Category: संपादकीय

  • ठेका खेती के आगे घुटना टेकती शिवराज सरकार

    ठेका खेती के आगे घुटना टेकती शिवराज सरकार


    -आलोक सिंघई-
    मध्यप्रदेश में पुलिस की गोली से किसानों के नरसंहार का कलंक भाजपा सरकार के माथे लगा है। इसे धोने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उपवास पर बैठने जा रहे हैं। उनके सलाहकारों ने समझाया है कि किसी भी जनांदोलन पर नियंत्रण पाने के लिए आपको गांधीवादी तरीका ही अपनाना होगा। गांधी जी के उपवास में बड़ी ताकत रही है। आजादी के संग्राम को नियंत्रित करने के लिए गांधीजी ने वही तरीका अपनाया था इसलिए भड़के हुए किसानों का दिल जीतने के लिए आपको भी उपवास पर बैठ जाना चाहिए। प्रदेश में मौजूदा किसान आंदोलन शिवराज जी के धूर्त सलाहकारों की चालबाजियों के कारण ही भड़का है। इससे निपटने के लिए वे एक और प्रहसन दुहराने जा रहे हैं। गांधीजी जब ये प्रहसन खेलते थे तब देश गुलाम था और आजादी देश के लोगों का सपना था। आज सत्तर सालों तक देश की आजादी का उत्सव मनाने के बाद जनमन का ये विश्वास जम चुका है कि वे आजाद मुल्क के वासी हैं। जाहिर है अब उनकी प्राथमिकताएं बदल गईं हैं। आजादी का अहसास देश के लोगों में भरने के लिए बाद की सरकारों ने बेलगाम छूटें दीं। जिसका लाभ चतुर लोगों ने तो उठाया पर खेतिहर मजदूर और किसान इससे वंचित रहे।

    शिवराज सिंह चौहान के शासनकाल में किसानों के हित की ढेरों योजनाएं चलाई गईं। खेती को मुनाफे के धंधे में बदलने का उनका अभियान कई सोपान पार कर चुका है। किसानों की अपेक्षाएं बहुत बढ़ चुकी हैं ।इसलिए किसानों को भड़काना भी सरल हो गया है। मौजूदा आंदोलन इन्हीं किसानों की आड़ लेकर भड़काया जा रहा है। इसके पीछे कौन है यह यक्ष प्रश्न सभी के दिमाग को मथ रहा है।शिवराज जी कह रहे हैं कि इसके पीछे कांग्रेस के गुंडे हैं। राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के अध्यक्ष पं. शिवकुमार शर्मा कह रहे हैं कि उनके आंदोलन को बदनाम करने के लिए साजिशन हिंसा कराई जा रही है। लोग कह रहे हैं कि जींस टीशर्ट पहिनकर गुंडों ने सार्वजनिक संपत्तियों को नुक्सान पहुंचाया है। उनके ही कारण आम नागरिकों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। मगर ये सभी बातें केवल अर्धसत्य हैं। इसका आधा सच खेती की ठेका पद्धति में छुपा हुआ है।

    कुछ सालों पहले भारत में ठेका पद्धति पर खेती करने का असफल प्रयोग किया गया था। बाद में कारगिल, ई चौपाल जैसी जिन कंपनियों ने बाजार में पूंजीकरण किया उन्होंने अपना कारोबार सीमित कर लिया। इसकी वजह थी कि उन्हें सब्सिडी पर आधारित कृषि व्यवसाय का सामना करना पड़ रहा था। अब स्थितियां बदल गईं हैं। ठेका खेती में पैसा लगाने के लिए भी कई कंपनियां सार्वजनिक धन का ही उपयोग करने की तैयारी कर रहीं हैं। रिलायंस जैसी कंपनी ने प्रदेश के कई सहकारी बैंकों को गोद लेने की लाबिंग शुरु कर दी है। कुछ सहकारी बैंकों के बोर्ड में तो कथित तौर पर उनके समर्थित किसानों का बहुमत हो चुका है। अब वे सरकार पर दबाव बना रहीं हैं कि इन बैंकों के पूंजीकरण के लिए उन्हें विश्व बैंक, एडीबी जैसे अंतर्राष्ट्रीय सूदखोरों से पैसा लेने की छूट दें। इसके लिए गारंटी सरकार को देनी है। यदि सरकार गारंटी देती है तो वे कंपनियां किसानों के नाम पर ये रकम आसानी से निकाल सकेंगे और अधिक मुनाफे वाले कारोबारों में लगा सकेंगे। इसके साथ साथ डूबने वाली रकम चुकाने की जवाबदारी सरकार की होगी।

    इन कंपनियों की अगुआई रिलायंस जैसी बड़ी कंपनी कर रही है। उसके मोबाईल जियो ने जिस तरह बाजार पर कब्जा जमाया है उससे अन्य कंपनियों के कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। अपने कारोबार के विस्तार के लिए रिलायंस शुरु से सरकार पर दबाव बनाता रहा है। जियो के टावर पुलिस थानों की जमीनों पर फोकट में लगाने के षड़यंत्र से इसी शुरुआत हुई थी। जब इस मामले को अदालतों में घसीटा जाने लगा तो कंपनी ने नाम मात्र का किराया देकर अपना कारोबार बढ़ा लिया। अब इसी तरह का हस्तक्षेप वह कृषि में करने जा रहा है।

    भूमि सुधारों के नाम पर किए जा रहे डिजिटलाईजेशन ने भी किसानों की जमीनों पर कब्जा जमाना शुरु कर दिया है। खेती को ठेके पर लेने वाली कंपनियां किसानों की जमीनें हड़पने की तैयारी कर रहीं हैं।इन जमीनों पर खेती करने से उन्हें किसानों के मंहगा किराया नहीं देना पड़ेगा। खेती को उद्योग का दर्जा दिए जाने की तैयारी ने उनका उत्साह बढ़ा दिया है। इसलिए यही कंपनियां सरकार पर दबाव बना रहीं हैं कि किसान की फसलों का मूल्य बढ़ाया जाए। अब तक सब्सिडी पर चलने वाले कृषि व्यवसाय के कारण खाद्यान्नों का मूल्य नियंत्रण में रहा है। बाजार की ताकतें अब चाहती हैं कि उन्हें खेती पर तो सब्सिडी मिले पर उनके उत्पाद को नियंत्रण के दबाव से मुक्त कर दिया जाए।इससे वे मनमानी कीमतों को अपना लागत मूल्य ज्यादा बताकर बढ़ा सकेंगी।

    इस अर्थ शास्त्र को समझे बगैर मौजूदा किसान आंदोलन की दशा और दिशा नहीं समझी जा सकती है। बेशक देश और प्रदेश का किसान नाराज है। न केवल किसान बल्कि व्यापारी, कर्मचारी और सभी तबकों के लोग नाराज हैं। नोटबंदी ने उनकी संपत्तियों को उजागर कर दिया है। उन्हें अब हर सेवा का अधिक मूल्य चुकाना पड़ रहा है। ये एक सामान्य कदम साबित होता यदि आम लोगों और किसानों की खरीद क्षमता बढ़ाने के प्रयास पहले किये जाते। लोगों की जेबें यदि भरती रहतीं तो वे कतई नाराज न होते पर दुहरी व्यवस्था ने उन पर खर्च का बोझ बढ़ा दिया है। आज किसानों का गेहूं तो समर्थन मूल्य पर खरीदा जा रहा है पर बाजार में उसी गेहूं से तैयार आटा बहुत मंहगे दामों पर बिक रहा है।बिस्कुट जैसे अन्य उत्पादों के कई ब्रांड तो दस गुना ज्यादा दामों पर बिक रहे हैं। इस विपणन शास्त्र का मुनाफा किसानों को नहीं मिल पा रहा है इसलिए उसका आक्रोश सड़कों पर आ कर फट रहा है। उसे हवा देने वाले कंपनियों के प्रमोटर इस नाराजगी को हिंसक बनाने से भी नहीं चूक रहे हैं।

    अब इन हालात में शिवराज जी कल से अनशन पर बैठकर गांधी वादी प्रयोगों को दुहराने जा रही हैं। जब अंग्रेजों ने जान लिया था कि हिंदुस्तान को अधिक समय तक प्रत्यक्ष गुलामी में नहीं रखा जा सकता तो उन्होंने गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस की मांगों के सामने समर्पण शुरु कर दिया था। गांधी जी सत्याग्रह करते और थोड़ी हीला हवाली के बाद अंग्रेज अपने हथियार डाल देते। कमोबेश यही इतिहास कल से एक बार फिर दुहराया जाने वाला है। किसान आंदोलन का समय 10 जून निर्धारित किया गया था। इसके बाद जेल भरो आंदोलन चलाया जाना है। अब इसके समानांतर मुख्यमंत्री जी धरने पर बैठने जा रहे हैं।किसानों का आव्हान किया जा रहा है कि वे उनसे मिलकर अपनी बात उन्हें बता सकते हैं। जाहिर है किसानों की इन्हीं सलाहों के नाम पर सरकार ठेका खेती करने वाली कंपनियों की कई मांगों को मंजूर करने का मन बना रही है। कहा जा सकता है कि किसान आंदोलन की आड़ में की गई गुंडागर्दी ने सरकार के घुटने लगभग टिका दिए हैं। अब तक सरकार ने जो मांगे स्वीकार की हैं उनसे किसानों की जीत तो पहले ही हो चुकी है। अब सरकार उनके नाम पर जो फैसले लेगी उनसे ठेका खेती के मैदान में उतरीं कंपनियों के हित भी संरक्षित किए जा सकेंगे। इसके साथ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की कुर्सी भी एक बार फिर सुरक्षित हो जाएगी।

  • विलीनीकरण वर्षगांठ के बहाने एजेंडे पर लौटती भाजपा

    विलीनीकरण वर्षगांठ के बहाने एजेंडे पर लौटती भाजपा

    मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह सरकार अपनी असफलताओं से घबराकर पार्टी के पुराने एजेंडों पर लौटने लगी है। लगभग चौदह सालों बाद भाजपा ने भोपाल के विलीनीकरण की वर्षगांठ मनाकर ये जताने की कोशिश की है कि वह कांग्रेस की पिछली भ्रष्ट सरकारों से अलग है। हालांकि भाजपा के ये प्रयास अब ट्रेन चूकने के बाद किए जाने वाले प्रयास ही साबित हो रहे हैं। इसकी वजह ये है कि सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर शुरु हो गई है। मालवा के किसानों ने भारतीय किसान संघ के बैनर तले दूध और प्याज सड़कों पर फेंककर जनता की नब्ज दर्शाने का काम किया है। जनता के बीच कांग्रेस के कुशासन की बदबू अभी तक नहीं गई है। इसी के चलते वो अपनी प्यारी सरकार को लगातार बर्दाश्त कर रही है। इसके बावजूद अभी ये नहीं कहा जा सकता कि चुनाव की बेला में भी जनता का ये धीरज बरकरार रह पाएगा।

    भोपाल रियासत का भारत में विलीनीकरण आजादी के दो साल बाद हुआ ये बात आज की नई पीढ़ी को मालूम भी नहीं है। खुद शिवराज सिंह चौहान ने भोपाल के बोट क्लब पर आयोजित कार्यक्रम में कहा कि भोपाल के नवाब ने पाकिस्तान में मिलने की इच्छा के चलते हिंदुस्तान में विलीनीकरण स्वीकार नहीं किया था। तब भोपाल के नागरिकों ने आंदोलन चलाकर संघर्ष किया और फिर ये रियासत हिंदुस्तान का हिस्सा बनी। इस दौरान भोपाल के कई बहादुरों ने अपनी जान की बाजी लगाई। राजपूतों की तो एक पूरी टुकड़ी को धोखे से भोजन पर बुलाकर कत्ल कर दिया गया। भोपाल की खूनी बेगम ने अंग्रेजों की टुकड़खोरी करते हुए यहां के मुसलमानों और हिंदुओं की जायदाद हड़पी और उनका कत्ले आम किया। ये कहानियां राजा भोज की विरासत से कतई मेल नहीं खाती हैं। भाजपा और खासतौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बरसों से इस दिशा में काम करता रहा है। स्थानीय इतिहासकारों ने तथ्यों को संजोकर वे तमाम कड़ियां जोड़ीं जिनमें नवाब खानदान की गद्दारी की वजहें तलाशी गईँ हैं। अपना निजी वर्चस्व बनाने के लिए किस तरह अंग्रेजों के तलुए चांटे गए इसकी एक नहीं सैकड़ों कहानियां जनता के बीच सुनी सुनाई जाती हैं। नवाब के कुशासन को उचित साबित करने के लिए जो स्थानीय व्यापारी, कलाकार और पत्रकार उनकी जी हुजूरी में लगे रहते थे उनके वंशज आज भी कांग्रेस के बैनर तले सत्ता शीर्ष के करीब बने हुए हैं।

    सवाल ये है कि आरएसएस को अपनी विचारधारा का पैतृक संगठन मानती रही भाजपा ने चौदह सालों तक इस एजेंडे को क्यों छुपाए रखा। वह कांग्रेस की भ्रष्ट सरकार की तर्ज पर प्रदेश के संसाधनों के दोहन में क्यों जुटी रही। आधारभूत संरचनाओं के विकास की दिशा में भाजपा ने पिछली सरकारों की तुलना में बेशकीमती काम किया है। इसके बावजूद उस विकास की तर्ज वही रही जो कांग्रेस की शैली में भी झलकती थी। भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी के बीच विकास की जो कीमत अदा की गई उसके चलते आज भी प्रदेश में रोजगार के संसाधन विकसित नहीं हो पाए हैं। कृषि क्षेत्र की उत्पादकता में प्रकृति का सहयोग यदि न मिला होता तो कृषि उत्पादन में भी मध्यप्रदेश कोई बड़ा बदलाव नहीं ला पाया है। खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में कहा कि हम रोजगार बढ़ाने की दिशा में बड़ा काम करने जा रहे हैं। इसके बावजूद मध्यप्रदेश की आह चौदह सालों के बाद भी वाह में नहीं बदल सकी है।

    विलीनीकरण दिवस के आयोजन में भी जन भावनाओं की ये तस्वीर साफ नजर आई।बाहुबली जैसी रिकार्डतोड़ सफल फिल्म की गायिका मधुश्री भट्टाचार्या का बेहतरीन आयोजन भी भोपाल की जनता को बोट क्लब पर नहीं खींच पाया। लोग एक अच्छे आयोजन से वंचित रह गए जबकि नगर निगम ने इस आयोजन के लिए रेडियो, टीवी, अखबारों पर भरपूर विज्ञापन भी चलाए। आयोजन के साथ साथ आतिशबाजी भी की गई जबकि रात के वक्त वन विहार के नजदीक इस तरह के आयोजन करना प्रतिबंधित है। इसकी एक वजह ये भी थी कि रमजान का महीना चल रहा है और इस दौरान मुस्लिम धर्मावलंबियों के लिए गीत संगीत के कार्यक्रमों में भाग लेने की इजाजत नहीं होती है। इबादत का दौर भले ही रात भर चलता हो पर लोग टीवी पर हो रहे प्रसारण भी नहीं देखते हैं। हाल में हमीदिया अस्पताल में मस्जिद बनाने की जिद में जो नौटंकी की गई उससे भी भोपाल की फिजा में नाराजगी फैली। जब दंगे के हालात पैदा कर रहे लोगों को पुलिस प्रशासन ने सख्ती से कुचला तो भी लोगों में ये दहशत थी कि कहीं बोट क्लब पर भी वही हालात न बन जाएं। इस पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का ये बयान कि गदर मचाने वालों को कुचल दिया जाएगा। इससे भी लोगों ने आयोजन से दूरी बनाए रखना ही उचित समझा।

    आखिर भाजपा पिछले चौदह सालों से क्या करती रही है जो वह जनता का वह विश्वास दुबारा नहीं पा सकी जो उसने दिग्विजय सिंह की भ्रष्ट सरकार के खिलाफ पाया था। वह अब तक अपने एजेंडे छोड़कर आखिर कहां कहां भटकती रही। जब देश ने तय कर दिया कि उसे सबका साथ सबका विकास कहने वाले हिंदुत्व से कोई गुरेज नहीं है। सांप्रदायिकता की कांग्रेस की परिभाषा से उसकी कोई सहमति नहीं। भाजपा का सौमनस्यवादी हिंदुत्व उसे स्वीकार है तो फिर भाजपा कांग्रेस की ऊल जलूल नीतियों की नकलपट्टी क्यों करती रही। नए चुनाव की ओर बढ़ती भाजपा को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा।

  • विश्व बंधुत्व का उत्तम प्रदेश

    विश्व बंधुत्व का उत्तम प्रदेश

    आजाद हिंदुस्तान में भारतीय जनता पार्टी ने कई गैर कांग्रेसी सरकारें दी हैं। अन्य राजनीतिक दलों को भी गैर कांग्रेसी शासन देने का अवसर मिला है। इसके बावजूद कभी भारतीय संस्कृति का उद्घोष करती सरकारें अपने मुखौटे के साथ अवतरित नहीं हो सकीं हैं। मध्यप्रदेश को भारतीय संस्कृति पर आधारित राजनैतिक व्यवस्था देने वाली प्रयोग शाला के रूप में जाना जाता रहा है। यहां का चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय तो भारतीय संस्कृति पर आधारित राजनैतिक व्यवस्था की सबसे उत्कृष्ट लैब कहा जाता रहा है। इसके बावजूद जब उमा भारती के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की विशाल बहुमत वाली सरकार बनी तो वो फार्मूला बुरी तरह फेल हो गया। उमा भारती जिस जन, जंगल, जमीन, जानवर और जल का नारा लेकर सत्तासीन हुईं थीं वो फार्मूला विश्व आर्थिक प्रवाह के सामने न टिक सका। उमा भारती को बदलकर भाजपा ने बाबूलाल गौर के गोकुल ग्राम का सूत्र दिया वो भी न टिक सका और अंततः भाजपा को कांग्रेस के पूर्व निर्धारित विदेशी कर्ज आधारित विकास का माडल ही अपनाना पड़ा। इस माडल पर पिछले तेरह सालों से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सफल सरकार चला रहे हैं। मध्यप्रदेश पर कर्ज का भार जरूर बढ़ा है लेकिन ढांचागत विकास के पैमाने पर भाजपा की सरकार ने भरपूर लोकप्रियता बटोरी है। कर्ज का ब्याज चुकाने के लिए सरकार ने अपने संसाधनों का दोहन बढ़ाया है। टैक्स जुटाने के तरीके भी बदले हैं और प्रदेश की आय में भारी इजाफा किया है। इसके बावजूद वह रोजगार के साधन बढ़ाने के मोर्चे पर संघर्ष कर रही है। वजह साफ है कि प्रदेश में उत्पादकता का तंत्र आज भी आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है।यही वजह है कि मध्यप्रदेश की सरकार भले ही आनंद मंत्रालय के माध्यम से लोगों के दिलों में खुशियों भरा गुब्बारा फुलाने में जुटी हो पर यहां के जन मानस के बीच रह रहकर बढ़ती मंहगाई की कराह सुनाई देती रहती है।
    यूपी में भाजपा को इसी कसौटी पर परखा जा रहा है। पंजाब में मरती कांग्रेस को जीवनदान मिल जाने की वजह भी शायद यही रही है कि भाजपा की सरकारें जनता के बीच आनंद का भाव नहीं जगा पा रहीं हैं। ये बात सही है कि देश की युवा पीढ़ी कांग्रेस से मुक्ति चाहती है। वो कांग्रेस को अब ढोना नहीं चाहती। कांग्रेस कोई भी मुखौटा लगाए वो अब उसके कथित सामाजिक सद्भाव के छलावे में नहीं आना चाहती। कांग्रेस के नेता जब जब भाजपा पर असहिष्णु और साम्प्रदायिक होने के आरोप लगाते रहे हैं तब तब जनता भाजपा को सिर आंखों पर बिठाकर सत्ता में पहुंचाती रही है। यूपी की जनता ने भी लामबंद होकर समाजवादी पार्टी की पाखंडी राजनीति को धूल चटाई है। विकास बोलता के नारों को धूल धूसरित करते हुए जनता ने कोई संशय नहीं किया और भाजपा को दो टूक फैसला सुनाते हुए सत्ता में भेजा है। बहन मायावती के जातिवादी झांसे में न आकर दलित राजनीति की जो सच्चाई सामने आई उससे भी राजनीतिक पंडितों के अरमान धराशायी हो गए हैं।
    इन सबसे अलग योगी आदित्य नाथ लगातार आगे बढ़ते हुए जनता की कसौटी पर खरे उतरते गए। जो गोरखपुर कभी अपने माफिया आतंक के लिए जाना जाता था वहां हिंदु मुस्लिम सद्भाव की मिसाल कायम करके सकारात्मक राजनीति की आधारशिला रखने वाले योगी आज भरोसे की अग्निशिखा के रूप में सबके सामने हैं। इस हवन कुंड में सबके नाम की आहुतियां पड़ रहीं हैं। यूपी आज एकजुट है। विकास के पथ पर आगे बढ़ने के लिए तैयार है। इसके बावजूद भाजपा से लंबा दुराव रखने वाले जो राजनेता दुष्प्रचार में जुटे हैं उन्हें अब जनता ने जवाब देना शुरु कर दिया है। लोग सोशल मीडिया पर आकर बता रहे हैं कि उन्होंने जो फैसला किया है वो सोच समझकर किया है। उन्होंने सक्षम नेतृत्व को चुना है और उन्हें पूरा भरोसा है कि ये नेतृत्व यूपी के लिए हितकारी साबित होगा।
    यूपी के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनता को जिस विकास का भरोसा जताया है वह कोई लौह पुरुष ही साकार कर सकता है। अब तक पटरी से उतरकर घिसटती रही यूपी की राजनीति को बदलना किसी आम राजनेता के बस की बात है भी नहीं। न तो वहां जाति के आधार पर दिया गया नेतृत्व कारगर हो सकता है और न ही फार्मूलों से सरकार चलाई जा सकती है। वहां तो सख्त और कुशल प्रशासक की ही जरूरत रही है। ऐसा शासक जो राजनैतिक षड़यंत्रकारियों की गीदड़ भभकियों के सामने जरा भी न सकुचाए। आज जो लोग मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ पर दर्ज पुराने मुकदमों का हवाला देकर लांछन लगाने की कोशिश कर रहे हैं वे उनके लिए अमृत की बूंदें साबित हो रहे हैं। जनता जानती है कि तब योगी ने किस जांबाजी के साथ कानून व्यवस्था को बचाने में लोहे की दीवार बनकर जनता का साथ दिया था। आज यूपी की जनता को भरोसा है कि योगी के रूप में उन्हें एक सक्षम नेतृत्व मिल गया है। जाहिर है कि इन हालात में जनता का आशीर्वाद उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने में कोई कसर छोड़ने वाला नहीं है।

  • कल्याणी को गौरवी बनाने का समय

    कल्याणी को गौरवी बनाने का समय

    जड़ता को तोड़ना बड़ी बात होती है। समाज की जड़ता को तोड़ना तो आसमान से तारे तोड़ लाने जैसा दुष्कर कार्य है। ये संतोष की बात है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार कभी कभी खुद के होने का अहसास भी करा देती है।इसी तरह का संतोषजनक अहसास सरकार ने विधवा शब्द को विलोपित करने का कदम उठाकर दिलाया है। सरकारी कामकाज में अब विधवा शब्द की जगह कल्याणी शब्द का इस्तेमाल किया जाएगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि जिस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विकलांग शब्द को हटाकर दिव्यांग प्रयोग करके देश की आबादी के बड़े हिस्से में गौरव जगाने में सफलता पाई उसी तरह कल्याणी शब्द समाज की आधी आबादी के माथे पर दुर्भाग्यवश लगने वाले कलंक को जरूर धो पाएगा। महिला और बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनिस जब विधानसभा के शून्यकाल में सरकार के इस प्रयास का उल्लेख कर रहीं थीं तब उनके चेहरे पर खासा संतोष और गौरव का भाव झलक रहा था। बेशक उन्हें महिला जन प्रतिनिधि होने के नाते ये आजीवन संतोष करने लायक अवसर था। उन्होंने राजनीति के माध्यम से समाज को करीब से समझा है। वे जानती हैं कि हमारे पुरुष प्रधान समाज में स्त्री की स्वतंत्र चेतना को किस तरह अवसरों की बाट जोहना पड़ती है। महिला के सामने चुनौती होती है कि पहले तो वह खुद को अविचलित बनाए तब कहीं जाकर समाज के उत्पादक या रचनात्मक कार्य से जुड़ पाए। देश और समाज की उत्पादकता बढ़ाने में ये लिंग भेद बड़ी दीवार बनकर रुकावट पैदा कर रहा है। सदियों से हमारे समाज में स्त्री और पुरुष की भूमिका को दायरे में बांधकर देखा जाता रहा है। जब पारंपरिक समाज था तब भले ही ये दायरे उचित प्रतीत होते रहे हों पर आधुनिक दौर में ये वर्गीकरण निश्चित रूप से काफी मंहगा सौदा है। जब हमारी सारी गतिविधियां आर्थिक उत्पादकता बढ़ाने में ऐड़ी चोटी का जोर लगा रहीं हों तब हम स्त्री और पुरुष के रूप में समाज की शक्ति को बांटकर देखें ये न तो न्यायोचित है और न ही व्यावहारिक । सदियों से भारत में स्त्री की भूमिका को घरों में ही समेटकर रखने की प्रवृत्ति घुमड़ती रही है। समय समय पर कुछ बहादुर महिलाओं ने धारा का रुख मोड़कर भी दिखाया है पर ये बदलाव स्थायी नहीं हो पाया, क्योंकि उसका उदय किसी न किसी व्यक्तित्व के इर्द गिर्द ही होता रहा है। पहली बार किसी बहुमत प्राप्त लोकतांत्रिक सरकार ने इस तरह का बदलाव लाने की पहल की है। निश्चित रूप से इस पहल का स्वागत करना होगा।इसके लिए महिला विकास मंत्री अर्चना चिटनिस और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को बहुत बहुत साधुवाद। इस बदलाव के साथ सरकार की चुनौतियां और भी ज्यादा बढ़ गईं हैं। पति की असमय मृत्यु होने के वक्त अक्सर महिलाएं आत्मनिर्भर नहीं होती हैं। वैसे तो पुरुष भी बड़ी तादाद में आत्मनिर्भर नहीं हो पाए हैं। लोकतांत्रिक सरकारों की ये बड़ी असफलता रही है कि उन्होंने समाज के पैतृक व्यवसाय बंद करा दिए हैं और नए व्यवसाय सृजित नहीं कर पाई हैं। इन हालात में महिलाओं के दैनंदिनी खर्चों के लिए किसी रोजगार का ढांच खड़ा करना फिलहाल संभव नहीं दिखता है। सरकारी नौकरी में कृपा करके भर्ती करना निहायत मूर्खता भरा कदम साबित हुआ है जो पिछली कांग्रेस की सरकारों की नाकामी के जीते जागते सबूत के रूप में हमारे इर्द गिर्द रोज देखा जा सकता है।एनजीओ में नौकरी देकर भी ज्यादा महिलाओं को आत्मनिर्भर नहीं बनाया जा सका है। एकमुश्त राशि देकर या पेंशन देकर भी कल्याणी की सेवा करना कर्ज मे डूबी मध्यप्रदेश सरकार के लिए भी फिलहाल संभव नहीं दिखता। फिलहाल तो विधवा के कल्याणी बनने पर इतना ही संतोष किया जा सकता है कि उसे सामाजिक तिरस्कार से तो बचाया जा सकेगा। कल्याणी शब्द में जो सेवा भाव छिपा है उसके चलते स्त्रियों को नई किस्म की परेशानियों का भी सामना करना पड़ सकता है। सोचने लायक बात है कि बगैर पढ़ी लिखी, जायदाद से वंचित, शारीरिक रूप से अशक्त, छोटे छोटे बच्चों के पालन के बोझ से दबी हुई स्त्री कैसे कल्याणी बन सकती है। जब उसे ही देखभाल की जरूरत हो तो उसे मजबूर होकर कई बार समाज के क्रूर हाथों में खेलने पर मजबूर होना पड़ जाता है। फिर धीरे धीरे वह विधवा से कुलटा बन जाती है और जीवन की शाम उसे काशी के विधवाश्रमों में ही बिताना पड़ती है। सरकार को सोचना होगा कि कल्याणी शब्द की आड़ में क्या उसे देह का सौदा करने के लिए मजबूर तो नहीं किया जाने लगेगा। वास्तव में जब जीवन की दौड़ में स्त्री अकेली पड़ जाती है तब उसे अपने पैरों पर खड़े होना सबसे पहली प्राथमिकता होती है। क्या सरकार इस दिशा में भी कोई कदम उठाने जा रही है। सरकारी नौकरी इसका कोई समाधान नहीं है। एनजीओ के भरोसे बैठे रहना भी संभव नहीं है। वास्तव में सरकार को रोजगार मूलक वे प्रयास शुरु करने होंगे जिनसे न केवल स्त्री बल्कि कोई पुरुष भी बेकार न बैठा रहे। उसके हाथों को इतना काम तो जरूर मिले कि वह अपना और अपने परिवार का भरण पोषण कर सके। जब ये हालात बन जाएं तब जरूर कहा जा सकता है कि स्त्री भी अपनी शान कायम रख सकेगी। कल्याणी शब्द फिलहाल कुछ ज्यादा ही नरम दिखाई दे रहा है। सरकार की जवाबदारी है कि वह उसे अबला न बनने दे। सबला न भी बना पाए तो कम से कम उसे गौरवी तो जरूर बना रहने दे।

  • भाजपा का मलाई खाने वाला कैडर

    भाजपा का मलाई खाने वाला कैडर

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    भारतीय जनता पार्टी को उसके कैडर के लिए जाना जाता रहा है। कांग्रेस के धराशायी होने की वजह भीउस पार्टी का कैडर ही रहा। जिस पार्टी का कैडर भ्रष्ट नेताओं और सुविधाभोगी अय्याशों से भर जाए उसे विदा करने में जनता जरा भी देरी नहीं करती। कांग्रेस इसका जीता जागता सबूत है। ये जानते बूझते हुए भी पिछले कुछ सालों में मध्यप्रदेश की भारतीय जनता पार्टी ने कैडर के नाम पर केवल चुनाव जीतने और जिताने वाले लोगों को ही तवज्जो दी है। पार्टी कैडर मेंशीर्ष के आसपास इसी तरह के कार्यकर्ताओं और नेताओं का जमघट हो गया है जो कांग्रेसियों के तमाम हथकंडों को अपनाकर चुनावी विजय का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। इसमें पार्टी को सफलता भी मिल रही है। हालिया उपचुनाव में पार्टी ने शहडोल और नेपानगर सीट पर विजय भी हासिल की। इस विजय को मोदी सरकार की नोटबंदी का लिटमस परीक्षण बताकर प्रचारित किया जा रहा है। लेकिन हकीकत इसके विपरीत है। आठ तारीख को जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पुराने बड़े नोटों के बंद करने की घोषणा की तबसे भारतीय जनता पार्टी को मानों सांप सूंघ गया है। कांग्रेसियों की बैचेनी की बात करने का तो कोई औचित्य है ही नहीं। भाजपा का प्रदेश नेतृत्व हो या राज्य सरकार दोनों इस मुद्दे पर तभी से चुप्पी साधे हुए हैं। भाजपा के राज्य नेतृत्व ने एक भी बयान अब तक जारी नहीं किया जिसमें कार्यकर्ताओं को नोटबंदी के कारण आ रही परेशानियों से निपटने में जनता के साथ खड़े होने के निर्देश दिए गए हों। जो पार्टी हर चुनाव के दौरान दम भरती हो कि हम बूथ लेवल मैनेजमेंट पर सबसे ज्यादा जोर देते हैं वह पार्टी अपने राष्ट्रीय नेता के क्रांतिकारी फैसले पर आखिर क्यों खामोश खड़ी है। किसका चेहरा देखकर पार्टी ने इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखने का फैसला लिया। क्या पार्टी का लक्ष्य केवल वोट लेना और सत्ता का आनंद लेना भर है। भाजपा के संवाद केन्द्र से जारी प्रेस नोट में युवा मोर्चा के किसी आयोजन का उल्लेख छोड़ दें जिसमें बैंकों में हेल्प डेस्क अभियान चलाने की बात कही गई हो लेकिन पार्टी के स्तर पर न तो कोई आपातकालीन बैठक बुलाई गई और न ही हालात से निपटने की कोई रणनीति बनाई गई। मध्यप्रदेश की भारतीय जनता पार्टी के संगठन को स्व. कुशाभाऊ ठाकरे जैसे जीवट व्यक्तित्व के कारण पूरे देश में गंभीरता से याद किया जाता रहा है। आज इस पार्टी में ऐसा क्या हो गया कि नोट बंदी जैसे जनहितकारी फैसले पर वह चुप्पी साधे बैठी है। मध्यप्रदेश की शिवराज सिहं चौहान सरकार को समाज के सभी वर्गों के लिए नीतियां बनाने के कारण खासी लोकप्रियता हासिल है। जनता ने उसे तीन तीन बार सत्ता सौंपी और प्रदेश के विकास का मौका दिया लेकिन इसके बावजूद सरकार ने नोटबंदी को सफल बनाने के लिए कोई अभियान नहीं चलाया। नोटबंदी की घोषणा के अठारह दिन बीत जाने के बाद भी जब अखबारों में जनता की परेशानियों की खबरें छपना बंद नहीं हुईं तो हाईकमान के निर्देश के बाद सरकार ने आनन फानन में कुछेक अखबारों को एक विज्ञापन जारी किया जिसमें वही बातें दुहराई गईं हैं जो भारत सरकार की ओर से जारी विज्ञापनों में कही जाती रहीं हैं। सरकार समर्थक एक बड़े समाचार पत्र ने तो अपने संपादकीय में नोटबंदी को मोदी का व्यक्तिगत फैसला बताकर इसका खुला विरोध भी किया। वास्तव में सरकार में बैठे महत्वपूर्ण लोगों और भ्रष्ट व्यापारियों के बीच इस तरह का गठजोड़ बन गया है कि वो किसी भी नवाचार को स्वीकार करने तैयार नहीं है। सार्वजनिक धन का अपवंचन करने के लिए इस गठजोड़ ने कई फार्मूले अपना लिए हैं। विकास के नारे लगाना इसमें सबसे उल्लेखनीय है। एक सामान्य सा अर्थशास्त्री भी समझ सकता है कि सत्ता से जुड़े शोषकों के गिरोहों ने विकास योजनाओं का जो धन चोर दरवाजे से अपने पास जुटा लिया उसे वापस लाने के लिए ही नोटबंदी की गई है। पर मध्यप्रदेश में तो सरकार फैसले के बाद से ही लकवा ग्रस्त नजर आ रही है।जिस फैसले को जनता का व्यापक समर्थन मिल रहा हो। भाजपा के पारंपरिक विरोधी वोट बैंक ने भी इस कदम को अच्छा फैसला बताया है। इसके बावजूद सरकार ऊहापोह की स्थिति से बाहर नहीं निकल पा रही है।जिस फैसले को जनता हाथों हाथलेकर चल रही है प्रदेश सरकार इस दौरान जनता से साथ हाथ बंटाने खड़ी नहीं हो पा रही है।क्या इसे भारतीय जनता पार्टी के भीतर आपसी प्रतिद्वंदिता की लड़ाई समझा जाए। पार्टी के नेताओं से ये सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या पार्टी का कैडर केवल मलाई खाने के लिए ही संयोजित किया गया है। क्या मध्यप्रदेश की भारतीय जनता पार्टी सरकार काला धन बनाने वाले व्यापारियों, अफसरों और राजनेताओं के साथ है। जनता की समस्याओं से उसे कोई वास्ता नहीं।

  • कर्ज से गुलछर्रे उड़ाने वालों की दहशत

    कर्ज से गुलछर्रे उड़ाने वालों की दहशत

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    देश में विमुद्रीकरण की आंधी ने जनता के नाम पर कर्ज लेकर गुलछर्रे उड़ाने वाले तथाकथित उद्योगपतियों की नींदें उड़ा दी हैं। विकास योजनाओं के नाम पर कर्ज लेने वाले और गुल्ली करने वाले राजनेताओं की भी जान सांसत में है। उन्होंने विकास योजनाओं पर लिए साफ्ट लोन की राशि को गुल्ली कर लिया था।ये धन उन्होंने मंहगी ब्याज दरों पर भूमाफिया, बिल्डरों, उद्योगपतियों को उपलब्ध करा रखा था ।अबउसे ताबड़तोड़ ढंग से वापस जमा करने की चुनौती ने उनकी नींदें उड़ा दी हैं। नतीजा ये है कि नेताओं और उद्योगपतियों के इस गठजोड़ ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना लगाना शुरु कर दिया है। आज मध्यप्रदेश के एक अखबार ने संपादकीय लिखा है जिसमें कहा गया है कि सरकार लोगों को नहींसमझा पाई है कि उसने जनता की गाढ़ी कमाई और महिलाओं के बचाकर रखे गए धन को हलक में हाथ डालकर निकाल लिया है वह लोगों के विकास में ही उपयोग की जाएगी। इस तरह की हल्की बातों को कहकर ये गैर जिम्मेदार अखबार विमुद्रीकरण के फैसले के खिलाफ जनमत तैयार करने का काम कर रहा है। ये अखबार ये भी कह रहा है कि विमुद्रीकरण का फैसला केवल और केवल प्रधानमंत्री मोदी ने लिया है। ये बात सही है कि विमुद्रीकरण का फैसला लिए जाते समय पूरी गोपनीयत बरती गई थी। लेकिन ये फैसला सुविचारित ढंग से देश के जिम्मेदार लोगों ने लिया है। सेना के तीनों अध्यक्षों को इसके लिए विश्वास में लिया गया। रिजर्व बैंक के अफसरों, वित्तीय सलाहकारों, और उन तमाम लोगों को भरोसे में लिया गया जो देश की नीति निर्धारण में बड़ी भूमिका निभाते हैं। इसके बावजूद बौखलाए सूदखोर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ जनमत जगाने में जुट गए हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि उन्होंने वैश्विक मुद्राकोषों से लिए गए जिस साफ्टलोन को मंहगी ब्याजदरों पर बाजार में चला रखा था उसे वे समयसीमा के भीतर वापस कैसे जमा करा सकेंगे। यदि उन्होंने ये धन घोषित नहीं किया तो वह मिट्टी हो जाएगा, और यदि घोषित करते हैं तो जेल जाने के हकदार होंगे। शायद इसीलिए वे जनता की परेशानियों का हवाला देकर तरह तरह की खबरें अखबारों में छपवा रहे हैं। उन घटनाओं को खबर बनाया जा रहा है जिसमें लोग बैक की लाईनों में खड़े होकर अपनी कमजोरियों के कारण बेहोश हो गए या उनकी मौत हो गई। ये सब माहौल वे बना रहे हैं जिन्हें जनता का धन हड़प करने के कारण अपनी मौत करीब नजर आ रही है। खुद भारतीय जनता पार्टी के नेता इस फैसले से अचंभित हैं। उन्हें लग रहा है कि ये फैसला उनकी मौत की वजह बनने जा रहा है। अब तक विकास के नाम पर भाजपा की सरकारों ने भी कांग्रेस की सरकारों की ही तरह भारी कर्ज ले रखा था। इस धन को उन्होंने फर्जी कंपनियों के माध्यम से शेयर मार्केट में भी लगा ऱखा था। जमीनों के भाव अनाप शनाप बढ़ाकर उन्होंने रियल स्टेट सेक्टर में भी भारी निवेश कर ऱखा था। मकानों की जमाखोरी को बढ़ावा देकर वे उस साफ्टलोन से करोड़ों रुपए उलीच रहे थे। सरकार के इस एक फैसले ने उनकी तमाम अय्याशियों को धरातल पर ला दिया है। इसलिए वे ऊपरी तौर से तो भले ही प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ कर रहे हैं लेकिन छिपकर वे भारत सरकार पर भी प्रहार करने से बाज नहीं आ रहे हैं। वे भूल गए हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमेशा से भारतीय अर्थव्यवस्था को नई कसावट देने का पक्षधर रहा है। भाजपा और आरएसएस के चिंतकों का एक बड़ा वर्ग नोटों से महात्मा गांधी की फोटो हटाने के पक्षधर रहे हैं। सच भी तो है महात्मा गांधी अपरिग्रह के पक्षधर थे और वे पूंजी के अधिक उपयोग के विरोधी थे। गांधीवाद वास्तव में पूंजी के विरोध पर टिका था जबकि पूंजीवाद लोगों की भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करके सुलझे समाज के निर्माण की बात करता है। ये दोनों विचार परस्पर विरोधी हैं इसलिए अब गांधी को विसर्जित करने का समय आ गया है। महात्मा गांधी को मुख्य धारा से हटाए बगैर हम सुखी समाज के निर्माण का अपना लक्ष्य नहीं पा सकते हैं। अब जबकि भारत ने पूंजीवाद के रास्ते पर पच्चीस सालों तक चलने के बाद ठोस फैसले लेकर पूंजीवाद को सफल बनाने की रणनीति पर काम शुरु कर दिया है तब ये सूदखोरों की लाबी इस फैसले की आलोचना में जुट गई है। वास्तव में विमुद्रीकरण का फैसला जनता के लिए जितना परेशान नहीं कर रहा उतना ये भ्रष्टाचारियों और शोषकों सिर पर लटकी तलवार साबित हो रहा है।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना सिर्फ एक बात पर की जा सकती है कि वे नए नोटों को गांधी से मुक्ति नहीं दिला सके हैं। शायद उन्होंने पूंजी को मजबूती देने के लिए अभी गांधी से पंगा लेने से बचने की रणनीति अपनाई है। इसके बावजूद विमुद्रीकरण जिस तरह देश की मुद्रा को मजबूती देने मे मील का पत्थर साबित होने वाला है उससे गरीबों के नाम पर शोषण का दुष्चक्र चलाने वालों की नींदें तो उड़ गई हैं। जनता को उसके अपने हित की रक्षा में लड़ रही इस सरकार के हाथ मजबूत करने के लिए आगे आना होगा। प्रधानमंत्री ने वाकई बड़ा पंगा लिया है और हमें समझना होगा कि राष्ट्रभक्ति के इस अनुष्ठान में आगे बढ़कर अपना योगदान देेने का सही वक्त आ गया है।

  • खाट लुटे या बैंक, सलामत रहे वोट बैंक

    खाट लुटे या बैंक, सलामत रहे वोट बैंक

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    फार्मूलों के दम पर राज करती रही कांग्रेस ने एक नया जुमला उछाला है। कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी कह रहे हैं कि गरीब खाट ले गए तो भाजपा उन्हें चोर बता रही है और विजय माल्या करोड़ों रुपए लेकर भाग गया तो उसे डिफाल्टर बता रही है। कहा जाता है कि एक झूठ सौ बार बोलो तो वह सच की तरह असरकारी बन जाता है। कुछ इसी तरह कांदा कांदा, प्याज प्याज चिल्लाकर भी कांग्रेस सत्ता पर सवारी कर चुकी है। इस बार उसे उम्मीद है कि उसकी सत्ता खाट से होकर गुजरेगी।

    देवरिया में कांग्रेस ने जो खाट पंचायत बुलाई उसका मास्टर माईंड पीके यानि प्रशांत किशोर को बताया जा रहा है। पीके चुनावी राजनीति के सफल खिलाड़ी बताए जाते हैं। वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए भी मार्केटिंग कर चुके हैं। इस बार कांग्रेस को उम्मीद है कि वे यूपी के चुनाव में अपने लेखकीय जौहर का जलवा जरूर दिखाएंगे। भारत में लोकतंत्र है और सपने देखने का सभी को हक है। कांग्रेस ने आजादी के सत्तर सालों में गरीब की दुहाई देकर जो धन संपदा जुटाई है वह अरबों रुपयों की है। नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक कांग्रेस ने सरकारी योजनाओं से जुटाए धन को दुनिया के कई मुल्कों में निवेश किया है। विदेशी धन और कालाधन चिल्ला चिल्लाकर उसे वापस लाने का दावा करती रही भाजपा अब लगभग हताश नजर आ रही है। क्योंकि वह इस कथित काले धन को देश में वापस नहीं ला पाई है। भाजपा का उपहास उड़ाते कांग्रेसी कहते रहे हैं कि मोदी हर वोटर के खाते में पंद्रह लाख रुपए लाने का वादा करते रहे हैं। जबकि हकीकत ये है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कभी ऐसा कोई दावा किया ही नहीं। चुनाव के दौरान उन्होंने ये जरूर कहा था कि देश का काला धन ….यदि…. वापस आ जाए तो हर नागरिक को पंद्रह लाख रुपए तक मिल सकते हैं। बात को छीलकर मोदी के मुंह में घुसेड़ने का कांग्रेस का अभियान अब तक तो सफल नहीं हो पाया है। कांग्रेसी जरूर कुतर्क देते मिल जाएंगे कि मोदी अपना वादा नहीं निभा सके लेकिन देश का होशियार मतदाता कांग्रेस के इन कुतर्कों को अच्छी तरह समझ चुका है। इंटरनेट पर प्रधानमंत्री मोदी का मूल भाषण आज भी उपलब्ध है जिसे देखसुनकर कांग्रेस के षड़यंत्र को आसानी से समझा जा सकता है।यही वजह है कि कांग्रेस की खटिया लुटने पर देश के लोगों ने राहुल गांधी का ही उपहास उड़ाया है। वे जितनी बार इसके बारे में कुतर्क दे रहे हैं उनकी पार्टी की कलई उतनी ही ज्यादा उतरती जा रही है।

    पीके की इसी तरह की सलाहें यदि जारी रहें तो कोई आश्चर्य नहीं कि यूपी में कांग्रेस गिनती की सीटें भी नहीं पा सकेगी। दरअसल प्रचार माध्यमों की एक सीमा होती है। वे आपकी छवि निखार तो सकते हैं लेकिन उसके लिए जमीनी धरातल और सच्चाई भी होना जरूरी है। कांग्रेस जब अपने सबसे बुरे दौर में गुजर रही है और बार बार शंका की जा रही है कि कांग्रेस अब मर चुकी है तब उसका प्रचार करना वाकई टेढ़ी खीर है। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि पहली बार प्रशांत किशोर यूपी में असफल होंगे और बुरी तरह पिटकर बाहर कर दिए जाएंगे। वे जो तर्क गढ़ने का प्रयास कर रहे हैं वह देश की नई पीढ़ी के सामने महज शिगूफा बनकर सामने आ रहे हैं। अब ये कौन नहीं जानता कि विजय माल्या कांग्रेस की अवैध संतान रहे हैं। ये बात सही है कि कांग्रेस की लुटिया डूबते देख माल्या ने भाजपा का दामन पकड़ लिया था। चुनावी दौर में धन की अनिवार्यता को देखते हुए भाजपा ने उसे अपना भी लिया था लेकिन जब उसकी पोल खुली तो भाजपा ने उसके खिलाफ कार्रवाई करने में कोई कसर भी नहीं छोड़ी।

    देश को अच्छी तरह मालूम है कि बैंकों का राष्ट्रीयकरण इंदिरा गांधी की पहल पर हुआ था। तब लंबे चौड़े दावे किए गए थे कि ये सरकारी बैंक देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देंगे। लेकिन धीरे धीरे ये बैंक लूट लिए गए। उद्योग लगाने के नाम पर कांग्रेसियों ने लोन फायनेंस कराए। ये लोन डूबने ही थे क्योंकि उन्हें केवल बैलेंसशीट पर ही चलने वाले उद्योगों के लिए फायनेंस कराया गया था। माल्या जैसे हजारों उद्योगपतियों ने बैंकों को खाली कर दिया। इसमें सरकारी क्षेत्र के बैंकों के अफसरों की साफ मिली भगत थी। उन्होने अपने प्रमोशन सुनिश्चित करने के लिए नेताओं के निर्देशों का पालन किया और देश की पूंजी को फोकटियों के हवाले कर दिया। नतीजा सामने है। आज देश के सामने पूंजी का संकट है।रुपया ब्रिटेन के पाऊंड की तुलना में 95 गुना भिखारी है। डालर की तुलना में लगभग सत्तर गुना विपन्न है। इसकी वजह यही है कि माल्या जैसे उद्योगपतियों ने डिफाल्टर बनकर ब्रिटेन में शरण ले ली और भारत का पंगु कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सका। अब गरीबी की दुहाई देने वाला कांग्रेस का राजकुमार कह रहा है कि भाजपाई खटिया ले जाने वालों को लुटेरा बता रहे हैं। ये झूठ इतने पुख्ता अंदाज में बोला जा रहा है और इसे लूट पोषित मीडिया इतनी सफाई से प्रचारित कर रहा है मानों भाजपा किसानों को खटिया लुटेरा ठहरा रही है। जबकि हकीकत ये है कि आजादी के सत्तर सालों बाद भी देश के लोगों की हैसियत इतनी खराब है कि वे खटिया जैसी सस्ती वस्तु को भी मौका मिलने पर उठा ले जाते हैं। यदि उनकी जेबें भरी होतीं तो वे खटिया तो क्या पलंग को भी हाथ नहीं लगाते।

    यही कांग्रेस की कीमियागिरी है कि वह देश के आम लोगों को चोर बनाती है और फिर बड़ी सफाई से उसका लांछन अपने विरोधियों पर मढ़ देती है।देश की नई पीढ़ी से उम्मीद की जा सकती है कि वह कांग्रेस के इस गोरखधंधे को समझ सकेगी । यूपी की अखिलेश यादव सरकार इस झूठ का पर्दाफाश कर सकेगी इसमें संशय है। क्योंकि वह सरकार बसपा की महारानी मायावती के लूट के धन को बचाने के फेर में कदम पीछे खींच लेने के कारण सत्ता में आई थी। यूपी का चुनावी रण कांग्रेस, बसपा और सपा की धमाचौकड़ी के कारण दलदली हो गया है। इसके बीच भाजपा अपना वोटबैंक सहेजने में सफल रही है। इसके बावजूद जो निर्णयकारी मतदाता हैं उनकी खेती करने में भाजपा असफल हो रही है। उसके पास कोई ऐसा प्रभावी नेतृत्व नहीं जो इन फ्लोटिंग मतदाताओं को अपने पक्ष में खड़ा कर सके। इसकी तुलना में राहुल गांधी और शीला दीक्षित दोनों दमदारी से मैदान पर उतर खड़े हुए हैं। यही कारण है कि यूपी का माहौल कांग्रेस की अकूत धनसंपदा और रणनीति के चलते गरमा गया है।

  • फिर सदन में कौन बोलेगा

    फिर सदन में कौन बोलेगा

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    कड़वे प्रवचन सुनाने वाले संत तरुण सागर जी के विचारों से असहमति जताई जा सकती है। शायद ये समझ बूझकर ही तरुण सागर जी अपने विचारों को कड़वे प्रवचन कहते रहे हैं। देश भर में बुखार आने पर कहा जाता है कड़ुए भेषज पिए बिन मिटे न तन को ताप । जाहिर है वैचारिक बुखार को दूर करने के लिए कड़वे विचारों की ही औषधि असरकारी हो सकती है। यही सोच समझकर हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर सरकार ने इसके लिए सदन का विशेष सत्र भी बुला डाला। यही नहीं राजदंड की ऊंचाई पर बिठाकर तरुण सागर जी से कड़वे प्रवचन भी करने का निवेदन कर डाला। इस गरिमापूर्ण फैसले के लिए हरियाणा की विधानसभा की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। इससे इतना तो साबित हो गया है कि खट्टर सरकार समस्याओं का समाधान करने के लिए पूरी तरह संकल्पित है।

    तरुण सागर जी बरसों से अपने प्रवचनों में कहते रहे हैं कि दुनिया के सदनों में सबसे खतरनाक लोग बैठते हैं। वे कहते हैं कि यदि सत्ता के इन सिंहासनों पर बैठने वालों की गलती ये है कि उन्हें कोई बताता नहीं कि वे कैसे जनता के दिलों पर राज कर सकते हैं। सत्ता के मद में डूबे ये सत्ताधीश गरीब और कमजोर लोगों को कुचलने को ही शासन करना समझ बैठते हैं। अब इस विचार में क्या बुराई है। क्या हमारे राजनेता अपनी जिद पूरी करने के लिए जनता की नीतियों का मुंह अपने निजी खजाने के हित में नहीं मोड़ देते हैं। यदि ऐसा न होता तो आज आजादी के सत्तर सालों बाद तक हम देश के आम नागरिकों की मूलभूत जरूरतें तक क्यों नहीं मुहैया करा पाए हैं। चांद सूरज तक की दूरियां तय करने में सफल होने के बावजूद हम देश की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को सुखी जीवन क्यों नहीं मुहैया करा पा रहे हैं। वे कौन सी बाधाएं हैं जो हमारे राजनेताओं, अफसरों और न्यायाधीशों को अपना कर्तव्य पूरा करने से रोकती हैं। क्या इन मुद्दों पर चिंतन नहीं होना चाहिए। पर ये करे कौन। सत्ता की सवारी करने वालों को तो बस अपनी सफलताओं का लक्ष्य दिखता है। फिर पिछड़ गए लाचार की बात कौन करेगा।

    सत्ता पर काबिज होने की होड़ इतनी खतरनाक है कि अच्छे से अच्छा राजनेता बुराईयों को देखने और उसे दूर करने की जुर्रत नहीं कर पाता है। वो तभी तक राजनेता है जब तक लोग उसे चुनते रहते हैं। जिस दिन उसे वोट मिलना बंद हुआ उसी दिन वो कचरे के डिब्बे में पहुंचा दिया जाता है। अब इन हालात में बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे। तरुण सागर जी बरसों से देश के गली कूंचों में घूम फिरकर बोलते रहे हैं कि यदि सत्ता के सर्वोच्च सदन सुधर जाएं तो देश के हालात बदले जा सकते हैं। सरकारों को उनकी ये आवाज बहुत पहले सुन लेनी चाहिए थी। इस आवाज को सत्ता का संदेश भी बना दिया जाना था। ये इसलिए न हो पाया क्योंकि देश की जनता कांग्रेस को आजादी दिलाने वाली पार्टी मानती रही है। वो कांग्रेस को ही सत्ता में भेजती रही। कांग्रेस की सरकारें अंग्रेजों की कृपा पर इतनी ज्यादा निर्भर रहीं हैं कि वे देश की आवाज को सदन के पटल तक पहुंचने ही नहीं देती थीं। ज्यादातर समय देश में एक पक्षीय शासन ही चलता रहा। सरकार को जनता के लिए जो नीतियां पसंद थीं वही लागू की जाती रहीं। सत्ता में जनता की भागीदारी उतनी ही रही जितने से लोकतंत्र की छवि बनी रहे। जनता बरसों से इस समस्या को समझती रही है।

    तरुण सागर जी जैसे कई संत बरसों से समाज की आवाज बोलते रहे हैं और समय के साथ विदा होते रहे हैं। तरुण सागर जी कोई पहले आदमी नहीं जिन्होंने सामाजिक समस्याओं के लिए सदनों तक पहुंचने वालो को जिम्मेदार बताया हो। शायद कांग्रेस की सरकारों में इस सच को स्वीकार करने का साहस ही नहीं रहा। निराशा का दौर झेलती रही देश की जनता ने बरसों बाद अंत्योदय की बात कहने वाली भाजपा को देश की बागडोर सौंपी है। इसी वजह से सत्ता के सिंहासनों पर जनता की आवाज सुनाई देने लगी है। मनोहर लाल खट्टर सरकार ने लीक से हटकर देश विदेश में गूंजती एक आवाज को सत्ता की आवाज बनाने का साहसिक कारनामा कर दिखाया है। देश के राजनेताओं और जनता ने भी इस आवाज को सकारात्मक तौर पर लिया है। आखिर राजनेता भी तो जनता के बीच से ही आते हैं। वे भी जनता के दर्द को समझते हैं। उनकी मजबूरी ये होती है कि सत्ता को ताकत देने वालों का लालच उन्हें धकेलकर आगे कर देता है और उसकी आड़ में अपने गोरखधंधे भी खोल देता है। इसलिए हरियाणा सरकार ने सत्ता के पर्दे की आड़ में पलने वाले लालची लोगों को स्पष्ट संदेश दिया है।

    गौरव की बात ये है कि देश के किसी सत्ताधीश ने इस फैसले की बुराई नहीं की है। बुरा तो उन्हें लग रहा है जो सत्ता के नाम पर घोटालों का जंजाल फैलाए रहते हैं। थोड़ा थोड़ा दान और खुद का महाकल्याण जिनका सूत्र वाक्य होता है. वे भी तरुण सागर जी की बात को गलत तो नहीं ठहरा सकते इसलिए उन्होंने कहना शुरु कर दिया कि प्रवचन गलत स्थान पर हो गए। वो स्थान चुने हुए प्रतिनिधियों का है। इसलिए उस स्थान का अतिक्रमण नहीं किया जाना चाहिए। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने का दावा करने वाली आप पार्टी के नेता विशाल दादलानी ने तो दिगंबर जैन संत पर ही मजाक छोड़ दिया। ये सभी वो लोग हैं जो सत्ता की आड़ में रबड़ी सूंतते रहे हैं।

    मध्यप्रदेश में दमोह तेंदूखेड़ा की माटी में पैदा हुए इस संत की प्रतिभा को मध्यप्रदेश सरकार पहले ही पहचान चुकी थी। इसलिए मध्यप्रदेश की विधानसभा में भी उनके प्रवचन कराए गए। इस बार उस आवाज को और बुलंद बनाने के लिए हरियाणा की सरकार ने जनता के अधिकृत मंच का उपयोग कर अपनी रचनाधर्मिता का परिचय दिया है। जो लोग कह रहे हैं कि तरुण सागर जी को जनता के दरबार का उपयोग नहीं करने देना था वे भूल जाते हैं कि ये पवित्र सदन जनता की आवाज को ही स्वर देने के लिए बनाए गए हैं। यही काम तो हरियाणा में हुआ। विरोध करने वाले क्या चाहते हैं कि नियमों, कानूनों और परंपराओं के बियाबान में जनता की आवाज को हमेशा कुचला जाता रहे। बच्चा बच्चा जानता है कि यदि राजनेताओं को मजबूर न किया जाए तो वे जनता के हितों की पैरवी जरूर कर सकते हैं। इसके बावजूद ताकतवर लोग जन प्रतिनिधियों को उनके लिए नियम कानून बनवाने में ही लगाए रखते हैं। विरोध की सुगबुगाहट लेकर रेंग रहे लोग तरुण सागर जी के उद्घाटित सच का विरोध करने की औकात तो रखते नहीं इसलिए वे उनके दिगंबर रूप और विधानसभा की परंपरा का तर्क देकर इस विचार को खारिज करने का षड़यंत्र कर रहे हैं। बेचारों को पता नहीं कि जनता की आवाज आंधी होती है जो राह में आने वाले दरख्तों, दीवारों को जमींदोज भी कर देती है।

  • एजेंट कांग्रेस क्यों समझे मोदी का दर्द

    एजेंट कांग्रेस क्यों समझे मोदी का दर्द

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    भारत की कांग्रेस गणराज्य के विभिन्न समूहों का महासंघ रही है।उसका किसी विचारधारा से कोई लेना देना कभी नहीं रहा। जो जहां से आ गया उसे उसके नेता समेत मंच पर जगह मिल गई। भारत की आजादी के विचार के लिए ये वक्त की जरूरत थी। यही वजह थी कि अंग्रेजों को अपना उत्तराधिकारी चुनने में आसानी हो गई। जब 1857 की क्रांति असफल हो गई तो अंग्रेजों को ये अहसास हो गया था कि स्थानीय लोगों को सत्ता में भागीदार बनाए बगैर वह इतने विशाल देश पर शासन नहीं कर सकते हैं। इसीलिए ए.ओ.ह्यूम ने तत्कालीन वायसराय लार्ड डफरिन की सलाह से 1884 ईस्वी में इंडियन नेशनल यूनियन की स्थापना की थी। डफरिन भी चाहता था कि भारत के राजनीतिज्ञ वर्ष में एक बार इकट्ठे हों और उनकी सुविधा और नाराजगी को ध्यान रखते हुए भारत का शासन चलाया जा सके।इस संगठन की स्थापना से पूर्व ह्यूम इंग्लैण्ड गये, जहां उन्होंने रिपन, डलहौजी जान व्राइट एवं स्लेग जैसे राजनीतिज्ञों से इस विषय पर व्यापक विचार-विमर्श किया। भारत आने से पहले ह्यूम ने इंग्लैण्ड में भारतीय समस्याओं के प्रति ब्रिटिश संसद के सदस्यों में रुचि पैदा करने के उद्देश्य से एक ‘भारत संसदीय समिति’ की स्थापना की। भारत आने पर ह्यूम ने ‘इण्डियन नेशनल यूनियन’ की एक बैठक मुम्बई में 25 दिसम्बर, 1885 को की, जहां पर व्यापक विचार विमर्श के बाद इण्डियन नेशनल युनियन का नाम बदलकर ‘इण्डियन नेशनल कांग्रेस’ या ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ रखा गया। यहीं पर इस संस्था ने जन्म लिया।

    लाला लाजपत राय ने अपनी पुस्तक ‘यंग इंडिया’ में लिखा है कि ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की स्थापना का मुख्य कारण यह था कि इसके संस्थापकों की उत्कंठा ब्रिटिश साम्राज्य को छिन्न-भिन्न होने से बचाने की थी। ह्यूम के जीवनीकार वेडरबर्न ने लिखा है है कि भारत में असन्तोष की बढ़ती हुई शक्तियों से बचने के लिए एक अभयदीप की आवश्यकता है और कांग्रेसी आन्दोलन से बढ़कर अभयदीप नामक दूसरी कोई चीज़ नहीं हो सकती। रजनीपाम दत्त ने अपनी पुस्तक इण्डिया टुडे में लिखा है कि ‘कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश सरकार की एक पूर्व नियोजित गुप्त योजना के अनुसार की गयी।” इस कांग्रेस में शामिल भारतीय नेता भी जानते थे कि ये अंग्रेजों की पिछलग्गू संस्था ही है। इसके बावजूद वे लहर पर सवार होने की कोशिश में कांग्रेस में शामिल रहे।

    जब आजादी के बाद इन नेताओं ने गांधीजी से अंग्रेजों के षड़यंत्रों के बारे में शिकायत की और कहा कि वे इसी कांग्रेस के नाम पर अपना छद्म शासन जारी रखना चाहते हैं तो गांधीजी ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि कांग्रेस अपना काम कर चुकी है अब उसका अवसान कर देना चाहिए। इसके बावजूद अंग्रेजों के एजेंट बनकर नेहरू ने कांग्रेस की सफलता पर अपनी सवारी नहीं छोड़ी। जाहिर है आज नेहरू के निधन के 52 सालों बाद उनके वंशज राहुल गांधी कैसे अपने पुरखों की गलती स्वीकार सकते हैं। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाजपा कार्यालय की आधारशिला रखते वक्त कहा कि आजाद हिंदुस्तान में जितना संघर्ष भाजपा के कार्यकर्ताओं को करना पड़ा है उतना तो आजादी की लड़ाई में कांग्रेस के नेताओं को भी नहीं करना पड़ा था। मोदी के इस बयान पर खिसियानी बिल्ली खंभा नोचें वाले अंदाज में राहुल गांधी बोले कि मोदी को अज्ञानता से आजादी मिले। मरती कांग्रेस के वारिस से इसके अलावा क्या बोलने की उम्मीद की जा सकती थी।

    वहीं मोदी ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा था कि आजादी के बाद उसके नेताओं की हर बात को गलत ठहराया गया। यही वजह है कि भाजपा कार्यकर्ताओं को कठिन संघर्षों से जूझना पड़ा। अब जबकि देश को ये मालूम पड़ चुका है कि अंग्रेजों ने लार्ड माऊंटबेटन और नेहरू के सहयोग से जो ट्रांसफर आफ पावर एग्रीमेंट हस्ताक्षरित किया था उसने किस तरह अंग्रेजों को मुनाफे के धंधों में भागीदारी दिलाई। आज जब ब्रिटेन का पाऊंड 87.85 रुपए में आ रहा है तब इस षड़यंत्र को आसानी से समझा जा सकता है कि किस तरह ब्रिटेन ने आजाद हिंदुस्तान से भी अपनी आय जारी रखी है। यही वजह है कि भारत में ब्रिटेन की लाबी आज भी बड़े निर्णायक के तौर पर कार्य कर रही है। इस लाबी के एजेंट भारत के जमीनी राजनेताओं को धूल धूसरित करने में जुटे रहते हैं। वे उन नेताओं को चंदा दिलाते हैं। उन्हें गुमराह करते हैं और फिर उन्हें बदनाम कर उन्हें सत्ता की दौड़ से बाहर धकेल देते हैं।

    मोदी जी की बात सौ फीसदी सही है। भाजपा को आज के वैभव तक पहुंचाने के लिए इसके नेताओं को तरह तरह की यातनाएं झेलनी पड़ी हैं। प्रधानमंत्री खुद उसी प्रताड़ना तंत्र के बीच से तपकर आए हैं। वे जानते हैं कि जमीनी नेताओं को प्रताड़ित करने का ये अभियान आज भी जारी है। अब इसकी कमान भाजपा और संघ में घुसपैठ कर चुके कुछेक कार्यकर्ता संभाले हुए हैं। इसके बावजूद मोदी इससे मुकाबले का तंत्र विकसित करने में जुटे हुए हैं। ये संतोष की बात है कि देश की नई पीढ़ी ब्रितानी हुकूमत और उसके एजेंटों की हरकतों को समझ रही है। यही वजह है कि तमाम षड़यंत्रों और शिकायतों के बावजूद देश की जनता भाजपा की विकास यात्रा को जारी रखे हुए है। देश को बुलंदियों तक ले जाने में जुटे नेताओं को अपना नजरिया साफ रखना होगा। उन्हें कांग्रेस की पूंछ पकड़कर चलने वाली अपनी प्रवृत्ति पर विराम लगाना होगा। मोदी बेशक शेर की चाल से अपना मार्ग प्रशस्त करते चले जा रहे हैं पर देश के लोगों को भी अपनी भूमिका पर अमल करना होगा। भाजपा ने अपने भीतर छुपे अंग्रेजों के एजेंटों पर लगाम नहीं लगाई तो आज जो लोग भाजपा का बधियाकरण करने में जुटे हैं वे क्षेत्रीय दलों को उभारकर इस नए स्वाधीनता संग्राम को कुचलने में कामयाब हो जाएंगे।

  • ऐसे ही डूबी कांग्रेस की महानता

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    कोयला नीलामी कांड से जनचर्चा के घेरे में आए नवीन जिंदल दावा कर रहे हैं कि कांग्रेस महान पार्टी है। लोग इसमें आते जाते रहते हैं इसकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। भारत में एक कहावत हमेशा कही जाती है कि रस्सी जल जाए पर बल न जाए। कमोबेश यही हालत इन दिनों कांग्रेस की है। मध्यप्रदेश में तो कांग्रेस और भी दुर्गति में है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव कांग्रेस को उसकी परंपराओं की नींव पर ही पुख्ता करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि उनके प्रयास एक दिन मरने की कगार पर खड़ी कांग्रेस में जान फूंक देंगे। कांग्रेस के कई बड़े नेता इसी मुगालते में जी रहे हैं। हकीकत ये है कि गया हुआ समय कभी वापस नहीं आता। कांग्रेस का भी एक समय था। आजादी के दौर में तो पूरे देश के जमींदारों, सामंतों पूंजीपतियों ने कांग्रेस के बैनर पर ही गरीबों को लामबंद करने का करिश्मा किया था। तब मुगल शासकों को निपटाने में इस्तेमाल हुए अंग्रेज भारत के सेठों को ही लूटने में लग गए थे। उन्होंने नए नए कानून बनाकर रियासतों से लेकर राजे रजवाड़े तक हड़प लिए थे। जाहिर था कि तब अंग्रेजों से निपटना भारत के हर वर्ग हर जाति समूह और हर आम आदमी की जरूरत थी। उस सफलता के बाद निपटने और निपटाने की नीति का खात्मा कर दिया जाना था। गांधीजी ने तो बाकायदा अपने भाषणों में कहा कि कांग्रेस का काम खत्म हो गया है इसे अब भंग कर दिया जाना चाहिए। इसके बावजूद नेहरू और उनके सहयोगियों ने नए सिरे से कहानी लिखने के बजाए लोकप्रिय कांग्रेस के बैनर पर ही सवारी गांठने का फैसला कर लिया। उसके बाद कांग्रेसियों की हर नई पीढ़ी सफलता की गारंटी वाली इस सत्ता को छोड़ने राजी नहीं हुई। कभी अंग्रेजों से करीबी रखने वाली कांग्रेस अंग्रेजों के फार्मूलों पर ही देश में राज करने लगी। उसके नेताओं को अच्छी तरह पता है कि सत्ता में बने रहने के लिए हमें समाज के किस तबके को खुश रखना है। वे कौन से साधन अपनाने हैं कि गरीब का नाम लेकर अमीरों को खुश किया जाए। यही वजह है कि कांग्रेस हमेशा से गरीबी हटाओ का नारा तो लगाती रही लेकिन गरीबों को गरीब बनाए रखने की नीति पर ही काम करती रही। नतीजतन हिंदुस्तान में उत्पादकता का ग्राफ कभी नहीं बढ़ सका। जितनी उत्पादकता बढ़ी उतनी ही जनसंख्या बढ़ गई और संसाधन फिर कम पड़ गए। यही वजह है कि आज सवा सौ करोड़ आबादी वाले देश की मुद्रा ब्रिटेन की मुद्रा के सामने भिखारी बनी नजर आती है। डालर के सामने ही वह कराहती नजर आती है। कई छोटे छोटे देशों की मुद्रा भी भारत की मुद्रा के सामने पहलवान की तरह सीना ताने खड़ीं हैं। गरीबों और अमीरों के बीच लगातार बढ़ते इस अंतर के कारण ही असंतोष फैला और लोगों ने नरेन्द्र मोदी की आवाज में अपनी आवाज मिलाकर कांग्रेस को विदा कर दिया। हार के चीथड़े पहिनने के बाद भी कांग्रेस के नेताओं का दंभ जहां का तहां खड़ा है।रस्सी जल गई पर बल नहीं गया। कांग्रेस के नेता अपने ऐंठ भरे दावे करने से नहीं चूक रहे हैं। वहीं वे आम इंसान की भावनाओं को भी समझने तैयार नहीं है।
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    हाल में जब मुख्यमंत्री निवास पर दद्दाजी ने मिट्टी के शिवलिंग बनाने का अभियान चलाया तब भक्तों के बीच भजनों का कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। इस आयोजन में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी अपने परिवार के साथ मौजूद थे। इस दौरान उनकी धर्मपत्नी साधना जी ने प्रफुल्लित मुख्यमंत्री के गाल में प्यार भरी चिकोटी काट ली। ये मुख्यमंत्री बने आम नागरिकों की भावनाएं ही थीं लेकिन कांग्रेस उसे तमाशा बनाने में लग गई। कांग्रेसियों का कहना है कि सार्वजनिक मंच पर इस तरह की हरकतें उचित नहीं हैं। ये बात सही है कि आमतौर पर स्त्री और पुरुष के बीच इस तरह की चुहलबाजियां घरों के भीतर ही होती हैं। पर ये भी सही है कि ये आयोजन मुख्यमंत्री निवास पर हो रहा था। इस आयोजन में भी मुख्यमंत्री जी सपत्नीक शामिल थे। ये आयोजन की सफलता ही कही जाएगी जिसने उसमें शामिल लोगों के बीच दूरियां घटा दीं। ऐसे आयोजन की तारीफ की जानी चाहिए। इसके बावजूद कांग्रेस के नेता निहायत पारिवारिक घटना को तूल देने में जुट गए हैं। कांग्रेस को प्रदेश के उन मुद्दों पर बात करनी चाहिए थी जो आम जनता को प्रभावित करते हैं। जिनसे प्रदेश के आम लोगों का जीवन संवारा जा सकता है। लेकिन वह ये नहीं कर रही है। ये भी उसकी परंपरा है। वह आम लोगों का नाम भले ही लेती रहती हो पर हमेशा वह बड़े लोगों के मुद्दे ही उठाती रही है। इस मामले में भी वह मुख्यमंत्री पर निशाना साधकर जनता के मूलभूत मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाने का काम कर रही है। उसे इस नीति से बाज आना चाहिए। अभी तो जनता ने उसे विपक्ष में बिठा दिया है। यदि उसने आम जनता की आवाज बनने के बजाए इसी तरह के दांव पेंच न छोड़े तो वह दिन दूर नहीं जब लोग कांग्रेसियों को देखते ही उन्हें हकालने लगेंगे।