Category: अपराध

  • मनीष गौतम रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार

    मनीष गौतम रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार

    अहमदाबाद,11 दिसबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। डायरेक्टर आफ रीजनल आऊटरीच ब्यूरो(आरओबी) के निदेशक और भारतीय सूचना सेवा के अधिकारी मनीष आर गौतम को गुजरात एंटी करप्शन ब्यूरो ने बीस हजार रुपए की रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया है।भोपाल दूरदर्शन में सहायक निदेशक रहा ये अधिकारी एक जादूगर से रिश्वत लेते धराया गया है।

    अहमदाबाद पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का यह प्रथम श्रेणी अधिकारी एक जादूगर को प्रचार कार्य का ठेका देने के लिए रिश्वत मांग रहा था। कलाकार की शिकायत पर एंटी करप्शन ब्यूरो ने नेहरूनगर में जाल बिछाया और गौतम को रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों धर दबोचा।पुलिस ने उसके कब्जे से रिश्वत की रकम के रूप में बीस हजार रुपए बरामद किए हैं।

    प्राप्त जानकारी के अनुसार मनीष गौतम के विरुद्ध कई सालों से रिश्वतखोरी की शिकायतें मिलती रहीं हैं। भोपाल दूरदर्शन में संवाददाताओं को नियुक्त करने में रिश्वत लेने के संबंध में भी शिकायतें की गईं थीं लेकिन जांच एजेंसियों की शिथिलता के चलते कार्रवाई नहीं की जा सकी। फिलहाल गुजरात एंटी करप्शन ब्यूरो उन शिकायतों की भी छानबीन कर रहा है। गौतम की संपत्तियों की भी जानकारी जुटाई जा रही है।

  • अदालतों में भ्रष्टाचार का अंत

    अदालतों में भ्रष्टाचार का अंत

    भोपाल जिला बार एसोसिएशन ने जिले के लोगों को स्वाधीनता दिवस की बड़ी सौगात दी है। उसने घोषणा की है कि आज से जिले की अदालतों में भ्रष्टाचार नहीं होगा। किसी भी प्रकार के गैरकानूनी लेनदेन की शिकायत यदि मिलती है तो बार एसोसिएशन उस आपराधिक कृत्य करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में शिकायत दर्ज कराएगा। जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेश व्यास राज्य की एडवोकेट एनरोलमेंट कमेटी के अध्यक्ष भी हैं। जबलपुर हाईकोर्ट के दायरे में चलने वाली ये संस्था संवैधानिक दर्जा प्राप्त है। इस लिहाज से राजेश व्यास की राय प्रदेश की समूची न्यायपालिका की आत्मा की आवाज मानी जा सकती है। खुद राजेश व्यास कहते हैं कि उनकी ये राय एक दिन में नहीं बनी है। वे लंबे समय से प्रदेश भर के पीठासीन जजों, बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों,सदस्यों,वरिष्ठ अधिवक्ताओं, न्यायिक कर्मचारी संघों के पदाधिकारियों, कर्मचारियों, वरिष्ठ और कनिष्ठ अधिवक्ताओं, कोर्ट मुंशियों, थाने के मुंशियों ,चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों से चर्चा करते रहे हैं। सभी इस घृणित परंपरा को पसंद नहीं करते हैं। इसके बावजूद बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे। इस मुद्दे पर कोई बोलने की पहल नहीं करता है। इसलिए अदालतों की गरिमा रोज खंडित होती रहती है और न्याय देने दिलाने का काम आम जनता से दूर होता जाता है।

    राजेश व्यास कहते हैं कि ये बात सही है कि मंहगाई के इस दौर में किसी अनजान पक्ष के लिए न्याय दिलाने की लंबी जद्दोजहद बहुत खर्चीली होती है। यदि भ्रष्टाचार का सामना न भी करना पड़े तब भी पक्षकार को दर दर की ठोकरें खाना पड़ती हैं। ऐसे में लोग अदालत की चौखट चढ़ने को भी अपने पूर्व कर्मों का पाप मानने लगते हैं। यही वजह है कि सभी के बीच संवाद के दौरान उनके मन में भ्रष्टाचार मुक्त अदालतों का विचार आया। उनका कहना है कि लोगों के बीच से न्यायपालिका को लेकर बना संशय दूर होने से समूची न्यायप्रक्रिया से जुड़े लोगों को सिर ऊंचा करके चलने का अवसर मिलेगा।

    वे कहते हैं कि जिस तरह अदालतों का कामकाज तेजी से कंप्यूटरीकृत होता जा रहा है ऐसे माहौल में किसी पक्षकार का काम केवल इसलिए टरकाया जाए कि उससे रिश्वत वसूलनी है तो ये बड़ा गंभीर अपराध है। देश भर की अदालतों में जब लंबित प्रकरणों को निपटाने की तेजी अपनाई जा रही है ऐसे माहौल में वकीलों का काम सरल बनाने के लिए जरूरी है कि समूचा कामकाज पारदर्शी बनाया जाए। अब जबकि नोटबंदी के बाद लेनदेन का काम भी लोग मोबाईल एप से करने लगे हैं तब वकीलों की भागदौड़ घटाने के लिए भी जरूरी है कि न्याय प्रक्रिया को सरल बनाया जाए।
    राजेश व्यास ने झंडावंदन के बाद अध्यक्षीय उद्बोधन में जब ये बात कही तो वकीलों ने इसका भरपूर स्वागत किया। जिला एवं सत्र न्यायाधीश शैलेन्द्र शुक्ला ने भी उनकी बात का समर्थन करके इस राय पर अपना निर्णय सुना दिया। उन्होंने कहा कि ये सराहनीय पहल है और पूरी न्यायपालिका की ओर से वे इस फैसले का स्वागत करते हैं। ये राय इस संवैधानिक स्तंभ से जुड़े लोगों के बीच व्यापक विमर्श से निकली है इसलिए अदालतों में इसे लागू कराने के लिए कोई सख्ती की भी जरूरत नहीं पड़ेगी।

    राजेश व्यास ने कहा कि लोगों को सस्ता त्वरित और सुलभ न्याय दिलाना आज इसलिए भी जरूरी हो गया है कि देश विकास के एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है। यदि हम लोगों को कानूनी पचड़ों में ही उलझाए रहेंगे तो पड़ौसी देशों या विश्व के देशों से विकास के पैमाने पर कभी मुकाबला नहीं कर पाएंगे। उनका मानना है कि लोगों को सुलभ न्याय मिले और वकीलों को उन्हें न्याय दिलाने के लिए अनावश्यक परेशान न होने पड़े इसे देखते हुए ही उन्होंने ये निर्णय लिया कि इस नैतिक गंदगी का पुरजोर विरोध किया जाए।

    वरिष्ठ अधिवक्ता सी.एस. शर्मा कहते हैं कि इस फैसले से न्यायपालिका की गरिमा बढ़ेगी। अदालतों और जनता के बीच करीबी बढ़ने से ज्यादा लोग अदालतों के माध्यम से अपने फैसले करवा सकेंगे।जिस तरह पारिवारिक मामले अदालतों में अधिक आने लगे हैं उन्हें देखते हुए अदालतों को लोगों की मित्र बनाना जरूरी है। अदालत का कामकाज सुगम हो तो ज्यादा लोग अदालतों के माध्यम से कानून का राज कायम कर सकेंगे। विकास की गति तेज करने की दिशा में ये कदम मील का पत्थर साबित होगा। उनका कहना है कि इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए।

    एडवोकेट श्रीमती सुनीता राजपूत ने कहा कि अदालत की चौखटों पर पहुंचने वाले आम नागरिकों के हितों की रक्षा में ये नई परिपाटी ऐतिहासिक साबित होगी। उन्होंने कहा कि न्याय प्रक्रिया का लाभ आम नागरिकों तक पहुंचाने में वकीलों की बड़ी भूमिका होती है। अदालतों में बढ़ने वाले अनावश्यक खर्चों से डरकर बहुत से लोग न्याय से वंचित रह जाते हैं। अब जब अदालतों का कामकाज जनता के ज्यादा करीब होगा तो इससे ज्यादा लोग अदालत पहुंचेंगे और न्यायपालिका की गरिमा बढ़ेगी।

  • सड़क को युद्धस्थल बनाया तो फिर रोने की गुजाईश नहीं

    सड़क को युद्धस्थल बनाया तो फिर रोने की गुजाईश नहीं

    आलोक सिंघई

    सड़कें हमारी जीवनरेखा हैं और दिन भर हमें इन पर खेल भावना से दौड़ना होता है। न चाहते हुए भी कई बार हमसे गलतियां हो जाती हैं और इसका एकमात्र समाधान यही है कि गलती के लिए तत्काल माफी मांग ली जाए। प्रभावित का गुस्सा पल भर में काफूर हो जाता है और हम भी बिना वजह के तनाव से बच जाते हैं। जब हम कानों में ईयरफोन लगाकर मोबाईल पर बात कर रहे हों और अचानक अपनी गाड़ी सड़क पर डाल दें। इससे मुख्य सड़क पर आने वाले दूसरे वाहन चालक को अचानक स्टीयरिंग मोड़कर ब्रेक लगाना पड़े तो उसके चालक का झुंझलाना वाजिब है। वह भी तब जब इन हालात में कोई निरीह राहगीर कुचलने से बच जाए तो उसके रंज की तीव्रता बढ़ना भी स्वाभाविक है। इन हालात में हमारा दायित्व है कि हम क्षमा मांग लें और आगे बढ़ें। यदि पिटने के भय से हम वहां से भाग भी खड़े हों और प्रभावित गाड़ी वाला पीछा करके भीड़ भरे स्थान पर आपको गरियाने आ जाए तब भी सॉरी के दो बोल आपका काम चला सकते हैं। जब प्रभावित कार चालक अपने परिवार की महिलाओं और बुजुर्ग के साथ हो और अचानक आपको महिला चालक के रूप में सामने पाए तो उसका मकसद सिर्फ आपको उलाहना देना ही हो सकता है।वह राजधानी के सार्वजनिक स्थल पर छेड़खानी नहीं कर सकता। इस पर भी यदि वो पच्चीस वर्षीय वाहन चालक जैन परिवार का लड़का हो तो क्षमा भरे दो बोल उसके गुस्से पर घड़ों बर्फीले पानी का काम कर सकते हैं। क्योंकि उसने अपने संस्कारों से जाना है कि क्षमा वीरों का आभूषण होता है। ये सब तब संभव है जब आप सड़कों की यात्रा खेल भावना से करते हैं।

    बेशक सड़कों पर चलते समय कानून हर पल हमारा तरफदार होता है। हमारा अधिकार है कि हम अपने ऊपर होने वाली ज्यादतियों के लिए कानून का सहारा लें। कानून सड़क पर चलने वाले हर राहगीर और वाहन चालक पर समान रूप से लागू होता है। सड़क पर गाड़ी चलाते समय आप स्त्री या पुरुष नहीं केवल चालक होते हैं। आपकी गाडी़ की पहचान के लिए परिवहन विभाग नंबर जारी करता है जिस पर आप स्त्री या पुरुष किसी का भी नाम लिखवा सकते हैं। ये नाम तब तक सार्वजनिक होता है जब तक आपका वाहन सड़क पर होता है। इसे आप गैरेज में रख दें तो ये आम जनता से छुपाया जा सकता है। सड़क पर आप ये नहीं बोल सकते कि मेरे वाहन का रजिस्ट्रेशन नंबर और नाम आपने उजागर कर दिया इससे मेरी स्त्री अस्मिता चोटिल हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने रेप पीड़िता या स्त्री अत्याचार से पीड़िता की पहचान उजागर न करने का कानून बनाया है, सड़क पर चलने वाले वाहन की चालक स्त्री का नाम छुपाने का कोई प्रावधान उसने नहीं किया है। यातायात नियमों में साफ प्रावधान है कि यदि कोई वाहन चालक असावधानी से वाहन चलाता है तो उसका लाईसेंस निरस्त किया जा सकता है। इसके बावजूद परिवहन विभाग की भर्राशाही के कारण गलत लाईसेंस जारी होना और उसका निरस्त न होना लगभग मजाक बना हुआ है।

    दरअसल आजादी के बाद से कांग्रेस की सरकारें आम नागरिकों को शैतान पर कंकर मारने की सोच से हांकती रहीं हैं। सर ए ओ ह्यूम ने भारतीयों की कांग्रेस को अंग्रेजों के शॉक एब्जार्बर के लिए बनाया था। समय के साथ लोगों ने अंग्रेजों को शैतान पाकर कंकर फेंकने शुरु कर दिए और वही कांग्रेस स्वाधीनता संग्राम की वजह बनी।महात्मा गांधी जानते थे कि ये मानस आगे चलकर आत्मघाती साबित होगा इसलिए उन्होंने कहा कि कांग्रेस का काम अब खत्म हो गया इसे समाप्त कर दिया जाना चाहिए था। इसके बावजूद सत्ता लोलुपों ने उसे चलने दिया। उन्होंने कंकर मारने के इस भाव को राजाओं की ओर, फिर सामंतों की ओर, फिर पूंजीपति सेठों की ओर मोड़ दिया। बालीवुड की फिल्में नायक और खलनायक के दो ध्रुवों के बीच ही झूलती रहती हैं। खलनायक जितना पीटा जाएगा नायकत्व उतना ज्यादा उभरेगा। आधुनिक भारत में यही भाव अभिशाप बन गया है। कश्मीर में शैतान पर कंकर मारने वाला यही भाव सेना को खलनायक बनाए फिर रहा है और सेना के बूटों तले रौंदा जा रहा है। देश की जनता ने सत्ता की चाभी भाजपा को सौंपी कि वह इस गलती को नहीं दुहराएगी। जबकि भाजपा आज उससे बड़ी कांग्रेस साबित हो रही है। महिला वोटों की खेती के लिए उसने बालिका से बलात्कार करने वालों के खिलाफ सख्त कानून बना दिए। जबकि दोषियों को दंड देने के पर्याप्त विधान पहले से मौजूद थे।

    इसका विपरीत असर ये हुआ है कि आम स्त्री के मन में असुरक्षा का भाव घर कर गया है। वह सोचती है कि हर पुरुष रेपिस्ट है, अत्याचारी, आतताई है।जबकि हकीकत में पुरुष और स्त्री एक दूसरे के पूरक हैं। भोपाल के प्रेस काम्पलेक्स में घटित वाहन दुर्घटना को भी स्त्री के विरुद्ध साजिश बताने की कोशिश की जा रही है। लापरवाही से उपजे तनाव को क्षमा के दो बोल से ठंडा किया जा सकता था। दुर्घटना का एक पक्ष टीवी की एंकर स्वयं हो तब तो एकमात्र यही अपेक्षा की जा सकती है। पर समस्या शैतान पर कंकर फेंकने वाली सोच में निहित है। उस स्त्री के सलाहकार जब उसे उकसा रहे हों कि उसे गलती के लिए टोका जाना स्त्री अस्मिता पर प्रहार है। पत्रकार होते हुए कोई भला उसे कैसे टोक सकता है। तब रायता फैलना स्वाभाविक ही है। फिर जब इसमें राजनीति प्रविष्ट हो जाए। कांग्रेस के नेता, ठेकेदार, और माफिया शामिल हो जाएं तो फिर जाहिर है कि भाजपा की मौजूदा सरकार को लानत मलानत से कौन बचा सकता है। इस पर भी जब विपक्ष की बागडोर किसी पुतुल प्रेमी को सौंप दी गई हो तो फिर पुलिस को हर दिन तैयार रहना होगा कि उस पर प्रदेश भर के विभिन्न स्थानों पर स्त्री की रक्षा न कर पाने का लांछन जरूर लगेगा।

    समाज के जिम्मेदार लोगों को सोचना होगा कि सड़क पर चलने वाले वाहन धारक यदि अपने चालक की लापरवाही का भूल सुधार न करेंगे तो सड़कें खेल का मैदान बनने की जगह युद्ध भूमि बन जाएंगी। फिर जब आप युद्ध भूमि में प्रवेश कर जाएं तो फिर स्त्री, बुजुर्ग या लाचार होने का कोई मतलब ही नहीं रह जाता है। घटनास्थल की सच्चाई से भागकर आप इसे युद्ध की पृष्ठभूमि में ले जाना चाहते हैं तो फिर आपकी नियत आसानी से समझी जा सकती है। विषय पुलिस की विवेचना से ज्यादा आत्मचिंतन का है। इसे समझेंगे तो न केवल यातायात, खेल बन जाएगा बल्कि, देश भी सीरिया बनने से बच जाएगा।

  • घाटा देने वाली मिल खाक,छीने रोजगार

    घाटा देने वाली मिल खाक,छीने रोजगार


    भोपाल,25 फरवरी,(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।चांदबड़ स्थित न्यू भोपाल टेक्सटाईल मिल की नई यूनिट भीषण आग के चलते राख हो गई है। अपनी स्थापना के साल 1937 से लगातार घाटा दे रही इस मिल को मुनाफे में लाने के लिए जुलाई 2013 में यहां नई यूनिट लगाई गई थी। इसके बावजूद नई और पुरानी दोनों यूनिटें लगातार घाटा देती जा रहीं थीं। सूत्र बताते हैं कि इसी के चलते मिल में कल रात रहस्यमयी आग से पूरी यूनिट स्वाहा हो गई और लगभग एक हजार परिवार बेरोजगार हो गए हैं।

    मिल के प्रबंधक अजय दीक्षित ने इस मुद्दे पर बात करने से इंकार कर दिया। इसके बावजूद फैक्टरी के सूत्रों ने बताया कि कल रात की पारी में करीबन ढाई बजे जब ब्लो रूम में श्रमिकों ने चिंगारियां देखीं तो उन्होंने उन्हें बुझाने के लिए फव्वारे चालू किए। तब वाटर लाईन में पानी ही नहीं था इसलिए आग मशीन के ऊपर पड़े यार्न के कचरे तक पहुंच गई। घबराए श्रमिकों ने जब फायर उपकरणों का प्रयोग करना चाहा तो वे खाली निकले। श्रमिकों को आपात स्थिति से निपटने का प्रशिक्षण भी नहीं दिया गया था। इसलिए आग भड़कने के बावजूद उन्होंने मशीनें बंद नहीं कीं। आपात कालीन स्थिति से निपटने में पूरी तरह नाकाम प्रबंधन भी वक्त पर मौजूद नहीं था। सुपरवाईजर तय नहीं कर पा रहे थे कि अब क्या किया जाए। मिल का अग्निशमन अमला जब तक घटना स्थल पर पहुंचता तब तक आग पूरी यूनिट तक पहुंच चुकी थी।
    घबराए प्रबंधन ने आग की सूचना फायर ब्रिगेड तक दी लेकिन तब तक पूरी नई यूनिट भीषण आग से घिर चुकी थी। आनन फानन में सेना तक को सूचना दी गई। बाद में जेसीबी मशीनों से मिल की दीवारें तोड़ी गईं तब आग पर पानी की बौछारें पहुंच सकीं। सुबह तक आग पर काबू नहीं पाया जा सका था। मिल प्रबंधन से श्रमिकों को सुबह की पारी में आने से रोक दिया और उन्हें आश्वासन दिया गया कि उनकी हाजिरी होगी और पारिश्रमिक भी दिया जाएगा।
    गौरतलब है कि कपड़ा मंत्रालय के हस्तक्षेप के बाद मिल में 107 करोड़ रुपए का निवेश किया गया था। पहली किस्त में 27 करोड़ और दूसरी किस्त में 81 करोड़ दिए गए थे। इस दौरान केवल यार्न का धागा बनाने की यूनिट लगाई गई थी। तत्कालीन कपड़ा मंत्री संबाशिवा राव ने दूसरे चरण की शुरुआत करते हुए कहा था कि मिल का उत्पादन दोगुना हो जाएगा और ये मुनाफा कमाने लगेगी।
    1937 में स्थापित इस मिल को औद्योगिक और वित्तीय पुननिर्माण बोर्ड (बीआईएफआर) ने घाटा पहुंचाने वाली मिल करार दिया था। मध्यप्रदेश की सात मिलों में से पांच को अव्यावहारिक इकाईयां बताकर बंद कर दिया गया था। इसके बाद बुरहानपुर की ताप्ती मिल और भोपाल की इस इकाई में सरकार ने और भी निवेश किया था। इसके बावजूद ये इकाईयां आत्मनिर्भर नहीं हो पाईं. नई सरकार ने इन मिलों के प्रबंधन से उनके कामकाज का ब्यौरा मांगा है जिसके चलते प्रबंधन अपनी गलतियां छुपाने का जतन कर रहा है। बताते हैं कि मिल प्रबंधन ने षड़यंत्र पूर्वक ऐसे हालात निर्मित कर दिए कि आग भड़की और उसे समय पर बुझाया भी नहीं गया।

  • अपराधी का पीछा करेगा अब कंप्यूटर

    अपराधी का पीछा करेगा अब कंप्यूटर

    अपराधी न्याय प्रणाली को फास्ट ट्रैक बनाने के लिये सीसीटीएनएस डिजिटल पुलिस पोर्टल का शुभारंभ

    * दीपक राजदान

    जैसे-जैसे अपराध बढ़ते जा रहे हैं और अपराधी तकनीक का सहारा ले रहे हैं, ऐसे में राज्यों में कानून तोड़ने वालों को सजा दिलाने में पुलिस जांचकर्ताओं को कठिन चुनौती का सामना करना पड़ता है। यद्यपि इस स्थिति में क्रान्तिकारी बदलाव आ रहा है। इस वर्ष अगस्त माह में भारत सरकार ने डिजिटल पुलिस पोर्टल का शुभारंभ किया, यह भारत सरकार के क्राइम एण्ड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एण्ड सिस्टमस का एक अंग है। यह न केवल पुलिस अधिकारियों द्वारा अपराधियों को तेजी से पकडने में मदद करेगा बल्कि अपराध पीडि़त को समाधान की प्रक्रिया में भी ऑनलाइन मदद करेगा।

    देश में अपराधों में बढ़ोतरी का ग्राफ बढ़ा है वर्ष 2014 में अपराधों की संख्‍या 28.51 लाख थी जो वर्ष 2015 में बढ़कर 29.49 लाख हो गई। केन्द्रीय गृह मंत्रालय की नवीनतम वार्षिक रिपोर्ट (2016-17) के अनुसार वर्ष 2011 में कुल उपलब्ध अपराध आंकड़ों में आईपीसी अपराधों का प्रतिशत हिस्सा 37.2 प्रतिशत था औऱ यह वर्ष 2015 में बढ़कर 40.3 प्रतिशत हो गया। अपराध दर में यह बढोत्तरी प्रति एक लाख जनसंख्या पर वर्ष 2012 में 497.9 से वर्ष 2015 में 581.8 हो गयी।

    इस तरह की परिस्थितियों में विभिन्‍न सुविधाओं से युक्‍त डिजिटल पुलिस पोर्टल स्‍थि‍‍ति में परिवर्तन का परिचायक हो सकता है। सीसीटीएनएस पोर्टल जांचकर्ताओं को पूरे देश में किसी भी अपराधी के इतिहास की पूरी जानकारी देगा। गूगल टाइप एडवान्स सर्च इंजन से सुसज्जित एवं विश्लेषण जानकारी देने में सक्षम, यह पोर्टल देश की अपराधी न्याय प्रणाली का आधार साबित हो सकता है। राज्य पुलिस संगठनों और जाँच एजेंसी जैसे सीबीआई, आईबी, ईडी और एनआईए के लिए यह डिजिटल पुलिस पोर्टल, 11 सर्च और 44 रिपोर्ट की सुविधाओँ के साथ, अपराध और अपराधियों के राष्ट्रीय डेटाबेस उपलब्ध कराएगा। यह राष्ट्रीय सुरक्षा में सुधार लाएगा और देश में पुलिस की कार्यप्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव लाएगा। डिजिटल पोर्टल नागरिकों को एफआईआर दर्ज करने की ऑनलाइन सुविधा प्रदान करता है। प्रारंभिक रूप से 34 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में सात पब्लिक डिलीवरी सर्विसिज होंगी जैसे कर्मचारियों, किराएदारों, परिचारिकाओँ आदि के पते की पुष्टि, लोक कार्यक्रमों की मेजबानी की इजाजत, वस्तु और वाहन चोरी खोया और पाया आदि की जानकारी उपलब्‍ध होगी। यह पोर्टल अपराधिक जांच को पूरी तरह से नागरिक-मैत्री सेवा के रूप में बदल देगा। नागरिकों की रिपोर्टस और (अनुरोध), जांच कार्य के लिये बिना समय गंवाए सीधे राज्य एवं केन्द्र शासित प्रदेशों की पुलिस को भेजे जा रहे हैं।

    वर्ष 2004 में गृह मंत्रालय ने पुलिस स्टेशनों में स्टेन्ड अलोन आधार पर अपराधिक रिकॉर्डस का कम्पयूटरीकरण करने के उद्देश्य से, राज्‍य पुलिस बलों के आधुनिकीकरण की परियोजना (मार्डनाइजेशन ऑफ स्टेट पुलिस फोरसिस) (एमपीएफ) के एक भाग के रूप में कामन इन्टेगरेटीड पुलिस एप्लीकेशन (सीआईपीए) परियोजना की शुरूआत की। बाद में आपराधिक रिकॉर्डस के राष्ट्रीय डेटाबेस की आवश्यकता महसूस होने पर गृह मंत्रालय ने वर्ष 2009 में सीसीटीएनएस की शुरूआत, सभी पुलिस स्टेशनों को एक कामन एप्लीकेशन साफ्टवेयर के अऩ्तर्गत आपस में जोड़ने और जांच, नीति निर्धारण, डेटा विश्लेषण, अनुसंधान और नागरिक सेवाएं प्रदान करने की।

    यह परियोजना राज्य पुलिस अधिकारियों को अपराध एवं अपराधियों के आंकड़ों को सीसीटीएनएस एप्लीकेशन में दर्ज करने का मंच प्रदान करती है। जिसे राज्य डेटा बेस के माध्यम से स्टेट डाटा सेन्टर, राष्ट्रीय आंकड़ों के लिए नेशनल डाटा सेन्टर से प्राप्त किया जा सकता है। इस परियोजना पर कुल मंजूर व्यय राशि दो हजार करोड़ रुपये है। केन्द्र सरकार राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों को हार्डवेयर, सीसीटीएऩएस सॉफ्टवेयर, कनेक्टविटी, एकीकृत प्रणाली, परियोजना प्रबंधन एवं प्रशिक्षण प्रदान करती है। केन्द्र सरकार ने राज्यों को 1,450 करोड़ रुपये की राशि दी है जिसमें से 1,086 करोड़ रुपये राज्यों औऱ केन्द्र शासित प्रदेशों द्वारा व्‍यय किए जा चुके हैं।

    वर्तमान में, इस योजना के अंतर्गत 15,398 पुलिस स्टेशनों में से 14,284 पुलिस स्टेशनों में सीसीटीएऩएस सॉफ्टवेयर लगाया गया है। 14,284 पुलिस स्टेशनों में से कुल 13,775 पुलिस स्टेशन इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करते हुए शतप्रतिशत एफआईआर दर्ज कर रहे हैं। 15,398 पुलिस स्टेशनों में से 13,439 पुलिस स्टेशन इस योजना में शामिल हैं। 15,398 पुलिस स्टेशनों में से 13,439 पुलिस स्टेशन इस योजना में शामिल है, यह पहले से ही जुड़े हुए हैं। अपराध और अपराधियों के रिकॉर्डस राज्य एवं राष्ट्रीय डेटा बेस से जुड़े हुए हैं। सीसीटीएनएस का प्रयोग करते हुए मार्च 2014 में 1.5 लाख से कम एफआईआर दर्ज हुई जो जून 2017 में बढ़कर 1.25 करोड़ हो गई। 34 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों ने प्रधान सेवाओं जैसे अपराध रिपोर्ट करना, सत्यापन का अनुरोध, कार्यक्रमों की अनुमति इत्यादि के लिए अपने राज्य नागरिक पोर्ट सेवाओँ की शुरूआत की है। 36 में से 35 राज्य एवं केन्द्र शासित प्रदेश राष्ट्रीय अपराध औऱ अपराधिक डेटाबेस के साथ आंकड़े साझा कर रहे हैं। इस प्रणाली में अपराध औऱ अपराधिक आंकड़ों के 7 करोड़ रिकॉर्डस हैं जिसमें 2.5 करोड़ एफआईआर रिकॉर्ड्स औऱ संबद्ध आंकड़े शामिल है।

    सीसीटीएनएस परियोजना का दायरा पुलिस आंकड़ों को अपराधिक न्याय प्रणाली के अऩ्य स्तंभो के साथ एकीकृत करने जैसे न्यायालय, जेल, अभियोग, पैरवी, फोरेंसिक और फ़िंगरप्रिंट्स और किशोर गृहों की पहुंच तक बढ़ाया गया है। इसी के अऩुसार एक नई प्रणाली – अंतर परिचालन आपराधिक न्याय प्रणाली (आईसीजेएस) भी विकसित की गई है। आईसीजेएस प्रणाली का विकास वांछित डेटा पाने के लिए एडवांस सर्च सेवा के साथ एक डैशबोर्ड के रूप में किया गया है। इस आईसीजेएस परियोजना का संचालन एक कार्य समूह द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश श्री मदन बी लोकुर की अध्यक्षता में किया गया है।

    राज्य पुलिस संगठनों और सभी जांच एजेंसियों का डिजिटल पुलिस पोर्टल द्वारा सशक्तिकरण किया गया है। यह पोर्टल सीसीटीएनएस राष्ट्रीय डेटा बेस पर आधारित 11 सर्च और 44 रिपोर्ट प्रदान करता है। यह अग्रिम खोज (एडवांस सर्च) गहन खोज और विश्लेषणात्मक तकनीक से सज्जित है। यह प्रारंभिक खोज दो तरह से पूरी की जा सकती है। खोज के प्रथम चरण में सर्च प्रक्रिया पूर्ण दर्ज किए गए नाम को दिखायेगी (उदाहरणार्थ नाम एवं परिजन नाम) किन्तु जहां एक अथवा दोनों नाम हैं वही रिकॉर्ड देगा। सर्चिंग के द्वितीय चरण में यह आंशिक मेल के साथ रिकॉर्ड प्रदान करेगा और पूर्ण परिणाम भी उपलब्‍ध करायेगा।

    पोर्टल पर विभिन्न प्रकार के फिल्टर्स उपलब्ध हैं जिनके माध्यम से आँकड़े छांटे जा सकते है और नजदीक लाए जा सके है। व्यक्ति के नाम, व्यक्ति एवं परिजन नाम, व्यक्ति एवं धारा/अनुच्छेद, निशुल्‍क आधारभूत खोज और दर्ज एफआईआर पर सटीक खोज, संख्या/मोबाइल नम्बर/इमेल के द्वारा सर्च पूरी की जा सकती है। यह सीसीटीएनएस पोर्टल जांचकर्ताओं को पूरे देश में किसी भी अपराधी के इतिहास की पूर्ण जानकारी प्रदान करेगा।

    यह सॉफ्टवेयर गूगल टाइम एडवांस सर्च इंजन और विश्लेषणात्मक रिपोर्ट्स प्रस्तुत करता है। अभी हाल ही में इस सॉफ्टवेयर का प्रयोग तमिलनाडु की कुछ मानसिक रूप से विकसित महिलाओं को ढूंढने के लिए उत्तराखंड में किया गया और उन्हें उनके परिवार से मिलाया गया। बाद में इस सीसीटीएनएस डेटाबेस को वाहन पंजीकरण के लिए सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय डेटाबेस से जोड़ा जाएगा।

    डिजिटल पुलिस पोर्टल की शुरूआत के बाद से नागरिकों ने पोर्टल पर शिकायतें दर्ज करना शुरु कर दिया है। यह डिजिटल पुलिस पोर्टल दोस्ताना रूप में नागरिक-केंद्रित सेवाओं को सुगम रूप से उपलब्‍ध कराने के लिए सरकार की मदद कर रहा है जो आज के आधुनिक कल्याणकारी राज्य की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

    * श्री दीपक राजदान एक वरिष्ठ पत्रकार हैं और वर्तमान में द स्टेट्समैन, नई दिल्ली में संपादकीय सलाहकार हैं। इस आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं।

  • अड़ीबाज पुलिस और लाचार शिवराज

    अड़ीबाज पुलिस और लाचार शिवराज


    भोपाल,22 नवंबर,(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। मध्यप्रदेश की भारतीय जनता पार्टी सरकार अपनी चौथी पारी के लिए जिन महिला वोटों की खेती कर रही है उसके कारण स्त्री प्रताड़ना के मामलों में तो बाढ़ सी आ गई है। संपत्तियों पर कब्जे के लिए महिलाओं की आड़ लेकर धड़ाधड़ मुकदमे दर्ज हो रहे हैं। इनमें वे मामले भी शामिल हैं जिनमें स्त्रियां सचमुच प्रताड़ित हुईं हैं। इसके बावजूद सरकार की सदाशयता का लाभ लेकर ढेरों प्रकरण हर दिन सामने आ रहे हैं। सरकार की नासमझी और कथनी करनी में अंतर से व्यवस्था कैसे चौपट होती है, ये उसका सटीक उदाहरण है। खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पुलिस मुख्यालय जाकर आपराधिक मामलों की समीक्षा की। हालांकि ये काम गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह का था। पुलिस के जागरूक अधिकारियों ने बढ़ते अपराधों की जो वजहें बताई हैं उनमें मैदान में पुलिस की सक्रियता कम होना तो एक कारण है ही साथ में पुलिस के बीच बढ़ती अड़ीबाजी की घटनाएं भी शामिल हैं।

    कुछ समय से पुलिस के मैदानी पदों पर पदस्थापना के लिए चंदे की दरें जिस तरह बढ़ती रहीं हैं उससे पुलिस अपराध रोकने के बजाए खुद अपराध को बढ़ावा देने वाला संगठन बनकर रह गई है। सिपाही से लेकर तमाम मैदानी पदों पर पदस्थापना के लिए तो चंदा वसूला ही जा रहा है साथ में खामोशी से शहरों में जमे रहने के लिए बाकायदा फीस वसूली जाती है। अड़ीबाजी के मामलों की तो हालत ये है कि हवलदार और एएसआई तक इतने पावरफुल हो गए हैं कि वे टीआई या सीएसपी की फटकार को हवा में उड़ा देते हैं।जब जिले के पुलिस अधीक्षक उन पुलिसवालों के विरुद्ध कार्रवाई करते हैं तो वरिष्ठ पुलिस अधिकारी उन्हें रोक देते हैं।इन पुलिस अफसरों के भी सरकार से अच्छे संबंध बताए जाते हैं इसलिए पुलिस मुख्यालय में बैठे अफसर भी लाचारी महसूस करते हैं। सबसे बड़ी बात तो ये है कि खुद मुख्यमंत्री निवास के बाजू में स्थित श्यामला हिल्स थाने से भी अड़ीबाजी का ये काम धड़ल्ले से किया जा रहा है।

    हाल में पालीटेक्निक कालेज के एक शिक्षक के विरुद्ध एक महिला ने छेड़खानी की शिकायत श्यामला हिल्स थाने में की। थाने में पदस्थ एएसआई शिवेन्द्र मिश्रा ने शिक्षक के घर जाकर पांच लाख रुपए की मांग की। धमकाते हुए कहा कि उस महिला ने बलात्कार की शिकायत की है। यदि तुमने पैसे नहीं दिए तो फिर जेल जाने के लिए तैयार हो जाओ।उस महिला के दो साथी पहले से गवाही के लिए तैयार थे। आरटीओ दलाल के रूप में काम करने वाले संजय पाठक और रेखा परिहार ने ही उस महिला को घरेलू काम के लिए भेजा था और वे ही थोड़ी देर बाद थाने ले गए। रिश्वत का दबाव बनाने के लिए दोपहर में मीडिया के कुछ कैमरामेनों को भी पुलिस ने बुला लिया और शाम के अखबारों में मुकदमा दर्ज होने की सूचना भी दे दी। जबकि खुद पुलिस ने अपने रिकार्ड में शाम को मुकदमा दर्ज होना दिखाया है।

    ये गिरोह पुलिस के निर्देश में कई अन्य लोगों पर भी अड़ीबाजी का काम कर चुका है। रिश्वत की वसूली खुद पुलिस का एएसआई शिवेन्द्र मिश्रा करता है। जबकि गिरोह के सद्स्यों को सरकार से मिलने वाले हर्जाने की राशि और बाद में समझौते के नाम पर वसूली के लिए तैयार किया जाता है। इस घटना की जानकारी पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को भी दी गई लेकिन सभी लाचार थे। कई बड़े अफसरों ने तो टीआई से भी कहा कि मामले की पूरी छानबीन करके प्रकरण दर्ज करो लेकिन एएसआई ने तब तक प्रकरण दर्ज करके चालान भी अदालत में प्रस्तुत कर दिया। ये बात सही है कि अदालत में ये प्रकरण नहीं टिकेगा।साक्ष्य और परिस्थितिजन्य स्थितियों के बीच आरोपी खुद को बेगुनाह साबित कर लेगा,लेकिन तब तक वो अदालतों के चक्कर ही काटता रहेगा। इस तरह के एक नहीं सैकड़ों प्रकरण प्रदेश भर में रोज दर्ज किए जा रहे हैं। महिला अपराधों के मामलों में यदि पुलिस प्रकरण दर्ज नहीं करती है तो उसे दंड का भागी बनना पड़ता है ये भय दिखाकर अड़ीबाज पुलिस वाले दिल से प्रकरण दर्ज करने में जुट गए हैं।

    मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद को सख्त दिखाना चाहते हैं लेकिन उनकी पुलिस सरकार की असफलताओं को करीब से देख रही है। सरकार के कथित भ्रष्टाचारों की पोल भी सबसे पहले पुलिस के सामने ही खुलती है। इससे पुलिस की अड़ीबाजी की प्रवृत्ति खुलकर सामने आ रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह, डीजीपी ऋषि शुक्ला और तमाम बड़े अधिकारी पुलिस सुधार के नाम पर बैठकें कर रहे हैं। निर्देश जारी कर रहे हैं लेकिन हकीकत में जमीन पर स्थितियां पूरी तरह विपरीत हैं। पुलिस सड़कों पर गश्त लगा रही है। मैदानी अफसरों को कहा गया है कि अपराधियों की छानबीन करो ताकि जनता को पुलिस की मौजूदगी का भरोसा हो सके। लेकिन पुलिस को मैदान में उतारना अपराधों को और भी बढ़ाने की वजह बन रहा है। पुलिस के कामकाज का आकलन करने की व्यवस्था धराशायी होने से बदमाश पुलिस वाले तो मजा मौज कर रहे हैं जबकि हम्माली वाली ड्यूटी ईमानदार पुलिस वालों के पल्ले पड़ रही है।

    गृहमंत्री भूपेन्द्रसिंह पुलिस महकमे के बजाए परिवहन महकमे की व्यवस्थाएं संभालने में ज्यादा रुचि रखते हैं। उन पर सरकार की मैदानी व्यवस्थाएं संभालने की भी जवाबदारी है। मुख्यमंत्री के चहेते मंत्री होने के नाते उन्हें हर काम की आजादी भी मिली हुई है। इसके बावजूद पुलिस मुख्यालय के अफसरों ने उनके आदेशों के बजाए सीधे मुख्यमंत्री के आदेशों पर अमल करने की नीति अपना रखी है। यही वजह है कि गृहविभाग पर सीधे मुख्यमंत्री का हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है।

    पुलिस मुख्यालय के आला अफसर भी दबी जुबान से इन स्थितियों को बयान कर रहे हैं। लेकिन उनका कहना है कि बढ़ते अपराधों की वजह पुलिस नहीं बल्कि सरकार की असफलताएं हैं। अपने लंबे कार्यकाल में सरकार रोजगार के साधन नहीं बढ़ा सकी है। आधारभूत ढांचे के विकास के नाम पर सरकार ने भारी धन व्यय किया है लेकिन इसका असर निचले स्तर तक नहीं पहुंचा है। चंद उद्योगपतियों की गिरफ्त में होने के कारण भारी बजट का अधिकांश हिस्सा बाजार में पहुंचने के बजाए सीधे उद्योगपतियों के खातों में पहुंचा है। अधिकतर उद्योगपतियों का जुड़ाव राष्ट्रीय नेताओं और प्रदेश के बाहर के औद्योगिक घरानों से है इसलिए मुनाफे की रकम भी प्रदेश में खर्च नहीं की गई है। प्रदेश पर कर्ज बढ़ा जिससे ब्याज भी बढ़ता गया है। नतीजतन आर्थिक अपराधों की संख्या में भारी इजाफा हो रहा है। किसानों की दुर्दशा और सरकार के शहरीकरण के अभियानों ने भी व्यवस्था को चौपट कर दिया है।

    भारतीय जनता पार्टी की सरकार अपने कुशल संगठन के भरोसे चौथी बार भी सत्ता में आने की तैयारी कर रही है। जबकि प्रमुख विपक्षी दल के रूप में कांग्रेस आज भी मैदान में धराशायी है। उसका न तो संगठन है और न ही उसके नेताओं में कोई सुरताल है। मैदान में लंबे समय से पदस्थ अफसरों ने जब महसूस कर लिया कि सरकार का हर काम चंदे से जुड़ा है तो उन्होंने अपनी मनमानी शुरु कर दी है। जिसका नतीजा बढ़ते अपराधों के आंकडों से साफ महसूस किया जा सकता है। सरकार अपराध पर नियंत्रण के लाख दावे करे लेकिन आने वाले समय में अपराधों की ये परिपाटी और भी तेजी से बढ़ती महसूस होगी।

  • बलात्कारियों को सजा दिलाने पुलिस ने डॉ. हर्ष शर्मा को बुलाया

    बलात्कारियों को सजा दिलाने पुलिस ने डॉ. हर्ष शर्मा को बुलाया


    भोपाल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)3 नवंबर। 31 अक्टूबर की रात हबीबगंज रेलवे स्टेशन के नजदीक घटित सामूहिक बलात्कार की वारदात के बाद पुलिस ने अब दोषियों को दंडित कराने के लिए मोर्चा संभाल लिया है। बेहद शर्मनाक गेंगरेप की इस घटना के बाद आज पुलिस ने फोरेंसिक विशेषज्ञ को लेकर घटना स्थल का बारीकी से मुआयना किया। कई नए साक्ष्य भी जुटाए ताकि दोषियों को दंडित कराने के लिए सबूतों की कड़ी को आपस में जोड़ा जा सके। इसके लिए पुलिस ने प्रदेश के सबसे बड़े फोरेंसिक वैज्ञानिक डॉ.हर्ष शर्मा को बुलाया है।

    सागर स्थित राज्य न्यायालयिक विज्ञान प्रयोगशाला के निदेशक डॉ.हर्ष शर्मा ने आज घटना स्थल का बारीकी से मुआयना किया। उन्होंने पुलिस को वारदात से जुड़े कई अहम सबूतों को एकत्र करने की सलाह दी। घटना स्थल पर मौजूद अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक तकनीकी सेवाएं दिनेश चंद सागर ,डी.पी.गुप्ता आईजी रेल, भोपाल स्थित फोरेंसिक शाखा के प्रभारी डॉ.दिनेश शर्मा एवं संबंधित पुलिस थानों के प्रभारी अधिकारियों के साथ घटना से सभी पहलुओं की छानबीन की।

    राजधानी के प्रमुख क्षेत्र में घटित इस घटना के बाद पुलिस को भारी बदनामी झेलनी पड़ रही है। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने पुलिस की अक्षमता के लिए सरकार को दोषी ठहराया है। जन न्याय दल के अध्यक्ष एड्व्होकेट बृजबिहारी चौरसिया ने कहा कि बलात्कार जैसे संज्ञेय अपराध में पीड़िता की रिपोर्ट लिखने में पुलिस ने देरी करके सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन किया है। वरिष्ठ पत्रकार अनिल तिवारी ने कहा कि देश की सर्वोच्च अदालत की संविधान पीठ ने ललिता कुमारी विरुद्ध स्टेट आफ यूपी मामले में किसी भी संज्ञेय अपराध में प्रथम सूचना रिपोर्ट तत्काल दर्ज करने के निर्देश दिए थे। दिल्ली में घटित निर्भया कांड के बाद अनुच्छेद 141 में पुलिस एक्ट में संशोधन करते हुए कहा था कि ड्यूटी पर तैनात किसी भी अधिकारी की कर्तव्य निर्वहन में लापरवाही पर धारा 166 ए के तहत कार्रवाई की जाना जरूरी है। इस धारा में लापरवाह अधिकारियों को समुचित आधार पाए जाने पर एक साल की सजा से दंडित किया जा सकता है।

    गौरतलब है कि विदिशा निवासी एक छात्रा जब 31 अक्टूबर को अपनी कोचिंग की पढ़ाई समाप्त करके ट्रेन पकड़कर घर जाने के लिए रेलवे पटरी से गुजर रही थी तभी वहां बैठे दो अपराधियों ने उसका अपहरण कर लिया था। उन्होंने लड़की से से बलात्कार किया और उसके सोने के कर्णफूल और मोबाईल भी छुड़ा लिए। यही नहीं उन्होंने अपने दो साथियों को भी बुला लिया। चारों अपराधियों ने लड़की से सात बार बलात्कार किया और लगभग चार घंटों तक उसे बंधक बनाए रखा था। बाद में अपराधियों के चंगुल से छूटकर लड़की ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। इस मामले में एमपीनगर पुलिस और हबीबगंज पुलिस ने अपना क्षेत्र न होने के कारण कार्रवाई करने से इंकार कर दिया। बाद में रेलवे पुलिस ने प्रकरण कायम कर मामले की तफतीश शुरु की।

    सबसे बड़ी बात तो ये है कि खुद लड़की ने अपने पिता के साथ मिलकर एक आरोपी को पक़ड़ा और उसे पुलिस के सुपुर्द किया। आज जब ये मामला अखबारों की सुर्खियां बना तब सरकार और पुलिस सभी सक्रिय हुए।

    मध्यप्रदेश सरकार को इस मामले में काफी अपयश झेलना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर पुलिस महकमें में अनावश्यक हस्तक्षेप करने के आरोप लगाए जा रहे हैं। जबकि गृह मंत्री भूपेन्द्र सिंह पर भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण देने के आरोप लग रहे हैं। पुलिस महानिदेशक ऋषि कुमार शुक्ला ने इस संबंध में पुलिस मुख्यालय में विशेष बैठक ली और आरोपियों को दंडित कराने के निर्देश दिए। भोपाल डीआईजी संतोष सिंह की कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान लगाए जा रहे हैं।

  • डंपर कांड के विधिक सलाहकार तनखा को  लोकायुक्त की नियुक्ति गलत नजर आई

    डंपर कांड के विधिक सलाहकार तनखा को लोकायुक्त की नियुक्ति गलत नजर आई


    सरकार को घेरने में जुटी कांग्रेस की लाबी की करारी शिकस्त
    भोपाल 17 अक्टूबर, (पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। डंपर खरीदी कांड में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को क्लीनचिट दिलाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले हाईकोर्ट के वकील विवेक तनखा को अब नए लोकायुक्त जस्टिस नरेश गुप्ता की नियुक्ति गलत नजर आ रही है। विशेष कृपा से राज्यसभा सांसद बने विवेक तनखा का कहना है कि सरकार ने नैतिक आधार पर ये फैसला गलत लिया है।उनका कहना है कि नए लोकायुक्त महोदय वर्तमान उपलोकायुक्त जस्टिस माहेश्वरी से छह साल जूनियर हैं इसलिए ये फैसला न्यायपालिका की मान्य परंपराओं के विपरीत है।

    सामान्य प्रशासन विभाग ने बाकायदा अधिसूचना जारी करके जस्टिस नरेश गुप्ता की नियुक्ति की घोषणा कर दी है। वे दीवाली से एक दिन पहले कल अपना कार्यभार ग्रहण करेंगे।जस्टिस गुप्ता 2010 में मप्र हाईकोर्ट में न्यायाधीश बने थे।जनवरी 2016 में उनका तबादला ग्वालियर कर दिया गया। वे 30 जून 2017 को रिटायर हुए थे।

    जस्टिस गुप्ता की नियुक्ति पर सबसे पहले राज्यसभा सांसद और कांग्रेस के राष्ट्रीय विधि प्रकोष्ठ से जुड़े विवेक तनखा ने ट्वीट करके कहा कि सरकार ने रातोंरात लोकायुक्त बनाकर विधि के मान्य सिद्धांतों को तोड़ा है।उन्होंने नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह की चुप्पी पर भी आश्चर्य व्यक्त किया। इस मामले में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने बताया कि उन्होंने लगभग सवा साल से खाली पड़े लोकायुक्त पद को भरने के लिए सरकार को पत्र लिखा था। इसके जवाब में सरकार ने उन्हें सूचित किया कि मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के माननीय चीफ जस्टिस ने लोकायुक्त पद के लिए जस्टिस नरेश गुप्ता का नाम भेजा है। जाहिर है विपक्ष के नेता होने के नाते मैंने उसका अनुमोदन कर दिया।

    जस्टिस गुप्ता की नियुक्ति पर सवाल उठाने वाले आरटीआई एक्टिविस्ट अजय दुबे का कहना है कि लोकायुक्त की नियुक्ति को पहले कैबिनेट से मंजूरी ली जानी थी। बाद में इसे राज्यपाल के पास भेजा जाना था। लेकिन सरकार ने प्रस्ताव को सीधे राज्यपाल के पास भेज दिया। उनका सवाल है कि सरकार यह बताए कि आखिर ऐसी कौन सी जल्दी थी जो सरकार ने नियुक्ति का प्रस्ताव सीधे राज्यपाल को भेज दिया। जब सवा साल से पद खाली था तो कुछ दिन और इंतजार किया जा सकता था।हालांकि जब उनसे पूछा गया कि प्रक्रिया को छोड़कर इस नियुक्ति में गलत क्या है। इसके जवाब में उन्होंने चुप्पी साध ली।

    दरअसल ये मामला मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के वकीलों और कांग्रेस समर्थित जजों की लॉबी से जुड़ा है। विवेक तनखा लंबे समय से मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के फैसलों में दबदबा बनाए रहे हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही राजनीतिक दलों के विधि सलाहकारों के हित साधने में उन्हें महारथ हासिल है। इस बात का जस्टिस नरेश गुप्ता लंबे समय से विरोध करते रहे हैं। न्यायपालिका ने टकराव टालने के लिए ही उन्हें जबलपुर बेंच से हटाकर ग्वालियर भेज दिया था। सूत्रों का कहना है कि उप लोकायुक्त जस्टिस यू सी माहेश्वरी ने सवा साल में लगभग सौ मामलों पर स्वतः संज्ञान लेकर प्राथमिक जांच शुरु कराई थी। बाद में जब उन्हें पता लगा कि ये मामले बाकायदा षड़यंत्र पूर्वक लोकायुक्त संगठन को भेजे गए हैं तो उन्होंने उन मामलों की फाईलें ठंडे बस्ते में डाल दीं। इसी को लेकर तनखा की लॉबी लंबे समय से जस्टिस यू सी माहेश्वरी पर फैसले न लेने के आरोप लगा रही थी। उप लोकायुक्त के माध्यम से अपना राजनीतिक हित साधने में जुटे तनखा और उनके सहयोगियों का कहना है कि पूर्व लोकायुक्त जस्टिस पीपी नावलेकर ने अपने पूरे कार्यकाल में नौ मामलों में स्वतः संज्ञान लेकर जांच शुरु कराई थी जबकि उप लोकायुक्त यूसी माहेश्वरी ने सौ मामलों को संज्ञान में लेकर जांच शुरु कराई पर उन्हें लंबित कर दिया।

    अब जबकि सरकार ने हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की सिफारिश पर अमल करते हुए जस्टिस गुप्ता की नियुक्ति की प्रक्रिया आनन फानन में पूरी कर ली तो इससे सरकार को घेरने में जुटी तनखा की लॉबी बौखला गई है। उसका मानना है कि इतने लंबे समय तक लोकायुक्त नियुक्त न होने के दौरान विवेक तनखा की लॉबी ने जो मामले लोकायुक्त संगठन में भेजे उनसे कांग्रेस की रणनीति तो उजागर हो गई है लेकिन उनके लंबित रहने से सरकार को घेरने का उनका मकसद कामयाब नहीं हो सका है। इसे सरकार के संसदीय कार्य मंत्री नरोत्तम मिश्रा का मास्टर स्ट्रोक भी कहा जा रहा है। जस्टिस गुप्ता की नियुक्ति के बाद भ्रष्टाचार के मामलों पर फैसले लेने में तेजी आएगी और लंबित पड़े मामलों का निराकरण जल्दी हो जाएगा। इससे लंबे समय से लोकायुक्त संगठन में रहकर सरकार के विरोध में षड़यंत्र कर रहे जजों और अफसरों की भी भूमिका उजागर हो गई है। इससे लोकायुक्त संगठन में अब बड़े बदलावों की भी संभावना व्यक्त की जाने लगी है।

  • डेरा सच्चा सौदा के समर्थक हत्याएं और आगजनी पर उतरे

    डेरा सच्चा सौदा के समर्थक हत्याएं और आगजनी पर उतरे

    पंचकूला(विनीत कुमार)।डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम को सीबीआई की विशेष अदालत ने बलात्कार मामले में दोषी करार दिया है। उन्हें इस मामले में सजा 28 अगस्त को सुनाई जाएगी।अदालत के इस फैसले के बाद उनके समर्थकों ने पंजाब और हरियाणा में कई हिंसक वारदातों को अंजाम दिया जिससे पच्चीस से अधिक लोग मारे गए हैं। करोड़ों रुपयों की संपत्ति जला दी गई है। दो रेलवे स्टेशनों को आग में फूंक दिया गया है। हाईकोर्ट ने डेरा सच्चा सौदा की पूरी संपत्ति को राजसात करने के आदेश दिए हैं। अदालत ने कहा है कि डेरा समर्थक जिस सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाएंगे उसकी कीमत डेरा की संपत्ति से वसूल की जाएगी।

    प्रशासन ने हरियाणा के पंचकुला और पंजाब के फिरोजपुर, बठिण्डा और मानसा में कर्फ्यू लगा दिया गया है. फतेहाबाद, जयतो और फरीदकोट को रेड अलर्ट पर रखा गया है.हरियाणा के पुलिस महानिदेशक ने बताया है कि राज्य में 2500 लोगों को हिरासत में लिया गया है. राज्य के गृह सचिव राम निवास के मुताबिक हरियाणा में हालात नियंत्रण में है. समाचार एजेंसियों के मुताबिक दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर को जानोमाल की हिफाजत के लिए एहतियाती कदम उठाने के लिए कहा है. हरियाणा के सिरसा में हालात पर काबू करने के लिए पुलिस ने सेना की मदद मांगी है.

    दिल्ली पुलिस ने बताया है कि हिंसा फैलाने के मामले में दिल्ली से तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया है. दो लोगों को बदरपुर से गिरफ्तार किया गया है जबकि एक व्यक्ति को ख़्याला से गिरफ्तार किया गया है.संगरूर में पुलिस ने चार लोगों को पेट्रोल बम के साथ गिरफ्तार किया है. पंचकुला में कुछ सरकारी इमारतों में भी आग लगा दी गई है.हरियाणा के मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार अमित आर्य ने एक बयान जारी कर बताया, “हमने पंचकुला में कर्फ्यू लगाया है. आगे की कार्रवाई के लिए हरियाणा कैबिनेट की बैठक की जा रही है.”

    हरियाणा और पंजाब में हो रही हिंसा का असर रेल यातायात पर भी पड़ा है. रेलवे के प्रवक्ता अनिल सक्सेना ने बताया है कि उत्तर रेलवे ने इस रूट से आने वाली ट्रेनों को रद्द कर दिया है.
    रेलवे प्रवक्ता ने दिल्ली के आनंद विहार रेलवे स्टेशन पर खड़ी रीवा एक्सप्रेस के दो डिब्बों को आग लगाए जाने की घटना पर स्पष्टीकरण भी दिया है. सक्सेना ने कहा, “आनंद विहार में एक घटना सामने आई थी लेकिन ये डिब्बे यार्ड में खड़े थे और किसी ने इनमें आग लगा दी. लेकिन किसी भीड़ के इसमें शामिल होने की बात सामने नहीं आई है.”

    हिंसा की घटनाओं के चलते 26 अगस्त को पंजाब के कई ज़िलों में स्कूल और कॉलेजों को बंद रखने के लिए कहा गया है. राजस्थान के गंगानगर ज़िले में इंटरनेट सेवाएं बंद की गई हैं.
    दिल्ली मेट्रो को भी अलर्ट पर रखा गया है. समाचार एजेंसी ने सीआईएसएफ़ के महानिदेशक ओपी सिंह के हवाले से बताया कि उत्तर प्रदेश और हरियाणा से लगे सभी स्टेशनों पर चौकसी बढ़ा दी गई है.

    उधर, डेरा सच्चा सौदा के एक प्रवक्ता डॉक्टर दिलावर इंशा ने कहा है, “हमारे साथ अन्याय हुआ है. हम अपील करेंगे. हमारे साथ वही हुआ है जो इतिहास में गुरुओं के साथ हुआ था. डेरा सच्चा सौधा मानवता की भलाई के लिए है. सभी शांति बनाएं रखें.”

    पंजाब के मानसा और मलोट में रेलवे स्टेशन को डेरा समर्थकों ने आग लगा दी है. फिरोजपुर में प्रशासन ने कर्फ्यू जैसे क़दम उठाने के लिए कहा है. अमृतसर और तरणताल में पुलिस के आला अधिकारियों की बैठक हो रही है.रेड अलर्ट के साथ-साथ सीमा पर चौकसी बढ़ा दी गई है. पंजाब और हरियाणा के कई स्थानों से डेरा समर्थकों द्वारा हिंसा की ख़बरें मिल रही हैं. सुरक्षा बलों और डेरा समर्थकों के बीच झड़प में 11 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है. कई लोग घायल हुए हैं.

    हरियाणा के पंचकुला और पंजाब के फिरोजपुर, बठिण्डा और मानसा में कर्फ्यू लगा दिया गया है.
    उधर, पंजाब और हरियाणा दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने डेरा समर्थकों से अमन और शांति बनाए रखने की अपील की है. कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा है कि हम किसी को राज्य में माहौल ख़राब करने की इजाजत नहीं देंगे.

    मई 2002 में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत सिंह पर यौन शोषण के आरोप लगाते हुए डेरा की एक साध्वी ने गुमनाम पत्र तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भेजा था. जिसकी एक प्रति पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को भी भेजी गई.हाईकोर्ट ने 24 सितंबर 2002 को साध्वी यौन शोषण मामले में जांच के आदेश दिए.पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने 10 नवंबर 2003 को सीबीआई को एफआईआर दर्ज कर जांच के आदेश जारी किए.

  • लोअर क्लास की चोटी

    लोअर क्लास की चोटी

    रजनीश जैन

    चोटी कटवा घूम रहा है। स्त्रियों से उनकी अमूल्य निधि छीनने। लटें, गेसू, ज़ुल्फें, केश, घटाऐं ही तो हैं जो पुरुषों की कल्पना में असल स्त्रीधन है।…इसीलिए इसे केशराशि भी कहा गया। यही एक ऐसी राशि है जो सरकार के सारे प्रतिबंधात्मक कदमों के बाद बढ़ने से नहीं रुकती। विभिन्न वित्तवर्गों की स्त्रियों के पास केशराशि अलग अलग मात्रा में मौजूद होती है। ऐसी इकलौती राशि भी है जो विलोम प्रकृति रखती है। जो स्त्री जितनी विपन्न होगी उसके पास केशराशि की अधिक मात्रा होगी।स्त्री के अमीर होते जाने का एक संकेत यह भी है कि उनकी केशराशि उसी तदात्म्य में सीमित होती जाती है। अमीरी में केशराशि को छोटा किंतु सुघढ़ बगीचे की तरहा कृत्रिम विन्यास दिये जाने के प्रयास होते हैं।
    गरीब स्त्रियों के पास प्रचुर मात्रा में केशराशि होती है लेकिन गाजरघास की तरह अस्त व्यस्त और बेतरतीब। ‘बिनु पानी साबुन बिना’ सुभाव तो निर्मल हो सकता है। लेकिन जल और साबुन के अभाव में निम्न मध्यमवर्गीय केशराशियों में इससे एक जैवविविधता से भरा वनप्रदेश निर्मित होता है। बिल्कुल सतपुड़ा के घने जंगलों की तरहा। ‘घुस सको तो घुसो इनमें, धँस सको तो धँसो इनमें,घुस न पाती हवा जिनमें…ऊंघते अनमने जंगल’। इस वन में कंघी कभी घुसाई या धँसाई नहीं जाती।उपलब्धता के आधार पर तेल की तहें चढ़ाई जाती हैं। इतना तगड़ा बंदोबस्त होता है कि बारिश का पानी भी तहों को न भेद पाये।
    इस वनीकृत केशराशि में विचरण करने वाला प्रमुख प्राणी जूँ नामक कीट होता है जो अपनी असीमित प्रजनन क्षमता से इन वनों को व्यापक रूप से खसखस के दानों सदृश्य अपनी भावी संततियों की असंख्य मात्रा से आच्छादित कर देता है। इस प्राणी की एक मात्र प्राकृतिक शत्रु वनप्रांत की स्वामिनी की माता, भगिनी, सखी , पुत्रियां ही होती हैं जो एक दूसरे के वनों में अपने तीक्ष्ण नखों से इन प्राणियों का शिकार करने एक के पीछे एक बैठ जाती हैं। शिकार की खोज में कटार जैसी निगाहें और पैनी होकर अभियान चलाती हैं। सूक्ष्म पगडंडियों की अभ्यस्त होते ही जूँ मिलने लगते हैं जिन्हें एहतियात से खींच कर पहले हथेली पर रखकर साईज इत्यादि का मुआयना किया जाता है। फिर दोनों अंगूठों के मध्य दबाकर ‘पिट्ट’ की ध्वनि का श्रवण किया जाता है। स्त्रीस्वभाव में हिंसात्मक तत्व का सर्वोत्तम दर्शन ‘जूँ आखेट’ में ही होते हैं। इस पर शोध होना आवश्यक है कि नाखूनों के बीच दबाकर जूँ को पिचलते वक्त उनके दिमाग में किसका प्रतिबिंब होता है। पति , समाज , व्यवस्था या अपने सपनों में से किसकी हत्या इतनी निर्दयता से कर रही होती हैं वे उस वक्त! जूँ को प्राणदंड देने की इस सुखद और अनंत संतुष्टि देने वाली इस प्रकिया में इतना आनंद होता है कि इसे बहुधा घंटों तक तल्लीनता से किया जाता है। इस प्रक्रिया को यदि पड़ोसिनों की निंदाचर्चा के साथ संपन्न किया जाये तो समय का भान नहीं होता। आईंस्टीन का सापेक्षता के सिद्धांत के आदर्श उदाहरण की तरह। …हालांकि जूँ के निरंतर शिकार की इस परंपरा का सबसे नायाब पहलू यह है कि प्रतिदिन शिकार किए जाने पर भी जूँ की तादाद कभी घटती नहीं और आनंदप्राप्ति का स्रोत शाश्वत अजस्र बना रहता है।
    यह पूरा शिरोधार्य पारिस्थितिकी तंत्र हरेक वन की तरह ही अर्से में इकट्ठा हो गयी अवशिष्ट सामग्री के सड़ने से दुर्गंध युक्त भी हो जाता है लेकिन केशरमणी इस दुर्गंध की इतनी अभ्यस्त होती है कि उसे यह सुगंध ही प्रतीत होती है। कभी कोई प्रेमातुर केशराशि की तैलीय चमक के आकर्षण में निकट आकर गेसुओं की खुशबू से मदहोश होने के फेर में बेहोश होने लगे तब रमणी अपने केशतेल पर शक करती है और गांव के बनिए से भृंगराज की जगह इसबार डाबर आँवला केशतेल की डिमांड करती है।आखिर ब्रांड की बात ही और होती है। बढ़ी हुई कीमत का बोझ या तो ‘वे’ भुगतें या दूकानदार।
    मितरों, …ऊपर यह पर्यावरणीय जानकारियां इस वजह से समझना जरूरी थीं कि इन्हीं में ‘चोटी कटवा ‘ का रहस्य छुपा है। यह कृत्य न अंधविश्वास है न अपराध। यह उक्त पारिस्थितिकी तंत्र के असंतुलन से उपजा उपचार है। बरसाती पानी केशराशि में अतिक्रमण कर चिकट,गंदगी वगैरह से मिलकर दुर्गंध और खुजली पैदा करता है। अमीरों में इसे फंगल इंफेक्शन या रूसी कहा जाता है। जब यह असहनीय हो जाती है तो रमणियों को अपने केश त्यागने की तीव्र इच्छा होती होगी। खुली हवा में सांस लेने की प्राकृतिक इच्छा सासें और समाज नहीं रोक सकतीं। नाई से बाल कटाने की परंपरा बनाई नहीं, ब्यूटीपार्लर का कांसेप्ट पिछड़े इलाकों में पहुंचा नहीं, पहुंच गया है तो मुफ्त में ऊगे बाल कटाने के दो सौ रुपया कौन दे। इसलिए चोटीकाटने का यह कार्य लुकछिप कर किये गये कई घरेलू कार्यों में से ही एक है।
    …दक्षिण में तिरुपति के मंदिर की परंपरा को देखिए। वहां दान में बाल अर्पित करके सफाचट निकल कर भक्तजन आते हैं। इनमें बड़ी तादाद में नारियां भी होती हैं जो धर्म के ही प्रताप से सिर पर खुली हवा के प्रछन्न झोंकों का लुत्फ लेती हैं। बुंदेली में कहावत है ‘जुंआ लगे न लीख मुंडा सबसे ठीक।’ समाज की लादी परंपरा की दवा उन्होंने धार्मिक कर्मकांड में ही ढूंढ़ ली। लोहे को लोहे से काट लिया। पर उत्तर भारत में तिरुपतिबालाजी नहीं हैं। बाल प्रचुरता से हैं। बाल चोटियां बनते हैं और चोटियां कट रही हैं। हल साबुन, शैंपू,कंघी, स्नान , वस्त्रों की सफाई, स्वच्छता में छिपा है पर गरीब की अर्थव्यवस्था आड़े आ जाती है।…घरों में कैद लोअर क्लास महिला क्या करे?…परिवार पाले या बाल संवारे। तो बाल और चोटी लोअर क्लास की ही समस्या है वहीं कटेगी। सदियों से कट रही है, दिख आज रही है।
    (रजनीश जैन, सागर)

  • सफेदपोशों के अपराध

    सफेदपोशों के अपराध

    पुस्तक समीक्षा

    हमारे दिमाग में जमाने से चली आ रही अपराधों की परिकल्पना में चोरी, डकैती, हत्या, आक्रमण, सेंधमारी, यौन उत्पीड़न आदि का ही समावेश हो पाता है।…

    डॉ. हनुमंत यादव
    हमारे दिमाग में जमाने से चली आ रही अपराधों की परिकल्पना में चोरी, डकैती, हत्या, आक्रमण, सेंधमारी, यौन उत्पीड़न आदि का ही समावेश हो पाता है। ये अपराध आमतौर पर निम्न आय वर्ग तथा गरीबी से जुड़े रहते हैं। इसके अलावा गरीबी से जुड़ी मनोविकृतियां भी अपराध को जन्म देती हैं। यह मान्यता पुरानी हो गई है कि अपराध मजबूरी में किए जाते हैं तथा भगवान ने जिसको सब कुछ दिया है उसको अपराध करने की जरूरत नहीं पड़ती। आधुनिक पूंजीवाद के उदय के साथ ही अपराध के चरित्र और स्वरूप में परिवर्तन हुआ तथा नए प्रकार के आर्थिक अपराधों का तेजी से विस्तार हो रहा है। नए प्रकार का अपराध सफेदपोश अपराध अपने विविध रूपों में सामने आया। अर्थशास्त्री डॉ. गिरीश मिश्र और राजनीतिशास्त्री डॉ. ब्रजकुमार पांडेय द्वारा लिखित प्रस्तुत पुस्तक इन्हीं धनाढयों और प्रभावशाली लोगों के अपराध के विषय पर केन्द्रित है।
    सफेदपोश अपराधी, सुशिक्षित सौम्य और सुसंस्कृत है, लिहाजा उनको समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त है। इन लोगों के अपराध के विषय में अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और अन्यत्र स्थानों के समाजविज्ञानियों द्वारा शोध करके काफी कुछ लिखा गया है। किन्तु अपने देश में इस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया गया था। इस रिक्तता को महसूसकर डॉ. गिरीश मिश्र और राजनीतिशास्त्री डॉ. ब्रजकुमार पांडेय ने सफेदपोश अपराध पर शोध कार्य प्रारंभ किया। उनकी सोच थी कि जब तक देश में सफेदपोश अपराध की जड़ों में नहीं जाएंगे और भ्रष्टाचार के स्वरूप और फैलाव को समझने का प्रयास नहीं करेंगे तब तक जड से उन्मूलन संभव नहीं है। इसलिए उन्होंने अन्यत्र देशों के समाजविज्ञानियों के शोधग्रंथों के अध्ययन कर भारत में सफेदपोश अपराध के विभिन्न पहलुओं का समग्र शोध करके अंग्रेजी में ”व्हाइट कॉलर क्राइम्स” नामक पुस्तक अंग्रेजी में लिखी जो 1998 में प्रकाशित हुई। हिन्दी के जागरूक पाठकों को अपेक्षा थी कि कुछ ही वर्षों में उक्त पुस्तक का हिन्दी संस्करण का भी प्रकाशन हो जाएगा। किन्तु ऐसा नहीं हो पाया तथा अंग्रेजी न जानने वाले हिन्दी भाषी पाठक उक्त पुस्तक को पढ़ने से वंचित रहे। अंतत: हिन्दी पाठकों की भावनाओं को ध्यान में रखकर एवं जागरूक मित्रों के अनुरोध पर लेखकद्वय ने अद्यतन सामग्री शामिल करते हुए हिन्दी में ”सफेदपोशों के अपराध” पुस्तक लिखी, जो अभी हाल में दानिश बुक्स द्वारा प्रकाशित की गई है। इस पुस्तक के प्रकाशन के लिए लेखकद्वय डॉ. गिरीश मिश्र और डॉ. ब्रजकुमार पांडेय धन्यवाद के पात्र हैं।
    पुस्तक की प्रस्तावना में सफेदपोश अपराध का अर्थ समझाते हुए आम अपराध एवं सफेदपोश अपराध में उदाहरणों सहित अंतर समझाया गया है। इसके साथ ही दोनों प्रकार के अपराधियों के प्रति हमारे समाज का नजरिया भी बताया गया है। सफेदपोशों के अपराध को समाजशास्त्री अल्बर्ट मौरिस ने ”अभिजात्य वर्गीय अपराध” का नाम दिया है। ऊंचे लोगों का गुनाह व्यक्ति और समाज में दोमुंहेपन का सूचक है। यह सफेदपोश अपराधी की कथनी और करनी का अंतर है तो दूसरी ओर अभिजात्य वर्ग के अपराधों को समाज की अनदेखी करनी व मौन स्वीकृति की प्रवृत्ति का भी द्योतक है। उद्योग-व्यवसाय में कारपोरेट क्षेत्र के बढ़ते प्रभाव के साथ ही कारपोरेट अर्थात् संगठित क्षेत्र की सफेदपोश अपराधों की भागीदारी भी लगातार तेजी से बढ़ती जा रही है। कारपोरेट जगत के अपराध को विश्वास हनन के अपराध की संज्ञा दी जा सकती है।
    लेखकद्वय के अनुसार धंधे-पेशों के विस्तार के साथ हर क्षेत्र में सफेदपोश अपराध फैल रहा है। चोरी को प्राचीनतम अपराध माना जाता है। गुपचुप तरीके से बिना किसी धमकी या हिंसा को सहारा लिए व्यक्तिगत व सार्वजनिक धन-सम्पत्ति हड़पना चोरी की श्रेणी में आता है। हेराफेरी, भ्रष्टाचार, गबन, घोटाले, सार्वजनिक सम्पत्ति का निजी उपयोग व दुरूपयोग आदि चोरी के विभिन्न स्वरूप हैं। वर्तमान भूमंडलीकरण के दौर में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तनों के फलस्वरूप गैर-परम्परागत चोरी के आयामों का विस्तार हुआ है। पुस्तक में मीडिया की दुनिया, शिक्षा जगत, प्रशासन तंत्र और राजनीति में भ्रष्टाचार अध्यायों के पड़ने से पता लगता है कि सफेदपोश अपराध हमारे देश में हर क्षेत्र में प्रवेश कर गया है, कोई क्षेत्र अछूता नहीं बचा है। धार्मिक पाखंडी लोगों की धार्मिक आस्था व श्रध्दा का फायदा उठाकर देवता का बाना पहन कर शैतान के रूप में कारगुजारियां कर रहे हैं। आश्चर्य है कि पढ़े-लिखे समझदार बड़े लोग भी इनके चंगुल में स्वेच्छा से फंस जाते हैं।
    धमकी व हिंसा माफिया की कार्यशैली के अंग होते हैं। जिस संदर्भ में माफिया शब्द का प्रयोग आज किया जाता है उस का उद्भव इटली में हुआ तो कालान्तर में अनेक देशों में फैला। भूमंडलीकरण ने माफिया के राष्ट्रीय सीमाओं से निकलकर विरूव के पैमाने पर अपनी गतिविधियां चलाने को अनुकूल परिस्थितियां पैदा कीं। अब तो यह दूसरे विश्व में फैल चुका है। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा है। पुस्तक के अंतिम चार अध्यायों में माफिया के उद्भव, भूमंडलीकरण के प्रभाव तथा भारत में माफिया का विस्तार से वर्णन किया गया है।
    यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत में नवपूंजीवाद में राजनेताओं, अधिकारियों और व्यवसायियों- इन तीन वर्ग के श्रीमान लोगों का गठजोड़ से सफेदपोश अपराध फलता-फूलता जा रहा है। उदाहरण के लिए वस्तुओं के भंडार और कीमतों में कानून के तहत फेरबदलकर बेहिसाब मुनाफा कमाना, उच्च सरकारी अधिकारियों द्वारा नियमों की अनदेखी करना, सरकारी धन राशि का अन्यत्र व्यय करना, राजनेताओं द्वारा नियमों को तोड़-मरोड़ कर अपने लोगों का निजी हित करना आदि कुछ उदाहरण हैं।
    सरल हिन्दी भाषा में लिखी गई शोध पर आधारित ”सफेदपोशों के अपराध” यह पुस्तक आजादी के बाद, विशेषकर नवउदारवादी चिंतन को अंगीकार करने के बाद, भारत में क्या हुआ और क्या हो रहा है, को समझने में मददगार होगी। जो अध्येता सफेदपोश अपराध पर आगे शोध कार्य करना चाहते हैं उनके लिए यह पुस्तक उपयोगी संदर्भ ग्रंथ साबित होगी।
    पुस्तक: सफेदपोशों के अपराध
    लेखक द्वय:गिरीश मिश्र एवं ब्रजकुमार पांडेय
    प्रकाशक: दानिश बुक्स
    25 सी, स्काइलार्क 450 रूअपार्टमेट्स
    गाजीपुर, दिल्ली-110096
    मूल्य: 450 रूपए

  • नागरिकों को सूचना तंत्र से जोड़ेगा राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण  मंच

    नागरिकों को सूचना तंत्र से जोड़ेगा राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच

    राष्ट्रीय सुरक्षा मंच के समन्वयक डॉ.अनिल सौमित्र, मप्र इकाई के कार्यकारी अध्यक्ष शैलेन्द्र प्रधान और अध्यक्ष एस.के.राऊत ने पत्रकार वार्ता के माध्यम से जनता से मंच से जुड़ने का आव्हान किया है।

    भोपाल,26 अप्रेल। देश के जागरूक नागरिकों को सूचना तंत्र से जोड़ने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच का गठन किया गया है। हाल ही में गुरुग्राम में हुई मंच की बैठक में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई जिम्मेदार नागरिकों ने जनता को एक बेहतर सुरक्षा मंच उपलब्ध कराने का अभियान प्रारंभ किया है। इस अभियान के तहत भोपाल में मध्यप्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक एस.के.राऊत को अध्यक्ष बनाया गया है। श्री राऊत के साथ आज मप्र इकाई के कार्यकारी अध्यक्ष शैलेन्द्र प्रधान और स्पंदन स्वयंसेवी समूह के अनिल सौमित्र ने मंच की गतिविधियों की जानकारी दी।
    सफल पुलिस महानिदेशक के रूप में ख्याति बटोर चुके श्री एस.के.राऊत ने बताया कि राष्ट्र की सुरक्षा की कड़ी में सीधे तौर पर देश के जागरूक नागरिकों को जोड़ने के लिए इस मंच का गठन किया गया है। समाज की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए स्कूलों, कालेजों, महाविद्यालयों के अलावा विभिन्न संगठनों के बीच संवाद स्थापित किया जाएगा। इसमें सामाजिक और स्वैच्छिक संगठन भी बड़ी भूमिका निभाएंगे।
    उन्होंने बताया कि हरियाणा के गुरुग्राम में 15-16 मार्च को हुई बैठक में देश भर के विभिन्न राज्यों के कार्यकर्ता उपस्थित हुए थे। मंच के राष्ट्रीय समन्वयक इंद्रेश कुमार की उपस्थिति में हरियाणा के राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी ने दीप प्रज्ववलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया था। दूसरे दिन समापन समारोह पूर्व गृह सचिव आर. के सिंह की मौजूदगी में हुआ। बैठक में तय किया गया कि राष्ट्रीय महत्व के तीन दिवसों को बड़े स्तर पर मनाया जाएगा। इनमें 8 अप्रैल को इंकलाब दिवस, 23 सितंबर को हायफा दिवस, और 30 दिसंबर को प्रथम स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाएगा। प्रदेशों की इकाईयां अपनी जरूरत के मुताबिक अन्य कार्यक्रमों का आयोजन भी कर सकेंगी।
    मंच के मार्गदर्शन में साल भर सामाजिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ साथ संगोष्ठियों का भी आयोजन किया जाएगा। जिनके माध्यम से राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जरूरतों पर व्यापक विमर्श किया जाएगा। विश्वविद्यालयों में सुरक्षा से जुड़े विषयों पर अनुसंधान कार्यों को प्रोत्साहन दिया जाएगा। गुरुग्राम में आयोजित मीडिया की कार्यशाला में राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण के लिए पांच विषयों पर अधिक प्रकाश डाला गया
    । इनमें पर्यटन बनाम आतंकवाद, हिंद महासागरीय क्षेत्र की गतिविधियां, भारत इसराईल संबंध, एशियाई क्षेत्रों में चीन की धौंसपट्टी, और जन सांख्यिकीय परिवर्तन एक प्रमुख खतरा जैसे विषय शामिल किए गए थे। कार्यशाला में जाने माने पत्रकार अशोक श्रीवास्तव, जगदीश उपासने, और शिवाजी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों पर न केवल चर्चा की बल्कि समस्याओं के संभावित निराकरणों पर पूछे गए सवालों के उत्तर भी दिए।
    पत्रकारों से चर्चा के पहले वक्ताओं ने छत्तीसगढ़ के सुकमा में नक्सली हिंसा में शहीद हुए जवानों को श्रद्धा सुमन भी अर्पित किए। उनके शोक संतप्त पीड़ित परिवारों के प्रति भी संवेदना व्यक्त की गई।मीडिया समन्वयक कृपा शंकर चौबे और मंच के स्थानीय समन्वयक डॉ.अनिल सौमित्र ने राष्ट्र के प्रति बढ़ाई जाने वाली इस जागरूकता से देश को न केवल विदेशी बल्कि देश को तोड़ने वाली भीतरी ताकतों से भी निपटने में सफलता मिलेगी।

  • आईटीबीपी के शूटर जेल संभालेंगे

    आईटीबीपी के शूटर जेल संभालेंगे

    भोपाल,21 जनवरी(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। राजधानी की केन्द्रीय जेल तोड़ने और सिमी आतंकवादियों की मुठभेड़ में हत्या के बाद मध्यप्रदेश सरकार ने जेलों में पुलिस की घुसपैठ बढ़ाने के नए नए तरीके खोजने शुरु कर दिए हैं। राज्य शासन ने भारत सरकार को एक प्रस्ताव भेजकर भारत तिब्बत सीमा पुलिस बल के जवानों की तीन बटालियन मांगी हैं। शूटिंग में माहिर इन जवानों को जेलों की सुरक्षा के लिए तैनात किया जाएगा। इसके साथ साथ मध्यप्रदेश पुलिस के चार आला अफसरों को भी जेलों का प्रबंधन संभालने भेजा जा रहा है।

    सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने होशंगाबाद जिले के सांगाखेड़ा खुर्द में नर्मदा सेवा यात्रा के 33 वें दिन एक सार्वजनिक कार्यक्रम में ऐलान किया है कि महिलाओं से दुराचार करने वालों पर अब मुकदमा तो चलेगा पर दोषियों को सीधे फांसी चढ़ाने की व्यवस्था भी की जाएगी। राज्य की भाजपा सरकार ने जबसे महिलाओं के हित के नाम पर नई योजनाएं चलाईं हैं तबसे जेलों में छेड़छाड़ संबंधी अपराधों के दोषियों की संख्या बढ़ती जा रही है। आज जेलों में महिला अपराधों से संबंधित आरोपियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इनमें से ज्यादातर मामले महिलाओं को मुआवजा राशि दिलाने और विरोधियों को कथित तौर पर निपटाने की रणनीति के तहत दर्ज किए गए हैं। बताते हैं कि भाजपा सरकार दोषियों को इस्लामिक देशों की तरह सख्त सजा से दंडित करने की तैयारी कर रही है।

    गौरतलब है कि राज्य में पहली बार जेलों में बंदियों के सुधार की जिम्मेदारी पुलिस अफसरों को सौंपी जा रही है। अंग्रेजों के शासनकाल से जेलों की जवाबदारी जेल विभाग के अधिकारी कर्मचारी संभालते रहे हैं। जस्टिस मुल्ला कमेटी की रिपोर्ट में तो जेलों में पुलिस के हस्तक्षेप को अनैतिक बताया गया है। इसके बावजूद जेलों में पुलिस का हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है। पुलिस को अपराधों की जांच के साथ साथ दोषियों को दंडित करने की भी जबाबदारी सौंपे जाने से न्यायाधीशों में भी दहशत फैल रही है। उन्हें लगता है कि जजों को चुनने वाली कोलोसियम पद्धति पर विवादों के बाद भाजपा ने पूरे देश में अपनी सरकारों को दंड का अधिकार अपने हाथों में लेने की तैयारी शुरु कर दी है।

    सूत्रों के अनुसार मध्यप्रदेश की जेलों में मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन किया जा रहा है। राजनीतिक चंदा वसूली के चलते बंदियों के साथ मारपीट की घटनाएं भी बढ़ीं हैं और उनके परिजनों पर अनैतिक तरीके से चंदा वसूली का दबाव बढ़ता जा रहा है। सूत्र बताते हैं कि जेलों में बंदियों के साथ अमानवीय तरीके से मारपीट की जा रही है। उनकी कराहों और आवाजों से जेलों में दहशत का माहौल बन गया है। सिमी से जुड़े आरोपियों के कथित जेल ब्रेक कांड के बाद बदनामशुदा जेल डीजी सुशोभन बैनर्जी को तो हटा दिया गया है लेकिन इस मामले में जेल विभाग के अफसरों और प्रहरियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा रही है। इससे जेल विभाग के अफसरों में भी नाराजगी देखी जा रही है।

    हाल ही में जेल डीजी संजय चौधरी ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के दौरान प्रदेश की जेलों के प्रभारियों को साफ चेतावनी दी है कि यदि उन्होंने मुख्यालय के निर्देशों का पालन नहीं किया तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। इस वीडियो कांफ्रेंसिंग में अतिरिक्त मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी और जेल विभाग के प्रमुख सचिव विनोद सेमवाल भी मौजूद थे।

  • मध्यप्रदेश की जेलों में मीसा बंदी का दौर

    मध्यप्रदेश की जेलों में मीसा बंदी का दौर

    भोपाल (पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। सुशासन का वादा करने वाली भाजपा ने मध्यप्रदेश में ढांचागत विकास पर तो बहुत जोर दिया है लेकिन उसने कांग्रेस की वे तमाम बुराईयां भी अपना लीं हैं जिन्हें वह कभी पानी पी पीकर कोसती रही है।श्रीमती इंदिरा गांधी के आपातकाल की ज्यादतियों की कहानी आज भी जो सुनता है उसकी रूह कांप जाती है। उन्हीं कहानियों को सुनाकर शिवराज सिंह चौहान की मिठबोली सरकार ने मीसाबंदियों के लिए पेंशन योजना भी लागू की है। इसके बावजूद अब उनकी सरकार जेलों में जो दमन चक्र चला रही है उससे प्रदेश के लगभग पैंतीस हजार बंदियों और उनके परिवारों के बीच आतंक फैल गया है। बंदियों पर जो नए नियम लादे जा रहे हैं उससे बंदियों में आक्रोश फैल गया है और वे भूख हड़ताल जैसे कदम उठाने पर मजबूर हो रहे हैं।

    अंग्रेजों के बाद से पहली बार शिवराज सिंह सरकार ने जेलों को राजनीतिक योजनाओं की आय का स्रोत बनाना शुरु किया है। मजेदार बात ये है कि इस काली दौलत की खेती कथित तौर पर भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी कर रहे हैं। जेलों में आधुनिकीकरण के नाम पर लागू की जा रही योजनाओं को सफल बनाने के लिए जेल विभाग में पुलिस के तीन आला अफसर तैनात किये गए हैं। अब वहां चार और बड़े अफसर भेजे जाने की तैयारी हो रही है जो सरकार की मंशाओं को पूरा करने की जवाबदारी संभालेंगे। जेलों में प्रहरियों की भारी कमी है उन्हें भर्ती किया जाना जरूरी है पर इसके स्थान पर सरकार ने जेलों में एसएएफ के जवान भेज दिए हैं। जेलों में पुलिस की तैनाती को सही साबित करने के लिए भोपाल जेल ब्रेक कांड की जांच में लापरवाही की जवाबदारी जेल महकमे के कर्मचारियों और प्रहरियों पर डाली जा रही है। जबकि हकीकत ये है कि सिमी के आतंकवादी जब भोपाल की केन्द्रीय जेल तोड़कर फरार हुए तब जेल पर एसएएफ के जवान ड्यूटी दे रहे थे। एकबारगी ये मान भी लिया जाए कि जेल के प्रहरी लापरवाह थे तब भी पुलिस को उसकी ड्यूटी के लिए क्लीनचिट कैसे दी जा सकती है।

    जेल विभाग पर पुलिस का शिकंजा किसी भी तरह न तो कानूनी है और न ही नैतिक उसके बावजूद मौजूदा सरकार जेलों की आड़ में जिस दंड प्रक्रिया को लागू कर रही है वह आपातकाल से भी गंभीर प्रताड़ना और अमानवीयता की ओर जाती साफ नजर आ रही है। भोपाल जेल ब्रेक कांड के बाद हटाए गए जेल महानिदेशक सुशोभन बैनर्जी की हरकतों को पूरी तरह नजरंदाज करके जिस तरह जेल विभाग के अफसरों के खिलाफ दमन चक्र चलाया जा रहा है उससे जेल महकमे के भीतर भी असंतोष घुमड़ रहा है। जेल विभाग में दो डीआईजी और दो एडीशनल एसपी भेजे जाने की खबर ने तो अफसरों की नींदें उड़ा दीं हैं। उन्हें पता है कि कि मौजूदा पदों पर जब पुलिस के बड़े अधिकारी जम जाएंगे तो उनके प्रमोशन की राह तो हमेशा के लिए अवरुद्ध हो जाएगी। जेल महकमें में लंबे समय तक नौकरी करने वाले जिन अफसरों ने प्रशासन में सुधार के जो सपने संजोए थे उन्हें पुलिस के आला अफसर अपने नौसिखिएपन में मट्टी पलीत करे दे रहे हैं।

    सूत्र बताते हैं कि ये सारा खेल साजिशन किया जा रहा है,जिससे जेलों में असंतोष फैले और पुलिस के अलावा सरकार के पिट्ठुओं की तैनाती का रास्ता प्रशस्त हो सके। पिछले दिनों जेल प्रशासन ने एक आदेश निकाला जिसमें कहा गया कि कोई भी मुलाकाती बंदियों को अपने घरों से बनाया हुआ या बाहिरी सामान नहीं दे सकता। कोई बहन यदि अपने बंदी भाई को संक्रांति पर तिल के लड्डू भी खिलाना चाहे तो उसे इसकी इजाजत नहीं है। क्योंकि जेलों में बंदियों के लिए बाहर से लाए जाने वाले नमक, मसाले, तेल, टाफी, बिस्किट, सिगरेट, बीड़ी, तंबाखू, जूते आदि पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है। अब तक बंदियों को तय लगभग पचपन रुपए के डाईट प्लान में सुबह नाश्ते में चाय के साथ उबले चने और पौष्टिक आहार दिया जाता था, पर अब उनकी डाईट में ब्रेड, बिस्किट, मिठाई, खीर जैसे आईटम शामिल कर दिए गए हैं। ये पैक सामान एक तो पूरा बजट बिगाड़ रहा है वहीं नई समस्याएं भी खड़ी कर रहा है। अब कैदियों को यदि ब्रेड दी जाए तो उसके लिए बड़े मग भर चाय भी चाहिए। इस तरह की दिक्कतें बंदियों को नए झमेले में धकेल रहीं हैं।

    बंदियों को उनकी घरेलू समस्याओं की देखभाल करने के लिए जेलों में पे रोल का प्रावधान किया गया है। इससे जहां बंदियों को सामाजिक दायरों की अहमियत समझाई जाती है वहीं जेलों के संचालन के लिए मनोवैज्ञानिक सहारा भी मिल जाता है। पुलिसिया फंडों को लादने वाले जेल प्रशासन ने पे रोल को लगभग बंद कर दिया है। इससे बंदियों को नई मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है और प्रदेश भर की जेलों के बंदी भड़क रहे हैं।

    दंड प्रकिया में अपराधी को दोषी साबित करवाने वाले पुलिस के अफसरों को बंदियों का कथित संरक्षक बनाने पर तुली शिवराज सरकार को आंखें मूंदकर जेलों की सीमा रेखा लांघ रही है। जेलों में एसएएफ के साथ साथ विशेष दस्ते भी तैनात किए जा रहे हैं जिन्हें बंदियों की निगरानी की जवाबदारी सौंपी गई है। सूत्रों का कहना है कि ये ही वो दस्ता है जो राजनैतिक विरोधियों को जेलों में भेजकर उन्हें प्रताड़ित करने की जवाबदारी संभाल रहे हैं। भोपाल में इस दस्ते को सेना जैसी वर्दी दी गई है। जेलों के प्रहरियों और अफसरों को प्रशिक्षण देने का काम अरसे से बंद है। नतीजा ये है कि प्रहरी बेडोल हो रहे हैं और कई ने तो अपनी नौकरी के दौरान बंदूक की गोली भी नहीं चलाई है। इसके बावजूद जेलों में जो प्रक्रिया अपनाई जाती है उसके चलते बंदियों में विद्रोह के भाव नहीं पनपते हैं और वे अपनी सजा शराफत से पूरी करके एक नए जीवन की शुरुआत करते हैं। पुलिसिया घुसपैठ ने वो समरसता का माहौल बिगाड़ दिया है। जेल ब्रेक कांड भी उसी कड़ी का नतीजा है।

    जेलों में संवाद का आलम ये है कि कथित तौर पर जेलों की व्यवस्था धराशायी करने और अवैध कमाई में जुटे रहे पूर्व डीजी सुशोभन बैनर्जी ने जेल विभाग की वेवसाईट ही बंद करा दी थी। आज यदि आप प्रदेश की किसी भी जेल की जानकारी या संपर्क तलाशना चाहें तो संभव नहीं है। जेल विभाग के प्रशासनिक प्रतिवेदन को तलाशना संभव नहीं है। यदि बंदियों के परिजन कोई संदेश पहुंचाना चाहें तो उन्हें वही पुरातनपंथी समय साध्य व्यवस्था को ढोना पड़ता है। जेल महकमे के पुलिसिया ढर्रे का आलम ये है कि भोपाल केन्द्रीय जेल की पुरानी वेवसाईट अब तक चल रही है जिसे कभी 2008 में पूर्व जेल अधीक्षक पीडी सोमकुंवर ने बनवाया था। आज सोमकुंवर स्वयं जेल में बंद हैं पर वेवसाईट पर उन्हें जेल अधीक्षक ही बताया जा रहा है।

    भाजपा को जमीनी विचारधारा देने वाले पं.दीन दयाल उपाध्याय ने समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान का संस्कार दिया था। लंबे समय तक भाजपा के नेता इसे अपनी गीता मानते रहे। आज भी भाजपा से जुड़े परिवारों में इसे ध्येय विचार माना जाता है। इसके बावजूद सत्ता की चाशनी चांटने के बाद सत्ता शीर्ष पर विराजमान भाजपाईयों में जो विकार घर कर गए हैं उनसे भाजपा की सत्ता धिक्कार के पथ पर अग्रसर हो चली है। आमतौर पर कबाड़खाने से किसी भी समाज की मानसिकता और उसकी स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। जाहिर है समाज के सुधार गृह में बंदियों में सुधरने के बजाए यदि विद्रोह के संस्कार फैलने लगें तो सरकार के औचित्य की जरूरत ही क्या रह जाएगी।

  • शिवराज की जेलों में चंदा उगाही का नारकीय आतंक

    शिवराज की जेलों में चंदा उगाही का नारकीय आतंक

    भोपाल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम). दुनिया भर में सुधारगृह कही जाने वाली जेलें शिवराज सिंह चौहान की सरकार के कार्यकाल में चंदा उगाही के नारकीय आतंक का घर बन गईं हैं। इस त्रासदी को भोगने वाले बताते हैं कि वे किसी डॉन की तुलना में जेल के वसूली जल्लादों से ज्यादा भयभीत रहते हैं। ये स्थिति इसलिए बनी है कि शिवराज सिंह सरकार का चंदा वसूली कोटा लगातार बढ़ता जा रहा है। इसकी पूर्ति के लिए पुलिस विभाग के अफसरों ने जेल विभाग के अफसरों को किनारे बिठाकर वसूली की कमान अपने हाथों में ले ली है। गृह विभाग से प्रतिनियुक्ति पर जेल महकमें में भेजे गए पुलिस अफसरों ने अपने गुर्गों के हाथों में ये वसूली की कमान थमा दी है। उन्होंने जेल विभाग के अफसरों को तो पद पर बिठा रखा है पर वसूली का ठेका किसी डिप्टी जेलर, चक्कर अधिकारी जैसे कर्मचारी को थमा दिया है। खुद जेल महकमे के अफसर हताश हैं क्योंकि उनके महकमे में पुलिस का दखल बढ़ता जा रहा है। हालत ये है कि पुलिस के अफसर जेल मंत्री तक की बात नहीं सुनते। इसकी जगह गृहमंत्री यदि कुछ कहे तो वो आदेश तत्काल लागू हो जाता है। हालत ये है कि आपराधिक रिकार्ड वाले अफसरों को जेलों की कमान थमा दी गई है, जो अफसर चापलूसी में और नजराना पेश करने में हाजिरी नहीं देते उन्हें किनारे बिठा दिया जाता है।

    जस्टिस मुल्ला कमेटी की सिफारिशों में साफ कहा गया है कि जो व्यक्ति आपराधिक प्रकरणों की जांच करेगा वो अपराधी को दंडित नहीं कर सकता। इसीलिए ये जवाबदारी अदालतों को दी गई है। इसके बाद कैदी को जेल विभाग के निर्देशन में सुधार की प्रक्रिया से गुजारा जाता है। जबकि पुलिस के बढ़ते दखल से राजनैतिक विरोधियों को निपटाने का रास्ता सुलभ बना दिया गया है। जेलों में बढ़ते पुलिस के दखल ने जेलों को सुधार गृह के बजाए प्रताड़ना घर बना दिया है जो किसी भी सभ्य समाज के लिए खतरे का सबब कहा जा सकता है।

    भोपाल जेल ब्रेक कांड के बाद जारी हो रहे तुगलकी आदेशों ने भी जेल महकमे की दुर्दशा कर दी है। भोपाल केन्द्रीय जेल से सिमी के आतंकी जब मुठभेड़ में मारे गए तो वे मंहगे जूते पहने हुए थे। पुलिस विभाग के लालबुझक्कड़ी विवेचना कर्ताओं ने कहा कि जूते पहने होने के कारण वे आसानी भाग सके। इस पर कैदियों को जूते के बजाए चप्पल पहनने के आदेश जारी कर दिए गए। अब कड़ाके की ठंड में जब कैदियों के पैरों में बिवाई फट रहीं हैं और उनसे खून रिस रहा है तब भी जेल प्रशासन अपने उसी आदेश पर अटका हुआ है।

    मध्यप्रदेश की 39 जिला जेलों और 72 उपजेलों में इस समय सजा याफ्ता 17 हजार 58 कैदी बंद हैं, इसकी तुलना में 21 हजार 300 कैदी महज विचाराधीन का तमगा लिए बंद हैं। यही विचाराधीन कैदी जेल के जल्लाद नुमा वसूली अफसरों की कमाई का बड़ा स्रोत बने हुए हैं। जो विचाराधीन कैदी छोटे अपराध में बंद होता है और जिसे जल्दी जमानत मिलने उम्मीद होती है उससे वसूली का काम जल्दी से जल्दी निपटाया जाता है। कैदी की माली हालत की खबर लाने में वकील और अदालत में तैनात पुलिस विभाग के कर्मचारी बड़ी भूमिका निभाते हैं। जैसा कैदी हो उससे वसूली की इबारत भी उसी तरह लिखी जाती है। प्रदेश में एक भी महिला जेल नहीं है। जेलों में इन दिनों 603 सजायाफ्ता महिला कैदी बंद हैं। जबकि 718 विचाराधीन महिला कैदी भी हैं। ये दैहिक शोषण का साधन तो हैं ही साथ में इनसे वसूली भी की जाती है। अब चूंकि कानून की नजर में वे अपराधी हैं या उन्हें मालूम है कि उनसे अपराध हो गया है तो उनके शोषण का रास्ता आसान हो जाता है।

    जेल महकमे में प्रतिनियुक्ति पर आए महानिदेशक संजय चौधरी खुद भोपाल की केन्द्रीय जेल में आए दिन दौरा करते रहते हैं इसके बावजूद इस जेल में जो प्रताड़ना का तंत्र चल रहा है उन्हें वो नजर नहीं आता है। जेल ब्रेक कांड के बाद ब खंड से थोड़े दिनों के लिए चक्कर अधिकारी पद से हटा दिए गए अफसर को वसूली कांड का तजुर्बेकार माना जाता है। एक कैदी मुकेश उर्फ मुक्कू उनका इशारा अच्छी तरह समझता है। अफसर का इशारा मिलते ही मुक्कू जेल में नए नए आने वाले विचारधीन या सजायाफ्ता कैदी से भिड़ जाता है। पीट पीटकर उसकी ये हालत कर देता है कि नवांतुक डर के मारे कांपने लगता है। इसके बाद मुक्कू के सहयोगी कैदी को बता देते हैं कि यदि तुम्हें जेल में ठीक तरह रहना है तो अपने घर से रुपए बुलाकर चक्कर अधिकारी को दे दो। इस रकम का एक हिस्सा मुक्कू और उसके सहयोगियों को भी मिलता है।घर से पैसे बुलाने के लिए जो फोन दिया जाता है उसके एक काल का चार्ज पचास रुपए होता है। हर सुविधा की कीमत अलग है। यदि जेल में रहते हुए आराम फरमाना है तो डाक्टर साहब हैं न। ये सेटिंग कंपाऊंडर करता है। मात्र दस हजार रुपए में आपको सिक प्रमाण पत्र मिल जाएगा फिर आप बिस्तर पर आराम फरमाईए। ये सुविधा भी तब तक मिलेगी जब तक कोई बड़ा अधिकारी जांच करने नहीं आ जाता। यदि जांच हुई तो सौदा पूरा। अगली सिक के लिए नई फीस फिर देना होगी।

    चक्कर अधिकारी का जलवा इतना जोरदार है कि गत 13 दिसंबर को जब सभी लोग सदमें में थे तब एक जेलर ने कैदियों को चक्कर अधिकारी की तारीफ में सुनाया कि वे जेल में हर सुविधा मुहैया करा सकते हैं। बस पैसे देते जाओ तो फिल्मी हीरोईन भी आ जाएगी सेवा में। कैदियों को जेल में बिस्कुट, सिगरेट, गांजा, चरस, फोन जो भी सुविधा चाहिए आसानी से मिल जाती है। कैदियों से जो पैसा वसूला जाता है वो सभी के बीच बंटता है। आंखें मूंदे रखने के लिए जेलर या जेल अधीक्षक को भी निश्चित हिस्सा मिल जाता है। यदि जेल महकमे के आला अधिकारी ने टारगेट दे दिया है तो वो रकम भी कैदियों की पिटाई से जुटाई जाती है।
    मजदूरी भी कमाई का एक नायाब स्रोत है। कैदियों को मजदूरी के नाम पर पुताई का जिम्मा दिया जाता है। खेत से सब्जी उगाने और तरह तरह के कामकाज से उसे मजदूरी दी जाती है। पर ये मजदूरी कभी लगातार नहीं मिलती। जेल के रिकार्ड में पुताई का जितना रिकार्ड दर्ज किया जाता है यदि वास्तव में उतनी पुताई कर दी जाए तो जेल की दीवारों पर इंचो में नहीं फुटों में चूने की परत चढ़ जाए।

    शिवराज सिंह सरकार के बेटी बचाओ अभियान ने जेलों में बलात्कार के दोषी और विचाराधीन कैदियों की बाढ़ ला दी है। इसकी वजह है कि बलात्कार पीढ़िता तो सरकार की ओर से राहत राशि मुआवजे के रूप में दी जाती है। अक्सर मुआवजे की ये राशि भी महिला को पूरी नहीं मिल पाती । इसका भी बंटवारा हो जाता है, पर जेल को एक फोकट की कमाई का मुर्गा जरूर मिल जाता है। पहले अनुसूचित जाति प्रताड़ना में लोगों को जेल भेजा जाता था अब ये काम महिलाओं की मदद के नाम पर होने लगा है। जिसका फायदा जेलों में खूब लिया जा रहा है।

    मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कहते हैं कि उन्हें प्रेस से मिलने वाले फीडबैक की ज्यादा जरूरत नहीं होती वे तो रोज हजारों लोगों से मिलते हैं। उनकी जेलों में कैदियों को किस अमानवीय प्रताड़ना से गुजरना पड़ रहा है ये बात कैदी उनसे बता नहीं सकते और उनके रिश्तेदार उनसे कह नहीं सकते क्योंकि उनके करीबी अभी अदालतों में सुनवाई के दौर से गुजर रहे हैं या फिर उन्हें अपराधी करार दिया जा चुका है। शिवराज सिंह को शायद नहीं पता कि पुलिस किस तरह बेकसूर लोगों पर फर्जी प्रकरण लादकर उन्हें जेलों में धकेलती है। अदालतों में घसीटती है। इसके बावजूद मुख्यमंत्री कहते हैं कि उन्होंने राजनीति को ढर्रे से बाहर निकालकर पटरी पर ला दिया है। उनके चापलूस मंत्री, अफसर, पत्रकार सभी इसी सुर में सुर मिलाकर उन्हें अहसास कराने की कोशिशों में जुटे हैं कि राज्य में सब अमन चैन चल रहा है। अब इसे राजा का भाग्य ही नहीं तो क्या कहेंगे कि कि उनकी पार्टी भाजपा और सहयोगी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी सब कुछ ठीक ठाक ही नजर आ रहा है। हकीकत में तस्वीर इतनी उजली नहीं है।

  • गृहमंत्री की जिद से जेल महकमे में कोहराम

    गृहमंत्री की जिद से जेल महकमे में कोहराम

    gopal-tamrakar
    बंटी बबली की जोड़ी के सामने आईपीएस लाबी ने घुटने टेके
    -आलोक सिंघई-
    भोपाल,7 दिसंबर। गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह और जेल मंत्री सुश्री कुसुम सिंह मेहदेले के बीच ठनी रार ने जेल महकमे के अफसरों में असमंजस के हालात बना दिए हैं। भोपाल की केन्द्रीय जेल से सिमी आतंकवादियों कीफरारी और मुठभेड़ में उनके सफाए के बाद से कोई अधिकारी सरकार का उचित मार्गदर्शन करना नहीं चाह रहा है। नतीजतन पूरे महकमे में अफरातफरी मच गई है। गृहमंत्री के बाल सखा और उज्जैन केन्द्रीय जेल के अधीक्षक गोपाल ताम्रकार ने कुछ ऐसा ताना बाना बुना है कि विभाग के आला अफसर भी खुद को लाचार महसूस कर रहे हैं। उनकी हालत सांप छछूंदर की तरह हो गई है शासन का आदेश मानते हैं तो गृहमंत्री नाराज और गृहमंत्री की बात मानते हैं तो जेल मंत्री नाराज। इस करामात की असली वजह भोपाल जेल टूटने के बाद हटाए गए जेल डीजी सुशोभन बैनर्जी और उनकी सहेली अफसर ( बंटी बबली की जोड़ी )बताए जा रहे हैं।
    शिवराज सिंह सरकार की असफलताओं की फेरहिस्त जैसे जैसे खुलती जा रही है वैसे ही कई विभागों से तरह तरह की कहानियां सामने आती जा रहीं हैं। ग्यारह साल पूरे करने के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तरह तरह के कार्यक्रमों के आयोजन से खुद की पीठ ठोकते नजर आ रहे हैं लेकिन उन्होंने चपरासीनुमा जिन भ्रष्ट अफसरों को अपना सलाहकार बना रखा है उनकी कारस्तानियां अब छप्पर फाड़कर सिर उठाने लगीं हैं। भाजपा की सरकार में शिवराज सिंह चौहान के ग्यारह साल पूरे होने पर उनके राजनीतिक प्रतिद्वंदी ही तरह तरह के मामलों से सरकार की नींव हिलाने में जुट गए हैं। अब जैसे शिवराज सिंह चौहान के करीबी माने जाने वाले गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह ने जेल विभाग की मंत्री सुश्री कुसुम सिंह मेहदेले को खुली चुनौती दे डाली है। जेल गोलीकांड के बाद चैतन्य हुए राज्य शासन के प्रमुख सचिव विनोद चंद्र सेमवाल ने जेल मुख्यालय में काम का बोझ संभालने के लिए डीआईजी पद पर प्रमोशन पाने वाले उज्जैन के जेल अधीक्षक गोपाल ताम्रकार को मुख्यालय में पदस्थ किया है। लगभग डेढ़ महीना बीत जाने के बाद भी ताम्रकार अपनी कुर्सी छोड़ने को राजी नहीं हैं।शासन के आदेश का पालन इसलिए नहीं हो पा रहा क्योंकि ताम्रकार गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह के साथ पढ़े हैं। उन्होंने हटाए गए जेल डीजी सुशोभन बैनर्जी से एक आदेश जारी करवा लिया कि आगामी आदेश तक वे अपने ही पद पर बने रहें। जबकि शासन के आदेश के समर्थन में जेल मंत्री सुश्री कुसुम सिंह मेहदेले ने भी निर्देश जारी करके श्री ताम्रकार को भोपाल मुख्यालय में आमद देने के निर्देश दिए हैं। इसके बावजूद श्री ताम्रकार टक के मस होने को तैयार नहीं हैं। उनकी जगह जेल अधीक्षक सुश्री ऊषा राज उज्जैन पहुंच चुकी हैं लेकिन श्री ताम्रकार उन्हें पदभार सौंपने तैयार नहीं हैं।यही नहीं स्थानीय अखबारों में उन्होंने हटाए गए जेल डीजी सुशोभन बैनर्जी के पत्र के माध्यम से खबर भी छपवाई कि मुख्यालय ने शासन के तबादला आदेश को निरस्त कर दिया है।
    इस मामले में जेल महानिदेशक संजय चौधरी कुछ बोलने को तैयार नहीं हैं। सूत्र बताते हैं कि गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह ने उन्हें फोन करके श्री ताम्रकार को उज्जैन में ही पदस्थ रखने के निर्देश दिए हैं। जेल विभाग में पदस्थ आईजी सुधीर शाही भी इस मामले में कोई बात करने तैयार नहीं हैं। उन्होंने हाल ही में उज्जैन जेल का निरीक्षण भी किया था और कार्यभार संभालने पहुंची ऊषा राज को सभी जेलों के निरीक्षण के निर्देश भी जारी किए थे। उन्होंने उज्जैन जेल से निरीक्षण के लिए उन्हें वाहन भी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। जेल विभाग में पदस्थ डीआईजी प्रशासन संजय पांडे के पास काम का बोझ इतना अधिक बढ़ गया है कि उन्हें अपना काम निपटाने के लिए देर रात तक दफ्तर में रुकना पड़ रहा है। इसकी जानकारी जेल मंत्री को भी दी जा चुकी है लेकिन मंत्री जी अपने ही सहयोगी गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह को नीचा दिखाने से बच रहीं हैं। हालांकि उन्होंने अपने विभाग के आला अफसरों से आदेशों का पालन न होने पर नाराजगी भी जताई है। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि यदि उनके ही विभाग का अफसर आदेशों का पालन नहीं करेगा तो अंततः उन्हें अपने विशेषाधिकार का उपयोग करके उसे दंडित करना पड़ेगा।
    जेल महकमे को चकर घिन्नी बनाने वाली सतना की जेल अधीक्षक सुश्री शेफाली तिवारी ने इस काम के लिए कथित तौर पर हटाए गए जेल डीजी सुशोभन बैनर्जी को अपना हथियार बनाया है। भोपाल जेल ब्रेक कांड में भी इसी बंटी बबली की जोड़ी की करतूतें धीरे धीरे प्रशासन के सामने आती जा रहीं हैं। इनकी करीबी की कहानियां पूरे जेल महकमें में कुख्याति की तरह फैली हुई हैं। जेल मंत्री सुश्री कुसुम मेहदेले के निवास पर कभी याचक की तरह खड़े रहकर सुशोभन बैनर्जी ने शेफाली तिवारी को सतना का जेल अधीक्षक बनवाया था। अब जबकि सुशोभन बैनर्जी हटा दिए गए हैं तब उनके ही कृपा पात्र रहे गोपाल ताम्रकार ने शासन के आदेश के खिलाफ लिखे गए सुशोभन बैनर्जी के पत्र को अपनी ढाल बना लिया है।
    शेफाली तिवारी का इतिहास कई किस्से कहानियों से भरा पड़ा है। जब वे होशंगाबाद जेल प्रभारी थीं तो तीन कैदी फरार हो गए थे। जेल मंत्री जगदीश देवड़ा ने जब छापा मारा तो जेल में गंदगी मिली पांच किलो गांजे की खेप बरामद हुई थी। शहला मसूद हत्याकांड में इंदौर की जेल में बंद सबा फारूखी और जाहिदा परवेज ने कमीशनखोरी के चक्कर में शेफाली तिवारी को बाल पकड़कर पीटा था। सतना में उनके बंगले से एक कैदी फरार हो गया। दो आरोपी जेल से फरार हो गए। जेल में मोबाईल बरामद हुए। दो कैदियों की संदिग्ध हालात में मौत हो गई। जिसका मुकदमा अभी भी लंबित है। जेल प्रहरी मनीष शेखर ने उसकी प्रताड़ना से तंग आकर जहर खा लिया जिसकी विभागीय जांच चल रही है। बताते हैं कि कैदियों को बिना कागजी कार्रवाई रिहा कर देने की बात जैसे ही प्रशासन को मालूम चली तो उन्हें पुलिस से दुबारा धारा 151 में गिरफ्तार कराकर जेल में बंद करवा दिया। अब प्रशासन इस बात की जांच कर रहा है कि कैदी यदि जेल में बंद थे तो पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कैसे किया। जबलपुर की मूल निवासी इस जेल अधीक्षक ने कथित तौर पर एक कैदी से ही शादी रचा ली थी लेकिन बाद में उसे आजीवन कैद की सजा सुना दी गई तो बताते हैं उन्होंने अपने ही कंप्यूटर आपरेटर से शादी रचा ली। पूर्व मंत्री बाबूलाल गौर से उनकी नजदीकियों के किस्से भी जेलों में चटखारे लेकर सुनाए जाते हैं। बताते हैं कि यही किस्से भोपाल जेल ब्रेक कांड की नींव बने थे।
    हटाए गए जेल डीजी सुशोभन बैनर्जी के हवा हवाई फरमानों के बाद जब जेलरों के बीच ये बात फैल गई कि उन्हें मुख्यालय में चंदे की खेप पहुंचानी है तो कैदियों से चौथ वसूली की जाने लगी जिसका अंत भोपाल जेल ब्रेक और मुठभेड़ के रूप में सामने आया। ये जानकारियां पुलिस प्रशासन को भी हैं और सरकार के पास भी लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियतावादी नीतियों से तंग आकर जमीनी हालात सुधारने की सुध कोई अफसर नहीं ले रहा है।

  • सुशोभन बैनर्जी की हीरोपंती ने तुड़वाई जेल

    सुशोभन बैनर्जी की हीरोपंती ने तुड़वाई जेल

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    भोपाल 5 नवंबर(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। सिमी आतंकवादियों ने भोपाल जेल की दीवार तो फांद ली लेकिन भोपाल पुलिस की चौकस निगाहों ने उन्हें कानून को लतियाने की उचित सजा देकर अपनी मुस्तैदी का सबूत भी दे डाला। इस मुठभेड़ की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। इसलिए जो लोग जेल से हवलदार की हत्या कर भागे आतंकवादियों को टपका देने पर मरसिया पढ़ रहे हैं उनकी बातें रद्दी की टोकरी में फेंकने लायक हैं। मगर इस पर तो विचार करना ही होगा कि कानून से खिलवाड़ करने का ये साहस किसमें, कैसे और क्यों पलता रहा है।
    मध्यप्रदेश की जेलें अपनी सुधारात्मक गतिविधियों के लिए जानी जाती हैं। यहां ये माना जाता है कि बुरा आदमी गलत शिक्षा का नतीजा होता है । जब कानून किसी को दोषी ठहराए तो जेलों में ले जाकर उन्हें नए सिरे से संस्कारित किया जा सकता है। इसलिए मध्यप्रदेश की जेलों को सुधारगृह कहा जाता है। होशंगाबाद में तो खुली जेल का जो प्रयोग किया गया वो सबसे सफल प्रोजेक्ट रहा है। जेल प्रशासन हमेशा से जेलों में इतने बुलंद अफसरों को तैनात करता रहा है कि वे समाज के कबाड़ कहे जाने वाले अपराधियों को मुख्य धारा में चलने लायक जरूर बना देते थे। पिछले कुछ सालों में जेलों की ये साख खंडित हुई है। इसकी वजहों पर विचार किए बिना मध्यप्रदेश की सरकार, प्रशासन और प्रेस जिस तरह हवा हवाई उपाय सुझा रही है उससे कहा जा सकता है कि सुशासन का दावा करने वाली मध्यप्रदेश की सरकार कांग्रेस की लचर सरकार के मुकाबले लाचार अधिक साबित हो रही है।
    जब भी कोई मुठभेड़ होती है और पुलिस की गोली से एक भी अपराधी मारा जाता है तो उस मामले की मजिस्ट्रीयल जांच की जाती है। जाहिर है भोपाल जेल से भागे सिमी आतंकवादियों की हत्या के मामले में भी न्यायिक जांच ही एक मात्र कानून सम्मत कदम है। इसके बावजूद एसआईटी के गठन, एनआईए, सीबीआई , सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जैसी संस्थाओं से जांच की बात करके इस मामले का राजनीतिकरण किया जा रहा है। सरकार की इच्छा का सम्मान करते हुए पुलिस महानिदेशक ऋषि कुमार शुक्ला ने एसआईटी के गठन की घोषणा भी कर दी. उन्होंने बताया कि एसआईटी की तीन सदस्यीय टीम का नेतृत्व सीआईडी के एसपी अनुराग शर्मा करेंगे और वो पूरे मामले की रिपोर्ट पुलिस हेडक्वाटर को सौपेंगे.मुठभेड़ कांड के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पूर्व पुलिस महानिदेशक नंदन दुबे को मामले की जांच करने भेजा था लेकिन बाद में उन्हें इस प्रक्रिया से हटा दिया गया। उनके खिलाफ प्रदेश के पुलिस थानों में रिलायंस जियो कंपनी को फ्री में टावर लगाने का मामला उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। इस सौदे में प्रदेश को कथित तौर पर 1400 करोड़ रुपए की क्षति पहुंचाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट उनके खिलाफ काफी पहले स्ट्रक्चर पारित कर कह चुका है कि उन्हें किसी बड़े पद पर नहीं रखा जाना चाहिए। इसके बावजूद प्रदेश सरकार ने उन्हें डीजीपी बनाया और रिटायर होने के बाद एक निगम में पुनर्वासित भी कर दिया। जबकि हकीकत ये है जेल तोड़ने की साजिश भी तबसे रची जा रही थी जबसे वे पुलिस महानिदेशक रहे । उन्होंने अपने प्रिय अफसर सुशोभन बैनर्जी को डीजी जेल बनवाया था। उनके कार्यकाल में ही खंडवा जेल से सिमी के आतंकवादी फरार हुए थे। जब मार्च 2015 में सुशोभन बैनर्जी को डीजी जेल बनाया गया तबसे सिमी आतंकवादियों को मिलने वाली सहूलियतें भी बढ़ गईं थीं।
    सुशोभन बैनर्जी मूलतः कलकत्ता के रहने वाले आईपीएस अफसर हैं। जिनका अपराध और कानून की दुनिया से कभी कोई रिश्ता नहीं रहा। तीसरे प्रयास में वे प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पास कर सके थे। वे क्रिकेट खिलाड़ी रहे हैं और नौकरी में आने से पहले वे क्रिकेट ही खेलते रहते थे। कालेज के दिनों में ही वे शरीर सौष्ठव और फिल्मों नाटकों में अभिनय से जुड़ गए और नौकरी के दौरान फिल्मों में अभिनय करते रहे। नंदन दुबे जैसे अफसरों की मेहरबानी से उन्होंने मुंबई में घुमक्कड़ी की नौकरी की और उनकी पत्नी ने वहीं अपना कारोबार भी फैलाया। आज उनकी पत्नी मुंबई में बड़ा कारोबार चलाती हैं और बेटा फिल्मों में अभिनय करता है। सुशोभन बैनर्जी ने डीजी जेल की नौकरी भी पूरी तरह पार्ट टाईम जॉब की तरह की। जेल अधीक्षकों और जेलरों को कथित तौर पर टारगेट दिए गये थे कि वे अपने बजट का लगभग पचास फीसदी हिस्सा बचाकर चंदे के रूप में पेश करें। ये नजराना वसूलने वे स्वयं जाते थे। नतीजा ये हुआ कि आज जेलों में कैदियों को मिलने वाला 70 फीसदी बजट गुल्ली हो जाता है। कैदियों को सुविधाएं खरीदने के भरपूर मौके दिए जाते हैं।जेलों को सुरक्षा बढ़ाने के निर्देश कागजों पर हमेशा दिए जाते रहे लेकिन फील्ड पर हकीकत कुछ और थी। आज जो मीडिया सुशोभन बैनर्जी को हटा दिए जाने के बाद उनकी शान में कशीदे पढ़ रहा है उसे ये हकीकत पता करने में जरा भी रुचि नहीं है कि सुशोभन बैनर्जी ने डीजी जेल रहते हुए उनके सत्कार पर जो रकम खर्च की वो उन्होंने कहां से जुटाई थी। जिन अफसरों ने उनके इशारे पर चलने से इंकार कर दिया उनके खिलाफ विभागीय जांचें शुरु कर दीं गईं। उन्हें निलंबित भी किया गया। जेलों के प्रभार से भी हटा दिया गया।
    सुशोभन बैनर्जी की रुचि चंदा वसूलने और उसकी रकम मुंबई में पत्नी के कारोबार में लगाने बेटे को फिल्मों में काम दिलाने में तो रही ही है साथ में वे जेल में बंद महिला कैदियों में भी खासी दिलचस्पी लेते रहे हैं। जेलरों और अफसरों को कथित तौर पर निर्देश रहते थे कि वे जेलों में बंद खूबसूरत और चालाक किस्म की महिला अपराधियों को भी पेश करें। सूत्र बताते हैं कि वे अपने दौरों में शराब और शबाब के बीच महिला कैदियों से फिल्मों के लिए कहानियां भी तलाशते रहते थे। समय समय पर अपने मीडिया इंटरव्यू में वे कहते रहे हैं कि वे समाज में महिलाओं की स्थितियों को बदलने के लिए फिल्म बनाना चाहते हैं। उनके इस कथित रंगीलेपन की कहानियां जेलों में आम हो गईं थीं। यही वजह है कि जेलों में कैदियों को सुविधाएं बेचे जाने और उनसे चंदा उगाहने की परंपरा का एक नया युग शुरु हो गया था। जेलों के प्रहरी डीजी जेल के महिला प्रेम की कहानियां भी चटखारे लेकर सुनाते थे और यही वजह जेलों में गुंडागर्दी बढ़ने की असली वजह बनी। एक चर्चित जेल अधिकारी से उनकी करीबियां पूरे महकमे को मालूम है। यही महिला अधिकारी उनके नाम पर जेलों के अफसरों से चंदे के फरमान सुनाती रहती थी। जो अफसर सुनते उन्हें बजट और प्रभार भी मिल जाते और जो नहीं सुनते वे निलंबन की सजा भोगते।
    सिमी आतंकवादियों से मुठभेड़ कांड की जांच करने वाले अधिकारी तमाम पहलुओं पर विचार करने में जुटे हैं। सरकार को तो इस घटना के नाम पर एक नया कर्ज लेने का बहाना मिल गया है। उसने जेलों में एक नई चारदिवारी बनाने के नाम पर ढाई सौ करोड़ के कर्ज लेने की भी योजना प्रस्तुत कर दी है। सुशोभन बैनर्जी के स्थान पर भेजे गए 1988 बैच के आईपीएस अधिकारी सुधीर शाही की गिनती ईमानदार अफसरों में की जाती है।व्यापम कांड में अपनी सख्ती के लिए भी उनका नाम लिया जाता रहा है लेकिन सुशोभन बैनर्जी की लापरवाहियों की ओर न तो सरकार और न ही अफसरशाही कोई निगाह कर रही है। अभी हाल ही में जन्माष्टमी के कार्यक्रम में जब जेल मंत्री सुश्री कुसुम सिंह मेहदेले स्वयं मौजूद थीं तब भी सुशोभन बैनर्जी महिला कैदियों में रुचि लेने में शर्म नहीं महसूस कर रहे थे। स्वयं वरिष्ठ मंत्री ने तब टिप्पणी की थी कि इस अफसर के बारे में अब तक तो वे बहुत सुनती रहीं हैं लेकिन ये तो उससे एक कदम आगे है। जेल मंत्री के आदेशों को रद्दी की टोकरी में फेंक देने की बदतमीजी बैनर्जी इसलिए ही करते रहे क्योंकि उन्हें वरिष्ठ पुलिस अफसरों ने अपने कार्यकाल के दौरान बेजा संरक्षण दे रखा था।
    अब जबकि उन्हें इस महत्वपूर्ण पद से हटा दिया गया है तब भी उनके खिलाफ किसी किस्म की विभागीय जांच नहीं खोली गई है। एक नाकारा और बेईमान अफसर को नौकरी में रखकर पालते रहने वाली शिवराज सिंह चौहान की मजबूर सरकार तरह तरह के वायदे करके लोगों को यकीन दिलाने में जुटी है कि वह जेलों की सुरक्षा के प्रति वचन बद्ध है। इसके बावजूद लोगो में मुठभेड़ को लेकर तरह तरह के सवाल उठ रहे हैं। भोपाल में तो इस मुठभेड़ को फर्जी बताने का माहौल बनाया जा रहा है। मुस्लिम समाज के जन प्रतिनिधियों ने इस मामले पर भारी प्रदर्शन की अनुमति मांगी थी जिसे प्रशासन ने शांति व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर रद्द करवा दिया। इसके बावजूद कुछ मुस्लिम युवाओं ने इकबाल मैदान के समीप नारेबाजी करके अपना विरोध जताया।
    सरकार यदि इस मुठभेड़ कांड के बाद यदि अपनी गलती सुधारने की मंशा रखती है तो उसे अपनी जेलों में पनप रहे कुशासन पर लगाम लगानी होगी। अदालतों को भी उन कारणों पर विचार करना होगा जिनसे उनके आधिपत्य वाली जेलों में अराजकता के हालातों पर काबू पाया जा सके ।
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    सेंट्रल जेल भोपाल से बंदियों के फरार होने और मुठभेड़ की जाँच के बिन्दु तय

    आयोग का मुख्यालय भोपाल होगा, तीन माह में रिपोर्ट देगा
    राज्य सरकार द्वारा जाँच आयोग के गठन की अधिसूचना जारी
    भोपाल : सोमवार, नवम्बर 7, 2016,
    सेंट्रल जेल भोपाल से 30-31 अक्टूबर की दरम्यानी रात को आठ विचाराधीन बंदियों के जेल से भागने और मुठभेड़ में मृत्यु होने की घटना की जाँच के बिन्दु तय किये गये हैं। उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री श्री चौहान ने घटना की जाँच के लिये उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश श्री एस.के. पाण्डे की अध्यक्षता में एक-सदस्यीय जाँच आयोग गठित करने की घोषणा की थी। जाँच आयोग का मुख्यालय भोपाल (मध्यप्रदेश) होगा। आयोग अधिसूचना के मध्यप्रदेश राजपत्र में प्रकाशन की तारीख से 3 माह के भीतर जाँच पूरी कर अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को प्रस्तुत करेगा।

    राज्य शासन ने जाँच आयोग और उसके जाँच के बिन्दु की अधिसूचना आज जारी की है। जाँच आयोग जेल से विचाराधीन बंदियों के फरार होने और ग्राम मनीखेड़ा थाना गुनगा जिला भोपाल के निकट पुलिस मुठभेड़ में बंदियों की मृत्यु की घटना की जाँच निम्न बिन्दुओं पर करेगा:-

    1. दिनांक 30-31 अक्टूबर की दरम्यानी रात में केन्द्रीय जेल भोपाल से आठ विचाराधीन बंदी किन परिस्थितियों एवं घटनाक्रम में जेल से फरार हुए? उक्त घटना के लिये कौन अधिकारी एवं कर्मचारी उत्तरदायी हैं?

    2. ग्राम मनीखेड़ा थाना गुनगा जिला भोपाल के निकट 31 अक्टूबर को फरार आठ बंदियों के साथ हुई पुलिस मुठभेड़, जिसमें सभी आठ बंदियों की मृत्यु किन परिस्थितियों एवं घटनाक्रम में हुई?

    3. क्या मुठभेड़ में पुलिस द्वारा की गयी कार्यवाही तत्समय विद्यमान परिस्थितियों में युक्ति-युक्त थी?

    4. कारागार से बंदियों के फरार होने की घटना की पुनरावृत्ति न हो, इसके संबंध में सुझाव।

    5. ऐसा अन्य विषय, जो जाँच के लिये अनुषांगिक हो।