Category: भारत

  • फारूक अब्दुल्ला देश में अशांति फैलाने  का काम कर रहे – गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा

    फारूक अब्दुल्ला देश में अशांति फैलाने का काम कर रहे – गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा

    भोपाल,7 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने कहा है कि फारूख अब्दुल्ला धारा 370 को बहाल करने पर बयान देकर लोगों को उकसाने और देश में अशांति फैलाने का काम कर रहे है। उनके ऐसे बयानों से जम्मू कश्मीर की वर्तमान स्थिति में अब कुछ भी बदलाव नहीं होने वाला है|मोदी सरकार ने जब से तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की है, तभी से जम्मू-कश्मीर के नेताओं को धारा 370 की बहाली के लिए उम्मीद की एक किरण नजर आने लगी है। कृषि कानून रद्द होने के बाद जिस तरह से कश्मीरी नेता बयान देते हैं, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि इन नेताओं को यह लगने लगा है कि वो भी एक दिन धारा 370 को वापस बहाल करवा लेंगे।

    इसी कड़ी में रविवार (5 दिसंबर 2021) को नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) के अध्यक्ष और पूर्व सीएम फारुक अब्दुल्ला ने कहा कि जिस प्रकार से 700 किसानों के बलिदान के बाद केंद्र को कृषि कानूनों को रद्द करना पड़ा है, उसी प्रकार से केंद्र द्वारा छीने गए अपने अधिकारों को वापस पाने के लिए हमें भी ‘बलिदान देने’ के लिए तैयार रहना पड़ेगा। फारूक अब्दुल्ला ने हजरतबल में अपने अब्बू शेख अब्दुल्ला की पुण्यतिथि के अवसर पर अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि प्रत्येक नेता और कार्यकर्ता को गाँव और इलाके के लोगों के संपर्क में रहना होगा। उन्होंने कहा कि ये याद रखना चाहिए कि हमने सूबे को धारा 370 और 35A देने का वादा किया है और इसके लिए हम कोई भी बलिदान देने के लिए तैयार हैं।

    आज इसी कड़ी में मध्य प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने निशाना साधते हुए एक प्रेस कांफ्रेंस में बोलै है कि फारूक अब्दुल्ला धारा 370 को बहाल करने पर बयान देकर लोगों को उकसाने और देश में अशांति फैलाने का काम कर रहे है | इसी के साथ साथ नरोत्तम मिश्रा ने ये भी कहा है कि उनके ऐसे बयानों से जम्मू कश्मीर की वर्तमान स्थिति में अब कुछ भी बदलाव नहीं होने वाला है|

    इसके साथ ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा धारा 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में पर्यटन बढ़ने के बयान पर बगैर नाम लिए अब्दुल्ला ने कहा कि ‘क्या पर्यटन बढ़ना ही सबकुछ’ है। आपने 50,000 नौकरियों का जो वादा किया था उसका क्या? अब्दुल्ला ने केंद्र सरकार पर ये भी इल्जाम लगाया कि जो लोग नौकरियों पर थे, उन्हें भी बर्खास्त कर दिया गया।

  • डॉ. अम्बेडकर के अनमोल विचार…  “मेरे नाम की जयकार ना करें, उससे बेहतर है- मेरे बताए रास्‍ते पर चलें”

    डॉ. अम्बेडकर के अनमोल विचार… “मेरे नाम की जयकार ना करें, उससे बेहतर है- मेरे बताए रास्‍ते पर चलें”

    नईदिल्ली,7 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।14 अप्रैल, 1891 को जन्मे बाबासाहेब के नाम से लोकप्रिय अम्बेडकर ने संविधान के पहले मसौदे को तैयार करने में अहम योगदान दिया था. उन्होंने अछूतों के प्रति सामाजिक भेदभाव के खिलाफ और निचली जातियों के उत्थान के लिए काफी संघर्ष किया था|

    डॉ.अंबेडकर लोकतांत्रिक भारत के सबसे प्रभावशाली शख्सियतों में से एक हैं. बाबासाहेब के नाम से लोकप्रिय, डॉ अम्बेडकर एक न्यायविद, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक थे. डॉ. अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 को तत्कालीन मध्य भारत प्रांत (अब मध्य प्रदेश) के महू नगर छावनी में हुआ था. बेहद गरीब परिवार में जन्मे बाबासाहेब के नाम से लोकप्रिय अम्बेडकर ने संविधान के पहले मसौदे को तैयार करने में अहम योगदान दिया था.
    उन्होंने अछूतों के प्रति सामाजिक भेदभाव के खिलाफ और निचली जातियों के उत्थान के लिए काफी संघर्ष किया था. डॉ. अम्बेडकर को मरणोपरांत, वर्ष 1990 में, भारत रत्न से सम्मानित किया गया था. 6 दिसंबर, 1956 को उनका निधन हो गया था, जिसे परिनिर्वाण दिवस के तौर पर मनाया जाता है. उन्होंने अपने कार्यों और विचारों से समाज सुधारकों, शिक्षाविदों और राजनेताओं को बहुत प्रभावित किया था.

    डॉ. अम्बेडकर देश के पहले कानून मंत्री थे. वह अपने अनुयायियों से कहा करते थे कि मेरे नाम की जय-जयकार करने से अच्‍छा है, मेरे बताए हुए रास्‍ते पर चलें. उनकी 65वीं पु्ण्यतिथि आइए हम उनके कुछ सबसे प्रेरक उद्धरणों और संदेशों पर एक नज़र डालते हैं:

    “किसी भी कौम का विकास उस कौम की महिलाओं के विकास से मापा जाता हैं.”
    “जो व्यक्ति अपनी मौत को हमेशा याद रखता है वह सदा अच्छे कार्य में लगा रहता है.”
    “मैं ऐसे धर्म को मानता हूँ जो स्वतंत्रता, समानता, और भाई-चारा सीखाये.”
    “मेरे नाम की जय-जयकार करने से अच्‍छा है, मेरे बताए हुए रास्‍ते पर चलें.”
    “रात-रातभर मैं इसलिये जागता हूँ क्‍योंकि मेरा समाज सो रहा है.”
    “जो कौम अपना इतिहास नहीं जानती, वह कौम कभी भी इतिहास
    “जो कौम अपना इतिहास नहीं जानती, वह कौम कभी भी इतिहास नहीं बना सकती.”
    “अपने भाग्य के बजाय अपनी मजबूती पर विश्वास करो.”
    “मैं राजनीति में सुख भोगने नहीं बल्कि अपने सभी दबे-कुचले भाइयों को उनके अधिकार दिलाने आया हूँ.”
    “मनुवाद को जड़ से समाप्‍त करना मेरे जीवन का प्रथम लक्ष्‍य है.”
    “जो धर्म जन्‍म से एक को श्रेष्‍ठ और दूसरे को नीच बनाए रखे, वह धर्म नहीं, गुलाम बनाए रखने का षड़यंत्र है.”
    “राष्‍ट्रवाद तभी औचित्‍य ग्रहण कर सकता है, जब लोगों के बीच जाति, नस्ल या रंग का अन्‍तर भुलाकर उसमें सामाजिक भ्रातृत्‍व को सर्वोच्‍च स्‍थान दिया जाये.”
    “मैं तो जीवन भर कार्य कर चुका हूँ अब इसके लिए नौजवान आगे आएं.”

    Koo App
    महान विधिवेत्ता, सामाजिक न्याय के प्रबल पक्षधर, भारत के सर्वसमावेशी संविधान के शिल्पकार, ’भारत रत्न’ बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर जी के महापरिनिर्वाण दिवस पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि। राष्ट्र निर्माण एवं समतामूलक समाज की स्थापना हेतु आपके कार्य सभी के लिए महान प्रेरणा हैं। Yogi Adityanath (@myogiadityanath) 6 Dec 2021
  • ऐसा भी क्या दिया अनिल कपूर ने कि अनुपम खेर को लेने में लगा इतना डर!!!!

    ऐसा भी क्या दिया अनिल कपूर ने कि अनुपम खेर को लेने में लगा इतना डर!!!!

    मुंबई.7 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। तमाम रिश्तों से परे अपना वजूद सबसे ऊपर रखती है, इस बात के हजारों उदाहरण हमें आए दिन देखने को मिल जाते हैं। व्यक्ति गरीब हो या अमीर, दोस्ती के मायने हमेशा अमीर होते हैं। उस पर यदि दोस्त से कुछ खास-सा तोहफा मिल जाए, तो क्या बात हो….

    सोशल माइक्रोब्लॉगिंग ऐप, कू के माध्यम से हाल ही में दोस्ती की एक ऐसी ही परिभाषा देखने को मिली है। इसमें रंग भरते कोई और नहीं, बल्कि बॉलीवुड के दो दिग्गज अभिनेता, अनुपम खेर और अनिल कपूर दिखाई दे रहे हैं।

    दरअसल अनिल कपूर लंदन से खास तौर पर अपने बरसों पुराने दोस्त अनुपम खेर के लिए एक तोहफा लेकर आए हैं। यह सब तो ठीक है, लेकिन अनुपम इसे खोलने के दौरान कुछ इस तरह डर रहे हैं, जैसे कि उन्हें तोहफे में बम रखकर दिया गया हो। पोस्ट के साथ शेयर किए गए वीडियो में उनके डर को साफ तौर पर देखा जा सकता है।

    इस पोस्ट के माध्यम से अनुपम खेर कहते हैं:

    “मेरे प्यारे दोस्त श्री @AnilKapoor जी मेरे लिए लंदन से एक डिज़ाइनर चश्मा लेकर आए है। चश्मा कितना महँगा है इसका ज़िक्र उन्होंने 2 तीन बार किया। लेकिन मैंने बुरा नहीं माना। क्योंकि उनकी इस उदारता में एक अच्छी दोस्ती का अच्छा उदाहरण है। प्रभु ऐसा दोस्त सबको दे! धन्यवाद अनिल जी।”

    वीडियो में अनुपम को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि कुछ समय पहले उन्होंने अनिल के चश्मे की तारीफ की थी, और साथ ही उनसे ठीक ऐसा ही चश्मा लाकर देने की बात कही थी। इस पर अनिल ने सचमुच उन्हें लंदन से यह तोहफा लाकर दिया, जिसे लेते हुए अनुपम के चेहरे की खुशी और बेचैनी वीडियो में साफ-साफ देखी जा सकती है।

    इसके साथ ही वे दोनों दोस्तों की तरह एक-दूसरे की खिंचाई करते नज़र आ रहे हैं। अनिल ने दो बार ऐसा कहा कि यह बहुत महँगा है और उन्होंने इतना महँगा तोहफा कभी किसी को नहीं दिया। उन्होंने यह भी कहा कि आप पर यह चश्मा बिल्कुल सूट नहीं कर रहा है, जिस पर हँसते हुए अनुपम ने अपने पुराने चश्मे को गरीब और अनिल द्वारा दिए गए नए चश्मे को अमीर चश्मे की उपाधि दी।

    यह अनुपम का बड़प्पन ही तो है कि उन्होंने अनिल की किसी भी बात का बुरा नहीं माना और दोस्ती को इन बातों से भी ऊपर रखा। इस दोस्ती को सलाम!! दोस्तों की प्यार भरी नोंक-झोंक को कू ऐप पर इस वीडियो के माध्यम से देखा जा सका है।

  • पेसा एक्ट से जनजातीय समाज मजबूत होगा बोले विष्णुदत्त शर्मा

    पेसा एक्ट से जनजातीय समाज मजबूत होगा बोले विष्णुदत्त शर्मा


    प्रदेश अध्यक्ष ने पेसा एक्ट लागू करने के लिए मुख्यमंत्री का जताया आभार

    भोपाल। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष व सांसद श्री विष्णुदत्त शर्मा ने मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान द्वारा मध्यप्रदेश में पेसा एक्ट लागू करने की घोषणा का स्वागत किया है। प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि पेसा एक्ट लागू होने से स्थानीय संसाधनों पर जनजातीय समाज की पंचायतों को अब ज्यादा अधिकार मिलेंगे। जल, जंगल, जमीन और लघु वनोपज के साथ उन्हें संरक्षण का भी अधिकार मिलेगा। श्री विष्णुदत्त शर्मा ने कहा कि कांग्रेस 70 वर्षों से आदिवासी हितैषी होने का झूठ बोलती रही, लेकिन जनजातीय वर्ग को अधिकार संपन्न नहीं बनाया। मध्यप्रदेश में पेसा एक्ट लागू होने से जनजातीय समाज अधिकार संपन्न होंगे। 
    मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान ने टंट्या मामा बलिदान दिवस के अवसर पर इंदौर में आयोजित कार्यक्रम में जनजातीय वर्ग के लिए कई घोषणाएं की। मुख्यमंत्री ने प्रदेश में पेसा एक्ट लागू करने का बड़ा ऐलान करते हुए प्रदेश के अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा को और सशक्त बनाने की बात कही। प्रदेश अध्यक्ष श्री विष्णुदत्त शर्मा ने जनजातीय समाज के लिए की गयी घोषणाओं का स्वागत करते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश सरकार जनजातीय बंधुओं के विकास के लिए प्रतिबद्ध है। 

    कांग्रेस ने हमेशा जनजातीय समाज को वोट बैंक समझा
    श्री शर्मा ने कहा कि कांग्रेस के शासन में जनजातीय समाज पर अत्याचार होते थे। उन्हें वोट बैंक समझा जाता था। जनजातीय वर्ग को विकास की मुख्य धारा से जोडने का काम भाजपा ने किया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने अपने शासन के दौरान जनजातीय क्षेत्रों में विकास नहीं किया। जब स्व. श्री अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी तो सर्वप्रथम जनजातीय क्षेत्रों के विकास के लिए अलग से जनजातीय मंत्रालय बनाया गया। जनजातीय वर्ग के विकास का यह क्रम निरंतर जारी है। भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश सरकार जनजातीय वर्ग के उत्थान और विकास के लिए कार्य कर रही है।

  • अखिलेश सरकार में विकास का नहीं परिवारवाद और अपराध का एजेंडा चलता था: योगी

    अखिलेश सरकार में विकास का नहीं परिवारवाद और अपराध का एजेंडा चलता था: योगी

    अखिलेश सरकार में विकास का नहीं परिवारवाद और अपराध का एजेंडा चलता था: योगी

    लखनऊ। यूपी में विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है सियासी पारा चढ़ता जा रहा है। अब यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने सहारनपुर में अखिलेश यादव पर जमकर हमला बोला है। उन्होंने कहा कि पिछली सरकारों में एक परिवार के विकास को ही विकास का मानक मान लिया जाता था। इनके पास विकास का कोई एजेंडा नहीं था। वहां तो परिवारवाद और अपराध हावी रहा। पलायन, दंगे, अराजकता के अलावा बेटियां अपराधियों से डरकर स्कूल नहीं जा पाती थीं। प्रदेश की तस्वीर बदरंग हो गई थी। आजादी में जो राज्य अग्रणी था वह पिछड़कर बीमारू राज्य में शामिल हो गया।

    सीएम योगी आदित्यनाथ ने माइक्रो-ब्लॉगिंग ऐप Koo पर पोस्ट कर कहा कि पिछली सरकारें विकास के नाम पर बंदरबांट करतीं थीं। हमारी आस्था पर प्रहार होता था। सावन के महीनों में कहा जाता था कि कांवड़ यात्रा नहीं निकलेगी। बेटियों की सुरक्षा के मामले को अनसुना कर दिया जाता था। मुजफ्फरनगर के दंगाइयों को लखनऊ के मुख्यमंत्री आवास में सम्मानित किया जाता था। सहारनपुर में सिखों की दुकानों में आग लगाकर उन्हें भी आग में झोंकने का काम किया जाता था। वर्ष 2017 से सरकार बदलते ही प्रदेश में दंगा नहीं बल्कि कांवड़ यात्रा गाजे-बाजे के साथ निकाली जा रही है। दीपावली, होली और सभी पर्व और त्योहार बिना डर के मनाए जा रहे हैं। पांच सौ वर्षों के इंतजार को खत्म करके मोदी सरकार ने अयोध्या में भव्य श्रीराममंदिर के निर्माण कार्य को तेजी से आगे बढ़ाया है।

    उन्होंने कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विकास को गति दी गई है। वर्ष 2017 से पहले सहारनपुर से दिल्ली पहुंचने में सात से आठ घंटे लगते थे, अब हाईवे बनने के बाद केवल दो घंटे में ही दिल्ली पहुंचा जा सकता है। किसानों के गन्ने का मूल्य का भुगतान समयबद्ध तरीके से किया जा रहा है। हमारी पौने पांच वर्ष की सरकार में एक लाख 44 हजार करोड़ रुपये गन्ने का मूल्य किसानों के खाते में पहुंचाया जा चुका है। चीनी मिलों का विस्तारीकरण किया जा रहा है, एक्सप्रेसवे, एयर कनेक्टविटी, विश्वविद्यालय, सड़क, मेडिकल कॉलेज के साथ अन्य विकास के काम कराए जा रहे हैं।

  • मथुरा पर बोले मौर्य तो बौखला गए विपक्षी

    मथुरा पर बोले मौर्य तो बौखला गए विपक्षी

    डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के बयान पर विपक्ष ने उठाए सवाल

    उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के बयान को लेकर नई बहस छिड़ गई है. केशव प्रसाद मौर्य ने मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि की बात करते हुए कहा है, “मथुरा की तैयारी है.”

    हालांकि, कई संगठन हाल ही में मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मस्थान को लेकर आंदोलन चलाने का एलान करते रहे हैं.

    इसके साथ ही आगामी 6 दिसंबर को अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस की बरसी भी है और ऐसे में इस दिन कई संगठनों ने मथुरा में कार्यक्रमों का ऐलान भी किया है. वैसे तो उत्तर प्रदेश पुलिस ने कार्यक्रमों की अनुमति नहीं दी है लेकिन इसी बीच आए उपमुख्यमंत्री मौर्य के बयान से माहौल गर्मा गया है.

    कई लोग ख़ासकर विपक्षी दल मौर्य के बयान पर सवाल उठा रहे हैं और इसे आने वाले चुनाव से जोड़कर देख रहे हैं.

    केशव प्रसाद मौर्य का बयान ऐसे समय में आया है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 13 दिसंबर को काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन करने जा रहे हैं.

    बीजेपी नेताओं के मथुरा पर दिए गए बयान पर विपक्षी दलों के नेताओं ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं. केशव प्रसाद मौर्य के बयान पर पीस पार्टी के नेता शदाब चौहान ने Koo App पर एक वीडियो पोस्ट करते हुए कहा कि UP के उपमुख्यमंत्री का बयान अपनी सरकार की नाकामी छिपाने की साजिश है. याद रखिए UP पुलिस और जनता 6 दिसंबर 1992 जैसी आतंकी घटना किसी को नहीं करने देगी जहां संविधान और अदालत की धज्जियां उड़ाकर भारत के माथे पर काला कलंक लगाया गया था.

    वहीं, बसपा नेता सतीश चंद्र मिश्रा ने Koo करते हुए कहा कि चुनाव आ गया है, विकास तो भाजपा ने किया नहीं तो अब तुष्टिकरण की ही बात करेंगे, लेकिन जनता बहुत समझदार है। अब कोई इनके बहकावे में आने वाला नहीं है।

  • सीएम योगी बोले कोरोना रोधी टीका लगवाएं

    सीएम योगी बोले कोरोना रोधी टीका लगवाएं

    लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि दुनिया के कई देशों में कोरोना संक्रमण फिर तेजी से बढ़ रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में देश और प्रदेश ने कोरोना पर सफल नियंत्रण पा लिया है, फिर भी दुनिया मे संक्रमण के नए दौर को लेकर हमें सतर्कता पर जरूर ध्यान रखना होगा. दो गज की दूरी, मास्क है जरूरी के मंत्र का अनुसरण करने के साथ ही जिन लोगों ने अब तक वैक्सीन नहीं लगवाई है उन्हें वैक्सीन लगवाने को प्रेरित करें. वैक्सीन के बहाने सीएम योगी आदित्यनाथ ने विपक्ष को भी आड़े हाथ लिया. उन्होंने माइक्रो-ब्लॉगिंग ऐप Koo पर पोस्ट कर कहा कि दोहरे चरित्र और गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले विपक्ष के बहकावे में मत आइएगा. ये लोग चुपचाप वैक्सीन ले लेते हैं और कहते हैं कि हमने वैक्सीन नहीं ली. जनता से अपील है कि सभी पात्र लोग वैक्सीन अवश्य लें, किसी के बहकावे में न आएं.

    लॉकडाउन में उत्तर प्रदेश ऐसा पहला राज्य था जिसने गरीबों, श्रमिकों को भरण-पोषण भत्ता दिया। 54 लाख श्रमिकों को इसका लाभ मिला. सरकार ने मुफ्त में खाद्यान्न वितरण भी प्रारम्भ किया जो अनवरत जारी है. उन्होंने कहा कि पीएम मोदी ने सभी के लिए मुफ्त कोरोना जांच, इलाज और वैक्सीन की व्यवस्था की. इस दौरान मुख्यमंत्री ने उपस्थित जनसमूह से कोविड वैक्सीन लगवाने के बारे में पूछा. सबके हाथ उठाने पर उन्होंने कहा कि आपके आसपास जो लोग भी बचे हों, उन्हें वैक्सीन लगवाने के लिए प्रेरित करें. सीएम ने बताया कि देश में 125 करोड़ लोगों को वैक्सीन लगाई जा चुकी है. उत्तर प्रदेश में भी 16 करोड़ लोगों को एक या दो डोज़ लग चुकी है. विपक्ष पर निशाना साधते हुए सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि दुर्भाग्य से अगर पूर्व की सरकारों में कोरोना का संकट आया होता तो बाप-बेटे भाग गए होते, बुआ-बबुआ लापता हो गए होते, भाई-बहन का कहीं पता नहीं चलता और जनता तड़प रही होती. लेकिन भाजपा की केंद्र व प्रदेश सरकार जनता के साथ थी.

  • वर्जनाओं से मुक्त परिवार की कहानी हीकप्स एंड हुकअप्स

    वर्जनाओं से मुक्त परिवार की कहानी हीकप्स एंड हुकअप्स

    भारतीय स्क्रीन पर प्रदर्शित होने के लिए तैयार सबसे साहसी और निडर परिवार की कहानी ‘हीकप्स एंड हुकअप्स’ से राव की झलक; ट्रेलर हुआ रिलीज़

    एक भाई स्वेच्छा से डेटिंग ऐप पर अपनी बड़ी बहन की प्रोफाइल बनाता हुआ और बड़ी बहन अपने छोटे भाई के साथ अपने सेक्स-कैपेड्स पर चर्चा करती नज़र आ रही है। ‘हीकप्स एंड हुकअप्स’ का ट्रेलर जो कि हाल ही में रिलीज़ हुआ है, स्पष्ट रूप परिवार की गतिशीलता को एक नया रुख प्रदान करता नज़र आ रहा है। हालाँकि, कहानी नए ज़माने के विचारों का बखान करती है। तो, जीवन के हीकप्स तथा हुकअप्स के माध्यम से उनकी यात्रा का हिस्सा बनने के लिए तैयार हो जाइए।
    लॉयंसगेट प्ले का नया शो वसुधा, अखिल और कावन्या के जीवन पर बिना वर्जित धारणा के बोल्ड और अंतरंग कहानी बताता है, जो एक ही छत के नीचे रहते हैं और एक-दूसरे का हर स्थिति में साथ देते हैं। हालाँकि, जब जीवन जीने की बात आती है, तो ये पहाड़ को सिर पर उठाने में भी पीछे नहीं हटते हैं।
    लारा दत्ता द्वारा अभिनीत किरदार वसुधा, 40 साल की उम्र में अलगाव के बाद के जीवन को फिर से खोज रही है। इस उम्र में एक महिला के रूप में डेटिंग की कठिन राहों से गुजरते हुए, वह अपने जीवन में पहली बार सेक्स एडवेंचरस होने की कोशिश कर रही है। अपने किरदार के बारे में बात करते हुए लारा ने खुलासा किया, “वसुधा का किरदार अद्भुत है। 40 साल की उम्र में मुख्य भूमिका निभाना एक सशक्त एहसास है। तथ्य यह है कि लॉयंसगेट प्ले ने एक 40 वर्षीय महिला की कहानी बताने और उन विषयों को उजागर करने के लिए चुना, जो वर्जित हैं या जिन पर कोई बात नहीं करता है। इसलिए ऐसी कहानी पर काम करना मेरे लिए रोमांचक था। वसुधा के किरदार में कई परतें हैं, जो कई तरह की स्थितियों और परिदृश्यों में खुद को पाती है। मैं यह देखने के लिए उत्सुक हूँ कि दर्शक हमारे शो पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं।”
    एक डेटिंग ऐप के सीईओ, अखिल की भूमिका निभाने वाले प्रतीक बब्बर बेहद कूल हैं। वह डेट करने के लिए तैयार है, लेकिन बंधे होने के कारण कर नहीं पाता है। वह युवा है और कूल होने के बावजूद नेक दिल आदमी है। जब उसकी बहन और भांजी की बात आती है, तो वह हर परिस्थिति में उनके साथ खड़ा रहता है। उसका एकमात्र संघर्ष भावनाओं के साथ है। प्रतीक कहते हैं, “अखिल का किरदार बेहद दिलचस्प है। वह एक आंत्रप्रेन्योर है, जिसने अपने स्टार्ट-अप के साथ अपना लोहा मनवाया है और ऐसे रिश्तों में जुड़ना चाहता है जो स्थायीता के साथ बंधे नहीं होते हैं।”

    शो में लारा की बेटी की भूमिका निभाने वाली शिनोवा एक नियमित लड़की है, जो कि एक टीनेजर है। वह अपनी शर्तों पर जीने में विश्वास करती है। अपने माता-पिता के ब्रेक अप के मामले में वह उनके साथ अपने समीकरण को समझ रही है और उसका आकलन कर रही है, जबकि मौजूदा समय में वह सेक्स को समझने और वयस्क होने के दौरान भोलेपन को पीछे छोड़ने की पूरी कठोरता से गुजरती है।
    ‘हीकप्स एंड हुकअप्स’ तीन परिवारों की कहानी है और उनके मॉडर्न दोस्त कुछ बातों पर विश्वास नहीं करते हैं, और उनकी बातचीत को दबा देते हैं। इस परिवार में कोई फिल्टर नहीं है। कैजुअल सेक्स, समान सेक्स से प्यार, ओपन रिलेशनशिप्स और यहाँ तक कि ऑर्गीज़, कुछ भी गलत नहीं है, के इर्द-गिर्द इसकी कहानी घूमती है। यह शो भाई-बहन के एक ताज़ा और गैर-आदरणीय रिश्ते पर भी प्रकाश डालता है। अपनी सीट बेल्ट कस लें, क्योंकि राव आपको जीवन के हीकप्स तथा हुकअप्स के माध्यम से अपनी रोमांचक यात्रा पर ले जाने वाले हैं।
    कुणाल कोहली द्वारा निर्देशित और लारा दत्ता और प्रतीक बब्बर अभिनीत ‘हीकप्स एंड हुकअप्स’ 26 नवंबर से लॉयंसगेट प्ले पर स्ट्रीम होगी।

  • नोट पर महापुरुषों को भी जगह मिलेःअतुल मलिकराम

    नोट पर महापुरुषों को भी जगह मिलेःअतुल मलिकराम

    हर दिन आगे बढ़ने के साथ-साथ पीछे छूट जाती हैं कई बातें, कई कहावतें, और महज़ कहानियाँ बनकर रह जाते हैं वो तमाम मुहावरें, जो हमारे बड़े-बुजुर्ग कह गए हैं। “परिवर्तन ही संसार का नियम है….” कभी तो यह एक दिन में कई बार कही जाने वाली कहावत थी, और आज हम इसका अर्थ ही भूल चले हैं। अब तो यह बात देश के नोट भी कहने लगे हैं।

    भारतीय रिजर्व बैंक समय-समय पर नोटों की रुपरेखा में बदलाव करता है। गाँधी जी से पहले, नोटों पर जानवर, बांध, संसद भवन, अंतरिक्ष उपग्रह आदि मुद्रित हुआ करते थे। तमाम बड़े परिवर्तनों के बाद, करीब 50 वर्षों से अब तक भारत के नोटों पर गाँधी जी की ही तस्वीर पेश की जा रही है, लेकिन आरबीआई ने आज तक इस तस्वीर में परिवर्तन का कोई इरादा नहीं दिखाया है। भारत माता की गोद में पले-बढ़े कई वीर सपूत ऐसे हैं, जिन्होंने भारत के हित में अनन्य कार्य करने के चलते देश की गरिमा को जीवंत रखा है। इन वीर पुरुषों का अमिट योगदान भारत की कर्मभूमि में अनंत काल तक गूंजता रहेगा। इसलिए परिवर्तन ही संसार का नियम है, पंक्ति को पुनः जीवंत करने का समय आ गया है, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह और जेआरडी टाटा को भारत के नोटों पर स्थान देने का समय आ गया है।

    महात्मा गाँधी हमारे देश के ‘राष्ट्रपिता’ हैं। भारतीय नोटों पर उनकी छवि भारतीय लोकाचार और मूल्यों को दर्शाती है। हम बहुत लंबे समय से नोटों पर गाँधी जी की छवि देख रहे हैं, यह गर्वित करने वाली बात है। लेकिन अन्य महान नेताओं और स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को पहचानने और सम्मान करने में कहीं न कहीं एक बड़ी कसर है, जिन्होंने भारत और इसके वासियों के लिए अपना सर्वस्व कुर्बान कर दिया। भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस और जेआरडी टाटा ने जीवन पर्यन्त भारत वासियों को सरल जीवन देने और देश को बेहतर बनाने के लिए कड़ा संघर्ष किया, इसके साथ ही अटूट समर्पण, देशभक्ति और निष्ठा के साथ देश की सेवा की। भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस भारत माता के वीर योद्धा थे, जिन्होंने भारत की आज़ादी के लिए लड़ाई लड़ी और शहादत हासिल की। उनके शक्तिशाली व्यक्तित्व ने ही भारतीयों को खुलकर जीने के लिए प्रेरित किया।

    अतुल मलिकरामः भारत के नोटों पर कई अन्य महापुरुषों का भी हक

    जेआरडी टाटा की प्रेरणा भी देश वासियों के लिए अविश्वसनीय है। उन्होंने टाटा ग्रुप के चैयरमेन के रूप में व्यवसायों और संस्थानों का निर्माण करके राष्ट्र की अमिट सेवा की। भारत की प्रगति में उनका योगदान अतुलनीय है। चाहे स्वास्थ्य क्षेत्र (टाटा मेमोरियल अस्पताल) हो या वैज्ञानिक क्षेत्र (टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च), जेआरडी टाटा ने समृद्ध भारत के निर्माण में कोई कमी नहीं रखी। जिस गति से भारत ने तरक्की की है, सबसे बड़े हाथों में से एक हाथ जेआरडी टाटा का है, जिन्होंने हमें व्यवसाय को बुलंदियों पर पहुँचना सिखाया।

    मुद्रा यानी नोटों पर दी जाने वाली इन छवियों का मूल उद्देश्य देश की संस्कृति, मूल्यों और जैव विविधता का प्रतिनिधित्व करना है। भारतीय नोटों पर जेआरडी टाटा, भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस जैसे दिग्गजों की छवियों का उपयोग करना एक प्रगतिशील भारत की ताकत और समृद्धि का प्रतीक होगा। नोटों पर गाँधी जी की तस्वीर के साथ ही इन महान विभूतियों को भी स्थान दिया जाना आवश्यक है। यह भारतीयों को भी भारत माता की सेवा करने के लिए प्रेरित करेगा, जैसा कि राष्ट्र के इन वीर पुरुषों ने किया। यह परिवर्तन नई पीढ़ी को देश के गौरव से रूबरू कराने में कारगर सिद्ध होगा, साथ ही उनके अंतर्मन में भी देशभक्ति की अमिट भावनाओं का सैलाब लाने में मदद करेगा, क्योंकि परिवर्तन ही संसार का नियम है…

  • ख़त्म हुईं इंतजार की घड़ियाँ! मेट्रो से रोशन कानपुर

    ख़त्म हुईं इंतजार की घड़ियाँ! मेट्रो से रोशन कानपुर

    यूपीएमआरसी (UPMRC) द्वारा काफी तेज और व्यवस्थित तरीके से मेट्रो का कार्य कराया जा रहा है। ऐसे में इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि कानपूर निवासियों को इस दीपावली पर मेेट्रो का तोहफा मिल सकता है। कानपुर में मेट्रो के पहले सफल ट्रायल पर एमडी कुमार केशव ने बधाई दी है।

    सोशल माइक्रोब्लॉगिंग ऐप, कू (Koo) पर भी मेट्रो की रौनक खूब जमी है। यूजर्स भारी मात्रा में एक-दूसरे को बधाई देते नज़र आ रहे हैं, जिनमें से कुछ खास इस प्रकार पेश हैं:

    • कानपुर वालों के लिए खुशखबरी, बहुत जल्द कानपुर में भी दिखेगी मेट्रो।
    • Kanpur वासियों के लिए खुशखबरी! पहली बार ट्रैक पर दौड़ी मेट्रोल
    • चलो अब कानपुर की धूल से तो राहत मिलेगी। इंतजार रहेगा मेट्रो का।
    • लखनऊ से कानपुर जाने वालों को बहुत दिक्कत आती है, मेट्रो चालू होने के बाद लोगों को राहत मिलेगी।
    • कानपुर को मेट्रो की सवारी की सौगात जल्‍द ही मिल सकती है।
    • वाह भाई वाह कानपुर वासियों के लिए नई सौगात! जल्द अब हम कानपुर में भी मेट्रो का सफर कर पाएंगे।

    कानपुर की मेट्रो को पहली बार शहर की धरती पर चलाकर देखा गया। असेंबलिंग एरिया से निकालकर सोमवार को उसे डिपो के अंदर ही ट्रैक पर चलाया गया। इसके साथ ही सिग्नल के साथ रुकने, चलने का परीक्षण करने के साथ ट्रेन के अंदर से ही इसके दरवाजे खोलने और बंद करके चेक किया गया। शाम से रात तक मेट्रो को ट्रैक पर अलग-अलग स्पीड पर चलाकर देखा गया।

    पिछले माह के अंत में मेट्रो की पहली ट्रेन के कोच कानपुर आए थे। तीनों कोच को असेंबलिंग एरिया में ले जाने के साथ ही इसके तमाम पुर्जों को असेंबल करने का कार्य चल रहा था। साथ ही ट्रेन के विभिन्न उपकरणों की चेकिंग का कार्य संपन्न किया गया। मेट्रो डिपो में करंट की आपूर्ति में देरी के चलते दो जेनरेटर के करंट से मेट्रो को चलाया गया।

    मेट्रो को सामान्य तौर पर अधिकतम 80 किलोमीटर की रफ्तार पर चलाया जाता है, लेकिन मुख्य रूट पर परीक्षण के दौरान इसे 90 किलोमीटर तक की रफ्तार तक चलाया गया। सोमवार को पहले ट्रायल में मेट्रो की गति पांच, 10 और 15 किमी रही।

    जिस गति से कार्य प्रगति पर है, उससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि दीपावली तक कानपूर शहर की सरजमीं मेट्रो से रोशन होगी।

  • नए केन्द्रीय मंत्रियों को जनता देगी अपना आशीर्वाद बोले सबनानी

    नए केन्द्रीय मंत्रियों को जनता देगी अपना आशीर्वाद बोले सबनानी

    भोपाल। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही में किए गए मंत्रिमंडल पुनर्गठन में ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ की झलक दिखाई देती है। इस पुनर्गठन के अंतर्गत प्रदेश के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री  थावरचंद गहलोत को कर्नाटक का राज्यपाल बनाया गया है, तो दो नए मंत्रियों के रूप में डॉ. वीरेंद्र खटीक एवं ज्योतिरादित्य सिंधिया को शामिल किया गया है। विपक्ष ने अपनी हठधर्मिता के चलते इन मंत्रियों का सदन में परिचय नहीं होने दिया था। इसलिए अब ये मंत्रीगण आशीर्वाद यात्राओं के माध्यम से जनता का आशीर्वाद लेंगे। यह बात भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश महामंत्री एवं आशीर्वाद यात्राओं के प्रदेश प्रभारी भगवानदास सबनानी ने गुरुवार को पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए कही। पत्रकार वार्ता में प्रदेश उपाध्यक्ष श्रीमती सीमा सिंह जादौन उपस्थित थी। 

    16 से 24 अगस्त तक चलेंगी यात्राएं

    श्री सबनानी ने बताया कि केंद्रीय मंत्री डॉ. वीरेंद्र खटीक, श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और उत्तरप्रदेश से सांसद तथा केंद्रीय मंत्री श्री एस.पी.एस. बघेल प्रदेश में आशीर्वाद यात्राओं के माध्यम से जनता का आशीर्वाद लेंगे। ये यात्राएं 16 अगस्त से शुरू होंगी और 24 अगस्त तक चलेंगी। यात्राओं के दौरान केंद्रीय मंत्री गण धार्मिक स्थलों, संत-महात्माओं, शहीदों, लोकतंत्र सेनानियों आदि से आशीर्वाद लेंगे। इसके अलावा मंत्रीगण विभिन्न समाजों के कार्यक्रमों में भाग लेंगे तथा प्रबुद्जनों, कलाकारों, खिलाड़ियों से भेंट करेंगे। इसके अलावा केंद्रीय मंत्री विभिन्न महापुरुषों के स्मारकों पर जाकर श्रद्धासुमन भी अर्पित करेंगे।

    रेल और सड़क मार्ग से होगी मंत्री श्री खटीक की यात्रा

    केंद्रीय मंत्री डॉ. वीरेंद्र खटीक की आशीर्वाद यात्रा रेल और सड़क मार्ग से होगी। उनकी यात्रा 19 अगस्त को ग्वालियर से शुरू होगी। 20 अगस्त को डॉ. वीरेंद्र खटीक भोपाल में आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लेंगे। उनके इन कार्यक्रमों में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष व सांसद श्री विष्णुदत्त शर्मा भी शामिल होंगे। आशीर्वाद यात्रा 21 अगस्त को विदिशा एवं सागर जिलों में पहुंचेगी। 23 अगस्त को जबलपुर और 24 अगस्त को दमोह तथा टीकमगढ़ जिलों में पहुंचेगी। उनकी यात्रा के लिए प्रदेश महामंत्री श्री रणवीरसिंह रावत को प्रभारी एवं कार्यसमिति सदस्य श्री महेंद्र यादव को सह प्रभारी बनाया गया है। श्री खटीक की यह यात्रा 7 जिलों एवं 7 लोकसभा क्षेत्रों से गुजरेगी और पांच दिनों में 589 किलोमीटर की दूरी तय करेगी। इस दौरान श्री खटीक 105 कार्यक्रमों में भाग लेंगे।

    देवास से शुरू होगी केंद्रीय मंत्री श्री सिंधिया की यात्रा

    श्री सबनानी ने बताया कि केंद्रीय मंत्री श्री ज्योतिरादित्य अपनी आशीर्वाद यात्रा की शुरुआत देवास से 17 अगस्त को करेंगे। इसी दिन यात्रा शाजापुर पहुंच जाएगी। 18 अगस्त को यात्रा खरगोन जिले में पहुंचेगी जहां रावेरखेड़ी में बाजीराव पेशवा के समाधि स्थल पर आयोजित कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री श्री सिंधिया मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान के साथ भाग लेंगे। 19 अगस्त को श्री सिंधिया की आशीर्वाद यात्रा इंदौर पहुंचेगी। उनकी आशीर्वाद यात्रा के लिए प्रदेश उपाध्यक्ष श्री आलोक शर्मा को प्रभारी एवं कार्यसमिति सदस्य श्री संतोष पारीक को सहप्रभारी नियुक्त किया गया है। श्री सिंधिया की यह यात्रा 4 जिलों एवं 4 लोकसभा क्षेत्रों से गुजरेगी तथा 584 किलोमीटर की होगी। चार दिनों की यात्रा के दौरान श्री सिंधिया 78 कार्यक्रमों में भाग लेंगे।

    पीताम्बरा पीठ, दतिया से शुरू होगी केंद्रीय मंत्री श्री बघेल की यात्रा

    श्री सबनानी ने बताया कि केंद्रीय मंत्री श्री एस.पी.एस. बघेल की आशीर्वाद यात्रा दतिया स्थित पीताम्बरा पीठ से 16 अगस्त को शुरू होगी। विधि राज्यमंत्री श्री बघेल 16 अगस्त को दतिया, डबरा, ग्वालियर की यात्रा करेंगे। इसके उपरांत 17 अगस्त को ग्वालियर और मुरैना में आशीर्वाद लेंगे। उनकी यात्रा के लिए प्रदेश उपाध्यक्ष श्री चौधरी मुकेश चतुर्वेदी को प्रभारी एवं प्रदेश मंत्री श्री मदन कुशवाह को सह प्रभारी नियुक्त किया गया है। श्री बघेल की यह यात्रा तीन जिलों एवं तीन लोकसभा क्षेत्रों से होकर गुजरेगी तथा 167 किलोमीटर की होगी। इस दौरान श्री बघेल 14 कार्यक्रमों में भाग लेंगे। 
  • कांग्रेस ने दो दिन भी नहीं चलने दिया विधानसभा का राज दरबार

    कांग्रेस ने दो दिन भी नहीं चलने दिया विधानसभा का राज दरबार

    भोपाल 10 अगस्त(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें, ओबीसी आरक्षण और बढ़ती महंगाई के विरोध में हंगामे के चलते विधानसभा का मानसून सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया है। इस हंगामे के बीच सरकार ने सदन में महत्वपूर्ण विधेयकों की मंजूरी जरूर करवा ली।

    सदन की कार्यवाही सुबह से ही हंगामेदार रही। हंगामे की स्थिति और ज्यादा तब बढ़ गई जब महंगाई से जुड़ा सवाल वित्त मंत्री से पूछा गया। इसके बाद वित्त मंत्री के जवाब से विपक्ष खेमे ने नाराजगी प्रकट की। जवाब से असंतुष्ट नजर आए नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि मंत्री का जवाब सही नहीं, आज पूरा देश महंगाई से जूझ रहा है, इस पर चर्चा होनी चाहिए। इस पर विपक्षी सदस्य लॉबी में नारेबाजी करने लगे और विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम को सदन की कार्यवाही 12 बजे तक के लिए स्थगित करनी पड़ी। इसके बाद फिर से कार्यवाही शुरू की गई, लेकिन विपक्ष का हंगामा नहीं थमा तो विधानसभा के मानसून सत्र को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया।


    सदन की हंगामेदार कार्यवाही के दौरान सरकार ने कई महत्वपूर्ण विधेयक पास करा लिए। इसी शोरगुल के बीच अनुपूरक बजट को हंगामे के दौरान मंजूरी दे दी गई। इसके बाद नगरीय निकाय संशोधन बिल भी पास हुए और आबकारी एक्ट संशोधन समेत अन्य महत्वूर्ण विधेयकों को भी मंजूरी दे दी गई।

    बाढ़ से प्रभावित शयोपुर के विधायक बाबू जँडेल ने विधानसभा में अपने कपड़े फाड़ लिये। वे अपने इलाक़े में बाढ़ प्रभावितों को कथित तौर पर सरकारी मदद न मिल पाने के कारण खुद को दुखी बता रहे थे। उनका कहना था कि उनके इलाके के लोगों को कपड़े तक नहीं मिल पा रहे हैं। लोगों के घर पानी में डूब गए हैं। सरकार बाढ़ पीड़ितों को मदद नहीं कर रही है।

  • इस दोराहे पर लुटेरों से कैसे मुक्ति दिलाएंगे बाजीराव के सेनानी

    इस दोराहे पर लुटेरों से कैसे मुक्ति दिलाएंगे बाजीराव के सेनानी

    देश के नीति आयोग ने आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को सफल बनाने के लिए मध्यप्रदेश को भी आत्मनिर्भर बनाने का फार्मूला पेश किया है। मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार इसे सफल बनाने के लिए प्राण प्रण से जुट गई है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सभी जिलों के कलेक्टरों को निर्देश दिए हैं कि वे अब कर्ज लेकर बांटे जाने वाले बजट के भरोसे न रहें। उन्हें प्रदेश के लगभग साढ़े सात करोड़ लोगों को काम देना है और अपने अपने जिलों की अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाना है। कमोबेश यही शुरुआत 2003 में उमा भारती की सरकार ने की थी। दिग्विजय सिंह की कांग्रेसी सरकार को प्रदेश की जनता ने जिस आक्रोश के साथ कुचला था उसे देखते हुए यही कामना की जा रही थी कि मध्यप्रदेश की दशा और दिशा बदली जा सकेगी। तब केन्द्र में कांग्रेसी सरकारें थीं और उन्होंने अपने पैरों पर खड़े होते मध्यप्रदेश को एक बार फिर कर्ज की बैसाखियों पर ला खड़ा करने के लिए तमाम षड़यंत्र रचे। उमा भारती को केवल लोधियों से घिरा हुआ दिखाकर उन्हें अपदस्थ किया गया। ये तमाशा देश भर ने देखा लेकिन कोई कुछ न कह सका।

    बाबूलाल गौर की ढपोरशंखी सरकार ने कांग्रेसी हाई कमान की मंशाओं को अक्षरशः लागू किया और प्रदेश एक नए कर्ज के दलदल में फंसने के लिए तैयार हो गया। शिवराज सिंह चौहान की ताजपोशी तो इसी एजेंडे के तहत की गई थी। नतीजतन पंद्रह सालों तक उन्होंने अधोसंरचना के विकास के नाम पर धड़ा धड़ कर्ज लिया। दिग्विजय सिंह की जो फौज मध्यप्रदेश को लूटने का डेरा डाले बैठी थी शिवराज सरकार को उसी ठग लाबी ने घेर लिया। भाजपा के संगठन महामंत्री कप्तान सिंह सोलंकी ने जिन्हें मध्यप्रदेश का स्वाभाविक शासक बताते हुए भाजपा में शामिल किया वे दरअसल बजट के लुटेरे थे।शिवराज को कई सालों बाद ये अहसास हुआ कि वे ठगों से चंगुल में बुरी तरह फंस चुके हैं। उमा भारती ने जिन राघवजी भाई को वित्तमंत्री बनाया था उन्होंने बेहतर वित्तीय प्रबंधन किया और कर्ज पर कर्ज लेने की राह प्रशस्त होती चली गई। राज्य आय बढ़ाता जा रहा था इसलिए तयशुदा कर्ज लेने में कोई गुरेज भी नहीं था। राघवजी भाई के बाद घटिया वित्तीय प्रबंधन और लोकप्रियता की लोलुपता ने राज्य को हवाई किले में तब्दील कर दिया। यही वजह थी कि शिवराज सरकार उस कांग्रेस से चुनाव हारी थी जिसका न तो कोई संगठन था, न नेता और न ही बजट। सत्ता से उतरने पर शिवराज ने ये कहकर अपनी लाचारी का प्रकटीकरण भी किया था कि मैं मुक्त हो गया।

    मध्यप्रदेश का दुर्भाग्य है कि इसे हमेशा से आक्रमणकारी लुटेरों ने अपनी हवस का निशाना बनाया है। मुगलों ने जिस तरह यहां लूट मचाई उससे राज्य के वनवासी अलग अलग टोलों और मजरों में बंट गए और गरीबी की जहालत भरी जिंदगी जीने को मजबूर हुए थे। भारत में मुगल शासन का पतन होने पर मराठों ने 18 वीं शताब्दी में मालवा पर अधिकार करना चाहा था। मालवा के तत्कालीन सूबेदार और जयपुर के सवाई जय सिंह ने भेलसा का अधिकार भोपाल के नवाब को दे दिया था। नवाबों की अक्षमता के चलते ये हिस्सा शीघ्र ही मराठों के आधिपत्य में चला गया। मई 1736 ईस्वी के अंत तक जयसिंह के कहने पर बाजीराव पेशवा को मालवा का नायब सूबेदार बनाया गया। दिल्ली की सल्तनत बहुत कमजोर थी और जयसिंह ने बाजीराव के कंधे पर रखकर अपनी सूबेदारी बचाने की कोशिश की। पेशवा को लगा कि इस इलाके को नए सिरे से संगठित करना चाहिए और उसने अपनी कई मांगों के बारे में दिल्ली को अवगत भी कराया। अपनी शैली का शासन स्थापित करने के बाद वह दक्षिण की ओर चल पड़ा।तब विदिशा मराठों के मार्गदर्शन में चल रहा था। पेशवाओं की ओर से ये क्षेत्र सिंधिया राजघराने की निगरानी में था। सिंधिया राजपरिवार की अंदरूनी उठापटक का फायदा उठाकर देवास के तुकोजी और जीवाजी पंवार बंधुओं ने विदिशा की घेराबंदी कर डाली। 11 जनवरी 1737 को उन्होंने उस पर अधिकार करके कर वसूलना शुरु कर दिया। इस स्थिति पर नियंत्रण के लिए पेशवा को बुंदेलखंड से वापस विदिशा आना पड़ा।

    मराठों की शक्ति बढ़ रही थी इसे देखते हुए निजाम को दिल्ली बुलाकर पुख्ता रणनीति बनाई गई। निजाम अपने लाव लश्कर के साथ सिरोंज पहुंच गया। यहां का मराठा एजेंट विशाल सेना देखकर भाग गया। निजाम यहां से पेशवा की गतिविधियों का अध्ययन कर रहा था तभी उसे उत्तर से लौटता पिलाजी जाधव मिल गया। निजाम ने उसका उचित सम्मान किया। पिलाजी तब निजाम की सेना का सहयोगी बन गया था। निजाम ने दिल्ली जाकर वहां के मुगल बादशाह को आश्वासन दिया कि वह मराठों को नर्मदा से आगे बढ़ने से रोक देगा। इस हूल के बदले में निजाम को मुगल बादशाह से पांच सूबे और एक करोड़ रुपए का वचन मिल गया। दिल्ली के तख्त ने तभी जयसिंह को सूबेदार और बाजीराव को नायब सूबेदार पद से हटाकर निजाम के बड़े बेटे को मालवा का सूबेदार बना दिया।

    मराठों को भगाने के लिए निजाम ने दिल्ली से बड़ी सेना ली। वह दिसंबर 1737 के शुरु में सिरोंज और 13 दिसंबर को भोपाल पहुंचा। तब पेशवा नजदीक ही पड़ाव डाले पड़ा था। उसने चतुराई से निजाम की सेना की नाकेबंदी कर डाली। निराश निजाम ने निकल भागने की कोशिश की लेकिन मराठों ने उसे पीछा करके हलाकान कर दिया। उसकी सेना की रसद बंद कर दी गई। छापामार शैली में हमले किए गए। इससे घबराकर निजाम ने 6 जनवरी 1738 में दोराहा सराय में पेशवा से संधि कर ली। संधि की शर्तों के अनुसार निजाम ने मालवा में मराठों का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया। नर्मदा और चंबल के बीच के पूरे इलाके में उसने मराठों की संप्रभुता स्वीकार कर ली। हालांकि इस संधि पर पड़ा पर्दा 1741 में जाकर उठा। अगले पांच सालों में पेशवा ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली और प्रशासन दुरुस्त कर लिया।

    मराठा सेनाओं ने मार्च 1745 में विदिशा(भेलसा) के किले पर आक्रमण किया और उस पर कब्जा कर लिया। विदिशा 1753 तक पेशवा मराठों के अधिकार में रहा। मराठों ने अपने कुशल भूमि प्रबंधन के सहारे धीरे धीरे भोपाल राज्य में भी अपना दखल बढ़ा लिया था। पेशवाओं का साम्राज्य और भी अधिक मजबूत हो सकता था लेकिन मराठों के बीच अयोग्य लोगों को मिले महत्व की वजह से ये इलाका अधिक प्रगति नहीं कर पाया।

    आजादी के बाद दिल्ली की सल्तनत ने नेहरू इंदिरा को मजबूत बनाकर मराठों को तहस नहस कर दिया। इंदिरा गांधी के करीबियों ने जब सिंधिया राजघराने का खजाना और जमीनें लूटने का अभियान चलाया तो उन्हें भरपूर संरक्षण मिलता रहा। अब कालचक्र घूमकर एक बार फिर सिंधिया घराने की ओर आशाभरी निगाहों से देख रहा है। कमलनाथ सरकार के माध्यम से दस जनपथ यहां क्षत्रियों की सत्ता को कुचलने का प्रयास कर रहा था लेकिन सिंधिया की बगावत ने उसकी मंशा पर पानी फेर दिया । बाजीराव का प्रयास था कि वह भारत की धरती से लुटेरों को खदेड़कर बाहर कर दे। बहुत हद तक वह इसमें सफल भी हुआ। दोराहा की संधि इस दिशा में सबसे प्रमुख मील का पत्थर बनी। सिंधिया की बगावत लगभग यही संदेश देती है कि पेशवाई एक बार फिर लाचार निजाम को घुटनों पर लाने में सफल हुई है।

    भारतीय जनता पार्टी के मजबूत होने और नरेन्द्र मोदी जैसे मजबूत शासक की मौजूदगी ने अलग अलग ढपली और अपना अपना राग सुना रहे शासकों को एकजुट होने का अवसर दिया है। आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश इसी प्रशासनिक सुधारों का मुखपत्र बनकर सामने आया है। देखना ये है कि मध्यप्रदेश को चरोखर समझने वाले लुटेरे इस जन अभियान में क्या भूमिका निभाते हैं। बाजीराव के सेनानी रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया के वंशजों की योग्यता भी इस अभियान में कसौटी पर है। उन्हें दशकों तक दिल्ली की सल्तनत संभालते रहे माफिया से भी निपटना है और मध्यप्रदेश में मजबूत हो चुके भ्रष्ट माफिया से भी टक्कर लेनी है। शिवराज सिंह चौहान जिस शैली में शासन चला रहे हैं वह निश्चित रूप से आगे जाकर टकराव का रूप लेगी यह संकेत अभी से मिलने लगे हैं।

    ( लेख के ऐतिहासिक तथ्य विदिशा जिले के गजेटियर से लिए गए हैं.)

  • घेरकर और घुसकर मारने वाला योद्धा बालाजी बाजीराव पेशवा

    घेरकर और घुसकर मारने वाला योद्धा बालाजी बाजीराव पेशवा

    बाजीराव मस्तानी फिल्म ने भारत के इस वीर योद्धा को एक बार फिर समझने का अवसर दिया है.

    -आलोक सिंघई-

    देश पर आक्रमण करने वाले लुटेरों से संग्राम का शंखनाद और उन पर फतह भारत भूमि के कण कण की विशेष पहचान है। इतिहास गवाह है कि जब जब विदेशी आक्रांताओं ने इसे हथियाने की जुर्रत की है उन्हें अंततः पराजित होकर भागना पड़ा है। अंग्रेजों, फ्रांसीसियों, पुर्तगालियों, मुगलों,अफगानों,यूनानियों के बीच से अनेक आक्रांता तरह तरह के रूप धरकर हिंदुस्तान आते रहे लेकिन हिंदुत्व की सहिष्णु परंपरा के बीच उन्हें या तो लौट जाना पड़ा या फिर यहीं की संस्कृति में ढलकर समाहित हो जाना पड़ा है। जब भारत की तरुणाई किसी शासक की असलियत जान जाती है तो फिर वह उसकी विदाई के लिए अपनी जान भी दांव पर लगा देती है। ऐसे ही एक बहादुर की कहानियां आज भी तरुणाई की रगों में चेतना का संचार कर देती है। वह वीर योद्धा था बालाजी बाजीराव प्रथम। बरसों तक इस वीर योद्धा की चेतना को षड़यंत्र पूर्वक मुगल शासकों की ऐतिहासिक गाथाओं के बीच दबाकर रखा गया। कोशिश की गई कि हिंदुत्व का तेज कहीं मुगल वंशजों को नाराज न कर दे।इसके पीछे वोट की वह राजनीति थी जो सत्ता पाने के लिए अनिवार्य मानी जाती थी। इसके बावजूद सूर्य का प्रताप, बादलों की ओट हमेशा के लिए तो नहीं ढांप सकती। अंततः इस वीर योद्धा की यशोगाथा एक बार फिर देश की चेतना को एकसूत्र में बांधने की सुरलहरियां लेकर सामने आ गई है।

    बालाजी बाजीराव पेशवा प्रथम को भले ही उनके ही परिजनों के आपसी द्वेष से जूझना पड़ा हो पर केवल बहादुरी और इंसानियत को अपना धर्म मानने वाले इस रणबांकुरे की सच्चाई अंततः सामने आ ही गई। उनकी बहादुर जीवन संगिनी यवन सुंदरी मस्तानी की प्रेमकथाओं ने आज की नई पीढ़ी को बेचैन कर दिया है। युवा मन ये सोचने को मजबूर है कि आखिर क्यों इस अविजित योद्धा को अपनी पारिवारिक कलह का दंश झेलना पडा।देश के वे क्या हालात थे जब इस तूफानी योद्धा की विजय यात्रा पर लू जैसे सामान्य रोग ने असमय ही विराम लगा दिया।

    हिंदुत्व की आधारशिला कहे जाने वाले ज्योतिष शास्त्र में ऐसे नक्षत्रों की जीवनयात्रा समझने के लिए भरपूर प्रकाश डाला गया है। इस पैमाने पर सहज ही समझा जा सकता है कि बालाजी बाजीराव पेशवा जैसे योद्धा को यदि अपने ही राजघराने या अपने ही देशज शासकों का सहयोग मिला होता तो भारत का इतिहास चीनी राजवंशों से कहीं बेहतर मुकाम छू चुका होता। अंग्रेजों ने भारत की चेतना को कुंठित करने का जो षड़यंत्र रचा आजादी के बाद के शासकों ने उसे जारी रखकर अंग्रेजों के नमक का कर्ज भरपूर चुकाया। अंग्रेजों की इसी रणनीति की वजह से पौंड की यात्रा तो बदस्तूर जारी रही लेकिन भारतीय रुपए की दुर्गति निरंतर जारी रही। आज जब नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा भारतीय मुद्रा के खिलाफ रचे गए जिन षड़यंत्रों को पलटने का प्रयास कर रही है तब बाजीराव बल्लाल जैसे योद्धा के संदेश को नए संदर्भों में तरोताजा करना जरूरी हो गया है।

    तेज दिमाग और कठोर कर्म की प्रतिमूर्ति बालाजी बाजीराव पेशवा दरअसल भारतीय प्रज्ञा की विशिष्ट पहचान रहे। जब दिसंबर 1737 में सिरोंज होते हुए भोपाल पहुंचे बाजीराव ने निजाम की मुगल सेना को चारों ओर से घेर लिया,उसकी रसद काट दी लगातार युद्धों से विशाल मुगल सेना को लाचार कर दिया तब 6 जनवरी 1738 को सीहोर के दोराहा में निजाम ने शाही मुहर लगाकर बाजीराव को मालवा,नर्मदा और चंबल तक का इलाका सौंपा और पचास लाख रुपए भेंट किए। इस युद्ध के बाद बाजीराव पेशवा का नाम पूरे हिंदुस्तान में स्थापित हो गया।समाजसेवी रवि चतुर्वेदी बताते हैं कई देशी विदेशी इतिहासकारों ने तब उन्हें लायन ऑफ इंडिया की उपाधि से विभूषित किया था। बाजीराव ने बीस वर्ष की उम्र में ये तय किया था कि जो विदेशी आक्रांता जहां से आए हैं उन्हें वापस वहीं तक खदेड़ना है। इस लक्ष्य को पाने में वे बड़ी हद तक सफल भी हुए। इसके बाद उन्होंने भारतीय संस्कृति के अनुरूप हिंदुस्तान गढ़ने का अभियान चलाया जो समय समय पर आज भी प्रकट होता रहता है।

    भारतीय स्वाधीनता संग्राम की कहानियों को ही भारतीय इतिहास साबित करने वाले षड़यंत्रकारियों ने 1720 से 1740 तक देश की अस्मिता स्थापित करने वाले पेशवा सरदार बाजीराव प्रथम के तेज को भुला देने की कोशिशें कीं। वामपंथी राजनेता जानते थे कि यदि हिंदुस्तान बाजीराव पेशवा की राह पर चल पड़ा तो विदेशी आक्रांताओं के उन वंशजों को हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ेगी जिन्हें लूटे हुए धन पर गुरछर्रे उड़ाने की लत लग चुकी है। यही वजह थी कि उन्होंने श्रीमती इंदिरा गांधी की मदद से धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्द को संविधान में डलवा दिया। उनका प्रयास था कि सर्वधर्म समभाव जैसे संभ्रांत शब्द के सहारे वे अन्याय के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को कुचलने में सफल हो सकते हैं। विशाल भारत की जनता अपने हक की आवाज बुलंद न कर सके इसके लिए उन्होंने गरीब नवाज की विचारधारा को कौमी सद्भाव की चाशनी में लपेटकर परोसा। वास्तव में ये गरीबी को संरक्षित करने का ऐसा षड़यंत्र था जिसने भारत को कर्ज आधारित इकानामी बना दिया। वो तो भला हो विश्व बैंक और एशियन डेवलपमेंट बैंक जैसी सूदखोर संस्थाओं का जिन्हें अपनी मूल राशि डूबती नजर आई और उसने आर्थिक सुधारों के नाम पर अपने प्रशिक्षित शासकों को सत्तासीन कराया। दस सालों तक डॉ.मनमोहन सिंह के रूप में देश को ऐसा शासक मिला जिसने कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को जमीनी दिशा दिखाई। इसके बावजूद खैराती लोकतंत्र को आत्मनिर्भर देश में बदलना उनके बस में नहीं था। कांग्रेसी तो आज तक इन आर्थिक सुधारों के खिलाफ जूते खोलकर पीछे पड़े हैं।

    नरेन्द्र मोदी के रूप में जब देश को ऐसा बेखौफ शासक मिला है जो विकास के नाम पर लूट के भौंडे षड़यंत्रों को बेनकाब करने में जुटा है तब बालाजी बाजीराव की चेतना एक नए रूप में उभरकर सामने आई है। मध्यभारत में बालाजी बाजीराव ने जिस सिंधिया परिवार को देश की पहचान स्थापित करने की जवाबदारी सौंपी थी उस परिवार के कुलदीपक ज्योतिरादित्य सिंधिया ने एक बार फिर देशविरोधी षड़यंत्रों के खिलाफ संघर्ष का शंखनाद किया है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए लूट की इबारत लिखने वाले कमलनाथ जैसे षड़यंत्रकारी को सत्ताच्युत करवाकर सिंधिया ने हिंदुत्व आधारित सशक्त भारत को बुलंद करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। कृषि में आर्थिक सुधारों के माध्यम से नरेन्द्र मोदी यदि भारत को आत्मनिर्भर बनाने का अभियान चलाए हुए हैं तो मध्यप्रदेश एक बार फिर बालाजी बाजीराव बल्लाल की पेशवाई का अधूरा स्वप्न साकार कर रहा है। इस अधूरे स्वप्न को साकार करके ही मजबूत भारत और सुखी भारत की स्थापना की जा सकेगी।

  • सोनिया-कांग्रेस का पुरसा हाल !

    सोनिया-कांग्रेस का पुरसा हाल !

    के. विक्रम राव

    पत्रकार सब शायद वांगमय में भ्रमित हो गए, अथवा वर्तनी की त्रुटि कर बैठे! कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने असल में अपने बयान (23 अगस्त) में कहा होगा : “जाऊँगी, नहीं रहूंगी|” सब एडिटर ने अल्पविराम को खिसका कर ‘नहीं’ के बाद लगा दिया| मायने ही बदल गए| दो दिनों के दैनिक देख लीजिये| भला सोचिये राजपाट, खजाना, वैभव और ये ऐश तज दिया तो फिर कहाँ? तेईस तीसमार खान बड़े शेखी बघार रहे थे कि 135-वर्ष पुरानी पार्टी को पूरा बदल डालेंगे| संभवतः जैसा होता आया है वे सब मायाजाल पकड़ नहीं पाए| क्या “जी हुजूरिये” लोग कभी “न” बोल सकते हैं ? फिर बात हो उस प्रतीक्षारत प्रधान मंत्री पर? अब तो वे बावन पार गए और फिर भी युवा समझते हैं ! टट्टू का कभी अरबी घोड़ों से मुकाबला संभव है? मगर लोग हैं कि लगे रहे| समझे नहीं कि ठूंठ पर हरियाली नहीं आती| बहत्तर साल के कपिल सिब्बल और उनसे बस एक साल छोटे नबी भाई, जो गुलाम भी हैं, पर लिखते हैं आजाद, वे तक तलवार भांज रहे थे| दिन ढला, उनके तेवर भी ढीले हो गए| सूरमाओं की शेखी होती है, पर दिखी नहीं|सोनिया गाँधी चली थीं पोखरण तृतीय करने| बड़ा विस्फोट तो उनकी सासू माँ ने 1974 में किया था| इस बार हुआ नहीं| बस इतना हुआ कि दो दिन अखबार तथा टीवी पर से नरेंद्र मोदी को सोनिया ने बाहर कर दिया| तीसरे ही दिन सब सामान्य हो गया| सारा एक फूहड़ मजाक था! यूं भी इंदिरा गाँधी के पुराने वीडियो और समाचार की कतरनों के आधार पर सोनिया गाँधी काफी जानती, सीखती रहती हैं| उन्हें याद रहा उनके भारतीय बहू बनने वाले वर्ष (25 फ़रवरी 1968) के समय ही कांग्रेस विभाजन की कगार तक पहुंच रही थी| पार्टी अध्यक्ष एस. निजलिंगप्पा प्रधानमंत्री को पार्टी से निष्कासित करने का निर्णय ले चुके थे| कुछ महीनों बाद पार्टी प्रत्याशी नीलम संजीव रेड्डी के वोट काटकर इंदिरा गाँधी ने अपने निर्दलीय प्रत्याशी वी.वी. गिरि को राष्ट्रीय पद पर जिताने की तैयारी कर ली थी| उसी दौर में निजी बैंकों के राष्ट्रीयकरण का निर्णय हो गया था| आमजन को आभास हो रहा था कि ऐतिहासिक जनक्रांति हो रही थी| अंततः कांग्रेस टूटी, साल भर में दो कांग्रेस पैदा हो गई| मगर इंदिरा गाँधी का दांव चतुराई का था| उन्होंने दलित (जगजीवन राम) और मुस्लिम (फकरुद्दीन अहमद) को अपना मोहरा बनाया| वोटरों के दो बड़े तबके उनकी पार्टी के समर्थक बन गए| डेढ़ साल बाद “गरीबी हटाओ” के लुभावने नारे पर इंदिरा कांग्रेस सत्ता पर सवार हो गयी| विरोधी दफ़न हो गए| आज सोनिया गाँधी उसी पुराने (1971) सीन को दुबारा मंचित करना चाहती थीं| वे भूल गयीं कि 1970 के दौर के कोई भी नेता नरेंद्र मोदी के बाल बांका करने लायक भी नहीं थे| दूसरा उस समय कोई इंदिरा गाँधी का सानी नहीं था| इसी तरह आज भी सोनिया गाँधी तो सास की साया तक नहीं बन पायीं| इसी आधार पर गौर करें कि आज की चुनौती पर यह तिगड्डा (माँ, बेटा, बेटी) कितना जंगजू हो सकता है ? मान भी लें कि धनबल के आधार पर हो भी जाये, तो पाता क्या ? ये सब पुरोधा वही हैं जो आम चुनाव जीत न पाए| तब 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी रिटायर्ड और टायर्ड दिख रहे थे| सोनिया अपने सितारों की चाल से जीती| वर्ना सरदार मनमोहन सिंह दिल्ली से ही लोकसभा चुनाव बुरी तरह हार चुके थे| फिलहाल बटेर हाथ लग ही गयी| वे प्रधानमंत्री बन ही गए | मगर तब तारीफ के पुल बंधे सोनिया के| इस पूरे परिवेश में इस मौजूदा दो-दिवसीय (23-24 अगस्त) मैच पर गौर करें तो स्पष्टतयः आभास होता है कि यह फिक्स्ड था| कौन खिलाड़ी कब किस ओर से गेंद फेंकेगा ? कौन किस दिशा में हिट लगाएगा ? फिर कौन, कब आउट होगा ? सब तय होता है| दोनों “बागी” नेता जानते थे|मगर दुःख इस बात का रहेगा कि खुर्राट रणबांकुरों जैसे कपिल सिब्बल और गुलाम नबी आजाद अपनी पारी ठीक से खेल नहीं पाए| आजाद को तो भान हो गया होगा कि शीघ्र ही वे काबीना मंत्री के समकक्ष वाली सुविधाओं से मरहूम हो जायेंगे| अब राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड्गे होने वाले हैं| वे पिछले दिनों कर्णाटक से राज्यसभा में आये हैं| लोकसभा चुनाव हार गये थे|राज्यसभा में विपक्ष का नेता महत्वपूर्ण होता है, अतः दलित होने के कारण खड्गे का हक़ बनता है| उधर कपिल सिब्बल की राज्यसभा अवधि भी अब साल भर शेष है| इस बार उत्तर प्रदेश से कई प्रत्याशी होंगे| कांग्रेस के पास इतने विधायकों कि संख्या नहीं है की वे सिब्बल को दुबारा जिता पायें|इन सियासी तथ्यों पर गौर करें तो इस कथित विद्रोह के समस्त कारण समझ में आ जाते हैं| दबाव की राजनीति है| फ़िलहाल सोनिया से राहुल दो दशक तक, फिर राहुल से सोनिया तक का दौर| क्रम चलता रहेगा और तब पधारेंगी प्रियंका वाड्रा| अर्थात कांग्रेस में वंशावली चलती रहेगा| कुतुब्बुद्दीन ऐबक वाला गुलाम वंश फिर चालू हो जायेगा | अतः लब्बो लुआब यही है कि अब सीधी, सामान्य सियासी मांग है कि कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष वोट द्वारा मतपेटियों से निर्वाचित हो, नामित होने की परम्परा ख़त्म हो| कई वर्ष हो गए कांग्रेसियों ने पार्टी संगठन के निर्वाचन में मतपत्र ही नहीं देखा| सोनिया गाँधी ने तो करिश्मा ही कर दिखाया था, जब उन्होंने सीताराम केसरी को सशरीर पार्टी कार्यालय से फिकवा दिया था| स्वयं अध्यक्ष बन बैठीं| न नामांकन, न मतदान, न परिणाम| लेकिन अब कांग्रेस तभी बचेगी जब मतपत्र का पुनः दीदार होगा| वर्ना संग्रहालय में पार्टी का स्थान आरक्षित है|K Vikram RaoMobile : 9415000909E-mail : k.vikramrao@gmail.com

  • मध्यभारत में सिंधिया ने फहराया भगवा परचम

    मध्यभारत में सिंधिया ने फहराया भगवा परचम

    ज्योतिरादित्य बोले कांग्रेस भ्रष्टाचार में डूबी इसलिए छोड़ा

    भोपाल,22 अगस्त( प्रेस सूचना केन्द्र)। मध्यप्रदेश के ग्वालियर विधानसभा क्षेत्र के पांच हजार से अधिक कांग्रेस कार्यकर्ता शनिवार को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया समेत अन्य वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हो गए।

    कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि राज्य में 15 माह के शासन के दौरान कमलनाथ कांग्रेस ने जनता के हित में कदम नहीं उठाए। भ्रष्टाचार किया गया। उस समय मुख्यमंत्री भी दो हुआ करते थे। एक आगे और दूसरे पर्दे के पीछे। उन्होंने कमलनाथ और दिग्विजय सिंह का नाम लेते हुए कहा कि पूर्ववर्ती सरकार में जनता की सेवा की बजाए निहित स्वार्थों को प्राथमिकता दी गई।

    सिंधिया ने कहा कि उन्होंने और उनके परिवार ने सदैव जनता के हितों की बात की है। जनता की प्रतिष्ठा पर आंच आने पर भी परिवार ने सदैव आगे आकर विरोध किया है। उन्होंने कहा कि ऐसा ही उनकी दादी राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने तत्कालीन मुख्यमंत्री डी पी मिश्रा के समय किया था। उनके पिता माधवराव सिंधिया ने विकास कांग्रेस के नाम से नया दल बनाया था। वे भी जनता के हितों पर आंच आने पर झंडा और डंडा उठाकर सड़क पर उतरने तैयार रहते हैं।

    सिंधिया ने मुख्यमंत्री चौहान के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि उन्होंने कुर्सी संभालते ही सभी से कार्यों के बारे में पूछकर कार्य किए। इसके अलावा ग्वालियर चंबल अंचल की चंबल प्रोग्रेस वे परियोजना पर भी तेजी से कार्य किया जा रहा है। साढ़े सात हजार करोड़ रुपयों की इस योजना से इस संपूर्ण अंचल का विकास होगा।

    आगामी समय में राज्य में 27 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं। इसमें से अधिकांश सीट ग्वालियर चंबल अंचल की है। ग्वालियर विधानसभा सीट पर भी उपचुनाव होना है। इस सीट से वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में प्रद्युमन सिंह तोमर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते थे। इसी वर्ष मार्च के राजनीतिक घटनाक्रमों के चलते उन्होंने विधायक पद से त्यागपत्र दे दिया और भाजपा में शामिल हो गए। माना जा रहा है कि अब वे ग्वालियर विधानसभा उपचुनाव में भाजपा के टिकट पर उम्मीदवार होंगे।

    विधानसभा उपचुनाव के लिए कार्यक्रम जारी नहीं हुआ है, लेकिन भाजपा की तैयारियां तेजी से चल रही हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता शनिवार, रविवार और सोमवार को यहां विभिन्न आयोजनों में सक्रिय रहेंगे, इस दौरान ग्वालियर चंबल अंचल के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों के हजारों कार्यकर्ता भाजपा में शामिल होंगे।

  • राष्ट्रीय सुरक्षा मंच ने नागरिकों के सैन्य प्रशिक्षण की पैरवी की

    राष्ट्रीय सुरक्षा मंच ने नागरिकों के सैन्य प्रशिक्षण की पैरवी की

    राष्ट्रीय सुरक्षा : विचारधारा और सिद्धांतों का पुनरावलोकन विषय पर स्पंदन और फैन्स का वेबिनार

    भोपाल, 9 जुलाई। राष्ट्रीय सुरक्षा किसी भी देश के लिए सबसे महत्वपूर्ण होती है। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अब जरुरी है कि नागरिकों के लिए मिलिट्री ट्रेनिंग अनिवार्य कर दी जाए । सुरक्षा, हिंदुत्व, राष्ट्रीयता जैसे विषय अकादमिक पाठ्यक्रमों में शामिल किये जाएँ । राष्ट्रीय सुरक्षा के विषय पर गांधी, नेहरू, सुभाषचंद्र बोस, स्वातंत्र्यवीर सावरकर आदि महापुरुषों के विचारों पर खुल कर बहस होनी चाहिए । इन विषयों पर बौद्धिक और अकादमिक चुप्पी देश के लिए घातक है । ‘राष्ट्रीय सुरक्षा : विचारधारा और सिद्धांतों का पुनरावलोकन’ विषय पर स्पंदन संस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच द्वारा आयोजित वेबिनार में विद्वान् वक्ताओं ने यह बात रखी ।

    वरिष्ठ पत्रकार और लेखक उदय माहुरकर ने वेबिनार में मुख्य वक्तव्य दिया, जबकि वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया शिक्षक डा. राधेश्याम शुक्ल ने विषय प्रवर्तन किया । कार्यक्रम की अध्यक्षता राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच के महासचिव गोलोक बिहारी राय ने की ।

    श्री महुराकर ने अपने वक्तव्य में कहा कि सावरकर का मानना था कि भारत को विश्व गुरु बनने के लिए यहाँ की सेना का सशक्त होना आवश्यक है। गाँधीवादी अहिंसा से देश ने आजादी के पहले से आज तक बहुत कुछ खो दिया है, जिसकी देश को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। सम्पूर्ण अहिंसा और हिन्दू मुस्लिम एकता की बातें हिंदुओं की कीमत पर की गयी है, जिसपर देश में अब ईमानदारी से चर्चा होनी चाहिए। 1925 से ही सावरकर को यह अंदेशा था कि अहिंसा और हिन्दू मुस्लिम एकता के नाम पर देश को बांट दिया जाएगा । अंततः वही हुआ। देश में आजादी के पहले सेना में हिंदुओं की कमी थी। द्वितीय विश्वयुद्ध में उन्होंने हिंदुओं को सेना में जाने का आह्वान किया। जिससे आजादी के समय सेना में हिन्दू सैनिकों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई और हमें देश के लिए मजबूत सेना मिली। उन्होंने कहा कि वर्तमान में असम, यूपी में सरकार का बदलना, धारा 370 का हटना, राम मंदिर का निराकरण होने से कट्टरवादी भड़क उठे है, जो शाहीनबाग में गांधी की तस्वीर लगाकर अहिंसा के नाम पर देशवासियों को ब्लैकमेल कर रहे हैं। भारत विभाजन, चाइना युद्ध के बाद चीन का जमीन में कब्ज़ा इन सबमें अब एक राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए।

    वेबिनार को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार डा. राधेश्याम शुक्ल ने कहा कि देश के स्वतंत्र होने के बाद से ही देश की सुरक्षा की अलवेहना की गई। भारत के दोनों ओर दो इस्लामिक देश बना दिए गए और सीमाओं का निर्धारण भी नहीं हुआ। नेहरू ने देश में सेना को खत्म कर देने तक कि बात कही और पंचशील को लेकर दुनिया में चीन की वकालत कर रहे थे, उसे सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बना दिया। डा. शुक्ल ने कहा कि मोदी सरकार आने से पहले देश मे सुरक्षा को लेकर न कोई विचार था न सिद्धांत, अब सरकार ने देश के बाहरी खतरों के साथ भीतरी खतरों को पहचानना शुरू किया है। देश को मुख्य रूप से सांस्कृतिक खतरा है, जिससे लड़ने के लिए देश की जनता को आगे आना होगा। इस्लाम और कम्युनिस्ट जो देश की संस्कृति और सभ्यता को नष्ट कर रहे हैं, उससे देश की जनता को आगे बढ़कर सामना करना होगा तभी देश सुरक्षित रहेगा।

    कार्यक्रम की अध्यक्षता कृते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच के महासचिव गोलोक बिहारी राय ने कहा कि यह वेबिनार अत्यंत महत्वपूर्ण विषय पर उचित समय पर आयोजित हुआ है । इस आयोजन से राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दे पर समाज को काफी मदद मिलेगी । उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच वेबिनार के सुझावों और अनुशंसाओं को सरकार तक पहुंचाएगी और इसे पाठ्यक्रम में शामिल करने का आग्रह करेगी । इस आयोजन में मध्यप्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक और फैन्स मप्र इकाई के अध्यक्ष एस. के. राउत, पूर्व कुलपति प्रो. प्रमोद वर्मा, फैन्स की राष्ट्रीय महासचिव रेशमा सिंह, वरिष्ठ पत्रकार अक्षत शर्मा, भाजपा प्रवक्ता नीरू सिंह ज्ञानी, नेहा बग्गा, ग्लोबल सोशल नेटवर्क की अध्यक्ष रिचा सिंह, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. स्वदेश सिंह, प्रो. तरुण गर्ग सहित सैकड़ों लोगों ने भागीदारी की ।

    बेबीनार का संचालन मीडिया चौपाल के संयोजक और स्पंदन संस्था के सचिव डॉ अनिल सौमित्र ने किया। बेबीनार में भाग ले रहे प्रतिभागियों ने देश की सुरक्षा के विभिन्न पहलुओं पर वक्ताओं से सवाल भी

    पूछे । वेबिनार में बिहार, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, राजस्थान, गोवा, आंध्रप्रदेश आदि प्रदेशों सहित देश के विभिन्न हिस्सों से अध्येताओं, शोधार्थियों, प्राध्यापकों, पत्रकारों और कई संगठनों के प्रतिनिधियों ने भागीदारी की।

  • संगठन गढ़ने वाला तपस्वी नरेन्द्र सिंह तोमर

    संगठन गढ़ने वाला तपस्वी नरेन्द्र सिंह तोमर


    जयराम शुक्ल

    पिछले महीने ही मोदी 2.0 के एक साल पूरे हुए। इस एक साल का लेखाजोखा और सरकार की उपलब्धियों का प्रस्तुतिकरण नरेन्द्र तोमर ने जिस प्रभावी तरीके से किया उससे विपक्षी दल के नेता प्रभावित हुए बिना नहीं रहे। राज्यसभा के एक सदस्य(भाजपा के नहीं) का तो यहां तक कहना है कि श्री तोमर अपने जवाब से जिस तरह विपक्ष को संतुष्ट करते हैं और मीडिया को फेस करते हैं..इस वजह से वे सरकार की और भी बड़ी जिम्मेदारी के हकदार बनते हैं। सांसदजी का संकेत वित्तमंत्री जैसे गुरुतर दायित्व की ओर था क्योंकि इस पद के लिए धैर्य और जवाबदेही की बड़ी जरूरत होती है जो कि श्री तोमर में है।

    यद्यपि श्री तोमर केंद्र सरकार में ग्रामीण विकास,पंचायतीराज, पेयजल और स्वच्छता मंत्री पद का जो दायित्व मिला है व कथित बड़े मंत्रालयों से ज्यादा महत्वपूर्ण व चुनौती भरा है। क्योंकि इन्हीं क्षेत्रों की पृष्ठभूमि पर आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला रखी जानी है। कोरोना से अर्थव्यवस्था को उबारने में देश को प्राणवायु तो भारतमाता ग्राम्यवासिनी से ही मिलनी है। श्री तोमर नरेन्द्र मोदी व अमित शाह दोनों शीर्ष नेताओं के विश्वसनीय हैं इसीलिए जब भी सरकार या संगठन को कोई सबक देना होता है तो पहला नाम श्री तोमर का ही आता है। वे संगठन में जहां मंडल अध्यक्ष, प्रदेश भाजयुमो, प्रदेश भाजपाध्यक्ष होते हुए राष्ट्रीय महामंत्री तक पहुंचे, वहीं नगर निगम पार्षद से लेकर विधायक, सांसद, राज्यसभा सदस्य निर्वाचित हुए।

    पिछले कार्यकाल में वे इस्पात व खनन मंत्री थे..लेकिन पाँच साल पूरा होते-होते एक के बाद एक विभागों के अतिरिक्त दायित्व जुड़ते गए। जबकि सांगठनिक तौर पर वे गुजरात के विधानसभा चुनाव में वहां के प्रभारी रहे। संगठन और सरकार दोनों ही मामलों जहां कहीं कुछ पेंचीदगी दिखती है..वहां नरेन्द्र सिंह तोमर की अपरिहार्यता स्वमेव आ खड़ी होती है।

    श्री तोमर की एक और खासियत दूसरे से अलग करती है वो हैं विवादों में डूबे बगैर विवादों को सुलझाना। मध्यप्रदेश में जो ये भाजपा सरकार है उसकी केंद्रीय भूमिका में कोई और नहीं श्री तोमर ही थे। ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए भाजपा में यही लाल कालीन बिछाने वालों में थे..जबकि ये स्वयं उसी चंबल-ग्वालियर क्षेत्र के क्षत्रप हैं जहां दशकों से महल का दबदबा चला आ रहा है। कोई दूसरा नेता होता तो उसका असुरक्षा बोध शायद ही जूनियर सिंधिया के लिए रास्ता बनाता।
    जोड़तोड़ की सरकार में शिवराज सिंह चौहान का फिर से मुख्यमंत्री बन जाना सभी को चौंकाया। वजह श्री चौहान पर तोहमद थी कि जनता ने उनके नेतृत्व को नकार दिया इसलिए भाजपा हारी। सिद्धांततः यह सही भी है। सभी यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि प्रदेश के अगले मुख्यमंत्री श्री तोमर ही होंगे..लेकिन तोमर ने परोसी हुई थाल अपने मित्र की ओर खिसका दी और कुर्ता झाड़कर फिर अपने दायित्व में बिंध गए। राजनीति में तोमर-चौहान की युति की दुहाई आज भी दी जाती है। इसी युति ने..मध्यप्रदेश में दो-दो बार भाजपा की ताजपोशी कराई। इसबार जोड़ी टूटी थी, तोमर प्रदेश संगठन के अध्यक्ष नहीं थे। यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि केंद्र की राजनीति करते हुए भी नरेन्द्र सिंह तोमर मध्यप्रदेश की भाजपा के शुभंकर हैं।

    भारतीय जनता पार्टी की नई पीढ़ी के जिन वरिष्ठ नेताओं ने अपने सहज, सरल और सफल व्यक्तित्व व कृतित्व से गहरी छाप छोड़ी है उनमें से नरेन्द्र सिंह तोमर का नाम सबसे आगे है। सहजता के आवरण में ढंका हुआ उनका कुशाग्र राजनय उनके व्यक्तित्व का चुम्बकीय आकर्षण है। यहीं वजह है कि 1998 से विधानसभा और फिर संसदीय पारी को आगे बढ़ाते हुए श्री तोमर प्रदेश ही नहीं देश में भाजपा की सरकार और संगठन से लेकर केन्द्रीय राजनीति तक अपरिहार्य हैं।
    यह सब कुछ उन्हें विरासत में नहीं मिला अपितु उन्होंने अपनी लकीर खुद खींची, अपनी लीक स्वयं तैयार की। राजनीति के इस दौर में जहां धैर्य लुप्तप्राय तत्व है वहीं यह तोमरजी की सबसे बड़ी पूूँजी है। यही एक अद्भुत साम्य है जिसकी वजह से वे सरकार व संंगठन दोनोंं को प्रिय हैं। श्री तोमर की जड़ें राजनीति की जमीन पर गहराई तक हैं। वृस्तित जनाधार और लोकप्रियता की छांव उन्हें सहज, सरल, सौम्य और कुशाग्र बनाती है, यहीं उनके धैर्य और शक्ति-सामर्थ्य का आधार भी है।
    श्री तोमर पूर्णत: सांस्कारिक राजनेता है जिन्होंने अपने दायित्व को कभी बड़ा या छोटा करके नहीं नापा। विद्यार्थी परिषद की छात्र राजनीति से उनके सार्वजनिक जीवन का शुभारंभ हुआ। श्री तोमर माटी से जुड़े नेता हैं, उन्होंने मुरैना जिले के ओरेठी गांव की जमीनी हकीकत देखी और यहीं से तप कर निकले। राजनीति में शून्य से शिखर तक पहुंचने वाले गिनती के ही सहयात्री ऐसे हैं जो गांव-मोहल्ले की राजनीति से चलकर दिल्ली के राजपथ तक पहुंचे।

    श्री तोमर ने ग्वालियर नगर निगम की पार्षदी से चुनाव यात्रा शुरू की। वे तरूणाई में ही देश की मुख्य राजनीतिक धारा से जुड़ गए थे। आपातकाल के बाद 1977 में जब केन्द्र व प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार थी तब वे पार्टी के मण्डल अध्यक्ष बने। अपनी प्रभावी कार्यशैली और वक्तृत्व कला के जरिए वे मोर्चे के प्रदेश भर के युवाओं के चहेते बन गए परिणामत: 1996 में वे भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष बने।
    यहां मैंने श्री तोमर के आरंभ काल का जिक्र इसलिए किया ताकि पार्टी की नई पीढ़ी यह जाने और समझे कि यदि लगन, निष्ठा और समर्पण है तो उसके उत्कर्ष को कोई बाधा नहीं रोक सकती, श्री तोमर, उनका व्यक्तित्व व उनकी राजनीतिक यात्रा इसका एक आदर्श व जीवंत प्रमाण है।
    उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे सब कुछ करने, परिणाम देने व समर्थ होने के बावजूद भी स्वयं श्रेय लेने पर विश्वास नहीं करते। वे अपनी उपलब्धियों को साझा करते हैं। ‘शौमैनशिप’ उनमें दूर-दूर तक नहीं है।
    मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में इस्पात व खान मंत्री के रूप में उनकी कार्यशैली,नवाचार व मूल्यवर्धित परिणाम देने की कला ने केंद्रीय नेतृत्व को प्रभावित किया। देश में खनन क्षेत्र को नया जीवन देने का बीड़ा इन्होंने उठाया व पहले ही दिन से उस दिशा में कार्यवाही शुरू कर दी। केन्द्र सरकार के खान मंत्रालय ने तोमरजी के नेतृत्व में खनन क्षेत्र में भारी ठहराव, अवैध खनन, पारदर्शिता की कमी और विनियमित ढ़ांचे की अपर्याप्तता की चुनौती से निपटने के लिए एमएमडीआर अधिनियम 1956 में व्यापक संशोधन किए। इससे अब केवल नीलामी प्रक्रिया के माध्यम से ही खनिज रियायतों का आवंटन हो सकेगा, विवेकाधिकार समाप्त हो गया, पारदर्शिता बढ़ गई, खनिज मूल्य में सरकार का हिस्सा बढ़ गया और निजी निवेश तथा आधुनिक प्रौद्योगिकी को आकृष्ट करने में सफलता मिली।

    श्री तोमर के नेतृत्व व प्रशासनिक क्षमता का लोहा तो विपक्ष की राजनीति करने वाले भी मानते है। मेरी अपनी दृष्टि से श्री तोमर नई पीढ़ी के कार्यकर्ताओं के लिए इसलिए भी अनुगम्य और प्रेरणादायी हैं कि इकाई स्तर से शिखर की राजनीति तक का सफर किस धैर्य व संयम के साथ किया जाता है। वे एक पार्षद से विधायक, सांसद, मंत्री से केन्द्रीय मंत्री तक पहुंचे वहीं मंडल के अध्यक्ष के दायित्व से प्रदेश के अध्यक्ष, राष्ट्रीय महामंत्री बने। यह भारतीय जनता पार्टी में ही संभव है जहां कार्यकर्ता की क्षमता और निष्ठा का ईमानदारी से मूल्यांकन होता है। श्री तोमर इसकी जीती जागती मिसाल हैं।

  • कांग्रेस में घुमड़ रहा दिग्गी को विदा करने का मानस

    कांग्रेस में घुमड़ रहा दिग्गी को विदा करने का मानस

    डॉ.अजय खेमरिया

    चौबीस उपचुनावों की पहाड़ सी चुनौती से मुकाबिल कांग्रेस में घर की कलह थमने का नाम नही ले रही है।जिस चंबल ग्वालियर से बीजेपी सरकार के भविष्य का निर्णय होना है वहाँ कमलनाथ और दिग्विजयसिंह की लड़ाई खुलकर सामने आ गई है।कल पूर्व सीएम दिग्विजयसिंह ने राकेश चौधरी की घर वापसी पर एतराज जताया तो आज उनका जबाब देने के लिए चौधरी खुद भिंड से ग्वालियर आये और मीडिया के सामने दिग्विजयसिंह के अलावा अजय सिह और पूर्व मंत्री डॉ गोविंद सिंह पर गंभीर आरोप लगाए।माना जा रहा है कि कमलनाथ के इशारे पर ही चौधरी राकेश ने आज बकायदा प्रेस कांफ्रेंस लेकर यह हमला बोला है।चौधरी ने अजय सिंह पर जिस तल्खी के साथ आरोप लगाये है वे ठीक वैसे ही जैसे 2013 में पार्टी छोड़ते हुए लगाए गए थे।राकेश सिंह ने कहा कि अजय सिंह खुद तीन चुनाव हार चुके हैं और अपने पिता की विरासत को जो न बचा पाया हो वह कांग्रेस का क्या भला करेगा।राकेश सिंह ने इस कांफ्रेंस में जो कहा है उसके बहुत ही गहरे निहितार्थ भी है क्योंकि कल दिग्विजयसिंह ने कहा कि” मैं राकेश चौधरी के प्रवेश और मेहगांव से टिकट के पक्ष में नही हूँ”.आज इसका जबाब देते हुए उन्होंने कहाकि मैं तो कांग्रेस में ही हूँ और राहुल गांधी ने मुझसे खुद काम करने के लिए कहा है।यानी राकेश सिंह ने आज घोषित कर दिया कि वह कांग्रेस में है और उन्हें दिग्विजयसिंह, अजय सिंह की किसी एनओसी की जरूरत नही है।

    मेहगांव से टिकट को लेकर चौधरी ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि कमलनाथ ने उन्हें बुलाकर पूछा है कि क्या वे चुनाव लड़ना चाहते है?इस पर उन्होंने एक तरह से अपनी सहमति व्यक्त की है पार्टी आदेश मानने के लहजे में।यानी कमलनाथ मेहगांव से चौधरी को टिकट देने का मन बना चुके है इसलिए कल के दिग्विजयसिंह के बयान का मतलब है इस मामले पर दोनों नेताओं के बीच मतभेद की स्थिति है।असल में अब यह स्पष्ट हो गया है कि मप्र में कमलनाथ और दिग्गीराजा के बीच समन्वय का दौर खत्म सा हो गया है जो कमलनाथ के सीएम रहते देखा जाता था।महीने भर में दिग्गीराजा को तीसरी बार यह कहना पड़ा है कि उनके और कमलनाथ के बीच कोई मतभेद नही है।यह साबित करता है कि जिन परिस्थितियों ने कमलनाथ सरकार के पतन की पटकथा लिखी थी कमोबेश उनमें कोई बुनियादी बदलाव नही आया है।राकेश चौधरी कमलनाथ और दिग्गीराजा के बीच अलगाव के प्रतीक भर है और यह भी समझना होगा कि सिंधिया के जाने के बाद कमलनाथ मप्र पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए भी व्यू रचना में जुटे है।ग्वालियर चंबल अंचल में वे अब उन चेहरों को आगे बढ़ाना चाहते है जो जीतने के बाद उनके हमकदम रहे।मेहगांव से राकेश चौधरी इसी व्यूह के मोहरे है।वैसे देखा जाए तो खुद दिग्विजयसिंह के भाई लक्ष्मण सिंह भी बीजेपी में चले गए थे लेकिन उन्हें पार्टी ने वापिस लेकर दो चुनाव लड़ाए।कमलनाथ इसे चौधरी पर लागू कर दिग्गीराजा को मैसेज देना चाहते है।कमलनाथ ऑफ द रिकॉर्ड सरकार जाने के लिए भी दिग्विजयसिंह को जिम्मेदार मानते है क्योंकि नाराज विधायकों के साथ दिग्विजय ही फ्रंट फूट पर बात कर रहे थे।इस आशय का उनका बयान भी पिछले दिनों सामने आ चुका है।जाहिर है मप्र कांग्रेस में जहां ज्यादा एकजुटता और आक्रमकता की आवश्यकता है वहा पार्टी के शीर्ष पर मतभेदों का यह खुला अंबार उसकी वापिसी के सपनों को परवान नही चढ़ने देगा।


    यह भी समझना होगा कि इस अंचल में कमलनाथ के पास खुद की कोई पूंजी नही है सिंधिया के बाद जो कांग्रेस नजर आती है उसके तार दिग्गीराजा से ही जुड़े है क्योंकि न तो प्रदेशाध्यक्ष और न सीएम रहते हुए ही कमलनाथ कभी इस इलाके में आये।महल से कूटनीतिक मोर्चा राजा ही लेते रहे है इसलिए बरास्ता राहुल गांधी(जैसा कि आज चौधरी राकेश सिह ने कहा) नई खिचड़ी पकाने का प्रयास कमलनाथ करते है तो इसकी सफलता की संभावना कम ही होगी।राकेश के रूप में कमलनाथ का यह दूसरा हमला है दिग्गीराजा पर इससे पहले अशोक सिंह को प्रदेश महामंत्री से ग्वालियर ग्रामी न का अध्यक्ष बनाया जाना भी सियासी सन्देश देता था।तब जबकि अशोक सिंह गवलियर महानगर की दो सीटों से दावेदार थे।

  • प्रदुम्न की साख को भाजपा के वोटर का साथ

    प्रदुम्न की साख को भाजपा के वोटर का साथ

    (डॉ अजय खेमरिया)

    ग्वालियर सीट पर होने वाला उपचुनाव इस बात का परीक्षण भी होगा कि क्या जनता से सतत सम्पर्क का वोटिंग विहेवियर(मतदान व्यवहार)से कोई स्थाई रिश्ता होता है या नही? यहां से बीजेपी के कैंडिडेट प्रधुम्न सिंह तोमर मप्र में नरोत्तम मिश्रा के बाद सर्वाधिक जनसम्पर्क रखने वाले नेता है लिहाजा दलबदल के साथ उनका केन्डिडेचर उनके जनसपंर्क की निजी पूंजी का इम्तिहान भी होगा।

    प्रधुम्न सिंह तोमर ग्वालियर से चौथा चुनाव लड़ेंगे।दो चुनाव वह जीत चुके है कमलनाथ सरकार में खाद्य मंत्री से स्तीफा देने वाले तोमर की खासियत यह है कि वे ग्वालियर विधानसभा के हर आम -ओ- खास के साथ खुद सतत सम्पर्क में रहते है।माना जाता है कि उनका खुद का निजी वोट बैंक भी है जिसे वह लगातार सहेजते रहे है।जनता की मूलभूत समस्याओं के लिए अक्सर सड़कों और जेल में दिखाई देने वाले प्रधुम्न सिंह के सामने नई चुनौती बीजेपी के निशान पर चुनाव लड़ने की है।वही बीजेपी जिसके विरुद्ध वह 15 साल तक सड़कों पर लड़ते रहे है।उसके कार्यकर्ताओं ,नेताओं से उनका खुला टकराव होता रहा है।वैसे ग्वालियर की सियासत को नजदीक से समझने वाले जानते है कि प्रधुम्न सिंह को जितना चुनावी सहयोग कांग्रेस से नही मिलता उससे अधिक कमलदल से मिल जाता है।वजह बीजेपी के नेता जयभान सिंह पवैया है जिनके नेचर को लेकर न केवल बीजेपी वर्कर बल्कि आम जनता में भी तीखी प्रतिक्रिया रहती है।2018 के चुनाव में पवैया की पराजय दीवार पर मोटे हरूफ में लिखी इबारत की तरह साफ थी क्योंकि मंत्री रहते हुए उनके पास ऐसी कोई उपलब्धि नही थी जो उन्हें इस उपनगर से फिर जिताने के लिए आधार बने उल्टे पांच साल उनके रूखे व्यवहार से जनता बेहद खफा थी।यही कारण था कि जनसघर्ष से नेता बनने वाले प्रधुम्न को 2018 में जीत के लिए कोई जतन नही करना पड़ा।

    असल मे ग्वालियर सीट बीजेपी का गढ़ रही है यहां से केंद्रीय पंचायत मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर 1998 और 2003 में विधायक रहे है।डॉ धर्मवीर जैसे नेता भी यहां बीजेपी का झंडा गाड़ चुके है।यह इलाका बन्द हो चुके मिल्स के बेरोजगार श्रमिकों का भी है और महानगर की सबसे पिछड़ी बस्तियां भी यहीं है।यहाँ ठाकुर,ब्राह्मण,कोली,किरार,कमरिया(यादव),बाथम भोई,जाटव,शिवहरे,बिरादरी बहुसंख्यात्मक क्रम में है।इनके अलावा वैश्य ,राठौर,मुस्लिम,कुर्मी पटेल,लोधी,बघेल,पंजाबी,बाल्मीकि,प्रजापति,सेन,धोबी,नामदेव,गुर्जर,परिहार, खटीक,धानुक,बरार, सहित लगभग सभी जातियों को समेटे यह विधानसभा सीवर,पेयजल,सड़क,बिजली,बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर आज भी पिछड़ेपन का अहसास कराती है।प्रदेश सरकार में नरेंद्र सिंह तोमर,जयभान सिंह पवैया,प्रधुम्न सिंह जैसे कद्दावर मंत्री इस क्षेत्र ने दिये है लेकिन अभी भी यहां मूलभूत मामलों पर काम की लंबी फेहरिस्त है।यह तथ्य है कि विकास कार्य भी यहां बड़े पैमाने पर हुए है।

    उपचुनाव की चर्चा पूरे क्षेत्र में है प्रधुम्न सिंह जबसे बेंगलुरू से लौटे है लगातार गली मोहल्लों में अपनी बैठक जमाये हुए है।कोरोना में भी उन्होने सेवा कार्यों में कोई कसर नही छोड़ी।लेकिन समस्या यहाँ बीजेपी और कांग्रेस से आये कार्यकर्ताओं के सुमेलन की है।प्रधुम्न पहल कर इसके लिये आगे भी बढ़े तो पवैया शायद ही इसके लिए तैयार हो।असल मे जयभान सिंह के लिये प्रधुम्न का बीजेपी से जीतने का मतलब है सियासी वानप्रस्थ।
    हालांकि पार्टी के निर्णय के विरुद्ध पवैया का जाना मुश्किल है लेकिन यहां पुरानी अदावत को आबोहवा में साफ महसूस किया जा सकता है।
    जो चुनावी गणित है वह फिलहाल प्रधुम्न सिंह के पक्ष में है क्योंकि उन्हें बीजेपी में सबसे ताकतवर नेता नरेंद्र सिंह सपोर्ट करेंगे।इनके अलावा सांसद विवेक शेजवलकर ,माया सिंह, वेदप्रकाश शर्मा,जयसिंह कुशवाह, सहित ग्वालियर के सभी बड़े नेता सिंधिया के साथ समन्वय की बात कह रहे है।
    स्वयं प्रधुम्न की पूंजी भी यहां कम नही है।
    तोमर ठाकुरों के अलावा कोली और बाथम समाज में प्रधुम्न का जबरदस्त जनाधार है इसके अलावा गरीब तबके में भी वह लोकप्रिय है।


    उधर कांग्रेस के पास यहां से उतारने के लिए माथापच्ची करनी पड़ रही है क्योंकि जो सबसे प्रबल दावेदार है सुनील शर्मा वह कट्टर सिंधिया समर्थक रहे है।इतने स्वामी भक्त की पूरी चुनावी तैयारी के बाबजूद सिंधिया के कहने पर प्रधुम्न के लिए 2018 में मैदान छोड़ दिया।दूसरा नाम पूर्व जिलाध्यक्ष अशोक शर्मा का है कभी सुरेश पचौरी के नजदीक रहे अशोक शर्मा पहले भी इस सीट से नरेंद्र सिंह तोमर के विरुद्ध चुनाव लड़कर 26358 वोट से हार चुके है। स्थानीय राजनीति के पुराने खिलाड़ी होने के कारण उनके नाम पर भी कांग्रेस निर्णय कर सकती है।सुनील शर्मा की तुलना में वे सिंधिया के ज्यादा विरोधी कहे जा सकते है।अशोक शर्मा चूंकि सनाढ्य ब्राह्मण है और यहां इस उपवर्ग के ब्राह्मण ही सर्वाधिक है इसलिए उनकी दावेदारी को यहाँ अगर कांग्रेस दरकिनार करती है तो उसका ब्राह्मण कार्ड सुनील शर्मा के सहारे कमजोर पड़ सकता हैं क्योंकि सुनील यहां के स्थानीय ब्राह्मण न होकर मारवाड़ी है। सुनील कांग्रेस कैडर से ज्यादा सिंधिया भक्ति के चलते यहाँ केन्डिडेचर डवलप करने में सफल हुए है।उनके विरुद्ध कांग्रेस की बड़ी लॉबी यहां सक्रिय हो गई है।पिछले7 चुनावों में यहां बीजेपी चार और कांग्रेस तीन बार जीती है।बसपा का प्रभाव भी इस सीट पर अच्छा है।1990 से औसतन 16 परसेंट वोट यहां बसपा लेती आ रही है।इस बार भी बसपा यहां उम्मीदवार खड़ा करेगी जो कांग्रेस के लिए मुसीबत ही होगा।