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  • पंचायत चुनाव नहीं कराए तो आंदोलन करेगी कांग्रेस,कमलनाथ ने धमकाया

    पंचायत चुनाव नहीं कराए तो आंदोलन करेगी कांग्रेस,कमलनाथ ने धमकाया

    भोपाल,10 जनवरी(प्रेस इँफार्मेशन सेंटर)। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार को चेतावनी देकर कहा है कि सरकार दो महीने के अंदर परिसीमन, रोटेशन और ओबीसी आरक्षण के साथ पंचायत चुनाव कराए, नहीं तो कांग्रेस आंदोलन करेगी।
    सोमवार को भोपाल में मीडियाकर्मियों से बातचीत में कमलनाथ ने बीजेपी को ओबीसी विरोधी बताया।

    उन्होंने कहा कि सरकार की ओबीसी और आरक्षण विरोधी नीति के कारण प्रदेश में सात साल से पंचायत चुनाव नहीं हो पा रहे हैं। कुछ महीने पहले शिवराज सरकार इसके लिए अध्यादेश लेकर आई थी। उन्होंने अध्यादेश को काला कानून बताते हुए कहा कि इसमें न रोटेशन का पालन किया गया, न परिसीमन का और न आरक्षण का। इसी वजह से चुनाव रद्द हो गए। अगर सरकार दो महीने के भीतर परिसीमन, रोटेशन और ओबीसी आरक्षण के साथ ग्राम पंचायत चुनाव नहीं कराएगी तो कांग्रेस पार्टी जिला से लेकर ग्राम पंचायत स्तर तक आंदोलन करेगी ।


    कमलनाथ ने कहा कि शिवराज सिंह चौहान 15 साल से मुख्यमंत्री हैं, लेकिन कभी ओबीसी को 27% आरक्षण देने का प्रस्ताव सदन में नहीं रखा। पिछले दो साल से ओबीसी स्कॉलरशिप का 1210 करोड़ रुपये बकाया है। छात्र परेशान हैं, लेकिन सरकार को कोई चिंता नहीं है।


    हाल में हुई ओलावृष्टि के सवाल पर उन्होंने कहा कि सरकार को तत्काल किसानों को मुआवजा देना चाहिए। इस बारे में मुख्यमंत्री शिवराज की घोषणा को धूठा बताते हुए कमलनाथ ने कहा कि किसानों को हुए नुकसान का आकलन अब तक शुरू नहीं हुआ। फसल बीमा की राशि के भुगतान में हुई देरी के लिए भी उन्होंने बीजेपी सरकार को जिम्मेदार ठहराया।

  • कांग्रेस ने दो दिन भी नहीं चलने दिया विधानसभा का राज दरबार

    कांग्रेस ने दो दिन भी नहीं चलने दिया विधानसभा का राज दरबार

    भोपाल 10 अगस्त(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें, ओबीसी आरक्षण और बढ़ती महंगाई के विरोध में हंगामे के चलते विधानसभा का मानसून सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया है। इस हंगामे के बीच सरकार ने सदन में महत्वपूर्ण विधेयकों की मंजूरी जरूर करवा ली।

    सदन की कार्यवाही सुबह से ही हंगामेदार रही। हंगामे की स्थिति और ज्यादा तब बढ़ गई जब महंगाई से जुड़ा सवाल वित्त मंत्री से पूछा गया। इसके बाद वित्त मंत्री के जवाब से विपक्ष खेमे ने नाराजगी प्रकट की। जवाब से असंतुष्ट नजर आए नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि मंत्री का जवाब सही नहीं, आज पूरा देश महंगाई से जूझ रहा है, इस पर चर्चा होनी चाहिए। इस पर विपक्षी सदस्य लॉबी में नारेबाजी करने लगे और विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम को सदन की कार्यवाही 12 बजे तक के लिए स्थगित करनी पड़ी। इसके बाद फिर से कार्यवाही शुरू की गई, लेकिन विपक्ष का हंगामा नहीं थमा तो विधानसभा के मानसून सत्र को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया।


    सदन की हंगामेदार कार्यवाही के दौरान सरकार ने कई महत्वपूर्ण विधेयक पास करा लिए। इसी शोरगुल के बीच अनुपूरक बजट को हंगामे के दौरान मंजूरी दे दी गई। इसके बाद नगरीय निकाय संशोधन बिल भी पास हुए और आबकारी एक्ट संशोधन समेत अन्य महत्वूर्ण विधेयकों को भी मंजूरी दे दी गई।

    बाढ़ से प्रभावित शयोपुर के विधायक बाबू जँडेल ने विधानसभा में अपने कपड़े फाड़ लिये। वे अपने इलाक़े में बाढ़ प्रभावितों को कथित तौर पर सरकारी मदद न मिल पाने के कारण खुद को दुखी बता रहे थे। उनका कहना था कि उनके इलाके के लोगों को कपड़े तक नहीं मिल पा रहे हैं। लोगों के घर पानी में डूब गए हैं। सरकार बाढ़ पीड़ितों को मदद नहीं कर रही है।

  • कांग्रेस में घुमड़ रहा दिग्गी को विदा करने का मानस

    कांग्रेस में घुमड़ रहा दिग्गी को विदा करने का मानस

    डॉ.अजय खेमरिया

    चौबीस उपचुनावों की पहाड़ सी चुनौती से मुकाबिल कांग्रेस में घर की कलह थमने का नाम नही ले रही है।जिस चंबल ग्वालियर से बीजेपी सरकार के भविष्य का निर्णय होना है वहाँ कमलनाथ और दिग्विजयसिंह की लड़ाई खुलकर सामने आ गई है।कल पूर्व सीएम दिग्विजयसिंह ने राकेश चौधरी की घर वापसी पर एतराज जताया तो आज उनका जबाब देने के लिए चौधरी खुद भिंड से ग्वालियर आये और मीडिया के सामने दिग्विजयसिंह के अलावा अजय सिह और पूर्व मंत्री डॉ गोविंद सिंह पर गंभीर आरोप लगाए।माना जा रहा है कि कमलनाथ के इशारे पर ही चौधरी राकेश ने आज बकायदा प्रेस कांफ्रेंस लेकर यह हमला बोला है।चौधरी ने अजय सिंह पर जिस तल्खी के साथ आरोप लगाये है वे ठीक वैसे ही जैसे 2013 में पार्टी छोड़ते हुए लगाए गए थे।राकेश सिंह ने कहा कि अजय सिंह खुद तीन चुनाव हार चुके हैं और अपने पिता की विरासत को जो न बचा पाया हो वह कांग्रेस का क्या भला करेगा।राकेश सिंह ने इस कांफ्रेंस में जो कहा है उसके बहुत ही गहरे निहितार्थ भी है क्योंकि कल दिग्विजयसिंह ने कहा कि” मैं राकेश चौधरी के प्रवेश और मेहगांव से टिकट के पक्ष में नही हूँ”.आज इसका जबाब देते हुए उन्होंने कहाकि मैं तो कांग्रेस में ही हूँ और राहुल गांधी ने मुझसे खुद काम करने के लिए कहा है।यानी राकेश सिंह ने आज घोषित कर दिया कि वह कांग्रेस में है और उन्हें दिग्विजयसिंह, अजय सिंह की किसी एनओसी की जरूरत नही है।

    मेहगांव से टिकट को लेकर चौधरी ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि कमलनाथ ने उन्हें बुलाकर पूछा है कि क्या वे चुनाव लड़ना चाहते है?इस पर उन्होंने एक तरह से अपनी सहमति व्यक्त की है पार्टी आदेश मानने के लहजे में।यानी कमलनाथ मेहगांव से चौधरी को टिकट देने का मन बना चुके है इसलिए कल के दिग्विजयसिंह के बयान का मतलब है इस मामले पर दोनों नेताओं के बीच मतभेद की स्थिति है।असल में अब यह स्पष्ट हो गया है कि मप्र में कमलनाथ और दिग्गीराजा के बीच समन्वय का दौर खत्म सा हो गया है जो कमलनाथ के सीएम रहते देखा जाता था।महीने भर में दिग्गीराजा को तीसरी बार यह कहना पड़ा है कि उनके और कमलनाथ के बीच कोई मतभेद नही है।यह साबित करता है कि जिन परिस्थितियों ने कमलनाथ सरकार के पतन की पटकथा लिखी थी कमोबेश उनमें कोई बुनियादी बदलाव नही आया है।राकेश चौधरी कमलनाथ और दिग्गीराजा के बीच अलगाव के प्रतीक भर है और यह भी समझना होगा कि सिंधिया के जाने के बाद कमलनाथ मप्र पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए भी व्यू रचना में जुटे है।ग्वालियर चंबल अंचल में वे अब उन चेहरों को आगे बढ़ाना चाहते है जो जीतने के बाद उनके हमकदम रहे।मेहगांव से राकेश चौधरी इसी व्यूह के मोहरे है।वैसे देखा जाए तो खुद दिग्विजयसिंह के भाई लक्ष्मण सिंह भी बीजेपी में चले गए थे लेकिन उन्हें पार्टी ने वापिस लेकर दो चुनाव लड़ाए।कमलनाथ इसे चौधरी पर लागू कर दिग्गीराजा को मैसेज देना चाहते है।कमलनाथ ऑफ द रिकॉर्ड सरकार जाने के लिए भी दिग्विजयसिंह को जिम्मेदार मानते है क्योंकि नाराज विधायकों के साथ दिग्विजय ही फ्रंट फूट पर बात कर रहे थे।इस आशय का उनका बयान भी पिछले दिनों सामने आ चुका है।जाहिर है मप्र कांग्रेस में जहां ज्यादा एकजुटता और आक्रमकता की आवश्यकता है वहा पार्टी के शीर्ष पर मतभेदों का यह खुला अंबार उसकी वापिसी के सपनों को परवान नही चढ़ने देगा।


    यह भी समझना होगा कि इस अंचल में कमलनाथ के पास खुद की कोई पूंजी नही है सिंधिया के बाद जो कांग्रेस नजर आती है उसके तार दिग्गीराजा से ही जुड़े है क्योंकि न तो प्रदेशाध्यक्ष और न सीएम रहते हुए ही कमलनाथ कभी इस इलाके में आये।महल से कूटनीतिक मोर्चा राजा ही लेते रहे है इसलिए बरास्ता राहुल गांधी(जैसा कि आज चौधरी राकेश सिह ने कहा) नई खिचड़ी पकाने का प्रयास कमलनाथ करते है तो इसकी सफलता की संभावना कम ही होगी।राकेश के रूप में कमलनाथ का यह दूसरा हमला है दिग्गीराजा पर इससे पहले अशोक सिंह को प्रदेश महामंत्री से ग्वालियर ग्रामी न का अध्यक्ष बनाया जाना भी सियासी सन्देश देता था।तब जबकि अशोक सिंह गवलियर महानगर की दो सीटों से दावेदार थे।

  • छिंदवाड़ा मॉडल का फटा ढोल

    छिंदवाड़ा मॉडल का फटा ढोल

    कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाने के लिए कांग्रेस के जिन सयाने रणनीतिकारों ने छिंदवाड़ा मॉडल का ढोल पीटा था वे अब कहां हैं। जब छिंदवाड़ा माडल की कहानियां सुनाते कमलनाथ की कुंठित सत्ता का ढोल सरे चौराहे फट गया है तब वे सलाहकार जनता के सामने आने का साहस क्यों नहीं कर रहे हैं। कांग्रेस की सरकार के पतन के लिए असली जिम्मेदार तो वे ही हैं जिन्होंने कमलनाथ की उद्योगपति वाली छवि गढ़ने का काम किया था। नेहरू गांधी परिवार के कारिंदे के रूप में कमलनाथ बेहद असफल मुख्यमंत्री साबित हुए हैं। उन्होंने दस जनपथ के लिए रसद पानी जुटाने में भले ही सफलता पाई हो लेकिन मध्यप्रदेश की धरती पर वे एक लुटेरे शासक के रूप में ही पहचाने जाएंगे।सारी योजनाएं छिंदवाड़ा ले जाने और अन्य क्षेत्र के विधायकों के लिए खजाना खाली बताने की उनकी कंजूसी ने विधायकों को बेचैन कर दिया था। आते ही तबादलों और पोस्टिंग का जो ओछा कारोबार उन्होंने शुरु किया उसने प्रदेश भर में कोहराम मचा दिया।कांग्रेस की पिछली सरकारों ने ही अनाप शनाप नौकरियां बेचकर मध्यप्रदेश के वित्तीय प्रबंधन का कबाड़ा निकाला था। बाद की भाजपा सरकारों ने भी उसी माडल की लीक पकड़ ली। शिवराज सरकार के सलाहकार दिग्विजय सिंह और मुकेश नायक जैसे कांग्रेसी ही रहे हैं। लूट का जो साम्राज्य शिवराज सिंह चौहान की हवा हवाई शासनशैली की वजह से पनपा उससे प्रदेश में असंतोष को जगह बनाने का अवसर मिला था। शिवराज सिंह चौहान बेहद सफल कार्यकर्ता और प्रचारक रहे हैं।उन्होंने जनता के बीच लोकप्रियता भी पाई। इसके विपरीत वे कई मायनों में असफल भी साबित हुए। उन्होंने वोटरों की खेती की। तालियां बजवाने के लिए खैरातें बांटीं लेकिन वे प्रदेश को आत्मनिर्भर नहीं बना सके। इसे गरियाते कमलनाथ तो और भी फिसड्डी साबित हुए।उन्होंने आते ही जो झांकी पेली कि लोगों को लगा अब प्रदेश की समस्याओं का समाधान हो जाएगा। प्रदेश के मिलावटखोरों के खिलाफ शुद्ध के लिए युद्ध करते कमलनाथ का स्वागत किया गया लेकिन वे व्यापारियों के लुटेरे साबित हुए। उनके कार्यकाल में व्यापारियों से जो लूट खसोट की गई वह दर्दनाक थी। इसका सीधा असर प्रदेश की जनता पर पड़ा। व्यापारियों ने जरूरी सामानों की कीमतें बढ़ा दीं। अफसरों ने वसूली बढ़ा दी लेकिन मिलावटखोरी जस की तस रही। शहरों के मास्टर प्लान में अराजकता फैलाने के लिए भी कमलनाथ सरकार को कभी माफ नहीं किया जा सकेगा। रहवासी इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियां शुरु कर देना, अवैध संपत्तियों को रिश्वत लेकर वैध बना देना कमलनाथ के कारिंदों के लिए बाएं हाथ का खेल था। जिस तरह मंत्रालय के पांचवे तल पर कमलनाथ का गोपनीय आफिस चलता था उसे देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता था कि यहां कोई न कोई गलत काम जरूर हो रहा है। जनता से छिपाकर आखिर वे कौन सी जनता का भला करना चाह रहे थे। उनके कार्यकाल के फैसलों की विधिवत समीक्षा होनी चाहिए।इनमें से बहुत से फैसले निरस्त करने पड़ेंगे। प्रदेश की कानून व्यवस्था की स्थिति हो या वित्तीय व्यवस्था सभी की समीक्षा नए सिरे से करनी होगी तब जाकर पटरी से उतरी प्रदेश की गाड़ी को सीधा किया जा सकेगा। छिंदवाड़ा माडल का फटा ढोल तो सबने देख लिया है अब उस ढोल की पोल भी लोगों को दिखानी पड़ेगी। प्रयास करना होगा कि भविष्य में कोई राजनीतिक दल या सत्ता के दलालों का कोई गिरोह मध्यप्रदेश की सत्ता पर काबिज न हो सके। इसके लिए मौजूदा दलालों की फौज का सफाया करना जरूरी होगा।

  • कमलनाथ की कुर्सी बचाने में जुटे गोपाल रेड्डी

    कमलनाथ की कुर्सी बचाने में जुटे गोपाल रेड्डी

    भोपाल,17 मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)। तेज तर्रार आईएएस गोपाल रेड्डी को प्रदेश का प्रशासनिक मुखिया बनाकर मुख्यमंत्री कमलनाथ अपनी सत्ता के विरुद्ध हुई बगावत को काबू में करने का जतन करने में जुट गए हैं।रेड्डी के पद संभालते ही जेल विभाग ने पुरानी जेल के परिसर और भेल दशहरा मैदान को अस्थायी जेल में बदलने का आदेश जारी कर दिया है। ये तैयारी आने वाले दिनों में होने वाले किसी संभावित विद्रोह को देखते हुए की जा रही है। कमलनाथ यदि सुप्रीमकोर्ट और विधानसभा को धता बताते हुए कुर्सी छोड़ने पर राजी नहीं होते हैं तो संभावित जनांदोलनों पर नियंत्रण करने के लिए ये तैयारियां काम आ सकेंगीं।

    जेल विभाग के अवरसचिव अजय नथानियल ने विधानसभा के कार्यकाल के दौरान 13 अप्रैल तक ये नए जेल परिसर मान्य किए हैं। सरकार के खिलाफ होने वाले संभावित आंदोलनों में यदि अधिक लोग शामिल होते हैं तो उन्हें जेल पहुंचाने के बजाए इन परिसरों में ही निरुद्ध किया जा सकेगा। पुलिस और प्रशासन के बीच तालमेल जमाते हुए इस फैसले में प्रभारी पुलिस मुखिया रहे राजेन्द्र कुमार की सलाह की भूमिका मानी जा रही है।

    डीजी प्रशासन अकादमी बनाए गए सुधीरंजन मोहंती का कार्यकाल समाप्त होने के लगभग दो हफ्ते पहले की गई रेड्डी की नियुक्ति की वजह समझने में लोग सफल हो पाएं इससे पहले रेड्डी ने अपनी प्रशासनिक क्षमताओं पर पूरी तरह अमल शुरु कर दिया है।वे अपने त्वरित और दूरगामी फैसलों के लिए जाने जाते रहे हैं।

    सुधीरंजन मोहंती को इस महीने होने वाले रिटायरमेंट के बाद विद्युत नियामक आयोग का चेयरमेन बनना है। मुख्य सचिव पद पर रहते हुए ये नियुक्ति फिलहाल संभव नहीं थी। भले ही मुख्यमंत्री आदेश दे दें पर उसके ऊपर अमल तो मुख्य सचिव को ही करना पड़ता है। सरकार के खिलाफ उठी बगावत और अस्थिरता की स्थिति में यदि कमलनाथ सरकार बर्खास्त कर दी जाती है या सदन में बहुमत खो देती है तो फिर विद्युत नियामक आयोग की नियुक्ति का फैसला लटक सकता था। मुख्य सचिव के लिए ओएसडी बनाए जा चुके गोपाल रेड्डी की नियुक्ति भी नए हालात में खटाई में पड़ सकती थी।

    गोपाल रेड्डी ने पदभार संभालते ही अपने अनुकूल प्रशासनिक कसावट भी शुरु कर दी है। वे 1985 बैच के आईएएस हैं और लंबे समय से प्रदेश की प्रशासनिक जमावट से परिचित रहे हैं। समाज के सभी वर्गों से उनका जुड़ाव रहा है। ऐसे में माना जा रहा है कि कमलनाथ सरकार के खिलाफ उठ रहे असंतोष के स्वरों को वे संतुष्टि की आवाजों में बदल सकेंगे। इसके बावजूद फिलहाल कमलनाथ से नाराजगी के स्वर बहुत तेज हैं और उन्हें काबू में रखने के लिए राजदंड का प्रयोग करने की जरूरत भी पड़ रही है और नए मुखिया ने इस भूमिका पर अमल भी शुरु कर दिया है।

  • सत्ता के बूट से नहीं कुचली जाएगी ये बगावत

    सत्ता के बूट से नहीं कुचली जाएगी ये बगावत

    भोपाल,17मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)।मुख्यमंत्री कमलनाथ की कांग्रेस सरकार विदाई की बेला में है। उनकी पार्टी के ही 22 विधायकों ने अपनी सरकार के खिलाफ बगावत कर दी है। सरकार का प्रयास है कि उन विधायकों को डरा धमकाकर या पुटियाकर अपने खेमे में वापस लौटा लिया जाए और सरकार बचा ली जाए। बगावत को कुचलने के लिए कमलनाथ ने मुख्यसचिव और डीजीपी बदलकर प्रशासन और पुलिस के जेबी इस्तेमाल की तैयारी की है।इस तानाशाही भरे रवैये के बावजूद कमलनाथ की विदाई पल प्रतिबल और भी ज्यादा बलवती होती जा रही है। जैसे जैसे वे बगावत को कुचलने का षड़यंत्र रच रहे हैं उसका प्रतिरोध भी बढ़ता जा रहा है। सत्ता के इस दुरुपयोग से उन्होंने कांग्रेस के ही अन्य विधायकों की सहानुभूति भी खो दी है। सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद तो कमलनाथ के तमाम प्रयास नाकाफी साबित हो जाएंगे।

    बैंगलौर में बैठे विधायकों ने बाकायदा प्रेस वार्ता करके खुद के बंधक बनाने की बात झूठी साबित कर दी है। उन्होंने कहा कि हम अपनी मर्जी से सरकार के खिलाफ इस्तीफा देकर आए हैं और दुबारा चुनाव का सामना करने के लिए भी तैयार हैं। कमलनाथ सरकार जनहित के कार्यों की उपेक्षा कर रही थी हम इसलिए सरकार का विरोध कर रहे हैं। हमारे नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के काफिले पर जिस तरह सार्वजनिक तौर पर हमला किया गया उसे देखते हुए हमें अपनी सुरक्षा का खतरा है। सरकार हमें तोड़ने के लिए विविध हथकंडे अपना रही है। यदि हमें केन्द्रीय बलों की सुरक्षा दिलाई जाएगी तो हम भोपाल वापस आकर सदन के फ्लोर टेस्ट में भाग लेंगे। मध्यप्रदेश पुलिस सरकार के दबाव में है इसलिए हमें उस पर भरोसा नहीं है।

    सरकार के वित्तमंत्री तरुण भनोट और जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा बार बार कह रहे हैं कि विधायकों को यहां कोई खतरा नहीं है लेकिन कांग्रेस और कमलनाथ को करीब से समझने वाले विधायकों को सरकार के बयानों पर भरोसा नहीं है। दरअसल कमलनाथ ने डीजीपी वीके सिंह को हटाकर विवेक जौहरी को न केवल डीजीपी बना दिया है बल्कि उन्हें दो साल की सेवावृद्धि भी दे दी है। सरकार से उपकृत होने के बाद विवेक जौहरी ने पुलिस के और निजी बाऊंसर्स की सेवाएं सरकार को उपलब्ध कराई हैं। इन टोलियों में संविदा नियुक्ति वाले गुंडों को भी शामिल किया गया है। यही नहीं एक विधायक के नेतृत्व में गुंडों की एक टोली भी सक्रिय है जिसका मार्गदर्शन भोपाल के डीआईजी इरशाद वली कर रहे हैं।

    सरकार के प्रशासकीय नियंत्रण की कमान नए प्रशासनिक मुखिया गोपाल रेड्डी और प्रशासन अकादमी के डीजी बना दिए गए पूर्व सीएस सुधीरंजन मोहंती संभाल रहे हैं। कमलनाथ की जिस हेकड़ी भरी कार्यशैली की वजह से आज कांग्रेस की सरकार संकट में आई है उसके पीछे अफसर शाही का यही खुला दुरुपयोग प्रमुख वजह है। बागी विधायकों का दो टूक कहना है कि मुख्यमंत्री सचिवालय ने चुने हुए विधायकों को बाईपास करके अफसरों के माध्यम से लूट का तंत्र चला रखा है। उनके पास माफिया से मुलाकात के लिए तो समय है पर अपने विधायकों के लिए वक्त नहीं है।जनहितैषी योजनाएं बंद कर दी गई हैं या फिर उनका लाभ आम जनता को नहीं मिल पा रहा है।

    दरअसल जिस तरह से कमलनाथ की कार्यशैली को कांग्रेस के ही विधायकों ने नकार दिया है उससे सरकार अल्पमत में आ गई है। इस बगावत को कमलनाथ अपनी ही शैली में कुचलना चाह रहे हैं जो अब किसी भी तरह संभव नहीं है।कमलनाथ की विदाई तय है। यदि वे सत्ता में बने रहने के लिए गुंडागर्दी का सहारा लेने की कोशिश करेंगे तो मध्यप्रदेश में सत्ता संग्राम का खूनी माहौल बन जाएगा। इतिहास के आधार पर कमलनाथ इस बगावत को संविद सरकार के दौर से तुलना करके देख रहे हैं जबकि इस बार की बगावत ज्यादा परिष्कृत है और केन्द्र में भी एक ऐसी लोकतांत्रिक सरकार है जो किसी तानाशाही को छूट नहीं देगी।

  • महामहिम ने निकाली कमलनाथ की झूठी हेकड़ी

    महामहिम ने निकाली कमलनाथ की झूठी हेकड़ी

    भोपाल,15मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)। प्रदेश में बगावत के बाद अल्पमत में आई कमलनाथ सरकार की सारी हेकड़ी राज्यपाल महामहिम ने मुख्यमंत्री को भेजे अपने पत्र में ही निकाल दी है।उन्होंने कहा है कि विधायकों से प्राप्त जानकारी के अनुसार आपकी सरकार अल्पमत में आ चुकी है इसलिए राज्यपाल के अभिभाषण के तुरंत बाद आप सदन में विश्वासमत हासिल करें। यह कार्यवाही हर हाल में 16 मार्च को शुरु होगी और स्थगित,विलंबित या निलंबित नहीं की जा सकेगी।

    महामहिम लालजी टंडन ने मुख्यमंत्री कमलनाथ को 14 मार्च को लिखे पत्र में कहा है कि आपकी सरकार के 22 विधायकों ने अपने पद त्याग की सूचना विभिन्न माध्यमों से दी है। छह मंत्रियों के इस्तीफे विधानसभा ने भी मंजूर कर दिए हैं। ये स्थिति अत्यंत गंभीर है इसलिए प्रजातांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए आप सदन में विश्वास मत हासिल करें।

    कांग्रेस के पूर्व सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो जाने के बाद कांग्रेस के ही 22 सांसदों ने अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। वे विधायक बैंगलूरु के एक रिसार्ट में रह रहे हैं और वीडियो के माध्यम से उन्होंने पद त्याग की सूचना सार्वजनिक की है। कांग्रेस के कई अन्य मंत्रियों ने भी सुरक्षा की मांग करके सरकार के कामकाज के प्रति नाराजगी व्यक्त की है। इस्तीफा दे चुके जनसंपर्क मंत्री ने आज प्रेसवार्ता के माध्यम से आरोप लगाया कि कांग्रेस के 16 विधायकों को भाजपा ने बंदूक की नोंक पर बंधक बना रखा है। उन विधायकों पर सम्मोहित करने वाला जादू टोना किया गया है।

    इसी के साथ उन्होंने कैबिनेट बैठक में करोना वायरस के कहर की भी चर्चा का उल्लेख किया। कांग्रेस से जुड़े लोगों का कहना है कि होटल में ठहरे दो विधायकों में करोना वायरस से प्रभावित होने के लक्षण मिले हैं इसलिए वे सदन की कार्यवाही थोड़े दिनों के लिए स्थगित करने की मांग करेंगे। कैबिनेट बैठक के बाद सरकार के कई पूर्व मंत्रियों ने दावा किया कि कमलनाथ सरकार सदन में विश्वासमत हासिल कर लेगी। इन बड़बोले नेताओं ने खोखले दावे करते हुए कहा कि सरकार न केवल पांच साल का कार्यकाल पूरा करेगी बल्कि एक और बार सत्ता में आएगी।

    विकास की डींगें हांकते मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनके मंत्रियों की सारी हेकड़ी राज्यपाल लालजी टंडन के इस पत्र से आज निकल गई है। पूर्व वित्तमंत्री तरुण भानोट तो इसके बाद कहते सुने गए कि हमने किसानों के दो लाख तक के कृषि ऋण माफ करने का वादा किया था किसी भी प्रकार के ऋण माफ करने का वादा हमने कभी किया ही नहीं। इसी तरह अन्य वादों की असफलताओं को लेकर पूर्व मंत्रियों ने दबे स्वरों में स्वीकार किया कि सरकार की कई नीतियां अपेक्षाकृत रूप से सफल नहीं हो पाईं हैं। सरकार की नीतियों की असफलता की वजह से ही कांग्रेस के भीतर असंतोष फूटा और उनकी सरकार आज विदाई की दहलीज पर पहुंच गई है। हम मुख्यमंत्री कमलनाथ को उद्योगपति के रूप में प्रचारित किए जाने वाले वादों से प्रभावित हो गए थे जबकि सत्ता में आने के बाद वे सरकारी तंत्र और व्यापारियों की लूट के हथकंडे अपनाते देखे गए।

  • कमलनाथ की कलाकारी की इकानामी और कटौती का रुदन

    कमलनाथ की कलाकारी की इकानामी और कटौती का रुदन

    मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार ने जनता से जुड़ी योजनाओं में कटौती करके बाजार में सूनापन ला दिया है। बजट की तैयारी में जुटे वित्तमंत्री तरुण भनोट भी कह रहे हैं कि केन्द्र की भाजपा सरकार ने फरवरी 2019 में जारी बजट अनुमान में मध्यप्रदेश को 63,750.81 करोड़ राशि आवंटित की थी। वर्ष 2020 के फरवरी माह के पुनरीक्षित अनुमान में यह राशि घटाकर 49,517.61 करोड़ कर दी गई। जोकि 14,233 करोड़ रुपए कम है।देश भर में कांग्रेस से जुड़े औद्योगिक घराने हों या व्यापारिक प्रतिष्ठान सभी बेरोजगारी के आंकड़े बढ़ाने का अभियान चलाए हुए हैं। वे ये जताने की कोशिश कर रहे हैं कि मोदी सरकार ने समानांतर अर्थव्यवस्था को खत्म करने का जो अभियान नोटबंदी से चलाया था वह असफल हो गया है। इसकी वजह से कंपनियां बंद हो रहीं हैं और रोजगार के साधन छिन गए हैं। राज्यों से मिलने वाली राशि का हिस्सा केन्द्र ने घटा दिया है जिससे राज्यों में वित्तीय संकट आ गया है। इस जैसी कई कहानियों से कमलनाथ सरकार अपनी असफलताओं पर पर्दा डालने का प्रयास कर रही है। जनता को बरगलाने वाले उनके धूर्त पहरुए भी यही डमरू बजा रहे हैं। हकीकत इससे बिल्कुल विपरीत है।

    हाल ही में पूर्व केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा राजधानी आए और उन्होंने केंद्रीय बजट में मध्यप्रदेश की हिस्सेदारी कम किए जाने के आरोप का जवाब देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री कमल नाथ का कटौती वाला बयान पूरी तरह राजनीतिक है।वास्तव में राज्य सरकार केंद्र की योजनाओं के पैसे का न तो उपयोग कर रही है, न ही उपयोगिता प्रमाणपत्र दे रही है. केंद्र की कोई भी योजना हो, उसका पैसा इसलिए उपलब्ध है क्योंकि केन्द्र ने उनके लिए स्पष्ट प्रावधान किए हैं,जबकि राज्य की सरकार योजनाओं का काम ही आगे नहीं बढ़ा रही है.”

    जयंत सिन्हा ने कहा कि केंद्र सरकार हर कदम पर मध्यप्रदेश के लोगों के साथ खड़ी है और मौजूदा बजट में भी प्रदेश के किसानों के लिए, सिंचाई सुविधाओं के लिए, नेशनल हाइवे और एयरपोर्ट के विकास के लिए कई प्रावधान किए गए हैं।उन्होंने केंद्रीय बजट की प्रशंसा करते हुए कहा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने जो बजट प्रस्तुत किया , उसमें देश के, समाज के हर वर्ग को लाभ मिल रहा है, इसलिए यह जन-जन का बजट है. समाज के गरीब तबके को पक्का घर देने के बाद केंद्र सरकार ने अब हर नल में जल पहुंचाने की व्यवस्था की है, तो गृहिणियों को महंगाई से राहत देने, कुकिंग गैस उपलब्ध कराने और उनके खाते खोलने की व्यवस्था की गई है. उद्योगपतियों को कार्पोरेट टैक्स का फायदा है, तो मध्यम वर्ग को आयकर में राहत मिली है. युवाओं के लिए स्वरोजगार और स्किल डेवलपमेंट के प्रावधान हैं, तो इस बजट के माध्यम से निवेशकों की भी मदद की गई है.

    सिन्हा ने कहा, “प्रधानमंत्री मोदी ने देश की अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य तय किया है और हम उसी तरफ बढ़ रहे हैं. केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत बजट इसी लक्ष्य को हासिल करने का पॉलिसी रोडमैप है.”उन्होंने कहा कि बजट 2020-21 में उपभोग, निवेश और स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन दिया गया है. इसका लाभ तो सभी को मिलेगा ही, यह अर्थव्यवस्था के विकास और विस्तार को भी गति देगा. सरकार ने अर्थव्यवस्था के विकास को गति देने के लिए बजट में जो प्रावधान किए हैं, उससे विकास दर तेजी से बढ़ेगी और जल्द ही उसके 7.5 प्रतिशत पर पहुंच जाने की आशा है. केंद्र सरकार ने राजकोषीय घाटे को नियंत्रण में रखने के सफल उपाय किए हैं।

    दरअसल कांग्रेस की कमलनाथ सरकार पुरानी दो खातों वाली अर्थव्यवस्था को मजबूत बना रही है जिससे काला धन बनाया जाता रहा है। देश के सार्वजनिक बैंकों की 85 फीसदी से अधिक पूंजी चंद औद्योगिक घरानों के हाथों में थमाकर जो फर्जी विकास के प्रतिष्ठान खड़े किए गए थे उन पर एनपीए की राशि वसूली के अभियान और सरफेसी एक्ट के चलते तालेबंदी होने लगी है। इसके विपरीत रोजगार बढ़ाने के लिए जो राशि सीधे नव उद्यमियों को आबंटित की जा रही है उससे देश भारी पूंजीकरण हुआ है। कुप्रचार में भले ही बार बार बेरोजगारी की बात कही जा रही हो लेकिन हकीकत में जो राशि बाजार में पहुंची है उसने न केवल रोजगार के अवसर बढ़ाए हैं बल्कि उपभोक्ताओं की खरीद क्षमता भी बढ़ाई है। बैंकों के खजाने भर गए हैं और वे सस्ती दरों पर कर्ज देने के लिए उद्यमियों के चक्कर काट रहे हैं। जाहिर है कि नए स्टार्टअप कारोबार बढ़ाने में सहयोगी साबित हो रहे हैं।

    वित्त मंत्री तरुण भनोत का कहना है कि केन्द्रीय योजनाओं में राज्यों की हिस्सेदारी यूपीए सरकार के समय 25 प्रतिशत थी जिसे वर्तमान एनडीए सरकार ने बढ़ाकर 40 और कुछ योजनाओं में 50 प्रतिशत तक कर दिया था। इस प्रकार राज्य के अंशदान में 60 से 100 प्रतिशत तक की वृद्धि की गई है। ये सब कहते हुए वे केन्द्र पर ज्यादा पूंजी जुटाने का आरोप लगा रहे हैं। हकीकत ये है कि केन्द्र की योजनाओं का लाभ मध्यप्रदेश समेत देश के तमाम राज्यों को मिल रहा है। पूंजी के बढ़े उत्पादन का लाभ भी सीधे राज्यों को ही तो मिल रहा है।

    पूंजी के बढ़ते संसाधनों के बावजूद उद्योगपति कहे जाने वाले कमलनाथ और रेत के कारोबारों में भागीदारी करने वाले वित्तमंत्री तरुण भनोत जनता को तरसाकर वित्तीय संकट का रोना रो रहे हैं। वे ये समझने भी तैयार नहीं हैं कि उनके घटिया वित्तीय प्रबंधन से प्रदेश की तो विकास दर प्रभावित हो ही रही है साथ में देश की विकास दर भी अपेक्षाकृत तौर पर गति नहीं पकड़ पा रही है। कल्याणकारी योजनाओं में सीधी कटौती करके कमलनाथ सरकार जो तीन हजार करोड़ रुपए बचाने का दावा कर रही है उससे अधिक राशि वह उन फर्जी योजनाओं पर खर्च कर चुकी है जिनसे भारी तादाद में काला धन बन रहा है। इस काले धन के निवेश से चंद औद्योगिक घरानों को बुलाकर कमलनाथ ये जताने का प्रयास कर रहे हैं कि देश का उद्योग जगत उनके इशारे पर चलता है। हालांकि ये उद्योग वे ही हैं जो भारी तादाद में रोजगार छीनने के लिए जाने जाते रहे हैं। आईटीसी ने जिस अगरबत्ती और बीड़ी उद्योग पर कब्जा जमाकर करोड़ों मजदूरों का रोजगार छीना है उसे रोजगार प्रदाता बताने की कोशिश से कमलनाथ की नीतियों की पोल सरे बाजार खुल रही है।

    भारतीय जनता पार्टी के राज्यस्तरीय तमाम नेता पिछले पंद्रह सालों से कांग्रेस की उसी सरकारीकरण और चोर बाजार वाली अर्थव्यवस्था की पैरवी करते रहे हैं जिसकी वजह से भारतीय रुपए की साख नहीं बढ़ सकी थी। आज वे भारत सरकार की श्वेत इकानामी का रहस्य भी नहीं समझ पा रहे हैं। यही वजह है कि भाजपा के नेता कमलनाथ सरकार की नीतियों का खुला विरोध नहीं कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की वजह से भाजपा ने कई राज्यों की सत्ताएं गंवा दी हैं। जबकि हकीकत में उनकी नासमझी भरी पिछलग्गू नीतियों की वजह से देश की अर्थव्यवस्था तेजी नहीं पकड़ सकी थी। पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह जिस इंस्पेक्टर राज के कभी न लौटने की बात कहते थे उनकी ही पार्टी की कमलनाथ सरकार आज इंस्पेक्टर राज की सहायता से भारी तादाद में काला धन जुटा रही है। तबादलों और पोस्टिंग से मौजूदा सरकार ने जितना काला धन जुटाया है वही अपने आप में एक रिकार्ड है। इसके बावजूद ये काला धन स्थानीय उद्योग और रोजगार बढ़ाने में उपयोगी साबित नहीं हो पा रहा है। आज देश में जो वित्तीय टूल विकसित हो गए हैं उनकी वजह से काले कारोबारियों की धरपकड़ सरल हो गई है। ये बात जरूर है कि अमले की कमी की वजह से सभी पर कार्रवाई नहीं हो पा रही है लेकिन ये भी तय है कि आज नहीं तो कल वे जरूर धरे जाएंगे तब उन्हें कमलनाथ के छिंदवाड़ा माडल के छेद स्पष्ट नजर आने लगेंगे। जीएसटी और आयकर विभाग की क्षमता यदि नहीं बढ़ाई गई तो आर्थिक संकट का रोना रोते कांग्रेसी नेतागण देश को रूस जैसे पतन की राह पर ढकेलते रहेंगे।

  • कमलनाथ का सिख दंगों से कोई नाता नहीं -पीसी शर्मा

    कमलनाथ का सिख दंगों से कोई नाता नहीं -पीसी शर्मा

    भोपाल,6 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। दिल्ली में 1984 के सिख विरोधी दंगों से मुख्यमंत्री कमलनाथ का कोई लेना देना नहीं है। इस मुद्दे पर अब तक बिठाए गए आयोगों ने भी कमलनाथ को दोषी नहीं पाया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसके बावजूद सदन में कहा कि कांग्रेस ने सिख दंगों के आरोपों के बाद भी कमलनाथ को मुख्यमंत्री बना रखा है। ये तथ्य गलत है और प्रधानमंत्री जैसे पद पर बैठे व्यक्ति को ये कहना शोभा नहीं देता। आज राजधानी के जनसंपर्क संचालनालय में आयोजित पत्रकार वार्ता में श्री शर्मा ने दावा किया कि श्री कमलनाथ के नेतृत्व में प्रदेश विकास की ओर बढ़ रहा है।

    जब उन्हें बताया गया कि सिख दंगों के दौरान इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्टर संजय सूरी ने अपनी आंखों देखी घटना के बाद अपने अखबार में खबर छापी थी।जिसमें लिखा गया था कि स्वयं कमलनाथ ने सेंट्रल दिल्ली के रकाबगंज गुरुद्वारे के बाहर भीड़ का नेतृत्व किया था और उनकी उपस्थिति में दो सिख मारे गए थे। इस मामले की जांच करने वाले नानावटी आयोग ने कमलनाथ को संदेह का लाभ दिया था।जांच आयोग ने दो लोगों की गवाही सुनी थी, जिसमें तत्कालीन इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्टर संजय सूरी भी शामिल थे। उन्होंने कमलनाथ के मौके पर मौजूद होने की पुष्टि की थी। कमलनाथ ने यह स्वीकार किया था कि वे वहां मौजूद थे और भीड़ को शांत करने की कोशिश कर रहे थे।

    पिछले दिनों शिरोमणी अकाली दल के सदस्य और दिल्ली के विधायक मनजिंदर सिंह सिरसा ने मांग की थी कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तुरंत कमलनाथ को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देने के लिए कहें। उन्होंने दो गवाहों के लिए भी सुरक्षा की मांग की थी जो कमलनाथ के खिलाफ अदालत में गवाही देने के लिए तैयार हैं।

    केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने गृह मंत्रालय के सिख विरोधी दंगों का केस वापस खोलने के फैसले का स्वागत किया था। हरसिमरत बादल ने अपने ट्वीट में लिखा था कि ‘मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के खिलाफ मुकदमे को फिर से खोलना सिखों की जीत है। गलत तरीके से हल किए गए मामलों को फिर से खोलने के हमारे निरंतर प्रयासों का नतीजा है। अब कमलनाथ अपने अपराधों की कीमत चुकाएंगे.’

  • सरकार की धूर्तता उजागर करने का धर्म निभाए प्रेस

    सरकार की धूर्तता उजागर करने का धर्म निभाए प्रेस

    प्रदेश भर के पत्रकार संगठन कल पांच फरवरी को सरकार से अपनी नाराजगी जताने भोपाल में इकट्ठे हो रहे हैं। उनकी नाराजगी की वजह सरकार की ओर से दिए जाने वाले विज्ञापनों में मनमानी कटौती करना है। पूर्व की शिवराज सिंह सरकार को विज्ञापन वाली सरकार बताकर सत्ता में आई कमलनाथ सरकार शुरु से प्रेस विरोधी रही है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की प्रेस के प्रति बदनीयती को देख चुकने के बावजूद ढेरों पत्रकारों ने कांग्रेस को सत्ता में लाने का एजेंडा चलाया था। इन्हीं पत्रकारों ने छिंदवाड़ा मॉडल को प्रदेश के विकास का राजमार्ग बताया था। ये वही पत्रकार थे जो शिवराज सिंह चौहान की सरकार की नालायकियों पर भी वाहवाही कर रहे थे। शिवराज की भाजपा भी उन्हीं पत्रकारों पर लट्टू थी जो अंधाधुंध कर्ज लेकर किए जा रहे विकास को प्रदेश का भविष्य बता रहे थे। हर साल तकरीबन पांच सौ करोड़ रुपए विज्ञापन के नाम पर खर्च करके शिवराज सरकार ने सौजन्य का वातावरण बनाया था। ये पांच सौ करोड़ रुपए प्रदेश के दो लाख दस हजार करोड़ के बजट का बहुत छोटा हिस्सा होता था। ये जानते बूझते कमलनाथ सत्ता में आने के बाद से प्रेस को जूता दिखा रहे हैं। यही वजह है कि पत्रकार उनसे खफा हैं और वे कमलनाथ विहीन सरकार की मांग कर रहे हैं।

    भाजपा को विज्ञापन वाली सरकार बताने वाले कमलनाथ ने भी सत्ता में आने के साल भर में लगभग चार सौ करोड़ रुपए विज्ञापन पर खर्च कर दिए हैं।वित्तीय वर्ष में ये राशि पांच सौ करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी होगी। अपनी इस हिकमत अमली में प्रबंधन की महारथ दिखाते हुए कमलनाथ ने लगभग बारह हजार पत्रकारों का टेंटुआ दबा दिया है। इन पत्रकारों के छोटे छोटे अखबार सरकार की ओर से मिलने वाले लगभग साठ हजार रुपए सालाना के सहारे परिवार चलाते थे और लोकतंत्र की जय जयकार करते थे। इसमें आधी राशि वह थी जो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती थी। लगभग नाममात्र की धनराशि के सहारे ये छोटे पत्रकार लोकतंत्र के नाम पर लूट करने वाले अफसरों और बाबुओं की खैरखबर लेते रहते थे। आज वे सरकार के खिलाफ लामबंद क्यों हैं इस रहस्य को समझना कठिन नहीं है।

    कांग्रेस की राजमाता इंदिरा गांधी ने सरकारीकरण और उद्योगों के राष्ट्रीयकरण को जिस तरह देश का भाग्य विधाता बताया था उसकी पोल खुद कांग्रेसी ही खोल चुके हैं। पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह ने जिस तरह नरसिम्हाराव की सरकार के वित्तमंत्री रहते हुए इस सरकारीकरण से मुक्ति का जो अभियान चलाया वो आज 29 साल बाद भी अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया है।वे कहते थे कि इंस्पेक्टर राज अब कभी नहीं लौटेगा। इसके बावजूद कांग्रेस की भ्रष्ट सरकारें हों या फिर कांग्रेस की पूंछ पकड़ू शिवराज सिंह चौहान जैसी सरकारें कोई भी भ्रष्टाचार के राजमार्ग को छोड़ने तैयार नहीं हैं। कमलनाथ ने तो आपातकाल के दौरान अपनाए गए फार्मूले का इस्तेमाल करके उस इंस्पेक्टर राज की वापिसी कर दी है।

    शिवराज सिंह चौहान की अति लोकप्रिय सरकारों ने कर्ज लेकर विकास के नाम पर पैसा बांटने का जो महारथ हासिल किया था उससे खैरात तो बंटती रही लेकिन विकास का ढांचा तैयार नहीं हो सका। आधारभूत ढांचे के विकास के नाम पर कर्ज लेकर शिवराज सरकार ने ढेरों कल्याणकारी योजनाएं चलाईं जिसकी वजह से लोगों में आज भी शिवराज के प्रति सदाशयता का भाव बना हुआ है। इसके बावजूद आय के आत्मनिर्भर संसाधन नहीं बन सके हैं। भारी बेरोजगारी से जूझ रहे प्रदेश को ये हकीकत अब समझ आ रही है जब कमलनाथ सरकार ने फोकट धन बांटने वाली योजनाएं बंद करना शुरु कर दीं हैं। इसके बावजूद सरकारी तंत्र की आड़ में खजाना उलीचने की परंपराएं आज भी जारी हैं।

    यही वजह है कि कमलनाथ सरकार ने भी सत्ता में आने के बाद खजाना लूटना जारी रखा है। सही मायनों में कमलनाथ सरकार दोहरी लूट कर रही है। सरकारी खजाने को लूटने वालों पर अंकुश लगाने के बजाए उसने तबादलों और पोस्टिंग का जो बेशर्मी भरा नंगा नाच किया उसने खजाने को बुरी तरह क्षतिग्रस्त किया है। हर तबादला भारी भरकम चंदा लेकर ही किया गया। ये अफसर जब नई पोस्टिंग पर गए तो उसका खर्च प्रदेश सरकार को वहन करना पड़ा। कई पदों पर बड़े अफसर तो दो से तीन करोड़ रुपए तक की रिश्वत लेकर गए थे इसलिए उन्होंने नया पद संभालते ही वसूलियां शुरु कर दीं। यही वजह है कि प्रदेश का खजाना तो खाली होता गया पर रिश्वतखोरों की चांदी हो गई। ये सब उस दौर में हुआ है जब कमलनाथ मिलावटखोरों और माफिया के विरुद्ध अभियान चला रहे हैं। अफसरों ने इस आड़ में प्रदेश को भरपूर लूटा क्योंकि वे तो इसके लिए सरकार को चंदा पहले ही दे चुके थे।

    शिवराज सिंह सरकार से सुविधा शुल्क लेने में मगन प्रेस इन सब गड़बड़झाले की रिपोर्ट करने को तैयार नहीं है। वह आज भी सोच रही है कि कमलनाथ कभी तो पसीजेंगे। आखिर उनकी भी पार्टी को चुनाव में जाना है। वे आज नहीं तो कल शिवराज की वही परिपाटी शुरु कर देंगे जिसने प्रेस को सुविधाभोगी बनाकर घरों तक सीमित कर दिया था।

    कमलनाथ की सरकार हर वित्तीय वर्ष में सरकारी अमले के वेतन पर 75 हजार करोड़ रुपए खर्च कर रही है। उसे इस अमले से एक लाख अस्सी हजार करोड़ की आय का अनुमान था।वित्तमंत्री तरुण भानोट ने डींगे हांकते हुए दो लाख दस हजार रुपए खर्च करने का दावा किया था। उनका कहना था कि हम वसूलियां इतनी ज्यादा करेंगे कि विकास के लिए इससे ज्यादा राशि जुटा लेंगे। इसके विपरीत सरकार की बदनीयती के चलते राज्य का खर्च भी नहीं निकल पाया है। उलटे सरकार ने लगभग इक्कीस हजार करोड़ का नया कर्ज ले डाला है। ये कर्ज भी भारी ब्याज पर लिया गया है।

    बैंक डिफाल्टरों से चंदा वसूली के लिए उन्हें सरकारी ठेकों में शामिल करके सरकार और उसके मंत्रियों ने जो चंदा वसूला है उससे वे टाकीज और अस्पताल खरीद रहे हैं। पांच सितारा होटलें बना रहे हैं। उद्योगों में भागीदारी बढ़ा रहे हैं। प्रदेश के लोगों को वे खजाना खाली होने का रोना सुना रहे हैं।

    सरकार के सामने विज्ञापनों का रोना रोने वाले पत्रकार ये पूछने को भी राजी नहीं हैं कि प्रदेश के मालिक कहलाने वालों के पास ऐसी कौन सी जादू की छड़ी है जो उन्होंने हजारों करोड़ रुपयों की दौलत जुटा ली है। उनके बेटे नशे में डूबे रहने के बाद भी हजारों करोड़ रुपयों की संपत्तियों के मालिक बन बैठे हैं। देश की जांच एजेंसियों ने उनके रिश्तेदारों से जो बयान लिए हैं उनमें साफ हो चुका है कि ये दौलत कहां से जुटाई गई है,इसके बावजूद प्रदेश के अखबार आईफा अवार्ड को प्रदेश का भाग्य संवारने का फार्मूला बता रहे हैं। पत्रकारों को चाहिए कि वे दुर्घटना और षड़यंत्रों से आई कमलनाथ सरकार की असलियत प्रदेश की जनता के सामने उजागर करें। जनता का विश्वास जीतें और अपने पैर मजबूत करें। अच्छी पत्रकारिता के लिए इससे अच्छा समय शायद फिर कभी न मिल पाएगा।

  • स्थापित उद्योगों के सहारे एमपी के सीईओ दिखना चाहते हैं कमलनाथ

    स्थापित उद्योगों के सहारे एमपी के सीईओ दिखना चाहते हैं कमलनाथ

    अरुण पटेल

    बतौर मुख्यमंत्री अपने कार्यकाल के अंतिम कुछ सालों में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अक्सर बढ़चढ़ कर यह दावा करते रहे कि वे मुख्यमंत्री नहीं बल्कि प्रदेश के सीईओ हैं, लेकिन सच्चे अर्थों में प्रदेश के वास्तविक सीईओ के रुप में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और मुख्यमंत्री कमलनाथ अपनी एक ऐसी छवि गढ़ रहे हैं जिसमें राजनेता के साथ ही एक कुशल प्रशासक के भी गुण मौजूद दिखाई पड़ने लगे हैं। कमलनाथ के पास विकास की वैश्‍विक दूरदृष्टि होने के साथ ही विकास का मॉडल स्थानीय जमीनी आवश्यकताओं के अनुसार क्या हो, इन दोनों का समन्वय उनके व्यक्तित्व में है। प्रशासनिक व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने और ‘वक्त है बदलाव का’ अपना चुनावी वायदा पूरा करने की दिशा में कमलनाथ सरकार आगे बढ़ रही है। दशकों बाद मंत्रालय में मुख्यमंत्री के रुप में एक ऐसा चेहरा विराजमान है जिसकी प्रशासन पर मजबूत पकड़ बन रही है और वे आला अधिकारियों को बताते हैं कि उन्हें क्या करना है और कैसे होगा। कमलनाथ का कहना है कि मेरी सरकार ‘आउटसोर्स’ की नहीं है। अब जब अधिकारी मेरे पास आते हैं और कैसे क्या करना है पूछते हैं तो मैं उन्हें बताता हूं कि कैसे काम करना है और क्या काम करना है एवं सरकार कैसे चलती है।


    मेरी सरकार आउटसोर्स की सरकार नहीं है यह कहते हुए कमलनाथ पूर्ववर्ती शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार पर तंज कसते हैं। समझा जाता है कि पूर्ववर्ती शिवराज सरकार के कार्य संचालन के मामले में उनकी यह पक्की धारणा रही है कि उस समय पांच-छह अधिकारियों को सरकार आउटसोर्स कर दी थी और वे जो चाहते थे वही होता था। जहां तक कमलनाथ का सवाल है चाहें वे मुख्यमंत्री हों, मंत्री रहे हों या सांसद उनकी कार्यशैली स्वाभाविक रुप से सीईओ की ही रही है, जबकि शिवराज पहली बार सीधे मुख्यमंत्री बने थे और उन्होंने अपने ढंग से सरकार चलाई थी। पहले और दूसरे कार्यकाल में शिवराज ने भी सामाजिक सरोकारों से जुड़ी खासकर लाडली लक्ष्मी और मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन तथा मुख्यमंत्री कन्यादान योजना जैसी कुछ ऐसी योजनायें चलाई थीं, जिनके चलते उनका अपना एक आभामंडल बना था और बहनों के भाई एवं भांजे-भांजियों के मामा तथा वृद्धजनों के लिए श्रवण कुमार बन गए थे। लेकिन यह भी सही है कि उनके कार्यकाल के आखिरी दो-तीन सालों में जैसा कमलनाथ कह रहे हैं वैसी ही स्थिति बन गयी थी।


    राजनीतिक हल्कों में यह बात मानी जाती थी कि कमलनाथ एक साथ वैश्‍विक सोच एवं जमीनी आवश्यकताओं के साथ पिछड़े से पिछड़े इलाके को कैसे विकसित किया जाए यह भलीभांति जानते हैं। आला प्रशासनिक अधिकारी और मध्यप्रदेश आईएएस एसोसिएशन के अध्यक्ष आई.सी.पी. केशरी कहते हैं कि हमारे सी.एम. डायनमिक ग्लोबल हैं और हम सब राज्य की उम्मीदों पर खरे उतरेंगे। आईएएस आफीसर्स एसोसिएशन की सर्विस मीट 2020 के उद्घाटन अवसर पर केशरी ने कहा कि नये आने वाले अफसरों को शायद अपने मुख्यमंत्री के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं है, इसकी वजह यह है कि उन्होंने उनके साथ काम नहीं किया है। उन्होंने एक उदाहरण देकर कहा कि जिनेवा में डब्ल्यूटीओ के सम्मेलन में एक बार किसानों के हितों को लेकर 90 देशों के मंत्रियों ने कमलनाथ के नेतृत्व में वाकआउट कर दिया था। एक बार विकासशील देशों के लिए पश्‍चिमी देशों की एक बैठक में अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश भी आये थे, उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने परिचय कराते हुए कहा कि ये वाणिज्यिक मंत्री कमलनाथ हैं, इसके पूर्व ही बुश बोल उठे कि मैं इन्हें जानता हूं, इन्होंने हमारे मंत्रियों को परेशान किया हुआ है। इस पर कमलनाथ ने कहा कि ऐसा नहीं है हमारे अच्छे सम्बन्ध हैं, उनकी इस हाजिर जवाबी के कारण सभी उनकी ओर देखने लगे थे।


    कांग्रेस अक्सर शिवराज सरकार पर भू-माफिया, खनन माफिया को फलने-फूलने का आरोप लगाती रही थी। चुनाव के समय भी कांग्रेस ने इसे एक बड़ा मुद्दा बनाया था। उसका आरोप था कि पिछले भाजपा सरकार के कार्यकाल के दौरान रेत माफिया, भू-माफिया, बिल्डर माफिया और अनेक प्रकार के माफिया इस कदर तेजी से उभरे थे कि एक प्रकार से प्रदेश माफियाओं के मकड़जाल में फंस गया था। कांग्रेस का कहना है कि इन सभी माफियाओं पर अपने-पराये या राजनीतिक प्रतिबद्धताओं से परे समान रुप से कड़ी कार्रवाई कमलनाथ कर रहे हैं और इसमें किसी प्रकार के हस्तक्षेप को प्रश्रय नहीं मिल पा रहा है। अपने चुनावी वायदों को तेजी से पूरा करने के साथ ही कमलनाथ की प्राथमिकता प्रदेश में नये उद्योग लगाने की रही है और इस मामले में एक यथार्थवादी दृष्टिकोण से वे आगे बढ़ रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस मीडिया विभाग के उपाध्यक्ष अभय दुबे का दावा है कि प्रदेश में औद्योगिक निवेश का एक विश्‍वसनीय माहौल बना है और लगभग 30 हजार करोड़ रुपये के निवेश के प्रोजेक्ट की बुनियाद बीते एक साल के कार्यकाल में रखी गई है। लगभग 70 हजार करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट के लिए, उन्हें भूमि आवंटन सम्बन्धी प्रक्रिया भी पूरी कर ली गयी है। उनका कहना है कि मध्यप्रदेश में औद्योगिक निवेश के परिवेश को देखा जाए तो पिछले पन्द्रह साल की तुलना में कमलनाथ सरकार का एक साल का कार्यकाल भाजपाई शासन का पर्दाफाश कर रहा है और भाजपा के पन्द्रह साल की अवधि प्रदेश के औद्योगिक निवेश के लिए अभिशाप साबित हुई है। दुबे का आरोप है कि शिवराज सरकार के समय 2007 से 2016 तक आयोजित अनेकों ग्लोबल इन्वेस्टर समिट में बड़े पैमाने पर औद्योगिक निवेश में 17 लाख करोड़ के गननचुम्बी निवेश के दावे किए गए थे, किन्तु नतीजा सिफर रहा और केवल 50 हजार करोड़ का ही निवेश आ पाया। दुबे का दावा है कि कमलनाथ सरकार औद्योगिक निवेश का स्वर्णिम भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर रही है और उसने 30 हजार करोड़ रूपये की बुनियाद भी रख दी है जबकि समूचा देश केन्द्र की भाजपा सरकार की अदूरदृष्टि के चलते भयंकर आर्थिक मंदी की चपेट में आ गया है, जबकि मध्यप्रदेश में निवेशकों की कतार लग गयी है। मध्यप्रदेश का पीथमपुर हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा फार्मा हब बन गया है। यहां सिपला फार्मा ने 600 करोड़ रुपये के निवेश की बुनियाद यहां रखी है। जो बड़े निवेशक आये हैं उनमें अजंता फार्मा ने 500 करोड़ रुपये का निवेश किया है। न्यू जर्सी की कम्पनी पार फार्मा ने 400 करोड़ का निवेश किया है मेक्लाईड नेे भी 400 करोड़ का निवेश किया है। इसके साथ ही उन्होंने आंकड़ों के हवाले से औद्योगीकरण की दिशा में बढ़ते प्रदेश का खाका भी प्रस्तुत किया।

    एक तरफ मुख्यमंत्री कमलनाथ जहां प्रदेश का औद्योगिक परिवेश बदलने के लिए भिड़े हुए हैं तो वहीं वे उन पर किए जा रहे किसी भी तंज का जवाब उसी लहजे में देने से नहीं चूक रहे। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष व केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने जबलपुर में सीएए के समर्थन में एक रैली को सम्बोधित करते हुए कमलनाथ पर निशाना साधा और कहा कि वे सोनिया मैडम के दरबार में अपनी सीआर सुधारने में लगे हैं और जोरशोर से बोल रहे हैं कि प्रदेश में सीएए लागू नहीं होगा। उनकी उम्र चिल्लाने की नहीं रही है, स्वास्थ्य बिगड़ जायेगा। इस पर कमलनाथ ने भी पलटवार करते हुए कहा कि मेरी उम्र नहीं काम देख रही है प्रदेश की जनता, 365 दिनों में 365 वायदे पूरे किए हैं हमारी सरकार ने, आप प्रदेश की जनता और जनादेश दोनों का अपमान कर रहे हैं। हमने एक साल में प्रदेश में बदलाव लाकर दिखा दिया है और वायदे पूरे कर जनता का भरोसा कायम रखा है, हम काम में विश्‍वास रखते हैं झूठे वायदों में नहीं। इसी उम्र में जनता ने मुझ पर भरोसा कर भाजपा के कई युवा उम्मीदवारों की उम्मीद पर पानी फेरा है। आप कांग्रेस को नहीं जनता को समझाइए जो इस सच को जानती है कि केन्द्र सरकार अपनी असफलताओं को छुपाने के लिए सीएए और एनआरसी जैसे कानून थोपने का काम कर रही है। कमलनाथ ने शाह को सलाह दी कि अधिक बेहतर होता आप सीएए के समर्थन में रैली व जनसभा के लिए उन राज्यों में जाते जहां हिंसा हुई है। प्रदेश की शान्त धरती पर कानून के नाम पर गुमराह करने व फिजा खराब करने के लिए आपके यहां आने की आवश्यकता नहीं है। 

    यह लेख सुबह सवेरे से आभार सहित लिया गया है। इसका मकसद मुख्यमंत्री कमलनाथ की आकांक्षाओं को अपने पाठकों तक पहुंचाना मात्र है। लेखक को उपलब्ध कराए गए तथ्यों ,वक्तव्यों, राय आदि से प्रेस इंफार्मेशन सेंटर की सहमति होना आवश्यक नहीं है।

  • प्रदेश को आर्थिक शक्ति बनाएं अफसरों से बोले कमलनाथ

    प्रदेश को आर्थिक शक्ति बनाएं अफसरों से बोले कमलनाथ

    तीन दिवसीय आईएएस सर्विस मीट 2020

    भोपाल 17 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। मुख्यमंत्री कमल नाथ ने कहा है कि देश में मध्यप्रदेश ही ऐसा प्रदेश है, जो विविधताओं से सम्पन्न है और पूरे विश्व में भारत ही ऐसा देश है, जो विविधताओं से पूर्ण है। इस विविधता को सकारात्मक ऊर्जा में बदलना होगा। उन्होंने कहा कि विविधता में भारत की बराबरी करने वाला देश सिर्फ सोवियत संघ था। आज वह अस्तित्व में नहीं है क्योंकि उसमें भारत जैसी सोच-समझ और सहिष्णुता की संस्कृति नहीं थी। यही भारत की पहचान है। मुख्यमंत्री आरसीवीपी नरोन्हा प्रशासन अकादमी में आईएएस सर्विस मीट 2020 के शुभारंभ सत्र को संबोधित कर रहे थे।

    मुख्यमंत्री कमल नाथ ने कहा कि जो आईएएस अधिकारी अपनी सेवा यात्रा के मध्य में हैं और जो सेवा पूरी करने वाले हैं, वे चिंतन करें कि मध्यप्रदेश को वे कहाँ छोड़कर जाना चाहते हैं। जो अधिकारी अपनी सेवा यात्रा की शुरूआत कर रहे हैं, वे सोचें कि मध्यप्रदेश को कहाँ देखना चाहते हैं। श्री कमल नाथ ने प्रशासनिक अधिकारियों को न्याय देने वाला बताते हुए कहा कि संविधान में उल्लेखित स्वतंत्रता और समानता जैसे मूल्यों की सीमाएँ हो सकती हैं लेकिन न्याय की कोई सीमा नहीं है। यह हर समय और परिस्थिति में दिया जा सकता है। दृष्टिकोण में परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों के पास जो क्षमता और कौशल है, वह सामान्यत: राजनैतिक नेतृत्व के पास नहीं रहता। राजनैतिक नेतृत्व बदलते ही प्रशासनिक तंत्र का भी नया जन्म होता है लेकिन ज्ञान, कला, कौशल नहीं बदलते।

    मुख्यमंत्री ने नए परिवर्तनकारी विचारों (न्यू आइडिया आफ चेंज) के लिए तीन पुरस्कार देने की बात कही। उन्होंने कहा कि इसके लिए पूर्व मुख्य सचिवों की एक ज्यूरी बनाई जाएगी, जो सर्वोत्कृष्ट आईडिया चुनेगी।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि हर राज्य की अपना प्रोफाईल होती है। सबको मिलकर मध्यप्रदेश का प्रोफाईल बनाना होगा। वर्तमान प्रोफाईल को बदलना होगा। मध्यप्रदेश की नई पहचान बनानी होगी। इसके लिए जरूरी है कि प्रदेश में ज्यादा से ज्यादा आर्थिक गतिविधियाँ उत्पन्न हों। उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी हर पल बदल रही है। पूरा भारत बदल रहा है। ज्ञान और सूचना के भंडार तक आज जो पहुँच बढ़ी है, वह पहले नहीं थी। उन्होंने कहा कि विश्व में सबसे ज्यादा महत्वाकांक्षी जनसंख्या भारत में है। ये जनसंख्या युवाओं की है। बदलते समय में महत्वाकांक्षाएँ भी बदल रही हैं। अब यह देखना है कि इन्हें कैसे अपनाएं।

    श्री कमल नाथ ने कहा कि मध्यप्रदेश कृषि आधारित अर्थ-व्यवस्था का प्रदेश है। वर्तमान समय में अधिक उत्पादन की चुनौती है। खाद्यान्न की कमी अब चुनौती नहीं रही। उन्होंने कहा कि परिवर्तन तब दिखेगा, जब धोती-पायजामा पहनने वाला किसान आधुनिक खेती करते हुए जींस और शर्ट वाला किसान बन जाये।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती हमारी नई पीढ़ी की है। उन्होंने कहा कि हर साल बड़ी संख्या में कौशल सम्पन्न युवा तैयार होते हैं। उन्हें रोजगार की जरूरत है। उन्होंने कहा कि रोजगार आर्थिक गतिविधियों का एक घटक है। इसलिए आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ाना चुनौतीपूर्ण काम है। उन्होंने कहा कि हर सरकार की अपनी कार्य-शैली होती है। अपनी अच्छाईयाँ और कमजोरियाँ होती हैं। प्रशासनिक अधिकारियों की नई पीढ़ी को यह देखना होगा कि मध्यप्रदेश को किस दिशा में जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश एक आर्थिक शक्ति बनने की संभावना रखता है। मध्यप्रदेश के पास लॉजिस्टिक लाभ है। यहाँ का बाजार और व्यापार पूरे देश से जुड़ सकता है। सिर्फ नजरिए में परिवर्तन लाने की देर है। इसके लिए नया सीखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि क्या सीखते हैं, इससे ज्यादा जरूरी है कि कैसे सीखते हैं।

    मुख्य सचिव एस.आर. मोहंती ने आईएएस मीट के आयोजन की पृष्ठभूमि की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यह नई ऊर्जा और अनुभव को एक साथ लाने का अवसर है ताकि यह कार्य-शैली में भी बना रहे और इसका भरपूर लाभ समाज को मिले।

    अपर मुख्य सचिव सर्वश्री एम.गोपाल रेड्डी, मनोज श्रीवास्तव एवं प्रमुख सचिव मलय श्रीवास्तव ने अतिथियों को स्मृति-चिन्ह भेंट किये। प्रारंभ में मध्यप्रदेश आईएएस एसोसिएशन के अध्यक्ष आई.सी.पी. केशरी ने अपने स्वागत भाषण में मुख्यमंत्री को आधुनिक, उदार, डॉयनामिक और विश्व-दृष्टि से सम्पन्न नेता बताते हुए कहा कि वे 159 देशों का भ्रमण कर चुके हैं । वे किसानों के हित में 19 मंत्रियों के साथ विश्व व्यापार संगठन की बैठक का विरोध करने वाले नेता हैं। उनके नेतृत्व में देश में ऑटोमोबाइल सेक्टर में क्रांतिकारी परिवर्तन आया।

    इस अवसर पर वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी एवं प्रख्यात लेखक पवन वर्मा और प्रशासन अकादमी की महानिदेशक सुश्री वीरा राणा उपस्थित थी। 

  • माफिया से गलबहियां और मुक्ति की लबरयाई

    माफिया से गलबहियां और मुक्ति की लबरयाई

    भारत पर 514 अरब डॉलर का कर्ज है और इस कर्ज का अधिकतर हिस्सा या तो अनुत्पादक है या फिर उसके मुनाफे पर चंद लोग ऐश कर रहे हैं। इस कर्ज का अधिकांश हिस्सा विदेशी बैंकों में छिपाकर रखा गया है।विदेशी धन वापस लाने का वायदा करके सत्ता में आई भाजपा की मोदी सरकार के लिए यह विदेशी कर्ज एक अबूझ पहेली बन गया है। पहले कार्यकाल में तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने टैक्स हैवन देशों से नई संधियां करके विदेशी बैंकों में रखे धन के मालिकों को ढूंढ़ने का भरपूर जतन किया। इसके बावजूद सरकार को अधिक सफलता नहीं मिली। ये जरूर पता चल गया कि बैंकों की 85 फीसदी कर्ज की रकम जिन उद्योपतियों ने गड़प ली है वे भारत में ही सक्रिय हैं और फर्जी कंपनियों से धन का उपयोग कर रहे हैं। सरकार ने फर्जी कंपनियों को भी ढूंढ़ निकाला और उनका धन बरामद कर लिया। इसके बावजूद जिस धन को शोधन के बाद बाकायदा सीए की मंजूरी के बाद कंपनियों में निवेश किया गया है उनसे धन की वसूली की प्रक्रिया देश भर में अपनाई जा रही है। कमलनाथ सरकार भी उस व्यवस्था का हिस्सा हैं जो देश में काले धन की खोजबीन में जुटे हैं। उनसे ये उम्मीद की जाती रही है कि वे अपना काम जिम्मेदारी से करेंगे और काला धन उजागर करने में सहयोगी की भूमिका निभाएंगे।

    इसके विपरीत कमलनाथ की भूमिका प्रोपेगंडा से अधिक साबित नहीं हो रही है। वे शुद्द के लिए युद्ध और भू माफिया के विरुद्ध जिस तरह से अभियान चला रहे हैं उसे लेकर वे ये जताने का प्रयास कर रहे हैं कि वे काले धन की वसूली के प्रयास कर रहे हैं। वास्तव में उनकी भूमिका देश से काला धन उजागर करने की मुहिम को पंचर करना अधिक नजर आ रहा है। उन्होंने जिस तरह रेत के ठेकों में देश की पूंजी हड़पने वाले फर्जी उद्योगपतियों की भीड़ जुटाई है उसे देखकर उनकी भूमिका की असलियत आसानी से समझी जा सकती है। जिस रेत कारोबार से प्रदेश को 250 करोड़ रुपए की आय होती थी और बाद में इसे शिवराज सरकार ने मुक्त कर दिया उससे कमलनाथ 1200 करोड़ रुपए की आय होने की कहानियां सुना रहे हैं। उनकी सरकार का कहना है कि रेत माफिया पर अंकुश लगाकर ये आय की जा रही है। इस कारोबार के पुराने खिलाड़ी धंधे से बाहर कर दिए गए हैं और जिला स्तर पर नए ठेकेदारों को खदानें आबंटित की गई हैं। रेत खदानों के ठेके लेने वालों में वे लोग शामिल हैं जिन पर देश का अरबों रुपया जीम जाने का आरोप है।

    सरकार ने जिन रेड्डी बंधुओं को रेत कारोबार का सहयोगी बनाया है और राज्य के लिए आय देने वाला बताया जा रहा है उन रेड्डी बंधुओं की असलियत कुछ और है। मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र की पुलिस उन्हें सरगर्मी से तलाश रही है। उन पर हजारों लोगों को झांसा देकर उनके साथ बैंक धोखाघड़ी करने का आरोप है।इसके बावजूद कमलनाथ सरकार उन्हें राज्य को आय कराने वाला निवेशक बता डाला है। जो लोग बैंकों का हजारों करोड़ रुपया पौंजी स्कीमों से हड़प चुके हैं वे प्रदेश को कितनी और कैसी आय कराएंगे ये तो आने वाले समय में पता चलेगा लेकिन तब तक कमलनाथ सरकार ने उन्हें पुलिस से रक्षा कवच जरूर उपलब्ध करा दिया है।

    इसके विपरीत भारत सरकार का ध्यान बंटाने के लिए राज्य सरकार माफिया को ध्वस्त करने की मुहिम चला रही है। इस मुहिम में सैकड़ों निर्दोष व्यापारियों और बिल्डरों की बलि चढ़ाई जा रही है। राज्य सरकार की इस मुहिम में अफसर, जज और पुलिस सभी शामिल हैं। जिस तरह की रिपोर्ट के आधार पर आम नागरिकों को भयंकर माफिया, मिलावटखोर, जमाखोर बताया जा रहा है वे आने वाले समय में आपातकाल से भी ज्यादा भयावह प्रताड़ना की असलियत सामने लाने लाएंगे। लेकिन इससे प्रदेश की विकास यात्रा बुरी तरह तहस नहस हो रही है। जो लोग छुटपुट कारोबार करके हजारों लोगों को रोजगार देने का काम कर रहे थे वे भी खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। सरकार की मुहिम से बचने के लिए व्यापारियों ने न केवल भारी भरकम टैक्स चुकाना जारी रखा है बल्कि वे राजनीतिक चंदे की मुंहमांगी रकम भी देने को मजबूर किए जा रहे हैं। जिन लोगों को माफिया बताकर प्रशासन ने उनके ठिकाने तहस नहस कर डाले हैं उनमें से अधिकतर केवल दस्तावेजों की कमी की वजह से निशाना बने हैं। जिन अफसरों और दलालों ने उन्हें झांसा देकर कारोबार बढ़ाने में मदद की अब वही लोग उन्हें माफिया साबित करने में जुटे हुए हैं।

    सरकार की इस मुहिम से आम जनता परेशान है और काला धन बनाने वाला माफिया अपनी बुलंदियां छू रहा है। वह न केवल काला धन बचाने में सफल हो रहा है बल्कि निर्दोष लोगों को डरा धमकाकर उनसे अवैध वसूलियां भी कर रहा है। ये हालत कमोबेश वैसी ही है जैसे कभी इंदिरा गांधी के आपातकाल के दौरान सामने आई थी। बेशक कमलनाथ कह रहे हैं कि निर्दोष लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है लेकिन जब प्रशासन और तंत्र उन्हें आरोपी बना देता है तब वे अपनी बेगुनाही साबित ही नहीं कर पाते और सरकार के दमनचक्र का शिकार हो जाते हैं।

    ऐसे ही एक पनीर कारोबारी के विरुद्ध हाईकोर्ट ने बाईस पेज का फैसला दिया और उसे दोषी बताते हुए मामले की सुनवाई अधिक जजों की खंडपीठ से कराने का निर्देश दिया। जिस मामले को कोई बच्चा भी षड़यंत्र पूर्वक रचा गया बता सकता है उसे हाईकोर्ट मानने तैयार नहीं है। हाईकोर्ट के ही एक विद्वान न्यायाधीश कह रहे हैं कि वह व्यक्ति निर्दोष है और उसे बरी किया जाना चाहिए लेकिन दूसरे जज केवल अपना तमगा बढवाने और कमलनाथ की गुड बुक में आने के लिए अपनी विद्वत्ता का प्रदर्शन किए जा रहे हैं।

    वास्तव में समय आ गया है जब देश की सर्वोच्च संस्थाएं इन मामलों पर गौर करें और राज्य सरकार की पक्षपातपूर्ण नीतियों पर लगाम लगाएं। ये तो साफ हो चुका है कि मध्यप्रदेश एक बार फिर आपातकाल दो के दौर से गुजर रहा है लेकिन ये आपातकाल भारत की मानवता के लिए कलंक न बन जाए इसके लिए आगे बढ़कर इस पर रोक लगाना समय की मांग बन गई है।

  • डिफाल्टर नीतियों वाला मुख्यमंत्री

    डिफाल्टर नीतियों वाला मुख्यमंत्री

    सत्ता संभालने के एक साल पूरा होने पर मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अपनी डींगें हांकने के लिए विज्ञापनों का रेला पेल दिया है। जिस शिवराज सिंह सरकार को विज्ञापनों की सरकार बताकर कमलनाथ ने मीडिया पर लांछन लगाया आज उसी मीडिया की चौखट पर उनकी सरकार औंधे मुंह गिरी पड़ी है। करोड़ों के विज्ञापन कार्पोरेट मीडिया की झोली में डालकर वे प्रदेश की जनता के टूटते भरोसे को टिकाए रखना चाहते हैं। कर्ज माफी और इंदिरा ज्योति योजना जैसी वाहवाही लूटने वाले उनके ध्वजवाहक अभियान ही जनता को उनके वादे और हकीकत की पहचान कराने के लिए काफी हैं। तरह तरह की नई शर्तें कर्जमाफी को छलावा बता रहीं हैं तो बिजली कंपनियां अपना घाटा पाटने के लिए जिस तरह बिजली बिलों की रीडिंग लंबित करके उपभोक्ताओं से भारी भरकम बिल वसूल रही है उससे सरकार की कथनी और करनी की पोल खुल जाती है। बात बात में भाजपा सरकार पर खजाना खाली छोड़कर जाने का आरोप मढ़ने वाले मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी ये समझाने में असफल रहे हैं कि राज्य की मासिक आय क्यों घटती जा रही है। यदि उनका वित्तीय प्रबंधन बहुत अच्छा है तो साल भर में उन्हें उन्नीस हजार करोड़ का कर्ज क्यों लेना पड़ा है। छिंदवाड़ा माडल का शिगूफा छोड़कर कमलनाथ ने खुद को उद्योगपति बताने की कारीगरी तो कर ली लेकिन वे अब तक एक डिफाल्टर मुख्यमंत्री ही साबित हुए हैं। प्रदेश के बरसों पुराने बेशकीमती बांस जंगलों को मिट्टी मोल बेचने के लिए उन्होंने आईटीसी को कारखाना लगाने की छूट तो दे दी लेकिन इससे प्रदेश की कितनी संपदा कौड़ियों के मोल बेची जाएगी ये बताने को वे तैयार नहीं हैं। छतरपुर के बक्सवाहा की हीरा खदान सरकार ने अस्सी हजार करोड़ में बिड़ला को बेचकर ये बताने का प्रयास किया है कि वे प्रदेश के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने में बहुत गंभीर हैं। जबकि हकीकत ये है कि भारत सरकार अभी अपने बहुमूल्य खनिजों को बेचने की नौबत नहीं आने देना चाहती। खनिज मंत्री प्रदीप जायसवाल कहते हैं कि केन्द्र से मंजूरियां लेने की जवाबदारी ठेका लेने वाली कंपनी की है। उसे हमने दो साल का वक्त दिया है। हालांकि केन्द्र के रुख को देखते हुए ये अनुमतियां मिल पाएंगी फिलहाल तो संभव नहीं दिखता। कमलनाथ सरकार ने तबादलों और पोस्टिंग का जो खुला खेल किया उसकी वजह से नौकरशाही पूरी तरह मनमर्जी की मालिक हो गई है। जिस अफसर ने करोड़ों रुपये देकर पोस्टिंग हड़पी है वह राजस्व उगाही आखिर कहां से करे। उसकी सहूलियत के लिए ही सरकार ने पहले शुद्ध के लिए युद्ध और फिर माफिया पर हमले जैसे लोकप्रियता बटोरने वाले अभियान चला दिए। शुद्ध के लिए युद्ध के नाम पर सरकार ने सात हजार से भी अधिक व्यापारियों के नमूने लिए। अस्सी से अधिक व्यापारियों को रासुका में जेल भेज दिया जबकि उनमें से अधिकतर की खाद्य सामग्री शुद्ध पाई गई है। इसके बाद जेल भेजे गए व्यापारियों को भी सरकार की कृपा के आधार पर ही छोड़ा जा रहा है। जो लोग सरकार की कृपा नहीं खरीद सके हैं वे बेगुनाह होते हुए भी जेलों में बंद हैं। उनके कारोबार बंद हैं और उनसे जुड़े हजारों कर्मचारी बेरोजगार हो गए हैं। ये बात सही है कि कांग्रेस ने लगभग हवा हवाई वादे करके सत्ता की चाभी छीनी है। किसानों को गुमराह किया गया आदिवासियों को बहकाया गया, आम नागरिकों को शिवराज सरकार की कमजोरियां दिखाकर बरगलाया गया और सत्ता तो हासिल कर ली लेकिन अब इसे बनाए रखना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। ये बात सही है कि शिवराज सिंह सरकार प्रशासनिक तौर पर इतनी असफल सरकार थी कि वह अपने अच्छे कार्यों की पैरवी करने लायक लोगों को भी तैयार नहीं कर सकी। भीड़ भंगार के बीच कर्ज लेकर योजनाओं की टाफिया बांटते शिवराज सिंह चौहान को पता ही नहीं था कि उन्होंने कैसे भाजपा के कर्मठ कार्यकर्ताओं को संगठन से बेदखल कर दिया है। उनकी सरकार लगभग जड़ विहीन थी यही वजह है कि आज जब कमलनाथ सरकार ने माफिया के नाम पर उनके चमचों को जूते की नोंक पर रखना शुरु कर दिया है तब भाजपा के पास सरकार का मुकाबला करने के लिए रक्षा पंक्ति तक नहीं है। पाखंडी अभियानों से शिवराज की भाजपा ये भ्रम फैलाने का प्रयास कर रही है कि वो कमलनाथ सरकार से मुकाबला कर रही है लेकिन उनके साथ रहे भ्रष्ट मंत्रियों और चापलूसों की भीड़ को कमलनाथ बहादुरी के साथ काबू में कर रहे हैं। अधिकतर तो सरकार के माफिया वाले अभियान से ही डरकर अपने घरों तक सिमट गए हैं।दरअसल कमलनाथ जिन कारोबारियों को माफिया का नाम देकर वसूलियां कर रहे हैं वे सरकारी तंत्र के ही संरक्षण में तो फले फूले हैं। असली माफिया तो टैक्स वसूली करने वाले भ्रष्ट अफसरों का तंत्र है। कमलनाथ जी उसी तंत्र से चुनावी चंदा वसूलकर माफिया के विरुद्ध संग्राम का ऐलान कर रहे हैं जो सिर्फ छलावा ही साबित हो रहा है। शिवराज सिंह चौहान सरकार भी योजनाओं के नाम पर कर्ज लेकर जनता को बांट रही थी और कमोबेश यही काम कमलनाथ कर रहे हैं। कमलनाथ सरकार के वित्तमंत्री तरुण भनोट ने तो अपने बजट में भारी भरकम वसूली के टारगेट तय किए थे लेकिन जब मध्यप्रदेश अपने हिस्से का जीएसटी ही नहीं वसूल कर पा रहा हो तो वह किस मुंह से केन्द्र से अपना हिस्सा मांग सकता है। बेशक केन्द्र ने देर सबेर सभी राज्यों को जीएसटी की भरपाई राशि दे दी है लेकिन जब तक कमलनाथ सरकार बेईमान सरकारी तंत्र के भरोसे वसूली के रिकार्ड बनाने का मुगालता पाले बैठी रहेगी तब तक उसे असफलता ही हाथ लगेगी। हंसना और गाल फुलाना एक साथ नहीं हो सकता। आप अफसरों से यदि पार्टी फंड वसूल रहे हों तब आपको ये मुगालता नहीं पालना चाहिए कि वे ये राज्य का खजाना भी अपनी जेब से भरेंगे। कांग्रेस सरकार ने पार्टी फंड वसूलने की जवाबदारी जब अफसरों को ही थमा दी है तो फिर राज्य के संसाधन जुटाने के लिए निश्चित रूप से वे जनता पर अत्याचार करेंगे। यही कार्य श्रीमती इंदिरा गांधी के लगाए आपातकाल के दौरान हुआ था। तब जमाखोरों, मिलावटियों और कथित शोषकों के विरुद्ध मुहिम चलाई गई थी। नतीजा ये हुआ कि आपातकाल की आड़ में सरकारी भ्रष्ट तंत्र ने अत्याचारों की बाढ़ ला दी। नतीजतन श्रीमती गांधी चुनाव हारीं और देश को आपातकाल जैसे सिरफिरे फैसले से निजात मिल सकी थी। आपातकाल का कलंक आज भी कांग्रेस के सिर पर लगा है इसके बावजूद कमलनाथ आपातकाल 2 लेकर मैदान में कूद पड़े हैं। अब तक जो कहानियां उजागर हो रहीं हैं उनसे सरकार के झूठ की पोल रोज खुल रही है। निश्चित रूप से ये कहानियां मीडिया की सुर्खियां नहीं बन पा रही हैं लेकिन आखिर कब तक सरकार मीडिया का मुंह बंद कर सकती है।रोते बच्चे के मुंह को हाथ से दबा दिया जाए तो उसके रोने की आवाज जरूर बंद हो जाती है लेकिन उसका रोना जारी रहता है और जैसे ही हाथ हटाया जाता है उसके रोने की आवाज बुक्का फाड़कर बाहर आ जाती है। सरकार विज्ञापनों के मायाजाल के सहारे आखिर कब तक जनता की घुटन को दबाकर रख सकती है। राजनैतिक वसूलियों से केन्द्र की नीतियों के विरुद्ध झूठे आंदोलन खड़े करने से जनता का पेट भरने वाला नहीं है। जनता के बीच आक्रोश पनप रहा है। अभी यूरिया की कालाबाजारी ने जिस तरह किसानों को आक्रोशित कर दिया है उसी तरह सरकार की जनविरोधी नीतियों की असलियत भी जल्दी ही सामने आ जाएगी। अभी भी वक्त है कांग्रेस के सलाहकार अपनी सरकार का मार्गदर्शन करें तो गलती सुधारी जा सकती है।

  • निर्दोष सिखों के नरसंहार के दोषी कब दंडित होंगे

    निर्दोष सिखों के नरसंहार के दोषी कब दंडित होंगे

    स. इकबाल सिंह लालपुरा

    1984 में निर्दोष सिखों का बर्बरता से नरसंहार किया गया, सरेराह गले में टायर डालकर उन्हें जलाया गया, सामूहिक कत्ल किए गए, बलात्कार किए गए, लूट की गई और गुरुद्वारों को तोड़ दिया गया। अच्छे भले लोग भी ‘खून का बदला खून’, ‘खून के छींटे सिखों के घर तक पहुंचने चाहिए’ और ‘जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है’ की बातें करने लगे

    31 अक्टूबर 1984 को देश की तात्कालिक प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का कत्ल उन्हीं की सुरक्षा में नियुक्त दो पुलिस कर्मचारियों (एक सब इंस्पेक्टर व एक सिपाही) ने प्रधानमंत्री के आवास पर ही कर दिया। किसी भी देश में प्रधानमंत्री व उसका निवास सबसे सुरक्षित स्थान होता है। जो भी व्यक्ति सेना, अर्धसैनिक दस्ते या पुलिस की वर्दी पहनता है, वह केवल देश के कानून व नागरिकों की सुरक्षा तक ही समर्पित होता है। उसका व्यक्तिगत धर्म/जाति का बंधन उसे अपनी ड्यूटी निरपक्षता से करने में रुकावट नहीं होना चाहिए। यदि सुरक्षा कर्मचारी अनुशासन की अवहेलना करें व रखवाले बनने की जगह कातिल, हत्यारे बन जाएं तब जरूर कुछ बड़े मानसिक कारणों की संभावना होती है।

    इंदिरा गांधी जी पर हमला 31 अक्टूबर 1984 को सुबह तकरीबन 9:20 पर हुआ। तुरंत उन्हें ‘ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस’ दिल्ली में ले जाया गया। जहां पर डॉक्टरों ने 10:50 पर उन्हें मृत घोषित कर दिया। 11:00 बजे प्रातः ऑल इंडिया रेडियो प्रधानमंत्री जी को उन्हीं के दो सिख शस्त्रधारी अंगरक्षकों द्वारा कत्ल किया जाने का ऐलान करता है। साधारणत: ‘ग्रेव एंड सडन प्रोवोकेशन’ जो जुर्म की गंभीरता को नहीं बल्कि सजा को कम करने की प्रक्रिया है जिसका तात्पर्य यह है कि दोषी की भावनाओं को ठेस पहुंची तो उसने जुर्म कर दिया। पर दिल्ली सिख कत्लेआम की कहानी तो कुछ अलग ही है।

    भावनाएं तो कुछ मिनटों के बाद ही शांत हो जाती हैं। परंतु दिल्ली में सिखों कत्लेआम कुछ मिनटों बाद नहीं, बल्कि कई घंटों की विचार मंथन से उत्पन्न हुई घटना प्रतीत होती है। । राजीव गांधी शाम 4:00 बजे वापस एम्स पहुंचते हैं। पहली पत्थरबाजी की घटना शाम 5:30 बजे तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह जी के एम्स पहुंचने पर होती है। रात में अकबर रोड दिल्ली के एक बंगले पर ऐसे कुछ मुख्य लोग इकट्ठे होते हैं, जिनमें से अधिकतर पर सिख कत्लेआम करवाने का दोष आज भी लगाया जाता है।

    1 नवंबर 1984 को सुबह केवल दिल्ली ही नहीं भारत के कई राज्यों में सिखों का नरसंहार आरंभ होता है। जिन्होंने प्रधान मंत्री जी की हत्या की थी। उनमें से एक को तो गिरफ्तार कर लिया गया व दूसरे को मौके पर ही मार गिराया गया। परंतु नरसंहार उन हजारों निर्दोष सिखों का हुआ जिनका कोई जुर्म ही नहीं था।

    निर्दोष सिखों का बर्बरता से नरसंहार किया गया, सरेराह गले में टायर डालकर उन्हें जलाया गया, सामूहिक कत्ल किए गए, बलात्कार किए गए, लूट की गई और गुरुद्वारों को तोड़ दिया गया। अच्छे भले लोग भी ‘खून का बदला खून’, ‘खून के छींटे सिखों के घर तक पहुंचने चाहिए’ और ‘जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है’ की बातें करने लगे। 3 नवंबर तक देश की पुलिस, फौज और अदालतें खामोश रही, इंसानियत उनके ह्रदय में नहीं जागी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इन 3 दिनों में करीब 2800 सिख दिल्ली में और 3350 सिख भारत के दूसरे राज्यों में कत्लेआम की भेंट चढ़े। लूट खसोट और नुकसान का तो कोई हिसाब ही नहीं। सरकारी तंत्र चाहे अराजकता की तस्वीर बना रहा परंतु आम आदमी के ह्रदय में इंसानियत जरूर कचोटती रही। उन्होंने मजलूमों को अपनी छाती से लगाकर, अपने घर में छुपाकर भी रखा कई जगह बचाने वाले भी भीड़ तंत्र के शिकार बनें और य​ह भले लोग शरणार्थी कैंपों में भी उनका सहारा बने। ये हमला एक धर्म को मानने वालों के द्वारा दूसरे पंथ पर नहीं था बल्कि बदला लेने की नियत से अपराधियों और राजनीतिक दल के नापाक गठबंधन का घिनौना कृत्य था|

    इस कत्लेआम की पड़ताल तो क्या होनी थी, पुलिस ने कोई मुकदमा भी दर्ज नहीं किया और न ही किसी अदालत ने कानून के पालन हेतु, स्वयं ही कोई कार्रवाई की। दुनिया भर में बदनामी के दाग से बचने हेतु तात्कालिक सरकार ने नवंबर 1984 में एक एडिशनल कमिश्नर पुलिस वेद मरवाह की अध्यक्षता में कमेटी बनाई । जिसे 1985 में बंद कर दिया गया। उस रिपोर्ट का भी कुछ पता नहीं। अगला कमीशन जस्टिस रंगनाथ मिश्रा का बना। जस्टिस रंगनाथ मिश्रा कमीशन ने कहा कि दोषियों की शिनाख्त करनी उसकी जिम्मेदारी का हिस्सा ही नहीं थी। इसी क्रम में अब तक 10 से अधिक कमीशन और कमेटियां बन चुकी हैं। परंतु पूर्ण इंसाफ की प्रक्रिया अभी देश की राजधानी दिल्ली में ही अधूरी है। देश के अन्य राज्यों में 35 साल पूरे होने के बाद भी सरकार इंसाफ की निष्पक्ष जांच, मुआवजा व दोषियों को सजा दिलाने हेतु पूरी तरह सजग नहीं है।

    सन 1993 में मदन लाल खुराना जी की तरफ से बनाई गई ‘जस्टिस नरूला कमेटी’ को भी उस समय कि केंद्र सरकार ने मान्यता नहीं दी थी। पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेई जी की सरकार ने सन 2000 में ‘जस्टिस जी. टी. नानावती कमीशन’ का गठन करके इस नरसंहार की जांच को आगे बढ़ाया। जो आज भी कभी तेज ओर कभी धीमी गति से चल रही हैं।

    बेगुनाह लोगों के कत्लेआम, लूटमार और औरतों के साथ बलात्कार करने वाले दोषियों को सजा करवाने की प्रक्रिया यदि 35 साल में पूरी नहीं हो सकी तो लगता है कि पूरी न्यायिक प्रक्रिया की भी जांच आवश्यक है।

    आज जब सारा विश्व और विशेषकर भारत सरकार श्री गुरु नानक देव जी का 550 साला प्रकाश उत्सव बना रही है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की तरफ से सिख भाईचारे के हरे जख्मों पर मरहम लगाने का प्रयास हो रहा है। तो अच्छा हो, कि समय निश्चित करके 1984 के अपराधियों की सजा दिलवाने के कार्य को भी प्रमुखता से किया जाए।

    ( लेखक पंजाब पुलिस से सेवानिवृत्त डीआईजी हैं )