भोपाल,19 जुलाई(प्रेस सूचना केन्द्र)। पूर्व संसदीय कार्यमंत्री नरोत्तम मिश्रा के तीखे तेवरों ने पिछले दो दिनों में सरकार को बैकफुट पर आने को मजबूर कर दिया है। हालात ये हैं कि उनके तीखे सवालों के सामने सदन भी नतमस्तक होता नजर आया। इस तरह की संसदीय बहस प्रदेश की राजनीति में लंबे समय बाद देखने मिल रही है जिससे सहमत विधानसभा अध्यक्ष एनपी प्रजापति ने सदन को अगले दिन तक के लिए स्थगित करने की घोषणा कर दी। उनके फैसले की सभी वर्गों के बीच प्रशंसा की जा रही है।
कल
जब गृह विभाग पर बजट चर्चा का
जवाब गृहमंत्री बाला बच्चन
देने जा रहे थे तभी पूर्व मंत्री
नरोत्तम मिश्रा ने व्यवस्था
के प्रश्न के हवाले से अधिकारी
दीर्घा की ओर सदन का ध्यान
आकर्षित कराया। उन्होंने कहा
कि माननीय अध्यक्ष जी ने ही
ये निर्देश दिए थे कि जब किसी
विभाग के संबंध में चर्चा चल
रही हो तब उस विभाग के प्रमुख
अधिकारी दीर्घा में अवश्य
मौजूद रहें। इसके बावजूद पुलिस
महानिदेशक वीपी सिंह और डीजी
जेल संजय चौधरी आज दीर्घा में
उपस्थित नहीं हैं। क्या उन्होंने
अपनी गैरहाजिरी के लिए किसी
से अनुमति ली है। उन्होंने
कहा कि गृहमंत्री इतने निरीह
हैं कि अधिकारी उनकी सुनते
तक नहीं हैं।
इस
पर संसदीय कार्य मंत्री डाक्टर
गोविंद सिंह ने कहा कि निश्चित
तौर पर ये बहुत गंभीर बात है।
मालूम चला है कि वे किसी बैठक
में हैं। सदन की बैठक से ज्यादा
महत्वपूर्ण और कौन सी बैठक
हो सकती है। अधिकारियों को
दीर्घा में उपस्थित रहना
चाहिए। ये बहुत गंभीर बात
है।मुख्यमंत्री और गृह सचिव
को इस पर कार्रवाई करनी चाहिए।
विपक्ष ने जिस ओर ध्यान आकर्षित
कराया है उस पर सदन को संज्ञान
लेना चाहिए। इस दौरान गृह सचिव
एस.एन.मिश्रा
भी दीर्घा में मौजूद थे।
नेता
प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने
कहा कि माननीय अध्यक्ष जी आपने
ही व्यवस्था दी थी कि जनरल बजट
पर चर्चा के दौरान विभाग प्रमुख
और सचिव भी दीर्घा में उपस्थित
रहें। उन्होंने कहा कि माननीय
मंत्री जी आज अपने विभाग की
चर्चा का उत्तर न दें। जब डीजी
महोदय और जेल डीजी उपस्थित
रहें तब कल या किसी और समय चर्चा
का उत्तर दिया जाए।
इस
पर नरोत्तम मिश्रा ने कहा कि
माननीय गृहमंत्री जी सक्षम
हैं और वे आज भी जवाब दे सकते
हैं। यदि वे आज अधिकारियों
की अनुपस्थिति के कारण जवाब
नहीं देते हैं तो ये भविष्य
के लिए नजीर बन जाएगी। इस पर
अध्यक्ष जी कोई व्यवस्था दे
दें तो उचित होगा।
जवाब
में अध्यक्ष एन.पी.प्रजापति
ने कहा कि सदन के निर्देशों
का पालन नहीं होगा तो मुझे भी
किताबें पलटकर नियमों का पालन
कराना पड़ेगा। उन्होंने कहा
कि मैं जब बिजली मंत्री था और
तब ओ एंड एम मेंबर मिस्टर भोंडे
उपस्थित नहीं थे तो मैंने
उन्हें नोटिस दिया था और धारा
11 ए के
तहत कार्रवाई की थी। हमारा
सदन लोकतंत्र का मंदिर है,
गफलत बाजी की
जाएगी तो ये सदन की अवमानना
के दायरे में आएगा। उन्होंने
कहा कि चर्चा के दौरान अधिकारियों
को सदन में रहना चाहिए। यदि
कोई नया विधायक अपनी बात सदन
में उठा रहा है तो वह बात
अधिकारियों तक प्रेषित होनी
ही चाहिए। यदि नहीं जा रही है
तो फिर क्या मतलब। इसके साथ
ही उन्होंने सदन को शुक्रवार
11 बजे तक
के लिए स्थगित करने की घोषणा
कर दी।
अध्यक्ष
एन.पी.प्रजापति
के इस फैसले पर पूरे सदन की ओर
से उनकी सराहना की गई। इस तरह
का माहौल बरसों बाद सदन में
देखा गया।
मध्यप्रदेश विधानसभा के बजट सत्र में आज की कार्यवाही ने प्रदेश के राजनैतिक और आर्थिक हालात की पूरी तस्वीर प्रस्तुत कर दी। वित्तमंत्री तरुण भनोट के बजट भाषण पर सदन के 32 विधायकों ने पिछले दो दिनों में जिस तरह अपने विचार प्रस्तुत किए उन्हें लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच कई मुद्दों पर तीखी तकरार हुई। सदन के समवेत होते ही विधानसभा अध्यक्ष नर्मदा प्रसाद प्रजापति ने जब प्रश्नकाल प्रारंभ करने की अनुमति दी तो आरोप प्रत्यारोप का दौर भी शुरु हो गया। भाजपा विधायक जालम सिंह पटेल ने शिक्षा मंत्री प्रभुराम चौधरी से पूछा कि चुनाव के दौरान कांग्रेस ने अपने वचनपत्र में वादा किया था कि वह सत्ता में आने पर निजी स्कूलों के शिक्षकों का नियमितीकरण करेगी। अब सात महीने बीत चुके हैं, निजी स्कूलों के शिक्षक तनावपूर्ण माहौल में काम करते हैं। उन्हें सरकार कब नियमित करेगी और उनके वेतनमान बढ़ाएगी। उन्होंने कहा कि सरकार ने युवाओं को रोजगार देने का वादा करते हुए कहा था कि पीएससी से शिक्षकों के पद भरे जाएंगे और युवाओं को नौकरी दी जाएगी। श्री पटेल ने कहा कि यदि पीएससी होती है तो कई सालों से निजी स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षक बेरोजगार हो जाएंगे। ऐसे हालात में सरकार पहले उन्हें नियमित करे और फिर युवाओं की नई भर्तियां करे। कांग्रेस ने चुनाव में वादा तो कर दिया था पर वह इस पर अमल कब कर रही है। इस पर प्रभुराम चौधरी ने कहा कि सरकार इस पर विचार कर रही है और सभी संभावनाओं का अध्ययन कराया जा रहा है। इस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरु हो गया। इस बीच नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने प्रभुराम चौधरी के जवाब पर व्यंग्य कसते हुए कहा कि एक तरफ तो वोटें ठग लीं और अब कह रहे हैं कि वादों पर अमल की समय सीमा बताना संभव नहीं है। आपकी भी समय सीमा नहीं है कि सरकार आखिर कब तक रहेगी। इस पर गृहमंत्री बाला बच्चन ने कहा कि क्या आप हमारी समयसीमा तय करेंगे। हमारा फैसला तो विधायकगण कर चुके हैं। इस बीच लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री तुलसी सिलावट ने कहा कि आप अपनी समयसीमा बता दो कि आप कब तक नेता प्रतिपक्ष बने रहेंगे। इस पर भाजपा के डाक्टर नरोत्तम मिश्रा ने कहा कि एक मेरे पास एक वाट्सएप संदेश आया था जिसमें कहा गया था कि एक मानसून कर्नाटक से होता हुआ मध्यप्रदेश की ओर आने को अग्रसर है। इस पर अध्यक्ष एनपी प्रजापति ने कहा कि यह सदन का विषय नही है। इस पर बाला बच्चन ने जवाब दिया कि ये मानसून मध्यप्रदेश में प्रवेश नहीं कर पाएगा. एक सवाल के जवाब में विधायक मुन्नालाल गोयल ने पूछा कि स्मार्टसिटी प्रोजेक्ट में मध्यप्रदेश और केन्द्र के बीच हिस्सेदारी क्या है। इसके जवाब में नगरीय विकास एवं आवास मंत्री जयवर्धन सिंह ने बताया कि ये प्रोजेक्ट केन्द्र प्रवर्तित है और इसमें केन्द्र व राज्य की पचास पचास प्रतिशत की हिस्सेदारी है। इस पर श्री गोयल ने कहा कि इस प्रोजेक्ट के संबंध में जो गाईड लाईन बनाई गई है उसका पालन नहीं हो रहा है। स्मार्ट सिटी में शिक्षा, स्वास्थ्य, पार्क आदि की व्यवस्था की जानी है लेकिन राज्य सरकार गाईड लाईन का पालन नहीं कर रही है। उन्होंने कहा कि जो फंड केन्द्र से आ रहा है या राज्य खर्च कर रहा है उसका खर्च कैसे हो रहा है इसे जानने के लिए स्थानीय जन प्रतिनिधियों की निगरानी भी होनी चाहिए। ये राशि किसी व्यक्ति के अधिकार क्षेत्र में नहीं है। जनता का पैसा है और उसका पूरा उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इस पर नगरीय प्रशासन मंत्री जयवर्धन सिंह ने कहा कि मैं माननीय विधायक जी को पूरा आश्वासन देता हूं कि गाईड लाईन का पूरा पालन किया जाएगा।उन्होंने कहा कि ग्वालियर में फेस टू के लिए तीन सौ पचास करोड़ का फंड आया है। लेकिन अभी उसमें से केवल सैंतीस करोड़ ही खर्च हो पाए हैं। उन्होंने कहा कि स्मार्ट सिटी के लिए ग्वालियर में जो जगह निर्धारित है उसमें से विधायक जी की विधानसभा का बहुत छोटा क्षेत्र आता है। उन्होंने कहा कि खेल क्षेत्र और मेडीकल कालेज के लिए पांच करोड़ इन्क्यानवे लाख रुपए स्वीकृत हो चुके हैं। भोपाल के मास्टर प्लान के संबंध में विधायक रामेश्वर शर्मा ने नगरीय प्रशासन मंत्री जयवर्धन सिंह से पूछा कि मास्टर प्लान की सड़कों का निर्माण अब तक क्यों नहीं हो पाया है और सरकार इन्हें कब तक पूरा करेगी। इस पर श्री जयवर्धन सिंह ने कहा कि सड़कों का निर्माण बजट की व्यवस्था के आधार पर किया जाता है। जैसे जैसे बजट मिलता जाएगा सड़कों का निर्माण होता जाएगा। उन्होंने कहा कि भोपाल के मास्टर प्लान का काम जारी है। इसे 2005 में और 2015 में बन जाना था पर पिछली सरकार उसे लागू क्यों नहीं कर पाई इसकी वजह वे नहीं बता सकते। उन्होंने कहा कि अंतिम मास्टर प्लान 1995 में लागू हुआ था तबसे भोपाल की तस्वीर बहुत बदल चुकी है। हमारी सरकार का प्रयास है कि इस साल के अंत तक नया मास्टर प्लान लागू हो जाए। उन्होंने कहा कि कई एजेंसियां सड़कों का निर्माण करती हैं। कई सड़कें नगर निगम की होती है, कई सीपीए, कई लोक निर्माण विभाग और कई बीडीए की भी होती हैं इसलिए ये काम सदन के भीतर बैठकर तो तय नहीं किया जा सकता कि कौन सी सड़क कौन सी एजेंसी लेगी।
विधायक नागेन्द्र सिंह ने रीवा जिले में अवैध उत्खनन का मामला उठाया तो खनिज मंत्री प्रदीप जयसवाल ने कहा कि अवैध उत्खनन रोकने के लिए सरकार मुस्तैदी से काम कर रही है। जुर्माना भी वसूला जा रहा है, वाहनों के राजसात करने की कार्रवाई भी की जा रही है। इस पर नागेन्द्र सिंह ने कहा कि अवैध उत्खनन की तुलना में सरकार की कार्रवाई बहुत सीमित है। इस विषय पर कई सदस्यों की टिप्पणियों को अध्यक्ष ने विलोपित कर दिया। प्रश्नकाल समाप्त होते ही कई सदस्य टोका टाकी करके अपनी बातें कहने लगे। इस पर अध्यक्ष श्री प्रजापति ने कहा कि शून्यकाल का मतलब ये नहीं कि सब शून्य हो गया है। जब घड़ी के दोनों कांटे बारह बजे पर आते हैं तो इसे शून्यकाल कहा जाता है। इसके बाद भी कार्यवाही चलती है इसलिए आप लोग हस्तक्षेप करना बंद करें। पथरिया विधायक राम बाई ने क्षेत्र के एक परिवार के अट्ठाईस लोगों को पुलिस मुकदमे में जबरन फंसाए जाने का मामला उठाया। इस पर अध्यक्ष श्री प्रजापति ने कहा कि जब कोई मामला अदालत में विचारणीय होता है तो उस पर सदन में चर्चा नहीं की जाती है। नरोत्तम मिश्रा ने विधानसभा में मीडिया के व्यवस्थापन का मुद्दा भी उठाया। इस पर नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने कहा कि आसंदी से कुछ ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि मीडिया का भी सम्मान बना रहे और विधायिका का भी गौरव बढ़े। इस पर अध्यक्ष ने कहा कि जो संस्था विधायिका के लिए बनी है उसमें ही यदि वो धक्के खाने को मजबूर हो जाए तो काम कैसे होगा। पहले मीडिया का स्वरूप बहुत छोटा था अब इलेक्ट्रानिक मीडिया भी है और प्रिंट मीडिया भी इसलिए दोनों के लिए अलग कक्ष दे दिए गए हैं। धीरे धीरे व्यवस्था जम जाएगी जो बातें सामने आएंगी उसके मुताबिक और भी बदलाव हो जाएंगे। नरोत्तम मिश्रा ने कहा कि एक ही सवाल के जवाब देने के लिए सदस्यों को दो अलग अलग स्थानों पर जाना पड़ रहा है। गोपाल भार्गव ने कहा कि विधानसभा सलाहकार समिति की राय से उचित व्यवस्था दे दें तो इसके जवाब में अध्यक्ष ने कहा कि उचित समय पर निर्णय ले लिया जाएगा। सदन के कामकाज को देखते हुए अध्यक्ष महोदय ने भोजनावकाश निरस्त कर दिया और मौजूदा वर्ष के आय व्ययक पर चर्चा आहूत की। बजट पर चर्चा करते हुए नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने कहा कि सदन में कहा गया कि आर्थिक सर्वेक्षण में जारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश पिछड़ गया है और बीमारू राज्य हो गया है। हकीकत में राज्य का विकास तेज गति से हुआ है। दो हजार तीन की तुलना में देखें तो राज्य में बिजली, सड़क,पानी, सिंचाई जैसे कई क्षेत्रों में अभूतपूर्व विकास हुआ है। जहां तीन हजार मेगावाट बिजली बनती थी वहां अब अठारह हजार छह सौ साठ मेगावाट बिजली बनती है। इस पर वाणिज्यिक कर मंत्री बृजेन्द्र सिंह राठौर ने कहा कि दो लाख करोड़ का कर्ज किसने लिया। इस पर गोपाल भार्गव ने कहा कि आपने तो सत्ता में आते ही कर्ज और फिजूलखर्ची शुरु कर दी है। अगले महीने से तो सरकार वेतन भी नहीं बांट पाएगी। पिछले पंद्रह सालों में हमारी सरकार ने कभी ओवरड्राफ्ट नहीं किया था। उन्होंने कहा कि इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगना चाहिए। यदि हम कहें कि नेहरू जी, इंदिरा जी, लाल बहादुर शास्त्री जी, अटलजी के जमाने में देश में कुछ नहीं हुआ तो ये कहना उन विभूतियों के साथ अन्याय करना होगा। उन्होंने कहा कि वित्त मंत्रीजी ने बजट में जो आय बढ़ने का आंकडा प्रस्तुत किया है उसे उन्हें एक बार फिर जांच करके कंफर्म करना चाहिए। उन्होंने कहा कि राज्य उत्पाद कर में सैंतीस प्रतिशत की ग्रोथ दिखाई गई है, जबकि अधिकतर ठेके बीस से अठारह प्रतिशत पर हो रहे हैं। पिछले दस वर्षों की ग्रोथ रेट को आधार बनाकर ये बजट बनाया जाता तो ज्यादा उपयुक्त होता। श्री भार्गव ने कहा कि मैं इस बजट को खोखला कहता हूं। उन्होंने कहा कि इस तरह के आंकड़ों के आधार पर बजट बनने से ये स्थितियां बनेंगी कि न तो निर्माण हो पाएंगे न ही भुगतान हो पाएंगे। उन्होंने कहा कि जीएसटी में 70 फीसदी की बढ़त दिखाई गई है , जबकि ये संभव नहीं है। यदि आप इतनी बढ़त दिखाएंगे तो फिर केन्द्र अतिरिक्त राशि क्यों देगा। नियम ये है कि यदि आप घाटे में जा रहे हैं तो घाटे की प्रतिपूर्ति केन्द्र से की जाएगी। जब आप मुनाफा दिखाएंगे तो संसाधन कैसे जुटा पाएंगे। इसी तरह स्टाम्प ड्यूटी में 23 फीसदी की बढ़त दिखाई गई है, जबकि कलेक्टर गाईड लाईन में 20 प्रतिशत की कमी की गई है। इसी तरह भू राजस्व में सौ फीसदी बढ़त दिखाई गई है जो किसी भी तरह संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि ऊर्जा विभाग की सब्सिडी आदि पर आठ हजार करोड़ का प्रावधान किया गया है जबकि हमने लगभग साढ़े चौदह हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया था। जाहिर है कि सरकार को अपने इस फैसले पर एक बार फिर विचार करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि सरकार ने सहकारी बैंकों को एक हजार करोड़ देने का फैसला किया है। यदि ऐसा होता है तो सरकार खस्ताहाल बैंकों की मालिक ही बन जाएगी। ऐसे में रिजर्व बैंक इन सहकारी बैंकों का लाईसेंस निरस्त कर देगा। सरकार को कर्ज के एवज में इन बैंकों में पूंजी निवेश करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि सारी सहकारी मिलें घाटे में चल रही हैं उन्हें उबारने के लिए बजट में कोई प्रावधान नहीं किए गए हैं।
बजट भाषण के संबंध में सभी सदस्यों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करते हुए वित्तमंत्री तरुण भनोट ने कहा कि इस संबंध में सभी आपत्तियों का कोई आधार नहीं है। सरकार प्रदेश की बेहतरी के लिए काम कर रही है। शराब पर इस बार पंद्रह के स्थान पर बीस फीसदी वृद्धि की गई है इससे प्रदेश का राजस्व बढ़ेगा। उन्होंने पांच रुपए में गरीबों को भोजन कराने वाली दीन दयाल रसोई योजना बंद किए जाने के आरोप का खंडन करते हुए कहा कि राज्य में हर दिन तेरह हजार गरीबों को पांच रुपए में भोजन कराया जा रहा है। ये योजना कई कंपनियों से फंड जुटाकर चलाई जा रही है। सरकार इसमें आवश्यक सुधार भी करेगी। इस पर भाजपा के जालम सिंह पटेल ने कहा कि मैं स्वयं ये योजना चलाता रहा हूं। इसमें पांच रुपए की राशि बहुत कम पड़ती है। रसोई का पूरा खर्च नहीं निकल पाता है इसलिए इस राशि को बढ़ाया जाना चाहिए। इस पर वित्तमंत्री तरुण भनोट ने कहा कि सरकार इस सुझाव पर अवश्य विचार करेगी। मनोहर ऊंटवाल के आरोप के जवाब में श्री भनोट ने कहा कि हमने गौशालाओं के लिए दी जाने वाली चार रुपए की राशि को बढ़ाकर बीस रुपए प्रतिदिन प्रतिगाय की दर से बढ़ा दिए हैं। इससे गौवंश की देखभाल अच्छी तरह हो पाएगी। इसके लिए बजट में पर्याप्त प्रावधान किया गया है। आगे और भी संशोधन किए जाएंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछली भाजपा की सरकार तो एक गौशाला भी नहीं खोल सकी थी जबकि कमलनाथ सरकार ने जो प्रावधान किए हैं उससे प्रदेश में पर्याप्त गौशालाएं खोली जा सकेंगी। धीरे धीरे ये स्थिति बन जाएगी कि एक भी गौवंश आवारा हाल में सड़कों पर नहीं फिरेगा। इस बीच भाजपा के बहादुर सिंह चौहान ने कहा कि सरकार ने सारी जन हितैषी योजनाओं की दुर्गति कर दी है। तीर्थ दर्शन योजना में दो सौ करोड़ रुपए का प्रावधान किया जाता था सरकार ने बजट में उसे मात्र छह करोड़ रुपए कर दिया है।
सदन
में तीन अशासकीय संकल्प प्रस्तुत
किए गए जिन्हें अध्यक्ष की
घोषणा के अनुसार सर्वानुमति
से पारित कर दिया गया। जिसमें
प्रधानमंत्री आवास योजना के
लिए ग्रामीण इलाकों में आबंटित
की जाने वाली राशि डेढ़ लाख
रुपए से बढ़ाकर ढाई लाख रुपए
किए जाने का संकल्प भी शामिल
था। दशहरा दीपावली की छुट्टियों
में या उसके तुरंत बाद परीक्षाओं
का आयोजन न किए जाने और इटारसी
से इलाहाबाद के लिए प्रतिदिन
ट्रेन चलाने के संकल्प भी सदन
ने पारित कर दिए। अपरान्ह
अध्यक्ष महोदय ने सदन की
कार्यवाही बुधवार
सत्रह जुलाई तक के लिए स्थगित
करने की घोषणा कर दी।
आम चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस में आत्ममंथन का दौर शुरु हो गया है। राहुल गांधी का कहना है कि कांग्रेस की बागडोर अब परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति को संभालनी चाहिए। चुनावी भाषणों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस के परिवारवाद को जिस तरह देश के लिए घातक बताया उस पर जनता ने गंभीरता से विचार किया। खुद को इस परिवारवाद से अलग दिखाने के लिए भाजपा ने तो कई बड़े दिग्गजों और उनके परिजनों के भी टिकिट काट दिए। अपने चुनावी इंटरव्यू में अमित शाह ने बार बार कहा कि आप नहीं जान सकते भाजपा का अगला अध्यक्ष कौन होगा लेकिन कांग्रेस में तो सबको मालूम रहता है कि अगला अध्यक्ष गांधी परिवार का ही कोई बेटा बेटी होगा। ये बात कांग्रेस पर सौ फीसदी सही भी उतरती है। कांग्रेस के भीतर से इसे लेकर काफी आक्रोश पनपता रहा है। कांग्रेस के कई नेता तो खुलकर बोलते रहे हैं कि कांग्रेस में अनुकंपा नियुक्तियों का दौर समाप्त होना चाहिए। मध्यप्रदेश कांग्रेस में सभी बड़े दिग्गज गांधी परिवार से असहमत रहे हैं। स्वर्गीय अर्जुनसिंह ने तो तिवारी कांग्रेस बनाकर विद्रोह का शंखनाद किया था। उनके चेले रहे दिग्विजय सिंह भी कांग्रेस परिवार का दंश झेल चुके हैं। सिंधिया राजवंश पर इंदिरागांधी के प्रहार के कारण ही तो प्रदेश में आधुनिक भाजपा की नींव पड़ी थी। दरअसल में नेहरू गांधी खानदान का हस्तक्षेप देश की राजनीति में इतना प्रभावी रहा है कि कोई भी क्षेत्रीय या राष्ट्रीय नेता इस परिवार की कोटरी के खिलाफ सिर नहीं उठा सका है। जब जिसने अपना वजूद बढ़ाने का प्रयास किया उसे राजनीति के मैदान से ही विदा होना पड़ा। यही वजह है कि नेहरू गांधी खानदान भारत की राजनीति का एजेंडा तय करने की एकमात्र धुरी रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह पीव्ही नरसिंम्हाराव सरकार की आर्थिक नीतियों पर अमल शुरु किया उससे पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह की सोच ही साकार हुई है। आर्थिक सुधारों ने देश में समानांतर अर्थव्यवस्था को समाप्त करने की दिशा में बड़ी दूरी तय कर ली है।विशाल भारत तेजी से अर्थव्यवस्था के नए नए मुकाम हासिल करता जा रहा है।ऐसे में कांग्रेस की कथित गांधीवादी सोच की कोई जरूरत शेष नहीं रह गई है। यह सोच देश को आत्मनिर्भर बनाने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा रही है। महात्मा गांधी तो ग्राम स्वराज की बात करते थे लेकिन कांग्रेस ने उसे नेहरू गांधी राज में तब्दील कर दिया। ऐसे में किसी भी राजनेता के बस की बात नहीं रही कि वो कांग्रेस को इस लौह आवरण से मुक्त करा सके। यही वजह है कि कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने भाजपा को आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई। मध्यप्रदेश में तो शिवराज सिंह सरकार इतना लंबा सफर केवल इसलिए तय कर सकी क्योंकि उसे कांग्रेस के दिग्गजों ने ही सहारा दे रखा था। जब शिवराज की भाजपा कांग्रेस से भी आगे बढ़कर कथित गांधीवादी नीतियों की गुलाम बन गई तो उससे प्रदेश को निजात दिलाने के लिए भाजपा के भीतर से ही बदलाव की बयार महसूस की गई। उससे बड़ी समस्या तो आज महसूस की जा रही है जब वक्त है बदलाव का नारा साकार करने के बावजूद मध्यप्रदेश में वही पुरातन पंथी कांग्रेस का दौर लौट आया है। मुख्यमंत्री कमलनाथ के हाथों में ही संगठन की कमान है और वे उसी पोंगापंथी कांग्रेस की तस्वीर साकार कर रहे हैं जिसे प्रदेश ने बेचैनी से भरकर सत्ता से बाहर धकेला था। संगठन का ताना बाना बुनने के लिए कमलनाथ ने चोर दरवाजा खोल दिया है। उन्होंने तबादलों और पोस्टिंग का जो काला कारोबार शुरु किया उसकी वजह से प्रदेश का विकास ठप पड़ गया है। दलालों की फौज फोन कर करके भ्रष्ट अफसरों को मनचाही पोस्टिंग का न्यौता भेज रही है।लोग चंदा देकर पोस्टिंग नहीं पाना चाहते क्योंकि प्रदेश सरकार ने आर्थिक संसाधनों की व्यवस्था नहीं की है। कमलनाथ की सोच जिन दलालों को संगठन के तौर पर एकजुट कर रही है उसे ही वे समाज के नीति नियंता मानते हैं।कमलनाथ को करीब से जानने वाले बताते हैं कि वे समाज में धौंस डपट से संसाधनों पर कब्जा जमाने वालों को ही लीडर मानते हैं। यही वजह है कि भाजपा और कांग्रेस के तमाम दलाल कांग्रेस के बैनर पर एकजुट होने लगे हैं। कमलनाथ की सोच सही है या गलत इस पर विचार न करें तो भी ये तो तय है कि वे अपनी सोच के आधार पर संगठन का एक ढांचा गढ़ रहे हैं। भाजपा से विशाल संगठन से दो दो हाथ करने के लिए कांग्रेस को लड़ने वाले योद्धाओं की जरूरत है। ये जरूरत कमलनाथ पूरी कर रहे हैं। समस्या ये आ रही है कि शोभा ओझा, नरेन्द्र सलूजा,आर.के.मिगलानी या प्रवीण कक्कड़ जैसे लोग जिस संगठन के नाम पर तबादले पोस्टिंग का कारोबार चला रहे हैं वे वास्तव में जनसेवा के विचार से कोई वास्ता नहीं रखते। अब ऐसे लोगों की भीड़ जुटाकर जनहितकारी कांग्रेस तो नहीं बनाई जा सकती। भाजपा में आज भी जब अपना घर फूंककर समाजसेवा करने वाली पीढ़ी जिंदा है तब ऐसी चंदाखोरों की कांग्रेस की जरूरत क्या है। शिवराज सिंह चौहान ने सेवाभावी भाजपा को भले ही प्राथमिकता न दी हो लेकिन उन्होंने इसे समाप्त भी नहीं किया। कमलनाथ कांग्रेस तो सेवाभावी कार्यकर्ताओं और नागरिकों को ही धकियाकर घर बिठाने में जुट गई है। इसमें राहुल गांधी के इस्तीफे की पेशकश के बाद खलल पड़ रहा है। कमलनाथ को उद्योगपति के रूप में प्रचारित किया गया था। सत्ता में आने के बाद वे तबादला और पोस्टिंग पति साबित हो रहे हैं। उनकी सरकार ने कृषि, उद्योग, सार्वजनिक क्षेत्र सभी का भट्टा बिठा दिया है। वैमनस्य से भरे कमलनाथ को प्रदेश के तमाम क्षेत्रों से जुड़े लोग चोर नजर आते हैं। उनका कहना है कि पिछली सरकार खजाना खाली करके गई है। जबकि वे स्वयं सत्ता में आने के बाद प्रदेश के नाम पर दस हजार करोड का लोन ले चुके हैं। प्रदेश की नियमित आय चार हजार करोड़ से अधिक है जिसमें से 3200 करोड़ रुपया वेतन में बंट जाता है। बाकी रकम ब्याज सुविधाओं आदि में खत्म हो जाती है। ये स्थिति पिछली सरकार के कार्यकाल में भी थी और विकास योजनाओं के लिए शिवराज सरकार ने भी धड़ाधड़ कर्ज लिया था। प्रदेश की उत्पादकता धराशायी होने के कारण ये स्थितियां निर्मित हुई हैं। कमलनाथ कहते रहे हैं कि आप लोग मौजूदा काम छोड़कर कोई नए धंधे कर लीजिए। जाहिर है कि देश में चल रही आर्थिक सुधारों की बयार में ये अभीष्ठ भी है। इसके बावजूद लोग क्या करें, कैसे करें इसका मार्गदर्शन देने में कमलनाथ सरकार बुरी तरह असफल साबित हुई है। वे स्वयं कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं इसलिए कांग्रेस भी नेतृत्व विहीनता का दौर झेल रही है। कांग्रेस के भीतर किसी नेता का कद इतना बड़ा नहीं कि वो कमलनाथ को उनकी नाकामियों के लिए डंडा दिखा सके। ऐसे में कांग्रेस के भीतर से चल रही नेतृत्व की बयार कुछ मार्गदर्शन जरूर कर सकती है। राहुल गांधी यदि सच में देश को बदला हुआ देखना चाहते हैं तो उन्हें पद छोड़ने की झूठी रट को छोड़कर कांग्रेस से दूरियां बनानी होंगी। कमलनाथ जैसे लकीर पर चलने वाले नेताओं के बजाए यदि वे कांग्रेस का नया ढांचा खड़ा करने में सक्षम नेताओं को अवसर देंगे तो वे एक मजबूत संगठन जरूर खड़ा कर सकते हैं। यदि वे कांग्रेस को अपना जेबी संगठन बनाने की ही लीक पर चलते रहे तो तय है कि धीरे धीरे प्रदेश की जनता में पनप रहा आक्रोश सैलाब बनकर कांग्रेस की सरकारों को खदेड़ देगा। तब सुधारों का अवसर नहीं बचेगा। गांधी के नाम पर शोषणवादी नीतियों की खेती कर रही कांग्रेस को अपने गिरेबान में झांककर देखना होगा और सुधारों को अमली जामा भी पहनाना पड़ेगा।
राजा,महाराजा औऱ कमलनाथ की रियासतों में बंटी मप्र कांग्रेस।
(डॉ अजय खेमरिया) गुना से ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार ने मप्र की कांग्रेस राजनीति में आपसी संघर्ष की नई पटकथा लिख दी है नकुलनाथ को छोड़कर मप्र के सभी कांग्रेसी सूरमा बुरी तरह से हारे है सरकार के तीन चौथाई मंत्रियों के इलाकों से कांग्रेस बुरी तरह हारी है।मुख्यमंत्री ने 22 प्लस का नारा दिया था लेकिन 29 में से 28 सीटों पर कांग्रेस बुरी तरह हारी है।भोपाल में दिग्विजयसिंह, गुना में सिंधिया, सीधी में अजय सिंह,जबलपुर में विवेक तन्खा जैसे दिग्गज नेता बुरी तरह परास्त हुए है।मप्र की इस हार ने एक बार फिर कांग्रेस दिग्गजों को एक दूसरे के आमने सामने लाकर खड़ा कर दिया है।पूर्व मंत्री और 6 बार से विधायक केपी सिंह ने यह कहकर मामले की गंभीरता को सामने ला दिया कि अब राजा महाराजा को चाहिये कि मुख्यमंत्री कमलनाथ को फ्री हैंड छोड़कर राजा(दिग्गिराजा),महाराजा( सिंधिया) दिल्ली में आराम करें।इधर बाल विकास मंत्री इमरती देवी ,पशुपालन पालन मंत्री लाखन सिंह यादव ने मुख्यमंत्री के नेतृत्व पर सवाल उठाना शुरू कर दिए है।एक टीव्ही शो में कांग्रेस की हार पर पक्ष रखते हुए मुकेश नायक ने भी कमलनाथ की कार्यशैली पर उनके अंतर्मुखी व्यक्तित्व को लेकर कुछ इसी तरह से सवाल खड़ा किया है।लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद सबसे ज्यादा घबराहट मप्र की कमलनाथ सरकार में देखी और सुनी जा रही है ।क्या वाकई मप्र में कमलनाथ सरकार को कोई खतरा है?कल की विधायक दल की बैठक के बाद से लगता तो नही है जिसमे 121 का आंकड़ा परेड के लिये तैयार था।लेकिन बाबजूद इसके खतरा घर मे खड़ा है बहुमत से 2 विधायक कम रहने के कारण कमलनाथ मन्त्रिमण्डल गठन में सीनियरिटी ,क्षेत्रीय सन्तुलन का ध्यान नही रख पाए।6 बार तक के लगातार विधायक मंत्री नही बनाये गए और दूसरी बार विधायक बने के कई लोग मंत्री बनने में सफल रहे यह स्थिति कमलनाथ के लिये मजबूरी में निर्मित हुई क्योंकि सिंधिया, दिग्गिराजा के दबाब में उनके कोटे पूरे करने पड़े इस बीच वरिष्ठता, कैडर, को पीछे रखना पड़ा यही से इस सरकार स्थिरता को लेकर सवाल उठने लगे खुद कांग्रेस विधायकों के बयानों ने इस हवा को बनाने का काम किया।मंत्रिमंडल में आने से वंचित रहे सीनियर विधायको ने एक दूसरे सरदारों पर खुलेआम निशाना साधना शुरू कर दिया।एडल सिंह कंषाना,जयवर्द्धन सिंह दत्ती गांव ,बिसाहूलाल सिंह, नातीराजा,केपी सिंह,लक्ष्मण सिंह,जैसे 20 से अधिक विधायक मंत्री पद की महत्वाकांक्ष लिए हुए है सपा, बसपा,औऱ सभी4 निर्दलीय विधायक भी मंत्री रुतबा चाहते है।कमलनाथ की बुनियादी दिक्कत यह है कि उनके पास दावेदारों को समायोजित करने के लिये विकल्प बहुत सीमित है ।कल विधायक दल की बैठक में एक विधायक ने 20 कांग्रेस विधायको के बीजेपी के सम्पर्क में रहने का दावा किया है।बुरहानपुर औऱ सुसनेर के निर्दलीय विधायक भी आंखे तरेर रहे है भिंड के बसपा विधायक मूलतः भाजपाई ही है ।कुल मिलाकर कांग्रेस में अंदरूनी चुनौतीयां कम नहीं है।
लोकसभा चुनावों ने इस अंदरूनी क्लेश को औऱ भी गहरा कर दिया है।सिंधिया के प्रभाव क्षेत्र वाला मध्यांचल में पार्टी बुरी तरह हारी है सिंधिया से जुड़े एक बड़े नेता के अनुसार इस स्थिति के लिये मुख्यमंत्री और दिग्विजयसिंह जिम्मेदार है क्योंकि टिकट वितरण में सिंधिया की पसन्द को दरकिनार किया गया।भिंड में सिंधिया नही चाहते थे कि देवाशीष जरारिया को टिकट दी जाए क्योंकि उनकी इमेज कट्टर दलित एक्टिविस्ट की है और 2 अप्रेल के सवर्ण वर्सेज दलित झगड़े में उनकी भूमिका आपत्तिजनक थी इसके बाद भी सीएम औऱ दिग्गिराजा की सिफारिश पर भिंड से देबाशीष को टिकट दी गई परिणाम 2 लाख से कांग्रेस हार गई और इस केन्डिडेचर का असर अंचल के आसपास भी पड़ा ।
ग्वालियर की सीट पर भी सिंधिया नही चाहते थे कि अशोक सिंह को कांग्रेस की टिकट मिले अशोक 3 चुनाव यहां से हार चुके थे दो बार तो उन्होनें महल के उम्मीदवार सिंधिया की बुआ श्रीमती यशोधरा राजे को कड़ी टक्कर दी थी।सिंधिया यहां से किसी अन्य समर्थक को टिकट दिलाने के लिये प्रयासरत थे लेकिन कमलनाथ औऱ दिग्गिराजा के दबाब में अशोक सिंह टिकट पाने में सफल रहे। मुरैना में जरूर उनकी सिफारिश पर रामनिवास रावत को टिकट मिली।सिंधिया भिंड औऱ ग्वालियर के टिकट वितरण से इतने नाराज थे कि जब इनके समर्थन में राहुल गांधी सभा करने आये तो सिंधिया शिवपुरी में रहते हुए भी इन सभाओं में नही गए।ग्वालियर औऱ भिंड में एक एक सभा लेने वे गए जरूर पर सभा मंच से ही स्पष्ट कर दिया कि दोनो राहुल गांधी के खड़े किये प्रत्याशी है उनका इशारा आसानी से समझा जा सकता था।इस बीच कट्टर महल विरोधी दलित नेता फूल सिंह बरैया, साहब सिंह गुर्जर को कमलनाथ ने सीधे कांग्रेस ज्वाइन करा दी इससे सिंधिया नाराज हो गए उन्होंने भी जबाबी हमला करते हुए ठाकुर लॉबी के दुश्मन चौधरी राकेश को अपने मंच से ही कांग्रेस में शामिल कर दिया।मुरैना से 2014 में डॉ गोविन्द सिंह की हार सुनिश्चित करने वाले व्रन्दावन सिंह को भी सिंधिया ने इसी होड़ में बसपा से कांग्रेस में शामिल कराया।सिंधिया कोटे से मंत्री प्रधुम्न सिंह,इमरती देवी,गोविंद राजपूत, प्रभुराम चौधरी,तुलसी सिलावट, लाखन सिंह पूरे समय अपने अपने जिले छोड़कर गुना में जुटे रहे।यह स्थिति कांग्रेस के अन्दर के असली हालातों को बयां करने के लिये पर्याप्त है।
भिंड,ग्वालियर के टिकट को लेकर सिंधिया की नाराजगी का स्तर इस बात से ही समझा जा सकता है की वे 12 मई को वोटिंग के बाद सिर्फ एक सभा के किया धार गए इसके बाद वे विदेश रवाना हो गए।जबकि 19 मई को जिन 9 सीटों पर मप्र में मतदान था वे सभी सिंधिया स्टेट के प्रभाव क्षेत वाली थी इंदौर उज्जैन में तो प्रियंका गांधी तक प्रचार करने आई पर सिंधिया नही गए।इसी तरह सिंधिया के चुनाव में दिग्गिराजा के समर्थक भी उदासभाव के साथ सिंधिया की पराजय की कामना करते रहे उन्हें 2002 के बाद से वैसे ही पूछा नही जा रहा है यह अलग बात है कि सिंधिया विरोधी समझे जाने वाले पिछोर के विधायक केपी सिंह के यहां से सिंधिया 16 हजार से जीतने में सफल रहे शेष सभी असेंबली सेग्मेंट में सिंधिया हार गए।
आने वाले समय कांग्रेस के लिये बेहद चुनौतीपूर्ण होने है क्योंकि सरकार की स्थिरता पर सदैव सवाल बना रहेगा औऱ खेमेबाजी तेजी से बढ़ने वाली है इधर कार्यकर्ताओं के लिये संगठन जनसेवा के लिये प्रेरित कर पायेगा इसकी संभावना क्षीण इसलिये है क्योंकि एक तो सत्ता 15 साल बाद मिली है दूसरा कांग्रेस यहां बहुसंस्करणीय है दिग्गिराजा कि कांग्रेस, महाराजा की कांग्रेस, कमलनाथ की कांग्रेस इनमे इतना ज्यादा आपसी इन्टॉलरेंस है कि आप कांग्रेस खोज नही सकते है राहुल गांधी और उनके वामी सलाहकार पहले मप्र कांग्रेस के आपसी इन्टॉलरेंस को ही खत्म कर दे तो यह बड़ी बात होगी उनके नेतृत्व में।
“हिंदुओं को ‘आतंकवादियों’ के रूप में बदनाम करने की साजिश से धीरे धीरे हट रहा है पर्दा” in Punjab Kesari
October 31, 2017/0 Comments/in News /by Lalita NIjhawan
हाल ही में गुजरात से आईएस के दो आतंकी – मौहम्मद कासिम स्टिंबरवाला और ओबेद अहमद मिरजा गिरफ्तार किए गए। पता लगा कि मौहम्मद कासिम कुछ दिन पहले तक अंकलेश्वर के एक अस्पताल में काम करता था जो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल के निकट सहयोगियों का है। पटेल कुछ समय पहले तक इस अस्पताल की प्रबंध समिति में भी थे। इस मामले पर जब हंगामा मचा और भारतीय जनता पार्टी ने पटेल को घेरा तो कांग्रेस ने इसे चुनावी राजनीति बता कर टरकाने की कोशिश की। पर वास्तव में क्या ये मामला इतना हलका है? क्या इससे पटेल का कोई लेना-देना नहीं है? जांच जारी है। असलियत क्या है, इस आतंकी को पटेल से जुड़े अस्पताल में किसने नौकरी दी, ठीक चुनाव से पहले इसने नौकरी क्यों छोड़ी, कौन कौन से धार्मिक स्थल इसके और इसके सहयोगी के निशाने पर थे, ये जांच के बाद ही सामने आ पाएगा।
गुजरात और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को केंद्र में रखकर कांग्रेस ने लंबे अर्से तक इस्लामिक सांप्रदायिक राजनीति की है। यही नहीं इस्लामिक आतंकियों के प्रति नरमी और सहानुभूति का भी कांग्रेस का लंबा इतिहास रहा है। इसे देखते हुए भाजपा का इस मुद्दे को गंभीरता से लेना जायज बनता है। कांग्रेस नीत यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस (यूपीए) सरकार ने बहुत ही सोचे समझे तरीके से हिंदुओं को आतंकवादियों के रूप में बदनाम करने की साजिश की, इसे कोई कैसे भूल सकता है। इस षडयंत्र की परतें भी अब धीरे धीरे खुलती जा रही हैं और साथ ही इस बात के संकेत भी मिलने लगे हैं कि इसमें कौन कौन शामिल थे। अब ये भी समझ में आने लगा है कि इस दुष्प्रचार का कारण सिर्फ मुस्लिम वोट बैंक ही नहीं था, इसके पीछे संभवतः कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं की मजबूरियां भी थीं। संकेत ये भी मिल रहे हैं कि ये मामला सिर्फ हिंदूवादी नेताओं को फंसाने का ही नहीं था, ये किसी बाहरी ताकत के इशारे पर इस्लामिक आतंकवाद के बरक्स ‘हिंदू आतंकवाद’ का नेरेटिव खड़ा करने का भी था। बड़ा सवाल ये है कि क्या ये पूरी साजिश सोनिया और उनके सलाहकार अहमद पटेल की सहमति और शिरकत के बिना संभव थी?
इस विषय में आगे बढ़ने से पहले बात सुधाकर चतुर्वेदी की। 2008 मालेगांव ब्लास्ट मामले में नौ साल सलाखों के पीछे रहने के बाद वो हाल ही में जमानत पर रिहा हुए हैं। वो बताते हैं कि कैसे महाराष्ट्र एंटी टेरर स्क्वाड (एटीएस) ने उन्हें फर्जी तरीके से फंसाया। उन्हें देवलाली (नाशिक) में उनके घर से जबरदस्ती उठाया गया और मुंबई ले जाया गया। मुंबई में उन्हें थर्ड डिग्री टाॅर्चर दिया गया। एटीएस अफसरों ने उनके घर की चाबी छीन कर उनके घर में विस्फोटक पदार्थ आरडीएक्स रखा। उन्हें अवैध रूप से पुलिस हिरासत में रखा गया, प्रताड़ित किया गया, फंसाने के लिए फर्जी दस्तावेज बनाए गए, उनके पास से पिस्तौल की बरामदगी दिखाई गई और फिर माटुंगा पुलिस स्टेशन में फर्जी मामला दर्ज करवाया गया जिसमें कहा गया कि उन्हें हथियारों के साथ गिरफ्तार किया गया।
चतुर्वेदी के खिलाफ कितने फर्जी पर मजबूत मामले बनाए गए और साजिश कितनी गहरी थी, उसे इस बात से समझा जा सकता है कि उन्हें जमानत मिलने में ही नौ साल लग गए। ध्यान रहे इसी मामले में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल श्रीकांत पुरोहित सहित कई और लोगों को भी फंसाया गया। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा को पहले ही जमानत मिल चुकी है। कर्नल पुरोहित की पत्नी को तो इसके लिए सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा।
सुधाकर चतुर्वेदी बताते हैं कि उन्हें और अन्य लोगों को इस मामले में सिर्फ इसलिए फंसाया गया कि महाराष्ट्र की तत्कालीन कांग्रेस-एनसीपी सरकार और केंद्र की यूपीए सरकार मुसलमानों को खुश करने के लिए हिंदुओं को आतंकवादी साबित करना चाहती थी। हिरासत के दौरान एटीएस वाले उनसे लगातार योगी आदित्यनाथ, हिंदू युवा वाहिनी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके प्रमुख मोहन भागवत के बारे में पूछताछ कर रहे थे। सुधाकर कहते हैं कि वो मुझसे जिस तरह सवाल कर रहे थे, उससे साफ था कि अनेक वरिष्ठ हिंदूवादी नेता उनके निशाने पर थे और वो किसी भी हालत में उन्हें फंसाना चाहते थे।
ध्यान रहे तब केंद्र में पी चिदंबरम और महाराष्ट्र में आर आर पाटिल गृहमंत्री थे। मालेगांव मामले में हिंदुओं का पकड़ने और उनके खिलाफ षडयंत्र रचने वाले हेमंत करकरे को 2008 में मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख (कांग्रेस) और आरआर पाटिल (एनसीपी) ने ही एटीएस प्रमुख बनाया था।
‘हिंदू आतंकवाद’ शब्दावली का सबसे पहले प्रयोग एक वामपंथी पत्रिका ने 2002 में किया। ध्यान रहे 2002 में गुजरात में सांप्रदायिक दंगे हुए थे। कांग्रेसियों ने इनके लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को तो बहुत बदनाम किया पर गोधरा कांड को भुला दिया जिसके कारण दंगे शुरू हुए। गोधरा में मुस्लिम षडयंत्रकारियों ने बहुत सोचे समझे तरीके से अयोध्या से आ रही साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बों में आग लगाई जिसमें 59 लोग जिंदा जल गए। इसकी जांच से पता चला कि इसके मास्टरमाइंड कराची में बैठे थे और इसे कश्मीरी आतंकवादियों की मदद से अंजाम दिया गया। गुजरात दंगों में पाकिस्तानी हाथ को कांग्रेस ने बहुत आसानी से अनदेखा कर दिया।
गुजरात में ही एक अन्य घटना में 2004 में इशरत जहां अपने तीन सहयोगियों (दो पाकिस्तानी – जीशान जौहर और अमजद अली अकबर अली राणा तथा एक भारतीय जावेद शेख) के साथ मारी गई। केंद्र सरकार की सूचना के बाद उनका एनकाउंटर हुआ। लेकिन बाद में कांग्रेस ने इसे भी हिंदू नरेंद्र मोदी द्वारा मुस्लिम अबला इश्रत की हत्या का मामला बना दिया। जबकि बाद में सीआईए और आईएसआई के डबल एजेंट जेम्स हेडली ने खुलासा किया कि वो लश्कर ए तौएबा की सदस्य थी। उसकी हत्या के बाद खुद लश्कर ने उसे अपनी वेबसाइट में शहीद बताया था। कांग्रेसियों ने इशरत की बात तो बहुत उछाली पर उन पाकिस्तानियों को भूल गए जो उसके साथ मारे गए।
इन घटनाओं के सहारे कांग्रेसियों ने मोदी को ‘हिंदू खलनायक’ के रूप में भारत ही नहीं विदेशों में भी बदनाम किया। उनके खिलाफ अमेरिका में ऐसी लाॅबिंग की गई कि उन्हें वीसा दिए जाने पर ही रोक लग गई।
‘हिंदू आतंकवाद’ शब्दावली पहली बार भले ही 2002 में प्रयोग की गई, लेकिन इसे प्रचारित किया यूपीए सरकार के गृहमंत्री पी चिदंबरम ने जिन्होंने 2008 के मालेगांव ब्लास्ट के संदर्भ में अगस्त 2010 में हिंदु या भगवा आतंकवाद का जुमला उछाला। इस पर काफी बवाल मचा जिसके बाद तत्कालीन कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने स्पष्टीकरण जारी किया। इसके बाद 2013 में आॅल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सत्र में तत्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने बयान दिया कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कैंपों में ‘हिंदू आतंकवाद’ का प्रशिक्षण दिया जाता है। यहां आपको विकीलीक्स के उस खुलासे की भी याद दिला दें जिसमें राहुल गांधी ने अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर से कहा था कि भारत को पाकिस्तान से आने वाले इस्लामिक आतंकवाद से ज्यादा बड़ा खतरा देसी हिंदू आतंकवाद से है। रोमर जुलाई 2009 से अप्रैल 2011 तक भारत में अमेरिका के राजदूत रहे।
राहुल, चिदंबरम और शिंदे कांग्रेस के शीर्षस्थ नेताओं में से हैं। यूपीए शासन में इनके शब्द पत्थर की लकीर समझे जाते थे। जाहिर है सरकारी महकमे और कांग्रेस नीत राज्य सरकारें इनकी सोच के हिसाब से ही काम करते थे और उसे अमली जामा पहनाने की कोशिश करते थे। क्या ये लोग सोनिया गांधी और उनके राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल की सहमति के बिना ‘हिंदू विरोधी’ राजनीति कर सकते थे? क्या इनकी सहमति के बिना विभिन्न आतंकवादी घटनाओं में पकड़े गए इस्लामिक संदिग्धों को छोड़ा जा सकता था? मालेगांव में 2008 से पहले सितंबर 2006 में भी धमाके हुए। एटीएस ने पहले तो इन धमाकों के लिए स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट आॅफ इंडिया (सिमी) के नौ लोगों को गिरफ्तार किया पर 2013 में चार्जशीट दाखिल करते समय हिंदूवादी संगठन अभिनव भारत को जिम्मेदार ठहरा दिया।
इसके बाद 29 सितंबर 2008 को गुजरात के मोडासा और महाराष्ट्र के मालेगांव में एक साथ धमाके हुए। इस विषय में आगे बढ़ने से पहले बता दें कि सितंबर धमाकों से पहले इसी वर्ष जयपुर, बेंगलूरू, फरीदाबाद और अहमदाबाद में भी धमाके हुए। तत्कालीन सरकार ने बाकी के धमाकों की जांच को तो दरकिनार कर दिया पर मालेगांव धमाकों के आरोप में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, शिवनारायण सिंह कलसांगरा, और भंवरलाल साहू आदि को गिरफ्तार किया और इसे जोर शोर से ‘हिंदू आतंकवादी’ घटना के रूप में प्रचारित किया गया। सुधाकर चतुर्वेदी के बारे में हम पहले ही बता चुके हैं।
इस से पहले फरवरी 2007 में भारत और पाकिस्तान के बीच चलने वाली समझौता एक्सप्रेस में धमाके हुए। एक अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट ने इसके लिए पाकिस्तानी नागरिक और लश्कर ए तौएबा के सदस्य आरिफ कसमानी को जिम्मेदार ठहराया और उसे संयुक्त राष्ट्र ने आतंकवादी भी घोषित किया। धमाकों के बाद एक संदिग्ध पाकिस्तानी को गिरफ्तार भी किया गया परंतु उसे 14 दिन के भीतर उसे छोड़ दिया गया। कांग्रेस सरकार ने इसके लिए एक बार फिर इस्लामिक आतंकवादियों को छोड़ कर अभिनव भारत को जिम्मेदार ठहराया और कर्नल पुरोहित का नाम भी उछाला गया जबकि चार्जशीट में उनका नाम तक नहीं था।
जांच एजेंसियों ने इस मामले में सिमी नेता सफदर नागौरी, कमरूद्दीन नागौरी और आमिल परवेज पर नारको टेस्ट भी किए। इसमें एक शख्स अब्दुल रज्जाक का हाथ होने की बात सामने आई और ये भी साफ हुआ कि उसने इस विषय में सफदर नागौरी को बताया भी था। लेकिन सिमी और उनके पाकिस्तानी हैंडलर्स पर कार्रवाई करने की जगह कांगे्रस सरकार ने अपने ही देश के लोगों को ही इसके लिए बदनाम किया।
बात अगर इन धमाकों तक ही रह जाती तब भी गनीमत थी। राहुल गांधी के राजनीतिक गुरू दिग्विजय सिंह ने तो नवंबर 2008 में मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले के लिए भी आरएसएस को जिम्मेदार ठहरा दिया। एक पत्रकार अजीज बर्नी ने ‘26/11 – आरएसएस की साजिश’ नाम से किताब तक लिख डाली जिसका 6 दिसंबर 2010 को खुद दिग्विजय सिंह ने विमोचन किया। इस अवसर पर अन्य इस्लामिक कट्टरवादियों के साथ फिल्म निर्माता महेश भट्ट भी मौजूद थे। इस मौके पर दिग्विजय सिंह ने कहा कि हमले से दो घंटे पहले हेमंत करकरे ने उन्हें फोन करके कहा कि उन्हें मालेगांव मामले में जांच से खफा ‘हिंदू अतिवादियों’ से जान का खतरा है। ज्ञात हो कि इस हमले में करकरे मारा गया था। ये बात अलग है कि बाद में करकरे की पत्नी ने कहा कि दिग्विजय उसके पति की लाश पर राजनीति कर रहे हैं। खुफिया एजेंसियों के कुछ विशेषज्ञ तो यहां तक कहते हैं कि मुंबई हमले सत्तारूढ़ पार्टी की मिलीभगत से हुए। सभी हमलावरों ने हिंदू नामों के पहचान पत्र लिए हुए थे और मौली पहनी हुई थी। अगर कसाब जिंदा न पकड़ा जाता तो बड़ी आसानी से इसके लिए ‘हिंदुओं’ को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता। बहरहाल ये वहीं दिग्विजय सिंह हैं जिन्हें दुर्दांत इस्लामिक आतंकवादी भी सम्मानीय नजर आते हैं। ये ओसामा बिन लादेन को ‘ओसामा जी’ और हाफिज सईद को ‘हाफिज साहब’ कहते हैं।
देश में अनेक आतंकवादी घटनाओं के लिए जिम्मेदार सिमी पर 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन ये अब भी दक्षिण भारतीय राज्यों में पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया (पीएफआई) के नाम से चल रही है। इस पर भारतीय मुस्लिम युवकों का बे्रनवाश कर आईएस भेजने के आरोप हैं। पर कांग्रेस इस मसले में चुप है। पीएफआई पर हिंदू लड़कियों का धर्मपरिवर्तन करवाने का आरोप है लेकिन कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल ऐसे मामलों में अदालत में पीएफआई की वकालत कर रहे हैं। धर्म के नाम पर घृणा फैलाने वाले जाकिर नायक को भी कांग्रेस सरकार ने पूरा बढ़ावा दिया जबकि अनेक देशों ने उस पर प्रतिबंध लगा दिया था। दिग्विजय सिंह ने तो उसे शांतिदूत करार दिया और उसकी हर तरह से मदद की। हाल हीे में एनआईए ने जाकिर नायक के खिलाफ चार्जशीट दायर की जिसमें उसके सारे आतंकी संपर्कों का कच्चा चिट्ठा दिया गया है। जब सरकार उसके खिलाफ कार्रवाई कर रही है तो उसे समर्थन और बढ़ावा देने वाले नेताओं को क्यों बख्शा जा रहा है?
कश्मीर से केरल तक पाकिस्तानी आतंकियों और इस्टैबलिशमेंट के प्रति कांग्रेस की नरमी की यूं तो अनेक कहानियां हैं। लेकिन हाल ही में इस संबंध में कुछ और तथ्य सामने आए हैं जो वास्तव में सनसनीखेज हैं। एक न्यूज चैनल ने अपने खुलासे में बताया कि कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने बदनाम पाकिस्तानी बैंक – बैंक आॅफ क्रेडिट एंड काॅमर्स इंटरनेशनल (बीसीसीआई) के जरिए बोफोर्स सौदे के घूस की रकम को ठिकाने लगाया। आर्थिक अनियमितताओं के आरोप में जब इस बैंक की मुंबई ब्रांच को ताला लगाया गया तो इसके प्रमुख ने घूस देकर इसे फिर खुलवा लिया। देश-विेदेश में बदनामी के बाद इसे 1991 में बंद कर दिया गया। यहां समझने की बात ये है कि एक तरफ तो भारत और पाकिस्तान की कथित दुश्मनी थी, तो दूसरी तरफ कांग्रेस के प्रमुख नेता इस बैंक के जरिए घूस के पैसे को ठिकाने लगा रहे थे। क्या ये संवेदनशील जानकारियां इस बैंक के अधिकारियों ने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों को नहीं दी हांगी?
एक अन्य मामला हवाला व्यापारी मोइन कुरैशी का है। इसके पारिवारिक और व्यापारिक रिश्ते अनेक पाकिस्तानियों से हैं। भारत में ये प्रमुख कांग्रेसी नेताओं की नाक का बाल समझा जाता है। यूपीए सरकार के दौरान सीबीआई और ईडी जैसी जांच एजेंसियों में इसका दबदबा चलता था। ये मोटी रकम की एवज में मामले ‘रफा-दफा’ कराने का काम भी करता था। इस बात से कैसे इनकार किया जा सकता है कि कुरैशी देश की महत्वपूर्ण जानकारियां पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों को नहीं देता होगा?
मामला चाहे आतंकवादी गतिविधियों का हो या मुस्लिम तुष्टिकरण का या संवेदनशील आर्थिक जानकारियों का, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कांग्रेस की गतिविधियों में पाकिस्तान का हाथ दिखाई देता है। ऐसे में बहुत संभव है भारत में हिंदुओं को आतंकवादी के रूप में बदनाम करने के पीछे भी पड़ोसी देश की कोई सोची समझी रणनीति हो जिसे कांग्रेस चाहे-अनचाहे अंजाम दे रही हो। हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने पी चिदंबरम पर कश्मीर मामले में पाकिस्तानी जुबान बोलने का आरोप लगाया। कोई तो कारण होगा जो उन्होंने इतना गंभीर आरोप लगाया। बहरहाल बहुत से मामले अभी अदालत में हैं और बहुत से फाइलों में दबे हैं। माले गांव से लेकर मोइन कुरैशी तक के उदाहरण बताते हैं कि जो दिखता है वो सत्य नहीं होता। लेकिन हम सत्य का अनुमान अवश्य लगा सकते हैं। आप भी स्वतंत्र हैं इस विषय में अपनी राय बनाने के लिए।( ये पुराना आलेख आपको पृष्ठभूमि समझने में मदद करेगा.हमने इसे पंजाब केसरी से साभार लिया है।).
मध्यप्रदेश
की राजनीति पर अपना परचम फहराने
की खींचतान इन दिनों भोपाल
में साफ देखी जा रही है।
मुख्यमंत्री कमलनाथ ने लोकसभा
चुनावों में अपनी पार्टी को
फतह दिलाने के लिए जिस तरह आनन
फानन मे कर्जमाफी की औपचारिकताएं
पूरी कीं वहीं वे कई मुद्दों
पर अपनी सरकार का बचाव करते
नजर आ रहे हैं। लोकसभा चुनावों
के माध्यम से पार्टी पर कब्जा
जमाने के षड़यंत्र को उन्होंने
सफल नहीं होने दिया। उन्होंने
प्रदेश अध्यक्ष के अपने वीटो
पावर का प्रयोग करके बेगुसराय
से सीपीआई के उम्मीदवार कन्हैया
कुमार को प्रचार के लिए बुलाने
के दिग्विजय सिंह के प्रस्ताव
को रद्दी की टोकरी में डाल
दिया। इससे एक बात साफ हो गई
है कांग्रेस दिग्विजय सिंह
के साथ तो कम से कम नहीं है।
दरअसल
भोपाल सीट पर कांग्रेस के
टिकिट से चुनाव लड़ रहे पूर्व
मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह
जिस अंदाज में अपना प्रचार
कर रहे हैं उससे वे खुद को
पार्टी हाईकमान से भी ऊपर
दिखाने की कोशिश करते दिख रहे
हैं। पत्रकार अमृता राय से
बुढ़ापे में शादी रचाने के
बाद राघौगढ़ किले में उन्हें
पारिवारिक कलह और विरोध का
सामना करना पड़ा। उसके बाद
उन्होंने राघौगढ़ सीट से चुनाव
लड़ने का फैसला छोड़ दिया और
भोपाल की ओर रुख किया था। इसे
पार्टी का फैसला बताने के लिए
उन्होंने कमलनाथ का सहारा
लिया। मुख्यमंत्री कमलनाथ
ने जब पत्रकारों से सार्वजनिक
तौर पर कहा कि मैं दिग्विजय
सिंह से अनुरोध करता हूं कि
वे भोपाल से चुनाव लड़ें तो
पत्रकारों ने मुख मुद्रा देखकर
अनुमान लगाया कि उन्हें राजनीतिक
दांव में फंसा दिया गया है।
वे अपने चुनाव में जुटे रहेंगे
तो प्रदेश की अन्य सीटों का
माहौल भी नहीं बिगाड़ पाएंगे।
हालिया विधानसभा चुनाव में
स्वयं दिग्विजय सिंह ने स्वीकार
किया था कि उनकी पार्टी ने
उन्हें प्रचार करने से इसलिए
रोक दिया है क्योंकि प्रचार
करने से पार्टी के वोट कट जाते
हैं। भोपाल राजनीतिक मूड के
हिसाब से भाजपा का गढ़ माना
जाता है। इस लोकसभा सीट पर
पिछले तीस सालों से भाजपा का
कब्जा है। कांग्रेस के दिग्गजों
का भी मानना है कि पिछले विधानसभा
चुनावों में इस क्षेत्र में
मतदाताओं का जो रुझान पाया
गया उसके बीच दिग्विजय सिंह
तो ठीक कांग्रेस के किसी भी
प्रत्याशी का जीतना भी मुश्किल
है।
हालांकि
दिग्विजय सिंह ने इसे चुनौती
के रूप में इसलिए स्वीकार किया
क्योंकि वे अपने जीवन की
राजनीतिक पारी खेल चुके हैं।
वे अपनी विरासत अपने बेटे
जयवर्धन सिंह को भी सौंप चुके
हैं। ऐसे में जीत उनके लिए कोई
मायने नहीं रखती बल्कि वे
सिर्फ अपनी धूल धूसरित साख
को पुनर्जीवित करना चाहते
हैं कम से कम इस लक्ष्य में तो
वे बहुत हद तक सफल भी हुए हैं।
अब वे चुनाव हार भी जाएं तो कम
से कम उन्होंने अपनी कुछ जय
जयकार तो करवा ही ली।
इस हारी हुई बाजी के पर्दे के पीछे जो लक्ष्य दिग्विजय सिंह का था उसे पाने में वे पूरी तरह सफल रहे हैं। चुनाव की जीत का ख्वाब उनके लिए सिर्फ उपोत्पाद(बाईप्रोडक्ट) है।उन्होंने कमलनाथ सरकार में अपने बेटे को नगरीय प्रशासन मंत्री पहले ही बनवा लिया था। अब वे भोपाल में अपने उस कारोबार का दोहन करना चाह रहे हैं जो उन्होंने शिवराज सिंह चौहान की सरकार में अपने चहेते अफसरों और ठेकेदारों के माध्यम से फैलाया था। ठेकेदारों अफसरों के एक गिरोह के माध्यम से वे मध्यप्रदेश के उन सभी ठेकों में अपनी भागीदारी करते रहे हैं जो जरूरी बजट से पांच गुना पूर्वाकलन(इस्टीमेट) पर दिए जाते रहे हैं। इसमें सड़कों,पुलों, बिजलीघरों, बांध जैसी आधारभूत संरचनाओं का निर्माण प्रमुख रहा है। उन सभी ठेकों में दिग्विजय सिंह अपने चहेते अफसरों के माध्यम से चहेते ठेकेदारों को उपकृत कराते रहे हैं। उन ठेकों में अपने समर्थकों का धन निवेश कराते रहे हैं। इसीलिए उन्होंने भोपाल विजन नाम से एक दस्तावेज भी चुनावी मैदान में फेंका जिससे वे खुद को षड़यंत्रकारी आतंकवादी कहलाए जाने के आरोपों से बचने की जुगत करते दिखने लगे हैं।
जनता
ने जब 2003 में दिग्विजय
सिंह को अपदस्थ करके उमा भारती
को मध्यप्रदेश की कुर्सी सौंपी
थी तब ये माना जा रहा था कि
दि्ग्विजय सिंह की जेल यात्रा
सुनिश्चित है। उस दौरान भाजपा
ने श्वेतपत्र जारी किया था
और लूटो भागो नाम से एक पुस्तिका
भी प्रकाशित की थी जिसमें
दिग्विजय सिंह सरकार के लूट
भरे वित्तीय प्रबंधन और
भ्रष्टाचारों की पोल खोली गई
थी। जाहिर था जनादेश दिग्विजय
सिंह को जेल भेजने का था। समय
की नजाकत भांपकर दिग्विजय
सिंह ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण
सिंह को भाजपा में भेजकर खुद
को जेल जाने से बचा लिया। उनके
माध्यम से शिवराज सिंह सरकार
से तालमेल भी बिठा लिया। इसके
साथ साथ सरकार की आड़ में चलने
वाले कारोबारों में भी घुसपैठ
जमा ली।
यह घुसपैठ कुछ इसी तरह थी जैसे अंग्रेजों ने भारत छोड़ते समय सभी मुनाफे के कारोबारों में अपना शेयर डाल दिया था। वे भारत तो छोड़ गए लेकिन इन छद्म बहुराष्ट्रीय कंपनियों के माध्यम से सभी मुनाफे के धंधों से चांदी काटते रहे। यही नहीं उन्होंने बैंकों के सरकारीकरण का लाभ उठाते हुए स्थानीय चेहरों के नाम पर भारी कर्ज भी प्राप्त किया और इन छद्म उद्योगपतियों को डिफाल्टर बनाकर उन्हें ब्रिटेन में बसा दिया। भारत से प्रतिभा पलायन के साथ साथ पूंजी का ये पलायन देश को गरीब बनाए रखने की सबसे बड़ी वजह बन गई है। यही वजह है कि इस आमचुनाव में राष्ट्रवाद का मुद्दा पूरी तरह परवान चढ़ा है।मोदी इसी के सहारे स्थानीय नेत्तृव की असफलताओं को लांघकर सीधे मतदाता तक पहुंच गए हैं।इसने दिग्विजय सिंह के षड़यंत्र को भी धूल चटा दी है,क्योंकि मतदाता अब सीधे मोदी के नाम पर मतदान कर रहे हैं।
इस षड़यंत्र के माध्यम से दिग्विजय सिंह ने अपने सभी सहयोगियों को भी भाजपा में एडजस्ट करा लिया था। हालत ये हो गई थी कि भाजपा के लिए रात दिन काम करने वाले कार्यकर्ताओं को तो किनारे कर दिया गया पर उनके चेले चपाटे सरकार पर हावी हो गए। भाजपा संगठन के बीच बार बार ये आवाजें उठती रहीं कि अफसरशाही उनकी बात नहीं सुन रही है पर शिवराज सिंह चौहान ने उन आवाजों को अनसुना कर दिया था. स्थिति यहां तक पहुंच गई कि पंद्रह सालों में जो भाजपा अजेय मानी जाती थी वो छिन् भिन्न हो गई। शिवराज सिंह चौहान की इसी शासनशैली का खमियाजा भाजपा को उठाना पड़ा है और पार्टी के तमाम सहयोग के बावजूद पार्टी जीत की देहरी पर जाकर भी सत्ता से वंचित रह गई।
अब
जबकि कांग्रेस राज्य की सत्ता
पर काबिज हो गई है, भले
ही उसकी लंगड़ी सरकार अल्पमत
की है ऐसे में कमलनाथ अपनी
सत्ता खोना नहीं चाहते। दिग्विजय
सिंह ने उनसे बगैर पूछे सीपीआई
की बैठक में जाकर ये घोषणा कर
दी कि कन्हैया कुमार उनका
प्रचार करने भोपाल आएंगे।
उन्होंने इससे आगे बढ़कर ये
भी कह दिया कि वे कन्हैया कुमार
के प्रशंसक हैं।ऐसे में कांग्रेस
के सभी रणनीतिकार भौंचक्के
रह गए। प्रदेश अध्यक्ष के रूप
में कमलनाथ ने अचकचाकर दिग्विजय
सिंह को बुलाया और कहा कि
कन्हैया कुमार को लाकर आप
कांग्रेस का जनाजा क्यों
निकालना चाहते हैं। हम इसकी
अनुमति नहीं देंगे। आप इस
फैसले पर फिर विचार करें और
कन्हैया कुमार को भोपाल न आने
के लिए कहें। तब तक पार्टी के
भीतर और विरोधी खेमें में भी
विरोध शुरु हो गया था। सोशल
मीडिया पर तो कहा जाने लगा था
कि कन्हैया कुमार भोपाल से
पिटे बगैर नहीं जाएगा। उसे
मालूम पड़ जाएगा कि देश टुकड़े
टुकड़े गेंग को पसंद नहीं
करता।
कांग्रेस
के रणनीतिकारों ने भी दिग्विजय
सिंह को सलाह दी कि वे सीपीआई
के किसी भी नेता को बुला लें
पर कन्हैया कुमार को न बुलाएं।
इससे उनकी विरोधी भाजपा जिस
राष्ट्रवाद के मुद्दे पर चुनाव
लड़ रही है वह आसानी से काग्रेस
पर देशद्रोहियों से हाथ मिलाने
का आरोप साबित कर देगी। नतीजतन
दिग्विजय सिंह को अपना कदम
वापस खींचना पड़ा और सीताराम
येचुरी की सभा से संतोष करना
पड़ा। हालांकि सीताराम येचुरी
ने भी भोपाल आकर दूसरा बखेड़ा
खड़ा कर दिया। उन्होंने कहा
कि साध्वी प्रज्ञा कहती हैं
कि हिंदू आतंकवादी नहीं होता
जबकि भारत का इतिहास लड़ाईयों
से भरा पड़ा है। रामायण और
महाभारत भी हिंसा के उदाहरणों
से भरे हुए हैं। आरोप लगाने
के अतिरेक में वे ये भूल गए कि
युद्ध और आतंकवाद दो अलग अलग
चीजें होती हैं।
जबसे दिग्विजय सिंह के भोपाल से लड़ने की घोषणा हुई है तबसे कई राजनीतिक विश्लेषक कहते रहे हैं कि ये फैसला भोपाल के साथ साथ कांग्रेस के लिए प्रदेश की सभी 29 सीटों के लिए हार की बड़ी वजह बनेगा। ये होता दिख रहा है। साध्वी प्रज्ञा पर आतंकवाद में शामिल होने का आरोप एनआईए कोर्ट में झूठा साबित हो चुका है। ऐसे में दिग्विजय सिंह को एक निरपराध महिला को झूठा फंसाने और भगवा आतंकवाद के नाम पर हिंदुओं को कलंकित करने का आरोप जनता के बीच गंभीरता से लिया जाने लगा है। इससे साफ है कि 23 मई को आने वाले नतीजों में कांग्रेस को जनमत की उपेक्षा करने का खमियाजा चुकाने के लिए तैयार रहना होगा।
भोपाल
लोकसभा की हाईप्रोफाईल सीट
का आमचुनाव इन दिनों साधू और
शैतान की लड़ाई में तब्दील
हो गया है। एक ओर जहां कांग्रेस
के दिग्विजय सिंह ने जनसंपर्क,
धनवर्षा, और
पुलिसिया तालमेल के साथ
अपराधियों की फौज मैदान में
उतार दी है वहीं साध्वी प्रज्ञा
सिंह के पक्ष में आम जनता ने
मोर्चा संभाल लिया है। आम
लोगों के समूह रोज सुबह एक से
दो घंटों तक घर घर जाकर मतदान
की अपील कर रहे हैं। कई स्वयंसेवियों
ने तो अपने कारोबार बंद करके
साध्वी के पक्ष में दिन रात
की जवाबदारी संभाली है। वे
लोगों को दिग्विजय सिंह के
मुख्यमंत्रित्व काल के कुशासन
की याद दिला रहे हैं और मौजूदा
सरकार की असफलता की कहानियां
सुना रहे हैं। साध्वी प्रज्ञा
को झूठे मुकदमों में फंसाकर
हिंदुओं को बदनाम करने वाले
दिग्विजय सिंह को वोट न देने
की अपील भी कर रहे हैं। इसके
जवाब में दिग्विजय सिंह ने
कुख्यात कंप्यूटर बाबा के
नेतृत्व में बाबाओं की फौज
मैदान में उतार दी है। भारी
दान दक्षिणा लेकर मैदान में
उतरे ये बाबा घर घर जाकर कह
रहे हैं कि साध्वी प्रज्ञा
कोई संत तो हैं नहीं, जबकि
दिग्विजय सिंह ने नर्मदा
परिक्रमा करके खुद को हिंदू
साबित कर दिया है। दिग्विजय
सिंह के समर्थक घर घर जाकर
नर्मदा जल की बोतलें, उनके
हिंदू होने के प्रमाण पत्र
और धन बांट रहे हैं इसके बावजूद
आम जनता ने साध्वी प्रज्ञा
के प्रचार की कमान संभाली है
तो इसकी वजह आसानी से समझी जा
सकती है।
बाबाओं
में बंटती खीर पुड़ी का लंकर
इतना विशाल है कि प्रदेश भर
से बाबाओं की टोलियों ने इन
दिनों भोपाल में डेरा डाल दिया
है। ये बाबा नमक का कर्ज अदा
कर रहे हैं और घर घर घूमकर
दिग्विजय सिंह के पक्ष में
प्रचार कर रहे हैं। दिग्विजय
सिंह ने लंबे समय से भोपाल से
चुनाव लड़ने की तैयारी कर रखी
थी। उन्होंने पत्रकारों के
बीच सघन संपर्क बना रखा था और
उनके पक्ष में माहौल बनाने
वाला एनजीओ विकास संवाद इसके
लिए कई सालों से भूमिका बनाता
रहा है।न्यू मार्केट
के इंडियन काफी हाऊस में बैठने
वाले उनके समर्थक नए पत्रकारों
को अपने खेमें में खींचने का
प्रयास करते हैं यहीं से उन
पत्रकारों को दिग्विजय के
लिए सहयोगी साबित होने वाली
खबरें प्लांट की जाती रहीं
हैं। यही वजह है कि जैसे ही
भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा को
भोपाल से उम्मीदवार बनाया तो
अखबारों और मीडिया चैनलों ने
माहौल बनाना शुरु कर दिया कि
भाजपा ने आतंकवादी को अपना
प्रत्याशी बना दिया है। जबकि
हकीकत ये है कि एनआईए ने एटीएस
की भगवा आतंकवाद की कहानी को
नकार दिया है और अदालत ने केवल
सामान्य धाराओं में मुकदमा
चलाने की अनुमति दी थी। साध्वी
प्रज्ञा और उनके सहयोगियों
के विरुद्ध ये प्रकरण अभी भी
अदालत में लंबित है लेकिन वो
इतना कमजोर है कि जो ज्यादा
लंबा नहीं खिंच सकता।
दिग्विजय
सिंह विभिन्न समाजों के सम्मेलन
भी आयोजित कर चुके हैं जहां
उनसे जुड़े समाज के नेताओं
ने अपने नेता के पक्ष में गुणगान
करने में कोई कसर नहीं रखी।
इस दौरान हर समाज के सहभोज भी
कराए गए जिनकी फंडिंग दिग्विजय
सिंह ने अपने छद्म सहयोगियों
के मार्फत की थी।कांग्रेस
कमेटी में प्रवक्ता माणक
अग्रवाल के माध्यम से जो भारतीय
मुद्रा की बारिश कराई जा रही
है उसमें स्नान करने के लिए
लोगों का तांता लगा हुआ है।
फंडिंग का ये दारोमदार दिग्विजय
सिंह के सुपुत्र और राज्य के
नगरीय प्रशासन मंत्री जयवर्धन
सिंह संभाले हुए हैं।
फंड
का ये सैलाब लाने की तैयारी
दिग्विजय सिंह ने लंबे समय
से कर रखी थी। एक समय़ भाजपा की
आर्थिक रीढ़ समझे जाने वाले
दिलीप सूर्यवंशी और उनकी फर्म
दिलीप बिल्डकान ने पूरे पंद्रह
सालों तक राज्य के निर्माण
ठेकों पर एकछत्र राज्य किया
है। इस दौरान उनकी फर्म दिलीप
बिल्डकान चंद लाख रुपयों से
बढ़कर अरबों का आंकड़ा छू गई
। बताते हैं कि दिग्विजय ने
अबू धाबी की अपनी तेल लाबी के
सहयोग से दिलीप बिल्डकान में
अरबों रुपयों का निवेश करवाया
था। जनवरी माह में अबू धाबी
की इन कंपनियों ने अपना निवेश
खींच लिया। इससे दिलीप बिल्डकान
का जो शेयर लगभग 1200 रुपए
की ऊंचाई छू रहा था वो घटकर
450 रुपए
की जमीन पर आ गिरा।लगभग तीस
प्रतिशत की शुरुआती गिरावट
से ही भाजपा की संभावित आर्थिक
रीढ़ टूट गई। एक समय जो दिलीप
सूर्यवंशी खुद को मुख्यमंत्री
शिवराज सिंह चौहान का फंड
मैनेजर कहते थे वे आज दिग्विजय
सिंह के दरवाजे खड़े हैं और
चुनाव के लिए धन भी मुहैया करा
रहे हैं।
यही
नहीं उदय क्लब नामक उनका सहयोगी
संगठन जिसमें भाजपा और कांग्रेस
से जुड़े ठेकेदारों,
अफसरों और
नेताओं का गठजोड़ है वह भी
दिग्विजय सिंह के पक्ष में
थैलियां खोलकर रुपया खर्च कर
रहा है। इसकी वजह है कि दिग्विजय
सिंह ने आते ही भोपाल के विकास
का विजन पत्र प्रस्तुत किया
है। उनका बेटा नगरीय प्रशासन
मंत्री है। मुख्यमंत्री कमलनाथ
कह रहे हैं कि भोपाल के विकास
की चाभी दिग्विजय सिंह के पास
रहेगी। ऐसे में भाजपा और
कांग्रेस के ठेकेदार दिल खोलकर
दिग्विजय सिंह के पक्ष में
धनराशि खर्च कर रहे हैं। उन्हें
उम्मीद है कि यदि दिग्विजय
सिंह चुनाव जीतते हैं तो उन्हें
फिर विकास के नाम पर बड़े ठेके
मिल सकते हैं। इस तरह विकास
का विजन वास्तव में भोपाल के
विकास के लिए नहीं बल्कि
ठेकेदारों के विकास का विजन
बन गया है।यही वजह है कि संगठन
विहीन कांग्रेस मैदान में
नजर आने लगी है और भाजपा मैदान
से बाहर खड़ी दिख रही है। भाजपा
के जो नेता ठेकेदार हैं वे
इसलिए सामने नहीं दिखना चाहते
क्योंकि उन्हें भय है कि भविष्य
में ठेके मिलना मुश्किल हो
जाएगा।
जो
लोग दिग्विजय सिहं का शासन
देख चुके हैं वे भयभीत हैं कि
उन्हें एक बार फिर बंटाढार
का शासन न झेलना पड़े,
इसलिए उन्होंने
खुद आगे बढ़कर साध्वी प्रज्ञा
के प्रचार की जवाबदारी थाम
ली है। उन्हें राष्ट्रीय
स्वयंसेवक संघ के सहयोगियों
का समर्थन मिल रहा है। उन्हें
सबसे बड़ा सहयोग तो उन आम
नागरिकों का मिल रहा है जो
लंबे समय से प्रधानमंत्री
नरेन्द्र मोदी को देख सुन रहे
हैं। उनके कामकाज की उपलब्धियां
जान चुके हैं। कांग्रेस और
राहुल गांधी के गाली गलौच भरे
दुष्प्रचार को झेल रहे हैं।
दिग्विजय सिंह के दंभी कटाक्ष
उन्हें याद हैं। वे जानते हैं
कि आम नागरिकों को अपमानित
करना दिग्विजय सिंह की आदत
में शामिल है।
सबसे
बड़ी बात तो ये है कि दिग्विजय
सिंह की इस कुख्याति से हिंदू
ही नहीं मुसलमान भी अच्छी तरह
वाकिफ हैं। रमजान की तैयारी
कर रहे मुस्लिम, दिग्विजय
सिंह की उस फौज की गतिविधियों
को देख सुन रहे हैं जिसने बूथ
मैनेजमेंट के लिए भोपाल में
डेरा डाल रखा है।एक मेडीकल
कालेज में डेरा डाले पड़ी इस
अपराधियों की टोली और खुले
लंगर के साथ इन्हें टैक्सियां
दी गईं हैं। भोपाल लूटने के
अंदाज में घूम रहे इन आपराधिक
तत्वों पर पुलिस का कोई अंकुश
नहीं है। इसकी वजह है कि दिग्विजय
सिंह ने अपने चहेते आईपीएस
वीके सिंह को पुलिस का मुखिया
बनवाया है। उनके माध्यम से
पुलिस को साफ निर्देश हैं कि
बगैर छानबीन किए कोई प्रकरण
दर्ज न करो। चुनाव में पुलिस
और जनता के बीच टकराव टालते
रहो। यही वजह है कि पुलिस की
बंधी हुई घिग्घी को देखकर एक
महिला पुलिस अफसर के बेटे ने
एक डीएसपी को घर में घुसकर
गोली मार दी। राजनैतिक हस्तक्षेप
के बीच जब उस हत्यारे ने सरेंडर
किया तो पुलिस ने अपने ही अफसर
के खिलाफ कहानी प्रचारित कर
दी कि वो महिला पुलिस अफसर को
अश्लील मैसेज भेजता था इससे
गुस्सा होकर बेटे ने उसे गोली
मारी है। मुस्लिमों के बीच
इस प्रकरण ने चिंता बढ़ा दी
है। उन्हें लगने लगा है कि जिस
दिग्विजय सिंह के समर्थक
चुनाव जीतने के पहले इस तरह
की गुंडागर्दी कर रहे हैं वे
चुनाव जीतने के बाद तो खुलेआम
लूटपाट करने लगेंगे। इस लिहाज
से साध्वी को भले ही हिंदूवादी
कहकर मुस्लिमों से काटने की
कोशिश की जा रही है पर वे उनके
लिए ज्यादा सुरक्षित साबित
होंगी। इसकी एक वजह शिवराज
सिंह चौहान का पिछला कार्यकाल
भी है जिसमें मुस्लिमों को
भरपूर विकास के अवसर मिले और
भाजपा की कथित मुस्लिम विरोधी
छवि से वे बाहर निकल चुके हैं।
जैसे
जैसे चुनाव की तारीख नजदीक
आती जा रही है वैसे वैसे राजनीतिक
दलों ने भी घर घर जाकर प्रचार
की मुहिम तेज कर दी है। आम सभाएं
और नुक्कड़ सभाएं भी हो रहीं
हैं। इन सभी के बीच साध्वी
प्रज्ञा को दी गई अमानवीय
प्रताड़ना की जो बातें कहीं
जाती हैं उनसे आम लोग उद्वेलित
हो रहे हैं। देश में जिस
राष्ट्रवाद का माहौल बन गया
है उसके बीच साध्वी प्रज्ञा
पर लगे झूठे आरोप तेजी से
सहानुभूति बटोर रहे हैं। इस
मुद्दे पर लिखीं गई किताबें
(भगवा
आतंक एक षड़यंत्र) और
(आतंक से
समझौता) ने
भाजपा कार्यकर्ताओं के मन से
संशय के बादल दूर कर दिए हैं।
वे अब साध्वी प्रज्ञा की
बेगुनाही और दिग्विजय सिंह
के षड़यंत्रों के खिलाफ खुलकर
प्रचार कर रहे हैं। ऐसे में
साध्वी प्रज्ञा षड़यंत्रों
की इस दीवार को फांदने के लिए
तैयार हो चुकी हैं। जनता उनके
पक्ष में जिस तरह स्वतःस्फूर्त
ढंग के आगे आ रही है उसे देखते
हुए भोपाल का चुनाव भावुक और
रोचक हो गया है।
(लेखक
पत्रकार होने के साथ साथ जन
न्याय दल के सदस्य और प्रवक्ता
भी हैं).
भोपाल,28 अप्रैल(प्रेस सूचना केन्द्र)।मध्यप्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक और बहुजन समाज पार्टी के नेता रहे आईपीएस सुभाष चंद्र त्रिपाठी ने कहा है कि उन्हें मुंबई के 26। 11/2013 को हुए हमले में असमय काल कवलित हुए हेमंत करकरे के माफिया कनेक्शन के बारे में कोई जानकारी नहीं है। वे तो सिर्फ इतना जानते हैं कि ड्यूटी के दौरान वे आतंकवादी की गोलियों से मारे गए थे और भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया था। इसी वजह से जब उन्होंने सुना कि भोपाल से भाजपा की ओर से लोकसभा प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा ने करकरे पर निर्दोष लोगों को झूठे मामलों में फंसाने वाला बताया है तो उन्होंने अपने साथियों से साथ मिलकर बयान की निंदा की।
नशा
माफिया और डाकू गिरोहों के
खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के
लिए मुस्तैद माने जाने वाले
एस.सी.त्रिपाठी
ने एक मुलाकात में बताया कि
हेमंत करकरे ने अपना कर्तव्य
निभाते हुए मुंबई हमले के
दौरान मोर्चा संभाला था जहां
उन्हें गोलियां लगीं थीं।
जिन हालात में करकरे आगे आए
थे वो निश्चय ही सराहनीय कदम
था। हम इस मुद्दे पर और ज्यादा
पहलुओं पर बात करके अपना समय
बर्बाद नहीं करना चाहते।
मध्यप्रदेश
में नशे की आवक के लिए दोषी
पुलिस वालों पर कड़ी कार्रवाई
कर चुके श्री त्रिपाठी से पूछा
गया मुंबई में नशे का कारोबार
करने वाला माफिया आखिर किसके
संरक्षण में पनपा। करकरे की
टीम ने जिन 75 के
करीब एनकाऊंटर में अपराधियों
को मारा उनमें दाऊद गेंग का
एक भी नहीं था, सभी
अरुण गवली या राजन गैंग के थे।
इस सवाल के जवाब में उन्होंने
कहा कि पुलिस ने ये कार्रवाई
क्यों की इसके बारे में तो
मुंबई एटीएस ही बता सकती है।
देश के स्तर पर आईपीएस एसोसिएशन ने वर्दीधारी की मौत पर निंदा प्रस्ताव पारित किया पर मध्यप्रदेश के आईपीएस इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोल रहे हैं। ये जवाबदारी चंद सेवा निवृत्त आईपीएस ही क्यों निभा रहे हैं ये पूछा जाने पर उन्होंने कहा कि हम सिर्फ देश के लिए जान न्यौछावर करने वाले करकरे की बात कर रहे हैं, हमें उनके पुराने कामकाज के बारे में कुछ नहीं कहना। देश के स्तर पर जो लोग सवाल उठा रहे हैं उनका पक्ष वे ही बता सकते हैं।
जब
उनसे पूछा गया कि साध्वी प्रज्ञा
ने खुद को प्रताड़ित किए जाने
की बात कहते हुए हेमंत करकरे
को इसके लिए दोषी बताया था तो
उन्होंने कहा कि ये आरोप अदालत
में साबित नहीं हुए हैं।
उन्होंने कहा कि कई बार यदि
प्रताड़ना की बात ठीक तरह से
उठाई जाती है तो अदालत में
दोषियों को सजा तक मिलती है।
इस मुद्दे पर अदालत के सामने
साक्ष्य नहीं आ पाए तो इसके
लिए करकरे को दोषी कैसे माना
जा सकता है।
हालांकि
उन्होंने ये भी कहा कि देश में
रुपए के लेनदेन पर कड़ी निगाह
रखी जाती है इसके बावजूद चुनाव
आयोग की निगरानी में काला धन
बरामद हो रहा है जो जाहिर करता
है कि देश की व्यवस्था में कोई
लीकेज जरूर है। पुलिस के भी
कई अफसर आपराधिक गतिविधियों
में संलग्न रहते हैं पर इसके
लिए पूरी पुलिस फोर्स को तो
दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
हम सिर्फ यही कहना चाहते हैं।
साध्वी प्रज्ञा के आरोपों के बारे में उन्होंने कहा कि इससे ऐसा लग रहा है कि भारत में कानून का राज नहीं है। भारत एक बनाना इस्टेट बनकर रह गया है।सच्चाई ये है कि एनआईए की अदालत ने मालेगांव बम कांड के आरोपियों से मकोका हटाया है पर साध्वी प्रज्ञा और उनके सहयोगियों पर मुकदमा तो चलाया ही जा रहा है।वे बेदाग साबित होती हैं या नहीं ये भविष्य के गर्त में है।करकरे का पक्ष उनकी दस्तावेजी कार्रवाई से ही समझा जा सकता है।अदालत के फैसले से भी समझा जा सकता है कि चूक कहां हुई।
दिग्विजय सिंहःभगवा आतंकवाद से पिंड छुड़ाने की नाकाम कोशिश
-आलोक
सिंघई-
साध्वी
प्रज्ञा को भोपाल से लोकसभा
प्रत्याशी बनाकर भाजपा ने
राष्ट्रवाद बनाम परिवारवाद
की बहस को तेज कर दिया है। ये
बहस आम चुनाव के तीन चरण हो
जाने के बाद आकार लेना शुरु
हुई है। इस बहस की शुरुआत में
जो संशय और सवाल उठ रहे हैं
उससे आम मतदाता अभी तक समाधान
के दौर तक नहीं पहुंच पाए हैं।
आम मतदाता की तो छोड़िए भाजपा
के कार्यकर्ता और वरिष्ठ नेता
भी इस बहस को लेकर अभी ऊहापोह
के बीच झूल रहे हैं। जब प्रत्याशी
की घोषणा नहीं हुई थी और कांग्रेस
के प्रत्याशी दिग्विजय सिंह
ने क्षेत्र में जनसंपर्क शुरु
कर दिया था तब भाजपा के नेताओं
में खलबली मची हुई थी कि उनका
विरोधी दल प्रचार में आगे
निकलता जा रहा है। इस बीच भाजपा
के कार्यकर्ताओं और टिकिट
मांगने वाले नेताओं के बीच
भी प्रतिस्पर्धा का माहौल
था। हर नेता संपर्क करके खुद
को बांका प्रत्याशी घोषित
करवाने में जुटा हुआ था। बहुत
देर बाद जब साध्वी प्रज्ञा
को मैदान में उतारा गया तो
टिकिट की दौड़ में जुटे इलाकाई
नेतागण मुंह फुलाकर घूमते
देखे जाने लगे। हालत ये हो गई
कि प्रदेश प्रभारी विनय
सहस्त्रबुद्धे को इन नेताओं
को लामबंद करना भारी पड़ रहा
है।
दरअसल
पिछले पंद्रह सालों के भाजपा
शासनकाल में संगठन की घनघोर
उपेक्षा की गई। संगठन में
सुविधाभोगी नेताओं का जमघट
लग गया। संगठन के प्रभारियों
से संपर्क जोड़कर उन्हें बदनाम
करने के प्रयास भी जोर शोर से
हुए। ये काम वो लोग कर रहे थे
जिन्हें तात्कालिक संगठन
महामंत्री कप्तान सिंह सोलंकी
ने अपदस्थ दिग्विजय सिंह और
उनके भाई लक्ष्मण सिंह से
तालमेल बिठाकर भाजपा में शामिल
करा दिया था। वे सभी पंचायत
स्तर तक फैल गए थे। जब शिवराज
सिंह चौहान सत्तासीन हुए तो
उन्होंने संगठन के उन्हीं
पदाधिकारियों से काम लेना
शुरु कर दिया। इस दौरान संघर्ष
में प्रमुख भूमिका निभाने
वाला भाजपा का मूल कैडर नेपथ्य
में चला गया। शिवराज जी के
कार्यकाल में संगठन के पुनर्गठन
का काम भी धीमा पड़ गया। प्रदेश
अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान
के कार्यकाल में संगठन को जिस
दयादृष्टि से चलाया गया उसके
बीच यही आयातित पदाधिकारी
मलाई काटते रहे। आज यदि
मुख्यमंत्री कमलनाथ या दिग्विजय
सिंह जोर जोर से कह रहे हैं कि
मोदी ने अच्छे दिनों का वादा
किया था लेकिन अच्छे दिन केवल
भाजपा के कार्यकर्ताओं के आए
हैं तो वे उन्हीं छद्म भाजपा
के नेताओं की बात कर रहे हैं
जो इतने लंबे कार्यकाल में
जनता के बीच लहीम शहीम जीवन
शैली के कारण ईर्ष्या के तौर
पर देखे गए। संगठन के मूल
कार्यकर्ता तो उपेक्षित ही
रहे और उनमें से कुछ ने तो
हितग्राही मूलक योजनाओं से
खुद को जिंदा रखा और कुछ ने
संगठन से किनारा कर लिया।
साध्वी
प्रज्ञा ने जब भोपाल पहुंचकर
अपने खिलाफ मालेगांव बम धमाके
के फर्जी आरोप में खुद को
प्रताड़ित किए जाने का मुद्दा
उठाया तो जनता के बीच से तो
सकारात्मक प्रतिक्रिया आई
लेकिन संगठन का अप्रशिक्षित
कैडर इसे जनता का मुद्दा नहीं
बना पाया। इसके विपरीत साध्वी
प्रज्ञा ने अपने खिलाफ प्रताड़ित
करने वाले मुंबई एटीएस प्रमुख
हेमंत करकरे का नाम लिया तो
कांग्रेस ने इसे शहीद का अपमान
करने वाला बयान बताना शुरु
कर दिया। इस दौरान भी कैडर के
भीतर से प्रताड़ना की कहानी
को वांछित हवा नहीं दी गई।
कैडर की इस असफलता का नतीजा
ये हुआ कि कांग्रेस महात्मा
गांधी की शहादत के समान ही इसे
शहीद का अपमान बताने में जुट
गई। भाजपा को हस्तक्षेप करके
स्वयं को इस मुद्दे से अलग
करना पड़ा। उसने ये कहकर पल्ला
झाड़ा कि ये साध्वी का निजी
अनुभव है हम शहादत का अपमान
करने के पक्ष में नहीं हैं।
कांग्रेस ने मराठी समाज को
भी उकसाकर इस मुद्दे पर साध्वी
प्रज्ञा और भाजपा के राष्ट्रवाद
की मुखालिफत शुरु कर दी। हालत
ये हो गई है कि भाजपा के नेतागण
इस मुद्दे पर बचाव की मुद्रा
में आ गए हैं उन्हें लगता है
कि साध्वी पज्ञा ने अपनी
राजनैतिक अपरिपक्वता के कारण
उन्हें झमेले में फंसा दिया
है। जिस मुद्दे पर पूरे देश
में मतदान का तीसरा चरण स्पष्ट
मतविभाजन की स्थिति में आ जाना
चाहिए था भाजपा उस जनमत को
अपने पक्ष में लामबंद करने
में असफल रही है।
वास्तव
में प्रज्ञा सिंह तत्कालीन
गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे,
और दिग्विजय
सिंह जैसे कांग्रेस के नेताओं
के षड़यंत्र का शिकार रहीं
हैं। तत्कालीन गृह सचिव आर
के सिंह ने बेशक इस आदेश का
पालन करने के लिए नोटशीट लिखी
पर इसे सरकार ने ही पारित किया
और मुंबई एटीएस को मामले की
छानबीन की जवाबदारी सौंपी।
आज जब दिग्विजय सिंह चुनाव
मैदान में हैं और उन्हें बीस
में से पंद्रह लाख हिंदू
मतदाताओं के वोट की दरकार है
तब वे खुद को निर्दोष बताने
के लिए कह रहे हैं कि उन्होंने
भगवा आतंकवाद शब्द नहीं रचा,
ये तो आरके
सिंह की देन था। हालांकि
केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ
सिंह ने आरके सिंह का बचाव
करते हुए कहा कि वे सचिव थे
किसी मुद्दे पर फैसला लेने
का अधिकार और दायित्व सरकार
का होता है इसलिए भगवा आतंकवाद
शब्द को हवा देने का षड़यंत्र
दिग्विजय सिंह और सुशील कुमार
शिंदे की जोड़ी ने ही किया था।
इस
मामले में जो लोग साध्वी प्रज्ञा
की प्रताड़ना के बयान को शहादत
का अपमान बताने में जुटे हैं
वे वास्तव में शहादत की आड़
में परिवारवाद को स्थापित
करने की अपनी जानी पहचानी सफल
नीति पर अमल कर रहे हैं। बापू
महात्मा गांधी की हत्या,
श्रीमती
इंदिरागांधी की जघन्य हत्या,
स्वर्गीय राजीव
गांधी की अमानवीय हत्या की
आड़ लेकर सफल राजनीति करती
रही कांग्रेस को हेमंत करकरे
की शहादत के रूप में एक सुरक्षित
छतरी मिल गई है। इसके विपरीत
भाजपा हेमंत करकरे के कांग्रेस
के षड़यंत्र में लिप्तता को
नहीं उभार पाई है। मीडिया में
भी उनकी बड़ी बेटी जुई करकरे
का बयान प्रसारित किया गया
जो अमेरिका के बोस्टन में रहती
हैं। घटना के वक्त भी वे बोस्टन
में ही थीं। पिता की गतिविधियां
उन तक परिवारजनों के माध्यम
से ही पहुंचती थीं। उनके बेटे
आकाश करकरे और छोटी बेटी शायली
के बारे में जुई कुछ नहीं बोलना
चाहती। इसे वे उनकी निजता
बताती हैं। जबकि आकाश करकरे
क्या कारोबार करते हैं,
उनका कारोबार
कब स्थापित हुआ। वे किस देश
में कारोबार करते हैं। दिग्विजय
सिंह के बेटे जयवर्धन सिंह
से उनके क्या कारोबारी संबंध
हैं। उसमें पूंजी निवेश किसने
और कितना किया था।तब क्या
हेमंत करकरे उतना बड़ा निवेश
करने की स्थिति में थे या नहीं
इन मुद्दों पर भाजपा प्रकाश
नहीं डाल पा रही है। ऐसे में
वो आरोपों से घिर रही है।
साध्वी
प्रज्ञा ने यदि भगवा आतंकवाद
पर अपनी प्रताड़ना का जिक्र
किया था तो उन्हें इस मुद्दे
पर लोगों के मन में उठ रहे सभी
सवालों का जवाब देना था। प्रकरण
अदालत में होने के कारण वे कई
मुद्दों पर चर्चा नहीं कर पा
रहीं हैं। इसके बावजूद भाजपा
को किसने रोका कि वे साध्वी
के निर्दोष होने के बाजवूद
उन्हें प्रताड़ित करने के
मुद्दे को जनचर्चा न बनाएं।
भाजपा के नेतागण शहादत को
मुद्दा बनाए जाने के कांग्रेस
के ट्रेप में फंस गए हैं। जबकि
साध्वी के निर्दोष होने के
बावजूद प्रताड़ित किए जाने
का मुद्दा हवा नहीं पकड़ सका
है।
जिन
लोगों ने साध्वी प्रज्ञा के
छात्र जीवन को करीब से देखा
है। उनका तेजाबी रूप देखा है
वे भी साध्वी का पक्ष नहीं रख
पा रहे हैं। जब प्रज्ञा सिंह
नाम की ये छात्रा किसी पद पर
नहीं थी तब उसके न्याय करने
का ढंग लोगों के आकर्षण का
केन्द्र बन चुका था। आरएसएस
की पारिवारिक पृष्ठभूमि के
कारण वे लोगों की निगाह में
आईँ और उन्हें अपने पाले में
खींचने के लिए दिग्विजय सिंह
ने कई चरणों के प्रयास किए।
जब वे सफल नहीं हुए तो उन्होंने
भगवा आतंकवाद की कहानी के
ट्रेप में साध्वी को फंसाने
का जतन किया। अमानवीय यातना
झेलने के बाद भी जब साध्वी
प्रज्ञा टूटी नहीं और सत्ता
परिवर्तन के बाद बदले माहौल
में छानबीन हुई तो उसी एटीएस
ने पाया कि साध्वी निर्दोष
हैं। इसके बाद ही अदालत ने
उन्हें जमानत पर रिहा किया।
अब जबकि अदालत की प्रक्रिया अंतिम दौर में है और भविष्य में साध्वी प्रज्ञा के बेदाग बरी होने की पूरी संभावना है तब भाजपा ने उन्हें मैदान में खड़ा करके राष्ट्रवाद को समझाने का प्रयास किया है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह कह रहे हैं कि साध्वी प्रज्ञा को झूठे मामले में फंसाकर भगवा आतंकवाद का नाम देकर राष्ट्रवाद को लांछित करने का काम कांग्रेस के नेताओं ने किया है। वे सवाल करते हैं कि समझौता एक्सप्रेस में ब्लास्ट करने वाले आरोपी अब कहां हैं। भाजपा यदि शहादत और प्रताड़ना के बीच मौजूद राष्ट्रवाद के तत्व को समझाने में सफल होती है तो आगे आने वाले चरणों के मतदान में उसे अवश्य लाभ होगा। सबसे बड़ी बात तो ये है कि केवल राष्ट्रवाद को कुचलने के लिए परिवारवाद की ध्वजावाहक कांग्रेस ने कैसे कैसे षड़यंत्र किये ये भी स्थापित करना संभव हो सकता है। ये आम चुनाव इस तरह देश में एक क्रांतिकारी बदलाव के मोड़ पर खड़ा है। जनमत के आधार पर राष्ट्रवाद और परिवारवाद के बीच जीत हार का फैसला भी 23 मई को होना तय है।
भोपाल,15
अप्रैल(प्रेस
सूचना केन्द्र)।
केरल की वायनाड जैसी छोटी
लोकसभा सीट से जीत सुनिश्चित
करने पहुंचे कांग्रेस अध्यक्ष
राहुल गांधी का दक्षिण प्रेम
इस बार भारत की राजनीति को
परिभाषित करने के लिए इस्तेमाल
किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश
की अमेठी लोकसभा सीट के अलावा
वायनाड से जीत सुनिश्चित करने
के पीछे कांग्रेस की रणनीति
काम कर रही है।
दरअसल
देश में काले धन की जो समानांतर
अर्थव्यवस्था कांग्रेस के
शासनकाल में विकसित हुई थी
वो कांग्रेस की शक्ति का आधार
रही है। नोटबंदी और जीएसटी
ने उस अर्थव्यवस्था को बुरी
तरह प्रभावित किया है। इसी
वजह से व्यापारियों और साहूकारों
का बहुत बड़ा वर्ग आर्थिक
सुधारों की लहर से खफा हो गया
है। कांग्रेस गरीब की बात जरूर
करती रही है लेकिन उसकी पृष्ठभूमि
में खड़े राजा महाराजाओं और
साहूकारों की शक्ति कांग्रेस
को हर चुनौती का सामना करने
में सहयोग प्रदान करता रहा
है। दक्षिण में जिन स्वयंसेवी
संस्थाओं और कंपनियों को
प्रतिबंधित किया गया है उससे
भी मोदी सरकार के विरोध में
नाराजगी देखी गई और कांग्रेस
को इस बार दक्षिण भारत जैकपाट
नजर आ रहा है।
केरल की
वायनाड लोकसभा सीट के समीकरण
देखे तो ये सीट2008 में
अस्तित्व में आई. तब
से अब तक इस सीट पर कांग्रेस
का ही कब्जा है. इस
सीट के तहत 7 विधानसभा
सीटें आती हैं. ये
सातों विधानसभा सीटें मनंथावाड़ी,
सुल्तानबथेरी,
कल्पेट्टा और कोझीकोड
जिलों में पड़ती हैं. 2009 से
इस सीट पर कांग्रेस के एमआई
शानवास सांसद हैं. अब
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी
के यहां से चुनाव लड़ने की वजह
से यह संसदीय सीट हाई-प्रोफाइल
सीटों में शुमार हो गई है और
सभी की नजर इस सीट पर भी लग गई
है.
वायनाड
जिले की आबादी 8.18 लाख
है जिनमें से 4.01 लाख
पुरुष और 4.15 महिलाएं
है. इस जिले की
साक्षरता दर 89.03 प्रतिशत
है. वायनाड में
49.48% हिंदू, 28.65%
जनसंख्या मुस्लिम और
ईसाई समुदाय की आबादी 21.34%
है. केरल
में कांग्रेस की अगुवाई वाली
गठबंधन का नाम है यूनाइटेड
डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ).
जबकि दूसरी तरफ वामपथी
दलों का गठबंधन का नाम है लेफ्ट
डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ).
2014 लोकसभा
चुनाव में कांग्रेस को वायनाड
पर महज 20,870 वोटों के
अंतर से जीत हासिल हुई थी.
कांग्रेस के एमआई
शानवास को सीपीएम के सत्यन
मोकेरी से सिर्फ 1.81 फीसदी
अधिक वोट मिले थे. शानवास
को 3,77,035 और मोकेरी
को 3,56,165 वोट मिले थे.
बीजेपी तब चुनाव में
तीसरे स्थान पर रही थी और उसके
प्रत्याशी पीआर रस्मिलनाथ
को 80,752 वोट मिले थे.
वायनाड
लोकसभा सीट पर 2009 में
पहली बार संसदीय चुनाव कराए
गए जिसमें कांग्रेस को बड़ी
जीत मिली थी. कांग्रेस
के एमआई शानवास ने सीपीआई के
एम रहमतुल्लाह को 1,53,439 के
भारी अंतर से हराया था.
शानवास को तब 4,10,703
और रहमतुल्लाह को
2,57,264 वोट मिले थे.
कांग्रेस
अध्यक्ष राहुल गांधी दक्षिण
के रण में उतरकर वहां के राजनीतिक
समीकरण साधने की रणनीति पर
काम रहे हैं. एक दौर
में दक्षिण भारत कांग्रेस का
मजबूत गढ़ माना जाता था,
लेकिन वक्त के साथ
छत्रपों ने कांग्रेस की जमीन
को कब्जा लिया है. ऐसे
में राहुल दक्षिण के सियासी
रण में खुद उतरकर अपनी सियासी
जमीन को वापस पाने की है.
वायनाड
और मल्लपुरम इलाके में कांग्रेस
और ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की
मजबूत पकड़ मानी जाती है.
यही वजह है कि पिछले
दो लोकसभा चुनाव से कांग्रेस
लगातार जीत दर्ज कर रही है.
ऐसे में राहुल के लिए
वायनाड की राह में बहुत ज्यादा
दिक्कतें नहीं होंगी.
वायनाड
एक पर्यटन स्थल भी है, इस
लिहाज से भी राहुल गांधी के
लिए इस लोकसभा सीट का चयन किया
गया है।2008 से ही इस
क्षेत्र का विस्तार किया जा
रहा है। यहां आठ जन जातियां
निवास करती हैं। इसलिए बजट
का बड़ा हिस्सा यहां विकास
के नाम पर खर्च किया जाता रहा
है। कोआपरेटिव सोसायटी बनाकर
भी यहां की खेती और पर्यटन को
संरक्षण देने का प्रयास बरसों
से किया जाता रहा है। कांग्रेस
की निगाह बहुत लंबे समय से इस
सीट पर थी और इसे दक्षिण के
इलाकों में सुरक्षित लांच
पेड की तरह इस्तेमाल किया जा
रहा है।
पर्यटन
क्षेत्र वयनाड
वयनाड
पर्यटन संगठन (डबल्यूटीओ)
वयनाड में ‘जिम्मेदार
और सतत् पर्यटन’ की संस्कृति
लाने में मुख्य भूमिका निभा
रहा है, जिसने वयनाड
के उत्तरी जिले की चार पगडंडियों
की पहली पगडंडी आपको यहाँ
मिलेगी।
इन चार
पगडंडियों में, हम
आपका परिचय पहली पगडंडी ‘आउटडोर
ट्रेल’ से कराएंगे जिसमें
आपको वयनाड जिले के निम्नलिखित
स्थल मिलेंगे ।
चेम्ब्रा
पीक
2100 मीटर
की ऊंचाई पर चेम्ब्रा पीक
वयनाड के दक्षिणी हिस्से में
मेप्पाडी के समीप स्थित है।
यह इस क्षेत्र की चोटियों में
सबसे ऊंची चोटी है और इसकी
चढ़ाई काफी मुश्किलों भरी है।
चेम्ब्रा पीक की चढ़ाई एक रोमांचक
अनुभव है, जहां चढ़ाई
के हर चरण में वयनाड का व्यापक
विस्तार दिखाई पड़ता है और शिखर
तक पहुंचते-पहुंचते
यहां के दृश्य काफी विस्तृत
बन जाते हैं। इस चोटी तक पहुंचकर
वापस लौटने में एक दिन का समय
लगता है। जो इसके शीर्ष पर
कैंप करना चाहते हैं, बेशक
उनके लिए तो यह एक यादगार अनुभव
ही होगा।
कैंपिंग
के लिए इच्छुक व्यक्ति वयनाड
के कलपेट्टा में स्थित डिस्ट्रिक्ट
टूरिज्म प्रोमोशन काउंसिल
से संपर्क कर सकते हैं।
नीलिमला
वयनाड के
दक्षिणपूर्वी हिस्से में
कलपेट्टा तथा सुल्तान बथेरी
से आसानी से पहुंचे जाने वाली
स्थिति में अवस्थित नीलिमला
ट्रेकिंग के लिए एक उपयुक्त
स्थान है, जहां
ट्रेकिंग के लिए कई मार्ग
उपलब्ध हैं। नीलिमला के शिखर
पर से समीप की घाटी में मीनमुट्टी
जलप्रपात का दृश्य बेहद यादगार
हो उठता है।
मीनमुट्टी
जलप्रपात
ऊटी और
वयनाड को जोड़ने वाली मुख्य
सड़क से 2 कि.मी.
की ट्रैकिंग करते हुए
नीलिमला के पास स्थित इस खूबसूरत
मीनमुट्टी जलप्रपात तक पहुँचा
जा सकता है। यह वयनाड जिले का
सबसे बड़ा जलप्रपात है जहाँ
तीन धाराएँ लगभग 300 मीटर
से नीचे गिरती हैं।
चेतलयम
एक और
जलप्रपात जो पर्यटकों को वयनाड
की ओर आकर्षित करता है,
चेतालयम जलप्रपात है
जो वयनाड के उत्तरी इलाके के
सुल्तान बतेरी के पास है।
मीनमुट्टी जलप्रपात की तुलना
में यह आकार में थोड़ा छोटा
है। यह जलप्रपात और आसपास के
इलाके ट्रैकिंग और पक्षी
प्रेमियों के लिए बेहतरीन
जगह है।
पक्षीपातालम
ब्रह्मगिरी
की पहाडियों पर 1700 मी.
की ऊंचाई पर घने वन
में पक्षीपातालम स्थित है।
इस क्षेत्र में बड़े-बड़े
बोल्डर देखने को मिलते हैं,
उनमें से कुछ तो सचमुच
विशाल हैं। यहां मौजूद कई सारी
गुफाएं विभिन्न प्रकार के
पक्षियों, जंतुओं
और वनस्पतियों की विशेष किस्मों
के वासस्थान हैं। पक्षीपातालम
मानंतवाडी के पास स्थित है
और यहाँ जाने के लिए आपको
तिरुनेल्ली से शुरु करते हुए,
जंगल में लगभग 7
कि.मी.
की ट्रैकिंग करते हुए
जाना होगा। पक्षीपातालम जाने
वालों को डीएफओ – उत्तरी वयनाड
से अनुमति लनी होती है।
बाणासुरा
सागर बांध
बाणासुरा
सागर पर बना बांध भारत के सबसे
बड़े बांध के रूप में जाना जाता
है। यह बांध वयनाड जिले के
दक्षिण-पूर्वी
हिस्से में स्थित है और यह
करलाड झील के समीप है। बाणासुरा
सागर बांध में बाणासुरा पीक
की चढ़ाई के लिए प्रारंभ स्थान
भी स्थित है। यहां का एक रोचक
आकर्षण है द्वीपों का समूह,
जिसका निर्माण जलाशय
द्वारा आस-पास के
क्षेत्रों को जलमग्न करने के
कारण होता है।
एक ओर जहाँ
आप वयनाड के मनोरम दृष्यों,
ध्वनियों और खुशबू
का मज़ा लेंगे, वहीं
आप वयनाड के कुछ दुर्लभ चीज़ें
भी खरीदना चाहेंगे जैसे यहाँ
के मसाले, कॉफ़ी,
चाय, बांस
की वस्तुएँ, शहद और
जड़ी-बूटी के पौधे।
वयनाड में
‘आउटडोर ट्रेल’ के बारे में
अधिक जानकारी के लिए, वयनाड
पर्यटन संगठन से संपर्क करें।
संपर्क
के विवरण
महासचिव
वयनाड
पर्यटन संगठन
वासुदेवा
एडम, पोझुताना पी.ओ.
वयनाड,
केरल, भारत
पिन –
673575
टेलीफ़ोन
+91-4936-255308, Fax.+91-4936-227341
ई-मेल
mail@wayanad.org
कैसे पहुँचे
नज़दीकी
रेल्वे स्टेशन – कोझिकोड
(कालीकट) रेल्वे
स्टेशन 62 कि.मी.
दूरी पर है
नज़दीकी
एयरपोर्ट – कोझिकोड (कालीकट)
अंतर्राष्ट्रीय
एयरपोर्ट लगभग 65 कि.मी.
दूरी पर है
नई
दिल्ली,(प्रेस सूचना
केन्द्र)। प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी ने बुधवार दोपहर
12:20 बजे देश को बताया
कि भारतीय वैज्ञानिकों ने
अंतरिक्ष में उपग्रह मार
गिराने का सफल परीक्षण कर लिया
है. असल में एंटी-सैटेलाइट
मिसाइल है क्या?
भारत के
पास एंटी-सैटेलाइट
मिसाइल के लिए पृथ्वी एयर
डिफेंस (पैड)
सिस्टम है. इसे
प्रद्युम्न बैलिस्टिक मिसाइल
इंटरसेप्टर भी कहते हैं.
यह एक्सो-एटमॉसफियरिक
(पृथ्वी के वातावरण
से बाहर) और
एंडो-एटमॉसफियरिक
(पृथ्वी के वातावरण
से अंदर) के टारगेट
पर हमला करने में सक्षम हैं.
यह दो स्टेज की बैलिस्टिक
मिसाइल है.
पूर्व
डीआरडीओ चीफ वीके सारस्वत
बताते हैं कि हमारे वैज्ञानिकों
ने पुराने मिसाइल सिस्टम को
अपग्रेड किया है. उसमें
नए एलीमेंट जोड़े हैं. इसका
मतलब ये है कि पहले से मौजूद
पैड सिस्टम को अपग्रेड कर तीन
स्टेज वाला इंटरसेप्टर मिसाइल
बनाया गया. फिर इस
परीक्षण में उसी मिसाइल का
इस्तेमाल किया गया.
पैड सिस्टम
की शुरुआती क्षमता
रेंज :
2000 किमी
गति:
1470 से 6126 किमी
प्रति घंटा
(हालांकि,
बाद में इसे अपग्रेड
कर और भी ताकतवर और घातक बनाया
गया है)
कैसे लॉन्च
किया एंटी-सैटेलाइट
मिसाइल
डीआरडीओ
ने बैलिस्टिक इंटरसेप्टर
मिसाइल के जरिए 300 किमी
की ऊंचाई पर मौजूद उपग्रह को
मार गिराया. यह
मिसाइल भुवनेश्वर से 150 किमी
दूर डॉ. एपीजे अब्दुल
कलाम व्हीलर आइलैंड से छोड़ी
गई. तीन स्टेज के
इस इंटरसेप्टर मिसाइल में दो
रॉकेट बूस्टर्स हैं. मिशन
कंट्रोल सेंटर को मिसाइल के
जरिए जो डाटा मिला है, उसकी
बदौलत मिशन के 100 फीसदी
सफलता की पुष्टि हुई है.
9 साल पहले
तिरुवनंतपुरम में हुए 97वें
इंडियन साइंस कांग्रेस में
डीआरडीओ के जनरल रुपेश ने पहली
बार घोषणा की थी कि भारत दुश्मन
के उपग्रहों को उसकी कक्षा
में ही गिराने की जरूरी टेक्नोलॉजी
विकसित कर रहा है. 10 फरवरी
2010 में डीआरडीओ के
डायरेक्टर जनरल और रक्षा
मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार
डॉ. वीके सारस्वत
ने कहा था कि भारत के पास लो
अर्थ और पोलर ऑर्बिट में मौजूद
दुश्मन के उपग्रहों को मार
गिराने के जरूरी सामान हैं.
चीन के
विदेश मंत्रालय ने भारत द्वारा
उपग्रह रोधी मिसाइल के सफल
परीक्षण को लेकर पीटीआई के
एक सवाल पर लिखित जवाब में
कहा, ”हमने खबरें
देखी हैं और उम्मीद करते हैं
कि प्रत्येक देश बाहरी अंतरिक्ष
में शांति बनाये रखेंगे।”
चीन ने ऐसा एक परीक्षण
जनवरी 2007 में किया
था जब उसके उपग्रह रोधी मिसाइल
ने एक निष्क्रिय मौसम उपग्रह
को नष्ट कर दिया था।
भोपाल,(प्रेस
सूचना केन्द्र)।कश्मीर
में सेना की सख्ती और आतंकवादी
हमलों के बीच एक आतंकवादी
संगठन लश्कर-ए-इस्लाम
ने पुलवामा में कई जगह पोस्टर
लगाए थे, जिनमें
कहा गया है कि कश्मीरी पंडित
या तो घाटी छोड़ दें या फिर
मरने के लिए तैयार रहें। यहां
ध्यान देने वाली बात है कि
कश्मीर में साल 1990 में
हथियारबंद आंदोलन शुरू होने
के बाद से अब तक लाखों कश्मीरी
पंडित अपना घर-बार
छोड़ कर चले गए। उस वक्त हुए
नरसंहार में सैकड़ों पंडितों
का कत्लेआम हुआ था। बड़ी संख्या
में महिलाओं और लड़कियों के
साथ बलात्कार हुए थे।
कश्मीरी
पंडितों पर इस्लाम के नाम पर
कहर टूटा इसकी शह भारत विरोधियों
ने दी थी। कश्मीर में हिंदुओं
पर हमलों का सिलसिला 1989 में
जिहाद के लिए गठित जमात-ए-इस्लामी
ने शुरू किया था। जिसने कश्मीर
में इस्लामिक ड्रेस कोड लागू
कर दिया। आतंकी संगठन का नारा
था-
‘हम सब एक,
तुम भागो या मरो’।
इसके बाद कश्मीरी पंडितों ने
घाटी छोड़ दी।
इस
अराजकता से परेशान अमीर से
अमीर कश्मीरी पंडित तक अपनी
पुश्तैनी जमीन जायदाद छोड़कर
शरणार्थी शिविरों में रहने
को मजबूर हो गए। हिंसा के उस
दौर में 300 से अधिक
हिंदू महिलाओं और पुरुषों की
हत्या हुई थी। घाटी में कश्मीरी
पंडितों के बुरे दिनों की
शुरुआत 14 सितंबर
1989 से हुई थी।
भाजपा
के राष्ट्रीय कार्यकारिणी
के सदस्य और वकील कश्मीरी
पंडित, तिलक लाल
तप्लू की जेकेएलएफ ने हत्या
कर दी गई। इसके बाद जस्टिस
नीलकांत गंजू की भी गोली मारकर
हत्या कर दी गई। आतंक के उस
दौर में अधिकतर हिंदू नेताओं
को मौत की नींद सुला दिया गया।
सरेआम
हुए थे बलात्कार
*मीडिया
रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक
कश्मीरी पंडित नर्स के साथ
आतंकियों ने सामूहिक बलात्कार
किया और उसके बाद मार-मारकर
उसकी हत्या कर दी। घाटी में
कई कश्मीरी पंडितों की बस्तियों
में सामूहिक बलात्कार और
लड़कियों के अपहरण किए गए।
हालात और बदतर हो गए थे।
*एक स्थानीय
उर्दू अखबार, हिज्ब
उल मुजाहिदीन की तरफ से एक
प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई
थी कि ‘सभी हिंदू
अपना सामान बांधें और कश्मीर
छोड़ कर चले जाएं’।
*एक अन्य
स्थानीय समाचार पत्र अल सफा
ने इस निष्कासन के आदेश को
दोहराया।
*मस्जिदों
में भारत एवं हिंदू विरोधी
भाषण दिए जाने लगे। सभी कश्मीरियों
को कहा गया कि इस्लामिक ड्रेस
कोड ही अपनाएं।
*कश्मीरी
पंडितों के घर के दरवाजों पर
नोट लगा दिया गया, जिसमें
लिखा था या तो मुस्लिम बन जाओ
या कश्मीर छोड़ दो।
*पाकिस्तान
की तत्कालीन प्रधानमंत्री
बेनजीर भुट्टो ने टीवी पर
कश्मीरी मुस्लिमों को भारत
से अलग होने के लिए भड़काना
शुरू कर दिया।
कश्मीर
में हुए बड़े नरसंहार
1. डोडा
नरसंहार- अगस्त 14,
1993 को बस रोककर 15
हिंदुओं की हत्या कर
दी गई।
2. संग्रामपुर
नरसंहार- मार्च 21,
1997 घर में घुसकर 7
कश्मीरी पंडितों को
किडनैप कर मार डाला गया।
3. वंधामा
नरसंहार- जनवरी 25,
1998 को हथियारबंद आतंकियों
ने 4 कश्मीरी परिवार
के 23 लोगों को गोलियों
से भून डाला।
4. प्रानकोट
नरसंहार- अप्रैल
17, 1998 को उधमपुर जिले
के प्रानकोट गांव में एक कश्मीरी
हिन्दू परिवार के 27 लोगों
को मौत के घाट उतार दिया गया,
इसमें 11 बच्चे
भी शामिल थे। इस नरसंहार के
बाद डर से पौनी और रियासी के
1000 हिंदुओं ने पलायन
किया था।
5. 2000 में
अनंतनाग के पहलगाम में 30
अमरनाथ यात्रियों की
आतंकियों ने हत्या कर दी थी।
6. 20 मार्च
2000 चित्तीसिंघपोरा
नरसंहार, होला
मोहल्ला मना रहे 36 सिखों
की गुरुद्वारे के सामने आतंकियों
ने गोली मारकर हत्या कर दी।
7. 2001 में
डोडा में 6 हिंदुओं
की आतंकियों ने गोली मारकर
हत्या कर दी।
8. 2001 में
जम्मू रेलवे स्टेशन नरसंहार,
सेना के भेष में आतंकियों
ने रेलवे स्टेशन पर गोलीबारी
कर दी, इसमें 11
लोगों की मौत हो गई।
9. 2002 में
जम्मू के रघुनाथ मंदिर पर
आतंकियों ने दो बार हमला किया,
पहला 30 मार्च
और दूसरा 24 नवंबर
को, इन दोनों हमलों
में 15 से ज्यादा
लोगों की मौत हो गई।
10. 2002 में
कासिम नगर नरसंहार में 29
हिन्दू मजदूरों को
मार डाला गया। इनमें 13 महिलाएं
और एक बच्चा शामिल था।
11. 2003 में
नंदीमार्ग नरसंहार, पुलवामा
जिले के नंदीमार्ग गांव में
आतंकियों ने 24 हिंदुओं
को मौत के घाट उतार दिया था।
12. मार्च
1998 में मुस्लिम
जिहादियों ने एक दूध पीते
बच्चे का कत्ल किया जोकि
निकृष्टता की पराकाष्ठा थी
लेकिन छोटे बच्चे व महिलाएं,
लड़कियां आतंकवादियों
के सॉफ्ट टारगेट होते हैं
क्योंकि वे अपने बचाव के उपाय
भी नहीं कर सकते हैं।
13. 2 फरवरी
1990 को सामाजिक
कार्यकर्ता सतीश टिक्कु की
हत्या कर दी गई।
14. 23 फरवरी
को कृषि विभाग के कर्मचारी
अशोक की टांगों में गोली मारकर
उन्हें घंटों तड़पाने के बाद
सिर में गोली मारकर उनका कत्ल
कर दिया गया। एक सप्ताह बाद
इन मुस्लिम जिहादियों द्वारा
नवीन सपरू का कत्ल कर दिया
गया।
15. 27 फरवरी
को तेजकिशन को इन जिहादियों
ने घर से उठा लिया और तरह-तरह
की यातनाएं देने के बाद उसका
कत्ल कर उसे बड़गाम में पेड़
पर
लटका दिया।
16. 19 मार्च
को इखवान-अल-मुसलमीन
नामक संगठन के जिहादियों ने
टेलीकाम इंजीनियर बीके गंजु
को घर में घुसकर पड़ोसी मुसलमानों
की सहायता से मारा। उसके बाद
राज्य सूचना विभाग में सहायक
उपदेशक पीएन हांडा का कत्ल
किया गया।
17. 70 वर्षीय
स्वरानंद और उनके 27 वर्षीय
बेटे बीरेन्दर को मुस्लिम
जिहादी घर से उठाकर अपने कैंप
में ले गए। वहां उनकी पहले
आंखें निकाली गईं, अंगुलियां
काटी गईं फिर उनकी हत्या कर
दी गई।
कश्मीर
घाटी से हिन्दुओं को मारकर
भगाने के लिए चलाए गए अभियान
के बाद जम्मू के मुस्लिम बहुल
क्षेत्रों में हिन्दू मिटाओ-हिन्दू
भगाओ अभियान चलाया गया। मुस्लिम
जिहादियों ने हिन्दुओं का
कत्लेआम किया, जो
वर्तमान में भी जारी है।
हिन्दुओं पर पहला हमला 1986
में अनंतनाग में हुआ।
दिसंबर 1989 में
जोगिंदरनाथ का नाम अन्य तीन
अध्यापकों के साथ नोटिस बोर्ड
पर चिपकाकर उन्हें घाटी छोड़ने
की धमकी दी गई। यह तीनों लोग
राधाकृष्ण स्कूल मे पढ़ाते
थे। धमकाने का सिलसिला तब तक
जारी रहा जब तक जून 1989 में
जोगिन्दर वहां से भाग नहीं
गए।
हिन्दु
मिटाओ-हिन्दू भगाओ
अभियान चलाने से पहले 1984 से
86 के बीच में पाकिस्तान
के कब्जे वाले कश्मीर के मुस्लिम
जिहादियों को भारतीय कश्मीर
में बसाया गया और घाटी में
जनसंख्या संतुलन मुस्लिम
जिहादियों के पक्ष में बनाकर
हिन्दुओं पर हमले शुरू करवाए
गए। ये सब पाकिस्तान के इशारे
पर हुआ।
यह वह समय
था जब मुस्लिम जिहादियों
द्वारा प्रशासन में बैठे अपने
आतंकवादी साथियों के सहयोग
से हिन्दुओं पर अत्याचारों
का सिलसिला बेरोकटोक जारी
था। इस दौरान जान-माल
के साथ-साथ हिन्दुओं
की मां-बहन–बेटी
भी सुरक्षित नहीं थे। सैकड़ों
हिन्दुओं का कत्ल किया जा चुका
था। दर्जनों महिलाओं की इज्जत
को तार-तार किया जा
चुका था। मस्जिदों व उर्दू
प्रेस के माध्यम से मुस्लिम
जिहाद का प्रचार-प्रसार
जोरों पर था।
यह जिहाद
कश्मीर के साथ-साथ
डोडा में भी पांव पसार चुका
था। हिन्दुओं में प्रशासन व
जिहादी आतंकवादियों के बीच
गठजोड़ से दहशत फैल चुकी थी।
लेकिन प्रशासन का ध्यान हिन्दुओं
की रक्षा के बजाए मुस्लिम
जिहादियों द्वारा हिन्दुओं
पर किए जा रहे अत्याचारों व
हिन्दुओं के नरसंहारों को
छुपाने पर ज्यादा था। परिणामस्वरूप
कश्मीर घाटी से हिन्दुओं का
पलायन शुरू हो चुका था। 50
हजार से अधिक हिन्दू
परिवार घाटी छोड़कर जम्मू व
देश के अन्य हिस्सों में शरण
लेने को मजबूर हो चुके थे।
इस दौर
में हिन्दुओं को मारने वाले
सबके सब विदेशी नहीं थे। इन्हें
मारने वाले स्थानीय मुस्लिम
भी थे। वे समूहों में कत्ल से
पहले हिन्दुओं के अंग-भंग
करना, आंखें निकालना,
नाखुन खींचना, बाल
नोचना, जिंदा जलाना,
चमड़ी खींचना खासकर
महिलाओं के स्तनों को गाड़ी
से बांधकर घसीटते हुए तड़पा-तड़पा
कर मारना आम बात थी। कुल मिलाकर
मुस्लिम जिहादियों द्वारा
चलाए जा रहे हिन्दू मिटाओ-हिन्दू
भगाओ अभियान की सफलता के पीछे
जम्मू-कश्मीर की
देशविरोधी सेकुलर सरकारों
का योगदान पाकिस्तान से कहीं
ज्यादा है।
लखनऊ,(कुमार
अभिषेक)।शिया सेंट्रल
वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम
रिजवी ने एक फिर बाबरी मस्जिद
को लेकर चौंकाने वाला बयान
दिया है. वसीम रिजवी
ने मुसलमानों से समझौते के
मेज पर बैठकर इसे हिंदुओं को
सौंपने की वकालत की है.
वसीम रिजवी
ने कहा कि उस कलंक को मस्जिद
कहना गुनाहे अजीम है क्योंकि
मस्जिद के नीचे की खुदाई 137
मजदूरों ने की थी जिसमें
52 मुसलमान थे. उस
खुदाई के दौरान 50 मंदिर
के स्तंभों के नीचे के भाग में
ईंटों का बनाया गया चबूतरा
भी मिला था.
उन्होंने
दावा किया कि खुदाई के दौरान
मंदिर से जुड़े कुल 265 पुराने
अवशेष मिले थे. इसी
के आधार पर भारतीय पुरातत्व
विभाग (एएसआई)
इस निर्णय पर पहुंचा
था कि ऊपरी सतह पर बनी बाबरी
मस्जिद के नीचे एक मंदिर दबा
हुआ है. सीधे तौर
से माना जाए कि बाबरी इन मंदिरों
को तोड़कर इनके मलबे पर बनाई
गई है.
बाबरी
मस्जिद का निर्माण तोड़े गए
मंदिरों के मलबे पर बनाए जाने
को लेकर रिजवी ने कहा कि इसका
उल्लेख केके मोहम्मद की किताब
‘मैं भारतीय हूं’
में भी किया गया है.
ऐसी स्थिति में उस
बाबरी कलंक को जायज मस्जिद
कहना इस्लामिक सिद्धांतों
के विपरीत है.
उन्होंने
आगे कहा कि अभी भी वक्त है लोग
बाबरी मस्जिद से जुड़ें,
अपने गुनाहों की तौबा
करें और हजरत मोहम्मद के इस्लाम
को मानें. आतंकी
अबु बक्र, उमर की
विचारधारा को छोड़ एक समझौते
की मेज पर बैठकर हार जीत के
बगैर राम का हक हिंदुओं को
वापस करो और एक नई अमन की मस्जिद
लखनऊ में जायज पैसों से बनाने
की पहल करो
इससे पहले
शिया सेंट्रल बोर्ड के चेयरमैन
वसीम रिजवी पूजा स्थल (विशेष
प्रावधान) अधिनियम-1991
को खत्म करने की मांग
कर चुके हैं. रिजवी
के मुताबिक, पूजा
स्थल (विशेष प्रावधान)
अधिनियम के तहत विवादित
मस्जिदें सुरक्षित की जा चुकी
हैं. उन्हें हिंदुओं
को सौंपने में मुश्किल होगी,
इसलिए इसे खत्म किया
जाए.
रिजवी ने
इस एक्ट को खत्म करने के साथ-साथ
उन 9 मस्जिदों को
जिन्हें मुगल काल में मंदिरों
को तोड़कर बनाया गया था,
जिसमें अयोध्या,
काशी, मथुरा,
कुतुब मीनार, सहित
कुल 9 मस्जिदें बनी
हैं. उन्हें वापस
हिंदुओं को सौंपने की मांग
कर चुके हैं.
उनकी यह
भी मांग की है कि एक स्पेशल
कमेटी बनाकर अदालत की निगरानी
में विवादित मस्जिदों के बारे
में ठीक-ठीक जानकारी
दी जाए. अगर यह सिद्ध
हो जाता है कि यह हिंदुओं के
धर्म स्थलों को तोड़कर बनाया
गया है तो फिर उन्हें हिंदुओं
को वापस किया जाए.
रिजवी
यहां तक कह चुके हैं कि अयोध्या
में उस जगह पर कभी मस्जिद नहीं
थी और वहां कभी मस्जिद नहीं
हो सकती है. यह भगवान
राम का जन्मस्थान है और वहां
केवल राम मंदिर बनाया जाएगा.
बाबर से सहानुभूति
रखने वालों की नियति में हार
है.
सत्ता
संभालते ही कमलनाथ सरकार के
नगरीय प्रशासन मंत्री जयवर्धन
सिंह ने भोपाल के बीआरटीएस
को उखाड़ने की मुहिम चला दी
है। संत हिरदाराम नगर के सिंधी
व्यवसायियों से हाथ उठवाकर
उन्होंने बताया कि लोग बीआरटीएस
से परेशान हैं और चुनावी वादा
निभाने के लिए उनकी सरकार इसे
उखड़वा देगी।मंत्रीजी के
पिता और पंद्रह सालों तक
कांग्रेस के निर्वासन के
जिम्मेदार दिग्विजय सिंह ने
भी बेटे के सुर में सुर मिलाकर
बीआरटीएस के विरोध में कानूनी
सलाह मशविरा जुटाना शुरु कर
दिया है। पूर्ववर्ती यूपीए
की कांग्रेस नीत सरकार ने ही
केन्द्र में रहते हुए बीआरटीएस
बनवाने का प्रोजेक्ट शुरु
किया था। जिसे बाद में मोदी
सरकार ने जारी रखा और देश के
कई बड़े शहरों में इसे आकार
दिया गया। भाजपा जिस प्रोजेक्ट
को जस का तस स्वीकार करती रही
उससे आखिर मध्यप्रदेश की
कांग्रेस सरकार खफा क्यों
है।इस पर गौर किया जाए तो एक
बड़े षड़यंत्र का खुलासा होता
है।
बीआरटीएस की जरूरत शहरों में बढ़ते यातायात के मद्देनजर महसूस की गई थी।पूर्ववर्ती राजीवगांधी सरकार ने जिस तरह आधुनिकीकरण के नाम पर देश में कारों को बनाने और विदेशों में बनी कारों के आयात की अनुमति दी थी उसके दुष्परिणाम जल्दी ही देश के सामने आने लगे। शहरों में आयातित पेट्रोलियम आधारित कारों और दुपहिया वाहनों की बाढ़ आ गई। हर घर के हर सदस्य के लिए लोगों ने अलग वाहन खरीदने शुरु कर दिए। नतीजा ये हुआ कि सड़कों पर वाहनों के चलने की जगह कम पड़ने लगी। लगातार ट्रेफिक जाम से जनता को निजात दिलाने के लिए आनन फानन में सड़कों का चौड़ीकरण करना मजबूरी हो गई। ये परिवहन इसलिए मंहगा था क्योंकि तेल खरीदने के लिए हमें विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती थी। दिग्विजय सिंह की सरकार तो सड़क, बिजली और पानी के संकट से उपजे विरोध के कारण ही उखाड़ फेंकी गई थी।
इसके बाद आई भाजपा सरकारों ने सड़क बिजली और पानी के लिए भारी कर्ज लेना शुरु कर दिया। उमा भारती की सरकार कर्ज लेने की इस मुहिम के खिलाफ थी। उसने पूंजी उत्पादन के पंच ज अभियान को बढ़ावा दिया था। जिसमें जन, जंगल, जल, जमीन व जानवर को बुनियादी सम्पदा मानते हुए इन तत्वों के प्रति लोगों को जागरूक बनाने का विशेष अभियान 15 मई, 2004 से 15 जून, 2004 तक चलाया गया। हालांकि इस बीच उमा भारती के विरुद्ध भाजपा के भीतर से ही मुहिम चलाई जाने लगी। उनके बाद मुख्यमंत्री बने बाबूलाल गौर ने राजीव गांधी की चलाई तमाम नीतियों को नए नामों से लागू करना शुरु कर दिया।इसमें गोकुल ग्राम योजना भी थी जिसे पूर्ववर्ती दिग्विजय सिंह सरकार की पंचायती राज योजना और उमा भारती की पंच ज अभियान को मिलाकर लागू किया जाना था। ग्यारह महीने की उनकी सरकार की इन योजनाओं का अंत तब हो गया जब स्वर्गीय प्रमोद महाजन ने आगे बढ़कर शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बनवा दिया। जोर जबरदस्ती से किए इस पदारोहण के बाद मध्यप्रदेश में विदेशी कर्ज आधारित योजनाओं को लागू करने का स्वर्णयुग आ गया। सड़कों, बिजली और पानी की योजनाओं के लिए भारी भरकम कर्ज लिए जाने लगे। भारी बहुमत होने के कारण इन योजनाओं को दना दन मंजूरियां भी मिलती गईं। भाजपा को ये बहुमत लगातार तीन कार्यकालों तक मिलता रहा। हर छोटा बड़ा प्रोजेक्ट विदेशी कर्ज लेकर चलाया जाता रहा। बीआरटीएस के लिए भी भोपाल नगर निगम को साढ़े तीन सौ करोड़ रुपए का कर्ज दिलाया गया। इससे शहर को एक सिरे से दूसरे सिरे तक जोडने वाले मुख्य़ मार्ग का चौड़ीकरण भी किया गया और उसके बीच आरक्षित मार्ग भी बनाया गया। सड़क के बीच बनने वाले इस मार्ग का विरोध भी किया गया। कई जगहों पर लोगों को सड़क पार करने के लिए लंबा रास्ता तय करना पड़ता था जिससे लोग सबसे ज्यादा परेशान हुए। इस प्रोजेक्ट में कई अंडरपास,फ्लाईओवर और ओवरहेड पाथ वे भी बनाए जाने थे,बजट की कमी के कारण ये नहीं बनाए जा सके। बैरागढ़ के बाजार में बीआरटीएस से मुख्य मार्ग के व्यापारियों का कारोबार भी प्रभावित हुआ इसकी वजह से वहां छुटपुट विरोध भी पनपा।
बीआरटीएस
की आज भले ही आलोचना की जाती
हो लेकिन मौजूदा परिस्थितियों
में सार्वजनिक परिवहन को
बढ़ाने का इससे अच्छा कोई
दूसरा तरीका नहीं था। कांग्रेस
नीत यूपीए सरकार ने सार्वजनिक
परिवहन को बढ़ाने के लिए ही
जवाहर लाल शहरी नवीनीकरण
परियोजना के तहत लो फ्लोर बसें
चलाई थीं। एक कंपनी बनाकर उसे
कर्ज दिया गया और बसें शुरु
की गईं। इसकी वजह शहरों का
अनियंत्रित विकास था। पूर्ववर्ती
कांग्रेस की सरकारों ने
बहुमंजिला रहवासी प्रोजेक्ट
मंजूर नहीं किये नतीजतन दूरदराज
के खेतों को बिल्डरों ने कालोनी
बनाकर बेचना शुरु कर दिया।
इससे कांग्रेस को चंदा देने
वाले बिल्डर तो मिले लेकिन
शहरों की सीमाएं दूर दूर तक
फैल गईं। इससे शहर के एक कोने
में रहने वाले व्यक्ति को
दूसरे सिरे पर मौजूद अपने
दफ्तर, फैक्टरी
या बाजार तक पहुंचना भारी
मंहगा सौदा साबित होने लगा
था। बीआरटीएस इस समस्या के
समाधान में मील का पत्थर साबित
हुआ। शहर में एंबुलेंस,
फायर बिग्रेड,
वीआईपी मूवमेंट,
सुरक्षित और
त्वरित गति से करने के लिए
बीआरटीएस सफल साबित हुए।
शिवराज सिंह सरकार ने यूपीए
सरकार की तमाम योजनाओं को न
केवल लागू किया बल्कि कर्ज
आधारित विकास के कई नए आयाम
भी गढ़े।
शिवराज
सिंह सरकार ने कर्ज लेकर बांटने
के लिए नई नई योजनाएं शुरु कर
दीं। प्रदेश की आय बढ़ाने में
जुटे वित्तमंत्री राघवजी भाई
को अनैतिकता के मामले में
फंसाने और रास्ते से हटाने
की मुहिम भी इसी का हिस्सा थी
ताकि कर्ज लेने की जरूरत लगातार
बनी रहे। इन योजनाओं से जनता
तो प्रसन्न हुई ही साथ में
शिवराज सिंह के सहयोगी भी
मालामाल हो गए। सड़क निर्माण
करने वाली कंपनी दिलीप बिल्डकान
का टर्नओवर तो अरबों तक पहुंच
गया। कांग्रेस के लिए इस विकास
के मायाजाल को काटना बहुत
मुश्किल हो गया था। सिंहस्थ
के बाद मुख्यमंत्री या सरकार
बदलने की मान्यता का सहारा
लेकर इस बार कांग्रेस इस जाल
को काटने में कामयाब साबित
हुई है। कांग्रेस जानती है
कि विकास नीति के इस स्वरूप
की सबसे बड़ी कीमत दिग्विजय
सिंह सरकार को ही चुकानी पड़ी
थी।
दिग्विजय
सिंह ने व्यापमं कांड और अन्य
प्रयासों से शिवराज सिंह सरकार
पर खूब तंज कसे और उसे अपने
इलाके के विकास कार्य जारी
रखने पर मजबूर किया।इसके
बावजूद वे सत्ता खोने के लिए
कांग्रेस के भीतर खलनायक बने
रहे। शिवराज के मायाजाल को
काटने के लिए उन्होंने पैदल
नर्मदा परिक्रमा कर डाली।
कांग्रेस ने किसानों के बीच
शिवराज सिंह की बढ़ती लोकप्रियता
को काटने के लिए कर्जमाफी का
दांव खेला और शिवराज की ही
शक्ति से उन्हें पराजित कर
डाला।
अब
कमलनाथ सरकार में जब दिग्विजय
सिंह के बेटे जयवर्धन सिंह
केबिनेट मंत्री बन गए हैं तब
दिग्विजय सिंह अपनी पूर्ववर्ती
सरकार का नाश करने वाली विदेशी
कर्ज आधारित परियोजनाओं की
परतें खोलने में जुट गए हैं।
ये योजनाएं भारी भ्रष्टाचार
की वजह भी बनीं थीं। प्रदेश
पर कर्ज का भारी दबाव भी इनकी
वजह से ही बढ़ा है। सरकार को
हर महीने कर्ज के ब्याज के रूप
में अपनी आय का बड़ा हिस्सा
खर्च करना पड़ता है। सातवें
वेतन आयोग की सिफारिशें लागू
हो जाने के बाद सरकार की चुनौतियां
बढ़ी हैं। उसकी आय का बड़ा
हिस्सा तो केवल वेतन भुगतान
पर ही खर्च हो जाता है। बाकी
पैसा ब्याज चुकाने में खर्च
हो जाता है। ऐसे में सरकार उन
योजनाओं की कलई उतारने में
जुट गई है। बैरागढ़ में सिंधियों
के आक्रोश की वजह कई हैं।
बीआरटीएस भी उसमें एक छोटी
वजह है। इसके बावजूद जयवर्धन
सिंह उसे मुद्दा बनाकर बीआरटीएस
खोदने की अपील कर रहे हैं।
हालांकि इसके लिए अब लगभग सौ
करोड़ रुपयों का खर्च आने की
संभावना है। क्योंकि बीआरटीएस
को खोदना फिर उस पूरे ढांचे
को नया रूप देना पड़ेगा जिस
पर सरकार ने कर्ज लिया है।इसके
बावजूद कर्ज ली गई रकम पर ब्याज
तो देना ही पड़ेगा। साथ में
मूलधन भी चुकाना होगा। इसलिए
बीआरटीएस का विरोध एक तरह से
गलती पर गलती ही साबित होने
जा रहा है।
जाहिर है कि नए नवेले मंत्री जयवर्धन सिंह हों या अल्पमत के बीच विरोधी मानसिकता के दलों का सहारा लेकर सत्ता में आई कमलनाथ सरकार इस तरह के विरोधों से वह नए विवादों को ही जन्म दे रही है। वह अंतर्स्फूर्त विकास की नई परिभाषा साकार कर सकती है। उसे प्रदेश के विकास का अवसर मिला है।इस मौके को यदि वो झगड़ों झंझटों के बीच ही गंवा देगी तो ये एक राजनीतिक गलती साबित होगी। सरकार को चाहिए कि वो अपने कामकाज में पारदर्शिता लाए। सरकार के बजट की बारीकियों को सार्वजनिक करे। यदि वो भी विदेशी कर्ज आधारित विकास को लागू करने वाली सरकार है तब तो उसे इस तरह के विवादों को हवा देना आत्महंता कदम साबित होगा। जरूरत इस बात की है कि वो सार्वजनिक परिवहन के इस ढांचे को न केवल स्वीकार करे बल्कि इसे सफल बनाने की कोई जुगत भी निकाले ताकि बीआरटीएस में बसों के फेरे बढ़ाए जा सकें। नियमित अंतराल पर बसों की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके। इससे लोगों को निजी वाहनों से चलने की मजबूरी से निजात मिल सकेगी। उन्हें सस्ता परिवहन उपलब्ध कराया जा सकेगा। जो लोकप्रिय फैसला साबित होगा।
केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री ने दी अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अधिवेशन की जानकारी
भोपाल16 जनवरी,(प्रेस सूचना केन्द्र)। समाज के वंचित तबके को कांग्रेस की सरकारें वोट बैंक समझती रहीं। इसलिए यह तबका आज भी पिछड़ा हुआ है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की सरकार इस वर्ग को सक्षम बनाने और उन्हें उनके मूलभूत अधिकार प्रदान करने का काम कर रही है। यह बात बुधवार को केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री श्रीमती कृष्णा राज ने पत्रकारों से चर्चा करते हुए कही। उन्होंने नागपुर में होने वाले अनुसूचित जाति मोर्चा के दो दिवसीय सम्मेलन की जानकारी भी दी। भाजपा सरकार ने ली वंचितों की सुध केंद्रीय राज्यमंत्री श्रीमती कृष्णा राज ने कहा कि कांग्रेस की सरकारों ने देश पर 70 सालों तक राज किया। इस दौरान ये सरकारें वंचित वर्ग को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करती रही, लेकिन उनकी दयनीय स्थिति को सुधारने के लिए कुछ नहीं किया। 2014 में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनने के बाद सरकार ने इस वर्ग के लिए वास्तविक प्रयास शुरू किए। प्रधानंमत्री श्री मोदी ने डॉ. अम्बेडकर की सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय भावना को मजबूत करने के लिए काम शुरू किया। उन्होंने संसद का विशेष सत्र भी बुलाया और अपने साढ़े चार वर्षों के कार्यकाल में गरीब और वंचित वर्ग को सक्षम बनाने, उनके अधिकार दिलाने के लिए कई योजनाएं शुरू कीं। कांग्रेस वोट लेती रही, नहीं किए प्रयास श्रीमती कृष्णा राज ने कहा कि आजादी के बाद कांग्रेस लंबे समय तक अनुसूचित जाति वर्ग के वोट लेती रही, लेकिन इन सालों में अनुसूचित जाति वर्ग का सामाजिक और आर्थिक उत्थान नगण्य रहा। बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के जीवन से जुड़े पांच स्थानों को पंचतीर्थ का दर्जा देने वाली प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने गरीबों और वंचितों को वास्तविक लाभ पहुंचाने के लिए योजनाएं शुरू कीं। उन्होंने कहा कि सबका साथ-सबका विकास की नीति पर चलने वाली मोदी सरकार ने किसी जातिगत आधार पर योजनाएं भले ही न बनाई हों, लेकिन गरीबों के लिए शुरू की उनकी योजनाओं से लाभान्वित होने वाले लोगों में बड़ी संख्या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों की ही हैं। उन्होंने कहा कि चाहे प्रधानमंत्री आवास योजना हो, उज्जवला योजना हो या आयुष्मान भारत योजना हो, सभी का लाभ हमारे अनुसूचित जाति वर्ग के लोग भरपूर ले रहे हैं। किसानों की समस्याओं का स्थायी हल खोज रही सरकार केन्द्रीय कृषि राज्यमंत्री श्रीमती कृष्णा राज ने कहा कि देश का किसान कर्ज से दबा है। लेकिन कांग्रेस की सरकारें समस्या को समझने की बजाय भटकाने की नीति पर चलती रहीं। उनकी समस्याओं को समझते हुए प्रधानमंत्री श्री मोदी की सरकार ने किसानों के लिए मृदा परीक्षण योजना, प्रधानमंत्री सिंचाई योजना आदि लागू की। इसके अलावा वर्ष 2022 तक देश के किसानों की आय को दोगुना करने की नीति पर चलते हुए मोदी सरकार ने स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट से भी अधिक करते हुए किसानों को उनकी लागत का डेढ़ गुना समर्थन मूल्य दिलाने का काम किया है। श्रीमती राज ने कहा कि हमारी सरकार सबको साथ लेकर देश का निर्माण करने की नीति पर चल रही है। देश में अब वोट बैंक की राजनीति नहीं चलेगी और आने वाले लोकसभा चुनाव में भी प्रचंड बहुमत के साथ प्रधानमंत्री श्री मोदी के नेतृत्व में एनडीए की ही सरकार बनेगी। राष्ट्रीय अधिवेशन में होगी समस्याओं पर चर्चा श्रीमती कृष्णा राज ने कहा कि अनुसूचित जाति वर्ग की समस्याओं और इस वर्ग के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों पर चर्चा के लिए भारतीय जनता पार्टी अनुसूचित जाति मोर्चा का दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन नागपुर में आयोजित किया जा रहा है। 19 और 20 जनवरी को आयोजित किए जा रहे इस अधिवेशन में मोर्चें के प्रदेश पदाधिकारी, कार्यसमिति सदस्य, जिला अध्यक्ष और महामंत्री भाग लेंगे। उन्होंने बताया कि इस अधिवेशन में करीब 10 हजार प्रतिभागियों के भाग लेने की संभावना है। इस दौरान श्रीमती कृष्णा राज के साथ वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मंत्री श्री लालसिंह आर्य एवं अजा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष श्री सूरज केरो, श्री मुकेश टटवाल उपस्थित थे।
संस्कृति मंत्री डाक्टर विजय लक्ष्मी साधौ से मिलने मंत्रालय पहुंचे प्रहलाद सिंह टिपानिया जनकवि कबीर के भजन गायक हैं। प्रह्लाद जी पहले शिक्षक थे। वर्ष2011 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया था। मध्यप्रदेश की साझी विरासत को संवारेगा संस्कृति विभाग
भोपाल,12 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। देश का हृदय प्रदेश कई संस्कृतियों का संगम स्थल है। यहां देश दुनिया की कई विचारधाराएं सामाजिक समरसता स्थापित करती हैं। पिछली सरकार धार्मिक कट्टरता के आधार पर प्रदेश को चलाने का प्रयास करती रही। इसकी वजह से कुछ लोगों ने सरकारी व्यवस्था पर कब्जा जमा लिया था। नई सरकार सभी संस्कृतियों का सम्मान करती है, हम प्रदेश की पहचान भी इसी तरह कायम करेंगे। मैं स्वयं कबीरपंथी हूं,सरकार ने मुझे संस्कृति विभाग का जिम्मा दिया है। पहले भी संस्कृति मंत्री रहते हुए मैं बेहतरीन आयोजनों से प्रदेश का गौरव बढ़ा चुकी हूं। इस बार संस्कृति विभाग जन जन की अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा। ये विचार कमलनाथ सरकार की संस्कृति मंत्री डाक्टर विजय लक्ष्मी साधो ने कार्यभार संभालने के बाद विशेष मुलाकात में कही।
मध्यप्रदेश की संस्कृति, चिकित्सा शिक्षा और आयुष विभाग की मंत्री डाक्टर विजय लक्ष्मी साधौ ने कार्यभार संभालने के बाद विभाग की समीक्षा शुरु की है। संबंधित अधिकारियों से पिछली सरकार के कार्यकाल के दौरान किए गए सांस्कृतिक आयोजनों का ब्यौरा मांगा है। चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि अब तक जो जानकारियां सामने आई हैं उनके आधार पर कहा जा सकता है कि प्रदेश की संस्कृति को संवारने के नाम पर चंद लोगों ने पूरे बजट पर कब्जा कर रखा था। उन्हीं के परिजनों को आयोजनों से जुड़ी जवाबदारियां दी जाती रहीं हैं। हम किसी पंथ परंपरा को थोपे जाने के पक्षधर नहीं हैं। हमारी कोशिश होगी कि मध्यप्रदेश की साझी विरासत को उभारें ताकि देश दुनिया में प्रदेश की पहचान समृद्ध विरासत वाले प्रदेश के रूप में स्थापित हो।
डाक्टर विजय लक्ष्मी साधौ ने बताया कि पूर्ववर्ती दिग्विजय सिंह की जिस सरकार में उन्हें संस्कृति विभाग की जवाबदारी दी गई थी तब मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों एक ही राज्य हुआ करते थे। तब हमने बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को उभारने वाले कई आयोजन किए थे। खजुराहो उत्सव, नदी किनारे होने वाले महेश्वर उत्सव से प्रदेश का मान बढ़ाया था। हमारे दौर में सिंधी, उर्दू अकादमी फल फूल रहीं थीं। विभिन्न संस्कृतियों के बीच मेलजोल बढ़ाने के लिए हम श्रीलंका के कलाकारों को भी आमंत्रित करते थे। अभी सांची के बौद्ध विश्विद्यालय को जानने का अवसर मिला वहां चंद लोगों ने पूरी व्यवस्था को अपने हाथों में कैद कर रखा है। ऐसे माहौल में हमें विभाग को ज्यादा जनोन्मुखी बनाने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी की प्रेरणा से भोपाल में स्थापित भारत भवन का उद्देश्य कला और संस्कृति पर अनुसंधान करके भारत की संस्कृति को समृद्ध बनाना रहा है। उसमें कई अलग अलग विचारधाराओं का हस्तक्षेप भी होता था इसके बावजूद कई मानदंड स्थापित किए गए। आज उसका स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। नई सरकार मध्यप्रदेश की साझी संस्कृतियों का जो गुलदस्ता प्रस्तुत करेगी उससे देश दुनिया में प्रदेश का मान बढ़ेगा।
भोपाल,(डॉ.अजय खेमरिया)। ग्वालियर चंबल संभागों में कुल मिलाकर 34 विधानसभा की सीट्स है इस बार यहां बीजेपी को जबरदस्त नुकसान उठाना पड़ा है 2013 की तुलना में 13 सीट बीजेपी ने गंवा दी बसपा को भी एक सीट का नुकसान हुआ है।मुरैना ओऱ अशोकनगर जिलों में बीजेपी का सफाया हो गया।चुनाव परिणाम के आंकड़ो को अगर खंगाला जाए तो कुछ मोटे कारण निकलकर सामने आते है बीजेपी की इस पराजय के:
(1)एट्रोसिटी एक्ट
(2)खराब प्रत्याशी चयन
(3)बीजेपी का संगठन स्तर पर उदासीनता
(4)चुनाव प्रबन्धन के नाम पर कोई मैकेनिज्म का न होना जैसा 2003,2008,2013 में नजर आता था।
(5)बीजेपी का पहली बार कांग्रेस कल्चर में अवतरित होना जहाँ हर सीट पर बीजेपी ने बीजेपी को हराया।
सबसे पहले बात श्योपुर जिले की जहां बीजेपी के दुर्गालाल विजयवर्गीय बुरी तरह हारे है श्योपूर सीट से यहां कांग्रेस का टिकट सिंधिया जी के विरोध के बाबजूद बसपा से आये बाबू जंडेल मीणा को मिला पहली बार मीणा जाति ने यहां एकजुट होकर वोट किया जो लगभग 45 हजार है संख्या में। कांग्रेस के नेता चाह कर भी बाबू जंडेल का नुकसान नही कर पाये।मीणा के अलावा मुस्लिम और दलित आदिवासी भी कांग्रेस की बम्पर जीत का आधार बनें।इसके अलावा पूरी बीजेपी ने भी दुर्गालाल को निपटाने का काम किया, बीजेपी के लगभग सभी नेता टिकट बदलबाने के लिये अंतिम समय तक लगे रहे लेकिन पार्टी ने टिकट नही बदला परिणाम सामने है।संभव है टिकट बदलने से यहां इतनी बड़ी हार न हो पाती।जिले की दूसरी सीट है विजयपुर यहां जो उलटफेर हुआ वह कतई चौकाने वाला नही है कांग्रेस के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष रामनिवास रावत की हार पहले से ही तय थी वे खुद साल भर पहले ही क्षेत्र छोड़कर सबलगढ में सक्रिय थे लेकिन ऐनवक्त पर उनका टिकट नही बदला गया।रामनिवास रावत की हार उनके ही जमाये सिस्टम ने भी तय कर दी बसपा से लड़े बीजेपी नेता बाबूलाल मेवरा को लेकर चरचा थी वे रामनिवास के सबलगढ़ जाते ही कांग्रेस टिकट पर विजयपुर से लड़ सकते है लेकिन सब कुछ गड़बड़ा गया और बाबूलाल मेवरा हाथी की सवारी कर गए यही एक बड़ा फ़ेक्टर रहा रामनिवास रावत की हार का ।आमने सामने की फाइट में वे लगातार दो बार बीजेपी के सीताराम को हराते आ रहे थे लेकिन इस बार बीजेपी के नाराज वोटर और कार्यकर्ताओं की फ़ौज बाबूलाल के साथ जुट गई और दोनो को विरोधी लॉबी सीताराम को जीता ले गई।रामनिवास के लिये जीवन का सबसे बड़ा सदमा है क्योंकि वे इस सरकार में सिंधिया कोटे से सबसे ताकतवर मंत्री होते महेंद्र सिंह कालूखेड़ा के निधन के बाद रामनिवास ही उनके विकल्प थे लेकिन उनकी हार ने खुद के साथ सिंधिया का गणित भी बिगाड़ दिया।रामनिवास की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1993 की सरकार में वे मंत्री रह चुके है।उनकी हार का बुनियादी कारण 5 बार की एन्टीनकम्बेंसी ही है।
(1)अब मुरैना जिले की चर्चा करें तो सबसे पहली सीट है सबलगढ।
सबलगढ़ में बीजेपी प्रत्याशी चयन में भूल कर गई एक ही परिवार मेहरबान रावत को 30 साल से लगातार टिकट आबंटन नुकसानदेह साबित हुआ।एक ही रावत केंडिडेट होने के बाबजूद बीजेपी का तीसरे नम्बर पर रहना परिवार की खिलाफत का फैक्टर क्रिएट करता है यहां से कांग्रेस ने कुशबाह जाति पर दांव खेला जो सफल साबित हुआ कमलनाथ के प्रभावी भूमिका में होने से सुरेश चौधरी परिवार की नाराजगी भी कम हो गई सवर्ण खासकर ब्राह्मण,वैश्य,ठाकुर शुरू से ही मेहरबान रावत के विरुद्ध थे पहले उन्होंने बसपा को सपोर्ट किया फिर कुछ लोग कांग्रेस के पक्ष में आये नतीजतन बीजेपी के साथ केवल रावत और अन्य परम्परागत कैडर वोट रह गए यहां जादोन्न ठाकुरों,ब्राह्मण,और वैश्य वर्ग ने बीजेपी को अपना समर्थन नही दिया।एट्रोसिटी से ज्यादा रिएक्शन रावत परिवार के विरुद्ध था पार्टी अगर यहाँ बीरसिंह रावत,कमल रावत,या बादशाह रावत को टिकट देती तो शायद ये परिणाम नही आता ।बीजेपी के जिलाध्यक्ष खुद यहां से दावेदार थे।सीपी शर्मा,विनोद जादोन्न जैसे नेता मैनेज किये जा सकते थे पर संगठन सिर्फ नाम का नजर आया।पिछला चुनाव मेहरबान सिंह ये कहकर जीते थे कि ये उनका अंतिम चुनाव है इसके बाबजूद पार्टी ने बदलाब की जगह इसी परिवार को टिकट देकर रावत समाज मे भी अपना बेस गंवा दिया।
(2)जिले की दूसरी सीट है जोरा।पहली बार बीजेपी के सूबेदार सिंह रजौधा जीते थे यहाँ2013 में उनकी हार हुई है इसके बाबजूद इस सीट पर बीजेपी के पास रजौधा का कोई विकल्प नही था पिछले चुनाव में उन्हें जिन त्यागी ब्राह्मणो ने खुलकर सहयोग किया था वे इस बार बनबारी शर्मा के साथ हो गए जो 2013 में नजदीकी मुकाबले में हार गए थे इसके अलावा किरार वोटर का एकमुश्त बसपा के मनीराम के साथ जाना भी यहॉ बीजेपी के लिये नुकसान कर गया।कैलारस और जोरा के व्यापारी वर्ग में भी बीजेपी का वोट कट गया ,कुशवाह वोट सबलगढ़ के कुशबाह के चलते कांग्रेस की तरफ गया इस तरह बीजेपी के रजौधा बाहर हो गए।
(3)मुरैना की सीट पर मंत्री रुस्तम सिंह की हार पर किसी को आश्चर्य नही है मुरैना में दीवार पर मोटे हरूफ में लिखी इस हार को अनपढ भी पढ़ रहा था पर बीजेपी ने जानकर भी क्यों नही पढा ?ये समझ से परे है।ब्राह्मण, वैश्य दोनो समाज निजी रूप से रुस्तम सिंह के खिलाफ थी अगर रुस्तम सिंह की जगह हमीर पटेल या अनिल गोयल बीजेपी केंडिडेट होते तो मामला उलट सकता था यहां सबसे बड़ा फैक्टर रुस्तम सिंह ही थे ।
(4)सुमावली की सीट पर बीजेपी के पास अजब सिंह कुशवाह के अलावा कोई अच्छा विकल्प नही था उन्होंने टक्कर भी ठीक दी लेकिन किरार और ब्राह्मण वोटर बीजेपी को उस अनुपात में नही मिला जितना जीत के लिये आवश्यक था किसानों की कर्जमाफी यहां एक फैक्टर रही है।दलित वोट भी बड़ी संख्या में बसपा से कटकर कांग्रेस की तरफ चला गया।
(5)अंबाह में बीजेपी को सीधा नुकसान ब्राह्मण और ठाकुर बिरादरी ने पहुचाया इन्ही ने नेहा किन्नर को लड़ाया एट्रोसिटी का यहाँ ज्यादा असर था फिर व्यापारी वर्ग ने भी अंबाह पोरसा में बीजेपी का साथ नही दिया।
(6)दिमनी में कांग्रेस का केंडिडेट बहुत एक्टिव था उसे सभी वर्गों का समर्थन मिला है बीजेपी यहां भी केंडिडेट के मामले में चूक कर गई अगर ब्राह्मण चेहरे या फिर केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर के बेटे को लड़ाया जाता तो परिणाम बदल सकता था यहाँ तोमर ठाकुरों ने भी इस बार बीजेपी का विरोध किया है।एट्रोसिटी यहां भी एक बड़ा फैक्टर रहा है।
*मुरैना जिले में बीजेपी की इस पराजय का मूल कारण है दो बड़ी जातियों की नाराजगी ब्राह्मण और वैश्य। 2013 और 2018 में बीजेपी ने किसी भी ब्राह्मण को टिकट नही दी जबकि काँग्रेस ने इस बार 6 मे से 2 सीटों पर ब्राह्मणो को उतारा।वैश्य जाति में केएस के मालिक रमेश गर्ग की नाराजगी ने मुरैना,अंबाह,सबलगढ़ ओऱ जोरा सीटों पर खेल खराब कर दिया।बीजेपी का संगठन पूरे चुनाव में तमाशबीन नजर आया भगवान और केंडिडेट भरोसे हुए सभी जगह चुनाव।गुर्जर तो बीजेपी के परम्परागत रूप से यहां विरोधी थे ही।साथ ही बसपा का कोर वोटर पूरे जिले में कांग्रेस की तरफ ट्रांसफर हुआ और 2 अप्रेल की घटना के बाद सबसे ज्यादा पुलिस केस और जेल इस जिले में ब्राह्मण,वैश्य,ठाकुरों ने ही झेले थे इन सभी सम्मिलित कारणों ने जिले से बीजेपी के सफाये की पटकथा लिख दी थी।
……………….भिण्ड……………. .
(1)भिण्ड की पराजय अप्रत्याशित नही है जिस तरह से अंतिम समय मे यहां टिकट फाइनल किया गया वह हार का कारण साबित हुआ बसपा प्रत्याशी संजू कुशबाह 5 साल से सक्रिय थे विधायक नरेंद्र कुशबाह के बागी होने,कांग्रेस के ब्राह्मण केंडिडेट आने से भिण्ड का पूरा गणित ही बीजेपी के खिलाफ हो गया था।90 फीसदी संगठन नरेंद्र कुशबाह के साथ था जो सिर्फ बीजेपी को हराने के लिये मैदान में थे।कांग्रेस की ठाकुर लॉबी ने भी चौधरी साब को हराने के लिये मेहनत की ।खुद चौधरी अपना पारिवारिक वजूद बरकरार नही रख पाए।भिण्ड की सीट पर चंबल में अकेली सीट थी जहां बसपा का वोट उसके साथ मजबूती से जुड़ा रहा।
(2)अटेर की सीट पर बीजेपी के अरविंद भदौरिया इस बार जीतने में इसलिये सफल रहे क्योंकि यहां कांग्रेस और ब्राह्मण लॉबी में हेमन्त कटारे की जमकर खिलाफत की वहीँ भदौरिया बैल्ट में 2013 और उपचुनाव की तरह भीतरघात नही हो पाया,भाजपा के बड़े नेताओं की कम से कम भदौरिया ठाकुरों ने नही सुनी इसके अलावा हेमन्त का लगातार क्षेत्र से गायब रहना, उनका खराब व्यवहार भी उनकी हार का आधार बना है।
(3)मेहगांव की सीट पर ओपीएस भदौरिया की जीत पहले से ही तय थी पिछली बार वे नजदीकी मुकाबले में हारे थे बीजेपी ने यहां भी केंडिडेट चयन में चूक की अच्छा होता यहाँ केपीएस भदौरिया को टिकट दी जाती वे अपने धनबल से भदौरिया वोटर्स में डिवीजन करा लेते बल्कि अन्य समाज का वोट भी ले सकते थे।राकेश शुक्ला इस मल्टी कास्ट सीट पर पहले दिन से ही फिट नही थे बसपा ने कौशल तिवारी को टिकट देकर उनकी सँभाबना और कमजोर कर दी। लोधी बघेल गुर्जर जैसी जातियों का समर्थन बीजेपी को नही मिला।राकेश शुक्ला 2013 में निर्दलीय लड़े थे उन्हें इसके बाबजूद बीजेपी टिकट देना गलत निर्णय साबित हुआ।
(4)गोहद में भी केंडिडेट का सिलेक्शन गलत साबित हुआ चुनाव पूर्व एट्रोसिटी का सबसे ज्यादा हल्ला इसी सीट पर था कोई भी लाल सिंह आर्य की जीत की बात स्वीकार्य करने तैयार नही था।यहां विशुद रूप से एट्रोसिटी और माई के लाल फैक्टर ने बीजेपी को हराया है।
(5)लहार की सीट पर डॉ गोविंद सिंह की जीत पहले से ही तय थी उनका जीवंत सम्पर्क इसका आधार है बीजेपी के रसाल सिंह अच्छे केंडिडेट थे लेकिन गुड्डू शर्मा ने बगाबत कर बीजेपी की सँभाबना को खत्म कर दिया गुड्डू शर्मा की बगाबत गोविंद सिंह को जिताने के लिये ही थी जिसे आसानी से हर कोई समझ रहा था।
भिण्ड जिले में ऐसा पहली बार हुआ है जब कोई ब्राह्मण विधायक चुनकर नही आया है।बीजेपी के दोनों केंडिडेट राकेश शुक्ला और राकेश चौधरी दोनो हार गए और रमेश दुबे को जिस काम के लिये टिकट दी गई थी उसे उन्होंने भी पूरा कर दिया। इसी तरह मुरैना जिले में भी पहली बार हुआ है जब कोई ठाकुर विधानसभा नही पहुँचा है।
भिण्ड-मुरैना में बीजेपी की हार एट्रोसिटी, माई के लाल,खराब केन्डिडेचर के चलते हुई है।मुरैना में ब्राह्मण,वैश्य,ठाकुर,जाटव गुर्जर,किरार, जातियां उसके खिलाफ रही है।
भिण्ड में ठाकुर,वैश्य,जाटव,ब्राह्मणो के अलावा बघेल,लोधी,कौरव ने भी बीजेपी का साथ नही दिया।सिंधिया का आक्रमक प्रचार और बीजेपी का अतिशय रक्षात्मक रुख भी हार के ठोस कारणों में एक है।
नई दिल्ली,15 दिसंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)।राफेल मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर बड़ा आरोप लगाया है. कांग्रेस पर पीएम मोदी ने पलटवार करते हुए कहा कि वो पैसा बनाने का रास्ता खोज रही है. कांग्रेस ने देश के रक्षा क्षेत्र को लूटा है.
पीएम मोदी ने कहा, ‘कांग्रेस ने हमेशा पैसा बनाने का रास्ता खोजा है. कांग्रेस के लिए रक्षा क्षेत्र फंडिंग का स्रोत रहा है.’ उन्होंने कहा कि कांग्रेस के घोटालों से सेनाओं के मनोबल में गिरावट आई. उन्होंने (कांग्रेस) सेनाओं के मनोबल की भी चिंता नहीं की.
उन्होंने ट्वीट कर कहा कि कांग्रेस के राज में यानी 40 और 50 के दशक में जीप घोटाला हुआ. 80 के दशक में बोफोर्स घोटाला हुआ. उन्होंने कांग्रेस राज के घोटालों की लिस्ट को लंबा करते हुए कहा कि उन्हीं की सरकार में अगस्ता और सबमरीन घोटाला हुआ.
पीएम मोदी ने नई दिल्ली से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए तमिलनाडु के भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ संवाद के दौरान कहा, ‘कांग्रेस के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा क्षेत्र या तो तिरस्कृत क्षेत्र या फिर आय का स्रोत है. वे सब (कांग्रेस) इसे धन बनाने का जरिया मानते हैं चाहे इससे हमारे बलों के मनोबल पर ही प्रभाव क्यों न पड़ता हो.’
प्रधानमंत्री ने कहा, ‘हमें अपने बलों पर गर्व है और उन पर विश्वास है.’ राजस्थान में हाल में चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने सेना द्वारा सितंबर 2016 में सीमा पार किए गए सर्जिकल स्ट्राइक पर ‘संदेह व्यक्त करने’ को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की निन्दा की थी.
मोदी ने आरोप लगाया था कि सैन्य अभियान से विपक्ष को खुशी की जगह दुख हुआ. कांग्रेस पर उनका हमला ऐसे समय आया है जब गांधी ने मोदी पर सर्जिकल स्ट्राइक को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने तथा युवाओं को नौकरी देने में विफल रहने का आरोप लगाया.
इधर, बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनिल बलूनी ने कहा कि राफेल पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दूध का दूध और पानी का पानी करने के बाद कांग्रेस और राहुल गांधी एंड कंपनी बौखला गई है. बीजेपी सोमवार को देश में 70 स्थानों पर प्रेस वार्ता के जरिये कांग्रेस द्वारा देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ और सरकार के खिलाफ षड्यंत्र रचने की साजिश को बेनकाब करेगी.