Category: स्वास्थ्य रहस्य

  • त्रिशला महिला मंडल की कव्वाली ने देव दर्शन सिखाया

    त्रिशला महिला मंडल की कव्वाली ने देव दर्शन सिखाया


    अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन परिचय सम्मेलन भोपाल

    भोपाल,3 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर )। अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन परिचय सम्मेलन के पहले दिन आज शाम को आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम ने देश विदेश से आए युवाओं में उमंग और उल्लास का संचार कर दिया।आयोजन स्थल और सुदूर देशों में बैठे युवाओं के रिश्तेदारों ने भी इस कार्यक्रम का आनंद लिया।यह प्रस्तुति आयोजन की व्यवस्था संभाल रही त्रिशला महिला मंडल की ओर से दी गई थी।
    त्रिशला महिला मंडल की अध्यक्ष श्रीमती विजय लक्ष्मी भारिल्ल ने बताया कि लगभग एक महीने से आयोजन की व्यवस्थाओं में जुड़ी महिलाओं और युवतियों ने अपने कार्य के बीच समय निकालकर ये प्रस्तुतियां तैयार की थीं।इन कार्यक्रमों को जिस खूबसूरती के साथ लड़ी में पिरोया गया था उससे परिचय सम्मेलन में आए युवा भी आल्हादित हो उठे।
    आयोजन की व्यवस्थाएं संभाल रही गुणाली जैन ने …रेशम की है डोरी.. नृत्य से सभी का मन मोह लिया। एक नृत्य ….बड़े बाबा मेरे आदिनाथ…की प्रस्तुति से सुश्री शिवाली जैन ने पंडाल में मौजूद लोगों को भाव विभोर कर दिया। श्रीमती आरती जैन और नितिका ने जय हो रामेश्वरा नृत्य प्रस्तुत करके ओज भरा माहौल निर्मित कर दिया। मनस्वी जैन ने नमोकार मंत्र है प्यारा से जैन सांस्कृतिक चेतना का उद्घोष किया। इस बीच मंच संचालन में सहयोग दे रहे प्रसन्न जैन ने चुटकुले सुनाकर लोगों को लोटपोट कर दिया।
    त्रिशला महिला मंडल की सदस्य महिलाओं के बच्चों ने हम याद करें सती ब्राह्मी भजन पर भावपूर्ण प्रस्तुति दी। श्रीमती सोना विमित जैन ने बुंदेलखंडी विदाई गीत गाकर युवक युवतियों और उनके अभिभावकों की आंखें नम कर दीं। बुंदेलखंडी परिवेश में कन्या के जन्म से लेकर विदाई तक के विभिन्न पहलुओं को उन्होंने ढपली बजाकर बहुत सुंदर अंदाज में प्रस्तुत किया। श्रीमती आरती, नितिका, प्रिया और नेहा जी ने एक समूह नृत्य करके पनघट की संस्कृति को मनोहारी अंदाज में प्रस्तुत किया। नयापुरा जैन मंदिर से जुड़ी त्रिशला महिला मंडल की सदस्यों ने लुक छुप न जाओ जी की प्रस्तुति दी।
    त्रिशला महिला मंडल की सदस्यों ने अरे माता बहनों जरा ये तो बता दो कि मंदिर में श्रंगार भला किसलिए है कव्वाली गाकर जैन समाज में नियमित दर्शन जाने की प्रेरणा दी। उन्होंने मंदिर को ध्यान स्थल बताते हुए यहां होने वाली लापरवाहियों को भी रेखांकित किया। महिलाओं ने बताया कि मंदिर में जाकर शास्त्र पढ़े जाते हैं , कुछ लोग जिस तरह मंहगे वस्त्रों, आभूषणों के प्रदर्शन तक स्वयं को सीमित कर लेते हैं वह जैन आगम में भी निषिद्ध है और स्वयं के व्यक्तित्व विकास में भी बाधक होता है। कव्वाली के व्यंगात्मक लहजे के बीच उन्होंने बताया कि जैन धर्म ईश्वर के दर्शन और आराधना से अपनी इंद्रियों पर विजय का मार्ग प्रशस्त करना सिखाता है।
    अनुशासन ग्रुप की छात्राओं ने लव जिहाद नाटक की प्रस्तुति देकर जैन युवक युवतियों को जीवन साथी के चयन में सावधानी बरतने का संदेश दिया। उन्होंने बताया कि जो युवक युवतियां जवानी के उल्लास में पथ भ्रष्ट हो जाते हैं और अपने माता पिता का मार्गदर्शन ठुकरा देते हैं उन्हें कई अप्रिय परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। ये सभी छात्राएं विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से अपना जीवन संवारने का प्रयास कर रहीं हैं।
    नाटिका की लेखक और निर्देशक सुश्री प्राची जैन ने बताया कि लव जिहाद बनाम चक्रवर्ती विवाह नामक इस लघु नाटिका के माध्यम से हमने दो परिवारों के संस्कारों के अंतर को समझाने का प्रयास किया है। एक जैन परिवार है जिसमें माता पिता की परवरिश और जैन संस्कारों के महत्व को रेखांकित किया गया है। जबकि दूसरे परिवार में एक पथ भ्रष्ट विजातीय परिवार है जिसके सदस्य अपनी चालबाजियों से धार्मिक ग्रंथों की आड़ में अनाचार और धोखाघड़ी करते हैं।
    उन्होंने कहा कि हम भारत के लोग अल्लाह ईशु सबको मानते हैं। कोई धर्म बुरा नहीं है जरूरत है कि हम अच्छाई और बुराई के मर्म को पहचानें। अनुशासन समूह की छात्राओं का यह संदेश महिला सशक्तिकरण में नई पीढ़ी की भूमिका को संबल प्रदान करता है। छात्राओं ने देश की जैन लड़कियों को नाटिका के माध्यम से संदेश देने का प्रयास किया है कि ….नहीं बचे अब देश में कोई ,लव जिहाद का भोगी। हर बेटे बेटी की शादी ,चक्रवर्ती विवाह से होगी।

  • सूरज रे जलते रहना

    सूरज रे जलते रहना


    प्रिय युवा साथियो
    दिगंबर जैन समाज की नई पीढ़ी के युवक युवतियों का परिचय सम्मेलन में स्वागत करते हुए हमें बहुत प्रसन्नता हो रही है। जो बच्चे हमारे देखते देखते दुनिया में आए वे आज विभिन्न क्षेत्रों में अपना परचम फहरा रहे हैं। हमें साल दर साल उनके लिए योग्य जीवनसाथी तलाशने का अवसर मिला है। अपने हिस्््से में आए इस पवित्र कार्य के लिए हम स्वयं को सौभाग्यशाली महसूस करते हैं। जो बात कुछ समय से मन को बैचेन कर रही है वह ये कि आज के युवाओं में अहम और संवादहीनता की वजह से परिवार के प्रति श्रद्धा का भाव घट रहा है। उनमें परिवार की गाड़ी को पटरियों पर चलाने का धैर्य कम होता जा रहा है। उपभोक्तावाद ने माईक्रोफैमिली बनाने की जो मुहिम छेड़ रखी है उसकी वजह से परिवार टूट रहे हैं। कहा जाता है ….सा विद्या या विमुक्तये…यानि विद्या वो जो मुक्ति प्रदान करती हो। जाहिर है कि ज्ञान के प्रसार के बाद बंधनों से आजादी की ललक परवान चढ़ती ही है। आज युवतियां जाति,राष्ट्रवाद और पुरुषवाद के घेरे से आजादी की तरफ भाग रहीं हैं । वे पितृसत्ता की गुलामी से आजादी की ओर भी भाग रहीं हैं।उन्हें कानून से मिले अधिकार बहुत लुभा रहे हैं। इन सबके बीच वे अपना कर्तव्यबोध भूल चली हैं।युवा लड़के परिवार की जिम्मेदारियों से बचने का हुनर तलाश रहे हैं। इन सब विकृतियों का कारण वोट की राजनीति के लिए परिवारवादी चिंतन को बढ़ावा देना रहा है। हमारी सामाजिक गतिविधियां भी व्यक्तिवाद के इर्द गिर्द सिमटी रहीं हैं। लोगों ने सामाजिक गतिविधियों को किन्हीं परिवार या व्यक्ति की बपौती बताना शुरु कर दिया।संस्थाओं में किसी व्यक्ति के नाम का लेबल लगाकर भरपूर अनियमितताएं की जाती हैं। गड़बड़ियों को छुपाने के लिए धर्म या धर्म गुरुओं के नाम की आड़ ले ली जाती है। फर्जी बिल लगाकर सामाजिक गतिविधियों को इस तरह एहसान थोपते हुए अंजाम दिया जाता है मानों वे महान दानी और भामाशाह हों। ये सब गतिविधियां युवा मन बड़ी जल्दी पकड़ लेता है। इसके बाद अनैतिकता के विचार धीरे धीरे अपनी जगह बनाने लगते हैं। नई पीढ़ी बराबरी चाहती है सौंदर्य चाहती है, प्रेम चाहती है यहां तक तो ठीक है लेकिन वह इसके लिए जब गैर जिम्मेदार हो जाती है तो निंदनीय हो जाती है। समाज को सुंदर और न्यायप्रिय बनाने के लिए विद्रोह जरूरी है। समाज को ढर्रे से आजाद करना जरूरी है। इंसानियत तभी खूबसूरत बनेगी जब हम गलत बातों का प्रतिकार करेंगे। परिवार के दायरे को आगे बढ़ाकर जब राष्ट्र और विश्व के स्तर पर ले जाया जाता है तभी चिंतन की व्यापकता सार्थक होती है। हमें सोचना होगा कि हम व्यापक तो हों पर धरातल पर भी अपने पैर जमाए रख सकें । युवाओं का एक बड़ा वर्ग अधिकार की आड़ में सब कुछ मुफ्त हड़पने की नियत रखता है। सामाजिक नियंत्रण और दंड विधान की निष्क्रियता या अक्षमता वजह से इस पाखंड को कई बार प्रश्रय भी मिल जाता है। इसके बावजूद दूरगामी परिणाम विषदायी साबित होते हैं। युवाओं को समझना होगा कि वे अपने जीवनसाथी का आकलन पैकेज के आधार पर नहीं बल्कि व्यक्तित्व की व्यापकता के आधार पर करें। जब वे आत्मनिर्भर सोच से निर्णय करेंगे तो फिर उन्हें हताशा नहीं होगी। जैन समाज को जागरूक माना जाता है। उसके ऊपर बड़ी जिम्मेदारी भी है। आईए हम प्रयास करें कि हमारे परिवार आदर्श बनें, हम समाज के उन घरों का अंधेरा दूर कर सकें जिनके घरों को दीपक भी मुश्किल से नसीब होता हो। जगत कल्याण के लिए हमें सूरज बनकर निरंतर जलते रहना होगा।
    निवेदक
    आभा जैन गोहिल,
    त्रिशला महिला मंडल,9424966247

  • घोटालेबाजों से अलग हुए जैन परिचय सम्मेलन पर समाज ने भरोसा जताया

    घोटालेबाजों से अलग हुए जैन परिचय सम्मेलन पर समाज ने भरोसा जताया


    भोपाल,15 नवंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। पिछले 27 सालों से चले आ रहे अखिल भारतीय दिगंबर जैन परिचय सम्मेलन भोपाल ने विवाह योग्य युवाओं को अपना जीवन साथी चुनने के लिए इस साल बहुत कम दामों पर मिलन पत्रिका मुहैया कराने और परिचय सम्मेलन का आयोजन करने की तैयारियां पूरी कर लीं हैं। श्री महावीर दिगंबर जैन मंदिर टिन शेड टीटी नगर भोपाल में 3 व 4 दिसंबर 2022 को ये सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। कुछ सालों से घोटालेबाजी के आरोपों का सामना कर रहे मनोहर लाल टोंग्या जी वाले परिचय सम्मेलन से अलग होकर जैन समाज की पूरी टीम ने ये आयोजन किया है। इसमें युवाओं को मात्र छह सौ रुपए में तमाम रिश्ते पत्रिका के माध्यम से तो दिलाए ही जाएंगे साथ में जोड़ों के आनलाईन चुनाव की सुविधा भी उपलब्ध रहेगी।यही देखते हुए जागरूक जैन समाज ने ज्यादा प्रविष्टियां देकर परिचय सम्मेलन को मजबूत मंच बना दिया है।
    सम्मेलन से जुड़े अन्य सूत्र बताते हैँ कि युवाओं से परिचय के नाम पर धन उगाही करके उससे धंधा करने वालों से मुक्ति के बाद अब समिति बहुत कम दरों पर सारी सुविधाएं दिला रही है.समिति का उद्देश्य जैन समाज के युवाओं को अच्छा जीवनसाथी उपलब्ध कराकर सामाजिक विकास के नए मानदंड स्थापित करना है।जनता के धन से कारोबार करने की परिपाटी अब नहीं चल पाएगी। हर साल युवाओं को परिचय से जुड़ी नई सौंगातें देने का प्रयास रहेगा। जैन समाज के जो जागरूक नागरिक पिछले 27 सालों से अधिक समय से अलख जगाए हुए हैं उन्होंने ही परिचय सम्मेलन को ढर्रे से बाहर निकालने का बीड़ा उठाया है। इस बार हम युवाओं को जो विकल्प उपलब्ध कराएंगे उससे जैन समाज का हर वर्ग लाभान्वित होगा। आयोजकों ने आगम और संतों की वाणी को साकार करने की दिशा में कदम बढ़ाया है. जिसका जागरूक जैन समाज ने आगे बढ़कर स्वागत किया है।अब तक आई प्रविष्ठियों से साफ दिख रहा है कि जैन समाज सुधार के लिए हरदम तैयार रहता है।
    समिति के पदाधिकारियों ने बताया कि देश विदेश में फैले परिचय सम्मेलन के सहयोगियों ने जिन युवाओं की जानकारियां जुटाई हैं उन्हें पत्रिका में सहेजा जा रहा है। पंजीयन कराने और फार्म जमा करने की अंतिम तिथि 21 नवंबर तय की गई है। पत्रिका में जो लोग विज्ञापन प्रकाशित कराना चाहते हैं वे www.djpsbhopal.com पर आन लाईन फार्म जमा कर सकते हैं। इस वेवसाईट से फार्म डाऊनलोड भी किया जा सकता है। सम्मेलन में प्रत्याशियों का पदवार और व्यवसाय वार विवरण रहेगा। आनलाईन फार्म भरने पर बायोडाटा अपलोड करने की सुविधा दी गई है। 3 दिसंबर से 31 दिसंबर तक बायोडाटा आनलाईन सर्च करने की सुविधा भी रहेगी। मिलन स्मारिका रंगीन पृष्ठों में छापी जा रही है।
    सम्मेलन मेँ लम्बे समय से सक्रिय रहे अन्य सूत्र बताते हैँ कि इस परिचय सम्मेलन में जैन युवाओं को आधुनिक जानकारियां दी जा रही हैं।टोंग्या जी वाली समिति से पिछले चार सालों से आय व्यय की जानकारी सार्वजनिक करने की अपील की जा रही थी लेकिन कुछ लोग जानकारियां छुपा रहे थे.इसी वजह से जैन समाज ने ये परिचय सम्मेलन अपने हाथ में ले लिया है। टोंग्या जी वाले परिचय सम्मेलन के कोषाध्यक्ष श्री सेठी और अन्य पदाधिकारी लगभग पच्चीस लाख रुपए से अधिक के आय व्यय की जानकारियां नहीं दे पा रहे थे। कई पदाधिकारियों ने पत्नी के नाम चैक भुगतान करके रकम निकाली थी। कई चहेते लोगों को समिति के फंड से लैपटाप जैसी महंगी गिफ्ट दी गईं.तीन सालों से कोरोना कार्यकाल में आन लाईन परिचय सम्मेलन होने के बावजूद टैंट, भोजन, परिवहन और ठहरने के नाम पर रकम निकाल ली गई थी। समिति के धन से रियल इस्टेट का कारोबार शुरु कर दिया गया था और पैसा मार्केट में फंसा दिखाकर गड़प लिया गया.अब तक लगभग 60 लाख रुपए उड़ाए गए हैँ.25लाख का तो हिसाब प्रारंभिक जांच मेँ पकड़ा गया है.इन्हीं सब ग़ड़बड़ियों को देखते हुए समिति ने नए पंजीकरण के साथ युवाओं को कम कीमत में ज्यादा सुविधाएं दिलाने का फैसला लिया है। इस सम्मेलन में शामिल होने के बाद जैन समाज के लोग खुद समझ जाएंगे कि यदि नियत साफ हो तो किस तरह समाज को ऊंचाईयों पर ले जाया जा सकता है।

    उधर टोंग्या जी वाली समिति के इंजीनियर विनोद जैन का कहना है कि व्यय की जानकारी समिति के सदस्यों को दी गई थी लेकिन कुछ लोग उससे सहमत नहीं थे। उन्होंने अलग परिचय सम्मेलन शुरु कर लिया है।

  • मन को समझकर दूर करें चंद्रमा का बुरा प्रभाव

    मन को समझकर दूर करें चंद्रमा का बुरा प्रभाव



    भोपाल 06 नवंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। चंद्रमा या उसके ग्रहण का मन पर असर पूरे व्यक्तित्व को झिंझोड़कर रख देता है। कुंडली के अध्ययन से हर व्यक्ति के लिए अलग लोकव्यवहार और जीवनचर्या निर्धारित की जा सकती है। इससे सामाजिक उन्नति की राह भी प्रशस्त की जा सकती है। देश को ऐसे ज्योतिषियों की जरूरत है जो मनोविज्ञानी भी हों। वे लोगों का मार्गदर्शन करें ताकि समाज में सुख शांति और समृद्धि की स्थापना की जा सके। ये विचार रविवार को भोपाल के केन्द्रीय संस्कृत संस्थान में आयोजित राष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन एवं सम्मान समारोह में प्रख्यात ज्योतिषी सुश्री हेमलता तिवारी ने व्यक्त किए। ये आयोजन ज्योतिष विचार मंच भोपाल की ओर से आयोजित किया गया था। इस अवसर पर देश भर से आए कई विद्वान ज्योतिषियों को सम्मानित भी किया गया।
    मानसिक रोगों पर चंद्रमा के असर का विश्लेषण करते हुए डॉ.हेमलता तिवारी ने कहा कि हमारे आसपास के लोगों के प्रति हमारा व्यवहार कुंडली में चंद्रमा की स्थितियों के अनुरूप निर्धारित होता है। यदि जातक का जन्म चंद्रमा की जिस स्थिति में हुआ है उसका व्यवहार उसी के मुताबिक होता है। हमारी मनोदशा से ही हमारे लोकव्यवहार निर्धारित होते हैं और यही भाग्य को संवारते भी हैं और बिगाड़ते भी हैं। समाज को बड़ी संख्या में ऐसे मनोविज्ञानी चाहिए जो ज्योतिष का मर्म समझते हों। जातक की कुंडली के अध्ययन से उसकी कई बीमारियों का निदान भी चुटकियों में किया जा सकता है।
    प्रोफेसर हंसराज ने कहा कि सूर्य की प्रतिनिधि आत्मा, और मन का प्रतिनिधि चंद्रमा लग्न के प्रतिनिधि शरीर के साथ मिलकर जीवन की दशा और दिशा तय करते हैं। आत्मा और मन राजा की तरह जीवन के आरोह अवरोह बनाते हैं। जो ग्रह हमारे जीवन पर असर डालते हैं हम केवल उन्हीं का अध्ययन कर पाते हैं। जैसे सूर्य और चंद्रमा का असर तो भौतिक जीवन पर स्पष्ट देखा जाता है लेकिन नवग्रहों और 27 नक्षत्रों के अध्ययन से कई समस्याओं का समाधान किया जाता है। ज्योतिष कर्म करने वाले साधक यदि अर्थलोलुपता के दुष्प्रभाव से बचे रहें तो इस विधा की शान दिन ब दिन बढ़ती जाएगी।


    इस अवसर पर प्रमुख संरक्षक एमएस श्रीवास्तव ने चिकित्सा ज्योतिष के विभिन्न आयामों के आधार पर बताया कि देश के कई राज्यों में गंभीर बीमारियों का इलाज ज्योतिषीय मार्गदर्शन में किया जा रहा है। मंच के प्रमुख केसी कलानिधि ने कहा कि ज्योतिष शास्त्र में ऐसे लोगों की जरूरत नहीं है जो लोगों को ठगते रहते हैं। उन्होंने कहा कि कालसर्प दोष या तो होता है या नहीं होता लेकिन वह कभी आंशिक नहीं होता। जबकि कई ज्योतिषी भ्रांतियां फैलाकर लोगों को ठगने का काम करते रहते हैं।
    कार्यक्रम में न्यूसी समैया, राजेश सोनी, श्वेता विजयवर्गीय, पं.सुदर्शन लव पांडेय.समेत कई विद्वानों ने ज्योतिषीय घटनाओं पर प्रकाश डाला।

  • प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा महाकाल लोक भारत के सांस्कृतिक वैभव की पुर्नस्थापना का उद्घोष

    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा महाकाल लोक भारत के सांस्कृतिक वैभव की पुर्नस्थापना का उद्घोष

    शिवराज और उनकी सरकार का हृदय से अभिनन्दन


    प्रधानमंत्री ने “श्री महाकाल लोक’’ के लोकार्पण के बाद जन समारोह को किया सम्बोधित


    उज्जैन 11 अक्टूबर (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि भारत के सांस्कृतिक वैभव की पुर्नस्थापना का लाभ न केवल भारत को अपितु पूरे विश्व एवं समूची मानवता को मिलेगा। उज्जैन में ‘श्री महाकाल लोक’ की स्थापना इसी की कड़ी है। यह काल के कपाल पर कालातीत अस्तित्व का शिलालेख है। उज्जैन आज भारत की सांस्कृतिक अमरता की घोषणा और नये कालखण्ड का उद्घोष कर रहा है। हमारे लिये धर्म का अर्थ कर्त्तव्यों का सामूहिक संकल्प, विश्व का कल्याण एवं मानव मात्र की सेवा है। हमने आजादी के पहले जो खोया था, उसकी आज पुनर्स्थापना हो रही है। प्रधानमंत्री श्री मोदी आज उज्जैन में ‘श्री महाकाल लोक’ के लोकार्पण के बाद जन समारोह को सम्बोधित कर रहे थे।
    प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि ‘श्री महाकाल लोक’ दिव्य है। यहाँ सब कुछ अलौकिक, अविस्मरणीय एवं अविश्वसनीय है। महाकाल की आराधना अन्त से अनन्त की यात्रा है, आनन्द की यात्रा है, इससे काल की रेखाएँ भी मिट जाती हैं। महाकाल लोक आने वाली कई पीढ़ियों को अलौकिक दिव्यता और सांस्कृतिक ऊर्जा की चेतना प्रदान करेगा। इस अदभुत कार्य के लिये मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान, उनकी सरकार और मन्दिर समिति का मैं हृदय से अभिनन्दन करता हूँ, जिन्होंने निरन्तर पूरे समर्पण से सेवा-यज्ञ किया है।
    प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि भगवान महाकाल की नगरी उज्जैन वह नगरी है, जो प्रलय के प्रहार से भी मुक्त है। “प्रलयो न बाध्यते, तत् महाकाल पूज्यते”। उज्जैन न केवल काल गणना एवं ज्योतिषिय गणना का केन्द्र है, अपितु यह भारत की आत्मा का केन्द्र भी है। यह पवित्र सात पुरियों में एक है। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने शिक्षा ग्रहण की। विक्रमादित्य के प्रताप से भारत के स्वर्णकाल की शुरूआत हुई। विक्रम संवत महाकाल की भूमि से ही शुरू हुआ।
    प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि उज्जैन के क्षण-क्षण में इतिहास, कण-कण में आध्यात्म और कोने-कोने में ईश्वरीय ऊर्जा है। यहाँ कालचक्र के चौरासी कल्पों के प्रतीक चौरासी महादेव, चार महावीर, छह विनायक, आठ भैरव, अष्टमातृका, नौ ग्रह, दस विष्णु, ग्यारह रूद्र, बारह आदित्य, चौबीस देवियाँ एवं 88 तीर्थ हैं। इन सबके केन्द्र में कालाधिराज महाराज विराजमान हैं। पूरे ब्रह्माण्ड की ऊर्जा को ऋषियों ने प्रतीक रूप में समाहित किया। उज्जैन ने एक हजार वर्षों तक भारत की सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान, गरिमा, साहित्य, कला का नेतृत्व किया। कालिदास एवं बाणभट्ट की रचनाओं में यहाँ की सभ्यता, संस्कृति, शिल्प और वैभव का वर्णन मिलता है।
    प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि किसी राष्ट्र का सांस्कृतिक वैभव, उसकी पहचान उसकी सफलता की सबसे बड़ी निशानी है। भारत में हमारे धार्मिक एवं सांस्कृतिक केन्द्र का निरन्तर विकास किया जा रहा है। उज्जैन सहित सोमनाथ, केदारनाथ, बद्रीनाथ आदि केन्द्रों का समुचित विकास किया जा रहा है। चारधाम प्रोजेक्ट में ऑल वेदर रोड बनाये जा रहे हैं। हमने स्वदेश दर्शन एवं प्रसाद योजनाएँ चलाई हैं। हमारे धार्मिक एवं आध्यात्मिक केन्द्रों का गौरव पुनर्स्थापित हो रहा है। महाकाल लोक आज अतीत के गौरव के साथ भविष्य के स्वागत के लिये तैयार हो चुका है।
    प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि हमारे प्राचीन मन्दिरों की दिव्यता, भव्यता, वास्तु और कला हमें आश्चर्यचकित करती है। कोणार्क का सूर्य मन्दिर, एलोरा का कैलाश मन्दिर, मोढेरा का सूर्य मन्दिर, तंजौर का ब्रह्मदेवेश्वर मन्दिर, कांचीपुरम का तिरूमल मन्दिर, रामेश्वरम मन्दिर, मीनाक्षी मन्दिर और श्रीनगर का शंकराचार्य मन्दिर बेजोड़ है। हमारे मन्दिरों का आध्यात्मिक सन्देश आज भी स्पष्ट रूप से सुनाई देता है। पीढ़ियाँ इसे देखती हैं, सुनती हैं। ये हमारी निरन्तरता और परम्परा के वाहक हैं।
    प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि महाकाल लोक में हमारी सांस्कृतिक परम्परा को कला एवं शिल्प के रूप में उकेरा गया है। यहाँ शिव पुराण की कथाओं पर आधारित कलाकृतियाँ बनाई गई हैं। उन्होंने देशवासियों से अपील की कि वे यहाँ अवश्य आयें। यहाँ भगवान शिव के दर्शन के साथ ही उनकी महिमा और महत्व के दर्शन भी होंगे। यहाँ निर्मित पंचमुखी शिव, डमरू, अर्धचंद्र, सप्तऋषि मण्डल अद्वितीय हैं। शिव ही ज्ञान है। शिव दर्शन ब्रह्माण्ड दर्शन है। ज्योतिर्लिंगों का विकास भारत की आध्यात्मिक ज्योति ज्ञान एवं दर्शन का विकास है। भारत आज विश्व के मार्गदर्शन के लिये फिर तैयार है।
    प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि श्री महाकालेश्वर में की जाने वाली भस्म आरती अवसान से पुनर्जीवन और अन्त से अनन्त की यात्रा का प्रतीक है। जहाँ महाकाल हैं, वहाँ विष भी कुंदन होता है। यह भारत की जीवटता और अपराजेय अस्तित्व की प्रतीक है। भारत सदियों से अजर-अमर है। हमारी सभ्यता, परम्परा, आत्मा-जागृत है। श्री महाकालेश्वर विश्व में एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। मन्दिर हमारी आस्था के प्रमाणित केन्द्र हैं। इनके माध्यम से भारत पुनर्जीवित हो रहा है।
    प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि भारत में हजारों वर्षों से कुंभ मेले की परम्परा है। हर बारह वर्ष में हम अमृत मंथन करते हैं और उसमें निकलने वाले अमृत पथ पर चलते हैं। पिछले कुंभ मेले में मैं उज्जैन आया था। उस समय मेरे मन में श्री महाकाल लोक सम्बन्धी संकल्प आया, जिसे आज संकल्प के रूप में मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने चरितार्थ किया है, मैं उन्हें धन्यवाद देता हूँ।
    आज प्राचीन मूल्यों पर नया भारत खड़ा हो रहा है। हमारी विज्ञान और शोध की परम्पराएँ जीवित हैं। खगोल विद्या के क्षेत्र में चंद्र यान, गगन यान मिशन महत्वपूर्ण सफलताएँ हैं। रक्षा के क्षेत्र में हम आत्म-निर्भर हैं। हमारे युवा स्किल, स्पोर्ट्स, स्टार्टअप्स के क्षेत्र में विश्व में भारत का डंका बजा रहे हैं।
    मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि भारत में ही सभ्यता के सूर्य का उदय हुआ। हमारी संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम् एवं सर्वे भवन्तु सुखिन: भी है। हमारा सन्देश विश्व कल्याण का है। भारत के इसी सन्देश को स्वामी विवेकानन्द ने सारी दुनिया को दिया। एक नरेन्द्र ने जो किया दूसरा नरेन्द्र आज उसे पूरा कर रहा है। हमारा योग, उपनिषद, गीता-ज्ञान, आयुष वे दुनिया में लेकर गये। आज श्री नरेन्द्र मोदी गौरवशाली, वैभवशाली, शक्तिशाली भारत का निर्माण कर रहे हैं।
    श्री चौहान ने कहा कि 2016 के सिंहस्थ में विचार महाकुंभ भी हुआ था, जिसमें प्रधानमंत्री श्री मोदी आये थे। विचार महाकुंभ में 51 अमृत बिन्दु निकले, जिनमें से एक श्री महाकाल लोक की स्थापना का कार्य भी था। प्रधानमंत्री श्री मोदी की प्रेरणा से इस कार्य की शुरूआत की गई। वर्ष 2018 में केबिनेट ने इसे स्वीकृति दी, वर्ष 2019-20 में यह कार्य मंद हो गया, लेकिन वर्ष 2020 के बाद तेजी से हुआ। आज इसका लोकार्पण हो रहा है। भगवान शिव सबका कल्याण करने वाले हैं, थोड़ी-सी पूजा से वे प्रसन्न हो जाते हैं, जिसे दुनिया ठुकराती है, उसे अपनाते हैं। उन्होंने पूरी दुनिया को अमृत दिया और स्वयं जहर पिया।
    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि आज भौतिकता से दग्ध मानवता को शाश्वत शान्ति का अदभुत दर्शन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत करायेगा। हम सभी भारत के नवनिर्माण में अपना सर्वश्रेष्ठ दें। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने उपस्थित सभी को विश्व एवं प्राणीमात्र के कल्याण का संकल्प दिलाया।
    प्रारम्भ में प्रधानमंत्री श्री मोदी को राज्यपाल श्री मंगुभाई पटेल एवं मुख्यमंत्री श्री चौहान ने नन्दी द्वार की प्रतिकृति भेंट की। श्री मोदी का मुख्यमंत्री श्री चौहान ने रूद्राक्ष की माला, अंग वस्त्र एवं पगड़ी पहना कर स्वागत किया। प्रसिद्ध भजन गायक श्री कैलाश खेर ने सुमधुर शिव-स्तुति प्रस्तुत की। समूचा वातावरण शिवभक्ति से ओत-प्रोत हो गया।
    उल्लेखनीय है कि श्री महाकाल लोक के लोकार्पण अवसर पर महाकाल मन्दिर सहित पूरे प्रदेश के प्रमुख मन्दिरों एवं देवस्थलों पर रोशनी की गई और स्थानीय लोगों ने स्क्रीन पर लोकार्पण समारेाह को देखा। मन्दिरों में भजन-कीर्तन सहित शिव आरती भी हुई। मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के प्रयासों से न केवल मध्य प्रदेश के 52 जिले, बल्कि पूरे भारत सहित 40 से अधिक देश इस अदभुत समारोह के साक्षी बने। चारों ओर शिव महिमा की गूँज सुनाई दी। सभी लोग श्री महाकाल लोक के लोकार्पण से आनन्दित और भक्तिमय हो गये।
    धार्मिक और आध्यात्मिक रूप में विकसित किये गये श्री महाकाल लोक को देख कर भारत सहित अन्य देश के लोग भी मंत्रमुग्ध हो उठे। बनारस कॉरिडोर की तर्ज पर बने इस लोक के आकर्षण से कोई भी अछूता नहीं रहा। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने भी श्री महाकाल लोक को देख कर मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के प्रयासों पर प्रसन्नता जाहिर की।
    लोकार्पण समारोह में छत्तीसगढ़ की राज्यपाल सुश्री अनुसुइया उइके, झारखंड के राज्यपाल रमेश बैस, केन्द्रीय कृषि एवं कल्याण मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर, नागरिक उड्डयन एवं इस्पात मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, केन्द्रीय सामाजिक न्याय एवं अध्यिाकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार खटीक, इस्पात राज्य मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते, केन्द्रीय जलशक्ति एवं खाद्य प्र-संस्करण उद्योग राज्य मंत्री प्रहलाद पटेल सहित मध्य प्रदेश के मंत्रीगण एवं बड़ी संख्या में साधु-सन्त, श्रद्धालु और नागरिक उपस्थित थे।

  • जीवन को अपडेट और रीसेट करने का महापर्व पर्यूषण

    जीवन को अपडेट और रीसेट करने का महापर्व पर्यूषण

    -डॉ. सुनील जैन संचय

    पर्यूषण यानि दसलक्षण पर्व का जैनधर्म में बहुत ही महत्व है। यह पर्व हमारे जीवन को परिवर्तित करने का कारण बन सकता है। यह ऐसा पर्व है जो हमारी आत्मा की कालिमा को धोने का काम करता है। दिगम्बर एवं श्वेतांबर जैन दोनों में यह पर्व भारी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।वास्तव में ये वह अभ्यास पाठशाला है जिसमें हम अपने विचारों को आधुनिक जीवन के साथ अपडेट और मूल जीवनचर्या के साथ रीसेट कर सकते हैं।

    दिगम्बर, श्वेताम्बर दोनों सम्प्रदाय इसे एक समान तौर पर स्वीकार करते हैं और पूरी वैचारिकता के साथ मनाते हैं।विशेष यह है कि श्वेताम्बर समाज भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशी से भाद्रपद शुक्ला पंचमी तक सिर्फ 8 दिन का मनाते हैं। जबकि दिगम्बर समाज में 10 दिन का प्रचलन है। यह एक मात्र आत्मशुद्धि और आत्म जागरण का पर्व है।इस वर्ष यह महापर्व श्वेतांबर परंपरा में 24 से 31 अगस्त एवं दिगम्बर जैन परंपरा में 31 अगस्त से 9 सितम्बर 2022 तक विधि विधान, त्याग-तपस्या, साधना के साथ मनाया जा रहा है।

    आत्मा के दस मूलभूत गुणों की आराधना :
    इस पर्व में आत्मा के दस मूलभूत गुणों की आराधना की जाती है। इनका सीधा सम्बंध आत्मा के कोमल परिणामों से है। इस पर्व का वैशिष्ट्य है कि इसका सम्बन्ध किसी व्यक्ति विशेष से न होकर आत्मा के गुणों से है। इन गुणों में से एक गुण की भी परिपूर्णता हो जाय तो मोक्ष तत्व की उपलब्धि होने में किंचित् भी संदेह नहीं रह जाता है।
    जैन धर्म में अहिंसा एवं आत्‍मा की शुद्धि को सबसे महत्‍वपूर्ण स्‍थान दिया जाता है। प्रत्‍येक समय हमारे द्वारा किये गये अच्‍छे या बुरे कार्यों से कर्म बंध होता है, जिनका फल हमें अवश्‍य भोगना पड़ता है। शुभ कर्म जीवन व आत्‍मा को उच्‍च स्‍थान तक ले जाता है, वही अशुभ कर्मों से हमारी आत्‍मा मलिन होती जाती है।इसलिए जीवन को सार्थक बनाने में ये सभी दस गुण बहुत कारगर साबित होते हैं।

    दस दिन तक प्रत्येक दिन एक एक धर्म की आराधना :
    पर्युषण पर्व के दौरान विभिन्‍न धार्मिक क्रियाओं से आत्‍मशुद्धि की जाती व मोक्षमार्ग को प्रशस्त करने का प्रयास किया जाता है, ताकि जनम-मरण के चक्र से मुक्ति पायी जा सके। जब तक अशुभ कर्मों का बंधन नहीं छुटेगा, तब तक आत्मा के सच्‍चे स्‍वरूप को हम नहीं पा सकते हैं।

    इस पर्व के दौरान दस धर्मों- उत्‍तम क्षमा, उत्‍तम मार्दव, उत्‍तम आर्जव, उत्‍तम शौच, उत्‍तम सत्‍य, उत्‍तम संयम, उत्‍तम तप, उत्‍तम त्‍याग, उत्‍तम आकिंचन एवं उत्‍तम ब्रह्मचर्य को धारण किया जाता है। समाज के सभी पुरूष, महिलाएं एवं बच्‍चे पर्युषण पर्व को पूर्ण निष्‍ठा के साथ मनाते है। यह पर्व जीवन में नया परिवर्तन लाता है। दस दिवसीय यह पावन पर्व पापों और कषायों को रग -रग से विसर्जन करने का संदेश देता है।

    आत्म जागरण का संदेश :
    संपूर्ण संसार में यही एक ऐसा उत्सव या पर्व है जिसमें आत्मरत होकर व्यक्ति आत्मार्थी बनता है व अलौकिक, आध्यात्मिक आनंद के शिखर पर आरोहण करता हुआ मोक्षगामी होने का सद्प्रयास करता है। पर्युषण आत्म जागरण का संदेश देता है और हमारी सोई हुई आत्मा को जगाता है। इस जाग्रत अवस्था से हमें आत्मा को पहचानने की शक्ति देता है।

    यह पर्व जीवमात्र को क्रोध, मान,माया,लोभ, ईर्ष्या, द्वेष, असंयम आदि विकारी भावों से मुक्त होने की प्रेरणा देता है। हमारे विकार या खोटे भाव ही हमारे दु:ख का कारण हैं और ये भाव वाह्य पदार्थों या व्यक्तियों के संसर्ग के निमित्त से उत्पन्न होते हैं। आसक्ति—रहित आत्मावलोकन करने वाला प्राणी ही इनसे बच पाता है। इस पर्व में इसी आत्म दर्शन की साधना की जाती है। यह एक ऐसा अभिनव पर्व है कि जिसमें अपने ही भीतर छिपे सद्गुणों को विकसित करने का पुरुषार्थ किया जाता है। अपने व्यक्तित्व को समुन्नत बनाने का यह पर्व एक सर्वोत्तम माध्यम है।

    इस दौरान व्यक्ति की संपूर्ण शक्तियां जग जाती हैं। पर्युषण का अर्थ है – ‘ परि ‘ यानी चारों ओर से , ‘ उषण ‘ यानी धर्म की आराधना। वर्ष भर के सांसारिक क्रिया – कलापों के कारण उसमें जो दोष चिपक गया है , उसे दूर करने का प्रयास इस दौरान किया जाता है। शरीर के पोषण में तो हम पूरा वर्ष व्यतीत कर देते हैं। पर पर्व के इन दिनों में आत्म के पोषण के लिए व्रत, नियम, त्याग, संयम को अपनाया जाता है।

    विकृति का विनाश और विशुद्धि का विकास :
    सांसारिक मोह-माया से दूर मंदिरों में भगवान की पूजा-अर्चना, अभिषेक, आरती, जाप एवं गुरूओं के समागम में अधिक से अधिक समय को व्‍यतीत किया जाता है एवं अपनी इंद्रियों को वश में कर विजय प्राप्‍त करने का प्रयास करते हैं।
    दसलक्षण धर्म (पर्यूषण पर्व) के फल के बारे में आचार्य कार्तिकेय स्वामी ने लिखा है-

    एदे दहप्पयारा पाव कम्मस्स णासिया भणिया।
    पुण्णस्स संजणाया पर पुण्णत्थं ण कायव्वा।।

    यह धर्म के दशभेद पाप कर्म को नाश करने वाले और पुण्य का प्रार्दुभाव करने वाले हैं। इसे इस रूप में भी कहा जा सकता है कि यह धर्म पुण्य के पालक और पाप के प्रक्षालक हैें।

    इस पर्व में सभी अपने को अधिक से अधिक शुद्ध एवं पवित्र करने का प्रयास करते है। प्रेम, क्षमा और सच्ची मैत्री के व्यवहार का संकल्प लिया जाता है। खान-पान की शुद्धि एवं आचार-व्यवहार की शालीनता को जीवनशैली का अभिन्न अंग बनाये रखने के लिये मन को मजबूत किया जाता है। विकृति का विनाश और विशुद्धि का विकास करना ही इस पर्व का ध्येय है। पर्व पापों और कषायों को रग -रग से विसर्जन करने का संदेश देता है।

  • सहकारिता से सफल हो रही जैविक खेतीःहेमलता तिवारी

    सहकारिता से सफल हो रही जैविक खेतीःहेमलता तिवारी

    राष्ट्रीय उत्कृष्टता नवाचार समिट में हेमलता तिवारी को मिला साहित्य श्री सम्मान

    देहरादून,19 अगस्त(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। उत्तराखंड के पर्यटन स्थल देहरादून की अभ्युदय वातस्ल्यम संस्था की ओर से आयोजित समागम 2022 में देश भर से आए विद्वानों ने भारत को विश्वगुरु बनाने के सूत्र बताए हैं। संस्था की ओर से इन विद्वानों को सम्मान देकर अलंकृत भी किया गया है। छत्तीसगढ़ के रायपुर की विदुषी डॉ.हेमलता तिवारी को संस्था की ओर से साहित्य श्री सम्मान से अलंकृत किया गया।
    स्वाधीनता दिवस की 75 वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित अखिल भारतीय शैक्षिक नवाचार, प्राकृतिक-जैविक कृषि, शिल्प उद्यमी, पर्यावरणीय पर्यटन, आध्यात्मिक विज्ञान समागम 2022 में अभ्युदय वात्सल्यम की अध्यक्ष और निदेशक डॉ.श्रीमती गार्गी मिश्रा ने बताया कि उनकी संस्था ने देश भर में नवाचारों के लिए योग्य प्रतिभागियों को चयनित किया है। संस्था की ओर से भारतीय संस्कृति में रचे बसे सामाजिक अनुसंधान कर्ताओं को प्रोत्साहित किया जाता है।
    उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय उत्कृष्ट नवाचार समिट में डॉ.हेमलता तिवारी को उत्कृष्ट साहित्य रचना काऊंसिलिंग, वोकेशनल ट्रेनर एवं व्यक्तित्व विकास के माध्यम से समाज का मार्गदर्शन करने के अनुकरणीय नवाचारी योगदान के लिए सम्मानित किया गया है। उन्होंने बताया कि विश्व कल्याण के लिए संकल्पित अभ्युदय वात्सल्यम परिवार वसुधैव कुटुंबकम की भावना से समाज में शिक्षा, सामाजिक, सांस्कृतिक, लोक कल्याण, एवं पर्यावरण आदि विषयों पर सिर्फ चिंतन ही नहीं कुछ प्रायोगिक कार्य भी कर रहे व्यक्तियों को सम्मानित करके गौरव महसूस कर रहा है। हम आशा करते हैं कि हमारी संस्था की ओर से चयनित ये विशेष व्यक्तित्व के धनी लोग भारतीय समाज को नए आयाम प्रदान करते रहेंगे। इन प्रतिभाशाली व्यक्तित्वों की ओर से किए जा रहे विशिष्ट कार्यऔर कर्तव्य के प्रति लगन शीलता देखकर देश की नई पीढ़ी प्रेरणा पाएगी और अनुकरण करके देश को बुलंदियों पर ले जाएगी।


    संस्था की ओर से डॉ.हेमलता तिवारी को अभ्युदय श्री सम्मान और प्रशस्तिपत्र देकर सम्मानित किया गया। डॉ.तिवारी ने इस अवसर पर प्रेस से चर्चा करते हुए कहा कि भारत सरकार ने कृषि को सफल बनाने के लिए जो सुधार कार्य किए हैं वे सराहनीय हैं। मध्यप्रदेश के कई किसान अब बिखरी हुई कृषि परिस्थितियों पर विजय पाने के लिए सहकारिता के माध्यम से सामूहिक खेती कर रहे हैं। उनकी खेती संसाधनों और तकनीक के आधुनिक प्रयोग से सरल होती जा रही है। उन्होंने बताया कि छोटी जोत वाले किसानों के लिए कृषि का मशीनीकरण केवल ख्वाब रहता है। इस सपने को साकार करने के लिए किसानों ने कंपनी बनाकर खेती को संयुक्त करना शुरु कर दिया है। इससे उन्हें वे सभी संसाधन आसानी से मिलने लगे हैं जिन्हें छोटे किसानों के लिए दुरूह समझा जाता था।


    उन्होंने बताया कि ठेका खेती की अवधारणा से डरे किसानों ने अब आपस में गठबंधन करके कंपनियां बनाई हैं। येकंपनियां किसानों को बीज खाद, पानी,ट्रेक्टर एवं अन्य मशीनें मुहैया कराने के साथ साथ अनाज की मार्केटिंग में भी मदद कर रहीं हैं। देश भर में इसी तरह से खेती के स्वरूप को बदलकर खाद्यान्न की जरूरतें पूरी की जा सकती हैं। यही नहीं जैविक खेती से उपजे खाद्यान्न से लोगों को कई बीमारियों से भी बचाया जा सकेगा। एक नए हिंदुस्तान की दिशा में इन प्रयासों का विस्तार जरूरी हो गया है।

  • बड़े बाबा का अगला महामस्तकाभिषेक होली के नौ साल बाद होगाःआचार्यश्री विद्यासागर जी

    बड़े बाबा का अगला महामस्तकाभिषेक होली के नौ साल बाद होगाःआचार्यश्री विद्यासागर जी


    महामस्तकाभिषेक से ही पाप का प्रक्षालन संभव

    कुंडलपुर 25 फरवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। दमोह जिले के कुंडलपुर में इन दिनों चल रहा बड़े बाबा भगवान आदिनाथ का महामस्तकाभिषेक अब हर नौ साल बाद होगा। भगवान आदिनाथ को ऊंची वेदी और भव्य जिनालय में प्रतिष्ठित करवाने के बाद आज आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने अपनी देशना में ये घोषणा की। वर्तमान महामस्तकाभिषेक होली के दिन तक चलता रहेगा,अगला आयोजन नौ साल बाद होगा। महामस्काभिषेक के इस अवसर पर देश विदेश से आए श्रद्धालुओं ने बढ़ चढ़कर भाग लिया।
    आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने कहा कि भगवान आदिनाथ के पुत्र भगवान बाहुबलि की प्रतिमा दक्षिण के श्रवणबेलगोला में है वहां महामस्तकाभिषेक हर बारह सालों में होता है। देश विदेश से धर्मावलंबी वहां पहुंचते हैं। भगवान बाहुबलि की ये प्रतिमा खड़गासन में है जबकि कुंडलपुर में उनके पिता भगवान आदिनाथ की विशाल प्रतिमा बैठी हुई अवस्था में है। कुंडलपुर में भगवान आदिनाथ की प्रतिमा समूचे विश्व में पुण्य के अर्जन के लिए पाप प्रक्षालन का निमित्त बनेगी। उन्होंने कहा कि आचार्यों के अनुसार पाप का प्रक्षालन करके ही पुण्य अर्जित किया जा सकता है। आगम में इसके सिवाय कोई दूसरा मार्ग नहीं बताया गया है। ये प्रभु की भक्ति और ध्यान से ही संभव हो सकता है। पुण्य का अर्जन स्थायी होता है ये किसी भी प्रकार नष्ट नहीं होता। शास्त्रों में 94 पदार्थ बताए गए हैं पर उनमें से केवल पुण्य ही ऐसा है जो अविनाशी है।
    आचार्यश्री ने कहा कि कुंडलपुर में महमस्तकाभिषेक का ये अवसर दुर्लभ है। मेरी शारीरिक अवस्था की वजह से मैं सोच रहा था कि शायद मैं पहाड़ चढ़कर बड़े बाबा के चरणों तक नहीं पहुंच पाऊंगा लेकिन बाबा ने मुझे बुला लिया। आज जहां महामस्तकाभिषेक चल रहा है वहां मैं भी पहुंच गया हूं। अब होली के बाद से हर नौ साल बाद महामस्तकाभिषेक की ये परंपरा चलती रहेगी। बड़े बाबा भगवान आदिनाथ पूरे विश्व के लिए पूज्यनीय हैं। यहां आकर लोग मुंडन कराते रहे हैं अब महामस्तकाभिषेक के माध्यम से वे पुण्य का अर्जन भी करते रहेंगे। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए वो जो जीवन शैली अपनाएंगे उससे सारे विश्व का कल्याण होगा।

  • धर्म सापेक्ष भारत के संविधान से धर्म निरपेक्षता शब्द हटाया जाएः आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

    धर्म सापेक्ष भारत के संविधान से धर्म निरपेक्षता शब्द हटाया जाएः आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

    कुंडलपुर पंचकल्याणक महोत्सव में जाकर केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वीडी शर्मा ने बडे़ बाबा के दर्शन किए


    कुंडलपुर 22 फरवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। दमोह जिले के कुंडलपुर में चल रहे पंचकल्याणक महोत्सव में आज समवसरण में विराजमान आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने दो टूक शब्दों में कहा कि भारत धर्म सापेक्ष देश है। हमारे देश की सभी समस्याओं का समाधान धार्मिक परंपराओं से हो जाता है, ऐसे में देश को धर्म निरपेक्ष कहने की आयातित सोच से अब हमें बाहर निकलना होगा। समय आ गया है जब संविधान में डाला गया धर्मनिरपेक्ष शब्द हटाया जाए और उसकी जगह भारत को धर्म सापेक्ष देश घोषित किया जाए। धर्मसभा में उपस्थित जन समुदाय ने करतल ध्वनि से आचार्य़ श्री की बात का समर्थन किया।
    आचार्य श्री ने सबसे पवित्र समवसरण में विराजमान होकर ईश्वरीय वाणी के रूप में कहा कि भारत का जनमन जिस धार्मिकता से धरा का वैभव संवारता रहा है हमें उस पर गौर करना होगा। उन्होंने कहा कि राष्ट्र की रक्षा और उन्नति धर्म से विमुख होकर नहीं हो सकती। अंग्रेजों ने धर्म का अर्थ रिलीजन यानि साम्प्रदायिक होना गलत समझाया है। धर्म का सही अर्थ तो कर्तव्य का ठीक से पालन करना होता है। महोत्सव के खचाखच भरे विशाल पंडाल में जन समुदाय ने कई बार आचार्य श्री की बातों का जय जय उद्घोष करके समर्थन किया। पंचकल्याणक महोत्सव में आज केन्द्रीय विमानन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया भी पहुंचे थे।
    कुंडलपुर महोत्सव में आज भगवान आदिनाथ का समवसरण सजाया गया था। इस समवसरण में आचार्यश्री अपने निर्यापक शिष्यों के साथ विराजमान थे। समवसरण में भगवान की देशना (धर्म उपदेश) के रूप में आचार्यश्री ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि धर्म की विदेशी परिभाषा को स्वीकार करते हुए भारत को धर्म निरपेक्ष राष्ट्र कहा गया, यह बिल्कुल गलत है। धर्म का सही अर्थ समझा ही नहीं गया। धर्म हमें सन्मार्ग पर चलने की प्ररेणा देता है। धर्म हमारी आत्मा को पवित्र बनाता है। भारत की संस्कृति रही है कि धर्म पर चलने वाला राजा ही प्रजा को सुखी रख सकता है। धर्म से विमुख होकर जनता का हित कैसे हो सकता है? भारत के राजनेताओं को इस बारे में सोचना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत के नेताओं को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। आचार्यश्री ने धर्म के पांच गुण भी बताये। उन्होंने कहा कि जहां झूठ, चोरी, हिंसा, कुशील के साथ कम से कम परिग्रह (आवश्यकता के अनुसार वस्तुओं का संग्रह) की बात हो, वहां धर्म होता है।लोक के लिए धन का संग्रह तो किया जाए पर लोभवश संग्रह न किया जाए। दया का मूल ही धर्म है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में रहकर धर्म निरपेक्ष की बात करना, बिल्कुल गलत है। उन्होंने कहा कि मेरा यह संदेश केन्द्र सरकार तक पहुंचना चाहिए। आचार्यश्री के इस आव्हान पर लोगों ने तालियां बजाकर समर्थन किया।आचार्यश्री ने कहा कि हमारी मौलिक शिक्षा हर बच्चे को आत्मनिर्भर बना सकती है। हमें ऐसा आलोक चाहिए जो किसी भी ग्रहण की स्थिति में देश को अंधकार में भटकने से बचा सके।


    आचार्यश्री ने इस बात पर चिन्ता व्यक्त की कि आज षड्यंत्र पूर्वक तरीके से अंडे को शाकाहारी और दूध को मांसाहारी बताया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस धरती पर यदि साक्षात लक्ष्मी है तो वह गाय है। शास्त्रों में लिखा है कि भगवान आदिनाथ के पुत्र भरत चक्रवर्ती के समय वे तीन करोड़ गौशालाओं का संचालन करते थे। आचार्यश्री ने नकली दूध के प्रचलन पर चिन्ता व्यक्त करते हुए, त्यौहारों के समय दूध मावा से बनी नकली मिठाईयों पर रोक लगाने की जरूरत भी बताई।
    कुंडलपुर महोत्सव में आज सुबह से प्रतिष्ठाचार्य विनय भैया के निर्देशन में धार्मिक अनुष्ठान शुरू हुए। भगवान के अभिषेक, शांतिधारा व नित्य पूजन के बाद आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज की पूजा की गई। इसके बाद मुनि आदिसागर को केवल ज्ञान प्राप्त हुआ। आचार्यश्री के संघस्थ मुनियों ने लगभग 2000 प्रतिमाओं को सूर्यमंत्र देकर उनकी प्राण प्रतिष्ठा की। कुंडलपुर के बड़े बाबा मंदिर में विराजमान नवीन प्रतिमाओं को भी सूर्यमंत्र दिया गया।
    पंचकल्याणक में भगवान की प्रतिमाओं को पहनाये गये वस्त्र व सोने के आभूषण लेने भक्तों में होड मच गई। मूल विधि नायक भगवान के वस्त्र आभूषण की बोली 2 करोड़ 17 लाख में लगी।
    कुंडलपुर महोत्सव में भगवान के समवसरण के लोकार्पण का सौभाग्य दुनिया के सबसे बड़े मार्बल व्यापारी अशोक पाटनी परिवार को मिला। उन्होंने सपरिवार समवसरण का लोकार्पण किया।
    केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और भाजपा प्रदेशाध्यक्ष वीडी शर्मा ने आज कुंडलपुर पहुंचकर बड़े बाबा आदिनाथ भगवानके दर्शन किए और छोटे बाबा आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज का आशीर्वाद लिया। सिंधिया ने प्रेस से चर्चा में कहा कि हम मप्र वासी सौभाग्यशाली हैं कि आचार्यश्री ने अपना अधिकांश समय मप्र में गुजारा है। उनका आशीर्वाद और मार्गदर्शन हमें मिलता रहता है। सिंधिया ने कहा कि प्रदेश की जनता की खुशहाली के लिये आशीर्वाद लेने कुंडलपुर आया हूं। वीडी शर्मा ने भी मीडिया से बात करते हुए कहा कि भगवान के दर्शन करने और आशीष लेने आया हूं।
    दस दिवसीय कुंडलपुर महोत्सव का समापन कल बुधवार को विशाल रथयात्रा फेरी के साथ होगा। फेरी के लिये देशभर से 27 रथ कुंडलपुर पहुंचकर चुके हैं। कल दोपहर में इन रथों पर भगवान को विराजमान कर मुख्य पांडाल की सात फेरियां लगाई जाएंगीं।

  • भारत के स्वाभिमान को जाग्रत करने का सबसे अनुकूल अवसरः आचार्य श्री विद्यासागर जी

    भारत के स्वाभिमान को जाग्रत करने का सबसे अनुकूल अवसरः आचार्य श्री विद्यासागर जी


    मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कुंडलपुर को पवित्र क्षेत्र घोषित किया

    कुंडलपुर 21 फरवरी (प्रेस इँफार्मेशन सेंटर)। दमोह जिले में स्थित जैन तीर्थ क्षेत्र कुंडलपुर में आज मुख्यमंत्री शिवराज सिंहासन चौहान ने धर्मसभा में आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के सामने कहा कि तीर्थ क्षेत्र के आसपास के 7 किलोमीटर क्षेत्र को पवित्र स्थल के रूप में नोटिफाई किया जाएगा, यहां मांस मदिरा व अन्य अनैतिक गतिविधियों पर सख्ती से रोक रहेगी। चौहान आज सपत्नीक कुंडलपुर महोत्सव में शामिल होने पहुंचे थे।
    कुंडलपुर महोत्सव में आज ज्ञान कल्याणक (पूर्व) के धार्मिक अनुष्ठान प्रतिष्ठाचार्य विनय भैया के निर्देशन में किये गये। दोपहर में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने मंत्रिमंडल सहयोगी गोपाल भार्गव व ओमप्रकाश सकलेचा के साथ महोत्सव स्थल पहुंचे। उनके साथ उनकी पत्नि श्रीमती साधना सिंह भी थीं। पूर्व वित्तमंत्री जयंत मलैया और रामकृष्ण कुसमरिया भी इस अवसर पर उपस्थित थे। कुंडलपुर कमेटी ने मुख्यमंत्री और श्रीमती साधना सिंह को चांदी का मुकुट पहनाकर, चांदी का प्रशस्ति पत्र सौंपा। चौहान ने आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज के चरणों में श्रीफल भेंटकर आचार्यश्री का संघ सहित आशीर्वाद लिया।

    आचार्यश्री विद्यासागर जी का आशीर्वाद लेने पहुंचे शिवराज सिंह चौहान और उनकी धर्मपत्नी


    आचार्यश्री ने प्रवचन में कहा कि भारत के गौरवशाली इतिहास को सामने लाना जरूरी है।ये तभी संभव है जब देश को इंडिया बनाने के बजाए भारत बनाया जाए। भारत की मुद्रा का अवमूल्यन केवल इसलिए हो रहा है क्योंकि हमने आत्मनिर्भरता की राह छोड़कर आयातित सोच को महत्व देना बंद नहीं किया है। आजादी के बाद संविधान निर्माताओं ने भगवान आदिनाथ का प्रतीक चिन्ह संविधान पर अंकित किया था। भगवान आदिनाथ ने समाज को आत्मनिर्भरता का संदेश दिया था। उन्होंने कहा कि कोरोना जैसी बीमारियों को दूर भगाना चाहते हो तो आयुर्वेद पर जोर देना होगा। आजादी के बाद साढ़े सात दशक बीत चुके हैं अब हमें तेजी से काम करना होगा।
    आचार्य श्री ने कहा कि देश की बुलंदी के लिए हमें भाषा की भूमिका की पहचान करनी होगी। संविधान में हमने बहुत सारी बातें शामिल की हैं लेकिन हमारी संस्कृति की सोच को हम अब तक केन्द्र में नहीं ला पाए हैं। हमारे न्यायालय जनता की भाषा में घोषणा नहीं करते हैं इसलिए जनता की आस्था लोकतंत्र में स्थापित नहीं हो पा रही है। अदालत में भाषा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि मातृभाषा का असर पूरे समाज पर पड़ता है। पिता की भाषा(अंग्रेजी) देश के व्यक्तित्व का विकास अब तक नहीं कर पाई है। हम विदेशी विचार के प्रभाव में अपनी सहमति भले ही दे दें लेकिन इससे हमारी असफलता की इबारत ही लिखी जाती है। प्राणी की रक्षा तभी संभव है जब हम नकारात्मक भाव को तिलांजलि देंगे और हां की कूबत देखेंगे। सकारात्मकता का असर इतना प्रभावी होता है कि उसके नतीजे देखकर हम दंग रह जाते हैं।
    उन्होंने कहा कि कुंडलपुर के लोगों ने दस दिनों में विशाल पंचकल्याणक की तैयारियां करके साबित किया है कि यदि हम ठान लें तो सब संभव हो सकता है। भारतीयता को लागू करने में सरकारों को कोई शंका नहीं करनी चाहिए। जनता भी सब समझ रही है। आप आगे बढ़ें ,शंका न करें कि कुर्सी हिल जाएगी। जनता आपके सद्प्रयासों को हाथों हाथ लेगी, और आपकी कुस्री भी नहीं हिलेगी।हमें किसी पर अधिकार नहीं करना है,हमारी मंशा साफ है तो जाहिर है कि सबके अधिकार सुरक्षित रहेंगे। हमारी संस्कृति हमारे जीवन का अंग है, यही राष्ट्र के अंग अंग में ऊर्जा भरती है। हमारे देश में रामायण भी पढ़ी जाती है और महाभारत भी। आप इस संस्कृति पर चलेंगे तो देखेंगें कि जिस तरह आधी रात को विभीषण स्वयं चलकर राम की शरण में आया था और रावण राज का अंत हो गया था उसी तरह हम यदि आगे बढ़ेंगे तो सभी परेशानियों का अंत हो जाएगा। आज देश को सबसे उत्तम अवसर मिला है। हम फैसलें लेंगे तो दुनिया में कोई भी भारत को हिला नहीं पाएगा। उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के माध्यम से देश के नेताओं को संदेश दिया कि हम अपनी विचारधारा को मजबूत करेंगे तो उनकी राजनीति को कोई नुक्सान नहीं पहुंचेगा।


    कुंडलपुर महोत्सव में विशाल जनसमूह के सामने शिवराज सिंह ने 17 जनवरी 2006 की तारीख को याद करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री का पद संभाले सिर्फ दो महीने हुए थे, तभी आचार्यश्री ने बड़े बाबा को बड़े सिंहासन पर विराजमान करने का भाव किया। कलेक्टर एसपी और सभी कानूनविद चेतावनी दे रहे थे कि ऐसा हुआ तो सरकार जा सकती है। मैंने तय कर लिया सरकार जाए तो चली जाए, लेकिन आचार्यश्री की भावना के अनुसार बड़े बाबा को बड़े सिंहासन पर विराजमान करके रहेंगे। चौहान ने कहा कि पिछले चुनाव में हमारी सरकार चली गई थी। हमने सोचा अब पांच साल तक विपक्ष में बैठना है, लेकिन बडे बाबा आदिनाथ भगवान और छोटे बाबा आचार्यश्री की कृपा से मुझे फिर से मुख्यमंत्री पद मिला। मैं भाग्यशाली हूं कि बड़े बाबा के भव्य व दिव्य मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा मेरे कार्यकाल में हो रही है।
    मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार के संचालन में कभी कभी कुछ अड़चनें आती हैं। कुछ फैसले लेने में परेशानी होती है। ऐसे में मैं आचार्यश्री के चित्र के सामने ध्यान लगाने बैठता हूं और मेरी सारी समस्याओं का हल मुझे मिल जाता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि आचार्यश्री को प्रणाम किये बिना वह घर से नहीं निकलते। चौहान ने पहली बार आचार्यश्री से कहा कि सभी के प्रति करूणा रखने वाले आचार्यश्री अपने शरीर के प्रति इतने निर्मोही क्यों हैं? मानवता के कल्याण के लिये आचार्य भगवन का हमारे बीच रहना बहुत जरूरी है।
    आचार्यश्री के प्रवचन से पहले निर्यापक मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने सुझाव दिया कि कुंडलपुर के 100 किलोमीटर क्षेत्र को पशुओं के लिये अभ्यारण्य घोषित किया जाए, जहां पशु निर्भय होकर विचरण कर सकें।
    कुंडलपुर महोत्सव में कल मंगलवार को भगवान आदिनाथ का ज्ञान कल्याणक महोत्सव मनाया जाएगा। सुबह से ही धार्मिक अनुष्ठान शुरू होंगे। दोपहर में आचार्यश्री समोशरन में बैठकर प्रवचन देंगे।

  • हर परेशानी का हल सुझाते हैं श्रीमद्भगवदगीता के 11 श्लोक

    हर परेशानी का हल सुझाते हैं श्रीमद्भगवदगीता के 11 श्लोक


    श्रीमद्भगवदगीता को हिंदू धर्म में बड़ा ही पवित्र ग्रंथ माना जाता है। गीता के माध्यम से ही भगवान श्रीकृष्ण ने संसार को धर्मानुसार कर्म करने की प्रेरणा दी।
    हम आपको गीता के कुछ चुनिंदा प्रबंधन सूत्रों के बारे में बता रहे हैं जो भगवान श्रीकृष्ण ने कलयुग के मापदंडों को ध्यान में रखते हुए ही दिए हैं।
    श्लोक 1
    त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
    कामः क्रोधस्तथा लोभस्तरमादेतत्त्रयं त्यजेत्।।
    अर्थ: काम, क्रोध व लोभ। यह तीन प्रकार के नरक के द्वार आत्मा का नाश करने वाले हैं अर्थात् अधोगति में ले जाने वाले हैं, इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।
    मैनेजमेंट सूत्र: काम यानी इच्छाएं, गुस्सा व लालच ही सभी बुराइयों के मूल कारण हैं। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने इन्हें नरक का द्वार कहा है। जिस भी मनुष्य में ये 3 अवगुण होते हैं, वह हमेशा दूसरों को दुख पहुंचाकर अपने स्वार्थ की पूर्ति में लगे रहते हैं। अगर हम किसी लक्ष्य को पाना चाहते हैं तो ये 3 अवगुण हमें हमेशा के लिए छोड़ देना चाहिए। क्योंकि जब तक ये अवगुण हमारे मन में रहेंगे, हमारा मन अपने लक्ष्य से भटकता रहेगा।
    श्लोक 2
    तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः
    वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।
    अर्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मनुष्यों को चाहिए कि वह संपूर्ण इंद्रियों को वश में करके समाहितचित्त हुआ मेरे परायण स्थित होवे, क्योंकि जिस पुरुष की इंद्रियां वश में होती हैं, उसकी ही बुद्धि स्थिर होती है।
    मैनेजमेंट सूत्र: जीभ, त्वचा, आंखें, कान, नाक आदि मनुष्य की इंद्रीयां कही गई हैं। इन्हीं के माध्यम से मनुष्य विभिन्न सांसारिक सुखों का भोग करता है जैसे- जीभ अलग-अलग स्वाद चखकर तृप्त होती है। सुंदर दृश्य देखकर आंखों को अच्छा लगता है। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो मनुष्य अपनी इंद्रीयों पर काबू रखता है उसी की बुद्धि स्थिर होती है। जिसकी बुद्धि स्थिर होगी, वही व्यक्ति अपने क्षेत्र में बुलंदी की ऊंचाइयों को छूता है और जीवन के कर्तव्यों का निर्वाह पूरी ईमानदारी से करता है।
    श्लोक 3
    योगस्थ: कुरु कर्माणि संग त्यक्तवा धनंजय।
    सिद्धय-सिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।।
    अर्थ: हे धनंजय (अर्जुन)। कर्म न करने का आग्रह त्यागकर, यश-अपयश के विषय में समबुद्धि होकर योगयुक्त होकर, कर्म कर, (क्योंकि) समत्व को ही योग कहते हैं।
    मैनेजमेंट सूत्र: धर्म का अर्थ होता है कर्तव्य। धर्म के नाम पर हम अक्सर सिर्फ कर्मकांड, पूजा-पाठ, तीर्थ-मंदिरों तक सीमित रह जाते हैं। हमारे ग्रंथों ने कर्तव्य को ही धर्म कहा है। भगवान कहते हैं कि अपने कर्तव्य को पूरा करने में कभी यश-अपयश और हानि-लाभ का विचार नहीं करना चाहिए। बुद्धि को सिर्फ अपने कर्तव्य यानी धर्म पर टिकाकर काम करना चाहिए। इससे परिणाम बेहतर मिलेंगे और मन में शांति का वास होगा।
    मन में शांति होगी तो परमात्मा से आपका योग आसानी से होगा। आज का युवा अपने कर्तव्यों में फायदे और नुकसान का नापतौल पहले करता है, फिर उस कर्तव्य को पूरा करने के बारे में सोचता है। उस काम से तात्कालिक नुकसान देखने पर कई बार उसे टाल देते हैं और बाद में उससे ज्यादा हानि उठाते हैं।
    श्लोक 4
    नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
    न चाभावयत: शांतिरशांतस्य कुत: सुखम्।।
    अर्थ: योगरहित पुरुष में निश्चय करने की बुद्धि नहीं होती और उसके मन में भावना भी नहीं होती। ऐसे भावनारहित पुरुष को शांति नहीं मिलती और जिसे शांति नहीं, उसे सुख कहां से मिलेगा।
    मैनेजमेंट सूत्र: हर मनुष्य की इच्छा होती है कि उसे सुख प्राप्त हो, इसके लिए वह भटकता रहता है, लेकिन सुख का मूल तो उसके अपने मन में स्थित होता है। जिस मनुष्य का मन इंद्रियों यानी धन, वासना, आलस्य आदि में लिप्त है, उसके मन में भावना ( आत्मज्ञान) नहीं होती। और जिस मनुष्य के मन में भावना नहीं होती, उसे किसी भी प्रकार से शांति नहीं मिलती और जिसके मन में शांति न हो, उसे सुख कहां से प्राप्त होगा। अत: सुख प्राप्त करने के लिए मन पर नियंत्रण होना बहुत आवश्यक है।
    श्लोक 5
    विहाय कामान् य: कर्वान्पुमांश्चरति निस्पृह:।
    निर्ममो निरहंकार स शांतिमधिगच्छति।।
    अर्थ: जो मनुष्य सभी इच्छाओं व कामनाओं को त्याग कर ममता रहित और अहंकार रहित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करता है, उसे ही शांति प्राप्त होती है।
    मैनेजमेंट सूत्र: यहां भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन में किसी भी प्रकार की इच्छा व कामना को रखकर मनुष्य को शांति प्राप्त नहीं हो सकती। इसलिए शांति प्राप्त करने के लिए सबसे पहले मनुष्य को अपने मन से इच्छाओं को मिटाना होगा। हम जो भी कर्म करते हैं, उसके साथ अपने अपेक्षित परिणाम को साथ में चिपका देते हैं। अपनी पसंद के परिणाम की इच्छा हमें कमजोर कर देती है। वो ना हो तो व्यक्ति का मन और ज्यादा अशांत हो जाता है। मन से ममता अथवा अहंकार आदि भावों को मिटाकर तन्मयता से अपने कर्तव्यों का पालन करना होगा। तभी मनुष्य को शांति प्राप्त होगी।
    श्लोक 6
    न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
    कार्यते ह्यश: कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:।।
    अर्थ: कोई भी मनुष्य क्षण भर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। सभी प्राणी प्रकृति के अधीन हैं और प्रकृति अपने अनुसार हर प्राणी से कर्म करवाती है और उसके परिणाम भी देती है।
    मैनेजमेंट सूत्र: बुरे परिणामों के डर से अगर ये सोच लें कि हम कुछ नहीं करेंगे, तो ये हमारी मूर्खता है। खाली बैठे रहना भी एक तरह का कर्म ही है, जिसका परिणाम हमारी आर्थिक हानि, अपयश और समय की हानि के रुप में मिलता है। सारे जीव प्रकृति यानी परमात्मा के अधीन हैं, वो हमसे अपने अनुसार कर्म करवा ही लेगी। और उसका परिणाम भी मिलेगा ही। इसलिए कभी भी कर्म के प्रति उदासीन नहीं होना चाहिए, अपनी क्षमता और विवेक के आधार पर हमें निरंतर कर्म करते रहना चाहिए।
    श्लोक 7
    नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण:।
    शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मण:।।
    अर्थ: तू शास्त्रों में बताए गए अपने धर्म के अनुसार कर्म कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा।
    मैनेजमेंट सूत्र: श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से मनुष्यों को समझाते हैं कि हर मनुष्य को अपने-अपने धर्म के अनुसार कर्म करना चाहिए जैसे- विद्यार्थी का धर्म है विद्या प्राप्त करना, सैनिक का कर्म है देश की रक्षा करना। जो लोग कर्म नहीं करते, उनसे श्रेष्ठ वे लोग होते हैं जो अपने धर्म के अनुसार कर्म करते हैं, क्योंकि बिना कर्म किए तो शरीर का पालन-पोषण करना भी संभव नहीं है। जिस व्यक्ति का जो कर्तव्य तय है, उसे वो पूरा करना ही चाहिए।
    श्लोक 8
    यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
    स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।
    अर्थ: श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं, सामान्य पुरुष भी वैसा ही आचरण करने लगते हैं। श्रेष्ठ पुरुष जिस कर्म को करता है, उसी को आदर्श मानकर लोग उसका अनुसरण करते हैं।
    मैनेजमेंट सूत्र: यहां भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि श्रेष्ठ पुरुष को सदैव अपने पद व गरिमा के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि वह जिस प्रकार का व्यवहार करेगा, सामान्य मनुष्य भी उसी की नकल करेंगे। जो कार्य श्रेष्ठ पुरुष करेगा, सामान्यजन उसी को अपना आदर्श मानेंगे। उदाहरण के तौर पर अगर किसी संस्थान में उच्च अधिकार पूरी मेहनत और निष्ठा से काम करते हैं तो वहां के दूसरे कर्मचारी भी वैसे ही काम करेंगे, लेकिन अगर उच्च अधिकारी काम को टालने लगेंगे तो कर्मचारी उनसे भी ज्यादा आलसी हो जाएंगे।
    श्लोक 9
    न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्म संगिनाम्।
    जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्त: समाचरन्।।
    अर्थ: ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे किंतु स्वयं परमात्मा के स्वरूप में स्थित हुआ और सब कर्मों को अच्छी प्रकार करता हुआ उनसे भी वैसे ही करावे।
    मैनेजमेंट सूत्र: ये प्रतिस्पर्धा का दौर है, यहां हर कोई आगे निकलना चाहता है। ऐसे में अक्सर संस्थानों में ये होता है कि कुछ चतुर लोग अपना काम तो पूरा कर लेते हैं, लेकिन अपने साथी को उसी काम को टालने के लिए प्रोत्साहित करते हैं या काम के प्रति उसके मन में लापरवाही का भाव भर देते हैं। श्रेष्ठ व्यक्ति वही होता है जो अपने काम से दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है। संस्थान में उसी का भविष्य सबसे ज्यादा उज्जवल भी होता है।
    श्लोक 10
    ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
    मम वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्या पार्थ सर्वश:।।
    अर्थ: हे अर्जुन। जो मनुष्य मुझे जिस प्रकार भजता है यानी जिस इच्छा से मेरा स्मरण करता है, उसी के अनुरूप मैं उसे फल प्रदान करता हूं। सभी लोग सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।
    मैनेजमेंट सूत्र: इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि संसार में जो मनुष्य जैसा व्यवहार दूसरों के प्रति करता है, दूसरे भी उसी प्रकार का व्यवहार उसके साथ करते हैं। उदाहरण के तौर पर जो लोग भगवान का स्मरण मोक्ष प्राप्ति के लिए करते हैं, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो किसी अन्य इच्छा से प्रभु का स्मरण करते हैं, उनकी वह इच्छाएं भी प्रभु कृपा से पूर्ण हो जाती है। कंस ने सदैव भगवान को मृत्यु के रूप में स्मरण किया। इसलिए भगवान ने उसे मृत्यु प्रदान की। हमें परमात्मा को वैसे ही याद करना चाहिए जिस रुप में हम उसे पाना चाहते हैं।
    श्लोक 11
    कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
    मा कर्मफलहेतु र्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।।
    अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन। कर्म करने में तेरा अधिकार है। उसके फलों के विषय में मत सोच। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो और कर्म न करने के विषय में भी तू आग्रह न कर।
    मैनेजमेंट सूत्र: भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन से कहना चाहते हैं कि मनुष्य को बिना फल की इच्छा से अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा व ईमानदारी से करना चाहिए। यदि कर्म करते समय फल की इच्छा मन में होगी तो आप पूर्ण निष्ठा से साथ वह कर्म नहीं कर पाओगे। निष्काम कर्म ही सर्वश्रेष्ठ परिणाम देता है। इसलिए बिना किसी फल की इच्छा से मन लगाकार अपना काम करते रहो। फल देना, न देना व कितना देना ये सभी बातें परमात्मा पर छोड़ दो क्योंकि परमात्मा ही सभी का पालनकर्ता है।

  • कोरोना वायरस के नए वेरिएंट ‘ओमीक्रोन’ ने बढ़ाई चिंता

    कोरोना वायरस के नए वेरिएंट ‘ओमीक्रोन’ ने बढ़ाई चिंता

    नई दिल्ली। दुनियाभर में कोरोना वायरस के नए वेरिएंट को लेकर चिंता जताई जा रही है। इसे अब तक का सबसे ज्यादा म्यूटेशन वाला वेरिएंट बताया जा रहा है। इसके सामने आने के बाद सवाल उठने लगे हैं कि ये नया वेरिएंट कितना संक्रामक है, वैक्सीन के बावजूद भी ये कितनी तेजी से फैल सकता है और इसे लेकर क्या करना चाहिए?

    विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कोरोना वायरस के एक नए वेरिएंट को लेकर चिंता जाहिर की है। उसने इसे वेरिएंट ऑफ कंसर्न (वीओसी) बताते हुए इसका नाम ओमीक्रोन (Omicron) रखा है। डब्ल्यूएचओ ने चेतावनी देते हुए कहा कि यह काफी तेजी से और बड़ी संख्या में म्यूटेट होने वाला वेरिएंट है। उसने बताया है कि इस वेरिएंट के कई म्यूटेशन चिंता पैदा करने वाले हैं। इसलिए शुरुआती साक्ष्यों के आधार पर डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि इस म्यूटेशन के चलते संक्रमण का खतरा बढ़ गया है। बता दें कि डब्ल्यूएचओ को इस वेरिएंट के पहले मामले की जानकारी 24 नवंबर को दक्षिण अफ्रीका से मिली थी। इसके अलावा बोत्सवाना, बेल्जियम, हांगकांग और इसराइल में भी इस वेरिएंट की पहचान हुई है। इस वेरिएंट के सामने आने के बाद दुनिया के कई देशों ने दक्षिणी अफ्रीका से आने-जाने पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है।

    अमेरिकी अधिकारियों ने भी दक्षिण अफ्रीका, बोत्सवाना, जिम्बॉब्वे, नामीबिया, लेसोथो, इस्वातिनी, मोज़ाम्बिक और मलावी से आने वाली उड़ानों को रोकने का फ़ैसला किया है. यह प्रतिबंध सोमवार से लागू हो जाएगा. यूरोपीय संघ के देशों और स्विट्ज़रलैंड ने भी कई दक्षिणी अफ़्रीकी देशों से आने-जाने वाले विमानों पर अस्थायी रोक लगा दी है.

    भारत सरकार भी अलर्ट
    भारत के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने नए वेरिएंट की गंभीरता को देखते हुए राज्यों को निर्देश दिया है कि वे दक्षिण अफ्रीका, हॉन्ग कॉन्ग और बोत्स्वाना से आने या जाने वाले यात्रियों की सख्ती से जांच करें और उनका परीक्षण करें। स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पत्र लिख कर कहा है कि भारत के नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (एनसीडीसी) ने सरकार को सूचित किया है कि ‘बोत्स्वाना, दक्षिण अफ्रीका और हॉन्ग कॉन्ग में नए कोविड-19 वेरिएंट बी.1.1529 के कई मामले दर्ज किए गए हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय ने ये भी कहा है कि जारी दिशानिर्देशों के अनुसार इन अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के संपर्कों में आए सभी लोगों को बारीकी से ट्रैक और टेस्ट किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने भी कहा कि अधिक सतर्क रहने और मास्क तथा सोशल डिस्टेंसिंग जैसी उचित सावधानी बरतने की जरूरत है।

  • ब्राह्मणत्व जन्म नहीं आचरण का विषय

    ब्राह्मणत्व जन्म नहीं आचरण का विषय

    जयराम शुक्ल

    “यदि शूद्र में सत्य आदि उपयुक्त लक्षण हैं और ब्राह्मण में नहीं हैं, तो वह शूद्र शूद्र नहीं है, न वह ब्राह्मण ब्राह्मण। युधिष्ठिर कहते हैं कि हे सर्प जिसमें ये सत्य आदि ये लक्षण मौजूद हों, वह ब्राह्मण माना गया है और जिसमें इन लक्षणों का अभाव हो, उसे शूद्र कहना चाहिए”….
    -महाभारत,वनपर्व सर्प-युधिष्ठिर संवाद

    धर्मशात्रों में ब्राह्मणों का स्थान अप्रतिम और अमोघ माना गया है। लोग कह सकते है क्योंकि शास्त्रकार सबके सब ब्राह्मण होते थे इसलिए खुद को सर्वोपरि रखा। फिर भी ब्राह्मणत्व में ऐसा कुछ न कुछ तो होगा कि प्रायः प्रत्येक थर्मशास्त्रों में बार बार समाज को सावधान किया गया है कि वह ब्राह्मणों को रुष्ट होने का अवसर नहीं दे। क्योंकि….

    मन्युप्रहरणा विप्राः न विप्रा शस्त्रयोधिनः।
    निहन्युर्मन्युना विप्राः बज्रपाणिर वासुरान।।

    ब्राह्मण शस्त्र उठाकर युद्ध नहीं करता, उसका हथियार उसका क्रोध है। क्रोध के द्वारा ब्राह्मण वैसा ही विनाश करता है, जैसा विनाश असुरों का इंद्र करते हैं।

    वास्तविक पक्ष यह है कि ब्राह्मणों के शील, स्वभाव और चरित्र की कल्पना जिस ऊंचे धरातल पर की गई है उसे देखते हुए यह सर्वोपरि स्थान प्राप्त हुआ।

    ब्राह्मण नैतिकता के प्रहरी थे। वे समाज के विवेक के प्रतिनिधि होते थे, अतेव उनका धर्म था कि स्वयं राजा भी कुमार्ग पर चले तो उसका प्रतिरोध करे।

    स्पष्टतः यह वही कर सकता है जिसे किसी वस्तु का लोभ न हो। राजा के चरणों में बिछा ब्राह्मण चारण हो सकता है ब्राह्मण नहीं। वह धन और कीर्ति के लोभ में पड़कर अपने कर्तव्य से विमुख न हो।

    भगवान शंकराचार्य से जुड़ी एक कथा है..संन्यास की दीक्षा के उपरान्त वे भिक्षा के लिए एक ब्राह्मणी के घर पहुंचे- मातु भिक्षाम् देहि, की टेर लगाई। ब्राह्मणी अत्यंत गरीब थी। उसके घर अन्न का एक दाना भी न था। वह स्वयं कई दिनों से भूखी थी ..पर याचक अतिथि को कैसे लौटाती। उसके घर एक सूखा आँवला था उसे भिक्षु शंकर को दे दिया।

    कृशकाय गरीब ब्रह्माणी की दशा देखकर आचार्य शंकर की करुणा जगी। शंकर ने स्त्रोत पाठकर माँ लक्ष्मी का आह्वान किया। माँ प्रसन्न हुईं और शंकर की याचनानुसार गरीब ब्राह्मणी के घर को स्वर्ण आँवलों से भर दिया।

    शंकराचार्य यह स्वयं के लिए कर सकते थे या ब्राह्मणी क्षुधापूर्ति के अंतिम साधन से अपना पेट भर सकती थी। पर दोनों ने अपने अपने धर्म का अनुपालन किया। वास्तव में ब्राह्मण धर्म यही है इसीलिए वेदान्त, पुराणों में ब्राह्मण की सर्वोच्चता है।

    सच्चा ब्राहमण वो जो धन, यश, कीर्ति, सम्मान की अपेक्षा न करे। इसीलिए मनुस्मृति में बार बार ब्राह्मणों को सावधान किया गया है।

    असम्मानात्तपोवृद्धिः सम्मानातु तपःक्षयः

    असम्मान पाने से तपस्या में वृद्धि होती है, सम्मान पाने से तप का विनाश होता है।

    सम्मानाद् ब्राह्मणो नित्यं उद्धिजेत विषादिव
    अमृतस्यैव चाकांक्षेत अवमानस्य सर्वदा।

    सम्मान से ब्राह्मण उसी प्रकार भागे, जैसे मनुष्य जहर से भागता है और अपमान की कामना वह उसी प्रकार करे, जैसे लोग अमृत की कामना करते हैं।

    अर्चितः पूजितो विप्रः दुग्ध गौरिव सीदति।

    अर्थात अर्चित पूजित विप्र दुही हुई गौ के समान सूख जाता है। यह मनु का आख्यान है उनके स्मृति ग्रंथ में।

    क्या ऐसा नहीं लगता कि हम ब्राह्मणत्व के गौरव का तो उपभोग करना चाहते हैं पर उसके जीवन आचरण के कठोर अनुशासन को विस्मृत कर देते हैं। वैदिक काल में ब्राह्मणों का इसलिए सत्कार था क्योंकि वे कठोर जीवन का निर्वाह करते थे।

    एक बड़ा प्रश्न वैदिक काल से ही विमर्श का विषय रहा है कि ब्राह्मणत्व जन्म से प्राप्त होता है या कर्म से।

    जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उचयते।

    इस श्लोक से स्पष्ट है वर्ण निर्धारण कर्म से होना चाहिए। किंतु अत्रि संहिता में यही बात विपरीत ढंग से कही गयी है।

    जन्मना ब्राह्मणौं ग्येयः संस्काराद् द्विज उच्यते।

    अर्थात् ब्राह्मण जन्म से ही ब्राह्मण होता है, संस्कारों से द्विजत्व की प्राप्ति होती है।

    यह शंका महाभारतकार महर्षि व्यास के भी मन में भी थी, जिसे उन्होंने वनपर्व में वर्णित युधिष्ठिर-सर्प संवाद में प्रत्यक्ष किया है। सर्प युधिष्ठिर से पूछता है..ब्राह्मण कौन है? इस पर युधिष्ठिर कहते हैं कि ब्राह्मण वह है, जिसमें सत्य, क्षमा, सुशीलता, क्रूरता का अभाव तथा तपस्या और दया, इन सद्गुणों का निवास हो। इस पर सर्प शंका करता है कि ये गुण तो शूद्र में भी हो सकते हैं, तब ब्राह्मण और शूद्र में क्या अंतर है?

    शूद्रेष्वपि च सत्यं च दानम्क्रोध एव च
    आनृशंस्रमहिंसा च घृणा चैव युधिष्ठिर।

    अर्थात् हे युधिष्ठिर, सत्य, दान,दया, अहिंसा आदि गुण तो शूद्रों में भी हो सकते हैंं। इस पर युधिष्ठिर ने जो उत्तर दिया, वह किसी भी अभिनव मनुष्य का उत्तर हो सकता है। युधिष्ठिर ने कहा..

    शूद्रे तु यद् भवेल्लक्ष्म द्विजे तच्च न विद्यते,
    न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मणः।
    यत्रैतल्लक्ष्यते सर्प वृत्तं स ब्राह्मणः स्मृतः
    यत्रैतन्न भवेत सर्प तं शूद्रमति निर्दिशेत।

    अर्थात यदि शूद्र में सत्य आदि उपयुक्त लक्षण हैं और ब्राह्मण में नहीं हैं, तो वह शूद्र शूद्र नहीं है, न वह ब्राह्मण ब्राह्मण। हे सर्प जिसमें ये सत्य आदि ये लक्षण मौजूद हों, वह ब्राह्मण माना गया है और जिसमें इन लक्षणों का अभाव हो, उसे शूद्र कहना चाहिए।

    भारतीय ग्यान परंपरा की अमूल्य निधि वैदिक वाग्यमय की रचना अकेले ब्राह्मणों ने नहीं की है। ऋषिपरंपरा में वर्ण व्यवस्था नहीं थी। प्रकारान्तर में वे ब्राह्मण माने गए जिन्होंने तप,साधना और ग्यान से ब्रह्म के रहस्य को जाना।

    वेद सहित उस समय का रचा हुआ समग्र साहित्य श्रुति और स्मृति परंपरा
    से होते हुए उस काल तक पहुँचा जहाँ जनसंचार के साधन मिलने शुरू हुए। जब यह ग्यान वृहद ग्रंथों के रूप में संकलित होने लगा तब इसमें ग्रंथकारों की ओर से क्षेपक और बुद्धिविलास बखानने का काम शुरू हुआ। वैदिक ग्रंथों की टीकाएं सुविधानुसार की जाने लगी इससे ग्यान की मूल अवधारणा दूषित होने लगी।

    जिस वर्ग पर इसके संरक्षण व संवर्धन की जिम्मेदारी थी उसी ने सबसे ज्यादा यह काम किया। ऋषिपरंपरा से प्रवाहित प्रवाहित होकर चली यह ग्यान संपदा समयकाल के साथ विरूपित होती गयी।

    आज जिस शोध व अनुसंधान की जरूरत है वह यही कि नीर-क्षीर विवेक का प्रयोग करते हुए वेद पुराणों के शुद्ध व संशोधित संस्करण लाए जाएं जो समयकाल के विरूपण से मुक्त हों।

    ग्यान पर ब्राह्मणों का एकाधिकार कभी नहीं रहा। उसे हर वर्ग के लोगों ने संपन्न किया। विश्व के दो महान ग्रंथ हैं, पहला बाल्मीक कृत रामायण, दूसरा वेदव्यास कृत महाभारत। ये दोनों ही महापुरुष जन्म से ब्राह्मण नहीं हैं। सूतजी जिन्हें कथावाचक या सूत्रधार के रूप में पुराणों को लोकमानस तक पहुंचाने का श्रेय जाता है वे ब्राह्मण नहीं अपितु वर्ण से शूद्र थे।

    वेद ध्वनि सुनने पर शूद्र और स्त्री के कानों में पिघला हुआ सीसा डाल देने का श्लोक रचने वाले वही स्वार्थी तत्व थे जिन्होंने ने ऋषि परंपरा से निकले ग्यान को कर्मकाण्ड में बदलकर उसे अपनी वृत्ति(पेशा) बना लिया। यह जानना चाहिए कि वेद किन्हीं एक व्यक्ति द्वारा नहीं लिखे गए। यह तत्कालीन समाज की सहकारी रचनाकर्म है जिसमें महिलाओं का योगदान अग्रगण्य है।

    वेदों में विदुषियों का सम्मान सहित उल्लेख है। और फिर इस बात का उल्लेख पहले ही कर चुका हूँ कि वेदों के रचनाकाल के समय वर्णव्यवस्था थी ही नहीं। यह तो बहुत बाद स्मृति ग्रंथों व पुराणों के रचनाकाल में घनीभूत हुई।

    इसलिए महाभारत में युधिष्ठिर-सर्प संवाद में ब्राह्मण व शूद्र को जिस तरह परिभाषित किया गया और ग्रंथकार वेदव्यास ने जो परिभाषा दी वही सबको ग्राह्य और विशाल हिंदू समाज में उसी की ही पुर्नप्राणप्रतिष्ठा की जानी चाहिए।

    संपर्क- 8225812813

  • कोरोनिल, प्रमाणिक दवाओं का नया फार्मूला है तो विवाद क्यों

    कोरोनिल, प्रमाणिक दवाओं का नया फार्मूला है तो विवाद क्यों

    भोपाल,25 जून(प्रेस सूचना केन्द्र)। कोरोना के उपचार के लिए बनाई गई देशी दवा कोरोनिल को बाजार में उतारने की घोषणा के बाद वैश्विक दवा कंपनियों में हड़कंप मच गया है। दवा निर्माता पतंजलि आयुर्वेद को गरियाने मैदान में उतरे कमीशनखोरों ने बाबा रामदेव पर तरह तरह से आरोपों की झड़ी लगा दी है। वे दवा का क्लीनिकल ट्रायल नहीं होने के आरोप लगा रहे हैं। इस दवा को बनाने में प्रयुक्त हुईं तमाम जड़ी बूटियां सदियों से वायरसों को पराजित करती रहीं हैं। सार्वकालिक उपयोगिता सिद्ध कर चुकी इन जड़ी बूटियों पर निशाना साधने वाले लोग दवा की सफलता पर तुक्केबाजी भरे आरोप लगा रहे हैं। वे ये सोचने तैयार भी नहीं कि यदि भारत के आयुर्वेदाचार्यों ने वायरस की वैक्सीन का तोड़ देसी ढंग से निकाल लिया है तो इसमें नुक्सान क्या है। इस दवा को बनाने की विधि और उसमें शामिल जड़ी बूटियों की सदियों से क्लीनिकल ट्रायल होती रही है। जिन दवाओं की प्रमाणिकता जन जन के बीच सिद्ध है उन्हें कानून की तलवार लेकर बैठे सरकारी अफसरों की क्लीनचिट की जरूरत नहीं है।

    दरअसल स्वास्थ्य के नाम पर विश्व भर में जो दवा उद्योग फैला हुआ है वह सुई की जगह तलवार का इस्तेमाल करके अपनी उपयोगिता सिद्ध करता रहा है। कोरोना के उपचार के लिए भी दुनिया भर की लगभग 130 कंपनियां अपना वैक्सीन बनाने में जुटी हैं। 11 कंपनियों की वैक्सीनों को तो विश्व स्वास्थ्य संगठन अपनी मंजूरी देने बेकरार बैठा है। अभी कोरोना के इलाज की जो विधि दुनिया भर में अपनाई जा रही है उसमें पहले रोगी का टेस्ट किया जाता है। लगभग पांच हजार भारतीय रुपयों की कीमत वाले इस टेस्ट के बाद पता चलता है कि रोगी कोरोना संक्रमित तो नहीं है। इसके बाद संक्रमित रोगियों का उपचार शुरु किया जाता है। ये उपचार पूरी तरह तुक्केबाजी पर टिका है और अन्य रोगों के लिए बनाई गई दवाईयों और विटामिनों के इस्तेमाल से इलाज किया जाता है। जिन रोगियों में डबल निमोनिया जैसे लक्षण पैदा हो जाते हैं और वे सांस नहीं ले पाते उन्हें वैंटीलेटर पर डाल दिया जाता है। जरा सी असावधानी रोगी की जान ले लेती है। नतीजतन तमाम आधुनिक चिकित्सा के उपयोग के बाद दुनिया के पांच लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। दरअसल कोरोना का हौवा खड़ा करने में जिन कंपनियों ने अपनी जमा पूंजी लगा दी है उन्हें यदि देशी फार्मूले ने परास्त कर दिया तो उन कंपनियों का तो दिवाला निकल जाएगा।

    जबकि भारत की दवा निर्माता कंपनी पतंजलि आयुर्वेद ने दावा किया कि कोरोनिल टैबलेट और श्वासारि बटी दवाओं से कोविड-19 का इलाज किया जा सकेगा। अणु तेल का प्रयोग करने की सलाह तो बाबा रामदेव पहले से देते रहे हैं। पतंजलि योगपीठ ने यह भी दावा किया कि उसने इसका क्लिनिकल ट्रायल किया है और सौ फीसदी कोरोना संक्रमित लोगों को मौत के मुंह से बाहर निकाला है। जब इस घोषणा से वायरस पर शोध कर रहीं दुनिया भर की कंपनियों ने दबाव बनाना शुरु किया तो वैश्विक व्यापार संधियों में जकड़ी भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने दवा के प्रचार पर रोक लगाकर पूरी प्रक्रिया की जांच शुरु कर दी।

    हालांकि पतंजलि आयुर्वेद के चेयरमैन आचार्य बालकृष्ण ने इसे ‘कम्युनिकेशन गैप’ बताते हुए यह दावा किया है कि ‘उनकी कंपनी ने आयुष मंत्रालय को सारी जानकारी दे दी है।’ बालकृष्ण ने अपने ट्वीट में लिखा है कि “यह सरकार आयुर्वेद को प्रोत्साहन व गौरव देने वाली है। क्लिनिकल ट्रायल के जितने भी तय मानक हैं, उन 100 प्रतिशत पूरा किया गया है।”

    सामान्य परिस्थितियों में किसी दवा को विकसित करने और उसका क्लिनिकल ट्रायल पूरा होने में कम से कम तीन साल तक का समय लगता है लेकिन अगर स्थिति अपातकालीन हो तो भी किसी दवा को बाज़ार में आने में कम से कम दस महीने से सालभर तक का समय लग जाता है। कोरोनिल में प्रयुक्त सभी जड़ी बूटियां कालातीत हैं और अनुभव व समय की कसौटी पर खरी साबित हो चुकी हैं।

    भारत में किसी दवा या ड्रग को बाज़ार में उतारने से पहले किसी व्यक्ति, संस्था या स्पॉन्सर को कई चरणों से होकर गुज़रना होता है. इसे आम भाषा में ड्रग अप्रूवल प्रोसेस कहते हैं। अप्रूवल प्रोसेस के तहत, क्लिनिकल ट्रायल के लिए आवेदन करना, क्लिनिकल ट्रायल कराना, मार्केटिंग ऑथराइज़ेशन के लिए आवेदन करना और पोस्ट मार्केटिंग स्ट्रेटजी जैसे कई चरण आते हैं। भारत का औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम 1940 और नियम 1945 औषधियों तथा प्रसाधनों के निर्माण, बिक्री और वितरण को विनियमित करता है.

    औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम 1940 और नियम 1945 के अंतर्गत ही भारत सरकार का केंद्रीय औषध मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ- ) दवाओं के अनुमोदन, परीक्षणों का संचालन, दवाओं के मानक तैयार करने, देश में आयातित होने वाली दवाओं की गुणवत्ता पर नियंत्रण और राज्य दवा नियंत्रण संगठनों को विशेष सलाह देते हुए औषधि और प्रसाधन सामग्री के लिए उत्तरदायी है।

    ड्रग रिसर्च एंड मैन्युफ़ैक्चरिंग विशेषज्ञों के अनुसार भारत में किसी दवा के अप्रूवल के लिए सबसे पहले इंवेस्टिगेशनल न्यू ड्रग एप्लिकेशन यानी आईएनडी को सीडीएससीओ के मुख्यालय में जमा करना होता है। इसके बाद न्यू ड्रग डिवीज़न इसका परीक्षण करता है। इस परीक्षण के बाद आईएनडी कमेटी इसका गहन अध्ययन और समीक्षा करती है।इस समीक्षा के बाद इस नई दवा को ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया के पास भेजा जाता है।अगर ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया, आईएनडी के इस आवेदन को सहमति दे देते हैं तो इसके बाद कहीं जाकर क्लिनिकल ट्रायल की बारी आती है। क्लिनिकल ट्रायल के चरण पूरे होने के बाद सीडीएससीओ के पास दोबारा एक आवेदन करना होता है। यह आवेदन न्यू ड्रग रजिस्ट्रेशन के लिए होता है.

    एक बार फिर ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया इसकी समीक्षा करता है। अगर यह नई दवा सभी मानकों पर खरी उतरती है तब इसके लिए लाइसेंस जारी किया जाता है। दवा यदि सभी मानकों पर खरी नहीं उतरती है तो डीसीजीआई इसे रद्द कर देता है।भारत में किसी नई दवा के लिए अगर लाइसेंस हासिल करना है तो कई मानकों का ध्यान रखना होता है। यह सभी मानक औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम 1940 और नियम 1945 के तहत आते हैं।नई दवा दो तरह की हो सकती है. एक तो वो जिसके बारे में पहले कभी पता ही नहीं था. इसे एनसीई कहते हैं। ये एक ऐसी दवा होती है जिसमें कोई नया केमिकल कंपाउंड हो। दूसरी नई दवा उसे कहा जाता है जिसमें कंपाउंड तो पहले से ज्ञात हों लेकिन उनका फ़ॉर्मूलेशन अलग हो। मसलन जो दवा अभी तक टैबलेट के तौर पर दी जाती रही उसे अब स्प्रे के रूप में दिया जाने लगा हो। ये नई दवा के दो रूप हैं लेकिन इनके लाइसेंसिंग अप्रूवल के लिए नियम एक ही होंगे।

    अंग्रेज़ी दवा और आयुर्वेंदिक दवा के लिए अप्रूवल मिलने में बहुत अंतर नहीं है लेकिन आयुर्वेद में अगर किसी प्रतिष्ठित किताब के अनुरूप कोई दवा तैयार की गई है तो उसे आयुष मंत्रालय तुरंत अप्रूवल दे देगा। जबकि एलोपैथी में ऐसा नहीं है।“आयुर्वेद प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति है।जिसमें किसी जड़ी-बूटी को किस मात्रा में, किस रूप में और किस इस्तेमाल के लिए अपनाया जा रहा है सबका लिखित ज़िक्र है। ऐसे में अगर कोई ठीक उसी रूप में अनुपालन करते हुए कोई औषधि तैयार कर रहा है तब तो ठीक है लेकिन अगर कोई काढ़े की जगह टैबलेट बना रहा है और मात्राओं के साथ हेर-फेर कर रहा है तो उसे सबसे पहले इसके लिए रेफ़रेंस देना होता है।”

    अगर आप किसी प्राचीन और मान्य आयुर्वेद संहिता को आधार बनाकर कोई दवा तैयार कर रहे हैं तो आपको क्लिनिकल ट्रायल में जाने की ज़रूरत नहीं है लेकिन अगर आप उसमें कुछ बदलाव कर रहे हैं या उसकी अवस्था को बदल रहे हैं और बाज़ार में उतारना चाहते हैं तो कुछ शर्तों को पूरा करने के बाद ही आप उसे बाज़ार में ला सकेंगे। ऐसा नहीं है कि किसी ने कुछ भी बनाया और बाज़ार में बेचने लगा।”

    एनपीपीए यानी नेशनल फ़ार्मास्युटिकल अथॉरिटी ढांचे के साथ देश के हर राज्य में स्टेट ड्रग कंट्रोलर होते हैं, जो अपने राज्य में दवा के निर्माण के लिए लाइसेंस जारी करते हैं। जिस राज्य में दवा का निर्माण होना है, वहां स्टेट ड्रग कंट्रोलर से अप्रूवल लेना होता है। नेशनल फ़ार्मास्युटिकल अथॉरिटी भी दवाओं की निगरानी करती है,अगर कोई नई दवा ही नहीं बल्कि कोई शेड्यूल ड्रग भी बाज़ार में लाया जा रहा है तो उसे बाज़ार में लाने से पहले उसकी क़ीमत तय की जाएगी। जिसके लिए नेशनल फ़ार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी से अप्रूवल लेना होगा। शेड्यूल ड्रग्स का मतलब ऐसी दवाओं से है जो पहले से ही नेशनल लिस्ट ऑफ़ एसेंशियल लिस्ट में शामिल हों। इन मानक नियमों की अनदेखी होने पर लाइसेंस रद्द भी हो सकता है।

  • बरसों से वायरस को पछाड़ रहा है आयुर्वेद बोले आचार्य शनकुशल

    बरसों से वायरस को पछाड़ रहा है आयुर्वेद बोले आचार्य शनकुशल

    आज का विज्ञान क्या इतना विकसित है जो कोराना से हार रहा है य और उसे विकसित होने के लिए भारतीय प्रयोग शाला के ज्ञान को आधार बनाना पड़ेगा।

    लैब को लेण्ड पर लाना
    भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने एक नारा दिया था वह था लैब को लेण्ड पर लाना है तभी देश विश्व में अग्रणी रहेगा और देशवासी आनंद, शांति और खुशहाल जीवन व्यतीत कर जहां से आया वहीं वापस चला जाएगा और जीवन सफल होगा।
    मानसिक जीवन के आरंभ से ही हर देश और काल में मानव इन्हीं समस्याओं से लड़ रहा है समय-समय पर समस्याओं के समाधान के लिए व्यक्ति समाज और राजा सभी ने समय-समय पर प्रयोग कर आनंद शांति और खुशहाली के साथ मोक्ष प्राप्त किया इसे ही हम लेब नाम से जाने तथा लेण्ड पर लाने के लिए उन्होंने समाज को सिखाया तथा राजा ने अपनाकर शांति स्थापित की अब सोचे आज के वैज्ञानिकों ने जो जो खोजें कि उनका कब कहां उपयोग होना है।
    सर्वप्रथम हम खुद को समाज और देश को देखें उसमें मुख्यता चार ही विचारधाराएं हैं जो सुख शांति दे सकती है।

        प्रथम वर्ग है अर्थाति अर्थात सभी समस्याओं का समाधान अर्थ से किया जा सकता है अर्थात आर्थिक विकास मूल मंत्र रहा और कहा ''सर्व सुख काञ्चनस्थि'' और भारत ने इतनी खोजे करी और विकास लेब में किया जिसमें सोना बनाया राजा वली अपने वजन का सोना कढ़ाई में कूदकर बना लेते थे।

    चाणक्य ने 17 प्रकार का स्वर्ण बनाया तथा देश में हीरा, पन्ना, पुखराज, नीलम विश्व का सबसे अच्छा खोजा और भारत को सोने की चिड़िया नाम विश्व ने दिया। उसी
    लेब को लेण्ड पर लाना है इस वृति के विश्व में •०२% ही है जो यह जानते हैं और विश्व का संचालन कर रहे हैं।

     दूसरा ग्रुप या समुदाय आर्ती (अर्थात दुखी रोगी) असहाय वर्ग आता है जो ६०% है आज की वैज्ञानिक लेब ने इंसान के जीवन को बड़ा नहीं पाय परंतु भारतीय ज्ञान ने आयुर्वेद लेब में अमर कर बताया मुर्दे को जिंदा किया और अंग काट कर दूसरे जीव का अंग लगा कर जिंदा किया जिसमें गणपति, और बिना सर के केकड़ा सोचो आधुनिक युग में आयुर्वेद लैब से मुर्दे को जिंदा करने वाले ज्ञान को लेण्ड पर लाना है जो आयुर्वेद शिक्षा बिना संभव नहीं। 
    
     तीसरा ग्रुप या समुदाय जिज्ञासु का आता है जो २०% ही होंगे जो सब रहस्य और तरीका सीखना चाहते हैं जिनमें भारत ही एक देश है जहां संपूर्ण जिज्ञासाओं को शांत करने हेतु ४ वेद, १०८ उपनिषद, १८ पुराण, गीता, योग दर्शन आदि का लैब रिसर्च रूप में वर्णन है क्यों उसकी शिक्षा नहीं दी जाती इसी ज्ञान के कारण भारत विश्व गुरु से जाना जाता था।
    
     चौथा और अंतिम ग्रुप और समुदाय ज्ञानी वर्ग का है उसमें मात्र गुरु को लैब रूप में मान शिष्यों ने शांति पाई आज गुरु नहीं गुरु खोजना पड़ता है राजा को कार्य सोंपना पड़ता है तब गुरु की महिमा होगी जो बताई है 

    “गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु” और गुरु ही महेश्वर है क्या ऐसे गुरु है अगर है तो क्या कमी होगी भारत में चार प्रयोगशालाय थी हैं और रहेंगी इन्हें लेण्ड पर लाना है।

    भारतीय प्रयोगशालाओं का निष्कर्ष जानिएतब आपको स्वयं पता चलेगा कि आज के आधुनिक विज्ञान से पुष्ट होता है या नहीं। सर्वप्रथम अर्थ को ले जिससे वर्तमान की विश्व समस्या हल होवेंगी।
    भारतीयज्ञान-अर्थ :- अकुला एक से अनेक हुआ और आगे कहा जो विद अर्थात भासता है वही अर्थ पद से जाना जाता है। यही शरीर और ब्रह्मांड का निर्माण करता है इसी की आवश्यकता होती है उसका विनिमय कार्य द्रव्य से होता है कार्य द्रव का मानक स्वर्ण है अतः ब्रह्माण्डीय पदार्थों का विनिमय सोने से किया जा सकता है भारतीय प्रयोगशाला ने ब्रह्मा जी द्वारा ब्रम्हांड की रचना ही सोने के अण्डे से करी इससे पूर्ण कोई परिभाषा नहीं। मानव जीवन की उत्पत्ति स्थिति और मृत्यु का कारण स्वर्ण है आज विज्ञान भी संतान उत्पत्ति और संपूर्ण तंत्र तथा मानसिक क्रियाएं स्वर्ण आयनों से ही संभव बताया है अतः भारतीय प्रयोगशाला को लेण्ड पर लाना होगा।
    दूसरा समुदाय दुखी और रोगियों का है जिनको चिकित्सा चाहिए चिकित्सा इतना व्यापक क्षेत्र है जिसमें आबादी के ६०% लोग ग्रसित हैं सभी को स्वस्थ रहना है और ३ अरब साल से मनुष्य जीने की इच्छा पूर्ण करता रहा है और निरोग रहता रहा है समय समय पर चिकित्सा में चमत्कारी प्रभाव दिखाएं हैं जो लैब तक आ गए थे जिसमें कर कर दिखाया है जैसे मियां मिर्च सारंगी वादक भगवान बुध और वशिष्ठ तथा विश्वामित्र का कायाकल्प हुआ यह सभी चिकित्सा प्रयोगशाला तक रही उदाहरण है इन्हें ही,
    °परंपरागत चिकित्सा
    °ग्रामीण चिकित्सा
    °आयुर्वेद चिकित्सा
    °प्राकृतिक चिकित्सा
    आदि अनंत नामों से आदि से आज तक जानते हैं अतः इस समय पर चिकित्सा को लेण्ड पर लाना है।
    तीसरा बौद्धिक स्तर आता है जिसमें मनुष्य कार्य करने के पूर्व निश्चय करता है कार्य भी किया जा चुका है जिसमें प्रश्न ही समाप्त हो जाते हैं जिनको लैब तक पहुंचाया गया है जिसमें वेद पुराण और भारतीय उपनिषद दर्शन गीता आदि आते हैं उन्हें ही उद्दमियों ने लैब को लेण्ड पर लाने में अलग अपने ढंग से पेश किया और ग्रुप बनाया इसमें कोई त्रुटि नहीं यह परंपरा है। समय आ गया है नई परंपरा और नए तरीके से जिज्ञासाओं को संतुष्ट करने का।
    चौथा ज्ञानी या गुरुओं का आता है आदि से गुरुओं को महत्व दिया है और राम हो या कृष्ण या चंद्रगुप्त सभी के गुरुओं ने राज चलाने की वही ब्रह्मांड नीति को नए ढंग से कुछ जोड़ घटा कर शांति सुहृदयता और प्रकृति का आनंद लेने आने की इच्छा पूर्ण करने के तरीके बताए।

       इस प्रकार चारों वर्ग जब संतुष्ट हो गए तो धरती स्वर्ग हो जाएगी परंतु माध्यम कौन होगा उसको आज के विकसित युग ने उद्दमी पद दिया जिसका तात्विक अर्थ है लैब को लेण्ड पर लाना जिसमें वही पुराना काम है नए परिवेश में नए ढंग से आकर्षक रूप रूप में प्रस्तुत करना है ठीक इसी प्रकार जैसे दांतों के लिए दतौंन मंजन से टूथपेस्ट आदि का निर्माण आता है। हमारे देश में उद्दमी जंगल गांव और शहरों में रहता है राजा सभी को सुखी देखना चाहता है अतः सोचें पहला उद्दमी को मालिक ने जंगल में ही उतारा सनातन धर्म में मनु और इस्लाम में आदम हब्बा जंगल ही में उतरे थे। सोचो क्यों आज आधुनिक युग में प्रत्येक व्यक्ति अपनी संपूर्ण आवश्यकताएं जंगल से ही पूरी करता है सर्वप्रथम आवश्यक आवश्यकता रोटी, कपड़ा, मकान इन तीनों का स्रोत जंगल है औषधि जंगल में मिलती है जिज्ञासा कर कर सीखे जंगल से पूर्ण होगी तथा गुरु का वास भी जंगल में ही होता है कभी सोचा आर्थिक रूप से विश्व का सबसे धनी आदमी जंगल से प्राप्त संपदा से ही होता है चाहे हीरा, सोना, मोती आदि हो या अन्य अतः सबसे अहम भूमिका Forest Base Economy होगी उसी के उद्दमी देश को सुखी करेंगे। उद्दमी को यह मालूम होना चाहिए कि जंगल से वनस्पति रूप में पेड़ नष्ट होते हैं पेड़ फल देते हैं पेड़ पतझड़ भी करते हैं अतः Forest produce base economy फिर Forest deteriorate base और Forest waste देश को मालामाल कर देगी।

    इन तीनों के बाद agro based economy आती है। जंगल में जो होता है उसे कई गुना खेती से करें इसके बाद चिकित्सा पर आधारित अर्थव्यवस्था आती है।
    हमारे देश में जंगल गांव और शहर में रहने वालों की अनुपातिक संख्या १:२४:१२ है। यह पूरी जनसंख्या लेण्ड है और उसकी आवश्यकता सुखी शांत जीवनखुशहाली स्वास्थ्य आनंद लेकर शांतिपूर्ण जहां से आया वहां चला जावे यह उसका अभीष्ट है।
    भारत ने ३ अरब साल में सभी प्रकार की प्रयोगशालाएं निर्मित करी थी जिनकी खोजे हैं परंतु समय की आवश्यकता ने उन्हें बंद कर दिया परंतु ज्ञान विज्ञान के रूप में विद्यमान है आवश्यकता है आज की प्राथमिकता की उसके लिए उद्दमी तैयार कर विश्व शांति स्थापित की जा सकती है। इसके लिए शिक्षा में समूल परिवर्तन करना होगा जिसमें उद्दमी तैयार किए जावे जिसका सिद्धांत होगा “कर कर सीखे” दूसरा Education with free lodging and boarding अर्थात गुरुकुल पद्धति से होना चाहिए जिसका अभिप्राय उद्दमी बनाया हो।
    आज के उद्दमी का पहला नारा
    (१) Make money from waste
    दूसरा नारा
    (२) Input science and technology to convert low grade into high grade just coal into dimond यह प्रथ्वी लेब ही है जहां Aluminium oxide माणिक, पुखराज और नीलम बनता है। यह भी लैब ही है आज भी विज्ञान कि लैब यही कर रही है परंतु बहुत खर्चीला और कठिन है परंतु भारतीय लैब घर पर बना सकती है लैब जमीन में कोयला समय अंतराल में डायमंड बन रहा है उसे देख अमेरिका ने कोयले से हीरा बनाया है।
    आयुर्वेद में रसायन और पारद संहिता में यह सब रहस्य हैं इनकी लैब और उद्दमी बनाना होगा। दूसरा उद्दमी आयुर्वेद का बनाना होगा जो अमृत बनावे तीसरा उद्दमी विद्यालयों की स्थापना का बनाना होगा जो वैदिक ज्ञान को मूर्त रूप दे चौथा उद्दमी गुरुओं की परंपरा पर बनाना होगा इसमें मुख्य भूमिका राज आश्रय की ही होगी क्योंकि सभी कार्य राजाश्रेय से चलते हैं अतः राजा को युधिष्ठिर राम विक्रमादित्य हरिश्चंद्र जैसे चाहिए होंगे तभी रावण और कंस जैसे समाप्त होंगे हमें यथा राजा तथा प्रजा के नारे को साकार होता देखना है।

  • आयुर्वेद की पढ़ाई का स्वरूप बदलें-शनकुशल

    आयुर्वेद की पढ़ाई का स्वरूप बदलें-शनकुशल

    ॐ परमात्मने नमः
    आज विज्ञान ने पदार्थ के अस्तित्व में PTV के अलावा चौथी विमा समय की पुष्टि का प्रत्यक्ष उदाहरण कोरोना के आतंक से प्रतीत हो रहा है ज्योतिष हो या वेद इनकी भविष्यवाणियों से २०२० से २०२५ ईसवी का समय विश्व आबादी को कम करेगा और उनके लिए कोरोना जैसे रोगों का वर्णन ऋग्वेद और अथर्वेद में मिलता है साथ ही भारत विश्व गुरु बनेगा एवं आर्थिक स्थिति में सबसे अच्छा होगा जिससे सोने की चिड़िया की कहावत भी साकार होगी। इसके लिए भारत के परमात्मा स्वरुप प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ही धन्यवाद के पात्र रहेंगे उनका नाम विश्व इतिहास में अमर रहेगा श्री मोदी जी ने जो कहा कि आयुर्वेद में ही कोरोना का उपचार मिलेगा यह बात सत्य है क्योंकि आयुर्वेद चार वेदों से आयु का ज्ञान लेकर पांचवा वेद आयुर्वेद है जिसमें आयु का ज्ञान लेकर आयु का विज्ञान किया जिसके उपयोग से मृत्यु पर विजय प्राप्त की और आयुर्वेद ने अमृत बना लिया तो आयुर्वेद का कार्य समाप्त हो गया। अब तो उस ज्ञान को वैज्ञानिक परिपेक्ष में उपयोग करना है। यह क्यों नहीं हो पा रहा क्योंकि हम आयुर्वेद को विज्ञान की तरह न पढ़ रहे ना समझ रहे इस कारण उसका उपयोग नहीं हो पा रहा अब आवश्यकता है और समस्त आयुर्वेदाचार्यों को यह कार्य सौंपा जाना चाहिए कि वे बताएं यह कोरोना वायरस क्या है यह आदमी द्वारा निर्मित है या समय अंतराल में प्रकृति प्रदत्त है आयुर्वेद का उपयोग तभी संभव है जब आयुर्वेद को ६ मान्यताओं पर उतारना होगा।

    १. वेदों का ज्ञान (संस्कृत के ज्ञान के साथ)
    २. आयुर्वेद का ज्ञान
    ३. ज्योतिष का ज्ञान
    ४. प्रयोगशाला (औषधि निर्माण)
    ५. चिकित्सालय (वास्तु शास्त्र से)
    ६. सहायक (स्त्री व पुरुष)

    उपरोक्त ६ बातों को ध्यान में रखकर मृत्यु पर विजय प्राप्त की जा सकती है। 
    
       आयुर्वेद की वैज्ञानिकता सिद्ध की जा सकती है तभी जब विज्ञान को सही मानकर कसौटी पर आयुर्वेद को कसा जावे और विज्ञान की पहुंच को सीमित बताया जावे जो निम्न प्रकार से संभव है विज्ञान शरीर को पदार्थों से निर्मित मानता है और उसकी निश्चित मात्रा होती है जिसकी कम ज्यादा मात्रा मृत्यु कारक हो जाती है जो स्थूल शरीर में भोजन से प्राप्त तत्व कोषा तक पहुंचाए जाते हैं जिसमें भोजन पदार्थ की अवस्था पर निर्भर करता है तथा कोषा तक जाने के लिए नाड़ियां साफ होना चाहिए अर्थात रास्ता होना चाहिए। आज का विज्ञान रसायनों की मात्रा के लिए शल्य चिकित्सा को महत्व देता है। नाड़ियों के लिए शालावय तन्त्र आयुर्वेद में विकसित था परंतु आज हम न ही आदमी पर हाथी का सर लगा पाए ना हम भोजन को ११ द्वारों से खा पा रहे ना ही भोजन को भक्ष भोज्य लेह और चौश्य अवस्था का ज्ञान कर चबाकर खाना गुटकना, लपटकर खाना नो चूसना इसके महत्व को जानते ना कर रहे। इस ज्ञान से हम औषधि सेवन शरबत, गोली, भस्म, लेप और पफ आदि सब सिस्टम समझेंगे और आयुर्वेद को मानेंगे। 
    
     आधुनिक विज्ञान औषधि के मन का निर्माण नहीं कर सकी इस कारण प्राचीन आयुर्वेद में संजीवनी बूटी सूर्योदय से पहले की बात तथा रविवार को आंवला ना खाना एकादशी को चावल आदि का क्यामहत्व है समझना पड़ेगा वहीं रावण ने बड़ के पत्ते से तार को ७ धातुओं में बदलने के महत्व को समय की महिमा बताई वहीं पानी के प्रकार और अर्क से सभी चिकित्सा संभव है। औषधि की जातियां जातियां समझना होंगी जैसे सफेद धतूरा, पीला, काला इसमें प्रभाव का क्या अंतर है इसी प्रकार प्लास पीला, सफेद, लाल इसके अलावा एक पत्ती ३ पत्ती और ५ पत्ती के पलाश में क्या अंतर है। इसी प्रकार इनके तोड़ने और एकत्र करना जिसमें शुक्ल और कृष्ण पक्ष अमावश्या पूर्णमासी दिन में रात्रि में आदि साथ ही ५ अंगों फल, फूल, तना, जड़, पत्ते इसमें क्या चाहिए कब और क्यों।

    वेदों में सब बताया है यहां तक कि समय पर कौन सी औषधि प्रकृति निर्मित करती है जैसे औषधि स्वयं अपने निर्माण को जानती है उसी को जानकर जादू की औषधियां और औषधियों के साथ से अमृत और विष बन जाता है यदि कोरोना वायरस है तो आयुर्वेद का अगद, बल एवं भ्रत्य और भूत संकाय से इसे बनाया जा सकता है और रसायन व बाजीकरण से कोरोना से लड़ने की क्षमता प्रदान करी जा सकती है।
    पृथ्वी पर जीवन की रक्षा आयुर्वेद से ही संभव है उसके लिए आयुर्वेद शिक्षा होनी चाहिए जिसमें पूरे ६ विषय पढ़ाए जावे।

  • आयुर्वेद में पहले से उपलब्ध है वायरस मुक्ति का उपायःआचार्य हुकुमचंद शनकुशल

    आयुर्वेद में पहले से उपलब्ध है वायरस मुक्ति का उपायःआचार्य हुकुमचंद शनकुशल

    भोपाल,8 अप्रैल(प्रेस इन्फार्मेशन सेंटर)। आयुर्वेद की शास्त्रोक्त पद्धति से बनाई गईं औषधियां कोरोना को परास्त करने में पूरी तरह सक्षम हैं।इसके पहले भी वायरसों के हमलों से आयुर्वेद रक्षा करता रहा है। आधुनिक चिकित्सा के वैज्ञानिक अनुसंधानों के बीच आयुर्वेद की जो परंपरा भुला दी गई है उस पर अमल करके भारत को दुनिया का मार्गदर्शन करना चाहिए। राजधानी में भारतीय योग अनुसंधान केन्द्र आनंदनगर के संस्थापक आचार्य हुकुमचंद शनकुशल ने कोरोना के उपचार की जो दवाएं विकसित की हैं वे उनके माध्यम से लोगों को मुफ्त उपचार सेवाएं भी दे रहे हैं।

    श्री शनकुशल ने बताया कि उन्होंने आयनिक पानी और अग्नि तत्व के माध्यम से कोरोना के उपचार की पूरी विधि विकसित की है। इस उपचार विधि में स्वर्णिम जल, विष्णुजल,नस्य, और धूनी मसाला व शर्बत बनाया है जो कोरोना संक्रमण को रोकने में कारगर है। उन्होंने अपने दावे की प्रमाणिकता को साबित करने के लिए आयुर्वेद में दिए गए उपायों का भी विवरण प्रस्तुत किया है। आयनिक जल का प्रयोगशाला में भी परीक्षण कराया गया है जिससे इसके सुरक्षित होने का विश्वास बढ़ेगा। इन दवाओं से उन्होंने आम मरीजों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सफलता भी पाई है।

    योग और आयुर्वेद को पिछले पचास सालों से भी अधिक समय से वैज्ञानिक आधार पर परिभाषित करते रहे आचार्य हुकुमचंद शनकुशल ने बताया कि ये जग जाहिर तथ्य है कि पीने का पानी यदि शुद्ध हो तो कई बीमारियों से बचा जा सकता है। पानी हमारी कोशिकाओं का प्रमुख तत्व भी होता है। हमारा शरीर कई किस्म के न्यूरोन्स की गतिविधियों से ही सक्रिय रहता है। यही वजह है कि स्वर्णिम जल शरीर पर तुरंत असर करता है। इसे बनाने के लिए ज्वालामुखी के चार सौ फीट की गहराई से निकाले गए पानी का शोधन किया जाता है।इस पानी में सोना, मैग्नीशियम और एल्यूमीनियम जैसे तत्वों के लवण मौजूद हैं। गहन चुंबकीय क्षेत्र से गुजारे गए इस पानी को सोने और तांबे के बीच से गुजारा जाता है। यही वजह है कि ये आयनिक पानी हमारे शरीर पर तेज असर डालता है। सरकार यदि पहल करे तो आम जनता को ये जल बहुत सस्ती कीमत पर उपलब्ध कराया जा सकता है।

    आचार्य हुकुमचंद शनकुशलः विश्व को स्वस्थ और सफल बनाने का सतत अनुष्ठान

    गौमूत्र से निर्मित विष्णुजल कोरोना जैसे वायरसों को निष्क्रिय करने में प्रभावी भूमिका निभाता है। शास्त्रोक्त विधि से इसे बनाने का विवरण कई ग्रंथों में पहले से मौजूद है। इसे बनाने के लिए आठ लीटर बछिया के मूत्र में आधा किलो सौंफ, आधा किलो धनिया मिलाकर 24 घंटे के लिए रख दिया जाता है। इसके बाद इसा अर्क उतार लिया जाता है। पांच लीटर इस अर्क में 250 ग्राम गंधक शोधित आंवला सार, 250 ग्राम चूना, 5 ग्राम लौंग, 5 ग्राम इलायची मिलाई जाती है। इसे नारंगी होने तक उबाला जाता है और फिर 24 घंटे बाद निथारकर छानकर रख लिया जाता है। इससे त्वचा को शुद्ध किया जाता है और शरीर पर भी छिड़ककर वायरस को निष्क्रिय कर दिया जाता है।

    कोरोना जिस तरह से मस्तिष्क की चेतना प्रभावित करता है और फेंफड़ों में रुकावट लाता है उसे बेअसर करने के लिए वैदिक नस्य बनाई जाती है। इसमें अपामार्ग, अरीठा, आक(मदार), गोलोचन, और केसर डालकर पीसा जाता है। इसे बनाने के लिए 25ग्राम चावल का आटा, 2 ग्राम शुद्ध केसर, 10 ग्राम अपामार्ग का आटा, 70 मिलीग्राम सफेद अर्क का दूध मिलाकर 24 घंटे बाद घोंटा जाता है। 5 ग्राम अरीठे का झाग 2 मिलीलीटर मिलाकर तब तक घोंटा जाता है जब तक कि ये सूख न जाए। इसमें 1 ग्राम शुद्ध गोलोचन मिलाकर घोंट दिया जाता है। इस नस्य को दिन में 11 बजे से 4 बजे के बीच सूंघा जाता है। अंगूठा और उसके पास वाली उंगली से चुटकी भर नस्य लेकर जोर से सूंघा जाता है। सूर्य की ओर नासा छिद्र करके सांस ली जाती है तो छींकें आने लगती हैं। कफ निकलने के बाद छींकें बंद हो जाती है। इसके बाद उंगली में थोड़ा गाय का घी मिलाकर नाक का सूखापन दूर कर दिया जाता है। इसके उपयोग से नाक से पानी बहना, सर्दी जुकाम और बुखार से रक्षा होती है और मस्तिष्कीय चेतना बढ़ती है।

    कोरोना में फेंफड़ों में फाईब्राईड विकसित हो जाते हैं और उनका स्पंज समाप्त होने लगता है।इससे फेंफड़ों में सांस रोक सकने की क्षमता समाप्त हो जाती है। इसका इलाज हवन प्रक्रिया से किया जाता है। हवन की जो समिधा बनाई जाती है उसमें अर्क(मदार) की लकड़़ी का उपयोग होता है। धूम लेने के लिए काले धतूरे के पत्ते, सत्यानाशी के बीज, बिल्ली की विष्टा, मोर पंख, गाय का सींग, सांप की केंचुली, नीम के पत्ते, वासा की छाल, अर्क के फूल, तुलसी पत्र, बहेड़ा पाऊडर, घी, शहद और गुग्गल मिलाकर धूनी दी जाती है। इससे फेंफड़े खराब नहीं हो पाते। अथर्व वेद की भूत विद्या में इस फार्मूले का विवरण दिया गया है। सन्निपात, भूत बाधा और नाड़ी चिकित्सा में ये विधि बहुत सफल साबित होती रही है। कोरोना वायरस को बेअसर करने में भी यही विधि रामबाण साबित होगी।

    गले की नली में खराश करने वाला कोरोना वायरस लिवर और किडनी को भी क्षतिग्रस्त करता है। इसके निदान के लिए आंवला, बहेड़ा, पारिजात और गुड़हल के फूल का शरबत रोगी को पिलाया जाता है। इससे वायरस का असर भी समाप्त होता है और पीड़ित की चेतना भी लौटने लगती है।

    श्री शनकुशल ने बताया कि पूरी चिकित्सा विधि अग्नि और आयनिक जल के प्रयोग पर केन्द्रित है। इसका असर अब तक वायरसों के आक्रमण से रक्षा के लिए होता रहा है। यजुर्वेद में भी इन विधियों का उल्लेख है। बड़े पैमाने पर ये कार्य सरकारी संरक्षण के बगैर संभव नहीं है। यदि कोरोना संक्रमितों को इस विधि से उपचार दिया जाए तो न केवल मरीजों को ठीक किया जा सकता है बल्कि देश के संसाधनों की बड़ी क्षति भी बचाई जा सकती है।

  • धन प्रबंधन से पहले देखें कुंडली

    धन प्रबंधन से पहले देखें कुंडली

    पं. अशोक पंवार मयंक

    धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष ये चार पुरुषार्थ हैं। अर्थ और काम भौतिक हैं,तथा मनुष्यों को इनकी आकांक्षा होना स्वाभाविक है। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा जो धन प्राप्ति की आकांक्षा न रखता हो। धन के बिना जीवन नीरस हो जाता है। जिनके पास धन होता है वे मजे में रहते हैं,एवं अपने नाती पोतों के लिए धन जोड़ते चले जाते हैं। धन हर एक कार्य कर देता है। ज्योतिष की दृष्टि से हम इसी विषय की चर्चा यहां करेंगे।

    धन स्थान का कुंडली में दूसरा घर होता है,एवं प्राप्ति(लाभ) स्थान 11 वें भाव को कहते हैं।जहां लाभ स्थान उत्तम होगा वहीं धन की बचत होगी। खर्च की स्थिति जानने के लिए कुंडली में 12 वां घर होता है। इसके साथ ही अन्य घरों का महत्व संक्षेप में निम्नानुसार है।

    1.लाभ स्थान में स्वग्रही गुरु और साथ में नेप्च्यून हो तो जातक की(जिसकी जन्म कुंडली हो) आय उत्तम होती है।

    2.लाभ स्थान में गुरु अकेला हो, तो जातक की आय स्थिर होती है। अगर गुरु के साथ शुक्र, बुध अथवा ग्यारहवें भाव का स्वामी हो तो आवक थोड़ी होती है।

    3.ग्यारहवें भाव में गुरु चंद्र की युति हो तो वारिसनामा मिलता है,तथा गुरु व चतुर्थेश हो, तो भी जातक धन संपत्ति का वारिस बनता है।

    4.धनेश, भाग्येश, लाभ स्थान में हो तो जातक की आवक बहुत होती है। अगर धनेश भाग्येश साथ में होकर 11 वें स्थान में हो तो जातक अत्यंत धनवान होता है।

    5.धनेश, भाग्येश में से कोई भी एक ग्रह लाभस्थान में हो और दूसरा बारहवें भाव में हो तो जातक की आर्थिक स्थिति सामान्य होती है।

    6.ग्यारहवें भाव पर बारहवें भाव के स्वामी की दृष्टि पड़े तो साधारण आय होती है।

    7.लाभेश छठे, आठवें या बारहवें स्थान में हो तो दूषित होने के कारण जातक की आर्थिक आय मध्यम होती है।

    8.ग्यारहवें स्थान का स्वामी शत्रु स्थान में या नीच का हो तो जातक की आय घटती है।

    9.ग्यारहवें भाव का स्वामी दशम भाव में हो तो आवक कम रहती है।

    10.ग्यारहवें भाव का स्वामी बारहवें भाव में हो या दशम भाव में हो तो भी आय से खर्च अधिक होता है।

    उपर्युक्त दस बिंदुओं में से आय कैसी होगी ये दर्शाया गया है। बचत बैंक बैलेन्स होगा या नहीं इसकी जानकारी इस प्रकार है।

    1.धन स्थान से आवक नहीं देखी जाती लेकिन इसे धन संचय या बैंक बैलेन्स का स्थान कहते हैं। धन स्थान के साथ बारहवें भाव की स्थिति का अध्ययन करना जरूरी है। क्योंकि बारहवां भाव जातक का है। आवक-जावक में से जो पैसा बचता है वही बचत होती है।

    2.धन स्थान में व लाभ स्थान में ये विशेषता है कि गुरु के साथ शुक्र की युति हो तो धन संचय में बाधा आती है। धन स्थान में गुरु हो और शुक्र लाभेश या भाग्येश होकर पड़ा हो अथवा धन स्थान में गुरु लाभ भाव में भाग्येश होकर पडा हो तो धन संचय में खूब वृद्धि होती है।

    3.अगर धन स्थान में भाग्य स्थान का परिवर्तन योग हो तो जातक की आय का काफी हिस्सा खर्च होता है। और उसके बाद भी काफी धन अनुपयोगी पड़ा रहता है।

    4.धन स्थान का स्वामी गुरु हो और कुंडली में शनि की युति हो अथवा धन स्थान का स्वामी शनि हो और गुरु की युति हो तो उसकी संपत्ति कोई दूसरा नहीं ले सकता। ऐसा जातक धन इकट्ठा करने वाला होता है।

    5.धन स्थान का स्वामी पराक्रम में हो तो जातक के पास पराक्रम द्वारा कमाया धन होता है यानि वह स्वप्रयत्नों से धन लाभ पाता है।

    6.धन स्थान और पराक्रम स्थान के स्वामी का एक दूसरी राशि में परिवर्तन हो और इस परिवर्तन योग में मंगल ग्रह हो तो जातक के पास धन रहता है और वह कंजूस प्रवृ़त्ति का होता है।

    7.धन स्थान का स्वामी कुंडली में पांचवे स्थान में पड़ा हो और शुक्र ग्रह युक्त हो या उस पर शुक्र ग्रह की दृष्टि पड़ रही हो या मित्र क्षेत्री हो तो उस व्यक्ति के पास अटूट संपदा होने में कोई शक नहीं है।

    8.अगर लाभ स्थान में सारे ग्रह पड़े हों एवं आसपास कोई ग्रह नहीं हो तो जातक की आय बहुत कम रहती है। या यूं कहें कि कामचलाऊ के अलावा धन नहीं रहता।

    9.धनस्थान का स्वामी कुंडली में लग्न चतुर्थ, सप्तम, दशम यानि केन्द्र में शुभ या मित्र ग्रह की युति में हों तो धन अच्छा जुड़ता है।

    धन स्थान व लाभ स्थान के विचार के बाद अब भाग्य स्थान बाकी रह गया है। भाग्य के बगैर सब अधूरा रहता है। अगर आपकी कुंडली में भाग्य स्थान बली न हो तो न तो धन रहेगा न लाभ तो आईए भाग्य के विषय में थोड़ा जान लें।

    सर्व प्रथम तो ये जानना आवश्यक है कि भाग्य स्थान का संबंध मात्र धन संपत्ति से नहीं होता इंसान के व्यक्तित्व,यश कीर्ति से भी इसका संबंध है।

    नवम भाव को भाग्य भवन कहते हैं। भाग्य का अर्थ धनवान होना नहीं होता बल्कि भाग्य शब्द का क्षेत्र बहुत बड़ा है। भाग्य के बल पर सब कुछ मिलता है, ये बात ध्यान में रखनी चाहिए।

    1 . मेष लग्न हो व भाग्य भाव में गुरु व चंद्र की युति हो तो जातक के धार्मिक होने के साथ साथ बाहिरी संबंध उचित होंगे। व माता सुख उत्तम रहता है। विद्या उत्तम होने के साथ साथ पुत्रवान होकर सुख भोगता है। यदि भाग्य भाव में शुक्र हो तो धन संपत्तिवान व स्त्री सुख उत्तम पाता है।

    स्त्रियों से लाभ भी मिलता है। अगर मंगल हो व शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ रही हो तो जातक शारीरिक सुख व आयु लाभ पाने वाला होता है। भाईयों का सहयोग उत्तम रहता है,लेकिन मातृ सुख से वंचित भी करता है। इस भाव में चंद्र, गुरु, शुक्र, सूर्य ही उपयुक्त रहते हैं। बाकी सभी ग्रह कुछ न कुछ अनिष्ट कारक ही रहते हैं।

    2.यदि जातक की वृषभ लग्न व नवम भाव में बुध पड़ा हो तो वह धन संपत्तिवान होगा। धन व्यापारिक लेखन, या बुद्धि के कार्यों से अर्जित करने वाला होगा। शनि राज्य से लाभ दिलाने वाला होगा। इसी प्रकार जातक को शुक्र भी स्व प्रयत्नों से नाना माया से या कला के क्षेत्र से अर्थालाभ दिलाने वाला होगा। इन ग्रहों की दृष्टि नवम भावपर पड़ रही होगी तो भी ये लाभ दिलाएगा।

    3,मिथुन लग्न वालों का भाग्य अधिकतर कष्टप्रद ही रहता है। व बहुत धीमी गति से आगे बढ़ते हैं क्योंकि अष्टम भाव मकर होता है। अतःशनि बाधक ग्रह बन जाता है।

    4.कर्क लग्न वाले भाग्यशाली ही होते हैं। यदि गुरु भाग्य भाव में होता तो वह स्वराशि मीन का होता है, व लग्न पर उच्च दृष्टि डालता है। सप्तम पराक्रम भाव पर शत्रु दृष्टि पड़ती है,लेकिन अशुभ फल न मिलकर शुभ फल ही मिलता है। पंचम भाव पर मित्र दृष्टि पड़ने से ये पंचम भाव को अमृतपान कराता है। अतःविद्या – पूजा आदि उत्तम होते हैं। शारीरिक सौंदर्य भी बढ़ता है लेकिन अक्सर इन्हें गंजेपन का भी रोग होता है। ये उच्च पदों पर भी आसीन होते हैं। यदि सूर्य गुरु की युति रही तो राजदूत न्यायाधीश राजनीति में प्रमुख एवं धनवान होते हैं। यदि शुक्र रहा तो इनके पास अटूट धन रहता है। व प्रारंभ से अंत तक धनाड्य रहते हैं। लाभ भी बहुत होकर वाहन अधिपति होते हैं।

    5 सिंह लग्न वालों के लिए सूर्य या सूर्य बुध की युति अति उत्तम होती है। ये जातक भी बिंदु क्रमांक चार के विवेचन के समान रहते हैं।

    6.कन्या लग्न वालों के लिए शुक्र या चंद्र या फिर शुक्र चंद्र की युति उत्तम रहकर धनवान बनाती है।

    7.तुला लग्न वालों के लिए बुध ग्रह उत्तम रहता है। बुध यदि नवम में हो या बारहवें भाव में हो तो भाग्य उत्तम रहता है। उसे बाहर के व्यापार विदेश या व्यापारी बाहिरी संबंधों से लाभ होता है। शनि भी अति शुभ माना जाएगा।

    8.वृश्चिक लग्न वालों को गुरु व चंद्र उत्तम बलशाली रहेंगे या इन ग्रहों की दृष्टि पड़ने पर भी भाग्य बलवान माना जाएगा।

    9.धनु लग्न वालों को गुरु व सूर्य भाग्यशाली ग्रह होकर भाग्य को बढ़ाने वाले होंगे। मंगल व चंद्र ग्रह भी शुभ रहेंगे।

    10 मकर लग्न वालों को शनि व बुध की स्थिति उत्तम भाग्यवर्धक रहेगी। शुक्र भी उत्तम फलदायक होंगे।

    11.कुंभ लग्न वालों को शनि शुक्र की स्थिति लाभप्रद होने के साथ भाग्यवर्धक रहेगी।

    12.मीन लग्न वालों को गुरु व मंगल की दृष्टि शुभ रहेगी। कहते हैं कि बिन भाग्य के सब सून ,भाग्यहीन व्यक्ति दरिद्र के समान होता है एवं भाग्य का होना धन संपत्ति में चार चांद लगा देता है।

  • कोरोना वायरस का असर महामारी घोषित

    कोरोना वायरस का असर महामारी घोषित

    दिल्ली,13 मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)। चीन में तबाही मचाने वाला कोरोना वायरस अब पूरे विश्व में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है। चीन से बाहर 122 देशों में कोरोना वायरस के मामलों की पुष्टि हुई है. इन देशों में थाईलैंड, ईरान, इटली, जापान, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं. आइए जानते हैं कि इस वायरस के लक्षण और बचाव के तरीके क्या हैं.

    कोरोना वायरस का संबंध वायरस के ऐसे परिवार से है, जिसके संक्रमण से जुकाम से लेकर सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्या क्या है कोरोना वायरस? कोरोना वायरस का संबंध वायरस के ऐसे परिवार से है, जिसके संक्रमण से जुकाम से लेकर सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्या हो सकती है. इस वायरस को पहले कभी नहीं देखा गया है. इस वायरस का संक्रमण दिसंबर में चीन के वुहान में शुरू हुआ था. डब्लूएचओ के मुताबिक, बुखार, खांसी, सांस लेने में तकलीफ इसके लक्षण हैं. अब तक इस वायरस को फैलने से रोकने वाला कोई टीका नहीं बना है. क्या हैं इस बीमारी के लक्षण? इसके लक्षण फ्लू से मिलते-जुलते हैं. संक्रमण के फलस्वरूप बुखार, जुकाम, सांस लेने में तकलीफ, नाक बहना और गले में खराश जैसी समस्या उत्पन्न होती हैं. यह वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है. इसलिए इसे लेकर बहुत सावधानी बरती जा रही है. कुछ मामलों में कोरोना वायरस घातक भी हो सकता है. खास तौर पर अधिक उम्र के लोग और जिन्हें पहले से अस्थमा, डायबिटीज़ और हार्ट की बीमारी है. क्या हैं इससे बचाव के उपाय? स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय ने कोरोना वायरस से बचने के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं. इनके मुताबिक, हाथों को साबुन से धोना चाहिए. अल्‍कोहल आधारित हैंड रब का इस्‍तेमाल भी किया जा सकता है. खांसते और छीकते समय नाक और मुंह रूमाल या टिश्‍यू पेपर से ढककर रखें. जिन व्‍यक्तियों में कोल्‍ड और फ्लू के लक्षण हों उनसे दूरी बनाकर रखें. अंडे और मांस के सेवन से बचें. जंगली जानवरों के संपर्क में आने से बचें. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सात स्टेप्स विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सात आसान स्टेप्स बताए हैं, जिनकी मदद से कोरोना वायरस को फैलने से रोका जा सकता है और खुद भी इसके इंफेक्शन से बचा जा सकता है.

    भारत सरकार ने भी कोरोना वायरस के लक्षण मिलने पर तत्काल स्वास्थ्य केंद्र पर सूचना देने को कहा है. स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से 24 घंटे चलने वाला कंट्रोल रूम तैयार किया गया है. फोन नंबर 011-23978046 के माध्यम से कंट्रोल रूम में संपर्क किया जा सकता है. इसके अलावा ncov2019@gmail.com पर मेलकर के भी कोरोना वायरस के लक्षणों या किसी भी तरह की आशंकाओं के बारे में जानकारी ली जा सकती है.

    चीन और इटली में सबसे ज्यादा असरचीन और इटली में सबसे ज्यादा असर

    चीन में इस वायरस का बहुत ज्यादा असर पड़ा है. सबसे ज्यादा असर चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है. पहले ही चीन की अर्थव्यवस्था सुस्ती के दौर में है. लगभग 18 साल पहले सार्स वायरस से भी ऐसा ही खतरा बना था. 2002-03 में सार्स की वजह से पूरी दुनिया में 700 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी. इटली में भी अब तक 800 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं.

    क्या आप जानते हैं कि कोरोना वायरस यानी कि क्या आप जानते हैं कि कोरोना वायरस यानी कि Coronavirus disease (COVID-19) बहुत सूक्ष्म लेकिन प्रभावी वायरस है. कोरोना वायरस मानव के बाल की तुलना में 900 गुना छोटा है. आकार में इस छोटे वायरस ने पूरी दुनिया को डरा दिया है. इसका खौफ आज दुनियाभर में दिख रहा है.

  • दिमाग को बीमार करता गांजे का नशा

    दिमाग को बीमार करता गांजे का नशा

    भोपाल,7 मार्च,(प्रेस सूचना केन्द्र)। गांजा या भांग भारत के कमोबेश हर इलाके में प्रयोग किया जाता है। कानूनी रोक के बावजूद ये नशा सभी इलाकों में आसानी से उपलब्ध हो जाता है। इस नशे का इस्तेमाल करने वालों का कहना है कि इन नशे से कोई नुक्सान नहीं होता है। इसके विपरीत हालिया शोधों ने साबित किया है कि गांजे का नशा कई तरह की मानसिक बीमारियों को जन्म दे देता है। इसकी वजह नशे की लत होती है।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़ दुनिया भर में क़रीब डेढ़ करोड़ लोग रोज़ाना गांजे का किसी न किसी रूप में इस्तेमाल करते हैं। यह संख्या किसी भी और ड्रग्स से काफ़ी ज़्यादा है. इसका सबसे ज़्यादा ख़तरा युवाओं में ख़ासकर किशोरों को होता है।

    ताजा शोध बताते हैं कि किशोरों के गांजा इस्तेमाल करने से उनमें डिप्रेशन, शिज्नो फ्रेजिया जैसी मानसिक बीमारियों का ख़तरा बढ़ जाता है। शोध में सामने आया है कि गांजे का सेवन करने से दिमाग़ के दो महत्वपूर्ण न्यूरोट्रांसमीटरों पर असर पड़ता है। ये हैं सेरोटोनिन और नोराड्रेनलीन. ये दोनों दिमाग़ में भावनाओं को, ख़ासकर डर की भावना को नियंत्रित करते हैं।

    कनाडा के जो किशोर बहुत ज़्यादा गांजे का सेवन करते हैं. इससे उनमें डिप्रेशन की शिकायत बढ़ती जाती है।इसके अलावा उनमें डर से जुड़ी भावनाएं बहुत ज़्यादा बढ़ जाती हैं। चिंताजनक तो ये है कि गांजे और शराब का एक साथ सेवन भी बढ़ता जा रहा है। यूरोपीय संघ के ड्रग्स विशेषज्ञ इस नए ट्रेंड की भी खतरनाक मानते हैं। नशे की लत लग जाने के बाद युवा लड़के लड़कियां गांजे का धुआं, बीयर या फिर एक्सेटिसी की गोलियां भी साथ में लेते हैं जो बहुत खतरनाक साबित होता है।

    यूरोपीय संघ में नशाखोरी के मामलों पर निगाह रखने वाले अधिकारी कहते हैं कि ड्रग्ज और अल्कोहल की मिलावट बड़ी समस्या है। ख़ासकर युवाओं में पी कर धुत्त होना और उसके साथ ड्रग्स लेना एक साथ चलता है। ड्रग्स लेने वाले अकसर शराब के भी आदी होते हैं।”

    अगर बढ़ती उम्र में गांजे का सेवन किया जाता है तो मस्तिष्क में सेरोटोनिन की मात्रा कम होने लगती है। इससे भावनात्मक असंतुलन पैदा होता है और नोरेड्रेनलीन की मात्रा दिमाग़ में बढ़ने लगती है जिससे तनाव बढ़ने का जोखिम बढ़ता जाता है या व्यक्ति तनाव की स्थिति का मुक़ाबला ठीक से नहीं कर पाता।

    इसके अलावा गांजे से बना स्कंक बहुत ज़्यादा ख़तरनाक है और इससे शिज्नो फ्रेजिया होने का ख़तरा भी बढ़ जाता है। लंदन के किंग्स कॉलेज में मानसिक रोग संस्थान के शोध में सामने आया है कि स्कंक लेने वालों के मस्तिष्क में टेट्रा हाइड्रो कैनेबिनॉल नाम का रासायनिक पदार्थ बहुत बढ़ जाता है और इससे मानसिक बीमारियां होने का ख़तरा भी बढ़ जाता है।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि “कई नए तरह के उत्पाद बाज़ार में हैं जो बहुत ही आक्रामक तरीक़े से बेचे जाते हैं और अकसर इंटरनेट के ज़रिए. जांच या प्रतिबंधों को अनदेखा करके यह व्यापारी बहुत तेज़ी से काम करते हैं।”

    इसी तरह गांजे के कई अन्य उत्पाद हैं जो स्वास्थ्य पर बुरा असर डालते हैं। अब तक के शोधो से यह भी सामने आया है कि गांजे के पौधे का इलाज में भी इस्तेमाल होता है। कैंसर, एड्स और नॉशिया जैसी बीमारियों में इसका इस्तेमाल होता है, लेकिन ज़्यादा मात्रा में लेने पर इसके प्रभाव बहुत हानिकारक होते हैं क्योंकि टेट्राहाइड्रोकैनेबिनॉल या टीएचएस की ज़रा भी ज़्यादा मात्रा और इसका बार बार सेवन मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरे प्रभाव डालता है। इसीलिए इलाज के लिए जिन दवाओं को संश्लेषित करके बनाया गया है उनमें नशाकारी तत्व टीएचएस की मात्रा कम रखी जाती है।

    कैनेबिस, मैरियुआना या गांजा के नाम से जाना जाने वाला यह पौधा मूल रूप से मध्य और दक्षिण एशिया में पाया जाता है और नशे के अलावा गांजे के अन्य इस्तेमाल अलग अलग समाजों में हज़ारों साल से चले आ रहे हैं। भारत में हिमाचल क्षेत्र का गांजा और भांग अच्छे माने जाते हैं।जबकि मध्यप्रदेश में आंध्रप्रदेश के सीमांत इलाके से गांजे की तस्करी की जाती है। नेपाल में भी मांग उठ रही है कि जब कई यूरोपीय देशों ने इसकी खेती पर से प्रतिबंध हटा दिया है तो वहां भी इसकी खेती को कानूनी निगरानी में किया जाए इससे किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारी जा सकती है।