भोपाल,13
दिसंबर(प्रेस
सूचना केन्द्र)।
अखिल भारतीय जैन पत्रकार
महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष
प्रवीण कुमार खारीवाल की सहमति
से राष्ट्रीय महासचिव संजय
लोढ़ा ने संदीप डाकोलिया को
प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया
है। डाकोलिया विगत वर्षों से
मप्र में जैन समाज के पत्रकारों
के माध्यम से समाज की एकता को
लेकर रचनात्मक आंदोलन चला
रहे हैं। समाज को जोड़ने की
दिशा में उनकी सक्रियता को
देखकर अब उन्हें ही प्रदेश
अध्यक्ष पद की जवाबदारी सौंपी
गई है।
श्री
डाकोलिया ने सभी पंथों और समाज
के सभी वर्गों के साधुओं और
गणमान्य नागरिकों से मिलकर
सकल जैन समाज को शक्ति के रूप
में उभारने का अभियान चलाया
और उसमें बड़ी सफलताएं भी
अर्जित कीं हैं। डाकोलिया
की इस नियुक्ति से आने वाले
दिनों में एकता के इस अभियान
को और अधिक सफलता मिलेगी। श्री
संदीप डाकोलिया की इस नियुक्ति
से राजधानी के सभी जैन पत्रकार
साथियों के बीच संतोष महसूस
किया गया है। बरसों से जैन
समाज के पत्रकार अलग अलग जिलों
में अपनी विश्वसनीय खबरों से
समाज का मार्गदर्शन
करते रहे हैं।
उन्होंने अपनी नियुक्ति को संगठन के लिए उपयोगी बताया है। उनका कहना है कि जिस तरह से अभियान में बड़ी संख्या में जैन पत्रकार जुड़े हैं उनसे निरंतर संवाद स्थापित करने के लिए ये नई भूमिका मददगार साबित होगी।
संगठन के जिलाध्यक्ष आलोक सिंघई ने बताया कि श्री डाकोलिया की नियुक्ति से राजधानी के पत्रकारों ने संतोष व्यक्त किया है। सर्वश्री सनत जैन, रवीन्द्र जैन, राकेश सिंघई, विनोद भारिल्ल,प्रशांत जैन, संजय जैन, प्रवीण जैन, राजेन्द्र जैन, अंकित जैन, विकास जैन सभी ने उम्मीद की है कि संदीप डाकोलिया की नियुक्ति से जैन पत्रकारों का संगठन और भी मजबूती के साथ उभरेगा।
मध्यप्रदेश
में कांग्रेस सरकार किन हालात
में आई सभी जानते हैं। प्रदेश
के लोग शिवराज सिंह चौहान की
प्रशासनिक असफलताओं से खफा
थे और उन्होंने विकास के नाम
पर लूट करने वाले फोकटियों
को अपने पड़ौस में देखा था।
नतीजतन वे खफा हुए और शिवराज
सिंह चौहान की खरीदी हुई
अतिलोकप्रियता धराशायी हो
गई। अब कांग्रेस के गुटीय
संतुलन को साधकर सत्ता में
आए कमलनाथ ने शिवराज सिंह
चौहान के नेतृत्व में जड़
विहीन कर दी गई भारतीय जनता
पार्टी को फुटबाल बना दिया
है। खुद भाजपा के नेता आश्चर्य
से देख रहे हैं कि आखिर कमलनाथ
की शक्ति का आधार क्या है। ऐसा
क्या हो गया कि कमलनाथ कथित
कैडर आधारित पार्टी को आए दिन
ठोक रहे हैं और कोई बोलने वाला
तक नहीं है। दरअसल शिवराज सिंह
चौहान ने अपने नजदीक जैसै
भ्रष्ट और नपुंसक लोगों की
भीड़ जमा कर ली थी उनकी शक्ति
का आधार केवल सरकार थी। सरकारी
तंत्र का लाभ लेकर वे भ्रष्ट
मंत्री अफसर विकास के नाम पर
लिए गए कर्ज को जीमने में जुटे
रहे। धनागमन के इस आंकड़े को
बाहर बैठा कोई सामान्य शख्स
भी अच्छी तरह समझ सकता है।
शुरुआती दौर में उमा भारती
ने जब राघवजी भाई को वित्तीय
प्रबंधन की कमान थमाई तो
उन्होंने प्रदेश की आय बढ़ाने
में व्यावसायिक प्रबंधन का
सहारा लिया। वे स्वयं टैक्स
सलाहकार थे सो उन्होंने टैक्स
प्रदाताओं से धन जुटाकर प्रदेश
की बैलेंस शीट मजबूत की। जिससे
भाजपा सरकार केन्द्र से अधिक
धन प्राप्त कर सकी। मैचिंग
ग्रांट भरपूर होने की वजह से
तरह तरह की योजनाएं बनाईं गईं
और प्रदेश के लिए वित्तीय
प्रबंधन मजबूत किया गया।
शिवराज सिंह
चौहान इस वित्तीय प्रबंधन की
वजह से भरपूर धन लुटाते रहे।
हितग्राहियों के जो सम्मेलन
भाजपा कर रही थी वह वास्तव में
फुगावा था। दरअसल सत्ता के
अंतिम मुहाने पर पंचायतों
में बैठे दिग्विजय सिंह के
समर्थक उस धन को आहरित कर रहे
थे। वे गांव के लोगों को ठेलकर
हितग्राही सम्मेलनों में भेज
रहे थे और भाजपा उन्हें प्रदेश
के विकास की धुरी मान रही थी।
राजीव गांधी के पंचायती राज
को माफिया राज में बदलने वाले
इस षड़यंत्र की आहट जब पंचायत
सचिव रहे आईएएस आरएस जुलानिया
को लगी तो उन्होंने पंचायतों
को जाने वाला फंड रोक दिया।
इसके बावजूद इस दौरान जन धन
का भारी अपव्यय हो चुका था।
ठेकेदारों और अफसरों के जिस
गठजोड़ ने राजनेताओं का संरक्षण
पाकर विकास की कहानियां सुनाईं
वे भी इस प्रक्रिया में भरपूर
मजबूत हो चले थे। अब सत्ता की
मलाई चाटने वाला ये माफिया
इस बार कांग्रेस के साथ है,
और कमलनाथ
सरकार माफिया के विरुद्ध
संग्राम का उद्घोष कर रही है।
सरकार की निगाह में माफिया
वो है जो टैक्स नहीं देता और
कानूनी इबारतों को अनदेखा
करके अनगढ़ तरीके से धन बनाने
का काम कर रहा है। दरअसल प्रदेश
और देश में धन बनाने वाला बड़ा
वर्ग वो है जो बगैर किसी सरकारी
मदद के अपना कारोबार करके
धनार्जन करता है। निश्चित
रूप से सरकारी तंत्र उसे अवैध
कारोबारी कहता है। इसीलिए
सरकार ने शुद्द के लिए युद्ध
नाम का जो अभियान चलाया उसमें
निरीह व्यापारियों की मौत हो
गई। उन पर रासुका लाद दी गई और
जेलों में ठूंस दिया गया। उनके
उद्योग से जुड़े हजारों
कर्माचारी बेरोजगार हो गए।
इसके बावजूद कमलनाथ सरकार और
उससे पोषित मीडिया इसे बेईमानों
के विरुद्ध संग्राम बताता
रहा। आज जब कमलनाथ माफिया के
विरुद्ध शंखनाद करने के लिए
सरकारी तंत्र को छूट दे रहे
हैं तो वो कहर कांग्रेस के
विरोधियों पर टूटने वाला है।
जो अवैध कारोबार करने वाले
कांग्रेस की गोदी में बैठे
हैं या बैठ चुके हैं उन पर इस
युद्ध का कोई असर पड़ने वाला
नहीं है। इसके साफ संकेत कमलनाथ
सरकार की कार्यप्रणाली को
देखकर मिल जाता है। तबादले
पोस्टिंग के कारोबार में जिस
तरह खुलेआम नौकरियों की बोलियां
लगाईँ गईं उससे साफ पता चलता
है कि सरकार अपने विरोधियों
को अपराधी बताने में कोई गुरेज
नहीं कर रही है। जिस तरह कांग्रेस
ने चुनाव के दौरान कर्ज माफी
या सस्ती बिजली के वादे किए
उसके लिए धन की जरूरत थी। ये
धन इसी तरह बेरहमी से टैक्स
वसूली से उगाया जा सकता है।
साथ में बंदर हीरा खदान को
नीलाम करके सरकार ने अपने धन
की उगाही का एक अजस्र स्रोत
भी तलाश लिया है। चुनावों को
देखकर शिवराज सिंह चौहान ने
रेत को टैक्स मुक्त करके अपने
समर्थकों को खुश करने का खेल
खेला था उसे भी कमलनाथ माफिया
के विरुद्ध युद्ध बता रहे हैं।
निश्चित रूप से सरकार और प्रदेश
को चलाने के लिए धन की जरूरत
होती है। यह धन टैक्स से ही
जुटाया जाता है। जो सरकार अपनी
आय का अस्सी फीसदी हिस्सा
स्थापना खर्च में ही लुटा देती
हो वह प्रदेश के लिए धन बनाने
वाले कारोबारियों को माफिया
कहे तो ये वास्तव में क्रूरता
होगी। इसके बावजूद सरकार
धड़ल्ले से फोकटियों को ये
अधिकार दे रही है कि वे प्रदेश
के लिए पैसा उत्पादन करने वाले
या सेवाएं उपलब्ध कराने वालों
को माफिया कहे क्योंकि वे
सरकार से सहमत नहीं हैं। ये
आपातकाल से भी ज्यादा नृशंस
और निंदनीय कार्य कहा जाएगा।
इतिहास में आपातकाल को इंदिराजी
का सबसे घिनौना अत्याचार बताया
जाता है लेकिन कमलनाथ का ये
माफिया संग्राम सदियों तक
डरावने अध्याय के रूप में जाना
जाएगा।
भोपाल 11 दिसंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। कमल नाथ सरकार ने अपने मात्र एक साल के कार्यकाल में वर्षों से माफिया राज के आतंक का दंश झेल रही आम जनता को इससे मुक्त कराने की मुहिम को तेज करने के लिए 12 दिसंबर को उच्च स्तरीय बैठक बुलाई गई है। जनसम्पर्क मंत्री पी.सी. शर्मा ने कहा है कि मुख्यमंत्री के स्पष्ट निर्देश हैं कि अब प्रदेश में ‘लोगों के लिए लोगों की सरकार’ चलेगी न कि माफिया राज।
जनसम्पर्क मंत्री श्री शर्मा ने कहा कि मात्र एक साल में माफिया राज की कमर तोड़ने का जो साहस मुख्यमंत्री ने दिखाया है, उससे जनता को राहत मिली है। उन्होंने कहा कि माफिया, शासन-प्रशासन को ताक पर रखकर पूरे प्रदेश में दशकों से समानांतर सरकार चला रहे थे, जिसका खामियाजा प्रदेश की जनता भुगत रही थी और विकास अवरूद्ध हो रहा था।
श्री शर्मा ने कहा कि माफिया के खिलाफ जनमानस के साथ कमर कसकर खड़ी कमल नाथ सरकार ने मिलावटखोरों के खिलाफ ‘शुद्ध के लिए युद्ध’ की शुरुआत की। आम जनता को जहर परोस रहे मिलावटखोर माफियाओं की धर-पकड़ से पूरे प्रदेश में बड़े पैमाने पर कार्यवाही हुई। अभियान के दौरान मिलावटखोरों के खिलाफ 94 एफआईआर दर्ज की गई और 31 कारोबारियों के खिलाफ रासुका के तहत कार्रवाई हुई।
मंत्री श्री शर्मा ने कहा कि राज्य सरकार की नई रेत नीति बन जाने से अभी तक प्रदेश की रेत संपदा लूटने और प्रदेश की जनता के हितों से कुठाराघात करने वाले माफिया के हौसले पस्त हो गए हैं। शासन-प्रशासन पर हमले कर और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त कर बेखौफ रेत माफिया को एक ही फैसले से मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ ने ध्वस्त कर दिया है। यही नहीं, नई रेत नीति से प्रदेश को जो राजस्व करीब 200 करोड़ मिलता था, वह इस वर्ष बढ़कर 1234 करोड़ तक पहुँच गया है। पिछले 15 साल से 15 हजार करोड़ रुपए किसकी जेब में जा रहे थे, इसका खुलासा भी मुख्यमंत्री ने नई रेत नीति बनाकर किया है। अब ये पैसा निजी हाथों में जाने के बजाए प्रदेश के विकास और जनता के हितों के लिए उपयोग होगा।
जनसम्पर्क मंत्री ने कहा कि किसानों को मिलावटी खाद बेचने वाले माफियाओं से मुक्त कराने के लिए भी मुहिम पूरे प्रदेश में चल रही है। पिछले एक माह में 1313 उर्वरक विक्रेताओं और गोदामों का निरीक्षण कर लिए गए नमूनों में 110 प्रकरणों में मिलावट पाए जाने पर कार्रवाई की गई है।
श्री पी.सी. शर्मा ने कहा कि इतना ही नहीं, कमल नाथ सरकार ने विभिन्न शहरों में अपने रसूख और माध्यमों का दुरुपयोग करके अनैतिक गतिविधियाँ चलाने, सरकारी और निजी जमीनों पर कब्जे कर अपना साम्राज्य बनाने वाले तथा इंदौर और ग्वालियर में भी माफिया के खिलाफ सारे दबावों के बावजूद सख्ती दिखाई है और कठोर कार्यवाही भी सुनिश्चित की है। इस दृढ़तापूर्ण कार्रवाई के पीछे एक ही लक्ष्य था कि अब माफिया को प्रदेश की जनता और यहाँ की सरकारी संपदा को लूटने की इजाजत नहीं होगी।
मंत्री श्री शर्मा ने कहा कि जो नेता प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से माफिया के समर्थन में बयान देकर उनका संरक्षण कर रहे हैं, उनकी गतिविधियों से यह स्पष्ट है कि 15 साल में ये माफिया किनके संरक्षण में पनपे हैं। श्री शर्मा ने कहा कि प्रदेश में माफिया राज को जड़ से उखाड़ फेकने के लिए मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ की अध्यक्षता में 12 दिसंबर को उच्च स्तरीय बैठक होने जा रही है। इस बैठक में गृह मंत्री, मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (गुप्त वार्ता) एवं एसआईटी, आईजी एवं कमिश्नर जबलपुर, इंदौर, ग्वालियर, भोपाल, कलेक्टर इंदौर एवं कमिश्नर इंदौर नगर निगम उपस्थित रहेंगे।
भोपाल,9
दिसंबर(प्रेस
सूचना केन्द्र)।
ऊर्जा मंत्री प्रियव्रत सिंह
ने दावा किया है मध्यप्रदेश
सरकार ने अपने चुनावी वादे
को पूरा करते हुए एक करोड़
बिजली उपभोक्ताओं को इंदिरा
ज्योति योजना में सस्ती बिजली
उपलब्ध कराई है। केवल सत्रह
लाख उपभोक्ता इस सुविधा के
दायरे में नहीं आए हैं। हितग्राही
उपभोक्ताओं को अब तीस दिनों
की बिजली खपत डेढ़ सौ यूनिट
से कम होने पर सौ यूनिट का बिल
मात्र सौ रुपए लिया जा रहा है।
प्रेस
वार्ता में श्री सिंह ने बताया
कि उपभोक्ताओं को लाभ देने
के लिए राज्य सरकार 3400
करोड़ रुपए
की सब्सिडी दे रही है। इससे
90 फीसदी
उपभोक्ता लाभान्वित हो रहे
हैं। उन्होंने बताया कि जब
नई सरकार सत्ता में आई तब बिजली
कंपनियों पर 37963 करोड़
रुपए का कर्ज था और लगभग 44975
करोड़ का संचयी
घाटा था।
उन्होंने
पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज
सिंह चौहान के उस बयान को गैर
लोकतांत्रिक बताया जिसमें
उन्होंने उपभोक्ताओं से अधिक
बिजली बिल का भुगतान न करने
का आव्हान किया है। उन्होंने
कहा कि इस तरह के भड़काऊ बयानों
से अराजकता फैल जाएगी जिसे
नियंत्रण करने के लिए राज्य
को अपने बहुमूल्य संसाधन खर्च
करने होंगे।
जुलाई
महीने से लेकर अब तक ऊर्जा
विभाग में कितने तबादले किए
गए और इन तबादलों से विभाग को
क्या लाभ हुआ पूछे जाने पर
उन्होंने कहा कि ये तबादले
पांच साल की समयसीमा पूरी होने
पर किए गए हैं। उन्होंने कहा
कि तबादलों की निश्चित संख्या
तो बता पाना फिलहाल संभव नहीं
है लेकिन ये तबादले जरूरत के
अनुसार ही किए गए हैं।
नवंबर
के महीने तक मीटर बदलने की समय
सीमा बढ़ाए जाने की बात स्वीकार
करते हुए श्री सिंह ने कहा कि
ये समय सीमा मार्च 2020 तक
तय की गई है।
भोपाल
की सांसद प्रज्ञा सिंह को भारत
सरकार के रक्षा मंत्रालय की
समिति का सदस्य बना दिए जाने
से विघ्न संतोषी ताकतों के
पिछवाड़े मिर्ची लग गई है।
उनका कहना है कि प्रधानमंत्री
नरेन्द्र मोदी ने जब साध्वी
प्रज्ञा सिंह के प्रति सार्वजनिक
तौर पर नाराजगी व्यक्त की थी
तो उन्हें रक्षा समिति जैसे
महत्वपूर्ण कार्य की जवाबदारी
कैसे दी जा सकती है। भोपाल की
सांसद से चिढ़ने वालों की
फेरहिस्त बड़ी लंबी है। जबसे
साध्वी प्रज्ञा को भाजपा ने
सांसद के रूप में प्रोजेक्ट
किया था तबसे उन्हें विवादों
में घसीटने के प्रयास लगातार
होते रहे हैं। अब जबकि वे 21
सदस्यों वाली रक्षा
समिति की सदस्य बनाई गईं हैं
तब यही विघ्न संतोषी अपना
पिछवाड़ा संभालते हुए उछलने
लगे हैं। साध्वी प्रज्ञा सिंह
को 2008 में हुए
मालेगांव बम धमाके का आरोपी
बनाकर कांग्रेस के कुछ
षड़यंत्रकारियों ने हिंदू
आतंकवाद की नई परिभाषा गढ़ी
थी। इसे खूब प्रचारित किया
गया। कर्नल श्रीकांत पुरोहित
को भी इस बम धमाके में आरोपित
किया गया था जिन्हें बाद में
निर्दोष पाया गया और अब वे
सेना में दुबारा अपना काम
संभाल चुके हैं। दरअसल तत्कालीन
गृहमंत्री शिवराज पाटिल और
उसके बाद कांग्रेस के ही सुशील
कुमार शिंदे ने इस बम धमाके
को हिंदू बनाम मुस्लिम झड़प
का रूप देने का प्रयास किया
था। कांग्रेस के ही दिग्विजय
सिंह ने इसे हिंदू आतंकवाद
का नाम देते हुए साम्प्रदायिक
ध्रुवीकरण का अभियान चला दिया।
देश में लंबे समय तक ये बम धमाका
जातिगत वैमनस्य की वजह बना
रहा। अब जबकि एनआईए की गढ़ी
गई कहानी झूठी साबित हो रही
है तब देश का एक बड़ा तबका इस
पर संशय महसूस कर रहा है। इस
मामले की सुनवाई कर रहे जज ने
भी सवाल पूछा कि यदि एनआईए की
कहानी झूठी है तो बम धमाका
किसने किया था। दरअसल एनआईए
के तत्कालीन अफसरों के माध्यम
से कांग्रेस सरकार ने जिस तरह
बम धमाके को साम्प्रदायिक
रंग देने का प्रयास किया उससे
आज भी लोग असमंजस महसूस कर रहे
हैं। मालेगांव के बम धमाके
में 7 लोगों की
मौत हुई थी और सौ से अधिक लोग
जख्मी हो गए थे। इस धमाके के
वास्तविक आरोपियों को तो जांच
के दायरे से बाहर कर दिया गया
और आतंक के खिलाफ काम करने
वालों को आरोपी बना दिया गया।
जाहिर है कि अब जबकि साध्वी
प्रज्ञा को देश की रक्षा समिति
का सदस्य बना दिया गया है तब
उनके खिलाफ षड़यंत्र रचने
वाला बड़ा समूह आहत महसूस
करेगा ही। अब समय आ गया है कि
जब भारत की सेना और नागरिकों
पर हिंदू आतंकवाद जैसा लांछन
लगाने में असफल होने के बाद
जो लोग बैचेन हो रहे हैं उनकी
आपत्तियों को रद्दी की टोकरी
में फेंक दिया जाना चाहिए।
भारत में आतंकवाद फैलाने वालों
पर कड़ी कार्रवाई होने से जो
लोग परेशान महसूस करते हैं
उनकी चिंता की जाएगी तो फिर
भारत में भी एक नया पाकिस्तान
बन जाएगा। आज पाकिस्तान ऐसे
ही आतंकवादियों से परेशान
है। भारत में इस आतंक की कमर
तोड़ने के लिए सेना और सरकार
को जो भी उपाय बन पड़ें बेखौफ
होकर करने चाहिए। इसमें किसी
आतंकवादी के मानवाधिकारों
की चिंता करने वालों की भी खबर
ली जाना जरूरी है।जो लोग आतंकवाद
की पैरवी करते फिरते हैं उनके
लिए साध्वी प्रज्ञा भारती के
रक्षा समिति में चयनित होने
पर चिंतित होना लाजिमी है।
देश की सुरक्षा के प्रति चिंतन
करने का काम वही लोग कर सकते
हैं जो देश के लिए मरने मिटने
के लिए तैयार हों। अपना सर्वस्व
न्यौछावर करने के लिए तैयार
हों। साध्वी प्रज्ञा सिंह
मालेगांव बम धमाके के प्रताड़ना
तंत्र से चोखी साबित होकर वापस
आईं हैं। भोपाल की जनता ने
षड़यंत्रकारी दिग्विजय सिंह
को भारी मतों से हराकर उन्हें
संसद भेजा है। महात्मा गांधी
की हत्या निश्चित तौर पर निंदनीय
और गलत थी। देश महात्मा गांधी
की क्षति पूर्ति कभी नहीं कर
सकता। इसके बावजूद नाथूराम
गोड़से की देशभक्ति पर सवाल
खड़े करना उन लोगों की सीमित
दृष्टि का ही नतीजा है जो खरगोश
की तरह आंखें बंद करके दुश्मन
के चले जाने का भ्रम पालते
फिरते हैं। साध्वी प्रज्ञा
के बयानों पर लाख सवाल उठाए
जाएं पर उनकी देशभक्ति शंका
से परे है। रक्षा मंत्रालय
या भारत सरकार के जिन भी लोगों
ने साध्वी को ये महत्वपूर्ण
जवाबदारी दी है उन्होंने देश
को संदेश देने का प्रयास किया
है कि वे रक्षा के मुद्दे पर
किन्हीं भी सीमाओं तक जा सकते
हैं। निश्चित रूप से भारत में
आतंक फैलाने की मंशा रखने
वालों के लिए ये कड़ा संदेश
है।इसकी जितनी प्रशंसा की
जाए कम है।
भोपाल,19
नवंबर(प्रेस
सूचना केन्द्र)।
छिंदवाड़ा मॉडल की शान बघारकर
मुख्यमंत्री बने कमलनाथ ने
सत्ता संभालते ही छिंदवाड़ा
में लगभग तीन हजार करोड़ के
प्रोजेक्ट मंजूर कर दिए हैं।
राज्य सरकार का खजाना खाली
होने का शोर मचाकर वे प्रदेश
को गुमराह कर रहे हैं और अपने
चुनाव क्षेत्र में प्रदेश के
संसाधन झोंकते चले जा रहे हैं।
मुख्यमंत्री के इस अभियान की
आड़ में अपना उल्लू सीधा करने
वाले पीआईयू विभाग के एपीडी
रमाकांत गुप्ता ने ठेकेदारों
का नया गिरोह खड़ा करना शुरु
कर दिया है। सबसे ज्यादा चंदा
देकर वे सरकार के नीति नियंताओं
के लोकप्रिय बने हुए हैं और
कमाई के साथ साथ रिटायरमेंट
के बाद अपनी पुर्ननियुक्ति
की भूमिका भी बनाते जा रहे
हैं।
कमलनाथ
के अंधा बांटे रेवड़ी बार बार
खुद को दे वाले अंदाज का फायदा
उठाने वाले पीआईयू विभाग के
एपीडी रमाकांत गुप्ता के रवैये
से खासा असंतोष पनप रहा है
लेकिन वे पूरी बेशर्मी से अपना
भविष्य सुरक्षित करने में
जुटे हुए हैं। गुप्ता के रवैये
से न केवल छिंदवाड़ा बल्कि
पूरे जबलपुर संभाग के अन्य
विकास कार्य ठप हो गए हैं। जिन
प्रोजेक्टों की समय सीमा पूरी
हो चुकी है और बावजूद वे अधूरे
हैं उनकी समय सीमा बढ़ाना
एपीडी के अधिकार क्षेत्र में
ही रहता है। मूल ठेके से जुड़े
सप्लीमेंट्री सेक्शन की
मंजूरी, स्टीमेट
में सुधार, और लैब
अप्रूवल जैसे कार्य भी एपीडी
ही संपन्न कराते हैं। जाहिर
है कि इन सभी कार्यों के लिए
रमाकांत गुप्ता के दफ्तर में
ठेकेदारों को मोटी रिश्वत
देनी पड़ रही है। उगाही के इस
तंत्र से जुड़े उनके करीबियों
का कहना है कि इसमें माननीय
मुख्यमंत्री जी के दफ्तर का
खर्च भी शामिल है।
अपने
पूरे सर्विसकाल में श्री
गुप्ता ने ठेकों की परिपाटियों
को अपनी परिभाषा की कसौटी पर
कसा है। जब वे मुख्य अभियंता
थे तब भी उन्होंने ठेकेदारों
के कमीशन में से राजनेताओं
का हिस्सा बढ़ाया था। यही वजह
है कि उनके प्रमोशन धड़ाधड़
होते चले गए और अब वे अपने
रिटायरमेंट के करीब आते आते
सेवा वृद्धि की रणनीति पर तेजी
से काम कर रहे हैं। उनके इस
रवैये से ठेकेदारों पर अतिरिक्त
बोझ पड़ रहा है और शर्तें पूरी
न करने पर उन्हें अपने काम से
भी हाथ धोना पड़ रहा है।
गौरतलब
है कि छिंदवाड़ा के अधिकतर
निर्माण कार्य ईपीसी पद्धति
से कराए जा रहे हैं। जिनमें
ज्यादातर ठेकेदार दिल्ली के
ही हैं और वे नक्शा बनाने से
लेकर संधारण और निर्माण के
सभी कार्यों का ठेका ले रहे
हैं। इस पूरी प्रक्रिया में
ठेकों की लागत अनावश्यक रूप
से बढ़ाई जा रही है। कई ठेकेदारों
का आतंक इतना ज्यादा है कि
विभाग के अफसर भी उनकी बात
काटने में हिचकते हैं। बताते
हैं कि आरके गुप्ता का मार्गदर्शन
पाकर वे ठेकेदार गुंडागर्दी
पर उतारू हो रहे हैं।
छिंदवाड़ा
माडल के नाम पर लूट का आलम ये
है कि भोपाल का हमीदिया अस्पताल
जहां लगभग छह सौ करोड़ रुपए
में बन रहा है वहीं छिंदवाड़ा
के सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल
की लागत 1600 करोड़
बताई गई थी। बाद में सरकार में
बैठे अफसरों ने इसे घटाने का
दबाव बनाया तो लागत 1100 करोड़
अनुमानित की गई। इस प्रक्रिया
में आरके गुप्ता ने आंख मूंद
ली और प्रदेश के खजाने से लगभग
दोगुनी राशि व्यय किए जाने
का राज मार्ग खोल दिया। पीआईयू
के सर्वेसर्वा विजय वर्मा इस
प्रक्रिया से पूरी तरह वाकिफ
हैं लेकिन वे भी इसी तरह के
हथकंडे अपनाते हुए अपना कार्यकाल
तीन बार बढ़वा चुके हैं। ठेके
की लागत घटाने के साथ साथ इस
अस्पताल के लिए दुबारा टेंडर
बुलाने पड़े थे, जिससे
लागत भी बढ़ी और प्रोजेक्ट
की समयसीमा भी बढ़ गई।
श्री
गुप्ता जब पीडब्लयूडी के मुख्य
अभियंता थे तब उन्होंने सड़कों
के 200 करोड़ रुपए के
कार्य को भी कई महीनों तक लटकाया
था। ये निर्माण न्यू डेवलपमेंट
बैंक से प्राप्त कर्ज से किया
जाना था। गुप्ता की शर्तें
पूरी नहीं होने के कारण उन्होंने
इस प्रोजेक्ट को महीनों तक
तकनीकी मंजूरी नहीं दी। जब
विभाग में नए अभियंता की
नियुक्ति हुए तब जाकर सड़कों
के लिए तकनीकी मंजूरी दी जा
सकी।इस तरह प्रदेश के संसाधनों
से खिलवाड़ करने वालों के लिए
गुप्ता एक सफल सरमाएदार बन
गए हैं।
भोपाल,22अक्टूबर(प्रेस
सूचना केन्द्र)।
शुद्ध के लिए युद्ध नाम से
चलाई गई कमलनाथ सरकार की पाखंडी
मुहिम पर अंततः केन्द्र सरकार
ने हस्तक्षेप करके विराम लगा
दिया है। उज्जैन के एक घी
व्यापारी पर लगाई गई रासुका
का प्रकरण हटाकर केन्द्र के
गृह विभाग ने राज्य सरकार की
तमाम कार्रवाईयों को संदेह
के दायरे में ला दिया है। रासुका
हटाए जाने से बिलबिलाई कमलनाथ
कांग्रेस ने इसके बाद अनर्गल
प्रलाप शुरु कर दिया है।
मध्यप्रदेश
कांग्रेस की मीडिया विभाग की
अध्यक्ष शोभा ओझा और उपाध्यक्ष
अभय दुबे ने उज्जैन के घी
व्यापारी कीर्ति वर्धन केलकर
पर लगाई रासुका हटाने की
कार्रवाई को शर्मनाक बताया
है।अभय दुबे का कहना है कि
कीर्ति वर्धन केलकर को 30
जुलाई 2019 को
उज्जैन प्रशासन ने नकली घी
बनाते हुए तथा केमिकल एवं
रसायनों के साथ पकड़ा था।
कार्रवाई करने वाले अमले का
आरोप था कि व्यक्ति अपने परिसर
में बेकरी शार्टनिंग के नाम
पर मिलावटी घी का निर्माण कर
रहा था। इस व्यक्ति से 45
किलो घी जब्त करके
सैंपल को जांच के लिए भेजा गया
था। जांच रिपोर्ट में सामग्री
अवमानक (कम गुणवत्ता)
स्तर की पाई गई। इसके
बाद आरोपी के खिलाफ एफएसएस
एक्ट 2006 की धारा
26(2)(ii) तथा नियम 2011
सहपठित धारा 51 के
तहत अपराध पंजीबद्ध किया गया।
खाद्य
विभाग का आरोप था कि यह व्यक्ति
आदतन अपराधी है। इसके पूर्व
2015 में भी इसका नमूना
लिया गया था, तब भी
सामग्री घटिया गुणवत्ता की
पाई गई थी। वह प्रकरण न्यायालय
में विचाराधीन है। दो प्रकरण
बन जाने के कारण व्यापारी को
आदतन अपराधी बताते हुए कलेक्टर
ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम
1980 की धारा 3(2) के
तहत कार्रवाई करने की अनुशंसा
की गई थी। इस प्रकरण में केंद्रीय
गृहमंत्रालय ने 10 अक्टूबर
2019 को राष्ट्रीय
सुरक्षा कानून 1980 की
धारा 14 (1) के तहत
रासुका की कार्रवाई को निष्प्रभावी
कर दिया है।
शोभा
ओझा और अभय दुबे ने केंद्रीय
गृहविभाग की इस कार्रवाई को
शर्मनाक बताते हुए आरोप लगाया
है कि मप्र भाजपा के बड़े नेता
सत्ता में रहते हुए भी मिलावट
खोरों के साथ खड़े थे और आज
विपक्ष में रहकर भी मिलावटखोरों
का साथ निभा रहे हैं।
अभय
दुबे का कहना है कि कमलनाथ
सरकार ने शुद्ध के लिए युद्ध
अभियान में अब तक 89 व्यापारियों
के विरुद्ध मिलावटखोरी के
लिए एफआईआर दर्ज की है। 31
मिलावटखोरों पर रासुका
के तहत कार्रवाई की गई है।
पूरे प्रदेश में इस साल 19
जुलाई से 16 अक्टूबर
तक दूध उत्पादनों एवं अन्य
खाद्य पदार्थों, पान
मसाला सहित कुछ 7425 नमूने
जांच के लिए दिए गए हैं। इनमें
से राज्य प्रयोगशालाओं और
अन्य प्रयोगशालाओं से कुछ
2147 नमूनों की रिपोर्ट
आई है। इनमें 666 अवमानक
(कम गुणवत्ता के)
पाए गए हैं। 163
मिथ्याछाप(दूसरे
ब्रांड के) पाए गए
हैं। 40 मिलावटी पाए
गए हैं। 36 सुरक्षित
पाए गए और 30 प्रतिबंधित
पाए गए हैं।
गौरतलब
है कि राज्य सरकार के अभियान
को समर्थन देने के लिए कई जिलों
में खाद्य अधिकारियों ने फर्जी
तरीके से रिपोर्ट बिगड़वाई
और व्यापारियों के विरुद्ध
रासुका की कार्रवाई की है।
इसकी शिकायतें कई जिलों से आ
रहीं हैं और प्रकरण अदालतों
में लंबित पड़े हैं। कुछ
प्रकरणों को हाईकोर्ट ने रद्द
कर दिया है और कई अन्य विचाराधीन
हैं। इस मुहिम की आड़ में सत्ता
के दलालों ने व्यापारियों को
धमका चमकाकर लाखों रुपए वसूले
हैं। व्यापारियों के नमूने
अवमानक बताने के लिए खाद्य
विभाग के अफसर फर्जी रिपोर्ट
तैयार कर रहे हैं और पुलिस
कार्रवाई के नाम पर व्यापारियों
से लाखों रुपए ऐंठे जा रहे
हैं। स्थानीय निकायों ने भी
खाद्य सुरक्षा के नाम पर अपनी
टीमें बना लीं हैं जो व्यापारियों
से महीना वसूल रहीं हैं। राज्य
सरकार की इस पाखंडपूर्ण कार्रवाई
के बावजूद बाजार में नकली
खाद्य सामग्रियां धड़ल्ले
से बिक रहीं हैं और निर्दोष
व्यापारियों को परेशान किया
जा रहा है। सरकार की इस कार्रवाई
पर लगाम लगाकर केन्द्रीय गृह
मंत्रालय ने साफ जाहिर कर दिया
है कि राज्य सरकार की अन्यायपूर्ण
गतिविधियों पर वह चुप्पी साधे
नहीं रह सकती।
भोपाल 11
अक्टूबर(प्रेस
सूचना केन्द्र)।
वन मंत्री उमंग सिंघार का कहना
है कि मध्यप्रदेश के पूर्व
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह
चौहान की लोकप्रियता बटोरने
की ललक के चलते राज्य सरकार
के खजाने को 450 करोड़
का नुकसान पहुंचा था। गिनीज
बुक ऑफ वर्ल्ड में अपना नाम
दर्ज कराने के चक्कर में शिवराज
ने जुलाई 2017 में एक
ही दिन में नर्मदा किनारे 7
करोड़ पौधे लगाने का
फरमान सुनाया। अधिकारी मना
करते रहे, लेकिन
मुख्यमंत्री की सनक के सामने
किसी की नहीं चली। 30 प्रतिशत
पौधे भी नहीं लगे और बजट पूरा
निकाल लिया गया। कमलनाथ सरकार
ने अब इस पर सख्त कदम उठाते
हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री
शिवराज सिंह चौहान और तत्कालीन
वनमंत्री डॉ. गौरीशंकर
शेजवार सहित 6 अधिकारियों
के खिलाफ आर्थिक अपराध अन्वेषण
ब्यूरो में एफआईआर दर्ज करने
के निर्देश दिए हैं।
प्रदेश
के वनमंत्री उमंग सिंघार ने
आज पत्रकार वार्ता में शिवराज
सरकार पर लगने वाले आरोपों
को लेकर आज ये खुलासा किया।
उनका कहना है कि अधिकारियों
के रोकने के बावजूद तत्कालीन
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह
चौहान गिनीज बुक में नाम दर्ज
कराने एक दिन में 7 करोड़
10 लाख 39 हजार
711 पौधे लगाने का
कथित झूठा रिकॉर्ड बनाते रहे।
मजेदार बात यह है कि इतने सारे
पौधे 20 रुपए से 200
रुपए के दर पर खरीदना
दिखाया गया। इनके लिए गड्ढे
करना दिखाया गया और इनके रोपण
खाद्य और पानी के नाम पर भी
करोड़ों रुपए निकाले गए।
सरकारी रिकॉर्ड में 1 लाख
21 हजार 275 स्थानों
पर 7.10 करोड़ पौधों
की घोषणा की गई जबकि गिनीज बुक
वल्र्ड ऑफ रिकॉर्ड को बताया
गया कि मात्र 5 हजार
540 स्थानों पर 2
करोड़ 22 लाख
28 हजार 954 पौधे
ही लगाए गए। यानि 3 गुना
भ्रष्टाचार तो पहले ही साफ
दिखाई दे रहा है। वनमंत्री
का दावा है कि मात्र 5 से
7 प्रतिशत पौधे ही
लगे हैं।
वनमंत्री
ने पत्रकार वार्ता में कहा
कि शिवराज कार्यकाल में हुए
पौधा रोपण कार्यक्रम में वन
विभाग के अधिकारी वनमंत्री
को ही गलत जानकारियां दे रहे
हैं। उन्होंने बताया कि बैतूल
के शाहपुर परिक्षेत्र में
वृक्षारोपण की जानकारी मांगने
पर अधिकारियों ने बताया था
कि 2 जुलाई 2017 को
15625 पौधे रोपे गए
इनमें से 11 हजार 140
पौधे जीवित हैं। जबकि
27 जून 2019 को
स्वयं वनमंत्री ने वरिष्ठ
अधिकारियों के साथ मौका मुआयना
किया तो मौके पर मात्र 2343
पौधे ही जीवित मिले।
इस स्थान पर पौधों के लिए गड्ढे
भी मात्र 9 हजार 985
ही खोदे गए थे। उन्होनें
कहा कि गलत जानकारी देने वाले
अधिकारियों के खिलाफ सख्त
कार्रवाई की जा रही है।
इस पूरे
मामले में अतिरिक्त मुख्य
सचिव स्तर के आईएएस अधिकारी
एपी श्रीवास्तव की भूमिका को
संदिग्ध बताया जा रहा है। जिस
समय यह घोटाला हुआ तब वे प्रमुख
सचिव वित्त थे। उन्होंने ही
इस वृक्षारोपण अभियान के लिए
वित्तीय अनुमतियां दीं थीं।
वर्तमान में श्रीवास्तव वन
विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव
हैं। वनमंत्री ने उन्हें ही
नोटशीट लिखकर इस घोटाले की
शिकायत ईओडब्ल्यू को करने के
निर्देश दिए हैं। मंत्रालय
में चर्चा है कि जिस अधिकारी
ने स्वयं घोटाले की राशि जारी
की है वह इसकी शिकायत कैसे
कराएगा?
सूत्रों
के मुताबिक केन्द्रीय वन
मंत्रालय से प्राप्त पांच सौ
करोड़ रुपए की धनराशि को राज्य
के अन्य विकास कार्यों पर भी
खर्च किया गया था जबकि वृक्षारोपण
अभियान वन विभाग के सामान्य
बजट और कई निजी संस्थाओं के
जन सहयोग से पूरा किया गया था।
राज्य में पहली बार नर्मदा
नदी के दोनों किनारों पर इतना
बड़ा वृक्षारोपण अभियान चलाया
गया था। ईओडब्ल्यू की जांच
में ये साफ हो जाएगा कि बजट की
धनराशि का किसी भी तरह दुरुपयोग
नहीं किया गया था। वन विभाग
की ही एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार
इस अभियान में लगाए गए लगभग
साठ फीसदी वृक्ष अभी भी जिंदा
हैं और तीस फीसदी वृक्षारोपण
हर अभियान में असफल होता ही
है। ऐसे में केवल दस फीसदी
वृक्षों के आंकड़ों के आधार
पर रचा गया ये घोटाले का मायाजाल
आगे चलकर कुछ अधिकारियों को
निपटाने के साथ ही ठंडा पड़
जाएगा।
भोपाल,11
अक्टूबर(प्रेस
सूचना केन्द्र)।खनिज
साधन विभाग ने प्रदेश में रेत
नियम-2019 के क्रियान्वयन
की प्रक्रिया 43 जिलों
में समूहवार शुरू की है। रेत
खदानों की शुरू की गई निविदा
प्रक्रिया की अंतिम तिथि 8
नवम्बर, 2019 निर्धारित
की गई है। निविदाओं के बाद सफल
उच्चतम बोली के निविदाकार को
अपने जिले में रेत खदानों के
संचालन की जिम्मेदारी दी
जायेगी।तब तक रेत की सप्लाई
पंचायतों से ही जारी रहेगी।
राज्य
शासन ने नई नीति के अनुसार
जिले में रेत खदानों के संचालन
के लिये सभी वैधानिक अनुमतियाँ
प्राप्त करने में लगने वाले
समय को देखते हुए निजी भूमि
पर उपलब्ध रेत खदानों और ग्राम
पंचायतों को हस्तांतरित रेत
खदानों को पूर्व की भाँति
निरंतर संचालित रखे जाने का
निर्णय लिया है। जिन निजी भूमि
एवं ग्राम पंचायतों की रेत
खदानों को मानसून अवधि में
प्रतिबंध लगने के पूर्व 30
जून, 2019 के
पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति
प्राप्त हो गई थी, ऐसी
सभी खदानों को तत्काल संचालित
करने के प्रस्ताव भेजने के
निर्देश प्रमुख सचिव, खनिज
साधन विभाग श्री नीरज मण्डलोई
ने जिला कलेक्टर्स को दिये
हैं।
खनिज साधन
मंत्री श्री प्रदीप जायसवाल
ने बताया कि प्रदेश में नई
नीति के अनुसार रेत खदानों
की निविदा के लिये बड़ी संख्या
में इच्छुक निविदाकार तैयारी
कर रहे हैं। नई नीति से प्रदेश
को रेत से 464 करोड़
रुपये के आरक्षित मूल्य से
अधिक राजस्व प्राप्त होने की
संभावना है। उन्होंने बताया
कि प्रदेश में जन-सामान्य
को रेत प्राप्त करने में दिक्कत
न हो, इसे ध्यान में
रखते हुए पर्यावरणीय स्वीकृति
प्राप्त निजी भूमि की रेत
खदानों और ग्राम पंचायतों को
हस्तांतरित रेत खदानों को
चालू रखे जाने का निर्णय लिया
गया है।
बदलते
वैश्विक दौर में हस्तशिल्प
और हथकरघा क्षेत्र का विकास
चुनौतीपूर्ण
भोपाल,10 अक्टूबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। राज्यपाल लालजी टंडन ने कहा है कि तेजी से बदलते वैश्विक दौर में हस्तशिल्प और हथकरघा क्षेत्र के विकास के लिये कार्य करना चुनौतीपूर्ण है। उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन हस्तशिल्प और हथकरघा पद्धति का विकास कर हम रोजगार के ज्यादा से ज्यादा अवसर निर्मित कर सकते हैं। बाजारवाद ने जिस तरह फिनिश माल की मांग बढ़ा दी है उस दौर में ग्रामीण उत्पादों की मार्केटिंग एक चुनौती है। राज्यपाल आज यहाँ हिन्दी भवन में डॉ. बी.आर. अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित त्रि-स्तरीय पंचायती राज प्रशिक्षण कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।
राज्यपाल
श्री टंडन ने कहा कि पंचायत
राज व्यवस्था हमेशा से ग्रामीण
विकास की धुरी रही है। हमारे
देश के हस्तशिल्प और हथकरघा
की दुनियाभर में विशिष्ट पहचान
रही है, लेकिन पिछले
कुछ वर्षों में मशीनीकरण के
दौर ने इन कलाओं के विकास को
प्रभावित किया है। प्राचीन
दौर में इन कलाओं के माध्यम
से अधिक से अधिक लोगों को उनके
गाँव में ही रोजगार के अधिक
से अधिक अवसर मिल जाते थे।
राज्यपाल ने कहा कि देश की
आदिवासी संस्कृति की समृद्धि
के लिये निरंतर प्रयास करना
भी जरूरी है।
डॉ.
बी.आर.
अम्बेडकर सामाजिक
विज्ञान विश्वविद्यालय,
महू की कुलपति प्रो.
आशा शुक्ला ने कहा कि
विश्वविद्यालय डॉ. अम्बेडकर
के सपनों और आदर्शों को केन्द्र
में रखकर निरंतर कार्य कर रहा
है। उन्होंने बताया कि ग्रामीण
क्षेत्रों में रोजगार के अधिक
से अधिक अवसर निर्मित करने
के लिये पंचायत प्रतिनिधियों
को प्रशिक्षण दिये जाने की
व्यवस्था की गई है। विश्वविद्यालय
द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों
में हस्तशिल्प और हथकरघा के
विकास के लिये जागरूकता
कार्यक्रम भी चलाये जा रहे
हैं। प्रो. शुक्ला
ने बताया कि इस प्रशिक्षण
कार्यक्रम में रायसेन,
सीहोर और भोपाल जिले
के कारीगरों और पंचायत
प्रतिनिधियों को प्रशिक्षण
दिये जाने की व्यवस्था है।
उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय
ने महू के पास 12 गाँव
गोद लिये हैं, इन
गाँवों में सामाजिक विकास के
लिये जन-जागरूकता
अभियान चलाया जा रहा है।
कार्यक्रम
को साथिया वेलफेयर सोसायटी
की निदेशक श्रीमती स्मृति
शुक्ला और हस्तशिल्प विकास
निगम के प्रतिनिधि श्री महेश
गुलाटी ने भी संबोधित किया।
पान बरेजों
के लिए निस्तार दर पर बांस
मुहैया कराए जाएंगे
मंत्रि-परिषद
के निर्णय
भोपाल,5 अक्टूबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। मुख्यमंत्री कमल नाथ की अध्यक्षता में आज मंत्रालय में हुई मंत्रि-परिषद की बैठक में सामाजिक सुरक्षा पेंशन भुगतान के लिए जिलों को 550 करोड़ 2 लाख रूपये की राशि स्वीकृत करने का निर्णय लिया गया। यह राशि राज्य स्तरीय निराश्रित निधि खाते से मासिक आवश्यकतानुसार आहरित कर सामाजिक सुरक्षा पेंशन का भुगतान किया जायेगा। आईटीसी के अगरबत्ती उद्योग को सरकारी जंगलों का बांस सस्ते भावों पर मुहैया कराने के लिए कमलनाथ सरकार ने पान बरेजों के लिए निस्तार दर पर बांस मुहैया कराने का फैसला लिया है। सूत्र बताते हैं कि पान बरेजों के नाम पर खरीदा जाने वाला बांस सीधे अगरबत्ती उद्योग को मुहैया कराए जाने की तैयारी की जा रही है।
मंत्रि-परिषद
ने प्रदेश में होटल,
रिसॉर्ट और हेरिटेज
होटल की स्थापना के लिए ब्रॉण्ड्स
को आकर्षित और प्रोत्साहित
करने के लिए सतत् अनुदान उपलब्ध
कराने की ब्रॉण्डेड होटल
प्रोत्साहन नीति-2019
का अनुमोदन किया।
ब्रॉण्ड्स को प्रदेश में
स्थापित होने वाली परियोजनाओं
की संभावनाओं को देखते हुए
ब्रॉण्ड हॉटल्स,
ब्रॉण्ड रिसॉर्टस
और ब्रॉण्ड हेरिटेज हॉटल्स
श्रेणी में वर्गीकृत किया
गया है।
मध्यप्रदेश
देश का पहला राज्य है,
जिसने ब्राण्ड
हॉटल्स की स्थापना पर इस तरह
की नीति बनाई है। अनुमान है
कि इस नीति से प्रदेश में अगले
5 वर्षों
में ब्राण्ड हॉटल्स में कम
से कम एक हजार लग्जरी और
विश्व-स्तरीय
नवीन कक्ष स्थापित हो सकेंगे।
न्यूनतम 100 करोड़
रुपये अथवा उससे अधिक के निवेश
से नवीन ब्राण्ड होटल की स्थापना
पर उनके द्वारा होटल कक्षों
के किराये से प्राप्त वार्षिक
टर्न ओवर पर नीति अंतर्गत 3
वर्ष तक 20
से 30
प्रतिशत तक अनुदान
दिया जायेगा। अनुदान की अधिकतम
सीमा 3 करोड़
रुपये होगी। इसी प्रकार,
ब्रॉण्ड रिसॉर्ट
एवं ब्रॉण्ड हेरिटेज होटल को
3 वर्षों
तक प्रतिवर्ष 2
करोड़ रुपये तक संचालन
अनुदान दिया जायेगा। ब्रॉण्ड
होटल को दिये जाने वाला यह
अनुदान उन्हें नीति के तहत
प्राप्त होने वाले पूँजी
अनुदान के अतिरिक्त होगा।
प्रदेश
सरकार के पर्यटन विकास के
लक्ष्यों की पूर्ति के लिए
मंत्रि-परिषद
ने पर्यटन नीति-2016
को सक्षम,
व्यवहारिक,
व्यापक और पूंजी
निवेश के अनुकूल बनाने के लिए
प्रावधानित संशोधन को अनुमोदन
प्रदान कर दिया। बैठक में
मार्ग सुविधा केन्द्रों
(वे-साईड
एमेनिटीज) की
स्थापना एवं संचालन की नीति
2016 में
संशोधन का अनुमोदन किया गया।
इसके अंतर्गत मध्यप्रदेश
पर्यटन विकास निगम द्वारा
पूरे प्रदेश में रोड नेटवर्क
एवं यात्री सुविधाओं की आवश्यकता
को ध्यान में रखते हुए मार्ग
सुविधा केन्द्रों की स्थापना
को प्रोत्साहित किया जाएगा।
साथ ही, संभावित
स्थलों और तैयार ब्राउन-फील्ड
मार्ग सुविधा केन्द्रों का
प्रचार-प्रसार
किया जाएगा, ताकि
निवेश का वातावरण तैयार हो।
मंत्रि-परिषद
ने आवास एवं पर्यावास नीति
2007 की
कंडिका क्रमांक 5.4
को विलोपित करने
का निर्णय लिया। इसमें निवेश
के क्षेत्रों में भूखण्डीय
विकास के लिए भूमि अथवा भू-खण्ड
का क्षेत्रफल दो हेक्टेयर
रखे जाने का प्रावधान था। इस
कारण न्यूनतम दो हेक्टेयर
भूमि की आवश्यकता निर्मित
होने से छोटी भूमि अनुपयोगी
रह जाती थी। ऐसे क्षेत्रों
में अवैध कॉलोनियाँ विकसित
होने की संभावनाएँ बढ़ जाने
से विकास की निरंतरता भी बाधित
हो रही थी।
रिसॉर्ट
बार लायसेंस का सरलीकरण
मंत्रि-परिषद
ने राज्य के वन क्षेत्रों में
पर्यटन को प्रोत्साहन देने
के लिए रिसॉर्ट बार लायसेंस
का सरलीकरण करने का निर्णय
लिया। इसमें राष्ट्रीय उद्यानों
के अतिरिक्त वन अभयारण्य के
पास भी रिसॉर्ट बार लायसेंस
की सुविधा दी जाएगी। रिसॉर्ट
बार राष्ट्रीय उद्यान/अभयारण्यों
की सीमा से 20
किलोमीटर की सीमा
में स्थित होना चाहिए। रिसॉर्ट
में दस कमरों के स्थान पर
न्यूनतम पाँच कमरों का प्रावधान
किया गया। रिसॉर्ट बार के लिए
न्यूनतम क्षेत्र 2
हेक्टेयर को घटाकर
एक एकड़ करने का निर्णय लिया
गया। वन्य क्षेत्रों में स्थित
रिसॉर्ट बार के लिए वार्षिक
लायसेंस फीस पाँच कमरे के लिए
50 हजार,
6 से 10
कमरे के लिए एक लाख
और 10 से
अधिक कमरे वाले रिसॉर्ट के
लिए डेढ़ लाख रूपये करने का
निर्णय लिया गया है। सभी बार
लायसेंसों की स्वीकृति और
नवीनीकरण के प्रकरणों में
अग्नि सुरक्षा संबंधी व्यवस्था
के संबंध में निर्धारित
प्रमाण-पत्र
के स्थान पर जिला आबकारी अधिकारी
तथा संबंधित रिसॉर्ट बार
अनुज्ञप्तिधारी के संयुक्त
हस्ताक्षर से रिपोर्ट ली
जाएगी।
मंत्रि-परिषद
ने पान किसानों/पान
बरेजा परिवारों को निस्तार
दर पर बाँस उपलब्ध कराने का
निर्णय लिया। वन विभाग द्वारा
जारी आदेश को 10
मार्च 2019
से ही पान बरेजा
परिवारों की निस्तार नीति
में शामिल करते हुए कार्योत्तर
अनुमोदन प्रदान किया गया।
संशोधित निस्तार नीति वर्ष-2019
का भी अनुमोदन किया
गया।
मंत्रि-परिषद
ने भारतीय पुलिस सेवा (संवर्ग)
नियम के अनुसार 31
अक्टूबर,2019
तक की अवधि के लिए
पुलिस महानिदेशक ग्रेड में
एक पद निर्मित करने का निर्णय
लिया। इसी के साथ,
संविदा आधार पर
निरंतर किए गए कोर्ट मैनेजर
का कार्यकाल 31
मार्च 2020
तक अथवा नियमित
कोर्ट मैनेजर के पदों पर भर्ती
होने तक, जो
भी पहले हो, इस
शर्त के साथ अंतिम बार निरंतर
करने का निर्णय लिया गया।
मंत्रि-परिषद
ने मुंबई स्थित मध्यालोक भवन
का संचालन एवं संधारण मध्यप्रदेश
राज्य पर्यटन विकास निगम को
सौंपने का भी निर्णय लिया।
भोपाल,26
सितंबर(प्रेस
सूचना केन्द्र)।
मध्यप्रदेश में आगामी नगरीय
निकाय चुनाव में नगर निगम के
महापौर सहित नगर पालिका और
नगर परिषद में अध्यक्ष का
चुनाव अब पार्षद करेंगे। अभी
तक जनता को इनके चुनाव करने
का अधिकार था, लेकिन
बुधवार 26 सितंबर
को हुई कैबिनेट बैठक में इस
पर मोहर लगा दी है कि अब पार्षद
महापौर और अध्यक्ष का चुनाव
करेंगे। नई व्यवस्था लागू
करने के लिए मध्यप्रदेश नगर
पालिक अधिनियम में संशोधन
किया गया है। अगले साल होने
वाले नगरीय निकाय चुनाव में
20 साल बाद अप्रत्यक्ष
तौर पर महापौर और अध्यक्षों
का चुनाव होगा। वहीं नगरीय
निकाय चुनाव के पहले होने वाले
परिसीमन का समय 6 माह
से घटाकर सरकार ने 2 माह
कर दिया है। अभी तक परिसीमन
और चुनाव के बीच का समय 6
महीने होना जरूरी था।
भाजपा ने
सरकार के इस फैसले का विरोध
किया है। भाजपा को यह आशंका
है कि अप्रत्यक्ष प्रणाली से
महापौर और अध्यक्षों के चुनाव
हुए तो उसको नुकसान हो सकता
है। जबकि कांग्रेस अप्रत्यक्ष
प्रणाली से चुनाव करवाकर
प्रदेश की ज्यादा से ज्यादा
नगर निगमों, नगर
पालिकाओं और नगर परिषदों में
अपने समर्थकों को महापौर और
अध्यक्ष बनाना चाहती है।
मध्यप्रदेश में नगरीय निकाय
चुनावों का गणित देखा जाए तो
दोनों ही प्रमुख पार्टियों
के 40-40 प्रतिशत पार्षद
जीतते हैं। वहीं, निर्दलीय
और अन्य दलों के पार्षद 20
प्रतिशत पर ही सिमट
जाते हैं। कमलनाथ सरकार के
इस फैसले के बाद कांग्रेस
समर्थित पार्षदों के अलावा
निर्दलीय और अन्य दल के पार्षद
भी सत्ताधारी दल के साथ आना
चाहेंगे। जिसके चलते प्रदेश
के ज्यादातर नगरीय निकायों
में कांग्रेस समर्थित
जनप्रतिनिधियों की जीत होगी।
कमलनाथ
कैबिनेट ने इसके अलावा आपराधिक
छवि वाले पार्षदों पर सख्ती
करने का प्रस्ताव भी पारित
किया है। अब ऐसे पार्षदों के
दोषी पाए जाने पर उन्हें 6
माह की सजा और 25 हजार
जुर्माने का प्रावधान सरकार
ने किया है। कुल मिलाकर देखा
जाए तो अभी तक प्रत्यक्ष प्रणाली
से नगर निगम महापौर और नगरपालिका
तथा नगर परिषद अध्यक्ष को जनता
सीधे चुनती थी लेकिन बुधवार
को नगरीय निकाय चुनाव को लेकर
आए कैबिनेट के नए फैसले के तहत
अब जनता सीधेतौर पर महापौर
और अध्यक्ष का चुनाव नहीं कर
सकेगी, इन्हें अब
जनता के चुने हुए पार्षद ही
चुनेंगे।
भोपाल,26
सितंबर(प्रेस
सूचना केन्द्र)।
घनघोर आर्थिक कुप्रबंधन से
घिरी कमलनाथ सरकार ने कामकाज
चलाने के लिए तीन शहरों में
मैट्रो रेल परियोजना के नाम
पर कर्ज बटोरने का अभियान
चलाया है। इसके तहत आज भोपाल
में सात हजार करोड़ रुपए के
मैट्रो के पहले चरण का शिलान्यास
किया गया। ये आकलन अभी आनन
फानन में तैयार किया गया है
वास्तविक लागत इससे कई गुना
अधिक आने की संभावना व्यक्त
की जा रही है।
छिंदवाड़ा
मॉडल की औद्योगिक कलाकारी
वाली कमलनाथ की नौ महीने पुरानी
बैसाखियों पर टिकी सरकार जिस
तरह छीनाझपटी और भ्रष्टाचार
के रिकार्ड बना रही है उसके
चलते प्रदेश की तमाम आर्थिक
व्यवस्थाएं गड़बड़ा गईं हैं।
कमलनाथ जनता को बहलाने के लिए
रोज रोज कहते फिरते हैं कि
शिवराज सिंह चौहान सरकार खजाना
खाली छोड़कर गई है। जबकि हकीकत
ये है कि सरकार को जो बयालीस
सौ करोड़ रुपए मासिक आय होती
थी वो अब तेजी से गिरती जा रही
है। सरकार के तमाम प्रस्ताव
केन्द्र ने मैचिंग ग्रांट तक
न चुका पाने के कारण वापस लौटा
दिए हैं।
कमलनाथ
का जादू टूटने लगा है और वे
जिस औद्योगिक जादूगरी का हवाला
देकर सत्ता में आए थे उसकी
हालत इतनी खस्ता है कि आज जब
भोपाल में मैट्रो का उद्घाटन
करते हुए उन्होंने इसे राजा
भोज मैट्रो का नाम दिया तो
कांग्रेस के ही एक विधायक आरिफ
मसूद ने उनकी बात काट दी।
उन्होंने कहा कि मैट्रो का
नाम भोपाल मैट्रो ही रहने दिया
जाए। मंच से कमलनाथ की बात
काटे जाने से कांग्रेस के तमाम
नेता और पदाधिकारी खुद को
असहाय महसूस करते रहे।
दरअसल
सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा
देने की भारत सरकार की नीति
के चलते भोपाल में भी रेल शुरु
करने की योजना बनाई गई थी।
पूरे देश में राजीव गांधी की
पहल पर जिस वैयक्तिक परिवहन
को बढ़ावा दिया गया था वह बुरी
तरह असफल साबित हुआ है। देश
को आयातित ईंधन आधारित परिवहन
के लिए मंहगी कीमत चुकानी पड़ी
और हर आम आदमी को अपनी आय का
बड़ा हिस्सा वाहन खरीदने पर
खर्च करना पड़ा था। सड़कों
पर वाहनों की भीड़ इतनी अधिक
बढ़ गई कि सडकों को चौड़ा करने
के लिए भी सरकारों को मोटा
कर्ज लेना पड़ा इसके बावजूद
सार्वजनिक परिवहन की हालत जस
की तस रही।
कमलनाथ
ने कुर्सी संभालते वक्त कहा
था कि भोपाल को मैट्रो की जरूरत
नहीं है यहां मोनो रेल चलाई
जानी चाहिए। इसके बावजूद अब
वे ही इंदौर, जबलपुर
और भोपाल में भी मेट्रो चलाने
की वकालत कर रहे हैं। इसकी वजह
मैट्रो पर लिया जाने वाला वह
मोटा कर्ज है जिसका उपयोग वे
प्रदेश का खर्च चलाने में करने
की तैयारी कर रहे हैं। भोपाल
में सात हजार करोड़ रुपए से
जो 27.87 किलोमीटर
की मैट्रो बिछाई जानी है उसका
महज 1.79 किलोमीटर
हिस्सा जमीन के नीचे होगा।
बाकी पूरी मैट्रो पिलरों पर
ही चलेगी। इसके दो कारीडोर
बनेंगे जिसमें से एक करोंद
सर्कल से एम्स तक 14.94 किलोमीटर
और दूसरा भदभदा चौराहा से
रत्नागिरि चौराहा तक 12.88
किलोमीटर का होगा।
इसकी प्राथमिक लागत 6941 करोड़
40 लाख होगी। प्रोजेक्ट
में एलीवेटेड सेक्शन 26.08
किलोमीटर का होगा।
इसमें कुल 28 स्टेशन
बनेंगे। अंडर ग्राउण्ड सेक्शन
1.79 किलोमीटर का होगा,
जिसमें 2 स्टेशन
बनेंगे। पहला भाग दिसम्बर
2022 तक पूरा करने का
लक्ष्य है।
गौरतलब
है कि दिल्ली प्रदेश में मैट्रो
रेल 327 किलोमीटर
चलती है।यह रेल नेटवर्क दिल्ली
के एक करोड़ अस्सी लाख लोगों
के लिए बनाया गया है जिसमें
हर दिन सोलह लाख लोग सफर करते
हैं। इसके बावजूद मैट्रो घाटे
में चलती है। जबकि भोपाल की
आबादी महज 23 लाख है
और यहां 27 किलोमीटर
में मैट्रो बिछाने की तैयारी
की गई है। जिस तरह बीआरटीएस
रोड़ असफल साबित हुई और शहर
की परिवहन जरूरतें पूरी नहीं
कर पाई उसी तरह मैट्रो भी फिलहाल
औचित्यहीन है। इसके बावजूद
कमलनाथ सरकार ने आनन फानन में
मैट्रो केवल इसलिए प्रारंभ
की ताकि वो इसके नाम पर कर्ज
ले सके और राज्य की जरूरतें
पूरी कर सके। कांग्रेस के लोग
इसे कमलनाथ की औद्योगिक सूझबूझ
बता रहे हैं जबकि दिन ब दिन
प्रदेश के लोगों की बैचेनी
बढ़ती जा रही है।
देश के
वर्तमान प्रधानमंत्री राष्ट्रीय
स्वयंसेवक संघ के प्रचारक
रहे हैं l प्रचारक
और संचारक लगभग समानार्थी है
l संघ
का प्रत्येक स्वयंसेवक एक
कुशल संचारक होता है l
इसी प्रकार एक
प्रचारक में श्रेष्ठ संचारक
के सारे गुण विद्यमान होते
हैं l प्रधानमंत्री
श्री मोदी टेक्नोसेवी भी हैं
l वे
संचार के परम्परागत,
आधुनिक और अत्याधुनिक
साधनों का खूब इस्तेमाल करते
हैं l एक
अर्थ में वे भारत के वैश्विक
संचारक और प्रचारक प्रतीत
होते हैं l श्री
नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के
संचार कौशल के करोड़ों मुरीद
हैं l इसमें
बड़ी संख्या संघ के स्वयंसेवकों
की भी है l श्री
मोदी की संचार साधना में आभासी
और वास्तविक संचार का संतुलन
कमाल का है l यह
आदर्श और अनुसरण योग्य है l
लेकिन यह आधा सच है
l इसके
आगे की बात यह है कि संघ में
संचार प्रणाली,
प्रकिया,
संचार माध्यमों
और उपकरणों को लेकर अंतर्द्वन्द्व
और कशमकश की स्थिति है l
संघ के अनेक अधिकारी,
वरिष्ठ कार्यकर्ता
और स्वयंसेवक हैं जिनकी आभासी
सक्रियता वास्तविक गतिशीलता
की तुलना में नगण्य है l
हाल ही में संघ के
उच्च अधिकारियों का ट्विटर
खाता खुला, लेकिन
उसमें अंतरण न के बराबर
है l
संचार
पुरानी अवधारणा है l
समाज और संघ अपेक्षाकृत
नई अवधारणा है l
संघ अर्थात राष्ट्रीय
स्वयंसेवक संघ l
यह एक सामाजिक-सांस्कृतिक
संगठन है l नित्य
गतिशील शाखा के माध्यम से संघ
सामाजिक परिवर्तन और पुनर्रचना
के लिए प्रयासरत है l
सामान्य तौर पर कहा
जा सकता है कि समाज में मत-निर्माण,
मत परिवर्तन,
विचार परिमार्जन,
लोकमत परिष्कार
और व्यवहार परिवर्तन ही संघ
का मुख्य कार्य है l
संघ का यह प्रयास
लोगों के साथ निरंतर संपर्क
और संवाद पर आधारित है l
इसके सम्पूर्ण
प्रयासों के केंद्र में
सुनियोजित, सुसंगत
और सम्यक संचार व सम्प्रेषण
ही है l संघ
के योजनाकार और विचारक यह
भली-भांति
जानते हैं कि जैसे मनुष्य के
लिए हवा और पानी आवश्यक है,
वैसे ही समाज के
लिए संचार जरूरी है l
यही कारण है कि संघ
ने संचार प्रक्रिया,
पद्धति और तकनीक
पर शुरू से ही गंभीर दृष्टि
रखी है l संघ
ने संगठन और समाज की आवश्यकताओं
के अनुसार संचार प्रविधि व
प्रक्रिया में युक्तिसंगत
परिवर्तन भी किये
हैं l
संघ ने शाखा,
स्वयंसेवक,
और प्रचारक को
संचार-तंत्र
के रूप में विकसित किया है l
संघ का पूरा ताना-बाना
ही संचार आधारित है l
संघ के प्रारम्भ
से ही संचार और जनसंचार के
विभिन्न माध्यमों का नियोजित
उपयोग देखने को मिलता है l
स्वयंसेवकों का
व्यापक तंत्र ही संघ की सूचना
प्रौद्योगिकी है l
स्वयंसेवकों के
माध्यम से संघ की विचारधारा
प्रवाहित या संप्रेषित होती
है l स्वयंसेवक
में संपर्क, परिचय
और नियमित संवाद के द्वारा
विचारधारा को विस्तार देने
का गुण विद्यमान होता है l
संचार
विशेषज्ञों के अनुसार,
मनुष्य और समाज की
ही तरह प्रौद्योगिकी की भी
अपनी विचारधारा होती है l
यह विचारधारा भले
ही वैचारिक संगठनों की तरह न
होती हो, लेकिन
प्रौद्योगिकी भी अपनी विचारधारा
को सतत आगे बढाने,
अपने अनुसरणकर्ताओं
की संख्या बढाने,
उनमें उपयोग की आदत
डालने की कोशिश करता है l
इसमें उपयोगर्ताओं
के साथ ही अन्य लोगों को प्रभावित
करने का गुण विद्यमान होता
है l सामान्यत:
विचारधारा की दृष्टि
से स्वयंसेवक और तकनीक अतुलनीय
है l लेकिन
जब हम सामाजिक अंत:क्रिया
के परिप्रेक्ष्य में विचार
करते हैं तो विचारधारा के
प्रचार-प्रसार
में तकनीक और स्वयंसेवक की
तुलना की जा सकती है l
किसी भी संगठन के
कार्यकर्ता में अगर मानवीय
गुणों को पृथक कर दें तो वह
सिर्फ मशीन या प्रौद्योगिकी
के सामान ही होगा l
कमोबेश यही स्थिति
संघ के स्वयंसेवकों में भी
संभावित है l अगर
स्वयंसेवकों में मानवीयता
का गुण न हो तो उनमें और
प्रौद्योगिकी की विचारधारा
में अंतर नगण्य रह जाएगा l
इसलिए कहा जा सकता
है कि संघ के स्वयंसेवकों की
विचारधारा मानवीय है,
किन्तु प्रौद्योगिकी
की विचारधारा अमानवीय l
तो क्या तकनीक का
अनियोजित, अनियंत्रित
उपयोग, उसकी
आदत और उसका अनुसरण व्यक्ति,
समाज और संगठन को
अमानवीय बना सकता है?
अगर ऐसा है तो दुनियाभर
में क्यों प्रौद्योगिकी का
इतना उपयोग हो रहा है?
मानव संगठनों में
इसका दिनों-दिन
बढता उपयोग क्या चिंता का विषय
है?
भारत और
दुनिया में मानव समाज को संगठित
करने के काम में सन 1925
से ही प्रयासरत
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
प्रारम्भिक समय से ही प्रौद्योगिकी
के बारे में अन्य संगठनों से
भिन्न विचार रखता रहा है l
इसीलिये आरएसएस
की स्थापना के शुरुआती दिनों
में मानव संसाधन के अलावा अन्य
सभी संसाधनों से एक निश्चित
दूरी की परम्परा रही l
कार्यक्रमों,
गतिविधियों और
योजनाओं का समाचार देना भी
बहुत आवश्यक नहीं समझा जाता
था l संचार
तकनीक को तो तिरस्कार भाव से
ही देखा जाता था l
डोर टू डोर,
मैन टू मैन और हार्ट
टू हार्ट संचार सिर्फ संयोग
नहीं, बल्कि
संघ की सुदीर्घ नीति रही है
l यद्यपि
संघ के सिद्धांत और दर्शन में
तो यह आज भी विद्यमान है,
लेकिन व्यवहार में
विचलन प्रतीत होता है l
सकारात्मक या
नकारात्मक, किसी
भी प्रकार की सूचना को प्रसारित
करने की संघ की विशिष्ट शैली
रही है l संघ
ने संवाद की भारतीय पद्धति
और प्रारूप (माडल)
को ही अपनाया है l
अनेक अनूकूल-प्रतिकूल
परिस्थितियों में सूचना-सम्प्रेषण
का यह प्रारूप सफलतापूर्वक
उपयोग किया जाता रहा है l
आरएसएस की संगठनात्मक
गठ संरचना सूचना-सम्प्रेषण
की अदभुत व्यवस्था है l
दरअसल यह संघ की
संचार प्रौद्योगिकी ही है,
जिसका लोहा उसके
विरोधी भी मानते हैं l
जैसे डिजिटल संचार
के तहत कंप्यूटर का संजाल
दुनियाभर में एक-दूसरे
से जुड़ा है, ठीक
वैसे ही संघ के स्वयंसेवकों
का संजाल है, जो
अल्प समय में अत्यंत तीव्र
गति से संदेशों को संप्रेषित
करने में सक्षम है l
अनेक विषम परिस्थितियों
और आपदाओं में संघ ने इस सूचना
तंत्र का सकारात्मक उपयोग
किया है l हांलाकि
संघ की इस संचार क्षमता का मधु
लिमये जैसे समाजवादी चिंतक
व वैचारिक विरोधी ‘रियुमर्स
स्प्रेडिंग सोसाइटी’
(आरएसएस)
कह कर आलोचना करते
रहे l
कई शोधकर्ताओं
और विश्लेषकों ने इस तथ्य का
उल्लेख किया है कि कि संघ की
सूचना प्रणाली को वर्तमान या
आधुनिक संचार तकनीक ने काफी
प्रभावित किया है l
गत 20-25
वर्षों में संचार,
विशेषकर संचार
तकनीक में आमूल-चूल
परिवर्तन होता दिखाई देता है
l इसके
कारण संघ की कार्यशैली,
विशेषकर संपर्क
और संवाद शैली में भी परिवर्तन
हुआ है l सूचनाओं
के तीव्र और गहन सम्प्रेषण
के दौर में संघ के स्वयंसेवक
भी पीछे नहीं रहना चाहते l
संघ के विचारक
प्रौद्योगिकी की विचारधारा
और उसके प्रभावों से बखूबी
वाकिफ हैं l वे
भली-भाँति
जानते हैं कि संचार-प्रौद्योगिकी
अब लोगों की जरूरत और बहुत हद
तक मजबूरी बन चुकी है l
संचार तकनीक या
सूचना प्रौद्योगिकी एक आवश्यक
बुराई के रूप में ही सही,
लेकिन स्वीकार्य
हो चुका है l संघ
में बौद्धिक विभाग के साथ ही
बकायदा एक प्रचार विभाग भी
है जो वर्षों से स्वयंसेवकों
में प्रचार के महत्त्व का
प्रतिपादन करता आ रहा है l
यह प्रचार विभाग
स्वयंसेवकों से ज्यादा समाज
में विचार और सूचना सम्प्रेषण
के लिए है l लेकिन
तकनीक का प्रभाव ऐसा बढा है
कि इससे संघ का स्वयं का तंत्र
भी प्रभावित हुए बिना नहीं
रह सका है l दुनियाभर
में विचार फैलाने और प्रतिगामी
व विरोधी विचारों जवाब देने
से लेकर संगठन के आतंरिक
सूचना-प्रवाह
तक में संचार-
प्रौद्योगिकी की
भूमिका अत्यधिक बढ़ गई है l
इसमें कुछ तो तकनीक
के इस्तेमाल का फैशन है,
देखा-देखी
है, लेकिन
बहुत कुछ तकनीकी-उदारीकरण
का प्रभाव भी है l
संघ में अब सिर्फ
बौद्धिक और प्रचार के लिए ही
नहीं, बल्कि
शारीरिक प्रशिक्षण के लिए भी
संचार तकनीक का उपयोग आम चलन
में है l
एक समय था
जब संघ में टेलीफोन से किसी
कार्यक्रम की सूचना देना भी
मजबूरी समझा जाता था,
लेकिन आज ई-मेल,
फेसबुक मैसेंजर,
वाट्सेप,
एसएमएस,
गूगल हैंग-आउट
आदि कम्प्युटर और मोबाईल फोन
आधारित संचार-तकनीक
के द्वारा सूचनाओं का आदान-प्रदान
सामान्य-सी
बात है l संघ
की गठ-संरचना
अब मोबाइल ‘एसएमएस-ग्रुप’
या वाट्सेप व्यवस्था
पर अवलंबित हो चुकी है l
संघ में स्मार्टफोन,
आईपौड,
आईपैड और लैपटाप
से परहेज करने वाले अब कम ही
बचे हैं l डिजिटल
संचार माध्यमों से परहेज करने
वाले इक्के-दुक्के
लोग संघ के भीतर भी आधुनिकता
विरोधी और रूढ़िवादी माने जाने
लगे हैं l संचार-तकनीक
का उपयोग करने वालों का अपना
तर्क है l यद्यपि
आधुनिक संचार तकनीक से परहेज
करने वाले संघ में अल्पसंख्यक
हैं, लेकिन
उनका भी अपना मजबूत तर्क है
l सूचना
सम्प्रेषण के अत्याधुनिक
तकनीक का उपयोग करने वाले इसके
गुण और फायदे बताते हैं,
जबकि पारंपरिक
संचार के समर्थक सूचना-प्रौद्योगिकी
के नकारात्मक पहलुओं को उजागर
कर इससे बचने की सलाह देते हैं
l
कई मुद्दों
की तरह संचार पद्धति को लेकर
संघ के भीतर एक कश्मकश की स्थिति
बरकरार है l इस
मामले में भी संघ ‘चिर
पुरातन और नित्य-नूतन’
दो खेमों में बंटा
है l एक
तर्क ये है कि अगर युवाओं को
जोडना है, दुनिया
में विचारधारा को फैलाना है,
भारत को दुनिया में
सिरमौर बनाना है तो आज के
चाल-चलन
और तौर-तरीके
को स्वीकारना ही होगा l
तकनीक के प्रयोग
में बढ़-चढ़कर
हिस्सा लेना ही होगा l
नई सोच के तरफदार
हर क्षेत्र की तरह संचार क्षेत्र
में भी संघ को सिरमौर होता हुआ
देखना चाहते हैं l
लेकिन संघ के भीतर
एक तबका ऐसा है जो संघ की
विचारधारा के साथ तकनीक की
विचारधारा को भी बखूबी समझता
है l वह
तकनीक की ताकत को जानता है l
वह डरता है कि “संघौ
शक्ति कलियुगे”
कहीं ‘तकनीकौ
शक्ति कलियुगे’
न बन जाए l
उसे डर है कि तकनीक
का आकर्षण परम्परागत व्यवहार
पद्धति पर भारी न पड़ जाए l
तकनीक स्वयंसेवकों
और समाज की आदत न बन जाए l
इस मामले में वे
महात्मा गांधी की सीख को भूलना
नहीं चाहते जिसमें उन्होंने
मानव सभ्यता के तकनीकीकरण का
विरोध किया है l
संघ का यह तबका गांधी
जी की ही तरह प्रकृति आधारित
मानव-सभ्यता
के विकास का समर्थक है l
इसी कारण वह इस
सभ्यता के विधायक गुणतत्वों
– धर्म,
नीति,
मूल्य आदि को बढ़ावा
देना चाहता है l
जबकि चर्च (ईसाइयत)
पोषित वर्तमान
सभ्यता यन्त्र,
तकनीक,
मशीन और प्रौद्योगिकी
आधारित है l यह
विविधता और विकेंद्रीकरण का
विरोधी है l
संचार-तकनीक
की भी यही प्रवृत्ति प्रतीत
होती है l
हालांकि
आज संघ के भीतर और संघ समर्थकों
के द्वारा आधुनिक सूचना तकनीक
का उपयोग करने की होड-सी
दिख रही है l मोबाईल
फोन के अत्याधुनिक एप्लीकेशन,
इंटरनेट अनुसमर्थित
– वेबसाईट,
ब्लॉग,
सोशल नेटवर्क और
इलेक्ट्रानिक जनमाध्यमों
के उपयोग में संघ के स्वयंसेवक
किसी से भी पीछे नहीं हैं l
संघ में तकनीक विरोधी
अब अल्पसंख्यक हो चुके हैं l
तो क्या यह मान लेना
उचित होगा कि संघ के लिए
संचार-तकनीक
के उपयोग का लाभ-ही-लाभ
है? कोई
हानि नहीं, कोई
नुकसान नहीं?
क्या यह मान लिया
जाए कि संघ,
विचारधारा की
दुनियावी लड़ाई में तकनीक के
सहारे सबको पछाड़ ही देगा?
क्या तकनीक की
विचारधारा का संघ की विचारधारा
पर कोई प्रभाव नहीं होगा?
क्या संघ पर तकनीक
बे-असर
है? क्या
यह मान लेना मुनासिब होगा कि
तकनीक के सहारे स्वयंसेवकों
की संघ-साधना
डा. हेडगेवार
के अभीष्ट को बिना किसी हानि
के प्राप्त कर लेगी ?
ये कुछ ऐसे सवाल
हैं जिनके प्रति संघ के
आधुनिकतावादी शायद बेपरवाह
हैं l शायद
उन्हें लगता है,
अभी सोचने का नहीं,
सबसे आगे निकल जाने
करने का वक्त है !
लेकिन संघ के
परम्परावादी चिंतित हैं l
वे कट्टर और रूढ़िवादी
होने के आरोपों से बेपरवाह
संघ में तकनीकी अनुप्रयोगों
पर लगाम लगाने,
इसे नियंत्रित और
नियोजित करने की हर संभव कोशिश
में हैं l
कुछ लोग
भले ही तकनीक को नई सभ्यता का
सिर्फ एक औजार भर मानते हों
l लेकिन
इस औजार का भी गलत उपयोग होना
संभावित है l इस
बात का खतरा तो है ही कि
प्रौद्योगिकी आधारित संचार
प्रक्रिया समाज में अमानवीय-संचार
को बढ़ावा दे दे l
डोर टू डोर,
मैन टू मैन और हार्ट
टू हार्ट की प्रतिस्थापना
कम्प्युटर टू कम्प्युटर,
फोन टू फोन,
मेल-टू-मेल
और व्हाट्सेप टू व्हाट्सेप
के रूप में होने की संभावना
को नकारा नहीं जा सकता l
यह भी संभव है कि
स्वयंसेवकों की मानवीय विचारधारा
को तकनीक की अमानवीय विचारधारा
प्रभावित कर दे l
तब शायद संघ सबसे
तेज, सबसे
आगे और सबसे बड़ा होकर भी निष्फल
रह जाए! संघ
वह न रहे जिसके लिए संघ है l
पवित्र साध्य के
लिए साधन की पवित्रता को कैसे
झुठलाया जा सकता है l
संघ के परम्परावादी
साधन की पवित्रता और मानवीयता
के सवाल पर सजग हैं,
अपना पक्ष लेकर संघ
में खड़े, समाज
में डटे हैं l यह
सही वक्त है कि संघ के आधुनिकतावादी
भी संचार प्रौद्योगिकी की
चकाचौंध में अपनी आँखें न
भींचे – तकनीक
के उपयोग के साथ उसकी विचारधारा
को भी परखें !
चूंकि संघ
समाज के लिए, समाज
में और समाज के द्वारा कार्य
करता है l आज
संघ मानव गतिविधि से जुड़े लगभग
सभी क्षेत्रों में सक्रिय है
l नि:सन्देश
संघ कार्य की धुरी मनुष्य है
l कोई
भी उपकरण, मशीन,
तकनीक या प्रौद्योगिकी
संघ कार्य के लिए साधन मात्र
हो सकता है, लेकिन
लक्षित क्षेत्र तो मनुष्य और
समाज ही है l संघ
इस बात के लिए दृढ निश्चयी है
की मानव सभ्यता को देव सभ्यता
(प्रकृति
उन्मुखी) की
ओर ले जाना है, न
कि दानव सभ्यता (मशीनोन्मुखी)
की ओर l
इसलिए संघ के योजनाकार
संचार और संवाद के लिए भी मानवीय
गुणों से युक्त संचार प्रारूप
को ही श्रेष्ठ और युक्तिसंगत
मानते हैं l इंटरनेट,
कम्प्युटर,
मोबाईल फोन आदि
डिजिटल व तकनीक (उपकरण)
आधारित सूचना तंत्र
संघ को फौरी तौर पर मजबूरी में
या आवश्यक बुराई के रूप में
स्वीकार्य तो हो सकता है,
लेकिन नीतिगत और
दीर्घकालिक रूप से यह त्याज्य
ही होगा l
संघ को यह
बखूबी पता है कि वर्तमान सूचना
तकनीक ने एक अलग दुनिया निर्मित
कर दी है जिसे संचार विशेषज्ञ
‘आभासी दुनिया’ कहते हैं l
इस नव-निर्मित
आभासी दुनिया और वास्तविक
दुनिया में जमीन-आसमान
का अंतर है l जो
लोग जब भी, जितनी
देर तक तकनीक के साथ आभासी
दुनिया में होते हैं तो वे
वास्तविक दुनिया से अलग-थलग
हो जाते हैं l इस
दुनिया में व्यक्ति अकेला
होता है और उसके साथ होते हैं
कम्प्यूटर, मोबाइल,
गैजेट,
चित्र,
संकेत,
ध्वनियाँ आदि l
संघ को आभासी नहीं,
वास्तविक दुनिया
में काम करना है l
इसलिए उसके लिए
उपकरण और तकनीक से अधिक मानवीय
गुणों- संवेदना,
भावना आदि के साथ
मनुष्य के मस्तिष्क और ह्रदय
की चिंता है l संघ
मानवीय समाज के विकास और
सशक्तिकरण के लिए प्रतिबद्ध
है, न
कि मशीनी या तकनीकी समाज के
लिए l
(डॉ अजय खेमरिया) मप्र में छतरपुर के कलेक्टर कलेक्टर है मोहित बुंदस।सीधी भर्ती के आईएएस अफसर है इन्हें हटाने के लिये जिले की तीन पार्टियों के सभी पांच विधायक मप्र के सीएम से गुहार लगा चुके है।बीजेपी के विधायक राजेश प्रजापति को कलेक्टर महोदय ने पूरे दो घण्टे तक बाहर बिठाए रखा मिलने से पहले।कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे सत्यव्रत चतुर्वेदी के विधायक भाई आलोक चतुर्वेदी भी कुछ इन्ही अनुभवों से बेजार है।जिस सपा विधायक के समर्थन से कमलनाथ सरकार टिकी है वे राजेश शुक्ला भी मुख्यमंत्री से फरियाद कर रहे है कि कलेक्टर को हटाया जाए क्योंकि वे न किसी की सुनते है न फील्ड में जाते।बाबजूद मोहित बुंदस पर मुख्यमंत्री की कृपा बरस रही है।यह पहला मौका नही है जब मप्र में आईएएस अफसरों के सामने इस तरह चुने गए विद्यायको को लाचार और विवश होकर खड़ा होना पड़ा है।असल में मप्र में लगातार अफसरशाही की निरंकुशता बढ़ रही है न केवल कमजोर बहुमत वाली मौजूदा कमलनाथ सरकार में बल्कि मजबूत बहुमत से चलीं बीजेपी की सरकारों में भी अफसरशाही से जनता ही नही सत्ता पक्ष के विधायक और मंत्री तक परेशान रहे है। आखिर क्या वजह है कि भारत मे आज भी कलेक्टर का पद इतना ताकतवर होता जा रहा है इस उलटबांसी के की देश मे लोकतंत्र निचले स्तर पर मजबूत हुआ है लोगों में लोकतांत्रिक अधिकार और जागरूकता का व्यापक प्रसार हुआ है।कलेक्टर की ताकत अपरिमित रूप में बढ़ रही है।यह जानते हुए की इस पद का निर्माण गोरी हुकूमत ने औपनिवेशिक साम्राज्य की मैदानी पकड़ मजबूत करने के लिये किया था।कलेक्टर मतलब राजस्व औऱ लगान कलेक्शन करने वाला साहब।अंग्रेजी राज में इसे सूबा साहब भी कहा जाता था।क्योंकि तब आज की तरह जिलों की छोटी इकाइयां नही थी।आईसीएस की भर्ती भी अंग्रेजों के पास थी और शरुआती दौर में परीक्षा भी इंग्लैंड में ही हुआ करती थी।यानी समझ लीजिये ये पद जो बाद में आईसीएस की जगह आईएएस में तब्दील हुआ है उसकी गर्भ नाल उस अंग्रेजी साम्राज्यवाद में छिपी है जो भारतीयों को दोयम दर्जे का इंसान मानती थी।क्या यही मानसिकता इन अफसरों को मैदान में परिचालित करती है?मोहित बुंदस जैसे प्रहसन इसे साबित करने के लिये पर्याप्त आधार प्रदान करते है।सीधी भर्ती के अधिकतर आईएएस अफसर खुद को भारत मे सबसे काबिल और ताकतवर शख्स मानते है वे सोचते है कि यूपीएससी की परीक्षा पास कर आईएएस संवर्ग हासिल करने के बाद दुनियां में अब कुछ भी ऐसा नही जो उनसे ऊपर हो।अधिकतर आईएएस अधिकारी जब प्रशिक्षण प्राप्त कर मैदानी पदस्थापना पर आते है तो उन्हें इस बात का अहसास रहता है कि देश के सभी नेता अनपढ़ प्रायः है कानून औऱ नियमों का उन्हें कोई ज्ञान नही है।और इस देश मे हर कोई कानून तोड़कर गलत काम करना चाहता है।आईएएस ही कानून के अकेले रक्षक है उन्हें हर हाल में अडिग,सख्त,और अनुदार बने रहना है।वस्तुतः यह भारत की आइएएस बिरादरी का स्थायी चरित्र बन गया है।सवाल यह है कि क्या वाकई यूपीएससी की परीक्षा प्रवीण शख्स दुनिया का सर्वाधिक श्रेष्ठ और प्रतिभाशाली माना जाना चाहिये?पिछले 70 साल से तो यह मान ही लिया जाना चाहिये क्योंकि हर दिन इस बिरादरी की ताकत बढ़ती गई है।जिस अनुपात में सरकारों के काम बढ़े ,राज्य का चेहरा लोककल्याण के नाम पर जीवन के हर क्षेत्र में हस्तक्षेपनीय बना उसी अपरिमित अनुपात में आईएएस बिरादरी की ताकत,रुतबा,और अहं बढ़ता चला गया है।आज का कलेक्टर सही मायनों में अंग्रेज बहादुर से कम नही है औपनिवेशिक सूबों की तरह सूबा साहब को आज चरितार्थ कर रहा है। कलेक्टर दो तीन बीघा के सर्वसुविधायुक्त बंगलों में रहता है उसके पास भारतीय (दोयम)सेवादार है जो घर,रसोई,बगीचों से लेकर दफ्तरों तक हर जगह अर्दली में लगे है।जिसके घर के बिजली, पानी से लेकर खाने पीने तक कि किसी भी सुविधा का कोई ऑडिट नही होता है।जिसकी एक आवाज पर अधीनस्थ अफसरों की फ़ौज आधी रात को शीर्षासन करने पर ततपर रहती है।जिसकी सुरक्षा में 24 घण्टे जवान खड़े रहते है।आप उसकी मर्जी के बगैर उससे मिल नही सकते है।वह आपका फ़ोन उठाये यह उसकी मर्जी पर निर्भर है।वह विकास पुरुष है वह दंडाधिकारी है वह जिले का सुपर बॉस है। वह किसी को भी मुअतिल कर सकता है।वह आज का महाराजा है।उसके काम के घण्टे तय नही है,कोई उससे उसके काम का हिसाब नही मांग सकता है।फिर भी वह सिविल सर्वेंट है।उसका सुपर बॉस राज्य का मुख्य सचिव है जो अपनी बिरादरी का सर्वोच्च सरंक्षणदाता है।मायावती को छोड़कर भारत मे किसी शख्स ने कभी भी इस महाराजा के वर्चस्व को चुनौती नही दी।आईएएस ब्रह्म ज्ञानी है उनकी मेधा स्वयंसिद्ध है वह जिस जगह खड़ा हो जाता है उस क्षेत्र का हुलिया बदल देता है वह कभी कलेक्टर के रूप में विकास के नए आयाम स्थापित करता है जिसकी गवाही नीति आयोग के आभासी जिलों की संख्या दे ही रहे है।आईएसएस कभी बिजली कम्पनी के सीएमडी के रूप में भारत को ऊर्जीकरत कर देता है,कभी वह लोकस्वास्थ्य, कभी मेडिकल एजुकेशन, संचार,उधोग,सिविल एवियेशन,विज्ञान,स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा, पीएचई, जल संसाधन ,नगर विकास,जनसम्पर्क से लेकर शासन के हर क्षेत्र को अपनी प्रतिभा से अलंकृत करता रहता है।जब इतनी प्रतिभा किसी एक हाड़मांस में घनीभूत हो तब आपके पास उसकी अद्वितीय श्रेष्ठता को अधिमान्यता देने का कोई अन्य विकल्प शेष ही नही रह जाता है। सवाल यह भी है कि एक व्यक्ति के रूप में इस वर्ग के इस अवतार को आखिर विकसित किसने किया है?हमारी व्यवस्था में विधायिका ,कार्यपालिका, और न्यायपालिका का स्पष्ट विभाजन है लेकिन यहां चर्चिल की भविष्यवाणी ने फलित होकर सब कुछ अस्त व्यस्त कर दिया है शक्ति पृथक्करण का राजनीतिक सिद्धान्त तिरोहित हो चुका है कतिपय कमजोर चरित्र के लोगों ने सरकार के तीनों अंगो को अपनी अंतर्निहित भूमिका से भटका दिया है।सत्ता के लिये असुरक्षा की मार से पीड़ित नेताओं ने कभी इस तरफ सोचा ही नही की वह अपने सत्ता सुख को बचाने के लिये किस तरह उस व्यवस्था के दास बनते चले जा रहे है जो उनके सार्वजनिक अनुभवों से अधीनस्थ अमले के रूप में काम करने के लिये प्रावधित है।इस असुरक्षा की ग्रन्थि ने ही आज भारत की लोकशाही को बाबूशाही में बदल दिया है और मोहित बुंदस असल में इसी बाबूशाही के प्रतिनिधि भर है।ऐसा नही है कि इस बिरादरी में सभी एक जैसे है कुछ अफसर अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय करने का प्रयास करते है।मप्र में एक मुख्य सचिव के समकक्ष अफसर है जो जिस विभाग में रहते है उसमें ढल कर काम करते है।कुछ कलेक्टर के रूप में भी संवेदनशीलता दिखाते है लेकिन ऐसे अफसरों की संख्या बहुत ही कम है। प्रशासन के स्तर पर जिलाधिकारी को इस योग्य माना जाता है कि वह अपने अधीनस्थ अधिकारियों पर नियंत्रण में सक्षम है लेकिन 70 साल के अनुभव बताते है कि जिलों में ऐसा नही हुआ है।मप्र में हर मंगलवार जिला मुख्यालय पर जनसुनवाई होती है वहाँ औसतन दो तीन सौ लोग सुदूर गांवों से अपनी फरियाद लेकर कलेक्टर के पास आते है इसका मतलब अधीनस्थ अमला जनता की सुनवाई नही कर रहा है।अफसरशाही की संवेदनशीलता को खारिज करने के लिये हजारों मामले सामने रखे जा सकते है।जाहिर है देश मे इस वर्ग की उपयोगिता और योगदान पर विचार करने का समय आ गया है।क्या भर्ती के समय सेवा करने का जो जबाब अभ्यर्थियों द्वारा दिया जाता है वह सेवा में आने के बाद किसी औपनिवेशिक विशेषाधिकार को स्थापित कर देता है?अनुभव तो इसकी तस्दीक करते ही है।इसलिये समय आ गया है कि हम इस आईएसएस सिस्टम और इसकी भागीदारी पर खुले मन से पुनर्विचार करें।गांधी जी का एक प्रसंग यहां उदधृत किया जाना चाहिये।अहमदाबाद में अपने एक परिचित के बेटे नानालाल के आईसीएस में सिलेक्ट होने पर आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि सिविल सेवक भारत का भला नही कर सकते है।यह एक बुराई है।आज गांधी की 150 वी जन्मजयंती बर्ष में उनके विचारों के आलोक में आईएएस सिस्टम पर विचार किया जाना चाहिये। मौजूदा केंद्र सरकार ने निजी क्षेत्र के पेशेवर लोगों को लैटरल एंट्री के जरिये सीधे आईएएस के समकक्ष भर्ती का प्रयोग किया है इसे नए भारत मे समय की मांग कहा जा सकता है। तब तक सर्वशक्तिमान,सर्वाधिक प्रतिभाशाली, सर्वाधिक बुद्धिमान और कानून के रखवालों के अधीन आनन्द लीजिये। यह अलग बात है कि शिवपुरी जिले के एक कलेक्टर साहब को प्रधानमंत्री आवास योजना की बुनियादी गाइडलाइंस नही पता है वे आजकल एक दूसरे जिले में कलेक्टर है। सीधी भर्ती से इनकी पोजिशन भारत बर्ष में अंडर 30 थी। मान्यता यही है की कलेक्टर कभी गलती नही करते है उनसे ज्यादा किसी को कुछ नही आता है।इसीलिए मोहित बुंदस सभी विधायकों को घण्टे भर बाहर खड़ा रखते है।भले ही विधायक का स्थान प्रोटोकॉल में मुख्य सचिव से ऊपर है।
भोपाल,5 सितंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। मुख्यमंत्री कमल नाथ ने आज फिर हीरा खदान की नीलामी को लेकर केन्द्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि हीरा खुदाई के लिए अलग नीति बनाई जानी चाहिए। कोयला खुदाई के लिए बनाई गई नीति के आधार पर ही हीरा और मैंगनीज की खुदाई कैसे हो सकती है।
कमलनाथ का कहना है कि खनिज उत्पादन भविष्य की अर्थ-व्यवस्था का आधार है। मध्यप्रदेश में कीमती खनिजों का भंडार है, जिसका उपयोग राज्य के विकास के लिए जितनी जल्दी करें, उतना जनता के हित में होगा। मुख्यमंत्री ने मंत्रालय में भारत सरकार की मिनी रत्न कंपनी मिनरल एक्सप्लोरेशन कार्पोरेशन लिमिटेड के वरिष्ठ अधिकारियों से चर्चा करते हुए कहा कि वे मध्यप्रदेश को अपनी प्राथमिकता का प्रदेश बनायें। कोयला और चूना पत्थर के अलावा प्रदेश में कई बहुमूल्य खनिज हैं, जो भविष्य की अर्थ-व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। श्री कमल नाथ ने अधिकारियों को निर्देश दिये कि कीमती खनिजों के खनन की समयबद्ध योजना बनायें।
मुख्यमंत्री कमल नाथ ने कहा कि भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के पास उपलब्ध खनन और भण्डारण की बहुमूल्य जानकारी का उपयोग कर खनन का काम तत्काल शुरू करने की तैयारी करें। एम.ई.सी.एल. के पास इसका उपयोग करने की क्षमता और विशेषज्ञता है। खनिजों के उत्खनन की समय-सीमा निर्धारित कर योजना बनायें। राज्य शासन पूरा सहयोग करेगा। मैगनीज, बाक्साइट, ग्रेफाईट, आयरन ओर एवं रेडियम, वेनेडियम जैसे मूल्यवान खनिजों के खनन पर ध्यान दें, जिनके भण्डारण की जानकारी उपलब्ध है। मुख्यमंत्री ने कहा कि बुंदेलखण्ड, महाकौशल और प्रदेश के पश्चिम भाग में इन खनिजों के कीमती भंडार उपलब्ध हैं। प्रत्येक खनिज की अलग नीति बनाकर काम शुरू किया जायेगा। उन्होंने कहा कि कोयला खनन की नीति डायमंड अथवा मैगनीज पर लागू नहीं हो सकती।
बैठक में खनिज मंत्री प्रदीप जायसवाल, मुख्य सचिव एस.आर. मोहन्ती, प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री अशोक वर्णवाल, प्रमुख सचिव उद्योग राजेश राजौरा, प्रमुख सचिव खनिज नीरज मंडलोई और एम.ई.सी.एल. के अध्यक्ष तथा मुख्य महाप्रबंधक डा. रंजीत रथ उपस्थित थे।
दादा भाई डॉ.रवि प्रकाश ने मुख्यमंत्री कमलनाथ के प्रयासों पर प्रसन्नता जताई
भोपाल
2 सितंबर।
दादा दरबार की भक्ति परंपरा
को देश विदेश में स्थापित करने
वाले साधकों और स्थानधारी
संतों के नाम पर भोपाल के आश्रम
परिसर में कक्ष आरक्षित किए
जाएंगे।इन कक्षों के माध्यम
से धूनी वाले दादाजी के शिष्यों
का जुड़ाव पूरे मध्यप्रदेश
से हो सकेगा। इन संतों के संपर्क
में रहने वाले शिष्यों के लिए
भी आश्रम परिसर में कक्ष उपलब्ध
रहेंगे। सतत धर्म चर्चा के
लिए प्रवचनों का मंच भी उपलब्ध
रहेगा। परिसर में अखंड ज्योति
के साथ निरंतर चलने वाले यज्ञों
में शामिल होने वाले साधकों
और आगंतुकों के लिए परिसर की
भोजनशाला साल भर चलेगी।अभी
यहां प्रत्येक अमावस्या और
पूर्णिमा को भंडारा होता है।
महंत
एवं संचालक डॉ.रविप्रकाश(दादाभाई)
ने बताया कि
श्री दादाजी धूनीवाले दरबार
के समकालीन शिष्य संत के नाम
से स्थापित ये कक्ष जरूरत
पड़ने पर आरक्षित कराए जा
सकेंगे। देश विदेश के कई स्थानों
पर पिछले तीस पैंतीस सालों
से धोनी माई और दादाजी की सेवा
पूजा अर्चना के साथ कल्याणकारी
कार्य भी संचालित किए जा रहे
हैं। कई स्थानों पर तो ऐसे
साधक इस भक्ति परंपरा की ध्वजा
संभाले हुए हैं जिनका प्रचार
भी नहीं हो पाया है। अघन त्रयोदशी
दादा जी की पुण्यतिथि तक इन
स्थानों को विधिवत तरीके से
जोड़ लिया जाएगा। इसी के आधार
पर दादाजी संप्रदाय के संत
निवास की स्थापना की जाएगी।
वर्तमान में दादाजी धूनीवाले
दरबार श्यामला हिल्स भोपाल
में जिन जिन स्थानों के स्थान
धारियों के लिए नाम प्रस्तावित
हैं उनमें दादाजी दरबार साईं
खेड़ा खंडवा, इंदौर,
छीपानेर,आवली
घाट,सौंसर,
पांडुर्ना,नागपुर
जबलपुर, हंडिया,पुणे,
मंडला,
स्वामी चंद्रशेखर
आनंद मुंबई एवं दादा नित्यानंद
दमोह है ।
माननीय
मुख्यमंत्री कमलनाथ जी से
प्रयासों का अभिनंदन
गत
26 वर्षों
से दादा जी के परम भक्तों एवं
शिष्य के बीच में भावना के
मंदिर की स्थापना के लिए प्रदेश
के मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ
जी की ओर से जो प्रयास किया जा
रहा है उस प्रयास का दादा जी
भक्त शिष्य मंडल भोपाल स्वागत
करता है। हम उनके इस प्रयास
के प्रति उनका आभार व्यक्त
करते हैं। मुख्यमंत्री श्री
कमलनाथ जी से हमारी ये अपेक्षा
है कि भारत भवन भोपाल एवं
दादाजी धूनीवाला दरबार श्यामला
हिल्स भोपाल के मध्य जो समझौता
हुआ था उस पर अमल किया जाए।
सरकार की ओर से इस कार्य का
आश्वासन पिछले चालीस सालों
से लंबित है। इस समझौते में
दादा धूनीवाले दरबार की भूमि
के मुआवजे के संबंध में विधानसभा
में तत्कालीन आवास एवं पर्यावरण
मंत्री विष्णु राजोरिया ने
विधायक कंकर मुंजारे के प्रश्न
के जवाब में बारह आवास गृह,
धर्मशाला,
संस्कृत पाठशाला,
पार्किंग,
और कैंटीन
बनाने का आश्वासन दिया था।
इसकी भूमि व्यवस्था का भी पालन
अब राज्य सरकार की ओर से किए
जाने के संकेत मिलने लगे हैं।
दादा
जी भक्त मंडल भोपाल के शिष्यों
की ओर से मध्य प्रदेश के
मुख्यमंत्री माननीय कमलनाथ
जी से अपेक्षा है कि दादाजी
के स्थान पंचम धाम खंडवा में
भी स्थान धारी शिष्यों के
पहुंचने पर ट्रस्ट की ओर से
आश्रम की गरिमा के अनुसार
निवास आरक्षित हो। इससे हम
शिष्यों का भक्तिभाव अपने
गुरुदेव के प्रति निरंतर सहज
रहेगा। जिस प्रकार दादाजी
धूनीवाले दरबार श्यामला हिल्स
भोपाल के साधक संत गुरुदेव
दादा भाई आश्रम में प्रदेश
देश विदेश के समस्त स्थानधारियों
के लिए कक्ष उनके नाम से बनाकर
उन स्तानधारियों के लिए स्थान
आरक्षित कर रहे हैं. ऐसा
ही यदि खंडवा पंचम धाम में
किया जाता है तो शिष्य परिवार
का गौरव पूरे देश में बढ़ेगा
।
आज की पत्रकार वार्ता में श्री दादाजी परहित सेवा संस्थान के पदाधिकारी भी उपस्थित रहे। संस्थान की ओर से पूरी दुनिया में फैले शिष्यों से लगातार संपर्क रखने के लिए आधुनिक तकनीकी साधनों का प्रयोग भी किया जा रहा है।
भोपाल,28
अगस्त(प्रेस
सूचना केन्द्र)।
भ्रष्टाचार और अराजकता के
चलते राज्य की मासिक आय में
गिरावट ने कांग्रेस सरकार
में सिरफुटौव्वल के हालात
निर्मित कर दिए हैं। रेत की
रायल्टी चोरी के मसले पर सामान्य
प्रशासन मंत्री डाक्टर गोविंद
सिंह ने जैसे ही सवाल खड़े किए
पार्टी के भीतर से उनके खिलाफ
बयानबाजी शुरु हो गई है। हालात
पर काबू पाने के लिए मुख्यमंत्री
कमलनाथ मंत्रियों को संभलकर
बोलने की नसीहत दी है।
कांग्रेस
की अंतर्कलह तब उजागर हुई जब
लहार से कांग्रेस के विधायक
और सामान्य प्रशासन मंत्री
डाक्टर गोविंद सिंह ने रेत
के अवैध उत्खनन के लिए जनता
से माफी मांगी। उन्होंने कहा
कि मैं अपने समर्थकों के साथ
भाजपा शासनकाल में रेत के अवैध
उत्खनन के खिलाफ लड़ाई लड़ता
रहा हूं। सत्ता में आने के बाद
कांग्रेस के नेतागण जिस तरह
से रेत का अवैध उत्खनन करके
मंहगी रेत बेच रहे हैं इसके
कारण मैं जनता से माफी मांगता
हूं।उन्होंने कहा कि रेत
माफिया के हौसले इतने बुलंद
हैं कि वे मेरे जैसे वरिष्ठ
मंत्री तक की परवाह नहीं करते
हैं।
खनिज
मंत्री प्रदीप जायसवाल ने
कहा कि डाक्टर गोविंद सिंह
वरिष्ठ राजनेता हैं। वे दतिया
के प्रभारी मंत्री भी हैं वे
अपने क्षेत्र में रेत का अवैध
उत्खनन रोकने के लिए स्वतंत्र
हैं। प्रशासन को उनके निर्देशों
का पालन अवश्य करना पड़ेगा।
जनसंपर्क
और विधि विधायी कार्य मंत्री
पीसी शर्मा ने कहा कि इस बार
नदियों में इतनी अधिक रेत आई
है कि पानी उतरते ही रेत का
भंडार सामने आ जाएगा। रेत का
ये भंडार जनता की आवश्यकता
से बहुत अधिक है। आने वाले समय
में रेत के खरीददार तक नहीं
मिलेंगे। इस मुद्दे पर विवाद
की कोई जरूरत नहीं है।
पीडब्ल्यूडी
मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने
कहा कि डाक्टर गोविंद सिंह
वरिष्ठ मंत्री हैं। ऐसा हो
ही नहीं सकता कि अधिकारी उनकी
बात नहीं सुनें। यदि मेरे
विभाग में ये नौबत आ जाए कि
अधिकारी मेरी बात नहीं सुनें
तो मैं तो इस्तीफा दे दूंगा।
कंप्यूटर
बाबा ने कहा कि रेत के अवैध
उत्खनन पर कमलनाथ सरकार ने
सख्ती से रोक लगाई है। पिछले
दिनों चंबल और सिंध नदी में
जैसी बाढ़ आई है उसके चलते रेत
का उत्खनन संभव नहीं है। सरकार
रेत माफिया के विरुद्ध सख्त
कार्रवाई करेगी और किसी व्यक्ति
को बख्शा नहीं जाएगा।
भाजपा
प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह
ने कहा कि पैसों की बंदरबांट
के चलते आज कांग्रेस की अंतर्कलह
सामने आ गई है। सरकार ने चंदा
लेकर ट्रांसफर पोस्टिंग की
हैं। जो लोग भारी रिश्वत देकर
मैदानी पोस्टिंग लेकर पहुंचे
हैं उन्हें जनता के प्रति अपने
उत्तरदायित्व की चिंता नहीं
है। वे तो केवल अपनी लागत
निकालने के लिए उगाही करने
में जुटे हुए हैं।
नेता
प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने
मुख्यमंत्री कमलनाथ को पत्र
लिखकर अवैध उत्खनन पर चिंता
व्यक्त की है। वहीं कैलाश
विजयवर्गीय ने कहा है कि डाक्टर
गोविंद सिंह कह रहे हैं कि
चंदा उगाही का खेल ऊपर से नीचे
तक चल रहा है। उन्हें यह भी
बताना चाहिए कि ऊपर का आशय
श्यामला हिल्स से है या दस
जनपथ से।
राज्य
की घटती आय को देखते हुए डाक्टर
गोविंद सिंह की चिंता वाजिब
है। निवृत्तमान शिवराज सिंह
चौहान सरकार ने रेत उत्खनन
की अनुमति देने का अधिकार
पंचायतों को सौंप दिया था।
इसके पहले 18 जिलों
की 430 खदानों
से रेत का उत्खनन खनिज विकास
निगम की निगरानी में होता था
शेष जिलों में ये काम खनिज
विभाग करता था। तब तमाम शिकायतों
के बावजूद प्रदेश को लगभग 700
करोड़ रुपयों
की आय होती थी। पंचायतों को
अधिकार दिए जाने के बाद रेत
उत्खनन से होने वाली आय मात्र
डेढ़ सौ करोड़ रुपए रह गई है।
राज्य
सरकार बारिश के सीजन में रेत
उत्खनन पर रोक लगाती है। इस
बार भी एक जुलाई से 30
सितंबर तक ये
रोक प्रभावी है। इसके बावजूद
रेत का उत्खनन और परिवहन जारी
है। रेत माफिया पुराने परमिटों
पर एकत्रित रेत को एक गोदाम
से उठाकर दूसरे स्थान पर ले
जाने का तर्क देकर रेत का अवैध
कारोबार कर रहा है।
डाक्टर
गोविंद सिंह जिन भिंड,
मुरैना,
ग्वालियर और
दतिया जिलों में रेत का अवैध
उत्खनन होने की शिकायत कर रहे
हैं उन जिलों में खनिज निगम
के पास केवल चार खदानें हैं
जबकि अन्य खदानें पंचायतों
को समर्पित कर दी गईं हैं।
पूरे प्रदेश में खनिज विकास
निगम 48 खदानों
से रेत का उत्खनन कर रहा है।
बारिश की वजह से लगी रोक के
चलते उन खदानों पर उत्खनन बंद
है लेकिन आसपास की अन्य खदानें
जिनकी नीलामी नहीं की जाती
है उनसे रेत का अवैध उत्खनन
हो रहा है। जब रेत उत्खनन के
अधिकार खनिज विकास निगम के
पास थे तब इन चार जिलों से बीस
लाख घनमीटर रेत का उत्खनन किया
जाता था। पंचायतों को अधिकार
देने के बाद ये उत्खनन क्षमता
मात्र आठ लाख घनमीटर बची है।
रेत
उत्खनन का अधिकार पंचायतों
को दिए जाने के बाद दस्तावेजों
पर रेत का उत्खनन भी घटा है और
राज्य को होने वाली आय में भी
भारी गिरावट आई है। इसके बावजूद
आम नागरिकों को पहले से मंहगी
रेत खरीदना पड़ रही है। वर्ष
2018-19 में
पंचायतों ने अब तक लगभग सवा
सौ करोड़ रुपए की रेत रायल्टी
जुटाई है जबकि खनिज विकास निगम
और खनिज निगम मिलकर इतने ही
कार्यकाल में पांच सौ करोड़
रुपए रेत की रायल्टी के रूप
में जुटाते थे। शासन ने रेत
के दाम 125 रुपए
प्रति घनमीटर तय किए हैं।
फार्मूले के मुताबिक इसमें
से 50 रुपए
कलेक्टर फंड में और 50
रुपए पंचायतों
को दिए जाते हैं। इसमें से 25
रुपए खनिज
विकास निगम को दिया जाता है।
इतनी सस्ती रेत खरीदने के
बावजूद बाजार में रेत के दाम
डेढ़ हजार रुपए से लेकर साढ़े
तीन हजार रुपए घनमीटर तक पहुंच
गए हैं। खनिज निगम नीलामी में
रेत की रायल्टी कई बार 900
रुपए प्रति
घनमीटर तक हासिल करता था। इसके
बावजूद रेत के दाम खुले बाजार
में नियंत्रित रहते थे।
नेशनल
ग्रीन ट्रिब्यूनल,सिया
और प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण
जैसी संस्थाओं के दबाव के चलते
शिवराज सिंह चौहान की सरकार
ने पत्थर को पीसकर रेत बनाने
जैसा काम शुरु किया था लेकिन
अब प्रदेश की रेत की जरूरतें
केवल नदियों से बहकर आने वाली
रेत से ही पूरी हो रहीं हैं।
खनिज
मंत्री प्रदीप जायसवाल ने नई
खनिज नीति बनाने की घोषणा की
थी। इसके मुताबिक रेत की नीलामी
के लिए ग्लोबल टेंडर जारी किए
जाने की तैयारी की गई है। अभी
तक सरकार का जो ढर्रा है उसे
देखते हुए कहा जा सकता कि एक
अक्टूबर से जब रेत उत्खनन पर
पाबंदी हटेगी तब तक टेंडर की
प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाएगी।
लगभग सभी स्थानों पर पुलिस
की अवैध वसूली की शिकायतें
सामने आ रहीं हैं। रेत उत्खनन
से रायल्टी जमा कराने की
जवाबदारी खनिज विभाग और खनिज
विकास निगम की है जबकि रेत
रायल्टी की चोरी पर लगाम लगाने
की जवाबदारी पुलिस को सौंपी
गई है। पुलिस के अधिकारी
कर्मचारी ही रेत की चोरी करवाते
हैं और अवैध उत्खनन से खजाने
को क्षति पहुंचाते हैं। रेत
की रायल्टी जमा कराना उनकी
जवाबदारी भी नहीं है इसलिए
वे संबंधित पुलिस थानों में
पोस्टिंग के लिए मनचाही कीमत
देने तैयार रहते हैं।
डाक्टर गोविंद सिंह की चिंता को देखते हुए यदि राज्य सरकार रेत उत्खनन से रायल्टी जुटाने का नया ढांचा तैयार करे तभी प्रदेश का खजाना भरा जा सकता है। रेत की जरूरत आम जनता को है और वह इसके लिए मंहगी कीमत चुका रही है। मकान बनाने के लिए उसे कई स्तर पर शासन को कर चुकाना पड़ता है। इसके बावजूद उसे रेत की जरूरत के लिए माफिया के सामने नाक रगड़नी पड़ती है। जरूरत है कि सरकार रेत रायल्टी जुटाने के लिए कारगर व्यवस्था बनाए और जनता को सस्ती रेत मुहैया कराए।
मुख्यमंत्री कमलनाथ इन दिनों सत्ता माफिया से किए गए अपने चुनावी वादों को पूरा करने में जुटे हुए हैं। उनके नेतृत्व वाली कांग्रेस ने जनता से जो वादे किए थे वे तो बेअसर रहे लेकिन जिन गिरोहों को उन्होंने इनाम देने के वादे किए थे उन्हें पूरा करने के लिए वे राज्य का खजाना लुटाने में जुटे हुए हैं। बात बात में खजाना खाली है का शोर मचाने वाले कमलनाथ ने हाल ही में उज्जैन पहुंचकर तीन सौ करोड़ रुपए के विकास कार्यों की घोषणा कर डाली। जबकि शिवराज सिंह चौहान सरकार ने सिंहस्थ के दौरान करोड़ों रुपयों के विकास कार्य उज्जैन में कराए थे। उन निर्माण कार्यों में भारी घोटाले के आरोप भी लगे थे। चुनाव के दौरान कांग्रेस ने भी सिंहस्थ घोटाले का शोर मचाया था।भाजपा के हाथों से बजट लूटने का काम जिस महाकाल माफिया ने किया था सत्ता में आने के बाद कमलनाथ फिर उसी महाकाल माफिया के सामने साष्टांग लेट गए हैं। इस माफिया का भगवान महाकाल से कोई लेना देना नहीं है। इसके विपरीत जनता को लूटने के लिए बिजली के दाम अनाप शनाप बढ़ा दिए गए हैं।
मध्यप्रदेश
का महाकाल माफिया लंबे समय
से राज्य की सरकारों को ब्लैकमेल
करता रहा है। कमोबेश हर सरकार
इस गिरोह के हाथों ब्लैकमेल
होती रही है। इस गिरोह का काम
नेताओं, आला अफसरों,
पत्रकारों, बैंकरों,
न्यायाधीशों की
नियुक्तियां कराना और फिर
उन्हें अपने लाभ के लिए इस्तेमाल
करना रहा है। चुनावों के दौरा
ये गिरोह अपने अनुकूल सरकार
बनाने के लिए तमाम रणनीतियां
इस्तेमाल करता है। उज्जैन के
कई अखाड़ों से इस गिरोह का
संचालन किया जाता है। राज्य
की सरकार को धमकाने के लिए
गिरोह के सदस्य हमेशा प्रचारित
करते रहते हैं कि कोई मुख्यमंत्री
उज्जैन में रात्रि निवास नहीं
कर सकता क्योंकि महाकाल ही
राजा हैं। हर सिंहस्थ के बाद
या तो मुख्यमंत्री हट जाता
है या फिर सरकार बदल जाती है।
इस किंवदंती को सच साबित करने
के लिए देश भर में फैले माफिया
से जुड़े सदस्य बयान देकर
माहौल बनाते रहते हैं।
महाकाल
का इतिहास देखें तो वर्तमान
मंदिर को श्रीमान पेशवा बाजी
राव और छत्रपति शाहू महाराज
के जनरल श्रीमान रानाजिराव
शिंदे महाराज ने 1736 में
बनवाया था। इसके बाद श्रीनाथ
महादजी शिंदे महाराज और श्रीमान
महारानी बायजाबाई राजे शिंदे
ने इसमें कई बदलाव और मरम्मत
भी करवायी थी।महाराजा श्रीमंत
जयाजिराव साहेब शिंदे आलीजाह
बहादुर के समय में 1886 तक,
ग्वालियर रियासत के
बहुत से कार्यक्रमों को इस
मंदिर में ही आयोजित किया जाता
था।तभी से सिंधिया राजघराने
की भूमिका महाकाल मंदिर के
संचालन में प्रमुख तौर पर रहती
आई है।
यही
वजह है कि पिछले कई दिनों से
राज्य में महाकाल माफिया ने
ये कहानी उड़ाई कि ज्योतिरादित्य
सिंधिया कांग्रेस के विद्रोह
करके भाजपा में जा सकते हैं
और भाजपा उनके नेतृत्व में
कमलनाथ सरकार को गिराकर सत्तासीन
हो जाएगी। इस कहानी को बल देने
के लिए बाकायदा भाजपा के अध्यक्ष
अमित शाह से ज्योतिरादित्य
सिंधिया की मुलाकात की घटना
प्रचारित की गई।कहा गया कि
सिंधिया अपने समर्थकों के
साथ भाजपा को लेकर सरकार बनाने
जा रहे हैं। भाजपा ने उन्हें
मुख्यमंत्री बनाने का वादा
किया है। जब जनता के बीच ये
कहानी सुनी सुनाई जाने लगी
तो कमलनाथ को अपनी कुर्सी पर
खतरा मंडराता दिखा। इस दौरान
ज्योतिरादित्य सिंधिया खामोश
रहे और उन्होंने अपने पक्ष
में चलती इस मुहिम का भरपूर
आनंद लिया। लीपापोती करने
पहुंचे कमलनाथ ने सार्वजनिक
तौर पर महाकाल के आसपास विकास
कार्यों के लिए तीन सौ करोड़
रुपए की योजना घोषित कर डाली।
गौरतलब है कि जब प्रदेश का
खजाना कथित तौर पर खाली है तब
कमलनाथ को प्रदेश के विकास
की कोई चिंता नहीं है और वे
महाकाल माफिया के आगे घुटने
टेककर खड़े हो गए हैं।
दरअसल
पिछले विधानसभा चुनावों में
इसी महाकाल माफिया ने सपाक्स
पार्टी को झाड़ पोंछकर मैदान
में उतारा था। तब ये अफवाह
उड़ाई गई कि भाजपा सवर्णों
के खिलाफ है। महाकाल माफिया
के कारिंदों ने प्रदेश के सीधे
साधे ब्राह्मणों को उकसाया
कि वे आरक्षण के खिलाफ सवर्ण
समाज पार्टी को वोट दें। इस
षड़यंत्र का नतीजा ये रहा कि
भाजपा का समर्पित वोटर पार्टी
से खफा हो गया और वोट को बर्बाद
होने से बचाने के लिए उसने
कांग्रेस को अपना समर्थन
दिया।अपने इस षड़यंत्र को
हवा देने के लिए महाकाल माफिया
ने शिवराज सिंह चौहान से वह
बयान दिलवाया जिसमें उन्होंने
कहा था कि कोई माई का लाल आरक्षण
समाप्त नहीं कर सकता।
भगवान
महाकाल की नीलकंठेश्वर वाली
त्यागी भूमिका को सृष्टि के
उद्भव का कारक माना जाता है।
उनकी संहारक वाली छवि भी जन
जन के बीच जिज्ञासा का केन्द्र
होती है। ऐसे में महाकाल माफिया
कहानियां प्रचारित करता रहता
है कि यदि सिंहस्थ के बाद
मुख्यमंत्री नहीं बदला गया
या सरकार नहीं बदली तो प्रलय
हो जाएगा। अपनी इस कहानी को
सच साबित करने के लिए महाकाल
माफिया ने शिवराज सिंह चौहान
सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए
अभियान चलाया था। तब प्रदेश
के पंडितों के माध्यम से इसे
धर्मयुद्ध बताया गया। कहा
गया कि यदि सरकार नहीं बदली
तो महाकाल के प्रति आस्थाओं
में कमी आ जाएगी। पंडितों ने
भी बढ़ चढ़कर इस सुर में सुर
मिलाए। सरकार में आने के बाद
कमलनाथ ने धर्मस्व विभाग का
ढांचा बदल दिया और धर्मस्थलों
को नियमित करने के नियम भी
ढीले कर दिए।
मध्यप्रदेश
में कमलनाथ सरकार ने जनता की
सहानुभूति बटोरने के लिए न
केवल शुद्धता को लेकर अभियान
चलाया बल्कि हर जिले में कुछेक
व्यापारियों के खिलाफ रासुका
लगाकर अपने अभियान की पूर्णाहुति
भी कर डाली है। हालांकि विकास
के मोर्चे पर कमलनाथ सरकार
बुरी तरह असफल साबित हुई है।
उद्योगपति कमलनाथ ने कथित
छिंदवाड़ा माडल की आड़ में
उद्योगपतियों से जो वसूली
अभियान चलाया उससे राज्य में
अफरातफरी के हालात बन गए हैं।
नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव
तो कहते हैं कि नौ माह बाद भी
सरकार जनता को नतीजे नहीं दे
पाई है। उसके मंत्री तबादलों
में ही जुटे हैं। जनता की
समस्याएं बढ़ती जा रहीं हैं
और जनता में आक्रोश फैल रहा
है।
राज्य में कमलनाथ को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करते समय कांग्रेस ने उन्हें उद्योपति बताया था। अब जबकि उद्योगों के बीच भय का माहौल है तब लोग सवाल कर रहे हैं कि कमलनाथ आखिर कौन सा उद्योग चलाते हैं और उनके कारखाने प्रदेश या देश के लिए कौन सा माल बनाते हैं।जब सरकार ने नवंबर 2019 तक प्रदेश के सभी मीटर बदलने का अभियान चलाया है। लोग पूछ रहे हैं कि प्रदेश में बिजली की क्षति लगातार बढ़ती जा रही है तब मीटर बदलने की ये मुहिम कमलनाथ से जुड़े किस उद्योगपति को लाभ पहुंचाने के लिए चलाई जा रही है।इसी बीच महाकाल माफिया को दस्तूरी पहुंचाने के कदम ने कमलनाथ की असलियत उजागर कर दी है।
विदेशी
तकनीक के आयात से भारत को कर्ज
के दलदल में धकेलने वाले राजीव
गांधी की सोच को मुख्यमंत्री
कमलनाथ अब मध्यप्रदेश में
लागू करने की तैयारी कर रहे
हैं। इसे वे अपने बहु प्रचारित
छिंदवाड़ा मॉडल का प्रेरणा
स्रोत बता रहे हैं। राजीव
गांधी के 75 वें
जन्मदिवस को उन्होंने राजीव
गांधी को 21 वीं सदी
के आधुनिक भारत का निर्माता
बताया। जबकि हकीकत ये है कि
कंप्यूटर तकनीक के आयात की
देश को जो मंहगी कीमत चुकानी
पड़ी है वह भारत के विकास के
मार्ग में रोड़ा साबित
हुई है। आज चीन जहां तकनीक के
विकास से 13 ट्रिलियन
डॉलर की अर्थव्यवस्था बन चुका
है वहीं भारत आज भी 5ट्रिलियन
डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने
की जद्दोजहद से जूझ रहा है।
कांग्रेस
के जिस विकास मॉडल को देश ने
खारिज करके मोदी सरकार को
सत्ता सौंपी है उसने भारतीय
मुद्रा को रीसेट करके देश में
पनप चुकी समानांतर अर्थव्यवस्था
को समाप्त करने का एतिहासिक
फैसला लिया था। नोटबंदी से
देश का काला धन तो उजागर हुआ
ही साथ में बैंकों के सरकारीकरण
का लाभ लेकर कालाधन बनाने
वालों की पोल भी देश के सामने
खुल चुकी है। जिन राजीव गांधी
को देश में कंप्यूटर क्रांति
का जनक बताया जाता है उसे
उन्होंने माईक्रोसाफ्ट का
कथित एजेंट बनकर देश में लागू
करवाया था। विश्वसनीय सरकारी
सूत्र बताते हैं कि पूरे देश
की ओर से भारत सरकार ने माईक्रोसाफ्ट
से अनुबंध किया था। उसी अनुबंध
की तर्ज पर आज तक भारत सरकार
और राज्यों की सरकारें
माईक्रोसाफ्ट से ही आपरेटिंग
सिस्टम खरीदती हैं। भारत ये
युवा यदि आपरेटिंग सिस्टम
बना भी लें तो उस अनुबंध की
वजह से सरकारें वो साफ्टवेयर
नहीं खरीद सकती हैं।भारत का
कोई आंत्रप्न्योर यदि मुफ्त
में भी वो साफ्टवेयर सरकारों
को देना चाहे तो उसे नहीं खरीदा
जा सकता।
देश
में राजीव गांधी के मित्र सैम
पित्रोदा ने जिस सी डॉट एक्सचेंज
की खरीदी पूरे देश में करवाई
थी वो तकनीक पूरी दुनिया में
बंद हो चुकी थी। इसके बाद देश
में पेजर आए और वे भी मोबाईल
की वजह से विदा हो गए। इस तरह
मंहगी तकनीकें खरीदे जाने से
देश को अरबों रुपयों की हानि
पहुंची और कमीशन के रूप में
मिला अरबों रुपयों का धन कथित
तौर पर विदेशी बैंकों में
रिश्वत के रूप में पहुंचाया
गया। जबकि सैम पित्रोदा ने
अहसान जताते हुए एक रुपये का
वेतन लेकर देशभक्त होने का
नाटक खेला था।
भोपाल
गैस त्रासदी के आरोपी वारेन
एंडरसन को विदेश भगाने के लिए
जिम्मेदार राजीव गांधी की
पोल पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल
गौर विधानसभा में उजागर कर
चुके हैं। उनका कहना था कि
स्वर्गीय अर्जुनसिंह को फोन
करके राजीव गांधी ने एंडरसन
को छोड़ने का हुक्म दिया था।
जिसे तत्कालीन कलेक्टर मोती
सिंह और एसपी स्वराज पुरी ने
सकुशल वापस पहुंचाया था।
स्वराज पुरी तो स्वयं कार
चलाकर एंडरसन को विमान तल तक
छोड़ने गए थे। यूनियन कार्बाइड
ने सुप्रीम कोर्ट के माध्यम
से जो हर्जाना दिलवाया उसकी
बंदरबांट की कहानी भोपाल के
गली कूंचों में आज भी सुनी
सुनाई जाती है। गैस राहत विभाग
के मंत्री आरिफ अकील और पूर्व
मंत्री बाबूलाल गौर इस एपीसोड
की कहानियां समय समय पर सुनाते
रहते हैं।
कांग्रेस
में राजीव गांधी की विचारधारा
देश को आत्मनिर्भर बनाने के
बजाए कर्ज लेकर बांटने वाली
सोच के रूप में ही जानी जाती
है। युवाओं को वैश्विक उद्योगों
के लिए बेचने की इस विचारधारा
में प्रशिक्षण तो सरकारी
संसाधनों से दिया गया लेकिन
वे युवा नौकरी के लिए भारत
छोड़कर विदेश चले गए। वहीं
बस गए और सरकारें लाभ के नाम
पर विदेशी मुद्रा का फायदा
गिनाती रहीं। आज विश्व भर में
फैले भारत के युवा अपने देश
को याद करते हैं और घरों से
उजड़ने का दुख उन्हें सालता
रहता है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री
नरेन्द्र मोदी ने जब मेक इन
इंडिया का नारा दिया तो कई
उद्योगपतियों ने अपने दफ्तर
भारत में खोल दिए। आज वे उद्योगपति
पूरी दुनिया में तीन दफ्तर
और कारखाने चलाते हैं जिनमें
भारत के युवाओं को रोजगार के
अवसर मिले हैं। कई वैश्विक
कंपनियां भी भारत के युवाओं
से तकनीकी कामकाज कराती हैं।
इसके विपरीत चीन ने अपने युवाओं की तस्करी नहीं की। अपनी लागत पर दुनिया भर के उद्योगों को रोशन नहीं किया। चीन ने घरेलू उत्पादन को पूरी दुनिया में बेचा और आज उसकी मुद्रा पूरी दुनिया में तहलका मचा रही है। भारत में नरेन्द्र मोदी जब मेक इन इंडिया का नारा दे रहे हैं तब मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार युवाओं को विदेश भेजने की मुहिम चला रही है। जाहिर है कि ये भारत सरकार की राष्ट्रीय सोच के विपरीत कदम है। जिसे केन्द्र की भाजपा सरकार लंबे समय तक बर्दाश्त नहीं कर पाएगी। कमलनाथ सरकार का ये अभियान अंततः कांग्रेस सरकार की विदाई की वजह भी बन सकता है।