Month: March 2018

  • शिक्षा में अराजकता से कैसे निपटेंगे जावड़ेकर

    शिक्षा में अराजकता से कैसे निपटेंगे जावड़ेकर

    -आलोक सिंघई-

    दंभ से सराबोर भारत के शैक्षणिक संस्थानों में –या विद्या सा मुक्तये– का नारा लगाने वालों की भरमार है। जुगत भिड़ाकर या चयन के अवैज्ञानिक मापदंडों का लाभ लेकर स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक में फर्जी शिक्षकों की भीड़ गुजारा भत्ता पा रही है। यही वजह है कि सफलता के मापदंडों पर भारत का युवा सोशल मीडिया तक ही पहुंच पाया है। सवा सौ करोड़ का देश पेटेंट पाने के पैमाने पर फिसड्डी साबित हो रहा है। सरकारें बदल गईं हैं, पर शैक्षणिक संस्थानों का ढर्रा वही है। देश को विश्वगुरु बनाने का सपना पाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मुर्दों में जान फूंकने की कितनी भी कोशिश करें लेकिन जब तक उनकी पार्टी भाजपा इन फर्जी शिक्षकों के स्थान पर असली मुक्तिदाताओं को नहीं बिठाती तब तक बदलाव की शुरुआत भी कैसे हो सकती है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने शैक्षणिक संस्थाओं में अपना जनाधार बढ़ा लिया है इसके बावजूद युवाओं की इस बैचेनी को भांपने में भाजपा की सरकारें पूरी तरह असफल साबित हो रहीं हैं।

    सागर के डाक्टर सर हरिसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के पूर्व छात्रों ने आगामी 14- 15 अप्रैल को पूर्व विद्यार्थियों की एल्युमनी मीट बुलाई है। पूर्व छात्रों के मिलने का ऐसा अवसर कोई पहली बार नहीं आया है। जमाने भर के शैक्षणिक संस्थानों में विद्यार्थी इस तरह के आयोजन करते रहते हैं। सागर के भी कुछ पुरा छात्रों ने इस प्रथा की नकल करने की कोशिश की,लेकिन उनका प्रयास कुछ अलग ही अंदाज में सामने आया है। पत्रकारिता विभाग से निकले ये छात्र देश भर के विभिन्न शहरों में ख्यातनाम पत्रकार बन चुके हैं। उन्हें मलाल है कि कभी इस विभाग के जिन छात्रों को कटंगी के रसगुल्ले की तरह खास प्यार मिलता था वो अब क्यों नहीं मिल रहा है। उनका प्यारा संस्थान आज देश के कई अन्य पत्रकारिता पढ़ाने वाले संस्थानों के बराबर ऊंचाई तक भी क्यों नहीं पहुंच पाया । आज इस संस्थान में गिने चुने विद्यार्थी ही क्यों प्रवेश लेते हैं। उन्हें आग में तपाकर कुंदन बनाने का प्रयास कहां गुम हो गया है। ऐसे तमाम सवाल हैं जिनके जवाब ढूंढ़े जा रहे हैं। पुरा छात्रों ने इस एल्युमनी मीट के लिए जो वाट्सएप समूह बनाया है उसमें चल रहे संवाद उस बैचेनी का उद्घोष कर रहे हैं।

    इस संस्थान की विकास यात्रा अलबेली है। बोफोर्स कांड की गूंज जब पूरे देश में चल रही थी,तब आकाशवाणी के एक प्रसारण केन्द्र पर जीवित प्रसारण के दौरान अनोखी घटना घटित हो गई। एक बच्चे ने बोल दिया गली गली में शोर है राजीव गांधी चोर है। देश में कांग्रेस का दबदबा था और ये कल्पना में भी नहीं सोचा जा सकता था कि सरकारी मीडिया से इस तरह की आवाज भी आ सकती है। जाहिर है कि जागरूक जनता ने इस घटना को गंभीरता से लिया। अखबारों में भी ये खबर प्रकाशित की गई। अब जो विद्यार्थी पत्रकारिता की पढ़ाई में प्रवेश लेना चाहते हैं वे कितने जागरूक हैं ये जानने के लिए प्रवेश परीक्षा में उस आकाशवाणी केन्द्र का नाम पूछा गया था। सवाल सीधा था, प्रवेशार्थियों की जागरूकता जानने के लिए पूछा गया था। पत्राकारीय अभिरुचि जानने का इससे अच्छा पैमाना कोई दूसरा नहीं हो सकता था। इसके बावजूद कांग्रेस की चिलम भरने वाले छात्र संगठनों ने इसे उछालना शुरु कर दिया। इस प्रश्नपत्र को बनाने वाले पत्रकारिता के मूर्धन्य शिक्षक प्रदीप कृष्णात्रे पर सवाल उठाए जाने लगे। भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन के कतिपय गुंडों ने अभिव्यक्ति की आजादी के प्रतिमान गढ़ने वाली इस फैक्टरी पर हमला कर दिया। प्रदीप कृष्णात्रे का मुंह काला करके विश्विद्यालय परिसर में जुलूस निकाला गया। इस तरह की घटना झकझोर देने वाली थी। देश भर के समाचार पत्रों ने इस घटना को गंभीरता से लिया। नवभारत टाईम्स, जनसत्ता समेत तमाम अखबारों ने इस कलंकित घटना का विरोध करते हुए संपादकीय लिखे। मामला अदालत पहुंचा। सालों चला। घटना के बाद इस विभाग की सक्रियता और भी बढ़ गई। शिक्षकों ने दुगुने उत्साह से विद्यार्थी गढ़ना शुरु कर दिया। इसके बावजूद राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ता गया और प्रतिभाशाली शिक्षकों ने विभाग से पलायन कर लिया। इस बीच अभियुक्त को कांग्रेस की सरकारों ने पुरस्कृत करते हुए विश्वविद्यालय के इसी विभाग में मीडिया असिस्टेंट जैसी गैर शैक्षणिक नौकरी देकर उपकृत करवा दिया। इसके बाद विवि और इसके पत्रकारिता विभाग की साख धूलधूसरित हो गई। बाद में विद्यार्थी तो निकले लेकिन फील्ड पर वे ही सफल हो सके जिनमें खुद कुछ कर गुजरने की जिजीविषा थी। विभाग की निरंतर गिरती साख का नतीजा ये है कि आज वहां चंद विद्यार्थी ही डिग्री लेने पहुंचते हैं।

    ये बात पत्रकारिता के शीर्ष पर पहुंच चुके विभाग के पूर्व विद्यार्थियों को आज भी सालती है कि जिस संस्थान को अपनी समर्पित शिक्षा के कारण शीर्ष पर होना था वो आज गुमनामी के अंधेरे में क्यों धकेला जा रहा है। समय बदला, सरकारें बदलीं लेकिन विश्वविद्यालय का ढर्रा नहीं बदला। केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिलने के बाद कभी ये प्रयास नहीं किए गए कि देश को कुशल संवाद से आगे ले जाने वाले मीडिया कर्मी कैसे तैयार किए जाएं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय हो या विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, या देश का शैक्षणिक ढांचा संवारने वाला कोई अन्य संस्थान कोई भी अब तक इस पत्रकारिता संस्थान की खोई साख नहीं लौटा सका है। इस कसमसाहट ने ही इस बार एल्युमनी मीट की चाहत को परवान चढ़ा दिया है।

    सागर का पुरा छात्र सम्मेलन अब केवल गलबहियां करने का अरमान लिए नहीं आयोजित नहीं हो रहा है। इसमें कई सवाल घुमड़ रहे हैं। क्या देश की शिक्षा कभी क्षुद्र राजनीतिक चंगुल से आजाद हो सकेगी। शैक्षणिक संस्थानों में चापलूसी या कृपा के नाम पर जो गंदगी जमा हो गई है उसे आखिर कब तक पाला पोसा जाता रहेगा। मोदी सरकार अपनी पूर्ववर्ती सरकारों से आखिर किस नजरिए से अलग है। उसने देश को जो भ्रष्टाचार गंदगी और अयोग्यता से मुक्ति दिलाने का स्वप्न दिखाया था वो क्या कभी पूरा होगा। आखिर अच्छे दिन कब आएंगे। डिग्रियों की आड़ में ज्ञान के संरक्षण और संवर्धन की हत्या कब तक की जाती रहेगी। मानव संसाधन और विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर आखिर कर क्या रहे हैं । देश के शैक्षणिक ढांचे में सुधार की उनकी क्या योजना है। पत्रकारिता के पुरा छात्रों को ही यदि अपने प्रिय संस्थान को सुधारने और संवारने का कार्य करना है तो फिर सरकार की जरूरत ही क्या है। सरकार की ये बेरुखी क्या देश में किसी अराजकता को पनपने का अवसर तो नहीं दे रही । कल यदि शैक्षणिक संस्थानों में सुधार और बदलाव की आकांक्षा गुटीय टकराव की वजह बन गई तो फिर उससे कैसे निपटा जा सकेगा।

    ये तमाम ज्वलंत सवाल न केवल सागर के डाक्टर सर हरिसिंह गौर विवि कुनबे के बीच सुलग रहे हैं वे चाहते हैं कि उनका प्यारा पत्रकारिता संस्थान एक बार फिर अपनी पहचान स्थापित करे। यहां से निकले पत्रकारिता के शावक देश में बदले निजाम का संदेश फैलाएं। देश के आम जनमानस को भी बदलाव की बयार का इंतजार है। सरकार को यदि अपनी उपस्थिति दिखानी है तो उसे कोई ठोस कदम उठाकर दिखाने होंगे। शेर बूढ़ा हो जाए तो उसके मुंह पर मक्खियां भिनकने लगती हैं, पर जब शेर दहाड़ता नजर आ रहा हो तब उसके मुंह पर मक्खियां भिनकने लग जाएं तो साफ है कि उसने मक्खियों से ही यारी कर ली है।

    (लेखक स्वयं डाक्टर सर हरिसिंह गौर विवि के पत्रकारिता और जनसंचार विभाग के पूर्व छात्र हैं)

  • भाजपा का सैलाबी जवाब

    भाजपा का सैलाबी जवाब



    कांग्रेस वाकई रसातल की ओर जा रही है। लहरों की सवारी करने वाली उसकी राजनीति अब दलदल में गोता लगा रही है। जबकि उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक प्रतिद्वंदी भारतीय जनता पार्टी निरंतर अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत बनाती जा रही है। निठल्ले बैठकर हर हलचल को गाली और बददुआ देने वालों के सुर में सुर मिलाकर कांग्रेसी एक बार फिर मध्यप्रदेश के विपक्ष में बैठने की तैयारी कर रहे हैं। जिस तरह कांग्रेस के शोरगुल के बीच मध्यप्रदेश का अनुपूरक बजट बगैर चर्चा कराए पास हो गया उससे सत्ता पक्ष का नहीं बल्कि कांग्रेस का नुक्सान ज्यादा हुआ है। सत्ता पक्ष को तो जनता के अपने हित के काम करने का जनादेश दिया था। मध्यप्रदेश की भाजपा सरकारें पिछले साढ़े चौदह सालों से जनसुविधाओं की डिलीवरी कर रहीं हैं। आने वाले चुनावों से पहले सरकार ने कल्याणकारी योजनाओं की पूरी फेरहिस्त तैयार की है। वह उस दिशा में अपना काम किए जा रही है। नाकारा और गैरजिम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभा रही कांग्रेस ने अपने ही दंभ के जाल में उलझकर वो मौका गंवा दिया जिसके माध्यम से वो सरकारी योजनाओं में कथित सुधार कराने का श्रेय लूट सकती थी। भाजपा की उमाभारती सरकार ने दिसंबर2003 में जब सत्ता संभाली थी तब मध्यप्रदेश का बजट मात्र तेईस हजार करोड़ हुआ करता था। आज वो दो लाख करोड़ पार कर चुका है। पंद्रह सालों में दस गुना बढ़ा बजट प्रदेश की बेहतर होती अर्थव्यवस्था का उद्घोष कर रहा है। लगातार बढ़ती अर्थव्यवस्था ने आम उद्यमियों के दिल में अपेक्षाओं का ज्वार पैदा कर दिया है। भाजपा सरकार उस ज्वार पर सवार होकर अपने नीति निर्धारकों के उस सूत्र वाक्य को साकार करने आगे बढ़ रही है कि तेरा वैभव अमर रहे मां हम दिन चार रहें न रहें। इस घोषित वाक्य के सामने खड़ी होकर कांग्रेस और उसके नेतागण आरोप प्रत्यारोप की राजनीति कर रहे हैं। विधानसभा में प्रस्तुत अनुपूरक मांगें बगैर चर्चा पारित हो गईं इसे कांग्रेस इतिहास का काला दिन बता रही है। जबकि ये घटना कांग्रेस के लिए काला दिन साबित होने जा रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के करीबी मंत्री रामपाल सिंह ने अपनी बहू प्रीति की कथित आत्महत्या पर सच स्वीकार करने में भले देरी की हो। उनकी पारिवारिक वजहें जो भी रहीं हों। बेटे गिरिजेश की मनोदशा ने उन्हें तथ्यों से अनभिज्ञ भले ही रखा हो लेकिन देर से ही सही उन्होंने प्रीति को अपनी बहू स्वीकार तो कर ही लिया था। ये इतना लोक महत्व का मुद्दा भी नहीं था जिसके कारण कांग्रेस ने प्रदेश के सात करोड़ लोगों के भविष्य को ठेंगा दिखा दिया। जबकि ये सर्वविदित तथ्य है कि प्रीति ने अपने कथित पत्र में गिरिजेश या मंत्रीजी के नाम तक का उल्लेख नहीं किया था। इसके बावजूद महिला वोट अर्जित करने के लिए कांग्रेस ने इस लिजलिजे मुद्दे को ही अपने माथे पर सजा लिया। कांग्रेस के नेता भूल गए कि प्रदेश की महिलाएं अपनी विकास यात्रा भाजपा के साथ बेहतर तरीके से कर रहीं हैं।रही सही कसर उसने विधानसभा अध्यक्ष डाक्टर सीतासरन शर्मा के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाकर पूरी कर दी। प्रदेश की आम जनता को जीवन के हर जरूरी मुद्दे पर तरसाने वाली दिग्विजयसिंह सरकार की तुलना में शिवराज सरकार महिलाओं के करीब ज्यादा रही है। उनका बेटी बचाओ नारा हो या बच्चों के मामा के रूप में जनकल्याण की योजनाएं चलाना सभी प्रदेश के आम मतदाता के दिलों को छूते रहे हैं। न केवल विधानसभा में बल्कि दूसरे दिन सड़कों पर भी कांग्रेस प्रीति की मौत को भुनाने की असफल कोशिश करती रही। गलती एक बार हो जाए तो उसे सुधारा भी जा सकता है पर कांग्रेस के नेतागण अपनी निरंतर गलतियों से कोई सबक लेने तैयार नहीं हैं। वोटरों को बहकाने के उसके षड़यंत्र कई बार केवल इसलिए सफल होते नजर आते हैं क्योंकि लोगों की अपेक्षाएं बढ़ गईं हैं। सरकारी कर्मचारियों को इस सरकार ने जितनी अधिक वेतनमान दिया है उतना आजादी के बाद कभी नहीं मिला इसके बावजूद सरकारी अधिकारी कर्मचारी ज्यादा वेतन भत्तों की मांग कर रहे हैं। वे ये समझने भी तैयार नहीं कि जिन लोगों के घरों में सरकारी वेतन नहीं आता है वे पूंजी के उत्पादन के लिए कैसे पसीना बहा रहे हैं। दरअसल में भाजपा की शिवराज सिंह सरकार की ज्यादातर नीतियां पिछली सरकारों की असफल नीतियों में फेरबदल करके उन पर अमल करने की रहीं हैं। इसलिए आम नागरिकों को ज्यादा फर्क नजर नहीं आ रहा है। जबकि आंकड़ों की बिसात पर देखें तो उपलब्धियों का मंच अतिविशाल नजर आता है।

    कांग्रेस के बतोलेबाज नेताओं से जब पूछा जाता है कि यदि मान लें कि भाजपा सरकार असफल रही है तो आप प्रदेश के विकास का क्या ब्लूप्रिंट सोचते हैं। इस पर वे अपनी वही सड़ी गली सबसिडी वाली नीतियों की दुहाई देने जुट जाते हैं जो वैश्विक अर्थपटल पर अप्रासंगिक हो चलीं हैं। वे श्रमिकों को लुभाने वाली वही भाषा बोलते हैं जो कभी साम्यवादी अर्थव्यवस्था वाले देशों से आयातित की गईं थीं। बरसों तक कांग्रेस उन्हीं साम्यवादी परिभाषाओं को गांधीवादी समाजवाद की चासनी में लपेटकर जनता को चुसाती रही है। उनसे जनता का भला न होना था न हुआ। फूट डालो और राज करो की नीति को धर्मनिरपेक्षता के धारदार चाकू से छीलकर पेश करती रही पर सोशल मीडिया की आंधी ने उसकी भी कलई उतारकर रख दी। अब कांग्रेस के नेताओं को समझ नहीं आ रहा है कि वे आगामी चुनावों में जनता को क्या कहानियां सुनाएंगे। इसलिए उसके नेता झूठे जुमलों को उछालकर भ्रम फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। भारत का इतिहास गवाह है कि यहां प्याज की मंहगाई भी सरकारें बना बिगाड़ देती रही हैं। इसके बावजूद समय जितनी तेजी से बदला है उसके चलते अब झूठे मुद्दों की कलई खोलना बड़ा सरल हो गया है। चंद मिनिटों में ऐसे गुब्बारों की हवा देश भर में निकाली जा सकती है जो केवल जनता को बरगलाने के लिए फुलाए जाते हैं। आज जब कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व ने राजभवन के दरवाजे पर प्रीति सिंह रघुवंशी की मौत पर बासी कढ़ी में उबाल लाने की कोशिश की तब वह अपने सभी समर्थकों को भी नहीं जुटा पाई।जनता के पास ऐसे मुद्दों के लिए अब समय ही नहीं है। ऐसी कांग्रेस यदि बजट जैसे गूढ़ मुद्दे पर सरकार को लांछित करने का प्रयास करे तो भला उसकी आवाज को कौन सुनेगा। सरकार के संसदीय कार्य मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने जिस तरह से आगे बढ़कर कांग्रेस के योद्धाओं को शस्त्र विहीन कर दिया वो संसदीय ज्ञान की परिपक्वता की मिसाल बन गया है। कांग्रेस के कुतर्कों को रौंदने का इससे अधिक सैलाबी जवाब दूसरा नहीं हो सकता था।

  • सत्ता हमारी साध्य नहीं कहने वाले कुशाभाऊ ठाकरे

    सत्ता हमारी साध्य नहीं कहने वाले कुशाभाऊ ठाकरे



    भरत चंद नायक-

    भुवन भास्कर भी संध्या को अस्ताचल पहुंचकर विश्राम करते हैं, लेकिन कुछ ऐसे व्यक्तित्व के धनी लोग भी होते हैं जो अपने जीवन की संध्या में लोक कल्याण की भावना से अपने ध्येय की पूर्ति में जुटे रहते है। अपने-अपने परिवार और संगे संबंधियों से अनासक्त होकर जीवन पथ पर चलते रहते हैं। जीवन में विश्राम उनके लिए विलासिता के समान होते हैं। ऐसे समर्पण भाव से जीने वालों के लिए समाज और देश ही परिवार बन जाता है। भारतीय जनता पार्टी की स्थापना से लेकर 1980 में भारतीय जनता पार्टी के गठन के साक्षी बने पितृ पुरूष कुशाभाऊ ठाकरे एक ऐसे ही महापुरूष हुए जिन्होंने अपना जीवन पुष्प राष्ट्रवाद के पोषण के लिए मातृभूमि की बलिवेदी पर आर्पित कर दिया।

    कहते है कि अपनों के लिए तो संसार जीता है जो दूसरों के लिए जीते है उनका जीवन धन्य है। मध्यप्रदेश में कुशाभाऊ ठाकरे राष्ट्रवाद के प्रवर्तन और भारतीय जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी के गठन और विस्तार के प्रतीक पुरूष रहे लेकिन इस विकास यात्रा में सत्ता प्राप्ति से बढकर उनका ध्येय राष्ट्रनिष्ठ कार्यकर्ताओं का निर्माण करना रहा। कार्यकर्ता निर्माण की उनमें अद्धुत क्षमता थी। उन्हें कार्यकर्ता की क्षमता, उसके बौद्धिक स्तर की पहचान थी जिसका श्रेय उनका कार्यकर्ताओं से तादात्म्य स्थापित करने की कला को है। प्रदेश के लाखों कार्यकर्ताओं को उन्होंने संवारा। हर कार्य के लिए कार्यकर्ता और हर कार्यकर्ता को दायित्व उनकी कार्य संस्कृति थी। अविराम कार्यकर्ताओं के बीच रहना। कार्यकर्ताओं की सुनना और उन्हें संतुष्ट करना उनकी दिन चर्या थी। इससे उनके संपर्क में आने वाला अजनबी व्यक्ति भी उनका मुरीद हो जाता था। देखा गया कि कुछ लोग उनके संपर्क में आते और विचारधारा से असहमत हो जाते थे। उनकी असहमति का वे सम्मान करते हुए कहते थे कि सतत संवाद और संपर्क में वही असहमत व्यक्ति आने वाले दिनों में कार्यकर्ता बनेगा और उसका सहयोग हमें मतदाता के रूप में मिलने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता है।

    कुशाभाऊ ठाकरे अपने से असहमति होने वालों को विशेष तरजीह देते और कभी गांठ नहीं बांधते थे, जिससे हर विरोधकर्ता व्यक्ति उनका विश्वास भाजन बन जाता था। उन्होंने जो कार्य संस्कृति और पद्धति विरासत में छोडी यदि उसका अनुगमन किया जाता तो वास्तव में पार्टी संगठन में गुट नहीं गट बनते। कार्यकर्ता किसी व्यक्ति के प्रति नहीं संगठन के प्रति उत्तरदायी रहता। इस दिशा में आज स्थिति विचारणीय है। हम पितृपुरूष के जीवन आदर्शो के प्रति गंभीर रहेंगे तो वास्तव में संगठन का यह दावा सोलह आना सही साबित होगा कि भाजपा के लिए सत्ता साध्य नहीं। सत्ता समाज में सुखद परिवर्तन लाने का साधन मात्र है। यही ठाकरे जी का जीवन दर्शन था।

    संगठन और पार्टी के विकास की दिशा में ठाकरे जी के योगदान को कुछ पृष्ठों में समेटना वास्तव में असंभव है। लेकिन यथार्थ यही है कि जब डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी पं. नेहरू के मंत्रिमंडल में रहते हुए राष्ट्रवाद के प्रवर्तन के बजाए तुष्टीकरण देखकर आहत हुए उन्होंने श्री गुरूजी से परामर्श कर राष्ट्रवाद को समर्पित दल भारतीय जनसंघ की स्थापना का बीडा उठाया। देशव्यापी संगठन और दल के गठन के लिए कार्यकर्ताओं की खोज खबर आरंभ हुई। पं. दीनदयाल, नानाजी देशमुख, दत्तोपंत ठेंगडी जैसे चुनिंदा कार्यकर्ताओं का चयन किया गया। मध्य भारत क्षेत्र के लिए कुशाभाऊ ठाकरे धुरी मान लिए गए। कुशाभाऊ ठाकरे एक थैला लिए, पैरो में टायर की चप्पल पहनकर निकल पडे। उन्होंने मध्य भारत क्षेत्र की लंबाई चैड़ाई कुछ इस तरह नापी कि गांव गांव में जनसंघ की पहचान बनी। किसानों, छोटे मोटे उद्यम में लगे लोगों मजदूरों और युवा वर्ग को अपनेपन का अहसास हुआ। संगठन शिल्प में निष्णात ठाकरेजी के समर्पण भाव ने जन जन में विश्वास पैदा किया। दिन भर यात्रा और संध्या रात्रि में जन जन की चैपाल में सुख दुख की बातों के बीच उन्होंने राष्ट्रवाद का अलख जगाया। तत्कालीन सरकार की जनविरोधी नीतियों का प्रखरता से विरोध किया और जनता की जागरूकता का विकास किया। फलस्वरूप मध्यप्रदेश में कांग्रेस का एकाधिकार समाप्ति की ओर बढा। सहयोगी दलों में संवाद ने सेतु का काम किया। पहली बार कांग्रेस से सत्ता छीनकर संविद सरकार बनाने में उनका अप्रतिम योगदान रहा लेकिन सरकार चले जाने से तत्कालीन भारतीय जनसंघ की भूमिका का इतिहास बदला हो ऐसा नहीं हुआ है।

    5 मार्च 1990 में मध्यप्रदेश की पहली भारतीय जनता पार्टी की सरकार का गठन हुआ। तब भारतीय जनता पार्टी प्रदेश में दो तिहाई बहुमत से सत्ता पर काबिज हुई थी। कुशाभाऊ ठाकरे सत्ता साकेत से दूर संगठन में तल्लीन रहे। उन्होंने तत्कालीन सरकार को राष्ट्रवाद की पटरी से नहीं उतरने दिया लेकिन इस दरम्यान वे सत्ता साकेत से दूर तथापि एक रेफरी की तरह व्हिसिल ब्लोवर बने रहे। यह भारतीय जनता पार्टी और पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ की पुण्याई थी कि राज्यों में सरकारे बनी। अयोध्या में ढांचा गिराए जाने पर आए राजनैतिक झंडावात में भारतीय जनता पार्टी की सरकार कुर्बान हो गयी। लेकिन नीति और नीयत जब साफ होती है तो नैतिक साहस बड़े बड़े किले ध्वस्त हो जाते है। कुशाभाऊ ठाकरे को मध्यप्रदेश संगठन से प्रथक राष्ट्रीय जिम्मेदारी सौंप दी गयी। लेकिन कुशाभाऊ ठाकरे ने जिस शिशु संगठन का संगोपन किया उसका मोह नहीं छोड़ पाए और मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी और उनके कार्यकर्ताओं से संबंध विच्छेद नहीं हुआ। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में तत्कालीन एनडीए की अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार के दौर में कुशाभाऊ ठाकरे ने सत्ता से दूर रहते हुए अम्पायर की भूमि का भली प्रकार बिना रागद्वेष निर्वाह किया। शरीर से दुर्बल हो जाने के बावजूद उनकी मनस्थिति हमेशा जीवंत रही और उन्होंने मध्यप्रदेश संगठन और कार्यकर्ताओं का विस्मरण नहीं किया। उनकी रूग्णावस्था में कार्यकर्ता उन्हें देखने जब दिल्ली पहुंचे वे सभी की खैर ख्वाह लेते रहे और पूरी व्यवस्था करते थे।

    कुशाभाऊ ठाकरे ने भारतीय जनता पार्टी के स्थापना दिवस पर कहा था कि जनसंघ के रूप में राजनैतिक यात्रा आरंभ करते हुए हमारी कुछ प्रतिबद्धताएं थी। राष्ट्र की एकता, प्रजातांत्रिक मूल्यों पर आधारित राजनीति और भारत को एक शक्तिशाली देश बनाना। जनसंघ छोटा दल था लेकिन कमजोर नहीं था। हमारी कोशिश प्रेशर ग्रुप बनाने की रही थी। देश की प्रमुख पार्टी न होने के बाद भी हमारी साख और इकबाल था कि बिना हमें विश्वास में लिए देश की राजनीति पर विचार संभव नहीं था। ध्येय लेकर बढे है। देश की सुरक्षा की चिंता, राष्ट्रीय अस्मिता को जिंदा रखना था और होगा। भारतीय जन संघ और भारतीय जनता पार्टी की आगे बढ़ने का कारण हमारे कार्यकर्ताओं ने भारत की आत्मा से संवाद किया है। जनता की तलित भावनाओं को समझा है उनसे तादात्म्य स्थापित किया है। आत्मा को छूने के साथ हमने अपना लक्ष्य सामने रखा है। हम राज्यों में केन्द्र में सरकार में रहे, न रहे जनता के मर्म को समझना है और उससे एकाकार होना है। जनता का विश्वास ही पूंजी है इसे ईमान की तरह संरक्षित रखना है। तो पार्टी जनमानस पर हमेशा शासन करती रहेगी। कर्तव्यबोध की चुनौती को खुले मन से स्वीकार करे और सशक्त भारत का लक्ष्य पूरा करेंगे। उनकी ध्येय निष्ठा आने वाली पीढी के लिए दीप स्तंभ का कार्य करेगी।

  • विज्ञापन चोर मंडली आखिर है कौन

    विज्ञापन चोर मंडली आखिर है कौन




    (फाईल फोटो)
    मध्यप्रदेश इन दिनों अपनी विकास यात्रा नहीं बल्कि शासन शैली को लेकर चर्चाओं में है। चौदह साल बीत जाने के बाद भी मध्यप्रदेश की जनता भाजपा के सुशासन पर रीझ नहीं पा रही है। कांग्रेस को भूल चुके मतदाता भी आने वाले चुनावों से पहले भाजपा की फींच फींचकर धुलाई करने में जुट गए हैं। प्रदेश भर से जनता की जो आवाजें सुनाई पड़ रहीं हैं वो अपेक्षाओं से लबरेज हैं। उन्हें भाजपा से कुछ ऐसा करने की उम्मीद है जो पहले कभी न हुआ हो। यही वजह है कि भाजपा विरोधियों के साथ साथ उसके समर्थक भी सरकार पर गुलेल तान रहे हैं। सवालों से घिरी शिवराज सरकार के राज दरबार यानि विधानसभा के सदन में भी शासन शैली को लेकर तीखे आरोप लगाए जा रहे हैं। प्रतिपक्ष नहीं बल्कि सत्तापक्ष के भी कई सदस्य सरकार के जवाबों और कार्यशैली से खफा हैं। कई विधायक तो खीजकर सदन में ही कह चुके हैं कि जो सरकार हमारी आवाज नहीं सुनती उससे अब हमें कोई सवाल ही नहीं पूछना है। जो कर्कश विवाद पिछले दिनों सदन में देखने सुनने मिले उससे तो महाभारत काल के प्रहसन भी फीके पड़ते दिख रहे हैं। जो बात सहजता से कही जा सकती है उसे माननीय विधायकगण छिछोरे अंदाज में कहते नजर आ रहे हैं। ऐसा लगता है कि किसी को लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भरोसा ही नहीं रह गया है। विधानसभा अध्यक्ष डाक्टर सीतासरन शर्मा जब पक्ष और विपक्ष के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करते हैं तब भी विधायकगण अपनी जिद पर अड़े रहते हैं। विधायक ये गौर करने तैयार नहीं कि वे कल के इतिहास की इबारत लिख रहे हैं। कांग्रेस के जीतू पटवारी ने जब नौ मार्च को कथित तौर पर सत्ता पक्ष को चोरों की मंडली कह दिया और कहा कि ये चोरों को विज्ञापन देते हैं । अंधा अंधे को रेवड़ी बांटे बाली इस व्यवस्था जर्नलिज्म वाले परेशान हैं। जो ओरीजनल जर्नलिज्म वाले हैं वे आज भी खाली हाथ हैं। उनके इस कथन से सत्ता पक्ष के विधायक बिफर पड़े। जनसंपर्क मंत्री डाक्टर नरोत्तम मिश्रा ने कहा कि ये मीडिया को चोर कह रहे हैं। उन्होंने अध्यक्ष से मांग की कि पत्रकारों को चोर कहने वाली बात सदन की कार्यवाही से विलोपित करवाईए। इस पर अध्यक्ष ने इन पंक्तियों को सदन का कार्यवाही के रिकार्ड से निकलवा दिया। बारह मार्च को विपक्ष की ओर से रामनिवास रावत ने स्पष्ट किया कि जीतू पटवारी ने मीडिया पर नहीं बल्कि उसकी आड़ में चलने वाले विज्ञापन घोटाले का उल्लेख किया है।इसके बाद भी यदि उनके शब्दों से किसी की भावनाएं आहत हुईं हों तो वे सदस्यों की ओर से माफी मांगते हैं। इसके बाद भी सत्ता पक्ष के विधायकगण मानने तैयार नहीं थे। दस सदस्यों ने इस कथन पर सदन का विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव दिया जो सत्तापक्ष के सदस्यों के दबाव में स्वीकार कर लिया गया। हालांकि इस घटना पर पत्रकारों के बीच बेचैनी का माहौल देखा गया। युवा पत्रकार संघ के अध्यक्ष दिनेश शुक्ल ने अध्यक्ष डाक्टर सीतासरऩ शर्मा के सदन संचालन में सजगता और निष्पक्षता को लेकर धन्यवाद प्रस्ताव सौंपा है। उनका कहना है कि जब सदन में दोनों पक्षों के बीच आरोप प्रत्यारोप का दौर चल रहा था तब भी अध्यक्ष की आसंदी से सभी को अपनी बात रखने का अवसर दिया गया। विधायकों की दबावपूर्ण भाषाशैली और जिद के सामने अध्यक्ष ने पूरा धैर्य रखा और विपक्ष को अपनी बात रखने का अवसर देकर उदारता का परिचय दिया। उन्होंने कहा कि अब जबकि ये मामला विशेषाधिकार हनन समिति को सौंप दिया गया है तब पक्षकार की हैसियत से हम चाहते हैं कि कथित तौर पर कहे गए चोरों की मंडली शब्द का आशय स्पष्ट हो
    , क्योंकि जीतू पटवारी ने अपने आरोप में कहीं भी मीडिया या पत्रकार शब्द का उल्लेख नहीं किया था। उन्होंने कहा कि यदि कतिपय माफिया तत्व सत्ताधीशों की आड़ में जन धन का अपवंचन करते रहे हैं तो उन्हें उजागर किया जाना चाहिए। इस संबंध में दोषी अधिकारियों और राजनेताओं को भी न बख्शा जाए। पत्रकारों की ओर से ये वक्तव्य तब सामने आया जब सेन्ट्रल प्रेस क्लब के अध्यक्ष गणेश साकल्ले,महासचिव राजेश सिरोठिया, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विजय कुमार दास ने राहुल गांधी को लिखे पत्र में कहा कि जीतू पटवारी की ….सरकार चोरों की मंडली मीडिया ….. को विज्ञापन दे रही ये टिप्पणी अनुचित और अवांछित है। मूल वक्तव्य में हालांकि चोर मंडली के साथ मीडिया शब्द का उल्लेख ही नहीं किया गया था। पत्रकारों की इसी नाराजगी का उल्लेख सदन में हुआ और मामला विशेषाधिकार हनन समिति को सौंप दिया गया। सदन में संसदीय कार्य मंत्री ने ये भी कहा कि पटवारी का मूल वक्तव्य सदन की कार्यवाही से नहीं निकाला गया है। अब इस शब्द संग्राम का अंत कहां होगा ये तो नहीं कहा जा सकता पर इस प्रहसन में मध्यप्रदेश के मीडिया की साख पर जरूर कीचड़ उछाला गया है। वो भी उन लोगों की आड़ में जिन्होंने विज्ञापन के नाम पर जनता के बजट की खुली लूट की है। सरकार को इस मसले का समाधान बड़ी तत्परता और प्राथमिकता से करना होगा। ये बात भी सही है कि मौजूदा भाजपा सरकार ने मीडिया को जो संसाधन उपलब्ध कराए हैं वैसे मध्यप्रदेश के इतिहास में पहले कभी नहीं उपलब्ध थे। इसके बावजूद ये भी सही है कि मीडिया की आड़ में ज्यादातर धन अवांछित तत्वों ने लूटा है। भाजपा सरकार को अब अपने कथित गोदी मीडिया और वास्तविक मीडिया के बीच अंतर करने की समझ विकसित करनी होगी। आगामी चुनावों में यही मीडिया जनता का मार्गदर्शन करेगा और जिसकी कीमत हर जनविरोधी राजनेता को चुकाना पड़ेगी। क्योंकि विचार का कहर बाढ़ नहीं सैलाब लाता है।

  • सफल संवाद के लिए विचार के नए मुखौटों को पहचानें

    सफल संवाद के लिए विचार के नए मुखौटों को पहचानें



    स्व.भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यान 2018 के मंथन से निकला पत्रकारिता का ताजा फार्मूला
    भोपाल,4 मार्च,(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।पत्रकारिता विचार यात्रा से बाजार यात्रा तक विषय पर आयोजित स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यान 2018 में मीडिया के असमंजस पर कुछ नायाब फार्मूले सामने आए हैं। व्याख्यान माला में भाग लेने वाले विद्वानों और पत्रकारों का मानना है कि जबसे देश ने पूंजीवाद की राह पकड़ी है तबसे जनसंचार के साधन समाजोन्मुख रास्ता भूल चले हैं। समाज केन्द्रित पत्रकारिता के बगैर सफल संवाद संभव नहीं है इसलिए पत्रकारों को पूंजीवादी दौर में उभरे विचार के नए मुखौटों को पहचानना सीखना होगा। मीडिया संस्थानों की बुराई किए बगैर यदि हम मर्यादाओं का पालन करेंगे तो हमारा सफल संवाद समाज को भी स्वीकार्य होगा।
    डॉ.सर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के प्राध्यापक स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया की स्मृति में ये लगातार छटवां सफल आयोजन था। इस आयोजन में मुख्य अतिथि के रूप में मध्यप्रदेश शासन के राजस्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता, दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक प्रकाश दुबे, नईदिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार ने पत्रकारिता विचार यात्रा से बाजार यात्रा तक विषय पर आयोजित व्याख्यान में अपने अपने नजरिए से पत्रकारिता के संवाद को सार्थक बनाने के रास्ते सुझाए। अध्यक्षीय उद्बोधन में माधव राव सप्रे संग्रहालय के स्थापक पद्मश्री विजय दत्त श्रीधर ने विषय का प्रवर्तन किया।

    इस अवसर पर दैनिक भास्कर ग्वालियर के पत्रकार अनिल पटैरिया को उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए ग्यारह हजार रुपए के स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया स्मृति पत्रकारिता सम्मान से अलंकृत किया गया। उन्हें राजस्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने शाल श्रीफल भेंटकर प्रशस्ति पत्र भी दिया गया। आयोजकों ने सभी आमंत्रित वक्ताओं को स्मृति चिन्ह और तुलसी के पौधे देकर सम्मानित किया। मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण के साथ आयोजन का विधिवत शुभारंभ हुआ। अतिथियों ने स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया के चित्र पर माल्यार्पण भी किया। स्वागत भाषण वरिष्ठ पत्रकार शिव अनुराग पटैरिया ने दिया। कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए समिति की ओर से जनसंपर्क अधिकारी अशोक मनवानी ने अतिथिओं और आगंतुकों के प्रति आभार प्रकट किया। आयोजन के उपरांत अनौपचारिक सत्र भी आयोजित किया गया जिसमें वक्ताओं ने श्रोताओं की जिज्ञासाओं का समाधान किया। सहभोज का आयोजन भी किया गया।

    अध्यक्षीय उद्बोधन में पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि आत्मआलोचना के नाम पर हम लोग आत्म निंदा में जुट जाते हैं। बाजार और पत्रकारिता के रिश्ते चिंताजनक नहीं हैं। पत्रकार यदि सूझबूझ से लिखेंगे तो उन्हें कभी मालिकों की ओर से तनाव नहीं झेलना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि गायत्री परिवार के (हम सुधरेंगे जग सुधरेगा ) नीतिवाक्य की रोशनी में हमें आगे बढ़ते रहना होगा।

    विषय का तकनीकी विश्लेषण करते हुए वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार ने कहा कि सागर में पत्रकारिता के प्रशिक्षण के दौरान हम सभी सहपाठियों को स्व.देवलिया जी का स्नेह मिला। उनके ही मार्गदर्शन पर हमने दिल्ली में अपनी जमीन तलाशी। उन्होंने कहा कि आज के जनसंचार में भावनात्मक अपीलें की जाती हैं जिनमें नीतियां दफन हो जाती हैं। लोकतंत्र में चुनाव जीतना ही अंतिम लक्ष्य हो गया है। आज के राजनेताओं ने जनता के मुद्दों के समाधान खोजना बंद कर दिया है। जबसे बाजारवाद की स्वीकार्यता बढ़ी है और साम्यवाद का अंत हुआ है तबसे मीडिया प्रोपेगंडा करने लगा है। ये मॉडल सत्ताधीशों को भी मुफीद पड़ता है और धनपशुओं के लिए भी भरपूर नतीजे लाने वाला है। यही वजह है कि आज बाजार स्वयं एक विचार बन गया है। उसने कई पुराने विचारों की जगह ले ली है। मीडिया में विचारों का यही फंडामेंटलिज्म(कट्टरपंथ) हावी हो गया है। इसलिए जो लोग कहते हैं कि आज का मीडिया विचार हीन हो गया है मैं उसका खंडन करता हूं। आज तो फेसबुक और गूगल जैसे सोशल मीडिया भी बाजार को नियंत्रित कर रहे हैं। दरअसल मीडिया ने अपने मुखौटे बदल लिए हैं और इन बदले मुखौटे में छिपे मीडिया के नियंताओं की पहचान जरूरी हो गई है। इसे पहचाने बगैर हम मीडिया को जनता के करीब नहीं ले जा सकते।

    दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक प्रकाश दुबे ने कहा कि स्वर्गीय देवलिया जी ने गुरु द्रोणाचार्य की तरह शिष्य तो बनाए पर उन्होंने कभी एकलव्य की तरह शिष्यों से उनका अंगूठा नहीं मांगा। उनके पास आसपास की घटनाओं की सटीक जानकारी होती थी। यूनीवार्ता के प्रतिनिधि रहते हुए उन्होंने समाज से गहरा नाता बना लिया था। उन्होंने कहा कि आज बाजार की ताकतें और सत्ता का दबाव बेशक मीडिया को नियंत्रित कर रहा है लेकिन ये समाचार संस्थान कभी नहीं चला सकते। यदि ऐसा होता तो देश पर एकछत्र राज्य करने वाली कांग्रेस और उसका गांधी परिवार नेशनल हेराल्ड समूह को भी चला सकती थी। उन्होंने कहा कि तमाम दावों के बावजूद प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया का दबदबा बढ़ता चला गया है।

    श्री प्रकाश दुबे ने यूनियन कार्बाइड गैस कांड की घटना के माध्यम से बताया कि जब अमेरिकी राष्ट्रपति के दबाव मे देश की सत्ता ने अपने मुख्यमंत्री को बाकायदा फोन करके दबाव डाला था। राज्य सरकार ने इसके बाद अपने प्रिय अधिकारी के संरक्षण में यूका के अपराधी वारेन एंडरसन को देश से बाहर भेजने में बडी भूमिका निभाई थी,तब भी एक छोटे से अखबार के पत्रकार राजकुमार केसवानी ने अपने अखबार में खबर छापकर यूनियन कार्बाइड को झुकने पर मजबूर कर दिया था। विश्व जनमत के कारण आज तक यूनियन कार्बाइड उस मुकदमे को बंद नहीं करा सकी है। अखबार की ताकत अपार है इसलिए बाजार कितना भी आततायी क्यों न हो जाए हम उससे डरने वाले नहीं हैं।

    मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित राजस्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने कहा कि आज बाजार के साथ साथ विचार, सत्ताधीशों और धनपशुओं सभी की मर्यादाएं टूट रहीं हैं। बाजार के आशय अनेक स्थानों पर बदलते रहते हैं। इसलिए बाजार किसी विचार को दबा सके ये अब संभव नहीं है। सोशल मीडिया की ताकत आज इतनी बढ़ गई है कि समर्थक या विरोधी विचारों की अभिव्यक्ति किसी न किसी तरह हो ही जाती है। ये हमें तय करना है कि हम लोगों के विश्वास की रक्षा कैसे करें। हम मर्यादाओं का पालन करेंगे तो विचार की रक्षा भी होगी और पाठक तक उसकी यात्रा भी निर्बाध रूप से संभव हो सकेगी।

    व्याख्यान माला के अंत में सर्वश्री शंभुदयाल गुरु, विनय द्विवेदी, आरएस अग्रवाल, अनिल सौमित्र, और कई अन्य आगंतुकों ने वक्ताओं से सवाल पूछे। समाधान करने की जवाबदारी मुकेश कुमार और प्रकाश दुबे दोनों ने संभाली। मुकेश कुमार ने कहा कि जिस तरह तेल, आटा, मिठाई में मिलावट हमें मंजूर नहीं। हम उसका विरोध करते हैं। उसी प्रकार हमें मीडिया में मिलावट का भी विरोध करना होगा। जो मीडिया लोकतंत्र के खिलाफ ही खडा़ हो जाए उसे हम गोदी मीडिया कहकर पीछे न लौट आएं उसे सुधारने के लिए भी आगे आएं।

    प्रकाश दुबे ने कहा कि हम अपनी भूमिका उस मोची के समान मानते हैं जिसे फटा जूता ही नजर आता है। वह उसे सुधारने का जतन भी करता है। इसलिए हम अपनी भूमिका निभाते रहें तो विचार की यात्रा को सार्थक बना सकेंगे।

    कार्यक्रम के आरंभ में स्वागत उद्बोधन में शिव अनुराग पटैरिया ने कहा कि स्वर्गीय देवलिया जी की उंगली पकड़कर हमने आदर्श पत्रकारिता शुरु की थी। आज यदि हम उन आदर्शों की बात करें तो बदले हालात में उन्हें अप्रासंगिक समझा जाएगा। आयोजन का ये अनुष्ठान हमने जबसे प्रारंभ किया है तबसे सभी मित्रों और सहयोगियों का योगदान हमें मिलता रहा है।

  • मिठलबरा राजनीति की उपासना

    मिठलबरा राजनीति की उपासना



    हिंदुस्तान की राजनीति अनुत्पादक, उद्देश्यहीन और ठहरी हुई बांझ महसूस की जा रही है। कांग्रेस से निराश हो चुके लोग आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भाजपा के बारे में भी निराशाजनक बातें कहते नजर आते हैं। हालांकि जो लोग यूपीए और एनडीए की सरकारों के आधारभूत अंतर को समझते हैं वे जानते हैं कि बदली सत्ता पहले की तुलना में क्या नए लक्ष्य छूने निकल पड़ी है। इसके बावजूद अपनी राजनीतिक विधा को बुलंद करने में जुटे सत्ताच्युत राजनेता ये मानने तैयार नहीं हैं कि बदलते वक्त ने उनकी राजनीतिक शैली को विदा कर दिया है। मध्यप्रदेश विधानसभा के बजट सत्र में दिवंगत विभूतियों को श्रद्धांजलि देने का क्रम चल रहा था। अध्यक्ष डाक्टर सीतासरन शर्मा ने पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी को जमींदारी उन्मूलन के लिए कार्य करने वाला विधिवेत्ता और संसदविद् बताया । मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी के प्रति श्रद्धांजलि देने के लिए कई सम्मानजनक संबोधन प्रेषित किए। वाजिब भी था, जिस विधानसभा की गरिमा आजादी के बाद संवाद आधारित लोकतंत्र से सजाई संवारी गई हो उसके पुरोधाओं को नई पीढ़ी की ओर से सम्मान दिया जाना लाजिमी है।

    नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कहा कि श्रीनिवास तिवारी को विंध्य का टाईगर कहा जाता था। उन्होंने बेरोजगारी मिटाने के लिए पूरे जीवन काम किया। वे विंध्य क्षेत्र के विकास के लिए विशेष प्रयास करते थे। श्री तिवारी का अपने लोगों के लिए कोई कानून कायदा नहीं होता था। वे हरदम प्रयास करते थे कि कानून के अंदर आदमी का संरक्षण कैसे किया जाए। उनके विचार ,सिद्धांत और सपने आज भी अधूरे हैं। वे चाहते थे कि गरीबी दूर हो पर अभी इसके बारे में बहुत कुछ किया जाना बाकी है। विधानसभा उपाध्यक्ष डाक्टर राजेन्द्र कुमार सिंह इस माहौल में कुछ ज्यादा ही भाव विभोर हो गए। उन्होंने कहा कि समाजवादी सोच के कारण वे परंपरागत रूप से विद्रोही स्वभाव के रहे। इसलिए वे हरदम सरकार से लड़ने के अंदाज में रहते थे। जब विंध्यप्रदेश का विलय मध्यप्रदेश में हो रहा था तब उन्होंने इसका विरोध किया था। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि श्री तिवारी की अष्टधातु की प्रतिमा रीवा में या विधानसभा परिसर में स्थापित की जाए। श्रीनिवास तिवारी के प्रति सम्मान का ये भाव स्वाभाविक है। श्री तिवारी भरी सभा में कहते थे कि श्री राजेन्द्र सिंह मेरे तीसरे बेटे समान हैं। जाहिर है इस आशीर्वाद का प्रतिफल देने का भाव श्री सिंह के मन में आना ही चाहिए। विधानसभा में श्रद्धांजलि आयोजन के इस संवाद में कुछ बातें निकलकर सामने आ रहीं हैं। निश्चित रूप से श्रीनिवास तिवारी इतने बड़े कद के नेता थे कि जीते जी तो उन्हें नजरंदाज करना संभव ही नहीं था। आज भी उन्हें भुलाना संभव नहीं है। जाहिर है कि मध्यप्रदेश के इतिहास में श्रीनिवास तिवारी का नाम हमेशा आदर के साथ याद किया जाएगा। इसके बावजूद कुछ बातें चिंतन करने योग्य हैं। श्रीनिवास तिवारी जब राजनीति में आए तब जमींदारी प्रथा मौजूद थी। जाहिर है कि नई पीढ़ी के युवकों में तब जमींदारी की आड़ में चलने वाले शोषण के प्रति घृणा का भाव हुआ करता था। इसके बाद साम्यवाद के हिंदुस्तानी संस्करण समाजवाद ने भी पूंजीपतियों के प्रति नफरत का भाव पल्लवित पोषित किया। गांधीवाद जरूर सेठों की पैरवी करता था लेकिन कांग्रेस का मौजूदा नेतृत्व तो चूं चूं का मुरब्बा था। गरीबी हटाओ का नारा देने वाली इंदिरा कांग्रेस मंच पर तो सेठों को गाली देती थी पर मंच की आड़ में वह पूंजीपतियों को पोषित करती रही । इसी ऊहापोह में श्रीनिवास तिवारी ने अपनी राजनीतिक सोच को जमीन पर उतारने का प्रयास किया। आज अजय सिंह सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि श्री तिवारी के स्वप्न अभी साकार नहीं हो पाए हैं। जाहिर है कि जो स्वप्न जमीनी बुनियाद पर न खड़े हों वे साकार हो भी कैसे सकते हैं।

    श्रीनिवास तिवारी अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में ही बहुत सारे विवादों में घिरे रहे। विधानसभा में जातिगत और क्षेत्रगत भेदभाव पर आधारित फर्जी नियुक्तियों को लेकर तो विधानसभा सचिवालय ने उनके खिलाफ प्राथमिकी तक दर्ज कराई थी। ये प्रकरण अभी लंबित है। उनके कार्यकाल के दौरान करोड़ों का मोसंबी जूस पिलाए जाने का घोटाला हो या सचिव सत्यनारायण शर्मा की उपस्थिति में गोलीकांड जैसे मामले सभी विधानसभा को कलंकित करते रहे। इसके बाद विधानसभा में फर्जी नियुक्तियों ने तो राजनीतिक हलकों में भारी कोहराम मचाया। आईएएस जे.एल.बोस ने इस मामले की जांच की तो उन्हें गंभीरता का अहसास हुआ। उन्होंने जब इस रिपोर्ट के बारे में सत्ताधीशों को बताया तो वे अचंभित रह गए। इसके बाद रहस्यमयी तौर पर कतिपय असामाजिक तत्वों ने उनसे रिपोर्ट भरी अटैची छीन ली और भाग गए। उन्होंने अपनी सिफारिश में किसी न्यायाधीश से इस मामले की जांच कराने की जरूरत बताई थी। जस्टिस शचीन्द्र द्विवेदी की अध्यक्षता में हुई न्यायिक जांच में ये घोटाला और भी गंभीर रूप में सामने आया। उनके असामयिक निधन से मामले पर पर्दा पड़ता नजर आने लगा। उन्होंने तथ्यात्मक जांच रिपोर्ट में मामले की प्राथमिकी दर्ज करने की सिफारिश की थी। इसके बावजूद ये मामला बरसों तक लंबित रहा। अंततः विधानसभा सचिवालय ने इस मामले में प्राथमिकी दर्ज कराई जिसके बाद आज भी ये मामला लंबित पड़ा है। विधानसभा के प्रमुख सचिव पद पर डा.ए.के.पयासी की नियुक्ति कैसे हुई ये गोलमाल आज तक लोगों को अचंभे में डाल देता है। शिक्षक से नगर निगम और फिर विधानसभा में उनका पहुंचना। इसी दौरान डिग्रियां पा लेना जैसे मामले सर्वज्ञात हैं। इसके बावजूद राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ने इस मामले पर पर्दा डाल रखा है। आज भी विंध्यक्षेत्र के ब्राह्मण जाति के लोग विधानसभा में भृत्य और मार्शल जैसे पदों से अपनी आजीविका चला रहे हैं। ये सब इसलिए क्योंकि तुरत नतीजे देने की ललक में श्रीनिवास तिवारी ने युवाओं को सरकारी नौकरियां देने की कांग्रेसी नीति का अनुकरण किया। बल्कि कहा जाए कि अपने नाते रिश्तेदारों को सरकारी नौकरियां दिलाने में उन्होंने लूट भरी नीति अपनाई। जिस पत्रकार ने उनका विरोध किया उसे उन्होंने विधानसभा परिसर में घुसने से प्रतिबंधित कर दिया। रीवा के माफिया तत्वों ने इस लूट का विरोध करने वाले अफसरों, कर्मचारियों को तरह तरह से प्रताड़ित किया। किसी को लूप लाईन में फिंकवा दिया तो किसी की सेवा पुस्तिकाएं बिगाड़ दीं। मध्यप्रदेश के इतिहास में इस तरह की लूट और अराजकता कभी नहीं देखी गई। दिग्विजय सिंह सरकार ये सब देखकर भी खामोश थी, क्योंकि दिग्विजय सिंह को अपने सारे काले कारनामों पर विधानसभा की मुहर लगवाना पड़ती थी।

    आज जो लोग मृत व्यक्ति को श्रद्धांजलि देने के नाम पर आदर व्यक्त कर रहे हैं उनकी बात तो समझी जा सकती है पर जो लोग श्रीनिवास तिवारी की परंपरा को अष्टधातु में ढालकर पीढ़ियों का मार्गदर्शन करने की बात कह रहे हैं उन्हें अपनी सोच पर पुनर्विचार करना चाहिए। आखिर हम नई पीढ़ी को क्या संस्कार देना चाहते हैं। लोगों को खुश करने के लिए उनकी मुंह पर मीठी बातें करने वालों को मिठलबरा कहा जाता है। किसी भी राजनीति का उद्देश्य यदि केवल लोगों को खुश करना और उनसे वोट पाना हो वह कभी देश और समाज के स्थापित लक्ष्यों को नहीं पा सकती। कांग्रेस की सरकारों ने इन कुसंस्कारों को संरक्षण दिया इसलिए वे रसातल में चलीं गईं। जिस भाजपा ने उनके कार्यकाल में उन गलत नीतियों का विरोध किया वह आज क्यों खामोश बैठी है ये बात जरूर चिंताजनक है। सरकार यदि विंध्य क्षेत्र के विकास के लिए काम कर रही है तो उसे श्रीनिवास तिवारी के पैदा किए गए माफिया गिरोह से डरने की जरूरत नहीं है। खुद विंध्य के बुद्धिजीवी इस माफिया गिरोह को कभी समर्थन नहीं देते थे। वे तो केवल इसलिए खामोश रहते थे क्योंकि उन्हें अपनी जानमाल की चिंता होती थी।

    माध्यमिक शिक्षा बोर्ड परीक्षा की नियंत्रक ताजवर रहमान साहनी को प्रताड़ित करने का मामला तब खूब सुर्खियों में आया था जब खुद श्रीनिवास तिवारी ने उन्हें अपने क्षेत्र के नकलचोर स्कूलों की मान्यता बहाल करने और रिजल्ट सुधारने के लिए धमकाया था। उसी रात रहस्यमय स्थितियों में श्रीमती साहनी की मौत भी हो गई थी। इस तरह के सैकड़ों किस्से मध्यप्रदेश की राजनीति में आज भी सुने सुनाए जाते हैं। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह सही कह रहे हैं कि विंध्य क्षेत्र की गलियां और चौपाल इस तरह के सैकड़ों आख्यानों से सराबोर हैं। इसके बावजूद आज के सत्ताधीश उनकी गलतियों से सबक क्यों नहीं लेना चाहते। यदि स्वर्गीय तिवारी जी की नीतियां मुखिया की छवि के अनुकूल होतीं तो क्या विंध्य क्षेत्र आज भी बेरोजगारी का दंश झेल रहा होता। मध्यप्रदेश की दिग्विजय सिंह सरकार बंटाढार साबित हुई होती। जरूरत है कि आज की राजनीति उन गलतियों से सबक ले, उन्हें दुहराने से बचे तभी हम आत्मगौरव की ओर बढ़ सकते हैं। ध्यान रहे भाजपा सरकार को भारत माता का वैभव अमर करने से लिए सत्ता में भेजा गया है। वह यदि इस लक्ष्य से भटककर सस्ती लोकप्रियता के फेर में पड़ी रहेगी तो प्रदेश की जनता उसकी भी परधनिया खोलने में देरी नहीं लगाएगी।