मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने मध्यप्रदेश के स्वर्णिम आकाश में एक जबर्दस्त छलांग लगाकर दिखाई है। विकास की अवधारणा को लेकर दशकों तक शोर मचाते आंदोलनकारी आज भी समझने को राजी नहीं हैं कि विकास की बयार किसी भी जड़ता से मीलों आगे निकल जाती है। यही नहीं देश के बड़े अखबारों के माध्यम से इन बुद्धिजीवियों ने एक बार फिर भ्रम फैलाने का खटराग शुरु कर दिया है। जबकि पूंजी को चलायमान करने वाली भाजपा की विचारधारा ने इस समझौते के माध्यम से ये संदेश देने का प्रयास किया है कि विकास की धारा को किसी कीमत पर थमने नहीं दिया जाएगा। वास्तव में नर्मदा घाटी परियोजना स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी बहुउद्देशीय नदी परियोजनाओं में गिनी जाती है। सरदार सरोवर परियोजना से जुड़े वित्तीय दायित्वों, डूब क्षेत्र, पुनर्वास और मुआवजे को लेकर मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के बीच वर्षों से विवाद चलता रहा। जुलाई 2026 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में चारों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने लंबित वित्तीय दावों और नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण (NWDT) के पुरस्कार से जुड़े मुद्दों के समाधान के लिए एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी हस्ताक्षर किए। केंद्र सरकार के अनुसार इसका उद्देश्य दशकों से लंबित भुगतान, लागत साझेदारी तथा पुनर्वास संबंधी विवादों का स्थायी समाधान करना रहा है।
मध्यप्रदेश के दृष्टिकोण से देखें तो इस समझौते का सबसे बड़ा लाभ यह है कि लंबे समय से अटके वित्तीय दावे और भुगतान का रास्ता साफ हुआ है। पिछले कुछ वर्षों से मध्यप्रदेश सरकार का दावा रहा था कि सरदार सरोवर परियोजना के कारण राज्य की बड़ी मात्रा में राजस्व भूमि, वन भूमि तथा अन्य सरकारी संपत्तियाँ डूब क्षेत्र में चली गईं, जिनका समुचित प्रतिपूर्ति मूल्य अभी तक प्राप्त नहीं हुआ था। इस विवाद के कारण हजारों करोड़ रुपये की राशि वर्षों से लंबित थी। समझौते के बाद एकमुश्त समाधान (One-Time Settlement) की दिशा में सहमति बनने से मध्यप्रदेश की वित्तीय स्थिति को लाभ मिलने की संभावना है। डैमिंग द नर्मदा किताब लिखने वाले नर्मदा आंदोलनकारी रमेश बिल्लौरे जब गांव गांव जाकर बांध के विरोध में अलख जगाने की कोशिश कर रहे थे तब भी बांध प्रभावित बांध के विरोध में नहीं थे। उनका डर था कि उनकी संपत्तियों का मुआवजा मिलेगा भी या नहीं। तब कांग्रेस की डिफाल्टर सरकारें हुआ करती थीं और किसी को ये विश्वास नहीं था कि सरकार मुआवजा कैसे दे पाएगी।
इस बहुपक्षीय समझौते से प्रभावित हितधारकों की सूची बहुत बड़ी है। सबसे पहले प्रभावित होंगे वे हजारों परिवार जो नर्मदा घाटी में विस्थापित हुए। यदि समझौते के अनुरूप लंबित भुगतान और पुनर्वास संबंधी दायित्वों का समयबद्ध क्रियान्वयन होता रहेगा, तो उन्हें वर्षों से लंबित राहत मिल सकती है। दूसरा बड़ा वर्ग मध्यप्रदेश सरकार का है, जिसे लंबित वित्तीय दावों के समाधान से राजकोषीय राहत मिलेगी। तीसरा लाभार्थी कृषि और सिंचाई क्षेत्र है, क्योंकि अंतरराज्यीय विवाद समाप्त होने से परियोजना के संचालन और भविष्य के जल प्रबंधन में अधिक स्थिरता आएगी। चौथा लाभ उद्योग और ऊर्जा क्षेत्र को होगा, क्योंकि परियोजना से जुड़ी बिजली उत्पादन और जल प्रबंधन योजनाओं में समन्वय बढ़ेगा।
पुनर्वास और मुआवजे का प्रश्न नर्मदा परियोजना का सबसे संवेदनशील पक्ष रहा है। नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण ने विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश दिए थे। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने भी विभिन्न मामलों में यह स्पष्ट किया कि पुनर्वास परियोजना का अभिन्न हिस्सा है और इसके बिना निर्माण कार्य आगे नहीं बढ़ सकता। समय के साथ भूमि के बदले भूमि, नकद मुआवजा, आवासीय भूखंड, आधारभूत सुविधाएँ तथा पुनर्वास स्थलों का विकास जैसी व्यवस्थाएँ लागू की गईं। हालिया समझौते का उद्देश्य इन्हीं लंबित वित्तीय दायित्वों और भुगतान संबंधी विवादों का अंतिम निपटारा करना है, जिससे प्रभावित परिवारों और राज्यों के बीच शेष विवाद समाप्त हो सकें।
नर्मदा आंदोलन का नेतृत्व करने वालों का कहना था कि बिना पर्याप्त पुनर्वास के बड़े बांध का निर्माण मानवाधिकारों का उल्लंघन होगा। उनके प्रयासों के कारण पुनर्वास नीति पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर बहस हुई और सरकारों को पुनर्वास मानकों में कई बार सुधार करना पड़ा।इससे जहां प्रभावितों को मुआवजा मिलना सुनिश्चित हुआ वहीं परियोजना में विलंब से देश को एक मंहगी कीमत भी चुकानी पड़ी। बांध विरोध की लड़ाई यदि परियोजना स्थापना के वक्त लड़ी गई होती तो परियोजना का रूप कुछ और हो सकता था। बाद के वर्षों में खड़ा किया गया जन असंतोष विकास के मार्ग में बड़ा अवरोध बन गया। विकास के कथित गांधीवादी मॉडल की आड़ लेकर विकास विरोधियों ने प्रदेश और देश की तरुणाई को गुमराह किया जो आज भी एक चुनौती बना हुआ है।
सरकारों तथा परियोजना समर्थकों का मत रहा कि लगातार न्यायालयी लड़ाइयों, धरना-प्रदर्शनों और पर्यावरणीय आपत्तियों के कारण परियोजना वर्षों तक विलंबित हुई, जिससे सिंचाई, पेयजल और विद्युत उत्पादन के अपेक्षित लाभ देर से मिले तथा लागत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर परियोजना को आगे बढ़ाने की अनुमति दी, साथ ही पुनर्वास संबंधी शर्तों के पालन पर भी बल दिया। इसलिए यह कहना अधिक संतुलित होगा कि आंदोलन ने परियोजना को पूरी तरह रोक नहीं दिया, बल्कि उसके क्रियान्वयन की गति और पुनर्वास नीति—दोनों को प्रभावित किया।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की भूमिका इस समझौते में राजनीतिक और प्रशासनिक—दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण रही। उन्होंने मध्यप्रदेश की ओर से समझौते पर हस्ताक्षर कर यह संकेत दिया कि राज्य अब दशकों पुराने विवादों को समाप्त कर विकास परियोजनाओं को गति देना चाहता है। राज्य सरकार लगातार यह तर्क देती रही है कि नर्मदा परियोजना से सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन के व्यापक लाभ प्राप्त हुए हैं तथा शेष वित्तीय विवादों का समाधान विकास की गति बढ़ाएगा। समझौते में उनकी भागीदारी इस राजनीतिक प्रतिबद्धता का संकेत मानी जा रही है।
राज्य के मुख्य सचिव अनुराग जैन ने राज्य के वित्तीय सुधारों को लागू करते हुए प्रशासनिक दक्षता का युक्तियुक्त समाधान प्रस्तुत किया। नर्मदा घाटी विकास विभाग को वे तमाम अनुमतियां दी गईं जिनसे राज्यों के बीच ये समझौता आकार ले सका। ऐसे अंतरराज्यीय समझौतों में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों का कार्य राज्यों के दावों का परीक्षण, वित्तीय देयताओं का मिलान, कानूनी बिंदुओं का समन्वय तथा अंतिम मसौदे की तैयारी करना होता है। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी से यह स्पष्ट है कि मध्यप्रदेश के अधिकारियों ने गुजरात तथा अन्य राज्यों के अधिकारियों के साथ लंबे समय तक तकनीकी और वित्तीय स्तर पर बातचीत की, जिसके बाद राजनीतिक स्तर पर अंतिम समझौता संभव हो सका। हालांकि सार्वजनिक स्रोतों में प्रत्येक वार्ता चरण में व्यक्तिगत अधिकारियों की विस्तृत भूमिका का आधिकारिक विवरण उपलब्ध नहीं है।
समग्र रूप से देखें तो यह समझौता केवल वित्तीय विवाद का समाधान नहीं है, बल्कि सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) का एक महत्वपूर्ण उदाहरण भी है। यदि लंबित भुगतान वास्तव में समय पर हो जाते हैं, पुनर्वास के शेष मामलों का न्यायसंगत निपटारा होता है और परियोजना से जुड़े सभी राज्यों के बीच समन्वय बना रहता है, तो मध्यप्रदेश को वित्तीय, कृषि, ऊर्जा तथा जल प्रबंधन—चारों क्षेत्रों में दीर्घकालिक लाभ मिल सकते हैं। वहीं यह भी उतना ही आवश्यक होगा कि विकास के साथ विस्थापित परिवारों के अधिकारों की अनदेखी न हो। किसी भी बड़ी नदी परियोजना की सफलता केवल बांध बनने से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि उससे प्रभावित अंतिम व्यक्ति को भी न्याय मिला या नहीं। यही इस ऐतिहासिक समझौते की वास्तविक कसौटी होगी।नर्मदा समग्र के सूत्रधार अनिल माधव दवे के प्रयासों को इस समझौते ने सच्ची श्रद्धांजलि दी है जिन्होंने नर्मदा और इस जैसी माता समान नदियों के विकास को लेकर पूरी अवधारणा प्रस्तुत की थी।

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