Category: भोपाल

  • एक वैभवशाली राष्ट्र के निर्माण में हम सब अपना योगदान दें : विश्वास सारंग

    एक वैभवशाली राष्ट्र के निर्माण में हम सब अपना योगदान दें : विश्वास सारंग

    • राज्य स्तरीय स्व. भुवन भूषण देवलिया पत्रकारिता पुरस्कार से पत्रकार जयराम शुक्ल सम्मानित
    • पत्रकारिता और राष्ट्रवाद पर विद्वानों ने रखे सारगर्भित विचार

    भोपाल। स्व भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यानमाला समिति की तरफ से रविवार को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि के सभा कक्ष में पत्रकारिता और राष्ट्रवाद पर एक विमर्श का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मप्र के चिकित्सा शिक्षा मंत्री विश्वास सारंग थे जबकि अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा ने की। कार्यक्रम में प्रसार भारती बोर्ड के अध्यक्ष जगदीश उपासने, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. केजी सुरेश, भारतीय जनसंचार परिषद नई दिल्ली के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार राजेश बदल ने प्रमुख वक्ता के रूप में अपने ओजस्वी। विचारों से विषय की गम्भीरता को प्रतिपादित किया। जबकि इस विमर्श में विषय प्रवर्तन का कार्य स्वदेश भोपाल के संपादक शिवकुमार ‘विवेक’ ने किया। इस अवसर पर विंध्य क्षेत्र से नाता रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार जयराम शुक्ल को राज्य स्तरीय स्व. भुवन भूषण देवलिया पत्रकारिता पुरस्कार से प्रदेश के चिकित्सा मंत्री विश्वास सारंग ने सम्मानित किया।
    भुवनभूषण देवलिया पत्रकारिता सम्मान का इस वर्ष ग्यारहवां वर्ष था। प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार श्री शुक्ल को सक्रिय और सार्थक लेखन के लिए सम्मान प्रदान किया गया। पुरस्कार स्वरू श्री शुक्ल को 11 का चेक, शॉल श्रीफल के साथ स्मृति चिन्ह भेंट किये गए।
    इस अवसर पर पत्रकारिता और राष्ट्रवाद पर अपने विचार रखते हुए प्रदेश के चिकित्सा मंत्री विश्वास सारंग ने कहा कि जब पत्रकारिता किसी बात को कहती है तो वह नीचे तक जाती है, इसलिए पत्रकार को राष्ट्रवादी होना ही चाहिए। उन्होंने कहा कि हम सब मिलकर एक वैभवशाली राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे, यह समय की मांग और हमारा राष्ट्र प्रेम भी है। श्री सारंग ने कहा कि कोई भी राष्ट्र सही रूप में तब बनता है जब उसका संघीय ढांचा मजबूत हो। इसे बनाने में आंचलिक पत्रकारिता का बड़ा योगदान है। श्री सारंग ने इस बात पर दुःख जताते हुए कहा कि आजादी के पचहत्तर साल बाद भी हमें यदि राष्ट्रवाद पर चर्चा करनी पड़े तो यह सोचनीय है। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद तो कारखाना निर्माण और पुल निर्माण की बात तो होती रही पर व्यक्ति निर्माण पर किसी ने चर्चा नहीं की। उन्होंने इस बात पर संतोष जाहिर करते हुए कहा कि स्व भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यानमाला समिति ने जो आज विषय रखा है वह प्रासंगिक है। समिति निरन्तर यह आयोजन कर रही है जो सराहनीय है। श्री सारंग ने कहा कि उनकी अपने जीवन में कभी देवलिया जी से भेंट नहीं हुई लेकिन उनके शागिर्दों से बहुत तारीफ़ सुनी है। ऐसे योग्य गुरु और काबिल पत्रकार नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करते हैं, श्रेष्ठ कार्य के लिए उनके प्रेरक भी बनते हैं। ऐसी विभूति को नमन करता हूं। श्री सारंग ने शुरुआत में स्व भुवन भूषण देवलिया जी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की।

    वर्तमान पत्रकारिता में राष्ट्रबोध का संकट : उपासने

    विचार गोष्ठी को ऑनलाइन सम्बोधित करते हुए प्रसार भारती बोर्ड के अध्यक्ष जगदीश उपासने ने कहा कि राष्ट्र के प्रति प्रेम और ईमानदारी का भाव हो तभी पत्रकारिता सार्थक हो सकती है और तभी लोकतांत्रिक व्यवस्था भी सफल रहेगी। श्री उपासने ने कहा कि बहुत से लोगों को लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आने के बाद राष्ट्रवाद बढ़ गया है, जबकि ऐसा नहीं है। यह राष्ट्रवाद नहीं बल्कि राष्ट्रबोध कहा जा सकता है, जिसका संकट पत्रकारिता में दिख रहा है। किसी भी राष्ट्र के पत्रकार हो या निवासी उनमें राष्ट्रबोध तो होना ही चाहिए। 2013 की एक घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्रबोध नीचे के स्तर से ही नही ऊपर के स्तर से ही गायब है। श्री उपासने ने कहा कि जो लोग समन्वयवादी संस्कृति की बात करते हैं वह कहीं नहीं है, यह बात सिर्फ भारत में होती है जबकि हम समन्वयवादी नहीं हैं पर सब को स्वीकार कर लेते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि सात हजार पुरानी हमारी संस्कृति है तो यह बोध किसको आएगा। श्री उपासने ने जोर देते हुए कहा कि यदि जब तक एक भी व्यक्ति जीवित रहेगा हमारा भारत और हमारी संस्कृति जीवित रहेगी। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र का आनन्द यही है कि आप विरोध तो करें पर किसी का मजाक न बनाएं। पत्रकारिता के पक्षधर होने पर कड़ी आपत्ति जताते हुए प्रसार भारती बोर्ड अध्यक्ष ने कहा कि जिनका काम ही सही सूचना देना है वह स्वयं ही अज्ञानी हैं। श्री उपासने ने पत्रकारों को सलाह देते हुए कहा कि अपनी विचारधारा को सिर्फ सम्पादकीय पेज पर जगह दें, पर समाज में मतभेद पैदा न करें।

    पत्रकारिता राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत होनी चाहिये : प्रो. सुरेश

    पत्रकारिता और राष्ट्रवाद पर अपने विचार व्यक्त करते हुए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति केजी सुरेश ने कहा कि पत्रकारिता किसी विचारधारा की नहीं होनी चाहिए बल्कि पत्रकारिता राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत होनी चाहिए। बालकोट हमले का जिक्र करते हुए सुरेश प्रोफेसर सुरेश ने कहा कि कुछ ऐसे विषय पर हमें अपनी सरकार पर विश्वास करना ही चाहिए, न कि किसी दूसरे देश की सेना के प्रवक्ता और या दूसरे राष्ट्र के समाचार पत्रों पर, यह हमारा राष्ट्र प्रेम नहीं है । 1971 के युद्ध का जिक्र करते हुए प्रोफेसर सुरेश ने कहा कि उस समय पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के दो टुकड़े इसलिए कर दिए थे क्योंकि संपूर्ण राष्ट्र उनके साथ था और यही राष्ट्रवाद है। प्रो. सुरेश ने कहा कि राष्ट्रवाद को इतिहास के पन्नों में गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया। उसे नाजीवाद और फासीवाद की तरह संकुचित तरीके से जनता के सामने प्रस्तुत किया गया। उन्होंने कहा कि भारत के अलग-अलग जगहों, मठ-मंदिरों या अन्य स्थानों में जो विभिन्न प्रकार की संस्कृति दिखाई देती है, वही हमारा राष्ट्रत्व है और वही भारत का राष्ट्रबोध है। यूक्रेन का जिक्र करते हुए विपक्षी दलों के बयान को हास्यास्पद करार देते हुए प्रो. सुरेश ने कहा कि आप इसलिए विरोध कर रहे कि एक व्यक्ति या दल आपको पसंद नहीं है। वहां फंसे भारतीयों को लेने कोई मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री नहीं जाएंगे, पर सरकार ने अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए 4 मंत्री भेजे हैं, जो लोगों को सुरक्षित निकालकर ला रहें। उन्होंने कहा कि सरकार की आलोचना राष्ट्र विरोध नहीं है पर वह परिस्थितियों पर निर्भर होनी चाहिए

    75 सालों में हम अपना राष्ट्र चरित्र नहीं बना पाए : बादल

    पत्रकारिता और राष्ट्रवाद विषय पर व्याख्यान माला को सम्बोधित करते हुए राज्यसभा टीवी के पूर्व निदेशक एवं वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने कहा कि मुझे यह कहते हुए अफसोस हो रहा है कि इन 75 सालों में हम अपना राष्ट्र चरित्र नहीं बना पाए। श्री बादल ने कहा कि यदि हम देश के प्रति ईमानदार नहीं हैं तो हम राष्ट्रद्रोही हैं। उन्होंने कहा कि एक हजार साल से हमारा हिंदुत्व खतरे में नहीं था पर इस सियासी पुट का नतीजा है। उन्होंने कहा कि सियासत ने हमें बांट दिया है, कोई भी दल इसमें कम नहीं है। सब अपने-अपने स्वार्थ के लिए इस तरह के प्रपंच रच रहे हैं। श्री बादल ने कहा कि सियासतदानों ने इसे धंधा बना दिया है। स्व भुवन भूषण देवलिया का जिक्र करते हुए श्री बादल ने कहा कि वह राष्ट्रप्रेम करते थे और अन्य सभी में भी राष्ट्रप्रेम जगाते थे। स्व. आज हर पत्रकार के ह्रदय में विराजमान हैं। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता देश का चौथा स्तम्भ है, यह बड़ी जिम्मेदारी उस समय हमें बुजुर्गों ने दी है, उसे हमें पूरी ईमानदारी से निभाना है।

    यह विभाजनकारी ताकतों को उखाड़ फेंकने का समय : प्रो. द्विवेदी

    पत्रकारिता और राष्ट्रवाद विषय पर व्याख्यान माला में प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा कि हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं। यह समय विभाजन करने वाली ताकतों को पूरी तरह से उखाड़ फेंकने का संकल्प लेने का समय है। उन्होंने कहा कि आजादी के समय हमारे नायको और पत्रकारों की लड़ाई स्वराज की थी। आज देश को जोड़ें रखने वाली शक्ति के सामने यह एक बड़ी चुनौती है। जो स्थान-स्थान पर संघर्षों को हवा दे रहे हैं उनको पहचानने की जरुरत है। प्रो. द्विवेदी ने सवाल उठाते हुए कहा कि हिंदुस्तान में क्या सब कुछ गलत ही हो रहा है। इस षड्यंत्र के कर्ताओं को देखिए किस तरह तिल का ताड बना रहे हैं। मानवता विरोधी विचार हमारे संकट को बढ़ा रहे हैं। उन्होंने कहा कि हम किसी एक विचार, धर्म या पंत को मानने वाले नहीं है। हम भारत को जाने, उसे बनाएं, छोटी-छोटी बातों पर लड़कर उसे महान नहीं बनाएं बल्कि समाज को तोड़ने की जगह जोड़ने वाले तथ्य को लेकर चलना होगा। प्रो. द्विवेदी ने कहा कि भारत बोध का जागरण ही एकमात्र मंत्र है। अनादि काल से जो हमारी शक्ति रही है उसे भारत पर विश्वास रहा है। मीडिया को इस देश की एकता व बहुलता को स्थापित करना होगा, यही हमारा राष्ट्रवाद है क्योकि पत्रकारिता समाज से जुड़ा विषय है। उन्होंने कहा कि पत्रकारों की पॉलिटिकल लाइन तो होनी चाहिए पर पार्टी लाइन नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय जीवन की लोक चेतना ही हमारी मूल चेतना है। मीडिया राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दें।

    मीडिया समाज में घोल रहा जाति का जहर : शर्मा

    व्यख्यान माला की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा ने कहा कि आजादी के पहले और बाद की पत्रकारिता में बड़ा अंतर आ गया है। आजादी के समय का एक भी अखबार या पत्रिका आज प्रकाशित नहीं हो रही है। उन्होंने कहा कि 1807 में अंग्रेजों ने देश और समाज को बांटने का जो कार्य किया था आज समाज उसी से जकड़न में पूरी तरह फंस गया है। उन्होंने कहा कि आज पत्रकारिता देश को जाति के नाम पर बांटने का काम कर रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि जो अंग्रेजों और मुगलों के प्रिय रहे सिर्फ वही हमारे पाठ्यपुस्तक का हिस्सा क्यों रहे हैं। श्री शर्मा ने कहा कि भारत में जाति प्रथा नहीं थी, बल्कि वर्ण व्यवस्था थी। अंग्रेजों ने हमारी परंपरा को नुकसान पहुंचाने के लिए देश में जातिगत जहर घोलने का काम किया जिसकी शिकार पत्रकारिता भी हो गई। उन्होंने कहा कि वैभव के कारण ही हमारा देश सोने की चिड़िया कहलाता था। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को भीड़ के साथ राष्ट्रवाद को जगाकर चलना होगा।

    पत्रकारिता राष्ट्रबोध की प्रखर अभिव्यक्ति थी : विवेक

    व्याख्यानमाला में विषय प्रवर्तन करते हुए स्वदेश के संपादक शिवकुमार विवेक ने कहा कि यह वास्तव में आंचलिक पत्रकारिता का सम्मान है। उन्होंने कहा कि आंचलिक पत्रकारिता का स्वरूप बढ़ रहा है। उस समय चौपाल ही पत्रकारिता की कक्षा होती थी। श्री विवेक ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन का फलसफा ही राष्ट्रवाद था। पत्रकारिता राष्ट्रबोध की प्रकार अभिव्यक्ति थी। उन्होंने कहा कि अंग्रेज एक साम्राज्यवादी सत्ता के बोधक थे। वह हमारी संस्कृत और व्यवस्था को खराब कर कर रहे थे। आज भी राष्ट्रवाद की जरूरत है। हमारी भाषा पर आज भी अतिक्रमण है, ऐसे में हमारी पत्रकारिता ही परे चले जाए तो सोचने की जरूरत है।
    कार्यक्रम में स्व. देवलिया की धर्मपत्नी श्रीमती कीर्ति देवलिया भी उपस्थित हुईं। कार्यक्रम में सतीश एलिया, आशीष देवलिया, डा अर्पणा और राजीव सोनी ने अतिथियों का स्वागत किया। संचालन आदित्य श्रीवास्तव ने किया। अंत में भुवनभूषण देवलिया स्मृति व्याख्यान माला समिति के सदस्य अशोक मनवानी ने आभार व्यक्त किया।कार्यक्रम में स्मारिका का विमोचन मंत्री श्री सारंग और अन्य अतिथियों ने किया।

  • सात दशकों बाद साकार हुआ भोपाल विलीनीकरण का स्वप्न

    सात दशकों बाद साकार हुआ भोपाल विलीनीकरण का स्वप्न


    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भाजपा सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से देश की तस्वीर बदलने का जो अभियान चलाया है उससे एक नया भारत खड़ा होने लगा है। दंभ से भरी नेहरू सरकार ने आजादी के बाद देश में बड़े कारखाने, बड़े बांध और बड़े वित्तीय संस्थान तैयार करने की नीति अपनाई थी। उस वक्त समझा जाता था कि बड़े प्रतिष्ठानों से रिसकर पूंजी का प्रवाह देश के निचले तबके तक पहुंचेगा। धीमी रफ्तार के इस विकास को गति देने के लिए श्रीमती इंदिरागांधी ने सार्वजनिक उपक्रमों और सरकारी संस्थानों के माध्यम से पंचवर्षीय योजनाएं लागू कीं। जब ये नीति मुंह के बल गिरी और भारी भ्रष्टाचार ने जनता का जीवन दूभर कर दिया तो श्रीमती गांधी के इंस्पेक्टर राज ने छापेमारी करके सुशासन लागू करने का अभियान चलाया। ये भी बुरी तरह असफल हुआ और देश लगभग पचास साल पीछे सरक गया। प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव की सरकार ने नई आर्थिक नीतियां लागू करके नेहरू गांधी परिवार की गलतियों को सुधारने का क्रांतिकारी फैसला लिया। नतीजे अच्छे आए लेकिन डाक्टर मनमोहन सिंह की सरकार उन आर्थिक सुधारों को लागू नहीं कर पाई। इसकी वजह कांग्रेसियों का वो मानस था जो कल्याणकारी राज्य की ठगनीति से इतर कुछ और नहीं देखना चाहता था। अटल बिहारी की सरकार ने देश के गांवों को सड़कों सेजोड़ने का भगीरथ किया। इसके बाद बेरोजगारी की जो तस्वीर सामने आई उसे देखकर सरकारें हिल गईं। मोदी सरकार ने बड़े औद्योगिक घरानों का खजाना भरने के स्थान पर गांव स्तर तक पूंजी का प्रवाह खोलने के कई अभियान चलाए हैं। नए एलईडी मोदी बल्ब से देश को रोशन करने ,गांवों को खुले में शौच से मुक्ति, कचरे वाले को घरों तक पहुंचाने के अभियानों की सफलता के बाद अब प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से पूंजी का प्रवाह समाज के अंतिम छोर तक पहुंचाने का चमक्तारिक प्रयास सफल बनाया है।
    राज्य सरकारों ने मोदी सरकार के इन अभियानों को अपने अपने अंदाज में लागू किया है। मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार ने लगभग एक लाख हितग्राहियों को प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ देकर शहरों और गांवों में रंग भरने में सफलता पाई है। गांव गांव तक आवास योजना में श्रमिकों को तो काम मिल ही रहा है साथ में लोगों को अपने मकानों को सुविधाजनक बनाने का अवसर भी मिलने लगा है। शिवराज सिंह चौहान सरकार ने इस बदलती तस्वीर को स्थानीय जरूरतों और पहचानों से जोड़कर अभियान की सफलता को नया स्वरूप दिया है। भोपाल की बदलती तस्वीर ने उन अरमानों को साकार किया है जिन्हें विलीनीकरण के बाद से भोपाल के जनमानस ने अपने दिलों में संजोकर रखा था। अंग्रेजों की सरकार ने जब भारत को आजादी देने का मन बनाया तो उसने धर्म के आधार पर फूट के बीज भी बो दिए थे। पाकिस्तान के विभाजन को तत्कालीन शासकों ने न केवल स्वीकार किया बल्कि पाकिस्तान परस्ती की ज़ड़ों में मट्ठा डालने के बजाए उन्हें पालने पोसने की नीति भी अपना ली। पंडित जवाहर लाल नेहरू का ध्वज जिस तरह जिन्ना के सामने झुका रहा उसकी वजह से नेहरू को लगता था कि यदि उन्होंने पाकिस्तान के प्रति प्रेम रखने वाले नवाबों और रिसायतों पर जोर जबर्दस्ती की तो वे विद्रोह भी खडा कर सकते हैं। यही वजह थी कि जब सारा हिंदुस्तान आजादी के गीत गा रहा था तब भोपाल के नवाब खुद को पाकिस्तान के साथ जोड़े जाने की रट लगाए हुए थे। भारत सरकार के पास इस बात की पूरी खबर थी लेकिन सरकार ने वेट एंड वाच की नीति अपनाई। कांग्रेस के नेताओं को कहा गया कि वे स्थानीय शासकों को मनाएं और भारत के साथ रहने के लिए तैयार करें। भौगौलिक तौर पर कुछ रियासतें पश्चिमी पाकिस्तान से दूर भी थीं। इसके बावजूद उन्हें पूर्वी पाकिस्तान की तरह अलग रियासतें बनाकर अपना तख्तो ताज बचाने की उम्मीद थी। कांग्रेस के स्थानीय नेताओं ने विलीनीकरण का आंदोलन चलाया और भारी शहादतें देने के बाद अंततः रानी कमलापति के राज्य को हथियाकर बनाए गए भोपाल को नई पहचान मिल सकी।
    तबसे लेकर अब तक लगभग सात दशकों का लंबा अंतराल बीत चुका है जब भोपाल को उसकी पहचान देने का स्वप्न साकार होता नजर आने लगा है। भोपाल की आजादी के वक्त स्थानीय तरुणाई को अपनी नई राह और नई मंजिल बहुत नजदीक नजर आ रही थी। सरकार के भरोसे विकास की जो इबारत कांग्रेस के शासकों ने लिखी उससे ये मंजिल मीलों दूर खिसक गई। भ्रष्टाचार और गरीबी को संरक्षण देने की इस नीति ने अपनी विरोधी भारतीय जनता पार्टी को व्यापारियों की पार्टी के रूप में खूब बदनाम किया। भाजपा के नेताओं को कांग्रेस के इस दुष्प्रचार से इतना डर लगता था कि जब वीरेन्द्र कुमार सखलेचा की सरकार ने अफसरों की लगाम कसी तो उनके विरोधियों ने तरह तरह के आरोप लगाकर उनकी सरकार गिरवा दी। उसके बाद सुंदरलाल पटवा की सरकार अफसरशाही के सामने झुकी सरकार के रूप में सामने आई। दिग्विजय सिंह की भ्रष्ट सरकार को जब जनता ने धक्के मारकर सत्ता से बाहर भेज दिया तबसे भाजपा की सरकारें अफसरशाही के साथ कदमताल करती रहीं हैं। मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों ने देश के सामने नवनिर्माण का वैकल्पिक मार्ग प्रशस्त किया है।
    भ्रष्ट सरकारी तंत्र की वजह से जो धनराशि विभिन्न छेदों से भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती थी मौजूदा नीति ने हितग्राही के खाते में सीधे भुगतान पहुंचाकर उस खामी को दूर कर दिया है। आज न तो सरकारी तंत्र और भ्रष्ट राजनेताओं का कमीशनखोरी का नेटवर्क सफल हो पा रहा है और न ही विकास की रफ्तार पर कोई ब्रेक बाकी रहा है। यही वजह है कि भोपाल संभाग और जिलों में हितग्राही मूलक योजनाओं को साकार करना सफल हो पा रहा है। भोपाल के नवाब के हाथों से सत्ता छीनकर जनता के हाथों में देने के बावजूद यहां के लोगों का जीवन रोशन करने का जो लक्ष्य अब तक पूरा नहीं हो पाया उसमें मानों पर लग गए हैं।
    वैसे तो विलीनीकरण के स्वप्न को जमीन पर उतारने के लिए अभी कई पायदान बाकी हैं। लगभग पच्चीस हजार घुसपैठियों ने भोपाल के आम नागरिक के संसाधनों पर डाका डाल दिया है। फुटपाथों गलियों में अतिक्रमण हो गया है। गंदी बस्तियों की तादाद बढ़ गई है। वोट बैंक के लिए कांग्रेस के जिन नेताओं ने झुग्गी माफिया खड़ा किया था वे आज अपने इलाकों में प्रधानमंत्री आवास योजना का प्रचार करने में जुटे हुए हैं। इसकी वजह है कि भले ही उन्हें कमीशन नहीं मिल पा रहा है पर उन्हें लगता है कि उनका वोटर कम से कम इस योजना को उनकी मेहनत का फल ही मान ले तो उनका भविष्य सुरक्षित हो सकता है।
    शहर का मास्टर प्लान अब तक राजधानी की तस्वीर नहीं बदल पाया है। भीड़ भरे इलाकों में अस्पतालों का निर्माण, बीच सड़कों पर पुरानी कारों की बिक्री के बाजार, गैरेज, और धुलाई ने राजधानी को भिखमंगों का शहर बनाकर रख दिया है। सरकारी दफ्तरों के आसपास लगने वाले सब्जी और कपड़ा बाजारों ने यातायात की व्यवस्था चौपट कर रखी है। अवैध निर्माणों की कोई मानीटरिंग नहीं है। यही वजह है कि चौड़ी सड़कें भी संकरी गलियों में तब्दील हो गईँ हैं। कभी बुलडोजर मंत्री के रूप में बाबूलाल गौर ने शहर की इस जरूरत को रेखांकित किया था। बाद की भाजपा सरकारों ने शहर में कई मूलभूत बदलाव किए हैं। फ्लाईओवर और चौराहों के चौड़ीकरण ने हालांकि राहत दी है लेकिन बढ़ते चार पहिया वाहनों की संख्या ने उन सारे सुधारों की हवा निकाल दी है। सार्वजनिक परिवहन का कोई विश्वसनीय और समय का पाबंद नेटवर्क अब तक नहीं तैयार हो सका है। धर्मस्थलों के नाम पर किए जाने वाले अतिक्रमणों ने शहर की खूबसूरती को लील लिया है।यही नहीं धर्म के नाम पर बढ़ रहीं दूकानों ने जनमानस को भी विकास की मुख्यधारा से परे धकेल दिया है।
    नवाबकालीन भवनों की हालत जर्जर हो चुकी है और वे जनता की आज की जरूरतों के लिए भी उपयोगी नहीं रह गए हैं। आज कंप्यूटरीकरण के दौर में न तो उन भवनों में स्थान बाकी है न ही बिजली हवा पानी की मूलभूत जरूरतें पूरी हो पा रहीं हैं। दिग्विजय सिंह सरकार ने पुराने भवनों की मरम्मत कराकर कथित विरासतों को बचाने का पाखंड जरूर किया था लेकिन जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी ये इमारतें खंडहर होती जा रहीं है। अब समय आ गया है कि शहर का अंधाधुंध विस्तार रोकने के लिए पुर्नघनत्वीकरण योजना का सख्ती से पालन किया जाए। इन जर्जर इमारतों को धराशायी करके आज की जरूरतों के अनुसार भवनों का निर्माण कराया जाए। जो लोग विरासतों को सहेजे रखने का शोर मचाकर जनजीवन को दूभर बनाने का षड़यंत्र रच रहे हैं उनके लिए पुराने इतिहास को किताबों में संजोकर रखा जा सकता है।
    शहरों को विकास का इंजन बनाने के लिए नियोजकों ने ग्रीन और ब्लू मास्टर प्लान तैयार किय़े थे। वृक्षारोपण को सफल बनाने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को स्वयं एक वृक्ष रोज लगाने के लिए आगे आना पड़ा है। ताल तलैयों की नगरी मानी जाने वाली राजधानी के अधिकांश जलग्रहण क्षेत्र दूषित पड़े हुए हैं। भोपाल तालाब की सफाई के लिए जो भोज वैटलैंड परियोजना चलाई गई थी उसने आम जनता पर कर्ज का पहाड़ तो खड़ा कर दिया लेकिन भोपाल तालाब की नई तस्वीर आज भी अधूरी है। तालाब का पानी सेप्टिक टैंक से भी ज्यादा गंदा बना हुआ है। उसमें आक्सीजन का स्तर नहीं बढ़ पाया है। सरकार और शासन को तय करना होगा कि आखिर वह आम नागरिकों को सम्मान जनक जीवन का माहौल कब तक मुहैया करा पाएगा।

  • पहला स्वतंत्रता संग्राम और भोपाल – सीहोर की शहादत

    पहला स्वतंत्रता संग्राम और भोपाल – सीहोर की शहादत

    राजेश बेन

    आज़ादी के अमृत महोत्सव के इस वर्ष में हम याद कर रहे हैं अपने उन क्रांतिकारियों को जिन्होंने भारत माता को आज़ाद करवाने के लिए पहले-पहल क्रांति की ज्वाला प्रज्जवलित की थी। भोपाल से शुरू हुआ आज़ादी के इस पहले संग्राम ने अंग्रेजों के शासन को जोरदार टक्कर दी। मातृभूमि को स्वतंत्र कराने वाले इन वीरों को देश कभी भी भूल नहीं सकेगा।

    अब से 164 साल पहले यानि 15 जनवरी 1858 को शाम 6 बजे कर्नल हयूरोज ने 149 क्रांतिकारियों को सीहोर कॉन्टिन्जेण्ट में एक लाइन में खड़ा कर गोली मार दी। भोपाल गजेटियर का संदर्भ 149 क्रांतिकारियों को लम्बी लाइन में खड़ा कर गोली मारने की पुष्टिकर्ता है तो सीहोर में जनश्रृति और एक प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र की रिपोर्ट में इस संख्या को 356 बताया गया है।

    भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम की कहानी भी रोंगटे खड़े करने वाली है और आज की तथा आने वाली पीढ़ी के लिये प्रेरणादायी है। 

    प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की कहानी कुछ ऐसी है कि अप्रैल, 1857 में भोपाल बेगम को पत्थर पर लिखकर छपाई गई क्रांति कारियों की (लिथोग्राफ) एक उदघोषणा प्राप्त हुई, जिसमें अंग्रेजों को निकाल बाहर करने और नष्ट करने का आव्हान किया गया था। बेगम ने इस घोषणा में कहीं गई बातें ब्रिटिश एजेन्ट को सूचित कर दी और इस प्रकार अंग्रेजों के प्रति अपनी वफादारी का सबूत दे दिया। 

    जब यह महान क्रांति मई, 1857 में भारत को आन्दोलित करने वाली थी उस समय भोपाल कॉन्टिन्जेन्ट सीहोर मुख्यालय में 60 तोपची,  206 घुड़सवार सैनिक तथा 600 पैदल सैनिक थे,  अर्थात् कुल मिलाकर 866 सैनिक थे, जिनमें सभी भारतीय थे। इस कॉन्टिन्जेन्ट के साथ केवल 6 अंग्रेज थे। इस कॉन्टिन्जेन्ट की एक टुकड़ी बेरछा में तैनात की गई किन्तु वहां कमान संभालने वाला एक भी अंग्रेज नहीं था।

     मेरठ तथा दिल्ली में हुई घटनाओं का समाचार सबसे पहले 13 मई, 1857 को इन्दौर में प्राप्त हुआ। परिणामस्वरूप, विद्रोह के अकस्मात् फैलने की आशंका से कर्नल ड्यूरेन्ड ने 14 मई को सीहोर को भोपाल कान्टिजेन्ट की 2 तोपें,  पैदल सैनिकों की 2 कंपनियां तथा घुड़सवारों के दो सैन्य दल भेजने के लिये अत्यावश्यक संदेश भेजा।

    20 मई को इन्दौर पहुँचने के लिये सैन्य दल भेज दिया गया और भोपाल क्षेत्र पर आसन्न संकट की छाया छाई रही। पड़ोस में और भारत के अन्य भागों में जो कुछ भी हो रहा था, उससे भोपाल रियासत की प्रजा प्रभावित हुये बिना नहीं रह सकी। मध्य भारत के लिये गर्वनर जनरल के एजेन्ट राबर्ट हैमिल्टन ने भारत सरकार के सेकेट्ररी को लिखा कि सामान्यत: दिल्ली, लखनऊ तथा रोहिलखंड में जो कुछ भी हो रहा था, उससे भोपाल के अनेक निवासी प्रभावित थे। भोपाल के मुसलमान लोग मुगल सम्राट बहादुर शाह से सहानुभूति रखते थे और हिन्दु लोग नाना साहब पेशवा से सहानुभूति रखते थे। “

    कैप्टन हुचिन्सन ने यह देखा कि भोपाल के अभिजात लोगों में ईसाई विरोधी तथा अंग्रेज विरोधी भावना बहुत अधिक थी। नियाज मुहम्मद खान, फौजदार मुहम्मद खा, बदी मुहम्मद खान, त्रिभुवन लाल जैसे महतवपूर्ण नेता तथा अनेक अन्य लोग उस समय वर्तमान व्यवस्था से असंतुष्ट थे। वे सिकन्दर बेगम के शासन के इसलिये विरोधी थे क्योंकि वह कम्पनी सरकार के अंगूठे नीचे थी। जब अवसर आया तो ऐसे व्यक्तियों ने विद्रोह में प्रमुखता से भाग लिया। “

    इस बीच 1 जुलाई, 1857 को इन्दौर के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। उन्हें दंडित करने के लिये भोपाल कॉन्टिन्जेन्ट कैवलरी के लगभग पचहत्तर सैनिकों का एक दल बुलाया गया । किन्तु कमांडर ट्रैवर्स को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि पूरे दल में से केवल 6 सैनिकों ने उसकी आज्ञा मानी। अन्तत: अंग्रेजों को इंदौर छोड़कर जाना पड़ा। कर्नल डयूरेन्उ और उस दल के लोग, जिसमें 17 अधिकारी, 8 महिलायें और 2 बच्चे शामिल थे, भोपाल कॉन्टिनेन्ट के कुछ सैनिकों की रक्षा में उसी दिन सीहोर चले गये। वे लोग 3 जुलाई को आष्टा और 4 जुलाई को सीहोर चले गये। सिकंदर बेगम ने उन्हें आश्रय और संरक्षण दिया। सिकंदर बेगम को अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ा। उसकी माँ तथा मामाओं ने उससे आग्रह किया कि वह अंग्रेजों के विरूद्ध धर्मयुद्ध घोषित कर दे। शहर के मौलवी भी जिहाद का उपदेश दे रहे थे और उसके सैनिकों ने भी उसे आतंकित किया। किन्तु सिकन्दर बगेम नहीं मानी। कर्नल ड्यूरेन्ड तथा उसके दल के साथ वह होशंगाबाद गईं, जहां वे 8 जुलाई को सुरक्षित पहुँच गये।

    9 जुलाई को सीहोर के पॉलिटिकल एजेन्ट मेजर रिचर्डस ने 20 यूरोपियों के साथ सीहोर छोड़ दिया। सीहोर छोड़ते समय उसने स्टेशन का प्रभार कुछ समय के लिये सिकंदर बेगम के अधिकारियों को सौंप दिया, किन्तु सभी व्यावहारिक प्रयोजनों उसका प्राधिकार कुछ भी नहीं था। कॉन्टिन्जेण्ट के सैनिकों ने सीहोर कैन्टोनमेण्ट पर कब्जा कर लिया। उन्होंने अंग्रेजों के बंगलों, डाकघर और सीहोर चर्च को लूट लिया। इस अवसर पर विद्रोही नेता शुजात खान पिंडारी ने मुख्य अधिकारी को मार डाला तथा बेरछा स्थित कम्पनी के खजाने को लूट लिया। जब सिकंदर बेगम ने सीहोर के सैनिकों को शुजात खान के विरूद्ध कार्रवाई करने का आदेश दिया तो उन्होंने आदेश मानने से इंकार कर दिया। इसके पहले के बेगम बदला लेतीं, सीहोर कैवलरी के रिसालदार ने 6 अगस्त, 1857 को खुले तौर पर विद्रोह की घोषणा कर दी। सैनिकों ने सीहोर कैन्टोंमेण्ट की 9 पौंडर तोपों तथा एक 24 पौंडर हो‍विट्जर को अपने कब्जे में ले लिया तथा उन्हें कैवलरी लाइन्स में रख दिया। बेगम ने सीहोर के सैनिकों के विद्रोह को कुचलने के लिये भोपाल से एक सैन्य बल भेजा। भोपाल के सैनिक भी उतने ही क्रांतिकारी थे, जितने सीहोर के सैनिक यद्यापि उन्होंने बेगम के पक्ष में सीहोर के खजाने को बचा लिया। तथापि सीहोर के अधिकांश क्रांतिकारी जिन्हें छोड़ दिया गया था, अन्तत: कानपुर जा पहुँचे और उन्होंने नाना साहब के झंडे के नीचे वीरतापूर्वक युद्ध किया।

    जुलाई, 1857 से लेकर नवंबर, 1857 तक सीहोर तथा उसके आसपास के क्षेत्र में इन्हीं क्रांतिकारियों का वर्चस्व रहा। विद्रोह के रोकने के लिये बेगम ने एक मैत्री विभाग की स्थापना की। उन्होंने सभी ओर से भागकर आये अंग्रेजों को सहायता दी और उन्हें सुरक्षा दी। इतना ही नहीं बल्कि अपने राज्य क्षेत्रों के बाहर भी उत्तर में काल्पी तक अनाज और चारा भेजकर और सागर तथा बुन्देलखण्ड में शान्ति स्थापित करने के लिये सैनिक टुकडियां भेजकर अंग्रेजों की भरसक सहायता की। अंबापानी के जागीरदार फाजिल मुहम्मद खान तथा आदिल मुहम्मद खान पर जिन्होंने विद्रोह कर दिया था, बेगम द्वारा तुरन्त हमला किया गया और उनकी संपदायें छीन ली गईं जबकि राहतगढ़ के हठी किलेदार को, जिसने अंग्रेजों को प्रवेश नहीं करने दिया था, पकड़ लिया गया तथा सूली पर चढ़ा दिया गया। इस बीच वह सीहोर में पुन: शांति स्थापित करने में सफल हो गई और अनेक क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया, जिन्हें बाद में फांसी दे दी गई।

    दिसम्बर, 1857 में ह्यूरोज ने विद्रोह को कुचलने के लिये सेना की कमान सम्हाली, 8 जनवरी को इन्दौर से रवाना होकर वह 15 जनवरी, 1858 को सीहोर पहुँचा। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, सीहोर में अनेक क्रांतिकारी पहले से बन्द थे और कोर्ट मार्शल की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनमें से 149 क्रांतिकारियों को न्यायालयों ने दोषी पाया तथा उन्हें गोली मार देने की सजा सुनाई गई। इस दण्डादेश के क्रियान्वयन का कार्य तीसरे यूरोपियन सैनिकों को सौंपा गया। सूर्यास्त के समय कैदियों को बाहर लाया गया और उन्हें एक लंबी पंक्ति में खड़ा कियागया और संकेत देते ही उन्हें गोली मार दी गई लेकिन उनमें से एक व्यक्ति बच निकला।

    जब मृत्युदंड देने की कार्रवाई पूरी हो गई तो अंधेरा हो गया और 15 जनवरी की उस लंबी, भयानक रात में तीसरे यूरोपियन बिग्रेड का एक अधिकारी और सैनिक क्रांतिकारियों के शवों की पंक्ति पर पहरा देते रहे और बिग्रेड 16 जनवरी को सुबह 3 बजे राहतगढ़ की ओर बढ़ गई।

    हमारे पहले क्रांतिकारियों को नमन

    (लेखक संभागीय जनसम्पर्क कार्यालय में उप संचालक हैं।)

  • इस देश को हिंदुत्व के विचार से चलाईएःपुष्पेन्द्र कुलश्रेष्ठ

    इस देश को हिंदुत्व के विचार से चलाईएःपुष्पेन्द्र कुलश्रेष्ठ

    भोपाल, 21 दिसंबर (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।भारत की बहुसंख्यक 90 करोड़ की जनता समान नागरिक अधिकारों की भीख मांग रही है और कुछ उन्मादी लोग अपने विशेष नागरिक अधिकारों का आनंद ले रहे हैं, जबकि लोकतंत्र संख्या बल का खेल होता है। आज के समय में लगता है जैसे सबसे अधिक हिन्दू बिकाऊ है, दो रुपये किलो चावल और एक रुपये किलो गेहूं, सस्ती बिजली में दिल्ली की सरकार चुन ली जाती है। सरकारों को चुनते वक्त हमारे मन में क्या रहता है? इतने सस्ते में हम सत्ता ऐसे लोगों को सौंप देते हैं, जिनके अपने निजी एजेण्डे हैं, उन्हें राष्ट्र और राज्य दोनों से कोई मतलब नहीं। याद रखो, सरकारें बदलने से राष्ट्र नहीं बदलते। आपके वर्तमान को देखकर दुनिया भविष्य में आपको याद रखेगी, यह आप पर निर्भर है कि किस प्रकार का आप इतिहास बना रहे हैं। उक्त विचार वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ ने सोमवार रात राजधानी भोपाल में आयोजित विचार संगोष्ठी ”विश्व पटल पर सनातन संस्कृति की शाश्वतता” पर व्यक्त किए।
    उन्होंने कहा कि पिछले सत्तर सालों से हमें पढ़ाया जा रहा है कि बाबर, औरंगजेब ने क्या किया, क्या इससे पहले भारत नहीं था? दुनिया भर में सरकारें राष्ट्र नहीं चलातीं, वह देश चलाती हैं। हम किसी सरकार का समर्थन या विरोध नहीं करते हैं, हम तो बस इतना जानते हैं कि जब तक संस्कृति है तब तक यह देश और राष्ट्र है। देश को अखंड रखना है तो राष्ट्र को जागृत करना होगा उसके बगैर यह संभव नहीं है। सरकार के साथ ही यह हम सबकी भी जिम्मेदारी है कि आनेवाले वक्त की आहट को पहचानें। उन्होंने वक्फ प्रॉपर्टी एक्ट 2013, सच्चर कमेटी, अल्पसंख्यक आयोग समेत तमाम मुददों पर विस्तार से बोला और कहा कि स्थितियां अराजकता की तरफ बढ़ रही हैं। 90 करोड़ हिन्दुओं को पता ही नहीं चल रहा है कि उनके साथ कौन सा खेल खेला जा रहा है? बहुसंख्यक होने के बाद भी हिन्दू को पता ही नहीं कि सरकारें किस तरह से उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहीं हैं।
    आंध्रप्रदेश के एक जज के हवाले से उन्होंने कहा कि देश में सबसे ज्यादा जमीन रेलवे के पास है। उसके बाद डिफेंस और फिर वक्फ बोर्ड के पास है। आपके इतने मठ, मंदिर हैं, बहुसंख्यक आप हो, लेकिन आपके पास इतनी जमीन नहीं। संकट तो यह है कि यह वक्फ प्रॉपर्टी एक्ट 2013 इसका एक प्रावधान आर्टिकल 40 बेहद खतरनाक है। यह आर्टिकल बोर्ड को यह अधिकार देता है कि वक्फ बोर्ड के दो सदस्यों को देश में अगर कहीं भी यह लगे कि कोई संपत्ति पहले वक्फ की थी तो वह उसे अपने कब्जे में ले सकता है। बीते 10 सालों में इस कानून के चलते देश में सरकारी जमीनों को कब्जाने का अभियान चल रहा है। इसके लिए उन्हें कोई साक्ष्य देने की जरूरत नहीं है। दोनों सदस्य जिला मजिस्ट्रेट या किसी भी जिम्मेदार अधिकारी को 24 से 72 घंटे में उसे खाली करने का आदेश दे सकते हैं। ऐसी सूरत में पूरी मशीनरी को उस आदेश पर अमल कराना होता है। हाई कोर्ट में ऐसे मामलों की सुनवाई नहीं हो सकती।
    उन्होंने इलाहाबाद में चंद्रशेखर आजाद अल्फ्रेड पार्क का हवाला देते हुए कहा कि कोरोनाकाल में पार्क में मस्जिद, मजार और दूसरे कई निर्माण हो गए। मामला जानकारी में आया तो हमारी टीम के एक सदस्य विष्णु शंकर जैन ने हाई कोर्ट में पिटीशन डाली। तब हाई कोर्ट ने यूपी सरकार से जवाब मांगा, लताड़ लगाई गई। तब कहीं जाकर वहां से वे मजारें हटाई गईं। फिर भी वहां एक मजार बनी रह गई थी, जब उसे हटाने के लिए कोर्ट ने तारीख दी तो कम्प्यूटर में उस दिन को ही नहीं चढ़ाया गया, वह तो विष्णु शंकर जैन हैं जो न्यायाधीश के समक्ष पहुंच गए और बोले कि आज आपने सुनवाई के लिए हमारा भी दिन तय किया है। तब कहीं जाकर पता चला कि खेल किस तरह से खेला जा रहा है और एक हम बहुसंख्यक हिन्दू हैं, समूह में यह समझ ही नहीं पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस एक्ट के बाद से सरकारी जमीन घेरने का सिलसिला देशभर में चल रहा है।
    वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेन्द्र ने 2005 में बनी सच्चर कमेटी के अस्तित्व पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह कमेटी संवैधानिक नहीं है। वास्तविकता यही है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री ने अपनी मर्जी से मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति का परीक्षण करने के लिए समिति नियुक्त करने का निर्देश जारी किया जबकि अनुच्छेद 14 और 15 के आधार पर किसी भी धार्मिक समुदाय के साथ अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता। सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थिति की जाँच के लिए एक आयोग नियुक्त करने की शक्ति भारत के संविधान के अनुच्छेद-340 के तहत भारत के राष्ट्रपति के पास निहित है, लेकिन इस पर राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर ही नहीं किए हैं। समिति का गठन भारतीय संविधान के अनुच्छेद-77 के उल्लंघन है और 2006 से इसके बहाने हजारों करोड़ रुपये मुसलमानों के अपलिफ्टमेंट के नाम पर खर्च हो रहे हैं।
    अल्पसंख्यक होने के क्राइटेरिया को लेकर सरकार के पास कोई नीति नहीं है। फिर भी इस कमेटी की सिफारिश पर देश में 5000 करोड़ का सालाना बजट हर साल मुसलमानों को दिया जाता है। इस तरह से यह भारतीय संविधान के समानता के अधिकार का उल्लंघन है। जो लोग टैक्स देते हैं उन्हें सरकार से यह पूछना चाहिए कि आखिर हमारे लिए और हमारे बच्चों के लिए कहां क्या सुविधाएं दे रहे हैं। उन्होंने अल्पसंख्यक आयोग पर भी तार्किक रूप से सवाल उठाए तथा उसके दुरुपयोग की बात कही। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के साथ ही राज्यों में भी अल्पसंख्यक आयोग बने हैं। अल्पसंख्यकों को दोनों आयोगों से आर्थिक सहायता दी जा रही है।
    पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ ने कहा कि कुछ राज्यों में हिंदुओं की संख्या नगण्य है, इसके बाद भी मुस्लिम ही अल्पसंख्यक हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि लक्षद्वीप में दो प्रतिशत, मेघालय में 11 प्रतिशत, नगालैंड में आठ प्रतिशत, मणिपुर में 31 प्रतिशत, अरुणाचल में 29 प्रतिशत, मिजोरम में दो प्रतिशत, जम्मू-कश्मीर में 28 प्रतिशत और पंजाब में 38 प्रतिशत हिंदू हैं। इन राज्यों में वास्तव में हिंदू अल्पसंख्यक हैं, लेकिन इसके बाद भी यहां मुसलमान ही अल्पसंख्यक कहलाते हैं और वे ही सारी अल्पसंख्यक से जुड़ी सुविधाएं लेते हैं। आखिर यह कहां का न्याय है और संविधान के समानता के अधिकार का पालन कहां हो रहा है।
    उन्होंने गंभीरता पूर्वक एक मामला प्राचीन हिन्दू मंदिरों को लेकर भी उठाया और इशारों-इशारों में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से अपील की कि वे कम से कम भोजशाला धार को तो पूरी तरह से हिन्दुओं को साधना के लिए सौंप दें। कुलश्रेष्ठ ने 1991 में बने प्लेसिस ऑफ वरशिप एक्ट का जिक्र करते हुए कहा कि इस कानून के चलते देशभर के 30 हजार मंदिरों से हिन्दुओं का दावा बिना अपना पक्ष रखे खारिज कर दिया गया है। भारत की संसद को इस बात का कोई अधिकार नहीं है कि मेरे बाप-दादाओं के जिन मंदिरों को लुटेरों ने लूट लिया है उसे हम वापस न ले सकें। उन्होंने कहा कि रातोंरात अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए किसी के दबाव में प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट बनाया।
    उन्होंने देश के समक्ष आंतरिक चुनौतियों की जानकारी देने के साथ ही उसके समाधान भी बताए। साथ ही कहा कि लोकतंत्र संख्या बल का खेल होता है। सनातन संस्कृति के साथ शुरू से खिलवाड़ पिछली सरकारें करती रही हैं। यह पहली सरकार है, जो भगवान राम के भव्य मंदिर के लिए आगे आई है। काशी विश्वनाथ कोरिडोर हो या अन्य देव स्थान आपको इस सरकार के काम स्पष्ट दिखाई देंगे। एक पिछला वक्त था जब इसी देश के किसी प्रधानमंत्री ने सेक्युलर देश के नाम पर मूर्ति स्थापना कार्यक्रम के लिए मना कर दिया था, लेकिन आज प्रधानमंत्री मोदी केदारधाम जा रहे हैं। वे गुफा में ध्यान भी कर रहे हैं, इससे समझ जाना चाहिए कि देश की 90 करोड़ हिन्दू जनता को वह क्या संदेश देना चाहते हैं। इसके बाद भी यदि भारत का हिन्दू नहीं जागता है तो फिर कोई कुछ नहीं कर सकता है। उन्होंने कहा कि सरकार के साथ ही यह हम सबकी भी जिम्मेदारी है कि आनेवाले वक्त की आहट को पहचानें।
    कुलश्रेष्ठ ने कहा कि सरकार बहुत छोटी चीज है, देश और राष्ट्र के बीच में जो फर्क नहीं समझते, उनकी दुर्दशा होती है। सच कहने की प्रवृति डालें, समाज सुधरेगा। जब तक विचार नहीं बदला जाएगा, तब तक भारत में परिवर्तन नहीं हो पाएगा। उन्होंने अपने जागरुकता के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 333 खत्म करने के प्रयासों के बारे में भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत जाति प्रधान नहीं, कर्म प्रधान देश है। यहां त्यागी की पूजा होती है, भगवान श्रीराम क्षत्रिय थे, उनकी पूजा होती है। भगवान परशुराम और रावण भी ब्राह्मण थे, दोनों के कर्म में अंतर है। एक को पूजा जाता है और एक को जलाया जाता है।
    पुष्पेन्द्र कुलश्रेष्ठ ने इस दौरान राजनैतिक भारत के साथ-साथ सांस्कृतिक भारत की व्याख्या की और देश में सांस्कृतिक भारत के उन पहलुओं से परिचित कराया जिसमें तुलसी, पीपल, नदी समेत सभी तरह से पर्यावरणीय संरक्षण को महत्व दिया गया है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी का नाम लिए बगैर कहा, बहुत वर्षों बाद आपने एक व्यक्ति को सत्ता में बैठाया और आप चाहते हैं कि सबकुछ एक दिन में ठीक हो जाए, सरकार को अपना काम करने के लिए समय भी दीजिए। हम अपने ही आदमी में कमियां और खामियां ढूंढने की कोशिश करते हैं, लेकिन हमने उन्हें चुना है तो उन्हें काम करने का मौका भी तो दो। अगर वे गलत रास्ते पर जाएं तो उन पर दबाव भी बनाएं।
    वरिष्ठ पत्रकार कुलश्रेष्ठ ने कहा, हर बार सनातन बनकर वोट दीजिए। यह मौका पांच साल में एक बार मिलता है। सरकार सिर्फ देश चलाती है, लेकिन हम पूरा समाज राष्ट्र को संचालित करते हैं। देश से बड़ा है राष्ट्र। इसलिए एकजुट होकर सामाजिक शक्ति का इस्तेमाल करना चाहिए। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह द्वारा देशहित में पूर्व में लिए गए निर्णयों की सराहना की। उनका कहना यही था कि सब कुछ की चाबी सरकार के पास है, ऐसा हमें नहीं मानना चाहिए। राष्ट्र क्या है यह हम सभी समझें, वह देश से बड़ा होता है। देश आखिर एक जमीन का टुकड़ा है, उस छोटे से जमीन के टुकड़े को सरकार चलाती है, यह किसी ना किसी विधान से चलती है। उसमें मैं, आप कोई हों, उन्हें उस विधान को मानना होता है। इस सबसे अलग होकर होता है राष्ट्र, उसे चलाने की जिम्मेदारी समाज की होती है, राष्ट्र चलता है मेरे और आपके विश्वास से, परम्पराओं, संस्कारों से। इसलिए हम सभी अपने राष्ट्र के स्व को पहचानें और उसके लिए कार्य करें। इसे हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए जो-जो भी करना चाहिए वह सब कुछ करें।
    राजधानी के एमपीनगर जोन-एक प्रेस काम्प्लेक्स के पास रविवार को हिन्दू राष्ट्र शक्ति के प्रदेश कार्यालय का लोकार्पण किया गया। मुख्य अतिथि हिन्दू राष्ट्र शक्ति के संरक्षक व संस्थापक डा सिकंदर रिज्वी, राष्ट्रीय अध्यक्ष मुत्युंजय ने प्रदेश कार्यालय का लोकार्पण किया। पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ ने कहा कि पाकिस्तान की आबादी से अधिक उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ संभाल रहे हैं। हमारे आगे पाकिस्तान की कोई औकात नहीं है। हमारे यहां महंगाई बहुत है, हमारे यहां बेरोजगारी बहुत है। हम पिछड़े हुए हैं, लेकिन कभी आपके लोगों ने आपके आत्म विश्वास को ताकत नहीं दी। पूरे विश्व में आपकी क्या हैसियत है।
    आजादी के बाद 1947 के बाद का रिकार्ड निकाल कर देख लीजिए, जो लोग आपको गाली दे रहे हैं, जो हीन भावना भर रहे हैं। उनकी औकात ही नहीं है आपसे बात करने की। 244 साल में अमेरिका दुनिया का बड़ा विकास की पराकष्ठा पर पहुंचने वाला देश है। पूरी दुनिया को ज्ञान दे रहा है। वो अमेरिका हमे और आपको तमीज सिखा रहे हैं। वो अमेरिका हमे बता रहे हैं कि महिलाओं की बराबरी का मतलब क्या है? भारतीयों को जेंडर जस्टिस्ट नहीं आता। जो ताकत हमारे पास है, जो इतिहास हमारे पास हैं, वो किसी के पास नहीं है।
    हम आत्मविश्वास से किसी दूसरे देशों को बता ही नहीं पा रहे हैं। शर्म आती है अपने देश की बात रखने में। अमेरिका में कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बनी। हमारे देश में 16 साल तक एक महिला प्रधानमंत्री रही, एक महिला राष्ट्रपति रही। सारे काम प्रधानमंत्री नहीं करेगा। ऐसा नहीं होता। हम सब को अपना आत्म विश्वास बढ़ाने व ऊर्जा जगाने की जरूरत है, तभी हम अपने देश की उन्नति के बारे में दुनिया को बता पाएंगे। कार्यक्रम में राजपूत महापंचायत के अध्यक्ष राघवेंद्र सिंह तोमर सहित बड़ी संख्या में गणमान्य लोग मौजूद रहे।

  • गोंडों का सम्मान रानी कमलापति रेलवे स्टेशन

    गोंडों का सम्मान रानी कमलापति रेलवे स्टेशन

    भोपाल,(शिवराज सिंह चौहान )।इतिहास के पन्नों को पलटने से ज्ञात होता है कि 1600 से सन् 1715 तक गिन्नौरगढ़ किले पर गोंड राजाओं का आधिपत्य् रहा तथा भोपाल पर भी उन्हीं का शासन था। गोंड राजा निज़ाम शाह की सात पत्नियाँ थीं, जिनमें कमलापति सबसे सुंदर थीं। उनकी इच्छा से तालाब के तट पर एक महल का निर्माण किया गया, जो सन् 1702 में पूर्ण हुआ, जिसे आज रानी कमलापति महल के नाम से जाना जाता है। आज इसके अवशेष छोटे और बड़े तालाब के पार्क में देखे जाते हैं। ईसवी सन् 1989 से भारतीय पुरातत्व विभाग ने इस महल को अपने संरक्षण में ले लिया। इसमें एक छोटी चित्र प्रदर्शनी भी है।

    गोंड समुदाय का राजवंश गिन्नौरगढ़ से बाड़ी तक फैला हुआ था। उनका साम्राज्य गढ़ा कटंगा (मंडला) 52 गढ़ के आधिपत्य में था। रायसेन किला ईस्वी सन् 1362 से 1419 तक 57 वर्ष राजा रायसिंह के आधिपत्य में था। यह किला इनके द्वारा बनवाया गया था। ईस्वी 14वीं में जगदीशपुर (इस्लाम नगर) में गोंड राजाओं का आधिपत्य रहा। इस महल को भी गोंड राजाओं के द्वारा बनवाया गया था। सन् 1715 में अंतिम गौंड राजा नरसिंह देवड़ा रहे। भोपाल शाही ईस्वी 476 से 533 लगभग 60 वर्षों तक इनका शासन रहा। गोंड समाज के प्रथम धर्मगुरू पारी कुपार लिंगो बाबा ने पाँच देव सगा समाज वाले के लिये बैरागढ़ का स्थान निश्चित किया था। तभी से गोंडवाना समाज के लोग बैरागढ़ से हजारों किलोमीटर की दूरी पर निवास करने के बावजूद भी बैरागढ़ में बड़ा देव की पूजा-अर्चना करने आते हैं। यह गोंडों का सबसे बड़ा देव-स्थल है।

    बाड़ी जिला रायसेन का अंतिम शासक चैन सिंह 16वी ईस्वीं में रहा। ईसवी 16वी सदी में सलकनपुर जिला सीहोर रियासत के राजा कृपाल सिंह सरौतिया थे। उनके शासन काल में वहाँ की प्रजा बहुत खुश और समपन्न थी। उनके यहाँ एक खूबसूरत कन्या का जन्म हुआ। वह बचपन से ही कमल की तरह बहुत सुंदर थी। उसकी सुंदरता को देखते हुए उसका नाम कमलापति रखा गया। वह बचपन से ही बहुत बुद्धिमान और साहसी थी और शिक्षा, घुड़सवारी, मल्लयुद्ध, तीर-कमान चलाने में उसे महारत हासिल थी। वह अनेक कलाओं में पारंगत होकर कुशल प्रशिक्षण प्राप्त कर सेनापति बनी। वह अपने पिता के सैन्य बल के साथ और अपने महिला साथी दल के साथ युद्धों में शत्रुओं से लोहा लेती थी। पड़ोसी राज्य अकसर खेत, खलिहान, धन-सम्पत्ति लूटने के लिए आक्रमण किया करते थे और सलकनपुर राज्य की देख-रेख करने की पूरी जिम्मेदारी राजा कृपाल सिंह सरौतिया और उनकी टी राजकुमारी कमलापति की थी, जो आक्रमणकारियों से लोहा लेकर अपने राज्य की रक्षा करती रही।

    राजकुमारी धीरे-धीरे बड़ी होने लगी और उसकी खूबसूरती की चर्चा चारों दिशाओं में होने लगी। इसी सलकनपुर राज्य में बाड़ी किले के जमींदार का लड़का चैन सिंह जो राजा कृपाल सिंह सरौतिया का भांजा लगता था, वह राजकुमारी कमलापति से विवाह करने की इच्छा रखता था। लेकिन उस छोटे से गाँव के जमीदार से राजकुमारी कमलापति ने शादी करने से मना कर दिया।

    16वीं सदी में भोपाल से 55 किलो मी. दूर 750 गाँवों को मिलाकर गिन्नौरगढ़ राज्य बनाया गया, जो देहलावाड़ी के पास आता है। इसके राजा सुराज सिंह शाह (सलाम) थे। इनके पुत्र निजामशाह थे, जो बहुत बहादुर, निडर तथा हर कार्य-क्षेत्र में निपुण थे। उन्हीं से रानी कमलापति का विवाह हुआ।
    राजा निजाम शाह ने रानी कमलापति के प्रेम स्वरूप ईस्वी 1700 में भोपाल में सात मंजिला महल का निर्माण करवाया, जो लखौरी ईंट और मिट्टी से बनवाया गया था। यह सात मंजिला महल अपनी भव्यता, सुंदरता और खूबसूरती से लिए प्रसिद्ध था।रानी कमलापति का वैवाहिक जीवन काफी खुशहाल व्यतीत हो रहा था। वह अपना वैवाहिक जीवन हँसी-खुशी के साथ राजा निजामशाह के साथ व्यतीत कर रही थी। उनको एक पुत्र की प्राप्ति हुई, जिसका नाम नवल शाह था।

    बाड़ी किले के जमींदार का लड़का चैन सिंह राजा निजामशाह का भतीजा था। वह राजकुमारी कमलापति की शादी होने के बावजूद भी अभी उससे विवाह करने की इच्छा रखता था। उसने अनेक बार राजा निजामशाह को मारने की कोशिश की, जिसमें वह असफल रहा। एक दिन प्रेम पूर्वक उसने राजा निजामशाह को भोजन पर आमंत्रित किया और भोजन में जहर देकर उनकी धोखे से हत्या कर दी। राजा निजामशाह की मौत की खबर से पूरे गिन्नौरगढ़ में खलबली हो गई। चैनसिंह ने रानी कमलापति को अकेले जानकर उन्हें पाने की नीयत से गिन्नौरगढ़ के किले पर हमला कर दिया। रानी कमलापति ने उस समय अपने कुछ वफादारों और 12 वर्षीय बेटे नवलशाह के साथ भोपाल में बने इस महल में छुप जाने का निर्णय लिया, जो उस समय सुरक्षा की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण था। कुछ दिन भोपाल में समय बिताने के बाद रानी कमलापति को पता चला कि भोपाल की सीमा के पास कुछ अफगानी आकर रूके हुए हैं, जिन्होंने जगदीशपुर (इस्लाम नगर) पर आक्रमण कर उसे अपने कब्जे में ले लिया था। इन अफगानों का सरदार दोस्त मोहम्मद खान था, जो पैसा लेकर किसी की तरफ से भी युद्ध लड़ता था। लोक मान्यता है कि रानी कमलापति ने दोस्त मोहम्मद को एक लाख मुहरें देकर चैनसिंह पर हमला करने को कहा।

    दोस्त मोहम्मद ने गिन्नौरगढ़ के किले पर हमला कर दिया जिसमें चैनसिंह मारा गया और किले को हड़प लिया गया। रानी कमलापति को अपने छोटे बेटे की परवरिश की चिंता थी इसीलिए उन्होंने दोस्त मोहम्मद के इस कदम पर कोई आपत्ति नहीं जताई। दोस्त मोहम्मद अब सम्पूर्ण भोपाल की रियासत पर कब्जा करना चाहता था। उसने रानी कमलापति को अपने हरम (धर्म) में शामिल होने और शादी करने का प्रस्ताव रखा। वह वास्तव में रानी को अपने हरम में रखना चाहता था।

    दोस्त मोहम्मद खान के इस नापाक इरादे को देखते हुए रानी कमलापति का 14 वर्षीय बेटा नवल शाह अपने 100 लड़ाकों के साथ लाल घाटी में युद्ध करने चला गया। इस घमासान युद्ध में दोस्त मोहम्मद खान ने नवल शाह को मार दिया। इस स्थान पर इतना खून बहा कि यहाँ की जमीन लाल हो गई और इसी कारण इसे लाल घाटी कहा जाने लगा। इस युद्ध में रानी कमलापति के 2 लड़के बच गये थे, जो किसी तरह अपनी जान बचाते हुए मनुआभान की पहाड़ी पर पहुँच गये। उन्होंने वहाँ से रानी कमलापति को काला धुंआ कर संकेत किया कि ‘हम युद्ध हार गये हैं और आपकी जान को खतरा है।

    रानी कमलापति ने विषम परिस्थति को देखते हुए अपनी इज्जत को बचाने के लिए बड़े तालाब बाँध का सँकरा रास्ता खुलवाया जिससे बड़े तालाब का पानी रिसकर दूसरी तरफ आने लगा। इसे आज छोटा तालाब के रूप में जाना जाता हैं। इसमें रानी कमलापति ने महल की समस्त धन-दौलत, जेवरात, आभूषण डालकर स्वयं जल-समाधि ले ली।

    दोस्त मोहम्मद खान जब तक अपनी सेना को साथ लेकर लाल घाटी से इस किले तक पहुँचा उतनी देर में सब कुछ खत्म हो गया था। दोस्त मोहम्मद खान को न रानी कमलापति मिली और न ही धन-दौलत। जीते जी उन्होंने भोपाल पर परधर्मी को नहीं बैठने दिया। स्रोतों के अनुसार रानी कमलापति ने सन् 1723 में अपनी जीवन-लीला खत्म की थी। उनकी मृत्यु के बाद दोस्त मोहम्मद खान के साथ ही नवाबों का दौर शुरू हुआ और भोपाल में नवाबों का राज्य हुआ।

    नारी अस्मिता और अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए रानी कमलापति ने जल-समाधि लेकर इतिहास में अमिट स्थान बनाया है। उनका यह कदम उसी जौहर परंपरा का पालन था, जिसमें हमारी नारी शक्ति ने अदम्य साहस के साथ अपनी अस्मिता, धर्म और संस्कृति को बचाया है। उसी परंपरा का निर्वाह करते हुए रानी कमलापति ने भी जीवित रहते अपनी नारी गरिमा को विधर्मियों से बचा लिया और पीढ़ियों के लिए यह प्रेरणा प्रदान की कि अपने धर्म की रक्षा के लिए किसी को भी बलिदान देने से पीछे नहीं हटना चाहिए।

    गोंड रानी कमलापति आज तीन सौ वर्ष बाद भी प्रासंगिक हैं और उनके बलिदान का सम्मान करके हम कृतज्ञ हैं। भोपाल का हर हिस्सा उनकी कहानी सुनाता है। यहाँ के तालाबों के पानी में उनके बलिदान की गूंज आज भी सुनी जा सकती है। ऐसा लगता है मानो वे स्वयं यहाँ की कल-कल धारा हैं। गोंड रानी अब पानी बनकर भोपाल की रवानी में अविरल बहती हैं।

    (लेखक – मुख्यमंत्री, म.प्र. शासन)

  • पर्यूषण पर्व में जीवन सूत्रों की साधना का दौर

    पर्यूषण पर्व में जीवन सूत्रों की साधना का दौर

    भोपाल,04सितंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।राजधानी में अरेरा कालोनी स्थित जैन स्थानक भवन में आज आठ दिनों तक चलने वाले पर्यूषण पर्व का श्रद्धा पूर्वक शुभारंभ हुआ।अरेरा कालोनी इ-3। 40 में स्वाध्यायी बहनें बैतूल की श्राविका शकुंतला जैन और महेश्वर की हेमलता वाणी के सानिध्य में प्रातः 6 बजे से हर दिन बारह घंटों का नवकार मंत्र जाप कराया जाएगा।


    आज के प्रवचनों में बहन शकुंतला जैन ने बताया कि जीवन में ज्ञान सर्वोपरि है। ज्ञान के बगैर किसी कार्य की सिद्धि नहीं की जा सकती। अच्छे और संस्कारयुक्त ज्ञान से मनुष्य का जीवन सार्थक हो जाता है।ज्ञानी व्यक्तियों से जीवन के रहस्य सरलता पूर्वक समझे जा सकते हैं। हम प्रतिष्ठित डाक्टरों, वकीलों और इंजीनियरों के पास जाकर जिस तरह अपनी समस्याओं का समाधान प्राप्त करते हैं उसी तरह संतों के पास जाकर जीवन दर्शन को समझते हैं। अपने क्षेत्र के इन विशेषज्ञों ने कड़ी साधना करके ज्ञान अर्जन किया है,इसी वजह से लोग उनकी ओर अपेक्षा भरी निगाहों से देखते हैं।


    उन्होंने कहा कि पर्यूषण पर्व भी ऐसा ही एक अवसर है जिसके दौरान हम धर्म के माध्यम से जीवन को सफल बनाने के गुर सीखते हैं। यदि हम श्रद्दा के साथ जीवन के सूत्रों को सीखने का प्रयास करेंगे तो धीरे धीरे हम भी अपनी जाग्रत अवस्था को हासिल कर लेंगे।


    बहन हेमलता वाणी ने श्रावकों को संदेश देते हुए बताया कि स्थानक भवन में हर दिन सुबह 7 बजे से प्रार्थना और साढ़े आठ बजे से अंतगड़ सूत्र का वाचन किया जाएगा। इसके बाद धार्मिक प्रवचन और प्रतियोगिताएं भी होंगी। ये सभी कार्यक्रम 11 सितंबर तक लगातार होंगे। सायंकालीन प्रतिक्रमण में साढ़े छह बजे से धार्मिक भजनों का भी आयोजन होगा। इस दौरान धर्मप्रेमी बंधुओं के निवास और भोजन की व्यवस्था भी रहेगी,जिससे उन्हें साधना में व्यवधान न हो। हर दिन अलग अलग जीवन सूत्रों पर व्याख्यान और शंका समाधान भी होगा। आज इस धार्मिक अनुष्ठान के शुभारंभ अवसर पर राजधानी के स्थानकवासी परिवारों ने बड़ी संख्या में उपस्थित होकर इस संस्कार शिविर का लाभ प्राप्त किया।

  • मीडिया के शोर में प्रेस की साख आज भी कायमःकुलपति केजी सुरेश

    मीडिया के शोर में प्रेस की साख आज भी कायमःकुलपति केजी सुरेश

    भोपाल,07 मार्च(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। सोशल मीडिया और डिजिटल क्रांति के दौर में पत्रकारों की समाज के प्रति संवेदनशीलता और लोक दायित्व का भाव ही प्रेस की पहचान है। प्रेस ने बड़ी हद तक अपनी इस साख को बचाकर रखा है। तकनीक और भाषा के सहारे चलने वाला दुष्प्रचार कभी लोकदायित्व से भरी प्रेस की जगह नहीं ले सकता।इसके बावजूद पत्रकारिता की मुख्य धारा यदि आज कहीं सवालों के घेरे में है तो उसे अपनी सार्थकता बनाए रखने के लिए खुद में बदलाव लाना होगा।प्रदेश के मूर्धन्य आंचलिक पत्रकार स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया की स्मृति में आयोजित व्याख्यान माला में पं. माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति के.जी. सुरेश ने प्रमुख वक्ता के रूप में ये विचार व्यक्त किए।

    पंडित माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय परिसर में आज रविवार को जूम एप और फेसबुक लाईव पर (पत्रकारिता का लोक दायित्व) विषय पर आयोजित व्याख्यानमाला में प्रोफेसर के.जी. सुरेश के अलावा अमर उजाला डिजिटल के संपादक जयदीप कार्णिक, भारतीय जन संचार संस्थान के महानिदेशक प्रो.संजय द्विवेदी, पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर, ने अपने विचार व्यक्त किए। लगातार दसवें वर्ष हुए इस आयोजन में विषय का प्रवर्तन वरिष्ठ पत्रकार शिव अनुराग पटैरिया ने किया। इसके अलावा वरिष्ठ पत्रकार राजेश सिरोठिया. और वरिष्ठ पत्रकार अजय त्रिपाठी ने श्री देवलिया जी के साथ जुड़ीं यादों के संस्मरण सुनाए।इस अवसर पर सागर के वरिष्ठ पत्रकार विनोद आर्य को स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया स्मृति अलंकरण से सम्मानित किया गया। इसमें आंचलिक पत्रकारों के लिए ग्यारह हजार रुपए नकद, शाल श्रीफल और स्मृति चिन्ह से सम्मानित किया जाता है। मंच संचालन युवा पत्रकार आदित्य श्रीवास्तव ने किया।

    प्रो.के.जी.सुरेश ने कहा कि कोई भी नागरिक अभिनंदन हमेशा प्रायोजित सम्मानों से ज्यादा मूल्यवान होता है। नागरिक अभिनंदन की कसौटी हमेशा ठोस होती है। मुझे स्वर्गीय देवलिया जी से मिलने का अवसर तो प्राप्त नहीं हुआ लेकिन उनके बारे में जो पढ़ा और उनके छात्रों में समाज के प्रति जो प्रतिबद्धता देखी उससे मालूम चलता है कि वे आंचलिक पत्रकारिता के पुरोधा रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज एक शिक्षक के नाते मुझे लगता है कि पत्रकारों की चयन प्रक्रिया पर हमें विशेष गौर करना होगा। हम पत्रकारों को भाषा और तकनीक के आधार पर बेहतर बनाने का प्रयास करते हैं लेकिन उनकी समाज के प्रति संवेदनशीलता पर गौर नहीं करते।

    श्री केजी सुरेश ने कहा कि समाज के बीच जनसंचार कायम करने के लिए हमें सामुदायिक रेडियो को बढ़ावा देना होगा। आज बोलचाल की भाषा में कहा जाता है कि पत्रकार तो पक्षकार हो गए हैं जबकि उनका तो एक ही पक्ष होता है वो है जनपक्ष या लोकपक्ष। मैं स्वयं तीन दशकों तक पत्रकार रहा हूं इस आधार पर कह सकता हूं कि रोज शाम को टीवी की बहसें पत्रकारिता नहीं हैं। ये बात भी सही है कि टेबल टाप रिपोर्टिंग मीडिया की मजबूरी है लेकिन यदि वो जमीनी स्तर की सच्चाई उजागर नहीं करती तो उसका महत्व कुछ नहीं। मुख्यधारा का मीडिया यदि अपने भीतर बदलाव नहीं लाएगा तो आगे चलकर उसका महत्व ही समाप्त हो जाएगा। जमीनी स्तर पर मीडिया को लेकर कई प्रयोग चल रहे हैं। यदि उन मुद्दों को नहीं उठाया जाएगा तो पढ़ने देखने के प्रति लोगों का लगाव नहीं बढ़ाया जा सकेगा। आज ब्लॉगों और यू ट्यूब पर पाठकों और दर्शकों की रुचि की सामग्री बढ़ती जा रही है। पाठकों की ये बदलती अभिरुचियां प्रेस के लिए खतरे की घंटी बन गई है। उन्होंने कहा कि प्रेस की 70 फीसदी आय विज्ञापनों से होती है, ऐसे में लोक दायित्व के भाव को बचा पाना कठिन हो जाता है। जनता को भी इस मुद्दे पर गौर करना होगा कि वह ऐसे प्रेस को संबल दे जो केवल जनता के हित के लिए काम करता हो। प्रेस के हित में हमारा विश्वविद्यालय भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यानमाला समिति के साथ काम करने के लिए तैयार है। आंचलिक पत्रकारिता को मजबूत करने के लिए यूनिसेफ के सहयोग से हम हर जिले में अच्छी पत्रकारिता को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं।

    भारतीय जनसंचार संस्थान,नईदिल्ली के महानिदेशक प्रो.संजय द्विवेदी ने कहा कि स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया का जीवन पत्रकारिता के लोक दायित्व का स्थापित उदाहरण है। लोकमंगल उनके संवाद का प्रमुख स्तंभ था। मीडिया की आलोचना करने से जनसंवाद का उद्देश्य पूरा नहीं होता। समाज के सभी स्तंभों में गिरावट देखी जाती है ऐसे में मीडिया अछूता नहीं रह सकता। पत्रकारिता विहीन समाज के बीच कभी भी लोक कल्याणकारी राज्य नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने कहा कि कुछ लोग आंदोलनकारी बनकर खुद को पत्रकार बताने का प्रयास करते हैं ऐसा करके वे पत्रकारों की तपस्या पर पानी फेर देते हैं। पत्रकारिता के पीछे जनता का विश्वास प्रमुख होता है। पत्रकार तो कोई भी बन सकता है लेकिन पत्रकारिता करने वाले लोग अलग होते हैं। हमें ऐसे लोगों को संरक्षण देना होगा जो वास्तव में पत्रकारिता कर रहे हैं। इस तरह के आयोजन उन्हीं पत्रकारों को संबल देने में सहायक होते हैं। इस लिहाज से ये विमर्श बहुत मूल्यवान बन गया है।

    अमर उजाला डिजिटल के संपादक जयदीप कार्णिक ने कहा कि जैसे कोई भी सच्ची खबर छुप नहीं सकती उसी तरह पत्रकारिता की गंदगी भी छुपाई नहीं जा सकती। पत्रकारिता में आत्म अवलोकन का भाव हमेशा अच्छी पत्रकारिता को जिंदा रखता है। सोशल मीडिया पर तो लोग झूठ भी प्रचारित कर देते हैं लेकिन प्रेस का संपादक केवल तथ्यों को ही प्रस्तुत करता है। यही प्रेस का महत्व भी है। उन्होंने कहा कि आज वक्त आ गया है कि हम पत्रकारिता की अर्थव्यवस्था पर भी बात करें।

    पत्रकारिता का लोक दायित्व विषय पर आयोजित इस व्याख्यानमाला में विषय का प्रवर्तन करते हुए वरिष्ठ पत्रकार शिव अनुराग पटैरिया ने कहा कि बिल्डर माफिया और शराब के व्यापारियों ने जबसे अखबारों में घुसपैठ कर ली है तबसे समाज की जन पक्षधरता लड़खड़ाने लगी है। अच्छे अखबारों का समर्थक बाजार न होने की वजह से लोकदायित्व की लड़ाई पिछड़ जाती है। इस सबके बावजूद ये भी सच है कि यदि पत्रकार न झुकना चाहें तो कोई शक्ति उन्हें नहीं झुका सकती। आज भी पत्रकारों को थानेदार, कलेक्टर और मुख्यमंत्री को खुश करके चलना होता है, ऐसे में जो लोग समझौते नहीं करते वे पिछड़ जाते हैं। साधनों के अभाव में ये पत्रकारिता पिछड़ रही है।

    अध्यक्षीय भाषण में पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि अच्छाई या बुराई हमारे ही कर्मों से निकलती हैं। हर दौर में अच्छी बुरी पत्रकारिता दोनों रहीं हैं। जो लोग किसी पार्टी के प्रवक्ता बन जाते हैं या फिर मुखबिरी करके लाभ उठाते हैं वे लोग ज्यादा खतरनाक हैं। बाजार तो हमेशा से समाज का हिस्सा रहा है,वह सहयोगी और सेवक रहे तब तक तो ठीक है लेकिन जब वह स्वामी बन जाता है तो प्रेस का लोक दायित्व भाव लड़खड़ा जाता है। उन्होंने कहा कि प्रेस काऊंसिल आज महत्वहीन हो चुकी है ऐसे में जरूरी है कि उसे समाप्त कर दिया जाए और प्रेस की स्थितियों पर नए सिरे से विचार करने के लिए तीसरे प्रेस आयोग का गठन किया जाए। प्रेस यदि साक्ष्य अधिनियम की तरह तथ्य आधारित संवाद करेगा तो उसकी विश्वसनीयता हमेशा कायम रहेगी। जनता की लोक मान्यताओं के आधार पर ही प्रेस को चौथे स्तंभ का दर्जा मिला हुआ है।

    आयोजन में दैनिक दोपहर मेट्रो के संपादक राजेश सिरोठिया और आईएनएच टीवी के ब्यूरो प्रमुख अजय त्रिपाठी ने भी स्वर्गीय देवलिया जी के संस्मरण सुनाए। आभार प्रदर्शन मुख्यमंत्री प्रकोष्ठ के जनसंपर्क अधिकारी अशोक मनवानी ने किया। आयोजन में स्वर्गीय देवलिया जी की धर्म पत्नी श्रीमती कीर्ति देवलिया और पुत्र आशीष देवलिया जी ने आनलाईन भागीदारी की। उनकी बेटियों सुश्री अरुणा और अपर्णा देवलिया भी आयोजन में शामिल थीं। समिति के पदाधिकारियों ने पुष्प गुच्छ भेंटकर अतिथियों का अभिनंदन किया। इनमें श्री राजेश सिरोठिया,राजीव सोनी,बृजेश राजपूत,ओपी दुबे,राकेश पाठक,आलोक-शैलजा सिंघई एवं अन्य पूर्व छात्र भी शामिल थे।

  • मास्टर प्लान में माफिया की घुसपैठ बोले बिहारीलाल जी

    मास्टर प्लान में माफिया की घुसपैठ बोले बिहारीलाल जी

    भोपाल,26 जून(प्रेस सूचना केन्द्र)। नगर विकास मंच मध्यप्रदेश के संयोजक बिहारीलाल जी का कहना है कि राजधानी के सुनियोजित विकास के लिए प्रस्तावित मास्टर प्लान के ड्राफ्ट में आमूलचूल बदलाव करना जरूरी है। ये मास्टर प्लान विधि सम्मत नहीं है और इसे इतनी जल्दबाजी में बनाया गया है कि इसके ऊटपटांग स्वरूप का लाभ लेते हुए माफिया ताकतों ने बेशकीमती जमीनों को हथियाने और बेचने का जाल बुन डाला है। भू माफिया ने राजधानी में रोजगार के अवसर विकसित किए बगैर लोगों को गांवों से खदेड़कर भीड़ जुटाने का षड़यंत्र रचा है। प्रदेश के समन्वित विकास के लिए प्रदेश के विभिन्न शहरों के मास्टर प्लान के साथ ही राजधानी का नगर निवेश भी किया जाना जरूरी हो गया है।

    आज एक पत्रकार वार्ता में नगर विकास मंच मध्यप्रदेश के पदाधिकारियों के साथ नगर तथा ग्राम निवेश विभाग मध्यप्रदेश के सेवानिवृत्त असिस्टेंट डायरेक्टर श्री बिहारी लाल ने कहा कि राजधानी के मास्टर प्लान के ड्राफ्ट में भारी गड़बड़ियां हैं। इसका महाविशाल स्वरूप वेवसाईट पर इस तरह दर्शाया गया है कि जिसे आम लोग पढ़ समझ नहीं सकते। इसके संपादित स्वरूप को पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित किया जाना जरूरी है। शहर के विकास में रुचि रखने वाले लोग इससे नगर विकास के संबंध में अपनी कीमती राय से शासन को अवगत करा सकेंगे। प्रेस वार्ता में मंच के अजय लखवानी समेत कई अन्य पदाधिकारी भी उपस्थित थे।

    उन्होंने कहा कि राजधानी की वर्तमान भूमियों के मानचित्र बनाकर उन्हें वार्डवार प्रदर्शित किया जाना जरूरी है ताकि लोग भविष्य की योजनाओं के संबंध में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकें। इस मास्टर प्लान को संक्षिप्त पुस्तक के रूप में और हिंदी भाषा में प्रकाशित किया जाना जरूरी है। मास्टर प्लान का ये ड्राफ्ट राजधानी के ही 284 गांवों की पंचायतों के अधिकारों का दमन कर रहा है। इससे पंचायतों के अधिकार समाप्त हो जाएंगे।

    श्री बिहारीलाल ने कहा कि एक ओर जब भारत सरकार आत्मनिर्भर भारत की योजना पर कार्य कर रही है वहां राजधानी में रोजगार के अवसर न होने पर ही अंधे शहरीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है।शहर में लगभग 50 हजार से ज्यादा आवासीय प्रकोष्ठ खाली पड़े हैं। इसके बावजूद माफिया ताकतें शहर में और भी ज्यादा भवन बनाने का षड़यंत्र रच रही है।चीन में विकास के नाम पर ऐसे ही कई शहर खाली पड़े हैं जिन्हें भूतिया शहर कहा जाता है।सरकार की ये जवाबदारी है कि वो बेतरतीब शहरीकरण को रोककर लोगों को मौजूदा आवासों की सुविधा उपलब्ध कराए।

    पत्रकार वार्ता में मौजूद नागरिकों ने जब उनसे सवाल किया कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में नगरीय विकास मंंत्री जयवर्धन सिंह किन माफिया ताकतों के इशारे पर ये मास्टर प्लान लागू कर रहे थे तो उन्होंने कहा कि कई अन्य ताकतें भी शहरी विकास की आड़ में अपना उल्लू सीधा करना चाह रहीं हैं। गौरतलब है कि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के इशारे पर कमलनाथ सरकार ने प्रदेश के कई शहरों में एक साथ मास्टर प्लान लागू करके गांवों से लोगों को खदेड़ने की तैयारी की थी,सरकार के अवसान के बाद ये स्थितियां बदल गईं हैं। इस स्थिति में शहरों और गांवों के समन्वित नियोजन की जरूरत महसूस की जा रही है। कोरोना के कहर के बाद तो इस योजना की प्रासंगिकता कई सवालों से घिर गई है।

  • होलिका में गौकाष्ठ का  उपयोग करें- कलेक्टर

    होलिका में गौकाष्ठ का उपयोग करें- कलेक्टर

    भोपाल12 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)।कलेक्टर तरूण पिथोड़े और केन्द्रीय पर्यावरण विभाग के अधिकारियों के साथ हुई चर्चा में निर्णय लिया गया कि इस बार होलिका दहन में लकड़ी का उपयोग नहीं करते हुए अधिकाधिक गौकाष्ठ का उपयोग हो इसके लिए विशेष अभियान चलाकर नागरिकों और स्कूली विद्यार्थियों को जागरूक किया जाये । भोपाल जिले में शवदाह गृहों में भी गौकाष्ठ का उपयोग हो इसके लिए भी मुहिम चलाई जायेगी । पर्यावरणविद डॉ. योगेश सक्सेना ने बताया कि जिले की शासन सेअनुदान प्राप्त गौशालाएं गौकाष्ठ का निर्माण कर शवदाह गृहों एवं लकड़ी के टालों पर इसका विक्रय कर रोजगार का जरिया बनाया जा सकता है । इसी प्रकार सेन्ट्रल जेल भोपाल के कैदियों को भी गौकाष्ठ निर्माण कराकर रोजगार से जोड़ा गया है । इसके लिए गोकाष्ठ निर्माण की मशीन जेल परिसर में स्थापित की गई है ।

    पर्यावरण संरक्षण प्रदेश के लिए स्थाई जरूरतों में से एक है । पर्यावरण केसंरक्षण, बचाव और हरा भरा शीतल प्रदेश हो इसके लिए शासन प्रशासन हर संभव प्रयास कर रहा है । पेड़ों को कटने से बचाने के लिए गौकाष्ठ आधारित लकड़ी, कंडे और अन्य संसाधन आज पर्यावरण को सामान्य स्थिति में लाने के लिए उपयोग में लाए जा रहे हैं ।

    कमिश्नर एवं कलेक्टर भोपाल के इस अभियान से नवाचार हो रहे हैं । गौकाष्ठ के उपयोग से सघन जंगल, जलवायु और पर्यावरण को बचाने में मदद मिलेगी । गौकाष्ठ आधारित वस्तुएं पर्यावरण को नुकसान से बचाने के लिए उपयोग में लाई जा रही हैं ।इस ओर कईं सामाजिक संस्थाएं, समाजसेवी भी अपना योगदान कर रहे हैं । गौकाष्ठ के उपयोग से जहां पर्यावरण को नई ऊर्जा मिल रही है वहां इसके उपयोग से पर्यावरण और बेवक्त बदलते मौसम की प्रतिकूल परिस्थिति को बदलने में मदद मिल रही है । गौकाष्ठ के उपयोग से जहां पेड़ों को कटने से बचाने में मदद मिलेगी वहां इसके उपयोग से रोजगार के नवीन अवसरों का सृजन हो सकेगा । साथ ही विभिन्न संस्थाओं को, आजीविका मिशन और गौशालाओं को पर्याप्त व्यवस्था के साथ साथ उनकी आर्थिक स्थिति में भी बदलाव लाया जा सकेगा । महिलाओं को भी रोजगारसे जोड़ा जा सकेगा । इससे शासन प्रशासन की विभिन्न योजनाओं का लाभ विभिन्न संस्थाओं और शासकीय अशासकीय गौशालाओं को भी मिल सकेगा ।

    क्या है गौकाष्ठ

    गाय के गोबर से निर्मित कंडे रूपी लकड़ियां हैं । गौकाष्ठ के उपयोग से वातावरण में कार्बनडाई आक्साईड की मात्रा भी कम होती है और गौकाष्ठ की केलोरिक वेल्यू लकड़ी से अधिक और घनत्व ज्यादा होता है जो पर्याप्त मात्रा में ईधन के लिए भी अनुपयोगी है । गौकाष्ठ निर्मित वस्तुएं प्रदूषण को रोकने, बढ़ती जरूरतों के लिए उपयोगी साबित हो रही हैं । गौकाष्ठ दैनिक जीवन में भी बहुतायत उपयोगी साबित हो रही है, साथ ही कईं कार्यक्रमों में भी इसकी उपयोगिता प्रमाणित है । गौकाष्ठ के उपयोग से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के नए अवसर प्राप्त होंगे । साथ ही पूरे प्रदेश में लकड़ियों एवं अन्य वस्तुओं के जलाने से पर्यावरण को बचाया जा सकेगा । पेड़ों की अत्यधिक कटाई को रोकने में मदद मिलेगी एवं इसके दोहरे उपयोग से हम पर्यावरण के संरक्षण में भागीदार बनेंगे और वातावरण को शुद्ध बना सकेंगे ।

  • कमलनाथ की राजनीति को नसीहत की दरकार

    कमलनाथ की राजनीति को नसीहत की दरकार

    गुलाम भारत में अंग्रेजों के ऊटपटांग कानूनों के विरोध में तरह तरह से विरोध किया जाता रहा है। उसकी वजह ये थी कि अंग्रेजी सल्तनत ने भारत को लूटने के लिए वे कानून बनाए थे। बाद में जब एओ ह्यूम की कांग्रेस को गांधीजी ने अंग्रेजों से संवाद का माध्यम बनाया तब कानूनों का विरोध अदालतों में भी किया जाने लगा। आजाद हिंदुस्तान में गांधी कांग्रेस की नकलची इंदिरा कांग्रेस संसद में पारित कानूनों को लेकर जनता को भड़काने में लगी है। इंदिरा कांग्रेस के नेता अपनी इस शैली से खुद को महात्मा गांधी की कांग्रेस बताना चाह रहे हैं। वो ये तब कर रहे हैं जब पूरा देश एक नई दिशा में चल पड़ा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मेक इन इंडिया उत्पादन बढ़ाकर पूंजी का उत्पादन करना चाहता है जबकि कांग्रेस का मानस आज तक थानेदारी के माहौल से आगे नहीं बढ़ पाया है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की कार्यशैली की लाखों आलोचनाएं की जा सकती है। बेशक वे एक सफल शासक नहीं साबित हो पाए। इसके बावजूद वे एक ऐसे मुख्यमंत्री जरूर साबित हुए जिसने प्रदेश को आगे बढ़ने का अवसर दिया। जिसने प्रदेश के लोगों के कामकाज में बेवजह अड़ंगे नहीं लगाए। इसके विपरीत मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार आपातकाल की मनःस्थिति से बाहर नहीं आ पा रही है। सरकार का शुद्ध के लिए युद्ध अभियान हो या बजट की कैपिंग करने की कार्यशैली ये दोनों ही चौकीदारी के मानस से बाहर नहीं आ पा रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह चिल्ला चिल्लाकर बोलते रहे कि देश में अब इंस्पेक्टर राज की वापिसी नहीं होगी। इसके बावजूद उनकी ही पार्टी की सरकार ने मध्यप्रदेश को थानेदारी के जाल में उलझा दिया है। ये थानेदारी भी छुप छुपकर की जा रही है। जिस नागरिकता कानून को संसद ने बहुमत से पारित किया उसके खिलाफ राज्य सरकार कुछ ऐसा माहौल बना रही है जैसे संसद में बैठे लोग अंग्रेज हों और उनकी नियत देश का शोषण करने की है। जबकि हकीकत ठीक विपरीत है। खुद को उद्योगपति कहलाने वाले कमलनाथ बेहद कमजोर व्यवस्थापक साबित हो रहे हैं। पिछली सरकार की देखासीखी करके उनके वित्तमंत्री तरुण भानोट ने भले ही दो लाख 14 हजार करोड़ का बजट बना दिया हो लेकिन कमोबेश सभी विभागों को बजट की राशि देने में कटौती कर दी है। हर विभाग को कम से कम चालीस फीसदी बजट कम दिया जा रहा है। बजट की इस कटौती से हाहाकार मचा है। इससे निपटने के लिए उन्होंने मुस्लिमों को नागरिकता कानून के विरोध में भड़काना जारी रखा है। उनके एक विधायक आरिफ मसूद इस अभियान के सूत्रधार हैं। उन्होंने पुराने भोपाल के इलाकों में इतनी दहशत फैलाई कि लोगों ने अपनी दूकानें बंद रखने में ही भलाई समझी। विधायक आरिफ अकील के क्षेत्र में व्यापारियों ने बेखौफ होकर अपना कारोबार जारी रखा लेकिन आरिफ मसूद के इलाके में भारत बंद को सफल दिखाने के लिए दूकानें बंद कराई गईं। सरकार की शह इतनी दबी छुपी है कि पूरे प्रदेश में पुलिस तंत्र का एक हिस्सा बंद का समर्थन करते नजर आया। पुलिस के कुछ आला अधिकारियों का तो कहना था कि लोग यदि कानून का विरोध कर रहे हैं तो फिर उन्हें क्यों रोका जाए। ये पहली बार हो रहा है कि कोई सरकार अपने ही देश के कानून के विरोध को शह दे रही हो। निश्चित रूप से ये समझदारी भरा कदम नहीं है। इससे केन्द्र राज्य के बीच बेवजह कटुता का माहौल बन रहा है। मध्यप्रदेश की जनता के एक हिस्से ने कांग्रेस को सत्ता में काम करने का अवसर दिया है। उसका भी सोच प्रदेश का विकास करना है। जबकि राज्य सरकार इस सत्ता का उपयोग केन्द्र से टकराव के लिए कर रही है। उसकी इस खुन्नस से राज्य के हित प्रभावित हो रहे हैं। प्रदेश के लोगों की जीवचर्या में सहयोग देने की बात आती है तो कमलनाथ और उनके मंत्री कहने लगते हैं कि खजाना खाली है। जबकि राज्य को हर महीने उतनी ही आय हो रही है जितनी पिछली सरकार के कार्यकाल में हो रही थी। राज्य सरकार जीएसटी कलेक्शन बढ़ाने का माहौल भी नहीं बना पा रही है। मुख्यमंत्री अपने सचिवालय में मैराथन बैठकें करते रहते हैं। वे अधिकारियों पर अधिक राजस्व जुटाने के लिए दबाव बनाते हैं जबकि इसके बावजूद खजाने की आय नहीं बढ़ रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि तबादले और पोस्टिंग के धंधों की वजह से राज्य की आय का एक बड़ा हिस्सा काला धन बना रहा है। उसे रोकने के लिए सरकारी तंत्र छापेमारी कर रहा है। इस पूरी कवायद ने प्रदेश में तनाव के हालात बना दिए हैं। राज्य सरकार की इस अज्ञानता भरी कवायद की वजह से राज्य का माहौल तनावपूर्ण है। सीएए का विरोध करके राज्य सरकार ने खुद को फिजूल की उलझन में फंसा लिया है। प्रदेश के जिम्मेदार लोगों को चाहिए कि वे सरकार को नसीहत दें और प्रदेश की विकास यात्रा प्रशस्त करें।

  • टीन शेड जैन मंदिर में गणतंत्र दिवस पर झंडावंदन

    टीन शेड जैन मंदिर में गणतंत्र दिवस पर झंडावंदन

    भोपाल,26 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)।भोपाल समाज समिति, भोपाल के तत्त्वावधान में टीन शेड जैन मंदिर के प्रांगण में झण्डा वंदन कर 71 वें गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। देश भक्ति से परिपूर्ण कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में सुश्री “मितुल प्रदीप” उपस्थित रहीं।

    सुश्री मितुल, जन जन के रक्त में देशभक्ति का संचार करने वाले कालजयी गीत “ए मेरे वतन के लोगो” जैसे अनेक देशभक्ति गीतों के रचियता कवि प्रदीप की पुत्री हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता देश के अंतराष्ट्रीय स्तर के वरिष्ठ कवि एवं गीतकार श्री कुंवर बैचेन ने की। कुंवर बैचेन जी की रचनाएं देश के 7 राज्यों के कॉलेज एवं स्कूल के पाठ्यक्रमों में सम्मिलित है। उनकी अब तक 35 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है साथ ही एक महाकाव्य भी प्रकाशित हो चुका है। लगभग 60 दशकों से भी अधिक समय से काव्य मंचो का प्राधिनित्व कर रहे कवि कुंवर बैचेन के काव्यों पर लगभग 24 पीएचडी अवार्ड हो चुकी हैं एवं 8 पीएचडी शोध चलायमान हैं।

    मुख्य अतिथि ने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए अपने संबोधन में कवि प्रदीप की दो संदेशों के विषय में कहा । पहला संदेश “हम लाये हैं तूफान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के” को दृष्टिगत रखते हुए बच्चों को संबोधित करते हुए दिया कि ये देश को संभालने वाले अब ये बच्चे है जो भावी भारत के कर्णधार हैं। दूसरे संदेश में “इंसान का इंसान से हो भाईचारा, यही संदेश हमारा’ को दृष्टिगत रखते आज के परिदृश्य में कवि प्रदीप द्वारा लिखी गयी पंक्तियों को आचरण में अंगीकार करने की अपील उन्होंने की। श्री कुंवर बैचेन ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में सकारात्मकता पर जोर देते हुए कहा कि इस समय हमें एकता के सूत्र में बधने की आवश्यकता है तभी राष्ट्र तरक्की कर पायेगा। अपने गीत “भले ही हम में तुम में कुछ, ये रूप रंग का भेद हो..है खुशबुओं में फर्क क्या गुलाब हम गुलाब तुम” के माध्यम से आज के परिदृश्य में समाधान बताने की चेष्टा की साथ ही अपने गीत ” है हमारा नमन है वतन के लिए” के माध्यम से देशभक्ति के जज़्बातों को ज़ाहिर किया।

    कार्यक्रम में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी श्री शोभित जैन आई.ए. एस, टीन शेड जैन मंदिर के अध्यक्ष अमर जैन, संस्था के अध्यक्ष राकेश सिंघई, श्री सेठी जी एवं अन्य गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।कार्यक्रम का सफल संचालन श्री शशांक जैन, आई.टी कंसलटेंट द्वारा किया गया एवं आभार प्रदर्शन अमर जी जैन द्वारा किया गया।

  • आरक्षित वर्गों का बैकलाग 20 जून तक भरें-भुवनेश पटेल

    आरक्षित वर्गों का बैकलाग 20 जून तक भरें-भुवनेश पटेल

    भोपाल,11 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। मप्र पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति, जनजाति एवं अल्पसंख्यक कर्मचारी संघ- अपाक्स के प्रांताध्यक्ष भुवनेश कुमार पटेल का कहना है कि पिछले पंद्रह सालों से आरक्षित वर्गों का बैकलाग भरने की प्रक्रिया बहुत धीमी चल रही है,पात्रताधारी लोग निर्धारित आयुसीमा पार करते जा रहे हैं इसलिए सरकार को वंचित वर्ग को लाभ दिलाने के लिए बैकलाग के खाली पदों की सौ फीसदी भरपाई 20 जून तक पूरी कर लेनी चाहिए। आज राजधानी में आयोजित अपाक्स की बैठक में उन्होंने सरकार से अनुरोध किया है कि इस अवधि में ये कार्य बखूबी निटपाया जा सकता है और इसकी तिथि को आगे बढ़ाने की नौबत भी नहीं आएगी।

    अपाक्स के पदाधिकारियों के बीच विमर्श के बाद उन्होंने कहा कि शासन की भर्ती प्रक्रिया की चयन समितियों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग सभी के प्रतिनिधियों को अलग अलग नामित किया जाए। अपाक्स परिवार ने इन सदस्यों को चिन्हित भी कर लिया है जिससे सरकार को फैसला लेने में आसानी होगी।

    श्री पटेल ने कहा कि शासन ने भर्ती प्रक्रिया में 70 फीसदी स्थान प्रदेश के मूल निवासियों के लिए आरक्षित किए हैं इसलिए निजी क्षेत्र में भी इस प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने कहा कि आरक्षित संवर्ग के अधिकारियों कर्मचारियों से जुड़े शिकायत के प्रकरणों में सहानुभूति पूर्वक विचार किया जाए और उन्हें शासन की मंशानुसार संरक्षण प्रदान किया जाए।

    राज्य प्रशासनिक सेवा से आईएएस सेवा में पदोन्नति के लिए जो 33.3 प्रतिशत पद आरक्षित हैं उनमें से पंद्रह प्रतिशत पद गैर राज्य प्रशासनिक सेवा में आरक्षित हैं। इन पदों की पूर्ति भी भाजपा शासन ने पिछले पंद्रह सालों के दौरान नहीं की है। इन पदों पर भी पदोन्नति की प्रक्रिया अभी शेष है जिसे तत्काल पूरा किया जाना चाहिए। बैठक में लंबित डीए की पांच प्रतिशत राशि का भुगतान शीघ्र किए जाने की मांग भी की गई।

    बैठक में विभिन्न कर्मचारी संगठनों के प्रतिनिधि गण सर्व श्री वीरेन्द्र खोंगल, जितेन्द्र सिंह, ओ.पी. कटियार, रामविश्वास कुशवाह, राजकुमार चंदेल, सीएस यादव, प्रकाश मालवीय,अनिल वाजपेयी समेत प्रदेश के सभी पदाधिकारियों और प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

  • दादा दरबार आश्रम में स्थानधारियों की भागीदारी बोले महंत डॉ.रविप्रकाश दादा भाई

    दादा दरबार आश्रम में स्थानधारियों की भागीदारी बोले महंत डॉ.रविप्रकाश दादा भाई

    दादा भाई डॉ.रवि प्रकाश ने मुख्यमंत्री कमलनाथ के प्रयासों पर प्रसन्नता जताई

    भोपाल 2 सितंबर। दादा दरबार की भक्ति परंपरा को देश विदेश में स्थापित करने वाले साधकों और स्थानधारी संतों के नाम पर भोपाल के आश्रम परिसर में कक्ष आरक्षित किए जाएंगे।इन कक्षों के माध्यम से धूनी वाले दादाजी के शिष्यों का जुड़ाव पूरे मध्यप्रदेश से हो सकेगा। इन संतों के संपर्क में रहने वाले शिष्यों के लिए भी आश्रम परिसर में कक्ष उपलब्ध रहेंगे। सतत धर्म चर्चा के लिए प्रवचनों का मंच भी उपलब्ध रहेगा। परिसर में अखंड ज्योति के साथ निरंतर चलने वाले यज्ञों में शामिल होने वाले साधकों और आगंतुकों के लिए परिसर की भोजनशाला साल भर चलेगी।अभी यहां प्रत्येक अमावस्या और पूर्णिमा को भंडारा होता है।

    महंत एवं संचालक डॉ.रविप्रकाश(दादाभाई) ने बताया कि श्री दादाजी धूनीवाले दरबार के समकालीन शिष्य संत के नाम से स्थापित ये कक्ष जरूरत पड़ने पर आरक्षित कराए जा सकेंगे। देश विदेश के कई स्थानों पर पिछले तीस पैंतीस सालों से धोनी माई और दादाजी की सेवा पूजा अर्चना के साथ कल्याणकारी कार्य भी संचालित किए जा रहे हैं। कई स्थानों पर तो ऐसे साधक इस भक्ति परंपरा की ध्वजा संभाले हुए हैं जिनका प्रचार भी नहीं हो पाया है। अघन त्रयोदशी दादा जी की पुण्यतिथि तक इन स्थानों को विधिवत तरीके से जोड़ लिया जाएगा। इसी के आधार पर दादाजी संप्रदाय के संत निवास की स्थापना की जाएगी। वर्तमान में दादाजी धूनीवाले दरबार श्यामला हिल्स भोपाल में जिन जिन स्थानों के स्थान धारियों के लिए नाम प्रस्तावित हैं उनमें दादाजी दरबार साईं खेड़ा खंडवा, इंदौर, छीपानेर,आवली घाट,सौंसर, पांडुर्ना,नागपुर जबलपुर, हंडिया,पुणे, मंडला, स्वामी चंद्रशेखर आनंद मुंबई एवं दादा नित्यानंद दमोह है ।

    माननीय मुख्यमंत्री कमलनाथ जी से प्रयासों का अभिनंदन

    गत 26 वर्षों से दादा जी के परम भक्तों एवं शिष्य के बीच में भावना के मंदिर की स्थापना के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ जी की ओर से जो प्रयास किया जा रहा है उस प्रयास का दादा जी भक्त शिष्य मंडल भोपाल स्वागत करता है। हम उनके इस प्रयास के प्रति उनका आभार व्यक्त करते हैं। मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ जी से हमारी ये अपेक्षा है कि भारत भवन भोपाल एवं दादाजी धूनीवाला दरबार श्यामला हिल्स भोपाल के मध्य जो समझौता हुआ था उस पर अमल किया जाए। सरकार की ओर से इस कार्य का आश्वासन पिछले चालीस सालों से लंबित है। इस समझौते में दादा धूनीवाले दरबार की भूमि के मुआवजे के संबंध में विधानसभा में तत्कालीन आवास एवं पर्यावरण मंत्री विष्णु राजोरिया ने विधायक कंकर मुंजारे के प्रश्न के जवाब में बारह आवास गृह, धर्मशाला, संस्कृत पाठशाला, पार्किंग, और कैंटीन बनाने का आश्वासन दिया था। इसकी भूमि व्यवस्था का भी पालन अब राज्य सरकार की ओर से किए जाने के संकेत मिलने लगे हैं।

    दादा जी भक्त मंडल भोपाल के शिष्यों की ओर से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री माननीय कमलनाथ जी से अपेक्षा है कि दादाजी के स्थान पंचम धाम खंडवा में भी स्थान धारी शिष्यों के पहुंचने पर ट्रस्ट की ओर से आश्रम की गरिमा के अनुसार निवास आरक्षित हो। इससे हम शिष्यों का भक्तिभाव अपने गुरुदेव के प्रति निरंतर सहज रहेगा। जिस प्रकार दादाजी धूनीवाले दरबार श्यामला हिल्स भोपाल के साधक संत गुरुदेव दादा भाई आश्रम में प्रदेश देश विदेश के समस्त स्थानधारियों के लिए कक्ष उनके नाम से बनाकर उन स्तानधारियों के लिए स्थान आरक्षित कर रहे हैं. ऐसा ही यदि खंडवा पंचम धाम में किया जाता है तो शिष्य परिवार का गौरव पूरे देश में बढ़ेगा ।

    आज की पत्रकार वार्ता में श्री दादाजी परहित सेवा संस्थान के पदाधिकारी भी उपस्थित रहे। संस्थान की ओर से पूरी दुनिया में फैले शिष्यों से लगातार संपर्क रखने के लिए आधुनिक तकनीकी साधनों का प्रयोग भी किया जा रहा है।

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  • पाकिस्तान जैसा मुल्क और नहीं चाहिए बोले गोलोक बिहारी राय

    पाकिस्तान जैसा मुल्क और नहीं चाहिए बोले गोलोक बिहारी राय

    भोपाल,4 जुलाई(प्रेस सूचना केन्द्र)।राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच के राष्ट्रीय महामंत्री गोलोक बिहारी राय का कहना है कि पिछले 70 सालों से हमने पाकिस्तान को मजबूत पड़ौसी के तौर पर खड़ा होते देखने की नीति अपनाई थी इसके बावजूद पाकिस्तान ने हर बार प्रतिफल के रूप में हमें घाव ही दिए। वह अपने ही नागरिकों को सुखी जीवन देने में असफल रहा है, इसकी वजह से कई प्रांतों में वहां के स्थानीय लोग अपनी अस्मिता के लिए लड़ रहे हैं। अब समय आ गया है कि हम अपनी नीति बदलें और अपनी अस्मिता के लिए लड़ रहे स्थानीय लोगों को अपना नैतिक समर्थन दें। ये नीति यूरोपीय देशों की तरह सह अस्तित्व के भाव को मजबूत करेगी और दक्षिण पश्चिम एशिया में शांति और समृद्धि भी बढ़ाएगी।

    आज राजधानी के विश्व संवाद केन्द्र में आयोजित एक संगोष्ठी में पाकिस्तान कल आज और कल विषय पर विभिन्न वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए।संगोष्ठी का आयोजन स्पंदन के सहयोग से किया गया था। कार्यक्रम में प्रमुख वक्तव्य राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच के राष्ट्रीय महामंत्री गोलोक बिहारी राय ने दिया। अध्यक्षता पूर्व पुलिस महानिदेशक एस.के.राऊत ने की। विषय की प्रस्तावना अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और विदेश नीति के अध्येता डॉ. अरविंद तिवारी ने रखी। प्रसिद्ध विचारक रामेश्वर शुक्ल,कुसुमलता केडिया समेत कई अन्य गणमान्य लोगों ने भी इस संगोष्ठी में भाग लिया। इस दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच की नवगठित भोपाल इकाई की भी घोषणा की गई। कार्यक्रम का संचालन देवांजन बोस ने और आभार प्रदर्शन आशुतोष ने किया।

    श्री गोलोक बिहारी राय ने कहा कि कुंभ के दौरान 14 फरवरी को जब पुलवामा हमले की सूचना पहुंची तो कुंभ मेला परिसर के तमाम पंडालों में बैचेनी की लहर दौड़ गई थी। लाखों धर्मप्रेमी नागरिकों के बीच किसी राष्ट्रीय विषय पर विषाद की इस घटना को देखकर साफ समझा जा सकता है देश से जुड़े हर भारतीय की संवेदनाएं राष्ट्र के साथ किस गहराई से एकाकार हैं। इसी के बाद 14 मार्च को देश के कुछ चिंतकों ने फैसला किया कि अब वे और पाकिस्तान नहीं चाहेंगे। इसी चिंता ने नो मोर पाकिस्तान आंदोलन को जन्म दिया और अब देश में इस विषय पर जनमत तैयार किया जा रहा है कि हम पाकिस्तान जैसे असफल विचार को और समर्थन नहीं देंगे। जो लोग इस विचार के खिलाफ पाकिस्तान में ही रहकर संघर्ष कर रहे हैं हम उन्हें अपना नैतिक समर्थन देंगे। जिस तरह यूरोप के छोटे छोटे देश एक साथ रहकर विकास की ऊंचाईयां छूने में सफल हुए हैं उसी तरह हम भी दक्षिण एशिया के विकास में, अपने पड़ौसी बलूचों और अन्य नागरिकों को अपना नैतिक समर्थन देंगे। यह कार्य हम अपने अपने शहर में रहकर भी कर सकते हैं।

    उन्होंने कहा कि जिस तरह बंगलादेश के लोगों ने सोचा कि हम बंगला भाषी हैं तो उर्दू भाषियों के अत्याचार क्यों सहें और इसी विचार ने एक नए देश को जन्म दे दिया। बंग्लादेश के लोगों ने मार्च 1971 में खुद को बंगला राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत किया था और 16 दिसंबर 1971 को बंगलादेश का एक नए देश के रूप में उदय हो गया था। भारत की सेना ने निश्चित रूप से इसमें बड़ी भूमिका निभाई थी लेकिन तब सूचना का तंत्र कमजोर हुआ करता था और मुक्तिवाहिनी के नेतृत्व में संग्राम लड़ रहे बंग्लादेशियों को इस संघर्ष की मंहगी कीमत चुकानी पड़ी थी। आज पूरी दुनिया के देश पाकिस्तान को आतंकवाद का जन्मदाता मानते हैं। पूरी दुनिया में कहीं भी आतंकवादी वारदातें होती हैं तो उनकी जड़ें पाकिस्तान में पाई जाती हैं। इस आपराधिक गतिविधियों में पूरा पाकिस्तान शामिल नहीं है। वहां के लोग इस नीति से असहमत हैं और कई प्रांतों में अपनी अस्मिता अलग स्थापित करने की लड़ाई चल रही है। पाकिस्तान के फौजी हुक्मरान उन्हें बंदूक के बल पर एक राष्ट्र के तले खड़े होने को मजबूर कर रहे हैं।ऐसे में वहां के समुदायों को अपनी पहचान स्थापित करना अधिक कठिन नहीं होगा।

    उन्होंने कहा कि पाकिस्तान शुरु से कई वैश्विक शक्तियों के हाथ का खिलौना बना रहा है। चीन ने सिल्क रूट के जरिए या अन्य अभियानों के माध्यम से पाकिस्तान को मंहगा कर्ज दे रखा है। जिसे चुकाना पाकिस्तान के बस की बात नहीं है। पाकिस्तान में बड़ी संख्या में चीन के निवेशक पहुंच चुके हैं। कई पाकिस्तानियों ने तो अपने मकान केवल इसलिए खाली छोड़ रखे हैं कि वे उन्हें चीन से आने वाले लोगों को किराए पर दे सकेंगे। सिल्क रूट के हर दो तीन सौ किलोमीटर पर चीनी भाषा मंदारिन सिखाने वाले स्कूल खुल गए हैं। बडी़ संख्या में पाकिस्तानी लड़कियां चीनी रेडलाईट एरिया में भेजी गईं हैं। ऐसे में भारत को अपनी नीति बदलनी होगी और पाकिस्तान के उद्यमी समुदायों को उनकी अस्मिता स्थापित करने के अभियानों को अपना नैतिक समर्थन देना होगा।

    उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ही विश्व में ऐसा अनोखा देश है जहां की राष्ट्रीयता इस्लाम है। दुनिया का कोई देश धर्म को राष्ट्रीयता से जोड़कर नहीं देखता। यही वजह है कि धर्म की आड़ में पनपी अनैतिकता ने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था चौपट कर दी है। उन्होंने बताया कि पाकिस्तानी दार्शनिक डॉ. अबरार ने तो इन हालात को देखकर कहा है कि वर्ष 2027 तक पाकिस्तान नाम की चिड़िया विलुप्त हो जाएगी। हमें अपनी वैश्विक यात्रा जारी रखना है इसके लिए पाकिस्तान का अब और न होना जरूरी है। भारत के पडौ़स में छोटे देश होंगे तो वे अपनी विकास यात्रा आसानी से जारी रख सकते हैं। पाकिस्तान जिस विचार पर अलग हुआ था उसकी असफलता छुपाने के लिए वहां के शासक गलतियों पर गलतियां किए जा रहे हैं जिससे समूचे दक्षिण एशिया की विकास यात्रा प्रभावित हो रही है।

    कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पूर्व पुलिस महानिदेशक एसके राऊत ने कहा कि पहले देश की राष्ट्रीय नीति गोपनीय रखी जाती थी लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच ने जिस तरह देश भर में जनसंवाद का आंदोलन छेड़ा उसके बाद अब देश की विदेश नीति में आम जनता के विचार भी सहयोगी साबित हो रहे हैं। चीन को लेकर सरकार की जो भी विदेश नीति हो पर देश में नागरिकता बोध का केन्द्र राष्ट्र बन जाने के बाद विदेशी माल का बहिष्कार करने का भाव तो जनता के बीच जागया ही जा सकता है। पाकिस्तान में लोग सफल राष्ट्र के रूप में खड़े होने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हमारा नैतिक समर्थन उन्हें भी सुखी बनाएगा और भारत की विकास यात्रा को भी ऊंचाईयों तक ले जाएगा। उन्होंने आव्हान किया कि ज्यादा से ज्यादा लोग राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच से जुड़ें और भारत को विश्व कल्याण के लिए नेतृत्व करने वाला देश बनाने में सहयोगी बनें।

  • भगवा को आतंकवादी बताने वाले दिग्विजय सिंह अब खुद के हिंदू होने के प्रमाणपत्र बंटवाने लगे

    भगवा को आतंकवादी बताने वाले दिग्विजय सिंह अब खुद के हिंदू होने के प्रमाणपत्र बंटवाने लगे

    भोपाल,29 अप्रैल (प्रेस सूचना केन्द्र)।भाजपा की लोकसभा प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा के खिलाफ षड़यंत्र करके भगवा को आतंकवादी बताने वाले दिग्विजय सिंह अब खुद के हिंदू होने के प्रमाणपत्र बंटवा रहे हैं। जैसे जैसे मतदान की तारीख नजदीक आ रही है उन्होंने साधु संतों की फौज सड़कों पर उतार दी है जो लोगों को कांग्रेस प्रत्याशी दिग्विजय सिंह के हिंदू होने के प्रमाण पत्र बांट रहे हैं। आज ऐसे ही एक कथित महामंडलेश्वर को पत्रकारों के तीखे सवालों ने ऐसे झमेले में डाल दिया कि वे पहले तो पांच क्विंटल मिर्ची से यज्ञ करने फिर समाधि लेने की धमकी देने लग गए।

    कांग्रेस प्रवक्ता फिरोज सिद्दीकि के साथ एक होटल में पत्रकार वार्ता आयोजित करने वाले इस साधु स्वामी बैराग्यानांद ने खुद को निरंजनी अखाड़े के महामंडलेश्वर बताया और कहा कि मैं दिग्विजय सिंह की जीत की गारंटी लेकर आया हूं । अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए मैं पांच क्विंटल मिर्च से यज्ञ करूंगा, और उनकी जीत के लिए समाधि भी लगाऊंगा।पत्रकारों ने उनसे पूछा था कि वे भगवा आतंकवाद की परिभाषा रचकर हिंदुओं को बदनाम करने वाले कांग्रेस के दिग्विजय सिंह की पैरवी क्यों कर रहे हैं। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि नर्मदा की परिक्रमा करके दिग्विजय सिंह खुद को हिंदू साबित कर दिया है।

    पत्रकारों ने सवाल किया कि जो व्यक्ति सत्ता में रहकर साध्वी उमा भारती के बारे में अनर्गल प्रलाप करता था, साध्वी प्रज्ञा को भगवा आतंकवाद की कहानी में प्रताड़ना दिलवाता रहा आप उसकी पैरवी क्यों कर रहे हैं। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि जगतगुरु स्वामी स्वरूपानंद ने अपना आशीर्वाद देकर उन्हें धर्म की सेवा में लगाया है इसलिए बीस हजार साधू घर घर जाकर दिग्विजय सिंह की जीत के लिए वोट मांगेंगे।

    कांग्रेस प्रत्याशी की पैरवी करते हुए बैराग्यानंद अपना आपा खो बैठे और पत्रकारों पर ही अनर्गल आरोप लगाने लगे इस पर कई पत्रकार उखड़ गए और उन्होंने कहा कि हम चुनाव में कोई पार्टी नहीं हैं जो आप हमसे ही सवाल कर रहे हैं। इस बीच कई पत्रकारों से उनका विवाद होने लगा और संचालन कर रहे कांग्रेस प्रवक्ता फिरोज सिद्दीकि ने पत्रकार वार्ता समाप्त कर दी।

  • नए जूते पहिनकर परिवारवाद को कुचलने चलीं साध्वी प्रज्ञा

    नए जूते पहिनकर परिवारवाद को कुचलने चलीं साध्वी प्रज्ञा

    -आलोक सिंघई-

    आमचुनाव में साध्वी प्रज्ञा का नाम आते ही पूरे देश में एक बहस छिड़ गई है। मालेगांव बम धमाके को साम्प्रदायिक रंग देने के लिए जिस तरह से भगवा आतंकवाद की कहानी गढ़ी गई वो परिवारवाद को बचाए रखने के षड़यंत्रों का जीवंत दस्तावेज बन गई है। जिन जिन देशों में परिवारवाद ने सत्ता को अपने घर की चेरी बनाया उन सभी देशों में बाद में तानाशाही का नृशंस तांडव देखने मिला है। पीड़ित और शोषित जनता ने जब उस तानाशाही को कुचला तब जाकर वे देश विकास की सीढ़ियां चढ़ने में कामयाब हुए। साध्वी प्रज्ञा के माध्यम से मोदी सरकार ने उसी जनांदोलन का आव्हान किया है जो परिवारवाद और उसके पापों से देश को निजात दिला सकता है। भाजपा का ये प्रयास कई स्थानों पर तल्ख रूप में भी सामने आया है। पार्टी ने अपने ही कई दिग्गजों के टिकिट काट दिए और नए चेहरों को चुनावी समर में उतारा है। इस बदलाव ने भाजपा के भीतर ही घमासान मचा दिया है। चुनावी टिकिट की मारामारी में इसे मोदी शाह की हेकड़ी बताने का प्रयास किया गया, जबकि नई पीढ़ी के आम मतदाता इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं।

    परिवारवाद, वंशवाद,यारवाद, पैसावाद जैसे शब्द गढ़ने वाले छद्म बुद्धिजीवी केवल किसी परिवार विशेष के सदस्यों को राजनीति में उतारे जाने पर ह्ल्ला मचाते हैं। वे इसके असर और उसके पापों पर चर्चा नहीं करते। यही वजह है कि परिवारवाद का हल्ला तो मचता है लेकिन उससे मुक्ति दिलाने की राह नहीं दिखती। वो कारण भी नहीं समझ आते जो परिवारवाद के लिए खाद पानी का काम करते हैं। नेहरू गांधी परिवार को देश की समस्याओं की जड़ माना जाता है। भारत में 55 वर्षों तक इसी परिवार का शासन रहा है।इसे बनाए रखने के लिए उसके कारिंदों ने तरह तरह के पाप किए। रियासतों, खानदानों को गरीबी दूर करने के नाम पर लूटा। परिवारवाद के खिलाफ अलख जगाने वालों को देशद्रोही बताकर जेलों में सड़ने के लिए मजबूर कर दिया। आज जब इस परिवारवाद के खिलाफ आवाज बुलंद हो रही है तब इस परिवार की जेबी संस्था बन चुकी कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में देशद्रोह कानून को समाप्त करने का वादा किया है। उन कानूनी प्रावधानों को हटाने की बात कही जा रही है जो देश की सेना को कवच प्रदान करते हैं। ये इसलिए हो रहा है क्योंकि मौजूदा सरकार इसी के सहारे कश्मीर में वंशवाद की बेल को काट रही है।

    साध्वी प्रज्ञा एक राष्ट्रवादी परिवार की बेटी हैं। उनके पिता डाक्टर के रूप में जनसेवा करते थे। बचपन से समाजसेवा के संस्कार मिले तो लोगों को करीब से देखने का मौका मिला। जनता को परेशान करने वाले गुंडों से लड़कर उन्होंने जाना कि सरकारें किस तरह असामाजिक तत्वों को प्रश्रय देती हैं। बस यहीं से उनकी राह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर मुड़ गईं। देश को परिवार मानने वालों की ये जमात जगह जगह अपना प्रभाव बढ़ा रही थी। इस पर अंकुश लगाने के लिए इसके उभरते चेहरों पर धब्बे लगाना परिवारवाद की सूची में शामिल था। वर्ष 2002 में जब शिवसेना सुप्रीमो बाला साहब ठाकरे ने पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई की साजिशों से बढ़ती आतंकवादी घटनाओं के खिलाफ हिंदुओं के आत्मघाती दस्तों को तैयार करने का आव्हान किया तो भारत की जांच एजेंसियों ने संभावित घटनाओं पर निगाह रखने के लिए एक अनुसंधान विंग तैयार की थी। इस विंग का उद्देश्य था कि इसकी आड़ में कोई आपराधिक साजिशें न आकार लेने लगें। कहा गया कि मुंबई के सीरियल बमकांड की वजह से 1993 के बाद से एटीएस और एनआईए ने इन अनुसंधानों में महारथ हासिल कर लिया था। यही एक वजह थी कि हेमंत करकरे और उनके सहयोगियों को काम करने की बहुत आजादी मिली। बाद में इसी आजादी का दुरुपयोग आर्थिक साम्राज्य खड़ा करने के लिए किया जाने लगा।

    केन्द्रीय गृहमंत्री रहे सुशील कुमार शिंदे इस सारी कवायद से वाकिफ थे। इस छानबीन की जानकारी के आधार पर दुबई,यूएई के कारोबारियों से भी उनका गहरा संबंध स्थापित हो चुका था।गांधी परिवार के विश्वस्त होने के नाते दिग्विजय सिंह भी उनके करीब आ चुके थे। सूत्र बताते हैं कि जब रिलाइंस पेट्रोकेमिकल्स बाजार से पूंजी उठा रही थी तब दिग्विजय सिंह ने भी उसमें बड़ा निवेश किया था। बाद में गांधी परिवार के हस्तक्षेप के कारण ये कारोबार ठप हो गया और सभी निवेशकों को भारी घाटा उठाना पड़ा। इस प्रक्रिया में दिग्विजय सिंह भी तेल लाबी के नजदीक आ चुके थे। भारत में तेल की खपत बढ़ाने के लिए राजीव गांधी की सरकार ने सार्वजनिक परिवहन की जगह कार बाजार को संरक्षण देना शुरु कर दिया था। ये नीतियां जारी रहें इसके लिए लोगों को आपसी तू तू मैं मैं में उलझाना जरूरी था। बताते हैं कि इसी षड़यंत्र के तहत देश में कई स्थानों पर कम प्रहारक क्षमता वाले बम धमाके किए गए। इसे हिंदू मुस्लिम रंग देने के लिए ही मालेगांव में नमाज पढ़ने जाते मुसलमानों के बीच बम फोड़ा गया।

    दिग्विजय सिंह अपने मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल में साध्वी प्रज्ञा की जांबाजी के किस्से सुन चुके थे। प्रज्ञा से जुड़े सहयोगी संगठनों पर जांच एजेंसियों की निगाह रखे जाने के कारण वे उस नेटवर्क से भी परिचित थे। यही वजह थी कि मालेगांव बम धमाके में हिंदू संगठनों की संलिप्तता दिखाने के लिए साध्वी को आरोपी बनाया गया। प्रताड़ना के बाद उन्हें अपना गवाह बनाकर भगवा आतंकवाद की कहानी को साबित करने का प्रयास भी किया गया। हालांकि इन सबसे डटकर मुकाबला करती हुई साध्वी प्रज्ञा साफ बाहर आ गईं। हेमंत करकरे की मौत के बाद एनआईए को एटीएस की जांच की असलियत मालूम पड़ गई थी।

    आज जब साध्वी प्रज्ञा भोपाल लोकसभा सीट से दिग्विजय सिंह के विरुद्ध मैदान में हैं तब परिवारवाद को बचाने के लिए किए जाने वाले षड़यंत्रों पर गौर किया जाना जरूरी है। परिवारवाद की आड़ में कैसे कैसे आर्थिक षड़यंत्र चलते हैं इन पर गौर करना भी जरूरी है। आपके आसपास ऐसे लोग भरे पड़े हैं जो अनैतिक साधनों का इस्तेमाल करते हुए परिवार को समृद्ध बनाने में जुटे रहते हैं। जो समाज के संसाधनों का उपयोग तो बेशर्मी से करते हैं पर उसे संवारने के लिए कोई प्रयास सफल नहीं होने देते। खुद दिग्विजय सिंह ने गांधी परिवार की तरह अपनी विरासत को संवारने के लिए कैसे सार्वजनिक व्यवस्थाओं को चौपट किया इसकी मिसाल उनके शासनकाल में देखी गई थी। आज भी उनके परिवार के सदस्य राजनीति के मैदान में हैं। हेमंत करकरे के सुपुत्र और दिग्विजय सिंह के सुपुत्र के बीच मित्रता के आधार क्या हैं इसे परखने के लिए किसी को दूर जाने की आवश्यकता नहीं हैं। परिवारवाद के षड़यंत्रों की तो कड़ी हर क्षेत्र में मौजूद है लेकिन राष्ट्रवाद के बहाने इन षड़यंत्रों का खुलासा होना और उन्हें धराशायी करने का ये अवसर भारत में पहली बार आया है।

    दिग्विजय सिंह को मध्यप्रदेश की जनता ने जनक्रांति के माध्यम से हराया था। एक बार फिर जब दिग्विजय सिंह परिवारवाद के शीर्ष पर पहुंचने का जतन कर रहे हैं तब मोदी सरकार ने परिवारवादी षड़यंत्रों की प्रताड़ना झेल चुकी साध्वी प्रज्ञा को मैदान में उतारा है। भोपाल के लोगों को तय करना है कि वे परिवारवाद को संरक्षण देना चाहते हैं या फिर राष्ट्रवाद को। यूं तो सारे देश में ये माडल एक समान रूप से लागू होता है पर भोपाल में इसकी अग्निपरीक्षा हो रही है और साध्वी प्रज्ञा ने नए जूते पहिनकर इससे निपटने की तैयारी कर ली है।

  • सिंधी अस्मिता से खिलवाड़ बर्दाश्त नहींः केसवानी

    सिंधी अस्मिता से खिलवाड़ बर्दाश्त नहींः केसवानी

    भोपाल। सिंधु एजुकेशनल वेल्फेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष दुर्गेश केसवानी के नेतृत्व में सिन्धी समाज का एक प्रतिनिधि मंडल ने आज मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी से मिलकर इन्दौर के कांग्रेस उम्मीदवार पंकज संघवी के समर्थक द्वारा भाजपा प्रत्याशी शंकर लालवानी एवं सिंधी समाज को अपशब्द कहने वाले के कठोर कार्यवाही की मांग की है।  प्रतिनिधिमण्डल ने कहा कि आदर्श आचार संहिता लागू किये जाने के बाद भी कांग्रेस के इंदौर क्षेत्र से प्रत्याशी पंकज संधवी अपने समर्थक श्रेयश झवर के माध्यम से भाजपा उम्मीदवार शंकर लालवानी को सिंधी दलाल बताया गया है। सिंधी समाज को गोली मारने का कथन कहा गया है। जिसकी शिकायत की वीडियो चुनाव को सौंपी है। शंकर लालवानी भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं एवं सिंधी समाज के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। पंकज संघवी के समर्थक श्रेयश झवर द्वारा ऐसे कथन करने एवं इस अभद्रतापूर्ण टिप्पणी एवं भाषा का प्रयोग करने से प्रत्येक सिंधी समाज के लोगों को ठेस पहुँची है।  शिकायत में कहा है कि शंकर लालवानी न सिर्फ भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता है, सिंधी समाज आदर के केन्द्र भी हैं। उन पर ऐसी अभद्र टिप्पणी करने से सम्पूर्ण सिंधी समाज में रोष है। इसलिये इस प्रकरण को संज्ञान में लेकर आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले इन्दोर क्षेत्र से कांग्रेस के प्रत्याशी श्री पंकज सिंघवी एवं उनकें समर्थक श्रेयश झवर पर नियमानुसार वैधानिक कार्यवाही करने की मांग की।  इस अवसर पर चन्द्रकुमार तक्तानी, जयकिशन आहुजा, श्री महेश शर्मा, मनोज रायचंदानी, रवि सतवानी, रोहित जसवानी, दिनेश दुलानी, श्याम वाधवानी, हरिष कुमार, यश कुमार, संतोष ललवानी, नीरज कुमार सहित अनेक लोग उपस्थित थें। 

  • प्रज्ञा सच्ची राष्ट्रभक्तः विनय सहस्त्र बुद्धे

    प्रज्ञा सच्ची राष्ट्रभक्तः विनय सहस्त्र बुद्धे

                    भोपाल। देशद्रोही मानसिकता के लोग चुनाव लड़ सकते हैं तो भारत माता की एक बिटिया और सच्ची राष्ट्रभक्त भोपाल की प्रतिनिधि क्यों नहीं बन सकती। यह बात भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, मप्र के प्रभारी एवं राज्यसभा सांसद डॉ. विनय सहस्त्रबुद्धे ने बुधवार को टीटी नगर स्थित गैमन परिसर बी ब्लाक में भोपाल लोकसभा क्षेत्र के मुख्य चुनाव कार्यालय का उद्घाटन अवसर पर कही। कार्यक्रम का उद्घाटन मंचासीन पदाधिकारियों ने भारत माता, पंडित दीनदयाल उपाध्याय और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के चित्रों पर दीप प्रज्जवलित कर किया। कार्यक्रम का संचालन जिला अध्यक्ष विकास विरानी एवं आभार आलोक संजर ने माना।

    भगवा आतंकवाद शब्दावली के पीछे घिनौनी राजनीति

                    डॉ. सहस्त्रबुद्धे ने कहा कि भगवा आतंकवाद शब्दावली के गैर जिम्मेदाराना उपयोग के पीछे घिनौनी राजनीति है, जो कार्यकर्ता के नाते हमें समझलेनी चाहिए और जनता के बीच जाकर उसे समझाना चाहिए। आतंकवाद को कुछ लोगों ने मजहब विशेष से जोडऩे की कोशिश की। आतंक की प्रवृत्ति का संबंध एक मजहब विशेष, भगवा रंग के साथ जोडऩा इस संस्कृति का अपमान है। मोदी सरकार ने तलाक पीड़ित मुस्लिम बहिनों के लिए कानून लाने की कोशिश की तो विपक्ष ने सहयोग नहीं किया। साध्वी प्रज्ञा चुनाव मैदान में वोट बैंक की राजनीति को खत्म करने के लिए उतरी हैं इसलिए भोपाल नगरी को एक नया इतिहास रचने का अवसर मिला है। हमें समाज के सभी वर्गों में जाकर बताना है कि साध्वी प्रज्ञा भोपाल के विकास, 26लाख जनता की आकांक्षा को लेकर चुनाव लड़ रही हैं। साध्वी ने सोशल मीडिया पर अपील की है कि आम जनता की अपेक्षाओं को समाहित कर भोपाल का नया स्वरूप बनाया जाएगा।

    यह चुनाव विकास बनाम बंटाढार का है

                    पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं सांसद श्री प्रभात झा ने कहा कि इस चुनाव का महत्व अलग प्रकार से बन गया है। जिस उददेश्य के लिए यह चुनाव हो रहा है, उससे इस कार्यालय की प्रतिष्ठा और अधिक बढ़ जाती है। भोपाल लोकसभा का चुनाव सामान्य न होकर विकास बनाम बंटाढार का चुनाव है, इसलिए हम अपनी-अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करेंगे। कार्यालय के उद्घाटन का संदेश हम अपने कार्य की गति और बढ़ाएंगे। उन्होंने कहा कि ये चुनाव अपने आप में एक इतिहास बनाएगा। इसका अर्थ यह नहीं कर्मभूमि से किए कर्म से जो न्याय युद्ध शुरू हुआ है। उस न्याय युद्ध में न्याय होगा। ईश्वर न्याय करेगा और साध्वी प्रज्ञा चुनाव जीतेंगी। यह इसलिए होगा क्योंकि हम सब विश्वास भाव से काम करेंगे। हम सब साध्वी प्रज्ञा के प्रतीक के रूप में काम करेंगे। कार्यालय और कार्यकर्ता की मर्यादा बढ़ेगी। हमें और अधिक तेजी से जुटना है।

                    कार्यक्रम में लोकसभा प्रभारी जसवंत हाड़ा, प्रदेश उपाध्यक्ष रामेश्वर शर्मा, प्रदेश मंत्री श्रीमती कृष्णा गौर, संभागीय संगठन मंत्री आशुतोष तिवारी, महापौर आलोक शर्मा, प्रदेश प्रवक्ता श्री राहुल कोठारी, भगवानदास सबनानी, डॉ. हितेश वाजपेयी, श्री अंशुल तिवारी, श्री सत्यार्थ अग्रवाल सहित जिला पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता उपस्थित रहे। 

  • कर्ज में डूबी मैट्रो मंहगी पड़ेगी

    कर्ज में डूबी मैट्रो मंहगी पड़ेगी

    दिल्ली9 मार्च,( विनायक चटर्जी)। कुछ सप्ताह पहले लंदन अंडरग्राउंड ने अपना परिचालन शुरू होने की 156वीं वर्षगांठ मनाई। वह दुनिया के शुरुआती रेल तंत्रों में से एक है और उसने दर्जनों शहरी परिवहन नेटवर्क के डिजाइन को प्रभावित किया है। यहां तक कि उसके मशहूर मानचित्र तक का अनुकरण किया गया। दिल्ली मेट्रो में ‘माइंड द गैप (दूरी का ध्यान रखें)’ जैसी उसकी मौलिक घोषणा और उसके मानचित्र को देखने पर लगता है कि उस पर लंदन अंडरग्राउंड मेट्रो का असर है। ऐसा तब है जबकि दिल्ली मेट्रो को पैदा हुए अभी सिर्फ 16 वर्ष हुए हैं। यानी वह लंदन अंडरग्राउंड के कई सालों बाद अस्तित्व में आई है। 

    परंतु बुनियादी ढांचा क्षेत्र में नए होने का एक अर्थ बेहतर होना भी होता है क्योंकि बाद में बनने वाली परियोजनाएं, पिछली परियोजनाओं की सफलता और विफलता से काफी कुछ सीख चुकी होती हैं। बड़े और हवादार स्टेशन, आधुनिक रेल ट्रैक और डिब्बे तक दिल्ली मेट्रो तकनीकी तौर पर न केवल लंदन अंडरग्राउंड बल्कि कई अन्य पुरानी मेट्रो रेल व्यवस्थाओं मसलन न्यूयॉर्क मेट्रो आदि से भी काफी बेहतर है। 

    दिल्ली मेट्रो बहुत तेजी से प्रगति कर रही है। उसके बुनियादी विकास के आंकड़े सफलता की कहानी स्वयं कहते हैं। दिल्ली मेट्रो के ट्रैक की कुल लंबाई अब करीब 327 किलोमीटर हो चुकी है जो लंदन अंडरग्राउंड की 402 किमी की लंबाई के काफी करीब है। लंदन में 270 स्टेशन हैं जबकि दिल्ली में 236 स्टेशन हैं। दिल्ली जल्दी ही उसे पार कर सकता है। उसने 20 वर्ष में कमोबेश वह हासिल कर लिया है जहां तक पहुंचने में लंदन को 150 वर्ष लग गए हैं। 

    परंतु इसे अगर दूसरे तरीके से देखें तो दिल्ली मेट्रो को अभी भी अपनी समकक्ष मेट्रो रेल परियोजनाओं की तुलना में लंबी दूरी तय करनी है। लंदन अंडरग्राउंड में रोजाना 50 लाख लोग यात्रा करते हैं जबकि दिल्ली में हर रोज यात्रा करने वालों की तादाद 25 लाख है। हालांकि लंदन की आबादी दिल्ली की आबादी की तुलना में आधी है। दिल्ली मेट्रो के यात्रियों की तादाद 2017-18 में इससे ठीक एक वर्ष पहले की तुलना में कम ही हुई है। 

    यात्रियों की संख्या में इस कमी के लिए कई लोग लगातार दोबारा किराये में इजाफे को जिम्मेदार बताते हैं। सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वॉयरनमेंट की एक रिपोर्ट में कहा गया कि दिल्ली मेट्रो, वियतनाम की हनोई मेट्रो के बाद दुनिया की दूसरी सबसे महंगी मेट्रो सेवा है। यह आकलन एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति द्वारा अपनी मासिक आय में से मेट्रो यात्रा किराये के रूप में व्यय की जाने वाली औसत राशि पर आधारित है। हालांकि दिल्ली मेट्रो ने स्वयं इसका विरोध करते हुए कहा कि किराये में बढ़ोतरी काफी समय के बाद की गई है। कहा गया कि इस अवधि में राजधानी में औसत वेतन में बढ़ोतरी के साथ किराया उतना ज्यादा नहीं रह गया है। 

    परंतु दिल्ली मेट्रो की यात्रा करने वालों की संख्या मुंबई की उपनगरीय रेल से महज एक तिहाई है। मुंबई की उपनगरीय रेल सेवा अपने आप में लंदन अंडरग्राउंड जैसी ही अहमियत रखती है। दिल्ली मेट्रो के नेटवर्क का विस्तार होने के साथ यह अंतर कम होता जाएगा लेकिन एक सवाल बरकरार है कि आखिर दिल्ली मेट्रो के प्रदर्शन का आकलन किस मानक पर किया जाए? इसके अलावा देश भर में शुरू हो रही नई मेट्रो रेल परियोजनाओं को क्या सबक लेने की आवश्यकता है? उनमें से कई तो दिल्ली मेट्रो के ही ढर्रे पर आगे बढ़ रही हैं।

    दुनिया भर में शहरी मेट्रो तंत्र से जुड़े अहम निर्णयों को इस बात से जूझना पड़ रहा है कि समाज के सभी धड़ों तक उसकी पहुंच और किराये को व्यवहार्य बनाए रखने के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए और इस दौरान सेवा को वित्तीय रूप से भी व्यवहार्य बनाए रखा जाए। यूरोप के अधिकांश देशों और अमेरिका में परिचालन लागत और यात्री किराये के बीच का अनुपात ऐसा है कि राजस्व जुटाने के लिए उनको सब्सिडी अथवा अन्य उपाय अपनाने पड़ते हैं। दिल्ली मेट्रो के किराये में बढ़ोतरी के बाद दिल्ली अथवा केंद्र सरकार की सब्सिडी पर इसकी निर्भरता कम हुई है। दिल्ली मेट्रो अपने परिचालन के लिए इन दो सरकारों पर काफी हद तक निर्भर रही है।

    एक बार फिर न्यूयॉर्क मेट्रो और लंदन मेट्रो के परिचालन पर नजर डालना श्रेयस्कर होगा। लंदन अंडरग्राउंड मेट्रो की यात्री किराये से लागत वसूल करने की क्षमता न्यूयॉर्क की तुलना में कहीं बेहतर है। यह यात्रियों से इतना किराया वसूल कर लेती है कि वह अपनी परिचालन लागत के अतिरिक्त कुछ राशि जुटा ले। इस मामले में न्यूयॉर्क मेट्रो का प्रदर्शन सबसे कमजोर है।

    ऐसा किराये के ढांचे में अंतर की वजह से भी है। लंदन और दिल्ली जैसे मेट्रो तंत्र दूरी या क्षेत्र आधारित मॉडल पर काम करते हैं जहां कोई यात्री जितनी अधिक दूरी तक यात्रा करता है, उतना अधिक किराया चुकाता है। न्यूयॉर्क जैसे शहरों में यात्री किराया तयशुदा है, भले ही वह कितनी भी दूर तक सफर करे। ऐसी व्यवस्था उन उपभोक्ताओं के लिए मुफीद है जो गरीब हैं और कार्यस्थल के आसपास रहने का बोझ नहीं उठा सकते।

    साफ जाहिर है कि न्यूयॉर्क मेट्रो प्रणाली लंदन की तुलना में खासी सस्ती है। हालांकि इसकी भी एक कीमत है जो चुकानी पड़ती है। सब्सिडी के अभाव में कम किराया होने के चलते एक अवधि के बाद सेवा मानकों में कमी आनी शुरू हो जाती है। पटरियों और डिब्बों का रखरखाव और उनकी गुणवत्ता और उन्नयन का काम भी प्रभावित होता है। अचल संपत्ति विकास से कुछ हद तक नुकसान की भरपाई होगी लेकिन देश में तमाम मेट्रो प्रणालियों के पास यह सुविधा नहीं होगी। 

    आखिरकार, सरकारों को अपना पैसा खपाते हुए मेट्रो प्रणालियों को सब्सिडी प्रदान करनी ही होगी। वरना उन्हें किराया इतना अधिक रखना होगा कि गरीब यात्री उसका बोझ ही वहन न कर पाएं। ऐसे में  समाज का वह तबका प्रभावित होगा जिसे इस तेज और किफायती सार्वजनिक परिवहन प्रणाली से सबसे अधिक लाभ होगा। इतना ही नहीं यह शहर की सड़कों को वाहनों के जाम से मुक्त रखने काम भी करता है। ऐसे में हमें सही चयन करना होगा।(लेखक फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन हैं। लेख में प्रस्तुत विचार निजी हैं।) 

  • सरकार अफसरों को बदल सकती है दलालों को नहीं- श्रवण गर्ग

    सरकार अफसरों को बदल सकती है दलालों को नहीं- श्रवण गर्ग

    भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यान माला में चुनाव,समाज और मीडिया पर विचारोत्तेजक चर्चा



    मीडिया का बेअसर हो जाना चिंताजनक बोले जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा


    भोपाल, 3 मार्च।बढ़ते बाजार वाद ने समाज और मीडिया के बीच की दूरियां कुछ इस तरह बढ़ा दी हैं कि चुनावी राजनीति मौलिक सामाजिक मुद्दों से भटक गई है। सत्ता के इर्द गिर्द ऐसे लोग जमा हो गए हैं जो सत्ता का दुरुपयोग करने में सिद्धहस्त हैं। सरकारें तबादले करके अफसरों को तो बदल सकती हैं लेकिन दलालों और बिचौलियों को बदलना संभव नहीं होता है। वे हर सरकार को घेर लेते हैं और सरकार की जड़ें काट देते हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी बेहतरीन कार्य किया जा रहा है लेकिन सत्ता को घेरने वाले लोग असली पत्रकारों का हक छीन लेते हैं। ये विचार वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने आज राजधानी में आयोजित भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यान में व्यक्त किए।इसी विषय पर जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा ने कहा कि कुछ मामलों में मीडिया का दुरुपयोग किए जाने से उसकी साख प्रभावित हुई है जो चिंताजनक है।


    डॉ.सर हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता और जनसंचार विभाग अध्यक्ष रहे एवं वरिष्ठ पत्रकार भुवन भूषण देवलिया की जयंती आज राजधानी में गरिमामयी के अवसर पर आयोजित व्याख्यान में स्वर्गीय देवलिया की पत्रकारिता के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला गया। विदिशा के पत्रकार गोविंद सक्सेना को इस अवसर पर राज्य स्तरीय भुवन भूषण देवलिया पत्रकारिता सम्मान से विभूषित किया गया। इसमें उन्हें 11 हजार रूपये का चेक,शाल श्रीफल एवं प्रशस्तिपत्र प्रदान किया गया। चुनाव, समाज और मीडिया विषय पर आयोजित व्याख्यान में मुख्य अतिथि के तौर पर मध्यप्रदेश शासन के जनसंपर्क मंत्री पी.सी.शर्मा,प्रमुख वक्ताओं के रूप में वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग और पटना से आए वरिष्ठ पत्रकार शशिधर खां, विशिष्ट अतिथि के रूप में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि भोपाल के कुलपति दीपक तिवारी, ने विषय के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार और सप्रे संग्रहालय के स्थापक विजयदत्त श्रीधर ने की। कार्यक्रम का संचालन लब्ध प्रतिष्ठित उद्घोषक विनय उपाध्याय ने किया। आभार प्रदर्शन जनसंपर्क अधिकारी अशोक मनवानी ने किया।


    मुख्य अतिथि और जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा ने कहा कि पहले अखबारों में यदि सत्ता प्रतिष्ठानों के खिलाफ दो लाईनें भी छप जाती थीं तो सरकारें कार्रवाई के लिए मजबूर हो जाती थीं,आज स्थिति ये हो गई है कि अखबारों में छपी बातों को गंभीरता से नहीं लिया जाता। हम भी प्रदेश की राजनीति करते हैं लेकिन पिछले पंद्रह सालों तक जब सरकार में नहीं थे तब हमारी गतिविधियां अखबारों की सुर्खियां नहीं बन पाती थीं। हमें कह दिया जाता था कि विज्ञापन आ जाने के कारण आपकी खबर नहीं छप पाई है। आज कांग्रेस की सरकार सभी को समान अवसर उपलब्ध करा रही है। यही वजह है कि गोविंद सक्सेना जैसे मेधावी पत्रकार आगे आ रहे हैं। ऐसे पत्रकारों का सम्मान समाज में पत्रकारिता की साख बढ़ाने में सहयोगी साबित होगा। राजनीति और पत्रकारिता का चोली दामन का साथ है। हम लोग अपने मददगार पत्रकारों और निंदा करने वाले पत्रकारों सभी से सीखते हैं और राजनीति को कारगर बनाने का प्रयास करते हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि स्वर्गीय देवलिया जी की स्मृति में आयोजित व्याख्यान में किए गए मंथन का लाभ समाज के सभी वर्गों को मिलेगा।


    प्रमुख वक्ता के रूप में व्याख्यान माला को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने कहा कि देश में बहुत सारे पत्रकार अच्छा कार्य कर रहे हैं। वे जोखिम भी उठाते हैं और समाज के संवाद को सफल भी बनाते हैं।राजनीति पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि सरकारें अफसरों के तबादले तो कर देती हैं लेकिन दलालों और बिचौलियों की भूमिका नहीं बदल पातीं। यही वजह है कि सत्ता प्रतिष्ठान को घेरने वाले बिचौलिए जनता की आवाज सरकार तक नहीं पहुंचने देते। उन्होंने कहा कि डाक्टर राम मनोहर लोहिया कहते थे हमारी और सरकार की भूमिका कभी नहीं बदलती। हम हर सरकार के गलत कार्यों का विरोध करते हैं और हर सरकार सत्ता में आकर हमें जेल भेजने में जुट जाती है।


    उन्होंने कहा कि वर्ल्ड इकानामिक फोरम ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें उसने भारत के मीडिया को सर्वाधिक भ्रष्ट बताया है। उन्होंने कहा कि कोई बलात्कार पीड़िता जब अपने ऊपर हुए अत्याचार की शिकायत करने थाने जाए और उसके साथ दुबारा बलात्कार हो जाए तो क्या इसे न्याय मिलना कहा जा सकता है। इसी तरह सभी जगह से निराश होकर जब लोग मीडिया के पास जाते हैं तो उन्हें एक नए किस्म के शोषण का सामना करना पड़ता है। जो पत्रकार जमीनी रिपोर्टिंग करते हैं और उन्हें सामाजिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है उनके लिए मीडिया संस्थानों या पत्रकार संगठनों का रक्षा कवच भी नहीं मिल पाता है। इसके बावजूद हमें जमीनी पत्रकारों को संरक्षण देना होगा। हमें सरकार से सवाल पूछने और जानकारी देने की परंपरा जारी रखनी होगी। हमें अपने कर्तव्य के लिए जेल जाने की सीमा तक तैयार रहना होगा तभी हम स्वर्गीय देवलिया जी को सच्ची श्रद्धांजलि दे सकेंगे।


    पटना से आए वरिष्ठ पत्रकार शशिधर खान ने कहा कि डिजिटल युग ने मीडिया का कुछ ऐसा कायापलट कर दिया है कि हम पेड और फेक न्यूज के दौर में पहुंच गए हैं। प्रेस की आजादी का लाभ उठाकर कई बार घटनाओं की मीडिया ट्रायल शुरु हो जाती है। मीडिया फोरम उपभोक्ता की पसंद का डाटा पोस्ट कर रहे हैं जिससे आम लोगों की निजता खतरे में पड़ गई है। आज तो कोर्ट में अर्जी की सुनवाई होने से पहले ही मीडिया पर बहसें शुरु हो जाते हैं। इन बहसों में पीड़ित पक्ष तक शामिल नहीं होता है. यही वजह है कि कुछ मनगढ़ंत बातें भी कुछ ही मिनिटों में वायरल होकर पूरी दुनिया में फैल जाती हैं. हमें मीडिया की प्रमाणिकता को बचाने के लिए आगे आना होगा। हम ये साबित करें कि मीडिया की खबरें आम लोगों की बतोलेबाजी से अलग होती हैं, तभी इस पेशे की गरिमा बचाई जा सकती है।


    माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति दीपक तिवारी ने कहा कि अखबारों की सुर्खियों के आधार पर लोग समाज का मूड भांपने का प्रयास करते हैं जबकि ये सच नहीं होता। इसी प्रकार सोशल मीडिया पर वे लोग अपना एजेंडा थोप देते हैं जिनके पास धन है और उनके कुछ निहित स्वार्थ हैं। उन्होंने कहा कि जनता बीच से लोग लोग लीडर्स के रूप में उभरते हैं उन्हें लोड लेना होगा। उन्हें समाज विरोधी बातों पर रोक लगाने के लिए आगे आना होगा। आज दुनिया भर के मीडिया जगत में भारत के मीडिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं ये चिंताजनक है। चुनाव के दौर में नेताओं को व्यापक जनहित की बातों को सामने लाना होगा तभी हम सामजिक बदलाव कर पाएंगे। उन्होंने कहा कि स्वर्गीय देवलिया सर ने युवाओं को प्रेरणा देकर सामाजिक बदलाव की अलख जगाई थी हम उस मशाल को जलाए रखेंगे और समाज का मार्गदर्शन करते रहेंगे।


    अध्यक्षीय उद्बोधन में पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि छोटी जगहों पर आज भी जमीनी पत्रकारिता की जा रही है। कार्पोरेट मीडिया कुछ तयशुदा मु्द्दों को उभारकर सत्ता को साधने का प्रयास कर रहा है। चुनाव के इस दौर में यदि हम अगले दो तीन महीनों तक टीवी और अखबार देखना बंद रखें तो हम देश की सत्ता का चयन ईमानदारी से कर पाएंगे।


    कार्यक्रम के आरंभ में भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यानमाला समिति भोपाल की ओर से अतिथियों का पुष्प गुच्छ देकर अभिनंदन किया गया। समिति की ओर से डा . अपर्णा एलिया, अशोक मनवानी, आलोक सिंघई,अरुणा दुबे, पिंकी देवलिया ने अतिथियों का अभिनंदन किया। आशीष देवलिया ने अतिथियों को तुलसी के पौधे देकर पर्यावरण की रक्षा का संकल्प दुहराया। इस अवसर पर देवलिया जी के क्रतित्व एवं व्यक्तित्व पर केन्द्रित स्मृति ग्रंथ पत्रकारिता के भूषण का विमोचन हुआ । इसका संपादन वरिष्ठ पत्रकार सतीश एलिया ने किया है। कार्यक्रम में समिति के सदस्य वरिष्ठ पत्रकार शिव अनुराग पटैरिया, अजय त्रिपाठी तथा अमित कुमार, पूर्व सूचना आयुक्त आत्मदीप , शिवकुमार विवेक,वरिष्ठ पत्रकार आनंद पांडे , प्रमोद भारद्वाज,वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी अरविंद दुबे, अवनीश सोमकुंवर, अजय उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार केएस शाइनी, शिफाली, दीप्ति चौरसिया, राजेन्द्र धनोतिया, प्रभु पटेरिया, गिरीश शर्मा, प्रेम पगारे, शिव हर्ष सुहालका, संजीव शर्मा,अमिताभ श्रीवास्तव, मुकेश मोदी,सुरेन्द्र द्विवेदी, प्रकाश साकल्ले, सुमन त्रिपाठी,शैलजा सिंघई, ममता यादव समेत बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक और पत्रकार मौजूद थे।