Category: मध्यप्रदेश

  • राहुल ब्रिगेड ने छीनी भोपाल की शान

    राहुल ब्रिगेड ने छीनी भोपाल की शान

    लोकनिर्माण विभाग में कमाऊ परियोजनाओं पर वर्चस्व जमाने की मुहिम

    वक्त है बदलाव का नारा देकर कांग्रेस ने प्रदेश की सत्ता की चाभी मांगी थी। जनता ने इस वादे पर गौर किया कांग्रेस की झोली में चार फीसदी वोट अधिक डाल दिए। समीकरण कुछ ऐसे बने कि सत्तर हजार वोट कम पाकर भी कांग्रेस कुर्सी पर काबिज हो गई। जनता को अपेक्षा है कि कमलनाथ कांग्रेस जनहित में कुछ बदलाव करेगी। सरकार ने कुछ बड़े कदम उठाए भी हैं लेकिन सत्ता की आड़ में कई ठग भी सत्तासीन हो चले हैं। लोक निर्माण विभाग में बड़े बजट वाले प्रोजेक्ट हड़पने की मुहिम शुरु हो गई है। कई प्रोजेक्ट तो सजायाफ्ता अफसरों के हवाले कर दिए गए हैं। ठेठ राजधानी में सड़क निर्माण की एक परियोजना ऐसे अफसर के हवाले कर दी गई है जिसे भ्रष्टाचार में दोषी पाकर दंडित किया जा चुका है। एक अन्य प्रकरण में सजा मंजूर हो चुकी है। जबकि एक अन्य प्रकरण पर लोकायुक्त की जांच लंबित है और जल्दी ही एफआईआर दर्ज होने वाली है।

    राजधानी का विकास मंडीदीप से बैरागढ़ होते हुए सीहोर तक लंबी लंबी सड़कों के बीच हुआ है। पहली बार एक ऐसी सड़क बनाई जा रही है जो सीहोर से मंडीदीप को जोड़ने वाली होगी। भोपाल को काटने वाली ये पहली सड़क है। कलियासोत डैम से बर्रई के बीच बनने वाली इस 12 किलोमीटर सड़क की लागत 45 करोड़ रुपए अनुमानित की गई है। इस सड़क का सुझाव पूर्व मुख्य सचिव आर परशुराम ने दिया था। उनका कहना था कि मंडीदीप औद्योगिक क्षेत्र को इंदौर मार्ग से जोड़ने का प्रयास कुछ इस तरह किया जाए ताकि भोपाल से गुजरने वाले ट्रेफिक को वक्त भी कम लगे और यातायात की बाधाएं भी न आएं। लोक निर्माण विभाग के पूर्व ईएनसी अखिलेश अग्रवाल ने इसके लिए बाकायदा विभागीय अफसरों से सैटेलाईट सर्वे करवाया और तब ऐसा मार्ग खोजा गया जिसकी लागत बहुत कम हो। कलियासोत नहर के दायीं ओर बनने वाली इस सड़क की लागत इसलिए कम आ रही है क्योंकि इसमें मुआवजे की राशि का भुगतान अधिक नहीं किया जाना है। अतिक्रमण हटाने के प्रकरण भी कम हैं। इसके साथ साथ जिन तेरह चौराहों से होकर ये सड़क गुजरनी है उनसे शहर के बड़े हिस्से को सीधी कनेक्टिविटी मिलना संभव है। चूनाभट्टी से बनने वाला ये एक्सप्रेस हाईवे बहुत कम वक्त में सीधा बाईपास से जोड़ देगा। यही नहीं मंडीदीप से सीहोर जाने के मौजूदा मार्ग की तुलना में इस सड़क से लगभग बारह किलोमीटर की कमी भी आएगी।

    लोक निर्माण विभाग ने चार वर्षों के लंबे अध्ययन और नक्शे आदि बनाने के बाद अक्टूबर 2018 में ये प्रोजेक्ट शुरु किया है। इस प्रोजेक्ट को साकार करने वाले जेल 2 सबडिवीजन के अनुविभागीय अधिकारी अमलराज जैन को ये जवाबदारी दी गई थी। इंजीनियरों के भी इंजीनियर कहे जाने वाले मुख्य अभियंता अखिलेश अग्रवाल इस परियोजना पर अपनी पैनी नजर रखे हुए थे। इसलिए परियोजना का काम तेजी से पूरा किया जा रहा था। कमलनाथ सरकार के आते ही कई लोग ईएनसी पर कमाऊ प्रोजेक्ट देने का दबाव बनाने लगे। राहुल ब्रिगेड के प्रभारी रहे युवा केबिनेट मंत्री ने चूनाभट्टी से बर्रई के बीच बनने वाले एक्सप्रेस हाईवे का काम अपने रिश्तेदार विजय सिंह पटेल को देने का दबाव बनाया। अखिलेश अग्रवाल ने साफ इंकार कर दिया। नतीजन अगले दिन विभागीय मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने मामले में हस्तक्षेप किया और विभागाध्यक्ष से राहुल ब्रिगेड के संबंधित मंत्री का निर्देश मानने को कह दिया। आनन फानन में आदेश निकाला गया और विजय सिंह पटेल को ये परियोजना थमा दी गई। जब श्री विजय सिंह जतारा में सहायक यंत्री थे तब उन्होंने सड़क पर इतना कम डामरीकरण कराया था कि पहली बरसात में ही सड़क बह गई। जांचकर्ताओं ने इसके लिए श्री विजय सिंह को दोषी पाया और विभाग ने उनकी चार वेतनवृद्धि संचयी प्रभाव से रोकने की शास्ति अधिरोपित कर दी। विभागाध्यक्ष अखिलेश अग्रवाल ये जानते थे,लोकायुक्त के प्रकरण की भी उन्हें जानकारी थी लेकिन सरकार का निर्देश मानकर उन्होंने इस परियोजना को भ्रष्ट अफसर के हवाले कर दिया।हालांकि इसके बावजूद निर्माण भवन में सात वर्ष नौ माह की मैराथन जवाबदारी संभालने वाले अखिलेश अग्रवाल को भी विभाग से चलता कर दिया गया। वे निहायत ईमानदार अफसर माने जाते हैं पर सरकार में आ धमके कुछ गिरोहबाजों के लिए वे उपयोगी नहीं थे।

    मौजूदा मुख्य अभियंता श्री आर के मेहरा और विभागीय मंत्री सज्जन सिंह वर्मा के विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी संजय खांडे भी इस परियोजना की हकीकत से वाकिफ हैं। वे कहते भी हैं कि इस प्रोजेक्ट को साकार करना भोपाल के लिए विशेष तौर पर उपयोगी है। वे ये भी कहते हैं कि लोक निर्माण विभाग के नियमों और परंपराओं के अनुसार किसी भी प्रोजेक्ट को शुरु करने वाले अफसर को ही उसे पूरा करने की जवाबदारी दी जाती रही है।क्योंकि इससे परियोजना की बारीकियां आसानी से हल हो जाती हैं। कोई गंभीर शिकायत सामने आने पर ही परियोजना का प्रभारी बदला जाता है। इसके बावजूद सरकार का हुक्म बजाना अफसरों की मजबूरी है।

    मुख्यमंत्री कमलनाथ आमतौर पर सरकारी कामकाज में अधिक दखल देने के पक्ष में नहीं रहते हैं। उनके करीबी बताते हैं कि वे अफसरों पर राजनीतिक उद्देश्यों के लिए भी बेजा दबाव डालने के पक्षधर नहीं हैं। इसके बावजूद कांग्रेस में जिस तरह से कई नेताओं की लाबियां सक्रिय हैं उससे शासन प्रशासन पर तय शुदा राजनीतिक दबाव की तुलना में कई गुना तनाव थोपा जा रहा है। राजधानी की शान कही जाने वाली इस परियोजना में मौजूदा बदलाव आने के बाद शुरु हो चुका काम ठप पड़ गया है। निश्चित तौर पर यदि सरकार ने परियोजना की सुध नहीं ली तो इसका समय सीमा में पूरा होना भी असंभव है और लागत कितने गुना बढ़ेगी ये तो आने वाला समय ही बताएगा।

  • सरकार का सूचना आयुक्त कौन

    सरकार का सूचना आयुक्त कौन


    भोपाल,8 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)।मध्यप्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त केडी खान और सूचना आयुक्त आत्मदीप का कार्यकाल आज समाप्त हो गया। सूचना भवन में आयोजित एक औपचारिक कार्यक्रम में दोनों को विदाई भी दे दी गई। परिवार को सबसे प्रमुख इकाई मानने वाले केडी खान को राष्ट्रवादी भाजपा ने अपना सूचना आयुक्त बनाया था पर अब नए सूचना आयुक्त का फैसला कमलनाथ सरकार को करना है। फिलहाल सूचना आयुक्त सुखराज सिंह ने प्रभार संभाल लिया है।

    मुख्य सूचना आयुक्त के लिए जिन प्रमुख हस्तियों के प्रस्तावों पर सरकार विचार कर रही है उनमें सूचना आयुक्त आत्मदीप और सुखराज सिंह भी शामिल हैं। तरह तरह के नवाचारों से मध्यप्रदेश में सूचना के कानून को लोकप्रियता मिली उनमें बहुत सारे प्रयोग सूचना आयुक्त आत्मदीप ने किए थे। जनता को सूचना का अधिकार देने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता अरूणा राय के नेतृत्व में राजस्थान से शुरू हुए आंदोलन में सहभागिता, सूचना का अधिकार अधिनियम एवं म0प्र0 सूचना का अधिकार (फीस व अपील) नियम 2005 के सुविज्ञ, सूचना के अधिकार के बेहतर क्रियान्वयन, इस अधिकार की पहुंच अधिकाधिक जनता तक पहुंचाने और इस अधिकार का लाभ ज्यादातर लोगों तक पहुंचाने के लिए म.प्र. राज्य सूचना आयुक्त के रूप में विशेष प्रयास, जनहित में म.प्र. में सर्वाधिक नवाचार किए ।
    देश में पहली बार म.प्र. में आर. टी. आई. एक्ट के तहत लोक अदालतों के आयोजन का शुभारंभ कराया । म0प्र0 सूचना आयोग में पहली बार वीडियो कान्फ्रेंसिंग से अपीलों की सुनवाई शुरू कराई । पक्षकारों की सुविधा के लिए सूचना आयोग को उसकी चारदीवारी से बाहर निकाल कर जनता के बीच ले जाने की पहल की । अपने प्रभार के सभी जिलों के दौरे कर जिला मुख्यालयों पर केंप कोर्ट लगाए और जिले की अपीलों का जिले में ही जाकर निराकरण करने का प्रयास किया । आर.टी.आई. एक्ट के प्रमुख उद्देश्य तथा एक्ट के मुख्य प्रावधानों की जानकारी देकर लोकसेवकों को लोकहित व लोक क्रिया कलाप से संबंधित अधिकाधिक जानकारियां नागरिकों को देने के लिए प्रेरित करने के लिए जिला मुख्यालयों पर जाकर लोक सूचना अधिकारियों, अपीलीय अधिकारियों व सूचना का अधिकार प्रकोष्ठ से जुडे़ लोक सेवकों की कार्यशालाएं आयोजित की । 5 वर्ष के कार्यकाल में 5 हजार से अधिक अपीलों व शिकायतों का निराकरण किया, सूचना के अधिकार की अवज्ञा करने वाले 21 लोक सूचना अधिकारियों को 3,13,500 रू0 के जुर्माने-हर्जाने से दंडित किया ।


    अपीलों व शिकायतों की सुनवाई के लिए पक्षकारों को भोपाल आने-जाने से राहत देने के लिए देश में पहली दफा मध्यप्रदेश में फोन पर सुनवाई कर प्रकरणों का निराकरण करने की पहल की । इससे अधिकारियों-कर्मचारियों की यात्रा पर खर्च होने वाले लोकधन की बचत हुई, शासकीय कार्यालयों का नियमित कामकाज बाधित होने से बचा, अधिकारियों-कर्मचारियों व अपीलार्थियों को यात्रा में होने वाली परेशानी से राहत मिली और सबके समय, श्रम, काम व धन की बचत हुई । उचित मूल्य की दुकानों, रेडक्रास सोसायटी आदि अनेक संस्थानों/निकायों को आर.टी.आई. एक्ट के दायरे में लाकर नागरिकों को वांछित सूचनाएं उपलब्ध कराने की पहल की ।


    सूचना आयुक्त के रूप में आत्मदीप ने देश में पहली बार म.प्र. में अपने स्तर पर ऐसी निःशुल्क सुविधा सबके लिए उपलब्ध कराई कि कोई भी नागरिक व लोकसेवक सूचना के अधिकार के संबंध में उनसे फोन, मोबाईल, वाट्सएप, इंस्ट्रग्राम, ईमेल आदि के जरिए कभी भी वांछित जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इस सुविधा से न केवल मध्यप्रदेश बल्कि अन्य राज्यों के भी काफी लोग लाभान्वित हुए जिनमें प्रवासी भारतीय भी शामिल हैं । सूचना के अधिकार के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से ‘राईट टू इंफर्मेशन’ (जर्नलिस्ट) नाम से फेसबुक पेज भी बनाया और सोशल मीडिया का भरपूर सदुपयोग किया । सुनवाई में निःशक्तजनों, बुजुर्गों व महिलाओं को प्राथमिकता देने का प्रावधान किया । अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर हर 8 मार्च को सिर्फ महिलाओं की अपीलों व शिकायतों को सुनवाई के लिए नियत किया ।


    प्रदेश के अनेक जिलों में गैर सरकारी कार्यक्रमों में भी प्रबोधन देकर सूचना के अधिकार को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया । दुबई व अबूधाबी में भी गोष्ठी आयोजित कर प्रवासी भारतीयों को सूचना के अधिकार का लाभ लेने हेतु प्रेरित किया।


    पत्रकार के रूप में: पूर्व में पत्रिका, नवभारत टाईम्स व जनसत्ता के कार्यालय संवाददाता/विशेष संवाददाता के रूप में करीब 35 वर्षों तक पूर्णकालिक पत्रकारिता की । जन सरोकारों से जुड़ी सार्थक पत्रकारिता करने तथा निष्पक्ष, खोजपूर्ण व रचनात्मक रिपोर्टिंग के लिए कई पुरूस्कारों से सम्मानित, विशेषकर मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत द्वारा श्रेष्ठ पत्रकार के रूप में ‘माणक अलंकरण’ से तथा जगदगुरू शंकराचार्य श्री वासुदेवानंद सरस्वती द्वारा ‘गुणीजन सम्मान’ से सम्मानित । देश के प्रमुख पत्रकार महासंघ नेशनल यूनियन आप जर्नलिस्टस्, इंडिया के राष्ट्रीय महासचिव के नाते पत्रकारों के लिए उल्लेखनीय कल्याणकारी कार्य किए तथा संयुक्त राष्ट्र के अंतराष्ट्रीय श्रम संगठन में पत्रकार बिरादरी का प्रतिनिधित्व करने वाले इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स, ब्रुसेल्स द्वारा विभिन्न देशों में आयोजित कार्यशालाओं में भागीदारी की ।


    म0प्र0 शासन द्वारा गठित राज्य स्तरीय पत्रकार अधिमान्यता समिति तथा म0प्र0 विधानसभाध्यक्ष द्वारा गठित पत्रकार दीर्घा सलाहकार समिति के भी सदस्य रहे । पत्रकारों के कल्याण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर गठित जर्नलिस्ट्स वेलफेयर फाउंडेशन, नई दिल्ली के भी दो बार निर्विरोध राष्ट्रीय सचिव चुने गए ।


    विज्ञान व प्रोद्यौगिकी: पत्रकारिता, आर.टी.आई. एक्ट सहित विभिन्न कानूनों व राज्य सूचना आयोग के काम-काज के बारे में विशेषज्ञता के अतिरिक्त भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र, मुंबई में प्रशिक्षण प्राप्त कर परमाणु उर्जा प्रोद्यौगिकी के क्षेत्र में भी विशेषज्ञता हासिल की । विज्ञान व तकनीकी के इस क्षेत्र में व पोखरण टू के संबंध में की गयी रिपोर्टिंग की देश के प्रमुख वैज्ञानिक डा0 अब्दुल कलाम आजाद, डा0 आर0 चिदंबरम व डा0 अनिल काकोड़कर द्वारा मुक्त कंठ से सराहना की गयी । जन सेवा को समर्पित, अब तक के जीवन पर अनुचित कार्य का कोई आक्षेप नहीं । पत्रकार व राज्य सूचना आयुक्त के रूप में संपूर्ण जीवन यात्रा बेदाग रही ।

  • दस लाख कारोबारियों पर चोट

    दस लाख कारोबारियों पर चोट

    सरकार ने गुमाश्ता कानून में कराए गए पंजीकरण को हर पांच साल में नवीनीकृत कराने का नियम समाप्त कर दिया है। अब मध्यप्रदेश में दुकान और स्थापना अधिनियम-1958 के प्रावधानों के तहत छोटे दुकानदारों, स्थापनाओं एवं स्टार्ट-अप को बार-बार दुकानों के लाईसेंस का नवीनीकरण नहीं कराना होगा। कमलनाथ सरकार का कहना है कि ऐसा करके उसने छोटे दुकानदारों और कारोबारियों को ईज आफ डूइंग बिजिनेस की तहजीब से झंझट मुक्त कर दिया है। इस निर्णय से प्रदेश के लगभग 10 लाख से अधिक छोटे दुकानदार, स्थापना व्यवसाई और स्टार्ट-अप लाभान्वित होंगे। नई व्यवस्था के अनुसार दुकानदार और स्थापनाओं को पूरे व्यवसाय अवधि में एक बार ऑनलाइन पंजीयन कराना होगा। पंजीयन कराने के बाद भविष्य में व्यवसाय के स्वरूप में परिवर्तन होने पर ही अपने पंजीयन में संशोधन कराना होगा।साथ ही पंजीयन की विभिन्न श्रेणियों को खत्म कर मात्र दो श्रेणी तक ही सीमित किया जा रहा है।पहली नजर में यह कदम बहुत जनोन्मुखी नजर आता है। सरकार और उसकी संस्था कांग्रेस भी यही प्रचारित कर रही है। जबकि हकीकत में ये बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सुभीते के लिए उठाया गया कदम है। वालमार्ट जैसी संस्थाओं ने भारत में अपना कारोबार फैलाने के लिए बाजार की आजादी स्थापित करने की मांग लंबे समय से उठा रखी है। छोटे उपभोक्ताओं के दबाव के कारण ही वालमार्ट के ब्रांडों को केवल थोक कारोबार की इजाजत दी गई है। वे अपना माल केवल थोक उपभोक्ताओं को बेच सकते हैं। इसके लिए उन्हें थोक उपभोक्ताओं के गुमाश्ता प्रमाण पत्र को ग्राहकी का आधार बनाना होता है। जाहिर है कि हर साल या पांच साल में जारी किए जाने वाले गुमाश्ता प्रमाणपत्र को वालमार्ट में हर बार नवीनीकृत कराना होता है। जैसे ही गुमाश्ता अनुमति का समय बीत जाता है वैसे ही वालमार्ट उस प्रमाणपत्र पर कारोबार नहीं कर सकता। इससे वालमार्ट के तमाम ब्रांड भारत में खासा घाटा उठा रहे हैं। उनकी मांग है कि उन्हें फुटकर कारोबार की इजाजत दी जाए। वालस्ट्रीट के दिग्गज मार्गन स्टेनली का कहना है कि भारत में वालमार्ट को यहां के नियमों के कारण घाटा हो रहा है। अमेरिकी रिटेल कंपनी वालमार्ट ने भारत के जिस प्रमुख ई कामर्स प्लेटफार्म फ्लिपकार्ट में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई थी उसे वह बेच सकती है। ये उसी तरह होगा जैसे 2017 में अमेजन ने चीन को छोड़ दिया था। ब्रोकरेज फर्म मार्गन स्टेनली का कहना है कि भारत में ई कामर्स में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश(एफडीआई) के जो नए नियम बने हैं उनसे वालमार्ट और अमेजन जैसे दिग्गज भी हिल गए हैं। वालमार्ट ने मई 2018 में भारत की सबसे बड़ी ई कामर्स कंपनी फ्लिपकार्ट में 77 प्रतिशत हिस्सेदारी करीब 1.07 लाख करोड़ रुपए में खरीदी थी। स्थानीय कारोबारियों ने तबसे ई कामर्स कंपनियों के खिलाफ अभियान चला रखा है। कारोबारियों का कहना है कि ई कामर्स के कारण उनका कारोबार तबाह हो रहा है।इसके बाद मोदी सरकार ने एफडीआई के नियमों में जो बदलाव किए उनके चलते फ्लिपकार्ट को अपने मौजूदा प्रोडक्टस में से 25प्रतिशत को हटाना पड़ रहा है। इसमें स्मार्टफोन और इलेक्ट्रानिक्स के आईटम भी शामिल हैं। सप्लाई चेन और एक्सक्लूसिव डील्स को लेकर नियमों में बदलाव से इलेक्ट्रानिक सेगमेंट पर बड़ा प्रभाव पड़ रहा है। जबकि फ्लिपकार्ट की 50 फीसदी कमाई इसी केटेगरी से आती है। हालत ये हो गई है कि अमेजन को अपने दो टाप सेलर्स क्लाऊडटेल और एपैरियो को भी हटाना पड़ा है। क्योंकि इन दोनों में अमेजन की हिस्सेदारी थी। एक फरवरी से लागू नए नियमों के मुताबिक एफडीआई वाली ई कामर्स कंपनियां मार्केटप्लेस पर उन कंपनियों का सामान नहीं बेच सकेंगी जिनमें उन्होंने निवेश कर रखा है। इसी तरह वे एक्सक्लूसिव बिक्री के लिए भी करार नहीं कर सकती हैं। अमेजन ने तो इन नियमों का विरोध करते हुए एक फरवरी से अपने प्लेटफार्म पर किराना प्रोडक्ट्स की बिक्री रोक दी है। भारत में निवेश करने वाली इन्हीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव के आगे झुकते हुए मध्यप्रदेश सरकार ने गुमाश्ता कानून की रीढ़ तोड़ दी है। अब जो प्रमाण पत्र एक बार जारी हो जाएंगे वे लगातार अस्तित्व में रहेंगे। इससे इन विदेशी कंपनियों को अपना ग्राहक आधार बढ़ाने में मदद मिलेगी। एक तरह से ये रिटेल बाजार में कब्जा जमाने की ओर बढ़ता कदम ही होगा। हालिया विधानसभा चुनावों में व्यापारियों ने भारी चंदा देकर भाजपा को हराने और कांग्रेस को सत्ता में लाने की मुहिम चलाई थी। सरकार के इस फैसले से उन्हें निराशा होगी। सरकार दावा कर रही है कि उसके इस फैसले से दस लाख छोटे व्यापारियों को सरलता हो जाएगी। जबकि हकीकत ये है कि सरकार के इस फैसले से दस लाख छोटे व्यापारियों की रोजी रोटी छिनने का संकट बढ़ गया है। भारत में पूंजीवाद लाने के लिए खुले बाजार को छूट देने की पहल 1991 में नरसिम्हाराव सरकार के वित्तमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह की पहल पर की गई थी। इसके बाद एनडीए की मनमोहन सिंह सरकार ने उन नीतियों को आगे बढ़ाया। आज जब मोदी सरकार देश की समृद्धि बढ़ाने की उसी दिशा में आगे बढ़ रही है तब उन नीतियों की आलोचना की जा रही थी। राज्य में कमलनाथ सरकार उन्हीं वैश्विक नीतियों को लागू कर रही है जिसका विरोध स्थानीय कारोबारी लंबे समय से करते रहे हैं। जाहिर है कि सरकार का यह फैसला एक बार फिर टकराव का माहौल निर्मित करेगा।

  • सरकार ने रोका जबलपुर के मत्स्य महाविद्यालय का अनुदान

    सरकार ने रोका जबलपुर के मत्स्य महाविद्यालय का अनुदान

    मांझी समाज से भेदभाव भारी पड़ेगा बोले आनंद निषाद

    भोपाल,2फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। विधानसभा चुनावों में रोजगार दिलाने का वादा करने के लिए इस्तेमाल किया गया छिंदवाड़ा मॉडल कांग्रेस के सत्ता में आते ही हवा हवाई साबित होने लगा है। मुख्यमंत्री कमलनाथ बात बात में युवाओं को रोजगार दिलाने के लिए प्रशिक्षण दिलाने की बात करते हैं लेकिन सरकार का मछली पालन विभाग ये जवाबदारी उठाने को ही तैयार नहीं है।सरकार ने जबलपुर के मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय का अनुदान रोक दिया है जिससे वहां कई महीनों से वेतन नहीं बंट पा रहा है। सरकार की इस बेरुखी से मांझी समाज आक्रोश में है और उसके नेतागण दो दो हाथ करने की तैयारी कर रहे हैं।

    प्रदेश में मछली पालन के क्षेत्र में रोजगार बढ़ाने और पूंजी निर्माण के लिए निवृत्तमान भाजपा सरकार ने वर्ष 2012 में मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय जबलपुर की स्थापना की थी। मांझी समाज की एक मांग उनके बच्चों को उनकी पारंपरिक कला में प्रशिक्षित करने की भी थी। इसे देखते हुए कुलाधिपति के आदेशानुसार यह कालेज मछुआ कल्याण तथा मत्स्य विकास विभाग ने शुरु किया था। पूरे मध्यप्रदेश में मछली पालन सिखाने वाला ये एकमात्र कालेज है।विभाग ने कालेज की स्थापना के साथ ही उसे पांच साल की ग्रांट उपलब्ध कराई थी। तबसे कालेज से निकले करीबन अस्सी विद्यार्थी आज देश भर में मछली पालन व्यवसाय में रोजगार पा रहे हैं और प्रदेश में मछली उत्पादन के नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं।

    कालेज शुरु होने के बाद से मंजूर पंचवर्षीय प्रोजेक्ट का समय विगत वर्ष अगस्त माह में पूरा हो गया था। अनुपूरक बजट पारित होने के साथ इसकी नई ग्रांट मंजूर होनी थी। एक सितंबर 2018 को मत्स्य पालन विभाग ने अनुपूरक बजट के लिए कालेज का प्रस्ताव प्रस्तुत ही नहीं किया। विभाग के संचालक ओपी सक्सेना ने तब आश्वासन दिया था कि विभाग का बजट आबंटित होते ही कालेज की ग्रांट नवीनीकृत कर दी जाएगी। उस वक्त चुनाव का माहौल था और आचार संहिता के दौरान कोई बड़ा फैसला नहीं लिया जा सका। अब जबकि नई सरकार अपना कामकाज सुचारू रूप से संभाल चुकी है और पिछले पांच छह महीनों से कालेज में वेतन तक नहीं बंट सका है तब विभाग और शासन दोनों ही कालेज को फंड देने में आनाकानी कर रहे हैं।

    प्रमुख सचिव मछुआ कल्याण एवं मत्स्य विभाग अश्विनी कुमार राय का कहना है कि सरकार ने पांच साल के लिए बजट मंजूर किया था। मंजूरी देते वक्त कहा गया था कि भविष्य में कालेज अपने कामकाज का विस्तार अपने वित्तीय संसाधनों से करेगा। कालेज को शैक्षणिक जगत में अपनी गुणवत्ता स्थापित करनी चाहिए और बजट की व्यवस्था खुद करनी चाहिए।उनका कहना है कि इंडियन इंस्टीट्यूट आफ एग्रीकल्चर रिसर्च और उच्च शिक्षा अनुदान आयोग से अनुदान लेकर कालेज को चलाया जाना चाहिए। हालांकि यूजीसी के मान्यता दिलाने और अनुदान दिलाने की जवाबदारी शासन की ही होती है। जबकि आईएआरआई की ओर से अनुसंधान कार्यों के लिए अनुदान दिया जाता है।

    हकीकत ये है कि सरकार की पहल पर शासन ने बाकायदा अधिसूचना जारी करके यह कालेज शुरु कराया था।जाहिर है कि कालेज की स्थापना का व्यय शासन को ही वहन करना था।शासन ने ये जवाबदारी अपनी ओर से मत्स्य पालन विभाग को दी थी। अपना रुतबा दिखाते हुए मत्स्य पालन विभाग ने कालेज को शुरु कराते समय ऐसे शिक्षकों की भर्ती कर ली थी जिनकी पढ़ाई मत्स्य विज्ञान में नहीं हुई थी। ऐसे में उच्च शिक्षा के राष्ट्रीय संस्थानों की कसौटी पर कालेज को कसा जाना संभव नहीं था। इसके बावजूद चूंकि शासन ने गारंटी ली थी इसलिए कालेज का शैक्षणिक कामकाज सुचारू तौर पर चलता रहा।

    मत्स्य पालन के क्षेत्र में रोजगार और पूंजी निर्माण की बढ़ती संभावनाओं को देखते हुए देश के सीमांत राज्यों ने अपने युवाओं को इस क्षेत्र में प्रशिक्षित किया है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में दो कालेज हैं जहां इस कारोबार के कुशल युवाओं को तैयार किया जाता है। बिहार जैसे राज्य में भी मछली पालन के स्टार्टअप तैयार हो चुके हैं जबकि मध्यप्रदेश इस क्षेत्र में बहुत पिछड़ा है।

    मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय जबलपुर के प्रभारी अधिष्ठाता डॉ.एस.के.महाजन का कहना है कि पिछले सालों में हमने राज्य के बच्चों को वैश्विक कसौटियों से मुकाबले के लिए तैयार किया है। आज हमारे कालेज से निकले छात्र देश के मछली उद्योग की शीर्ष जवाबदारियां संभाल रहे हैं। विशाखापट्टनम के मछली उद्योग में छात्रदल के प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल होने गए डॉ.महाजन ने कहा कि मत्स्य पालन विभाग और उसका ये कालेज अपनी जवाबदारी ठीक तरह से निभा रहा है। यदि सरकार की ओर से इसे संरक्षण मिले तो प्रदेश के युवाओं को रोजगार के नए अवसर देने में हम कामयाब होंगे। कालेज की ओर से अनुदान और विकास संबंधी प्रस्ताव हमने विभाग को भेजा है, जिस पर शासन की मंजूरी का हमें इंतजार है।

    हालांकि मांझी समाज के साथ किए जा रहे सरकार के भेदभाव से मछुआरों के सर्वमान्य नेता आनंद निषाद बहुत नाराज हैं। उनका कहना है कि हमने जब प्रदेश में अपना राजनीतिक वजूद खंगालना शुरु किया तब घबराकर भाजपा की शिवराज सरकार ने इस कालेज की स्थापना की थी। बाद में कुछ राजनीतिक कारणों से मांझी समाज भेदभाव का शिकार हो गया। विधानसभा चुनाव में मांझी समाज ने राष्ट्रीय महान गणतंत्र पार्टी के बैनर तले अपने स्वाभिमान की लड़ाई लड़ी। जिसके कारण भाजपा की सरकार का पतन संभव हुआ। अब कमलनाथ की कांग्रेस सरकार मछुआरों के बच्चों से शिक्षा का हक छीन रही है, जिसे देखते हुए हम आने वाले समय में कांग्रेस के वजूद पर भी प्रहार कर सकते हैं। उनका कहना है कि प्रदेश के जन,जंगल,जमीन, जल, और जानवरों पर पहला हक प्रदेश के मूल निवासियों का है। सरकार यदि मांझी समाज के बच्चों की शिक्षा में रोड़े अटकाएगी तो हम उसकी ईंट से ईंट बजा देंगे। प्रदेश के हर जिले और हर विधानसभा सीट पर हमारी समाज का वोट बैंक निर्णायक है। हम इसे एकजुट कर रहे हैं और आगामी चुनावों में हमारी मौजूदगी सरकार बनाने और बिगाड़ने में निर्णायक साबित होगी।

  • कमलनाथ सरकार को दलालों ने घेरा

    कमलनाथ सरकार को दलालों ने घेरा

    राज्य मंत्रालय में रोज सुबह से देर शाम तक इसी तरह आगंतुकों का जमघट लगा रहता है। दलालों और सुरक्षा कर्मियों के बीच आए दिन बहसें होती रहती हैं।

    आगामी लोकसभा चुनावों के लिए राजनैतिक जमावट में जुटी कमलनाथ सरकार न चाहते हुए भी दलालों से घिर गई है। मुख्यमंत्री कमलनाथ जगह जगह वित्तीय कुप्रबंधन को रोकने के उपाय करते नजर आ रहे हैं जबकि कांग्रेस संगठन से जुड़े पदाधिकारी अपने लाव लश्कर समेत सत्ता की मलाई सूंतने में जुट गए हैं। सरकार के महत्वपूर्ण विभागों को खंगालने के लिए उन्होंने भाजपा शासनकाल के दलालों को भी अपने खेमे में शामिल कर लिया है। सबसे बड़ी बात तो ये है कि पिछले पंद्रह सालों के भाजपा शासनकाल में सुशासन की जो कवायद की गई थी वो अब ताक पर धर दी गई है और मंत्रालय के गलियारे दलालों की दौड़भाग से गुलजार हो चले हैं। एक मलाईदार विभाग के मंत्री के विशेष सहायक इतनी जल्दी में हैं कि उन्होंने पूरे प्रदेश के अफसरों को धमकाकर वसूलियां शुरु कर दीं हैं। लोगों ने भी उनकी डिमांड के फोन टेप कर लिये हैं और उचित समय का इंतजार कर रहे हैं।

    ऐसा नहीं कि मुख्यमंत्री कमलनाथ इस सच से अनजान हैं। उनके खबरची लगातार ये फीडबैक दे रहे हैं। इसके बावजूद मुख्यमंत्री सचिवालय से वेट एंड वाच की सलाह ही दी जा रही है। इसकी वजह कांग्रेस संगठन का बिखरा स्वरूप है। अलग अलग धड़ों में बंटी कांग्रेस के तमाम नेतागण और उऩके समर्थक लंबे समय से कह रहे हैं कि पिछले पंद्रह सालों से वे सत्ता की मलाई खाने से वंचित रहे हैं। ऐसे में उन्हें अगला आम चुनाव भी लड़ना है। जनता के बीच दौड़ भाग के लिए रसद पानी का इंतजाम करने के लिए उन्हें भी अवसर चाहिए। इसलिए मंत्रालय के दरवाजे कांग्रेस समर्थकों के लिए खोल दिए गए हैं। रोज सुबह से मंत्रालय के गलियारों में दौड़ भाग करते कांग्रेस समर्थकों की भीड़ देखी जा सकती है। इनके साथ आने वाले दलाल बाजार से आवेदन बनाकर लाते हैं और मंत्रियों के स्टाफ से नोटशीट बनवाकर आदेश जारी करवाने में जुट जाते हैं।

    लंबे समय से सत्ता की गुंडागर्दी भूल चुके अफसरों के लिए ये एक नया अनुभव साबित हो रहा है। एक कमाऊ विभाग के प्रमुख को पिछले दिनों बड़ी कड़वी हकीकत से रूबरू होना पड़ा। उन्होंने जब मंत्री के दफ्तर से धड़ाधड़ आ रही नोटशीट डंप करना शुरु कर दिया तो मंत्री के समर्थकों ने उन्हों फोन पर गरियाना शुरु कर दिया। कुछ समर्थकों ने तो अफसर की माता बहिनों की सलामती की दुआ करते हुए कहा कि अब अच्छे से समझ लो ये कांग्रेस की सरकार है। यहां ना नुकुर की तो हम कांग्रेसी अपने नेताओं को भी नहीं छोड़ते,अफसरों की बिसात ही क्या है। अफसर को ये प्रेम भरा प्रस्ताव जल्दी समझ में आ गया और सारी नोटशीट एक ही झटके में आदेश बन गईं।

    सत्ता बदलते ही प्रशासन में आई इस तब्दीली से अफसर हक्के बक्के हैं वे मुख्यमंत्री से शिकायत नहीं कर सकते क्योंकि पद संभालते ही उन्होंने साफ कह दिया था कि किसी भी कार्यकर्ता का काम अटकना नहीं चाहिए। यदि मेरे पास शिकायत आएगी तो मैं उसे बख्शूंगा नहीं। अब ऐसे में भला कांग्रेस के शेरों पर लगाम लगाने का साहस भला कौन कर सकता है। लगभग अराजकता के दौर में प्रवेश कर चुकी प्रशासनिक व्यवस्था को देखकर अफसरों ने भी वेट एंड वाच की ही शैली अख्तियार कर ली है। एक आला अफसर ने कहा कि हम तो प्रदेश हित को ध्यान में रखकर व्यवस्था बनाने की कोशिश कर रहे थे। अब जब सरकार ही नहीं चाहती कि नियमों और कानूनों का पालन हो तो हम क्या कर सकते हैं।

    अटल बिहारी वाजपेयी इंस्टीट्यूट आफ गुड गवर्नेंस एंड पालिसी एनालिसिस के प्रशासन प्रबंधक ग्रुप केप्टन एचपी शर्मा कहते हैं कि कोई भी सरकार बदलती है तो प्रशासन उसकी नीतियों के साथ कदमताल करने की कोशिश करता है।धीरे धीरे जब सरकार और अफसरों की कार्यशैली में साम्य स्थापित हो जाता है तो प्रशासनिक व्यवस्था आकार ले लेती है। पिछली सरकार लंबे समय तक रही ऐसे में जाहिर है कि सरकार और अफसरों ने एक दूसरे की प्राथमिकताओं को समझ लिया था। अब नई सरकार के सामने चुनावी चुनौतियां भी हैं ऐसे में प्रशासन की शैली को स्थिर होने में थोड़ा वक्त लग सकता है।

    दरअसल पिछली भाजपा सरकार ने तो कार्यकर्ताओं को हितग्राहियों की सूची में शामिल कर दिया था। तबादलों और पोस्टिंग के लिए भाजपा संगठन की राय जरूर ली जाती थी लेकिन प्रशासनिक प्रक्रिया मंत्रिमंडल के सदस्य ही पूरी करते थे। इससे जहां विकेन्द्रित भ्रष्टाचार पर लगाम लग जाती थी वहीं प्रशासनिक आधार पर कसावट लाने में भी भाजपा सरकार सफल थी। यही वजह है कि खनिज, वाणिज्यकर, आबकारी, जैसे आय बढ़ाने वाले विभागों से सरकार ने खासा वित्त जुटाया जिससे उसे विकास कार्यों के लिए पर्याप्त धनराशि मिलती रही थी।

    मुख्यमंत्री कमलनाथ प्रदेश के वित्तीय प्रबंधन में कसावट लाकर विकास योजनाओं के लिए धन की व्यवस्था करने की बात कहते रहे हैं। उन्होंने मीडिया का बजट रोककर दो टूक कह दिया है कि मुझे अपनी छवि चमकाने की जरूरत नहीं है। हालांकि ये बात भी सही है कि दो लाख करोड़ के बजट में मीडिया पर खर्च की जाने वाली धनराशि सौ करोड़ भी नहीं होती है। जबकि सड़कों, फ्लाईओवर और अन्य योजनाओं पर खर्च की जाने वाली धनराशि हजारों करोड़ की होती है। इसके बावजूद मीडिया पर प्रहार करने से जनता को ये संदेश देने में सफलता मिल रही है कि सरकार वित्तीय प्रबंधन सुधार रही है।

    कांग्रेस के विभिन्न गुटों के बीच सत्ता की मलाई लूटने की जो होड़ इन दिनों पावर गेलरी में देखी जा रही है उससे तो साफ समझ में आता है कि कमलनाथ सरकार आगे चलकर गंभीर वित्तीय संकट का सामना करने की तैयारी कर रही है। आज जब प्रदेश के विकास के लिए संसाधन जुटाने की जरूरत है तब तबादलों और पोस्टिंग के धंधे को फलने फूलने का अवसर देकर नई सरकार अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है। जब सरकार के विभाग अपने वित्तीय लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पाएंगे तो वह अपनी नोटशीट पर कर्ज लेने की हैसियत भी खो देगी। प्रदेश के नागरिकों को निश्चित रूप से गहरे वित्तीय संकट का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा।

  • राजनैतिक मुकदमे वापस लेगी कमलनाथ सरकार

    राजनैतिक मुकदमे वापस लेगी कमलनाथ सरकार

    मंत्रि-परिषद के निर्णय 

    भोपाल,17 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)।मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ की अध्यक्षता में हुई मंत्रि-परिषद की बैठक में व्यापक लोकहित में आपराधिक प्रकरणों के प्रत्याहरण के लिए नयी प्रक्रिया अनुमोदित की गई है। अनुमोदित प्रक्रिया अनुसार प्रत्याहरण के लिए अब किसी भी आवेदक को राजधानी आने की आवश्यकता नहीं होगी। वह अपना आवेदन सीधे संबंधित जिले के जिलादण्डाधिकारी को प्रस्तुत कर सकेगा।इन आवेदनों की छानबीन के बाद ये मुकदमे सरकार वापस लेगी चाहे वे किसी भी राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं से संबंधित क्यों न हों।

    मंत्रिपरिषद की बैठक के बाद जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा और खेल उच्च शिक्षा मंत्री जीतू पटवारी ने कहा कि प्रकरणों के प्रत्याहरण के लिए जिला एवं राज्य स्तरीय समिति के गठन के साथ ही प्रकरण प्रत्याहरण की त्वरित कार्यवाही सुनिश्चित करने के लिए संचालक लोक अभियोजन को संयोजक एवं नोडल एजेंसी घोषित किया गया है। जिला स्तरीय समिति में जिलादण्डाधिकारी को अध्यक्ष, जिला पुलिस अधीक्षक को सदस्य और जिला लोक अभियोजन अधिकारी को सदस्य सचिव बनाया गया है।

    राज्य स्तरीय समिति में अपर मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव गृह विभाग, प्रमुख सचिव विधि एवं विधायी कार्य, पुलिस महानिदेशक और महाधिवक्ता अथवा उनके द्वारा नामांकित प्रतिनिधि सदस्य होंगे। संचालक लोक अभियोजन को समिति का संयोजक बनाया गया है। राज्य स्तरीय समिति प्रक्रिया के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए समय-समय पर अनुशंसा कर सकेगी। मंत्रि-परिषद की बैठक में जय किसान फसल ऋण माफी योजना के क्रियान्वयन की समीक्षा भी की गई।

    जीतू पटवारी ने कहा कि सरकार ने 31 मार्च 2018 तक बकाया प्रकरणों और 12 दिसंबर 2018 तक चुकाए गए प्रकरणों में भी कर्जमाफी का लाभ मिलेगा। उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य है कि अधिक से अधिक किसानों तक इस योजना का लाभ मिले।उन्होंने कहा कि प्रदेश के 55 लाख किसान इस योजना से लाभान्वित होंगे।उन्होंने बताया कि 90फीसदी किसानों से संबंधित जानकारियां कंप्यूटर में दर्ज है केवल 7 फीसदी किसानों की जानकारियां एकत्रित की जानी हैं।

  • 55 लाख किसानों का 50 हजार करोड़ का फसल ऋण होगा माफ

    55 लाख किसानों का 50 हजार करोड़ का फसल ऋण होगा माफ

    भोपाल,15 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र) मुख्यमंत्री कमल नाथ ने कहा है कि किसानों को मजबूत किये बिना मध्यप्रदेश की कृषि आधारित अर्थ-व्यवस्था मजबूत नहीं हो सकती। कृषि क्षेत्र अर्थ-व्यवस्था की नींव है। आज यहां ‘जय किसान फसल ऋण माफी योजना” का शुभारंभ करते हुए उन्होंने कहा कि इस योजना से प्रदेश के 55 लाख किसानों को ऋण माफी का लाभ मिलेगा। इन किसानों के 50 हजार करोड़ रूपये के फसल ऋण माफ हो जायेंगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह योजना मध्यप्रदेश के इतिहास में मील का पत्थर साबित होगी।

    श्री कमल नाथ ने स्थानीय पलाश होटल परिसर से योजना की शुरूआत की। इसके साथ ही पूरे प्रदेश में ऋण माफी की प्रक्रिया शुरू हो गई है। उन्होंने प्रतीक स्वरूप दस किसानों से ऋण मुक्ति आवेदन भरवाये और प्राप्त किये। आगामी पांच फरवरी तक पूरे प्रदेश में यह प्रक्रिया पूरी हो जायेगी।

    किसानों को मजबूती देगी योजना

    मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ ने कहा कि ‘जय किसान फसल ऋण माफी योजना” किसानों को आर्थिक रूप से मजबूती देने वाली योजना है। यह योजना कर्ज से जूझ रहे किसानों के लिये उपहार नहीं बल्कि कृषि क्षेत्र में बड़ा निवेश है । उन्होंने कहा कि कृषि आधारित अर्थ-व्यवस्था में जब तक किसान मजबूत नहीं होगा, तब तक प्रदेश आगे नहीं बढ़ सकता। मुख्यमंत्री ने जय किसान फसल ऋण माफी योजना के क्रियान्वयन से जुड़े सभी  अधिकारियों को भी धन्यवाद दिया ।

    जल्द शुरू होगा निवेश आने का सिलसिला

    मुख्यमंत्री ने कहा कि विगत दो दशकों में किसानों के बच्चे भी पढ़ लिख कर आगे आये हैं। इंजीनियर बने हैं। उनके लिए रोजगार की व्यवस्था करना होगा। युवाओं के लिये रोजगार निर्माण पर ज्यादा ध्यान दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि निवेश आने से रोजगार का निर्माण होता है और विश्वास से ही निवेश आता है । निवेश आए बिना रोजगार के अवसर पैदा करना संभव नहीं है । उन्होंने कहा कि जल्दी ही प्रदेश में निवेश आने का सिलसिला शुरू होगा।

    किसानों की मेहनत को समर्पित योजना

    मुख्यमंत्री ने कहा कि कि बाजारों में रौनक तभी होगी, जब किसानों की क्रय शक्ति मजबूत होगी। उन्होंने कहा कि यह योजना किसानों की मेहनत को समर्पित है। उन्होंने कहा कि किसान कर्ज में जन्म लेता है, कर्ज में जीता है और कर्ज में उसका अंत होता है। यह स्थिति ठीक नहीं है। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार किसानों को मजबूत करेगी।

    बजट की चिंता न करें विरोधी दल

    श्री कमल नाथ ने भाजपा द्वारा सरकार की स्थिरता और योजना के लिये बजट उपलब्‍धता पर व्यक्त की जा रही शंकाओं का स्पष्ट जवाब देते हुए कहा कि भाजपा को बजट की चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है।  उन्होंने कहा कि जो लोग वक्तव्य दे रहे हैं, वे खुद नहीं जानते कि बजट क्या होता है।

    प्रदेश की अपनी निवेश नीति होगी

    मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ ने कहा कि मध्यप्रदेश को निवेश के क्षेत्र में प्रतियोगी राज्य बनाना है । उन्होंने कहा कि अन्य राज्यों की तरह मध्यप्रदेश को भौगोलिक लाभ नहीं मिला है। इसलिए प्रदेश की अपनी नीति बनाना होगा।

    जनसंपर्क मंत्री श्री पी. सी. शर्मा ने कहा कि सरकार का शुरूआती एक घंटे में ही किसानों की कर्ज माफी का फैसला ऐतिहासिक कदम है। उन्होंने कहा कि लाखों किसान मुख्यमंत्री के प्रति आभार व्यक्त कर रहे हैं। कार्यक्रम में विधायक श्री आरिफ मसूद और किसान संघों के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

  • गांधी भवन में स्वास्थ्य शिविर

    गांधी भवन में स्वास्थ्य शिविर

    भोपाल,16 जनवरी(निज प्रतिनिधि)। श्यामला हिल्स स्थित गांधी भवन में निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर लगाया गया है। महाराष्ट्र के वर्धा में त्रिवेणी चैतन्यम ट्रस्ट के संस्थापक डॉ. सतीश सावरकर यहां 16 से 22 जनवरी तक ह्दय और डायबिटीज जैसे दुःसाध्य रोगों का इलाज करेंगे।यह चिकित्सा पूर्णतः अहिंसावादी और गांधीवादी नजरिए से की जाएगी। इस शिविर स्वास्थ्य के मौलिक सिद्धांतों को सिखाया जाएगा जिनसे बगैर गोली या दवा के स्वस्थ रहने के रहस्य बताए जाएंगे। इस संबंध में आज गांधी भवन न्यास के सचिव दयाराम नामदेव, गोविंद भूतड़ा,सी.पी.शर्मा,डॉ.एस.के.जैन ने पत्रकार वार्ता में चिकित्सा के तरीकों की जानकारी दी।

    श्री गोविंद भूतड़ा ने बताया कि इस शिविर में भोजन और निवास की व्यवस्था भी रहेगी। प्रदेश के कई जिलों से आने वाले रोगियों और जिज्ञासुओं को शिविर में गांधीवादी तरीकों से उपचार की जानकारियां दी जाएंगी। इस सरल उपचार पद्धति से ऐसे गंभीर रोगों का इलाज किया जाएगा जिन्हें आधुनिक मंहगी चिकित्सा पद्धति भी उपचार नहीं कर पाई है। डॉ.सतीश सावरकर देश के जाने माने साईको न्यूरोबिक विशेषज्ञ हैं। देश के कई जाने माने प्रतिष्ठान उनकी सेवाओं का लाभ लेते हैं। वे हृदय के ब्लाकेज, निराशा, दमा, पाचन विकारों,गठिया,थायराईड, एलर्जी,स्मरण शक्ति की कमी जैसे जटिल रोगों का निःशुल्क उपचार करेंगे।

    प्रेस वार्ता में वरिष्ठ पत्रकार विपिन शर्मा ने बताया कि यह शिविर सशुल्क है और इसमें शामिल होने के लिए पहले बुकिंग करानी होगी। चिकित्सा और उपचार मुफ्त किया जाएगा।

  • भाजपा के ट्रेप में फंसी कांग्रेस

    भाजपा के ट्रेप में फंसी कांग्रेस

    लंगड़ी सरकार की छवि से बाहर निकलने के लिए कांग्रेस ने विधानसभा में अपना अध्यक्ष बनाकर जीत का उद्घोष करने में सफलता पाई है। इसी उत्साह के माहौल में उसने अपना उपाध्यक्ष भी बनाकर अपनी पीठ थपथपाई है। कांग्रेस के आम कार्यकर्ता से लेकर मुख्यमंत्री कमलनाथ तक इसे अपनी जीत बता रहे हैं।ऊपरी तौर पर ये नजर भी आ रहा है। सरकार की जी हुजूरी में लगा मीडिया भी इसे सरकार की जीत बता रहा है। इसके बावजूद राजनीतिक पंडितों का कहना है कि ये फैसला वास्तव में कांग्रेस को भाजपा के राजनीतिक जाल में फंसाने वाला साबित होने जा रहा है। भाजपा का स्थानीय नेतृत्व अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव परंपरागत रूप से करने का ही पक्षधर था। बाद में भाजपा हाईकमान की ओर से कहा गया कि अपनी ओर से अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के नाम घोषित किए जाएं। पार्टी की ओर से अध्यक्ष के रूप में आदिवासी नेता विजय शाह का नाम प्रस्तुत किया गया। उपाध्यक्ष के रूप में जगदीश देवड़ा का नाम प्रस्तुत किया गया। कांग्रेस ने व्हिप जारी किया और अपने सभी सदस्यों को विधानसभा में हाजिर रहने के निर्देश दिए गए। सचिवालय को दी गई सूचना न पढ़े जाने को मुद्दा बनाकर भाजपा ने सदन से वाकआऊट कर दिया। नतीजतन कांग्रेस ने एक पक्षीय वोटिंग कराई और एनपी प्रजापति को 120 मतों से विजयी घोषित कर दिया। भाजपा के नेताओं का कहना था कि यदि सदन में गुप्त मतदान कराया जाता तो कांग्रेस का प्रत्याशी चुनाव नहीं जीत सकता था। हालांकि ऐसी कोई परंपरा पहले कभी नहीं रही है कि गुप्त मतदान कराया जाता। भाजपा को भी वोटिंग नहीं करानी थी उसे तो बस केवल रायता फैलाना था। जीत के उल्लास में कांग्रेस ने भाजपा की रणनीति को समझने का कोई प्रयास नहीं किया। अगले दिन भाजपा ने उपाध्यक्ष के लिए भी अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। फिर वही कहानी दुहराई गई। चार सदस्यों ने सुश्री हिना कांवरे को उपाध्यक्ष बनाने के लिए नाम प्रस्तावित किया जबकि एक सदस्य ने भाजपा के जगदीश देवड़ा का नाम प्रस्तावित किया।ये प्रस्ताव विधिवत था और समर्थक भी मौजूद था। इसके बावजूद अध्यक्ष की आसंदी पर विराजमान एनपी प्रजापति ने पहले तो पूरे नाम नहीं पढ़े लेकिन जब नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने अनुरोध किया कि वे पूरे नाम पढ़ें अन्यथा उनके प्रत्याशी का नाम सदन के रिकार्ड में नहीं आएगा। इसके बाद अध्यक्ष ने जगदीश देवड़ा का नाम भी पढ़ दिया। इसके बाद विपक्ष के सदस्य नारेबाजी करते रहे और इसी बीच उपाध्यक्ष पद पर हिना कांवरे को विजयी घोषित कर दिया गया। कांग्रेस ने जो तैयारी की थी उसके बीच यही होना भी था। यदि विधिवत चुनाव होता तो भी कांग्रेस अपने प्रत्याशी को जिताने की पूरी कोशिश करती क्योंकि इससे उसे विश्वास मत की पुष्टि भी करनी थी। भाजपा को इस प्रक्रिया में चुनौती देनी भी नहीं थी उसे तो केवल सरकार और उसके प्रतिनिधियों के बीच अविश्वास जताना था। पिछले कार्यकालों में वह भी कमोबेश ऐसा ही करती रही थी। उसने हर बार मनमर्जी से सदन चलाया क्योंकि उसे स्पष्ट बहुमत प्राप्त था। इस बार उसे पता था कि संख्याबल उसके पास नहीं है।यदि वो तोड़फोड़ का प्रयास करती तो उसे इसकी बहुत मंहगी कीमत चुकानी पड़ती। जनता के बीच भी संदेश जाता कि भाजपा जनमत को मानने तैयार नहीं है।पिछले सालों में भाजपा ने बाकायदा कांग्रेस को उपाध्यक्ष पद देकर विपक्ष को अपने साथ चलने के लिए तैयार किया था। उसे मालूम है कि उपाध्यक्ष जैसे पद का कोई औचित्य नहीं है।यदि वो उपाध्यक्ष पद कृपा से भी स्वीकार कर लेती तो उसे सदन में अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करने की मजबूरी से बंध जाना पड़ता।अब वह सदन को चलाने की जवाबदारी से मुक्त है। वहीं कांग्रेस के नेतागण बार बार सफाई देकर कह रहे हैं कि भाजपा ने उसे चुनाव के लिए मजबूर किया हम तो परंपरा का पालन करना चाहते थे। जबकि हकीकत ये है कि कांग्रेस जाने अनजाने भाजपा के बिछाए जाल में फंस गई है। भाजपा तो झगड़ा करना ही चाहती थी। फिर ये किसने कह दिया कि चुनाव करवाने से कोई बुरा काम हो गया। चुनाव ने तो कांग्रेस के स्पष्टमत की पुष्टि ही की है। जो बात राज्यपाल महोदया के समक्ष कांग्रेस ने प्रमाणित की थी वही बात सदन में उसने दुहराई है। इसके बावजूद कांग्रेस ने अनजाने में बड़ी पराजय को गले लगा लिया है। यदि सदन विधिवत चलता तो कांग्रेस अपनी नीतियों पर विपक्ष की मुहर भी लगवा सकती थी। आलोचना के साथ ही सही पर वो अपनी नीतियों को लोकतांत्रिक जामा पहना सकती थी। अब ऐसा होना संभव नहीं दिखता। सदन का पहला सत्र ही कांग्रेस सुचारू रूप से नहीं चला पाई। ये जवाबदारी सरकार की होती है। विपक्ष का तो काम ही हो हल्ला मचाना है। ये जवाबदारी सरकार की थी कि वो विपक्ष को कैसे अपने साथ लेकर चले। यदि कांग्रेस बड़ा दिल करके भाजपा को उपाध्यक्ष देकर परंपरा का पालन करती तो भाजपा के सामने मजबूरी थी कि वो सदन को चलाने में सहयोग करे। भाजपा ये चाहती भी नहीं थी और कांग्रेस ने उसकी मांगी मुराद पूरी कर दी। अब यदि ये टकराव आने वाले समय में और बढ़ता है तो भाजपा उसी तरह असहयोग आंदोलन शुरु कर देगी जिस तरह से आजादी के संग्राम के दौरान महात्मा गांधी असहयोग आंदोलन का आव्हान करते थे।मध्यप्रदेश में सरकारी तंत्र का बोझ बहुत भारी हो चुका है। हर महीने सरकार को तीन हजार दो सौ करोड़ रुपए तो मात्र वेतन भत्तों के लिए जुटाने पड़ते हैं। कर्ज ली गई रकम का ब्याज अलग से भुगतना पड़ता है। विकास कार्यों के लिए भी भारी धनराशि की जरूरत पड़ती है। कर्जमाफी, बिजली बिल हाफ जैसी लोकप्रियता आधारित योजनाओं का दंड भी सरकारों को भुगतना पड़ता है। ऐसे में कमलनाथ सरकार के सामने चुनौती है कि वो सरकारी कामकाज को शांतिपूर्वक निपटाए। यदि सरकार रोज रोज नेतागिरी करके थोथी जीत के नशे की आदी हो जाएगी तो उसे सरकार चलाने लायक धनराशि जुटाना भी कठिन हो जाएगा। दरअसल कांग्रेस के नेतागण पिछली सरकारों के समान ही राजनीतिक व्यवस्था की आदत से बाहर नहीं आ पाए हैं। पहले केन्द्र की ओर से अनुदान मिल जाता था या कुछ योजनाओं को शत प्रतिशत तक मदद मिल जाती थी। जीएसटी लागू होने के बाद ये परिपाटी बदल गई है। अब राज्यों को टैक्स कलेक्शन करना होता है और उसे अनुपातिक धनराशि केन्द्र से वापस मिल जाती है। ऐसे स्थिति में यदि राज्य सरकार का टैक्स कलेक्शन घटेगा तो उसे वित्तीय संकट का सामना करना पड़ेगा। यदि जनता ने असहयोग कर दिया और टैक्स कलेक्शन में सरकार को टकराव का सामना करना पड़ा तो उसे उपहार में केवल बदनामी हाथ लगेगी।वित्तीय संकट बढ़ेगा को अलग। भाजपा के रणनीतिकार कांग्रेस को उसी दिशा में धकेल रहे हैं।कांग्रेस के नेतागण समझ लें कि यदि उन्होंने टकराव की नीति जारी रखी तो वो अपनी सरकार को सफल बनाकर जनता का दिल नहीं जीत पाएंगे। उम्मीद है कि भविष्य में कांग्रेस जीत के हैंगओवर से बाहर आएगी और टकराव की नीति छोड़कर प्रदेश के विकास की नींव रखेगी।

  • उपाध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने फिर किया जीत का उद्घोष

    उपाध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने फिर किया जीत का उद्घोष

    मध्यप्रदेश में नई सरकार के गठन के बाद पहला सत्र आज शोरशराबे की भेंट चढ़ गया। कमलनाथ सरकार ने इसी शोरगुल के बीच बाईस हजार करोड़ से अधिक का बजट पारित करवा लिया।विपक्ष की नारेबाजी और धरने के बीच सदन के समापन की घोषणा भी कर दी गई। सदन के समवेत होते ही पूर्व मुख्यमँत्री शिवराज सिंह चौहान ने कल राज्यसभा में पारित सवर्ण गरीबों को आरक्षण के विधेयक पर धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया। उन्होंने इस विधेयक को क्रांतिकारी बताते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अभिनंदन किया। विपक्षी सदस्यों ने मेजें थपथपाकर इसका समर्थन किया। इस बीच सत्ता पक्ष की ओर से कई सदस्यों ने विधेयक को राजनीतिक कदम बताते हुए कहा कि आगामी लोकसभा चुनावों को देखते हुए मोदी सरकार ने ये विधेयक प्रस्तुत किया था। इस बीच अध्यक्ष नर्मदा प्रसाद प्रजापति ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री यदि इस बात को उठाने से पहले सचिवालय को सूचना दे देते और अनुमति प्राप्त कर लेते तो अच्छा था। इस तरह से बीच में बोलने से नए सदस्यों पर गलत असर पड़ता है। इसके जवाब में जावरा से भाजपा विधायक राजेन्द्र पांडेय ने आसंदी पर सवाल उठाते हुए कहा कि नियम तोड़ने की शुरुआत आसंदी की ओर से पहले ही दिन हो गई थी।उपाध्यक्ष के चुनाव में भी इसी तरह सदन की मान्य परंपराओं और नियमों को ताक पर रख दिया गया। इस पर सत्ता पक्ष की ओर से कहा गया कि ये आसंदी का अपमान है। इस बीच अध्यक्ष एनपी प्रजापति ने कहा कि जब अध्यक्ष खड़े हों तब माननीय सदस्यगण बैठे रहें और अध्यक्ष की बात सुनें। इस बीच नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने कहा कि आसंदी की ओर से यदि उपाध्यक्ष निर्वाचन के संबंध में प्राप्त सूचनाएं पढ़ी नहीं जाएंगी तो वो केवल कागज का टुकड़ा ही रहेंगी। पांचों को एक साथ पढ़ा जाए और सदन से उसका अनुमोदन लिया जाए। अध्यक्ष के निर्वाचन में भी इसी प्रकार चार सूचनाएं पढ़कर कार्रवाई आगे बढ़ा दी गईं थी। इस पर आसंदी की ओर से उपाध्यक्ष के निर्वाचन के संबंध में प्राप्त पांचों सूचनाओं का पाठन किया गया। उन्होंने पांचीलाल मेढ़ा को अपना प्रस्ताव प्रस्तुत करने की अनुमति प्रदान की। जिसमें उन्होंने सुश्री हिना लिखीराम कांवरे को विधानसभा का उपाध्यक्ष चुने जाने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया। संसदीय कार्यमंत्री डाक्टर गोविंद सिंह ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। अध्यक्ष ने बताया कि सुश्री हिना लिखीराम कांवरे के लिए इसी प्रकार के प्रस्ताव विधानसभा सदस्य प्रताप ग्रेवाल, पीसी शर्मा, राजेश शुक्ला की ओर से भी प्रस्तुत किए गए हैं।एक अन्य प्रस्ताव नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव की ओर से जगदीश देवड़ा के लिए प्रस्तुत किया गया है। इस प्रस्ताव का समर्थन डाक्टर सीतासरन शर्मा ने किया है। इस बीच उन्होंने सदन से उपाध्यक्ष के निर्वाचन करने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि सुश्री हिना लिखीराम कांवरे को उपाध्यक्ष बनाए जाने पर सदन सहमत है। इसके जवाब में सत्तापक्ष के सदस्यों ने हाथ उठाकर समवेत स्वर में प्रस्ताव का समर्थन किया।अध्यक्ष ने इसके साथ ही उपाध्यक्ष के नाम निर्वाचन की घोषणा कर दी। जब ये प्रक्रिया चल रही थी तब पूर्व विधानसभा अध्यक्ष डाक्टर सीतासरन शर्मा ने प्वाईंट आफ आर्डर उठाते हुए अपनी बात कहने का समय मांगा। इस पर अध्यक्ष श्री एनपी प्रजापति ने कहा कि चुनाव की प्रक्रिया शुरु हो चुकी है ऐसे में प्वाईंट आफ आर्डर का कोई अर्थ नहीं और हम इसकी अनुमति नहीं देते हैं। उपाध्यक्ष के नाम की घोषणा के विरोध में विपक्ष के सदस्य गर्भगृह में आने लगे। इस पर अध्यक्ष ने सदस्यों से गर्भगृह में न आने का अनुरोध किया। नेता प्रतिपक्ष ने इस पर आपत्ति की। उन्होंने कहा कि ये आसंदी की तानाशाही है और ये नहीं चलेगी।ऐसे तो सदन नहीं चल सकता। आसंदी की ओर से विपक्ष को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। इस बीच पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आसंदी की ओर इशारा करते हुए अध्यक्ष से कहा कि आप निष्पक्ष नहीं हैं। हमें न्याय नहीं मिल सकता। इस पर शोरगुल बढ़ने लगा और अध्यक्ष ने सदन को दस मिनिट के लिए स्थगित करने की घोषणा कर दी। एक बार फिर जब सदन समवेत हुआ तो अध्यक्ष ने कहा कि मैंने नेता प्रतिपक्ष की बात सुनने के बाद ही कार्यवाही आगे बढ़ाई थी। इस पर नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि आसंदी से सत्य वचन किया जाए। पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष की ही बात सदन में नहीं सुनी जा रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई जिसे अध्यक्ष ने सदन की कार्यवाही से विलोपित करवा दिया। अध्यक्ष ने कहा कि कौल शकधर की किताब में साफ लिखा है कि चुनाव की प्रक्रिया शुरु हो जाने के बाद रोकी नहीं जा सकती। इस पर प्वाईंट आफ आर्डर नहीं लिया जा सकता। इस बीच सदन में शोरगुल होने लगा। गर्भगृह में खड़े विपक्ष के सदस्य नारेबाजी करने लगे। जिस पर सदन की कार्यवाही एक बार फिर दस मिनिट के लिए स्थगित कर दी गई। सदन के फिर समवेत होने पर अध्यक्ष ने सदस्यों से अनुरोध किया कि वे सदन को सुचारू रूप से चलाने में सहयोग करें। इस बीच नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने आसंदी की ओर इशारा करते हुए कहा कि आपका निर्वाचन असत्य है, असंवैधानिक है, अनियमित है। उन्होंने नारा लगाया अध्यक्ष जी इस्तीफा दो। इस बीच कई अन्य सदस्य भी अपने स्थान से खड़े होकर नारेबाजी करते सुने गए। शोरगुल बढ़ते देख अध्यक्ष ने सदन की कार्यवाही फिर से दस मिनिट के लिए स्थगित करने की घोषणा कर दी। लगभग साढ़े बारह बजे जब सदन एक बार फिर समवेत हुआ तो अध्यक्ष श्री प्रजापति ने कहा कि मेरा सदन के सभी सम्मानीय सदस्यों के प्रति सम्मान का भाव है। नियम प्रक्रियाओं के पालन में हमें कई बार कठिन फैसले भी लेने होते हैं। सदन के सभी वरिष्ठ सदस्य हमारे लिए आदरणीय हैं। इस बीच सत्ता पक्ष के केपीसिंह अपने स्थान पर खड़े हो गए और कहने लगे कि अध्यक्ष को अपने फैसले पर सफाई नहीं देनी चाहिए। अध्यक्ष ने कहा कि मैंने उपाध्यक्ष के निर्वाचन की कार्यवाही निर्वाचन की प्रक्रिया के अनुसार की है। मैं विपक्ष के सदस्यों के लिए सौंपता हूं कि वे इस पर फिर विचार करें। उन्होंने सदन की कार्यवाही आगे बढ़ाते हुए विधि और विधायी मंत्री पीसी शर्मा को मध्यप्रदेश माल और सेवा कर संशोधन अध्यादेश को सदन के पटल पर रखने की अनुमति प्रदान की।शोरशराबे के ही बीच पत्रों के पटल पर रखे जाने की प्रक्रिया भी चलती रही। इसी दौरान वित्तमंत्री तरुण भनोत ने भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के प्रतिवेदन भी सदन के पटल पर रखे।शासकीय विधि विषयक कार्यों से संबंधित विधेयक वाणिज्यिक कर मंत्री बृजेन्द्र सिंह राठौर ने प्रस्तुत किया और पुरःस्थापन की अनुमति प्राप्त की। इस बीच नवनिर्वाचित विधानसभा उपाध्यक्ष सुश्री हिना लिखीराम कांवरे ने राज्यपाल के अभिभाषण पर कृतज्ञता ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मंदसौर में किसानों को कर्जमाफी का जो वादा किया था कांग्रेस की कमलनाथ सरकार ने सत्ता संभालते ही कर्जमाफी की घोषणा कर दी है।इस बीच भी सदन में शोरगुल चलता रहा और कई बातें नहीं सुनी जा सकीं। इस बीच विजयलक्ष्मी साधो ने कहा कि जब सदन की सम्मानीय महिला सदस्य बोल रहीं हैं तब भी विपक्ष के सदस्य शोर मचा रहे हैं इससे साफ जाहिर हो जाता है कि महिलाओं के प्रति उनका क्या रवैया है। कांवरे ने कहा कि पिछली सरकार के बीच विधायिका और कार्यपालिका के बीच दूरियां बनी हुईं थीं। प्रशासनिक तौरतरीकों में काफी बदलाव किए जाने की जरूरत है। भाजपा के कई सदस्य बगैर अनुमति के बीच में बोलते रहे। भाजपा के दिनेश राय मुनमुन ने कहा कि कमलनाथ जी ने प्रदेश के युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता देने की घोषणा की है। ऐसे में युवाओं को आगे बढ़कर अन्य प्रदेशों के युवाओं को रोजगार से बाहर कर देना चाहिए। धन्यवाद प्रस्ताव के संबंध में सेवढ़ा विधायक घनश्याम सिंह ने सरकार ने अपने अधिकतर चुनावी वायदे पूरे कर दिए हैं। इस तरह से ये तेज काम करने वाली सरकार है। इस बीच उज्जैन के मोहन यादव अपने स्थान पर खड़े होकर सरकार के विरोध में भाषण करने लगे। उन्होंने कहा कि सदन में लोकतंत्र का अपमान किया जा रहा है। इस बीच आसंदी से द्वितीय अनुपूरक मांगों पर मतदान कराने की अनुमति प्रदान की। वित्तमंत्री तरुण भनोत ने इकत्तीस मार्च को समाप्त होने जा रहे वित्तीय वर्ष के लिए राज्य की संचित निधि में से प्रस्तावित खर्च के लिए बाईस हजार दो सौ सड़सठ करोड़, उनत्तीस लाख पांच हजार छह सौ रुपए की अनुपूरक राशि देने का अनुरोध किया जिसे सत्ता पक्ष ने विपक्षी शोरगुल के बीच पारित कर दिया। संसदीय कार्यमंत्री डाक्टर गोविंद सिंह ने कहा कि सदन से सभी कार्य पूरे हो चुके हैं इसलिए सदन को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया जाए। इस पर अध्यक्ष ने सहमति प्रदान की और सदन को अनिश्चित काल के लिए स्थगित करने की घोषणा की।

  • बीज से वृक्ष बन गया भोपाल उत्सव मेलाःराज्यपाल श्रीमती आनंदी बेन पटेल

    बीज से वृक्ष बन गया भोपाल उत्सव मेलाःराज्यपाल श्रीमती आनंदी बेन पटेल

    भोपाल,8 जनवरी(करुणा राजुरकर)।राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने भोपाल उत्सव मेला का शुभारंभ करते हुए कहा कि मध्यप्रदेश में मेरे पिछले एक साल के कार्यकाल में पहली बार मैं किसी मेले में आई हूं।यहां आकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। उन्होंने कहा कि मेला शब्द मेल से बना है और जहाँ बहुत से स्त्री-पुरुष, बच्चे इकट्ठे होकर आनंदित हो, अपनी मन-पसंद चीजें देखें और खरीदें इससे अच्छा क्या हो सकता है। हमारे देश में पहले मेले धार्मिक स्थानों पर ही लगते थे। पर अब उसका स्वरूप बदला है। मेले धार्मिक उद्देश्यों के साथ-साथ आर्थिक-सामाजिक और सांस्कृतिक उद्देश्यों से लगने लगे हैं। इन सबके अलावा आजकल पुस्तक मेलों का आयोजन भी हो रहा है और इन पुस्तक मेलों से प्रबुद्ध वर्ग को बहुत फायदा हुआ है। दिल्ली में लगने वाला विश्व पुस्तक मेला ने विदेशी पाठकों के बीच अपना स्थान बनाया है। इस अवसर पर जनसम्पर्क मंत्री श्री पी.सी. शर्मा विशेष रूप से उपस्थित थे।

    मेला समिति के अध्यक्ष श्री मनमोहन अग्रवाल ने राज्यपाल का स्वागत करते हुए कहा कि भोपाल मेले को शुरू करने में भास्कर समूह के संस्थापक स्वर्गीय श्री रमेश चंद्र अग्रवाल का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। मेला 27 वर्षों से निरतंर चल रहा है। वर्ष 1991 में सिर्फ 60 स्टाल शुरू होकर आज विशाल आकार लेता जा रहा है। अब यहाँ लगभग 600 स्टाल लगते हैं। यहाँ भोपाल ही नहीं अब तो आस पास के गाँवों और शहरों के लोग बड़ी संख्या में इस मेले में घूमने के लिए आते हैं।

    मेला समिति के महामंत्री श्री संतोष अग्रवाल ने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह मेला भोपाल शहर की पहचान बन गया है। यहाँ मनोरंजन के साथ-साथ नि:शुल्क हेल्थ हेल्थ कैम्प भी लगाया गया है। यहाँ नारायण सेवा संस्थान, उदयपुर के सहयोग से नि:शक्तजनों के लिए कृत्रिम अंगों का वितरण होगा। एलोपैथी के डॉक्टरों द्वारा नाक, कान, गला, केंसर आदि की जाँच होगी। दंत परीक्षण, शुगर की जाँच के अलावा नेत्र परीक्षण कर नि:शुल्क चश्मों का वितरण किया जायेगा।

  • गोपाल लीला की स्वीकार्यता

    गोपाल लीला की स्वीकार्यता

    पंडित गोपाल भार्गव की लीलाओं का जादू पिछले पैंतीस सालों से रहली गढ़ाकोटा क्षेत्र की जनता के सिर चढ़कर बोलता रहा है। जब प्रदेश में कांग्रेस की सरकारें हुआ करतीं थीं तब भी इलाके के लोग अपने गोपाल को विधानसभा भेजते थे। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने इस तिलिस्म को तोड़ने के लिए अपने अठारह मंत्रियों की भीड़ गढ़ाकोटा ले जाकर सम्मेलन किया था। उनका मानना था कि जनता के बीच वे गोपाल भार्गव की लोकप्रियता को कुचल देंगे। प्रदर्शन करते गोपाल भार्गव को पुलिस ने गिरफ्तार करके जनता को डराने की कोशिश भी की,लेकिन इसके बावजूद गोपाल भार्गव चुनाव जीते। विधानसभा में उन्होंने बीड़ी मजदूरों की बेबसी और उन्हें बीमे का लाभ दिलाने की आवाज उठाई जिसे दिग्विजय सिंह सरकार ने स्वीकार किया। तबसे गोपाल भार्गव और दिग्विजय सिंह के बीच सदाशयता के संबंध विकसित हुए जो आज तक बरकरार हैं।भाजपा की ओर से राजनाथ सिंह ने एक बार फिर उन्हें नेता प्रतिपक्ष घोषित करके संवाद का ऐसा पुख्ता पुल तैयार कर दिया है जो प्रदेश के विकास के लिए सोने में सुहागा साबित होने जा रहा है।उनके नेता प्रतिपक्ष के रूप में भाजपा सकारात्मक प्रतिरोध का नया अध्याय लिखने जा रही है।गोपाल भार्गव को ये जवाबदारी तब मिली है जब वे राजनैतिक परिपक्वता के शिखर पर पहुंच गए हैं।लंबे समय से सरकार में कैबिनेट मंत्री रहते हुए उन्होंने राजनीति को करीब से देखा समझा है।सत्ता पक्ष के कई वरिष्ठ मंत्री भी जब भाजपा के सत्ता से बाहर जाते समय उनका बंगला खाली होने का इंतजार कर रहे थे तब भार्गव ने ये कहते हुए टाल दिया कि अभी इंतजार करिए।जाहिर था कि वे पार्टी और कांग्रेस दोनों के ही नेताओं को आश्वस्त कर चुके थे कि अब उनकी बारी है। उमा भारती की सरकार में भी गोपाल भार्गव की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है। जब स्वर्गीय प्रमोद महाजन ने सारे विरोध को दरकिनार करते हुए शिवराज जी को मध्यप्रदेश की सत्ता की बागडोर पकड़ा दी थी तब गोपाल भार्गव या कैलाश विजयवर्गीय जैसे दिग्गज नेता यदि विद्रोह को हवा देते तो शिवराज को सत्तासीन नहीं किया जा सकता था। पार्टी के प्रति अनुशासन का वो शीर्ष दौर था जब सभी ने शिवराज जी को नेता के रूप में स्वीकार किया और चौदह सालों तक बखूबी साथ दिया। शिवराज जी को मुख्यमंत्री बनाए रखने वाली उद्योगपतियों,अफसरों और ठेकेदारों की जिस लाबी ने भाजपा के बधियाकरण की मुहिम चलाई उसी ने इस बार नखदंत विहीन भाजपा को सत्ता से बाहर खड़ा करवा दिया। शिवराज जी के कार्यकाल में जमीन से कटे दूसरी पंक्ति के जिन नेताओं को सत्ता के करीब ला खड़ा किया गया वे समय आने पर असरहीन साबित हुए।कई के तो चुनाव सामने देखकर हाथ पैर फूल गए थे। उनमें से कई ऐसे भी थे जो चुनाव के वक्त शिवराज का साथ छोड़कर दूर खड़े थे। पार्टी संगठन का ढांचा इस कदर तोड़ दिया गया था कि संगठन की आवाज बेअसर साबित हुई और मैदान में खड़े विद्रोही भाजपा की हार की बड़ी वजह बने।अब ऐसे वक्त गोपाल भार्गव को सदन में पार्टी का नेतृत्व करने का अवसर मिला है। हार से हताश भाजपा के विधायकों को अब भी भरोसा नहीं हो रहा कि वे सत्ता से बाहर किए जा चुके हैं,वो भी उस कांग्रेस के हाथों जो मैदान से नदारद थी। नेता प्रतिपक्ष की दौड़ में शिवराज सिंह चौहान की ओर से पूर्व मंत्री राजेन्द्र शुक्ल का नाम उठाया गया था। तर्क दिए जा रहे थे कि विंध्य क्षेत्र में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा रहा है इसलिए उन्हें नेता प्रतिपक्ष के रूप में अवसर दिया जाना चाहिए। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की पसंद के रूप में पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा का नाम भी लिया जा रहा था। सवर्ण समाज के नाम पर उन्हें नेता प्रतिपक्ष के रूप में प्रचारित भी किया गया। उनके विरोध में कहा गया कि वे बमुश्किल चुनाव जीते हैं जबकि जनसंपर्क महकमा उनके पास था। पार्टी के भीतर संगठन के कई वरिष्ठ कार्यकर्ता भी नरोत्तम के खिलाफ थे। उन्होंने प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे और राजनाथ सिंह तक अपनी नापसंदगी की बात पहुंचाई। अमित शाह का कथित करीबी होने के कारण कोई खुलकर नहीं बोल रहा था। इसलिए जवाबदारी राजनाथ जी को सौंप दी गई। राजनाथ सिंह ने रायशुमारी के आधार पर अमित शाह के सामने गोपाल भार्गव का नाम रखा जिसे उन्होंने तत्काल अपनी मंजूरी दे दी। इसके साथ ही मध्य प्रदेश में रहली विधानसभा क्षेत्र से आठवीं बार विधायक बने पंडित गोपाल भार्गव विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष घोषित कर दिए गए। सोमवार को भारतीय जनता पार्टी के विधायक दल की बैठक में भार्गव को नेता चुना गया। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने गोपाल भार्गव को विधायक दल का नेता चुने जाने का प्रस्ताव रखा, जिसका पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने समर्थन किया। इसके बाद केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भार्गव को निर्विरोध रूप से भाजपा विधायक दल का नेता निर्वाचित किए जाने का एलान किया। जाहिर है कि गोपाल भार्गव आज की भाजपा के सर्वमान्य नेता के रूप में सामने आए हैं। शिवराज गुट के पतन के बाद भाजपा हाईकमान राज्य भाजपा को ऩए सिरे से संगठित होते देखना चाहता है। गोपाल भार्गव इस काम में निपुण हैं। विधानसभा में भाजपा अपने 109 विधायकों के साथ मजबूत स्थिति में है। जाहिर है कि बरसों बाद प्रदेश को एक मजबूत विपक्ष मिला है। गोपाल भार्गव कभी पाखंडी राजनीति के पक्षधर नहीं रहे हैं। जाहिर है कि उनके नेतृत्व वाला विधायक दल भी सकारात्मक और ठोस राजनीति का पैरवीकोर रहेगा। ऐसा पहली बार ही होगा जब इतना सशक्त और सकारात्मक विपक्ष प्रदेश को मिला है जो राज्य में नई राजनीति की इबारत लिखेगा।

  • विज्ञान के क्षेत्र में अध्ययन, अध्यापन और शोध की जरूरत: राज्यपाल श्रीमती पटेल

    विज्ञान के क्षेत्र में अध्ययन, अध्यापन और शोध की जरूरत: राज्यपाल श्रीमती पटेल

    माडर्न इंटरनेशनल स्कूल में राज्य-स्तरीय विद्यार्थी विज्ञान मंथन शिविर शुरू

    भोपाल,6 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने कहा है कि भारत में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। प्राचीन भारत विज्ञान और प्रौद्योगिकी दुनिया में सबसे आगे था। मगर हमने पेटेंट नहीं कराया क्योंकि उस समय पेटेंट नहीं होता था। जीरो से लेकर नौ तक की गिनती की खोज भारत में हुई, जिसका कोई पेटेंट नहीं है। भारतीय उप महाद्वीप में प्राचीन काल में पुष्पक विमान हुआ करते थे, जिसका परिष्कृत रूप आधुनिक युग का हेलीकॉप्टर है। महाभारत के संजय की दिव्य-दृष्टि भी दुनिया में अद्वितीय थी। भारत का इतिहास पाँच हजार साल पुराना है। इसकी सभ्यता, संस्कृति और विज्ञान खोज भी पाँच हजार साल से चली आ रही है। श्रीमती पटेल ने यह बातें राज्य स्तरीय विद्यार्थी विज्ञान मंथन शिविर के शुभारंभ के अवसर पर इंदौर के मॉडर्न इंटरनेशनल स्कूल में कही।

    बच्चों को गर्भ से ही अच्छे संस्कार जरूरी

    राज्यपाल श्रीमती पटेल ने कहा कि महाभारत में अभिमन्यु की कथा यह बताती है कि बच्चा गर्भ से ही सीखाना शुरू कर देता है। आधुनिक युग में गर्भवती माताओं को ऐसे काम करना चाहिये, जिससे गर्भ में पल रहे बच्चे को अच्छे संस्कार मिले। गर्भ में पल रहे बच्चे को पौष्टिक आहार, योगा, ध्यान, गीत-संगीत और विज्ञान की शिक्षा परोक्ष रूप से मिलती रहे। गर्भवती माता को अपने गर्भ में पल रहे बच्चे को अच्छा संस्कार देने के लिये स्वाध्याय करना जरूरी है।

    श्रीमती पटेल ने कहा कि भारत के वैज्ञानिकों ने खोज की है कि पेड़-पौधों में भी जीव होते हैं। मनुष्य के शरीर के रक्त-संचार की भाँति पौधों में भी नियमित रस-संचार होता रहता है। शांति, सुकून और गीत- संगीत का उन पर भी सकारात्मक असर होता है।

    विद्यार्थियों को मेडिकल शिक्षा जरूरी

    राज्यपाल श्रीमती पटेल ने कहा कि विद्याथियों को खेल-खेल में शिक्षा देना जरूरी है। उन पर दबाव और तनाव नहीं होना चाहिये। उन्होंने कहा कि हमारे देश मे चिकित्सकों की बहुत कमी है, जिस कमी को पूरा करने के लिये विद्याथियों को मेडिकल शिक्षा दी जाये। अच्छे डॉक्टर और वैज्ञानिक बनने के लिये विद्यार्थियों को विज्ञान की शिक्षा देना जरूरी है। विज्ञान विषय में धन अधिक खर्च होता है और मेहनत भी अधिक होती है। विज्ञान हमें अच्छे-बुरे, उचित-अनुचित और सही-गलत की शिक्षा देता है। हम अध्यात्म, संस्कृति और परम्परा को विज्ञान की कसौटी पर कस सकते हैं।

    डॉ. एस.पी. सिंह ने कहा कि विज्ञान भारती संस्थान के देश में एक लाख 40 हजार सदस्य हैं। इसकी स्थापना 1981 में बैंगलुरु में की गई। संस्थान का उदे्दश्य विज्ञान को बढ़ावा देना है।

    भारत में ज्ञान-विज्ञान की प्राचीन परम्परा

    डॉ. अनिल कोठारी ने विद्याथियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि भारत में ज्ञान-विज्ञान और खोज की प्राचीनतम परम्परा रही है। विश्व स्तर के मेघनाथ साहा, विक्रम साराभाई, एस. चंद्रशेखर, सी.वी. रमन आदि वैज्ञानिक भारत में हुए हैं। सम्मेलन का उदे्दश्य विज्ञान के विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करना है।

    डॉ. प्रदीप शर्मा ने कहा कि भारत दुनिया के प्राचीन देशों में से एक है। प्राचीन काल से यह विज्ञान, कला, संगीत और संस्कृति के क्षेत्र में समृद्ध रहा है। कार्यक्रम में डॉ. राजीव दीक्षित, श्री अनिल कारिया, श्री अनिल रावत, श्री संतोष पटेल, श्री अनिल खरे, श्री सुनील जोशी सहित गणमान्य नागरिक और बड़ी संख्या में विद्यार्थी मौजूद थे। संचालन श्रीमती अनुपमा मोदी ने किया।

  • प्रशासनिक बदलाव की धुरी बनेंगे डॉ.गोविंद सिंह

    प्रशासनिक बदलाव की धुरी बनेंगे डॉ.गोविंद सिंह

    कांग्रेस में समाजवादी पृष्ठभूमि का परचम लेकर चलने वाले डाक्टर गोविंद सिंह को मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सामान्य प्रशासन विभाग की जिम्मेदारी भी सौंप दी है।कमलनाथ के इस फैसले के कई अर्थ निकाले जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि कांग्रेस की अल्पमत वाली सरकार कई दबावों और तनावों के बीच झूल रही है। सत्ता के चार बड़े केन्द्र कांग्रेस सरकार के फैसलों को फुटबाल बना रहे हैं। आगामी विधानसभा के सत्र में ये खींचतान सरकार के लिए भारी पड़ सकती है। डाक्टर गोविंद सिंह ने तो पहले शपथ लेने से ही इंकार कर दिया था बाद में जीएडी विभाग लेने पर अड़ गए जिससे लगता है कि सरकार कई धड़ों में बंट गई है।

    हालांकि जो लोग डाक्टर गोविंद सिंह को जानते हैं वे समझते हैं कि लगातार जनता की पैरवी करने वाले डाक्टर साहब ने कभी ओछे दांव नहीं खेले हैं। वे जनहित के मुद्दों पर कई बार अपनी ही सरकार को घेरते रहे हैं। दिग्विजय सिंह सरकार में वे जनता के मुद्दों पर अपनी ही सरकार को खरीखोटी सुनाते रहे हैं।ऐसे में सामान्य प्रशासन विभाग लेने की उनकी जिद के क्या मायने हो सकते हैं। सामान्य प्रशासन विभाग सरकार का प्रमुख विभाग है। इसमें राजभवन सचिवालय,मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग,लोक आयुक्त एवं उप लोक आयुक्त,राज्य निर्वाचन आयुक्त का कार्यालय,मुख्य तकनीकी परीक्षक (सतर्कता),राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो,मध्यप्रदेश मानव अधिकार आयोग, आर.सी.वी.पी.नरोन्हा प्रशासन अकादमी मध्यप्रदेश,मध्यप्रदेश भवन,राज्य सत्कार अधिकारी का कार्यालय,विभागीय जांच आयुक्त कार्यालय,मध्यप्रदेश राज्य सूचना आयोग,अधिनियमों के अधीन गठित मंडल तथा निगम,मध्‍यप्रदेश सिविल सेवा सर्विसेस खेल मण्डल, विभाग के अधीन आने वाली सेवा का नाम,भारतीय प्रशासनिक सेवा,राज्य प्रशासनिक सेवा,मध्यप्रदेश मंत्रालयीन सेवा,राजभवन, मध्यप्रदेश प्रशासनिक अधिकरण, लोक सेवा आयोग, लोक आयुक्त एवं उप लोक आयुक्त, मुख्य तकनीकी परीक्षक, राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो, प्रशासन अकादमी और राज्य निर्वाचन आयोग के कार्यालयों से संबंधित सेवा विषय,आरक्षण प्रकोष्ठ,मानव अधिकार प्रकोष्ठ,पेंशन प्रकोष्ठ,पंच-ज प्रकोष्ठ,स्‍थानान्‍तर प्रकोष्ठ,सूचना का अधिकार प्रकोष्ठ,सुशासन प्रकोष्‍ठ,मुख्‍य सचिव कार्यालय,सत्‍कार कार्यालय जैसी महत्वपूर्ण जवाबदारी होती है।

    डाक्टर गोविंद सिंह को शुरुआती विभाग आबंटन में सहकारिता और संसदीय कार्य विभाग दिए गए थे। वे पहले भी सहकारिता और गृह विभाग संभाल चुके हैं। सहकारिता आंदोलन कांग्रेस की राजनैतिक शैली का प्रमुख औजार रहा है। हालांकि ये भी सच है कि सहकारिता आंदोलन को धराशायी करने में कांग्रेस के कुछ नेताओं ने बड़ी भूमिका निभाई। सहकारिता की आड़ में पनपे माफिया ने इस आंदोलन को शोषण का माध्यम बना दिया जो आगे चलकर जन आक्रोश की वजह बना।आज जब देश पूंजीवाद की राह पर चल रहा है तब सहकारिता के क्षेत्र को आज के संदर्भों में नए सिरे से परिभाषित करने की जरूरत है। ये काम ही अपने आप में इतना विस्तृत है कि इसे संभालने वाला व्यक्ति कोई दूसरा कार्य नहीं कर सकता। ऐसे में डाक्टर साहब को जीएडी जैसा बड़ा विभाग संभालने की जिद क्यों करनी पड़ी।

    इस मुद्दे की तहकीकात करते हुए कई नई बातें सामने आ रहीं हैं। ये तथ्य गौर करने लायक है कि डाक्टर गोविंद सिंह पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के करीबी माने जाते हैं। दिग्विजय सिंह सरकार की असफलता की एक बड़ी वजह उसका पंचायती राज लागू करने का फैसला भी माना जाता रहा है। पंचायती राज के नाम पर दिग्विजय सिंह की सरकार ने सरकारी तंत्र के समानांतर ऐसा ढांचा खड़ा कर दिया था जो निहायत गैर जिम्मेदार था और सरकारी खजाने पर बोझा साबित हुआ था। असामाजिक तत्वों और माफिया ताकतों ने तब कार्यपालिका का लगभग अपहरण कर लिया था। हालात इतने विपरीत हो गए थे कि नौकरशाही ने सरकार से असहयोग शुरु कर दिया और जिसकी परिणति दिग्गी सरकार के पतन के रूप में सामने आई थी। दिग्विजय सिंह सार्वजनिक मंचों पर सरकारी तंत्र को लताड़ते देखे जाते थे। आईएएस अफसर हों या आईपीएस अफसर सभी दिग्विजय सिंह के आक्रोश का शिकार बने। राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसरों की तो कोई बिसात ही नहीं थी। दिग्विजयसिंह की कई बातें तथ्यों पर आधारित भी थीं लेकिन नेता की मंशा को भांपकर कांग्रेसियों ने नौकरशाही को जिस तरह लताड़ना शुरु कर दिया वो असंतोष की बड़ी वजह बना था।

    इस बार डाक्टर गोविंद सिंह ने जिस जिद के साथ सामान्य प्रशासन विभाग की कमान हथियाई है उसके पीछे दिग्विजय सिंह से उनका तालमेल ही प्रमुख वजह माना जा रहा है। प्रशासनिक हलकों में कहा जा रहा है कि डाक्टर गोविंद सिंह के माध्यम से खुद दिग्विजय सिंह अपनी आधी अधूरी मंशा को लागू करना चाहते हैं। पिछले कार्यकाल में वे नौकरशाही पर लगाम लगाने का जो काम पूरा नहीं कर सके थे वो कमलनाथ मंत्रिमंडल में डॉ.गोविंद सिंह के माध्यम से करना चाहते हैं। जाहिर है कि खुद कमलनाथ भी इसी सोच के पक्षधर साबित होंगे। शपथ ग्रहण के बाद कार्यभार संभालने मंत्रालय पहुंचे मुख्यमंत्री ने पहली पत्रकार वार्ता में नौकरशाही पर निशाना साधा था। उनका कहना था कि आज के दौर का नौजवान लालफीताशाही को झेलने तैयार नहीं है। अफसरों को अपना सोच बदलना होगा। कार्यपालिका की जो जवाबदारी है उन कार्यों के लिए यदि कोई नागरिक शिकायत लेकर उनके पास आया तो वे बर्दाश्त नहीं करेंगे।

    भाजपा सरकार के पतन की वजह भी नौकरशाही को ही माना जा रहा है। भाजपा के कार्यकर्ताओं की हमेशा से शिकायत रही है कि अफसर उनकी बात नहीं सुनते। प्रशासनिक सुधारों को लेकर भाजपा ने तमाम चिंतन,मनन और बैठकें की हैं। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अफसरों को शासन व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग मानते थे। इसके बावजूद नौकरशाही के बीच सरकारी खजाने को लूटने की खुली होड़ पनपी वो शिवराज सिंह सरकार की कलंकित प्रशासनिक शैली की वजह बन गई थी। शिवराज सिंह सरकार के अंतिम चार सालों में जनधन खाते और केन्द्र के प्रयासों से योजनाओं का लाभ सीधे हितग्राहियों के खाते में पहुंचाने की व्यवस्था भी हुई लेकिन तब तक प्रशासनिक व्यवस्था इतनी बेलगाम हो चुकी थी कि जन आक्रोश से भाजपा का जनाधार प्रभावित भी हुआ।

    कांग्रेस की अल्पमत वाली कमलनाथ सरकार के सामने असरकारी उपस्थिति दिखाने के लिए बहुत कम समय है। लोकसभा चुनाव सिर पर खड़ा है। कांग्रेस ने चुनाव में वक्त है बदलाव का नारा दिया था। जनता ने उसी बदलाव की आस में उसे सरकार में भेजा है। ऐसे में यदि कार्यपालिका ने असहयोग शुरु कर दिया तो सरकार को लेने के देने पड़ सकते हैं। जाहिर है कि सरकार कार्यपालिका से सीधा टकराव लेने की स्थिति में नहीं है। इसके विपरीत यदि सरकार जनता को जीत का अहसास कराना चाहती है तो उसे नौकरशाही के चंगुल में फंसे पड़े प्रदेश को मुक्त कराना होगा। ये काम सामान्य प्रशासन विभाग को कसे बगैर संभव नहीं होगा। इस विभाग के ज्यादातर फैसले सरकार और मंत्रिपरिषद की जद में होते हैं। जाहिर है कि डाक्टर गोविंद सिंह पर बड़ी जवाबदारी होगी कि वे किस तरह कांग्रेस के सुधारों को लागू करें और अफसरशाही के बीच विद्रोह का भाव भी न पनपने दें। दूध के जले दिग्विजय सिंह के अरमानों की छाछ को फूंक फूंक कर कैसे पिएं। कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के बीच जो विशाल कार्यपालिका का बोझ कांग्रेस की सरकारें लादती रहीं हैं भाजपा ने भी उसमें थोडी़ बहुत वृद्धि ही की है।

    जाहिर है कि कांग्रेस की मौजूदा सरकार के सामने चुनौती है कि वो जनता को अनुत्पादक कार्यपालिका के बोझ से राहत कैसे दिलाए। सरकार ने सत्ता में आते ही पुलिस कर्मियों को एक दिन की छुट्टी का फैसला लागू कर दिया है। ऐसे में उसे आठ हजार पुलिस वालों को तत्काल नौकरी देने की मजबूरी का सामना करना पड़ेगा। पंद्रह सालों से सत्ता से बाहर रहे कांग्रेसी भी सरकार पर दबाव बना रहे हैं कि वो उनके चहेतों को सरकारी नौकरियां दे। जाहिर है कि चाहते हुए भी कांग्रेस की मौजूदा सरकार कार्यपालिका को सुधारने का कोई बड़ा अभियान नहीं चला पाएगी। ऐसे में डाक्टर गोविंद सिंह ने सामान्य प्रशासन विभाग लेकर कार्यपालिका के चक्रव्यूह में घुसने का फैसला तो कर लिया है लेकिन वे इसे कैसे भेदेंगे ये आने वाले समय में ही देखने मिलेगा।

  • तंत्र शास्त्र सामाजिक विकास में सहयोगीःआनंदी बेन

    तंत्र शास्त्र सामाजिक विकास में सहयोगीःआनंदी बेन

    सांची विश्वविद्यालय में तंत्र और श्रीविद्या पर धर्म-धम्म सम्मेलन सम्पन्न

    भोपाल,19 दिसंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने आज रायसेन जिले सांची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय में जारी धर्म-धम्म सम्मेलन के समापन अवसर पर कहा कि तंत्र शास्त्र और श्रीविद्या, भक्ति और ज्ञान का अध्यात्मिक मार्ग है। इस विषय में जनमानस में अल्पज्ञान है, जिसे दूर करने की ज़रूरत है।

    विश्वविद्यालय के निवृतमान कुलपति आचार्य यज्ञेश्वर शास्त्री ने कहा कि तंत्रशास्त्र शोध की दृष्टि से पिछड़ रहा है। इस कॉन्फ्रेंस से शोध को बढ़ावा मिलेगा। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के चेयरमैन प्रो अरविंद पी जामखेड़कर ने कहा कि तंत्र पर केंद्रित इस सम्मेलन से उन्हें इतिहास को देखने की नई दृष्टि मिली है। विश्वविद्यालय के कुलसचिव श्री अदितिकुमार त्रिपाठी ने कहा कि तंत्र शास्त्र का उल्लेख भारतीय, बौद्ध और जैन साहित्य में प्रमुखता से मिलता है। इस मौके पर विश्वविद्यालय के कुलपति श्री मनोज श्रीवास्तव भी उपस्थित थे।

    समापन सत्र के पूर्व दो सामान्य सत्रों में अमेरिका से आए प्रो. देवाशीष बनर्जी ने तंत्र और वेदांत के अंतरसंबंधों पर प्रकाश डालते हुए दोनों की प्रकियाओं एवं उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। ऑस्ट्रिया के प्रो जयेन्द्र सोनी ने शैव सिद्धांत और शिवज्ञानबोध में शक्तिनिपात का उल्लेख करते हुए कहा कि शक्ति के बिना शिव की कल्पना नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि ज्ञान ही शाश्वत सत्य है और गुरु शिव का प्रतिरूप है।

    समापन कार्यक्रम में विश्वविद्यालय द्वारा गोद लिए गए गांव बिलारा के विद्यार्थियों को राज्यपाल ने फल, किताबें और मेडिकल फर्स्ट एड किट्स भेंट की। तीन दिन के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, फिनलैण्ड, बैल्जियम, कोरिया, श्रीलंका एवं नेपाल से 34 विदेशी विद्वान समेत 130 भारतीय विद्वान शामिल हुए। 6 सामान्य सत्र, 9 गोलमेज सम्मेलन और तीन अकादमिक सत्रों में 100 से अधिक शोधपत्र प्रस्तुत किए गए।

  • प्रो. आशा शुक्ला बनी कुलपति

    भोपाल,14 दिसंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। कुलाधिपति और राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने प्रो. आशा शुक्ला, विभागाध्यक्ष, महिला अध्ययन विभाग, बरकतउल्ला विश्वविद्यालय, भोपाल को डॉ. बी.आर. अंबेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय, महू का कुलपति नियुक्त किया है। प्रो. आशा शुक्ला की नियुक्ति कुलपति के पद का कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से पांच वर्ष की कालावधि अथवा 70 वर्ष की आयु, जो भी पूर्वतर हो के लिए की कई है।

    प्रो.शुक्ला लिंगभेद को दूर करने के लिए किए गए अपने विशेष प्रयासों के कारण जानी जाती हैं। उन्होंने विभिन्न सामाजिक विषयों पर कई पुस्तकें भी लिखी हैं और शोधपत्र प्रकाशित किए हैं।

  • समर्थ हैं तो जरूरतमंदों की मदद करें बोलीं राज्यपाल

    समर्थ हैं तो जरूरतमंदों की मदद करें बोलीं राज्यपाल

    भोपाल 7 दिसंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)।राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने कोलार रोड स्थित दिल्ली पब्लिक स्कूल के तृतीय वार्षिक उत्सव में प्रायमरी, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक कक्षाओं में प्रथम आने वाले बच्चों, खेलकूद में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले बच्चों और संगीत के क्षेत्र में विशिष्ट प्रदर्शन करने वाले बच्चों को स्मृति-चिन्ह और प्रशस्ति पत्र प्रदान किये। उन्होंने स्कूल प्रबंधन को राजभवन परिवार के बच्चों को साँची घुमाने के लिये बसे उपलब्ध करवाने, बाल साहित्य प्रदान करने और पढ़े भोपाल में सक्रिय योगदान के लिये धन्यवाद दिया।

    राज्यपाल ने कहा कि हर समर्थवान को जरूरतमंद की मदद करना चाहिये। इसी भावना के साथ बड़े स्कूल छोटे स्कूलों की मदद करें और गरीब बच्चों को आगे लाने का प्रयास करें। उन्होंने कहा कि अगर लोग अपने जन्म-दिन पर स्कूलों में जाकर बच्चों को फल-मिठाई आदि वितरित करेंगे, तो बच्चे तो खुश होंगे ही, उन्हें भी आत्म संतुष्टि मिलेगी।

    कार्यक्रम के प्रारंभ में स्कूल प्रबंधन ने राज्यपाल का स्वागत करते हुए उनके ही फोटो पर ऑटोग्राफ लिये और फूलों का पौधा भेंट किया। स्कूल की छात्रा सुश्री कमलप्रीत कौर ने राज्यपाल को चारकोल से बनाई गई उन्हीं की पेंटिंग भेंट की। कार्यक्रम के दूसरे चरण में स्कूलों के बच्चों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये गये।

    राज्यपाल ने स्कूली बच्चों को बाँटी किताबें और खेलकूद, पेंटिंग की सामग्री

    बच्चों को जब किसी विशिष्ट व्यक्ति के स्नेह और दुलार के साथ-साथ उपहार मिलता है, तो उनमें नई ऊर्जा का संचार होता है और उनके चेहरे की खुशी देखते ही बनती है। ऐसा ही अवसर शा.मा. शाला कुम्हारपुरा के स्कूल के बच्चों के लिये था, जब उन्हें राजभवन में राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने आमंत्रित कर खेलकूद का सामान, चित्रकला सामग्री और बाल साहित्य की किताबें बाँटीं।

    राज्यपाल ने बच्चों से कहा कि हमें अपना हर काम स्वयं करने की कोशिश करना चाहिये क्योंकि इससे आत्मबल बढ़ता है और हम सक्षम बनते हैं। उल्लेखनीय है कि श्रीमती पटेल ने पहले राजभवन में संचालित वर्तमान में कुम्हारपुरा स्कूल को गोद लेकर वहाँ के बच्चों की बेहतरी के लिये काम शुरू किये है। उनके प्रयासों से बैंक ऑफ बड़ोदा के सहयोग से प्राप्त खेल सामग्री, बीएसएनएल के सहयोग से प्राप्त पेंटिंग सामग्री एवं डी.पी.एस. स्कूल के सहयोग से प्राप्त बाल साहित्य बच्चों को भेंट किया गया।

    श्रीमती पटेल ने बच्चों को इण्‍डोर गेम्स कैरम, शतरंज, लूडो, रस्सी, बेडमिंटन और चित्रकला में कलर बुक, पेंटिंग स्टेंड और कलर्स दिये, वही किताबों में प्रेमचंद साहित्य के अलावा अनेक ज्ञानवर्धक किताबें दीं, जिसे पाकर बच्चे प्रसन्न और उत्साहित थे। कुम्हारपुरा स्कूल की 8वीं कक्षा की छात्रा सोनिया ने कार्यक्रम का संचालन किया। उसने कहा कि पहले हम लोगों के पास खेल, चित्रकला, संगीत और कम्प्यूटर जैसा कोई सामान नहीं था। राज्यपाल द्वारा दी गई सामग्री से हम सभी बच्चे खूब खेलेंगे, चित्रकारी करेंगे, संगीत सीखेंगे और स्मार्ट कक्षाओं में पढ़ाई भी करेंगे। इस अवसर पर बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति भी दी। इस मौके पर राज्यपाल के सचिव, उप सचिव और स्कूल प्रबंधन भी उपस्थित था।

  • कुपोषण बांट रहे आधुनिक खेत

    कुपोषण बांट रहे आधुनिक खेत

    अगर डॉक्टर आपको लगातार विटामिन और आयरन की गोलियां खाने को बोल रहे हैं तो गलती आप और डॉक्टर की नहीं उस खाने की है, जिसमें पोषक तत्व लगातार कम हो रहे हैं। पढ़िए खेती में देसी क्रांति
    अरविंद शुक्ला
    लखनऊ। अगर आप अपने पिछले कुछ वर्षों के डॉक्टरों के पर्चे पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि वे दवाओं के साथ विटामिन, जिंक वाली टैबलेट-कैप्सूल भी लिखते हैं, क्योंकि आप जो खाना (शाकाहारी-मांसाहारी) खाते हैं, उसमें ही पोषक तत्व कम हो गए हैं। अनाज में पोषक तत्व कम इसलिए हो गए हैं क्योंकि मिट्टी बेदम हो गई है। इसी कुपोषित मिट्टी में उगी फसल खाकर भारत के लोग पेट तो भर रहे हैं, लेकिन कुपोषित भी हो रहे हैं। “कुपोषण के लिए मिट्टी सीधे तौर पर जिम्मेदार है। पोषण रहित मिट्टी में उगने वाले फल, फूल और अनाज में निश्चित पोषक तत्वों की कमी होगी। यही हाल मांसाहार खाने वालों का है, बकरी हो या दूसरे पशु खाते तो मिट्टी में उगी चीजें हैं, तो उनमें भी डेफिशियेंसी (कमी) पाई जाती है। इसीलिए मेडिकल रिपोर्ट में आयरन, विटामिन, जिंक और दूसरे पोषक तत्वों की कमी होती है, जिसे पूरा करने के लिए डॉक्टर दवाएं लिखते हैं।

    “डॉ. विनय मिश्रा, निदेशक, केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान,लखनऊ कहते हैं। यह सरकारी संस्थान देश में मिट्टी पर शोध और सुधार के लिए जाना जाता है। कुपोषण भारत के साथ ही दुनिया के लिए गंभीर समस्या है। भुखमरी और कुपोषण पर आई ‘स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रीशन इन द वर्ल्ड, 2017′ के मुताबिक दुनिया भर में कुपोषित लोगों की संख्या 2015 में करीब 78 करोड़ थी तो 2016 में यह बढ़कर साढ़े 81 करोड़ हो गई। दुनिया के कुपोषित लोगों में से 19 करोड़ लोग भारत में रहते हैं। यानि की कुल आबादी के करीब 14 फीसदी लोग कुपोषण से जूझ रहे हैं। चिंताजनक ये है कि भारत में 0-5 साल तक के 38 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। भरपूर पोषक तत्व न मिलने का असर न सिर्फ उनके शारीरिक विकास पर पड़ता है, बल्कि मानसिक और पढ़ाई-लिखाई पर साफ नजर आता है। कुपोषण के कलंक से निपटने के लिए सरकार ने 2018 में तीन साल के लिए 9046.17 करोड़ रुपए से पोषण मिशन शुरुआत की है। सितंबर 2018 को पोषण माह के रूप में मनाया जा रहा है। देश के कई मंत्रालय, विभाग और संस्थाएं इसमें शामिल हैं, लेकिन कृषि नहीं है, जबकि कुपोषण का सीधा वास्ता खेत से है।

    पोषण रहित मिट्टी में उगने वाले फल, फूल और अनाज में पोषक तत्वों की कमी तो होगी ही। यही हाल मांसाहार खाने वालों का है, बकरी हो या दूसरे पशु खाते तो मिट्टी में उगी चीजें हैं, तो उनमें भी कमी पाई जाती है। इसीलिए मेडिकल रिपोर्ट में आयरन, विटामिन, जिंक और दूसरे पोषक तत्वों की कमी होती है, जिसे पूरा करने के लिए डॉक्टर दवाएं लिखते हैं। डॉ.विनय मिश्रा, निदेशक, केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, लखनऊ मिट्टी की तुलना मानव शरीर से करते हुए अहमदाबाद में रहने वाले पारंपरिक देसी वनऔषधियों के जानकार और वैज्ञानिक डॉ. दीपक आचार्य कहते हैं, “हम लोग अक्सर पहली बारिश के बाद मिट्टी से आने वाली खुशबू की बात करते हैं, ये खुशबू मिट्टी में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीव (एक्टीनो मायसिटीज़) की वजह से आती है। पहली बारिश पर आने वाली मिट्टी की सौंधी सुगंध शहरों से नदारद होने लगी है, और तो और अब गाँवों की मिट्टी से भी असल सौंधी सुगंध कम होने लगी है।” वो आगे बताते हैं, “ये सूक्ष्मजीव एंटीबॉयोटिक होते हैं और मिट्टी में रहते हुए कई तरह से फसलों की रक्षा करते हैं। कई देहाती इलाकों में बुजुर्ग जानकार तो मिट्टी की सौंधी सुगंध को ही मिट्टी की ताकत मानते हैं।

    खेत खलिहानों में कीटनाशकों के ताबड़तोड़ प्रयोगों ने इन्हें खत्म कर दिया है। नतीजतन अब पौधों में बीमारियां भी ज्यादा लगती हैं, उन्हें बचाने के लिए किसान ज्यादा कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं। जिसका सीधा असर हमारे शरीर पर भी होता है।” इंडियन फूड कंपोजिशन टेबल 2017 रिपोर्ट के शोधकर्ताओं ने देश के 6 अलग-अलग स्थानों से लिए गए 528 खाद्य पदार्थों में से 151 पोषक तत्वों को मापा था। जिसके अनुसार इन 28 वर्षों में गेहूं में गरीब 9 फीसदी कार्बोहाइड्रेट घटा है, जबकि गरीबों के भोजन में ये 8.5 फीसदी कम हुआ। वर्ष 2017 में आई राष्ट्रीय पोषण संस्थान हैदराबाद (एनआईएन) की रिपोर्ट बताती हैं कि पिछले तीन दशकों में खाद्य पदार्थों में पौष्टिक तत्वों की मात्रा तेजी से कम हुई है। एनआईएन ने खाने में पोषक तत्वों को लेकर करीब 28 साल बाद आंकड़े जारी किए थे। इंडियन फूड कंपोजिशन टेबल 2017 रिपोर्ट के शोधकर्ताओं ने देश के 6 अलग-अलग स्थानों से लिए गए 528 खाद्य पदार्थों में से 151 पोषक तत्वों को मापा था। जिसके अनुसार इन 28 वर्षों में गेहूं में गरीब 9 फीसदी कार्बोहाइड्रेट घटा है, जबकि गरीबों के भोजन में ये 8.5 फीसदी कम हुआ। गैर सरकारी संस्था डाउन टू अर्थ में छपी खबर के मुताबिक, भारत ही नहीं, दुनियाभर में खाद्य पादर्थों में पोषण का स्तर कम हुआ है। वर्ष 2004 में जर्नल ऑफ द अमेरिकन कॉलेज ऑफ न्यूट्रीशन में प्रकाशित शोध में शोधकर्ताओं ने 1950 से 1999 के बीच उगाई जाने वाली 43 फसलों का अध्ययन किया था। इन फसलों में छह जरूरी पोषक तत्व कैल्शियम, प्रोटीन, आयरन, फॉस्फोरस, राईबोफ्लेविन और एस्कोर्बिक एसिड पहले की तुलना में कम मिले थे। केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान,लखनऊ में मिट्टी के साथ अनाज और भूसे पर भी टेस्ट किए जा रहे हैं, जिसमें पोषक तत्व कम मिल रहे हैं। फोटो-गांव कनेक्शन केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान,लखनऊ के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. विनय मिश्रा कहते हैं, “देश को जब आजादी मिली उस दौरान मिट्टी में सिर्फ नत्रजन (नाइट्रोजन) की कमी थी, लेकिन आज जो मिट्टी की जांच हो रही है, उसमें जिंक, फास्फोरस और निकिल सब की कमी नजर आ रही है। हरित क्रांति के बाद भरपूर अन्न होना गर्व की बात थी, लेकिन अब हमें इस समस्या से निपटना होगा। असंतुलित रसायनों और कीटनाशकों के उपयोग ने कई समस्याएं खड़ी कर दी हैं।’ अच्छी और पोषित पैदावार के लिए किसी फसल को 17 पोषक तत्वों की जरूरत होती है। भारत की पारंपरिक खेती प्राकृति गोबर और फसल चक्र पर आधारित थी, हरित क्रांति के बाद खेतों में नाइट्रोजन, डीएपी और कीटनाशकों के सहारे खेती होने लगी। अति दोहन से उपजाऊ जमीनों में पोषक तत्व कम ( Micronutrient Deficiency in Soils ) हुए और जमीन में हानिकारक तत्व शामिल हुए। केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान लखनऊ की अपनी प्रयोगशाला में अब मिट्टी के साथ ही गेहूं, धान और सरसों के पौधे, बीज और भूसे पर भी प्रशिक्षण किया जा रहा है, ताकि उसमें पाए जाने वाले पोषक तत्वों का पता चल सके। रिपोर्ट ये बताती हैं कि अनाजों में जिंक समेत कई पोषक तत्व कम हुए हैं। संस्थान के निदेशक डॉ. विनय मिश्रा आगे कहते हैं, “खेतों में जैविक खादें, कंपोस्ट (गोबर खाद) डालना तो कम हुआ है। किसानों ने फसल चक्र अपनाना छोड़ा, इतना ही नहीं अब फसल काटने के बाद किसान फसल अवशेष में आग लगा देते हैं, ये बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी गाँव को लूटने के बाद उसे फूंक देना।” देसी खेती और रसायनमुक्त खेती को बढ़ावा देने वाले लोग पुराने ढर्रे पर खेती करने, देसी बीजों का इस्तेमाल करने और गाय-गोबर आधारित खेती को ही विकल्प बताते हैं।

    मध्य प्रदेश के कृषि प्रसार अधिकारी और देश भर में घूम-घूम कर देसी अनाजों की किस्मों के संरक्षण में जुटे बीएस बारचे कहते हैं, “हमारे देश में अब अनाज तो खूब हो रहा है, लोगों को खाना भी मिल रहा है, लेकिन अनाज से लेकर दूध तक हम जो खाते-पीते हैं उनमें पोषक तत्व नहीं है। इसीलिए देश की बड़ी आबादी भरपूर खाने के बाद भी बीमारियों और कुपोषण से ग्रसित है। मोटे अनाज पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं अब सरकार इनको बढ़ावा दे रही है। वर्ष 2018 को मोटे अनाज के वर्ष के तौर पर मनाया जा रहा है।” दुनिया में खाने योग्य करीब 400 प्रजातियां हैं, जिन्हें बतौर खाद्य विकल्प देखा जाना चाहिए, लेकिन मुश्किल से 15-20 तरह के अन्न (धान, गेहूं आदि) को ही हम सदियों से उगाते आएं हैं, खाते आए हैं। खाने की मांग को देखते हुए नए संसाधन तलाशने होंगे। फसल चक्र अपनाने होंगे ताकि मिट्टी की उर्वरकता बरकरार रहे। मिट्टी पोषित होगी तो हम पोषित होंगे।- डॉ. दीपक आचार्य, देसी वनऔषधियों के जानकार और वैज्ञानिक पोषण विज्ञान में यूजीसी की सीनियर रिसर्च फ़ेलोशिप द्वारा डॉक्टरेट और आहार सलाहकार तनु श्री सिंह कहती हैं, “कुपोषण की समस्या तेजी से बढ़ी है क्योंकि आहार की संरचना (कंपोजिशन ऑफ डाइट) में बदलाव आया है और खाने-पीने की चीजों में पोषकता कम हुई है।” कुपोषण (Malnutrition) से निपटने के लिए क्या कैप्सूल ही काम आएंगे या दूसरे विकल्प हैं? इस सवाल के जवाब में डॉ. दीपक आचार्य कहते हैं, “दुनिया में खाने योग्य करीब 400 प्रजातियां हैं जिन्हें बतौर खाद्य विकल्प देखा जाना चाहिए, लेकिन मुश्किल से 15-20 तरह के अन्न को ही हम सदियों से उगाते आएं हैं, खाते आए हैं। धान, गेहूं, मक्का, बाजरा, ज्वार जैसी फसलों को ही लगातार उगाया जाता रहा है। जरूरत है फसल चक्र अपनाए जाने की। खाने की मांग को देखते हुए नए संसाधन तलाशने होंगे। फसल चक्र अपनाने होंगे ताकि मिट्टी की उर्वरकता बरकरार रहे.. मिट्टी पोषित होगी तो हम पोषित होंगे।”

    डॉ.विनय मिश्रा, निदेशक, केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, लखनऊ, मिट्टी के बारे में बताते हुए। (तस्वीर में बाएं) कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग रोकने और मिट्टी की सेहत (soil health) सुधारने के लिए वैसे तो कई योजनाएं चल रही हैं लेकिन साल 2015 में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने राष्ट्रीय मृदा स्वास्थ कार्ड योजना शुरू की। जिसके तहत किसानों की खेत की मिट्टी की जांचकर उन्हें मिट्टी की हालत बतानी हैं। “मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, किसानों और अनाज खाने वालों सबके लिए बहुत उपयोगी है। क्योंकि इसमें बताया जा रहा है कि उनके खेत में क्या कमी है और खाद-उर्वरक किस अनुपात में डालनी है। इसके परिणाम सामने आ रहे हैं। इसके साथ ही आईसीएआर और उसकी सहयोगी संस्थाएं अनाज और फल सब्जियों की ऐसी किस्मों भी विकसित कर रही हैं जो पोषण से भरपूर हैं। “डॉ. विनय बताते हैं।

  • बच्चों की सुरक्षा में सचेत रहेंः राघवेन्द्र शर्मा

    मध्यप्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग में हुई विस्तृत चर्चा

    भोपाल,28 सितंबर(करुणा राजुरकर)। स्कूली बच्चों की सुरक्षा के विषय पर म.प्र. राज्य बाल आयोग ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के सहयोग से समन्वय भवन में आज एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया। कार्यशाला में विषय प्रवर्तन करते हुए म.प्र. बाल आयोग के अध्यक्ष श्री राघवेन्द्र शर्मा ने कहा कि आयोग का प्रमुख कार्य आर.टी.ई. तथा किशोर न्याय अधिनियम और लैंगिक अपराधों पर कारवाई करना है। उन्होंने नियमों के पालन में व्यवहारिक कठिनाईयों का उल्लेख करते हुए कहा कि मौलिक अधिकारों का हनन आपराधिक श्रेणी में आता है। श्रम कानून के हिसाब से 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे से काम करवाना अपराध है। नये चाइल्ड लेबर एक्ट में 14 वर्ष की उम्र के बाद बच्चे को कौशल विकास का प्रशिक्षण दिया जा सकता है। अत: इन सारे विराधाभासों को दूर करते हुए तथा म.प्र के सभी विभागों में बच्चों को लेकर जो भी नियमावली है, उन्हें एकजाई कर नये नियम बनाये जाने और उनकी मॉनिटरिंग बाल आयोग द्वारा किये जाने की आवश्यकता है।

    ए.आई.जी. सायबर क्राइम श्री सुधीर गोयनका ने प्रदेश के विद्यालयों से आये प्राचार्यों और प्रबंधकों को वाट्सएप, इंटरनेट के माध्यम से बच्चों द्वारा जाने-अनजाने में किये जा रहे अपराधों के बारे में जानकारी देते हुए उन्हें सचेत रहने के लिये कहा। उन्होंने बताया कि 13 वर्ष की उम्र से बच्चा अपना फेसबुक प्रोफाइल और 18 वर्ष के बाद ई-मेल आई डी बना सकता है। उन्होंने डिजीटल फुटप्रिंट को मैनेज करने के लिये विवेकपूर्ण इस्तेमाल करने की सलाह भी दी। एक महत्वपूर्ण बात उन्होंने प्रशिक्षार्णियों को यह भी बताई कि हमें अपने हर खाते का पासवर्ड ऐसे ही अलग रखना चाहिये, जैसे हर कमरे का एक ताला और चाबी रखते हैं।

    राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के तकनीकी विशेषज्ञ श्री रजनीकांत ने तैयार की जा रही नियमावली के महत्वपूर्ण बिंदुओं पर प्रकाश डाला और सुझाव भी आमंत्रित किए। उन्होंने बच्चों की सुरक्षा एवं अन्य समस्याओं के समाधान के लिये शिकायत पेटी लगाने के साथ-साथ स्कूल की संरचना, प्रबंधन सेनीटेशन जैसी सुविधाओं पर विशेष ध्यान देने की जरूरत बताई। उनका मानना था कि बच्चों को 5वीं कक्षा के पश्चात् ही कम्प्यूटर शिक्षा दी जानी चाहिये। उन्होंने बस्ते का बोझ घटाने के लिये किये जा रहे नवाचारों की भी चर्चा की।

    कार्यशाला के समापन पर प्रशिक्षणार्थियों ने बच्चों की शिक्षा-सुरक्षा और अन्य मुद्दों पर महत्वपूर्ण सुझाव दिये। इस अवसर पर बाल आयोग के सदस्य श्री आशीष कपूर, रवीन्द्र मोरे, सचिव श्रीमती शुभा वर्मा, जिला शिक्षा अधिकारी श्री धमेन्द्र शर्मा, राज्य शिक्षा केन्द्र के श्री रमाकांत तिवारी विशेष रूप से उपस्थित थे।

  • समलैंगिकता से आजादी के दाग कैसे धुलेंगे

    समलैंगिकता से आजादी के दाग कैसे धुलेंगे


    -डॉक्टर अरविन्द जैन-

    आज भारत के इतिहास में गौरव पूर्ण दिन हैं जिसमे सुप्रीम कोर्ट ने समलैंकिता को पूरी तरह से मान्यता दे दी. धारा377 को हटा दिया हैं जिससे अब पुरानी मान्यताओं को समाप्त कर दिया हैं .इसका तात्पर्य अब समान लिंग के पुरुष और महिलाये बेफिक्र होकर शारीरिक सम्बन्ध बना सकती /सकते हैं . हमारी समाज में तीन प्रकार के लोग होते हैं आदरणीय /महानुभाव /गणमान्य .इसका मतलब समाज देश परिवार में गणमान्यों को अधिक इज़्ज़त मिलेगी ! ये कैसा न्याय व्यवस्था हैं .जिस मुद्दे पर सरकार को बचाव करना था वहां चुप्पी साधी और जिस पर कोर्ट ने आदेश दिया उसको उलट दिया .
    मनुष्य का जन्म उसके अधीन नहीं हैं .उसका जन्म एक दुर्घटनाजन्य घटना हैं .उसका जन्म उसके मुताबिक नहीं होता .जन्म विकृति का सूचक हैं .कारण प्रकृति एक स्वाभाविक क्रिया हैं .प्रकृति (नेचर )और स्वभाव (हैबिट )में अंतर होता हैं .प्रकति का बदलना असंभव और स्वभाव स्थितिजन्य परिवर्तनशील हैं ,इसलिए हमारा जन्म वैध नहीं हैं ,हम अवैध संतान हैं .जो अपने मन मुताबिक जन्म न ले सके उसे क्या कहेंगे ? हमारा जन्म पिता के गर्भ से नहीं हुआ ,माता के गर्भ से हुआ .इसीलिए माता प्रकृति हैं और पिता विकृति हैं .पर धार्मिक सामाजिक मान्यता इसी पर आधारित हैं .संतान उतपत्ति के लिए नर मादा की आवश्यकता होती ही हैं .चाहे मानव हो या जानवर .जानवर अनचाहे काम वासना की पूर्ती करते हैं पर सन्तानोपत्ति के लिए मादा की जरुरत ही होगी .हां जानवरों में कुछ मर्यादा /सीमायें होती हैं पर मनुष्य विवेकवान होने से जानवर से भी हीन हैं .वर्तमान में कामवासना एक रोग हो गया हैं कामी पुरुष रोगी इसीलिए कामाग्नि को शांत करने के लिए प्राकृतिक और अप्राकृतिक संयोगों को तलाशता फिरता हैं .अप्राकृतिक संयोग एक अपराध के साथ अधार्मिक और असामाजिकता हैं .रोग के लिए हीनयोग, अतियोग और मिथ्या योग होता हैं जैसे वर्षा ऋतू में कम वर्षा होना ,या अतिवर्षा होना या वर्ष में ठण्ड या गर्मी पड़ना .ये रोगी होने के लक्षण हैं या रोग होने के .
    आज समलैंगिकता पर बहस चल रही हैं न्यायालय में कोई भी जीते या हारे .तर्क बहुत होते हैं अंतहीन होते हैं और विवाद का अंत सुखद नहीं होता हैं .एक सत्य होता हैं और असत्य के अनेकों लिए विवाद और तर्क की जरुरत होती हैं .समलैंगिकता का अर्थ नर नर और नारी नारी में संयोग .उनके समर्थको से जानना चाहता हूँ की क्या वे अपने परिवार में इस धारणा को स्वीकार करेंगे ?क्या वे अपने माँ पिता भाई बहिनो में इस प्रकार के प्रेम या बंधन को स्वीकार करेंगे ?इस प्रकार के बंधन की जीवन रेखा कितनी होती हैं या होगी ? क्या आजतक किसी भी साहित्य में स्त्रियों के समान पुरुषों के सौंदर्य का वर्णन किया गया हैं?मात्र काम वासना ही एकपक्ष हैं या सन्तानोपत्ति .यदि संतान चाहिए हैं तो स्त्री का होना अनिवार्य हैं .बिना स्त्री के संतान उत्पत्ति नहीं हो सकती ,स्त्री का अंतिम सुख उससे शिशु होने से और उसके द्वारा स्तनपान कराने में जो सुखानुभूति होती हैं क्या वह नारी नारी के साथ संभव हैं .? पुरुष पुरुष में कितना सुख की अभिलाषा पूर्ण हो सकती हैं ?
    उस समलैंगकिता वाले युगल से यह जानना चाहता हूँ कि समाज में वे स्वयं स्थापित हो सकते हैं या यदि उनके परिवार का कोई सदस्य उनकी बहिन या भाई को वे सामाजिकता देंगे .उनसे उनके पुत्र या पुत्रियों के जन्म की उम्मीद की जाना बेमानी होगी .क्या वे यदि बहुत बड़े महानगर में रहते हैं अनजान शहर में अपरिचित स्थान पर अपने आपको स्थापित कर सकेंगे और उनको कितना सम्मान आपस में या समाज से मिलेगा .ये सब कल्पना लोक में रहने की बात हैं जमीनी हकीकत का सामना कठिन होता हैं .
    क्या यह सब नैतिकता को स्वीकार्य हैं क्या ये सब करना प्राकृतिक हैं या अप्राकृतिक .ये सब अनुमान वे अपने परिवार और परिवारजनों से नहीं समझ सकते हैं .हमारी समाज ऐसे लोगों को हीन दृष्टि से देखते हैं . कामाग्नि एक अनिवार्यता हैं और एक वय के बाद कोई भी उससे बच नहीं सकता .पहले वह चोरी छिपे कुछ कृत्य करेगा या उनको दबाएगा या बलात्कार करेगा . इसीलिए एक उम्र के बाद शादी विवाह किया जाता हैं .और शादी करना वैध माना जाता हैं से संतान पैदा करना होता हैं जो वैध/अवैध माना जाता हैं सामाजिक व्यवस्थाओं में .अब जब नर नर और नारी नारी का संयोग होगा तो वे कुंठाग्रस्त होकर मानसिक रुग्णता से ग्रसित होंगे .उनको जिस सुख की आकांक्षा होती हैं वह समान प्रकृति में नहीं मिलेंगी .उन्हें विकृति से सुखानुभूति होंगी अन्यथा वे रुग्ण होंगे या अपराधी बन जायेंगे
    हमारे धार्मिक ग्रंथों में इन बातों पर अधिक ज़ोर नहीं दिया गया ,उन ग्रंथों में प्राकृतिक जीवन शैली जीने पर जोर दिया .अब कोई शिखंडी का उदाहरण देकर अपनी बात पर जोर दे रहे हैं पर यह जानना जरुरी हैं की यह यदि प्राकृतिक कृत्य होता तो उन्हें न्यायलय जाने की क्यों जरुरत पड़ती .
    इस बात में कोई तथ्य नहीं हैं की यह उनके मौलिक अधिकारों का हनन हैं .इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं हैं की आप क्या करते हैं कैसे करते हैं और क्यों करते हैं पर यदि वे स्वयं आइना के सामने खड़े हो या अपने परिवार या समाज को उजागर करे तब उनकी स्थिति बहुत सम्मानीय नहीं होगी या वे आबादी नियंत्रण में अपना योगदान दे रहे हैं .
    क्या वे अपने परिवार के सदस्यों को भी बढ़ावा दे रहे हैं या वे चाहेंगे की वे लोग भी समाज में गणमान्य माने जाए आदरणीय को सामाजिक स्वीकृति हैं पर गणमान्य को नहीं .
    दुर्जनम सज्जनं कर्तुरमुपायो न ही भूतले !
    अपानं शतधा धौतं न श्रेष्ठमिनिन्द्रियम भवेत् !!
    ऐसा कोई उपाय नहीं हैं जिससे दुर्जन मनुष्य सज्जन बन सकते हो ,क्योकि गुदा को चाहे सैकड़ों बार धोया जाय फिर भी वह मुख नहीं बन सकती .
    विषयों के पीछे सब भाग रहे हैं
    जिसमे विष हैं उसे चाह रहे हैं
    विष के स्वाद को चखने के बाद
    विषपान ही करना होगा जीवन भर
    न्यायालय से मान्यता मिलने से क्या कोई
    व्यवस्था बदल जाएंगी
    आदरणीय होने में हित हैं
    गणमान्य तिरस्कृत होते हैं और रहेंगे
    डॉक्टर अरविन्द जैन संस्थापक शाकाहार परिषद् A2 /104 पेसिफिक ब्लू ,नियर दी मार्ट होशंगाबाद रोड, भोपाल 462026 मोबाइल 09425006753