Category: आमुख आलेख

  • भावनाओं के सूर्य भगवान गणेश

    भावनाओं के सूर्य भगवान गणेश

    के. विक्रम राव

    अगर इतिहासकार अलबरूनी की बात स्वीकारें तो श्रेष्ठतम सम्पादक हैं गणेश। इसे वेदव्यास ने भी प्रमाणित किया था। वर्तनी, लेखनी, प्रवाह और त्रुटिहीनता की कसौटी पर गणेश खरे उतरते है। इस पूरी गणेशकथा में हम श्रमजीवी पत्रकारों के लिये रूचिकर वाकया यह है कि गणेश सर्वप्रथम लेखक और उपसम्पादक हैं। यूं तो देवर्षि नारद को प्रथम घुमन्तू संवाददाता और संजय को सर्वप्रथम टीवी एंकर कहा जा सकता है, मगर गणेश का रिपोर्ताज में योगदान अनूठा है। मध्येशियाई इतिहासकार, गणितज्ञ, चिन्तक और लेखक अल बरूनी ने एक हजार वर्ष पूर्व लिखा था कि वेद व्यास ने ब्रह्मा से आग्रह किया था कि किसी को तलाशे जो उनसे महाभारत का इमला ले सके। ब्रह्मा ने हाथीमुखवाले गणेश को नियुक्त किया। वेदव्यास की शर्त यह थी कि गणेश लिखते वक्त रुकेंगे नहीं और वही लिखेंगेगे जो वे समझ पायेंगे। इससे गणेश सोचते हुए, समझते हुये लिखते रहे और व्यास भी बीच-बीच में विश्राम करते रहे। (एडवार्ड सी.सचान, अलबरूनीज इंडिया, मुद्रक एस. चान्द, दिल्ली, 1964, भाग एक, पृष्ट 134)।अब एक आधुनिक पहलू पर गौर करें। एडोल्फ हिटलर ने अपनी नेशनल सोशलिस्ट (नाजी) पार्टी का निशान (1930) स्वस्तिक बनाया था, तो प्राच्य के मनीषियों का व्यग्र होना सहज था। ओमकार स्वरूप गणेश के इस सौर प्रतीकवाले शुभ संकेत को उसने वीभत्स बना डाला था। हिटलर ने अपने अमांगलिक और अमानुषिक कार्ययोजना में इस वैदिक प्रतीक का जुगुप्सित प्रयोग किया था। स्वस्तिक को गणेश पुराण के अनुसार गजानन का स्वरूप तथा हर कार्यों में मांगलिक स्थापना हेतु शुरूआत को मानते हैं। श्रीगणेशाय नमः के उच्चारण के पूर्व स्वस्तिक चिन्ह बनाकर ”स्वस्ति न इन्द्रो बुद्धश्रवाः“ स्वस्तिवचन करने का विधान है। अपने स्वराष्ट्रवासी प्राच्यशास्त्री मेक्सम्यूलर को पढ़कर इस जर्मन नाजी तानाशाह ने अपने पैशाचिक अभीष्ट को हासिल करने हेतु स्वस्तिक को अपनाया था। लेकिन हिटलर का वही हश्र हुआ जो सूर्यपुत्र अहंतासुर का हुआ जिसका भगवान गजानन ने धूम्रवर्ण के अवतार में जगद् कल्याणार्थ वध किया। ब्रह्मा द्वारा कर्माध्यक्ष पद पाकर सूर्य को अहंकार हो गया था और तभी उनके नथुनों के वायु से अहंतासुर का जन्म हुआ था। वह भी अभिमानी होकर समस्त ब्रह्माण्ड का शासक, अमर तथा अजेय होना चाहता था। दैत्यगुरू शुक्राचार्य से गणेश मंत्र की दीक्षा प्राप्त कर अहन्तासुर राक्षस ने पार्वतीपुत्र की घोर उपासना की। भोले बाबा के आत्मज ने इस दैत्य को तथास्तु कहकर वर दे डाला। फिर वही हुआ जो हर दैत्य करता आया है। वही जो हिटलर ने गत सदी में किया था। पापाचार, नरसंहार, तबाही आदि। लाचार, निरीह देवताओं तथा मानवों ने गणेश की उपासना की। अपने भक्तों की रक्षा में गजानन ने उग्रपाश फेंक कर सभी असुरों का वध कर दिया। घमण्ड तजकर अहंतासुर गणेश का शरणागत हो गया। उसे आदेश मिला कि जहां गणेश की आराधना न होती हो वहीं जा कर वास करे।राजनीतिक रूप में गणेश का राष्ट्रवादी तथा जनकल्याणकारी उपयोग स्वाधीनता सेनानी, महाराष्ट्र केसरी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने हिटलर के आविर्भाव के पैंतीस वर्ष पूर्व पुणे में सर्वप्रथम किया था। अंग्रेजी साम्राज्यवादियों ने अपने भारतीय उपनिवेश में हर प्रकार की सार्वजनिक क्रियाशीलता पर प्रतिबंध लगा दिया था। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857) कुचल दिया गया था। शासकों ने भारतीयों को जाति तथा मजहब के आधार पर विभाजित कर दिया था। महाराष्ट्र के पेशवा शासक 1893 के पूर्व तक गणेश चतुर्थी भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाते थे। लोकमान्य तिलक ने इस धार्मिक उत्सव के जनवादी पहलू को पहचाना। उसे जनान्दोलन बनाया। तभी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना मुम्बई में हुये आठ वर्ष हो चुके थे। मगर सार्वजनिक आयोजन पर रोक बरकरार थी। हिन्दू चेतना को तिलक ने जगाया और जनपदीय स्तर से उठाकर गणेश चतुर्थी को राष्ट्रीय रूप दिया। चूंकि अन्य ईश्वरों की तुलना में गणेश किसी जाति या वर्ग विशेष के नहीं थे, अतः सर्वजन के इष्ट बन गये। गणेशोत्सव में सभी हिन्दू शरीक हो गये। उन्हीं दिनों तिलक के उग्र संपादकीय (समाचारपत्र मराठा तथा केसरी में) छपते थे जिनसे साम्राज्यवाद-विरोधी भावना को बल मिलता था। उनका सिंहनाद कि ”स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, मैं इसे लेकर रहूंगा“ काफी ख्यात हुआ। गणेश चतुर्थी को तिलक ने जनविरोध का माध्यम बनाया। बौद्धिक चर्चायें, नुक्कड़ नाटक, कविता पाठ, संगीत आदि माध्यम अपना कर गणेश चतुर्थी को मात्र लोकरंजन ही नहीं लोकराज के संघर्ष का मंच भी बनाया गया। स्वतंत्रता के बाद तो गणेश चतुर्थी को राष्ट्रीय पर्व की मान्यता मिल गई।गणेश के गृहस्थ होने की बात विवादित है। दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में, उन्हें ब्रह्मचारी मानते हैं। उत्तर भारत में प्रसंग भिन्न है। यह जानीमानी घटना है कि दोनों भ्राताओं (कार्तिकेय) में प्रतिस्पर्धा हुई कि पहले किसका पाणिग्रहण हो। दुनिया की परिक्रमा की शर्त रखी थी माता-पिता ने तो गणेश ने शार्टकट का रास्ता अपनाया और शिवपार्वती की परिक्रमा कर अपना दावा पुख्ता कर लिया। नाराज होकर देवताओं के सेनापति कार्तिकेय दक्षिण भारत में बस गये और अविवाहित रहे। गणेश की दो भार्या थीः ऋद्धि और सिद्धि तथा दो सन्ताने हुई क्षेम और लाभ जिसकी वणिकवर्ग और श्रेष्ठिजन पूजा करते हैं।यूं शिव ने देवताओं के शुभकार्य हेतु गणेश की सृष्टि की मगर अन्य गमनीय विभूतियां और विलक्षणतायें भी गणेश में हैं। शिव के रौद्ररूप की धार कम करना हो तो गणेशोपासना कीजिए। निर्विघ्नता, कर्मनाश और धर्मप्रवर्तन के अलावा गणेश ललित कलाओं और संस्कृति के संरक्षक हैं। एक बार वे मृदंग बजा रहे थे कुपित शिव ने उसे त्रिशूल से तोड़ दिया। तबला की उत्पत्ति तभी से हुई। जटिलता को सुगम बनाने में उन्हें महारत है जैसे भारीभरकम हाथीवाला शरीर नन्हे चूहे पर टिके, यह भौतिक संतुलन मुमकिन कर दिखाया।चूहे का ही प्रसंग है। एक बार सांप दिख गया था तो चूहा भागा और गड़बडा कर गणेश जी घराशायी हो गये। इस नजारे पर चन्द्रमा हंस पड़े। गणेश ने शाप दे दिया कि उसका आकार घटता बढ़ता रहेगा। तभी से चन्द्रमा के लिए बालेन्दु से पूर्णचन्द्र और फिर प्रतिपदा से अमावस तक का दौर चलता है। तो उस महान सम्पादक व लेखक वक्रतुण्ड, एकदन्त, गजवक्त्र, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज, धूम्रवर्ण, भालचन्द्र, विनायक, गणपति, गजानन को उनके जन्मोत्सव पर हमारा सादर नमन।K Vikram RaoMobile :9415000909E-mail: k.vikramrao@gmail.com

  • इस कंबल परेड से सुधार की उम्मीद बेकार

    इस कंबल परेड से सुधार की उम्मीद बेकार

    रैगिंग की भाषा में बोला जाए तो इन दिनों मुख्यमंत्री कमलनाथ की कंबल परेड चल रही है। कांग्रेस के विधायकों ने सरकार की जो धुलाई की है उससे पार्टी के बड़े बड़े दिग्गजों की सांसें भी फूल गईं हैं। भाजपा तो अंधे के हाथों बटेर लग जाने से प्रसन्न है। कमलनाथ सरकार जितने दिनों तक इस बगावत को काबू में नहीं कर पाएगी उतने दिनों तक ये धुलाई जारी रहेगी। मुख्यमंत्री कमलनाथ कह रहे हैं कि हम सदन में पहले भी बहुमत साबित कर चुके हैं लेकिन अब ये हालत हो गई है कि कोई भी ऐरागैरा आकर बहुमत साबित करने का चैलेंज देने लग जाता है। दरअसल ये कमलनाथ सरकार की अलोकप्रियता का उद्घोष है जो वे स्वयं कर रहे हैं। सलाहकारों की बात मानकर उन्होंने विधायकों को कथित तौर पर बंधक बनाए रखने के मुद्दे पर पुलिस में प्राथमिकी दर्ज नहीं कराई है। यदि वे ऐसा कर देते तो साफ उजागर हो जाता कि उनकी सरकार अल्पमत में आ गई है। आज दिग्विजय सिंह ने जिस तरह बैंगलौर जाकर बागी विधायकों से मिलने के लिए धरना दिया उसे देखकर कहा जा सकता है कि बगावत के मैनेजर भाजपा के रणनीतिकारों की सलाह पर नहीं चल रहे हैं। दिग्विजय सिंह को विधायकों से न मिलने देने का फैसला बड़ा बचकाना था। यही वजह है कि दिग्विजय सिंह विधायकों को बंधक बनाए रखने का शोर मचा रहे हैं। उनका कहना है कि वे विधायकों को बंधक बनाए रखने के मुद्दे पर कर्नाटक हाईकोर्ट जाएंगे। कमलनाथ सरकार के तमाम रणनीतिकार और अदालत में पैरवी कर रहे वकील पुष्पेन्द्र दुबे भी कह रहे हैं कि विधायकों को बंधक बनाकर रखा गया है। यदि आज दिग्विजय सिंह को विधायकों से मिलने का मौका दे दिया जाता तो खुद ब खुद साबित हो जाता कि विधायक बंधक नहीं हैं। कैमरों के सामने सार्वजनिक मुलाकात में विधायक हाथ जोड़कर दिग्विजय सिंह से वे सभी बातें कह सकते थे जो वे पहले अपने वीडियो जारी करते वक्त कह चुके हैं। वे इस मुलाकात के मंच का उपयोग करके सारी दुनिया को सुना सकते थे कि वे कमलनाथ सरकार के साथ नहीं हैं,जाहिर है कि विधानसभा के मंच से भी ज्यादा बड़े कैनवास पर कमलनाथ सरकार की कंबल परेड बेहतरीन तरीके से की जा सकती थी। ये तो आकलन हम लोग बाहर बैठकर लगा सकते हैं कि बगावत के रणनीतिकार गलती कर रहे हैं लेकिन हमारा आकलन हमेशा सही नहीं हो सकता। जिन विधायकों ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में बहादुरी भरा फैसला लिया और सरकार को नसीहत देने का कदम आगे बढ़ाया निश्चित रूप वे किसी न किसी रणनीति पर काम जरूर कर रहे हैं। सिंधिया समर्थक विधायक आज भी कह रहे हैं कि महाराज सिंधिया जो कहेंगे हम वही करेंगे। वे दरअसल देख चुके हैं कि जिन आर्थिक सुधारों से ज्योतिरादित्य प्रदेश का काया कल्प करना चाहते थे उन्हें कमलनाथ की पुरातनपंथी सरकार लागू नहीं कर रही थी। गोस्वामी तुलसी दास कह गए हैं कि मुखिया मुख सो चाहिए खानपान को एक पाले पौसे सकल अंग तुलसी सहित विवेक। कमलनाथ इस कसौटी पर फिसड्डी साबित हुए हैं। उन्होंने प्रदेश के विधायकों, जन प्रतिनिधियों, पत्रकारों, नागरिकों से दूरी बनाई और मनमाने ढंग से बजट खर्च करने का अभियान चलाया। जनता को हित वंचित करके अपने सहयोगियों पर बेइंतहा संसाधन लुटाए और अपनी स्थिति मजबूत की। उम्र के असर से उनकी दृष्टि कमजोर हो गई है। उन्होंने अकेले छिंदवाड़ा में लगभग तेरह हजार करोड़ के निर्माण कार्य स्वीकृत करवा लिए और अन्य विधानसभा क्षेत्रों को रीता छोड़ दिया। यही वजह है कि साल भर से चेताने के बावजूद जब कमलनाथ जी की आदतें नहीं बदलीं तो उन्होंने विद्रोह जैसा फैसला किया। आजादी की लड़ाई में भी जब अंग्रेजों ने लूट का शोषणवादी तंत्र चलाया था तब भारत में विद्रोह की चिंगारी भड़की और दावानल बनी थी। आज के हिंदुस्तान में कमलनाथ की कूढ़ मगज सोच को आखिर कैसे झेला जा सकता था। जिस इंस्पेक्टर राज को नरसिम्हाराव की सरकार के कार्यकाल में डाक्टर मनमोहन सिंह दफन कर चुके थे उसे कमलनाथ दोबारा थोपने में जुटे थे। शुद्ध के लिए युद्ध के नाम पर व्यापारियों का शोषण और लूट का जो दुष्चक्र कमलनाथ सरकार ने चलाया उससे प्रदेश भर में जन आक्रोश भड़क गया था। तबादलों के माध्यम से पोस्टिंग का खुला खेल जिस तरह से साल भर में देखा गया उसने प्रदेश में अराजकता की स्थितियां निर्मित कर दीं हैं। बढ़ते अपराधों ने प्रदेश की शांति व्यवस्था भंग कर दी है। इसके बावजूद कमलनाथ दंड और दमन का दुष्चक्र चलाने में जुटे हैं। इतनी तगड़ी धुलाई के बाद भी उनकी भाषा शैली नहीं बदली है। पिछले दिनों जब उनसे पूछा गया कि ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा है कि कर्मचारियों और नागरिको से किए वादे पूरे नहीं हुए तो वे सड़क पर उतर जाएंगे तो कमलनाथ ने लगभग दुत्कारते हुए कहा, तो उतर जाएं। इस तरह की भाषा शैली और रवैये के बाद भी यदि कांग्रेस के विधायक चुप थे तो ये उनकी भलमन साहत थी। भाजपा में तो इस तरह के बर्ताव को कैडर की वजह से झेला जा सकता है लेकि कांग्रेस में जहां लीडरशिप आधारित संगठन हो वहां इस तरह के तुर्रमखां को कब तक बर्दाश्त किया जा सकता था। आज सारा दारोमदार ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों के रुख पर निर्भर कर रहा है। यदि वे अपने फैसले पर कायम रहते हैं तो कोई वजह नहीं कि कमलनाथ सत्ता से अपदस्त कर दिए जाएंगे। भाजपा के साथ शामिल होकर ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रदेश को एक अग्रगामी विकास की दिशा दे सकते हैं। लेकिन अब तक ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है। कांग्रेस के भीतर की ये बगावत यदि सफल हो जाती है तो ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रदेश के कद्दावर नेता के रूप में उभर जाएंगे। महल से अदावट रखने वाले भाजपाई ये नहीं चाहते। जाहिर है कि प्रदेश की आधुनिक आवश्यकताओं की कसौटी पर फेल हो चुके शिवराज सिंह चौहान भी नहीं चाहते कि भाजपा में कोई उनसे बड़ा लीडर बनकर उभरे। इसके बाद सत्ता की हांडी टूटने की आस लगाए बैठे नरेन्द्र सिंह तोमर, कैलाश विजयवर्गीय, नरोत्तम मिश्रा, भूपेन्द्र सिंह, गोपाल भार्गव भी नहीं चाहते कि गोविंद राजपूत और तुलसी सिलावट जैसे धाकड नेता उनके सामने चुनौती के रूप में उभरें। इन हालात में भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व को हस्तक्षेप करना पड़ेगा। यदि भाजपा का अंदरूनी महाभारत थम जाता है और ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा के नेताओं का साथ पाकर इस बगावत को सफल बना लेते हैं तो फिर प्रदेश को अबकी बार भाजपा और कांग्रेस की संकर सरकार मिलेगी जो प्रदेश के हितरक्षण के लिए नए कीर्तिमान स्थापित करेगी। ज्योतिरादित्य सिंधिया की बुआ वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे सिंधिया संगठन को किस सीमा तक बांधने में सफल होती हैं बगावत की सफलता उसी से आकी जाएगी। कमलनाथ तो इस बगावत को कुचलने की पूरी तैयारी कर रहे हैं। फिलहाल उन्हें सत्ता जाने की संभावनाओं से डरे हुए कांग्रेस विधायकों का समर्थन मिल रहा है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से यदि पलड़ा भाजपा के पक्ष में झुकता है तो कमलनाथ सरकार का अल्पमत संकट और भी ज्यादा गहरा हो जाएगा। देखना होगा कि ये बगावत सफल होती है या फिर आत्मसमर्पण की चौखट चूमती है। दोनों ही स्थितियों में कमलनाथ इस कंबल परेड से कोई सबक लेंगे इसकी संभावना फिलहाल तो नहीं दिखती।

  • सत्ता के बूट से नहीं कुचली जाएगी ये बगावत

    सत्ता के बूट से नहीं कुचली जाएगी ये बगावत

    भोपाल,17मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)।मुख्यमंत्री कमलनाथ की कांग्रेस सरकार विदाई की बेला में है। उनकी पार्टी के ही 22 विधायकों ने अपनी सरकार के खिलाफ बगावत कर दी है। सरकार का प्रयास है कि उन विधायकों को डरा धमकाकर या पुटियाकर अपने खेमे में वापस लौटा लिया जाए और सरकार बचा ली जाए। बगावत को कुचलने के लिए कमलनाथ ने मुख्यसचिव और डीजीपी बदलकर प्रशासन और पुलिस के जेबी इस्तेमाल की तैयारी की है।इस तानाशाही भरे रवैये के बावजूद कमलनाथ की विदाई पल प्रतिबल और भी ज्यादा बलवती होती जा रही है। जैसे जैसे वे बगावत को कुचलने का षड़यंत्र रच रहे हैं उसका प्रतिरोध भी बढ़ता जा रहा है। सत्ता के इस दुरुपयोग से उन्होंने कांग्रेस के ही अन्य विधायकों की सहानुभूति भी खो दी है। सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद तो कमलनाथ के तमाम प्रयास नाकाफी साबित हो जाएंगे।

    बैंगलौर में बैठे विधायकों ने बाकायदा प्रेस वार्ता करके खुद के बंधक बनाने की बात झूठी साबित कर दी है। उन्होंने कहा कि हम अपनी मर्जी से सरकार के खिलाफ इस्तीफा देकर आए हैं और दुबारा चुनाव का सामना करने के लिए भी तैयार हैं। कमलनाथ सरकार जनहित के कार्यों की उपेक्षा कर रही थी हम इसलिए सरकार का विरोध कर रहे हैं। हमारे नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के काफिले पर जिस तरह सार्वजनिक तौर पर हमला किया गया उसे देखते हुए हमें अपनी सुरक्षा का खतरा है। सरकार हमें तोड़ने के लिए विविध हथकंडे अपना रही है। यदि हमें केन्द्रीय बलों की सुरक्षा दिलाई जाएगी तो हम भोपाल वापस आकर सदन के फ्लोर टेस्ट में भाग लेंगे। मध्यप्रदेश पुलिस सरकार के दबाव में है इसलिए हमें उस पर भरोसा नहीं है।

    सरकार के वित्तमंत्री तरुण भनोट और जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा बार बार कह रहे हैं कि विधायकों को यहां कोई खतरा नहीं है लेकिन कांग्रेस और कमलनाथ को करीब से समझने वाले विधायकों को सरकार के बयानों पर भरोसा नहीं है। दरअसल कमलनाथ ने डीजीपी वीके सिंह को हटाकर विवेक जौहरी को न केवल डीजीपी बना दिया है बल्कि उन्हें दो साल की सेवावृद्धि भी दे दी है। सरकार से उपकृत होने के बाद विवेक जौहरी ने पुलिस के और निजी बाऊंसर्स की सेवाएं सरकार को उपलब्ध कराई हैं। इन टोलियों में संविदा नियुक्ति वाले गुंडों को भी शामिल किया गया है। यही नहीं एक विधायक के नेतृत्व में गुंडों की एक टोली भी सक्रिय है जिसका मार्गदर्शन भोपाल के डीआईजी इरशाद वली कर रहे हैं।

    सरकार के प्रशासकीय नियंत्रण की कमान नए प्रशासनिक मुखिया गोपाल रेड्डी और प्रशासन अकादमी के डीजी बना दिए गए पूर्व सीएस सुधीरंजन मोहंती संभाल रहे हैं। कमलनाथ की जिस हेकड़ी भरी कार्यशैली की वजह से आज कांग्रेस की सरकार संकट में आई है उसके पीछे अफसर शाही का यही खुला दुरुपयोग प्रमुख वजह है। बागी विधायकों का दो टूक कहना है कि मुख्यमंत्री सचिवालय ने चुने हुए विधायकों को बाईपास करके अफसरों के माध्यम से लूट का तंत्र चला रखा है। उनके पास माफिया से मुलाकात के लिए तो समय है पर अपने विधायकों के लिए वक्त नहीं है।जनहितैषी योजनाएं बंद कर दी गई हैं या फिर उनका लाभ आम जनता को नहीं मिल पा रहा है।

    दरअसल जिस तरह से कमलनाथ की कार्यशैली को कांग्रेस के ही विधायकों ने नकार दिया है उससे सरकार अल्पमत में आ गई है। इस बगावत को कमलनाथ अपनी ही शैली में कुचलना चाह रहे हैं जो अब किसी भी तरह संभव नहीं है।कमलनाथ की विदाई तय है। यदि वे सत्ता में बने रहने के लिए गुंडागर्दी का सहारा लेने की कोशिश करेंगे तो मध्यप्रदेश में सत्ता संग्राम का खूनी माहौल बन जाएगा। इतिहास के आधार पर कमलनाथ इस बगावत को संविद सरकार के दौर से तुलना करके देख रहे हैं जबकि इस बार की बगावत ज्यादा परिष्कृत है और केन्द्र में भी एक ऐसी लोकतांत्रिक सरकार है जो किसी तानाशाही को छूट नहीं देगी।

  • सिंधिया से ठलुए कांग्रेसी और बोगस भाजपाई दोनों खफा

    सिंधिया से ठलुए कांग्रेसी और बोगस भाजपाई दोनों खफा

    भोपाल,14 मार्च,(प्रेस सूचना केन्द्र)। मोदी अमित शाह की जोड़ी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्यसभा में भेजने का फैसला लेकर भारतीय राजनीति के परंपरावादी युग का अंत कर दिया है। इसके साथ ही चंद मुद्दों के इर्द गिर्द चकरघिन्नी बनी राजनीति की इबारतें भी वाशिंग मशीन के ड्रायर में रखे गीले कपड़ों के समान सींलन मुक्त होने लगीं हैं। इस एक अकेले मूव ने न केवल कांग्रेस बल्कि भारतीय जनता पार्टी के भी पिछलग्गू राजनेताओं को हतप्रभ कर दिया है। स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे ने कांग्रेसी राजनीति के शीर्ष दिनों में भी कर्मठ कार्यकर्ताओं की फौज जुटाकर जो संगठन खड़ा किया था वह आज सिफारिशी भाजपाईयों से भर गया है। चौदह सालों के शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में जो भाजपा चमचों की भी़ड़ बनकर रह गई थी वह सिंधिया के आगमन से उत्साहित तो है लेकिन उसमें भी भविष्य को लेकर संशय के स्वर उभर रहे हैं।

    लगभग बीस सालों तक कांग्रेस की राजनीति को शीर्ष मंच पर करीब से देखने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया का राजनीतिक प्रशिक्षण बहुत लंबा रहा है। बचपन से राजघराने में जन्म लेने के बाद आधुनिक राजनीति के पुरोधा स्वर्गीय माधवराव सिंधिया की सफल राजनीति को करीब से देखने वाले ज्योतिरादित्य को जनसेवा का पाठ अपने खानदान से मिला है। उनकी दादी स्वर्गीय विजयराजे सिंधिया ने जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी में बदले एक नए राजनीतिक दल को अपने राजघराने की विरासत से पाला पोसा था। वीर शिवाजी जिस तरह आधुनिक महाराष्ट्र की राजनीति की पहचान रहे हैं। मध्यप्रदेश में यही पहचान आज भी बालाजी बाजीराव पेशवा द्वितीय की कर्मठता से है। परम प्रतापी राजा भोज द्वितीय के शासन की जो सुगंध मध्यप्रदेश के स्मृतिपटल पर आज भी अंकित है उसे चिरस्थायी बनाने का काम बालाजी बाजीराव पेशवा ने किया था। पेशवा ने ही ग्वालियर में सिंधिया वंशजों को सल्तनत सौंपी थी। इसके बाद सिंधिया घराने के कई राजाओं ने उस राजनीति को आगे बढ़ाया।

    राजमाता विजयाराजे सिंधिया इस राजनीतिक गौरव की मशाल लेकर ही राजनीति में आईं थीं। उनके ऐश्वर्य और विरासत से ईर्ष्या करने वाली श्रीमती इंदिरा गांधी ने सिंधिया राजघराने को मटियामेट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लोकतंत्र और स्वाधीनता की दुहाई देकर अंग्रेजों की पिछलग्गू कांग्रेस का नेतृत्व करते हुए श्रीमती गांधी ने भारतीय राजनीति के तमाम ठिए ठिकानों को ध्वस्त करने का अभियान चलाया था। उनके कुछ सिपाहसालारों ने जिस तरह की कहानियां गढ़ीं उस पर अमल करते श्रीमती इंदिरागांधी ने सिंधिया सल्तनत को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। एसपी बनाकर भेजे गए स्वर्गीय अयोध्यानाथ पाठक को लगातार सात गैलेन्ट्री अवार्ड इसी सोच का सबूत हैं। इस दमन चक्र का ही नतीजा था कि चंबल घाटी डकैतों के आतंक से थर्राती रही। श्रीमती विजयाराजे सिंधिया के निधन के बाद भी भारतीय जनता पार्टी ने चंबल में सामाजिक न्याय की बड़ी लड़ाई लड़ी। उमा भारती के नेतृत्व में बनी भाजपा की सरकार तक ये परंपरा जारी रही। शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा ने डकैती उन्मूलन के नाम पर खेती को सिंचित करने का जो अभियान चलाया उससे न केवल चंबल बल्कि धार झाबुआ के आदिवासी अंचल में भी अपराधों का ग्राफ गिरा था।

    इस सबके बावजूद मध्यप्रदेश की राजनीति में आर्थिक विषयों के जानकार नेतृत्व की जरूरत महसूस की जाती रही है। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपनी राजनीतिक पारी शुरु करने से पहले आधुनिक अर्थशास्त्र की जो तैयारी की वह अब तक चलती रही राजनीति में फिट नहीं बैठती है। कांग्रेस की राजनीति तो इसके लिए बिल्कुल ही बोगस है। कांग्रेस गरीबी को संरक्षित करने की जिस राजनीति के तहत समाज को बांटने की विचारधारा लेकर चलती है उससे मध्यप्रदेश कभी गुजरात जैसा या उससे भी आधुनिक राज्य नहीं बन सकता है। दिग्विजय सिंह का बंटाढ़ार शासनकाल रहा हो या फिर शिवराज सिंह चौहान का कर्ज लेकर खैरात बांटने वाला दीर्घ शासनकाल सभी में प्रदेश की जनता की भरपूर उपेक्षा की गई। योजनाओं के नाम पर खैरात बांटकर वोट खरीदने की इस शैली का अंत कभी न कभी तो होना ही था। ये पहल कौन करता। कमलनाथ को उद्योगपति के रूप में प्रचारित करने वाला वर्ग राजनीति की इसी पाठशाला से आता है। बैंकों से कर्ज लेकर घाटे के उद्योग स्थापित करने वाली फर्जी उद्योगपतियों की लाबी इस राजनीति की सूत्रधार है। इस राजनीति से देश को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकानामी बना पाना किसी भी तरह संभव नहीं है।

    देश में धनाड्य राजनीति की इस उड़ान का पायलट कोई आर्थिक विषयों का जानकार ही हो सकता है। भाजपा के प्रवक्ता के रूप में काम करने वाले डायचे बैंक के पूर्व प्रबंध निदेशक जफर इस्लाम ने ज्योतिरादित्य सिंधिया में वे क्षमताएं देखीं और उन्हें भाजपा की राजनीति की तरफ मोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। भाजपा को उनकी दादी राजमाता सिंधिया ने सिंधिया सल्तनत की बागडोर से सींचा था। उनकी बुआएं श्रीमती यशोधरा राजे सिंधिया और राजस्थान की मुख्यमंत्री रहीं वसुंधरा राजे सिंधिया ने इस विरासत को सहेजकर रखा था। यशोधरा जी जब मध्यप्रदेश की उद्योगमंत्री थीं तो उन्होंने विश्व भर में फैले औद्योगिक घरानों को प्रदेश से जोड़ने का सफल अभियान चलाया था। शिवराज सिंह चौहान को संरक्षण देने वाली लाबी को ये पसंद नहीं था और उन्होंने इस अभियान को धराशायी कर दिया।

    कांग्रेस हो या भाजपा दोनों में इंदिरागांधी के बैंकों के राष्ट्रीयकरण वाले अभियान से लूट करने वाले दलालों का वर्चस्व रहा है। इस लाबी को कमलनाथ अनुकूल लगते हैं लेकिन ज्योतिरादित्य खटकते हैं। कांग्रेस की सरकार बनाने में मध्यभारत से लगभग चौबीस विधायकों का साथ रहा है। ज्योतिरादित्य सिंधिया से जुड़े यही विधायक और पूर्व मंत्री आज कमलनाथ सरकार के पतन की वजह बन रहे हैं। मध्यप्रदेश को यदि देश की नई अर्थनीति के साथ कदमताल करना है तो उसे कमलनाथ सरकार से मुक्ति पाना ही होगा। कमलनाथ सरकार के पतन के बाद जो भी नेतृत्व उभरेगा उसमें सिंधिया का असर जरूर रहेगा। ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्यसभा में भेजने के बाद भाजपा चाहे नरेन्द्र सिंह तोमर को प्रदेश की कमान थमाए या फिर उमा भारती या कैलाश विजयवर्गीय को ,शिवराज, नरोत्तम मिश्रा या बीडी शर्मा कोई भी हो ये लीडरशिप प्रदेश में मोदी सरकार की नीतियों को लागू करने में सफल साबित होगी।

    जाहिर सी बात है कि कर्ज आधारित अर्थव्यवस्था की राजनीति की पैरवी करने वाले गमले में उगे राजनेता प्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनता की अपेक्षाओं को अब तक पूरा नहीं कर पाए हैं। कमलनाथ तो छिंदवाड़ा के ही मुख्यमंत्री बनकर रह गए। उनके कार्यकाल में सरकारी क्षेत्र को जिस तरह लूट का अड़्डा बना दिया गया उससे जनता में भारी निराशा है। शिवराज सरकार की सारी कल्याणकारी योजनाओं को बंद करके कमलनाथ जिस सस्ती बिजली का ढिंडोरा पीट रहे हैं वह जनता के लिए मंहगा सौदा है। शिवराज सिंह चौहान की खैराती राजनीति की तरह ये भी मीठा जहर बनकर जनता को लुभा रहा है। जाहिर है कि ऐसे में आर्थिक विकास की मूलभूत राजनीति करने वालों का वर्चस्व बढ़ना इन ठलुओं और बोगस राजनेताओं को भला कैसे रुचेगा। वे भले ही खफा होते रहें लेकिन इतना तो तय है कि मध्यप्रदेश ने एक नई राजनीति की दिशा में अपने कदम बढ़ा लिये हैं। दिग्गी के चमचे इसे गद्दारी कहें या शिवराज विभीषण की उपमा दें लेकिन बदलाव की ये बयार फिलहाल थमने वाली नहीं है।

  • डिफाल्टर नीतियों वाला मुख्यमंत्री

    डिफाल्टर नीतियों वाला मुख्यमंत्री

    सत्ता संभालने के एक साल पूरा होने पर मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अपनी डींगें हांकने के लिए विज्ञापनों का रेला पेल दिया है। जिस शिवराज सिंह सरकार को विज्ञापनों की सरकार बताकर कमलनाथ ने मीडिया पर लांछन लगाया आज उसी मीडिया की चौखट पर उनकी सरकार औंधे मुंह गिरी पड़ी है। करोड़ों के विज्ञापन कार्पोरेट मीडिया की झोली में डालकर वे प्रदेश की जनता के टूटते भरोसे को टिकाए रखना चाहते हैं। कर्ज माफी और इंदिरा ज्योति योजना जैसी वाहवाही लूटने वाले उनके ध्वजवाहक अभियान ही जनता को उनके वादे और हकीकत की पहचान कराने के लिए काफी हैं। तरह तरह की नई शर्तें कर्जमाफी को छलावा बता रहीं हैं तो बिजली कंपनियां अपना घाटा पाटने के लिए जिस तरह बिजली बिलों की रीडिंग लंबित करके उपभोक्ताओं से भारी भरकम बिल वसूल रही है उससे सरकार की कथनी और करनी की पोल खुल जाती है। बात बात में भाजपा सरकार पर खजाना खाली छोड़कर जाने का आरोप मढ़ने वाले मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी ये समझाने में असफल रहे हैं कि राज्य की मासिक आय क्यों घटती जा रही है। यदि उनका वित्तीय प्रबंधन बहुत अच्छा है तो साल भर में उन्हें उन्नीस हजार करोड़ का कर्ज क्यों लेना पड़ा है। छिंदवाड़ा माडल का शिगूफा छोड़कर कमलनाथ ने खुद को उद्योगपति बताने की कारीगरी तो कर ली लेकिन वे अब तक एक डिफाल्टर मुख्यमंत्री ही साबित हुए हैं। प्रदेश के बरसों पुराने बेशकीमती बांस जंगलों को मिट्टी मोल बेचने के लिए उन्होंने आईटीसी को कारखाना लगाने की छूट तो दे दी लेकिन इससे प्रदेश की कितनी संपदा कौड़ियों के मोल बेची जाएगी ये बताने को वे तैयार नहीं हैं। छतरपुर के बक्सवाहा की हीरा खदान सरकार ने अस्सी हजार करोड़ में बिड़ला को बेचकर ये बताने का प्रयास किया है कि वे प्रदेश के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने में बहुत गंभीर हैं। जबकि हकीकत ये है कि भारत सरकार अभी अपने बहुमूल्य खनिजों को बेचने की नौबत नहीं आने देना चाहती। खनिज मंत्री प्रदीप जायसवाल कहते हैं कि केन्द्र से मंजूरियां लेने की जवाबदारी ठेका लेने वाली कंपनी की है। उसे हमने दो साल का वक्त दिया है। हालांकि केन्द्र के रुख को देखते हुए ये अनुमतियां मिल पाएंगी फिलहाल तो संभव नहीं दिखता। कमलनाथ सरकार ने तबादलों और पोस्टिंग का जो खुला खेल किया उसकी वजह से नौकरशाही पूरी तरह मनमर्जी की मालिक हो गई है। जिस अफसर ने करोड़ों रुपये देकर पोस्टिंग हड़पी है वह राजस्व उगाही आखिर कहां से करे। उसकी सहूलियत के लिए ही सरकार ने पहले शुद्ध के लिए युद्ध और फिर माफिया पर हमले जैसे लोकप्रियता बटोरने वाले अभियान चला दिए। शुद्ध के लिए युद्ध के नाम पर सरकार ने सात हजार से भी अधिक व्यापारियों के नमूने लिए। अस्सी से अधिक व्यापारियों को रासुका में जेल भेज दिया जबकि उनमें से अधिकतर की खाद्य सामग्री शुद्ध पाई गई है। इसके बाद जेल भेजे गए व्यापारियों को भी सरकार की कृपा के आधार पर ही छोड़ा जा रहा है। जो लोग सरकार की कृपा नहीं खरीद सके हैं वे बेगुनाह होते हुए भी जेलों में बंद हैं। उनके कारोबार बंद हैं और उनसे जुड़े हजारों कर्मचारी बेरोजगार हो गए हैं। ये बात सही है कि कांग्रेस ने लगभग हवा हवाई वादे करके सत्ता की चाभी छीनी है। किसानों को गुमराह किया गया आदिवासियों को बहकाया गया, आम नागरिकों को शिवराज सरकार की कमजोरियां दिखाकर बरगलाया गया और सत्ता तो हासिल कर ली लेकिन अब इसे बनाए रखना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। ये बात सही है कि शिवराज सिंह सरकार प्रशासनिक तौर पर इतनी असफल सरकार थी कि वह अपने अच्छे कार्यों की पैरवी करने लायक लोगों को भी तैयार नहीं कर सकी। भीड़ भंगार के बीच कर्ज लेकर योजनाओं की टाफिया बांटते शिवराज सिंह चौहान को पता ही नहीं था कि उन्होंने कैसे भाजपा के कर्मठ कार्यकर्ताओं को संगठन से बेदखल कर दिया है। उनकी सरकार लगभग जड़ विहीन थी यही वजह है कि आज जब कमलनाथ सरकार ने माफिया के नाम पर उनके चमचों को जूते की नोंक पर रखना शुरु कर दिया है तब भाजपा के पास सरकार का मुकाबला करने के लिए रक्षा पंक्ति तक नहीं है। पाखंडी अभियानों से शिवराज की भाजपा ये भ्रम फैलाने का प्रयास कर रही है कि वो कमलनाथ सरकार से मुकाबला कर रही है लेकिन उनके साथ रहे भ्रष्ट मंत्रियों और चापलूसों की भीड़ को कमलनाथ बहादुरी के साथ काबू में कर रहे हैं। अधिकतर तो सरकार के माफिया वाले अभियान से ही डरकर अपने घरों तक सिमट गए हैं।दरअसल कमलनाथ जिन कारोबारियों को माफिया का नाम देकर वसूलियां कर रहे हैं वे सरकारी तंत्र के ही संरक्षण में तो फले फूले हैं। असली माफिया तो टैक्स वसूली करने वाले भ्रष्ट अफसरों का तंत्र है। कमलनाथ जी उसी तंत्र से चुनावी चंदा वसूलकर माफिया के विरुद्ध संग्राम का ऐलान कर रहे हैं जो सिर्फ छलावा ही साबित हो रहा है। शिवराज सिंह चौहान सरकार भी योजनाओं के नाम पर कर्ज लेकर जनता को बांट रही थी और कमोबेश यही काम कमलनाथ कर रहे हैं। कमलनाथ सरकार के वित्तमंत्री तरुण भनोट ने तो अपने बजट में भारी भरकम वसूली के टारगेट तय किए थे लेकिन जब मध्यप्रदेश अपने हिस्से का जीएसटी ही नहीं वसूल कर पा रहा हो तो वह किस मुंह से केन्द्र से अपना हिस्सा मांग सकता है। बेशक केन्द्र ने देर सबेर सभी राज्यों को जीएसटी की भरपाई राशि दे दी है लेकिन जब तक कमलनाथ सरकार बेईमान सरकारी तंत्र के भरोसे वसूली के रिकार्ड बनाने का मुगालता पाले बैठी रहेगी तब तक उसे असफलता ही हाथ लगेगी। हंसना और गाल फुलाना एक साथ नहीं हो सकता। आप अफसरों से यदि पार्टी फंड वसूल रहे हों तब आपको ये मुगालता नहीं पालना चाहिए कि वे ये राज्य का खजाना भी अपनी जेब से भरेंगे। कांग्रेस सरकार ने पार्टी फंड वसूलने की जवाबदारी जब अफसरों को ही थमा दी है तो फिर राज्य के संसाधन जुटाने के लिए निश्चित रूप से वे जनता पर अत्याचार करेंगे। यही कार्य श्रीमती इंदिरा गांधी के लगाए आपातकाल के दौरान हुआ था। तब जमाखोरों, मिलावटियों और कथित शोषकों के विरुद्ध मुहिम चलाई गई थी। नतीजा ये हुआ कि आपातकाल की आड़ में सरकारी भ्रष्ट तंत्र ने अत्याचारों की बाढ़ ला दी। नतीजतन श्रीमती गांधी चुनाव हारीं और देश को आपातकाल जैसे सिरफिरे फैसले से निजात मिल सकी थी। आपातकाल का कलंक आज भी कांग्रेस के सिर पर लगा है इसके बावजूद कमलनाथ आपातकाल 2 लेकर मैदान में कूद पड़े हैं। अब तक जो कहानियां उजागर हो रहीं हैं उनसे सरकार के झूठ की पोल रोज खुल रही है। निश्चित रूप से ये कहानियां मीडिया की सुर्खियां नहीं बन पा रही हैं लेकिन आखिर कब तक सरकार मीडिया का मुंह बंद कर सकती है।रोते बच्चे के मुंह को हाथ से दबा दिया जाए तो उसके रोने की आवाज जरूर बंद हो जाती है लेकिन उसका रोना जारी रहता है और जैसे ही हाथ हटाया जाता है उसके रोने की आवाज बुक्का फाड़कर बाहर आ जाती है। सरकार विज्ञापनों के मायाजाल के सहारे आखिर कब तक जनता की घुटन को दबाकर रख सकती है। राजनैतिक वसूलियों से केन्द्र की नीतियों के विरुद्ध झूठे आंदोलन खड़े करने से जनता का पेट भरने वाला नहीं है। जनता के बीच आक्रोश पनप रहा है। अभी यूरिया की कालाबाजारी ने जिस तरह किसानों को आक्रोशित कर दिया है उसी तरह सरकार की जनविरोधी नीतियों की असलियत भी जल्दी ही सामने आ जाएगी। अभी भी वक्त है कांग्रेस के सलाहकार अपनी सरकार का मार्गदर्शन करें तो गलती सुधारी जा सकती है।

  • इंसानियत का महामार्ग है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

    इंसानियत का महामार्ग है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

    डॉ. अनिल सौमित्र

    देश के वर्तमान प्रधानमंत्री राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे हैं l प्रचारक और संचारक लगभग समानार्थी है l संघ का प्रत्येक स्वयंसेवक एक कुशल संचारक होता है l इसी प्रकार एक प्रचारक में श्रेष्ठ संचारक के सारे गुण विद्यमान होते हैं l प्रधानमंत्री श्री मोदी टेक्नोसेवी भी हैं l वे संचार के परम्परागत, आधुनिक और अत्याधुनिक साधनों का खूब इस्तेमाल करते हैं l एक अर्थ में वे भारत के वैश्विक संचारक और प्रचारक प्रतीत होते हैं l श्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के संचार कौशल के करोड़ों मुरीद हैं l इसमें बड़ी संख्या संघ के स्वयंसेवकों की भी है l श्री मोदी की संचार साधना में आभासी और वास्तविक संचार का संतुलन कमाल का है l यह आदर्श और अनुसरण योग्य है l लेकिन यह आधा सच है l इसके आगे की बात यह है कि संघ में संचार प्रणाली, प्रकिया, संचार माध्यमों और उपकरणों को लेकर अंतर्द्वन्द्व और कशमकश की स्थिति है l संघ के अनेक अधिकारी, वरिष्ठ कार्यकर्ता और स्वयंसेवक हैं जिनकी आभासी सक्रियता वास्तविक गतिशीलता की तुलना में नगण्य है l हाल ही में संघ के उच्च अधिकारियों का ट्विटर खाता खुला, लेकिन उसमें अंतरण न के बराबर

    है l

    संचार पुरानी अवधारणा है l समाज और संघ अपेक्षाकृत नई अवधारणा है l संघ अर्थात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ l यह एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है l नित्य गतिशील शाखा के माध्यम से संघ सामाजिक परिवर्तन और पुनर्रचना के लिए प्रयासरत है l सामान्य तौर पर कहा जा सकता है कि समाज में मत-निर्माण, मत परिवर्तन, विचार परिमार्जन, लोकमत परिष्कार और व्यवहार परिवर्तन ही संघ का मुख्य कार्य है l संघ का यह प्रयास लोगों के साथ निरंतर संपर्क और संवाद पर आधारित है l इसके सम्पूर्ण प्रयासों के केंद्र में सुनियोजित, सुसंगत और सम्यक संचार व सम्प्रेषण ही है l संघ के योजनाकार और विचारक यह भली-भांति जानते हैं कि जैसे मनुष्य के लिए हवा और पानी आवश्यक है, वैसे ही समाज के लिए संचार जरूरी है l यही कारण है कि संघ ने संचार प्रक्रिया, पद्धति और तकनीक पर शुरू से ही गंभीर दृष्टि रखी है l संघ ने संगठन और समाज की आवश्यकताओं के अनुसार संचार प्रविधि व प्रक्रिया में युक्तिसंगत परिवर्तन भी किये

    हैं l संघ ने शाखा, स्वयंसेवक, और प्रचारक को संचार-तंत्र के रूप में विकसित किया है l संघ का पूरा ताना-बाना ही संचार आधारित है l संघ के प्रारम्भ से ही संचार और जनसंचार के विभिन्न माध्यमों का नियोजित उपयोग देखने को मिलता है l स्वयंसेवकों का व्यापक तंत्र ही संघ की सूचना प्रौद्योगिकी है l स्वयंसेवकों के माध्यम से संघ की विचारधारा प्रवाहित या संप्रेषित होती है l स्वयंसेवक में संपर्क, परिचय और नियमित संवाद के द्वारा विचारधारा को विस्तार देने का गुण विद्यमान होता है l

    संचार विशेषज्ञों के अनुसार, मनुष्य और समाज की ही तरह प्रौद्योगिकी की भी अपनी विचारधारा होती है l यह विचारधारा भले ही वैचारिक संगठनों की तरह न होती हो, लेकिन प्रौद्योगिकी भी अपनी विचारधारा को सतत आगे बढाने, अपने अनुसरणकर्ताओं की संख्या बढाने, उनमें उपयोग की आदत डालने की कोशिश करता है l इसमें उपयोगर्ताओं के साथ ही अन्य लोगों को प्रभावित करने का गुण विद्यमान होता है l सामान्यत: विचारधारा की दृष्टि से स्वयंसेवक और तकनीक अतुलनीय है l लेकिन जब हम सामाजिक अंत:क्रिया के परिप्रेक्ष्य में विचार करते हैं तो विचारधारा के प्रचार-प्रसार में तकनीक और स्वयंसेवक की तुलना की जा सकती है l किसी भी संगठन के कार्यकर्ता में अगर मानवीय गुणों को पृथक कर दें तो वह सिर्फ मशीन या प्रौद्योगिकी के सामान ही होगा l कमोबेश यही स्थिति संघ के स्वयंसेवकों में भी संभावित है l अगर स्वयंसेवकों में मानवीयता का गुण न हो तो उनमें और प्रौद्योगिकी की विचारधारा में अंतर नगण्य रह जाएगा l इसलिए कहा जा सकता है कि संघ के स्वयंसेवकों की विचारधारा मानवीय है, किन्तु प्रौद्योगिकी की विचारधारा अमानवीय l तो क्या तकनीक का अनियोजित, अनियंत्रित उपयोग, उसकी आदत और उसका अनुसरण व्यक्ति, समाज और संगठन को अमानवीय बना सकता है? अगर ऐसा है तो दुनियाभर में क्यों प्रौद्योगिकी का इतना उपयोग हो रहा है? मानव संगठनों में इसका दिनों-दिन बढता उपयोग क्या चिंता का विषय है?

    भारत और दुनिया में मानव समाज को संगठित करने के काम में सन 1925 से ही प्रयासरत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रारम्भिक समय से ही प्रौद्योगिकी के बारे में अन्य संगठनों से भिन्न विचार रखता रहा है l इसीलिये आरएसएस की स्थापना के शुरुआती दिनों में मानव संसाधन के अलावा अन्य सभी संसाधनों से एक निश्चित दूरी की परम्परा रही l कार्यक्रमों, गतिविधियों और योजनाओं का समाचार देना भी बहुत आवश्यक नहीं समझा जाता था l संचार तकनीक को तो तिरस्कार भाव से ही देखा जाता था l डोर टू डोर, मैन टू मैन और हार्ट टू हार्ट संचार सिर्फ संयोग नहीं, बल्कि संघ की सुदीर्घ नीति रही है l यद्यपि संघ के सिद्धांत और दर्शन में तो यह आज भी विद्यमान है, लेकिन व्यवहार में विचलन प्रतीत होता है l सकारात्मक या नकारात्मक, किसी भी प्रकार की सूचना को प्रसारित करने की संघ की विशिष्ट शैली रही है l संघ ने संवाद की भारतीय पद्धति और प्रारूप (माडल) को ही अपनाया है l अनेक अनूकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में सूचना-सम्प्रेषण का यह प्रारूप सफलतापूर्वक उपयोग किया जाता रहा है l आरएसएस की संगठनात्मक गठ संरचना सूचना-सम्प्रेषण की अदभुत व्यवस्था है l दरअसल यह संघ की संचार प्रौद्योगिकी ही है, जिसका लोहा उसके विरोधी भी मानते हैं l जैसे डिजिटल संचार के तहत कंप्यूटर का संजाल दुनियाभर में एक-दूसरे से जुड़ा है, ठीक वैसे ही संघ के स्वयंसेवकों का संजाल है, जो अल्प समय में अत्यंत तीव्र गति से संदेशों को संप्रेषित करने में सक्षम है l अनेक विषम परिस्थितियों और आपदाओं में संघ ने इस सूचना तंत्र का सकारात्मक उपयोग किया है l हांलाकि संघ की इस संचार क्षमता का मधु लिमये जैसे समाजवादी चिंतक व वैचारिक विरोधी ‘रियुमर्स स्प्रेडिंग सोसाइटी’ (आरएसएस) कह कर आलोचना करते रहे l

    कई शोधकर्ताओं और विश्लेषकों ने इस तथ्य का उल्लेख किया है कि कि संघ की सूचना प्रणाली को वर्तमान या आधुनिक संचार तकनीक ने काफी प्रभावित किया है l गत 20-25 वर्षों में संचार, विशेषकर संचार तकनीक में आमूल-चूल परिवर्तन होता दिखाई देता है l इसके कारण संघ की कार्यशैली, विशेषकर संपर्क और संवाद शैली में भी परिवर्तन हुआ है l सूचनाओं के तीव्र और गहन सम्प्रेषण के दौर में संघ के स्वयंसेवक भी पीछे नहीं रहना चाहते l संघ के विचारक प्रौद्योगिकी की विचारधारा और उसके प्रभावों से बखूबी वाकिफ हैं l वे भली-भाँति जानते हैं कि संचार-प्रौद्योगिकी अब लोगों की जरूरत और बहुत हद तक मजबूरी बन चुकी है l संचार तकनीक या सूचना प्रौद्योगिकी एक आवश्यक बुराई के रूप में ही सही, लेकिन स्वीकार्य हो चुका है l संघ में बौद्धिक विभाग के साथ ही बकायदा एक प्रचार विभाग भी है जो वर्षों से स्वयंसेवकों में प्रचार के महत्त्व का प्रतिपादन करता आ रहा है l यह प्रचार विभाग स्वयंसेवकों से ज्यादा समाज में विचार और सूचना सम्प्रेषण के लिए है l लेकिन तकनीक का प्रभाव ऐसा बढा है कि इससे संघ का स्वयं का तंत्र भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका है l दुनियाभर में विचार फैलाने और प्रतिगामी व विरोधी विचारों जवाब देने से लेकर संगठन के आतंरिक सूचना-प्रवाह तक में संचार- प्रौद्योगिकी की भूमिका अत्यधिक बढ़ गई है l इसमें कुछ तो तकनीक के इस्तेमाल का फैशन है, देखा-देखी है, लेकिन बहुत कुछ तकनीकी-उदारीकरण का प्रभाव भी है l संघ में अब सिर्फ बौद्धिक और प्रचार के लिए ही नहीं, बल्कि शारीरिक प्रशिक्षण के लिए भी संचार तकनीक का उपयोग आम चलन में है l

    एक समय था जब संघ में टेलीफोन से किसी कार्यक्रम की सूचना देना भी मजबूरी समझा जाता था, लेकिन आज ई-मेल, फेसबुक मैसेंजर, वाट्सेप, एसएमएस, गूगल हैंग-आउट आदि कम्प्युटर और मोबाईल फोन आधारित संचार-तकनीक के द्वारा सूचनाओं का आदान-प्रदान सामान्य-सी बात है l संघ की गठ-संरचना अब मोबाइल ‘एसएमएस-ग्रुप’ या वाट्सेप व्यवस्था पर अवलंबित हो चुकी है l संघ में स्मार्टफोन, आईपौड, आईपैड और लैपटाप से परहेज करने वाले अब कम ही बचे हैं l डिजिटल संचार माध्यमों से परहेज करने वाले इक्के-दुक्के लोग संघ के भीतर भी आधुनिकता विरोधी और रूढ़िवादी माने जाने लगे हैं l संचार-तकनीक का उपयोग करने वालों का अपना तर्क है l यद्यपि आधुनिक संचार तकनीक से परहेज करने वाले संघ में अल्पसंख्यक हैं, लेकिन उनका भी अपना मजबूत तर्क है l सूचना सम्प्रेषण के अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग करने वाले इसके गुण और फायदे बताते हैं, जबकि पारंपरिक संचार के समर्थक सूचना-प्रौद्योगिकी के नकारात्मक पहलुओं को उजागर कर इससे बचने की सलाह देते हैं l

    कई मुद्दों की तरह संचार पद्धति को लेकर संघ के भीतर एक कश्मकश की स्थिति बरकरार है l इस मामले में भी संघ ‘चिर पुरातन और नित्य-नूतन’ दो खेमों में बंटा है l एक तर्क ये है कि अगर युवाओं को जोडना है, दुनिया में विचारधारा को फैलाना है, भारत को दुनिया में सिरमौर बनाना है तो आज के चाल-चलन और तौर-तरीके को स्वीकारना ही होगा l तकनीक के प्रयोग में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना ही होगा l नई सोच के तरफदार हर क्षेत्र की तरह संचार क्षेत्र में भी संघ को सिरमौर होता हुआ देखना चाहते हैं l लेकिन संघ के भीतर एक तबका ऐसा है जो संघ की विचारधारा के साथ तकनीक की विचारधारा को भी बखूबी समझता है l वह तकनीक की ताकत को जानता है l वह डरता है कि “संघौ शक्ति कलियुगे” कहीं ‘तकनीकौ शक्ति कलियुगे’ न बन जाए l उसे डर है कि तकनीक का आकर्षण परम्परागत व्यवहार पद्धति पर भारी न पड़ जाए l तकनीक स्वयंसेवकों और समाज की आदत न बन जाए l इस मामले में वे महात्मा गांधी की सीख को भूलना नहीं चाहते जिसमें उन्होंने मानव सभ्यता के तकनीकीकरण का विरोध किया है l संघ का यह तबका गांधी जी की ही तरह प्रकृति आधारित मानव-सभ्यता के विकास का समर्थक है l इसी कारण वह इस सभ्यता के विधायक गुणतत्वों – धर्म, नीति, मूल्य आदि को बढ़ावा देना चाहता है l जबकि चर्च (ईसाइयत) पोषित वर्तमान सभ्यता यन्त्र, तकनीक, मशीन और प्रौद्योगिकी आधारित है l यह विविधता और विकेंद्रीकरण का विरोधी है l संचार-तकनीक की भी यही प्रवृत्ति प्रतीत होती है l

    हालांकि आज संघ के भीतर और संघ समर्थकों के द्वारा आधुनिक सूचना तकनीक का उपयोग करने की होड-सी दिख रही है l मोबाईल फोन के अत्याधुनिक एप्लीकेशन, इंटरनेट अनुसमर्थित – वेबसाईट, ब्लॉग, सोशल नेटवर्क और इलेक्ट्रानिक जनमाध्यमों के उपयोग में संघ के स्वयंसेवक किसी से भी पीछे नहीं हैं l संघ में तकनीक विरोधी अब अल्पसंख्यक हो चुके हैं l तो क्या यह मान लेना उचित होगा कि संघ के लिए संचार-तकनीक के उपयोग का लाभ-ही-लाभ है? कोई हानि नहीं, कोई नुकसान नहीं? क्या यह मान लिया जाए कि संघ, विचारधारा की दुनियावी लड़ाई में तकनीक के सहारे सबको पछाड़ ही देगा? क्या तकनीक की विचारधारा का संघ की विचारधारा पर कोई प्रभाव नहीं होगा? क्या संघ पर तकनीक बे-असर है? क्या यह मान लेना मुनासिब होगा कि तकनीक के सहारे स्वयंसेवकों की संघ-साधना डा. हेडगेवार के अभीष्ट को बिना किसी हानि के प्राप्त कर लेगी ? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके प्रति संघ के आधुनिकतावादी शायद बेपरवाह हैं l शायद उन्हें लगता है, अभी सोचने का नहीं, सबसे आगे निकल जाने करने का वक्त है ! लेकिन संघ के परम्परावादी चिंतित हैं l वे कट्टर और रूढ़िवादी होने के आरोपों से बेपरवाह संघ में तकनीकी अनुप्रयोगों पर लगाम लगाने, इसे नियंत्रित और नियोजित करने की हर संभव कोशिश में हैं l

    कुछ लोग भले ही तकनीक को नई सभ्यता का सिर्फ एक औजार भर मानते हों l लेकिन इस औजार का भी गलत उपयोग होना संभावित है l इस बात का खतरा तो है ही कि प्रौद्योगिकी आधारित संचार प्रक्रिया समाज में अमानवीय-संचार को बढ़ावा दे दे l डोर टू डोर, मैन टू मैन और हार्ट टू हार्ट की प्रतिस्थापना कम्प्युटर टू कम्प्युटर, फोन टू फोन, मेल-टू-मेल और व्हाट्सेप टू व्हाट्सेप के रूप में होने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता l यह भी संभव है कि स्वयंसेवकों की मानवीय विचारधारा को तकनीक की अमानवीय विचारधारा प्रभावित कर दे l तब शायद संघ सबसे तेज, सबसे आगे और सबसे बड़ा होकर भी निष्फल रह जाए! संघ वह न रहे जिसके लिए संघ है l पवित्र साध्य के लिए साधन की पवित्रता को कैसे झुठलाया जा सकता है l संघ के परम्परावादी साधन की पवित्रता और मानवीयता के सवाल पर सजग हैं, अपना पक्ष लेकर संघ में खड़े, समाज में डटे हैं l यह सही वक्त है कि संघ के आधुनिकतावादी भी संचार प्रौद्योगिकी की चकाचौंध में अपनी आँखें न भींचे – तकनीक के उपयोग के साथ उसकी विचारधारा को भी परखें !

    चूंकि संघ समाज के लिए, समाज में और समाज के द्वारा कार्य करता है l आज संघ मानव गतिविधि से जुड़े लगभग सभी क्षेत्रों में सक्रिय है l नि:सन्देश संघ कार्य की धुरी मनुष्य है l कोई भी उपकरण, मशीन, तकनीक या प्रौद्योगिकी संघ कार्य के लिए साधन मात्र हो सकता है, लेकिन लक्षित क्षेत्र तो मनुष्य और समाज ही है l संघ इस बात के लिए दृढ निश्चयी है की मानव सभ्यता को देव सभ्यता (प्रकृति उन्मुखी) की ओर ले जाना है, न कि दानव सभ्यता (मशीनोन्मुखी) की ओर l इसलिए संघ के योजनाकार संचार और संवाद के लिए भी मानवीय गुणों से युक्त संचार प्रारूप को ही श्रेष्ठ और युक्तिसंगत मानते हैं l इंटरनेट, कम्प्युटर, मोबाईल फोन आदि डिजिटल व तकनीक (उपकरण) आधारित सूचना तंत्र संघ को फौरी तौर पर मजबूरी में या आवश्यक बुराई के रूप में स्वीकार्य तो हो सकता है, लेकिन नीतिगत और दीर्घकालिक रूप से यह त्याज्य ही होगा l

    संघ को यह बखूबी पता है कि वर्तमान सूचना तकनीक ने एक अलग दुनिया निर्मित कर दी है जिसे संचार विशेषज्ञ ‘आभासी दुनिया’ कहते हैं l इस नव-निर्मित आभासी दुनिया और वास्तविक दुनिया में जमीन-आसमान का अंतर है l जो लोग जब भी, जितनी देर तक तकनीक के साथ आभासी दुनिया में होते हैं तो वे वास्तविक दुनिया से अलग-थलग हो जाते हैं l इस दुनिया में व्यक्ति अकेला होता है और उसके साथ होते हैं कम्प्यूटर, मोबाइल, गैजेट, चित्र, संकेत, ध्वनियाँ आदि l संघ को आभासी नहीं, वास्तविक दुनिया में काम करना है l इसलिए उसके लिए उपकरण और तकनीक से अधिक मानवीय गुणों- संवेदना, भावना आदि के साथ मनुष्य के मस्तिष्क और ह्रदय की चिंता है l संघ मानवीय समाज के विकास और सशक्तिकरण के लिए प्रतिबद्ध है, न कि मशीनी या तकनीकी समाज के लिए l

    ( लेखक संचार और संघ विचारों के अध्येता हैं )

  • महाकाल माफिया को रिश्वत,जनता को मंहगी बिजली

    महाकाल माफिया को रिश्वत,जनता को मंहगी बिजली

    मुख्यमंत्री कमलनाथ इन दिनों सत्ता माफिया से किए गए अपने चुनावी वादों को पूरा करने में जुटे हुए हैं। उनके नेतृत्व वाली कांग्रेस ने जनता से जो वादे किए थे वे तो बेअसर रहे लेकिन जिन गिरोहों को उन्होंने इनाम देने के वादे किए थे उन्हें पूरा करने के लिए वे राज्य का खजाना लुटाने में जुटे हुए हैं। बात बात में खजाना खाली है का शोर मचाने वाले कमलनाथ ने हाल ही में उज्जैन पहुंचकर तीन सौ करोड़ रुपए के विकास कार्यों की घोषणा कर डाली। जबकि शिवराज सिंह चौहान सरकार ने सिंहस्थ के दौरान करोड़ों रुपयों के विकास कार्य उज्जैन में कराए थे। उन निर्माण कार्यों में भारी घोटाले के आरोप भी लगे थे। चुनाव के दौरान कांग्रेस ने भी सिंहस्थ घोटाले का शोर मचाया था।भाजपा के हाथों से बजट लूटने का काम जिस महाकाल माफिया ने किया था सत्ता में आने के बाद कमलनाथ फिर उसी महाकाल माफिया के सामने साष्टांग लेट गए हैं। इस माफिया का भगवान महाकाल से कोई लेना देना नहीं है। इसके विपरीत जनता को लूटने के लिए बिजली के दाम अनाप शनाप बढ़ा दिए गए हैं।

    मध्यप्रदेश का महाकाल माफिया लंबे समय से राज्य की सरकारों को ब्लैकमेल करता रहा है। कमोबेश हर सरकार इस गिरोह के हाथों ब्लैकमेल होती रही है। इस गिरोह का काम नेताओं, आला अफसरों, पत्रकारों, बैंकरों, न्यायाधीशों की नियुक्तियां कराना और फिर उन्हें अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करना रहा है। चुनावों के दौरा ये गिरोह अपने अनुकूल सरकार बनाने के लिए तमाम रणनीतियां इस्तेमाल करता है। उज्जैन के कई अखाड़ों से इस गिरोह का संचालन किया जाता है। राज्य की सरकार को धमकाने के लिए गिरोह के सदस्य हमेशा प्रचारित करते रहते हैं कि कोई मुख्यमंत्री उज्जैन में रात्रि निवास नहीं कर सकता क्योंकि महाकाल ही राजा हैं। हर सिंहस्थ के बाद या तो मुख्यमंत्री हट जाता है या फिर सरकार बदल जाती है। इस किंवदंती को सच साबित करने के लिए देश भर में फैले माफिया से जुड़े सदस्य बयान देकर माहौल बनाते रहते हैं।

    महाकाल का इतिहास देखें तो वर्तमान मंदिर को श्रीमान पेशवा बाजी राव और छत्रपति शाहू महाराज के जनरल श्रीमान रानाजिराव शिंदे महाराज ने 1736 में बनवाया था। इसके बाद श्रीनाथ महादजी शिंदे महाराज और श्रीमान महारानी बायजाबाई राजे शिंदे ने इसमें कई बदलाव और मरम्मत भी करवायी थी।महाराजा श्रीमंत जयाजिराव साहेब शिंदे आलीजाह बहादुर के समय में 1886 तक, ग्वालियर रियासत के बहुत से कार्यक्रमों को इस मंदिर में ही आयोजित किया जाता था।तभी से सिंधिया राजघराने की भूमिका महाकाल मंदिर के संचालन में प्रमुख तौर पर रहती आई है।

    यही वजह है कि पिछले कई दिनों से राज्य में महाकाल माफिया ने ये कहानी उड़ाई कि ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के विद्रोह करके भाजपा में जा सकते हैं और भाजपा उनके नेतृत्व में कमलनाथ सरकार को गिराकर सत्तासीन हो जाएगी। इस कहानी को बल देने के लिए बाकायदा भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह से ज्योतिरादित्य सिंधिया की मुलाकात की घटना प्रचारित की गई।कहा गया कि सिंधिया अपने समर्थकों के साथ भाजपा को लेकर सरकार बनाने जा रहे हैं। भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का वादा किया है। जब जनता के बीच ये कहानी सुनी सुनाई जाने लगी तो कमलनाथ को अपनी कुर्सी पर खतरा मंडराता दिखा। इस दौरान ज्योतिरादित्य सिंधिया खामोश रहे और उन्होंने अपने पक्ष में चलती इस मुहिम का भरपूर आनंद लिया। लीपापोती करने पहुंचे कमलनाथ ने सार्वजनिक तौर पर महाकाल के आसपास विकास कार्यों के लिए तीन सौ करोड़ रुपए की योजना घोषित कर डाली। गौरतलब है कि जब प्रदेश का खजाना कथित तौर पर खाली है तब कमलनाथ को प्रदेश के विकास की कोई चिंता नहीं है और वे महाकाल माफिया के आगे घुटने टेककर खड़े हो गए हैं।

    दरअसल पिछले विधानसभा चुनावों में इसी महाकाल माफिया ने सपाक्स पार्टी को झाड़ पोंछकर मैदान में उतारा था। तब ये अफवाह उड़ाई गई कि भाजपा सवर्णों के खिलाफ है। महाकाल माफिया के कारिंदों ने प्रदेश के सीधे साधे ब्राह्मणों को उकसाया कि वे आरक्षण के खिलाफ सवर्ण समाज पार्टी को वोट दें। इस षड़यंत्र का नतीजा ये रहा कि भाजपा का समर्पित वोटर पार्टी से खफा हो गया और वोट को बर्बाद होने से बचाने के लिए उसने कांग्रेस को अपना समर्थन दिया।अपने इस षड़यंत्र को हवा देने के लिए महाकाल माफिया ने शिवराज सिंह चौहान से वह बयान दिलवाया जिसमें उन्होंने कहा था कि कोई माई का लाल आरक्षण समाप्त नहीं कर सकता।

    भगवान महाकाल की नीलकंठेश्वर वाली त्यागी भूमिका को सृष्टि के उद्भव का कारक माना जाता है। उनकी संहारक वाली छवि भी जन जन के बीच जिज्ञासा का केन्द्र होती है। ऐसे में महाकाल माफिया कहानियां प्रचारित करता रहता है कि यदि सिंहस्थ के बाद मुख्यमंत्री नहीं बदला गया या सरकार नहीं बदली तो प्रलय हो जाएगा। अपनी इस कहानी को सच साबित करने के लिए महाकाल माफिया ने शिवराज सिंह चौहान सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए अभियान चलाया था। तब प्रदेश के पंडितों के माध्यम से इसे धर्मयुद्ध बताया गया। कहा गया कि यदि सरकार नहीं बदली तो महाकाल के प्रति आस्थाओं में कमी आ जाएगी। पंडितों ने भी बढ़ चढ़कर इस सुर में सुर मिलाए। सरकार में आने के बाद कमलनाथ ने धर्मस्व विभाग का ढांचा बदल दिया और धर्मस्थलों को नियमित करने के नियम भी ढीले कर दिए।

    मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार ने जनता की सहानुभूति बटोरने के लिए न केवल शुद्धता को लेकर अभियान चलाया बल्कि हर जिले में कुछेक व्यापारियों के खिलाफ रासुका लगाकर अपने अभियान की पूर्णाहुति भी कर डाली है। हालांकि विकास के मोर्चे पर कमलनाथ सरकार बुरी तरह असफल साबित हुई है। उद्योगपति कमलनाथ ने कथित छिंदवाड़ा माडल की आड़ में उद्योगपतियों से जो वसूली अभियान चलाया उससे राज्य में अफरातफरी के हालात बन गए हैं। नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव तो कहते हैं कि नौ माह बाद भी सरकार जनता को नतीजे नहीं दे पाई है। उसके मंत्री तबादलों में ही जुटे हैं। जनता की समस्याएं बढ़ती जा रहीं हैं और जनता में आक्रोश फैल रहा है।

    राज्य में कमलनाथ को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करते समय कांग्रेस ने उन्हें उद्योपति बताया था। अब जबकि उद्योगों के बीच भय का माहौल है तब लोग सवाल कर रहे हैं कि कमलनाथ आखिर कौन सा उद्योग चलाते हैं और उनके कारखाने प्रदेश या देश के लिए कौन सा माल बनाते हैं।जब सरकार ने नवंबर 2019 तक प्रदेश के सभी मीटर बदलने का अभियान चलाया है। लोग पूछ रहे हैं कि प्रदेश में बिजली की क्षति लगातार बढ़ती जा रही है तब मीटर बदलने की ये मुहिम कमलनाथ से जुड़े किस उद्योगपति को लाभ पहुंचाने के लिए चलाई जा रही है।इसी बीच महाकाल माफिया को दस्तूरी पहुंचाने के कदम ने कमलनाथ की असलियत उजागर कर दी है।

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  • कर्ज का राजीव फार्मूला सरकार की विदाई की वजह बनेगा

    कर्ज का राजीव फार्मूला सरकार की विदाई की वजह बनेगा

    विदेशी तकनीक के आयात से भारत को कर्ज के दलदल में धकेलने वाले राजीव गांधी की सोच को मुख्यमंत्री कमलनाथ अब मध्यप्रदेश में लागू करने की तैयारी कर रहे हैं। इसे वे अपने बहु प्रचारित छिंदवाड़ा मॉडल का प्रेरणा स्रोत बता रहे हैं। राजीव गांधी के 75 वें जन्मदिवस को उन्होंने राजीव गांधी को 21 वीं सदी के आधुनिक भारत का निर्माता बताया। जबकि हकीकत ये है कि कंप्यूटर तकनीक के आयात की देश को जो मंहगी कीमत चुकानी पड़ी है वह भारत के विकास के मार्ग में रोड़ा साबित हुई है। आज चीन जहां तकनीक के विकास से 13 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन चुका है वहीं भारत आज भी 5ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की जद्दोजहद से जूझ रहा है।

    कांग्रेस के जिस विकास मॉडल को देश ने खारिज करके मोदी सरकार को सत्ता सौंपी है उसने भारतीय मुद्रा को रीसेट करके देश में पनप चुकी समानांतर अर्थव्यवस्था को समाप्त करने का एतिहासिक फैसला लिया था। नोटबंदी से देश का काला धन तो उजागर हुआ ही साथ में बैंकों के सरकारीकरण का लाभ लेकर कालाधन बनाने वालों की पोल भी देश के सामने खुल चुकी है। जिन राजीव गांधी को देश में कंप्यूटर क्रांति का जनक बताया जाता है उसे उन्होंने माईक्रोसाफ्ट का कथित एजेंट बनकर देश में लागू करवाया था। विश्वसनीय सरकारी सूत्र बताते हैं कि पूरे देश की ओर से भारत सरकार ने माईक्रोसाफ्ट से अनुबंध किया था। उसी अनुबंध की तर्ज पर आज तक भारत सरकार और राज्यों की सरकारें माईक्रोसाफ्ट से ही आपरेटिंग सिस्टम खरीदती हैं। भारत ये युवा यदि आपरेटिंग सिस्टम बना भी लें तो उस अनुबंध की वजह से सरकारें वो साफ्टवेयर नहीं खरीद सकती हैं।भारत का कोई आंत्रप्न्योर यदि मुफ्त में भी वो साफ्टवेयर सरकारों को देना चाहे तो उसे नहीं खरीदा जा सकता।

    देश में राजीव गांधी के मित्र सैम पित्रोदा ने जिस सी डॉट एक्सचेंज की खरीदी पूरे देश में करवाई थी वो तकनीक पूरी दुनिया में बंद हो चुकी थी। इसके बाद देश में पेजर आए और वे भी मोबाईल की वजह से विदा हो गए। इस तरह मंहगी तकनीकें खरीदे जाने से देश को अरबों रुपयों की हानि पहुंची और कमीशन के रूप में मिला अरबों रुपयों का धन कथित तौर पर विदेशी बैंकों में रिश्वत के रूप में पहुंचाया गया। जबकि सैम पित्रोदा ने अहसान जताते हुए एक रुपये का वेतन लेकर देशभक्त होने का नाटक खेला था।

    भोपाल गैस त्रासदी के आरोपी वारेन एंडरसन को विदेश भगाने के लिए जिम्मेदार राजीव गांधी की पोल पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर विधानसभा में उजागर कर चुके हैं। उनका कहना था कि स्वर्गीय अर्जुनसिंह को फोन करके राजीव गांधी ने एंडरसन को छोड़ने का हुक्म दिया था। जिसे तत्कालीन कलेक्टर मोती सिंह और एसपी स्वराज पुरी ने सकुशल वापस पहुंचाया था। स्वराज पुरी तो स्वयं कार चलाकर एंडरसन को विमान तल तक छोड़ने गए थे। यूनियन कार्बाइड ने सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से जो हर्जाना दिलवाया उसकी बंदरबांट की कहानी भोपाल के गली कूंचों में आज भी सुनी सुनाई जाती है। गैस राहत विभाग के मंत्री आरिफ अकील और पूर्व मंत्री बाबूलाल गौर इस एपीसोड की कहानियां समय समय पर सुनाते रहते हैं।

    कांग्रेस में राजीव गांधी की विचारधारा देश को आत्मनिर्भर बनाने के बजाए कर्ज लेकर बांटने वाली सोच के रूप में ही जानी जाती है। युवाओं को वैश्विक उद्योगों के लिए बेचने की इस विचारधारा में प्रशिक्षण तो सरकारी संसाधनों से दिया गया लेकिन वे युवा नौकरी के लिए भारत छोड़कर विदेश चले गए। वहीं बस गए और सरकारें लाभ के नाम पर विदेशी मुद्रा का फायदा गिनाती रहीं। आज विश्व भर में फैले भारत के युवा अपने देश को याद करते हैं और घरों से उजड़ने का दुख उन्हें सालता रहता है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब मेक इन इंडिया का नारा दिया तो कई उद्योगपतियों ने अपने दफ्तर भारत में खोल दिए। आज वे उद्योगपति पूरी दुनिया में तीन दफ्तर और कारखाने चलाते हैं जिनमें भारत के युवाओं को रोजगार के अवसर मिले हैं। कई वैश्विक कंपनियां भी भारत के युवाओं से तकनीकी कामकाज कराती हैं।

    इसके विपरीत चीन ने अपने युवाओं की तस्करी नहीं की। अपनी लागत पर दुनिया भर के उद्योगों को रोशन नहीं किया। चीन ने घरेलू उत्पादन को पूरी दुनिया में बेचा और आज उसकी मुद्रा पूरी दुनिया में तहलका मचा रही है। भारत में नरेन्द्र मोदी जब मेक इन इंडिया का नारा दे रहे हैं तब मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार युवाओं को विदेश भेजने की मुहिम चला रही है। जाहिर है कि ये भारत सरकार की राष्ट्रीय सोच के विपरीत कदम है। जिसे केन्द्र की भाजपा सरकार लंबे समय तक बर्दाश्त नहीं कर पाएगी। कमलनाथ सरकार का ये अभियान अंततः कांग्रेस सरकार की विदाई की वजह भी बन सकता है।

    #Rajeev Gandhi,#Bank froud,#Kamalnath,

  • कश्मीर के कलंक को सिंधिया के मुखौटे से छिपाती कांग्रेस

    कश्मीर के कलंक को सिंधिया के मुखौटे से छिपाती कांग्रेस

    कश्मीर से धारा 370 हटाकर मोदी सरकार ने देश के विकास का राजमार्ग प्रशस्त कर दिया है।सत्तर सालों से नासूर की तरह टीस झेल रहा कश्मीर भी एक नए युग में प्रवेश कर रहा है।जब सारे देश में रियासतों का एकीकरण हो रहा था तब एक अनोखा कश्मीर ही था जो भारतीय गणतंत्र में विलीन हुए बगैर अपनी अलग पहचान बनाने की रट लगाए था। इसकी पृष्ठभूमि पं. जवाहर लाल नेहरू ने तैयार की थी। सेब के बगीचों को अपनी राजनैतिक रियासत बनाने के लोभ ने नेहरू की भूमिका इतनी संकीर्ण बना दी थी कि वे कश्मीर के कथित विद्रोह से संरक्षक बन गए थे। बाद में चिकित्सकों की एसोसिएशन के माध्यम से उन्होंने डाक्टरों के (प्रिस्क्रिप्शन) परचे में रोगियों को रोज सेब खाने की हिदायत लिखवानी शुरु करवा दी। पूरे देश के रोगियों को तभी से अंग्रेजी दवाओं के डाक्टर सेब खिलवा रहे हैं। जबकि आयुर्वेदिक चिकित्सा में रोगियों को लाल टमाटर पर काला नमक और काली मिर्च बुरककर खिलाने की सलाह दी जाती है। यही वजह है कि 72 सालों से समूचा भारत कश्मीर समस्या झेल रहा है। तबसे देश के हजारों जवान कश्मीर की सरजमीं को बचाए रखने के लिए अपनी शहादत दे चुके हैं। लाखों कश्मीरियों ने कथित जेहाद के नाम पर अपनी जान गंवाई है। विशेष दर्जे की वजह से हर साल भारत को कश्मीर पर भारी धन खर्च करना पड़ता है। सैन्य आधुनिकीकरण के नाम पर भारी रक्षा बजट खर्च करना पड़ता है। अब उम्मीद की जा रही है कि कश्मीर समस्या हमेशा के लिए सुलझ सकेगी।

    देश की सबसे बड़ी पंचायत में जब धारा 370 (1) के अन्य सभी प्रावधानों को निरस्त करने की बहस चल रही थी तब गांधी परिवार की वजह से ही कांग्रेस इस बिल का विरोध कर रही थी। कांग्रेस ने गुलाम नबी आजाद को अपनी आवाज बनाया। उन्होंने धारा 370 बरकरार रखने की जबर्दस्त पैरवी की। समर्थन में कहा गया कि यदि ये धारा हटाई जाती है तो कश्मीर का उग्रवाद फिलिस्तीन के समान शोला बन जाएगा। सरकार की दृढ़ इच्छा शक्ति के आगे ये प्रतिरोध नहीं टिक सका। अंततः धारा 370 की बेड़ियों से कश्मीर आजाद हो ही गया। आने वाले पंद्रह अगस्त को मोदी सरकार ने देश के लिए सबसे बड़ी सौगात अभी से दे दी है।

    ये सौभाग्य की बात है कि इन दिनों कांग्रेस अध्यक्ष विहीन है। इस वजह से सांसदों के बीच वो संगठनात्मक कसावट नहीं है जो किसी बिल पास कराने या खारिज कराने के लिए जरूरी होती है। यही वजह है कि जब कांग्रेस इस बिल के विरोध में मतदान कर रही थी तब कई सांसद खुलकर सरकार के साथ आ गए।कांग्रेस के चीफ व्हिप भुवनेश्वर कलीता ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा कि पार्टी ने मुझे देश के मूड के खिलाफ व्हिप जारी करने को कहा था। पार्टी आत्महत्या कर रही है। मैं इसका भागीदार नहीं बनना चाहता। दीपेन्द्र हुड्डा और मिलिंद देवड़ा ने भी पार्टी से अलग रुख अपनाया। जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि आजादी के समय जो भूल हुई थी उसे सुधारा जाना स्वागत योग्य है। नतीजा ये रहा कि जम्मू कश्मीर को दो केन्द्र शासित प्रदेशों में बांटने का बिल जब राज्यसभा में पेश हुआ तो इसके पक्ष में 125 और विरोध में 61 वोट पड़े। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने बिल का विरोध किया जबकि बसपा जैसे विरोधी दल समर्थन में रहे। इस घटना ने कांग्रेस की रणनीतिक हार को उजागर कर दिया है।

    अब जबकि पूरे देश में इस फैसले का जबर्दस्त अभिनंदन किया जा रहा है तब कांग्रेस अपनी भूल सुधारने की निरर्थक कोशिश कर रही है। राहुल गांधी के करीबी ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ट्वीट करके कहा कि वे सरकार के इस फैसले का समर्थन करते हैं। साथ में ये पुछल्ला भी जोड़ दिया कि यदि सरकार संवैधानिक तरीकों का पालन करती तो ज्यादा अच्छा होता। जबकि सरकार ने ये कदम कानूनी एहतियात के अंतर्गत उठाया है। जिस संसद की आड़ लेकर राष्ट्रपति से ये कानून लागू करवाया गया था उसी संसद की सलाह पर राष्ट्रपति ने कानून को रदद् कर दिया। कहा गया कि जम्मू कश्मीर की विधानसभा ने इसे स्वीकार किया था और उसकी अनुमति के बगैर धारा को नहीं हटाया जा सकता। जबकि अभी कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लगा हुआ है। जाहिर है ऐसे में किसी प्रकार की संवैधानिक अड़चन आड़े नहीं आती है।

    कांग्रेस की रणनीति हर कदम पर असफल साबित हुई है। जब धारा 370 हट चुकी है और कश्मीर के भीतर भी इसे लेकर सहमति का भाव बन चुका है तब कांग्रेस अपनी करतूतों पर लीपापोती करती नजर आ रही है। इसी रणनीति के चलते ज्योतिरादित्य सिंधिया से ये बयान जारी करवाया गया है। हालांकि इसका कोई औचित्य नहीं है। न तो वे इन दिनों किसी संवैधानिक पद पर हैं और न ही निर्वाचित जन प्रतिनिधि हैं। इसके बावजूद उनका बयान पार्टी के भीतर उठते असहमति के स्वरों को सहारा देने की कवायद जरूर है। यही वजह है कि अब पार्टी के कई नेतागण सरकार के फैसले का समर्थन ये कहते हुए कर रहे हैं कि ये देशहित का मसला है इसलिए वे इससे सहमत हैं।

    जो लोग ये अटकलें लगा रहे हैं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया पार्टी से असहमत हैं और उनकी नाराजगी मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार को अस्थिर कर सकती है वे केवल कांग्रेस को मुखौटे को वास्तविकता का जामा पहनाने का प्रयास कर रहे हैं। इसके बावजूद सिंधिया के बयान कांग्रेस के इस मुखौटे की सच्चाई उजागर कर रहे हैं। सिंधिया समर्थक मंत्रियों से बयान जारी करवाकर ऐसा बताने की कोशिश की गई कि सिंधिया की राय ही पार्टी की राय है। ये भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस सिंधिया को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना सकती है। हालांकि इसकी संभावना बहुत कम है। सिंधिया को मध्यप्रदेश कांग्रेस का ही बड़ा धड़ा अपना नेता नहीं मानता है। ऐसे में राहुल गांधी भी चाहें कि वे सिंधिया को अपना प्रतिनिधि अध्यक्ष बना दें तो वे कारगर साबित नहीं होंगे।

    ये बात भी सही है कि कांग्रेस इन दिनों ऊहापोह से गुजर रही है। उसे अपनी नीतियों पर नए सिरे से विचार करना जरूरी हो गया है। आजादी के दौर की कांग्रेस को छोड़कर इंदिरा कांग्रेस ने जो एकाधिकारवादी रणनीति अपनाई थी वो बाजारवाद की आंधी में अप्रासंगिक हो चली है। ऐसे में कांग्रेस को तय करना होगा कि वो अपने ही नेताओं के बनाए सरकारीकरण के ढांचे का विरोध कैसे करे।फिलहाल तो कांग्रेस के सामने खुद का अस्तित्व बचाए रखने की बड़ी चुनौती है। इसलिए वो चाहकर भी सिंधिया के मुखौटे के पीछे भी अपना चेहरा नहीं छुपा पा रही है।

  • कमलनाथ एमपी में फिर ले आए इंस्पेक्टर राज

    कमलनाथ एमपी में फिर ले आए इंस्पेक्टर राज

    भारत की राजनीति में खुले बाजार की अर्थव्यवस्था का श्री गणेश करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री पीव्ही नरसिंम्हाराव और डाक्टर मनमोहन सिंह का अनुमान था कि देश अब आर्थिक विकास की ओर अग्रसर हो जाएगा। डाक्टर मनमोहन सिंह तो बार बार कहते रहे कि भारत में इंस्पेक्टर राज अब कभी नहीं लौटेगा। तीन दशकों तक हिंदुस्तान उसी राह पर चलता रहा। आज भी हिंदुस्तान पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का अनुष्ठान कर रहा है। इसके विपरीत मध्यप्रदेश में एक बार फिर इंस्पेक्टर राज लौट आया है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सत्ता का जो फार्मूला इस्तेमाल किया है उससे कांग्रेस की सत्ता में वापिसी तो हो ही गई साथ में अजेय मानी जाने वाली भाजपा के भीतर भी भगदड़ मच गई है। भाजपा के होश तो तब उड़े जब कांग्रेस ने भरी विधानसभा में उसके दो विधायक अपने पाले में खड़े कर लिए। अब भाजपा अपने विधायकों को समेटने में जुटी हुई है और विधायक हैं कि वे कमलनाथ की राजनीति से सहमत होते नजर आ रहे हैं।

    कमलनाथ की राजनीति की ये कलाकारी आखिर क्यों जादू की तरह विधायकों के सिर चढ़कर बोल रही है। इसे समझने के लिए भाजपा के पंद्रह साल पुराने शासनकाल पर गौर करना होगा। वर्ष 2003 में बिजली, सड़क और पानी के मुद्दे पर भाजपा सत्ता में आई थी। उसने पंद्रह सालों तक इस पर खूब काम किया। भारी भरकम कर्ज लेकर आधारभूत संरचना का विकास भी किया गया। जनता के लिए सरकार ने विभिन्न तरह की योजनाएं चलाईं जिनके हितग्राहियों ने भी पर्याप्त लाभ उठाया। हितग्राहियों से ज्यादा लाभ अफसरों ने उठाया। उन्होंने जनता के लिए जारी योजनाओं में भारी भ्रष्टाचार किया और धन संग्रह भी किया। सातवें वेतनआयोग की सिफारिशों की वजह से अफसरों और कर्मचारियों का वेतन भी खासा बढ़ता गया। आज ये स्थिति है कि हर महीने सरकार अपने अमले को 3200 करोड़ रुपए वेतन भत्तों के नाम पर देती है। जबकि उसकी आय लगभग चार हजार करोड़ रुपए मासिक है।

    मुख्यमंत्री कमलनाथ अपने भाषणों में बार बार कहते हैं कि भाजपा की सरकार खाली खजाना छोड़कर गई है। जबकि हकीकत ये है कि पिछली सरकार का बजट आधिक्य 137 करोड़ रुपए था। उसने चालीस हजार करोड़ की अर्थव्यवस्था को एक लाख छह हजार करोड़ की विशाल अर्थव्यवस्था का स्वरूप देने में सफलता पाई थी।हर महीने सरकार के खजाने में चार हजार दो सौ करोड़ रुपए आ ही जाते हैं। आज प्रदेश में बिजली सरप्लस है। सड़कों का जाल तैयार है। पेयजल की उपलब्धता बढ़ी है। सिंचाई का रकबा 6 हजार हेक्टेयर से बढ़कर 33 हजार हेक्टेयर हो चुका है। इसके बावजूद भाजपा की शिवराज सिंह सरकार न तो औद्योगिक विस्तार कर सकी और न ही रोजगार के अवसर पैदा कर सकी। यही वजह है कि उसके खिलाफ असंतोष की आग भीतर ही भीतर सुलगती रही।

    पिछले विधानसभा चुनावों में स्पष्ट मतविभाजन की वजह से भाजपा के वोट तो बढ़े लेकिन वोटों की बढ़त के साथ साथ कांग्रेस ने अधिक विधायक लेकर सत्ता छीन ली। भाजपा के नेता बार बार कहते हैं कि कांग्रेस की सरकार अल्पमत की है। इसकी वजह ये है कि 230 सदस्यों वाली विधानसभा में कांग्रेस के पास 114 विधायक हैं जबकि भाजपा 108 विधायकों के साथ दूसरा बड़ा राजनीतिक दल है। बहुमत के लिए कांग्रेस को 116 विधायकों की जरूरत थी। उसने चार निर्दलीयों, 2 बसपा और एक सपा के विधायकों को साथ लेकर आरामदायक बहुमत जुटा लिया। दो भाजपा विधायकों शरद कोल और नारायण त्रिपाठी के आ जाने से उसकी स्थिति और मजबूत हो गई है। इस फेरबदल ने मुख्यमंत्री कमलनाथ का आत्मविश्वास बढ़ा दिया है।

    अब कमलनाथ पुरानी कांग्रेस के अपने फार्मूले पर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। रोज रोज अफसरों के तबादलों की सूचियां निकल रहीं हैं। तबादले करवाने, मनचाही पोस्टिंग करवाने और तबादले निरस्त करवाने वालों की भीड़ सत्ता के गलियारों में जुट गई है। विधायक विश्रामगृह की रंगीनियां लौट आईँ हैं। राज्य मंत्रालय के गलियारे कार्यकर्ताओं से पट गए हैं। इसका लक्ष्य अफसरों और कर्मचारियों की वह आरामतलब फौज है जिसे हर महीने सरकारी खजाने से 3200 करोड़ रुपए वेतन के रूप में मिलते हैं। सरकारी अमले का वेतन अधिक है और खर्च बहुत कम है। साथ में भ्रष्टाचार से जुटाया धन भी इफरात है। बैंकों में भी इसी वर्ग ने भारी रकम जमा कर रखी है। धन की हवस इस वर्ग के बीच इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि वे अपनी मनचाही पोस्टिंग के लिए दो करोड़ रुपए का चंदा भी आसानी से देने के लिए तैयार हैं। आईएएस,आईपीएस और आईएफएस जैसे प्रशासनिक संवर्ग की सेवाओं के लिए तो चंदे का आंकड़ा और भी ऊंचा है।

    तबादले पोस्टिंग का ये कारोबार कांग्रेस के मंत्रियों, विधायकों और कार्यकर्ताओं के बीच फलफूल रहा है। कार्यकर्ताओं की फौज राजनैतिक चाहत से ऊपर उठकर ये काम पूरी जिम्मेदारी से कर रही है। सरकार के शीर्ष पदों पर बैठे नेताओं का प्रयास है कि इसमें कार्यकर्ताओं के बीच चंदे का बंटवारा भी व्यापक तरीके से करा दिया जाए। नतीजतन विधायकों के बीच मुख्यमंत्री कमलनाथ आज आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि सरकारी पदों पर कोई योग्य व्यक्ति बैठे या अयोग्य इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। प्रदेश की आय बढ़ाने का फायदा भी तब है जब विकास कार्यों के लिए अत्यधिक कर्ज लेना हो। अभी राज्य की जो आय है उससे तो सरकारी कामकाज के लिए पर्याप्त कर्ज मिलता ही रहेगा।

    सरकार ने अफसरों का खजाना बढ़ाने के लिए हर विभाग में इंस्पेक्टर राज बढ़ा दिया है। दूध,मावा, पनीर आदि के सेंपल लिए जा रहे हैं। अभी अभी पौने तीन सौ सेंपल धड़ाधड़ लिए गए। खाद्य विभाग के पास न तो इन सैंपलों को समय सीमा में चैक करने की पर्याप्त सुविधा है और न ही सैपलों का परीक्षण करने के लिए बुलाई गई मशीन चालू हो पाई है। इसके बावजूद धड़ाधड सेंपल उठाए जा रहे हैं। जनता के बीच सरकार की ये सक्रियता जरूर चर्चा का केन्द्र बन गई है।जनता और दुग्ध कारोबारियों के बीच जो अविश्वास पनपने लगा है उससे सरकार की अन्य गतिविधियों और वादों की ओर से जनता का ध्यान हट गया है।

    तबादलों की ये बयार जेल, स्वास्थ्य, शिक्षा, वन, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी, लोक निर्माण विभाग, जल संसाधन से लेकर तमाम विभागों में चल रही है।जो कांग्रेस कभी राजाओं,सामंतों को खलनायक बताकर जन आक्रोश की लहर पर सवार हुआ करती थी वो आज भ्रष्ट अफसरों, व्यापारियों, को निशाने पर ले रही है। कांग्रेस का ये चिरपरिचित फार्मूला जनता के बीच आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है और यही कमलनाथ की सरकार की फिलहाल नजर आ रहीं सफलताओं की कुंजी भी है।

  • हीरा खदान सौदे में आदिवासियों की आड़

    हीरा खदान सौदे में आदिवासियों की आड़

    छतरपुर के बक्स्वाहा की हीरा खदान की किंबरलाईट पाईपलाईन नीलाम करने की मंजूरी कमलनाथ सरकार ने अपनी कैबिनेट से ले ली है। सरकार का अनुमान है कि इस खदान के नीलाम करने से राज्य को साठ हजार करोड़ रुपए की आमदनी हो जाएगी। इससे सरकार को भारी तरलता मिल जाएगी और वह कमलनाथ को विकास पुरुष बताने का अपना अभियान सफल बना लेगी। इस सिलसिले में मुख्यमंत्री कमलनाथ दो बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिल चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनसे आदिवासी इलाकों में विस्थापन की समस्या को लेकर कार्रवाई प्रचलन में होने की बात कही थी। सरकार पर दबाव बनाने के लिए कमलनाथ सरकार ने आदिवासियों को अन्य इलाकों में पट्टे की जमीन वितरित करने का अभियान शुरु करने की तैयारी कर डाली। ये जानकारी पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को मिल गई और उन्होंने आदिवासियों की ट्रेक्टर ट्राली रैली निकालकर कमलनाथ सरकार को ही घेर दिया। आनन फानन में मुख्यमंत्री कमलनाथ ने आदिवासियों की सभी मांगें मान लेने की घोषणा कर दी। शिवराज सिंह चौहान ने इसे आदिवासियों की जीत बताकर श्रेय लूटना शुरु कर दिया।

    हालांकि शिवराज सिंह चौहान की इस भूमिका पर जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा ने प्रेस कांफ्रेंस करके कहा कि पिछले पंद्रह सालों में वे आदिवासियों की समस्याओं का समाधान नहीं कर सके। जब हमारी सरकार ने आदिवासियों के हित में फैसले लिए हैं तो वे श्रेय लूटने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि शिवराज सिंह को दिल्ली जाकर केन्द्र सरकार से मांग करनी चाहिए ताकि आदिवासियों के लिए लंबित मांगों पर भारत सरकार सकारात्मक फैसले ले सके।

    आदिवासियों को वनभूमियों पर पट्टे देने के मामले लंबे समय से लंबित पड़े थे। जंगलों को सुरक्षित रखने के लिए पिछली शिवराज सिंह सरकार वनभूमियों से विस्थापन का अभियान चलाती रही थी। इससे आदिवासियों में आक्रोश फैल गया था। विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने आदिवासियों को उन्हीं जमीनों पर पट्टे देने का वादा किया था। इसके चलते कांग्रेस को 31 आदिवासी बाहुल्य सीटों पर विजय मिली थी। मुख्यमंत्री कमलनाथ को अफसरों ने सलाह दी थी कि जमीनों पर कब्जे को लेकर प्रकरण लंबित हैं। ज्यादातर मामलों में आदिवासियों के नाम पर जंगल माफिया ने अतिक्रमण किया है। मुख्यमंत्री ने तमाम आपत्तियों को दरकिनार करते हुए पट्टे देने को मंजूरी दे दी। सरकार ने फैसला लिया है कि यदि कोई सरपंच भी चाहे तो आदिवासियों को जमीनों पर पट्टे दे सकता है।

    हालांकि आदिवासियों के इस अधिकार के पीछे असली वजह छतरपुर की वो हीरा खदान है जिसे नीलाम करने का लक्ष्य लेकर कांग्रेस सरकार ने कर्जमाफी और बेरोजगारी भत्ते जैसे वादे किये थे। सरकार के पास आर्थिक संसाधन नहीं हैं। इसकी वजह से ये घोषणाएं पूरी नहीं हो पा रहीं हैं। बिजली बिल आधा करने का वादा भी पूरा नहीं हो पा रहा है। जनता को भारी भरकम बिजली बिल चुकाना पड़ रहे हैं। इसे देखते हुए कमलनाथ सरकार आदिवासियों को आगे करके खदानों की लीज मंजूर करने के लिए केन्द्र पर दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। रेतखदानें नीलाम करके तो कमलनाथ कांग्रेस ने अपने नेताओं को धंधे पर लगाना शुरु कर ही दिया है। अब उसे हीरा खदान नीलाम करने का टारगेट पूरा करना है। केवल इस खदान के नीलाम हो जाने से सरकार को एकमुश्त आय का स्रोत मिल जाएगा।

    भारत सरकार ने फिलहाल इस खदान को नीलाम न करने की रणनीति बनाई है। भारत सरकार का विचार है कि जब दुनिया भर के हीरा खनिज खदानें समाप्त हो जाएंगी तब वह इस खदान को नीलाम करेगी। पिछले पंद्रह सालों में शिवराज सिंह सरकार भी ये खदान नीलाम नहीं कर पाई थी। जबकि कमलनाथ कांग्रेस का लक्ष्य केवल इस हीरा खदान को नीलाम करना है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भी देवभोग हीरा खदान के माध्यम से डी बियर्स से संबंधों के लिए बदनाम हो चुके हैं। अब कमलनाथ इस हीरा खदान को लेकर आदिवासियों को लामबंद करने में जुट गए हैं। उन्होंने वनभूमियों पर अतिक्रमण के तमाम प्रकरणों को अनदेखा करके जंगलों की लूट की छूट दे दी है।

    दरअसल खुद को विकास पुरुष बताने वाले मुख्यमंत्री कमलनाथ को अपनी सरकार के छह महीने बीत जाने पर ही काफी सफलता अनुभव हो रही है। सरकार बन जाने और तमाम उलटबांसियों के बाद भी चलते रहने का भरोसा खुद कांग्रेस के नेताओं को भी नहीं रहा है। जनता और सरकार के बीच जैसी संवादहीनता पनप गई है उसे देखते हुए मुख्यमंत्री कमलनाथ ने आज राज्य मंत्रालय में प्रवक्ताओं की बैठक बुलाई और उनसे सरकार के उल्लेखनीय कामकाजों के बारे में जनता से संवाद करने का निर्देश दिया।

    हीरा खदान पर भारत सरकार की मंजूरी मिलती है या नहीं ये तो आगे आने वाला समय ही बताएगा पर कमलनाथ सरकार को आर्थिक संसाधन जुटाने में जो परेशानी आ रही है उसके चलते प्रदेश में आक्रोश तेजी से भड़क रहा है।नगरीय निकायों के चुनावों की तैयारियां चल रहीं हैं और सरकार ने पत्रकारों के विज्ञापनों की उधारी भी नहीं चुकाई है। ऐसे में पत्रकारों की ओर से सरकार के कामकाज की तटस्थ समीक्षा शुरु हो गई है। जिसके चलते कमलनाथ सरकार को भय है कि प्रदेश में जन विद्रोह पनप सकता है। इसे देखते हुए कमलनाथ सरकार तेजी से खैरात बांटने के फैसले ले रही है। जबकि छिंदवाड़ा माडल का हवाला देकर सत्ता में आए कमलनाथ का औद्योगिक प्रबंधन चौखाने चित्त हो गया है। सरकार अपने पुराने ठेकेदारों को ही भुगतान नहीं कर पा रही है ऐसे में नए रोजगार सृजित करना सरकार के बस में नहीं है। सरकार को अपने कर्मचारियों को हर महीने 3200 करोड़ रुपए का वेतन भुगतान करना पड़ता है, जबकि उसकी आय में चार सौ करोड़ से ज्यादा की गिरावट आ गई है। ये रकम सरकारी अमले के सहयोग से कथित तौर पर कालाबाजार में पहुंचाया जा रहा है। कमलनाथ और उनके मंत्री बार बार झूठ बोलते हैं कि पिछली सरकार खजाना खाली करके गई है जबकि सरकार को हर महीने कर, लीज आदि से लगभग 4500 करोड़ की आय होती है। इसके बावजूद कमलनाथ सरकार अठारह हजार करोड़ से ज्यादा का कर्ज ले चुकी है। देखना है कि गहरे आर्थिक संकट से जूझती कमलनाथ सरकार इन चुनौतियों के बीच सफल हो पाती है या फिर भाजपा नेताओं के आक्रमण के चलते दम तोड़ देती है।

  • हिंदुत्व की नई परिभाषा में है सच्चा राष्ट्रवाद

    हिंदुत्व की नई परिभाषा में है सच्चा राष्ट्रवाद

    डॉ. वेदप्रताप वैदिक

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत ने मध्यप्रदेश यात्रा के दौरान ऐसा बयान दे दिया है, जो हिंदुत्व शब्द की परिभाषा ही बदल सकता है। अभी तक भारत में हिंदू किसे कहा जाता है और अहिंदू किसे? पहले अहिंदू को जानें। जो धर्म भारत के बाहर पैदा हुए, वे अहिंदू यानी ईसाई, इस्लाम, पारसी, यहूदी आदि! जो धर्म भारत में पैदा हुए, वे हिंदू यानी वैदिक, पौराणिक, वैष्णव, शैव, शाक्त, जैन, बौद्ध, सिख, आर्यसमाजी, ब्रह्म समाजी आदि। इन तथाकथित हिंदू धर्म की शाखाओं में चाहे जितना भी परस्पर सैद्धांतिक विरोध हो, उन सब को एक ही छत्र के नीचे स्वीकार किया जाता है। हिंदू-अहिंदू तय करने के लिए किसी सिद्धांत की जरूरत नहीं है। इस निर्णय का आधार सैद्धांतिक नहीं, भौगोलिक है।

    इसे ही आधार मानकर विनायक दामोदर सावरकर ने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘हिंदुत्व’ लिखा था। ‘हिंदुत्व’ की विचारधारा ने ही हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जन्म दिया था। सावरकरजी की मान्यता थी कि जिस व्यक्ति का ‘पुण्यभू’ और ‘पितृभू’ भारत में हो, वही हिंदू है। यानी जिसका पूजा-स्थल, तीर्थ, देवी-देवता, पैगंबर, मसीहा, पवित्र ग्रंथ आदि भारत के बाहर के हों, उसका पुण्यभू भी बाहर ही होगा। उसे आप हिंदू नहीं कह सकते चाहे भारत उसकी पितृभूमि हो यानी उसके पुरखों का जन्म स्थान हो। कोई भारत में पैदा हुआ है लेकिन, उसकी पुण्यभूमि मक्का-मदीना, यरुशलम, रोम या मशद है तो वह खुद को हिंदू कैसे कह सकता है? सावरकरजी की हिंदू की यह परिभाषा उस समय काफी लोकप्रिय हुई, क्योंकि उस समय मुस्लिम लीग का जन्म हो चुका था और इस्लाम के नाम पर अलग राष्ट्र की मांग जोर पकड़ने लगी थी। सावरकर का हिंदुत्व उस समय राष्ट्रवाद का पर्याय-सा बन गया था और लोग समझ रहे थे कि लीगी सांप्रदायिकता का यही करारा जवाब है। स्वयं सावकर ने भारत के आज़ाद होने के 15-20 साल बाद अपने अभिमत पर पुनर्विचार किया था।

    लेकिन संघ-प्रमुख मोहन भागवत ने ‘पुण्यभू’ की छूट देकर ‘हिंदू’ शब्द की परिभाषा को अधिक उदार बना दिया है। उन्होंने बैतूल के भाषण में कहा कि हिंदुस्तान में रहने वाला हर नागरिक उसी तरह हिंदू कहलाएगा, जैसे अमेरिका में रहने वाला हर नागरिक अमेरिकी कहलाता है, उसका धर्म चाहे जो हो। उनके इस तर्क को थोड़ा आगे बढ़ाएं तो यहां तक जा सकता है कि किसी नागरिक के पुरखे या वह स्वयं भी चाहे किसी अन्य देश में पैदा हुआ हो, यदि उसे नागरिकता मिल जाए तो वह खुद को अमेरिकी घोषित कर सकता है। यानी किसी के हिंदू होने में न धर्म आगे आएगा और न ही उसके और उसके पुरखों का जन्म-स्थल। यानी ‘पुण्यभू’ के साथ ‘पितृभू’ की शर्त भी उड़ गई। सैद्धांतिक और भौगोलिक दोनों ही आधार इस नई परिभाषा के कारण पतले पड़ गए।

    यूं भी हिंदू शब्द तो शुद्ध भौगोलिक ही था। यह सिंधु का अपभ्रंश है। सिंध से ही हिंद बना है। प्राचीन फारसी में ‘स’ को ‘ह’ बोला जाता था, जैसे सप्ताह को हफ्ता! सिंध का हिंद हो गया। स्थान का स्तान हो गया। हिंद और स्तान मिलकर ‘हिंदुस्तान’ बन गया। हिंद से ही ‘हिंदू’, ‘हिंदी’, ‘हिंदवी’, ‘हुन्दू’, ‘हन्दू’, ‘इंदू’, ‘इंडीज’, ‘इंडिया’ और ‘इंडियन’ आदि शब्द निकले हैं। विदेशियों के लिए हिंदू शब्द भारतीय का पर्याय है। जब मैं पहली बार चीन गया तो चीन के विद्वान और नेता मुझे ‘इंदुरैन’ ‘इंदुरैन’ बोलते थे। यों तो भारत का प्राचीन नाम आर्यावर्त या भारत या भरतखंड ही है। मैंने वेदों, दर्शनशास्त्रों, उपनिषदों, आरण्यकों, रामायण, महाभारत या गीता में कहीं भी हिंदू शब्द कभी नहीं देखा। इस शब्द का प्रयोग तुर्की, पठानों और मुगलों ने पहले-पहल किया। वे सिंधु नदी पार करके भारत आए थे, इसलिए उन्होंने इस सिंधु-पर क्षेत्र को हिंदू कह दिया।

    भारतीयों ने विदेशियों या मुसलमानों द्वारा दिए गए इस शब्द को स्वीकार कर लिया, क्या यह हमारी उदारता नहीं है? ऐसे में विदेशी मज़हबों के मानने वालों को अपना कहने में हमें एतराज क्यों होना चाहिए? यदि इस देश में भारत के 20-22 करोड़ लोगों को हम अपने से अलग मानेंगे तो हम खुद को राष्ट्रवादी कैसे कहेंगे? इस देश को हम मजहब के आधार पर बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक में बांट देंगे। हम राष्ट्रवादी नहीं होंगे बल्कि जिन्नावादी होंगे। दुनिया में पाकिस्तान ही एक मात्र देश है, जो मजहब के आधार पर बना है। पाकिस्तान की ज्यादातर परेशानियों का कारण भी यही है। भारत का निर्माण या अस्तित्व किसी धर्म, संप्रदाय, मजहब, वंशवाद या जाति के आधार पर नहीं हुआ है। इसीलिए इसे सिर्फ ‘हिंदुओं’ का देश नहीं कहा जा सकता है। हां, इस अर्थ में यह हिंदुओं का देश जरूर है कि जो भी यहां का बाशिंदा है, वह हिंदू है। मोहन भागवत का मंतव्य यही है। यह मंतव्य अत्यंत पवित्र है, क्योंकि यह ‘हम’ और ‘तुम’ के भेद को खत्म करता है। ‘हिंदू’ की इस परिभाषा से सहमत होने का अर्थ है, सभी पूजा-पद्धतियों को स्वीकार करना। गांधीजी इसे ही सर्वधर्म समभाव कहते थे। इसे आधार बनाएं तो फिर राष्ट्रवादिता से कोई भी अछूता नहीं रह सकता। इसी दृष्टि से मैं अपने अभिन्न मित्र और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक स्व. कुप्प सी. सुदर्शन से कहा करता था कि भारत के मुसलमानों को राष्ट्रवादी धारा से जोड़ना बेहद जरूरी है। मुझे खुशी है कि राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के जरिए वही काम आज हो रहा है। यह कितनी अद्‌भुत बात है कि यह मंच तीन तलाक का विरोध कर रहा है और मुस्लिम समाज में अनेक सुधारों की पहल भी कर रहा है। ऐसी पहल सभी धर्मों में क्यों नहीं होती?

    यह इतिहास का एक बड़ा सत्य है और अकाट्य है कि किसी भी विचारधारा या सिद्धांत या धर्म का जन्म चाहे जिस देश में हुआ हो, उसके मानने वालों पर ज्यादा प्रभाव उनके अपने देश की परंपरा का ही होता है। इसी आधार पर दुबई के अपने एक भाषण में अरब श्रोताओं के बीच मैंने यह बात डंके की चोट पर कह दी थी कि भारत का मुसलमान दुनिया का श्रेष्ठतम मुसलमान है, क्योंकि भारत की हजारों साल की परम्परा उसकी रगों में बह रही है। बादशाह खान ने अब से लगभग 50 साल पहले मुझे काबुल में कहा था कि मैं पाकिस्तानी तो पिछले 19-20 साल से हूं, मुसलमान तो मैं हजार साल से हूं, बौद्ध तो मैं ढाई हजार साल से हूं और आर्य-पठान तो पता नहीं, कितने हजारों वर्षों से हूं। यदि इस तथ्य को सभी भारतीय स्वीकार करें तो सोचिए, हमारा राष्ट्रवाद कितना सुदृढ़ होगा।

  • अपने ही चक्रव्यूह में उलझते कमलनाथ

    अपने ही चक्रव्यूह में उलझते कमलनाथ

    मुख्यमंत्री कमलनाथ की अब तक की राजनीति को चाहने वालों की लंबी जमात है। उनकी कार्यशैली के दीवाने नेता भी हैं और आम जनता भी। छिंदवाड़ा के लोग बरसों से उनकी सुलझी राजनीति के कायल रहे हैं। एक बार जब जनता ने उन्हें पराजय से दंडित किया तब भी उनके प्रति दीवानगी और सम्मान कम नहीं हुआ। लोगों को अपनी गलती का अहसास हुआ और बाद में उन्होंने अपनी गलती सुधारी भी। कमलनाथ के चाहने वालों को अब भी भरोसा है कि वे कथित छिंदवाड़ा माडल की तर्ज पर मध्यप्रदेश की कायापलट देंगे। सत्ता संभालने के लगभग छियासठ दिन बीतने के बाद लोगों की ये सोच संशय से घिरती नजर आ रही है। कांग्रेस की कमलनाथ सरकार ने जो फैसले लिए हैं, जो मंशाएं जाहिर की हैं और जमीन पर उसकी जो कार्यशैली नजर आ रही है उसे देखकर कहा जा सकता है कि कमलनाथ अपने ही चक्रव्यूह में उलझते जा रहे हैं।

    कमलनाथ की अब तक की राजनीति कभी सत्ता का केन्द्र नहीं रही है। वे या तो गांधी परिवार की नीतियों के पैरवीकोर रहे हैं या फिर अपनी राज्य सरकारों के सलाहकार की भूमिका में रहे हैं। उनके हाथों में केन्द्र सरकारों का बजट रहा जिससे उन्होंने राज्यों और जनता को उपकृत करने की भूमिका भी निभाई। पहली बार उन्हें सीमित बजट से राजनीतिक महल खड़ा करने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। उनके करिश्मे का जैसा प्रचार चुनाव के दौरान किया गया था उससे लोगों की अपेक्षाएं बढ़ती जा रही हैं। लोगों में बैचेनियां बढ़ रहीं हैं उन्हें अब भी लग रहा है कि आज नहीं तो कल कमलनाथ जी अपने पिटारे में छिपी धन की थैली निकालेंगे और मध्यप्रदेश की तस्वीर पलटकर रख देंगे।

    दो महीनों के शासनकाल की गतिविधियों को देखने के बाद ये कहा जा सकता है कि ऐसा कुछ होने नहीं जा रहा है। कांग्रेस सरकार की दो महीनों की रिकार्डशीट बेहद धुंधली है।वे न तो कोई बड़ा निवेश लाने में सफल हुए हैं और न ही पूंजी उत्पादन की कोई इबारत लिख पाए हैं। हां पिछली सरकार की योजनाओं की कतरब्यौंत करने का असफल प्रयास करते जरूर नजर आ रहे हैं।जिन योजनाओं पर उन्होंने कैंची चलाई उन्हें दुबारा जारी करके उन्होंने अपनी राजनीतिक अपरिपक्वता का भी उदाहरण पेश किया है। उनकी राजनीति सरकार के बजट को खर्च करने के इर्दगिर्द ही घूमती रही है। पहली बार उन्हें एक साथ कई आयामों के लिए पूंजी उत्पादन की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है जिसमें वे असफल साबित हो रहे हैं।

    इसकी एक बड़ी वजह आगामी लोकसभा चुनाव भी हैं।उन पर लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की सीटें बढ़ाने का जबर्दस्त दबाव है। इसके लिए वे लगातार लोकप्रियतावादी योजनाओं की घोषणाओं का जादू फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। बहुचर्चित किसान कर्जमाफी योजना से वे किसानों को बैंकों से नो ड्यूज दिलाने जा रहे हैं।किसानों का कर्ज चुकाने के लिए सरकार के पास कोई जमाराशि नहीं है। इसके लिए वे बैंकों की साख का सहारा ले रहे हैं। निश्चित तौर पर इसी महीने से वे किसानों को ये प्रमाण पत्र दिलवाना शुरु कर देंगे। वचनपत्र का ये वायदा पूरा होने से किसान प्रसन्न भी होंगे,लेकिन नया गल्ला सरकार नहीं खरीद रही है इससे किसान परेशान हैं।

    कमलनाथ की सरकार को किसानों की जिस फौज का सामना करना पड़ रहा है उससे वे खासे तनाव में भी हैं। पूर्व मंत्री डॉ.नरोत्तम मिश्र ने विधानसभा को बताया कि कार्यमंत्रणा समिति की बैठक के बाद अनौपचारिक चर्चा में मुख्यमंत्री कमलनाथ जी ने पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह से कहा कि आपने कृषि का उत्पादन इतना अधिक बढ़ा दिया कि अधिक उत्पादन ही समस्या बन गई है। दरअसल में कांग्रेस जिस रोजगार बढ़ाने की बातें सोच रही है या कर रही है उसे भाजपा की सरकार पहले ही कृषि क्षेत्र में बढ़ा चुकी है। कमलनाथ जी की सोच अभी भी उद्योगों के विस्तार से आगे नहीं निकल पा रही है,जबकि इसके लिए न तो सरकार के पास धन है और न ही निवेशक।उन्होंने दुनिया घूमी है,वे विकसित देशों की चकाचौंध से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं जबकि प्रदेश की हकीकत इसके विपरीत है।

    कांग्रेस सरकार के नेतागण जमीनी हकीकत समझने तैयार नहीं हैं। हवा हवाई बातें उनकी कार्यशैली का आधार हैं। सदन में कांग्रेस विधायक लक्ष्मण सिंह कह रहे थे कि पिछली सरकार अरबों रुपया विज्ञापन में बांट गई है इसलिए प्रदेश पर एक लाख अस्सी हजार करोड़ का कर्ज हो गया है। जबकि जमीनी हकीकत ये है कि मध्यप्रदेश का कर्ज आज भी तयशुदा सीमा से अधिक नहीं है।

    कमलनाथ ने सार्वजनिक कार्यक्रम में ये कहकर सनसनी फैला दी थी कि मैं अखबारों में अपनी फोटो नहीं छपवाना चाहता। आपको जो छापना हो छापें। हमारी सरकार विज्ञापन की सरकार नहीं है। बेहतर होगा कि आप लोग कोई दूसरा कारोबार कर लें। जबकि अपनी ही कही गई बातों के विपरीत कमलनाथ की सरकार अपने साठ दिनों में प्रचार के नाम पर 35 करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है। शिवराज सरकार ने मध्यप्रदेश की अर्थव्यवस्था को दो लाख दस हजार करोड़ रुपए के आंकड़े तक पहुंचाया था।इसमें से प्रचार पर खर्च साढ़े तीन सौ करोड़ रखा जाता था।इसकी अस्सी फीसदी राशि तो सरकारी प्रचार तंत्र की स्थापना, सत्कार और वाहनों पर ही खर्च हो जाती थी। मीडिया इंडस्ट्री आज बड़ा रूप ले चुकी है और वो इस बजट पर टिकी हुई नहीं है। तभी तो एक बड़े मीडिया संस्थान को कांग्रेस के कथित प्रयासों से तीन हजार करोड़ की आय कराई गई है। आज भी तमाम बड़े मीडिया संस्थानों की आय का महज तीस फीसदी धन सरकारी सेक्टर से आता है। जिसमें मध्यप्रदेश सरकार का हिस्सा तो और भी कम है। इसके बावजूद कमलनाथ सरकार और उसके मंत्री अपनी असफलताओं को छुपाने के लिए मीडिया को आधारहीन आरोपों से बदनाम कर रहे हैं।इसकी वजह स्वयं मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनके अनुभवहीन सलाहकारों की जमात है।

    कमलनाथ के करीबी और वित्तमंत्री तरुण भनोट अपनी सरकार पर दलाली के आरोपों से खफा हैं। उन्होंने सदन में कहा कि यदि सरकार जनहित के काम कर रही है तो क्या हम लोग दलाली खा रहे हैं।उन्हें सार्वजनिक तौर पर बताना होगा कि वे कौन से जनहित के कार्य हैं जिनके लिए दलालों की फौज वल्लभ भवन और विधानसभा में टूटी पड़ रही है। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों के थोपे गए सरकारी तंत्र को पालने के लिए राज्य को हर महीने तीन हजार दो सौ करोड़ रुपए स्थापना व्यय करना पड़ता है। इस व्यय का अधिकांश हिस्सा अनुत्पादक है। राज्य की आय तो सरकारी तंत्र को पालने और कर्ज का ब्याज चुकाने में ही खर्च हो जाती है। इसके बावजूद तबादलों के धंधे में लिप्त कमलनाथ सरकार प्रदेश की तस्वीर बदलने की डींगें हांक रही है।निश्चित तौर पर आने वाले समय में ये असंतोष की बड़ी वजह बनेगी। जिसका खमियाजा कांग्रेस को लोकसभा चुनावों में तो उठाना ही पड़ेगा साथ में पहली बार मध्यप्रदेश अपराध और अराजकता के दलदल में फंसने जा रहा है जिसके लिए आम जनता को अभी से तैयार रहना होगा।

    (लेखक जन न्याय दल के प्रदेश प्रवक्ता भी हैं। यह आलेख मीडिया पर लगाए जा रहे अनर्गल आरोपों के जवाब में लिखा गया है।)

  • उपाध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने फिर किया जीत का उद्घोष

    उपाध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने फिर किया जीत का उद्घोष

    मध्यप्रदेश में नई सरकार के गठन के बाद पहला सत्र आज शोरशराबे की भेंट चढ़ गया। कमलनाथ सरकार ने इसी शोरगुल के बीच बाईस हजार करोड़ से अधिक का बजट पारित करवा लिया।विपक्ष की नारेबाजी और धरने के बीच सदन के समापन की घोषणा भी कर दी गई। सदन के समवेत होते ही पूर्व मुख्यमँत्री शिवराज सिंह चौहान ने कल राज्यसभा में पारित सवर्ण गरीबों को आरक्षण के विधेयक पर धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया। उन्होंने इस विधेयक को क्रांतिकारी बताते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अभिनंदन किया। विपक्षी सदस्यों ने मेजें थपथपाकर इसका समर्थन किया। इस बीच सत्ता पक्ष की ओर से कई सदस्यों ने विधेयक को राजनीतिक कदम बताते हुए कहा कि आगामी लोकसभा चुनावों को देखते हुए मोदी सरकार ने ये विधेयक प्रस्तुत किया था। इस बीच अध्यक्ष नर्मदा प्रसाद प्रजापति ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री यदि इस बात को उठाने से पहले सचिवालय को सूचना दे देते और अनुमति प्राप्त कर लेते तो अच्छा था। इस तरह से बीच में बोलने से नए सदस्यों पर गलत असर पड़ता है। इसके जवाब में जावरा से भाजपा विधायक राजेन्द्र पांडेय ने आसंदी पर सवाल उठाते हुए कहा कि नियम तोड़ने की शुरुआत आसंदी की ओर से पहले ही दिन हो गई थी।उपाध्यक्ष के चुनाव में भी इसी तरह सदन की मान्य परंपराओं और नियमों को ताक पर रख दिया गया। इस पर सत्ता पक्ष की ओर से कहा गया कि ये आसंदी का अपमान है। इस बीच अध्यक्ष एनपी प्रजापति ने कहा कि जब अध्यक्ष खड़े हों तब माननीय सदस्यगण बैठे रहें और अध्यक्ष की बात सुनें। इस बीच नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने कहा कि आसंदी की ओर से यदि उपाध्यक्ष निर्वाचन के संबंध में प्राप्त सूचनाएं पढ़ी नहीं जाएंगी तो वो केवल कागज का टुकड़ा ही रहेंगी। पांचों को एक साथ पढ़ा जाए और सदन से उसका अनुमोदन लिया जाए। अध्यक्ष के निर्वाचन में भी इसी प्रकार चार सूचनाएं पढ़कर कार्रवाई आगे बढ़ा दी गईं थी। इस पर आसंदी की ओर से उपाध्यक्ष के निर्वाचन के संबंध में प्राप्त पांचों सूचनाओं का पाठन किया गया। उन्होंने पांचीलाल मेढ़ा को अपना प्रस्ताव प्रस्तुत करने की अनुमति प्रदान की। जिसमें उन्होंने सुश्री हिना लिखीराम कांवरे को विधानसभा का उपाध्यक्ष चुने जाने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया। संसदीय कार्यमंत्री डाक्टर गोविंद सिंह ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। अध्यक्ष ने बताया कि सुश्री हिना लिखीराम कांवरे के लिए इसी प्रकार के प्रस्ताव विधानसभा सदस्य प्रताप ग्रेवाल, पीसी शर्मा, राजेश शुक्ला की ओर से भी प्रस्तुत किए गए हैं।एक अन्य प्रस्ताव नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव की ओर से जगदीश देवड़ा के लिए प्रस्तुत किया गया है। इस प्रस्ताव का समर्थन डाक्टर सीतासरन शर्मा ने किया है। इस बीच उन्होंने सदन से उपाध्यक्ष के निर्वाचन करने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि सुश्री हिना लिखीराम कांवरे को उपाध्यक्ष बनाए जाने पर सदन सहमत है। इसके जवाब में सत्तापक्ष के सदस्यों ने हाथ उठाकर समवेत स्वर में प्रस्ताव का समर्थन किया।अध्यक्ष ने इसके साथ ही उपाध्यक्ष के नाम निर्वाचन की घोषणा कर दी। जब ये प्रक्रिया चल रही थी तब पूर्व विधानसभा अध्यक्ष डाक्टर सीतासरन शर्मा ने प्वाईंट आफ आर्डर उठाते हुए अपनी बात कहने का समय मांगा। इस पर अध्यक्ष श्री एनपी प्रजापति ने कहा कि चुनाव की प्रक्रिया शुरु हो चुकी है ऐसे में प्वाईंट आफ आर्डर का कोई अर्थ नहीं और हम इसकी अनुमति नहीं देते हैं। उपाध्यक्ष के नाम की घोषणा के विरोध में विपक्ष के सदस्य गर्भगृह में आने लगे। इस पर अध्यक्ष ने सदस्यों से गर्भगृह में न आने का अनुरोध किया। नेता प्रतिपक्ष ने इस पर आपत्ति की। उन्होंने कहा कि ये आसंदी की तानाशाही है और ये नहीं चलेगी।ऐसे तो सदन नहीं चल सकता। आसंदी की ओर से विपक्ष को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। इस बीच पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आसंदी की ओर इशारा करते हुए अध्यक्ष से कहा कि आप निष्पक्ष नहीं हैं। हमें न्याय नहीं मिल सकता। इस पर शोरगुल बढ़ने लगा और अध्यक्ष ने सदन को दस मिनिट के लिए स्थगित करने की घोषणा कर दी। एक बार फिर जब सदन समवेत हुआ तो अध्यक्ष ने कहा कि मैंने नेता प्रतिपक्ष की बात सुनने के बाद ही कार्यवाही आगे बढ़ाई थी। इस पर नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि आसंदी से सत्य वचन किया जाए। पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष की ही बात सदन में नहीं सुनी जा रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई जिसे अध्यक्ष ने सदन की कार्यवाही से विलोपित करवा दिया। अध्यक्ष ने कहा कि कौल शकधर की किताब में साफ लिखा है कि चुनाव की प्रक्रिया शुरु हो जाने के बाद रोकी नहीं जा सकती। इस पर प्वाईंट आफ आर्डर नहीं लिया जा सकता। इस बीच सदन में शोरगुल होने लगा। गर्भगृह में खड़े विपक्ष के सदस्य नारेबाजी करने लगे। जिस पर सदन की कार्यवाही एक बार फिर दस मिनिट के लिए स्थगित कर दी गई। सदन के फिर समवेत होने पर अध्यक्ष ने सदस्यों से अनुरोध किया कि वे सदन को सुचारू रूप से चलाने में सहयोग करें। इस बीच नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने आसंदी की ओर इशारा करते हुए कहा कि आपका निर्वाचन असत्य है, असंवैधानिक है, अनियमित है। उन्होंने नारा लगाया अध्यक्ष जी इस्तीफा दो। इस बीच कई अन्य सदस्य भी अपने स्थान से खड़े होकर नारेबाजी करते सुने गए। शोरगुल बढ़ते देख अध्यक्ष ने सदन की कार्यवाही फिर से दस मिनिट के लिए स्थगित करने की घोषणा कर दी। लगभग साढ़े बारह बजे जब सदन एक बार फिर समवेत हुआ तो अध्यक्ष श्री प्रजापति ने कहा कि मेरा सदन के सभी सम्मानीय सदस्यों के प्रति सम्मान का भाव है। नियम प्रक्रियाओं के पालन में हमें कई बार कठिन फैसले भी लेने होते हैं। सदन के सभी वरिष्ठ सदस्य हमारे लिए आदरणीय हैं। इस बीच सत्ता पक्ष के केपीसिंह अपने स्थान पर खड़े हो गए और कहने लगे कि अध्यक्ष को अपने फैसले पर सफाई नहीं देनी चाहिए। अध्यक्ष ने कहा कि मैंने उपाध्यक्ष के निर्वाचन की कार्यवाही निर्वाचन की प्रक्रिया के अनुसार की है। मैं विपक्ष के सदस्यों के लिए सौंपता हूं कि वे इस पर फिर विचार करें। उन्होंने सदन की कार्यवाही आगे बढ़ाते हुए विधि और विधायी मंत्री पीसी शर्मा को मध्यप्रदेश माल और सेवा कर संशोधन अध्यादेश को सदन के पटल पर रखने की अनुमति प्रदान की।शोरशराबे के ही बीच पत्रों के पटल पर रखे जाने की प्रक्रिया भी चलती रही। इसी दौरान वित्तमंत्री तरुण भनोत ने भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के प्रतिवेदन भी सदन के पटल पर रखे।शासकीय विधि विषयक कार्यों से संबंधित विधेयक वाणिज्यिक कर मंत्री बृजेन्द्र सिंह राठौर ने प्रस्तुत किया और पुरःस्थापन की अनुमति प्राप्त की। इस बीच नवनिर्वाचित विधानसभा उपाध्यक्ष सुश्री हिना लिखीराम कांवरे ने राज्यपाल के अभिभाषण पर कृतज्ञता ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मंदसौर में किसानों को कर्जमाफी का जो वादा किया था कांग्रेस की कमलनाथ सरकार ने सत्ता संभालते ही कर्जमाफी की घोषणा कर दी है।इस बीच भी सदन में शोरगुल चलता रहा और कई बातें नहीं सुनी जा सकीं। इस बीच विजयलक्ष्मी साधो ने कहा कि जब सदन की सम्मानीय महिला सदस्य बोल रहीं हैं तब भी विपक्ष के सदस्य शोर मचा रहे हैं इससे साफ जाहिर हो जाता है कि महिलाओं के प्रति उनका क्या रवैया है। कांवरे ने कहा कि पिछली सरकार के बीच विधायिका और कार्यपालिका के बीच दूरियां बनी हुईं थीं। प्रशासनिक तौरतरीकों में काफी बदलाव किए जाने की जरूरत है। भाजपा के कई सदस्य बगैर अनुमति के बीच में बोलते रहे। भाजपा के दिनेश राय मुनमुन ने कहा कि कमलनाथ जी ने प्रदेश के युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता देने की घोषणा की है। ऐसे में युवाओं को आगे बढ़कर अन्य प्रदेशों के युवाओं को रोजगार से बाहर कर देना चाहिए। धन्यवाद प्रस्ताव के संबंध में सेवढ़ा विधायक घनश्याम सिंह ने सरकार ने अपने अधिकतर चुनावी वायदे पूरे कर दिए हैं। इस तरह से ये तेज काम करने वाली सरकार है। इस बीच उज्जैन के मोहन यादव अपने स्थान पर खड़े होकर सरकार के विरोध में भाषण करने लगे। उन्होंने कहा कि सदन में लोकतंत्र का अपमान किया जा रहा है। इस बीच आसंदी से द्वितीय अनुपूरक मांगों पर मतदान कराने की अनुमति प्रदान की। वित्तमंत्री तरुण भनोत ने इकत्तीस मार्च को समाप्त होने जा रहे वित्तीय वर्ष के लिए राज्य की संचित निधि में से प्रस्तावित खर्च के लिए बाईस हजार दो सौ सड़सठ करोड़, उनत्तीस लाख पांच हजार छह सौ रुपए की अनुपूरक राशि देने का अनुरोध किया जिसे सत्ता पक्ष ने विपक्षी शोरगुल के बीच पारित कर दिया। संसदीय कार्यमंत्री डाक्टर गोविंद सिंह ने कहा कि सदन से सभी कार्य पूरे हो चुके हैं इसलिए सदन को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया जाए। इस पर अध्यक्ष ने सहमति प्रदान की और सदन को अनिश्चित काल के लिए स्थगित करने की घोषणा की।

  • शिक्षा में अराजकता से कैसे निपटेंगे जावड़ेकर

    शिक्षा में अराजकता से कैसे निपटेंगे जावड़ेकर

    -आलोक सिंघई-

    दंभ से सराबोर भारत के शैक्षणिक संस्थानों में –या विद्या सा मुक्तये– का नारा लगाने वालों की भरमार है। जुगत भिड़ाकर या चयन के अवैज्ञानिक मापदंडों का लाभ लेकर स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक में फर्जी शिक्षकों की भीड़ गुजारा भत्ता पा रही है। यही वजह है कि सफलता के मापदंडों पर भारत का युवा सोशल मीडिया तक ही पहुंच पाया है। सवा सौ करोड़ का देश पेटेंट पाने के पैमाने पर फिसड्डी साबित हो रहा है। सरकारें बदल गईं हैं, पर शैक्षणिक संस्थानों का ढर्रा वही है। देश को विश्वगुरु बनाने का सपना पाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मुर्दों में जान फूंकने की कितनी भी कोशिश करें लेकिन जब तक उनकी पार्टी भाजपा इन फर्जी शिक्षकों के स्थान पर असली मुक्तिदाताओं को नहीं बिठाती तब तक बदलाव की शुरुआत भी कैसे हो सकती है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने शैक्षणिक संस्थाओं में अपना जनाधार बढ़ा लिया है इसके बावजूद युवाओं की इस बैचेनी को भांपने में भाजपा की सरकारें पूरी तरह असफल साबित हो रहीं हैं।

    सागर के डाक्टर सर हरिसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के पूर्व छात्रों ने आगामी 14- 15 अप्रैल को पूर्व विद्यार्थियों की एल्युमनी मीट बुलाई है। पूर्व छात्रों के मिलने का ऐसा अवसर कोई पहली बार नहीं आया है। जमाने भर के शैक्षणिक संस्थानों में विद्यार्थी इस तरह के आयोजन करते रहते हैं। सागर के भी कुछ पुरा छात्रों ने इस प्रथा की नकल करने की कोशिश की,लेकिन उनका प्रयास कुछ अलग ही अंदाज में सामने आया है। पत्रकारिता विभाग से निकले ये छात्र देश भर के विभिन्न शहरों में ख्यातनाम पत्रकार बन चुके हैं। उन्हें मलाल है कि कभी इस विभाग के जिन छात्रों को कटंगी के रसगुल्ले की तरह खास प्यार मिलता था वो अब क्यों नहीं मिल रहा है। उनका प्यारा संस्थान आज देश के कई अन्य पत्रकारिता पढ़ाने वाले संस्थानों के बराबर ऊंचाई तक भी क्यों नहीं पहुंच पाया । आज इस संस्थान में गिने चुने विद्यार्थी ही क्यों प्रवेश लेते हैं। उन्हें आग में तपाकर कुंदन बनाने का प्रयास कहां गुम हो गया है। ऐसे तमाम सवाल हैं जिनके जवाब ढूंढ़े जा रहे हैं। पुरा छात्रों ने इस एल्युमनी मीट के लिए जो वाट्सएप समूह बनाया है उसमें चल रहे संवाद उस बैचेनी का उद्घोष कर रहे हैं।

    इस संस्थान की विकास यात्रा अलबेली है। बोफोर्स कांड की गूंज जब पूरे देश में चल रही थी,तब आकाशवाणी के एक प्रसारण केन्द्र पर जीवित प्रसारण के दौरान अनोखी घटना घटित हो गई। एक बच्चे ने बोल दिया गली गली में शोर है राजीव गांधी चोर है। देश में कांग्रेस का दबदबा था और ये कल्पना में भी नहीं सोचा जा सकता था कि सरकारी मीडिया से इस तरह की आवाज भी आ सकती है। जाहिर है कि जागरूक जनता ने इस घटना को गंभीरता से लिया। अखबारों में भी ये खबर प्रकाशित की गई। अब जो विद्यार्थी पत्रकारिता की पढ़ाई में प्रवेश लेना चाहते हैं वे कितने जागरूक हैं ये जानने के लिए प्रवेश परीक्षा में उस आकाशवाणी केन्द्र का नाम पूछा गया था। सवाल सीधा था, प्रवेशार्थियों की जागरूकता जानने के लिए पूछा गया था। पत्राकारीय अभिरुचि जानने का इससे अच्छा पैमाना कोई दूसरा नहीं हो सकता था। इसके बावजूद कांग्रेस की चिलम भरने वाले छात्र संगठनों ने इसे उछालना शुरु कर दिया। इस प्रश्नपत्र को बनाने वाले पत्रकारिता के मूर्धन्य शिक्षक प्रदीप कृष्णात्रे पर सवाल उठाए जाने लगे। भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन के कतिपय गुंडों ने अभिव्यक्ति की आजादी के प्रतिमान गढ़ने वाली इस फैक्टरी पर हमला कर दिया। प्रदीप कृष्णात्रे का मुंह काला करके विश्विद्यालय परिसर में जुलूस निकाला गया। इस तरह की घटना झकझोर देने वाली थी। देश भर के समाचार पत्रों ने इस घटना को गंभीरता से लिया। नवभारत टाईम्स, जनसत्ता समेत तमाम अखबारों ने इस कलंकित घटना का विरोध करते हुए संपादकीय लिखे। मामला अदालत पहुंचा। सालों चला। घटना के बाद इस विभाग की सक्रियता और भी बढ़ गई। शिक्षकों ने दुगुने उत्साह से विद्यार्थी गढ़ना शुरु कर दिया। इसके बावजूद राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ता गया और प्रतिभाशाली शिक्षकों ने विभाग से पलायन कर लिया। इस बीच अभियुक्त को कांग्रेस की सरकारों ने पुरस्कृत करते हुए विश्वविद्यालय के इसी विभाग में मीडिया असिस्टेंट जैसी गैर शैक्षणिक नौकरी देकर उपकृत करवा दिया। इसके बाद विवि और इसके पत्रकारिता विभाग की साख धूलधूसरित हो गई। बाद में विद्यार्थी तो निकले लेकिन फील्ड पर वे ही सफल हो सके जिनमें खुद कुछ कर गुजरने की जिजीविषा थी। विभाग की निरंतर गिरती साख का नतीजा ये है कि आज वहां चंद विद्यार्थी ही डिग्री लेने पहुंचते हैं।

    ये बात पत्रकारिता के शीर्ष पर पहुंच चुके विभाग के पूर्व विद्यार्थियों को आज भी सालती है कि जिस संस्थान को अपनी समर्पित शिक्षा के कारण शीर्ष पर होना था वो आज गुमनामी के अंधेरे में क्यों धकेला जा रहा है। समय बदला, सरकारें बदलीं लेकिन विश्वविद्यालय का ढर्रा नहीं बदला। केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिलने के बाद कभी ये प्रयास नहीं किए गए कि देश को कुशल संवाद से आगे ले जाने वाले मीडिया कर्मी कैसे तैयार किए जाएं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय हो या विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, या देश का शैक्षणिक ढांचा संवारने वाला कोई अन्य संस्थान कोई भी अब तक इस पत्रकारिता संस्थान की खोई साख नहीं लौटा सका है। इस कसमसाहट ने ही इस बार एल्युमनी मीट की चाहत को परवान चढ़ा दिया है।

    सागर का पुरा छात्र सम्मेलन अब केवल गलबहियां करने का अरमान लिए नहीं आयोजित नहीं हो रहा है। इसमें कई सवाल घुमड़ रहे हैं। क्या देश की शिक्षा कभी क्षुद्र राजनीतिक चंगुल से आजाद हो सकेगी। शैक्षणिक संस्थानों में चापलूसी या कृपा के नाम पर जो गंदगी जमा हो गई है उसे आखिर कब तक पाला पोसा जाता रहेगा। मोदी सरकार अपनी पूर्ववर्ती सरकारों से आखिर किस नजरिए से अलग है। उसने देश को जो भ्रष्टाचार गंदगी और अयोग्यता से मुक्ति दिलाने का स्वप्न दिखाया था वो क्या कभी पूरा होगा। आखिर अच्छे दिन कब आएंगे। डिग्रियों की आड़ में ज्ञान के संरक्षण और संवर्धन की हत्या कब तक की जाती रहेगी। मानव संसाधन और विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर आखिर कर क्या रहे हैं । देश के शैक्षणिक ढांचे में सुधार की उनकी क्या योजना है। पत्रकारिता के पुरा छात्रों को ही यदि अपने प्रिय संस्थान को सुधारने और संवारने का कार्य करना है तो फिर सरकार की जरूरत ही क्या है। सरकार की ये बेरुखी क्या देश में किसी अराजकता को पनपने का अवसर तो नहीं दे रही । कल यदि शैक्षणिक संस्थानों में सुधार और बदलाव की आकांक्षा गुटीय टकराव की वजह बन गई तो फिर उससे कैसे निपटा जा सकेगा।

    ये तमाम ज्वलंत सवाल न केवल सागर के डाक्टर सर हरिसिंह गौर विवि कुनबे के बीच सुलग रहे हैं वे चाहते हैं कि उनका प्यारा पत्रकारिता संस्थान एक बार फिर अपनी पहचान स्थापित करे। यहां से निकले पत्रकारिता के शावक देश में बदले निजाम का संदेश फैलाएं। देश के आम जनमानस को भी बदलाव की बयार का इंतजार है। सरकार को यदि अपनी उपस्थिति दिखानी है तो उसे कोई ठोस कदम उठाकर दिखाने होंगे। शेर बूढ़ा हो जाए तो उसके मुंह पर मक्खियां भिनकने लगती हैं, पर जब शेर दहाड़ता नजर आ रहा हो तब उसके मुंह पर मक्खियां भिनकने लग जाएं तो साफ है कि उसने मक्खियों से ही यारी कर ली है।

    (लेखक स्वयं डाक्टर सर हरिसिंह गौर विवि के पत्रकारिता और जनसंचार विभाग के पूर्व छात्र हैं)

  • मिठलबरा राजनीति की उपासना

    मिठलबरा राजनीति की उपासना



    हिंदुस्तान की राजनीति अनुत्पादक, उद्देश्यहीन और ठहरी हुई बांझ महसूस की जा रही है। कांग्रेस से निराश हो चुके लोग आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भाजपा के बारे में भी निराशाजनक बातें कहते नजर आते हैं। हालांकि जो लोग यूपीए और एनडीए की सरकारों के आधारभूत अंतर को समझते हैं वे जानते हैं कि बदली सत्ता पहले की तुलना में क्या नए लक्ष्य छूने निकल पड़ी है। इसके बावजूद अपनी राजनीतिक विधा को बुलंद करने में जुटे सत्ताच्युत राजनेता ये मानने तैयार नहीं हैं कि बदलते वक्त ने उनकी राजनीतिक शैली को विदा कर दिया है। मध्यप्रदेश विधानसभा के बजट सत्र में दिवंगत विभूतियों को श्रद्धांजलि देने का क्रम चल रहा था। अध्यक्ष डाक्टर सीतासरन शर्मा ने पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी को जमींदारी उन्मूलन के लिए कार्य करने वाला विधिवेत्ता और संसदविद् बताया । मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी के प्रति श्रद्धांजलि देने के लिए कई सम्मानजनक संबोधन प्रेषित किए। वाजिब भी था, जिस विधानसभा की गरिमा आजादी के बाद संवाद आधारित लोकतंत्र से सजाई संवारी गई हो उसके पुरोधाओं को नई पीढ़ी की ओर से सम्मान दिया जाना लाजिमी है।

    नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कहा कि श्रीनिवास तिवारी को विंध्य का टाईगर कहा जाता था। उन्होंने बेरोजगारी मिटाने के लिए पूरे जीवन काम किया। वे विंध्य क्षेत्र के विकास के लिए विशेष प्रयास करते थे। श्री तिवारी का अपने लोगों के लिए कोई कानून कायदा नहीं होता था। वे हरदम प्रयास करते थे कि कानून के अंदर आदमी का संरक्षण कैसे किया जाए। उनके विचार ,सिद्धांत और सपने आज भी अधूरे हैं। वे चाहते थे कि गरीबी दूर हो पर अभी इसके बारे में बहुत कुछ किया जाना बाकी है। विधानसभा उपाध्यक्ष डाक्टर राजेन्द्र कुमार सिंह इस माहौल में कुछ ज्यादा ही भाव विभोर हो गए। उन्होंने कहा कि समाजवादी सोच के कारण वे परंपरागत रूप से विद्रोही स्वभाव के रहे। इसलिए वे हरदम सरकार से लड़ने के अंदाज में रहते थे। जब विंध्यप्रदेश का विलय मध्यप्रदेश में हो रहा था तब उन्होंने इसका विरोध किया था। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि श्री तिवारी की अष्टधातु की प्रतिमा रीवा में या विधानसभा परिसर में स्थापित की जाए। श्रीनिवास तिवारी के प्रति सम्मान का ये भाव स्वाभाविक है। श्री तिवारी भरी सभा में कहते थे कि श्री राजेन्द्र सिंह मेरे तीसरे बेटे समान हैं। जाहिर है इस आशीर्वाद का प्रतिफल देने का भाव श्री सिंह के मन में आना ही चाहिए। विधानसभा में श्रद्धांजलि आयोजन के इस संवाद में कुछ बातें निकलकर सामने आ रहीं हैं। निश्चित रूप से श्रीनिवास तिवारी इतने बड़े कद के नेता थे कि जीते जी तो उन्हें नजरंदाज करना संभव ही नहीं था। आज भी उन्हें भुलाना संभव नहीं है। जाहिर है कि मध्यप्रदेश के इतिहास में श्रीनिवास तिवारी का नाम हमेशा आदर के साथ याद किया जाएगा। इसके बावजूद कुछ बातें चिंतन करने योग्य हैं। श्रीनिवास तिवारी जब राजनीति में आए तब जमींदारी प्रथा मौजूद थी। जाहिर है कि नई पीढ़ी के युवकों में तब जमींदारी की आड़ में चलने वाले शोषण के प्रति घृणा का भाव हुआ करता था। इसके बाद साम्यवाद के हिंदुस्तानी संस्करण समाजवाद ने भी पूंजीपतियों के प्रति नफरत का भाव पल्लवित पोषित किया। गांधीवाद जरूर सेठों की पैरवी करता था लेकिन कांग्रेस का मौजूदा नेतृत्व तो चूं चूं का मुरब्बा था। गरीबी हटाओ का नारा देने वाली इंदिरा कांग्रेस मंच पर तो सेठों को गाली देती थी पर मंच की आड़ में वह पूंजीपतियों को पोषित करती रही । इसी ऊहापोह में श्रीनिवास तिवारी ने अपनी राजनीतिक सोच को जमीन पर उतारने का प्रयास किया। आज अजय सिंह सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि श्री तिवारी के स्वप्न अभी साकार नहीं हो पाए हैं। जाहिर है कि जो स्वप्न जमीनी बुनियाद पर न खड़े हों वे साकार हो भी कैसे सकते हैं।

    श्रीनिवास तिवारी अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में ही बहुत सारे विवादों में घिरे रहे। विधानसभा में जातिगत और क्षेत्रगत भेदभाव पर आधारित फर्जी नियुक्तियों को लेकर तो विधानसभा सचिवालय ने उनके खिलाफ प्राथमिकी तक दर्ज कराई थी। ये प्रकरण अभी लंबित है। उनके कार्यकाल के दौरान करोड़ों का मोसंबी जूस पिलाए जाने का घोटाला हो या सचिव सत्यनारायण शर्मा की उपस्थिति में गोलीकांड जैसे मामले सभी विधानसभा को कलंकित करते रहे। इसके बाद विधानसभा में फर्जी नियुक्तियों ने तो राजनीतिक हलकों में भारी कोहराम मचाया। आईएएस जे.एल.बोस ने इस मामले की जांच की तो उन्हें गंभीरता का अहसास हुआ। उन्होंने जब इस रिपोर्ट के बारे में सत्ताधीशों को बताया तो वे अचंभित रह गए। इसके बाद रहस्यमयी तौर पर कतिपय असामाजिक तत्वों ने उनसे रिपोर्ट भरी अटैची छीन ली और भाग गए। उन्होंने अपनी सिफारिश में किसी न्यायाधीश से इस मामले की जांच कराने की जरूरत बताई थी। जस्टिस शचीन्द्र द्विवेदी की अध्यक्षता में हुई न्यायिक जांच में ये घोटाला और भी गंभीर रूप में सामने आया। उनके असामयिक निधन से मामले पर पर्दा पड़ता नजर आने लगा। उन्होंने तथ्यात्मक जांच रिपोर्ट में मामले की प्राथमिकी दर्ज करने की सिफारिश की थी। इसके बावजूद ये मामला बरसों तक लंबित रहा। अंततः विधानसभा सचिवालय ने इस मामले में प्राथमिकी दर्ज कराई जिसके बाद आज भी ये मामला लंबित पड़ा है। विधानसभा के प्रमुख सचिव पद पर डा.ए.के.पयासी की नियुक्ति कैसे हुई ये गोलमाल आज तक लोगों को अचंभे में डाल देता है। शिक्षक से नगर निगम और फिर विधानसभा में उनका पहुंचना। इसी दौरान डिग्रियां पा लेना जैसे मामले सर्वज्ञात हैं। इसके बावजूद राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ने इस मामले पर पर्दा डाल रखा है। आज भी विंध्यक्षेत्र के ब्राह्मण जाति के लोग विधानसभा में भृत्य और मार्शल जैसे पदों से अपनी आजीविका चला रहे हैं। ये सब इसलिए क्योंकि तुरत नतीजे देने की ललक में श्रीनिवास तिवारी ने युवाओं को सरकारी नौकरियां देने की कांग्रेसी नीति का अनुकरण किया। बल्कि कहा जाए कि अपने नाते रिश्तेदारों को सरकारी नौकरियां दिलाने में उन्होंने लूट भरी नीति अपनाई। जिस पत्रकार ने उनका विरोध किया उसे उन्होंने विधानसभा परिसर में घुसने से प्रतिबंधित कर दिया। रीवा के माफिया तत्वों ने इस लूट का विरोध करने वाले अफसरों, कर्मचारियों को तरह तरह से प्रताड़ित किया। किसी को लूप लाईन में फिंकवा दिया तो किसी की सेवा पुस्तिकाएं बिगाड़ दीं। मध्यप्रदेश के इतिहास में इस तरह की लूट और अराजकता कभी नहीं देखी गई। दिग्विजय सिंह सरकार ये सब देखकर भी खामोश थी, क्योंकि दिग्विजय सिंह को अपने सारे काले कारनामों पर विधानसभा की मुहर लगवाना पड़ती थी।

    आज जो लोग मृत व्यक्ति को श्रद्धांजलि देने के नाम पर आदर व्यक्त कर रहे हैं उनकी बात तो समझी जा सकती है पर जो लोग श्रीनिवास तिवारी की परंपरा को अष्टधातु में ढालकर पीढ़ियों का मार्गदर्शन करने की बात कह रहे हैं उन्हें अपनी सोच पर पुनर्विचार करना चाहिए। आखिर हम नई पीढ़ी को क्या संस्कार देना चाहते हैं। लोगों को खुश करने के लिए उनकी मुंह पर मीठी बातें करने वालों को मिठलबरा कहा जाता है। किसी भी राजनीति का उद्देश्य यदि केवल लोगों को खुश करना और उनसे वोट पाना हो वह कभी देश और समाज के स्थापित लक्ष्यों को नहीं पा सकती। कांग्रेस की सरकारों ने इन कुसंस्कारों को संरक्षण दिया इसलिए वे रसातल में चलीं गईं। जिस भाजपा ने उनके कार्यकाल में उन गलत नीतियों का विरोध किया वह आज क्यों खामोश बैठी है ये बात जरूर चिंताजनक है। सरकार यदि विंध्य क्षेत्र के विकास के लिए काम कर रही है तो उसे श्रीनिवास तिवारी के पैदा किए गए माफिया गिरोह से डरने की जरूरत नहीं है। खुद विंध्य के बुद्धिजीवी इस माफिया गिरोह को कभी समर्थन नहीं देते थे। वे तो केवल इसलिए खामोश रहते थे क्योंकि उन्हें अपनी जानमाल की चिंता होती थी।

    माध्यमिक शिक्षा बोर्ड परीक्षा की नियंत्रक ताजवर रहमान साहनी को प्रताड़ित करने का मामला तब खूब सुर्खियों में आया था जब खुद श्रीनिवास तिवारी ने उन्हें अपने क्षेत्र के नकलचोर स्कूलों की मान्यता बहाल करने और रिजल्ट सुधारने के लिए धमकाया था। उसी रात रहस्यमय स्थितियों में श्रीमती साहनी की मौत भी हो गई थी। इस तरह के सैकड़ों किस्से मध्यप्रदेश की राजनीति में आज भी सुने सुनाए जाते हैं। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह सही कह रहे हैं कि विंध्य क्षेत्र की गलियां और चौपाल इस तरह के सैकड़ों आख्यानों से सराबोर हैं। इसके बावजूद आज के सत्ताधीश उनकी गलतियों से सबक क्यों नहीं लेना चाहते। यदि स्वर्गीय तिवारी जी की नीतियां मुखिया की छवि के अनुकूल होतीं तो क्या विंध्य क्षेत्र आज भी बेरोजगारी का दंश झेल रहा होता। मध्यप्रदेश की दिग्विजय सिंह सरकार बंटाढार साबित हुई होती। जरूरत है कि आज की राजनीति उन गलतियों से सबक ले, उन्हें दुहराने से बचे तभी हम आत्मगौरव की ओर बढ़ सकते हैं। ध्यान रहे भाजपा सरकार को भारत माता का वैभव अमर करने से लिए सत्ता में भेजा गया है। वह यदि इस लक्ष्य से भटककर सस्ती लोकप्रियता के फेर में पड़ी रहेगी तो प्रदेश की जनता उसकी भी परधनिया खोलने में देरी नहीं लगाएगी।

  • चीनी माल की टैक्स चोरी रोकेगा जीएसटी

    चीनी माल की टैक्स चोरी रोकेगा जीएसटी

    राहुल लाल

    चीनी माल से तबाह हो रहे भारतीय उद्योगों के लिए जीएसटी एक नई आशा की किरण बनकर कवच के रूप में सामने आया है। अब तक जो चीनी माल चोरी छुपे भारत के बाजारों में भेजा जा रहा था उसे अब देशी माल से चुनौती का सामना करना पड़ेगा। जीएसटी लागू होने के बाद चीनी माल बेचने वाले व्यापारी हमारे टैक्स तंत्र की खामियों का लाभ नहीं ले पाएंगे। भारत के वैश्विक तौर पर लगातार उभरने से चीन की परेशानियां बढ़ती जा रहीं हैं। चीन ने भारत-भूटान के साथ सीमा-विवाद पर नया दांव चला है. चीन ने नक्शा जारी कर भारत और भूटान के अधिकार क्षेत्र वाली सिक्किम सेक्टर की जमीनों पर दावा किया है. चीन ने नक्शे में डोका ला और डोकलाम के भारत-चीन-भूटान के त्रिकोणीय जंक्शन को चिह्नित कर दावा किया है कि 1890 में ब्रिटिश-चीन संधि के तहत यह इलाका उनके अधिकार क्षेत्र में आता है. 2014 में चीन ने अरुणाचलप्रदेश और जम्मू-कश्मीर को अपना अभिन्न अंग बताया था. तब भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी चीन के दौरे पर गए थे. भारत ने तब चीन के इस मानचित्र पर कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कहा था कि नक्शा जारी करने से जमीनी हकीकत नहीं बदलती.

    चीन ने भारत पर दबाव बनाने के लिए नाथू ला की तरफ से मानसरोवर यात्रा पर तो पहले खराब मौसम का बहाना लगाकर रोका, फिर तो सिक्किम क्षेत्र से सेना वापसी की मांग रख दी. इसपर भारत ने नाथू ला वाले मानसरोवर यात्रा को ही स्थगित कर दिया. चीन मोदी-ट्रंप की प्रथम मुलाकात से भी बौखला गया है. यही कारण है कि चीनी मुखपत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ में मोदी-ट्रंप की प्रथम मुलाकात की तीखी आलोचना की. परंतु चीन की बौखलाहट यहीं नहीं रुकी. चीन ने भारत को फिर से 1962 की याद दिलाते हुए चेतावनी देने की कोशिश की, जिसका भारतीय रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने स्पष्ट शब्दों में जवाब दिया कि चीन वर्तमान भारत को 1962 का भारत समझने का भूल न करे.

    एक जुलाई मध्यरात्रि को जिस तरह कर एकीकरण के मूलभूत परिघटना में जीएसटी क्रियान्वित किया गया, वह भारतीय संघवाद के अंतर्गत ‘सहकारी संघवाद’ का एक बहुत बढ़िया उदाहरण है। यह चीन के आक्रामक रवैए का मुंहतोड़ जवाब भी है. जीएसटी के कारण भारत ने सीमा पर बगैर तनाव बढ़ाए चीन को तगड़ी चुनौती दे डाली है।

    जीएसटी के लागू होने से चिरप्रतीक्षित ‘एक राष्ट्र, एक टैक्स’ की अवधारणा क्रियान्वित हो गई है. 15 अगस्त 1947 मध्य रात्रि को देश को अंग्रेजों के प्रत्यक्ष अधीनता से मुक्ति मिली, अब 1 जुलाई 2017 को मध्य रात्रि को संसद के उसी सेंट्रल हॉल से देश को पुराने 17 करों तथा उपकरों से मुक्ति मिली. चीन ने अपने सीमावर्ती क्षेत्र पर उत्कृष्ट आधारभूत संरचनाओं का निर्माण किया है, जबकि संसाधनों के अभाव के कारण भारत-चीन सीमा पर भारतीय क्षेत्र में आधारभूत संरचना का अभाव है. लेकिन जीएसटी लागू होने तथा काला धन पर सरकार के कठोर रवैया से अब सरकार के पास पर्याप्त संसाधन होंगे, जिससे सीमा प्रबंधन पर भी पूर्ण ध्यान दिया जा सकेगा.

    जीएसटी का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे चीन के माल के दबाव से तबाह हो रहे छोटे भारतीय व्यापारी तथा बाजार फिर से सशक्त हो जाएंगे. चीन को सीमा पर लड़े बिना हराने का पूर्ण इंतजाम भी जीएसटी से हो रहा है.

    चीन का सस्ता माल देश की अर्थव्यवस्था को जर्जर कर रहा है. पिछले वर्ष दीपावली से देश में चीनी माल के बहिष्कार का आंदोलन भी चलता रहता है, क्योंकि चीनी माल का आयात होने के बावजूद वह घरेलू निर्माण से सस्ता होता है. सरकार ने इस चीनी लूट से बचने के लिए आयातित एवं घरेलू वस्तुओं पर समान कर लगाने की व्यवस्था कर ली है. जीएसटी लागू होने के बाद चीनी माल अब भारतीय माल से सस्ता नहीं होगा अर्थात् चीन का समान अब भारतीय कारोबारियों की कमर नहीं तोड़ सकेगा.

    राजस्व सचिव हसमुख अढ़िया के अनुसार जीएसटी ‘मेक इन इंडिया’के लिए भी महत्वपूर्ण है. अब तक एक्साइज ड्यूटी के तहत सीवीडी लगाया जा रहा था. उसके अलावा आयातित वस्तुओं पर सिर्फ 4 प्रतिशत स्पेशल एडिशन ड्यूटी (SAD) लगा रहे थे. इस 4 प्रतिशत एसएडी का मतलब यह था कि घरेलू उद्योग को जो वैट देनी पड़ती थी, उसी तरह आयातित को 4% स्पेशल एडिशन ड्यूटी लगाते थे. एक तरह से राज्यों को 14% वैट के बदले में आयातित वस्तु पर 4% एसएडी लगाया जा रहा था. इस तरह स्पष्ट रुप में देख सकते हैं कि घरेलू उद्योगों पर तो कर बोझ 14% था, जबकि आयातित वस्तुओं पर केवल 4%. परंतु जीएसटी आने के बाद घरेलू उद्योगों पर टैक्स का जितना बोझ है, उतना ही आयातित पर भी लगेगा. इससे घरेलू उद्योगों को न केवल बल मिलेगा अपितु भारतीय घरेलू उद्योग भी चीनी माल को आसानी से बाजार में चुनौती दे सकेंगे. इसी कारण पहले आयातित माल सस्ता पढ़ रहा था, जबकि घरेलू महंगा. इससे घरेलू उद्योग चीनी आयातित माल का सामना कर सकेंगे.

    इसी तरह पहले ‘सी’ फॉर्म भरकर व्यापारी सीएसटी में इंटरस्टेट ले जाने की जानकारी देते थे, लेकिन वह माल दूसरे राज्य जाता ही नहीं था, बल्कि उसी राज्य में बेच दिया जाता था. इस तरह व्यापारी केवल 2 प्रतिशत टैक्स देकर काम चला लेता था तथा राज्य के 14% वैट से बचा रह जाता था. अब जीएसटी में यह संभव नहीं है. अब अगर दूसरे राज्य ले भी जाना है, तो उसे पूरा का पूरा टैक्स भरना होगा. राजस्व सचिव के अनुसार 2% के दर से भी राज्यों के राजस्व में कम से कम 50-60 हजार करोड़ बचेंगे, जिसका प्रयोग पुन: राष्ट्र निर्माण हेतु अवश्य हो सकेगा.

    इसके अतिरिक्त जीएसटी से देश में निवेश में वृद्धि होगी तथा निवेश की गई राशि का भी ‘मेक इन इंडिया’ के लिए अधिकतम प्रयोग हो सकेगा. विदेशी निवेश के क्षेत्र में भी अब भारत चीन को कड़ी चुनौती दे सकेगा. इस तरह जीएसटी से जहां भारत में चीनी माल के लिए प्रतिस्पर्धा कठोर होगा, वहीं निवेश में भी चीन को कड़ी चुनौती मिलेगी.

    जीएसटी से देश एक आधुनिक कर प्रणाली की ओर आगे बढ़ रहा है जो पारदर्शिता के साथ काले धन और भ्रष्टाचार को रोकने का अवसर प्रदान करती है. सरकार ने कालाधन, जमाखोरी पर कार्रवाई करने हेतु एक चक्रव्यूह की रचना की है, जिसका असली दरवाजा जीएसटी ही है. विदेश में जमा कालाधन पर प्रहार के बाद नोटबंदी ने कैश गुमनामी को खत्म किया. पैन को आधार से जोड़ने का का भी क्रांतिकारी परिणाम भविष्य में दिखने को मिलेगा. इसके अतिरिक्त सरकार ने बेनामी कानून में संशोधन करके भी भ्रष्टाचार पर कड़ी चोट की है।(चौक साभार)

  • कांग्रेस को तमाचे में चमके सिंधिया

    कांग्रेस को तमाचे में चमके सिंधिया

    -आलोक सिंघई-
    सागर में कलेक्ट्रेट का घेराव कर रहे उद्दंड कार्यकर्ताओं को नसीहत देने के बहाने नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल भैया ने एक कार्यकर्ता के गाल पर थप्पड़ रसीद कर दिया। कांग्रेस के इस प्रदर्शन को नेतृत्व देने के लिए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव भी पहुंचे थे। ज्योतिरादित्य सिंधिया खेमे के प्रतिनिधि कहे जाने वाले गोविंद सिंह भी घटना स्थल पर मौजूद थे। अचानक घटित इस घटनाक्रम से सभी भौंचक्के रह गए। सत्ता से बेदखली के बरसों बाद किसान आंदोलन के सहारे सक्रिय कांग्रेस इन दिनों बदली बदली नजर आ रही है। हर एक कार्यकर्ता का अभिनंदन किया जा रहा है। सारे नेतागण उन्हें लाड़ प्यार से सहेज रहे हैं क्योंकि भाजपा के लंबे शासनकाल के बाद कार्यकर्ताओं को सहेजना एक चुनौती हो गया है। ऐसे माहौल में जब आज कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का जन्मदिन है तब सागर में कार्यकर्ता को पड़ा नेता प्रतिपक्ष का तमाचा कई संकेत दे रहा है। कांग्रेस हाईकमान को इसका आशय समझना होगा। राजनीतिक हलकों में ये तमाचा कांग्रेस की मौजूदा हालत का पूरा सच बयान कर रहा है।

    कांग्रेस शुरु से संगठन विहीन राजनीतिक दल रहा है। कभी कांग्रेस को संगठित करने का प्रयास दिल से नहीं किया गया। जितने भी अधिवेशन हुए वे नेताओं के इर्द गिर्द हुए और उन्हीं के माध्यम से कांग्रेस सत्ता हासिल करती रही है। जब किसी नए नेता का उदय होता है तब कार्यकर्ताओं की आस्थाएं बदल जाती हैं। वे जुगाड़ जमाकर नेता के इनर सर्किल में पहुंचते हैं और अपने वाजिब गैर वाजिब काम करवाकर अपनी आस्था की फीस वसूलने का जतन करते हैं। जो इसमें सफल हो जाता है वो थोड़ा बड़ा कार्यकर्ता बन जाता है। जो असफल रहता है वो छुटभैया नेता के रूप में चंदा वसूली में जुट जाता है। कांग्रेस का यही संगठन देश में अराजकता और धींगामुश्ती का पर्याय रहा है। इन हालात को समझते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं को भारतीय जनता पार्टी में भेजा। प्रशिक्षण संवर्गों का आयोजन किया। कार्यकर्ताओं को संस्कारित करने का अभियान चलाया। उन्हें समाजसेवा का धर्म सिखाया। बोलना सिखाया। फिर उन्हें भाजपा में नेतृत्व दिलाने का प्रयास भी किया। ये बात अलग है कि उनमें से अधिकतर प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं को बाद में सत्ता के मद ने गुमराह भी किया। इसके बावजूद भाजपा में आज बड़ी संख्या में ऐसे कार्यकर्ता भी हैं जो राजनीति या समाजसेवा को देश सेवा के धर्म से जोड़कर देखते हैं।

    ऐसा नहीं कि कांग्रेस में सारे के सारे चोर, मक्कार, अराजक, गुंडा तत्व हैं। कांग्रेस के कार्यकर्ता भी भारतीय परिवेश में ही पले बढ़े हैं। वे जानते हैं कि समाज को एकजुट रखने के लिए हमें अपना आचरण कैसा रखना चाहिए। हमारी भूमिका क्या और हमारे दायित्व क्या हैं, हमारी सीमाएं क्या हैं ये भी समय समय पर कांग्रेस के नेता अपने कार्यकर्ताओं को सिखाते रहते हैं। सागर में कांग्रेस कार्यकर्ता को पड़ा तमाचा भी कुछ इसी तरह का प्रशिक्षण संवर्ग का हिस्सा कहा जा सकता है। हाल ही में मंदसौर में कांग्रेस पर किसान आंदोलन में हिंसा भड़काने का आरोप लगा है। पूरे देश में कांग्रेस को किसान आंदोलन का खलनायक माना जा रहा है। इन हालात में कांग्रेस को फूंक फूंककर कदम रखने की जरूरत है। जाहिर है कि अजय सिंह अपनी मौजूदगी में किसी भी किस्म की अराजकता का लांछन नहीं झेलना चाहते हैं। उन्होंने कांग्रेस के नेता से माला पहिनने का आग्रह ठुकराया या एक कार्यकर्ता को थप्पड़ रसीद कर दिया इससे उनकी मनःस्थिति और कांग्रेस की अंतर्कलह की आहट को साफ तौर पर सुना जा सकता है।

    राहुल गांधी के जन्मदिन पर राहुल भैया अजय सिंह का ये थप्पड़ कांग्रेस को सबक सिखाने से ज्यादा खुद को पाक साफ रखना ज्यादा प्रतीत होता है। साथ में हाईकमान के लिए संकेत भी है कि वो अपने राजनैतिक विरोधियों के जाल में फंसने वाले नहीं हैं। सुरखी के पूर्व विधायक गोविंद सिंह ज्योतिरादित्य खेमे के प्रतिनिधि माने जाते हैं। कभी उन्होंने प्रदेश की ठाकुर लाबी से भी करीबी स्थापित करने की कोशिश की थी। बाद में उन्होंने सिधिया खेमा पकड़ लिया। हालांकि इसके बावजूद वे दिग्विजय सिंह खेमे के माध्यम से भी अपनी सत्ता का परचम फहराते रहे हैं। उनकी पिछली पराजय अर्जुनसिंह खेमे के खास सहयोगी संतोष साहू की बेटी के हाथों हुई थी। उनकी बेटी पारुल साहू केशरी ने भाजपा के प्रत्याशी के तौर पर 2013 का विधानसभा चुनाव लड़ा और टसल के बीच गोविंद राजपूत को हराकर विधानसभा पहुंची।पारुल साहू के भाजपा में जाने से कांग्रेस की शक्ति घट गई और तमाम राजनीतिक हथकंडे अपनाने के बाद भी गोविंद ये चुनाव हारे थे। भाजपा के पास लगातार सत्ता से पोषित हो चुके गोविंद सिंह को हराने लायक प्रत्याशी था भी नहीं इसलिए उसके सलाहकारों ने कांटे से कांटा निकालकर सुरखी सीट पर अपना परचम फहराया था।

    अब गोविंद राजपूत के सामने अपने बिखरी शक्ति एक बार फिर सहेजने की चुनौती है। इसलिए उन्होंने आज के प्रदर्शन में अजय सिंह को आमंत्रित किया था। अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि अजय सिंह को खबर मिली थी कि इस प्रदर्शन को हिंसक बनाकर उन्हें कलंकित करने की तैयारी की जा रही है। उन्हें पता था कि उनके हर कदम की वीडियो ग्राफी भी होगी। इसके बावजूद उनकी भावनाएं उनकी गतिविधियों से साफ उजागर हो गईं। जब कांग्रेस के कार्यकर्ता सर्किट हाऊस में अजय सिंह का स्वागत कर रहे थे तब उन्होंने कार्यकर्ताओं से फूलों के गुलदस्ते तो स्वीकार कर लिए पर एक कांग्रेसी नेता संदीप सबलोक की माला ये कहते हुए पहिनने से इंकार कर दिया कि वे माला नहीं पहिनते। इस घटना का भी वीडियो जल्दी ही वायरल हो गया। इसी तरह जब वे आंदोलन कर रहे कार्यकर्ताओं को पुलिस बैरिकेड तोड़ने से रोक रहे थे तभी उन्होंने एक कार्यकर्ता को झांपड़ रसीद कर दिया। अजय सिंह फूंक फूंककर कदम रख रहे थे लेकिन कांग्रेस कार्यकर्ता को मारे गए थप्पड़ ने सारे किए धरे पर पानी फेर दिया। उनके विरोधियों का मकसद भी यही था जिसमें वे बहुत हद तक सफल भी हो गए।

    इस घटनाक्रम से कांग्रेस की अंदरूनी उथल पुथल की झलक साफ देखी जा सकती है। पहली बात तो ये है कि संगठित और प्रशिक्षित भारतीय जनता पार्टी से मुकाबला करने में आज भी कांग्रेस मीलों दूर खड़ी है। स्व. सुभाष यादव की विरासत पर काबिज उनके सुपुत्र अरुण यादव कांग्रेस के पुराने संगठन की कमान तो संभाल चुके हैं लेकिन वे नवागत कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देने में बुरी तरह नाकामयाब साबित हुए हैं। वास्तव में ये उनके बस की बात भी नहीं है। कांग्रेस में जब किसी को कोई जवाबदारी दी जाती है तो पार्टी की तरफ से उसे रसद पानी उपलब्ध नहीं कराया जाता है। गुटों में बंटी कांग्रेस के नेतागण सत्ता की शक्तियां अपने गुटों तक ही समेटकर रखते हैं। जाहिर है अरुण यादव सफल हों ये कोई नहीं चाहता। कांग्रेस के आम कार्यकर्ताओं का मानना है कि सुभाष यादव ने अपने कार्यकाल में अपेक्स बैंक और सहकारिता आंदोलन के माध्यम से भरपूर संसाधन जुटा लिए थे। पार्टी आलाकमान भी ये अपेक्षा रखता है कि अब अरुण यादव उस विरासत को संभाल रहे हैं तो वे अपने हाथ खुले रखकर संगठन को संवारने का काम करेंगे। हाल ही में खलघाट पर कांग्रेस के प्रदर्शन ने भी पार्टी की आपसी सिर फुटौव्वल को बढ़ावा दिया। इस प्रदर्शन में किसान तो पहुंचे ही साथ में कमलनाथ, दिग्विजय सिंह,ज्योतिरादित्य सिंधिया,सुरेश पचौरी, भी पहुंचे। अरुण यादव के प्रचार तंत्र ने इस आंदोलन में से कथित तौर पर अजय सिंह को गायब करने की कोशिश की। जाहिर है कि अब सागर की घटना ने उनकी ही परीक्षा कापी में सवालिया निशान लगा दिया है। हाईकमान तक ये संकेत पहुंच चुका है कि अराजकता का आरोप झेल रही कांग्रेस को संगठित और प्रशिक्षित करने का काम अब तक सिफर ही है।

    राजनीति के इस दांव पेंच के बीच अजय सिंह से जुड़े सूत्र कह रहे हैं कि उन्होंने कार्यकर्ता को झांपड़ नहीं मारा। उनकी इस बचकानी सफाई पर भला कोई यकीन भी कैसे करे। जब इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया हो तब उनकी ओर से आई इस सफाई का कोई मतलब ही नहीं है। अजय सिंह को स्वीकारना ही पड़ेगा कि उन्होंने अराजक कार्यकर्ता को समझाने के लिए थप्पड़ की भाषा का इस्तेमाल किया था। अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदियों के बिछाए जाल को काटने के फेर में अजय सिंह एक छोटी सी गलती कर गए हैं जो उनके राजनैतिक बायोडाटा में दर्ज भी हो गई है। ज्योतिरादित्य सिंधिया को अब तक कांग्रेस हाईकमान ने पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री का अधिकृत चेहरा घोषित नहीं किया है। इसके बावजूद कांग्रेस के कार्यकर्ता सिंधिया की ओर आशा भरी निगाहों से देखने लगे थे। अजय सिंह के थप्पड़ ने कार्यकर्ताओं उस अभिलाषा को और हवा दे दी है।

  • शिवराज की पुंगी बजाने मैदान में उतरा सिंधिया राजघराना

    शिवराज की पुंगी बजाने मैदान में उतरा सिंधिया राजघराना

    -आलोक सिंघई-
    अटेर उपचुनाव में सिंधिया सल्तनत को चुनौती देना मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को मंहगा पड़ रहा है। किसानों की आड़ लेकर मुख्यमंत्री की हूटिंग शुरु होते ही उनके विरोधी जिस तरह लामबंद नजर आ रहे हैं उससे भाजपा हाईकमान चौंक गया है। सूत्र बताते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम पर प्रधानमंत्री सचिवालय सीधे नजर रखे हुए है । अपने साम्राज्य के सबसे मजबूत किले को ढहने से बचाने के लिए उसने रणनीति बदलने का मन बना लिया है। चूके चौहान साबित होने जा रहे शिवराज जी के विरोध में फूटी कांग्रेस अपने सत्ता आग्रह का स्वप्न साकार होता देखने लगी है। हालांकि तमाम अंतर्विरोधों के बाद भी भाजपा के रणनीतिकार विरोध के इस दावानल को शांत करने में जुट गए हैं पर उनके हर पांसे इस बार उलटे पड़ते दिखाई दे रहे हैं।

    सत्ता के तीन साल का उत्सव मनाती केन्द्र की भाजपा सरकार को मध्यप्रदेश में असंतोष के भंवर का सामना करना पड़ रहा है। इसका जवाब हाईकमान के पास तो है लेकिन वह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को हटाकर कोई नई मुसीबत मोल नहीं लेना चाहता। इसका मतलब ये भी नहीं कि शिवराज को केन्द्र की क्लीनचिट मिल चुकी है। फिलहाल तो राष्ट्रपति चुनाव की तैयारियों पर अपना ध्यान केन्द्रित करके मोदी सरकार अपने पांव मजबूत करने में जुट गई है। जबकि इधर शिवराज सरकार को संगठन की ओर से भरपूर संरक्षण दिया जा रहा है। इन सबके बीच भाजपा संगठन की राज्य इकाई भी निशाने पर आ गई है। भाजपा के भीतरी असंतोष ने संगठन की खिल्ली उड़ाना भी शुरु कर दिया है। जाहिर है कि निकट भविष्य में मुख्यमंत्री के साथ साथ प्रदेश भाजपा संगठन को भी अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा।

    अटेर उपचुनाव में जब भाजपा प्रत्याशी अरविंद भदौरिया लगभग आठ सौ वोट के मामूली अंतर से पराजित हुए तब किसी ने ये नहीं समझा था कि मुख्यमंत्री की फिसली जुबान भाजपा का सुख चैन भी छीन सकती है। बंदूक से निकली हुई गोली कभी वापिस हुई है। संगठन की तमाम लीपापोती के बाद भी पार्टी के खांटी नेता इस टीस को नहीं भुला पा रहे हैं। श्री चौहान ने तब सिंधिया घराने पर तंज कसते हुए कहा था कि स्वाधीनता संग्राम के दौर में सिंधिया राजघराने के लोगों ने अंग्रेजों के साथ मिलकर अटेर के आसपास के उन लोगों को काफी सताया जो वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का साथ दे रहे थे। इतिहास बदला नहीं जा सकता पर उस पर चिंतन मनन तो जरूर किया जा सकता है। शिवराज जी को भी चिंतन मनन का उतना ही अधिकार है जितना कि हर देश भक्त को है। प्रयास चिंतन का नहीं बल्कि लांछन का था। शिवराज जी और उनके सलाहकारों का सोचना था कि ऐसा बोलकर वे महारानी लक्ष्मीबाई की लोकप्रियता को सहलाकर अपने पक्ष में भुना पाएंगे। इसका असर ठीक उलटा हुआ। मनोविज्ञान को समझे बगैर किताबी अंदाज में की गई इस टिप्पणी ने न केवल कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया को भड़का दिया बल्कि भाजपा की जन्मदात्री लाबी को भी आहत कर दिया। बताते हैं कि इस बयान की पृष्ठभूमि में कई समीकरण बनते बिगड़ते रहे।

    सत्ता केन्द्र से लगातार बेदखली झेल रही कांग्रेस इस अवसर को भुनाने के लिए झट से ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ आ खड़ी हुई । सिंधिया किसानों के न्याय का झंडा लेकर अपने घराने के अपमान का बदला लेने निकल पड़े हैं जबकि सत्ता की सामूहिक लूट करके भाग निकले कांग्रेसी अपनी ऐशगाहों से निकलकर सिंधिया के बगलगीर होने लगे हैं। ऐसा नहीं कि कांग्रेसियों ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को अपना नेता मान लिया है बल्कि वे उस जहाज पर सवार होकर सत्ता संधान का स्वप्न देख रहे हैं जिसका ईंधन भाजपा के असंतोष के कुएं से निकला है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके कैलाशवासी सलाहकार सुंदरलाल पटवा की एकांगी राजनीति ने भाजपा के कई दिग्गजों को घायल कर रखा है। इनमें केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर, पंचायत मंत्री गोपाल भार्गव, श्रीमंत यशोधरा राजे सिंधिया, श्रीमती माया सिंह,विजय शाह, पूर्व मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, बाबूलाल गौर, प्रभात झा, कमल पटेल,लक्ष्मीकांत शर्मा जैसे और भी कई दिग्गज इनमें शामिल हैं। इनमें पूर्व वित्तमंत्री राघवजी भाई का प्रत्यक्ष हस्तक्षेप भले ही न दिखाई दे रहा हो पर विद्रोह को भड़काने में सुंदरलाल पटवा के विरोधियों की नाराजगी की भी बड़ी भूमिका है। श्री राघवजी भाई जैसे सफल वित्तमंत्री के मार्गदर्शन में भाजपा सरकार ने सत्ता शीर्ष के बड़े सोपान पार किए थे लेकिन व्यक्तिगत रंजिश के चलते स्व. सुंदरलाल पटवा ने कथित तौर पर शिवराज सिंह चौहान के माध्यम से राघवजी भाई का राजनीतिक वध कर डाला था।पटवा स्व. अर्जुनसिंह खेमे के नजदीक माने जाते थे और राघवजी सिंधिया राजघराने के साथ खड़े होते थे। इस कदम ने भी सिंधिया सल्तनत की गौरवगाथा को कलंकित किया था। मामला चूंकि कथित तौर पर चरित्रहीनता से जुड़ा था इसलिए तब राघवजी भाई का साथ देने कोई आगे नहीं आया।

    विदेशी निवेश को आमंत्रित करने में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जिन इन्वेस्टर समिटों की श्रंखला चलाई उन्हें सफल बनाने में तत्कालीन उद्योगमंत्री श्रीमती यशोधरा राजे सिंधिया की भी बड़ी भूमिका थी। विदेशों में बसे उद्योगपतियों को राजी करके मध्यप्रदेश में लाने के लिए सिंधिया घराने ने अपनी पुरानी साख का इस्तेमाल किया लेकिन बाद में श्री चौहान ने कथित तौर पर उन उद्योगपतियों पर पार्टी के नियम लाद दिए जिससे यशोधरा जी और शिवराज जी के बीच दूरियां बढ़ गईं। नतीजतन यशोधरा जी को प्रदेश का वैभव संवारने की इस मुहिम से किनारे कर दिया गया।

    श्री चौहान ने अपनी खीज मिटाने के लिए जिस तरह अटेर में सिंधिया के पूर्वजों पर हमला बोला उससे तो ये दूरियां खाई में बदल गईं। कांग्रेस की लूट और प्रताड़ना से तंग होकर भाजपा को सींचने वाली राजमाता स्व. विजयाराजे सिंधिया से जुड़े भाजपा के दिग्गज रणनीतिकारों ने भी इस बयान को उचित नहीं माना। उनका कहना था कि पूर्वजों ने यदि कोई गलती की भी थी तो उसके लिए क्या वर्तमान के समर्पित जनसेवकों को लांछित किया जाना चाहिए। जबकि राजमाता के त्याग और समर्पण ने भाजपा को आज इस मुकाम तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई हो। गौरतलब है कि गुलाम भारत में अंग्रेजों से सरेआम लोहा लेकर कोई भी सल्तनत अपने नागरिकों को सुरक्षित नहीं रख सकती थी। तात्याटोपे और लक्ष्मीबाई के साथ सिंधिया राजघराना भी अंग्रेजों से पिंड छुड़ाना चाहता था। इसकी रणनीति भी बनाई गई पर लक्ष्मीबाई की बैचेनी और एकला चलो की रणनीति ने इसे घाटे का सौदा बना दिया। लक्ष्मीबाई तो शहीद हो गईं पर उनकी रियाया को अंग्रेजों ने बहुत प्रताड़ित किया। ये बात सच है , लेकिन कांग्रेस के नेताओं ने जिस तरह इसके लिए सिंधिया राजघराने को दोषी ठहराया उसके चलते आज तक सिंधिया के वारिसों को कलंक का सामना करना पड़ रहा है।

    एक समय तो वो भी आया जब श्रीमती इंदिरा गांधी ने सिंधिया राजघराने को मटियामेट करने के लिए अपने खास सिपहसालार अयोध्यानाथ पाठक को ग्वालियर भेजा था। पाठक ने पुलिस अफसर रहते हुए सिंधिया घराने के प्रमुख दीवानों और मालगुजारों की हत्याएं करने का अभियान चला दिया। उन पर आपराधिक मुकदमे बनाए गए। उनके खजाने लूटे गए और सरेआम हत्याएं कर दीं गईं।पाठक को श्रीमती गांधी ने सात सात गैलेन्ट्री अवार्डों से सम्मानित किया। इस लूट से बैचेन होकर स्व. विजयाराजे सिंधिया ने अपने संसाधनों का इस्तेमाल करके भाजपा को कांग्रेस की चुनौती के रूप में तैयार किया था। वे खुद जगह जगह दौरे करतीं और भाजपा के संगठन की नींव मजबूत करती थीं। आज उसी भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ सिंधिया घराने को विद्रोह का शंखनाद करना पड़ रहा है। मजेदार बात तो ये है कि शिवराज सिंह को विरोध के लिए तैयार करने में षड़यंत्रकारी दिग्विजय सिंह ने बड़ी भूमिका निभाई है। दिग्विजय सिंह का परिवार कभी सिंधिया सल्तनत का कारिंदा रहा है। शिवराज सिंह चौहान के सलाहकारों में अपने भेदियों की घुसपैठ कराकर दिग्विजय सिंह ने कथित तौर पर अयोध्यानाथ पाठक के बेटे विकास पाठक को पुलिस मुख्यालय में एआईजी एकाऊंट के पद पर पदस्थ करवा दिया। पुलिस की पुरानी फाईलें खोलकर सिंधिया सल्तनत के प्रमुख सूत्रधारों पर लगाम कसी जाने लगी। जाहिर है एक बार फिर सिंधिया राजघराने को एकजुट होकर मैदान में लामबंद होना पड़ा है। इस फैसले में सिंधिया राजघराने के सभी दिग्गज शामिल हैं। फिर चाहे वे कांग्रेस में हों या भाजपा में।

    किसान आंदोलन के नाम पर कर्ज माफी की आवाज उठाने वाले उद्योगपति हों या फिर जीएसटी के कारण काली कमाई बंद होने से भयाक्रांत व्यापारी, सभी सिंधिया के इस संग्राम में साथ आ जुटे हैं। वे ज्योतिरादित्य सिंधिया को भले अपना नेता न मानें लेकिन वे शिवराज सिंह चौहान को उखाड़कर अपना शक्तिप्रदर्शन जरूर करना चाहते हैं। शिवराज सिंह चौहान की घोषणाओं के बावजूद रोजगार और लाभ से वंचित आम जनता भी इस अभियान में दर्शक के रूप में जुटने लगी है। कांग्रेसियों को इससे अपना भविष्य उज्जवल होता नजर आ रहा है। दिग्विजय सिंह की नाकाम सरकार से नाराज प्रदेश की जनता आज भी कांग्रेस को नेतृत्व देने तैयार नहीं है पर ज्योतिरादित्य सिंधिया की भूमिका से भाजपा को बड़ी क्षति पहुंचने की संभावना जरूर बनती नजर आ रही है।

  • किसान आंदोलन ने राजनीतिक सर्जरी की राह सुझाई

    किसान आंदोलन ने राजनीतिक सर्जरी की राह सुझाई

    -आलोक सिंघई-
    देश को प्रखर राष्ट्रवाद की बुलंदियों पर ले जाने का संकल्प करने वाली भारतीय जनता पार्टी की शिवराज सिंह चौहान सरकार अपने प्राण बचाने के लिए गांधीवाद की बैसाखियां तलाश रही है। प्रदेश में भड़के किसान आंदोलन को शांत करने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान राजधानी के भेल दशहरा मैदान पर अनशन कर रहे हैं। हर जिले से लाए गए किसानों के प्रतिनिधिमंडल उनसे मुलाकात कर रहे हैं और कृषि विस्तार की दिशा में किए गए भारतीय जनता पार्टी सरकार के कार्यों से अपनी सहमति जता रहे हैं। जो किसान कल तक कथित तौर पर अपनी मांगों को लेकर आगजनी कर रहे थे वे इस टैंट में आकर अपनी भूल सुधार करने का संकल्प दोहरा रहे हैं। हालांकि आंदोलन का व्यापक आव्हान करने वाले राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ ने अनशन पर बैठे शिवराज को जेल भरो आंदोलन से करारा जवाब देने का फैसला लिया है पर फिलहाल प्रदेश में हिंसा का दौर जरूर थमता नजर आने लगा है।

    मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से अनशन स्थल पर चार बजे तक लगभग 15 बड़े और 234 छोटे किसान संगठनों ने मुलाकात की। हर संगठन ने एक मिनिट में अपनी समस्या मुख्यमंत्री को बता दी और उनसे समाधान का आश्वासन भी प्राप्त कर लिया। इस दौरान मुख्यमंत्री के मंत्रीमंडलीय सहयोगी भी वहीं मौजूद थे जिन्होंने विधायकों के साथ आए किसान प्रतिनिधियों का स्वागत किया। किसी भी हिंसक आंदोलन का इतना तेज समाधान आजादी की लड़ाई के दौरान खुद गांधीजी भी नहीं कर सके थे। मुख्यमंत्री का ये प्रयास निश्चित तौर पर भाजपा के प्रखर राष्ट्रवाद के लिए एक गहरा सबक साबित होने जा रहा है।

    मुख्यमंत्री श्री चौहान अपने राजनीतिक आका लालकृष्ण आडवाणी से करीबी के लिए जाने जाते हैं। स्व. प्रमोद महाजन ने श्री आडवाणी की इच्छा को देखते हुए ही श्री चौहान को मध्यप्रदेश की सत्ता पर आरूढ़ करवाया था। जाहिर है कि ये सरकार श्री आडवाणी के प्रखर राष्ट्रवाद को साकार करने के लिए ही भेजी गई थी। प्रदेश की जनता ने कांग्रेस के निष्कासन के जनादेश के बाद सत्ता भाजपा को सौंपी थी , भाजपा को पूरा अवसर भी मिला कि वह अपने राष्ट्रीय नेता की विचारधारा को सफल बनाए पर लगभग बारह सालों के शासन के बाद भी राष्ट्रवाद की ये परिभाषा गांधीवाद के वेंटीलेटर पर जीवन संघर्ष कर रही है। प्रदेश की जनता जानना चाहती है कि किसान आंदोलन की असली वजह क्या थी और अनशन ने उसे शांत करने में कैसे बडी भूमिका निभाई।
    विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के विधायक अजय सिंह ने आज पत्रकार वार्ता बुलाकर सरकार को भंग करने और राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की है। उनका कहना है कि सरकार को किसानों की समस्याओं का समाधान करना चाहिए। इसमें यदि कांग्रेस की कोई भूमिका हो तो वे उसे भी निभाने तैयार हैं। उनका कहना था कि इस मामले पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खामोश हैं। जाहिर है कि ये आंदोलन भारतीय जनता पार्टी के अंदरूनी सत्ता संघर्ष की उपज है।

    बात बहुत हद तक सही भी है। किसानों के इस आंदोलन को भाजपा के भीतर से भी बल मिलता रहा है। राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के अध्यक्ष पं. शिवकुमार शर्मा उर्फ कक्काजी खुद भाजपा के सहयोगी भारतीय किसान संघ के सदस्य रहे हैं। खासतौर से पंचायत एवं ग्रामीण मंत्री पं. गोपाल भार्गव से उनकी करीबी रही है। इस आंदोलन में सबसे बड़ी भूमिका तो ग्रामीण पृष्ठभूमि में राजनीति करने वाले नेताओं ने निभाई है।भाजपा के पूर्व संगठन महामंत्री और वर्तमान में राज्यपाल कप्तानसिंह सोलंकी ने कांग्रेस के अपदस्थ किए गए पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के साथ एक गुप्त अनुबंध किया था। जिसके चलते दिग्विजय सिंह के तमाम समर्थकों को भाजपा में जगह दी गई थी। ये पूरी फौज गांवों से ही आती थी और पंचायती राज व्यवस्था के दौरान दिग्विजय सिंह के लिए कार्य करती थी। श्री सोलंकी ने इसे भाजपा का जनाधार बढ़ाने वाला कदम बताया और उनका पंचायती राज नई सरकार में भी कायम रहा। इस समझौते के चलते ही पंचायतों को सत्कार फंड दिया जाने लगा जो बाद में पंचायतों के नेताओं का जेबखर्च बन गया। तमाम सरकारी योजनाओं को लागू करने में भी इन्हीं जन प्रतिनिधियों को प्राथमिकता दी गई। गांवों की राजनीति में सिद्धहस्त इन नेताओं ने भाजपा के कार्यकर्ताओं को भी अपने साथ मिला लिया और सरकारी योजनाओं को डकारने की मुहिम शुरु हो गई।

    सत्ता के तीसरे कार्यकाल मेंजब हाईकमान ने अनापशनाप फंड देने की परंपरा बंद कर दी तब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को ये गड़बड़ झाला समझ में आ चुका था। उन्होंने खुर्राट आईएएस अफसर आर.एस.जुलानिया के माध्यम से पंचायतों को दिए जाने वाले तमाम फंड रोक दिए। सबसे पहले तो सत्कार भत्ता रोका गया जिससे पंचायतों के बड़े दिग्गजों का जेबखर्च बंद हो गया। पंचायत सचिवों के माध्यम से हितग्राहियों का इतना सख्त परीक्षण कराया गया कि किसी भी योजना के लिए पात्र होना टेढ़ी खीर हो गया। भारी भ्रष्टाचार का सबब बनी प्रधानमंत्री रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को बंद कर दिया गया। इस बजट से दूसरे जमीनी काम काज कराए जाने लगे। हालांकि पंचायत मंत्री गोपाल भार्गव भी इससे बहुत खफा हुए क्योंकि यही योजना उनकी अवैध कमाई का बड़ा आधार बन चुकी थी। कुछ समय पहले पंचायत सचिवों और उनके सहयोगियों ने राजधानी भोपाल में आकर प्रदर्शन भी किया था लेकिन सरकार ने उसे सख्ती से दबा दिया। श्री जुलानिया ने तो पंचायत मंत्री के सामने ही मांगों की फाईल फेंककर अपनी नाराजगी भी जताई थी। इसके बाद श्री भार्गव और उनके समर्थकों ने सोचा कि पुरानी कमाई की योजनाओं को जारी रखने के लिए मुख्यमंत्री को झुकाया जाना जरूरी है। यही वजह थी कि किसान नेता कक्काजी के हाथ मजबूत कर दिए गए। तय किया गया कि आंदोलन तय समय पर पूरे प्रदेश में होगा। जैसे ही इस गुप्त समझौते की सूचना अफीम माफिया से जुड़े कम्युनिष्ट नेता अनिल यादव को मिली उन्होंने सरकार के खिलाफ विद्रोह का ऐलान कर दिया। उनके साथ मैदान में उतरे नशा तस्करों ने मोर्चा संभाला और नतीजा गोलीकांड के रूप में सामने आया। मंदसौर के तत्कालीन कलेक्टर स्वतंत्र कुमार ने गंभीरता को समझते हुए एसएएफ की जगह सीआरपीएफ को भेजकर दंगे पर त्वरित काबू पाने का प्रयास किया लेकिन जब हिंसा पर उतारू कथित किसानों ने उन पर ही हिंसक हमला कर दिया तो मैदानी अधिकारियों को गोलीकांड का सहारा लेना पड़ा। इसका कलंक झेल रही शिवराज सिंह चौहान सरकार को इंतजार है कि मामले की जांच रिपोर्ट सामने आ जाए ताकि वो अपना दाग धो सके। अनशन इसी श्रंखला से उपजा कदम है।

    कथित किसान आंदोलन की दूसरी सबसे बड़ी वजह बिजली सुधार थी। गांव का किसान सिंचाई के सीजन में तीन महीने के लिए बिजली का अस्थायी कनेक्शन लेता था जिसके लिए उसे लगभग बारह हजार रुपए का बिजली बिल चुकाना पड़ता था। अब नए हालात में मुख्यमंत्री स्थायी कृषि पंप योजना प्रारंभ कर दी गई। जिसमें प्रति हार्सपावर 1400 रुपए का बिल चुकाना पड़ता है। यदि किसान का पंप पांच हार्सपावर का है तो उसके लिए उसे चौदह हजार रुपए का बिल देना पड़ेगा। ये बिल उन्हें वर्ष के दौरान दो किस्तों में चुकाना था। किसानों को ये बढ़ी रकम देना मंजूर नहीं था और वे इस आंदोलन में कूद पड़े। फीडर विभक्तीकरण के बाद रहवासी इलाकों में बिजली की चोरी नहीं रोकी जा सकी है। इसलिए बिजली वितरण कंपनियों ने वहां स्थायी और अस्थायी कनेक्शन देना लगभग बंद कर दिया। जिनके घरों पर कनेक्शन लगे हैं उनके लिए हजारों रुपयों के बिजली बिल भेजे गए । उन ग्रामीणों का तर्क था कि जब हम बिजली का बिल ईमानदारी से देने के लिए तैयार हैं तो हमसे चोरी की गई बिजली का दाम क्यों वसूला जा रहा है। मांग वाजिब थी जिसने किसानों को भड़काने में बड़ी भूमिका निभाई। ये बात बिजली वितरण कंपनियों की बैठकों में पहले ही रखी जा चुकी थी। सरकार के दोनों अपर मुख्य सचिवों इकबाल सिंह बैंस और राधेश्याम जुलानिया ने जब चोरी गई बिजली के दाम सरकार की ओर से चुकाए जाने का प्रस्ताव खारिज कर दिया तो बिजली कंपनियों ने किसानों को खुली छूट दी कि वे जाकर सरकार से बात करें। बिजली चोर किसानों और ग्रामीणों को भड़काने में तीनों बिजली वितरण कंपनियों के प्रबंध संचालकों ने बड़ी भूमिका निभाई। पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के प्रबंध संचालक आकाश त्रिपाठी ने इंदौर और इसके आसपास के किसानों को आंदोलन के लिए उकसाया जिसका नतीजा पूरे मालवांचल में देखने मिला। पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के प्रबंध संचालक और मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी ने भी किसानों को उकसाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हालांकि मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के नवागत प्रबंध संचालक एम सेलवेन्द्रम तो अभी अपनी कंपनी की अंदरूनी कहानी समझने का प्रयास ही कर रहे हैं। पर इतना जरूर कहा जा सकता है कि बिजली सुधारों की नई व्यवस्था ने सब्सिडी के आदी हो चुके किसानों को भड़कने के लिए पर्याप्त चिंगारी सुलगाई।

    इस पूरे एपीसोड में मध्यप्रदेश पुलिस के खुफिया तंत्र की पोल भी खुल गई। पुलिस की ये विंग आज भी जन चर्चा के पुराने तरीकों को ही अपने अनुसंधान का केन्द्र बनाती है। उसके अफसर तेज बढ़ते मध्यप्रदेश और यहां की अर्थव्यवस्था के अनुरूप वैज्ञानिक अनुसंधान करने में फिसड्डी साबित हो रहे हैं। यही वजह है कि दंगों की चिंगारी पिछले तीन महीनों से सुलगते रहने की भनक भी पुलिस को नहीं मिल सकी। पुलिस की एसएएफ इकाईयां आपातकाल के लिए तैयार नहीं थीं इसलिए मंहगी कीमत चुकाकर रतलाम कलेक्टर को सीआरपीएफ की सेवाएं लेनी पड़ीं।

    यही हाल एक लाख पचासी हजार करोड़ के बजट वाले प्रदेश के सूचना संवाद तंत्र का रहा है। साढ़े सात करोड़ लोगों से संवाद करने के लिए जनसंपर्क विभाग के माध्यम से पांच हजार से अधिक पत्रकारों को अधिमान्यता दी गई है। दिग्विजय सिंह की सरकार पत्रकारों पर चालीस करोड़ रुपए खर्च करती थी ये बजट बढ़ाकर लगभग चार सौ करोड़ रुपए कर दिया गया है। फिजूलखर्ची और भ्रष्टाचार का आलम ये है कि ये राशी चैनलों, फिल्म निर्माण और ढेरों समाचार पत्रों के नाम पर खर्च की जाती है। हकीकत में इस राशि से सरकार के कामकाज लायक फीडबैक तंत्र आज तक तैयार नहीं हो सका है। जनसंपर्क विभाग संविदा नियुक्ति वाले एक रिटायर्ड अफसर के भरोसे है जिसे कुछ भ्रष्ट अफसरों के काकस के माध्यम से चलाया जा रहा है। मुख्यमंत्री के सचिव एस के मिश्रा के सीधे दखल और आयुक्त अनुपम राजन की उदासीनता ने फीडबैक की रही सही प्रणाली भी ध्वस्त कर दी है। खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लचर और अनिर्णय से भरी शैली ने जनता से संवाद का पूरा तंत्र ही फेल कर दिया है। जनता को ये तस्वीर दिख रही है पर सरकार इसे समझने तैयार नहीं है। यही वजह है कि आंदोलित किसानों ने फील्ड पर मौजूद पत्रकारों को खदेड़ने और पीटने में कोई गुरेज नहीं किया।

    गांवों में किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य आजादी के बाद से अब तक कभी नहीं मिल पाया। पहले कांग्रेस की सरकारें मूल्य देने के बजाए किसानों को चोरी के लिए उकसाती रहीं हैं। बिजली पानी की चोरी के सहारे किसान खेती करता था पर उत्पादन बढ़ाने की कोई पहल कभी नहीं की गई। आज शिवराज सिंह सरकार आधे अधूरे सुधार कार्यों के कारण निशाने पर है। वह पुरातन परंपराओं को अब तक बंद नहीं कर पाई है। किसानों की आय बढ़ाने लायक तंत्र भी अब तक विकसित नहीं कर पाई है जिससे कि किसान को निश्चिंतता हो सके। जिस सुशासन के वादे पर जनता ने भाजपा को सत्ता सौंपी थी वह किसानों को आज नजर नहीं आ रहा है। देश में चल रहे आर्थिक सुधारों की आंधी के साथ कदमताल कर पाने में असफल प्रदेश सरकार की ऊहापोह का असर किसानों पर भी पड़ा है। इससे उपजी चिंता ने किसानों के विद्रोह को दावानल का रूप दे दिया। जाहिर है कि इन हालात में बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक सर्जरी समय की मांग बन गई है जिसका फैसला भाजपा हाईकमान को लेना है।