सकती थी। इसके विपरीत हिंसा का रास्ता चुनकर देश के विभिन्न इलाकों में जो विद्वेष की आग भड़काई गई उससे साफ प्रतीत होता है कि आजादी के इतने सालों के बाद भी देश का जनमानस परिपक्व नहीं हो पाया है। लोग ये समझने तैयार नहीं कि ये जनभावनाओं को सर्वोपरि मानकर चलने वाला देश है। आजादी का जो अर्थ लोगों के जेहन में जगाया गया है उससे देश का बहुत बड़ा वर्ग अराजकता को ही आजादी मानने लगा है। सबसे चिंताजनक बात तो ये है कि देश पर लंबे समय तक शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी ही आजादी के नाम पर लोगों को बरगलाने का काम कर रही है।
कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने भड़काए गए दलितों की आग में घी डालने के लिए ट्वीट करके हिंसा करने वालों को अपना सलाम भेजा। फैसला सुप्रीम कोर्ट का था जबकि राहुल गांधी ने लिखा कि दलितों को भारतीय समाज के सबसे निचले पायदान पर रखना आरएसएस और बीजेपी के डीएनए में है।जो इस सोच को चुनौती देता है वे उसे हिंसा से दबाते हैं। सरकार से अधिकारों की रक्षा करने की मांग करना लोगों का संवैधानिक हक है। सरकार ने उन्हीं हितों की रक्षा करते हुए सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की है।अदालत के बाहर इस मामले का कोई औचित्य नहीं है। इसके बावजूद देश भर में दलित संगठनों को हिंसा के लिए उकसाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने यदि कोई राय व्यक्त की है तो वह कानून का रूप ले लेती है। जिसका पालन करवाना और करना सरकार और पुलिस का काम होता है। कानून के विरुद्ध लोगों को उकसाना निश्चित तौर पर आपराधिक कृत्य है। जाहिर है कि कानून का पालन करवाने के लिए पुलिस को वही करना चाहिए जो वह आम नागरिकों के साथ करती है। पुलिस का हवलदार यदि किसी आपराधिक तत्व के पिछवाड़े डंडा फटकारता है तो वह कानून के पालन करने का संदेश दे रहा होता है। राहुल गांधी बच्चे नहीं हैं। वे न इस देश के माईबाप हैं। उन्हें भी कानून का पालन उसी तरह करना होगा जैसे कि आम नागरिक करते हैं। सत्ता पर बैठने के फेर में यदि वे कानून को धता बताने की कोशिश करते हैं तो उन्हें राह पर लाना सरकार और पुलिस की जवाबदारी है। यदि कानून अपना काम नहीं करेगा तो फिर लोगों के बीच बढ़ती हिंसा की भावना को नियंत्रित कैसे किया जा सकेगा।
आज दुनिया के कई देश सरकारों की असफलता के कारण ही मटियामेट हो गए हैं। समय रहते यदि वहां की सरकारों ने वहां के ज्वलंत विषयों पर कठोर फैसले लिए होते तो आज वे राष्ट्र सफलता के शिखरों को छू रहे होते। भारत में आजादी के बाद जाति, संप्रदाय, भाषा और क्षेत्रवाद को लेकर जो फैसले कांग्रेस की सरकारों ने लिए उनसे ये देश बुरी तरह विभाजित हो गया है। आज यदि कोई उस खाई को भरने का प्रयास करता है तो अलगाववादी ताकतें उसका विरोध करने के लिए एकजुट हो जाती हैं। आज जब देश पूंजीवादी रास्ते पर बहुत आगे निकल चुका है तब जाति, संप्रदाय, भाषा और क्षेत्रों पर आधारित मध्ययुगीन भावनाएं काफी पीछे छूट गईँ हैं।किसी भी कारोबार में क्या जाति के नाम पर अक्षम या अनुपयोगी लोगों को जगह दी जा सकती है। यदि कोई सवर्ण है तो क्या उसे केवल इसलिए नौकरी दी जानी चाहिए कि वह किसी सत्ताधीश का रिश्तेदार है। जब देश में नतीजे लाने वाला तंत्र विकसित किया जा रहा है तो जाति के आधार पर किसी को वंचित करना संभव ही नहीं है। मुक्त बाजार व्यवस्था में तो ये गैर बराबरी का बर्ताव संभव ही नहीं है। सत्ता की चाहत में लोगों को भड़काने वाली ताकतों पर सख्ती से अंकुश लगाना सरकार का काम है। उसे ऐसा करते नजर भी आना चाहिए। इस संबंध में देश भर की पुलिस ने जिन लोगों को दंगा भड़काने के आरोप में दबोचा है उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाना जरूरी है, ताकि भविष्य में कानून हाथ में लेने वालों को कानून के पालन के रास्ते पर लाया जा सके।
अराजकता को रोकने के लिए ये कड़वी दवाई सरकार को सख्ती से पिलानी होगी। ये देश किसी राजनीतिक दल या परिवार की बपौती नहीं हैं। जो लोग क्षुद्र राजनीति के लिए समाज को खंडित करने का काम कर रहे हैं उन पर भी सख्त कार्रवाई करना होगी तभी देश के निचले स्तर तक कानून के राज का संदेश जा सकेगा।
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भीमा कोरेगांव की आड़ में दलित एजेंडा
भारत की राजनीति में वोट कबाड़ने वाले मुद्दे सदैव छा जाते हैं। कांग्रेस ने जिस दलित वोट बैंक को अपने फायदे के लिए उकसाया था वो एक समय बेलगाम हो गया। कांसीराम ने इस वोट बैंक का महत्व समझा और देश की राजनीति में एक नई इबारत लिखी। अब जबकि दलितों के अधिकारों का मुद्दा समयातीत हो चला है तब उसे एक बार फिर गरमाने का प्रयास किया जा रहा है। भीमा कोरेगांव में दो सौ साल पहले जो अंग्रेज पेशवा भिड़ंत हुई थी उसमें पेशवाओं की फौज की टुकड़ी पीछे हट गई थी। ये युद्ध वास्तव में पेशवाओं की 28000 सेना से नहीं बल्कि अरब सैनिकों वाली 2000 की टुकड़ी से हुआ था। जब अंग्रेज पेशवाओं, होल्करों,सिंधियाओं, गायकवाड़ों को संधियों के माध्यम से तोड़ चुके थे और भारतीय दलितों और मुसलमानों को फौज में शामिल करके अपनी फौजें मजबूत बना चुके थे तब ये स्थितियां निर्मित हुईं थीं। ये जीवन भर अविजित रहने वाले बाजीराव पेशवा नहीं बल्कि उसके बाद पेशवा द्वितीय के दौर की घटना है।
ये भारत में अंग्रेजी राज की स्थापना के दौरान हुए संघर्षों की भी कहानी है, जिसके बाद अंग्रेजी हुकूमत ने देश में मजबूती से अपने कदम जमाए थे। इसीलिए दलित राजनीति करके भारत में फूट की इबारत लिखी गई।भारतीय समाज वैसे भी चार हिस्सों में बंटा था। इसलिए बाद में कांसीराम के नेतृ्त्व में एकत्रित दलित इसे मनुवादी व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष का ऐलान कहते रहे। कांग्रेस ने भी अंग्रेजों की तरह फूट के इस गणित को समझा और भारत में अंग्रेजी राज के नए संस्करण की नींव रखी।तबसे वह हर बार यही प्रयास करती रही है कि दलित एजेंडा चलाकर फूट के बीज बोए। आज भारत में पेशवाओं की तरह पतन की दहलीज पर पहुंच चुकी कांग्रेस अपने जीवन का संघर्ष कर रही है। इसलिए वह जिग्नेश मेवाणी या उमर खालिद जैसे समाज को बांटने वाले नेताओं के सहारे दलितों को समाज की मुख्यधारा से काटने की कोशिश कर रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यदि सबका साथ सबका विकास के नारे का उद्घोष करते हैं तो कांग्रेस उमर खालिद जैसे नेताओं को संरक्षण देने की वकालत करती है जो भारत तेरे टुकड़े होंगे ईंशाअल्लाह जैसे नारे लगाते रहे हैं।
भारत में दलित राजनीति का दौर बीत चला है, क्योंकि समाज में दलितों को लेकर कोई भेदभाव नहीं बचा है। इसके बावजूद नौकरियों और प्रमोशन में आरक्षण जैसे मुद्दों पर लूट का चक्र चलाने वाले दलितों को उकसाकर कांग्रेस अपना उल्लू सीधा करना चाह रही है। कांग्रेस को अपना भाग्य संवारने या बिगाड़ने का पूरा हक है। इसके बावजूद भाजपा को किसने रोका कि वह अपने ऐेजेंडे पर चलकर भारत का संपूर्ण विकास न करे। भाजपा ने अपने वास्तविक नेताओं के बीच से जिन फर्जी और कागजी नेताओं को सत्ता की बागडोर सौंपी है उनके चलते आज तक वैमनस्य की ये राजनीति समाप्त नहीं हो सकी है। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सबके विकास की बात तो करता है पर वो विकास उसी तबके का कर रहा है जो पहले से समृद्ध हैं। रिश्वतें दे सकने में सक्षम हैं। जिसके चलते विकास की दौड़ में पहले से पिछड़े लोग आज भी पिछड़ते जा रहे हैं। कांग्रेस ने सरकारी नौकरियों में जिन्हें जगह दी थी वही आज भी नौकरियां कब्जा रहे हैं। दलितों के नाम पर जिन फर्जी दलितों को नौकरियां दी गईं हैं वे अपने संसाधनों का वितरण सहधर्मी बंधुओं में नहीं कर रहे हैं। जाहिर है कि भेदभाव और असमानता का वही दौर आज भी जारी है जो कांग्रेस विरासत में छोड़ गई है। दलितों के सत्तासीन होने से भी ये हालात नहीं बदले। बल्कि शोषकों का एक नया तबका मैदान पर खड़ा हो गया जिसने संसाधनों का पूरा वितरण सोख लिया। देश में जिन जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं वहां उनके शासकों ने कांग्रेस की नीतियों में कोई बड़ा फेरबदल नहीं किया। ज्यादातर राज्यों में भाजपा ने कांग्रेस के पूर्व सत्ताधीशों से गलबहियां कर लीं और संसाधनों की लूट शुरु कर दी। महाराष्ट्र में भी यही सब हुआ है।शिवसेना को पछाड़ने के चक्कर में भाजपा ने दलितों के प्रति नरम रवैया अपनाना शुरु कर दिया। पर वे ये भूल गए कि दलित कभी हमारा या तुम्हारा नहीं होता। जब आप उसे दलित कह देते हैं तो वह केवल दलितों का ही होता है। भाजपा ने कांग्रेस को परास्त करने के लिए जो कांग्रेस की सोच को अपनाया है वही इस मौजूदा दंगों की वजह बन गयी है। अब उसे इन दंगाईयों से सख्ती से निपटना होगा। यदि भाजपा के नेता इन दंगों को कुचलने में कायमाब नहीं होते हैं और चोरी छुपे चलाए जा रहे दलित एजेंडे को पंचर नहीं करते हैं तो ये आग इसी तरह नए नए रूप में भड़कती रहेगी। देश ने भाजपा को विकास के लिए चुना है। जातिगत राजनीति को चलते रहने देने के लिए नहीं। मध्यप्रदेश में भी दंगे के इस गणित को फलित करने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन यहां उसके लायक खाद पानी नहीं है।
भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को चाहिए कि वो समय रहते अपनी गलती सुधारे। उसे देश को जाति धर्म के आधार पर बांटकर देखने वाली नीति पर सख्त प्रतिबंध लगाना होगा। आने वाले चुनावों के चक्कर में वो समाज को बांटने वाली जिन नीतियों को छूना भी नहीं चाहती उनके समानांतर उसे तीव्र विकास की जंग छेड़नी होगी। तभी वह कांग्रेस की बोई खरपतवार का उन्मूलन कर सकती है। वैसे भाजपा का जन्म जिस फार्मूले पर हुआ था उस पर न चलकर वह पहले ही कांग्रेस की पूंछ पकड़ चुकी है। जाहिर है कि ऐसे में उसे कोई अवतारी नेतृत्व ही शुभ मार्ग पर ला सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आर्थिक सुधारों पर जो ध्यान लगाया है उसे असफल करने में जुटे व्यापारी और शोषक तबके को गियर में लिए बगैर सरकार इन घटनाओं को नहीं रोक सकती। उसे अपनी राज्य सरकारों के कान उमेंठने होंगे तभी वह सबको साथ लेकर देश की तस्वीर बदल सकेगी।
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कांग्रेस के चीनी फार्मूले का पराभव

गुजरात में कांग्रेस के पराभव ने हिंदुस्तान में विदेशी राज की चूलें हिला दीं हैं। भारत में पैर जमाने वाले विदेशियों की पोल भी खुल गई और इसके बावजूद सत्ता नसीब न हो सकी। ये काम गुजरात में ही संभव था। किसी अन्य राज्य में ये दंगल हुआ होता तो भारत में विदेशियों का पंथ प्रशस्त हो गया होता। विदेशी शक्तियो ने एक बार फिर कांग्रेस के नेतृत्व में कथित सुधारवादी मुखौटे की आड़ में सत्ता संधान शुरु किया है। संघ और उससे जुड़े राष्ट्रवादियों को ये जानकर सुख का अहसास हो रहा है कि गुजरात में उनकी समर्थित सरकार बच गई। यही नहीं पिछले चुनाव की तुलना में उसे आठ फीसदी अधिक जन समर्थन भी हासिल हुआ है। इसके बावजूद ये चुनाव न केवल गुजरात बल्कि पूरे हिंदुस्तान के लिए खतरे की घंटी साबित हुआ है। अधिक मत मिलने के बावजूद भाजपा मौजूदा 116 सीटों में से भी केवल 99 सीटें हासिल कर सकी है। जबकि जीत के लिए उसे 93 सीटें चाहिए थीं।वहीं शोरशराबे और झूठे वादों की झड़ी लगाकर कांग्रेस 182 सीटों में से 77 जीत गई। जबकि पिछली बार उसके पास 61 सीटें थीं। पिछले चुनाव की तुलना में लगभग तीन फीसदी मतदान कम होने से भाजपा को क्षति पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा था जो सही साबित हुआ। भाजपा अपनी उम्मीदों से कम सीटें जीत सकी लेकिन इसके बावजूद जनता पर उसका भरोसा कायम रहा है।वहीं कांग्रेस तमाम तिकड़मों के बावजूद जनता का भरोसा नहीं जीत सकी। मत विभाजन से उसे वोट भी अधिक मिले और उसने सोलह सीटें भी अधिक पाईं हैं। बहुत सीटों पर हार जीत का अंतर भी कम हुआ है। इसकी वजह स्पष्ट ध्रुवीकरण है। लोगों ने भाजपा या कांग्रेस में से किसी एक को जिताने की कोशिश की जिसके चलते गुजरात में नियंत्रित मत विभाजन देखने में आया है। इस जीत में भाजपा के लिए कई संदेश छुपे हैं। सबसे बड़ा संदेश तो ये है कि भाजपा के सबका साथ सबका विकास के नारे ने विरोधियों को एकजुट कर दिया है। वे भाजपा को हराने के लिए किसी से भी हाथ मिलाने तैयार हैं। जमीन पर भाजपा के नेटवर्क की तुलना में कोई दल पासंग में नहीं ठहरता इसके बावजूद चुनावी रणनीति के बल पर वोट कबाड़ने में कांग्रेस कामयाब रही है। कांग्रेस ने पिछले कुछ सालों से संगठन को आऊटसोर्स करना शुरु कर दिया है। उसने भाजपा विरोधी देशी विदेशी ताकतों के सहारे संगठन खरीदने का भरपूर प्रयास किया, वो कामयाब भी हुई पर जीत नहीं पा सकी। गुजरात में पिछले कुछ सालों में सबसे अधिक चीनी कंपनियों का निवेश हुआ है। जीएसटी और नोटबंदी के बाद इन विदेशी कंपनियों की आर्थिक गतिविधियां उजागर होने लगीं हैं। तभी से इन कंपनियों ने गुजरात के बहाने मोदी सरकार को उखाड़ने की तैयारी की थी। बेरोजगार युवाओं के सहारे कांग्रेस ने हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश राठोर जैसे युवाओं को संगठन आऊटसोर्स किया। कांग्रेस ने इन युवाओं के जातिगत गणित के पीछे संगठन की रचना की। ये रणनीति पूरी तरह सफल हो सकती थी, लेकिन एन वक्त पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रौद्र रूप अपनाकर इस षड़यंत्र को कुचल डाला। इसमें संघ का जमीनी नेटवर्क, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की कुशल रणनीति, भाजपा कार्यकर्ताओं के बूथ मैनेजमेंट और भाजपा के तमाम जाने पहचाने मुद्दों का बड़ा योगदान रहा। भाजपा ने अपने लगभग सभी फार्मूले इस्तेमाल कर विदेशियों के षड़यंत्र को धराशायी कर दिया है। इन विदेशियों में सबसे प्रभावी भूमिका चीनी कंपनियों ने निभाई है। उन्होंने ही इस चुनाव में सबसे अधिक धन उपलब्ध कराया। वो तो सूरत के व्यापारियों की देशभक्ति और जिद थी जिसके सामने ये चाल नहीं चल सकी। जब भाजपा विरोधी षड़यंत्रकारी चिंतक चुनाव के दौरान कह रहे थे कि लड़कों ने मोदी को मैदान में उतरने पर मजबूर कर दिया तब वे उन विदेशी ताकतों की जय की इबारत लिख रहे थे। भाजपा को ये भी अहसास हो गया होगा कि विदेशी निवेश आकर्षित करने के चक्कर में उन्होंने कई वैश्विक शक्तियों का भी आव्हान कर लिया है। ये ताकतें हिंदुस्तान में एक कमजोर सरकार की आकांक्षी हैं। इसके लिए वे कोई भी कीमत देने को तैयार हैं। भाजपा को गुजरात के अनुभव के बाद अब पूरे देश में अपनी सरकारों पर नए तरीके से लगाम लगानी होगी। विकास की खजूर पर टंगी परिभाषा को जमीन पर लाना होगा। बड़े बांध,सड़कें, कारखाने और फ्लाईओवर लोगों का जीवन सरल तो बना सकते हैं पर रोजगार बिना वे भी असंतोष की वजह बन सकते हैं। कांग्रेस की नकलपट्टी करते हुए भाजपा की सरकारें जिस तरह लोगों को सरकारी नौकरियों का प्रलोभन दे रहीं हैं ये आगे चलकर कांग्रेस की ही तरह भाजपा के विनाश की वजह बनने जा रही हैं। भाजपा को ध्यान रखना होगा कि देश पूंजीवाद के मार्ग पर चल रहा है। इसलिए उसे लोगों को नौकर नहीं बादशाह बनाने के लिए तैयार होना होगा। उसे ध्यान रखना होगा कि नौकरशाही जिस तरह कांग्रेस के पतन की वजह बनी वही आगे चलकर भाजपा का नामोनिशान मिटाने की प्रमुख वजह भी बनेगी। भाजपा यदि लोगों को पैसा कमाने में मदद नहीं कर सकी तो उसका विकास का गुजराती माडल कभी भी दरक सकता है। -

विकास की खंती को आदिकालीन कानून से भरने की कोशिश

-आलोक सिंघई-
बारह साल से कम उम्र की बेटियों से व्यभिचार करने वालों को फांसी की सजा से दंडित करने का कानून बनाकर शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने जनभावनाओं के समुंदर पर अपना परचम फहराने की कोशिश की है। इस काम के लिए सरकार को बारह साल लग गए। चित्रकूट के उपचुनाव के नतीजों ने सरकार को ये दिव्यज्ञान प्रदान किया कि जन आकांक्षाओं के ज्वार में टिके रहने के लिए किसी न किसी पतवार का प्रयोग करना अब जरूरी हो गया है। मुख्यमंत्री का ये तीर इतना तीखा था कि प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस भी धराशायी हो गई। उसके सामने मजबूरी थी कि वह इस दंड विधि संशोधन विधेयक का समर्थन करे। अब ये कानून मध्यप्रदेश विधानसभा ने पारित करके केन्द्र की ओर भेज दिया है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का कहना है कि उनके इस प्रयास को पूरे देश में समर्थन मिलना चाहिए। पूरा देश विचार करे कि वो समाज के आधे हिस्से के प्रति कैसा बर्ताव करना चाहता है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विधानसभा में लाए गए इस संशोधन विधेयक पर चर्चा करते हुए कहा कि स्त्री के प्रति पूरे देश में जो सम्मान का भाव रहा है वो हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है। हम स्त्री को देवी के रूप में पूजते हैं और मां के रूप में उसका आदर सम्मान करते हैं। ये बात सही है कि गाय और गौरी दोनों भारतीय संस्कृति की गौरवपूर्ण मिसालें रहीं हैं। भारत में स्त्री के साथ गाय को भी पूजा जाता है। इस संस्कार पर भारत के हर नागरिक को गर्व है। इसलिए सरकार ने जो नया कानून बनाया है वो जनभावनाओं से उपजा कानून है। संसद को चाहिए कि वो इस कानून पर विचार करे, अन्य राज्यों में इस पर चर्चा कराए और इसे सर्वसम्मति से पारित करवाकर उसे कानून की शक्ल प्रदान करे। भारतीय दंड संहिता में जो कानून बनाए गए उन पर इसी तरह विस्तृत विमर्श किया गया था। वो भी तब जबकि पूरे देश में संचार के आधुनिक साधन मौजूद नहीं थे। पहले किसी कानून को बनने में यदि बरसों लगते थे तो आज ये काम चंद दिनों में पूरा हो सकता है। जन संचार के आधुनिक साधन बरसों का काम चुटकियों में पूरा कर सकते हैं निश्चित तौर पर इस कानून के विमर्श की दिशा में शिवराज सिंह सरकार का ये प्रयास बड़ा महत्वपूर्ण कहा जाएगा। देश और समाज को न केवल स्त्री के प्रति अपने नजरिए को बदलना पड़ेगा बल्कि कई अन्य कानूनों पर भी देश में व्यापक विमर्श करने का वक्त अब आ गया है। वहीं जब देश ने 1991 में तय कर लिया कि वो अब पूंजीवाद के रास्ते पर चलेगा तो उसके लिए ऐसे तमाम कानून अप्रासंगिक हो गए जो कभी समाजवादी, साम्यवादी,या गांधीवादी सोच के बीच बनाए गए थे। स्त्री और पुरुष को समान मानना भी इसी दिशा का एक बड़ा बदलाव है। ये बात भी सही है कि स्त्री और पुरुष भले शारीरिक और मानसिक तौर पर भिन्न हैं पर वोट के धरातल पर उनकी कीमत एक समान है। उत्पादकता के धरातल पर भी उनका मूल्य एक समान है। इसके बावजूद जातिगत आरक्षण के समान लिंग आधारित आरक्षण भारतीय समाज की कड़वी हकीकत है। पूंजीवाद के मार्ग पर चलते समय हमें स्त्री और पुरुष को लिंगभेद से ऊपर उठकर उत्पादकता का समान उपकरण मानना जरूरी हो गया है। जाहिर है कि स्त्री को पुरुष के समान ही वेतन और लाभ दिए जाने जरूरी हैं। पूंजीवाद इसके साथ साथ स्त्री की उत्पादकता को भी जोड़ता है।उसे मातृत्व अवकाश, देर रात की पाली में सुरक्षा, शारीरिक भिन्नता के आधार पर काम में अंतर जैसी शर्तें लागू हैं पर आरक्षण जैसी असमानता को अनुपयोगी माना गया है। अब उस पर भी उत्पादकता को बरकरार रखने का दबाव आ गया है। इन हालात में स्त्री पुरुष की भूमिका में सांगोपांग विमर्श समय की जरूरत बन गया है। जो लोग कह रहे हैं कि इस नए कानून का दुरुपयोग,अनुसूचित जाति भेदभाव विरोधी कानून और स्त्री अस्मिता को बचाने के लिए बनाए गए पुराने कानूनों की तरह हो सकता है उनकी बात में दम है। इसके बावजूद वे भी पुरातनपंथी सोच के दायरे में ही विचार कर रहे हैं। दरअसल पूंजीवाद की राह अपना लेने के बाद हमें अपने तमाम कानूनों पर नए सिरे से विचार करना जरूरी हो गया है।क्योंकि उन कानूनों के प्रावधानों का अब औचित्य ही नहीं है। मध्यप्रदेश सरकार की सबसे बड़ी विफलता ये है कि पिछले चौदह सालों के कार्यकाल में उसकी सरकारों ने केवल आधारभूत ढांचे के विकास पर ही जोर दिया है। मंहगे कर्ज और प्रदेश के संसाधनों को भी अधो संरचना के नाम पर निछावर कर दिया गया। अब जबकि बेरोजगारों की फौज अराजकता पर उतर आई है तब सरकार इसे कानूनों के जाल से बांधने का निरर्थक प्रयास कर रही है। केन्द्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने सत्ता संभालने के बाद कहा था कि वो बेकार के कानूनों को हटा देगी। उसने इस दिशा में कई प्रयास भी किए। इसके बावजूद अब खुले समाज की ओर बढ़ते हिंदुस्तान को कानूनों की नई बेड़ियों में जकड़ने के जो प्रयास किए जा रहे हैं वे विकास की रफ्तार पर लगाम लगाने वाले ही साबित होने वाले हैं। अब तक भाजपा की सरकारों ने यदि देश को विकास पथ पर अग्रसर किया होता तो ये नौबत ही न आती। जिस समाज का साक्षात्कार विकास की ऊंची ऊंची अट्टालिकाओं से हो जाता है वो फिर लिंगभेद आधारित भेदभाव और शोषण की फिजूल फितरतों से ऊपर उठ जाता है। शिवराज सिंह सरकार का कानून बनाने का प्रयास फिलहाल मजबूरी में हाथ पांव मारने से ज्यादा कुछ नहीं कहा जाएगा। अभी इस कानून को लंबा रास्ता तय करना है। इसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिलनी है।संसद और न्यायपालिका की हरी झंडी मिलनी है। तब जाकर इसे भारतीय दंड संहिता में जगह मिल सकेगी। सबसे बडी बात तो ये है कि ये कानून यदि बन भी जाता है तो पूंजीवाद की ओर बढते देश में ये निरर्थक रहेगा। जो समाज पूंजी बनाने में जुट जाए उसे इतनी फुर्सत नहीं होती कि वह स्त्री पर अत्याचार करके अपना समय बर्बाद करे।उसके लिए तो स्त्री वैसे ही पूंजी उत्पादन का एक सहज उपकरण साबित होती है,जैसे पुरुष । देश के राजनेताओं को इस पर गहन चिंतन करना होगा तभी जाकर हम संतुलित समाज का लक्ष्य पा सकेंगे। -

नोटबंदी पर खामोशी घातक
नोटबंदी का एक साल पूरा होने के बाद भी देश में तू तू मैं मैं का दौर चल रहा है। भारत जैसे विशाल देश में नोटबंदी का फैसला एक बड़ी चुनौती रहा है। डा. नरसिम्हाराव की सरकार ने जब 1991 में मुक्त बाजार व्यवस्था लागू की तब वह भयाक्रांत थी। उसे भय था कि इससे कहीं देश की जनता भड़क न जाए। आजादी के बाद से जो देश नियोजित की गई अर्थव्यवस्था का दंश झेल रहा हो भला उसे खुले आसमान की सर्द हवाएं कैसे बर्दाश्त हो सकती हैं।इसके बावजूद देश ने नरसिम्हाराव की मंशा को समझा और उनकी सरकार को अपना आशीर्वाद दिया। उनके वित्तमंत्री डा मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री बनकर उसी नीति को आगे बढ़ाया। व्यापारी और कारोबारी सभी खामोशी से इस बदलाव को देख रहे थे। इसकी वजह ये थी कि विकास के नाम पर आर्थिक जंजाल में फंसे देशवासियो को उम्मीद थी कि पूर्ववर्ती कांग्रेसी सरकारों ने जातिवाद, संप्रदायवाद के नाम पर जिन फोकटियों को उनके सिर लाद दिया है कम से कम अब उनसे मुक्ति मिल जाएगी। लेकिन आज नोटबंदी के एक साल पूरा होने पर वे महसूस कर रहे हैं कि उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका है। नोटबंदी लागू होने के बाद बाजार से पुराने नोट तो गायब हो गए पर नए नोट बाजार में सप्लाई नहीं हो पाए। यही वजह थी कि बाजार में चलने वाली रोजमर्रा की उपभोकता वस्तुओं के खरीददार ही नहीं बचे। एक झटके से घरों में रखा पैसा तो खाते तक पहुंचा पर नोट के अभाव में लोगों ने खरीददारी बंद कर दी। अब जबकि नोटबंदी के समर्थन में आंकड़े सामने आ गए हैं तब ये कहा जा सकता है कि नोटबंदी ने लाभ तो पहुंचाया पर उतना नहीं जितने का अनुमान था। इसके बावजूद आज कांग्रेस के साथ भाजपा के सद्सय भी सरकार और खासतौर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गाली दे रहे हैं।प्रधानमंत्री की ये बात भी सही है कि पहले केन्द्र सरकार एक रुपया भेजती थी तो 85 पैसे जनता तक पहुंचते थे। अब एक रुपया सीधा जनता के खाते में पहुंचता है। सबसे बड़ी बात तो ये कि समानांतर अर्थव्यवस्था में मौजूद काला धन अपने मालिक के नाम पर बैंकों में पहुंचा। लोगों ने भले ही फर्जी खातों से रकम जमा कराई हो पर अब उस रकम पर टैक्स वसूली का मार्ग प्रशस्त हो गया है। भाजपा को अपने इस महाअभियान पर लगातार बोलना चाहिए था। लोगों को बताना था कि वे बदली परिस्थिति में क्या करें। लोगों की कठिनाई दूर होती तो वे ही नोट बंदी के ब्रांड एंबेसेडर बन गए होते। वे ही नोटबंदी को सफल बनाते। भाजपा ने एक साल पूरा होने पर नोटबंदी के फायदे गिनाना शुरु किया है। राज्यों में शासन कर रही उनकी सरकारें भी नोटबंदी पर असमंजस के हालात से जूझ रहीं हैं। भाजपा की राज्य इकाइयों ने यदि समय रहते मैदानी मोर्चा संभाला होता तो उन्हें इन हालात का सामना नहीं करना पड़ता जिनसे देश आज जूझ रहा है। भाजपा को इन बदले हालात पर खुलकर जनता का साथ देना चाहिए। जनता का साथ पाने का इससे अच्छा मौका उसे फिर कभी नहीं मिल पाएगा। कमोबेश यही स्थिति जीएसटी की है। जीएसटी पर भी भाजपा बोलने से कतरा रही है। भाजपा कैडर बेस पार्टी है। इसके बावजूद उसका कैडर नोटबंदी और जीएसटी को समझाने में बुरी तरह असफल साबित हो रहा है।यदि उसकी जगह कांग्रेस की सरकार होती तो लोग अब तक उसके कार्यकर्ताओं को गली कूंचों में धुन रहे होते। भाजपा को अपनी पूरी क्षमता के साथ जनता से संवाद करना होगा। उसे अपने फर्जी और थोपे हुए नेताओं से मुक्ति पानी होगी। जमीनी नेताओं को विश्वास में लेना होगा। उन्हें नोटबंदी और जीएसटी पर प्रशिक्षण देना होंगे। तब जाकर उन्हें मैदानी मोर्चा संभालना होगा। अभी चुनाव को वक्त है।यदि समय रहते भाजपा ने अपना दायित्व ठीक तरह से निभाया तो उसे देश के जनमानस का वैसा ही प्यार मिलता रहेगा जैसा देश ने मोदी सरकार को चुनते वक्त बरसाया था।
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मंहगी पड़ेगी सड़कों के बतंगड़ की साजिश

-आलोक सिंघई-
ठेठ देहाती किसान जब शहर जाता है तो वहां बिकते मठे को देखकर वो ये जरूर बोलता है कि इससे तो ज्यादा अच्छा हमारा गांव है जहां घर घर मही मिल जाता है। कुछ इसी तरह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अमेरिका के वाशिंगटन पहुंचकर जब वहां की खराब सड़कें देखीं तो बरबस बोल उठे कि इससे अच्छी सड़कें तो हमारे मध्यप्रदेश की हैं। उनकी इस प्रतिक्रिया को देश में गौरव के बोल समझा जा सकता था। आम नागरिक की प्रतिक्रिया यही होती कि हमारी सरकार ठीक दिशा में काम कर रही है। इसके विपरीत भारत के संवाद तंत्र के बतोलेबाजों ने सड़कों का बतंगड़ बना दिया। कुछ ने बगैर सोचे समझे इस सुर में अपने सुर भी मिला दिए। वे इस बतंगड़ के गुबार में छिपे साजिशकर्ताओं को नहीं पहचान पाए। कुछ ने तो पहचानने का जतन भी नहीं किया। राजनैतिक विरोधी होने का कथित धर्म समझकर कई बंधु मैदान में खम ठोकने भी जुट गए।जिन लोगों ने कांग्रेस की दिग्विजय सिंह सरकार का कुशासन करीब से देखा है वे भी मध्यप्रदेश में सड़कों के विस्तार से संतुष्ट नहीं हैं। होना भी नहीं चाहिए। प्रदेश में सड़कों की दुर्दशा भी कुछ यही है। बरसों के प्रयासों के बावजूद ऐसी ढेरों सड़कें हैं जो आज भी अपने निर्माण की बाट जोह रहीं हैं। इससे बड़ी संख्या उन सड़कों की हैं जिन पर सरकारी बजट की कुछ बूंदें हर साल गिरती हैं और मलहम पट्टी करके उन्हें चलने फिरने लायक बना दिया जाता है। वर्ष 2003 का विधानसभा चुनाव बिजली, सड़क और पानी के मुद्दे पर ही लड़ा गया था। कांग्रेस के बंटाढार मुख्यमंत्री दिग्गी का कहना था कि उनकी सरकार ने मानव विकास सूचकांकों पर ज्यादा ध्यान दिया इसलिए आधारभूत ढांचे के विस्तार के मामले में उनकी सरकार थोड़ा पिछड़ गई। जबकि हकीकत ये थी कि जाति, धर्म और वर्गों को बांटने में सिद्धहस्त कांग्रेस की सरकार ने पंचायती राज व्यवस्था जैसा नया शिगूफा छोड़ा था। गरीबी हटाओ के नारे पर हजारों करोड़ रुपए फूंक दिए थे। इसी तरह की ढेरों फर्जी योजनाओं पर जनता का बजट फूंक दिया गया और निर्माण कार्यों को कमीशन बाजी की भेंट चढ़ा दिया गया। मध्यप्रदेश की जनता ने इतनी नाकारा और बेशर्म सरकार इससे पहले नहीं देखी थी। नतीजतन उसने लगभग जन क्रांति के माध्यम से उस सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया। अपदस्थ दिग्गी को जेल भेजने का जनादेश उसके राघौगढ़ में जमा दौलत और रिलायंस जैसे समूहों में बेनामी निवेश के चलते हाहाकारी साबित हो सकता था। निर्माण की चुनौतियों से जूझने में लगी भाजपा की सरकारों ने विवाद बढ़ाने के बजाए निर्माण पर ज्यादा ध्यान दिया। नतीजतन आज मध्यप्रदेश की सड़कों की तस्वीर बदल चुकी है।

भाजपा की सरकार ने सत्ता में आते ही 2004 में मध्यप्रदेश सड़क विकास निगम का गठन किया। इसका उद्देश्य खासतौर पर राज्य के राजमार्गों के निर्माण और उन्नयन के लिए किया गया था। प्रदेश की अधो संरचना के उन्नयन की जवाबदारी भी इसी निगम को दी गई। गठन के बाद से निगम ने 10039 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया है। अकेले निजी पूंजी निवेश से लगभग 5862 किलोमीटर लंबी सड़कें बनाई गईं। इन सड़कों के रखरखाव की जवाबदारी भी इन्हीं कंपनियों को दी गई। हालांकि सड़कों के साथ नालियां न बनाए जाने से हर बरसात में ये सड़कें भी क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। ठंड के सीजन में इसीलिए हर साल करोड़ों रुपए मरम्मत के नाम पर फूंकना पड़ते हैं।
मध्यप्रदेश सड़क विकास निगम ने एशियन डेवलपमेंट बैंक से चार चरणों में 11000 लाख डॉलर का कर्ज लिया और ये सडकें बनवाईं। भारत सरकार की वीजीएफ योजना का भी खूब लाभ उठाया गया और मध्यप्रदेश सबसे ज्यादा वायबिलिटी केप फंडिंग पाने वाला राज्य बन गया। धड़ाधड़ लिए गए इन कर्जों से सरकार के पास इतना अधिक धन आया कि मध्यप्रदेश सड़क विकास निगम ने स्टेट डाटा सेंटर, मध्यप्रदेश सड़क विकास निगम का प्रशासनिक भवन, मुंबई का मध्यलोक भवन, नई दिल्ली का मध्यांचल भवन और मध्यप्रदेश भवन, क्रिस्टल आईटी पार्क जैसे भवन भी बना डाले। निगम की ओर से सिंगरौली में बीओटी योजना में एयरपोर्ट भी बनाया जा रहा है। निगम की आय से विदिशा, रतलाम, और शहडोल जिलों में चिकित्सा महाविद्यालयों, इंदौर में श्रमोदय विद्यालय भी बनवाए जा रहे हैं।
अमेरिका की सड़कों की तुलना करने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बयान का बतंगड़ बनाने वालों की मंशा केवल इसी से भांपी जा सकती है कि वे जनता के बीच असंतोष के बीज बोकर सड़कों के नाम पर और भी ज्यादा कर्ज लेने की जरूरत जगाना चाहते हैं। सड़क विकास निगम ने अगले दस सालों की जो कार्ययोजना बनाई है उसमें राज्य के राजमार्गों की लंबाई बढ़ाकर 15000 किलोमीटर करना शामिल है। राज्य के बजट, मंडी बोर्ड और बहुपक्षीय एजेंसियों से जुटाए जाने वाले वित्तीय संसाधनों से सामान्य जिला मार्गों को मुख्य जिला मार्गों के रूप में उन्नयन किया जाना है। शहरों के ट्रेफिक से निपटने के लिए रिंग रोड बनाए जाने हैं। सभी मार्गों के लिए एकीकृत सड़क प्रणाली शुरु की जा रही है। जिसमें सभी सड़क निर्माण एजेंसियों की सड़कों को शामिल कर लिया गया है।

गौरतलब है कि कांग्रेस के बंटाढार प्रदेश में भाजपा ने सत्ता में आकर आधारभूत संरचनाओं के विकास का महाअभियान तो चलाया लेकिन अब लोगों के सब्र का बांध टूटने लगा है। प्रदेश की जनता रोजगार, भोजन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मसलों पर सत्ता के खिलाफ लामबंद होने लगी है। आधारभूत संरचनाओं के विकास में रबड़ी पाने वाली एजेंसियां और उनके दलाल साफ तौर पर समझते हैं कि यदि इन जन आकांक्षाओं पर लगाम नहीं लगाई गई तो सड़कों के विकास के नाम पर अधिक कर्ज लेने का उनका अभियान ठंडा पड़ जाएगा। इसलिए इसी लाबी ने मुख्यमंत्री की एक सहज प्रतिक्रिया को जनता के बीच बखेड़ा बना दिया। सोशल मीडिया के बयानवीर हों या खुद को समर्पित समाजसेवी बताने वाले मीडिया कर्मी सभी एक सुर में दलालों की इच्छाओं में पंख लगाने जुट गए हैं। आज जब प्रदेश में कई हजार गुना मंहगी सड़कों का उद्देश्य उत्पादकता बढ़ाना होना था वहां आज पर्यटन जैसे खर्चीले अभियान को बढ़ावा दिया जा रहा है। जाहिर है ये उलटबांसी जन असंतोष की वजह बनने जा रही है,क्योंकि जनता की स्वतः स्फूर्त आय की भरपाई कोई भी सरकार एक रुपए के गेहूं चावल या दीन दयाल रसोई से नहीं कर सकती। भाजपा के रणनीतिकारों को ये अच्छी तरह समझ लेना चाहिए।
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टकराव की राजनीति का अंत

मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के सबसे लंबे मुख्यमंत्रित्व काल में भले ही रोजगार के साधन विकसित न हो पाए हों लेकिन टकराव की राजनीति ने सकारात्मक दिशा जरूर पकड़ ली है। ये भी अपने आप में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। बरसों से टांग खिंचाऊ राजनीति के चलते राजनीतिज्ञों के बीच खेमे बाजी बढ़ती रही थी। कांग्रेस की सरकारें तो अलग अलग नेताओं के गुटों के लिए ही जानी जाती थीं। जनता को खंड खंड विभाजित करने की दिशा में काम करने वाली कांग्रेस की यही खंडित सोच अंततः कांग्रेस के पतन का कारण बनी । इसके बाद जब मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें आईं तब भी कुछ बरसों तक यही खंडित सोच राजनीति पर हावी रही। अब जबकि मुख्यमंत्री प्रदेश में नेतृत्व का सबसे लंबा कार्यकाल पूरा करके नया रिकार्ड बनाने जा रहे हैं तब ये टकराव की राजनीति पूरी तरह तिरोहित होती नजर आ रही है। मध्यप्रदेश विधानसभा के पावस सत्र में राजनीति की यही तस्वीर उभरी है। हालांकि तोड़ने की राजनीति करने वालों को ये नई किस्म की राजनीति रास नहीं आ रही है। वे स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि वो विपक्ष कैसे संभव है जो सरकार की सकारात्मक कार्यप्रणाली का भी विरोध न करे। दरअसल अब तक यही माना जाता रहा है कि विपक्ष यानि सरकार का विरोधी गुट। उसका तो काम ही सरकार का विरोध करना है। जबकि नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने बरसों पुरानी इस परिपाटी को अपने छोटे भाई शिवराज सिंह चौहान की कार्यशैली को समझकर इस टकराव की राह ही छोड़ दी है। ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे की तर्ज पर नजर आने वाला विपक्ष कल ठगा सा रह गया जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दो टूक शब्दों में कह दिया कि किसानों का कर्ज माफ करने की विपक्ष की मांग वो नहीं मानेंगे। वे किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य देने का वादा तो करते हैं लेकिन उसका कर्ज माफ करके वे किसान को पंगु नहीं बनाएंगे। इस घटिया राजनीति को नकारकर शिवराज सिंह चौहान ने अपनी बुलंद राजनीति का परिचय दिया है। नेता प्रतिपक्ष ने भी इसका बेवजह विरोध नहीं किया। कांग्रेस के दिग्गज उनकी इस शैली से भौंचक्के रह गए। दूसरे दिन उन्होंने अपने राहुल भैया पर दबाव बनाया कि उनकी भूमिका तो सरकार का विरोध करने की है। उन्हें अपना विरोध जरूर दर्ज कराना चाहिए था। जाहिर है पार्टी के दिग्गजों के दबाव के आगे उन्होंने दूसरे दिन सरकार के कर्ज माफी की घोषणा न करने से नाराज होकर सदन का बहिर्गमन कर दिया। हालांकि दूसरे दिन इस तरह के विरोध का कोई औचित्य नहीं था फिर भी कांग्रेस के नेताओं ने अपनी तोड़ने वाली सोच को जारी रखकर अपनी ओछी परंपरा का परिचय दे ही डाला। कांग्रेस के नेताओं के साथ समस्या यही है कि वे समझने तैयार नहीं कि वक्त बदल गया है। नर्मदा का पानी हमेशा बहता रहता है और क्षण भर बाद किसी भी स्थान से पानी की नई लहर गुजर जाती है। कांग्रेस के दिग्गज चाहते तो वक्त की नजाकत समझ सकते थे लेकिन वो समझने तैयार नहीं हैं। उन्होंने जिन घटिया हथकंडों से देश की जनता को हांका है वे उन फंडों को छोड़ना नहीं चाहते। वो सोचते हैं कि उनकी पुरानी कार्यशैली ही उन्हें देश की सत्ता पर लौटा देगी। जो अब कभी संभव नहीं है। टकराव की राजनीति के अंत का ये चमत्कार आखिर शिवराज सिंह चौहान ने किया कैसे। इस पर विचार करें तो बड़ा सरल का फार्मूला सामने आता है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को उनके राजनीतिक गुरु सुंदरलाल पटवा ने राजनीति में आगे बढ़ाया था। सुंदरलाल पटवा अर्जुन सिंह के करीबी माने जाते रहे हैं। अर्जुन सिंह ने ठाकुरों की राजनीति के सहारे मध्यप्रदेश में अपना वर्चस्व जमाया था। अपनी राजनीति को जमाए रखने के लिए उन्होंने न केवल अपनी पार्टी के सहयोगियों बल्कि विपक्षी भाजपा के भी दिग्गजों को अपना सहयोगी बनाया था। जब कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें कमजोर करने की कोशिश की तो उन्होंने दो बार विपक्षी सुंदरलाल पटवा को सरकार में आने में मदद की । भाजपा में राघवजी भाई जैसे लोगों ने तब इसी बात को लेकर सुंदरलाल पटवा का विरोध भी किया था। भाजपा हाईकमान से भी उन्होंने इस गठबंधन को अवैध बताते हुए शिकायत भी की थी। इसका परिणाम बरसों बाद राघवजी भाई को भुगतना पड़ा। पटवा जी के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उसी परंपरा को जारी रखा है। जिसमें बड़े भाई के रूप में अजय सिंह राहुल भैया शुरु से सहयोगी की भूमिका निभा रहे हैं। ये राजनीतिक समझदारी न केवल सत्ता शीर्ष बल्कि व्यापारिक संबंधों में भी जारी है। कई बड़े औद्योगिक घरानों का साम्राज्य इस दोस्ती की मिसाल के रूप में मौजूद है। ये एक तरह से प्रदेश के लिए बहुत अच्छा है। कारोबारी एकता से विकास की यशोगाथा लिखने का ये माहौल प्रदेश के लिए हितकारी है। कम से कम औद्योगिक स्थिरता से प्रदेश का विकास रथ ठीक दिशा में चल तो रहा है। उधर अजय सिंह अच्छी तरह जानते हैं कि जिस तरह कांग्रेस ने कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया को फ्री हैंड दे रखा है उसके चलते उनकी मुख्यमंत्री बनने की अभिलाषा पूरी नहीं हो पाएगी। जाहिर है इन हालात को देखते हुए खुद का साम्राज्य मजबूत किया जाए और भविष्य के लिए राजनीतिक ऊर्जा बचाए रखने का इंतजाम किया जाए यही बुद्धिमानी है। इस अनूठी यारी में पार्टीगत प्रतिद्वंदिता को ताक पर रखकर अपने विरोधियों को निपटाने में भी सहयोग और परस्पर विश्वास की युति देखी जा रही है। शिवराज जी को प्रदेश की राजनीति से हटाकर केन्द्र में पहुंचाने का जतन करने वाले नेताओं को एक एक कर निपटाया जा रहा है।राजनीति के जानकार किसानों पर मंदसौर में हुए गोलीकांड के मामले को स्थगन के माध्यम से सदन में उठाए जाने को फिक्सिंग बता रहे हैं। उनका कहना है कि इस स्थगन ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को अपनी सरकार का पक्ष जनता के सामने रखने का मौका दिया है। इससे कांग्रेस की भद भी पिटी है। जाहिर है प्रदेश के नेताओं को इस राजनीतिक परिपाटी को अच्छी तरह समझना होगा। वे विकास की इस यात्रा में सहयोगी के रूप में बने रहेंगे तो उनके अच्छे दिन चलते रहेंगे। यदि विरोध करने की राजनीति न छोड़ी तो फिर जयहिंद।












