Category: अर्थ संसार

  • खेती में राज्यों की धींगामुश्ती रोकेगी समवर्ती सूची

    खेती में राज्यों की धींगामुश्ती रोकेगी समवर्ती सूची

    सुरिंदर सूद

    किसानों की समस्याओं पर गठित एम एस स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय आयोग (नैशनल कमीशन ऑन फार्मर्स) ने कृषि क्षेत्र को राज्य सूची से स्थानांतरित कर समवर्ती सूची में रखने की सिफारिश की थी। अफसोस की बात है कि इस महत्त्वपूर्ण सिफारिश पर उतना ध्यान नहीं दिया गया है, जितनी जरूरत थी। कृषि विषय अगर समवर्ती सूची में लाया जाता है तो इससे कृषि एवं किसानों से जुड़े मसलों पर केंद्र सरकार अपेक्षाकृत अधिक निर्णायक कदम उठा पाएगी, साथ ही राज्य सरकारों के अधिकारों पर भी कोई खास असर नहीं होगा। फिलहाल केंद्र को उन कृषि विकास एवं किसानों के लिए कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए भी राज्य सरकारों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिनका वित्त पोषण यह स्वयं कर रहा है।

    वास्तव में कृषि क्षेत्र को राज्य सरकार की मर्जी पर छोडऩा भारत सरकार अधिनियम, 1935 की ‘देन’ कही जा सकती है। उस समय इसके पीछे तर्क यह दिया गया था कि चूंकि, कृषि क्षेत्र विशेष पेशा है और मुख्य तौर पर स्थानीय कृषि-पारिस्थितिकी वातावरण और मूल स्थानों पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है, इसलिए प्रांतीय सरकारें इस क्षेत्र की बेहतर देखभाल कर सकती हैं। उन दिनों कृषि कार्य केवल खाद्य जरूरतें पूरी करने के लिए किए होते थे और खाद्यान्न की खरीद-बिक्री सीमित स्तर पर होती थी। किसानों से जुड़ीं समस्याएं भी स्थानीय स्तर तक ही सीमित थीं।

    आधुनिक समय में परिस्थितियां काफी बदल गई हैं। आधुनिक समय में कृषि क्षेत्रीय सीमाओं में बंधा नहीं रह गया है और अब राज्यों के बीच व्यापारिक सौदे इसका हिस्सा बन गए हैं। इतना ही नहीं, कृषि अब अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों खासकर व्यापार, उद्योग और सेवा से भी जुड़ गया है। अब कोई एक राज्य कृषि के संबंध में कोई निर्णय लेता है तो इसका प्रभाव दूसरे राज्यों की कृषि-अर्थव्यवस्था पर भी देखा जाता है। लिहाजा कृषि क्षेत्रों पर राज्यों के बेरोकटोक नियंत्रण से समस्याएं खड़ी हो रही हैं और इनका प्रतिकूल असर पड़ रहा है।

    स्वामीनाथन समिति की पांचवीं और अंतिम रिपोर्ट अक्टूबर 2006 में जारी हुई थी, जिसमें कृषि को समवर्ती सूची में स्थानांतरित करने का प्रस्ताव दिया गया था। रिपोर्ट में इस ओर ध्यान दिलाया गया था कि फसलों का समर्थन मूल्य, संस्थागत साख और कृषि-जिंस कारोबार-घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय- आदि से जुड़े निर्णय केंद्र सरकार द्वारा लिए जाते हैं। कुछ महत्त्वपूर्ण कानून, जिनका कृषि क्षेत्र पर व्यापक असर पड़ा है, संसद ने बनाए हैं, जो केंद्र की देख-रेख में काम करते हैं। पौधे की नस्लों की सुरक्षा एवं किसानों के अधिकार कानून, जैविक विविधता कानून और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून कुछ ऐसे ही उदाहरण हैं। इनके अलावा ग्रामीण ढांचा, सिंचाई एवं अन्य कृषि विकास कार्यक्रमों के लिए ज्यादातर राशि केंद्र ही मुहैया कराता है। आयोग ने कहा, ‘कृषि समवर्ती सूची में आने से किसानों की सेवा और कृषि की संरक्षा केंद्र एवं राज्य दोनों का उत्तरदायित्व बन जाएंगे।’

    कृषि को समवर्ती सूची में लाने की सिफारिश के पीछे कुछ और कारण भी हैं। कुछ राज्य सरकारों के असहयोग करने से किसानों की समस्याएं दूर करने एवं उनकी आय बढ़ाने के लिए शुरू की गईं केंद्र की कुछ योजनाएं अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रही हैं। उदाहरण के लिए फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम किसान) और प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (पीएम आशा) कुछ ऐसी ही योजनाएं हैं, जिनका पूर्ण लाभ नहीं मिल पा रहा है। इतना ही नहीं, कृषि विपणन, जमीन पट्टा, अनुबंध आधारित कृषि आदि से जुड़े कुछ महत्त्वपूर्ण सुधार भी कुछ खास बदलाव नहीं ला पा रहे हैं। एक बार फिर कुछ राज्यों का असहयोग इसके लिए जिम्मेदार रहा है।

    किसानों की आय दोगुनी करने की संभावनाएं तलाशने के लिए गठित दलवाई समिति ने भी कृषि विपणन को समवर्ती सूची में रखने पर जोर दिया है। समिति के अनुसार इससे कृषि मंडियों में व्यापक सुधार, इनकी परिचालन क्षमता में इजाफा और ग्रामीण विपणन तंत्र के विस्तार में केंद्र सरकार को आसानी होगी। दलवाई समिति की रिपोर्ट ने कृषि को समवर्ती सूची में स्थानांतरित करने की दलील और मजबूत कर दी है। इससे पहले भी किसी विषय को एक सूची से दूसरी सूची में डालने के लिए संविधान में संशोधन हो चुके हैं। उदाहरण के लिए 1976 में 42वें संशोधन में वन एवं वन्यजीव सुरक्षा सहित पांच विषय राज्य से निकालकर समवर्ती सूची में डाल दिए गए। विषय की महत्ता और इससे मिलने वाले संभावित लाभों को देखते हुए सभी राजनीतिक दलों को कृषि को राज्य सूची से स्थानांतरित कर समवर्ती सूची में रखने के लिए एक और संविधान संशोधन को समर्थन देना चाहिए। कृषि और किसान दोनों इससे लाभान्वित होंगे।

  • खनन की मंजूरी दे केन्द्रःकमलनाथ

    खनन की मंजूरी दे केन्द्रःकमलनाथ

    प्राइज डेफिसिट योजना के 575.90 करोड़ मांगे
    मुख्यमंत्री कमल नाथ की प्रधानमंत्री से मुलाकात,    

    भोपाल,4 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र) मुख्यमंत्री कमल नाथ ने नई दिल्ली में आज प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की और कृषि एवं खनन से जुड़े मुददों पर विस्तार से चर्चा की।  श्री नाथ ने राज्य की आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिये माइनिंग लीज पाने की पात्रता रखने वाले 27 प्रकरण में जल्द से जल्द निर्णय लेने का अनुरोध किया। श्री कमल नाथ ने प्रधानमंत्री को विस्तार से बताया कि मध्यप्रदेश के करीब 170 आवेदन हैं जो खदान एवं खनिज (विकास एवं नियमन) अधिनियम की धारा 10-ए और 2-बी के अंतर्गत माइनिंग लीज अनुदान पाने की पात्रता रखते हैं। इन प्रस्तावों पर जल्द निर्णय होने से राज्य की आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।

     मुख्यमंत्री ने बताया कि जनवरी 2015 में खदान और खनिज (विकास एवं नियमन) अधिनियम मध्यप्रदेश जैसे राज्य जिला खनिज कोष के नये प्रावधानों का लाभ उठा रहे हैं। साथ ही वे अधोसंरचना के विकास और खनन गतिविधियों से प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के लिये अन्य संकेतकों को सुधारने में भी योगदान दे रहे हैं।

    प्राइज डेफिसिट योजना के 575.90 करोड़ रूपये जारी करने का आग्रह

      मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ ने प्रधानमंत्री का ध्यान तिलहन के लिये प्राइज डेफिसिट भुगतान योजना के क्रियान्वयन लागत की शेष राशि 575.90 करोड़ रूपये शीघ्र जारी करने का आग्रह किया है। उन्होंने प्रधानमंत्री समर्थन मूल्य तय करने के पूर्व के निर्णय को आगे बढाते हुए अभियान के क्रियान्वयन के संबंध में ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि अभियान के माध्यम से किसानों को उनकी उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने के लिये राज्य सरकार प्रतिबद्ध है।

    श्री नाथ ने श्री मोदी को बताया कि मध्यप्रदेश सरकार ने 1951.80 करोड़ रूपये किसानों को भुगतान किये थे जो न्यूनतम समर्थन मूल्य और आदर्श विक्रय मूल्य का अंतर था। उन्होंने कहा कि यदि यह फसल नाफेड द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर उपार्जित होती तो प्रशासनिक लागत और हानि करीब 2800 करोड़ आती।

    मुख्यमंत्री ने लागत में 50 प्रतिशत की भागीदारी भारत सरकार द्वारा करने के निर्णय को देखते हुए शेष 575.90 करोड़ रूपये शीघ्र जारी करवाने का आग्रह किया ।

    सोयाबीन के लिये म.प्र. का  लक्ष्य 26.92 लाख मीट्रिक टन करने का आग्रह

    मुख्यमंत्री ने सोयाबीन के लिये प्राइज डेफिसिट योजना में राज्य के उत्पादन का 40 प्रतिशत यानी 26.92 लाख मीट्रिक टन लक्ष्य तय करने का आग्रह किया है।

    श्री नाथ ने कहा कि प्राइज डेफिसिट योजना की गाइडलाइन में राज्य को दिये लक्ष्य को उत्पादन का 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 40 प्रतिशत करने के तरीके का उल्लेख नहीं किया गया है जबकि यही मूल्य समर्थन योजना की गाइडलाइन में अंकित है। उन्होंने प्राइज डेफिसिट योजना में परिवर्तन करने का आग्रह करते हुए कहा कि इससे उत्पादन के 25 प्रतिशत के लक्ष्य को 40 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकेगा।

  • यूरिया संकट पर मुख्यमंत्री कमलनाथ के उपाय सफल

    यूरिया संकट पर मुख्यमंत्री कमलनाथ के उपाय सफल

    कृषि विकास एवं किसान कल्याण विभाग लगातार कर रहा है समीक्षा

    भोपाल,21 दिसंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)।मुख्यमंत्री कमल नाथ के प्रयासों से प्रदेश में किसानों के लिये रबी सीजन में यूरिया सहित अन्य उर्वरकों की आपूर्ति बढ़ी है। इसके लिये कृषि एवं किसान कल्याण विभाग केन्द्र के रेल और रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय से लगातार सम्पर्क कर रहा है। उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री कमल नाथ ने किसानों की जरूरतों को देखते हुए गुरुवार को मंत्रालय में वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक में यूरिया की उपलब्धता की समीक्षा की थी। प्रदेश को जल्द ही यूरिया की 12 रेक्स मिलेंगी।

    प्रमुख सचिव, कृषि विकास एवं किसान कल्याण डॉ. राजेश राजौरा के अनुसार एनएफएल और चम्बल फर्टिलाइजर अपने प्लांटों से मध्यप्रदेश को तेजी से यूरिया की आपूर्ति करेंगे। नेशनल फर्टिलाइजर लिमिटेड (एनएफएल) का गुना प्लांट मध्यप्रदेश को ही यूरिया की आपूर्ति करने पर तेजी से विचार कर रहा है।

    वर्तमान में ग्वालियर के रेक पाइंट में 2600 मीट्रिक टन यूरिया पहुँच रहा है। इस पाइंट से ग्वालियर, दतिया और मुरैना जिले के किसानों को आपूर्ति होगी। शाजापुर में 3194 मीट्रिक टन, मण्डीदीप में 2700 मीट्रिक टन, हरपालपुर में इफ्को कम्पनी का 3139 मीट्रिक टन यूरिया पहुँच रहा है। इससे छतरपुर जिले के किसानों को यूरिया की आपूर्ति होगी। मण्डीदीप रेक पाइंट में एनएफएल कम्पनी का 3000 मीट्रिक टन, खण्डवा में 3194 मीट्रिक टन, गुना में 3017 मीट्रिक टन, सतना में 2600 मीट्रिक टन यूरिया दो दिनों में पहुँचने वाला है। खण्डवा में 1951 मीट्रिक टन यूरिया आज ही पहुँचा है। इसके वितरण की व्यवस्था के संबंध में कलेक्टर्स को निर्देश दे दिये गये हैं। मण्डीदीप रेक पाइंट में 24 दिसम्बर तक इफ्को का 3194 मीट्रिक टन यूरिया और पहुँचेगा, जिसका वितरण रायसेन, भोपाल और सीहोर जिले के किसानों को किया जायेगा।

    रेल मंत्रालय भी कर रहा है सहयोग

    भारत सरकार के रेल मंत्रालय के एडीशनल मेंबर (ट्रेफिक) श्री अनुराग ने आज प्रदेश के किसान-कल्याण और कृषि विकास विभाग को पत्र लिखकर जानकारी दी है कि उर्वरकों की 9 रैक ट्रांजिट में हैं, जो एक-दो दिन में प्रदेश को प्राप्त हो जायेंगी। पूर्व में देश के बंदरगाहों से डीएपी को ही उठाव करने की प्राथमिकता थी। मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ के प्रयासों के फलस्वरूप अब देशभर के किसानों के लिये यूरिया के रैक्स उठाने के लिये देश के अन्य राज्यों को भी प्राथमिकता दी जा रही है।

  • गांव को बाजार की गुलामी से कैसे मिले आजादी

    गांव को बाजार की गुलामी से कैसे मिले आजादी

    लेखक : प्रभाकर केलकर ,भारतीय किसान संघ

    पिछले महीनो में देश के अनेक राज्यों में किसानों द्वारा अपनी मांगो को लेकर विधानसभा एवं संसद घेराव के मार्च का सिलसिला तेज हुआ है। किसान संगठनो की अलग अलग सभाऐं हो रही है। जिनमें अनेक राजनैतिक दलों के झण्डे एवं नेता भी शामिल होतें है और उत्तेजक भाषणों के साथ ये कार्यक्रम किसी अगली योजना के एलान के साथ समाप्त होते हैं… हर सभाओ में प्रमुख मुद्दे 1.कर्जमाफी 2. पेंशन 3. लाभकारी मूल्य 4.न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) होते हैं ,लेकिन समाधान की पहल नज़र नहीं आती है।

    विगत 30 वर्षो में अनेक सरकारें बनी अनेक योजनाए भी सामने आयी , पूरे देश में किसानों के नाम पर लगभग 3 लाख करोड़ की कर्जमाफी भी हुई लेकिन इन उपायों के वाबजूद किसानों की समस्याऐं समाप्त नही हुई । ये एक कटु सत्य है।

    उपरोक्त समस्याओं के उपाय पर विचार करने से पहले इसका विशलेषण करने का प्रयास करेगें कि देश के संचालन में कौन सी विचारधारा काम करती है। इसके लिये हमें देश व दुनिया में चलने वाली विचारधाराओं पर भी विचार करना होगा।

    सामान्यतः तीन प्रकार की विचारधाराऐं दिखाई पड़ती है-

    1. साम्यवादी विचारधारा

    2. पूंजीवादी विचारधारा

    3. भारत की स्वावलम्बी आत्मनिर्भर समाज की विचारधारा।

    1.साम्यवादी विचारधारा- सबसे पहलें साम्यवादी विचारधारा पर विचार करते है, साम्यवादी विचारधारा के अनुसार ‘‘सर्वहारा की विजय एवं शासन’’ का नारा दिया जाता है। लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं दिखाई देता। अन्त में वहां पर पोलित ब्यूरो एवं एक पार्टी (साम्यवादी विचारधाराओं वाली) का शासन हो जाता है। जिसका उदाहरण चीन एवं रूस आदि देश है।

    समाज को सुखी करने के नाम पर वे किसान , मजदूरों एवं समाज को सरकारी संसाधनों का बांटना एक उपाय मानते है जैसे -कर्जमाफी, पेंशन योजना आदि। इसका परिणाम यह होता है कि समाज या जनता सरकार पर निर्भर होती चली जाती है। वे चाहते भी यहीं हैं कि कोई व्यक्ति स्वतन्त्र विचार करके उनके किसी कार्य में हस्तक्षेप न करे। यदि कोई समूह स्वतन्त्र अभिव्यक्ति का प्रयत्न करता है तो उसे गोलियों से भून दिया जाता है ,जिसका जवलन्त उदाहरण चीन में 70 के दशक में हजारों छात्रों एवं युवाओं को मौत के घाट उतरा गया । रूस में तो ऐसे सेकड़ो उदाहरण है और इसलिये ऊपर से देश शक्तिशाली व अन्दर से वही देश खोखला दिखाई देता है। जनता को स्वतन्त्रता की अभिव्यक्ति के किसी भी प्रकार के अधिकार नहीं होते हैं।

    2. पूंजीवादी विचारधारा – यह व्यवस्था धीरे-धीरे बडे उद्योगपतियों व पॅूजीपतियों द्वारा लोकतान्त्रिक सत्ता का नियन्त्रण करती है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण अमेरिका के साथ-साथ अन्य लोकतांत्रिक देश भी है। अमेरिका के राष्ट्रपति पूॅजीपतियों के इशारों पर चलने के लिये मजबूर हो जाती है। भारत में जब मानसेन्टों बीज कम्पनी को अतिरिक्त दाम घटानें के लिये बाध्य किया और अनेक प्रतिबन्ध लगाये तब मानसेन्टों बीज कम्पनी के द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति को कहने पर उन्होनें भारत पर दबाव बनाकर उन प्रतिबन्धों को तत्काल हटाने के लिये मजबूर किया।यह घटना 2017 मे घटित हुई थी।

    पूंजीवाद का बोध वाक्य है ‘‘सर्वश्रेष्ठ की विजय’’ जिसका अर्थ है जो सबसे ताकतवर है उसका सभी संसाधनों पर अधिकार होगा। आज अमेरिका एवं अन्य अति विकसित देश इसी विचारधारा पर चलते दिखाई दे रहे है इन देशों द्वारा संसार के लगभग 80 प्रतिशत संसाधनों का उपयोग किया जाता है और प्रकृति का अति शोषण होता है ये देश अपनी ऐशोआराम की जिन्दगीं जीने के लिये एवं सुख सुविधाओं के लिये कार्बन एवं अन्य गैंसो का अतिशय उत्सर्जन करते हैं जिससे पूरी पृथ्वी का प्रदूषण खराब हो रहा है। पूंजीवादी व्यवस्था में पिछड़े देशों का शोषण होता है। पूंजीवादी देशों में असहाय, निर्धन व दिव्यांग जनता नारकीय जीवन जीने के लिये बाध्य होती है।

    3.भारतीय प्राचीन अर्थव्यवस्था- 1. जिसके अनुसार एक व्यक्ति कमायेगा , पूरे परिवार को खिलायेगा।

    2.पूंजीपतियों के लिये न्यासी सिद्धांत 3. शासन के लिये धर्म आधारित शासन चलाने की अनिवार्यता।

    1. एक व्यक्ति कमायेगा व दस को खिलायेगा का अर्थ है कि परिवार का मुखिया मेहनत करके कमायेगा व परिवार का पालन-पोषण करेगा।

    2. न्यासी सिद्धांत का अर्थ है पूंजीपति व्यापारी आदि परिवार खर्च के अलावा बचे हुए धन के समाज हित के लिये संरक्षक न्यासी होगें। जिसके उदाहरण है- सेठ , व्यापारी आदि के द्वारा पूरे देश में धर्मशालाऐ, तीर्थ क्षेत्रों का निर्माण व अन्न क्षेत्रों का संचालन आदि किया जाना हैं और हम देखते है कि यह अनादि काल से चला आ रहा है। पूरे विश्व में केवल भारत के अन्दर ही यह अनुठी व्यवस्था है , दुनिया में किसी भी देश में धर्मशाला बनाने का विचार नहीं है ।

    3.शासन/राज्य-राजा राज व्यवस्था, लोकतांत्रिक या गणराज्य मे धर्म यानि कानून के निर्देशों के अनुसार चलाते थें व हैं तथा ये तीनों मिलकर आत्मनिर्भर, स्वावलम्बी समाज का निर्माण करते है। जो वह समाज सरकार पर निर्भर नही होता है। जिससे समाज में स्वतन्त्र विचार पनपनें के लिए योग्य वातावरण बना रहता है। उपरोक्त विचारों की छाया मे वर्तमान किसान व मजदूरों को देखे तो सरकारे , संसाधनों को बांटकर इन वर्गो को परावलम्बी व पंगू बना रही हैं।

    किसानो को आत्मनिर्भर बनाने के लिये हमारी निम्न उपाय हो सकते हैः-

    1.उधोगपति-पूंजीपति , व्यापारि आदि अपने बचे हुए धन का समाज को सामथ्र्यवान बनाने के लिए उपयोग करें। जैसे कमाई के साधन देकर आत्मनिर्भर बनाऐ उदाहरण के लिए- सिलाई मशीन चलाने की ट्रेनिंग देकर उन्हें मशीन प्रदान करना आदि।

    2.सरकारे कर्जमाफी व पेंशन आदि के स्थान पर किसानों को प्रति एकड़ प्रति वर्ष निश्चित प्रोत्साहन राशि प्रदान करे।

    3.अनाज खरीदी के साथ प्रति क्विंटल प्रोत्साहन राशि दें व फसल बीमा के स्थान पर किसान सुरक्षा कोष बनाएं जिसमें से किसानों की फसल हानी होने पर उन्हें तत्काल सहायता प्रदान की जा सके।इस कोष में पेसों की स्थाई व्यवस्था के लिए इस कोष को देश की कृषि उपज मंण्डियों से जोड़ देना चाहिए।

    4.किसानों से कौनसी फसल बोना है, खरीदी की गैरेन्टी के साथ सरकारें अनुबन्ध कर सकती हैं।

    विगत अनेक वर्षो से कृषि वैज्ञानिकों द्वारा अनाज की आत्मनिर्भरता को लेकर देश के पूरे फसल चक्र में परिवर्तन कर दिया गया हैं, ‘‘इसके अन्तर्गत बहु फसली खेती के स्थान पर एक फसली खेती को प्रोत्साहन दिया गया हैं’’। यह प्रणाली किसानों के लिए हानिकारक बन गई हैं। पहले के समय में किसान बारह महिनों में लगभग 24 फसलें लेता था, इस कारण उसके घर मे सर्वदा कुछ ना कुछ अनाज बना रहता था। आज अनेक राज्यों में बरसाती मौसम में केवल सोयाबीन पैदा करते हैं जिसे खाया नही जा सकता हैं।

    कुछ विद्वान लोग किसानों को सोने का भाव, कर्मचारियों के वेतन एवं किसानों की आय की तुलना करते हैं, जबकि कर्मचारी केवल तीन प्रतिशत हैं और सोना बहुत कम लोग खरीद कर रख पाते हैं जैसे- एक कृषि उपज मंण्डी में एक सौ व्यापारी होते हैं और दस हजार किसान वहां अनाज बेचते हैं। स्वाभाविक रूप से व्यापारियों की आय किसानों से अधिक रहेगी और दोनों की तुलना करना उचित नहीं होगा।

    यहां उल्लेखनीय है कि किसानों को भी रासायनिक खाद, रासायनिक दवाई, पेस्टीसाईड, उन्नत बीज, कृषि यन्त्र आदि के लिए बाजारों पर निर्भर रहना पड़ता हैं, जिससे किसानों की खेती की लागत अत्यधिक मात्रा में बढ़ गई हैं। बाजारों पर निर्भर रहकर किसान एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था कभी भी आत्मनिर्भर नहीं हो सकती हैं और ग्रामीण भारत हमेशा गरीबी या आर्थिक तंगी में फॅसा रहेगा। कृषि वैज्ञानिकों को चाहिए कि वे रासायनिकों के उपयोग के स्थान पर किसानों को जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित करें। किसानों को चाहिए कि वे गाय आधारित जैविक खेती एवं पशुपालन के साथ खेती करें। ग्रामीण भारत में जब तक कुटिर एवं लघु उद्योगों को पुनः प्रारम्भ नहीं किया जायेगा तब तक ग्रामीण भारत आत्मनिर्भर, स्वावलम्बी भारत का चित्र नहीं बन सकता हैं।

    “जिस देश का समाज रोजगार के लिए सरकार, उद्योग एवं व्यापारियों पर निर्भर रहता है वह गुलामी की राह चलता हैं। जो समाज स्वरोजगार युक्त स्वाभिमान सम्पन्न जीवन जीता है वह निरन्तर सम्पन्नता में आगे बढ़ता जाता हैं’’ और दुनिया में उसकी साख बढ़ती जाती हैं। वर्तमान में हमारे देश मे ठीक इसका उल्टा होता हुआ दिखाई देता है। 1947 से पूर्व देश गुलाम था ,गाँव आत्मनिर्भर थे। वर्तमान में देश स्वतंत्र है लेकिन गाँव गुलाम हो गया है वह पूरी तरह बाज़ार पर निर्भर हो गया है। इस निर्भरता को कम करने से ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार संभव है।

  • न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी दर्ज़ा देना उचित

    न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी दर्ज़ा देना उचित

    क्या आपको पता है संविधान ने किसान को क्या अधिकार दिए हैं? एमएसपी को कानूनी दर्जा देने से क्या होगा किसानों को फायदा, क्योंकि कोर्ट भी कर चुका है किसानों को संविधानिक अधिकार देने की तरफदारी.. पढ़िए इस लेख में

    शुभम कुमार

    वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने पहले वित्त बजट भाषण में उल्लेख किया था कि केंद्र सरकार 2022 तक किसानों की आय को दोगुनी करने का इरादा रखती है। नीति आयोग ने इसे लेकर 2017 में एक शोध पत्र भी जारी किया था, जिसमें सरकार किसानों की आय वृद्धि के लिए कौन से कदम उठाएगी इसका पूरा ब्यौरा था। सरकार ने फसल बीमा पॉलिसी, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी), मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड, इनपुट प्रबंधन, प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना, प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना, जैसे किसानों के लिए विभिन्न फायदेमंद नीतियां शुरू की हैं। हालांकि, किसानों के लिए सबसे बड़ी बाधा इन नीतियों का गैर-प्रवर्तन या अनुचित कार्यान्वयन रही है। चिंता की बात यह है कि इतने प्रयासों के बाद भी देश के अधिकतर किसानों के लिए खेती करना एक दर्दनाक अनुभव है।

    आर्थिक सर्वेक्षण (2017-18) के अनुसार कृषि क्षेत्र में 2.1% की वृद्धि होने की संभावना है, जबकि औद्योगिक क्षेत्र में 4.4% और सेवा क्षेत्र में 8.3% पर बढ़ने की संभावना है। कृषि क्षेत्र में धीमी विकास दर एक चिंता का विषय है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी-2015-16) के आंकड़ों के मुताबिक कृषि क्षेत्र में 11,370 लोगों ने आत्महत्या की थी। पिछले दो वर्षों से नए आंकड़े जारी नहीं हुए। एनसीआरबी के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि कृषि मजदूरों में आत्महत्या की दर में उछाल आया है, जो की चिंता का विषय है। इसके पीछे मुख्य कारण कृषि गतिविधियों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव है, यानी सूखे या बाढ़ के कारण फसल का बर्बाद होना है। हाल ही में ”कृषि और अन्य ग्रामीण श्रमिकों (संरक्षण और कल्याण) विधेयक, 2018” को राज्य सभा में पेश किया गया है। इस विधेयक का मुख्य लक्ष्य है कृषि और ग्रामीण श्रमिकों को शोषण के खिलाफ सुरक्षात्मक और कल्याणकारी उपाय प्रदान करना।

    1960 के दशक में, हरित क्रांति ने कृषि क्षेत्र में बहुत सकारात्मक प्रभाव डाला और कृषि के आधुनिक तरीकों के साथ फसल उपज में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। हरित क्रांति के बाद सरकार ने सरकार और किसानों को सीधे जोड़ने के लिए एक चैनल स्थापित करने पर काम किया, ताकि किसानों को अपनी फसलों के लिए वाजिब न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल सके। हालांकि, बहुत से इलाकों में किसानों की अभी भी विनियमित थोक बाजारों तक पहुंच नहीं है और इसके कारण वे न्यूनतम समर्थन मूल्य की तुलना से कम दरों पर स्थानीय बाजारों में अपनी फसल बेचते हैं। एक शोध के अनुसार यह पाया गया है कि केवल 9.14% किसान अपनी फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य से अवगत हैं और भारत में केवल 6% किसान अपनी फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य प्राप्त करने में सक्षम हैं, बाकी किसान अपनी फसल को सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य की तुलना से कम कीमत पर बेचते हैं। इसी बिंदु पर ग़ौर करते हुए 2016 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने ‘डॉ गणेश उपाध्याय बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया’ मामले में केंद्र सरकार और राज्य सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी दर्जा प्रदान करने के लिए एक उपयुक्त कानून लाने का सुझाव दिया था। कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) ने भी अपने शोध के उपरांत केंद्र सरकार से सिफ़ारिश की है कि एक क़ानून द्वारा किसानों को अपने उत्पाद को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेचने का कानूनी अधिकार प्रदान करना चाहिए।

    अखिल भारतीय किसान संघ समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) के नेतृत्व में अधिकांश किसान भारत भर में लंबे समय से विरोध कर रहे हैं। किसानों की मुख्य मांग यह रही है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी की जाए और इसे कानूनी दर्ज़ा दिया जाए। हाल ही में दो सांसद, श्री राजू शेट्टी और श्री के. के. रागेश, ने लोक सभा और राज्य सभा में ”किसानों को कृषि वस्तुओं के लिए गारण्टी लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्यों का अधिकार विधेयक, 2018” (विधेयक) पेश किया है। यह विधेयक उत्तराखंड उच्च न्यायलय के फैसले और CACP की सिफारिशों के उपरोक्त सुझावों के साथ समन्वय में है। एआईकेएससीसी द्वारा दलील के अनुसार यह विधेयक किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य को ”कानूनी अधिकार” के रूप में दावा करने और शिकायत निवारण तंत्र भी प्रदान करेगा। विधेयक को कई प्रमुख क्षेत्रीय दलों से व्यापक स्वीकृति और समर्थन मिला है। यह विधेयक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में उपभोक्ताओं के संरक्षण के लिए आवश्यक वस्तुओं अधिनियम, 1955 या उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 जैसे क़ानून बहुत पहले से हैं। लेकिन किसानों के अधिकार और उनके संरक्षण के लिए ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। 2001 में खाद्य और कृषि संगठन सम्मेलन के दौरान खाद्य और कृषि के लिए संयंत्र आनुवांशिक संसाधनों पर अंतर्राष्ट्रीय संधि को मंजूरी दे दी गई थी, जिसके पश्चात भारत ने संयंत्र किस्मों और किसानों के अधिकार अधिनियम, 2001 पारित किया, जिससे प्रजनकों और किसानों के अधिकारों को मान्यता दी गयी। इसी प्रकार न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी अधिकार देना बहुत आवश्यक है क्यों कि कल्पना कीजिये कि भारत के संविधान में अनुच्छेद 32 नहीं होता, मसलन अगर मौलिक अधिकारों का हनन होता और उनके संरक्षण के लिए अगर कोई उपाय नहीं होता तो मौलिक अधिकार अप्रभावी हो जाते। उल्लंघनों के मामले में किसी भी कानूनी सहारे के बिना किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देना संवैधानिक उपचार के अधिकार के बिना संविधान से तुलना की जा सकती है।

    बात अगर किसानों के संवैधानिक अधिकारों की करें तो भारत का संविधान स्पष्ट रूप से किसानों को कोई अधिकार नहीं देता है। परन्तु भारतीय संविधान का भाग IV (अनुच्छेद 36-51) राज्य नीतियों के निर्देशक सिद्धांतों (डीपीएसपी) से संबंधित है, जो राज्य के सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों को दर्शाते हैं। राज्य डीपीएसपी के निर्देशक सिद्धांतों के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक की सामाजिक और आर्थिक स्थिति सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय उपाय करती है। ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे नगर निगम के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया था कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार के अहसास के लिए आजीविका का अधिकार आवश्यक है। उपर्युक्त संवैधानिक प्रावधानों, उच्चतम न्यायालय एवं उत्तराखंड उच्च न्यायालय के फैसले को पढ़ा जाए तो यह साफ़ है की किसानों को अपनी गरिमा की रक्षा के लिए आजीविका के पर्याप्त साधनों को सुरक्षित करने के लिए कुछ कानूनी अधिकार दिया जाना चाहिए, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित है अगर संविधान के अनुच्छेद 38(2) और अनुच्छेद 39(अ) को संयुक्त तौर से पढ़ें तो यह साफ़ हो जाएगा कि राज्य असमानता को खत्म करने और नागरिकों को आजीविका के पर्याप्त साधनों को सुरक्षित करने के अवसर प्रदान करने के लिए आवश्यक उपाय करेगा। उपर्युक्त संवैधानिक प्रावधानों, उच्चतम न्यायालय एवं उत्तराखंड उच्च न्यायालय के फैसले को पढ़ा जाए तो यह साफ़ है की किसानों को अपनी गरिमा की रक्षा के लिए आजीविका के पर्याप्त साधनों को सुरक्षित करने के लिए कुछ कानूनी अधिकार दिया जाना चाहिए, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित है। साथ ही साथ किसानों को शोषण से बचाने के लिए एक सुरक्षा तंत्र प्रदान करने की स्पष्ट आवश्यकता है।

    -लेखक डॉ राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, लखनऊ के छात्र हैं।

  • निजीकरण न किया तो फिर पूंजी खा जाएंगे बैंक

    निजीकरण न किया तो फिर पूंजी खा जाएंगे बैंक

    बैंक इस समय चारों तरफ से घिरे हुए हैं। देश की अर्थव्यवस्था का इंजन सेवा क्षेत्र हो गया है जिसे लोन की जरूरत कम है। बड़े उद्योग सीधे बॉड के माध्यम से पूंजी उठा रहे हैं
    डॉ. भरत झुनझुनवाला

    बैंक इस समय चारों तरफ से घिरे हुए हैं। देश की अर्थव्यवस्था का इंजन सेवा क्षेत्र हो गया है जिसे लोन की जरूरत कम है। बड़े उद्योग सीधे बॉड के माध्यम से पूंजी उठा रहे हैं। छोटे उद्योग पस्त है और इनकी लोन लेने की क्षमता ही नहीं रह गई है।

    विकास दर में गिरावट आने से खपत के लिए कम ही लोन दिए जा रहे हैं। ऊपर से सार्वजनिक बैंकों में कुप्रबंधन एवं भ्रष्टाचार व्याप्त है। इस स्थिति में सरकार को दो कदम उठाने चाहिए। छोटी मैनुफैक्चरिंग एवं सेवा क्षेत्र को ईकाइयों को संरक्षण देना चाहिए।

    मेक इन इंडिया को छोटे उद्योगों की तरफ मोडऩा चाहिए। साथ-साथ सार्वजनिक बैंकों का निजीकरण कर देना चाहिए। इनका डूबना निश्चित है। डूबे इसके पहले इनकी बिक्री कर देना चाहिए जैसे चतुर दुकानदार एक्सपायरी के पहले दवा को बेच देता है।

    सर्वविदित है कि सरकारी बैंकों की हालत खस्ता है। इन्हें पुनजीर्वित करने को सरकार छोटे सार्वजनिक बैंकों का बड़े सार्वजनिक बैंकों के साथ विलय करने पर विचार कर रही है। बड़े बैंकों की कार्यकुशलता अच्छी होने से इनके द्वारा छोटे बैंकों को पुनजीर्वित किया जा सकता है। लेकिन बड़े बैंकों के सामने स्वयं खतरा मंडरा रहा है। वास्तव में देश के बैंकिंग सेक्टर का मूल चरित्र ही बदलता जा रहा है।

    इकानॉमिक ग्रोथ में अब क्रेडिट की भूमिका ही सिकुड़ती जा रही है। वर्ष 2015 में हमारे सम्पूर्ण बैंकिंग सेक्टर द्वारा दिए गए लोन में 10.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। वर्ष 2016 में यह वृद्धि घट कर 5.1 प्रतिशत रह गई है। यानी कुल लोन बढ़ रहे हैं परन्तु बढ़त की गति कम होती जा रही है जैसे कार का एक्सलरेटर हल्का होता जा रहा है। इस स्थिति में स्वाभाविक है कि कमजोर बैंक दबाव में शीघ्र आएंगे जैसे अकाल के समय छोटे किसान पहले प्रभावित होते हैं।

    लोन की मांग कम होने का प्रमुख कारण है कि अर्थव्यवस्था का इंजन सेवा क्षेत्र हो गया है। इस क्षेत्र में साफ्टवेयर, होटल, ट्रांसपोर्ट, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि सेवाएं आती हैं जिनमें किसी भातैक माल जैसे कपड़े अथवा सब्जी का उत्पादन नहीं होता है।

    बीते 5 वर्षों में सेवा क्षेत्र में 51 प्रतिशत की ग्रोथ हुई जबकि मैन्युफैक्चरिंग में 32 प्रतिशत की। ऐतिहासिक तौर पर देखा जाए तो सेवा क्षेत्र का दबदबा बढ़ता जा रहा है। सेवाओं के व्यापार में लोन की जरूरत कम पड़ती है।

    जैसे साफ्टवेयर के निर्माण में 25,000 रुपए के एक कम्प्यूटर से वर्ष में 10-20 लाख रुपए के साफ्टवेयर का उत्पादन किया जा सकता है। अथवा एक कम्प्यूटर से वर्ष में लगभग 3-4 लाख रुपए के आनलाइन ट्यूशन दिए जा सकते हैं।

    तुलना में मैनुफैक्चरिंग में जमीन, फैक्ट्री शेड तथा मशीन में भारी निवेश की जरूरत पड़ती है। इसलिए मैनुफैक्चरिंग सेक्टर के फिसलने के साथ-साथ लोन की मांग कम होती जा रही है। हमारी बैंकिंग व्यवस्था के दबाव में आने का यह प्रमुख कारण दिखता है।

    दूसरा कारण बॉड मार्केट का विस्तार है कंपनियों द्वारा वर्तमान में भारी मात्रा में बॉड जारी किए जा रहे हैं। बॉड जारी करने को कंपनी द्वारा अपनी प्रापर्टी को रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी में गिरवी रखा जाता है।

    गिरवी रखी गई प्रापर्टी के सामने कंपनी द्वारा फुटकर निवेशकों को बॉड जारी किए जाते हैं। किसी विशेष स्थिति में कंपनी अगर डूब गई तो सरकार द्वारा गिरवी प्रापर्टी की नीलामी करके निवेशक को उनकी रकम लौटाने की व्यवस्था रहती है। इससे खुदरा निवेशक सुरक्षित महसूस करते हैं और बॉड खरीदते हैं। इस प्रक्रिया में कंपनी द्वारा ब्याज की सम्पूर्ण रकम निवेशक को मिलती है।

    बैंकों के माध्यम से लोन लेने में भी मूल रूप से यही प्रक्रिया अपनाई जाती है। कंपनी द्वारा अपनी प्रापर्टी को बैंक के पास गिरवी रख दिया जाता है। इस प्रापर्टी के सामने बैंक लोन देता है। कंपनी को लोन देने के लिए बैंक द्वारा खुदरा निवेशकों से फिक्स डिपाजिट में रकम ली जाती है। लोन देने वाले खुदरा निवेशक तथा लोन लेने वाली कंपनी के बीच बैंक बिचौलिए की भूमिका निभाता है।

    जैसे बैंक द्वारा 7 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से खुदरा निवेशक से रकम ली जाती है और 12 प्रतिशत की दर से उसी रकम से कंपनी को लोन दिया जाता है। बॉड तथा बैंक दोनों ही तरह से खुदरा निवेशक द्वारा ही निवेश की गई रकम को कंपनी तक पहुंचाया जाता है। बीते समय में बॉड के मार्केट का विकास हो जाने के कारण कंपनियां बॉड के माध्यम से सीधे खुदरा निवेशक से लोन ज्यादा ले रही हैं।

    कंपनी 10 प्रतिशत की दर से बॉड जारी करती है तो खुदरा निवेशक को 10 प्रतिशत का ब्याज मिलता है। बैंक को कमीशन नहीं मिलता है। बैंकों का धंधा मंद पड़ गया है। बीते 4 वर्षों में कुल लोन में बैंकों का हिस्सा 45 प्रतिशत से घट कर 22 प्रतिशत रह गया है जबकि बॉड का हिस्सा 22 प्रतिशत से बढ़कर 33 प्रतिशत हो गया है। वर्तमान समय में बैंकों के खस्ता हाल होने का यह दूसरा कारण है।

    हमारे सार्वजनिक बैंकों की मूल समस्या प्रबन्धन आदि की नहीं है। मूलरूप से बैंकों की जमीन ही खिसक गई है। सार्वजनिक बैंकों में इसके अतिरिक्त कुप्रबन्धन एवं भ्रष्टाचार की भी समस्या है। छोटे सार्वजनिक बैंकों का बड़े सार्वजनिक बैंकों के विलय से छोटे बैंकों में व्याप्त कुप्रबन्धन की समस्या का कुछ निदान हो सकता है। परन्तु बैंकों की जमीन के खिसकने से उत्पन्न मूल समस्या का समाधान विलय से हासिल नहीं हो सकता है।

    बॉड जारी करने की प्रक्रिया पेचीदी होती है। इसे बड़ी कंपनियों द्वारा ही अपनाया जा सकता है। खुदरा निवेशकों में भरोसा बनाने के लिए भारी एडवर्टाइज़मेंट देने होते हैं एवं रोड शो करने होते हैं। इसलिए छोटी कंपनियों को बैंकों पर ही निर्भर रहना होता है। लेकिन बीते समय में सरकार द्वारा लागू की गई नीतियों ने छोटे उद्योगों को पस्त कर दिया है।

    सरकार का प्रयास है कि मेक इन इंडिया जैसी योजनाओं के तहत बड़े, आधुनिक एवं आटोमेटिक मशीनों का उपयोग करने वाले उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए। फलस्वरूप छोटे उद्योगों को मिल रहा संरक्षण कम हो गया है।

    इसके बाद नोटबंदी के कारण इनके ग्राहक लुप्त हो गए। अब जीएसटी की जटिल व्यवस्था इनके लिए अभिशाप बन गई है। इस कारण छोटे उद्योगों द्वारा लोन कम ही लिए जा रहे हैं। बड़े उद्योग बॉड मार्केट के चलते बैंकों के हाथ से फिसल गए हैं।

    छोटे उद्योग स्वयं मृतप्राय हो रहे हैं। अत: सेवा एवं मैनुफैक्चरिंग दोनों क्षेत्रों में बैंकों का धंधा कमजोर पड़ रहा है। बचता है खपत का क्षेत्र जैसे कार अथवा मकान के लिए दिए गए लोन। यह क्षेत्र अभी भी जीवित हैं। परन्तु देश की आर्थिक विकास दर में गिरावट आने के कारण आम आदमी की क्रय शक्ति घट रही है और यह क्षेत्र भी दबाव में है।

    बैंक इस समय चारों तरफ से घिरे हुए हैं। देश की अर्थव्यवस्था का इंजन सेवा क्षेत्र हो गया है जिसे लोन की जरूरत कम है। बड़े उद्योग सीधे बॉड के माध्यम से पूंजी उठा रहे हैं। छोटे उद्योग पस्त है और इनकी लोन लेने की क्षमता ही नहीं रह गई है।

    विकास दर में गिरावट आने से खपत के लिए कम ही लोन दिए जा रहे हैं। ऊपर से सार्वजनिक बैंकों में कुप्रबंधन एवं भ्रष्टाचार व्याप्त है। इस स्थिति में सरकार को दो कदम उठाने चाहिए। छोटी मैनुफैक्चरिंग एवं सेवा क्षेत्र को ईकाइयों को संरक्षण देना चाहिए।

    मेक इन इंडिया को छोटे उद्योगों की तरफ मोडऩा चाहिए। साथ-साथ सार्वजनिक बैंकों का निजीकरण कर देना चाहिए। इनका डूबना निश्चित है। डूबे इसके पहले इनकी बिक्री कर देना चाहिए जैसे चतुर दुकानदार एक्सपायरी के पहले दवा को बेच देता है।

  • जीएसटी से मिली विकास की गारंटी

    जीएसटी से मिली विकास की गारंटी

    – भरतचन्द्र नायक
    गत सप्ताह जीएसटी परिषद ने अठासी वस्तुओं और सेवाओं पर टेक्स के रेट में कटौती कर घरेलु उपभोक्ता उत्पाद के मूल्य में सात आठ प्रतिशत तक उपभोक्ताओं राहत पहुंचाने का अपना मंतव्य जाहिर कर दिया है। इन वस्तुओं और सेवाओं पर 28 प्रतिशत जीएसटी था जिसे घटाकर 18 प्रतिशत और 12 प्रतिशत तक कर दिया है। टेक्स की दरों में कमी का लाभ उपभोक्ता को मिले इसमें दो राय नहीं है, लेकिन इसमें भी अगर मगर लगाकर उत्पादक राहत से उपभोक्ताओं को वंचित कर देते हैं। हांलाकि ऐसी दशा में समस्या से निपटने के लिए भी केंद्र सरकार ने मुनाफा विरोधी प्राधिकरण एन्टी प्राफिटियरिंग निकाय की व्यवस्था की है और उसने पिछले अवसर पर टेक्स घटने पर उत्पाद को और वितरकों को आगाह भी किया था। उसने पुराने एमआरपी पर संशोधित एमआरपी रेपर पर लिखकर घटे हुए टेक्स लाभ ग्राहकों को पहुंचाने को कहा था, लेकिन सामान्य तह ऐसी राहत महसूस नहीं की गई। टेक्स में राहत दिये जाने से केंद्र सरकार पर 70 हजार करोड़ रू. का बोझ पड़ा है। केंद्र सरकार ने 14 प्रतिशत राजस्व नहीं बढ़ने पर राज्यों को पांच साल की भरपाई का भरोसा दिया है। अच्छा है कि इस बार कुछ उत्पादकों ने स्वयं स्फूर्त होकर घरेलु उपभोक्ता वस्तुओं पर टेक्स घटती का लाभ उपभोक्ता को देने की घोषणा की है। ऐसा करने वालों में गोदरेज, एलजी इंडिया, पेनासोनिक इंडिया, जैसे संस्थान अग्रणी हैं। उद्योग जगत की इस सदस्यता का दूसरे उत्पादकों को अनुकरण कर समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व बोध दिखाना चाहिए। इसके साथ इन संस्थानों ने केंद्र से अपेक्षा की है कि विदेशों से आयात किये जाने वाले घरेलु सामान एप्लाएंसज पर लगने वाला आयात शुल्क बढ़ाया जाए। इसे बढ़ाकर घरेलु उद्योगों को केंद्र सरकार प्रोत्साहित करें। ऐसे समय जब विकसित देश संरक्षणवाद का सहारा ले रहे हैं भारत सरकार को भी देशी उद्योगों की आकांक्षा के अनुरूप आयात नीति में संशोधन करके उद्योगों को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है।

    जीएसटी को आरंभ हुए एक साल हो चुका है। जीएसटी राजस्व संग्रह में धीरे-धरे स्थिरता परिलक्षित हो रही है। औसतन यह राजस्व संग्रह 95 हजार करोड़ तक पहुंच चुका है। जनता अपेक्षा करती है कि अमुक वस्तु पर टेक्स कम हो। इसके अनुरूप जीएसटी परिषद विचार भी करती है। जब टेक्स में कटौती की जाती है तो सियासत शुरू हो जाती है। लेकिन असलियत यह है कि टेक्स कटौती को सियासी हथकंडा नहीं कहा जा सकता। क्यांेकि इसका दारोमदार जीएसटी परिषद पर है, जिसमें राज्यों की भी केंद्र के साथ भागीदारी है। जीएसटी परिषद वास्तव में भारतीय संघवाद का सबसे बड़ा प्रतीक है। जिसने जीएसटी को अल्प समय में पटरी पर लाकर जनता और उत्पादकों को कमोवेश सत्रह बेरियरों की बेड़ी से मुक्ति दिला दी है। परिवहन की रफ्तार बढ़ा दी है। इन डेढ़ दर्जन टेक्सों के बदले में जीएसटी जैसा एकीकृत टेक्स लगा है जिसकी प्रक्रिया को लेकर हौआ खड़ा किया जा रहा था, लेकिन परिषद ने नियमों का सरलीकरण करके इसे सुगम, सरल और आसान बना दिया है। फिर जो डेढ़ दर्जन टेक्स समाप्त हुए हैं वे मिलाकर बत्तीस प्रतिशत होते थे। जबकि जीएसटी की सबसे अधिक दर 28 प्रतिशत है।

    जीएसटी को लेकर राजनैतिक दलों को शिकायत है और वे एक ही स्लेव में सभी वस्तुओं और सेवाओं को शामिल करना चाहते हैं जो न तो उचित है और न संभव है। इस लिए जीएसटी को लेकर उद्योग जगत और उपभोक्ताओं में फैलाये जा रहे भ्रम से बचा जाना चाहिए। आखिर तीन दशकों के विचार विमर्ष के बाद ही 1 जुलाई 2017 से जीएसटी अमल में आया है। राज्यों की शिकायत दूर करते हुए मोदी सरकार ने आने वाले 5 वर्षों तक राज्यों को क्षतिपूर्ति करने का भरोसा दिलाया है और इस आश्वासन पर अमल भी शुरू हो गया है। दरअसल यूीपए सरकार के दौरान तो कांग्रेस ने राज्यों को क्षतिपूर्ति देना असंभव बताकर हाथ खीच लिऐ थे। इसलिए कांग्रेस को तो जीएसटी प्रणाली में मीनमेख निकालने का नैतिक अधिकार नहीं है।
    जीएसटी टेक्स निर्धारण के लिए पांच श्रेणियां मौजूदा है। माना जा रहा है कि इतनी अधिक श्रेणियों जब कभी भटकाव पैदा करती है। इसका उपाय खोजने के बारे में परिषद में गहन विचार विमर्ष बताता है कि आने वाले दिनों में पांच श्रेणियों की जगह तीन स्लेव शेष रहेंगे, लेकिन इसमें जल्दवाजी नहीं की जा सकती क्योंकि इससे राज्यों को मिलने वला राजस्व जुड़ा है, राज्यों की आम सहमति आवश्यक होगी। पूर्व वित्तमंत्री श्री पी. चिदंबरम जो यूपीए सरकार में प्रभावशाली मंत्री रहे। जीएसटी के अमल के असमर्थ रहे हैं अब आपत्ति इस बात पर कह रहे हैं कि जिन 88 वस्तु सेवाओं पर टेक्स घटाया गया। वह 2017 में भी घटाया जाना संभव था। अब इसका सटीक उत्तर तो यही हो सकता है कि टेक्स कम करने अथवा बढ़ाने में किसी विशेष राजनैतिक दल अथवा जैसा चिदम्बरम का आरोप है, अकेली भाजपा ही उत्तरदायी नहीं है। परिषद में प्रतिनिधित्व करने वाले राज्यों का पूरा हस्तक्षेप है और सहमति से ही फैसला लिया जाता है। इसलिए जनता बीच में भाजपा को लाना बेमानी है। अर्थशास्त्री ही नहीं समाज शास्त्री और आमजन जनता है कि सरकारों का संचालन टेक्स कराधान और उसके संग्रह पर निर्भर रहता है। इसलिए सीधी सी बात है कि जीएसटी कराधान की शुरूआत ही इस सोच के साथ हुई कि इससे राज्यों और केंद्र को आर्थिक क्षति न पहुंचने पाये। जैसे-जैसे जीएसटी कराधान में स्थिरता आती गई। सोच विचार के साथ वस्तु और सेवा पर लगने वाले टेक्स पर रियायत देने पर परिषद ने विचार आरंभ किया और यह सिलसिला जारी रहेगा। एक वर्ष में 384 वस्तुओं पर से टेक्स कम किया गया है। अब चूंकि जीएसटी का कर संग्रह 95 हजार करोड़ रू. तक औसतन पहुंच गया है। जीएसटी करों में राहत देने पर परिषद विचार करने में सक्षम होगी। इससे उपभोक्ता वस्तुओं के दामों में कमी आना निश्चित है। इससे मुद्रास्फीति भी घटेगी। राज्यों की क्षतिपूर्ति करने में श्री नरेंद्र मोदी सरकार की सदाशयता प्रशंसनीय कही जाएगी। क्योंकि यूपीए सरकार में जब सेंट्रल सेल्स टेक्स तीन से दो प्रतिशत किया था। डाॅ. मनमोहन सिंह सरकार ने राज्यों को वायदा किया था कि राज्यों के नुकसान की केंद्र भरपाई करेगा। परंतु यूपीए सरकार वायदे से मुकर गई और उसने 2011-12 की क्षतिपूर्ति कभी नहीं की।

    मजे की बात है कि अब जनता जीएसटी को मूल्य स्थिरता का माध्यम मानने लगी है। यही कारण है कि पेट्रोलियम उत्पादों की अस्थिर कीमतों से चिन्तित उपभोक्ता डीजल, पेट्रोल को भी जीएसटी के नेट में लाने की मांग करने लगे हैं। उपभोक्ताओं का मानना है कि यदि डीजल पेट्रोल जीएसटी कराधान के अंतर्गत लाया गया तो वास्तव में उपभोक्ता अच्छे दिनों का अहसास जरूर करेंगे। यह भी धारणा बनाई जा रही है कि दरों में कमी चुनावी आहट को सुनकर हो रही है और व्यापरी घरानों की आकांक्षा पूरी की जा रही है लेकिन वास्तव में यह सोच सियासत का बदरूप चेहरा है। जीएसटी जैसे ऐतिहासिक आर्थिक क्रांतिकारी सुधार को चुनावी नजरिये से देखना कतई उचित नहीं है।

  • गरीब को सेठ बनाने की दिशा में बड़ा कदम रही नोटबंदी

    गरीब को सेठ बनाने की दिशा में बड़ा कदम रही नोटबंदी

    भोपाल,12 जून(पीआईसी)। सत्ता के गलियारों में उद्योगपतियों को इंतजार करते देखने का दौर अब बीत चला है। मोदी सरकार ने नोटबंदी करके समानांतर अर्थव्यवस्था पर जो चोट की है उसके चलते अब उद्योगपतियों को सत्ताधीशों के दरवाजे हाजिरी देना जरूरी नहीं रहा है। नतीजा ये है कि आर्थिक विकास में लगे कार्पोरेट घटाने आसानी से अपना कारोबार बढ़ा रहे हैं। छोटे स्तर पर जिन समूहों ने नोटबंदी के बाद जीएसटी की व्यवस्था को समझ लिया था उन्होंने भी अपने कारोबार में सुधार किया है। नतीजतन देश अर्थव्यवस्था में तेजी आई है।

    वित्तमंत्री अरुण जेटली का विश्वास है कि यदि आप देश के लिए पैसा बना रहे हैं तो आपको हमारे दरवाजे पर सिर झुकाने की जरूरत नहीं है। नियमों में बदलाव की इस नई परंपरा से शेयर बाजार तेजी की ओर अग्रसर हो रहा है। जीएसटी को लागू करने और आर्थिक सुधारों को लागू करने की दिशा में देश के औद्योगिक घराने सरकार के साथ इसलिए खड़े नजर आ रहे हैं क्योंकि इससे उनके संसाधनों की बर्बादी रुकी है। वित्तीय प्रबंधन के छिद्र बंद हुए हैं, जिससे मुनाफे की बर्बादी रुकी है।

    चार साल पहले अर्थव्यवस्था कमजोर रुपए, छीजते विदेशी मुद्रा भंडार, राजकोषीय और चालू खाते के ऊंचे घाटे और दहाई में महंगाई से जद्दोजहद कर रही थी.इस बार2018 में वृहत अर्थव्यवस्था के संकेतकों में खासा सुधार आया है—क्रिसिल के एक विश्लेषण के मुताबिक, खुदरा कीमतों की महंगाई 2015-2018 में औसतन 4.7 फीसदी रही है, जबकि इससे पहले के पांच साल में यह औसतन 10.2 फीसदी रही थी; चालू खाते का घाटा बीते चार साल में घटकर आधा रह गया है और विदेशी मुद्रा भंडार में अच्छा-खासा इजाफा हुआ है. रुपए का अवमूल्यन पहले के पांच साल के 5.5 फीसदी के मुकाबले घटकर 1.7 फीसदी पर आ गया है.

    जीएसटी और दिवालिया तथा शोधन अक्षमता संहिता (आइबीसी) जैसे सुधार कारोबार करने के उसूलों में आमूलचूल बदलाव लाने का भरोसा बंधा रहे हैं. आइबीसी ने असरदार ढंग से बता दिया है कि कर्ज लेकर उसे न चुकाने का बेलगाम और बेशर्म तरीका अब और काम नहीं आएगा.

    सरकार ने कर अनुपालन को बढ़ाने और नोटबंदी के साथ आमदनी की घोषणा योजना के जरिए और ज्यादा लोगों को औपचारिक अर्थव्यवस्था के दायरे में लाने की एकजुट कोशिशें की हैं. जिससे प्रत्यक्ष करों की वसूली में तेज बढ़ोतरी हुई है, बावजूद इसके कि जीडीपी की ग्रोथ पिछले दो वित्तीय साल में धीमी पड़ी है. शुरुआती गड़बडिय़ों के बावजूद हिंदुस्तान के अप्रत्यक्ष कर आधार में जीएसटी के लागू होने के बाद 50 फीसदी से ज्यादा का इजाफा हुआ है.

    कर और जीडीपी का अनुपात 2014 के वित्तीय साल के 5.7 फीसदी से बढ़कर 2018 के वित्तीय साल में 6 फीसदी पर पहुंच गया. प्रत्यक्ष कर संग्रह वित्तीय साल 2016 के 0.6 फीसदी से बढ़कर 2018 के वित्तीय साल में 1.9 फीसदी पर पहुंच गया.

    हालांकि नोटबंदी के अंतिम नतीजों पर अभी फैसला होना बाकी है और कुछ अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि इससे जीडीपी की ग्रोथ में 1-2 फीसदी की सेंध लग सकती है, पर इसका असर प्रत्यक्ष कर (खासकर आयकर) के बढ़े हुए अनुपालन में साफ दिखाई देता है.

    इसके बावजूद देखा जा रहा है कि नौकरियां 7.4 फीसदी की वृद्धि दर के साथ कदमताल करते हुए नहीं बढ़ी हैं और कारोबार करने में आसानी की फेहरिस्त में हिंदुस्तान की ऊंची छलांग के बाद भी निजी निवेश परवान नहीं चढ़ सके हैं.

    सामान्य मॉनसून और बंपर फसल के बावजूद 2018 में ग्रामीण अर्थव्यवस्था मुश्किलों से घिरी रही. कृषि की असल जीडीपी ग्रोथ वित्तीय साल 2010-14 के 4.3 फीसदी से तकरीबन आधी घटकर 2015-18 के वित्तीय साल में 2.4 फीसदी पर आ गई. बड़ी तादाद में नौकरियां देने वाले निर्माण क्षेत्र को नोटबंदी और जीएसटी की मार सहनी पड़ी है.

    ईंधन की बढ़ती कीमतों ने एक बार फिर अर्थव्यवस्था के सामने चुनौतियां खड़ी कर दीं हैं। इससे चालू खाते के घाटे पर सीधा असर पड़ेगा और यह महंगाई की आग में घी का काम कर सकती है. पेट्रोल-डीजल के दाम ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच रहे हैं और ऐसे में खुदरा तेल पर केंद्र और राज्य सरकारों के शुल्कों को कम करने की मांग तेज हो रही है.

    अगले साल सरकार को चुनाव की चुनौती से जूझना है। इस बीच कई राज्यों के बीच भी चुनाव की तैयारियां शुरु हो चुकी हैं। जाहिर है कि सरकार को जीएसटी और नोटबंदी जैसे मुद्दों पर जनता के बीच सभी तथ्य सिलसिलेबार रखने होंगे उसे बताना होगा कि किस तरह नोटबंदी करके देश ने एक बड़ा लक्ष्य हासिल किया है तभी वो जनता की नाराजगी से बच पाएगी।

  • किसानों तक पहुंच गया देश का कृषि बाजार

    किसानों तक पहुंच गया देश का कृषि बाजार

    राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना से जुड़ीं मध्यप्रदेश की 58 कृषि उपज मण्डियाँ

    भोपाल,4 जून(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।देश के अन्नदाता का सोना बिचौलियों के हाथों पड़ने के कारण अब तक खेती किसानी का जीवन एक अबूझ पहेली बना हुआ है। शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने इस दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए अब सभी कृषि उपज मंडियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार से जोड़ दिया है। कृषि बाजार (ई-नाम) एक पैन-इण्डिया इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल है। यह कृषि उपजों के लिये एकीकृत राष्ट्रीय बाजार का निर्माण करने का सशक्त माध्यम है। कृषि उपज मण्डी से संबंधित सभी सूचनाओं और सेवाओं के लिये यह ई-नाम पोर्टल सिंगल विण्डो सेवा प्रदान कर रहा है। इस पोर्टल में उपज के आगमन और कीमतों तथा उपज को खरीदने और बेचने के व्यापारिक प्रस्तावों के प्रावधान को शामिल किया गया है। प्रदेश में ई-नाम पोर्टल के माध्यम से अभी तक 58 कृषि उपज मण्डियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार से जोड़ा जा चुका है।

    http://www.enam.gov.in/NAM/home/index.html

    इस अभिनव पहल से प्रदेश की 58 कृषि उपज मण्डियाँ राष्ट्रीय कृषि बाजार से जुड़ गईं हैं। 13 कपास मण्डियों को भी राष्ट्रीय कृषि बाजार से जोड़ा जा रहा है।ई-नाम पोर्टल पर 49 लाख क्विंटल कृषि जिन्सों का व्यापार भी हो चुका है।

    प्रदेश में ई-नाम पोर्टल की शुरूआत भोपाल की पण्डित लक्ष्मीनारायण शर्मा कृषि उपज मण्डी करोंद से की गई। योजना के पहले चरण में प्रदेश की 19 चयनित कृषि उपज मण्डियों को इस पोर्टल से जोड़ा गया। ई-नाम पोर्टल से जुड़ी कृषि उपज मण्डियों में 6 जिन्सों पर ऑनलाईन ट्रेडिंग की जा रही है। योजना के दूसरे चरण में 30 और तीसरे चरण में 8 कृषि उपज मण्डियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना में शामिल किया गया है। अब तक प्रदेश की 58 कृषि उपज मण्डियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना से जोड़ा जा चुका है।

    इसके साथ ही, 13 कपास मण्डियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना से जोड़ने का कार्य तेजी से पूर्ण किया जा रहा है। प्रदेश में राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना में अब तक करीब 12 लाख किसानों से 19 हजार लायसेंस धारी व्यापारियों ने ई-प्लेटफार्म के माध्यम से करीब 49 लाख क्विंटल कृषि जिन्सों का व्यापार किया है। प्रदेश में ई-नाम पोर्टल की सभी 58 मण्डियों में कृषि उपज के गुणवत्ता परीक्षण के लिये वृहद एसेइंग एण्ड ग्रेडिंग लैब स्थापित करने की कार्यवाही की जा रही है। ई-नाम पोर्टल में देश के 18 राज्यों में मध्यप्रदेश की स्थिति गेट एन्ट्री और एसेइंग में प्रथम तथा बिड क्रिएशन और सेल ऐग्रीमेंट में तृतीय रही है। ज्ञातव्य है‍कि देश में अप्रैल 2016 से प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने ऑनलाइन राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना की शुरूआत की थी। इसका मकसद किसानों को उनकी उपज का राष्ट्रीय स्तर पर सही दाम दिलवाना है।

  • यूपीए की सरकारो ने डुबाए बैंक

    यूपीए की सरकारो ने डुबाए बैंक

    नईदिल्ली( अनिल जैन)।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बैंकिंग और रियल एस्टेट क्षेत्र की बिगड़ी हालत के लिए पिछली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। मोदी ने बुधवार को कहा कि उनकी सरकार अब उन नीतियों को सुधार रही है। इससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और खासकर छोटी और मझोली कंपनियों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्‍पर्धा करने में मदद मिलेगी।संप्रग की सरकारों ने बैंकों पर दबाव डालकर ऐसे उद्योगपतियों को कर्ज दिलाया था जो केवल कागजी खानापूर्ती करते थे।

    गुजरात में दूसरे और अंतिम चरण के लिए होने वाले मतदान से पहले मोदी ने छोटे और मंझोले उद्योगपतियों से हमदर्दी जताते हुए कहा कि कई बड़े औद्योगिक घराने उनके बकाये का भुगतान समय पर नहीं कर रही हैं। उन्होंने कहा कि अब इन कंपनियों को ई-मार्केटप्लेस के जरिये सीधे सरकार को अपना माल बेचने की अनुमति दे दी गई है। इससे पहले मोदी के गृह राज्य गुजरात में सूक्ष्म, लघु और मझोली इकाइयों ने वस्तु एवं सेवा कर का विरोध किया था। मोदी ने यह कहकर तसल्ली दी थी कि जीएसटी से उन्हें वैश्विक स्तर पर प्रतिस्‍पर्धा करने में मदद मिलेगी। अब यही बात वे बैंकिंग सुधार के सिलसिले में कह रहे हैं।

    औद्योगिक संस्था फिक्की की 90वीं वार्षिक आम बैठक को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि वित्तीय समाधान एवं जमा बीमा विधेयक के बारे में लोगों को गुमराह किया जा रहा है। उन्होंने जमाओं की सुरक्षा के बारे में फैलाए जा रहे भ्रम को दूर करने में फिक्की से मदद करने को कहा। प्रधानमंत्री बनने के बाद यह पहला मौका था जब मोदी ने किसी राष्ट्रीय उद्योग निकाय की बैठक को संबोधित किया। मोदी ने आयात पर निर्भरता खत्म करने और देश में ही उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कारोबारी समुदाय से मदद करने को कहा।

    मोदी ने कहा, ‘पुराने कानूनों को खत्म किया जा रहा है और नए कानून बन रहे हैं। हम यूरिया, कपड़ा, उड्डयन, परिवहन और स्वास्थ्य के क्षेत्र में नई नीति लाए हैं।’ उन्होंने कहा कि नई कपड़ा नीति से एक करोड़ रोजगार पैदा होंगे जबकि यूरिया नीति के कारण किसी नए संयंत्र को जोड़े बिना 18 से 28 लाख टन उत्पादन बढ़ा है। मोदी ने कहा कि उनकी सरकार ने रक्षा, निर्माण, खाद्य प्रसंस्करण और वित्तीय सेवा सहित 21 क्षेत्रों में 87 बड़े सुधार किए हैं। इन सुधारों के कारण पिछले 3 साल में विदेशी मुद्रा भंडार में 100 अरब डॉलर का इजाफा हुआ है और यह 400 अरब डॉलर के पार पहुंच गया है। उन्होंने कहा, ‘निर्माण क्षेत्र में अब तक जितना भी विदेशी प्रत्यक्ष निवेश आया है उसमें से 70 फीसदी पिछले 3 साल मे आया है जबकि वायु परिवहन के क्षेत्र में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश 75 फीसदी बढ़ा है।’

    मोदी ने आंकड़ों का सहारा लेकर यह संदेश देने की कोशिश की कि अर्थव्यवस्था पटरी पर है। उन्होंने कहा कि यात्री वाहनों की बिक्री नवंबर में सालाना आधार पर 14 फीसदी बढ़ी है, व्यावसायिक वाहनों की बिक्री में 50 फीसदी का इजाफा हुआ है, तिपहिया वाहनों की बिक्री 80 फीसदी बढ़ी है और दोपहिया वाहनों की बिक्री में 23 फीसदी से ज्यादा का इजाफा हुआ है। प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार की नीतियों के कारण विश्व बैंक की ताजा सूची में कारोबार आसान बनाने के मामले में भारत ने 30 पायदान की छलांग लगाई है। सरकार ने मुद्रा योजना के तहत पिछले 3 साल में 4.5 लाख करोड़ रुपये का ऋण देकर 3 करोड़ नए उद्यमी बनाए हैं।

    मोदी ने कहा कि स्टार्ट अप कंपनियों के लिए सिडबी ने फंड ऑफ फंड्स बनाया है जबकि सरकार ने वैकल्पिक निवेश फंड की अनुमति दी है। प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार की गरीबोन्मुखी योजनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि 2014 से महिलाओं के लिए मुफ्त रसोई गैस, सभी परिवारों के लिए बैंक खाते, युवाओं को ऋण और सस्ते मकानों की योजनाएं लागू की गई हैं।

    उन्होंने कहा कि जनधन योजना के तहत 30 करोड़ से अधिक लोगों के बैंक खाते खोले गए हैं। उन्होंने एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि जिन ग्रामीण इलाकों में ये खाते खोले गए हैं वहां महंगाई कम हुई है। प्रधानमंत्री ने कहा कि उद्योग जगत ने जीएसटी की मांग की थी। उन्होंने कहा, ‘मुझे याद है कि जब मैं गुजरात का मुख्यमंत्री था तो उद्योग प्रतिनिधिमंडल जीएसटी लागू करने की मांग को लेकर मेरे पास आया करता था।’ उन्होंने कहा कि देश के रेस्तराओं ने जीएसटी में कमी का फायदा अपने ग्राहकों को नहीं दिया है, जबकि जनता की असुविधा को देखते हुए सरकार ने दरों को दुबारा संयोजित भी किया ।

    मोदी ने कहा कि जीएसटी से बैंक क्रेडिट प्रवाह बढ़ेगा, कच्चे माल की गुणवत्ता बढ़ेगी और लॉजिस्टिक लागत में कमी आएगी। उन्होंने कहा कि सरकार चाहती है कि छोटे कारोबारी भी जीएसटी को अपनाएं, भले ही उनका टर्नओवर कुछ लाख ही क्यों न हो। ऐसा नहीं है सरकार उनसे राजस्व कमाना चाहती है लेकिन इससे पारदर्शिता आएगी। 20 लाख रुपये तक सालाना टर्नओवर वाले कारोबारियों को जीएसटी से दूर रखा गया है।

    मोदी ने पिछली संप्रग सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि उसने कुछ उद्योगपतियों को कर्ज देने के लिए बैंकों पर दबाव डाला। पिछली सरकार के अर्थशास्त्रियों ने विरासत के रूप में हमें बैंकिंग प्रणाली की गैर निष्पादित परिसंपत्तियां दी थीं। यह राशि राष्ट्रमंडल खेलों, कोयला और 2जी स्पेक्ट्रम घोटालों से बड़ी थी। उन्होंने कहा कि पिछली सरकार के दौरान मध्य वर्ग के लोगों ने अपनी मेहनत की कमाई बिल्डरों को दीं लेकिन उन्हें मकान नहीं मिला। मोदी ने सवाल किया, ‘क्या पिछली सरकार रेरा जैसा कानून नहीं बना सकती थी।’

  • पूंजी को ठगों से बचाने सरकार लाई नया कानून

    पूंजी को ठगों से बचाने सरकार लाई नया कानून


    बैंककारी विनियमन संशोधन विधेयक 2017
    नई दिल्ली। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कर्ज के दबाव में फंसी कंपनियों के प्रवर्तकों को आस्वस्त करते हुए कहा कि उनके पुराने फंसे कर्ज एनपीए की समस्या का समाधान करने के लिये लाए गए नए दिवाला एवं शोधन अक्षमता कानून का मकसद उन्हें बाहर करना नहीं बल्कि कर्ज वसूली सुनिश्चित करने के साथ साथ उनका बचाव करना भी है।

    कर्ज लेने वालों को बेहतर कर्ज संस्कृति विकसित करने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा, ‘वह पुरानी व्यवस्था जिसमें कर्ज देने वाला कर्जदार का पीछा करते करते थक जाता था और आखिर में उसे कुछ हाथ नहीं लगता था अब समाप्त हो चुकी है। यदि कर्ज लेने वाले को व्यवसाय में बने रहना है तो उसे अपने कर्ज की किस्त-ब्याज को समय पर चुकाना होगा अन्यथा उसे दूसरे के लिए रास्ता छोड़ना होगा।’ जेटली देश के प्रमुख वाणिज्य और उद्योग मंडल सीआईआई द्वारा आयोजित एक बैठक को संबोधित कर रहे थे।

    उन्होंने कहा, ‘एनपीए समस्या के समाधान के पीछे वास्तविक उद्देश्य संपत्तियों को समाप्त करना नहीं है, बल्कि इन व्यवसायों को बचाना है। यह काम चाहे इन कंपनियों के मौजूदा प्रवर्तक खुद करें अथवा अपने साथ नया भागीदार जोड़कर करें या फिर नए उद्यमी आएं और यह सुनिश्चित करें कि इन मूल्यवान संपत्तियों को संरक्षित रखा जा सके।’

    कर्ज वसूली सुनिश्चित करने वाले नए कानून को कर्जदाताओं को मजबूती देने वाले प्रावधान के रूप में देखा जा रहा है। बैंक और कर्ज देने वाली विभिन्न संस्थाएं 8 लाख करोड़ रुपये के फंसे कर्ज से जूझा रही हैं। समूचे फंसे कर्ज में अकेले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की ही 75 प्रतिशत तक राशि है।

    उन्होंने नए दिवाला और शोधन अक्षमता कानून की जरूरत को बताते हुए कहा कि ऋण वसूली न्यायाधिकरणों के अपना काम प्रभावी तरीके से नहीं करने और उनके असफल रहने की वजह से यह कानून लाना पड़ा है। उन्होंने कहा कि प्रतिभूतिकरण और वित्तीय आस्तियों का पुनर्गठन एवं प्रतिभूति हितों का प्रवर्तन सरफेसी कानून शुरू के दो तीन सालों के दौरान एनपीए को प्रभावी ढंग से नीचे लाने में सफल रहा था। लेकिन उसके बाद ऋण वसूली न्यायाधिकरण उतने प्रभावी नहीं रहे जितना समझा गया था, जिसकी वजह से नया कानूना लाना पड़ा।

  • किसान को माफिया से नहीं बचा पा रही भावांतर योजना

    किसान को माफिया से नहीं बचा पा रही भावांतर योजना


    भोपाल,(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।नीति आयोग की पहल पर मध्यप्रदेश को प्रयोगभूमि बनाने वाली भावांतर भुगतान योजना किसानों के शोषण और लूट का हथियार साबित हो रही है। लगातार संशोधनों के बाद योजना का मूल उद्देश्य कुचल गया है और अब इसने मंडियों में माफिया के हाथ मजबूत कर दिए हैं। बाजार से सरकार का नियंत्रण छूट गया है और मंडियों का प्रशासन व्यापारियों से गठजोड़ करके किसानों की फसलों से भारी कमीशन कबाड़ रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार इस कुशासन के सामने लाचार साबित हो रही है।

    राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के अध्यक्ष पं.शिवकुमार शर्मा इसे किसान हितैषी होने का पाखंड रच रही शिवराज सिंह सरकार की असफल योजना बता रहे हैं। उनका कहना है कि इस योजना के माध्यम से किसानों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। उनका कहना है कि इस योजना की असफलता के कारण किसान आगे बढ़कर सरकार के खिलाफ आंदोलन पर उतारू हो गए हैं। जब खुद मुख्यमंत्री, उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी, पार्टी और किसान कल्याण विभाग किसानों को इस योजना से सहमत नहीं करा पाए तो प्रमुख सचिव स्तर के 25अधिकारियों को मंडियों में भेजा जा रहा है। वे भी किसानों के आक्रोश को नहीं रोक पा रहे हैं और राधेश्याम जुलानिया जैसे अफसर अब किसानों को मजदूरी करने की सलाह देने लगे हैं।

    दरअसल अपने सबसे बड़े वोट बैंक किसान को खुश करने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने योजना आयोग की इस योजना को पहली बार मध्यप्रदेश में लागू किया है। जबकि इससे पहले इस योजना का पायलट प्रोजेक्ट गोवा में लागू किया गया था। जब व्यावहारिक कठिनाईयां सामने आईँ तो सरकार ने आनन फानन में संशोधन किए और पंद्रह संशोधनों के बाद भी मंडी माफिया पर लगाम लगाना संभव नहीं हो पाया है। सबसे बड़ी बात तो ये है कि किसानों की फसलों को सीलिंग सीमा में बांधकर रखा गया है। जिसके चलते अधिक फसलें उपजाने वाले किसानों की फसलें औने पौने दामों पर मंडी माफिया छीन रहा है।

    खुद को किसान हितैषी बताने वाली शिवराज सिंह चौहान की सरकार की नीतियों से एक ओर जहां किसान को उसकी फसलों का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है वहीं आम नागरिकों को कृषि उत्पादों के लिए मंहगी कीमत चुकानी पड़ रही है। किसानों के शोषण की नींव एक दशक पहले ही पड़ गई थी। जब शिवराज सिंह चौहान सरकार ने मंडी एक्ट पारित करके किसानों पर अपरोक्ष नियंत्रण करने का प्रयास किया था। पूर्ववर्ती कांग्रेसी सरकार के मंडी एक्ट में किसान अपने वोट से मंडियों के अध्यक्ष का चुनाव करता था। जबकि एक में संशोधन के बाद मंडी अध्यक्ष के पद करोड़ों रुपयों में बिकने लगे। यानि जिस किसान के पास ऋण पुस्तिका है वो केवल अपने वार्ड के सदस्यों का चुनाव करते हैं. अब ये वार्ड मेंबर मिलकर अध्यक्ष का चुनाव करते हैं। इस अप्रत्यक्ष चुनाव से मंडियों पर माफिया की सत्ता स्थापित हो गई है। अब जबकि मंडियों में पदाधिकारी और व्यापारी मिलकर किसानों की फसलों को लूटने लगे हैं तब एक्ट में बदलाव के दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं।

    सबसे बड़ी बात तो ये है कि मंडियों के इस माफिया ने सरकारी तंत्र के नेफेड(भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ मर्यादित) जैसे संगठनों को भी अपने कब्जे में ले लिया है। पिछली फसल की खरीद के दौरान नेफेड ने किसानों से एक जिले में लगभग90 हजार क्विंटल मूंग 2022 रुपए प्रति क्विंटल की दर से खरीदी थी। जब किसान आंदोलन के बाद दबाव में आई सरकार ने घोषणा की कि वो किसानों की फसलों को खरीदेगी तो नेफेड ने वही दाल व्यापारियों को बेच दी। व्यापारियों ने वही दाल सरकार को 5250 रुपए की दर पर बेच दी। इस तरह फसलों की बार बार खरीदी बिक्री ने आढ़तियों और माफिया को तो लाभ पहुंचाने के लिए सरकार को चूना लगाया है। राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के नेता पं. शिवकुमार शर्मा कहते हैं कि सरकार को झूठी शान छोड़कर इस योजना को तत्काल बंद करना चाहिए, तभी किसानों को माफिया के चंगुल से छुड़ाया जा सकता है।

    इस योजना को लेकर जो भ्रम फैले हैं उनके चलते किसान योजना में अपना पंजीयन नहीं करा पा रहे हैं। सरकार ने पंद्ह दिनों का समय बढ़ाकर आधार कार्ड, समग्र आईडी, फोटो, खसरे की प्रति, और ऋण पुस्तिका जैसे दस्तावेजों के आधार पर पंजीयन कराने के निर्देश दिए हैं पर इससे फर्जी किसानों का पंजीयन तो हो गया पर जरूरत मंद छोटा किसान अब भी वंचित ही रह गया है। मजबूरन सरकार को फसलों के रिकार्ड खंगालना पड़ रहे हैं कि खाद्यान्न लेकर मंडी में आने वाले किसान के पास जमीन है भी या नहीं। या फिर उसने वह खाद्यान्न खेत में बोया भी है या नहीं।

    मंडी एक्ट में स्पष्ट प्रावधान है कि सरकार व्यापारी से जो खाद्यान्न खरीदेगी उसका भुगतान वो उसी दिन कर देगी। इसके विपरीत सरकार ने किसान को तीन महीने में भुगतान करने का वादा किया है जो सीधे तौर पर मंडी एक्ट का उल्लंघन है। प्याज, मूंग, उड़द और तुअर जैसी फसलों के भुगतान किसानों को छह महीनों में भी नहीं किए गए हैं जिससे किसानों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।

    मोदी सरकार ने सत्ता में आने के लिए किसान को उसकी फसल के पचास फीसदी हिस्से पर लाभकारी मूल्य देने का वायदा किया था।अब जबकि उसकी ही एक प्रदेश सरकार भावांतर योजना पर किसानों को मंडी माफिया से नहीं बचा पा रही है तब मोदी सरकार खामोश है और विपक्षी राजनीतिक दलों के लिए ये योजना एक अच्छा राजनीतिक हथियार साबित हो रही है।

  • वित्तीय साक्षरता देश की जरूरत

    वित्तीय साक्षरता देश की जरूरत

    वित्तीय शिक्षा

    21वीं शताब्दी की पहली दशाब्दी में लोगों में वित्तीय साक्षरता फैलाने की आवश्यकता को सभी ने स्वीकार किया। अधिकतर देश वित्तीय शिक्षा के लिए एकीकृत और समन्वित राष्ट्रीय रणनीति अपना रहे हैं। भारत एक बड़ी जनसंख्या वाला देश है, जहां राष्ट्रीय स्तर पर समग्र विकास पर जोर दिया जा रहा है और अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और इसके साथ एक जीवंत और स्थिर वित्तीय प्रणाली विकसित करने की तुरंत आवश्यकता महसूस की जा रही है, ऐसी स्थिति में यह और भी जरूरी हो गया है कि जल्दी ही एक राष्ट्रीय रणनीति तैयार करके उसे लागू किया जाए।

    वित्तीय साक्षरता फैलाने के कार्य में केन्द्र और राज्य सरकारें, वित्तीय नियामक, वित्तीय संस्थाएं, सभ्य समाज, शिक्षाविद् और अन्य एजेंसियां जैसे कई पक्ष शामिल हैं। इसलिए एक व्यापक राष्ट्रीय रणनीति बनाना जरूरी है, ताकि ये सभी उस रणनीति के अनुसार एकरूपता से काम करें और विरोधी उद्देश्‍यों के लिए काम न करें।
    इस प्रकार राष्ट्रीय रणनीति का उद्देश्य वित्तीय दृष्टि से एक जागरूक और सशक्त भारत बनाना है। इसका उद्देश्य एक विशाल वित्तीय शिक्षा अभियान चलाना है जिससे आर्थिक खुशहाली के लिए लोगों को उपयुक्‍त वित्‍तीय सेवाओं के जरिए अपने धन का अधिक कारगर तरीके से प्रबंधन करने में मदद मिल सके।
    वित्तीय साक्षरता क्या है?
    आर्थिक सहयोग और विकास संगठन ने वित्तीय साक्षरता की परिभाषा इस प्रकार दी है कि-यह वित्तीय जागरूकता, ज्ञान, कौशल, दृष्टिकोण और व्यवहार का संयुक्त समग्र रूप है, जिसकी सहायता से वित्तीय फैसले लिये जा सकें और व्यक्ति अपनी आर्थिक स्थिति को बेहतर बना सकें। लोग वित्तीय शिक्षा की प्रक्रिया के माध्यम से वित्तीय साक्षरता प्राप्त करते हैं।

    वित्‍तीय समावेशीकरण : सरकार की उच्‍च प्राथमिकता वाली नीति
    भारत सरकार ने वित्‍तीय साक्षरता को फैलाने के महत्‍व को स्‍वीकार किया है, ताकि घरेलू बचतों को निवेशों में लगाने के लिए जोरदार प्रयास किये जा सकें। लेकिन वित्‍तीय उत्‍पादों की विविधिता और जटिलता ने एक साधारण व्‍यक्ति के लिए सही प्रकार का फैसला लेना मुश्किल कर दिया है। वित्‍तीय साक्षरता से विश्‍वास, ज्ञान और कौशल में वृद्धि होती है, जिससे वित्‍तीय उत्‍पादों और सेवाओं का सही लाभ उठाया जा सकता है और अपनी वर्तमान तथा भावी परिस्थितियों पर अधिक नियंत्रण किया जा सकता है। वित्‍तीय साक्षरता से शोषण करने वाली वित्‍तीय योजनाओं और साहूकारों द्वारा लिये जाने वाले अधिक ब्‍याज से भी लोगों को और समाज को बचाने में मदद मिलती है।

    यह उम्‍मीद की जाती है कि वित्‍तीय शिक्षा से अर्थव्‍यवस्‍था में कई गुणा प्रभाव होगा। एक सुशिक्षित परिवार नियमित रूप से बचतें करेगा, सही योजनाओं में निवेश करेगा और अपनी आमदनी बढ़ायेगा। इस प्रकार व्‍यक्तियों की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा तथा समाज की भलाई होगी।

    अंतर्राष्‍ट्रीय अनुभव और भारत के लिए सबक
    विश्‍व में चैक गणराज्‍य, नीदरलैंड, न्‍यूजीलैंड, स्‍पेन और ब्रिटेन जैसे देश वित्‍तीय शिक्षा के लिए राष्‍ट्रीय रणनीति पहले ही लागू कर चुके हैं तथा कई अन्‍य देश रणनीति बनाने और उसे लागू करने की प्रक्रिया में हैं।

    भारत में विशाल विविधता को देखते हुए हमें राष्‍ट्रीय रणनीति के अंतर्गत कई स्‍तरों पर काम करना होगा। राष्‍ट्रीय रणनीति का प्रारूप तैयार कर लिया गया है, जिसके उद्देश्‍य हैं – 1. वित्‍तीय सेवाओं, विभिन्‍न वित्‍तीय उत्‍पादों और उनकी विशिष्‍टताओं की जानकारी के लिए उपभोक्‍ताओं को जागरूक बनाना और शिक्षित करना। 2. जानकारी को व्‍यवहार में बदलने की वृत्तियों को विकसित करना और 3. वित्‍तीय सेवाओं के लाभार्थियों के रूप में उपभोक्‍ताओं को उनके अधिकारों और जिम्‍मेदारियों की जानकारी देना।

    वित्‍तीय जगत में तेजी से हो रहे परिवर्तनों को देखते हुए रणनीतिक कार्य योजनाओं के जरिए राष्‍ट्रीय रणनीति को 5 वर्ष के अंदर लागू करने की व्‍यवस्‍था रखी गई है।

    वित्‍तीय साक्षरता और समावेशीकरण का आकलन करने के लिए नमूना सर्वेक्षण
    इस रणनीति में वित्‍तीय समावेशीकरण और वित्‍तीय साक्षरता की स्थिति का आकलन करने के‍ लिए राष्‍ट्रव्‍यापी नमूना सर्वेक्षण की व्‍यवस्‍था है। इस सर्वेक्षण के अंतर्गत वित्‍तीय समावेशीकरण की स्थिति, विभिन्‍न वित्‍तीय उत्‍पादों के बारे में वित्‍तीय जागरूकता का स्‍तर, सुविचारित फैसले लेने के लिए वित्‍तीय क्षमता का स्‍तर तथा धन के प्रति लोगों का नजरिया और जोखिम उठाने के प्रति उनकी सोच, जैसे पहलुओं का आकलन किया जाएगा।

    सर्वेक्षण के आकलन के आधार पर विभिन्‍न वित्‍तीय नियामक लोगों की आवश्‍यकताओं को ध्‍यान में रखते हुए वित्‍तीय शिक्षा के अपने प्रकल्‍प बनायेंगे, बाद में स्‍कूल पाठयक्रम, सोशल मार्किटिंग तथा रेडियो, टे‍लीविजन, समाचार पत्र आदि के माध्‍यम से इनका प्रचार किया जाएगा तथा समर्पित वित्‍तीय शिक्षा वेबसाइट भी विकसित की जाएगी। इस कार्य में स्‍व-सहायता समूहों, माइक्रो-वित्‍तीय संस्‍थाओं, निवेशकों और उपभोक्‍ता एसोसिएशनों आदि की भी सहायता लेने का प्रस्‍ताव है।

    स्‍कूल पाठ्यक्रम में वित्‍तीय शिक्षा
    सरकार का मानना है कि वित्‍तीय शिक्षा स्‍कूल से ही शुरू हो जानी चाहिए और लोगों को जीवन में जितना जल्‍दी हो सके, वित्‍तीय मामलों के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन ने स्‍कूलों के लिए अच्‍छे वित्‍तीय शिक्षा कार्यक्रम तैयार करने के उद्देश्‍य से सम्‍बद्ध पक्षों के लिए तथा नीति निर्माताओं की सहायता के लिए मार्ग-निर्देश तैयार किये हैं।

    लेकिन यह बात स्‍पष्‍ट रूप से समझनी होगी कि वित्‍तीय शिक्षा स्‍कूलों में पढ़ाये जाने के लिए अलग विषय नहीं होगा, इसे केवल स्कूल पाठ्यक्रम में उचित रूप से समावेशित करना होगा। उदाहरण के लिए स्‍कूलों में गणित के विषय में चक्रवृद्धि ब्‍याज के बारे में समझाया जाता है कि एक व्‍यक्ति –ए दूसरे व्‍यक्ति –बी को कुछ वार्षिक ब्‍याज दर पर पैसा उधार देता है और उस पर चक्रवृद्धि ब्‍याज लगता है। इस अवसर का फायदा वित्‍तीय शिक्षा के लिए उठाया जा सकता है और लोगों को इस तरह समझाया जा सकता है कि एक कंपनी बैंक से पैसा उधार लेती है, या एक बैंक उपभोक्‍ता, सामान्‍य निश्चित अवधि का जमा खाता खोलने की बजाय एक सामूहिक जमा खाता खोलता है। इसी प्रकार नैतिक शिक्षा के पाठ्यक्रमों में ऐसी बातें शामिल की जा सकती हैं, जो रोजमर्रा के वित्‍तीय लेन-देनों पर आधारित हों।

    केन्‍द्रीय माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड-सीबीएसई प्राथमिक स्‍तर से ऊपर वाली कक्षाओं के लिए स्‍कूल शिक्षा में समन्वित रूप से वित्‍तीय शिक्षा को शामिल करने के बारे में सिद्धांत रूप से सहमत हो गया है और इस संबंध में विशेषज्ञों की एक समिति का भी गठन किया गया है।

    वित्‍तीय शिक्षा के प्रचार में नियामकों की भूमिका
    भारत में विभिन्‍न वित्‍तीय नियामक, जैसे भारतीय रिजर्व बैंक, भारतीय प्रतिभूति नियमन बोर्ड-सेबी, विनियामक और विकास प्राधिकरण आदि बहुसूत्रीय प्रणाली के जरिए विशाल वित्‍तीय साक्षरता कार्यक्रम पहले ही शुरू कर चुके हैं।

    भारतीय रिजर्व बैंक ने स्‍कूल और कॉलेज के छात्रों, महिलाओं, ग्रामीण और शहरी गरीबों, रक्षा सेनाओं के कर्मचारियों, और वरिष्‍ठ नागरिकों सहित विभिन्‍न लक्षित समूहों को केन्‍द्रीय बैकों के बारे में और सामान्‍य बैंकिंग प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी देने के लिए ‘प्रोजेक्‍ट फाइनेंशियल लिटरेसी’’ नाम से एक परियोजना शुरू की है। सेबी ने देशभर में अनुभवी और जानकार लोगों की एक सूची तैयार की है, जो विभिन्‍न समूहों को बचतों, निवेश, वित्‍तीय आयोजन, बैंकिंग, बीमा, सेवानिवृत्ति के बाद धन के उपयोग की योजनाओं, आदि जैसे विभिन्‍न पहलुओं के बारे में जानकारी देने के लिए कार्यशालाओं का आयोजन करते हैं। विभिन्‍न राज्‍यों में अब तक ऐसी 3500 से अधिक कार्यशालाएं आयोजित की जा चुकी हैं, जिनसे लगभग 3 लाख लोग लाभ उठा चुके हैं।

    बीमा नियमन और विकास प्राधिकरण पॉलिसी धारकों को अधिकारों और कर्तव्‍यों के बारे में और विवादों को हल करने के तरीकों के बारे में रेडियो, टेलीविजन और समाचार पत्रों के माध्‍यम से अंग्रेजी, हिन्‍दी तथा 11 अन्‍य भारतीय भाषाओं के जरिए सरल भाषा में संदेश और जानकारियां देते हैं।
    पेंशन निधि और विकास प्राधिकरण, आम जनता को सामाजिक सुरक्षा संबंधी संदेश देता है। इस प्राधिकरण ने पेंशन के बारे में आमतौर पर पूछे जाने वाले प्रश्‍नों की सूची को अपनी वेबसाइट पर डाला है तथा समाज के वंचित वर्गों को पेंशन सेवाओं का लाभ दिलाने के लिए यह विभिन्‍न गैर-सरकारी संगठनों के साथ सहयोग कर रहा है। इसी प्रकार, व्‍यावसायिक बैंक, स्‍टॉक एक्‍सचेंज, कमीशन एजेंसियों और म्‍युचुअल फंडों ने भी वित्‍तीय शिक्षा के बारे में प्रयास किये हैं। इसके लिए उन्‍होंने सेमिनार आयोजित किये हैं और समाचार पत्रों में अभियान चलाए हैं तथा क्‍या करना चाहिए और क्‍या नहीं करना चाहिए, जैसी जानकारियां उपलब्‍ध कराई हैं।

    इन सभी संस्‍थानों ने वित्‍तीय साक्षरता प्रदान करने के लिए जो विशाल सामग्री तैयार की है, उसको एकत्र करने और वर्गीकृत करने की आवश्‍यकता है, ताकि वह देश में वित्‍तीय शिक्षा के लिए ज्ञान का आधार बन सके।

    संस्‍थागत प्रबंधों के अंतर्गत राष्‍ट्रीय वित्‍तीय शिक्षा संस्‍थान की स्‍थापना की गई है, जिसके सदस्‍यों में विभिन्‍न नियामकों के प्रतिनिधि हैं। इस संस्‍थान का मुख्‍य उद्देश्‍य विभिन्‍न वित्‍तीय क्षेत्रों के लिए वित्‍तीय शिक्षा की सामग्री तैयार करना होगा। यह संस्‍थान खासतौर पर वित्‍तीय शिक्षा के लिए एक वेबसाइट भी तैयार करेगा।

    पूरी नीति पर अमल मौजूदा संस्‍थागत तंत्र के माध्‍यम से किया जाना है। वित्‍तीय समावेशीकरण और वित्‍तीय साक्षरता की वित्‍तीय स्थिरता और विकास परिषद की उप-समिति के तकनीकी दल को राष्‍ट्रीय नीति के अमल पर निगरानी रखने के लिए जिम्‍मेदारी सौंपी जाएगी।

    * इस लेख के लिए सामग्री 16.07.2012 को जारी भारतीय रिजर्व बैंक के वित्‍तीय शिक्षा की राष्‍ट्रीय रणनीति-2012 के प्रारूप से ली गई है। (पत्र सूचना कार्यालय, मुंबई)

  • अब समझौता शुल्क से निपट जाएंगे श्रमिकों के प्रकरण

    अब समझौता शुल्क से निपट जाएंगे श्रमिकों के प्रकरण

    भोपाल 12 अक्टूबर(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)

    प्रदेश में ईज ऑफ डूईंग बिजनेस के उद्देश्य से श्रम कानूनों में प्रक्रियाओं को श्रमिक एवं नियोजक के हित में सरल बनाया गया है। प्रावधानों को अधिक युक्‍तियुक्‍त किया गया है। विभागीय कार्यप्रणाली में पारदर्शिता के साथ सूचना प्रौद्योगिकी का व्‍यापक उपयोग करते हुए वर्ष 2014 से अब तक अनेक महत्वपूर्ण कदम इस संबंध में उठाये गये हैं।

    वॉलन्‍टरी कम्‍प्‍लायंस स्‍कीम

    अक्‍टूबर 2014 में प्रारंभ की गयी वॉलन्‍टरी कम्‍प्‍लायंस स्‍कीम विश्‍व बैंक, केन्‍द्र सरकार और अन्‍य राज्‍यों द्वारा सराही गयी है। स्कीम में 16 श्रम कानूनों में 61 रजिस्‍टर के स्‍थान पर एक रजिस्‍टर रखने तथा कार्यालयों में 13 रिटर्न की जगह मात्र 2 वार्षिक रिटर्न का प्रावधान किया गया है। पाँच वर्षों में संस्‍थान के अधिकतम एक बार निरीक्षण का प्रावधान किया गया है।

    श्रम कानूनों में संशोधन

    राज्‍य के 3 और केन्‍द्र के 15 श्रम कानूनों में संशोधन कर निवेशक एवं श्रमिक हितैषी बनाया गया है। राज्‍य के लाखों श्रमिकों के हित में सेवानिवृत्‍ति की आयु 58 से बढाकर 60 वर्ष की गयी। मध्यप्रदेश औद्योगिक नियोजन (स्थायी आज्ञा) अधिनियम के लागू होने संबंधी श्रमिक संख्‍या सीमा 20 से बढ़ाकर 50 की गयी तथा माइक्रो इण्‍डस्‍ट्रीज को इससे छूट दी गयी है। दस से कम श्रमिक संख्‍या वाले संस्‍थानों में निरीक्षण के लिए श्रम आयुक्‍त की अनुमति अनिवार्य की गयी है।

    मध्‍यप्रदेश श्रम कल्‍याण निधि अधिनियम से माइक्रो इण्‍डस्‍ट्रीज को छूट दी गयी है। श्रमिकों के अधिसमय कार्य के घंटों को किसी तिमाही में श्रमिकों की सहमति से 75 से बढ़ाकर 125 किये जाने का प्रावधान किया गया है। रात्रि पाली में महिलाओं की सुरक्षा को सुनिश्चित करते हुए रात्रि 8.00 बजे से सुबह 6.00 बजे तक कार्य की अनुमति का प्रावधान किया गया है। श्रमिकों को पिछले वर्ष में 240 दिन के स्थान पर 180 दिन कार्य करने पर उसी केलेण्डर वर्ष में सवैतनिक अवकाश की सुविधा उपलब्‍ध करायी गयी है। श्रमिकों की छंटनी की स्थिति में एक माह की सूचना के प्रावधान के स्थान पर तीन माह की सूचना के साथ न्यूनतम 3 माह के वेतन के भुगतान का प्रावधान किया गया है। किसी संस्थान में ले-ऑफ, छंटनी या बंदीकरण के लिए पूर्व अनुमति की आवश्यकता 100 श्रमिक वाले संस्थानों के स्थान पर 300 या अधिक श्रमिक वाले संस्थानों के लिए की गयी है। सेवा समाप्‍ति संबंधी औद्योगिक विवाद प्रस्‍तुत करने की समय-सीमा तीन वर्ष निर्धारित की गयी है।

    निवेशकों के हित में मध्‍यप्रदेश दुकान एवं स्‍थापना अधिनियम, ठेका श्रम अधिनियम, मोटर यातायात श्रमिक अधिनियम, भवन संन्निर्माण कर्मकार अधिनियम और अन्‍तर्राज्‍यीय प्रवासी कर्मकार अधिनियम प्रावधान किये गये हैं कि यदि अधिनियम में पंजीयन या लायसेंस व उसके नवीनीकरण आवेदन को 30 दिन में स्‍वीकृत नहीं किया जाता है तो इसे स्‍वत: पंजीकृत (डीम्‍ड) माना जाएगा। मध्‍यप्रदेश दुकान एवं स्‍थापना अधिनियम, मध्‍यप्रदेश औद्योगिक नियोजन (स्‍थाई आदेश) अधिनियम, समान पारिश्रमिक अधिनियम, श्रम विधि (विवरणी देने और रजिस्टर रखने से कतिपय स्थापनाओं को छूट) अधिनियम, न्यूनतम वेतन अधिनियम, वेतन भुगतान अधिनियम, विक्रय संर्वधन कर्मचारी (सेवा की शर्ते) अधिनियम में उल्‍लंघन के प्रकरण न्‍यायालय ले जाने के स्‍थान पर कार्यालय में समझौता शुल्‍क देकर निराकृत किये जाने का प्रावधान किया गया।

  • आर्थिक सुधारों पर संकट का कोहराम

    आर्थिक सुधारों पर संकट का कोहराम

    एमके वेणु
    2019 के चुनावों से 18 महीने पहले, भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था पूरी तरह से लड़खड़ाई हुई दिखाई दे रही है, लेकिन नरेंद्र मोदी द्वारा लगातार 2022 तक पूरे किए जाने वाले नामुमकिन वादों की झड़ी लगाने का सिलसिला जारी है.

    चारों तरफ से आ रही आर्थिक संकट की ख़बरों ने अचानक भाजपा की जान को सांसत में डाल दिया है. नोटबंदी के फैसले के बाद कुछ वैसी ही बदइंतजामी जीएसटी को लागू करने के मामले में भी दिखाई दे रही है. इसने छोटे कारोबारियों की कमर तोड़ दी है, जिसका नतीजा नोटबंदी के बाद के महीनों में उत्पादन और बेरोजगारी में आई गिरावट की स्थिति के और भयावह होने के तौर पर सामने आया है.

    कारोबारी कंपनियां जीएसटी के लागू होने से पहले अपना स्टॉक खाली करने में लगी हुई थीं. उन्हें उम्मीद थी कि वे नई कर-प्रणाली में नया स्टॉक जमा करेंगी. लेकिन, विशेषज्ञों का कहना है कि जीएसटी को खराब तरीके से लागू किए जाने के कारण नया स्टॉक जमा करने रफ्तार काफी सुस्त है और कंपनियां फिलहाल जीएसटी व्यवस्था के स्थिर होने का इंतजार कर रही हैं. इसके बाद ही वे रफ्तार पकड़ेंगी.

    इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि यह सब त्योहारों के मौसम के ठीक पहले हो रहा है. 2017 की दूसरी छमाही में इसका असर आर्थिक विकास पर पड़ना तय है. जैसा कि कई लोगों ने आशंका जताई थी, जीएसटी को लागू करने के बाद मुद्रास्फीति में भी थोड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. पिछले कई दशकों में घरेलू पेट्रोल और डीजल की सर्वाधिक कीमत ने भी स्थिति को और बिगाड़ने का काम किया है.

    इसे विडंबना ही कहा जा सकता है कि तेल पर लगाए गए रिकॉर्ड टैक्स स्थिर राजस्व का एकमात्र स्रोत हैं, क्योंकि इसे जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया है. फिलहाल जीएसटी नहीं, तेल पर लगा कर ही केंद्र सरकार की जान बचाए हुए है.

    वित्त मंत्री अरुण जेटली की मुश्किलों को और बढ़ाते हुए जीएसटी नेटवर्क के उम्मीदों से कमतर प्रदर्शन (ऐसा कहना शायद स्थिति की गंभीरता को कम करके बताना है) ने 2017-18 में राजस्व में कमी का गंभीर खतरा पैदा कर दिया है. इससे केंद्र के राजकोषीय हिसाब-किताब के गड़बड़ाने की आशंका पैदा हो गई है. वित्त मंत्रालय को पहला झटका तब लगा जब जुलाई के महीने के लिए जीएसटी के तहत जमा हुए 95,000 करोड़ रुपये में से कुल 65,000 करोड़ रुपये के रिफंड का दावा उसके सिर पर आ गया.

    अगर इन सारे रिफंड दावों को स्वीकार कर लिया जाता है, तो केंद्र के पास महज 30,000 करोड़ रुपये ही बचेंगे, जबकि बजट में प्रति माह वास्तविक कर संग्रह 90,000 करोड़ से ज्यादा होने का अनुमान लगाया गया है. पुराने स्टॉक पर रिफंड के प्रावधान के कारण पहले महीने में रिफंड के ज्यादा दावों के आने का अंदाजा पहले से ही था. अनुमान है कि आनेवाले महीनों में जीएसटी से ज्यादा राजस्व प्राप्त होगा. लेकिन, जीएसटीएन के सॉफ्टवेयर में आ रही दिक्कतों को देखते हुए इस वित्तीय वर्ष में इस पूरी कवायद का भविष्य अधर में लटका हुआ नजर आता है.

    जीएसटीएन में आ रही विभिन्न परेशानियों को दूर करने के लिए राज्यों के मंत्रियों की नवनिर्मित समिति की अगुआई कर रहे बिहार के उप-मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने पिछले सप्ताह एक दिलचस्प बयान दिया: ‘हम नाव को खेते हुए नाव का निर्माण कर रहे हैं.’ साफ तौर पर यह बयान केंद्र को कठघरे में खड़ा करता है, जिसने बगैर पर्याप्त तैयारी के जीएसटी को लागू कर दिया.

    इस नई समिति के सदस्य कर्नाटक के कृषि मंत्री कृष्ण बायरे गौड़ा ने बताया कि जीएसटीएन के सॉफ्टवेयर के साथ कई दिक्कतें हैं, जिन्हें ठीक करने में कम से कम छह महीने का वक्त लग जाएगा.

    उन्होंने कहा, ‘फिलहाल बहुत बुनियादी परेशानियां सामने आ रही हैं. मसलन, व्यापारी यह शिकायत कर रहे हैं कि उन्होंने रजिस्ट्रेशन करा लिया है और जीएसटी रिर्टन भी अपलोड कर दिया है, लेकिन इसे सिस्टम द्वारा नहीं दिखाया जा रहा है. सिस्टम की कछुआ चाल ने टैक्स भरनेवालों को दिन में तारे दिखा दिए हैं. जीएसटी सिस्टम इनवॉयस और विभिन्न चरणों, मसलन, जीएसटीआर-2 और जीएसटीआर-3, पर भरे गए रिटर्नों को अपलोड करने में भी परेशानी पैदा कर रहा है. इससे भी खराब बात ये है कि राज्य सरकारें जीएसटी अदायगी की निगरानी करने के लिए कंपनियों से संबंधित आंकड़ों को निकालने में असमर्थ साबित हो रही हैं.’

    गौड़ा का कहना है कि समिति के सदस्यों से सॉफ्टवेयर प्रोवाइडर से बात की है और ‘उनका कहना है कि उन्हें जुलाई में जीएसटी के लागू होने से पहले आखिरी मौके पर प्रक्रियागत नियमावली (प्रोटोकॉल) सौंपी गई. ट्रायल रन करने के लिए पर्याप्त समय नहीं था.’ इसलिए अब हम यह समझ सकते हैं कि आखिर सुशील मोदी के यह कहने का क्या अर्थ है कि नाव का निर्माण, बहती हुई नाव पर बैठे-बैठे किया जा रहा है!

    संघ परिवार के शीर्ष विचारकों ने देर से इस बात को स्वीकार किया है कि अर्थव्यवस्था की अस्थिर नाव पहले से ही नोटबंदी के कारण आए तूफान से पछाड़ खाते हुए हुए समुद्र में बह रही है. संघ परिवार के एक महत्वपूर्ण आर्थिक विचारक एस. गुरुमूर्ति ने कहा है कि एक साथ नोटबंदी, जीएसटी, बैंकों की गैर-निष्पादन परिसंपत्तियां (एनपीए), सेटलमेंट प्रोसेस और काले धन पर कई स्तरों पर किए जा रहे सुधारों ने व्यापार को बड़ा झटका दिया है.

    गुरुमूर्ति की यह आत्मस्वीकृति काफी दिलचस्प है, क्योंकि वे नोटबंदी, जीएसटी और निजी उद्यमियों तथा छोटे कारोबारियों पर कर-अधिकारियों की मनमानी कार्रवाई के सबसे बड़े समर्थकों में से एक थे. टैक्स डिपार्टमेंट बड़े कारोबारियों पर हाथ नहीं डाल रहा है. इसका कारण शायद ये है कि उनके साथ इनके संबंध मुद्दतों से अच्छे रहे हैं. आपको अगर इस बात का अर्थ समझना है, तो आपको बस नौकरी छोड़कर भारत की शीर्ष 500 कंपनियों से जुड़नेवाले वरिष्ठ टैक्स अधिकारियों की संख्या देखनी पड़ेगी.

    यानी संघ परिवार के विचारक अब ये खुलकर मान रहे हैं कि मोदी और जेटली ने दरअसल नवजात शिशु को सीधे पानी में तैरने के लिए फेंक दिया है. जीएसटी का वर्तमान चरण इसकी सबसे बड़ी मिसाल है. जुलाई महीने के लिए जीएसटी रिटर्न दाखिल करने और वाजिब रिफंड का दावा करनेवाले कारोबारियों को इस तरह परेशान किया जा रहा है, मानो वे कोई अपराधी हों.

    पहले निर्यातकों को हमेशा एक्साइज ड्यूटी से मुक्त रखा जाता था, क्योंकि वे वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करते थे. जीएसटी के तहत, चूंकि सभी कारोबारियों को प्रक्रिया के तहत अप्रत्यक्ष कर भरना पड़ रहा है, इसलिए निर्यातकों से 18 प्रतिशत जीएसटी भरने के लिए कहा गया था, जिसे उनके माल को विदेश भेजने से पहले वापस लौटाने की बात कही गई थी.

    लेकिन अब निर्यातकों की यह शिकायत है कि उनका टैक्स रिफंड समय पर नहीं आ रहा है. निर्यातक इसके लिए इंतजार नहीं कर सकते, क्योंकि वे मौसम के हिसाब से काम करते हैं. मसलन, क्रिसमस के लिए बाहर माल भेजना. 18 प्रतिशत जीएसटी चुका देने के बाद उनकी कामकाजी पूंजी फंस जाती है. यह एक बड़ी रकम है. उन्हें छोटी अवधि में कामचलाऊ पूंजी की जरूरत को पूरा करने के लिए कर्ज लेने के लिए अतिरिक्त पैसा चुकाना पड़ रहा है. इससे उनका मुनाफा और सिकुड़ रहा है.

    भारत करीब 300 अरब अमेरिकी डॉलर का सालाना निर्यात करता है जिससे जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा आता है. कल्पना कीजिए कि जीएसटी अधिकारी निर्यात मूल्य का 18 प्रतिशत अपने पास रख लेते हैं और उसे समय पर वापस नहीं लौटाते हैं. यह निर्यातकों के लिए किसी खराब सपने से कम नहीं कहा जा सकता है. निर्यातकों को त्वरित रिफंड के इस समीकरण को समझ पाने में वित्त मंत्रालय नाकाम रहा. जाहिर है इसका खामियाजा किसी न किसी को तो उठाना ही पड़ेगा.

    जीएसटी के पहाड़ जैसे कुप्रबंधन के मद्देनजर, अगर 2017 की दूसरी छमाही में जीडीपी विकास दर अप्रैल-जून में दर्ज किए गए 5.7 प्रतिशत से भी नीचे लुढक जाती है, तो मुझे कोई हैरत नहीं होगी. निश्चित तौर पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के इस साहस भरे बयान के बावजूद कि लोगों को ‘आधिकारिक आंकड़ों को नजरअंदाज करना चाहिए’ सरकार के अंदर अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहे काले बादलों को लेकर बदहवासी की स्थिति है.

    भारत के अनौपचारिक क्षेत्र, खासकर कृषि और छोटे उद्योगों को हुए नुकसान का काफी विस्तार से दस्तावेजीकरण किया गया है. पिछले कुछ महीनों से सोशल मीडिया पर इस मसले पर लगातार आंकड़ों के सहारे बात की जा रही है. छोटी कंपनियों (जिनका कुल कारोबार 25 करोड़ से कम है) को लेकर किए गए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के एक सर्वेक्षण के मुताबिक जनवरी-मार्च, 2017 में उनकी बिक्री में 58 फीसदी की गिरावट देखी गई. जुलाई के बाद जीएसटी ने उनकी बदहाली को और बढ़ाया ही होगा.

    अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा समूह, क्रेडिट सुइस की मुंबई स्थित रिसर्च इकाई ने हाल ही में कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था बेहद खराब दौर से गुजर रही है और नोटबंदी और जीएसटी जैसे बड़े नीतिगत उपायों ने अर्थव्यवस्था में बड़ी रुकावटें पैदा की हैं.

    क्रेडिट सुइस का कहना है कि इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात ये है कि इन रुकावटों के साथ-साथ कुल सरकारी खर्च में भी भारी कमी आई है. यह याद रखना होगा कि निजी निवेश की गैरहाजिरी में संभवतः सार्वजनिक निवेश ही वह इकलौता इंजन बचा था, जो विकास की गाड़ी को थोड़ा-बहुत आगे खींच रहा था.

    2019 के चुनावों से 18 महीने पहले, भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था पूरी तरह से लड़खड़ाई हुई दिखाई दे रही है. मोदी द्वारा लगातार 2022 तक पूरे किए जाने वाले नामुमकिन वादों की झड़ी लगाने का सिलसिला जारी है. इन नए वादों के पीछे छिपा संदेश यह है कि 2019 में उनकी सत्ता में वापसी पहले से ही तय है.

    इतिहास हमें बताता है कि राजनीति अक्सर चकमा देती है. किसी निजाम के आत्मविश्वास और लोकप्रियता के अपने चरम पर पहुंचने के ठीक बाद पैरों के नीचे की ज़मीन खिसकना शुरू कर देती है. मतदाता 2018 के बाद इस बारे में गंभीरता के साथ आकलन करना शुरू करेगा कि ‘नए भारत’ का वादा सच्चा है या फिर यह एक और बुलबुला है, जिसकी नियति ‘स्वच्छ भारत’ के कूड़ेदान में पड़ा पाया जाना है.(द वायर से साभार)

  • छोटे करदाताओं के लिए केवल पांच फीसदी टैक्स

    छोटे करदाताओं के लिए केवल पांच फीसदी टैक्स

    नई दिल्ली(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। केन्द्रीय वित्‍त एवं कॉरपोरेट मामलों के मंत्री श्री अरुण जेटली ने कहा कि वित्‍त मंत्रालय के आयकर विभाग ने कर प्रशासन में दक्षता, पारदर्शिता एवं निष्‍पक्षता सुनिश्चित करने के लिए पिछले दो-तीन वर्षों में अनेक कदम उठाए हैं। वित्‍त मंत्री ने इन पहलों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि 50 लाख रुपये तक की आमदनी वाले करदाताओं के लिए सिर्फ एक पेज वाला आईटीआर-1 (सहज) फॉर्म पेश किया गया। वित्‍त मंत्री ने कहा कि 2.5 लाख रुपये से लेकर 5 लाख रुपये तक की आमदनी वाले करदाताओं के लिए टैक्‍स दर 10 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दी गई जो दुनिया की न्‍यूनतम कर दरों में से एक है। वित्‍त मंत्री श्री जेटली ने यह भी कहा कि 5 लाख रुपये तक की आमदनी वाले ऐसे गैर-बिजनेस करदाताओं के लिए ‘कोई जांच नहीं’ अवधारणा शुरू की गई जिन्‍होंने पहली बार टैक्‍स रिटर्न भरा था। इसके पीछे मुख्‍य उद्देश्‍य यह था कि ज्‍यादा से ज्‍यादा लोग कर दायरे में आएं, अपने-अपने आईटी रिटर्न भरें और निर्धारित टैक्‍स भरें। वित्‍त मंत्री आज यहां ‘आईटी विभाग की पहलों’ विषय पर वित्‍त मंत्रालय से संबंद्ध सलाहकार समिति की दूसरी बैठक को संबोधित कर रहे थे।

    आयकर विभाग की अन्‍य पहलों पर प्रकाश डालते हुए वित्‍त मंत्री श्री अरुण जेटली ने कहा कि 50 करोड़ रुपये तक के कारोबार वाली कंपनियों के लिए कॉरपोरेट टैक्‍स की दर घटाकर 25 प्रतिशत के स्‍तर पर ला दी गई जिससे लगभग 96 फीसदी कंपनियों को कवर कर लिया गया। 01 मार्च, 2016 को अथवा उसके बाद गठित नई विनिर्माण कंपनियों को बगैर किसी छूट के 25 फीसदी की दर से टैक्‍स लगाए जाने का विकल्‍प दिया गया। वित्‍त मंत्री ने कहा कि प्रक्रियागत सुधारों के तहत न्‍यूनतम वैकल्पिक कर (मैट) से संबंधित क्रेडिट को 10 वर्षों के बजाय 15 वर्षों तक आगे ले जाने (कैरी फॉरवर्ड) की अनुमति दी गई।

    ई-गवर्नेंस के क्षेत्र में विभाग की पहलों पर रोशनी डालते हुए वित्‍त मंत्री ने कहा कि इस साल 97 फीसदी आयकर रिटर्न इलेक्‍ट्रॉनिक ढंग से दाखिल किए गए जिनमें से 92‍ फीसदी रिटर्न की प्रोसेसिंग 60 दिनों के भीतर कर दी गई और 90 फीसदी रिफंड 60 दिनों के भीतर जारी कर दिए गए। वित्‍त मंत्री ने यह भी कहा कि आयकर विभाग ने शिकायत निवारण प्रणाली ‘ई-निवारण’ शुरू की है जिसके तहत ऑनलाइन एवं कागज पर लिखकर दी गई सभी शिकायतों को एकीकृत कर दिया गया है और इनका निवारण होने तक इन पर करीबी नजर रखी जाती है। प्रत्‍येक शिकायत को स्‍वीकार किया जाता है और उसके समाधान के बारे में सूचना ईमेल और एसएमएस के जरिये दी जाती है। वित्‍त मंत्री ने कहा कि 4.65 लाख ई-निवारण शिकायतों में से 84 फीसदी शिकायतों का निपटारा अब तक किया जा चुका है।

    वित्‍त मंत्री श्री जेटली ने कहा कि ‘ई-सहयोग’ के जरिये सूचनाओं में अंतर वाले सभी मामलों को गैर-दखल तरीके से निपटाया जाता है जिससे कि पूर्ण जांच को टाला जा सके। वित्‍त मंत्री ने कहा कि आयकर विभाग द्वारा हर तिमाही लगभग 1.9 करोड़ वेतनभोगी करदाताओं को यह सूचना दी जाती है कि उनके नियोक्‍ताओं द्वारा कितना टीडीएस (स्रोत पर कर कटौती) जमा कराया गया है। वित्‍त मंत्री ने कहा कि विभाग की इन सभी ई-गवर्नेंस पहलों से कर निर्धारण अधिकारियों और करदाताओं के बीच प्रत्‍यक्ष संपर्क न्‍यूनतम हो गया है जिससे करदाताओं का उत्‍पीड़न कम करने, भ्रष्‍टाचार पर अंकुश लगाने और समय की बचत करने में मदद मिली है।

    केंद्रीय वित्‍त मंत्री ने कारोबार में सुगमता और वित्‍तीय बाजारों को बढ़ावा देने के लिए आयकर विभाग द्वारा उठाए गए कदमों पर भी प्रकाश डाला। इस संबंध में उन्‍होंने 50 लाख रुपये तक की आमदनी वाले प्रोफेशनलों के लिए प्रकल्पित कराधान योजना शुरू किए जाने का उल्‍लेख विशेष रूप से किया। इसी तरह कारोबारी आमदनी हेतु प्रकल्पित कराधान योजना के लिए सीमा को 1 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 2 करोड़ रुपये कर दिया गया है। वहीं, अंतरराष्‍ट्रीय वित्‍तीय सेवा केंद्र (आईएफएससी) में अवस्थित कंपनियों को लाभांश वितरण कर से मुक्‍त कर दिया गया है और उन्‍हें केवल 9 फीसदी की दर से मैट अदा करना होगा।

    जहां तक काले धन के खिलाफ छेड़े गए अभियान का सवाल है, आयकर विभाग ने वर्तमान सरकार के सत्‍ता में आने के बाद अनेक तरह के कदम उठाए हैं। इस संबंध में वित्‍त मंत्री ने काला धन अधिनियम 2015, बेनामी अधिनियम 1988 में किए गए व्‍यापक संशोधनों और ऑपरेशन क्लीन मनी इत्‍यादि का उल्‍लेख किया। वित्‍त मंत्री ने कहा कि 9 नवंबर, 2016 से लेकर 10 जनवरी, 2017 तक के विमुद्रीकरण संबंधी आंकड़ों के गहन अध्‍ययन के बाद लगभग 1100 तलाशियां ली गईं और इसके परिणामस्‍वरूप 513 करोड़ रुपये की नकदी सहित 610 करोड़ रुपये की राशि जब्‍त की गई। उन्‍होंने कहा कि 5400 करोड़ रुपये की अघोषित आय के बारे में पता लगा और समुचित कार्रवाई के लिए लगभग 400 मामले ईडी और सीबीआई को सौंपे गए हैं।

    ‘लेस कैश’ अर्थव्‍यवस्‍था और डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए वित्‍त मंत्री ने कहा कि आयकर विभाग ने अनेक कदम उठाए जिनमें 2 लाख रुपये अथवा उससे ज्‍यादा की नकदी की प्राप्ति पर जुर्माना लगाना, धर्मार्थ ट्रस्टों को नकद दान की सीमा को 10,000 रुपये से घटाकर 2,000 रुपये करना और राजनीतिक दलों को 2000 रुपये या इससे अधिक का नकद दान नहीं किया जाना, इत्‍यादि शामिल हैं।

    विमुद्रीकरण के असर और आयकर विभाग के विभिन्‍न सक्रिय कदमों पर प्रकाश डालते हुए वित्‍त मंत्री ने कहा कि प्रत्‍यक्ष करों के मामले में राजस्‍व संग्रह वित्‍त वर्ष 2016-17 के दौरान 14.5 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 8,49, 818 करोड़ रुपये के स्‍तर पर पहुंच गया। वित्‍त मंत्री ने यह भी कहा कि चालू वित्‍त वर्ष में 18 सितंबर, 2017 तक प्रत्‍यक्ष करों का शुद्ध संग्रह 15.7 प्रतिशत बढ़कर 3.7 लाख करोड़ रुपये के स्‍तर पर पहुंच गया।

    उन्‍होंने कहा कि करदाताओं की कुल संख्‍या वित्‍त वर्ष 2012-13 के 4.72 करोड़ से काफी बढ़कर वित्‍त वर्ष 2016-17 में 6.26 करोड़ हो गई।

    इससे पहले सीबीडीटी के अध्‍यक्ष श्री सुशील चंद्रा ने समिति के समक्ष आयकर विभाग की पहलों पर एक प्रस्‍तुति दी।

    उपर्युक्‍त बैठक में वित्‍त राज्‍य मंत्री श्री एस.पी.शुक्‍ला, वित्‍त सचिव श्री अशोक लवासा, राजस्‍व सचिव डॉ. हसमुख अधिया, निवेश एवं सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग में सचिव श्री नीरज कुमार गुप्‍ता, आर्थिक मामलों के विभाग में सचिव श्री एस.सी.गर्ग, मुख्‍य आर्थिक सलाहकार डॉ. अरविंद सुब्रमण्‍यन, सीबीडीटी के अध्‍यक्ष श्री सुशील चंद्रा और वित्‍त मंत्रालय के अन्‍य वरिष्‍ठ अधिकारीगण भी उपस्थित थे।

  • पिता ने सौंपी विरासत तो खैरात नहीं बांट सकतेःगौतम सिंघानिया

    पिता ने सौंपी विरासत तो खैरात नहीं बांट सकतेःगौतम सिंघानिया

    मुंबई(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। देश के स्थापित सूट ब्रांड रेमंड के मालिक गौतम सिंघानिया का जो पक्ष देश के सामने आया है उससे उनके पिता विजयपत सिंघानिया की सनक उजागर हो गई है। वे कंपनी के मालिकाना हक वाले जेके हाऊस को प्रमोटर के हाथों कौड़ियों के मोल बेचना चाह रहे हैं। इस प्रस्ताव के खिलाफ गौतम कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। मुंबई हाईकोर्ट ने उन्हें ये मामला अदालत से बाहर सुलझाने की सलाह दी है।

    गौतम ने पिता के उस दावे को खारिज किया है जिसमें उन्होंने कहा था कि बेटे के प्यार में आकर उन्होंने गलती से अपने 37.17 प्रतिशत शेयर बेटे को गिफ्ट कर दिए थे। इन शेयरों की कीमत बाजार में लगभग 1000 करोड़ रुपए है।गौतम सिंघानिया ने मीडिया को बताया कि ये शेयर फरवरी 2015 में ट्रांसफर हुए थे। पैंतीस सालों के लंबे प्रयासों के दौरान ये हिस्सा उन्होंने कंपनी के लिए काम करके कमाया था। गौतम अपने पिता के कारोबार में साथ देने वाले अकेले बेटे थे। इसलिए पिता ने उन्हें ये भागीदारी सौंपी। बातचीत में 52 साल के गौतम सिंघानिया ने कहा कि 35 सालों तक लगातार 16 घंटे काम करके उन्होंने कंपनी को संवारा है इसलिए परिवार में पहले ही ये बात तय थी कि पिता की विरासत बेटा संभालेगा। उन्होंने अपना स्टेक बेटे को देकर अपना कर्तव्य निभाया। इसके लिए कोई जोर जबरदस्ती तो थी नहीं। अगर पिता अपना स्टेक किसी और को देते तो कंपनी के 35000 कर्मचारियों का भविष्य बिगड़ सकता था। पिता ने शेयर सौंपे तो इसके बाद मैं या पिता कोई भी मनमाने ढंग से खैरात नहीं बांट सकते, इसके लिए कंपनी के शेयरहोल्डर्स के हितों की रक्षा करना हमारी प्राथमिकता है।

    रेमंड के सीएमडी ने कहा कि 2015 में पिता के हाथों कंपनी का स्टेक मिलने के बाद उन्हें कारोबार में प्रोफेशनलों को शामिल करने, सलाहकार बोर्ड बनाने जैसे कई फैसले लेने में सरलता होने लगी। ढाई साल पहले पिता से शेयर होल्डिंग कंट्रोल लेते ही मेरे लिए खेल बदल गया। ग्रोथ को बढ़ावा देने के लिए मैंने कई फैसले लिए।इसके बाद से कंपनी का शेयर 50 फीसदी तक चढ़ चुका है। इस दौरान बीएसई सेंसेक्स केवल 12 फीसदी बढ़ा है जबकि रेमंड के शेयरों का सुधार इससे कई गुना ज्यादा हुआ।

    पिता की बदहाली पर उन्होंने कहा कि नारियल का पेड़ तूफान में झुक जाता है पर दूसरे दरख्त नहीं झुकते इसलिए टूट जाते हैं। उन्होंने कहा कि रेमंड ने अपने अगले बीस सालों की रणनीति बनाई है। लोग इस ब्रांड को अपने नए अवतार में देख रहे हैं। कंपनी में कार्पोरेट गवर्निंग को बढ़ावा मिला है। राजनीतिक फैसलों के चलते कंपनी के बहुत से कामकाज नहीं हो पाते हैं, पर अब माहौल बदल गया है। उन्होंने कहा कि वे अपने शेयर होल्डर्स को अधिकतम फायदा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

  • फसलों का रिकार्ड रखो तो ज्यादा मिलेगा बीमा दावा

    पाँच वर्ष की औसत उत्पादकता और वास्तविक फसल उत्पादकता के अंतर पर बनता है बीमा दावा

    भोपाल 20 सितंबर(सुरेश गुप्ता)।

    प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत देश में सर्वाधिक 42 हजार किसानों को मध्यप्रदेश में बीमित किया गया है। इस योजना के अंतर्गत खरीफ 2016 के बीमित दावों का भुगतान किया गया है। खरीफ 2016 में सीहोर जिले के 43 हजार 850 कृषकों को 55 करोड़ 50 लाख की दावा राशि स्वीकृत हुई है। देखा जाय तो जिले के एक किसान के मान से 12 हजार 657 रुपये बीमा दावे का औसत आता है। लेकिन पटवारी हल्का अनुसार क्षतिस्तर भिन्न-भिन्न होने से कहीं अधिक और कहीं कम बीमा राशि का भुगतान हुआ।

    प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना पिछले 5 वर्षों की औसत उत्पादकता (जो फसल कटाई प्रयोग से निकाली जाती है) में वास्तविक फसल उत्पादकता के अंतर पर बीमा दावा बनाया जाता है।

    उदाहरण के लिये सीहोर जिले की रेहटी तहसील के पटवारी हल्का 44 में वास्तविक उपज तथा थ्रेश होल्ड उपज में फसल कटाई प्रयोगों में कमी मात्र 2 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर रही। इस वजह से बीमा दावा राशि अत्यन्त कम रही। दूसरी ओर जिन पटवारी हल्के में फसल कटाई प्रयोगों में थ्रेश होल्ड तथा वास्तविक फसल कटाई में अधिक अंतर रहा, वहाँ ज्यादा फसल बीमा राशि बनी।

    उदाहरण के लिये इसी तहसील के पटवारी हल्का 42 में थ्रेश होल्ड उपज से वास्तविक उपज में अंतर फसल कटाई प्रयोगों में 319 किलोग्राम प्रति हैक्टेयर रहा। इस कारण से इस पटवारी हल्के के ग्रामों में किसानों को फसल बीमा राशि अधिक मिली।

    सीहोर जिले में कृषकों को सोयाबीन फसल में अधिक नुकसान होने से अधिक राशि प्राप्त हुई है जैसे – कृषक श्री दशरथ सिंह पटवारी हल्का नं. 41 ग्राम अवंतिपुरा को बीमा दावा राशि 1,81,345 रुपये प्राप्त हुए हैं। इसी प्रकार कृषक श्री मनोहर सिंह पटवारी हल्का नं. 42 ग्राम महोड़िया को राशि 1,21,949 रुपये, कृषक श्री अशोक कुमार गुप्ता पटवारी हल्का नं. 42 ग्राम महोडिया को 1,40,752 रुपये, कृषक सिद्धनाथ सिंह पटवारी हल्का नं. 47 ग्राम संग्रामपुर को 97 हजार 480 रुपये, कृषक श्री भरतसिंह गेहलोत पटवारी हल्का नं. 52 ग्राम संग्रामपुर को 94 हजार 697 रुपये, कृषक श्री शेरसिंह पटवारी हल्का नं. 35 ग्राम तकीपुर को 85 हजार 732 रुपये, कृषक श्री पर्वतसिंह पटवारी हल्का नं. 64 ग्राम धबोटी को 76 हजार 636 रुपये, कृषक श्री नरसिंह पटवारी हल्का नं. 68 ग्राम बड़नगर को 84 हजार 882 रुपये और कृषक श्री हरिचरण पटवारी हल्का नं. 07 ग्राम सेमरादांगी को 66 हजार 539 रुपये प्राप्त हुए हैं।

    इस प्रकार यह स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के प्रावधानों के अनुसार पिछले 5 सालों में फसल कटाई प्रयोगों के मान से वास्तविक उपज के अंतर के अनुसार बीमा राशि का भुगतान होता है। कटाई अंतर कम होने पर बीमा राशि कम प्राप्त होती है और वास्तविक उपज का अंतर ज्यादा होता है तो दावा राशि ज्यादा प्राप्त होती है। यह भी कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना क्षेत्र आधारित है। किसानवार योजना नहीं है।

    किसान इस माह के अन्त तक फसल का बीमा करवायें

    भोपाल, 23 सितम्बर(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।

    प्राकृतिक आपदा से किसानों को होने वाले नुकसान की भरपाई के लिये केन्द्र सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना प्रारम्भ की है। इसमें किसानों को कम प्रीमियम देना पड़ता है। बीमा कंपनियों को रबी फसलों के प्रीमियम रेट का सिर्फ डेढ़ फीसदी एवं खरीफ फसल का 02 प्रतिशत किसान देंगे। बागवानी फसलों के मामले में किसानों को 05 प्रतिशत प्रीमियम देना होगा। बाकी प्रीमियम केन्द्र और राज्य की सरकारें देंगी। यह योजना 2016 से लागू की गई है। जिले के कृषकों से जिला प्रशासन द्वारा अपील की गई है कि अऋणी कृषक 30 सितम्बर तक निकट के बैंक से सम्पर्क कर अथवा जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक से सम्पर्क कर अपनी रबी फसल का बीमा करवा सकते हैं।

    ऋणी किसान हेतु स्वीकृत ऋण राशि एवं अऋणी किसान के प्रस्ताव बैंक में जमा कराने की तिथि 15 सितम्बर 2017 से 15 जनवरी 2018 निर्धारित है। बैंकों से बीमा कंपनी को घोषणा-पत्र भेजने की अन्तिम तिथि 28 फरवरी 2018 है। किसानों के खातों से काटे गये प्रीमियम को बीमा कंपनी को जमा करने की अन्तिम तिथि ऋणी कृषकों के लिये 15 फरवरी 2018 एवं अऋणी कृषकों के लिये 22 जनवरी 2018 है। बीमा योजना के तहत पैदावार के आंकड़े निर्धारित करने की अन्तिम तिथि 30 जून 2018 निर्धारित की गई है।

    प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अन्तर्गत सभी प्रकार की फसलों रबी, खरीफ, वाणिज्यिक और बागवानी को शामिल किया गया है। उपज नुकसान के आधार पर इस योजना में बिजली गिरने, तूफान, ओला पड़ने, चक्रवात, अंधड़, बवंडर, बाढ़, जलभराव, जमीन धंसने, सूखा, खराब मौसम, कीट एवं फसल को होने वाली बीमारियां आदि जोखिम से फसल को होने वाले नुकसान को शामिल कर एक ऐसा बीमा कवर दिया जाता है, जिसमें इनसे होने वाले सारे नुकसान से सुरक्षा प्रदान की जाती है।

  • नरेन्द्र मोदी के साथ महाशक्ति की राह पर भारत

    नरेन्द्र मोदी के साथ महाशक्ति की राह पर भारत


    - भरतचन्द्र नायक
    वीरता और पराक्रम में सदैव से भारत अजेय रहा है। उसकी समृद्धि ने सभी को ललचाया और बाह्य आक्रमण का दंश झेला, लेकिन समय की रफ्तार के साथ कदम से कदम मिलाने में जो चूक हुई उसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा। जब आक्रमण का प्रचलन हो चुका था और दुश्मन ने तोप बंदूक से लेस होकर आक्रमण किया हम अपना शौर्य भाला तलवार लेकर दिखा रहे थे। आजादी के बाद विकास की ओर ध्यान गया। कदम संभले पं. नेहरू ने बांध जलाशयों, कारखानों को तीर्थधाम बनाया। इंदिरा जी ने परमाणु शक्ति संपन्नता की ओर ध्यान दिया। राजीव गांधी ने देश में कंप्यूटरीकरण का मार्ग प्रशस्त करने का श्रेय दिया गया। अटलजी ने प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना से गांवों तक विकास की रोशनी पहुंचाई। मोदी जी ने देश को बुलेट पर सवार कर दिया। लोकतंत्र में सत्ता पक्ष की नीतियों कार्यक्रमों का विरोध अनिवार्य है और ऐसा हुआ, लेकिन 2014 में जब सोलहवीं लोकसभा के चुनाव की रणपेटी बजी और गुजरात के सफल मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी के चुनाव प्रचार की कमान संभाली उनकी प्रखर आलोचना उनके लिए स्वीकार्यता विस्तार में सहायक सिद्ध हुई। मोदी ने पूर्ववर्ती सरकार के भ्रष्टाचार से मुक्ति, महंगाई पर लगाम, सुरक्षा परिदृश्य में सुखद बदलाव का भरोसे और अच्छे दिन आने का सपने को देश की जनता ने मोदी जी के नेतृत्व में उनकी कटु आलोचना के बावजूद भारतीय जनता पार्टी के नाम प्रचंड बहुमत के साथ जनादेश दे दिया। मजे की बात यह रही कि जब नरेंद्र मेादी को जनता एक दूर दृष्ठा, कल्पनाशील और कुशल प्रशासक के रूप में देख रही थी। राजनैतिक दल उन्हें मौत का सौदागर बता रहा था। जनता महसूस कर चुकी थी कि विरोध राजनैतिक है। वास्तविकता यह थी कि गुजरात ने मोदी के नेतृत्व में नई करवट ली थी। गुजरात विकास के हर मापदंड पर कसे जाने के बाद देश में अब्बल, प्रगतिशील अमन चैन के मामले अब्बल राज्य था, जो राजनैतिक दल मोदी पर असहिष्णुता का इल्जाम लगा रहे थे उनके द्वारा शासित राज्यों से गुजरात के अल्पसंख्यक तरक्की की ऊंची सीढ़ियां चढ़ चुके थे। जनता देख चुकी थी कि नरेंद्र मोदी समस्या नहीं समाधान पुरूष है।

    प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी अपने कार्यकाल के तीन वर्ष पूर्ण कर चुके हैं और उन्होंने मंत्रालयवार अपना रिपोर्ट कार्ड जनता को सौंप दिया है। कुछ स्थानेां को अपवाद स्वरूप छोड़कर जहाॅ विधानसभा चुनाव अथवा लोकसभा उपचुनाव हुए जनता ने तमाम मुसीबतें सहते हुए मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी और भाजपानीत एनडीए कोसमर्थन देकर विजय रथ आगे बढ़ाया है। नरेंद्र मोदी सरकार ने कड़े, कष्टप्रद फैसले लेने में कभी गुरेज नहीं किया जिनका पुरजोर विरोध भी हुआ लेकिन देश की अपढ़ कही जाने वाली जनता ने मुसीबते झेलते हुए माना कि मोदी की दिशा और दशा सही है। नीयत में खोट नहीं है। विपक्ष के सामने सबसे बड़ी हैरानी परेशानी की बात यह रही कि वह बीते तीन वर्षों में एनडीए सरकार पर गड़बड़, घोटाला, भ्रष्टाचार का एक भी इल्जाम नहीं लगा पाई। जब 8 नवम्बर 2016 को एकाएक नोटबंदी का ऐलान हुआ गैरभाजपा दल हक्के-बक्के रह गये। उनका सीधा सपाट आरोप था कि बिना जनता को भरोसे में लिए इतना बड़ा फैसला क्यों ले लिया कि करेंसी कम पड़ गई। बैंकों से खाताधारियों को अपनी रकम निकालने पर पाबंदी लग गई। बैंकों के सामने बंद करेंसी बदलने के लिये गरीबों, अमीरों की लाइने लग गई। नोटंबंदी को कालेधन और उसके सृजन पर प्रहार बताया गया रोजी-रोटी छोड़ कर मजदूर भी बैंक के दरवाजे पर वहीं खड़ा था जहां धन्ना सेठ वारी का इन्तजार कर रहे थे। विपक्ष को मुंहमांगा मुद्दा मिल गया। लेकिन आम आदमी ने माना कि इससे कालेधन की समानान्तर चलने वाली व्यवस्था ध्वस्त हो गई जनता ने विरोध के स्वरों को अनसुना ही नहीं किया उत्तरप्रदेश जेसे राज्य में भारतीय जनता पार्टी को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विजय से नवाजा और नोटबंदी के प्रबल विरोधियों को हाशिये पर धकेल दिया। नीति नीयत ने मोदी का हर बार साथ दिया। आलोचना मोदी को संजीवनी साबित हुई। नोटबंदी के पश्चात् उपलब्धि की जो गुलाबी तसवीर रिजर्व बैंक ने सार्वजनिक की है वह साबित करती है कि आजदी के पश्चात् देश के आर्थिक क्षेत्र में नोटबंदी सबसे बड़ा कं्रातिकारी सुधार है जिसने धनपतियों की तसवीर बैंक के राडार पर ला दी है। अब न तो बेनामी सौंदे हो पा रहे हैं और न कालाधन खपाने की गली शेष बची है। बैंकों में नकदी का अंबार लगा है। कर्ज वितरण आसान हुआ है। टेक्स का वेस बड़ा है और सरकार के खजाने में आने वाले टेक्स में बहुगुवित वृद्धि हुई है।

    सुरक्षा परिदृश्य में आये बदलाव से दुनिया चकित है। पड़ौसी देश पाकिस्तान और चीन भ्रमित है। सर्जिकल स्ट्राईक ने दुनिया को बता दिया है कि भारत अब साफ्ट इस्टेट नहीं रहा है। इसकी डोकलाम प्रकरण में भारत की दृढ़ता ने मोहर लगा दी है। चीन को डोकलाम मामले में उल्टे पैर लौटना पड़ा है। इसने भारत की प्रतिष्ठा में चारचांद लगा दिये हैं। चीन के पुसैल पाकिस्तान को भारत की सीमा में आतंकवाद फैलाने के लिए उकसाने वाले चीन को ही ब्रिक्स की बैठक में पाकिस्तान की भत्र्सना करने को नरेंद्र मोदी ने विवश कर दिया। यह पहला मौका था जब मोदी ने चीन की धरती पर चीन केा मात दे दी। विश्व शक्तियां दांत तले अंगुली दबाने को विवश हुई। लेकिन इसे कांग्रेस की नादानी ही कहेंगे कि जब चीन भारत के बीच तनाव चरम पर था राहुल गांध्ीा चीन के दूतावास पहुंच गये और खुद संदेह के घेरे में आ गये। देश विदेश खासकर अमेरिका ने भारत में जीएसटी की जी भरकर प्रशंसा की। लेकिन राहुल गांधी ने अमेरिका की धरती पर जीएसटी का विरोध करके न केवल घरेलु मामलों पर विवाद खड़ा कर दिया अपितु अपनी कूटनीतिक निरक्षरता जनता के सामने उजागर कर दी।

    हाल के दिनों में जापान के प्रधानमंत्री आबे ने भारत पहुंचकर नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों का खुलेमन से समर्थन किया अपितु भारत को सामरिक, आर्थिक समर्थन देकर पड़ौसी देश चीन का बुलेट और पाकिस्तान को बुलट का अर्थ समझा दिया। आज पाकिस्तान यदि आतंकवादी देश के रूप में अलग-थलग खड़ा है और चीन की विस्तारवादी दुष्प्रवृत्ति के कारण विश्व के अधिकांश देश चीन के विरोधी और भारत के समर्थन में खड़े हैं यह इक्कीसवीं शताब्दी की बड़ी सफलता है जिसका श्रेय नरेंद्र मोदी को जाता है। उन्होंने भारत के इतिहास को नया मोड़ देकर वैश्विक पटल पर भारत का मान और प्रतिष्ठा बढ़ाई है।

    नरेंद्र मोदी के प्रयास से अहमदाबाद से मुंबई बुलेट ट्रेन की आधार शिला रखे जाने के पश्चात् जापान के प्रधानमंत्री ने ऐलान किया है कि वे 2022 में बुलेट ट्रेन से भारत के नयनाभिराम स्थलों का दौरा करेंगे। पांच वर्षों में पूर्ण होने वाली बुलेट ट्रेन परियोजना पर 84 लाख करोड़ रू. का खर्च आयेगा जो कर्ज के रूप में जापान भारत को 0.1 प्रतिशत ब्याज पर देगा। नरेंद्र मोदी का यह कहना कि बुलेट ट्रेन परियोजना भारत को मुफ्त में पड़ेगी अतिरंजना नहीं एक हकीकत है। क्योकि इस कर्ज राशि की वसूली 15 वर्ष बाद लंबी अवधि की किश्तों में होगी। तब तक यह परियोजना भारत के लिए दुधारू गाय साबित हो चुकी होगी। देश के औद्योगिक शहरों में आवागमन सरल, सुलभ पर यातायात का दबाव केन्द्रित होने से सड़क और देश यातायात पर से दबाव घटेगा। इससे पर्यावरण संरक्षण का नया अध्याय आरंभ होगा।

    नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हर क्षेत्र में काम की गति में तीव्रता आई है। सबसे बड़ी बात यह है कि भारत की दुनिया की महाशक्ति की राह पर अजेय बनकर बढ़ रहा है भारतीय फौज ने पाकिस्तान के विरूद्ध सर्जिकल स्ट्राईल लालसेना के साथ साहसिक झड़पे मोल ली हैं। ऐसा पहली बार हुआ कि भारत ने सीना तानकर इसकी जानकारी सार्वजनिक करने में गुरेज नहीं किया। अब तक यह साहस विश्व का महानशक्तिशाली देश अमेरिका ही करता रहा है। इतिहास में दर्ज है कि पूर्ववर्ती सरकार के दौर में नाथूला पर हुई झड़पों में चीन के 300 सैनिक ढेर हुए थे लेकिन सरकार यह बताने का साहस नहीं कर सकी थी। क्योंकि उसे अंदेशा था कि ऐसा करने से चीन भड़क जायेगा। लेकिन इस बार सेना को जितनी आजादी दी गई। उतने ही खुलेपन के साथ भारतीय फौज के शौर्य का सरकार ने बखान किया और उसे पूरा श्रेय भी दिया। अब तक भारत की विदेश नीति संकोच के अवकुंठन रही है। लेकिन मोदी ने इसमें साहस के साथ पारदर्शिता का रंग भरा है और देश का भाल उन्नत किया है यहीं महाशक्ति के सिर का सेहरा है।

  • अब चीन भी आतंकवाद पर भारत के साथ

    अब चीन भी आतंकवाद पर भारत के साथ

    नई दिल्ली । चीन के शियामेन शहर में ब्रिक्स सम्मेलन के समापन की औपचारिक घोषणा के साथ अगले साल दक्षिण अफ्रीका के जोहानिसबर्ग में अगले ब्रिक्स सम्मेलन की घोषणा की गई।

    ब्रिक्स सम्मेलन पर देश और दुनिया की नजर इस बात पर टिकी थी कि भारत और चीन के बीच बातचीत का एजेंडा क्या होगा। सोमवार को जब ब्रिक्स का घोषणापत्र जारी हुआ तो उसमें अहम बात ये रही कि पहली बार चीन ने माना कि लश्कर और जैश दुनिया के लिए खतरनाक हैं। ब्रिक्स के घोषणापत्र में लश्कर और जैश संगठनों का जिक्र होना भारत के लिए अहम कामयाबी मानी गई। गोवा में 2016 के ब्रिक्स के घोषणापत्र के समय भारत की तमाम कोशिशों के बाद भी लश्कर और जैश के नाम पर चीन अड़ गया था। आज जब पीएम मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनफिंग के बीच मुलाकात हुई तो कयास लगाए जा रहे थे कि शायद डोकलाम के मुद्दे पर दोनों देशों के बीच बातचीत हो। लेकिन चीन ने बातचीत से पहले ही साफ कर दिया कि डोकलाम पर बातचीत नहीं होगी।

    पीएम मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की बातचीत के बाद विदेश सचिव एस जयशंकर ने सधे अंदाज में कहा कि मतभदों को कभी विवाद नहीं बनने देंगे। भारत के इस बयान से साफ हो गया कि पंचशील सिद्धांतों के तहत ही चीन और भारत को आगे बढ़ने की जरुरत है।