Category: दुनिया एक बाजार

  • बिजली क्रांति बढ़ाएगी मुद्रा भंडार

    बिजली क्रांति बढ़ाएगी मुद्रा भंडार

    
    
    
    
    


    रमेश कुमार दुबे
    बिजली से चलने वाले वाहन अर्थव्‍यवस्‍था के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी मुफीद साबित होंगे। इसी प्रकार इलेक्‍ट्रिक वाहन पेरिस जलवायु समझौते की शर्तों के अनुपालन में भी मददगार बनेंगे। इतना ही नहीं इलेक्‍ट्रिक वाहनों के साथ आने वाली स्‍वचालन तकनीक से सड़क दुर्घटनाओं में भी कमी आएगी। स्‍पष्‍ट है, मोदी सरकार ने जो कदम उठाया है वह देश में एक नई बिजली क्रांति का आगाज करेगा।

    दुनिया भर में बिजली खपत में भारी असमानता पाई जाती है। इतना ही नहीं जहां विकसित देशों में जीवन के हर पहलू में बिजली की भरपूर भागीदारी रही है, वहीं भारत जैसे विकासशील देशों में बिजली की भूमिका रोशनी और औद्योगिक गतिविधियों तक सिमटी रही।

    दशकों की उपेक्षा के बाद भारत में भी बिजली की भागीदारी बढ़ाने के प्रयास शुरू हो चुके हैं। देश के हर गांव तक बिजली पहुंचाने के बाद प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी ने सातों दिन-चौबीसों घंटे बिजली मुहैया कराने का महत्‍वाकांक्षी लक्ष्‍य तय किया है। इसके साथ-साथ सरकार देश के समूचे परिवहन तंत्र को पेट्रोल-डीजल के बजाए बिजली आधारित करने की महत्‍वाकांक्षी योजना पर काम कर रही है। रेल लाइनों का विद्युतीकरण और 2030 तक कुल वाहनों के 25 फीसदी को इलेक्‍ट्रिक वाहन करने का लक्ष्‍य है।


    इलेक्‍ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए मोदी सरकार ने 2015 में फास्‍टर एडॉप्‍शन एंड मैनुफैक्‍चरिंग ऑफ इलेक्‍ट्रिक ह्विकल (फेम)-1 शुरू किया था। इसे मिली कामयाबी को देखते हुए 28 फरवरी को कैबिनेट ने फेम के दूसरे चरण को मंजूरी दे दी। इसके तहत देश में इलेक्‍ट्रिक वाहनों को प्रोत्‍साहन देने के लिए 10,000 करोड़ रूपये का आवंटन किया गया है।

    यह राशि इलेक्‍ट्रिक वाहनों और इलेक्‍ट्रिक इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर पर खर्च की जाएगी जिससे 2030 तक 100 फीसदी वाहनों को इलेक्‍ट्रिक बनाने का काम किया जा सके। फेम-2 के अंतर्गत इलेक्‍ट्रिक वाहनों की खरीद को सस्‍ता बनाने और चार्जिंग स्‍टेशनों की पर्याप्‍त व्‍यवस्‍था पर काम किया जाएगा।

    फेम-2 योजना के तहत इलेक्‍ट्रिक वाहन 20,000 से 2.5 लाख रूपये तक सस्‍ते हो जाएंगे। वाहनों को सस्‍ता बनाने के लिए वाणिज्‍यिक वाहनों को प्राथमिकता दी जा रही है। सरकार का लक्ष्‍य है कि तय समय के भीतर देश में 10 लाख इलेक्‍ट्रिक दोपहिया, पांच लाख इलेक्‍ट्रिक तिपहिया, 55000 इलेक्‍ट्रिक कार और 70000 इलेक्‍ट्रिक बस खरीदी जाएं। यह प्रोत्‍साहन सिर्फ उन्‍हें दिया जाएगा जो लिथियम आयन बैटरी से युक्‍त वाहन खरीदेंगे।

    योजना के तहत महानगरों, टू टियर शहरों और पहाड़ी इलाकों में 2700 चार्जिंग स्‍टेशन लगाए जाएंगे। इन शहरों में हर तीन किमी पर एक चार्जिंग स्‍टेशन और राजमार्गों पर हर 25 किमी पर चार्जिंग स्‍टेशन लगाने का लक्ष्‍य रखा गया है। इसके साथ-साथ रिहाइशी इलाकों में भी चार्जिंग स्‍टेशन लगाए जाएंगे।

    इस दिशा में आंध्र प्रदेश सरकार ने एक बड़ी पहल करते हुए 2024 तक पेट्रोल-डीजल कारों के पंजीकरण रोकने और अगले पांच वर्षों में सड़कों पर 10 लाख इलेक्‍ट्रिक वाहन लाने की घोषणा की है। इसके साथ-साथ 2024 तक सभी सरकारी वाहनों को इलेक्‍ट्रिक वाहनों में बदल दिया जाएगा। कमोबेश इसी तरह की पहल कर्नाटक सरकार ने भी की है।

    अधिक से अधिक लोग पेट्रोल-डीजल के बजाए बिजली से चलने वाले वाहन अपनाएं इसके लिए सरकार खुद पहल कर रही है। हाल ही में सरकार ने टाटा मोटर्स से 10,000 इलेक्‍ट्रिक वाहन खरीदने का समझौता किया है। बिजली मंत्रालय के मुताबिक इस दिशा में सबसे बड़ी बाधा कीमत है लेकिन एलईडी बल्‍ब का उदाहरण सरकार के लिए प्रेरणा का काम कर रहा है। गौरतलब है कि शुरू में एलईडी बल्‍ब बहुत महंगे पड़ते थे लेकिन जब देश में इनका बड़े पैमाने पर उत्‍पादन होने लगा तब इनकी कीमतों में तेजी से कमी आई। इसी तरह बैटरी रिक्‍शा व सोलर पंप को मिल रही लोकप्रियता भी सरकार का उत्‍साह बढ़ा रही है।

    फिर लीथियन ऑयन आधारित बैटरी की कीमतों में गिरावट से इलेक्‍ट्रिक वाहनों की लागत कम हो रही है। दूसरी ओर कठोर उत्‍सर्जन मानकों के कारण पेट्रोल-डीजल वाहनों की कीमत लगातार बढ़ रही है। मौजूदा अनुसंधान को देखें तो अगले पांच वर्षों में डीजल-पेटोल व बिजली से चलने वाले वाहनों की लागत लगभग एक समान हो जाएगी।

    स्‍पष्‍ट है, यदि भारत ढांचागत बदलाव नहीं करता तो उसे बड़े पैमाने पर इलेक्‍ट्रिक वाहन व संबंधित कल-पुर्जा आयात करना पड़ेगा। जर्मनी, चीन, अमेरिका जैसे देश पेट्रोल-डीजल की जगह इलेक्‍ट्रिक वाहन पर फोकस कर चुके हैं। इन देशों में वाहन निर्माताओं को 30-40 फीसदी सब्‍सिडी मिल रही है। भारत में इतनी सब्‍सिडी संभव नहीं है। इसलिए उसे समय पर कदम उठाना पड़ेगा।

    भारत अपनी जरूरत का 80 फीसदी पेट्रोलियम पदार्थ आयात करता है। ऐसे में परिवहन क्षेत्र में हो रही बिजली क्रांति से न केवल आयात पर निर्भरता घटेगी बल्‍कि पर्यावरण प्रदूषण में भी कमी आएगी। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक इलेक्‍ट्रिक वाहनों के इस्‍तेमाल से 2030 तक सड़क परिवहन में खपत होने वाली ऊर्जा में 64 फीसदी और कार्बन उत्‍सर्जन में 37 फीसदी की कमी आएगी।

    स्‍पष्‍ट है, बिजली से चलने वाले वाहन अर्थव्‍यवस्‍था के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी मुफीद साबित होंगे। इसी प्रकार इलेक्‍ट्रिक वाहन पेरिस जलवायु समझौते की शर्तों के अनुपालन में भी मददगार बनेंगे। इतना ही नहीं इलेक्‍ट्रिक वाहनों के साथ आने वाली स्‍वचालन तकनीक से सड़क दुर्घटनाओं में भी कमी आएगी। स्‍पष्‍ट है, मोदी सरकार ने जो कदम उठाया है वह देश में एक नई बिजली क्रांति का आगाज करेगा।

  • अधिक फसल बेचने के चक्कर में सीलिंग एक्ट में फंसे किसान

    अधिक फसल बेचने के चक्कर में सीलिंग एक्ट में फंसे किसान

    भोपाल। समर्थन मूल्य पर मुक्त हस्त से फसलों की खरीद करने के मध्यप्रदेश सरकार के फैसले को प्रदेश के बड़े किसानों ने मुनाफा कमाने का साधन बना लिया है। वे अपनी अधिक जोत को फसलों की खरीद के लिए पंजीकृत करा लेते हैं। इससे उनकी फसलों का अधिकतर भाग सरकारी खरीद के दायरे में आ जाता है। इस साल जबकि कोरोना संकट के चलते सरकार की माली हालत खस्ता है तब भी ऐसे किसानों ने अपनी उपज सरकार को बेचने में सफलता पाई है। जबकि छोटे जोत वाले किसानों का खाद्यान्न बहुत कम खरीदा गया है। इस खामी के सामने आने के बाद अब सरकार के कान खड़े हुए हैं और उसने सीलिंग एक्ट के तहत जमीनों के रकबे की जांच भी शुरु कर दी है।

    जमीन के रकबे के आधार पर फसल बिक्री के लिए किसानों ने जो पंजीयन कराया है उन आंकड़ों की जांच कराने पर कई बड़े किसानों को अपनी जमीनें बचाना कठिन हो जाएगा। कई जिलों में किसानों के पास जमीन का रकबा इतना ज्यादा है, जो सीलिंग एक्ट के दायरे में आ सकता है।

    मप्र कृषि जोत अधिकतम सीमा अधिनियम 1960 (सीलिंग एक्ट)की धारा 7 के तहत प्रदेश के किसानों को खेती के लिए जमीन की अधिकतम जोत रखने का अधिकार है। यह पात्रता परिवार में सदस्यों की संख्या के आधार पर है। पिछले कुछ सालों में किसानों की जमीन की सिंचाई का रकबा बढ़ा है। केसीसी में अधिकतम कर्ज लेने के लिए भी किसानों ने राजस्व अभिलेखों में असिंचित जमीन को सिंचित करवाया है। साथ ही समर्थन मूल्य पर रबी एवं गर्मियों की फसलों की बिक्री के लिए जमीन को दो फसलीय सिंचित दर्ज कराया है। ऐसे में किसानों की सिंचित जमीन का रकबा बढ़ा है। इसका रिकॉर्ड किसान हर साल समर्थन मूल्य पर फसल बेचने के लिए पंजीयन कराते समय देते हैं। इसी रिकॉर्ड के आधार पर जांच हुई तो कई किसान इसके लपेटे में आ सकते हैं। खास बात यह है कि प्रदेश के किसी भी किसान के पास प्रदेश के किसी भी हिस्से में जमीन ज्यादा होती है तो वह सीलिंग एक्ट में आ सकती है।

    तहसील स्तर के मामले की सुनवाई एसडीएम करते हैं। दो अलग-अलग तहसील के मामलों की सुनवाई कलेक्टर कोर्ट में होती है। दो जिलों के मामले की सुनवाई संभागायुक्त करते हैं। जबकि दो अलग-अलग संभाग में जमीन से जुड़े मामले की सुनवाई आयुक्त, भू-अभिलेख एवं बंदोबस्त करते हैं।

    एक व्यक्ति एक फसलीय सिंचित जमीन 15 एकड़ तक रख सकता है। पांच सदस्यतीय परिवार 27 एकड़ तक रख सकता है। जबकि पांच से ज्यादा सदस्य होने पर हर सदस्य को 4.5 एकड़ रखने का अधिकार है, लेकिन अधिकतम 54 एकड़ तक रखी जा सकती है।

    एक व्यक्ति दो फसलीय 10 एकड़ तक जमीन अपने पास रख सकता है। पांच सदस्यीय परिवार पति-पत्नी एवं तीन नाबालिग के लिए अधिकतम 18 एकड़ जमीन रखने का अधिकार है। संयुक्त परिवार जिसमें पति-पत्नी एवं तीन नाबालिगों के लिए यह सीमा अधिकतम 18 एकड़ है, लेकिन इससे ज्यादा सदस्य होने पर पांच से ज्यादा सदस्य होने पर हर सदस्य को 3 एकड़ जमीन रखने का अधिकार है, यह अधिकतम 36 एकड़ तक रखी जा सकती है।

    इसी तरह असिंचित जमीन एक व्यक्ति 30 एकड़ तक रख सकता है। पांच सदस्यीय परिवार (दो नाबालिग समेत)54 एकड़ जमीन रख सकता है, पांच से ज्यादा सदस्य होने पर प्रति सदस्य 9 एकड़ असिंचित जमीन रख सकता है। लेकिन यह अधिकतम 108 एकड़ तक रखी जा सकती है। इससे ज्यादा जमीन होने पर सीलिंग एक्ट के तहत सरकार ले सकती है।

    सीलिंग एक्ट के प्रकरणों की सुनवाई अलग-अलग स्तर पर होती है। इन सभी मामलों में आपत्ति होने पर इन मामलों का निराकरण शासन स्तर पर किया जाता है।
    ज्ञानेश्वर बी पाटिल, आयुक्त, भू-अभिलेख एवं बंदोबस्त एवं सचिव राजस्व

  • ATIGS Dubai 2020 is going to be great opportunity for Indian industries-Anuradha Singhai

    ATIGS Dubai 2020 is going to be great opportunity for Indian industries-Anuradha Singhai

    DUBAI, UAE [ 16th JANUARY 2020 ] – Leading Africa business development company, ATIGS Group is proud to announce a partnership with Indo-European Chamber of Commerce and Industry to host the 2020 Africa Trade and Investment Global Summit (ATIGS) on October 28 & 29, 2020 in Dubai, United Arab Emirates.

    ATIGS is a unique business platform to foster relationships and engage efficiently with key influencers and investors from every corner of the world. During a period of two days, Vice presidents, Ministers, Governors, Business Executives, top CEOs, international investors and companies seeking to expand in African markets are gathered in one single place to discuss concrete investment projects and establish strategic partnerships through thematic workshops, presentations, and networking sessions.

    Last year, ATIGS Group hosted the premier ATIGS in the United States, on June 24-26 in Washington DC at the Ronald Reagan Building and World Trade Center. With more than 2,300 delegates from 92 countries, ATIGS USA 2018 was a great success for both the hosting country, sponsors and the participants. High-potential industries and companies were presented to a select audience which led to direct engagement, deal-making, co-investments and the establishment of business partnerships.

    The next edition, ATIGS Dubai 2020 will be a more exclusive high-level gathering for government officials, high-profile African business leaders, project developers, and international investors from Africa, UAE, Asia, Europe, and America. www.atigs2020.com

    “ATIGS Dubai 2020 is going to be great opportunity for Indian industries who are looking at expanding in African geography” said, Anuradha Singhai, President of Indo-European Chamber of Commerce and Industry

    Under this partnership, Indo-European Chamber of Commerce and Industry will support ATIGS Group in the promoting, and India delegates recruitment of ATIGS Dubai 2020, and now entitled to participate in the business and affairs of ATIGS Dubai 2020.

    “Hosting ATIGS is a huge contribution to the development of Africa, and we are excited to partner with IECCI to advance the mission and agenda of ATIGS Dubai 2020.” said, Bako Ambianda, Chairman and CEO of ATIGS Group, Inc.

    ATIGS Dubai 2020 is presented by ATIGS Group, Inc, and organized by Global Attain Advancement, LLC, known as GAA Exhibitions & Conferences, and supported by partners & sponsors.

  • श्रमिकों की आवाज कौन बने

    श्रमिकों की आवाज कौन बने

    भारत सरकार की नीतियों को श्रमिक विरोधी बताते हुए देशव्यापी हड़ताल का आव्हान किया गया। हड़ताल लगभग असफल रही। इससे देश की गतिविधियों पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा। जबकि इस हड़ताल में संगठित क्षेत्र के 25 लाख श्रमिकों की भागीदारी का दावा किया गया था। इस लिहाज से ये हड़ताल श्रमिक आंदोलनों की विदाई का दस्तावेज बन गया है। इसकी वजह ये है कि ये श्रमिक जिन क्षेत्रों से आते हैं वे क्षेत्र अब भारत की मुख्यधारा नहीं रहे हैं। बीएसएनल हो या सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक इनके समानांतर पूरा ढांचा कार्पोरेट सेक्टर में खड़ा हो चुका है। रेलवे जिस निजीकरण का विरोध कर रहा है वह कार्पोरेट सेक्टर के सहारे पूरी तरह यंत्रवत काम करने लगा है। ऐसे में हड़तालियों की बात कौन सुनेगा। हड़तालियों ने अपना समर्थन जुटाने के लिए असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को लुभाने के लिए न्यूनतम वेतन 21 हजार रुपए करने का नारा दिया। ये नारा वे दे रहे हैं जिनके वेतन पचास हजार रुपए से अधिक हैं और वे अपना वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर हड़ताल कर रहे हैं। संगठित क्षेत्र के पांच सात प्रतिशत कर्मचारी या श्रमिक यदि ये मांग करें कि नब्बे फीसदी नागरिकों का पेट काटकर आप हमारे वेतन भत्ते बढ़ा दें तो इसे कैसे न्यायोचित माना जा सकता है। फिर ये आवाज भी जनता की गरीबी दूर करने के नाम पर लगाई जाए तो इसे कैसे उचित ठहराया जाए। इसके बावजूद देश के श्रमिक संगठन अपनी हड़ताल को मजदूर की आवाज बता रहे हैं। इसे केन्द्र सरकार की हठधर्मिता के विरुद्ध संग्राम बताया जा रहा है। देश के कुछ मूर्ख बुद्धिजीवी श्रमिक संगठनों की इस मांग को जायज बता रहे हैं। देश का पूरा ढांचा बदल चुका है। इसके बावजूद कांग्रेस और उनके वामपंथी सहोदर अपना पुराना घिसा पिटा रिकार्ड बजाने में जुटे हुए हैं। डाक्टर मनमोहन सिंह जैसे उनके मार्गदर्शक कर्जमाफी जैसे आम जनता को ठगने वाले चुनावी वायदे पर चुप्पी साधे बैठे हैं। दरअसल देश बदल चुका है और उसे नए हालात को समझने वाले जन नेताओं की दरकार है। नई पीढ़ी के बीच से उभरने वाले नेता इस जरूरत को महसूस करें और अपनी नई भूमिका निभाएं तो देश का ज्यादा भला हो सकता है।

  • सस्ती बिजली के पाखंड की आड़ में रिकार्डतोड़ वसूली

    सस्ती बिजली के पाखंड की आड़ में रिकार्डतोड़ वसूली

    भोपाल,4 दिसंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। प्रदेश के पावर सेक्टर के इतिहास में नवंबर 2019 का माह मील के पत्थर के रूप में दर्ज हो गया है। नवंबर में राजस्व संग्रह  2017 करोड़  रुपये का हुआ है, जो नवंबर 2018 की तुलना में 413 करोड़ अधिक है। इस प्रकार लगभग 26 प्रतिशत अधिक राजस्व मिला है जो अब तक का प्रदेश का एक माह का सर्वाधिक राजस्व संग्रह है। इसके लिये ऊर्जा मंत्री श्री प्रियव्रत सिंह ने बिजली उपभोक्ताओं और तीनों विद्युत वितरण कंपनी के स्टॉफ को बधाई दी है।

    गौरतलब है कि  वर्ष 2018 में जुलाई से नवंबर की तुलना इस वर्ष 2019  से की जाए तो इन महीनों में 1687 करोड़ का अधिक राजस्व संग्रह हुआ है। इसी प्रकार प्रति यूनिट नगद  राजस्व वसूली गत वर्ष 2 रुपये 34 पैसे की तुलना में इस वर्ष नवंबर में  4 रुपये 14 पैसे हो गई है। यह गत वर्ष के इसी माह से 77 प्रतिशत अधिक है। 

    प्रदेश की तीनों वितरण कंपनियों ने राजस्व संग्रह में अब तक का उत्कृष्ट योगदान दिया है। पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी द्वारा नवंबर 2019 में 596 करोड़, मध्य क्षेत्र कंपनी द्वारा 587 करोड़ एवं पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी द्वारा 834 करोड़ रुपए का राजस्व संग्रह किया गया। पिछले वर्ष इसी अवधि में पूर्व क्षेत्र कंपनी द्वारा 452 करोड़, मध्य क्षेत्र कंपनी द्वारा 488 करोड  एवं पश्चिम क्षेत्र कंपनी द्वारा 664 करोड़ रुपए का राजस्व संग्रह किया गया था। इस नवंबर माह में पूर्व क्षेत्र कंपनी द्वारा  31.71 प्रतिशत, मध्य क्षेत्र कंपनी द्वारा 20.38 प्रतिशत व पश्चिम क्षेत्र कंपनी द्वारा 25.63 प्रतिशत अधिक राजस्व संग्रह किया गया। यह कंपनी गठन के बाद किसी एक माह में सर्वाधिक है। 

     ऊर्जा मंत्री  ने कहा है कि सरकार प्रदेश के शहरों और ग्रामों में 24 घंटे तथा किसानों को घोषित अवधि में 10 घंटे निर्बाध विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कृत-संकल्पित है। 

  • बंदर हीरा खदान को मंजूरी बिना बेचने की तैयारी

    बंदर हीरा खदान को मंजूरी बिना बेचने की तैयारी

    बंदर हीरा खदान लेने के लिये 5 कम्पनियों ने प्रस्तुत किया दावा
    तकनीकी बिड का मूल्यांकन 27 नवम्बर को पूर्ण किया जायेगा : मंत्री जायसवाल

    भोपाल,14 नवंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। खनिज साधन मंत्री प्रदीप जायसवाल ने बताया है कि छतरपुर जिले की वर्षों से अनुपयोगी बंदर हीरा खदान लेने के लिये 5 बड़ी कम्पनियों ने 13 नवम्बर को खुली प्रथम चरण की तकनीकी निविदाओं में बिड जमा कर अपना दावा प्रस्तुत किया है। ये कम्पनियाँ हैं भारत सरकार का उपक्रम नेशनल मिनरल डेव्हलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एनएमडीसी), एस्सेल माइनिंग (बिरला ग्रुप), रूंगटा माइन्स लिमिटेड, चेंदीपदा कालरी (अडानी ग्रुप) तथा वेदांता कम्पनी।

    मंत्री श्री जायसवाल ने बताया कि 55 हजार करोड़ रुपये की यह खदान रियो टिंटो कम्पनी ने छोड़ी थी। देश की इस सबसे बड़ी खदान के नीलामी प्रकरण में भारत सरकार के नियमानुसार लगभग 56 करोड़ रुपये की सुरक्षा निधि जमा कराई जानी थी। इसके लिये आवेदक कम्पनी की नेटवर्थ कम से कम 1100 करोड़ रुपये होना आवश्यक था।

    खनिज साधन मंत्री ने बताया कि 13 नवम्बर की निविदा कार्यवाही के बाद अब तकनीकी बिड के मूल्यांकन का कार्य 27 नवम्बर, 2019 को पूर्ण किया जायेगा। इसके बाद 28 नवम्बर को प्रारंभिक बोली खोली जाएगी और उसके अगले दिन ऑनलाइन नीलामी सम्पादित की जाएगी।

    उल्लेखनीय है कि छतरपुर जिले में लगभग 3.50 करोड़ कैरेट के हीरे के भण्डार का अनुमानित मूल्य 55 हजार करोड़ रुपये है। इस पर राज्य शासन को प्राप्त होने वाली रॉयल्टी की दरों के आधार पर नीलामी सम्पन्न की जाएगी।

    बक्सवाहा में हीरे की मौजूदगी का पता लगने के बाद आस्ट्रेलिया की रियो टिन्टो कंपनी ने बंदर प्रोजेक्ट को लीज पर लेकर यहां भारी मात्रा में हीरा पाए जाने का सर्वे किया था। इसके बाद उसने करोड़ों रूपए के हीरे सर्वेक्षण के नाम पर निकाले थे।

    जब कंपनी से सरकार का अनुबंध खत्म हो गया और आगे के कार्य की अनुमति नहीं मिली तो कंपनी अपना सामान समेटकर चली गई। अब इसी प्रोजेक्ट को फिर से नीलाम किया जा रहा है।

    अब देश की जानी-मानी कंपनियों ने हीरा खनन में अपनी रूचि दिखाई है। कंपनी के प्रतिनिधियों ने बंदर प्रोजेक्ट की भौगोलिक स्थिति समझने हेतु जंगल का दौरा किया और प्रोजेक्ट के बारे में जांच-पड़ताल की। जानकारी के मुताबिक बंदर डायमंड माइंस प्रोजेक्ट की नीलामी में अनेक कंपनियों ने रुचि दिखाई है।

    आदित्य बिरला ग्रुप, अडानी ग्रुप, वेदांता ग्रुप, रूंगटा ग्रुप, एसेल ग्रुप, क्यूरा ग्रुप जैसी कंपनियों ने बकस्वाहा पहुँच कर बंदर प्रोजेक्ट की जानकारी ली साथ ही भौगोलिक स्थिति जानकर परिस्थितियों से रूबरू होकर प्रोजेक्ट के संबंध में चर्चाएं की गई जिसमें मुख्य रुप से भूमि सम्बन्धी और जंगल से सम्बंधित चर्चाएं हुई ।

    कलेक्टर मोहित बुंदस ने बताया कि डायमंड प्रोजेक्ट के लिए निरीक्षण करने टीमें आई हैं। इस प्रोजेक्ट में रूचि रखने वाली कंपनियों की टीमों ने निरीक्षण करने के बाद विभिन्न बिन्दुओं पर चर्चा की।

    यहां का प्रोजेक्ट शुरू होने से लोगों को रोजगार मिलेगा और बक्स्वाहा का नाम पूरे विश्व में हीरा खदान के रूप में जाना जाएगा।

    इस प्रोजेक्ट का रकबा 356 हेक्टेयर है जिसमें से करीब 13 हेक्टेयर जंगल ऐसा है जो पन्ना टाईगर रिजर्व से लगा हुआ है साथ ही इमली घाट जहां ये खदान लगाई जानी है वहां जाकर भी कंपनियों ने मुआयना किया और वहां की स्थिति जानी।

    बकस्वाहा ब्लॉक के हीरा खदान देखने पहुँची कंपनियों के साथ नरेंद्र सिंह परमार सचिव मध्यप्रदेश शासन, मोहित बुंदस कलेक्टर छतरपुर, अनुपम सहाय डीएफओ, तिलक सिंह एसपी, मनोज मालवीय एसडीएम बिजावर के साथ जिले का अमला मौजूद रहा।

    प्रदेश शासन के सचिव नरेन्द्र सिंह परमार ने बताया कि बंदर हीरा खनन प्रोजेक्ट बक्स्वाहा की नीलामी प्रक्रिया की शुरूआत 5 अगस्त से शुरू की गई। प्रोजेक्ट की बोली 60 हजार करोड़ से शुरू होगी।

    परमार ने बताया कि विभिन्न कंपनियों के प्रतिनिधियों से प्रोजेक्ट के बारे में चर्चा हुई है। पन्ना में रखे बक्स्वाहा के डायमंड को देखने के बाद प्रतिनिधियों ने भौगोलिक स्थिति जानने की इच्छा जताई थी। उन्हें यहां लाया गया है ताकि वे वस्तु स्थिति से भी अवगत हो सकें।

    यहां आने वालों में 6 कंपनियों के प्रतिनिधि शामिल हैं। उधर डीएफओ अनुपम सहाय का कहना है कि पूरा प्रोजेक्ट वन क्षेत्र का है इसलिए एनओसी जारी होगी लेकिन यह भी देखना होगा कि इस जंगल को कहां स्थानांतरित किया जाए ताकि अच्छे किस्म का जंगल तैयार हो सके।

  • व्यापारियों को ई कामर्स पर आना ही पड़ेगाःकमलनाथ

    व्यापारियों को ई कामर्स पर आना ही पड़ेगाःकमलनाथ

    भोपाल,4 सितंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। कनफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स कैट के पदाधिकारियों ने कैट के राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीण खंडेलवाल जी के नेतृत्व में बल्लभ भवन में माननीय मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ से मुलाकात की।व्यापारियों की समस्याओं के जवाब में उन्हें मुख्यमंत्री ने सुझाया कि यदि व्यापार को सुरक्षित रखना है और बढ़ाना है तो मौजूदा व्यवस्था के साथ साथ कारोबारियों को ई कामर्स का इस्तेमाल भी बढ़ाना होगा। यह प्लेटफार्म व्यापार की चुनौतियों से निपटने में मददगार साबित होगा।


    कैट के प्रवक्ता विवेक साहू ने हुए बताया कि भेंट के दौरान माननीय मुख्यमंत्री ने कहा कि विश्वभर में बढ़ते ऑनलाइन कारोबार को देखते हुए अब यह आवश्यक हो गया है कि आने वाले समय में व्यापारियों को ई-कॉमर्स पर लाना होगा। हम अपने व्यवसाय को ऑफलाइन के साथ-साथ आनॅलाइन पर भी रखे ।
    उन्होंने आगे कहा है कि हम मध्यप्रदेश में इसे अभियान के रूप में चलायेंगे।

    कैट के महामंत्री प्रवीण खंडेलवाल ने मुख्यमंत्री को बताया कि कैट एक पोर्टल तैयार करने जा रहा है जो व्यापारियों को ऑनलाइन व्यापार करने के लिए प्रेरित करेगा जिसमें विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राएं भी इसमें प्रतिभागी रहेंगे।हम उन्हें रोजगार के अवसर प्रदान करेंगे और छोटे कारोबारियों को बिना किसी आर्थिक भार के ई-कॉमर्स का उपयोग सिखाने में भी मददगार साबित होंगे।


    चर्चा में मुख्यमंत्री ने कहा कि मंडियों में किसानों को नगद भुगतान आवश्यक है क्योंकि बैंकों में कैश उपलब्ध ना होने की स्थिति में किसान को परेशानी होती है। अतः इसके लिए हम केन्द्र सरकार से बात करेंगे और व्यापरियों को परेशानी ना हो एवं किसान को भी उसकी फसल का पैसा मिले इसके लिए हम एक योजना बनाकर कार्य करेंगे।


    इस अवसर पर उन्होंने कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के ‘‘बैज‘‘ का लोकार्पण किया। कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के मध्यप्रदेश अध्यक्ष भूपेन्द्र जैन ने मुख्यमंत्री को पहला बैज लगाकर सम्मानित किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश के युवाओं को स्वावलंबी बनाने के लिए महिला उद्यमियों को विकास के लिए हर जिले में मुद्रा लोन शिविर लगाये जायेंगे और विश्वविद्यालय स्तर पर स्टार्टअप समिट होगी।


    मुख्यमंत्री ने कैट के प्रस्ताव को थाना स्तर पर व्यापारिक समितियां बनाने के लिए पुलिस महानिदेशक को आवश्यक दिशा-निर्देश देने का आश्वासन दिया।
    मुख्यमंत्री ने मध्यप्रदेश में व्यापारियों और कारोबारियों को आमंत्रित करते हुए कहा कि जो अधिक से अधिक रोजगार देगा उसके लिए राज्य शासन हरसंभव मदद करेगी। इस अवसर पर कैट के राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीण खंडेलवाल ने कैट, सीएससी, मास्टर कार्ड एवं ग्लोबल लिंकर ई-कॉमर्स बिजनिस की परिकल्पना से मुख्यमंत्री को अवगत कराया। मुख्यमंत्री ने कहा कि जिला स्तर पर कलेक्टर की अध्यक्षता में जो व्यापारिक समितियां बन रही हैं उनमें एवं अन्य जिला स्तरीय कमेटियों में कैट को उचित प्रतिनिधित्व मिलेगा। कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) मध्यप्रदेश राज्य शासन के साथ मिलकर प्रदेश के आर्थिक विकास के लिए कार्य करे।


    राष्ट्रीय वरिष्ठ उपाध्यक्ष कैलाश अग्रवाल, राधेश्याम महेश्वरी, ग्लोबल लिंकर के समीर वकील, कैट के सोशल मीडिया प्रभारी सुमित अग्रवाल, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राधेश्याम माहेश्वरी, सेन्ट्रल जोन कोर्डिनेटर रमेश गुप्ता, प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र जैन, महामंत्री मुकेश अग्रवाल, प्रवक्ता विवेक साहू, संयुक्त सचिव मनोज चौरसिया, अजय चौरिया, अविचल जैन, नरेन्द्र मांडिल आदि उपस्थित थे।


    इससे पूर्व प्रतिनिधिमंडल ने राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सुनील कुमार से भेंट की और व्यापारियों को ई-कॉमर्स में परिवर्तन करने के लिए विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं का सहयोग मांगा। इसे कुलपति ने स्वीकर किया और 9 सितम्बर से उनकी ट्रेनिंग प्रारंभ होगी।


    इसी श्रंखला में आज एमपी नगर स्थित गौरव होटल में विदेशी व्यापारियों के साथ बैठक का आयोजन किया गया ।बैठक के मुख्य अतिथि प्रवीण खंडेलवाल ने व्यापारियों को संबोधित करते हुए कहा कि आज का समय डिजिटल युग का हैं और उसके बिना व्यापार करना नामुमकिन है जो व्यापारी आज के दौर में डिजिटल तकनीक नहीं अपना आएगा वह धीरे-धीरे अपना व्यापार को खोता जाएगा।

  • सार्वजनिक क्षेत्र के छह और बैंकों का विलय,अब केवल 12 बचेंगे

    सार्वजनिक क्षेत्र के छह और बैंकों का विलय,अब केवल 12 बचेंगे

    नईदिल्ली,30 अगस्त(प्रेस सूचना केन्द्र) नरेन्द्र मोदी सरकार ने आज बैंकों की बड़ी विलय योजना की घोषणा की, जिससे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की संख्या एक ही झटके में 18 से घटकर 12 रह जाएगी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) ओरियन्टल बैंक ऑफ कॉमर्स और यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया का अधिग्रहण करेगा। इसी तरह वहीं केनरा बैंक में सिंडिकेट बैंक का, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में आन्ध्रा बैंक और कॉर्पोरेशन बैंक तथा इंडियन बैंक में इलाहाबाद बैंक का विलय होगा। सीतारमण ने कहा कि इन 10 बैंकों की जगह केवल 4 बैंक रह जाएंगे और सरकार चालू वित्त वर्ष के दौरान 70,000 करोड़ रुपये के पुर्नपूंजीकरण में से करीब 55,250 करोड़ रुपये की पूंजी इन्हीं बैंकों में डालेगी।

    बैंकों के विलय की घोषणा करते हुए वित्त मंत्री और वित्त सचिव राजीव कुमार ने बार-बार दोहराया कि इस निर्णय से किसी कर्मचारी की नौकरी नहीं जाएगी। कुमार ने कहा कि प्रस्तावित विलय की समयसीमा इन दस बैंकों के बोर्डों से परामर्श करने के बाद तय की जाएगी। उन्होंने कहा, ‘इस निर्णय से नौकरियों पर किसी तरह की आंच नहीं आएगी। जिन बैंकों में इनका विलय होगा, वे विलय होने वाले बैंकों के कर्मचारियों को बनाए रखेंगे।’  

    वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा, ‘बैंक एकीकरण के दो चरण पहले ही किए जा चुके हैं और अपनी बैंकिंग व्यवस्था को मजबूत बनाने तथा 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य हासिल करने के लिए हम एक बार फिर विलय करना चाहते हैं। हम नई पीढ़ी के और बड़े बैंक बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिनकी अधिक कर्ज देने की क्षमता हो।’ उन्होंने कहा, ‘इंडियन ओवरसीज बैंक, यूको बैंक, बैंक ऑफ महाराष्ट्र और पंजाब एण्ड सिंध बैंक पहले की तरह काम करते रहेंगे क्योंकि ये मजबूत क्षेत्रीय बैंक हैं।’  वित्त मंत्री ने बैंकों के लिए नए परिचालन सुधारों की भी घोषणा की।

    सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निदेशक मंडल अब महाप्रबंधक से ऊपर के दर्जे के अधिकारियों का प्रदर्शन आधारित मूल्यांकन करेंगे। बैंक अपने मुख्य जोखिम अधिकारी को बाजार के अनुकूल पारितोषिक पर नियुक्त कर सकेंगे। बोर्ड को वरिष्ठ प्रबंधन के कार्यकाल की योजना तय करने की आजादी होगी। इसके अलावा गैर-आधिकारिक निदेशकों की फीस में इजाफा किया जाएगा, बोर्ड समितियों को तार्किक बनाया जाएगा और प्रबंधन समिति की कर्ज मंजूर करने की सीमा बढ़ाकर 100 फीसदी तक की जाएगी ताकि उच्च मूल्य के ऋण प्रस्तावों पर ज्यादा ध्यान दिया जा सके। इसके साथ ही बड़े सरकारी बैंकों में कार्यकारी निदेशकों की संख्या मौजूदा तीन से बढ़ाकर चार की जाएगी। 

    पीएनबी में ओरियन्टल बैंक और यूनाइटेड बैंक का विलय होने के बाद वह 17.95 लाख करोड़ रुपये के कारोबार, 11,437 शाखाओं और 10.44 लाख करोड़ रुपये की जमा के साथ देश का दूसरा सबसे बड़ा बैंक बन जाएगा। एकीकृत इकाई की गैर-निष्पादित आस्तियां 6.61 फीसदी रहने का अनुमान है, जो ओरियन्टल बैंक ऑफ कॉमर्स के एनपीए से अधिक लेकिन पीएनबी और यूनाइटेड बैंक से कम है।केनरा बैंक और सिंडिकेट बैंक का विलय होने के बाद कारोबार के लिहाज से वह देश का चौथा सबसे बड़ा बैंक होगा, जबकि शाखाओं के हिसाब से तीसरा सबसे बड़ा बैंक बन जाएगा।  एकीकृत इकाई के पास कुल जमा राशि 8.59 लाख करोड़ रुपये होगी और शुद्घ एनपीए अनुपात 5.62 फीसदी होगा।

    यूनियन बैंक, आन्ध्रा बैंक और कॉर्पोरेशन बैंक के एकीकरण से देश का पांचवां सबसे बड़ा सरकारी बैंक बनेगा। इसकी एकीकृत जमा 8.20 लाख करोड़ रुपये और शुद्घ एनपीए अनुपात 6.30 फीसदी होगा, जो यूनियन बैंक के एनपीए से कम लेकिन आन्ध्रा बैंक और कॉर्पोरेशन बैंक के एनपीए से अधिक है। इंडियन बैंक और इलाहाबाद बैंक के एकीकरण से देश का सातवां सबसे बड़ा सरकारी बैंक बनेगा, जिसकी कुल जमा राशि 4.56 लाख करोड़ रुपये होगी और एनपीए अनुपात 4.39 फीसदी होगा।क्रिसिल रेटिंग्स के वरिष्ठ निदेशक कृष्णन सीतारमण ने कहा, ‘इतने बड़े स्तर पर एकीकरण से कुछ समय के लिए कामकाज की शैली के अंतर, मानव संसाधन को संभालने, बैंक शाखाओं को तर्कसंगत बनाने एवं तकनीकी एकीकरण करने जैसी चुनौतियों से जूझना पड़ सकता है। अगर इसे सही तरीके से क्रियान्वित किया गया तो मध्यम अवधि में इसका लाभ होगा और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ज्यादा प्रभावी तरीके से प्रतिस्पद्र्घा कर सकेंगे।’भारी-भरकम विलय की घोषणा वित्त सचिव, वित्त मंत्री और सार्वजनिक क्षेत्र के 10 बैंकों के मुख्य कार्याधिकारियों की बैठक के बाद की गई। 

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  • रिजर्व बैंक की सालाना आय 146.5% बढ़ी

    रिजर्व बैंक की सालाना आय 146.5% बढ़ी

    नई दिल्ली,31 अगस्त (प्रेस सूचना केन्द्र) RBI (भारतीय रिजर्व बैंक) ने बुधवार को अपनी सालाना रिपोर्ट पेश की। इसके अनुसार, केंद्रीय बैंक की बैलेंस शीट में 13.42 फीसद का इजाफा हुआ है और यह 41.03 लाख करोड़ रुपये रहा। वहीं, ब्‍याज से होने वाली आय 2018-19 में 146.59 फीसद बढ़कर 1.93 लाख करोड़ रुपये रही। अपने वार्षिक रिपोर्ट में RBI ने कहा है कि ब्‍याज से होने वाली उसकी आय 44.62 फीसद बढ़कर 1.06 लाख करोड़ रुपये रही और अन्‍य स्रोतों से होने वाली आय 30 जून 2019 के अनुसार, 86,199 करोड़ रुपये रही जो एक साल पहले की अवधि में 4,410 करोड़ रुपये थी। 

    RBI ने कहा कि 30 जून 2019 के अनुसार, सरकारी प्रतिभूतियों में उसका निवेश 57.19 फीसद बढ़कर 6.29 लाख रुपये से 9.89 करोड़ रुपये रहा। इसमें लिक्विडिटी मैनेजमेंट ऑपरेशंस के दौरान 3.31 लाख करोड़ रुपये की सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद शामिल है। रिजर्व बैंक का विदेशी विनिमय लाभ बढ़कर 28,998 करोड़ रुपये रहा। पिछले वर्ष इसमें 4,067 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था। 

    2018-19 में सरकार को ट्रांसफर की जाने वाली सरप्‍लस राशि रिजर्व बैंक के बोर्ड द्वारा इस हफ्ते अपनाए गए इकोनॉमिक कैपिटल फ्रेमवर्क अपनाए जाने के बाद समायोजन के आधार पर 1.76 लाख करोड़ रुपये रहा। यह नया फ्रेमवर्क 27 अगस्‍त को बिमल जालान कमेटी द्वारा दिए गए सुझावों का एक हिस्‍सा है। सरकार को दी जाने वाली राशि में फरवरी में दिया गया 28,000 करोड़ रुपया भी शामिल है। 

    30 जून 2019 के अनुसार, RBI के पास 618.16 मेट्रिक टन सोना था जो 30 जून 2018 को 566.23 मेट्रिक टन था। इस साल के दौरान 51.93 मेट्रिक टन सोना और बढ़ा है। 

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  • चार हजार खाद्य नमूने उठाए केवल छह नकली निकले

    चार हजार खाद्य नमूने उठाए केवल छह नकली निकले

    भोपाल,27 अगस्त(प्रेस सूचना केन्द्र)। कमलनाथ सरकार ने जनता की सहानुभूति हासिल करने के लिए जो शुद्ध के लिए युद्ध चलाया उसका नतीजा टांय टांय फिस्स साबित होने लगा है। खोदा पहाड़ और निकली चुहिया जैसी कहावत इस अभियान को देखते हुए सटीक साबित हो रही है। प्रदेश भर में जिन 3840 व्यापारियों के प्रतिष्ठानों से खाद्य नमूने जब्त किए उनमें से मात्र छह नमूने प्रतिबंधित निकले हैं। जबकि सरकार ने प्रदेश में बिक रहे 70 फीसदी खाद्य पदार्थों के नकली होने का शोर मचाया था।

    अधिकृत सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार पिछले महीने 19 जुलाई से कथित तौर पर मिलावट के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के जो नतीजे सामने आए हैं उनमें मात्र छह नमूनों में प्रतिबंधित पदार्थ पाए गए हैं। आज 28 अगस्त तक जिन 723 नमूनों की जांच रिपोर्ट सामने आई है उनमें से 374नमूने मानक स्तर के पाए गए हैं। नमूनों में से 277 जांच में अवमानक निकले हैं। ब्रांड की कसौटी पर 27 को मिथ्या ब्रांड पाया गया है। यानि कि उन्हें बेचने के लिए ब्रांड नाम की अनुमति नहीं ली गई थी। 23 सैंपलों में मिलावट पाई गई है, यानि उनमें पाम आईल या अन्य खाद्यान्नों के अंश पाए गए हैं। सोलह नमूनों को असुरक्षित पाया गया है उनमें यूरिया या डिटर्जेंट पाऊडर जैसे पदार्थों के अंश पाए गए हैं।

    केवल छह नमूनों में प्रतिबंधित पदार्थों की मौजूदगी पता चली है।ये नमूने उन्हीं व्यापारियों से बरामद हुए हैं जिनके बारे में लंबे समय से नकली खाद्यान् बनाने की शिकायतें मिलती रहीं थीं। इन्हीं की आड़ में सरकार ने धड़ाधड़ छापेमारी करके पूरे प्रदेश में भय का वातावरण निर्मित कर दिया। बीते राखी के त्यौहार के दौरान या तो उपभोक्ताओं ने इन खाद्यान्नों का इस्तेमाल नहीं किया या फिर उन्होंने ब्रांडेड कंपनियों के खाद्य पदार्थ खरीदकर त्यौहार मनाया।

    गौरतलब है कि राज्य सरकार के पास इतने बड़े अभियान को चलाने लायक अमला नहीं है। फूड लेबोरेटरी में रेंडम सैंपल लेने और जांच करने की व्यवस्था है लेकिन एक साथ हजारों नमूनों की तत्काल जांच की सुविधा नहीं है। इसके बावजूद सरकार ने न केवल अभियान चलाकर व्यापारियों पर हल्ला बोला बल्कि कई जिलों के कलेक्टरों ने व्यापारियों के विरुद्ध रासुका के अंतर्गत कार्यवाही करके भय का माहौल बना दिया है।

    राखी के अवसर पर व्यापारियों ने ज्ञापन देकर अनुरोध किया था कि खादय नमूनों को दूकानों से लिया जाए। परिवहन के दौरान जो नमूने लिए जाते हैं उनसे विक्रेताओं की धरपकड़ नहीं हो पाती है। इससे न ही खाद्यान्न निर्माताओं की पहचान संभव हो पाती है। व्यापारियों का कहना है कि खाद्य अमले ने इसके बाद रणनीति बदली थी लेकिन इस पूरे अभियान से कच्चा धंधा करने वाले व्यापारियों को खासी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। जबकि ये अभियान ईमानदार व्यापारियों को परेशान किए बगैर भी चलाया जा सकता था।

    #food-#adultration-#unsafe-#milk-#sweets

  • खेती में राज्यों की धींगामुश्ती रोकेगी समवर्ती सूची

    खेती में राज्यों की धींगामुश्ती रोकेगी समवर्ती सूची

    सुरिंदर सूद

    किसानों की समस्याओं पर गठित एम एस स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय आयोग (नैशनल कमीशन ऑन फार्मर्स) ने कृषि क्षेत्र को राज्य सूची से स्थानांतरित कर समवर्ती सूची में रखने की सिफारिश की थी। अफसोस की बात है कि इस महत्त्वपूर्ण सिफारिश पर उतना ध्यान नहीं दिया गया है, जितनी जरूरत थी। कृषि विषय अगर समवर्ती सूची में लाया जाता है तो इससे कृषि एवं किसानों से जुड़े मसलों पर केंद्र सरकार अपेक्षाकृत अधिक निर्णायक कदम उठा पाएगी, साथ ही राज्य सरकारों के अधिकारों पर भी कोई खास असर नहीं होगा। फिलहाल केंद्र को उन कृषि विकास एवं किसानों के लिए कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए भी राज्य सरकारों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिनका वित्त पोषण यह स्वयं कर रहा है।

    वास्तव में कृषि क्षेत्र को राज्य सरकार की मर्जी पर छोडऩा भारत सरकार अधिनियम, 1935 की ‘देन’ कही जा सकती है। उस समय इसके पीछे तर्क यह दिया गया था कि चूंकि, कृषि क्षेत्र विशेष पेशा है और मुख्य तौर पर स्थानीय कृषि-पारिस्थितिकी वातावरण और मूल स्थानों पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है, इसलिए प्रांतीय सरकारें इस क्षेत्र की बेहतर देखभाल कर सकती हैं। उन दिनों कृषि कार्य केवल खाद्य जरूरतें पूरी करने के लिए किए होते थे और खाद्यान्न की खरीद-बिक्री सीमित स्तर पर होती थी। किसानों से जुड़ीं समस्याएं भी स्थानीय स्तर तक ही सीमित थीं।

    आधुनिक समय में परिस्थितियां काफी बदल गई हैं। आधुनिक समय में कृषि क्षेत्रीय सीमाओं में बंधा नहीं रह गया है और अब राज्यों के बीच व्यापारिक सौदे इसका हिस्सा बन गए हैं। इतना ही नहीं, कृषि अब अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों खासकर व्यापार, उद्योग और सेवा से भी जुड़ गया है। अब कोई एक राज्य कृषि के संबंध में कोई निर्णय लेता है तो इसका प्रभाव दूसरे राज्यों की कृषि-अर्थव्यवस्था पर भी देखा जाता है। लिहाजा कृषि क्षेत्रों पर राज्यों के बेरोकटोक नियंत्रण से समस्याएं खड़ी हो रही हैं और इनका प्रतिकूल असर पड़ रहा है।

    स्वामीनाथन समिति की पांचवीं और अंतिम रिपोर्ट अक्टूबर 2006 में जारी हुई थी, जिसमें कृषि को समवर्ती सूची में स्थानांतरित करने का प्रस्ताव दिया गया था। रिपोर्ट में इस ओर ध्यान दिलाया गया था कि फसलों का समर्थन मूल्य, संस्थागत साख और कृषि-जिंस कारोबार-घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय- आदि से जुड़े निर्णय केंद्र सरकार द्वारा लिए जाते हैं। कुछ महत्त्वपूर्ण कानून, जिनका कृषि क्षेत्र पर व्यापक असर पड़ा है, संसद ने बनाए हैं, जो केंद्र की देख-रेख में काम करते हैं। पौधे की नस्लों की सुरक्षा एवं किसानों के अधिकार कानून, जैविक विविधता कानून और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून कुछ ऐसे ही उदाहरण हैं। इनके अलावा ग्रामीण ढांचा, सिंचाई एवं अन्य कृषि विकास कार्यक्रमों के लिए ज्यादातर राशि केंद्र ही मुहैया कराता है। आयोग ने कहा, ‘कृषि समवर्ती सूची में आने से किसानों की सेवा और कृषि की संरक्षा केंद्र एवं राज्य दोनों का उत्तरदायित्व बन जाएंगे।’

    कृषि को समवर्ती सूची में लाने की सिफारिश के पीछे कुछ और कारण भी हैं। कुछ राज्य सरकारों के असहयोग करने से किसानों की समस्याएं दूर करने एवं उनकी आय बढ़ाने के लिए शुरू की गईं केंद्र की कुछ योजनाएं अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रही हैं। उदाहरण के लिए फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम किसान) और प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (पीएम आशा) कुछ ऐसी ही योजनाएं हैं, जिनका पूर्ण लाभ नहीं मिल पा रहा है। इतना ही नहीं, कृषि विपणन, जमीन पट्टा, अनुबंध आधारित कृषि आदि से जुड़े कुछ महत्त्वपूर्ण सुधार भी कुछ खास बदलाव नहीं ला पा रहे हैं। एक बार फिर कुछ राज्यों का असहयोग इसके लिए जिम्मेदार रहा है।

    किसानों की आय दोगुनी करने की संभावनाएं तलाशने के लिए गठित दलवाई समिति ने भी कृषि विपणन को समवर्ती सूची में रखने पर जोर दिया है। समिति के अनुसार इससे कृषि मंडियों में व्यापक सुधार, इनकी परिचालन क्षमता में इजाफा और ग्रामीण विपणन तंत्र के विस्तार में केंद्र सरकार को आसानी होगी। दलवाई समिति की रिपोर्ट ने कृषि को समवर्ती सूची में स्थानांतरित करने की दलील और मजबूत कर दी है। इससे पहले भी किसी विषय को एक सूची से दूसरी सूची में डालने के लिए संविधान में संशोधन हो चुके हैं। उदाहरण के लिए 1976 में 42वें संशोधन में वन एवं वन्यजीव सुरक्षा सहित पांच विषय राज्य से निकालकर समवर्ती सूची में डाल दिए गए। विषय की महत्ता और इससे मिलने वाले संभावित लाभों को देखते हुए सभी राजनीतिक दलों को कृषि को राज्य सूची से स्थानांतरित कर समवर्ती सूची में रखने के लिए एक और संविधान संशोधन को समर्थन देना चाहिए। कृषि और किसान दोनों इससे लाभान्वित होंगे।

  • खनन की मंजूरी दे केन्द्रःकमलनाथ

    खनन की मंजूरी दे केन्द्रःकमलनाथ

    प्राइज डेफिसिट योजना के 575.90 करोड़ मांगे
    मुख्यमंत्री कमल नाथ की प्रधानमंत्री से मुलाकात,    

    भोपाल,4 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र) मुख्यमंत्री कमल नाथ ने नई दिल्ली में आज प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की और कृषि एवं खनन से जुड़े मुददों पर विस्तार से चर्चा की।  श्री नाथ ने राज्य की आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिये माइनिंग लीज पाने की पात्रता रखने वाले 27 प्रकरण में जल्द से जल्द निर्णय लेने का अनुरोध किया। श्री कमल नाथ ने प्रधानमंत्री को विस्तार से बताया कि मध्यप्रदेश के करीब 170 आवेदन हैं जो खदान एवं खनिज (विकास एवं नियमन) अधिनियम की धारा 10-ए और 2-बी के अंतर्गत माइनिंग लीज अनुदान पाने की पात्रता रखते हैं। इन प्रस्तावों पर जल्द निर्णय होने से राज्य की आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।

     मुख्यमंत्री ने बताया कि जनवरी 2015 में खदान और खनिज (विकास एवं नियमन) अधिनियम मध्यप्रदेश जैसे राज्य जिला खनिज कोष के नये प्रावधानों का लाभ उठा रहे हैं। साथ ही वे अधोसंरचना के विकास और खनन गतिविधियों से प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के लिये अन्य संकेतकों को सुधारने में भी योगदान दे रहे हैं।

    प्राइज डेफिसिट योजना के 575.90 करोड़ रूपये जारी करने का आग्रह

      मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ ने प्रधानमंत्री का ध्यान तिलहन के लिये प्राइज डेफिसिट भुगतान योजना के क्रियान्वयन लागत की शेष राशि 575.90 करोड़ रूपये शीघ्र जारी करने का आग्रह किया है। उन्होंने प्रधानमंत्री समर्थन मूल्य तय करने के पूर्व के निर्णय को आगे बढाते हुए अभियान के क्रियान्वयन के संबंध में ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि अभियान के माध्यम से किसानों को उनकी उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने के लिये राज्य सरकार प्रतिबद्ध है।

    श्री नाथ ने श्री मोदी को बताया कि मध्यप्रदेश सरकार ने 1951.80 करोड़ रूपये किसानों को भुगतान किये थे जो न्यूनतम समर्थन मूल्य और आदर्श विक्रय मूल्य का अंतर था। उन्होंने कहा कि यदि यह फसल नाफेड द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर उपार्जित होती तो प्रशासनिक लागत और हानि करीब 2800 करोड़ आती।

    मुख्यमंत्री ने लागत में 50 प्रतिशत की भागीदारी भारत सरकार द्वारा करने के निर्णय को देखते हुए शेष 575.90 करोड़ रूपये शीघ्र जारी करवाने का आग्रह किया ।

    सोयाबीन के लिये म.प्र. का  लक्ष्य 26.92 लाख मीट्रिक टन करने का आग्रह

    मुख्यमंत्री ने सोयाबीन के लिये प्राइज डेफिसिट योजना में राज्य के उत्पादन का 40 प्रतिशत यानी 26.92 लाख मीट्रिक टन लक्ष्य तय करने का आग्रह किया है।

    श्री नाथ ने कहा कि प्राइज डेफिसिट योजना की गाइडलाइन में राज्य को दिये लक्ष्य को उत्पादन का 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 40 प्रतिशत करने के तरीके का उल्लेख नहीं किया गया है जबकि यही मूल्य समर्थन योजना की गाइडलाइन में अंकित है। उन्होंने प्राइज डेफिसिट योजना में परिवर्तन करने का आग्रह करते हुए कहा कि इससे उत्पादन के 25 प्रतिशत के लक्ष्य को 40 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकेगा।

  • किसानों तक पहुंच गया देश का कृषि बाजार

    किसानों तक पहुंच गया देश का कृषि बाजार

    राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना से जुड़ीं मध्यप्रदेश की 58 कृषि उपज मण्डियाँ

    भोपाल,4 जून(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।देश के अन्नदाता का सोना बिचौलियों के हाथों पड़ने के कारण अब तक खेती किसानी का जीवन एक अबूझ पहेली बना हुआ है। शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने इस दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए अब सभी कृषि उपज मंडियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार से जोड़ दिया है। कृषि बाजार (ई-नाम) एक पैन-इण्डिया इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल है। यह कृषि उपजों के लिये एकीकृत राष्ट्रीय बाजार का निर्माण करने का सशक्त माध्यम है। कृषि उपज मण्डी से संबंधित सभी सूचनाओं और सेवाओं के लिये यह ई-नाम पोर्टल सिंगल विण्डो सेवा प्रदान कर रहा है। इस पोर्टल में उपज के आगमन और कीमतों तथा उपज को खरीदने और बेचने के व्यापारिक प्रस्तावों के प्रावधान को शामिल किया गया है। प्रदेश में ई-नाम पोर्टल के माध्यम से अभी तक 58 कृषि उपज मण्डियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार से जोड़ा जा चुका है।

    http://www.enam.gov.in/NAM/home/index.html

    इस अभिनव पहल से प्रदेश की 58 कृषि उपज मण्डियाँ राष्ट्रीय कृषि बाजार से जुड़ गईं हैं। 13 कपास मण्डियों को भी राष्ट्रीय कृषि बाजार से जोड़ा जा रहा है।ई-नाम पोर्टल पर 49 लाख क्विंटल कृषि जिन्सों का व्यापार भी हो चुका है।

    प्रदेश में ई-नाम पोर्टल की शुरूआत भोपाल की पण्डित लक्ष्मीनारायण शर्मा कृषि उपज मण्डी करोंद से की गई। योजना के पहले चरण में प्रदेश की 19 चयनित कृषि उपज मण्डियों को इस पोर्टल से जोड़ा गया। ई-नाम पोर्टल से जुड़ी कृषि उपज मण्डियों में 6 जिन्सों पर ऑनलाईन ट्रेडिंग की जा रही है। योजना के दूसरे चरण में 30 और तीसरे चरण में 8 कृषि उपज मण्डियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना में शामिल किया गया है। अब तक प्रदेश की 58 कृषि उपज मण्डियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना से जोड़ा जा चुका है।

    इसके साथ ही, 13 कपास मण्डियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना से जोड़ने का कार्य तेजी से पूर्ण किया जा रहा है। प्रदेश में राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना में अब तक करीब 12 लाख किसानों से 19 हजार लायसेंस धारी व्यापारियों ने ई-प्लेटफार्म के माध्यम से करीब 49 लाख क्विंटल कृषि जिन्सों का व्यापार किया है। प्रदेश में ई-नाम पोर्टल की सभी 58 मण्डियों में कृषि उपज के गुणवत्ता परीक्षण के लिये वृहद एसेइंग एण्ड ग्रेडिंग लैब स्थापित करने की कार्यवाही की जा रही है। ई-नाम पोर्टल में देश के 18 राज्यों में मध्यप्रदेश की स्थिति गेट एन्ट्री और एसेइंग में प्रथम तथा बिड क्रिएशन और सेल ऐग्रीमेंट में तृतीय रही है। ज्ञातव्य है‍कि देश में अप्रैल 2016 से प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने ऑनलाइन राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना की शुरूआत की थी। इसका मकसद किसानों को उनकी उपज का राष्ट्रीय स्तर पर सही दाम दिलवाना है।

  • नरेन्द्र मोदी के साथ महाशक्ति की राह पर भारत

    नरेन्द्र मोदी के साथ महाशक्ति की राह पर भारत


    - भरतचन्द्र नायक
    वीरता और पराक्रम में सदैव से भारत अजेय रहा है। उसकी समृद्धि ने सभी को ललचाया और बाह्य आक्रमण का दंश झेला, लेकिन समय की रफ्तार के साथ कदम से कदम मिलाने में जो चूक हुई उसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा। जब आक्रमण का प्रचलन हो चुका था और दुश्मन ने तोप बंदूक से लेस होकर आक्रमण किया हम अपना शौर्य भाला तलवार लेकर दिखा रहे थे। आजादी के बाद विकास की ओर ध्यान गया। कदम संभले पं. नेहरू ने बांध जलाशयों, कारखानों को तीर्थधाम बनाया। इंदिरा जी ने परमाणु शक्ति संपन्नता की ओर ध्यान दिया। राजीव गांधी ने देश में कंप्यूटरीकरण का मार्ग प्रशस्त करने का श्रेय दिया गया। अटलजी ने प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना से गांवों तक विकास की रोशनी पहुंचाई। मोदी जी ने देश को बुलेट पर सवार कर दिया। लोकतंत्र में सत्ता पक्ष की नीतियों कार्यक्रमों का विरोध अनिवार्य है और ऐसा हुआ, लेकिन 2014 में जब सोलहवीं लोकसभा के चुनाव की रणपेटी बजी और गुजरात के सफल मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी के चुनाव प्रचार की कमान संभाली उनकी प्रखर आलोचना उनके लिए स्वीकार्यता विस्तार में सहायक सिद्ध हुई। मोदी ने पूर्ववर्ती सरकार के भ्रष्टाचार से मुक्ति, महंगाई पर लगाम, सुरक्षा परिदृश्य में सुखद बदलाव का भरोसे और अच्छे दिन आने का सपने को देश की जनता ने मोदी जी के नेतृत्व में उनकी कटु आलोचना के बावजूद भारतीय जनता पार्टी के नाम प्रचंड बहुमत के साथ जनादेश दे दिया। मजे की बात यह रही कि जब नरेंद्र मेादी को जनता एक दूर दृष्ठा, कल्पनाशील और कुशल प्रशासक के रूप में देख रही थी। राजनैतिक दल उन्हें मौत का सौदागर बता रहा था। जनता महसूस कर चुकी थी कि विरोध राजनैतिक है। वास्तविकता यह थी कि गुजरात ने मोदी के नेतृत्व में नई करवट ली थी। गुजरात विकास के हर मापदंड पर कसे जाने के बाद देश में अब्बल, प्रगतिशील अमन चैन के मामले अब्बल राज्य था, जो राजनैतिक दल मोदी पर असहिष्णुता का इल्जाम लगा रहे थे उनके द्वारा शासित राज्यों से गुजरात के अल्पसंख्यक तरक्की की ऊंची सीढ़ियां चढ़ चुके थे। जनता देख चुकी थी कि नरेंद्र मोदी समस्या नहीं समाधान पुरूष है।

    प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी अपने कार्यकाल के तीन वर्ष पूर्ण कर चुके हैं और उन्होंने मंत्रालयवार अपना रिपोर्ट कार्ड जनता को सौंप दिया है। कुछ स्थानेां को अपवाद स्वरूप छोड़कर जहाॅ विधानसभा चुनाव अथवा लोकसभा उपचुनाव हुए जनता ने तमाम मुसीबतें सहते हुए मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी और भाजपानीत एनडीए कोसमर्थन देकर विजय रथ आगे बढ़ाया है। नरेंद्र मोदी सरकार ने कड़े, कष्टप्रद फैसले लेने में कभी गुरेज नहीं किया जिनका पुरजोर विरोध भी हुआ लेकिन देश की अपढ़ कही जाने वाली जनता ने मुसीबते झेलते हुए माना कि मोदी की दिशा और दशा सही है। नीयत में खोट नहीं है। विपक्ष के सामने सबसे बड़ी हैरानी परेशानी की बात यह रही कि वह बीते तीन वर्षों में एनडीए सरकार पर गड़बड़, घोटाला, भ्रष्टाचार का एक भी इल्जाम नहीं लगा पाई। जब 8 नवम्बर 2016 को एकाएक नोटबंदी का ऐलान हुआ गैरभाजपा दल हक्के-बक्के रह गये। उनका सीधा सपाट आरोप था कि बिना जनता को भरोसे में लिए इतना बड़ा फैसला क्यों ले लिया कि करेंसी कम पड़ गई। बैंकों से खाताधारियों को अपनी रकम निकालने पर पाबंदी लग गई। बैंकों के सामने बंद करेंसी बदलने के लिये गरीबों, अमीरों की लाइने लग गई। नोटंबंदी को कालेधन और उसके सृजन पर प्रहार बताया गया रोजी-रोटी छोड़ कर मजदूर भी बैंक के दरवाजे पर वहीं खड़ा था जहां धन्ना सेठ वारी का इन्तजार कर रहे थे। विपक्ष को मुंहमांगा मुद्दा मिल गया। लेकिन आम आदमी ने माना कि इससे कालेधन की समानान्तर चलने वाली व्यवस्था ध्वस्त हो गई जनता ने विरोध के स्वरों को अनसुना ही नहीं किया उत्तरप्रदेश जेसे राज्य में भारतीय जनता पार्टी को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विजय से नवाजा और नोटबंदी के प्रबल विरोधियों को हाशिये पर धकेल दिया। नीति नीयत ने मोदी का हर बार साथ दिया। आलोचना मोदी को संजीवनी साबित हुई। नोटबंदी के पश्चात् उपलब्धि की जो गुलाबी तसवीर रिजर्व बैंक ने सार्वजनिक की है वह साबित करती है कि आजदी के पश्चात् देश के आर्थिक क्षेत्र में नोटबंदी सबसे बड़ा कं्रातिकारी सुधार है जिसने धनपतियों की तसवीर बैंक के राडार पर ला दी है। अब न तो बेनामी सौंदे हो पा रहे हैं और न कालाधन खपाने की गली शेष बची है। बैंकों में नकदी का अंबार लगा है। कर्ज वितरण आसान हुआ है। टेक्स का वेस बड़ा है और सरकार के खजाने में आने वाले टेक्स में बहुगुवित वृद्धि हुई है।

    सुरक्षा परिदृश्य में आये बदलाव से दुनिया चकित है। पड़ौसी देश पाकिस्तान और चीन भ्रमित है। सर्जिकल स्ट्राईक ने दुनिया को बता दिया है कि भारत अब साफ्ट इस्टेट नहीं रहा है। इसकी डोकलाम प्रकरण में भारत की दृढ़ता ने मोहर लगा दी है। चीन को डोकलाम मामले में उल्टे पैर लौटना पड़ा है। इसने भारत की प्रतिष्ठा में चारचांद लगा दिये हैं। चीन के पुसैल पाकिस्तान को भारत की सीमा में आतंकवाद फैलाने के लिए उकसाने वाले चीन को ही ब्रिक्स की बैठक में पाकिस्तान की भत्र्सना करने को नरेंद्र मोदी ने विवश कर दिया। यह पहला मौका था जब मोदी ने चीन की धरती पर चीन केा मात दे दी। विश्व शक्तियां दांत तले अंगुली दबाने को विवश हुई। लेकिन इसे कांग्रेस की नादानी ही कहेंगे कि जब चीन भारत के बीच तनाव चरम पर था राहुल गांध्ीा चीन के दूतावास पहुंच गये और खुद संदेह के घेरे में आ गये। देश विदेश खासकर अमेरिका ने भारत में जीएसटी की जी भरकर प्रशंसा की। लेकिन राहुल गांधी ने अमेरिका की धरती पर जीएसटी का विरोध करके न केवल घरेलु मामलों पर विवाद खड़ा कर दिया अपितु अपनी कूटनीतिक निरक्षरता जनता के सामने उजागर कर दी।

    हाल के दिनों में जापान के प्रधानमंत्री आबे ने भारत पहुंचकर नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों का खुलेमन से समर्थन किया अपितु भारत को सामरिक, आर्थिक समर्थन देकर पड़ौसी देश चीन का बुलेट और पाकिस्तान को बुलट का अर्थ समझा दिया। आज पाकिस्तान यदि आतंकवादी देश के रूप में अलग-थलग खड़ा है और चीन की विस्तारवादी दुष्प्रवृत्ति के कारण विश्व के अधिकांश देश चीन के विरोधी और भारत के समर्थन में खड़े हैं यह इक्कीसवीं शताब्दी की बड़ी सफलता है जिसका श्रेय नरेंद्र मोदी को जाता है। उन्होंने भारत के इतिहास को नया मोड़ देकर वैश्विक पटल पर भारत का मान और प्रतिष्ठा बढ़ाई है।

    नरेंद्र मोदी के प्रयास से अहमदाबाद से मुंबई बुलेट ट्रेन की आधार शिला रखे जाने के पश्चात् जापान के प्रधानमंत्री ने ऐलान किया है कि वे 2022 में बुलेट ट्रेन से भारत के नयनाभिराम स्थलों का दौरा करेंगे। पांच वर्षों में पूर्ण होने वाली बुलेट ट्रेन परियोजना पर 84 लाख करोड़ रू. का खर्च आयेगा जो कर्ज के रूप में जापान भारत को 0.1 प्रतिशत ब्याज पर देगा। नरेंद्र मोदी का यह कहना कि बुलेट ट्रेन परियोजना भारत को मुफ्त में पड़ेगी अतिरंजना नहीं एक हकीकत है। क्योकि इस कर्ज राशि की वसूली 15 वर्ष बाद लंबी अवधि की किश्तों में होगी। तब तक यह परियोजना भारत के लिए दुधारू गाय साबित हो चुकी होगी। देश के औद्योगिक शहरों में आवागमन सरल, सुलभ पर यातायात का दबाव केन्द्रित होने से सड़क और देश यातायात पर से दबाव घटेगा। इससे पर्यावरण संरक्षण का नया अध्याय आरंभ होगा।

    नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हर क्षेत्र में काम की गति में तीव्रता आई है। सबसे बड़ी बात यह है कि भारत की दुनिया की महाशक्ति की राह पर अजेय बनकर बढ़ रहा है भारतीय फौज ने पाकिस्तान के विरूद्ध सर्जिकल स्ट्राईल लालसेना के साथ साहसिक झड़पे मोल ली हैं। ऐसा पहली बार हुआ कि भारत ने सीना तानकर इसकी जानकारी सार्वजनिक करने में गुरेज नहीं किया। अब तक यह साहस विश्व का महानशक्तिशाली देश अमेरिका ही करता रहा है। इतिहास में दर्ज है कि पूर्ववर्ती सरकार के दौर में नाथूला पर हुई झड़पों में चीन के 300 सैनिक ढेर हुए थे लेकिन सरकार यह बताने का साहस नहीं कर सकी थी। क्योंकि उसे अंदेशा था कि ऐसा करने से चीन भड़क जायेगा। लेकिन इस बार सेना को जितनी आजादी दी गई। उतने ही खुलेपन के साथ भारतीय फौज के शौर्य का सरकार ने बखान किया और उसे पूरा श्रेय भी दिया। अब तक भारत की विदेश नीति संकोच के अवकुंठन रही है। लेकिन मोदी ने इसमें साहस के साथ पारदर्शिता का रंग भरा है और देश का भाल उन्नत किया है यहीं महाशक्ति के सिर का सेहरा है।

  • अब चीन भी आतंकवाद पर भारत के साथ

    अब चीन भी आतंकवाद पर भारत के साथ

    नई दिल्ली । चीन के शियामेन शहर में ब्रिक्स सम्मेलन के समापन की औपचारिक घोषणा के साथ अगले साल दक्षिण अफ्रीका के जोहानिसबर्ग में अगले ब्रिक्स सम्मेलन की घोषणा की गई।

    ब्रिक्स सम्मेलन पर देश और दुनिया की नजर इस बात पर टिकी थी कि भारत और चीन के बीच बातचीत का एजेंडा क्या होगा। सोमवार को जब ब्रिक्स का घोषणापत्र जारी हुआ तो उसमें अहम बात ये रही कि पहली बार चीन ने माना कि लश्कर और जैश दुनिया के लिए खतरनाक हैं। ब्रिक्स के घोषणापत्र में लश्कर और जैश संगठनों का जिक्र होना भारत के लिए अहम कामयाबी मानी गई। गोवा में 2016 के ब्रिक्स के घोषणापत्र के समय भारत की तमाम कोशिशों के बाद भी लश्कर और जैश के नाम पर चीन अड़ गया था। आज जब पीएम मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनफिंग के बीच मुलाकात हुई तो कयास लगाए जा रहे थे कि शायद डोकलाम के मुद्दे पर दोनों देशों के बीच बातचीत हो। लेकिन चीन ने बातचीत से पहले ही साफ कर दिया कि डोकलाम पर बातचीत नहीं होगी।

    पीएम मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की बातचीत के बाद विदेश सचिव एस जयशंकर ने सधे अंदाज में कहा कि मतभदों को कभी विवाद नहीं बनने देंगे। भारत के इस बयान से साफ हो गया कि पंचशील सिद्धांतों के तहत ही चीन और भारत को आगे बढ़ने की जरुरत है।

  • चीनी माल का बहिष्कार करेंःइंद्रेश कुमार

    चीनी माल का बहिष्कार करेंःइंद्रेश कुमार

    भोपाल21 अगस्त,(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।भारत ने कभी किसी देश की जमीन हड़पने का प्रयास नहीं किया। इसके बावजूद चीन और पाकिस्तान जिस तरह की चालें चल रहे हैं उन्हें पता ही नहीं चल रहा कि उनकी जमीन कैसे खिसक रही है। पाकिस्तान ने यदि भारत से द्वेष बंद नहीं किया तो निकट भविष्य में वह अपना मौजूदा अस्तित्व ही गंवा देगा। इसी तरह चीन समुद्र की ओर बढ़ने की ललक में दुनिया से टकराव की नीति पर चल रहा है। दक्षिणी सागर में तेरह देश मिलकर चीन की लूट रोकने के लिए जुट गए हैं। उसके सभी पड़ौसी देशों से संबंध खराब हैं और वह बिखरने की कगार तक पहुंच गया है। हिंद बलोच फोरम के आव्हान पर आज भोपाल में एकत्रित जनसमूह को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार ने ये बातें कहीं।

    हिंद बलोच फोरम पाकिस्तान में बेहतर जीवन की लड़ाई लड़ रहे बलोचिस्तान के नागरिकों के हित में आवाज बुलंद कर रहा है। इस संगठन का उद्देश्य देश विदेश में बलोचिस्तान के नागरिकों के मानवाधिकारों के हनन की आवाज बुलंद करना है।……. जम्मू कश्मीर और बलोचिस्तान में पाकिस्तान का बर्बर चेहरा….. विषय पर आयोजित इस सेमिनार में देश के कई जाने माने विशेषज्ञों ने भी अपने विचार व्यक्त किए। इनमें हिंद बलोच फोरम के संयोजक स्वामी जितेन्द्रानंद सरस्वती,हिंद बलोच फोरम के अध्यक्ष और जाने माने ज्योतिषाचार्य पवन सिन्हा (गुरुजी), राजनीतिक विश्लेषक और पाकिस्तान मामलों के जानकार पुष्पेन्द्र कुलश्रेष्ठ, हिंद बलोच फोरम के राष्ट्रीय सूत्रधार गोविंद शर्मा,रक्षा विशेषज्ञ कर्नल आरएसएन सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किए। फादर मरिया स्टीफेन और सभी धर्मगुरु भी इस अवसर पर उपस्थित थे।स्थानीय स्तर पर आयोजित इस कार्यक्रम के संयोजक गजेन्द्र सिंह चौहान, अश्विनी, अजय ठाकुर एवं कई अन्य युवाओं ने कार्यक्रम को सफल बनाने में अपना सक्रिय सहयोग दिया। भारत और बलोचिस्तान की बहनों ने राखी बांधकर इस आयोजन को स्नेह सूत्र में पिरोया।

    हिंदू मुस्लिम एकता के लिए बरसों से कार्य कर रहे संघ के स्वयंसेवक इंद्रेश कुमार ने कहा कि हम कभी पाकिस्तान,इस्लाम या मुसलमान के विरोधी नहीं रहे। पाकिस्तान हमारी इच्छा के विरुद्ध बनाया गया था। तत्कालीन नेताओं नेहरू और जिन्ना ने इसमें भले ही सहमति दी हो पर दोनों देशों के नागरिक इस बंटवारे से न तो तब सहमत थे और न आज। पाकिस्तान के मौजूदा शासक इसके बावजूद आज भारत से द्वेष पैदा कर रहे हैं और चीन से गलबहियां डाल रहे हैं। इसके कारण पाकिस्तान के लोगों में भय फैल गया है कि चीन कहीं भविष्य में हमें तिब्बत की तरह गड़प न कर जाए।

    उन्होंने कहा कि लार्ड माऊंटबैटन के जिस कागज पर नेहरू और जिन्ना ने हस्ताक्षर किए थे वो आजादी का नहीं विभाजन का दस्तावेज था। इस विभाजन से दोनों देशों के तीन करोड़ लोग उजड़ गए, दस लाख लोगों का कत्लेआम हुआ, चार लाख बहनों ने आत्महत्या की या बलात्कार के बाद उनकी हत्या कर दी गई, छह लाख लोगों को धर्म परिवर्तन करना पड़ा। उन्होंने बताया कि आजादी के जश्न में बापू स्वयं मौजूद नहीं थे। एक भी दस्तावेज या वीडियो नहीं है जिसमें उन्होंने आजादी का संदेश दिया हो। उन्होंने इस अवसर पर झंडा भी नहीं फहराया। वे तो चाहते थे कि स्वाधीनता आंदोलन के दौरान कांग्रेस के बैनर पर देश के लोगों को एकजुट किया गया था। इसलिए इसे राजनीतिक दल का स्वरूप न दिया जाए। इसके बावजूद चंद स्वार्थी लोगों ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए स्वाधीनता संग्राम की याद दिला दिलाकर देश को लूटा। आज कांग्रेस के नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में कब भागीदारी की जो सेनानियों के नाम पर आज तक देश का दोहन कर रहे हैं।

    श्री इंद्रेश कुमार ने कहा कि जो लोग देश के अन्य राज्यों से पाकिस्तान पहुंचे थे वे आज मुहाजिर कहे जाते हैं। पाकिस्तान के लोगों ने कानून बनाकर उन्हें शरणार्थी का दर्जा दिया और वे आज भी पाकिस्तान के नागरिक नहीं बन सके हैं। आज वे कह रहे हैं कि अपने बुजुर्गों की गलती के लिए वे भारत से क्षमा चाहते हैं। भारत अपने प्रभाव का उपयोग करके उन्हें या तो पाकिस्तान का नागरिक बनवाए या हमें भारत में वापस शामिल कर ले। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के सिंध, गिलगित, बाल्टिस्तान के लोगों ने कभी पाकिस्तान नहीं मांगा था। बलूचिस्तान और सिंध के लोगों ने तो बाकायदा दिल्ली आकर पंडित नेहरू से ये विभाजन रोकने का अनुरोध किया था पर वे नहीं माने। पाकिस्तान की फौजें उन्हें नियंत्रण में रखने के लिए दो लाख मुस्लिमों का कत्ल कर चुकी है। यही वजह है कि पाकिस्तान में नो मोर पाकिस्तान का नारा देने वाले सात संगठन अपनी आवाज उठा रहे हैं। पाकिस्तान नफरत के मार्ग पर चल रहा है इसलिए वह विकास की दौड़ में पिछड़ता जा रहा है।

    कश्मीर की मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती और नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष व लोक सभा सांसद फारूख अब्दुला के बयानों के बारे में इंद्रेश कुमार ने कहा कि एक बार अनुच्छेद 35 ए को हटाकर जरूर देख लिया जाना चाहिए कि इसका क्या असर होता है। हो सकता है इसी से कोई रास्ता निकल आए। मेहबूबा मुफ्ती के बयान पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि तिरंगे की मौत नहीं हो सकती इसलिए इसका जनाजा भी नहीं निकल सकता। इसलिए इस तरह की बातें फिजूल हैं। उन्होंने युवाओं से आव्हान किया कि वे कश्मीर में जमीन खरीदने और बसने के लिए तैयार रहें।

    उन्होंने कहा कि भारत का हिंदू कभी मुसलमान के खिलाफ नहीं रहा। जब बाबरी ढांचे को ढहाने देश भर से स्वयंसेवक अयोध्या पहुंच रहे थे तो उन्होंने किसी दूसरी मस्जिद को हाथ भी नहीं लगाया। किसी भी मुसलमान को चांटा भी नहीं मारा। इस सच्चाई के बावजूद यदि कोई हिंदू को मुसलमानों का दुश्मन बताए तो ये उसके शैतानी दिमाग की उपज ही हो सकती है। पूर्व राष्ट्रपति हामिद अंसारी के बयान के बारे में उन्होंने कहा कि देश भर में कश्मीर के लाखों छात्र विभिन्न राज्यों में पढ़ते हैं कहीं भी उनसे वैमनस्य नहीं रखा जाता है। इसके बावजूद यदि कोई कहता है कि भारत का मुसलमान डरा हुआ है तो वह जिस देश को सुरक्षित समझता है वहां चला जाए। किसी को भारत का माहौल खराब करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

    श्री इंद्रेश कुमार ने कहा कि भारत की कूटनीतिक सफलता ही तो है कि आज दुनिया का एक भी देश चीन का मित्र नहीं है। पाकिस्तान भी पूरी दुनिया से अलग थलग पड़ गया है पर दुनिया के तमाम देश भारत के मित्र हैं। हम कन्फ्यूशियस वाले चीन के पक्षधर हैं, कम्युनिस्ट चीन के नहीं। डोकलाम में हमने अपनी अतिरिक्त सेना तैनात की है। हम युद्ध नहीं चाहते वार्ता से टकराव टालने का प्रयास कर रहे हैं। चीन यदि टकराव का रास्ता अपनाएगा तो इस नकारात्मक सोच के चलते वह बिखर भी जाएगा। उन्होंने कहा कि चीन और पाकिस्तान को सन्मार्ग पर लाने के लिए देश के लोगों को आगे आना होगा। भारत ने चीन को कच्चे माल की सप्लाई बंद कर दी है। हम लोगों से ये भी अपील कर रहे हैं कि तीज त्योहार से लेकर रोज की पूजा तक में इस्तेमाल होने वाले चीन के माल का उपयोग बंद कर दें।उन्होंने लोगों को चीन और पाकिस्तान की विस्तारवादी सोच से उपजे आतंकवाद से मुक्ति के लिए प्रार्थना करने का अनुरोध किया।

  • चीन से विवाद में कांग्रेसी दलालों की भूमिका

    चीन से विवाद में कांग्रेसी दलालों की भूमिका

    डोकलाम विवाद: भारत ने नहीं हटाई सेना तो दो हफ्तों में हमला कर सकता है चीन- ग्लोबल टाइम्स

    नईदिल्ली। चीनी मीडिया लगातार भारत और खासतौर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को निशाना करके हमले की चेतावनी दे रहा है। चीनी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने चीनी सैन्य विशेषज्ञों के हवाले से लिखा है कि अगर नरेन्द्र मोदी सरकार का इस मुद्दे पर अड़ियल रवैया कायम रहता है तो जंग होना तय है। चीन के सैन्य विशेषज्ञों के मुताबिक चीन की पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी दो हफ्तों के अंदर डोकलाम में भारतीय सेना पर सीमित कार्रवाई कर सकती है।

    शंघाई एकेडमी ऑफ सोशल साइसेंज के इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल रिलेशंस में रिसर्च फेल हु ज़ियोंग ने कहा, ‘पिछले दो दिनों में चीन की ओर से की गई टिप्पणियां दिखाती हैं कि चीन भारतीय सेना को विवादित क्षेत्र में लंबे समय तक बर्दाश्त नहीं करेगा।’ ग्लोबल टाइम्स ने हु जियोंग के हवाले से लिखा है कि चीन की सैन्य कार्रवाई का मकसद डोकलाम में मौजूद भारतीय सैनिकों को कैद करना या फिर उन्हें पीछे धकेलना शामिल होगा, साथ ही चीन का विदेश मंत्रालय ऐसी किसी भी कार्रवाई से पहले भारत के विदेश मंत्रालय को अपने फैसले की सूचना देगा।’

    चीन के विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, भारत में चीन के दूतावास और पीपुल्स डेली की ओर से भारत को धमकी दी जा चुकी है कि भारत डोकलाम से अपनी सेना हटाए। बता दें कि डोकलाम में पिछले दो महीनों से भारत चीन की सेना आमने-सामने है। चीन के सरकारी टीवी ने शुक्रवार को बताया कि चीन की सेना ने तिब्बत मिलिट्री क्षेत्र में युद्धाभ्यास किया है, ये युद्धाभ्यास सुबह 4 से शुरू हुआ था और इसमें दुश्मन के ठिकानों पर कब्जे का अभ्यास किया गया था।

    शंघाई इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल स्टडीज में सेन्टर फॉर एशिया-पैसिफिक स्टडीज के निदेशक जाओ गेनचेंग ने ग्लोबल टाइम्स को बताया कि चीनी सेना का ये अभ्यास दिखाता है कि डोकलाम में चीन सैन्य संसाधनों का इस्तेमाल कर सकता है और ऐसा करने की संभावनाएं बढ़ती जा रही है क्योंकि भारत कह कुछ रहा है और कर कुछ रहा है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने गुरुवार को संसद में बयान दिया था कि युद्ध से समस्या का समाधान नहीं हो सकता है इसके लिए बात चीत और बौद्धिक विमर्श की जरूरत है। हालांकि सुषमा स्वराज ने ये भी कहा था कि भारत की सेना किसी भी स्थिति का सामना करने को तैयार है।

    डोकलाम में सड़क बना रहे चीनी अमले को रोकने के लिए जबसे भारत की सेना ने हस्तक्षेप किया है तभी से ये विवाद गरमाया है। भारत में अपना कारोबार लगातार बढ़ाने के लिए चीन ने इन सड़कों का विस्तार किया है। सामरिक महत्व से भी चीन लगातार भारत को घेरने में लगा हुआ है। पड़ौसी मुल्कों से लगातार संबंध बिगाड़ने वाली कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी ने इस बीच चीनी दूतावास जाकर वहां के राजनयिकों से मुलाकात की थी। इस गोपनीय मुलाकात की जानकारी लीक हो गई और सत्तारूढ़ भाजपा के नेताओं ने राहुल गांधी के इस तरह गुपचुप मिलने पर सवाल उठाए थे। तभी से ये सवाल लगातार उठाए जा रहे हैं कि मौजूदा तनाव के पीछे कहीं कांग्रेस के रणनीतिकारों की तो भूमिका नहीं है। जनता की चुनी हुई सरकार के सामने लगातार लाचार नजर आती कांग्रेस जिस तरह देश के साथ षड़यंत्र करती रही है उसे देखकर तो शंकाएं उठना लाजिमी हैं। भारत सरकार को कांग्रेस से जुड़े दलालों और तस्करों की भूमिका की छानबीन भी करनी चाहिए जिससे इस विवाद का समाधान हो सके। (एजेंसियां)

  • हम देशसेवा कार्यों से करते हैं बातों से नहीं

    हम देशसेवा कार्यों से करते हैं बातों से नहीं


    कैथोलिक धर्मसभा में परिवार के महत्व पर चिंतन
    भोपाल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। भारतीय कैथोलिक धर्माध्यक्षीय सभा(सी.सी.बी.आई)ने भोपाल में परिवार के महत्व पर सात दिवसीय चिंतन कार्यक्रम आयोजित किया है। इस धर्मसभा में टूटते परिवारों को संवारकर राष्ट्र के विकास के तरीकों पर चिंतन किया जाएगा। धर्मसभा का आयोजन मुंबई से पधारे सी.सी.बी.आई के अध्यक्ष ओस्वाल्ड कार्डीनल ग्रेसीयस के मार्गदर्शन में किया जा रहा है।
    एशिया की सबसे बड़ी और विश्व की चौथी सबसे बड़ी धर्माध्यक्षीय महासभा में पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए भोपाल के आर्च बिशप लियो कार्नेलियो ने कहा कि हम अपने सेवा कार्यों से राष्ट्र सेवा करते हैं। केवल बयानबाजी पर हमारा कोई भरोसा नहीं। इस लिहाज से हम राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक हैं। उन्होंने कहा कि राजधानी में होने जा रहे इस आयोजन में हम परिवारों की सकारात्मक ऊर्जा का विस्तार करने और परिवारों को टूटने से बचाने जैसे कई मुद्दों पर विचार करेंगे। हमारे 132 धर्म प्रांतों और 182 धर्माध्यक्षों की धर्मसभा इन सूत्रों पर अमल करके राष्ट्र को मजबूत बनाने की दिशा में कार्य कर रहे हैं। पत्रकार वार्ता को सीसीबीआई के उपाध्यक्ष फिलीपे नेरी फेराव, महासचिव वर्गीज चक्कालाकल, उप महासचिव फादर इस्टीफन अलाटारा ने भी संबोधित किया।
    श्री ओस्वाल्ड कार्डीनल ग्रेसीयस ने कहा कि इस सम्मेलन के माध्यम से हम परिवारों में प्यार और खुशी का विस्तार करके सामाजिक ढांचे को मजबूती प्रदान करने के फार्मूलों पर चर्चा करेंगे। इस आयोजन में देश भर में फैली हमारी संस्थाओं के कामकाज पर विमर्श किया जाएगा। इसके साथ साथ हम उन संस्थाओं के कारोबार का भी सिंहावलोकन करेंगे। उन्होंने कहा कि गोवा समेत जिन चर्चों को विमुद्रीकरण के बाद आयकर के नोटिस प्राप्त हुए हमने उन सभी का जवाब दे दिया है। हम भारतीय संविधान के कानूनी दायरे में रहकर अपना कार्य करते हैं और पूरी जवाबदारी के साथ वैधानिक संव्यवहार करते हैं।उन्होंने कहा कि विमुद्रीकरण के बाद अन्य कारोबारों की तरह सभी धार्मिक संस्थाओं को भी अपने खातों और मुद्राओं के नवीनीकरण की प्रक्रिया करनी पड़ी है। इसमें हम कोई अलग नहीं हैं।
    धर्मांतरण के मुद्दे पर आर्चबिशप लियो कार्नेलियो ने कहा कि कोई भी किसी को जबरन अपना धर्म बदलने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। हम लोगों को जगाने और प्रेम से रहने का संदेश देते हैं।लोगों का धर्म परिवर्तन करना उनका मनोभाव है। ये केवल ईश्वर की कृपा से ही हो सकता है। हम देश में कम संख्या में हैं इसलिए हम पर आरोप लगा दिए जाते हैं। उन्होंने सवाल किया कि घर वापिसी जैसे कार्यक्रमों को क्या धर्मांतरण नहीं कहा जाएगा।
    मध्यप्रदेश में ईसाई समाज के सामने क्या चुनौतियां हैं इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि यहां के मुख्यमंत्री हों या सरकार कोई भी संवैधानिक दायरे में ही काम करते हैं। इनसे हमें कभी कोई परेशानी महसूस नहीं हुई। कुछ छुटपुट लोग यदा कदा हिंसा फैलाते रहते हैं जिनमें आमतौर पर न्याय नहीं हो पाता है।
    परिवार वाद बनाम राष्ट्रवाद के बीच विरोधाभासों के सवाल पर आर्चबिशप ने कहा कि राष्ट्रवाद का विचार हम सभी पर समान रूप से लागू होता है। हम अपने कार्यों से राष्ट्र की सेवा करते हैं, नारा लगाकर थोथी राष्ट्रभक्ति करना हमारा स्वभाव नहीं है। हम देश के प्रति पूरी बफादारी रखते हैं और देश को मजबूत बनाने के अपने लक्ष्यों पर पूरी ईमानदारी के साथ अमल भी करते हैं।
    प्रेस को जानकारी देते हुए कांन्फ्रेंस आफ कैथोलिक बिशप्स आफ इंडिया के भोपाल चैप्टर के मीडिया प्रभारी फादर मारिया स्टीफन ने बताया कि 29 वीं अखिल भारतीय कैथोलिक धर्माध्यक्षीय महासभा का आयोजन कल 31 जनवरी से 8 फरवरी 2017 तक किया जा रहा है। भोपाल धर्म प्रांत आशानिकेतन केम्पस स्थित पास्ट्रल सेंटर में इस आयोजन की मेजबानी करेगा। इस आयोजन का मूल एजेंडा परिवारों में प्रेम के आनंद को बढ़ाना है। हम देश भर में फैले अपने धर्म प्रांतों के माध्यम से आम नागरिकों के बीच प्रेम का जो ताना बाना बुन सकते हैं उन तरीकों पर चर्चा करके हम अपनी कार्यप्रणाली में कसावट लाने का प्रयास करेंगे।
    महासभा की शुरुआत यूखारिस्तीय पूजन विधि समारोह के साथ होगी। उद्घाटन सभा की अध्यक्षता भारतीय कैथोलिक धर्माध्यक्षीय महासभा एवं एशियाई कैथोलिक धर्माध्यक्षीय महासभा के अध्यक्ष एवं मुंबई के महाधर्माध्यक्ष ओस्वाल्ड कार्डिनल ग्रेशियस करेंगे।
    इस आयोजन में सीसीबीआई के नए पदाधिकारियों का चुनाव भी किया जाएगा। बैठक में भारतीय कलीसिया की वर्तमान स्थिति पर भी विचार विमर्श किया जाएगा।

  • चाईना बोला तो मिर्ची लगी

    चाईना बोला तो मिर्ची लगी

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    चीन के सरकारी मीडिया का कहना है कि चीनी माल पर प्रतिबंध लगाने के मामले में भारत केवल भौंक सकता है चीनी माल का मुकाबला नहीं कर सकता। देसी अंदाज में की गई इस टिप्पणी से पूरे हिंदुस्तान में नाराजगी का माहौल है। इसकी वजह ये है कि आम भारतीय केवल बात नहीं करता वह बदलाव के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता है। हिंदुस्तान के साधुओं की तपस्या और युद्ध के मैदान में मौत को गले लगा लेने वाले रणबांकुरों की बहादुरी देखकर हिंदुस्तानियों की असीमित शक्तियों का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। इसलिए ये बयान आम भारतीयों को कचोट रहा है। चीन का सरकारी मीडिया हो या स्वयं सरकार किसी को ये मुगालता नहीं पालना चाहिए कि हिंदुस्तान कुछ नहीं कर सकता। इस तरह का ओछा बयान देने से ज्यादा नुक्सान चीन का ही होने वाला है। यदि सवा सौ करोड़ हिंदुस्तानियों ने ठान लिया तो वे चीन के माल की होलियां जलाकर पूरा कारोबार ठप कर देंगे।

    चीनियों को नहीं भूलना चाहिए कि अंग्रेजों को भगाने के लिए इसी हिंदुस्तान में विदेशी कपड़ों की होलियां जलाई जाती रहीं हैं। ये बात अलग है कि आजादी के बाद नेहरू इंदिरा की धूर्त कांग्रेस ने देश के लहू में मक्कारी का जहर भर दिया है। एक महान देश को जातियों, संप्रदायों में बांट दिया है। आरक्षण के जहर से प्रतिभाओं को सरेराह कत्ल किया है। सुअर सरकारीकरण थोपकर देश की मुद्रा को भिखारी बना दिया है। आज अड़सठ रुपए का डालर बिके तो जाहिर है कि आम हिंदुस्तानी कितनी भी मेहनत क्यूं न कर ले पर वह चीन के बराबर सस्ता माल नहीं दे सकता। चीन की मुद्रा इतनी ताकतवर है कि वह कच्चे माल को बहुत थोड़ी लागत लगाकर बाजार में फेंक देता है। अब इतने सस्ते माल का मुकाबला भला कोई भी देश कैसे कर सकता है। चीन ने इसी हिकमत के बल पर न केवल हिंदुस्तान बल्कि दुनिया के तमाम देशों के बाजारों को अपने माल से पाट दिया है। वो ये सब केवल इसलिए कर सका क्योंकि वहां लोकतंत्र नहीं है। आम आदमी को मनचीता करने की आजादी नहीं है। जबकि हिंदुस्तान में तो जितने मुंह उतनी बातें। हर नागरिक शहंशाह है। राजतंत्र के दौर में एक राजा होता था जो यदि अच्छा हो तो पूरा राज्य सुगंधित विकास से भर जाता था और यदि मूर्ख हो तो कुशासन का अभिशाप उस राज्य को दूसरे शासक के हाथों विजित करा देता था। चीन का ये भड़काऊ बयान उस दौर में आया है जब हिंदुस्तान की महान जनता ने कांग्रेस के कुशासन को उखाड़ फेंका है। उसने उम्मीदों की एक नई सुबह के इंतजार में सत्ता की बागडोर नरेन्द्र मोदी जैसे सशक्त नेतृत्व के हाथों में सौंपी है।

    नरेन्द्र मोदी भारतीय जनता पार्टी की उस पाठशाला में पले बढ़े हैं जिसे संघ के तपोनिष्ठ स्वयंसेवकों ने अपने खून पसीने से सींचा है। नरेन्द्र मोदी जैसे हजारों लाखों स्वयंसेवक आज न केवल भारतीय जनता पार्टी बल्कि देश के अन्य राजनैतिक दलों का भी संचालन कर रहे हैं। पराजित होकर सत्ताच्युत हो चुकी कांग्रेस में भी संघ की ज्वाला में तपे निखरे स्वयंसेवक मौजूद हैं। ये वो लोग हैं जो भारत माता की आराधना करते हैं। ये वो लोग हैं जो देश के लिए मर मिटने में पल भर का वक्त भी नहीं लगाते हैं। यही वजह है कि हम चीन के इस मुगालते भरे कटाक्ष का स्वागत करते हैं। हम चीनी मीडिया को इस बात के लिए भी धन्यवाद देते हैं कि उसने हमें झकझोरने का काम तो किया। यही बात यदि भारतीय मीडिया के पत्रकार बंधु कहते तो सत्ता के मद में डूबे स्वयंभू देशभक्त उन पर तरह तरह की तोहमतें थोप देते। कोई उन पर वामपंथी, नक्सली, सनकी, बिका हुआ होने का लेबल चिपका देता तो कोई विपक्षी कांग्रेसियों की शह पर दिया गया बयान बताकर खारिज करने का श्रम करके अपने आकाओं से नंबर बढ़वाने का जतन करने लग जाता। ये अच्छी बात है कि ये बयान चीन के मीडिया ने दिया है। उसने न केवल भारत को भौंकने वाला लाचार देश बताया बल्कि ये भी कहा कि नरेन्द्र मोदी के मेक इन इंडिया अभियान का कोई मतलब नहीं। इसकी वजह उसने बताई कि भारत में भारी भ्रष्टाचार है। चीनी मीडिया ने अपने निवेशकों को भी सलाह दी है कि वे भारत में कतई निवेश न करें।

    चिंताजनक बात तो ये है कि चीनी मीडिया का ये बयान तब आया है जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जैसे कई नेता चीन की जमीन पर जाकर वहां के उद्योगपतियों को निवेश का न्यौता देते फिर रहे हैं। लगता है कि नेताओं के ये प्रयास चीन के उद्योगपतियों और सरकार का भरोसा नहीं जीत पाए हैं। ये बात भी सही है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह विश्व पटल पर पाकिस्तान में आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए चीन को सवालों के घेरे में खड़ा किया उससे भी चीन बौखलाया हुआ है। अमेरिका से बढ़ती नजदीकियों से भी चीन के रणनीतिकार परेशान महसूस कर रहे हैं। इसके बावजूद चीन के मीडिया ने जो बात कही है उसके लिए भारत के शासकों को अपने गिरेबान में जरूर झांकना पड़ेगा। कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री पी.व्ही.नरसिंम्हाराव और डाक्टर मनमोहन सिंह ने कड़ा दिल करके देश को नेहरू इंदिरा काल की गद्दार नीतियों से बाहर निकालने का भरपूर जतन किया। वे खुलकर तो नहीं कह सकते थे कि इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण और अंधे सरकारीकरण को थोपकर देश को गरीबी के दलदल में धकेल दिया था। इसलिए उन्होंने कार्पोरेटीकरण को बढ़ावा देकर एक समानांतर अर्थव्यव्यवस्था खड़ी करने का प्रयास किया। ये बात अलग है कि इससे आम नागरिकों पर दोहरा बोझ पड़ने लगा है। एक ओर तो वे कार्पोरेटीकरण जनित मंहगाई की मार झेलने के लिए खुले बाजार के हवाले कर दिए गए हैं वहीं राष्ट्रीयकरण के नाम पर थोपे गए अनुत्पादक सरकारी तंत्र को भी पालने पोसने के लिए मजबूर हैं। कांग्रेस के पतन के बाद जरूरत थी कि भारत जल्दी से जल्दी इस थोपे गए सरकारीकरण के जाल से खुद को मुक्त कर लेता।

    कांग्रेस की विदाई के बाद भाजपा की सरकारें भी कमीशनखोरी के चक्कर में कांग्रेस की ही पूंछ पकड़कर चलने लगीं। इसलिए देश में एक बार फिर निराशा का माहौल फैलने लगा है। इससे निजात दिलाने के लिए भाजपा के नेता खोखले बयानों की राजनीति कर रहे हैं। वे जनता को वैचारिक तौर पर राहत महसूस कराने का प्रयास कर रहे हैं जबकि इससे कोई समाधान निकलने वाला नहीं है। ये बात दुनिया भर के निवेशकों को भी मालूम है। यही वजह है कि जापान जैसा मित्र देश और उसके उद्योगपति भी भारत में निवेश करने से कतरा रहे हैं। धूर्त सरकारीकरण से घबराकर जापान की संस्था ने मध्यप्रदेश में मैट्रो रेल की जायका जैसी संस्था को भी कर्ज देने के मामले में चुप्पी साध ली है। चीन का मीडिया क्या बोलता है हम उसकी चिंता न भी करें तो हमें अपने हालात पर गौर जरूर करना होगा। कर्ज लेकर चलने वाली विकास योजनाओं को हम यदि विकास बताते रहेंगे तो फिर हमारी शुतर्मुर्गी भूमिका देश को एक नए झमेले में डाल देगी। यदि हम कांग्रेस को गाली देते रहे और युवाओं को रोजगार मुहैया नहीं करा सके तो ध्यान रखें हम एक नई उथलपुथल को पनपने का अवसर दे रहे हैं। हिंदुस्तान के शासकों और उनकी भोंदू नौकरशाही को आत्मचिंतन करना ही होगा। उन्हें ध्यान रहे कि ये दौर पूंजीवाद का है और कानून का डंडा केवल शासकों के हाथ का नौकर नहीं होता।