Month: August 2019

  • मतदाताओं को रंगीन फोटो युक्त परिचय पत्र मिलेंगे

    मतदाताओं को रंगीन फोटो युक्त परिचय पत्र मिलेंगे

    भोपाल,31 अगस्त(प्रेस सूचना केन्द्र)। भारत निर्वाचन आयोग ने मतदाताओं को रंगीन मतदाता पहचान पत्र मुहैया कराने का निर्णय लिया हैं. इस अभियान के अंतर्गत प्रदेश के 74 लाख उन मतदाताओं के फोटो परिचय पत्र नए बनाए जाएंगे जिनके पास अभी पुराने श्वेत श्याम मतदाता परिचय पत्र हैं।भारत निर्वाचन आयोग की ओर से एक सितंबर से पूरे देश में मतदाता सूची में दर्ज विवरणों का सत्यापन कार्य कराया जा रहा है।

    प्रदेश के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी बीएल कांताराव ने आज पत्रकार वार्ता में बताया कि जिन मतदाताओं के पास पहले से ही मतदाता पहचान पत्र हैं वे फार्म – 8 भरकर निःशुल्क नए परिचय पत्र बनवा सकते हैं। उन्हें एक रंगीन फोटो अपने क्षेत्र के बीएलओ को पहुंचाना होगा। जिनके परिचय पत्र नए बनना हैं वे 25 रूपए शुल्क जमा करके रंगीन मतदाता पहचान पत्र बनवा सकते हैं.

    पहली बार मतदाता सूची में नाम जुडवाने के लिए फार्म – 6 भरना होगा. इसके लिए कोई शुल्क देय नही हैं. यह फार्म संबंधित रजिस्ट्रीकरण अधिकारी अथवा मतदाता सहायता केन्द्र में जमा किए जा सकते हैं. यहीं से फार्म – 8 एवं फार्म – 6 के प्रारूप भी प्राप्त किए जा सकते हैं। ये सभी सुविधाएं आनलाईन भी मौजूद हैं।

    मतदाता सूची में आपका नाम है या नहीं ये अब आप घर बैठे ऑनलाइन चैक कर सकते हैं. इसके लिए सिर्फ़ इस लिंक http://electoralsearch.in/ पर क्लिक करना है. इसके बाद खुली विंडो में अपना नाम (जैसा कि वोटर आईडी कार्ड में दिया है) और पिता/ पति का नाम टाइप करना है. इसके बाद राज्य और निर्वाचन क्षेत्र के विकल्प पर जाकर अपना राज्य और निर्वाचन क्षेत्र चुनना है.

    इसके बाद अपनी आयु या अपनी जन्मतिथि और लिंग चुनकर खोज बटन का इस्तेमाल किया जा सकता है. हालाँकि यह वैकल्पिक है, लेकिन इस जानकारी के अभाव में एक ही नाम के एक से अधिक मतदाता होने पर परिणाम भी एक से अधिक मिलेंगे.

    इस जानकारी को देने के बाद अब सिर्फ़ खोजें/ Search बटन को क्लिक करना है और अगर वोटिंग लिस्ट में आपका नाम है तो विंडो में सबसे नीचे आपसे संबंधित सारी जानकारी आ जाएगी. इसमे आपका वोटिंग आईडी कार्ड नंबर, नाम, आयु, पिता/पति का नाम, राज्य, जिला, मतदान केन्द्र का नाम और कक्ष क्रमांक, विधानसभा और संसदीय क्षेत्र का नाम शामिल है.

    इसी प्रकार अगर आपको अपने पोलिंग बूथ की जानकारी नहीं है तो चुनाव आयोग ने इसके लिए भी ऑनलाइन व्यवस्था की है. बूथ की जानकारी पाने के लिए इस लिंक http://psleci.nic.in/ पर क्लिक करना है.

    इसके बाद दर्शाए गए चित्र के मुताबिक अपना राज्य या केन्द्र शासित प्रदेश चुनना है.

    मतदाता अपने पास पूर्व से उपलब्ध पुराने एपिक कार्ड को तब तक रख सकेगा जब तक उसे नया कार्ड उपलब्ध नहीं हो जाए। नया रंगीन फोटो परिचय पत्र प्राप्त होने के उपरांत पुराने कार्ड को बूथ लेवल अधिकारी के माध्यम से वापस जमा कराया जाएगा। मतदाता से जो मोबाईल नंबर लिया जा रहा है वह गोपनीय रहेगा। इसका इस्तेमाल चुनाव आयोग की ओर से मतदाताओं को नई जानकारियां देने में किया जाएगा।

  • सार्वजनिक क्षेत्र के छह और बैंकों का विलय,अब केवल 12 बचेंगे

    सार्वजनिक क्षेत्र के छह और बैंकों का विलय,अब केवल 12 बचेंगे

    नईदिल्ली,30 अगस्त(प्रेस सूचना केन्द्र) नरेन्द्र मोदी सरकार ने आज बैंकों की बड़ी विलय योजना की घोषणा की, जिससे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की संख्या एक ही झटके में 18 से घटकर 12 रह जाएगी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) ओरियन्टल बैंक ऑफ कॉमर्स और यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया का अधिग्रहण करेगा। इसी तरह वहीं केनरा बैंक में सिंडिकेट बैंक का, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में आन्ध्रा बैंक और कॉर्पोरेशन बैंक तथा इंडियन बैंक में इलाहाबाद बैंक का विलय होगा। सीतारमण ने कहा कि इन 10 बैंकों की जगह केवल 4 बैंक रह जाएंगे और सरकार चालू वित्त वर्ष के दौरान 70,000 करोड़ रुपये के पुर्नपूंजीकरण में से करीब 55,250 करोड़ रुपये की पूंजी इन्हीं बैंकों में डालेगी।

    बैंकों के विलय की घोषणा करते हुए वित्त मंत्री और वित्त सचिव राजीव कुमार ने बार-बार दोहराया कि इस निर्णय से किसी कर्मचारी की नौकरी नहीं जाएगी। कुमार ने कहा कि प्रस्तावित विलय की समयसीमा इन दस बैंकों के बोर्डों से परामर्श करने के बाद तय की जाएगी। उन्होंने कहा, ‘इस निर्णय से नौकरियों पर किसी तरह की आंच नहीं आएगी। जिन बैंकों में इनका विलय होगा, वे विलय होने वाले बैंकों के कर्मचारियों को बनाए रखेंगे।’  

    वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा, ‘बैंक एकीकरण के दो चरण पहले ही किए जा चुके हैं और अपनी बैंकिंग व्यवस्था को मजबूत बनाने तथा 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य हासिल करने के लिए हम एक बार फिर विलय करना चाहते हैं। हम नई पीढ़ी के और बड़े बैंक बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिनकी अधिक कर्ज देने की क्षमता हो।’ उन्होंने कहा, ‘इंडियन ओवरसीज बैंक, यूको बैंक, बैंक ऑफ महाराष्ट्र और पंजाब एण्ड सिंध बैंक पहले की तरह काम करते रहेंगे क्योंकि ये मजबूत क्षेत्रीय बैंक हैं।’  वित्त मंत्री ने बैंकों के लिए नए परिचालन सुधारों की भी घोषणा की।

    सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निदेशक मंडल अब महाप्रबंधक से ऊपर के दर्जे के अधिकारियों का प्रदर्शन आधारित मूल्यांकन करेंगे। बैंक अपने मुख्य जोखिम अधिकारी को बाजार के अनुकूल पारितोषिक पर नियुक्त कर सकेंगे। बोर्ड को वरिष्ठ प्रबंधन के कार्यकाल की योजना तय करने की आजादी होगी। इसके अलावा गैर-आधिकारिक निदेशकों की फीस में इजाफा किया जाएगा, बोर्ड समितियों को तार्किक बनाया जाएगा और प्रबंधन समिति की कर्ज मंजूर करने की सीमा बढ़ाकर 100 फीसदी तक की जाएगी ताकि उच्च मूल्य के ऋण प्रस्तावों पर ज्यादा ध्यान दिया जा सके। इसके साथ ही बड़े सरकारी बैंकों में कार्यकारी निदेशकों की संख्या मौजूदा तीन से बढ़ाकर चार की जाएगी। 

    पीएनबी में ओरियन्टल बैंक और यूनाइटेड बैंक का विलय होने के बाद वह 17.95 लाख करोड़ रुपये के कारोबार, 11,437 शाखाओं और 10.44 लाख करोड़ रुपये की जमा के साथ देश का दूसरा सबसे बड़ा बैंक बन जाएगा। एकीकृत इकाई की गैर-निष्पादित आस्तियां 6.61 फीसदी रहने का अनुमान है, जो ओरियन्टल बैंक ऑफ कॉमर्स के एनपीए से अधिक लेकिन पीएनबी और यूनाइटेड बैंक से कम है।केनरा बैंक और सिंडिकेट बैंक का विलय होने के बाद कारोबार के लिहाज से वह देश का चौथा सबसे बड़ा बैंक होगा, जबकि शाखाओं के हिसाब से तीसरा सबसे बड़ा बैंक बन जाएगा।  एकीकृत इकाई के पास कुल जमा राशि 8.59 लाख करोड़ रुपये होगी और शुद्घ एनपीए अनुपात 5.62 फीसदी होगा।

    यूनियन बैंक, आन्ध्रा बैंक और कॉर्पोरेशन बैंक के एकीकरण से देश का पांचवां सबसे बड़ा सरकारी बैंक बनेगा। इसकी एकीकृत जमा 8.20 लाख करोड़ रुपये और शुद्घ एनपीए अनुपात 6.30 फीसदी होगा, जो यूनियन बैंक के एनपीए से कम लेकिन आन्ध्रा बैंक और कॉर्पोरेशन बैंक के एनपीए से अधिक है। इंडियन बैंक और इलाहाबाद बैंक के एकीकरण से देश का सातवां सबसे बड़ा सरकारी बैंक बनेगा, जिसकी कुल जमा राशि 4.56 लाख करोड़ रुपये होगी और एनपीए अनुपात 4.39 फीसदी होगा।क्रिसिल रेटिंग्स के वरिष्ठ निदेशक कृष्णन सीतारमण ने कहा, ‘इतने बड़े स्तर पर एकीकरण से कुछ समय के लिए कामकाज की शैली के अंतर, मानव संसाधन को संभालने, बैंक शाखाओं को तर्कसंगत बनाने एवं तकनीकी एकीकरण करने जैसी चुनौतियों से जूझना पड़ सकता है। अगर इसे सही तरीके से क्रियान्वित किया गया तो मध्यम अवधि में इसका लाभ होगा और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ज्यादा प्रभावी तरीके से प्रतिस्पद्र्घा कर सकेंगे।’भारी-भरकम विलय की घोषणा वित्त सचिव, वित्त मंत्री और सार्वजनिक क्षेत्र के 10 बैंकों के मुख्य कार्याधिकारियों की बैठक के बाद की गई। 

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  • रिजर्व बैंक की सालाना आय 146.5% बढ़ी

    रिजर्व बैंक की सालाना आय 146.5% बढ़ी

    नई दिल्ली,31 अगस्त (प्रेस सूचना केन्द्र) RBI (भारतीय रिजर्व बैंक) ने बुधवार को अपनी सालाना रिपोर्ट पेश की। इसके अनुसार, केंद्रीय बैंक की बैलेंस शीट में 13.42 फीसद का इजाफा हुआ है और यह 41.03 लाख करोड़ रुपये रहा। वहीं, ब्‍याज से होने वाली आय 2018-19 में 146.59 फीसद बढ़कर 1.93 लाख करोड़ रुपये रही। अपने वार्षिक रिपोर्ट में RBI ने कहा है कि ब्‍याज से होने वाली उसकी आय 44.62 फीसद बढ़कर 1.06 लाख करोड़ रुपये रही और अन्‍य स्रोतों से होने वाली आय 30 जून 2019 के अनुसार, 86,199 करोड़ रुपये रही जो एक साल पहले की अवधि में 4,410 करोड़ रुपये थी। 

    RBI ने कहा कि 30 जून 2019 के अनुसार, सरकारी प्रतिभूतियों में उसका निवेश 57.19 फीसद बढ़कर 6.29 लाख रुपये से 9.89 करोड़ रुपये रहा। इसमें लिक्विडिटी मैनेजमेंट ऑपरेशंस के दौरान 3.31 लाख करोड़ रुपये की सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद शामिल है। रिजर्व बैंक का विदेशी विनिमय लाभ बढ़कर 28,998 करोड़ रुपये रहा। पिछले वर्ष इसमें 4,067 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था। 

    2018-19 में सरकार को ट्रांसफर की जाने वाली सरप्‍लस राशि रिजर्व बैंक के बोर्ड द्वारा इस हफ्ते अपनाए गए इकोनॉमिक कैपिटल फ्रेमवर्क अपनाए जाने के बाद समायोजन के आधार पर 1.76 लाख करोड़ रुपये रहा। यह नया फ्रेमवर्क 27 अगस्‍त को बिमल जालान कमेटी द्वारा दिए गए सुझावों का एक हिस्‍सा है। सरकार को दी जाने वाली राशि में फरवरी में दिया गया 28,000 करोड़ रुपया भी शामिल है। 

    30 जून 2019 के अनुसार, RBI के पास 618.16 मेट्रिक टन सोना था जो 30 जून 2018 को 566.23 मेट्रिक टन था। इस साल के दौरान 51.93 मेट्रिक टन सोना और बढ़ा है। 

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  • रेत की रायल्टी चोरी पर कांग्रेस में मचा कोहराम

    रेत की रायल्टी चोरी पर कांग्रेस में मचा कोहराम

    भोपाल,28 अगस्त(प्रेस सूचना केन्द्र)। भ्रष्टाचार और अराजकता के चलते राज्य की मासिक आय में गिरावट ने कांग्रेस सरकार में सिरफुटौव्वल के हालात निर्मित कर दिए हैं। रेत की रायल्टी चोरी के मसले पर सामान्य प्रशासन मंत्री डाक्टर गोविंद सिंह ने जैसे ही सवाल खड़े किए पार्टी के भीतर से उनके खिलाफ बयानबाजी शुरु हो गई है। हालात पर काबू पाने के लिए मुख्यमंत्री कमलनाथ मंत्रियों को संभलकर बोलने की नसीहत दी है।

    कांग्रेस की अंतर्कलह तब उजागर हुई जब लहार से कांग्रेस के विधायक और सामान्य प्रशासन मंत्री डाक्टर गोविंद सिंह ने रेत के अवैध उत्खनन के लिए जनता से माफी मांगी। उन्होंने कहा कि मैं अपने समर्थकों के साथ भाजपा शासनकाल में रेत के अवैध उत्खनन के खिलाफ लड़ाई लड़ता रहा हूं। सत्ता में आने के बाद कांग्रेस के नेतागण जिस तरह से रेत का अवैध उत्खनन करके मंहगी रेत बेच रहे हैं इसके कारण मैं जनता से माफी मांगता हूं।उन्होंने कहा कि रेत माफिया के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे मेरे जैसे वरिष्ठ मंत्री तक की परवाह नहीं करते हैं।

    खनिज मंत्री प्रदीप जायसवाल ने कहा कि डाक्टर गोविंद सिंह वरिष्ठ राजनेता हैं। वे दतिया के प्रभारी मंत्री भी हैं वे अपने क्षेत्र में रेत का अवैध उत्खनन रोकने के लिए स्वतंत्र हैं। प्रशासन को उनके निर्देशों का पालन अवश्य करना पड़ेगा।

    जनसंपर्क और विधि विधायी कार्य मंत्री पीसी शर्मा ने कहा कि इस बार नदियों में इतनी अधिक रेत आई है कि पानी उतरते ही रेत का भंडार सामने आ जाएगा। रेत का ये भंडार जनता की आवश्यकता से बहुत अधिक है। आने वाले समय में रेत के खरीददार तक नहीं मिलेंगे। इस मुद्दे पर विवाद की कोई जरूरत नहीं है।

    पीडब्ल्यूडी मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने कहा कि डाक्टर गोविंद सिंह वरिष्ठ मंत्री हैं। ऐसा हो ही नहीं सकता कि अधिकारी उनकी बात नहीं सुनें। यदि मेरे विभाग में ये नौबत आ जाए कि अधिकारी मेरी बात नहीं सुनें तो मैं तो इस्तीफा दे दूंगा।

    कंप्यूटर बाबा ने कहा कि रेत के अवैध उत्खनन पर कमलनाथ सरकार ने सख्ती से रोक लगाई है। पिछले दिनों चंबल और सिंध नदी में जैसी बाढ़ आई है उसके चलते रेत का उत्खनन संभव नहीं है। सरकार रेत माफिया के विरुद्ध सख्त कार्रवाई करेगी और किसी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।

    भाजपा प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह ने कहा कि पैसों की बंदरबांट के चलते आज कांग्रेस की अंतर्कलह सामने आ गई है। सरकार ने चंदा लेकर ट्रांसफर पोस्टिंग की हैं। जो लोग भारी रिश्वत देकर मैदानी पोस्टिंग लेकर पहुंचे हैं उन्हें जनता के प्रति अपने उत्तरदायित्व की चिंता नहीं है। वे तो केवल अपनी लागत निकालने के लिए उगाही करने में जुटे हुए हैं।

    नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने मुख्यमंत्री कमलनाथ को पत्र लिखकर अवैध उत्खनन पर चिंता व्यक्त की है। वहीं कैलाश विजयवर्गीय ने कहा है कि डाक्टर गोविंद सिंह कह रहे हैं कि चंदा उगाही का खेल ऊपर से नीचे तक चल रहा है। उन्हें यह भी बताना चाहिए कि ऊपर का आशय श्यामला हिल्स से है या दस जनपथ से।

    राज्य की घटती आय को देखते हुए डाक्टर गोविंद सिंह की चिंता वाजिब है। निवृत्तमान शिवराज सिंह चौहान सरकार ने रेत उत्खनन की अनुमति देने का अधिकार पंचायतों को सौंप दिया था। इसके पहले 18 जिलों की 430 खदानों से रेत का उत्खनन खनिज विकास निगम की निगरानी में होता था शेष जिलों में ये काम खनिज विभाग करता था। तब तमाम शिकायतों के बावजूद प्रदेश को लगभग 700 करोड़ रुपयों की आय होती थी। पंचायतों को अधिकार दिए जाने के बाद रेत उत्खनन से होने वाली आय मात्र डेढ़ सौ करोड़ रुपए रह गई है।

    राज्य सरकार बारिश के सीजन में रेत उत्खनन पर रोक लगाती है। इस बार भी एक जुलाई से 30 सितंबर तक ये रोक प्रभावी है। इसके बावजूद रेत का उत्खनन और परिवहन जारी है। रेत माफिया पुराने परमिटों पर एकत्रित रेत को एक गोदाम से उठाकर दूसरे स्थान पर ले जाने का तर्क देकर रेत का अवैध कारोबार कर रहा है।

    डाक्टर गोविंद सिंह जिन भिंड, मुरैना, ग्वालियर और दतिया जिलों में रेत का अवैध उत्खनन होने की शिकायत कर रहे हैं उन जिलों में खनिज निगम के पास केवल चार खदानें हैं जबकि अन्य खदानें पंचायतों को समर्पित कर दी गईं हैं। पूरे प्रदेश में खनिज विकास निगम 48 खदानों से रेत का उत्खनन कर रहा है। बारिश की वजह से लगी रोक के चलते उन खदानों पर उत्खनन बंद है लेकिन आसपास की अन्य खदानें जिनकी नीलामी नहीं की जाती है उनसे रेत का अवैध उत्खनन हो रहा है। जब रेत उत्खनन के अधिकार खनिज विकास निगम के पास थे तब इन चार जिलों से बीस लाख घनमीटर रेत का उत्खनन किया जाता था। पंचायतों को अधिकार देने के बाद ये उत्खनन क्षमता मात्र आठ लाख घनमीटर बची है।

    रेत उत्खनन का अधिकार पंचायतों को दिए जाने के बाद दस्तावेजों पर रेत का उत्खनन भी घटा है और राज्य को होने वाली आय में भी भारी गिरावट आई है। इसके बावजूद आम नागरिकों को पहले से मंहगी रेत खरीदना पड़ रही है। वर्ष 2018-19 में पंचायतों ने अब तक लगभग सवा सौ करोड़ रुपए की रेत रायल्टी जुटाई है जबकि खनिज विकास निगम और खनिज निगम मिलकर इतने ही कार्यकाल में पांच सौ करोड़ रुपए रेत की रायल्टी के रूप में जुटाते थे। शासन ने रेत के दाम 125 रुपए प्रति घनमीटर तय किए हैं। फार्मूले के मुताबिक इसमें से 50 रुपए कलेक्टर फंड में और 50 रुपए पंचायतों को दिए जाते हैं। इसमें से 25 रुपए खनिज विकास निगम को दिया जाता है। इतनी सस्ती रेत खरीदने के बावजूद बाजार में रेत के दाम डेढ़ हजार रुपए से लेकर साढ़े तीन हजार रुपए घनमीटर तक पहुंच गए हैं। खनिज निगम नीलामी में रेत की रायल्टी कई बार 900 रुपए प्रति घनमीटर तक हासिल करता था। इसके बावजूद रेत के दाम खुले बाजार में नियंत्रित रहते थे।

    नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल,सिया और प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण जैसी संस्थाओं के दबाव के चलते शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने पत्थर को पीसकर रेत बनाने जैसा काम शुरु किया था लेकिन अब प्रदेश की रेत की जरूरतें केवल नदियों से बहकर आने वाली रेत से ही पूरी हो रहीं हैं।

    खनिज मंत्री प्रदीप जायसवाल ने नई खनिज नीति बनाने की घोषणा की थी। इसके मुताबिक रेत की नीलामी के लिए ग्लोबल टेंडर जारी किए जाने की तैयारी की गई है। अभी तक सरकार का जो ढर्रा है उसे देखते हुए कहा जा सकता कि एक अक्टूबर से जब रेत उत्खनन पर पाबंदी हटेगी तब तक टेंडर की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाएगी। लगभग सभी स्थानों पर पुलिस की अवैध वसूली की शिकायतें सामने आ रहीं हैं। रेत उत्खनन से रायल्टी जमा कराने की जवाबदारी खनिज विभाग और खनिज विकास निगम की है जबकि रेत रायल्टी की चोरी पर लगाम लगाने की जवाबदारी पुलिस को सौंपी गई है। पुलिस के अधिकारी कर्मचारी ही रेत की चोरी करवाते हैं और अवैध उत्खनन से खजाने को क्षति पहुंचाते हैं। रेत की रायल्टी जमा कराना उनकी जवाबदारी भी नहीं है इसलिए वे संबंधित पुलिस थानों में पोस्टिंग के लिए मनचाही कीमत देने तैयार रहते हैं।

    डाक्टर गोविंद सिंह की चिंता को देखते हुए यदि राज्य सरकार रेत उत्खनन से रायल्टी जुटाने का नया ढांचा तैयार करे तभी प्रदेश का खजाना भरा जा सकता है। रेत की जरूरत आम जनता को है और वह इसके लिए मंहगी कीमत चुका रही है। मकान बनाने के लिए उसे कई स्तर पर शासन को कर चुकाना पड़ता है। इसके बावजूद उसे रेत की जरूरत के लिए माफिया के सामने नाक रगड़नी पड़ती है। जरूरत है कि सरकार रेत रायल्टी जुटाने के लिए कारगर व्यवस्था बनाए और जनता को सस्ती रेत मुहैया कराए।

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  • चार हजार खाद्य नमूने उठाए केवल छह नकली निकले

    चार हजार खाद्य नमूने उठाए केवल छह नकली निकले

    भोपाल,27 अगस्त(प्रेस सूचना केन्द्र)। कमलनाथ सरकार ने जनता की सहानुभूति हासिल करने के लिए जो शुद्ध के लिए युद्ध चलाया उसका नतीजा टांय टांय फिस्स साबित होने लगा है। खोदा पहाड़ और निकली चुहिया जैसी कहावत इस अभियान को देखते हुए सटीक साबित हो रही है। प्रदेश भर में जिन 3840 व्यापारियों के प्रतिष्ठानों से खाद्य नमूने जब्त किए उनमें से मात्र छह नमूने प्रतिबंधित निकले हैं। जबकि सरकार ने प्रदेश में बिक रहे 70 फीसदी खाद्य पदार्थों के नकली होने का शोर मचाया था।

    अधिकृत सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार पिछले महीने 19 जुलाई से कथित तौर पर मिलावट के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के जो नतीजे सामने आए हैं उनमें मात्र छह नमूनों में प्रतिबंधित पदार्थ पाए गए हैं। आज 28 अगस्त तक जिन 723 नमूनों की जांच रिपोर्ट सामने आई है उनमें से 374नमूने मानक स्तर के पाए गए हैं। नमूनों में से 277 जांच में अवमानक निकले हैं। ब्रांड की कसौटी पर 27 को मिथ्या ब्रांड पाया गया है। यानि कि उन्हें बेचने के लिए ब्रांड नाम की अनुमति नहीं ली गई थी। 23 सैंपलों में मिलावट पाई गई है, यानि उनमें पाम आईल या अन्य खाद्यान्नों के अंश पाए गए हैं। सोलह नमूनों को असुरक्षित पाया गया है उनमें यूरिया या डिटर्जेंट पाऊडर जैसे पदार्थों के अंश पाए गए हैं।

    केवल छह नमूनों में प्रतिबंधित पदार्थों की मौजूदगी पता चली है।ये नमूने उन्हीं व्यापारियों से बरामद हुए हैं जिनके बारे में लंबे समय से नकली खाद्यान् बनाने की शिकायतें मिलती रहीं थीं। इन्हीं की आड़ में सरकार ने धड़ाधड़ छापेमारी करके पूरे प्रदेश में भय का वातावरण निर्मित कर दिया। बीते राखी के त्यौहार के दौरान या तो उपभोक्ताओं ने इन खाद्यान्नों का इस्तेमाल नहीं किया या फिर उन्होंने ब्रांडेड कंपनियों के खाद्य पदार्थ खरीदकर त्यौहार मनाया।

    गौरतलब है कि राज्य सरकार के पास इतने बड़े अभियान को चलाने लायक अमला नहीं है। फूड लेबोरेटरी में रेंडम सैंपल लेने और जांच करने की व्यवस्था है लेकिन एक साथ हजारों नमूनों की तत्काल जांच की सुविधा नहीं है। इसके बावजूद सरकार ने न केवल अभियान चलाकर व्यापारियों पर हल्ला बोला बल्कि कई जिलों के कलेक्टरों ने व्यापारियों के विरुद्ध रासुका के अंतर्गत कार्यवाही करके भय का माहौल बना दिया है।

    राखी के अवसर पर व्यापारियों ने ज्ञापन देकर अनुरोध किया था कि खादय नमूनों को दूकानों से लिया जाए। परिवहन के दौरान जो नमूने लिए जाते हैं उनसे विक्रेताओं की धरपकड़ नहीं हो पाती है। इससे न ही खाद्यान्न निर्माताओं की पहचान संभव हो पाती है। व्यापारियों का कहना है कि खाद्य अमले ने इसके बाद रणनीति बदली थी लेकिन इस पूरे अभियान से कच्चा धंधा करने वाले व्यापारियों को खासी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। जबकि ये अभियान ईमानदार व्यापारियों को परेशान किए बगैर भी चलाया जा सकता था।

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  • सिंधिया को कैसे स्वीकारे ठाकुरों से घिरी भाजपा

    सिंधिया को कैसे स्वीकारे ठाकुरों से घिरी भाजपा

    रामभुवन सिंह कुशवाह

    इसमें तो दो राय नहीं हो सकती कि कांग्रेस से ज्योतिरादित्य सिंधिया का शनैः शनैः मोह भंग होता जा रहा है पर वह अभी कितना जमीन पर दिखेगा इसका आज कुछ कहा नहीं जा सकता। यह तो निसंदेह सत्य है कि कोई कितना भी अपने को और दूसरों को अंधेरे में रखे राजशाही के दिन अब लद चुके हैं। स्वतंत्र भारत लोकतन्त्र का सात दशक तक का आनंद ले चुका है और अब जो पीढ़ी देश पर वर्चस्व स्थापित करती जा रही है वह आजाद भारत की है। राजा रानियों के किस्से अब कहानियों में तो अच्छे लगते हैं पर अतीत लौटकर तो नहीं आता।किन्तु जो वर्ग सत्ता और सुविधा में रहा हो वह सहज अपने अधिकार नहीं छोडना चाहता और भारतीय समाज भी मूर्तिपूजक श्रद्धावान रहा है इसलिए नए प्रकार की ‘सामंतशाही’ विकसित होने लगी है। क्योंकि लोकतंत्र ने वह आदर्श और अवसर तो नहीं दिया जिसकी आम जन को उम्मीद थी। सुखद और आशाजनक स्थिति यह भी है कि देश लोकतन्त्र से निराश कतई नहीं हैं क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अभ्युदय इसी व्यबस्था में होना संभव है।

    यहाँ मैं जिक्र सिंधिया राजघराने की कर रहा हूँ। उसकी मौजूदा पीढ़ी भारतीय राजनीति में अपेक्षाकृत अच्छा खासा दखल रखती है तो इसके प्रमुख रूप से दो कारण हैं। पहला इस खानदान में दो शख्शियतें ऐसी हुईं जिन्होंने उसे लोकतान्त्रिक बनाये रखा है। । पहली ‘माधो महाराज’ और दूसरी स्वर्गीय राजमाता विजया राजे सिंधिया । माधो महाराज अर्थात माधव राव सिंधिया का आशय वर्तमान पीढ़ी ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता और पूर्व केंद्रीय मंत्री माधव राव सिंधिया नहीं बल्कि उनके पितामह ( ज्योतिरदित्य सिंधिया के प्रपितामह ) महाराजा माधवराव सिंधिया , जिन्हें तत्कालीन ग्वालियर राज्य की जनता अत्यंत आदर से “ माधौ महाराज ” कहकर पुकारती थी । वे कितने उदार और दूरदर्शी थे यह इसी बात से जाना जा सकता है कि जब उनसे कोई सामान्यजन , किसान ‘अन्नदाता’ कहकर पुकारता था तब वे उसे बुरी तरह डाटते थे और कहा करते थे कि अन्नदाता मैं नहीं, आप लोग किसान हैं जो हमें अन्न देते हैं । दूसरे उन्होंने अपने राज्य में जिस तरह की कानून व्यवस्था की स्थापना की थी वह आदर्श थी। उन्होंने तत्कालीन जमींदारी जागीरदारी व्यवस्था को समन्वयकारी और जन हितैषी बनाया था। उस समय की “ जमींदार हितकारिणी सभा ” जनता के बीच आदर्श और लोकतान्त्रिक ढंग से कार्य करती थी और उसमें आमजन की समस्याएँ बड़ी सदाशयता से सुनी जातीं थीं। आज डॉ. भीमराव अंबेडकर को अनुसूचित वर्ग का संरक्षक और आरक्षण के व्यवस्था का जनक भले ही माना जाता हो परंतु आरक्षण की अवधारणा सबसे पहले इन्हीं माधव राव सिंधिया ने दी थी। जनता के “माधो महाराज” पहले ऐसे शासक थे जिन्होने तत्कालीन जमीदारों और जागीरदारों को सलाह दी थी कि आर्थिक और सामाजिक रूप से दबे कुचले लोगों को नौकरियों में आरक्षण दिया जावे और उनका संरक्षण किया जावे। मैंने स्वयं उस समय की बहुचर्चित पुस्तक “जमींदार हितकारिणी” को पढ़ा है उस पर शोध किया है। आज भी जो लोग इस विषय में शोध करना चाहें तो राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद उस पुस्तक को पढ़ सकते हैं।

    दूसरा व्यक्तित्व था राजमाता विजया राजे सिंधिया जिनका अभ्युदय स्वतंत्र भारत में हुआ । अत्यंत लोकप्रिय, संघर्षशील , अन्याय के विरुद्ध अनूठी योद्धा जिन्होंने तत्कालीन कांग्रेस की तानाशाही को उखाड़ फैका था और इंन्दिरा गांधी के आपातकाल का जमकर विरोध किया । वे इमरजेंसी में मीसा में निरुद्ध रहीं और दो बार उनके पक्ष में स्पष्ट बहुमत होने के बाद भी मुख्यमंत्री पद को ठुकरा कर मध्यप्रदेश में आदर्श और ईमानदार सुशासन देने का प्रयास किया। उन्होंने ही भारतीय जनसंघ , जनता पार्टी और भारतीय जनता पार्टी को इस काबिल बनाया कि आज वह भारत की एकमात्र पार्टी बन गई है जो कांग्रेस को सत्ताच्युत कर सकी। उस पर देश ने भरोसा भी दिखाया है।

    इसके अलावा भी कुछ कारण और भी है कि जिससे ग्वालियर राजघराना और कांग्रेस का सत्तारूढ़ खानदान में लंबे दौर तक राजनीतिक संबंध नहीं बनाए रखे जा सकते। ग्वालियर राज्य के शासक कट्टर हिन्दू विचारधारा के रहे हैं। मुस्लिम और ईसाई उनके स्वाभाविक शत्रु रहे हैं और उनके पुरखों ने लंबे समय तक उनसे युद्ध लड़ते रहे हैं। सिंधिया अंग्रेजों के अधीन अवश्य रहे हैं किन्तु उन्हें कभी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में भी सिंधिया दोनों पक्षों , अंग्रेज़ शासकों और स्वतन्त्रता सैनानियों में सदैव बैलेन्स करते रहे । इस कारण दोनों में भ्रम की स्थिति भी बनी रही । यह दूसरी बात थी कि सिंधिया ने अंततः अंग्रेजों का साथ दिया और आजादी के लिए संघर्ष कर रहे लोगों को क्रूरतापूर्वक दबाया भी, किन्तु लोग समझते हैं कि यह उनकी मजबूरी थी । तत्कालीन ग्वालियर के महाराजा ने अंग्रेज़ शासकों के अधीन रहते हुये महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के साथ भी संबंध बनाए रखे । उन्होंने अपने क्षेत्र में स्वतन्त्रता सैनानियों को संरक्षण दिया। ग्वालियर राज्य की सीमाएं मध्यप्रान्त (सेंट्रलप्रोविन्स) जहां अंग्रेजों का सीधा शासन था, से मिलतीं थीं इसलिए वहाँ के क्रांतिकारियों और तथाकथित विद्रोहियों को खुला संरक्षण ग्वालियर राज्य में मिलता था। सेंट्रलप्रोविन्स के ‘बागी’ बरदात करके भिंड , दतिया और ग्वालियर के कतिपय ग्रामों में संरक्षण पाते थे और ग्वालियर के बागी उस क्षेत्र में जाकर लूट खसोट करते थे यह तथ्य ऐतिहासिक हैं । लुटेरे पिंडरियों की ग्वालियर से दोस्ती और संरक्षण की खबरें तो लंदन तक पहुँचती रहीं थी। प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम 1857 के समय सेंट्रलप्रोविन्स का दक्षिणी जिला इटावा के कलेक्टर लॉर्ड ए ओ हयूम थे ( जो बाद में राष्ट्रीय कांग्रेस महासभा के संस्थापक बनें ) जिन्होने ब्रिटिश वाइसराय और इंग्लेन्ड में कंपनी हुकूमत से ग्वालियर के तत्कालीन महाराजा की शिकायत की थी । बाद में महाराजा को सत्ता से हटाने की ‘धमकी’ दी गई । तब कहीं तत्कालीन महाराजा ने हयूम के साथ एक सप्ताह भिंड में पड़ाव डालकर विद्रोहियों के खिलाफ अभियान चलाने को सहमत हुये। कथित विद्रोहियों उन्हें सहायता देने के आरोप में कई अधिकारियों को नौकरी से हटाया गया। यही नहीं 1857 के आंदोलन के विफल होने के बाद लॉर्ड हयूम के नेतृत्व में रियासत की सेना ने सीमांत गाँव में अत्याचार भी बहुत किए गए ।

    यह भी एतिहासिक तथ्य है कि 1857 के स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख हीरो तांत्या टोपे के ग्वालियर की सेना में आना जाना था। वे कई दिनों सेना के मराठा अधिकारियों के यहाँ ही रुकते थे और झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई ग्वालियर के किले में कब्जा करने से पूर्व कई दिनों मुरार छाबनी में दल बल सहित रुकी रहीं थी। भारत के स्वतंत्र हो जाने के बाद सबसे बड़ी रियासत के महाराजा सिंधिया ने सबसे पहले विलयपत्र पर हस्ताक्षर किए थे और सबसे अधिक खजाना सौंपा था। परिणामस्वरूप उन्हें मध्यभारत प्रांत का राज्यप्रमुख भी बनाया गया था।
    ग्वालियर के महाराजा अन्य देशी रियासतों की तरह कुछ समय स्वतंत्र पार्टी के सक्रिय सदस्य भी बनें किन्तु उनकी रुझान हिन्दू महासभा की ओर अधिक थी और ग्वालियर की हिन्दू महासभा उस समय सबसे सशक्त इकाई के रूप में जानी जाती थी जिसके परिणाम स्वरूप पहले चुनाव में कांग्रेस की वांछित सफलता न मिलने पर स्वयं प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ग्वालियर आए थे और उन्होंने तत्कालीन राज्यप्रमुख महाराजा जीवाजी राव सिंधिया से उनकी पत्नी महारानी विजयराजे सिंधिया को कांग्रेस के लिए मांगा था। महाराजा की सहमति प्राप्त होने पर महारानी सिंधिया कांग्रेस में शामिल हुईं और कांग्रेस की सांसद बनीं । इसके बाद ग्वालियर क्षेत्र में कांग्रेस के खाते खुलने लगे किन्तु ग्वालियर कोई जनता मूल रूप से हिन्दू महासभाई ही बनी रही जो समय के साथ भारतीय जनसंघ की समर्थक बन गईं।

    सन 1956 में सभी रियासतों और राज्यों को मिलाकर मध्यप्रदेश बनाया गया । राजमाता सिंधिया कांग्रेसी संसद होने के नाते उसमें काफी प्रभाव रखतीं थीं किन्तु 1967 में पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र और उनके बीच में तब ठन गई। जब मिश्र ने राजमाता से मिलने से मना कर दिया।इसका प्रमुख कारण राजमाता सिंधिया ने बस्तर के महाराजा प्रवीणचंद्र भंजदेव की पुलिस द्वारा निर्मम हत्या की आलोचना की थी। राजमाता सिंधिया द्वारिका प्रसाद मिश्रा से बुरी तरह नाराज हो गईं और उन्होंने उन्हें हटाने का संकल्प लिया। परिणामस्वरूप प्रदेश और देश में पहली संविद सरकार बनीं । राजमाता चाहती तो मुख्यमंत्री बन सकतीं थीं किन्तु उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बजाय सत्तासूत्र अपने हाथ में रखना ही उचित समझा। फिर 1971 के चुनाव हुये राजमाता सिंधिया ने भारतीय जनसंघ को समर्थन दिया और स्वयं भी जनसंघ के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ा और जीत गईं।उस समय 1971 में इन्दिरा गांधी की बेंक राष्ट्रीयकरण और गरीबी हटाओ नारे के कारण देश भर में प्रबल हवा चल रही थी किन्तु मध्यभारत क्षेत्र में सभी सीटें भारतीय जनसंघ के प्रत्याशी जीते और राजमाता सिंधिया की ख्याति राष्ट्रव्यापी होकर जनसंघ के लिए पूरे देश में दौरा करने लगीं । 1975 में इन्दिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोप दिया और राजमाता सिंधिया को गिरफ्तार कर लिया गया। मीसा में गिरफ्तार तो उनके पुत्र महाराजा माधवराव सिंधिया भी हुये किन्तु उन्हें पहले दिन ही पेरोल दे दी गई। कहा जाता है कि कांग्रेस की यह ‘घरभेदू’ नीति के कारण माँ और पुत्र में दूरियाँ बढ़ गईं तो महाराजा माधव राव सिंधिया के समर्थक मानते हैं कि महाराजा अपनी माँ की सहमति लेकर ही कांग्रेस में शामिल हुये थे। कुछ भी हो उन दोनों में दूरियाँ बढ़तीं रहीं और माधवराव सिंधिया के पाँव कांग्रेस में जमते रहे। किन्तु इन्दिरा गांधी बहुत चालक थीं उन्होने माधव राव जी को राज्यमंत्री बनाया बाद में वे केंद्र में उन्हें केबिनेटमंत्री बनया गया। इधर राजमाता सिंधिया जनता पार्टी की संस्थापक नेत्री बन कर और फिर भारतीय जनता पार्टी को पूरे देश में सर्वस्वीकार्य बनने में जुटीं रहीं। भारतीय जनता पार्टी ने उनकी सार्वजनिक सेवाओं और संघर्ष को सदैव सम्मान दिया। उनकी पुत्री वसुंधरा राजे राजस्थान की मुख्यमंत्री , उनकी दूसरी पुत्री यशोधरा राजे , भाई ध्यानेन्द्र सिंह ,भाभी श्रीमती माया सिंह मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री बनीं। इसके विपरीत कांग्रेस में माधव राव सिंधिया को वह सम्मान कभी नहीं मिला जिसके वे अधिकारी थे। इसका प्रमुख कारण ग्वालियर रियासत के परंपरागत प्रतिद्वंदी राघौगढ़ के राजा दिग्विजय रहे जो बाद में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने।

    राजशाही का अंत होने के बाद भी माधव राव सिंधिया गुना से जीतते रहे । उन्होंने 1971 में पहली बार जनसंघ के टिकट चुनाव जीता तब वे महज 26 साल के थे। जिसके बाद वे एक भी चुनाव नहीं हारे। वे लगातार नौ बार लोकसभा के सांसद रहे। 1984 में उन्होंने भाजपा के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी को ग्वालियर से चुनाव हराया। 30 सितंबर, 2001 के दिन माधवराव सिंधिया की एक हवाई हादसे में मृत्यु हो गई । तब उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना से सांसद बनें। इस दर्दनाक हादसे ने ज्योतिरादित्य सिंधिया की जिंदगी का रुख ही बदल दिया। स्टेनफोर्ड हार्वर्ड से पढ़कर लौटे ज्योतिरादित्य को विरासत के साथ अपने पिता की राजनीतिक विरासत भी संभालनी पड़ी। वे गुना से सांसद भी रहे हैं। इनकी गिनती सबसे युवा सांसदों में भी होती रही है। उनकी शादी नेपाल के राजघराने की की बेटी और उनकी बेटी चित्रांगदा की शादी जम्मू-कश्मीर और जमवाल घराने के युवराज विक्रमादित्य सिंह के साथ हुई। राजमाता सिंधिया और उनकी संतानों में मूल अंतर व्यवहार का है। राजमाता जी सदैव स्वयं को राजकीय गरिमा से बचतीं रहीं हैं वही चाहें माधव राव सिंधिया हों या उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया राजकीय गरिमा ने स्वयं को कभी भी उससे मुक्त होने का प्रयास नहीं किया और उनकी पुत्रियाँ भी लोकप्रिय होने के बाद भी ‘एरोगेन्ट’ के आरोप से कभी भी मुक्त नहीं हो पाईं।

    अभी हाल के 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत तो नहीं मिला फिर भी सपा और बसपा की एकतरफा समर्थन देने से सरकार कांग्रेस की बन गई। ग्वालियर क्षेत्र में सबसे अधिक सीटें कांग्रेस को मिलने से मुख्यमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का बनना तय था किन्तु दिग्विजय सिंह ने कमलनाथ का साथ दे दिया और ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक मात्र प्रदर्शन करते रह गए।इसके बाद प्रदेश में गुटबाजी चरम पर रही। माधव राव सिंधिया की उपेक्षा इतनी ज्यादा हुई कि उन्हें एक अदद सरकारी मकान भी नहीं दिया गया। वे जो मकान देखते उसी को किसी अन्य नेता के नाम कर दिया जाता। जब लोकसभा चुनाव हुये तो उन्हें षड्यंत्र पूर्वक हरा भी दिया गया। जब राहुल गांधी ने हार की ज़िम्मेदारी लेकर इस्तीफा दिया तो हवा उड़ा दी गई कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया है। सच्चाई ये थी कि राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना तो दूर उन्हें प्रदेश का अध्यक्ष भी नहीं बनाया गया।

    अब बारी ज्योतिरादित्य सिंधिया की थी । उन्होने भी कांग्रेस हाइकामन को राजनीतिक झटका देते हुये अनुच्छेद 370 की कश्मीर से समाप्ति का समर्थन कर दिया। अभी हल में वे ऐसा कोई अवसर नहीं चूकते जिसमें से यह धारणा न बने कि उनका कांग्रेस से मोहभंग हो रहा है। इधर भाजपा ने भी इस भ्रम को बढ़ाने में सहायता की है। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने रक्षाबंधन के मौके पर भाई माधवराव को याद किया और एक पुराना फोटो शेयर किया। एक भावुक संदेश में राजे ने लिखा कि उनके जीवन में भाई माधवराव जी की कमी हमेशा खटकती रहेगी।इस बीच 24 अगस्त को पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली की मृत्यु के अवसर पर ज्योतिरादित्य सिंधिया उनके घर अंतिम दर्शन करने और परिवार को ढाढ़स बंधाने माँ, महारानी , पुत्री और पुत्रवधु के साथ पहुँच गए। जिसके कारण यह धारणा बनती नजर आ रही है कि हो न हो ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा में शामिल हो सकते हैं ।

    भाजपा और सिंधिया की सम्बन्धों को डोर बहुत पुरानी है। भाजपा भी मानती है कि सिंधिया राजघराने के नेताओं और कांग्रेस के नेताओं में एक मूल अंतर है कि वे कम से कम अन्य कांग्रेसियों कि तरह बेईमान और भ्रष्ट नहीं हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी राहुल गांधी को बहुत निकट से देखा है । उन्हें निश्चित ही लगता होगा कि जो अपनी बहिन के लिए स्वस्थ और अनुकूल विचार नहीं रखता वह उनके लिए क्या और कितना सुविधा जनक होगा ? ज्योतिरादित्य सिंधिया यह भी भलीभांति मानते हैं कि भाजपा नेतृत्व का व्यवहार सदैव ‘सिंधियाज़’ के साथ सदाशयी और अनुकूलता का रहा है।

    #Jyotiraditya-scindhia,#Imarti-Devi, #Congress,#Ram-Bhuvan-Singh-Kushvah

  • ई टेंडर मामला हवा हवाई, ब्रह्मे को मिली जमानत

    ई टेंडर मामला हवा हवाई, ब्रह्मे को मिली जमानत

    भोपाल,25अगस्त(प्रेस सूचना केन्द्र)। पूर्व मंत्री डॉ.नरोत्तम मिश्रा की ललकार को अब हाईकोर्ट का भी संबल मिल गया है। बहुचर्चित ई टेंडर घोटाला अदालत की देहरी पर हवा हवाई साबित होने लगा है।साक्ष्यों के परीक्षण के बाद हाईकोर्ट ने प्रमुख आरोपी नंदकुमार ब्रह्मे की जमानत मंजूर कर ली है। इसके बाद अन्य आरोपियों के भी बच निकलने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। सत्तासीन कांग्रेस की ओर से प्रमुख विपक्षी दल को घेरने के लिए आरोप लगाए जा रहे थे अब उसके अरमानों पर पानी फिरता नजर आने लगा है।

    जस्टिस राजीव कुमार दुबे की सिंगल बेंच ने ब्रह्मे की जमानत याचिका मंजूर कर ली है। नंद किशोर ब्रह्मे मध्यप्रदेश स्टेट इलेक्ट्रानिक्स डेवलपमेंट कार्पोरेशन भोपाल में ओएसडी के पद पर तैनात थे। उन्हें 2012 में ई टेंडर प्रक्रिया का नोडल अधिकारी बनाया गया था। उन पर आरोप है कि उन्होंने ई टेंडर प्रक्रिया में घालमेल करके कई ठेकेदारों को लाभ पहुंचाया। वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल खरे और अधिवक्ता अभिनव श्रीवास्तव ने इस मामले की पैरवी की। उन्होंने अदालत को बताया कि टेंडर जारी करने की प्रक्रिया से ब्रह्मे का कोई संबंध नहीं था।

    मध्य प्रदेश पुलिस आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (ईओडब्ल्यू) ने बीजेपी शासन के दौरान हुए कथित ई-टेंडर घोटाले की जांच के सिलसिले में पूर्व मंत्री और बीजेपी नेता नरोत्तम मिश्रा के दो पूर्व निजी सचिवों को भी गिरफ्तार किया था. ईओडब्ल्यू की टीम ने इन दो कर्मचारियों के ठिकानों की तलाशी भी ली थी,जिसके आधार पर कांग्रेस खेमे से पूर्ववर्ती भाजपा सरकार पर ई टेंडर घोटाला करने के आरोप लगाए जाने लगे थे।इसके जवाब में पूर्व मंत्री मिश्रा ने कमलनाथ सरकार को सबूतों के साथ सामने आने की चुनौती देते हुए कहा कि मामले में केवल छोटी मछलियों को निशाना बनाया जा रहा है.

    ईओडब्ल्यू के महानिदेशक के एन तिवारी कहते रहे हैं कि दो सरकारी अधिकारियों वीरेंद्र पांडे और नीलेश अवस्थी (पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्र के दोनों पूर्व सचिव) को ई-टेंडरिंग प्रक्रिया में अनियमितता के मामले में गिरफ्तार करके हमने बड़ी कड़ी जोड़ ली है। पांडे नरोत्तम मिश्रा के सहायक रहे हैं जबकि नीलेश अवस्थी लॉ विभाग का चपरासी है और मिश्रा के बंगले पर फोन सुनने की ड्यूटी पर तैनात था।

    ईओडब्ल्यू की कार्रवाई पर पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने इसे राजनीति से प्रेरित कार्रवाई करार दिया. उन्होंने कहा, ”जब ई-टेंडरिंग प्रक्रिया में छेड़छाड़ की बात सामने आई, तो हमने जांच का आदेश दिया था. इसके विपरीत वर्तमान सरकार ने उन एजेंसियों को ठेके दिये हैं जिनके खिलाफ पिछली सरकार ने इस अनियमितताओं में जांच का आदेश दिया था.” मिश्रा ने कहा, ”मैं कमलनाथ को चुनौती देता हूं कि वे तथ्यों और प्रमाणों के साथ आगे आएं. जिसमें हमें छेड़छाड़ की शिकायतें मिलीं थीं वे सभी टेंडर हमने रद्द कर दिये थे. न तो काम पूरा हुआ, न ही उन्हें कोई भुगतान किया गया.”

    नरोत्तम मिश्रा का कहना है कि ई टेंडर को मंजूरी देने वाली समितियों में प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव और सचिव स्तर के अधिकारी शामिल होते हैं. यह जानने के बावजूद सरकार ने छोटी मछलियों को पकड़ने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार इस मामले में फिजूल मेहनत कर रही है, थोड़े समय बाद वह जान जाएगी कि भाजपा सरकार ने कितनी ईमानदारी से जनहित के कार्य किए थे। मालूम हो कि इस साल 10 अप्रैल को ईओडब्ल्यू ने 3,000 करोड़ रुपये के ई-टेंडर घोटाले में सात कंपनियों, सरकारी विभागों और अन्य (अज्ञात) राजनेताओं सहित अधिकारियों के खिलाफ मामले दर्ज किए थे.

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  • कांग्रेस पर भारी मीसाबंदियों से वैमनस्य का सौदा

    कांग्रेस पर भारी मीसाबंदियों से वैमनस्य का सौदा

    मुख्यमंत्री कमलनाथ मध्यप्रदेश में श्रीमती इंदिरा गांधी की राजनीति की नकल करके अपनी सत्ता बचाने का प्रयास कर रहे हैं। बार बार वे केन्द्र सरकार के आर्थिक सुधारों को लागू करने का आश्वासन देते हैं लेकिन उसकी आड़ में राजनैतिक विरोधियों को कुचलने वाली राजनीति कर रहे हैं। वास्तव में वे किसी मूडी शासक की तरह बर्ताव कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी आम नागरिकों पर लांछन लगाने का काम कर रही है। मध्यप्रदेश में मिलावट को लेकर जो अभियान चलाया जा रहा है उसके बाद मिलावट के मामले घटने के बजाए बढ़ने लगे हैं। सरकार व्यापारियों पर रासुका लगा रही है इसके बावजूद उत्पादकता न बढ़ने से आई मंदी से जूझते लोग धड़ल्ले से मिलावट कर रहे हैं। कमोबेश ऐसी ही तस्वीर श्रीमती इंदिरागांधी के शासनकाल में भी देखी गई थी। उन्होंने आंतरिक सुरक्षा अधिनियम ( मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्यूरिटी एक्ट ) लागू करके मिलावटखोरों,जमाखोरों के विरुद्ध अभियान चलाया था। इसकी आड़ में तमाम राजनैतिक विरोधियों को भी जेलों में ठूंस दिया गया था। आज कमलनाथ सरकार आंदोलन करने वाले नेताओं पर जुर्माना लगाकार कमोबेश वही संदेश देने का प्रयास कर रही है। मीसा बंदियों के लिए चालू की गई पेंशन योजना को भी बंद करके कमलनाथ अपने राजनैतिक वैमनस्य का परिचय पहले ही दे चुके हैं।

    हाल ही में दो दिन पहले जब मुख्यमंत्री कमलनाथ को दिल्ली दरबार में हाजिरी देनी थी तब उनके मीडिया सलाहकारों ने खबर फैलाई कि सरकार ने मीसाबंदियों की पेंशन फिर शुरु कर दी है। शुरुआती कदम के रूप में दो हजार पेंशनरों को एरियर्स के साथ भुगतान कर दिया गया है। हालांकि इससे जुडा़ कोई आदेश जारी नहीं किया गया। सत्ता संभालते ही कमलनाथ ने पहले मीसाबंदियों की पेंशन बंद करने का आदेश दिया था बाद में सोच विचारकर कहा कि कुछ फर्जी लोग पेंशन ले रहे हैं इसलिए सरकार जांच के बाद पेंशन जारी करेगी।

    दरअसल पिछली भाजपा सरकार ने मीसा बंदी के दौरान जेल में निरुद्ध किए गए राजनीतिक विरोधियों को लोकतंत्र सेनानी बताते हुए पेंशन शुरु की थी। ये पेंशन स्वतंत्रता सेनानियों की तर्ज पर जारी की गई। विधानसभा में पारित मध्यप्रदेश लोकतंत्र सेनानी सम्मान नियम 2018 के अंतर्गत ऐसे लोकतंत्र सेनानी जो एक माह से कम कालावधि के लिए निरुद्ध रहे उन्हें 8000 रुपए और जो एक माह या एक माह से अधिक समय तक निरुद्ध रहे उन्हें 25000 रुपए प्रतिमाह की दर से सम्मान निधि की पात्रता प्रदान की गई। सरकार की ओर से स्वाधीनता सेनानियों को भी पच्चीस हजार रुपए प्रतिमाह की पेंशन दी जाती है।

    मीसाबंदी पेंशन के हकदार लोगों में भाजपा के साथ साथ कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों के जन प्रतिनिधि भी शामिल हैं। सरकार ने अपने बजट में वर्ष 2018-19 के लिए 40 करोड़ रुपए का प्रावधान भी किया है। पिछली सरकार ने वर्ष 2017 में सभी कलेक्टरों को परिपत्र जारी करके कहा था कि दिवंगत लोकतंत्र सेनानियों की पत्नियों या पतियों को सम्मान निधि का अंतरण एक महीने में हो जाना चाहिए।इसके बाजवूद सत्ता में आते ही कमलनाथ सरकार ने तमाम लोकतंत्र सेनानियों की पेंशन पर रोक लगा दी। सरकार के इस फैसले को हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में चुनौती भी दी गई। जिसमें कहा गया कि विधानसभा में पारित सरकार के फैसलो को कोई व्यक्ति केवल आदेश देकर खारिज नहीं कर सकता।जब 18 सितंबर 2018 को इसका प्रकाशन राजपत्र में भी कर दिया गया तो कोई व्यक्ति इसे सदन की अनुमति लिए बगैर कैसे खारिज कर सकता है।

    लोकतंत्र सेनानी संघ के अध्यक्ष कैलाश सोनी का कहना है कि सरकार ने जब जांच कराने का फैसला लिया तो किसी ने इस पर आपत्ति नहीं की। कुछ ऐसे मामलों का हवाला दिया गया था कि पेंशन गलत लोग भी दे रहे हैं। इसके बावजूद जांच में एक भी व्यक्ति को गलत पेंशन दिए जाने का मामला सामने नहीं आया। इसके बावजूद सरकार पिछले नौ महीनों से पेंशन पर लोक लगाए हुए थी। उन्होंने सभी पेंशनधारियों को पूर्ववत भुगतान जारी रखने की मांग भी की है।

    वास्तव में भाजपा सरकार ने जिन चार हजार लोकतंत्र सेनानियों को पेंशन चालू की थी उसका आधार जेलर से प्राप्त प्रमाण पत्र था। जिसमें जेल रिकार्ड के हवाले से निरुद्ध व्यक्ति के विरुद्ध दर्ज अपराध और जेल में बिताया उसका कार्यकाल प्रमाणित किया गया था। व्यक्ति या उसके परिजनों के जीवित होने का प्रमाणपत्र जांच करना विभागीय प्रक्रिया में पहले से ही शामिल है। इस लिहाज से पेंशन पर रोक लगाए जाने की जरूरत नहीं थी। इसके बावजूद सरकार ने पेंशन बंद कर दी। अब जबकि राज्य में वित्तीय संसाधनों की कमी है और राज्य संचालन के लिए केन्द्र से आर्थिक मदद की जरूरत महसूस हो रही है तब कमलनाथ सरकार ने पेंशन चालू करके केन्द्र सरकार को खुश करने का दांव खेला है।

    पिछले नौ महीनों से पेंशन के लिए भागदौड़ करते रहे पेंशनधारकों का कहना है कि सरकार ने पेंशन बंद करने को लेकर अस्पष्ट नीति बना रखी है। कई जिलों के कलेक्टर मनचाहे तरीके से पेंशन जारी कर रहे हैं जबकि शेष प्रदेश में पेंशन बंद कर दी गई है। इसी तरह कांग्रेस से जुड़े मीसाबंदी पेंशन प्राप्त कर रहे हैं जबकि अन्य राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों को पेंशन के लिए भटाकाया जा रहा है। मीसाबंदी पेंशन को बंद करने के पीछे कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति भी एक बड़ा मुद्दा रही है। कमलनाथ इस पेंशन को बंद करके इंदिरागांधी के प्रति अपनी आस्थाओं का प्रदर्शन करना चाह रहे हैं। यही वजह है कि कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी हों या राहुल गांधी और प्रियंका सभी कमलनाथ को अपना प्रतिनिधि मानते हैं। जबकि राहुल गांधी के करीबी होने के बावजूद ज्योतिरादित्य सिंधिया इसके बाद आते हैं। प्रदेश की ठाकुर लाबी इस गणित में सबसे पीछे आती है। ऐसे में कमलनाथ मीसाबंदी पेंशन को बंद करके अपनी पार्टी में राजनीतिक संतुलन साधने का प्रयास भी कर रहे हैं।

    इस सबके बावजूद देश पहले ही श्रीमती इंदिरा गांधी की राजनीति का हश्र देख चुका है। एमपी में उस राजनीति का दुहराव राज्य के विकास में बड़ा रोड़ा बन रहा है।जिस तरह से वैमनस्य की राजनीति करके अब कमलनाथ मीसाबंदी का समर्थन करते नजर आ रहे हैं उससे साफ है कि जनता के बीच उमड़ता आक्रोश जल्दी ही सरकार को भारी पड़ने वाला है। सत्तर अस्सी के दशक में तो कांग्रेस ही सबसे प्रमुख राजनीतिक दल होता था। वक्त के साथ कांग्रेस की राजनीति अपनी लोकप्रियता खो चुकी है। ऐसे में कमलनाथ की वैमनस्य भरी मूडी राजनीति भाजपा के लिए मददगार ही साबित होगी।

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  • महाकाल माफिया को रिश्वत,जनता को मंहगी बिजली

    महाकाल माफिया को रिश्वत,जनता को मंहगी बिजली

    मुख्यमंत्री कमलनाथ इन दिनों सत्ता माफिया से किए गए अपने चुनावी वादों को पूरा करने में जुटे हुए हैं। उनके नेतृत्व वाली कांग्रेस ने जनता से जो वादे किए थे वे तो बेअसर रहे लेकिन जिन गिरोहों को उन्होंने इनाम देने के वादे किए थे उन्हें पूरा करने के लिए वे राज्य का खजाना लुटाने में जुटे हुए हैं। बात बात में खजाना खाली है का शोर मचाने वाले कमलनाथ ने हाल ही में उज्जैन पहुंचकर तीन सौ करोड़ रुपए के विकास कार्यों की घोषणा कर डाली। जबकि शिवराज सिंह चौहान सरकार ने सिंहस्थ के दौरान करोड़ों रुपयों के विकास कार्य उज्जैन में कराए थे। उन निर्माण कार्यों में भारी घोटाले के आरोप भी लगे थे। चुनाव के दौरान कांग्रेस ने भी सिंहस्थ घोटाले का शोर मचाया था।भाजपा के हाथों से बजट लूटने का काम जिस महाकाल माफिया ने किया था सत्ता में आने के बाद कमलनाथ फिर उसी महाकाल माफिया के सामने साष्टांग लेट गए हैं। इस माफिया का भगवान महाकाल से कोई लेना देना नहीं है। इसके विपरीत जनता को लूटने के लिए बिजली के दाम अनाप शनाप बढ़ा दिए गए हैं।

    मध्यप्रदेश का महाकाल माफिया लंबे समय से राज्य की सरकारों को ब्लैकमेल करता रहा है। कमोबेश हर सरकार इस गिरोह के हाथों ब्लैकमेल होती रही है। इस गिरोह का काम नेताओं, आला अफसरों, पत्रकारों, बैंकरों, न्यायाधीशों की नियुक्तियां कराना और फिर उन्हें अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करना रहा है। चुनावों के दौरा ये गिरोह अपने अनुकूल सरकार बनाने के लिए तमाम रणनीतियां इस्तेमाल करता है। उज्जैन के कई अखाड़ों से इस गिरोह का संचालन किया जाता है। राज्य की सरकार को धमकाने के लिए गिरोह के सदस्य हमेशा प्रचारित करते रहते हैं कि कोई मुख्यमंत्री उज्जैन में रात्रि निवास नहीं कर सकता क्योंकि महाकाल ही राजा हैं। हर सिंहस्थ के बाद या तो मुख्यमंत्री हट जाता है या फिर सरकार बदल जाती है। इस किंवदंती को सच साबित करने के लिए देश भर में फैले माफिया से जुड़े सदस्य बयान देकर माहौल बनाते रहते हैं।

    महाकाल का इतिहास देखें तो वर्तमान मंदिर को श्रीमान पेशवा बाजी राव और छत्रपति शाहू महाराज के जनरल श्रीमान रानाजिराव शिंदे महाराज ने 1736 में बनवाया था। इसके बाद श्रीनाथ महादजी शिंदे महाराज और श्रीमान महारानी बायजाबाई राजे शिंदे ने इसमें कई बदलाव और मरम्मत भी करवायी थी।महाराजा श्रीमंत जयाजिराव साहेब शिंदे आलीजाह बहादुर के समय में 1886 तक, ग्वालियर रियासत के बहुत से कार्यक्रमों को इस मंदिर में ही आयोजित किया जाता था।तभी से सिंधिया राजघराने की भूमिका महाकाल मंदिर के संचालन में प्रमुख तौर पर रहती आई है।

    यही वजह है कि पिछले कई दिनों से राज्य में महाकाल माफिया ने ये कहानी उड़ाई कि ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के विद्रोह करके भाजपा में जा सकते हैं और भाजपा उनके नेतृत्व में कमलनाथ सरकार को गिराकर सत्तासीन हो जाएगी। इस कहानी को बल देने के लिए बाकायदा भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह से ज्योतिरादित्य सिंधिया की मुलाकात की घटना प्रचारित की गई।कहा गया कि सिंधिया अपने समर्थकों के साथ भाजपा को लेकर सरकार बनाने जा रहे हैं। भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का वादा किया है। जब जनता के बीच ये कहानी सुनी सुनाई जाने लगी तो कमलनाथ को अपनी कुर्सी पर खतरा मंडराता दिखा। इस दौरान ज्योतिरादित्य सिंधिया खामोश रहे और उन्होंने अपने पक्ष में चलती इस मुहिम का भरपूर आनंद लिया। लीपापोती करने पहुंचे कमलनाथ ने सार्वजनिक तौर पर महाकाल के आसपास विकास कार्यों के लिए तीन सौ करोड़ रुपए की योजना घोषित कर डाली। गौरतलब है कि जब प्रदेश का खजाना कथित तौर पर खाली है तब कमलनाथ को प्रदेश के विकास की कोई चिंता नहीं है और वे महाकाल माफिया के आगे घुटने टेककर खड़े हो गए हैं।

    दरअसल पिछले विधानसभा चुनावों में इसी महाकाल माफिया ने सपाक्स पार्टी को झाड़ पोंछकर मैदान में उतारा था। तब ये अफवाह उड़ाई गई कि भाजपा सवर्णों के खिलाफ है। महाकाल माफिया के कारिंदों ने प्रदेश के सीधे साधे ब्राह्मणों को उकसाया कि वे आरक्षण के खिलाफ सवर्ण समाज पार्टी को वोट दें। इस षड़यंत्र का नतीजा ये रहा कि भाजपा का समर्पित वोटर पार्टी से खफा हो गया और वोट को बर्बाद होने से बचाने के लिए उसने कांग्रेस को अपना समर्थन दिया।अपने इस षड़यंत्र को हवा देने के लिए महाकाल माफिया ने शिवराज सिंह चौहान से वह बयान दिलवाया जिसमें उन्होंने कहा था कि कोई माई का लाल आरक्षण समाप्त नहीं कर सकता।

    भगवान महाकाल की नीलकंठेश्वर वाली त्यागी भूमिका को सृष्टि के उद्भव का कारक माना जाता है। उनकी संहारक वाली छवि भी जन जन के बीच जिज्ञासा का केन्द्र होती है। ऐसे में महाकाल माफिया कहानियां प्रचारित करता रहता है कि यदि सिंहस्थ के बाद मुख्यमंत्री नहीं बदला गया या सरकार नहीं बदली तो प्रलय हो जाएगा। अपनी इस कहानी को सच साबित करने के लिए महाकाल माफिया ने शिवराज सिंह चौहान सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए अभियान चलाया था। तब प्रदेश के पंडितों के माध्यम से इसे धर्मयुद्ध बताया गया। कहा गया कि यदि सरकार नहीं बदली तो महाकाल के प्रति आस्थाओं में कमी आ जाएगी। पंडितों ने भी बढ़ चढ़कर इस सुर में सुर मिलाए। सरकार में आने के बाद कमलनाथ ने धर्मस्व विभाग का ढांचा बदल दिया और धर्मस्थलों को नियमित करने के नियम भी ढीले कर दिए।

    मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार ने जनता की सहानुभूति बटोरने के लिए न केवल शुद्धता को लेकर अभियान चलाया बल्कि हर जिले में कुछेक व्यापारियों के खिलाफ रासुका लगाकर अपने अभियान की पूर्णाहुति भी कर डाली है। हालांकि विकास के मोर्चे पर कमलनाथ सरकार बुरी तरह असफल साबित हुई है। उद्योगपति कमलनाथ ने कथित छिंदवाड़ा माडल की आड़ में उद्योगपतियों से जो वसूली अभियान चलाया उससे राज्य में अफरातफरी के हालात बन गए हैं। नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव तो कहते हैं कि नौ माह बाद भी सरकार जनता को नतीजे नहीं दे पाई है। उसके मंत्री तबादलों में ही जुटे हैं। जनता की समस्याएं बढ़ती जा रहीं हैं और जनता में आक्रोश फैल रहा है।

    राज्य में कमलनाथ को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करते समय कांग्रेस ने उन्हें उद्योपति बताया था। अब जबकि उद्योगों के बीच भय का माहौल है तब लोग सवाल कर रहे हैं कि कमलनाथ आखिर कौन सा उद्योग चलाते हैं और उनके कारखाने प्रदेश या देश के लिए कौन सा माल बनाते हैं।जब सरकार ने नवंबर 2019 तक प्रदेश के सभी मीटर बदलने का अभियान चलाया है। लोग पूछ रहे हैं कि प्रदेश में बिजली की क्षति लगातार बढ़ती जा रही है तब मीटर बदलने की ये मुहिम कमलनाथ से जुड़े किस उद्योगपति को लाभ पहुंचाने के लिए चलाई जा रही है।इसी बीच महाकाल माफिया को दस्तूरी पहुंचाने के कदम ने कमलनाथ की असलियत उजागर कर दी है।

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  • कर्ज का राजीव फार्मूला सरकार की विदाई की वजह बनेगा

    कर्ज का राजीव फार्मूला सरकार की विदाई की वजह बनेगा

    विदेशी तकनीक के आयात से भारत को कर्ज के दलदल में धकेलने वाले राजीव गांधी की सोच को मुख्यमंत्री कमलनाथ अब मध्यप्रदेश में लागू करने की तैयारी कर रहे हैं। इसे वे अपने बहु प्रचारित छिंदवाड़ा मॉडल का प्रेरणा स्रोत बता रहे हैं। राजीव गांधी के 75 वें जन्मदिवस को उन्होंने राजीव गांधी को 21 वीं सदी के आधुनिक भारत का निर्माता बताया। जबकि हकीकत ये है कि कंप्यूटर तकनीक के आयात की देश को जो मंहगी कीमत चुकानी पड़ी है वह भारत के विकास के मार्ग में रोड़ा साबित हुई है। आज चीन जहां तकनीक के विकास से 13 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन चुका है वहीं भारत आज भी 5ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की जद्दोजहद से जूझ रहा है।

    कांग्रेस के जिस विकास मॉडल को देश ने खारिज करके मोदी सरकार को सत्ता सौंपी है उसने भारतीय मुद्रा को रीसेट करके देश में पनप चुकी समानांतर अर्थव्यवस्था को समाप्त करने का एतिहासिक फैसला लिया था। नोटबंदी से देश का काला धन तो उजागर हुआ ही साथ में बैंकों के सरकारीकरण का लाभ लेकर कालाधन बनाने वालों की पोल भी देश के सामने खुल चुकी है। जिन राजीव गांधी को देश में कंप्यूटर क्रांति का जनक बताया जाता है उसे उन्होंने माईक्रोसाफ्ट का कथित एजेंट बनकर देश में लागू करवाया था। विश्वसनीय सरकारी सूत्र बताते हैं कि पूरे देश की ओर से भारत सरकार ने माईक्रोसाफ्ट से अनुबंध किया था। उसी अनुबंध की तर्ज पर आज तक भारत सरकार और राज्यों की सरकारें माईक्रोसाफ्ट से ही आपरेटिंग सिस्टम खरीदती हैं। भारत ये युवा यदि आपरेटिंग सिस्टम बना भी लें तो उस अनुबंध की वजह से सरकारें वो साफ्टवेयर नहीं खरीद सकती हैं।भारत का कोई आंत्रप्न्योर यदि मुफ्त में भी वो साफ्टवेयर सरकारों को देना चाहे तो उसे नहीं खरीदा जा सकता।

    देश में राजीव गांधी के मित्र सैम पित्रोदा ने जिस सी डॉट एक्सचेंज की खरीदी पूरे देश में करवाई थी वो तकनीक पूरी दुनिया में बंद हो चुकी थी। इसके बाद देश में पेजर आए और वे भी मोबाईल की वजह से विदा हो गए। इस तरह मंहगी तकनीकें खरीदे जाने से देश को अरबों रुपयों की हानि पहुंची और कमीशन के रूप में मिला अरबों रुपयों का धन कथित तौर पर विदेशी बैंकों में रिश्वत के रूप में पहुंचाया गया। जबकि सैम पित्रोदा ने अहसान जताते हुए एक रुपये का वेतन लेकर देशभक्त होने का नाटक खेला था।

    भोपाल गैस त्रासदी के आरोपी वारेन एंडरसन को विदेश भगाने के लिए जिम्मेदार राजीव गांधी की पोल पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर विधानसभा में उजागर कर चुके हैं। उनका कहना था कि स्वर्गीय अर्जुनसिंह को फोन करके राजीव गांधी ने एंडरसन को छोड़ने का हुक्म दिया था। जिसे तत्कालीन कलेक्टर मोती सिंह और एसपी स्वराज पुरी ने सकुशल वापस पहुंचाया था। स्वराज पुरी तो स्वयं कार चलाकर एंडरसन को विमान तल तक छोड़ने गए थे। यूनियन कार्बाइड ने सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से जो हर्जाना दिलवाया उसकी बंदरबांट की कहानी भोपाल के गली कूंचों में आज भी सुनी सुनाई जाती है। गैस राहत विभाग के मंत्री आरिफ अकील और पूर्व मंत्री बाबूलाल गौर इस एपीसोड की कहानियां समय समय पर सुनाते रहते हैं।

    कांग्रेस में राजीव गांधी की विचारधारा देश को आत्मनिर्भर बनाने के बजाए कर्ज लेकर बांटने वाली सोच के रूप में ही जानी जाती है। युवाओं को वैश्विक उद्योगों के लिए बेचने की इस विचारधारा में प्रशिक्षण तो सरकारी संसाधनों से दिया गया लेकिन वे युवा नौकरी के लिए भारत छोड़कर विदेश चले गए। वहीं बस गए और सरकारें लाभ के नाम पर विदेशी मुद्रा का फायदा गिनाती रहीं। आज विश्व भर में फैले भारत के युवा अपने देश को याद करते हैं और घरों से उजड़ने का दुख उन्हें सालता रहता है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब मेक इन इंडिया का नारा दिया तो कई उद्योगपतियों ने अपने दफ्तर भारत में खोल दिए। आज वे उद्योगपति पूरी दुनिया में तीन दफ्तर और कारखाने चलाते हैं जिनमें भारत के युवाओं को रोजगार के अवसर मिले हैं। कई वैश्विक कंपनियां भी भारत के युवाओं से तकनीकी कामकाज कराती हैं।

    इसके विपरीत चीन ने अपने युवाओं की तस्करी नहीं की। अपनी लागत पर दुनिया भर के उद्योगों को रोशन नहीं किया। चीन ने घरेलू उत्पादन को पूरी दुनिया में बेचा और आज उसकी मुद्रा पूरी दुनिया में तहलका मचा रही है। भारत में नरेन्द्र मोदी जब मेक इन इंडिया का नारा दे रहे हैं तब मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार युवाओं को विदेश भेजने की मुहिम चला रही है। जाहिर है कि ये भारत सरकार की राष्ट्रीय सोच के विपरीत कदम है। जिसे केन्द्र की भाजपा सरकार लंबे समय तक बर्दाश्त नहीं कर पाएगी। कमलनाथ सरकार का ये अभियान अंततः कांग्रेस सरकार की विदाई की वजह भी बन सकता है।

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  • युवाओं को रोजगार पाने लायक बनाएंगे बोले कमलनाथ

    युवाओं को रोजगार पाने लायक बनाएंगे बोले कमलनाथ

    भोपाल,20अगस्त(प्रेस सूचना केन्द्र)। राजीव गांधी की विकास नीति अब मध्यप्रदेश में साल भर तक प्रचारित की जाएगी। स्वर्गीय राजीव गांधी के 75 वें जन्मदिवस पर राजधानी के रवीन्द्र भवन में आयोजित सद्भावना दिवस समारोह में मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व में ये घोषणा की गई। युवा संकल्प वर्ष के रूप में मनाया जाने वाला ये आयोजन साल भर चलेगा, जिसमें युवाओं को राजीव गांधी की विकास नीति के आधार पर उद्योगों के अनुकूल बनाने के लिए कई कार्यक्रम चलाए जाएंगे।

    मुख्यमंत्री कमलनाथ ने स्वर्गीय राजीव गांधी के साथ दून स्कूल में पढ़ते समय अपने अनुभवों को साझा किया। उन्होंने कहा कि वे स्वर्गीय संजय गांधी के साथ पढ़ते थे और राजीव गांधी उनसे चार साल आगे थे। ज्ञान और शिक्षा में अंतर बताते हुए उन्होंने कहा कि स्कूलों में शिक्षा दी जाती है लेकिन ज्ञान हम प्रयोग करके हासिल करते हैं। जब स्वर्गीय इंदिरा गांधी की हत्या हुई तब देश की एकता पर आक्रमण हुआ था। देश पुरानी तकनीकों पर चल रहा था। ऐसे में राजीव गांधी ने आईटी और कंप्यूटर लाने की बात कही। 21 वीं सदी के भारत की परिकल्पना देश के सामने रखी। तब कांग्रेस के लोग भी मजाक बनाते थे। वे कहते थे कि इससे रोजगार के अवसर घट जाएंगे। रेलवे में कंप्यूटरीकरण के खिलाफ आंदोलन भी हुए लेकिन आज देश को इस तकनीक का लाभ मिल रहा है।

    देश को विविधता के बीच आगे बढ़ाने की कांग्रेस की सोच का शंखनाद करते हुए उन्होंने कहा कि भारत विभिन्नताओं से भरा देश है। यहां कई जातियां, धर्म, त्यौहार, रस्में, हैं। उत्तर में जो लोग धोती पहिनते हैं दक्षिण तक जाते जाते वो लुंगी बन जाती है। भारत की संस्कृति इस विविधता को बांधे रखती है। सोवियत संघ हमारे देखते बिखर गया। आज उसका नाम निशान भी नहीं बचा। भारत में ज्ञान की वजह से ही सद्भाव की संस्कृति रही। चंद्रगुप्त से सम्राट अशोक तक सद्भाव की ही बुनियाद रखी गई। यही विचार हमारा भविष्य भी सुरक्षित रखेगा।

    राजीव जी के सद्भाव के संदेश ने ही देश को दिशा दी और आज दुनिया भर में भारत का सम्मान बढ़ने की वजह भी उनकी ही सोच है। ये काम पिछले पांच सालों में नहीं हुआ है। इसका बीज राजीव जी ने डाला था। आज दुनिया भर में भारत के युवा इंजीनियर विकास के विभिन्न क्षेत्रों में अपना नाम रोशन कर रहे हैं।

    उन्होंने कहा कि दुनिया में तीन तरह के नेता होते हैं। एक वे जिन्हें देश प्यार करता है। दूसरे वे जिनसे देश डरता है और तीसरे वे जिनकी देश उपेक्षा कर देता है।राजीव जी से देश प्यार करता था। उन्होंने कहा कि आज का युवा पढ़ लिखकर बेरोजगार हो रहा है। वह न तो अपनी पारिवारिक जीविका चलाने लायक रह पाता है और न ही वह तकनीकी रूप से औद्योगिक क्षेत्र के उत्पादन का हिस्सा बन सकता है,इसलिए हमें युवाओं की शिक्षा की स्थितियां बदलनी होंगी।

    आयोजन में पहुंचे युवाओं के सवालों के जवाब के दौरान उन्होंने कहा कि आज प्रदेश को पूंजी निवेश की जरूरत है। इसके लिए हमें विश्वास का वातावरण बनाना होगा। प्रदेश में उद्योग लगेंगे तभी रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। बिना निवेश के प्रदेश न तो आगे बढ़ सकता है और न ही अन्य प्रदेशों के सामने प्रतिस्पर्धा में टिक सकता है। इसके लिए प्रदेश के युवाओं को स्किल आधारित गुणवत्ता युक्त शिक्षा दिए जाने की जरूरत है। शैक्षणिक संस्थाओं से रोजगार के लिए उपयोगी विद्यार्थी निकलें ये जरूरी है। उन्होंने कहा कि नौकरी पाना अचीवमेंट(उपलब्धि) हो सकता है लेकिन हमें आत्मसंतोष तभी मिल सकता है जब हम कसौटियों का फुलफिलमेंट करके खरे उतर पाएं।

    उन्होंने कहा कि राज्य में बेहतरीन स्टेडियम बनाए जा रहे हैं। खिलाड़ियों को विश्वस्तरीय प्रशिक्षण दिलाया जाएगा ताकि वे जीवन के हर मोर्चे पर सफलता हासिल करें।खेल के मैदान में जो दिमागी अनुशासन विकसित होता है वह क्लासरूम में नहीं पाया जा सकता। छिंदवाड़ा माडल पर पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि ये आज के स्किल इंडिया जैसा है जिसे हम फिनिशिंग स्कूल कह सकते हैं। इसमें हम समाज की जरूरत के मुताबिक युवा तैयार करते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार इन दिनों शुद्ध का युद्ध कार्यक्रम चला रही है जिसमें हम नागरिकों को गुणवत्ता युक्त खाद्य उपलब्ध कराने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में नशे के खिलाफ भी अभियान चलाया जाएगा।

  • कमलनाथ चाहें भी तो नहीं रोक पाएंगे पुलिस कमिश्नर प्रणाली

    कमलनाथ चाहें भी तो नहीं रोक पाएंगे पुलिस कमिश्नर प्रणाली

    भोपाल,18 अगस्त(प्रेस सूचना केन्द्र)। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने पुलिस कमिश्नर प्रणाली को एक कमेटी के हवाले करके उसे अपने अनुकूल बनाने की कवायद भले ही शुरु कर दी हो लेकिन इस विषय पर जितनी कवायद हो चुकी है उसके चलते मध्यप्रदेश के प्रमुख शहरों में इस प्रणाली को लागू करने से वे इंकार नहीं कर पाएंगे।इसके संकेत मिलने लगे हैं। भोपाल और इंदौर में एसएसपी प्रणाली लागू करके इस संबंध में सभी प्रायोगिक प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है और अब सिर्फ मजिस्ट्रेटी अधिकार देकर इस प्रणाली को कारगर बनाया जाना बाकी रह गया है।

    कानून और व्यवस्था की जवाबदारी भारतीय लोकतंत्र में राज्य को सौंपी गई है। इसके बावजूद राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर राज्य की जिम्मेदारी है कि वह केन्द्रीय एजेंसियों की सिफारिशों पर अमल भी करे। यही वजह है कि पिछली शिवराज सिंह चौहान सरकार ने भी पुलिस कमिश्नर प्रणाली को लागू करने की पूरी कवायद कर ली थी। चुनावों के मद्देनजर उसे लागू करने की प्रक्रिया जरूर नहीं अपनाई गई थी। अब कमलनाथ सरकार की जवाबदारी है कि वह इसे कैसे लागू करे।

    चुनावी संग्राम के दौरान राज्य पुलिस ने पुलिस कर्मियों को साप्ताहिक अवकाश दिए जाने और नई भर्तियां किए जाने के मुद्दे पर कमलनाथ सरकार का साथ दिया था। अब जब कमलनाथ सरकार में आ चुके हैं तब वे पुलिस के मुद्दों पर पूरी तरह असफल साबित हो रहे हैं। राज्य का खजाना खाली होने का हल्ला मचाकर उन्होंने पुलिस की भर्तियां भी टाल दी हैं और पुलिस कर्मियों को साप्ताहिक अवकाश दिए जाने की व्यवस्था भी लागू नहीं हो पाई है। ऐसे में पुलिस के आला अफसरों का दबाव है कि भले की महानगरों से शुरुआत हो पर प्रदेश में पुलिस कमिश्नर प्रणाली की शुरुआत कर दी जानी चाहिए। इससे कानून और व्यवस्था के विषय में पुलिस को जो बेवजह लांछन झेलना पड़ रहे हैं उससे राहत मिल सकेगी।

    कमलनाथ सरकार ने स्वाधीनता दिवस के अवसर पर पुलिस कमिश्नर प्रणाली की घोषणा किए जाने के संकेत दिए थे। ऐन वक्त पर सरकार ने राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के प्रतिनिधि मंडल की आशंकाओं पर गौर करते हुए घोषणा टाल दी। अब सरकारी सूत्रों की ओर से तर्क दिया जा रहा है कि इस प्रणाली का अध्ययन कराया जाएगा तब इसे लागू किया जाएगा। हालांकि इस संबंध में पुलिस सूत्रों का कहना है कि कमिश्नर प्रणाली के संबंध में सारी कवायद पूरी की जा चुकी है और अब इसे सिर्फ लागू करना बाकी है।

    दरअसल कानून व्यवस्था के लिए जिम्मेदारी तो पुलिस की है पर फैसले लेने का अधिकार राजस्व अमले पर है। कलेक्टर तय करते हैं कि एसडीएम कैसे कानून व्यवस्था पर नियंत्रण रखें। आज देश के 71 महानगरों, मेट्रो शहरों में कमिश्नर प्रणाली लागू हैं। वैसे दस लाख तक की आबादी वाले शहरों में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू किए जाने का प्रावधान है। कलेक्टर के पास डिस्ट्रीक मजिस्ट्रेट की शक्तियां होती हैं। इसके तहत रासुका लगाने, जिलाबदर करने, संवेदनशील हालातों में फायरिंग, लाठी चार्ज की इजाजत देने व धारा 144 व कर्फ्यू घोषित करने के अधिकार हैं। इसी प्रकार धारा 151 व अन्य प्रतिबंधात्मक कार्रवाई में जमानत दिए जाने व नहीं दिए जाने के फैसले भी कलेक्टर करते हैं. कमिश्नरी लागू हो जाने के बाद कलेक्टर की ये तमाम शक्तियां पुलिस कमिश्नर को हंस्तारित हो जाएंगी और कलेक्टर की भूमिका महज राजस्व अधिकारी की रह जाएगी।

    जहां तक पुलिस प्रणाली में सुधार और संशोधित एक्ट को लागू करने की बात है तो अब तक कई राज्यों ने इस पर अमल नहीं किया है। सुप्रीम कोर्ट ने संशोधित पुलिस एक्ट को लागू करने के आदेश भी दिए थे, जिसमें नए एक्ट के तहत राज्य सुरक्षा आयोग गठित करके पुलिस के कामकाज की निगरानी करके सरकार को रिपोर्ट सौंपने की सिफारिश की गई थी। सरकार को आयोग की रिपोर्ट मानना होगी इससे सरकार की मनमर्जी पर रोक लग सकेगी।डीजीपी, आईजी, डीआईजी की नियुक्ति के लिए वरिष्ठता और सेवा रिकार्ड का आधार ही मापदंड माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट का मानना था कि पुलिस के कामकाज में राजनैतिक हस्तक्षेप रोका जाए।

    वर्तमान व्यवस्था पुलिस को जांच और कानून के पालन के अधिकार तो देती है पर अपराध पर अंकुश लगाने की जवाबदारी उसकी नहीं है। इसके लिए उसे प्रशासनिक अफसरों और अदालत पर निर्भर रहना पड़ता है। यही वजह है कि कई पुलिस अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर अन्य विभागों में चले जाते हैं या फिर कविताएं लिखने और किताबें लिखने में जुट जाते हैं। अपराध पर अंकुश लगाने में उनकी रुचि नहीं रहती है। अपराध रोकने के तंत्र पर भारी संसाधन खर्च करने के बावजूद अपराधियों का जाल अपना काम बदस्तूर जारी रखता है।

    मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार के सामने अपराधों पर नियंत्रण रखने की चुनौती तो है लेकिन वह अपराधों की जड़ को उजागर नहीं होने देना चाहती।कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर जारी बजट को हड़पने,मकानों की जमाखोरी करने, खेती की जमीनों की आड़ में काला धन सफेद करने वाले, सरकारी ठेकों को हड़पने के लिए अपराधियों का सहारा लेने वाले, टैक्स चोरी करने वाले व्यापारी, आयकर चोरी करने वाले फर्जी एनजीओ जैसों की वजह से जो आपराधिक जंजाल पनपता है उसे भी सरकार उजागर नहीं होने देना चाहती। यही वजह है कि पुलिस कमिश्नर प्रणाली को विभिन्न बहानों से टालने की जुगत हो रही है। इसके बावजूद अब देश जिस आर्थिक प्रणाली की ओर बढ़ चला है उसमें फर्जी पुलिस पालना किसी भी शासन व्यवस्था के लिए संभव नहीं रहा है। जाहिर है कि ऐसे हालात में कमलनाथ चाहकर भी पुलिस कमिश्नर प्रणाली को रोक नहीं पाएंगे। वे मुख्यमंत्री हैं प्रदेश के मालिक नहीं, ये बात जितनी जल्दी समझ लेंगे उतनी जल्दी टकराव से बचकर जन समस्याओं का समाधान कर पाएंगे।

  • तू चोर मैं सिपाही वाला खेल कांग्रेस की हताशा – शरदेंदु तिवारी

    तू चोर मैं सिपाही वाला खेल कांग्रेस की हताशा – शरदेंदु तिवारी

    भोपाल18 अगस्त(प्रेस सूचना केन्द्र)। नकली दुग्ध उत्पादों के नाम पर प्रदेश भर में मारे गए छापों के बावजूद प्रदेश में आज भी नकली दूध,मावा,पनीर,घी आदि धड़ल्ले से बेचा जा रहा है। सरकारी अमले की जांच में लगातार ये बात उजागर हो रही है। इसकी वजह आपूर्ति और मांग के बीच बड़ा अंतर होना है। इन छापों से जनता के बीच सरकार ने थोथी लोकप्रियता बटोरी है,यदि इतना ही प्रयास दुग्घ उत्पादन बढ़ाने की दिशा में किया जाता तो समस्या का स्थायी समाधान निकाला जा सकता था। चुरहट से भाजपा के विधायक शरदेंदु तिवारी ने आज पत्रकारों से चर्चा में सरकार के विभिन्न अभियानों को लेकर पूछे गए सवालों पर बेबाकी से जवाब दिए।

    चुरहट से कांग्रेस के दिग्गज नेता अजय सिंह को परास्त करके राजनीति के मैदान में खलबली मचाने वाले युवा विधायक शरदेंदु तिवारी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की राजनीति को जाति, धर्म, संप्रदाय के संकीर्ण नजरिए से बाहर लाकर विकास की दौड़ में खड़ा कर दिया है। आज का समाज अमीर और अमीरी के लिए प्रयासरत दो वर्गों में बंट गया है। कांग्रेस जिस तरह लोगों को धर्म और संप्रदायों में बांटकर राजनीति करती थी आज जनता की नब्ज पर उसकी पकड़ छूट गई है। वो अपना जनाधार तलाशने के लिए तू चोर मैं सिपाही का खेल खेल रही है। ये खेल थोड़े समय तो लोगों का ध्यान आकर्षित कर सकता है लेकिन अंततः लोग यह खेल समझ जाएंगे और इस पाखंड को विदा कर देंगे।

    अपने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दादा की विरासत को याद करते हुए श्री तिवारी ने कहा कि कमलनाथ सरकार इतने अंतर्विरोधों में घिरी है कि प्रशासनिक मशीनरी पर उसका नियंत्रण स्थापित नहीं हो पा रहा है। सरकार का आपदा प्रबंधन धराशायी हो गया है। पूरे प्रदेश में लोग बाढ़ की आपदा झेल रहे हैं और मुख्यमंत्री छापेमारी को ही प्रशासनिक सफलता मान बैठे हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ऐसे मौकों पर जनता के बीच जाकर लोगों को ढाढ़स बंधाते थे और आवश्यक प्रबंध करते थे लेकिन आज जनता को उनकी कमी खल रही है।

    श्री तिवारी ने कहा कि विंध्य अंचल ने भाजपा की राजनीति में अपने क्षेत्रीय विकास की झलक देखी है। भाजपा ने सबका साथ सबका विकास का लक्ष्य लेकर सबका विश्वास भी प्राप्त किया है। केन्द्र सरकार जनता की मूलभूत समस्याओं का समाधान कर रही है। ऐसे में कमलनाथ सरकार की विद्वेष से भरी राजनीति जनता के बीच आक्रोश की वजह बन रही है। उन्होंने कहा कि सरकार के मंत्री उन्हें वोट न देने वालों को दंडित करने का भाव लेकर सरकार चला रहे हैं। ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं कि जल्दी ही सरकार के प्रतिनिधियों और जनता के बीच टकराव के हालात बनने लगें।

    कश्मीर में धारा 370 पर मिले व्यापक जन समर्थन के बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि मोदी सरकार के कार्यों ने कांग्रेस की जड़ें हिला दीं हैं। कांग्रेस आरोप लगाने में जुटी है और सरकार जनता को डिलीवरी देने में जुटी है। यही वजह है कि पूरे देश में जहां जहां कांग्रेस की सरकारें हैं उन्हें जनता की उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है। मध्यप्रदेश में तो कांग्रेस के नेताओं और दलालों की फौज लूटो भागो की रणनीति पर चल रही है। यही वजह है कि कांग्रेस यहां सिर्फ लोकप्रियता बटोरने वाले अभियान चला रही है।समस्या ये है कि समय बदल चुका है जनता इन हथकंडों को समझने लगी है,जिससे कांग्रेस सरकार के वादे खोखले साबित हो रहे हैं।

  • अंधा करने वाले डॉक्टर दंडित होंगेःसिलावट

    अंधा करने वाले डॉक्टर दंडित होंगेःसिलावट

    आंखों की रोशनी खोने वाले दस मरीजों का इलाज शंकर नेत्रालय चेन्नई के डॉक्टर करेंगे

    भोपाल,17 अगस्त(प्रेस सूचना केन्द्र)। लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री तुलसीराम सिलावट ने इंदौर के एक निजी अस्पताल में 10 मरीजों के आँखों के ऑपरेशन के बाद उनकी आँखों की रोशनी प्रभावित होने की घटना को अमानवीय बताया है। उन्होंने कहा कि प्रभावित मरीजों के इलाज के लिये राज्य सरकार ने देश के ख्याति प्राप्त शंकर नेत्रालय के डॉ. राजू रमन को कॉल किया है। डॉ. रमन रविवार, 18 अगस्त को सुबह इंदौर पहुँच रहे हैं। मंत्री श्री सिलावट ने बताया कि प्रभावित मरीजों को इंदौर के चोइथराम नेत्रालय में शिफ्ट कर दिया गया है।

    मंत्री श्री सिलावट ने बताया कि प्रभावित मरीजों की आँखों का पूरा इलाज राज्य सरकार द्वारा नि:शुल्क कराया जायेगा। उन्होंने कहा कि घटना की जाँच के लिये उच्च-स्तरीय इन्क्वायरी कमेटी गठित की गई है। कमेटी ने जाँच का काम शुरू कर दिया है। कमेटी को यथाशीघ्र जाँच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिये कहा गया है। श्री सिलावट ने बताया कि कमेटी की जाँच रिपोर्ट के आधार पर दोषी चिकित्सकों एवं अस्पताल के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जायेगी।

  • वैश्विक खेती को अपनाए भारत बोले कमलनाथ

    वैश्विक खेती को अपनाए भारत बोले कमलनाथ

    भोपाल,16 अगस्त(प्रेस सूचना केन्द्र)। मुख्यमंत्री कमल नाथ ने केन्द्र सरकार से आग्रह किया है कि वह जेनेटिकली मोडीफाइड बीज के संबंध में नीतिगत निर्णय ले, जिससे भारत ऐसी टेक्नालाजी अपनाने में पीछे नहीं रह जाये, जो पूरे विश्व को बदल रही है। इसके बिना भारत का बहुत बड़ा नुकसान हो जायेगा। उन्होंने अत्यावश्यक वस्तु अधिनियम में सुधार लाने की भी वकालत की, जिससे किसानों के हित में अप्रत्याशित परिस्थितियों से निपटने में मदद मिल सके।

      मुख्यमंत्री कमल नाथ ने  नीति आयोग की भारत के कृषि परिदृश्य के कायाकल्प के लिये गठित मुख्यमंत्रियों की उच्चाधिकार समिति की आज मुम्बई में हुई बैठक में अपने सुझाव दिये। उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ उच्चाधिकार समिति के सदस्य हैं।
    
        मुख्यमंत्री ने कहा कि कृषि न सिर्फ आर्थिक बल्कि सामाजिक मुद्दा भी है। उन्होंने कहा कि किसानों की सोच में बदलाव आया है। धोती पहनने वाले किसान और आज के पेंट-जींस पहनने वाले किसान के नजरिये में फर्क है। मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत के किसान अमेरिका, यूरोपियन यूनियन की व्यवस्थाओं से मुकाबला नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि विश्व व्यापार संगठन से हुए समझौतों के चलते किसी भी प्रकार का कृषि आयात किसानों के हित में नहीं है। उन्होंने किसानों के हित में जैविक खाद्यान्न के संकुलों की पहचान कर इसकी मार्केटिंग करने की जरूरत बताई।  श्री नाथ ने सुझाव दिया कि खाद्य प्रसंस्करण की संभावनाओं वाले क्षेत्रों की पहचान कर उन्हें भरपूर सहयोग देने की आवश्यकता है।        
    
        श्री कमल नाथ ने कहा कि किसानों को कीमतों का आकलन कर के कृषि आदान का ब्रांड चुनने की आजादी होना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसानों, किसान उत्पादन संगठनों, व्यापारिक सोसायटी और बाजार के बीच परस्पर सामंजस्य और तालमेल बैठाना होगा। उन्होंने कहा कि उपार्जन मॉडल को भी सुधारने की जरूरत है। श्री कमल नाथ ने खेती में यंत्रीकरण को बढ़ाने पर जोर देते हुए कहा कि कृषि क्षेत्र में जीआईएस/जीपीएस जैसी आधुनिक तकनीकी के उपयोग से भी लाभ होगा।
    
       मुख्यमंत्री कमल नाथ ने बैठक में मध्यप्रदेश के कृषि क्षेत्र में किए गए सुधारों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि किसानों के उत्पाद संगठनों को लाइसेंस और संचालन संबंधी जरूरतों को शिथिल किया गया है ताकि उन्हें बेहतर दाम मिलें। सिंगल लाइसेंस और मंडियों के बाहर भी खरीदी करने की अनुमति दी गई है। नीलामी के लिये इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफार्म स्थापित करने का काम चल रहा है। 
  • कांग्रेस के वसूली अभियान ने मचाया बाजार में कोहराम

    कांग्रेस के वसूली अभियान ने मचाया बाजार में कोहराम

    भोपाल,(प्रेस सूचना केन्द्र)।औद्योगिक विकास की राह चलते मध्यप्रदेश में सत्ता बदलने के साथ साथ उद्योपतियों से संवाद का तरीका भी बदल गया है। भाजपा की शिवराज सिंह चौहान की सरकार जहां कर्ज आधारित अर्थव्यवस्था से उन्हें पैसा बनाने के अवसर उपलब्ध करा रही थी वहीं कमलनाथ की कांग्रेस सरकार ने उद्योपतियों की वसूली बैठक शुरु कर दी है। भाजपा को जो उद्योगपति स्वेच्छा से चंदा मुहैया करा रहे थे उन्हें कमलनाथ जी ने कार्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के छिंदवाड़ा माडल के नाम पर भारी भरकम जवाबदारियां थमा दीं हैं।हाल की मुंबई यात्रा में मुख्यमंत्री ने सामाजिक विकास के नाम पर उ्दयोपतियो को जो जवाबदारियां थमाई हैं उससे उद्योगपतियों के बीच कोहराम मच गया है।उद्योगपतियों ने व्यापारियों को दिए जाने वाले प्रोत्साहन फंड जब्त कर लिए हैं जिससे पूरे बाजार में भूचाल आ गया है।

    कांग्रेस का विकास माडल हमेशा से अमीरों को लूटकर गरीबों को बांटने के कबीलाई फार्मूले पर टिका रहा है। मुक्त बाजार व्यवस्था के पूंजीवादी माडल ने इस नीति को पूरी तरह धराशायी कर दिया था। कमलनाथ दुबारा उसी घिसे पिटे फार्मूले को लागू करने का प्रयास कर रहे हैं। पंद्रह साल के भाजपा शासनकाल में भले ही इस पुराने फार्मूले की विदाई न हो पाई हो लेकिन इंस्पेक्टर राज की चूलें जरूर हिल गईं थीं। यही वजह था कि राज्य का बजट भी बढ़ा और फलने फूलने के एवज में उद्योगपतियों ने भाजपा को भरपूर चंदा भी दिया। अब जबकि कमलनाथ की कांग्रेस को अपनी सरकार बचाने के लिए हर दिन मशक्कत करना पड़ रही है तब उनकी कांग्रेस खुलकर चंदा उगाही के मैदान में कूद पड़ी है।

    कांग्रेस की पोल तो केवल उद्योपतियों की उस सूची से ही खुल जाती है जिन्हें वो प्रदेश में औद्योगिक विकास के लिए आमंत्रित करने का दावा कर रही है। इनमें अंबानी, अडानी से लेकर महिंद्रा और हीरो जैसी कंपनियां प्रमुख हैं जिनका कारोबार मध्यप्रदेश में पहले से फैला हुआ है। राज्य मंत्रालय का भवन बनाने वाले शापोरजी पालोनजी समूह को ही इतनी बड़ी जवाबदारी थमाई गई है जिससे विधायकों को भी मालामाल कर दिया जाएगा। सूत्र बताते हैं कि कमलनाथ ने मुख्यमंत्री बनने के बाद उद्यमियों से साफ कह दिया है कि यदि उन्हें प्रदेश में अपना कारोबार करना है तो अपनी आय का पंद्रह फीसदी हिस्सा पार्टी के अघोषित फंड में देना होगा। इधर कांग्रेस और भाजपा के भाग निकलने को बेकरार विधायकों को आश्वासन दिया जा रहा है कि उनका भरपूर सम्मान किया जाएगा इसलिए वे सरकार गिराने के अभियान से दूर ही रहें।

    कमल नाथ ने मुंबई में रिलायंस ग्रुप के चेयरमेन मुकेश अंबानी, बिरला ग्रुप के कुमार मंगलम, टाटा ग्रुप के चंद्रशेखर, महिंद्रा एंड महिंद्रा ग्रुप के पवन गोयनका, टाटा पावर के प्रवीर सिन्हा, ग्रेसिम के दिलीप गौर, आर.पी.जी. ग्रुप के हर्ष गोयनका, एसीसी सीमेंट के दिलीप अखूरी, अहिल्या हेरीटेज होटल्स के यशवंत होलकर एवं नरसी मुंजी के अमरीश पटेल से वन-टू-वन चर्चा की इन सभी के कारोबार पहले से ही मध्यप्रदेश में संचालित हैं।

    कांफ्रेंस में बजाज फाइनेंस के एम.डी. संजीव बजाज, जुबिलेंट लाइफ एंड सांइसेस लिमिटेड के वाइस प्रेसीडेंट अमरदीप सिंह, महिंद्रा हॉलिडेज एण्‍ड रिसोर्ट इंडिया लिमि. के चेयरमेन अरुण नंदा, टाटा केपिटल लिमि. के हेड बिजनेस डेव्हलपमेंट कश्मीरा मेवावाला, थाइसनग्रुप-इण्डस्ट्रीज प्रा.लि. के सीईओ विवेक भाटिया, ट्यूबेक्स इंडिया लिमि. के चेयरमेन अजय सम्बरानी, एचडीएफसी बैंक के ग्रुप हेड राकेश सिंह, वेरेटिव एनर्जी लिमि. के एम.डी. सुनील खन्ना, कौंसुलेट जनरल ऑफ जापान के कौंसुलेट जनरल मिशियो हराडा, टाटा पॉवर लिमि. के एमडी प्रवीर सिन्हा, टाटा कंसलटेंसी लिमि. के वाइस प्रेसीटेंड तेज भाटिया, रिलायंस इण्डस्ट्रीज लिमि. के स्टॉफ चेयरमेन निलेश मोदी, रिलायंस इण्डस्ट्रीज लिमि. के बिजनेस यूनिट हेड संजय रॉय, हिन्दुजा के ग्रुप हेड कार्पोरेट आर. केनन, एसीसी सीमेंट के एमडी नीरज अखोरी, इण्डो-स्पेस के मैनेजिंग डायरेक्टर राहुल नायर, टाटा मोटर लिमि. नेशनल हेड सुशांत नायक, ग्रेसिम इण्डस्ट्रीज लि. के ज्वाइंट डायरेक्टर अजय सरदाना, केमोट्रोल्स इण्डस्ट्रीज प्रा.लि. चेयरमेन के. नंदकुमार, हिन्दुस्तान यूनिलीवर लिमि. एक्जीक्यूटिव डेयरेक्टर प्रदीप बेनर्जी, हिन्दुस्तान यूनिलीवर लिमि. लीड साउथ एशिया कनिका पाल, इनोक्स लिमि. डायरेक्टर सिद्धार्थ जैन, प्रॉक्टर एंड गेम्बल चीफ एक्जीक्यूटिव मधुसूधन गोपालन, अहिल्या एक्सप्रिंसेस डायरेक्टर यशवंत होलकर, सिप्ला लिमि. वाइस प्रेसीटेंड निखिल बेसवान, इंटरनेशनल बायोटेक पार्क लिमि. सीईओ प्रशांता के. बिसवाल, टीसीजी रियल एस्टेट चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर प्रताप चटर्जी, एप्टेक लिमि. डायरेक्टर नीनंद करपे, केपिटल फू़ड प्रा.लि. सीईओ नवीन तिवारी, करगोम फूड्स लिमि. एमडी रोहित भाटिया, एरिस एग्रो लिमि. मैनेजिंग डायरेक्टर राहुल मीरचंदानी, टाटा कन्सलटिंग इंजीनियर्स लिमि. चेयरमेन अशोक सेठी, गोदावरी बायो रिफाइनर्स लिमि. सीईओ समीर सोमिया, एसीजी-एसोसियेटेड केप्सूल चेयरमेन अजीत सिंह से मुख्यमंत्री कार्यालय से सीधा संपर्क किया गया। इन सभी ने सरकार को सीएसआर की दो फीसदी राशि विकास कार्यों के लिए खर्च करने का आश्वासन तो दिया ही है साथ में चंदे की किस्त भी पहुंचानी शुरु कर दी है। सीएसआर की राशि तो शिवराज सिंह सरकार के कार्यकाल में भी खर्च होती थी लेकिन तब उद्योगपतियों पर कोई दबाव नहीं था।पहली बार सरकार ने उन्हें स्पष्ट टारगेट दिए गए हैं।जिससे उद्योपतियों के साथ साथ व्यापारियों में भी कोहराम मच गया है, क्योंकि उद्योगपतियों ने चंदे के टारगेट पूरे करने के लिए व्यापारियों के इंसेंटिव बंद कर दिए हैं।

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  • बिजली मंहगी कर खरीदे जाएंगे नए मीटर

    बिजली मंहगी कर खरीदे जाएंगे नए मीटर

    भोपाल।मध्यप्रदेश में बिजली बिल हाफ करने का वादा करके सत्ता में लौटी कांग्रेस सरकार ने अगले महीने से उपभोक्ताओं को मंहगी बिजली बेचने की तैयारी कर ली है। खजाना खाली होने का हवाला देकर सरकार ने अठारह हजार करोड़ रुपए के घाटे को पाटने और बिजली मीटरों की खरीद के लिए पैसा जुटाने के लिए बिजली के दाम बढ़ाने का फैसला लिया है। लगातार बढ़ती वितरण क्षति को पाटने की जवाबदारी भी अब आम उपभोक्ता को उठाना पड़ेगी।

    बिजली मंत्री प्रियव्रत सिंह की सिफारिशों को मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अनुमति देकर बिजली कंपनियों को अतिरिक्त धन जुटाने की ये जवाबदारी सौंपी है। सरकार ने इसी साल नवंबर महीने तक पूरे बिजली कनेक्शनों पर नए मीटर लगाने की समय सीमा तय की है। इसके लिए बिजली कंपनियों को अतिरक्त धन राशि की जरूरत थी। जिसे बढ़ी दरों से ही जुटाया जाएगा। उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली दिलाने के लिए सरकार सब्सिडी दे सकती थी लेकिन सरकार ने उपभोक्ताओं से ही ये धन जुटाने की तैयारी की है।

    मध्य प्रदेश विद्युत नियामक आयोग ने बिजली कंपनियों की सिफारिशों को मानते हुए बिजली की दरों में सात फीसदी दाम बढ़ाने की अनुमति दे दी है।इसके बाद सरकार की अनुमति से बिजली मंडल ने घरेलू, गैर घरेलू और व्यावसायिक उपभोक्ताओं की बिजली दरों में इजाफा किया है। नई दरें 17 अगस्त से लागू होंगी। राज्य की बिजली कंपनियों ने बिजली दरों में 12 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की मांग की थी,मगर आयोग ने बिजली दरों में सात प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी की अनुमति दी है। इससे राज्य के लोगों को अब सितंबर माह से बिजली के ज्यादा दाम चुकाने होंगे।

    नई बिजली दरों का फैसला गुरुवार की रात को आयोग ने किया। नई दरों के अनुसार, घरेलू कनेक्शन की बिजली दरें 5.1 प्रतिशत, गैर घरेलू कनेक्शन की दर में 4.9 प्रतिशत और व्यावसायिक कनेक्शन की दरों में सात प्रतिशत तक का इजाफा किया गया है।

    आयोग ने बिजली उपभोक्ताओं के लिए पांच स्लैब तय किए हैं, जिसके मुताबिक घरेलू उपभोक्ता को मासिक 30 यूनिट तक का उपयोग करने पर 3.25 रुपये प्रति यूनिट, 50 यूनिट तक बिजली के उपयोग पर 4.05 रुपये प्रति यूनिट, 51 से 150 यूनिट के उपयोग पर दर 4.95 रुपये प्रति यूनिट, 151 यूनिट से 300 यूनिट के उपयोग पर 6.30 रुपये प्रति यूनिट और 300 यूनिट से ज्यादा बिजली का उपयेाग करने पर 6.50 रुपये प्रति यूनिट की राशि का भुगतान करना होगा।

    आयोग बिजली दरों के निर्धारण के लिए बनाए गए पांच स्लैब पर नजर दौड़ाई जाए तो पता चलता है कि पुरानी दरों के मुकाबले 20 से 30 पैसे प्रति यूनिट तक इजाफा हुआ है। पहले चार स्लैब थे, अब पांच स्लैब बनाए गए हैं।

    एक तरफ जहां बिजली दरों में बढ़ोत्तरी की गई है, वहीं वैवाहिक उद्यानों, सामाजिक व वैवाहिक कार्यक्रमों के आयोजन, धार्मिक समारोह के लिए अस्थाई बिजली कनेक्शनों की दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है।

    इसी तरह ई-वाहन और ई-रिक्शा के चार्जिंग केंद्र की बिजली दरें भी पूर्ववत रखी गई हैं। इसके साथ ही कृषि उपभोक्ताओं को सब्सिडी के अतिरिक्त प्रति हार्सपावर प्रति वर्ष 700 रुपये का भुगतान करना होगा, जबकि 10 हार्सपॉवर से ज्यादा के कृषि उपभेाक्ताओं को सब्सिडी के अतिरिक्त प्रति वर्ष 1400 रुपये का भुगतान करना होगा।

  • कश्मीर के कलंक को सिंधिया के मुखौटे से छिपाती कांग्रेस

    कश्मीर के कलंक को सिंधिया के मुखौटे से छिपाती कांग्रेस

    कश्मीर से धारा 370 हटाकर मोदी सरकार ने देश के विकास का राजमार्ग प्रशस्त कर दिया है।सत्तर सालों से नासूर की तरह टीस झेल रहा कश्मीर भी एक नए युग में प्रवेश कर रहा है।जब सारे देश में रियासतों का एकीकरण हो रहा था तब एक अनोखा कश्मीर ही था जो भारतीय गणतंत्र में विलीन हुए बगैर अपनी अलग पहचान बनाने की रट लगाए था। इसकी पृष्ठभूमि पं. जवाहर लाल नेहरू ने तैयार की थी। सेब के बगीचों को अपनी राजनैतिक रियासत बनाने के लोभ ने नेहरू की भूमिका इतनी संकीर्ण बना दी थी कि वे कश्मीर के कथित विद्रोह से संरक्षक बन गए थे। बाद में चिकित्सकों की एसोसिएशन के माध्यम से उन्होंने डाक्टरों के (प्रिस्क्रिप्शन) परचे में रोगियों को रोज सेब खाने की हिदायत लिखवानी शुरु करवा दी। पूरे देश के रोगियों को तभी से अंग्रेजी दवाओं के डाक्टर सेब खिलवा रहे हैं। जबकि आयुर्वेदिक चिकित्सा में रोगियों को लाल टमाटर पर काला नमक और काली मिर्च बुरककर खिलाने की सलाह दी जाती है। यही वजह है कि 72 सालों से समूचा भारत कश्मीर समस्या झेल रहा है। तबसे देश के हजारों जवान कश्मीर की सरजमीं को बचाए रखने के लिए अपनी शहादत दे चुके हैं। लाखों कश्मीरियों ने कथित जेहाद के नाम पर अपनी जान गंवाई है। विशेष दर्जे की वजह से हर साल भारत को कश्मीर पर भारी धन खर्च करना पड़ता है। सैन्य आधुनिकीकरण के नाम पर भारी रक्षा बजट खर्च करना पड़ता है। अब उम्मीद की जा रही है कि कश्मीर समस्या हमेशा के लिए सुलझ सकेगी।

    देश की सबसे बड़ी पंचायत में जब धारा 370 (1) के अन्य सभी प्रावधानों को निरस्त करने की बहस चल रही थी तब गांधी परिवार की वजह से ही कांग्रेस इस बिल का विरोध कर रही थी। कांग्रेस ने गुलाम नबी आजाद को अपनी आवाज बनाया। उन्होंने धारा 370 बरकरार रखने की जबर्दस्त पैरवी की। समर्थन में कहा गया कि यदि ये धारा हटाई जाती है तो कश्मीर का उग्रवाद फिलिस्तीन के समान शोला बन जाएगा। सरकार की दृढ़ इच्छा शक्ति के आगे ये प्रतिरोध नहीं टिक सका। अंततः धारा 370 की बेड़ियों से कश्मीर आजाद हो ही गया। आने वाले पंद्रह अगस्त को मोदी सरकार ने देश के लिए सबसे बड़ी सौगात अभी से दे दी है।

    ये सौभाग्य की बात है कि इन दिनों कांग्रेस अध्यक्ष विहीन है। इस वजह से सांसदों के बीच वो संगठनात्मक कसावट नहीं है जो किसी बिल पास कराने या खारिज कराने के लिए जरूरी होती है। यही वजह है कि जब कांग्रेस इस बिल के विरोध में मतदान कर रही थी तब कई सांसद खुलकर सरकार के साथ आ गए।कांग्रेस के चीफ व्हिप भुवनेश्वर कलीता ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा कि पार्टी ने मुझे देश के मूड के खिलाफ व्हिप जारी करने को कहा था। पार्टी आत्महत्या कर रही है। मैं इसका भागीदार नहीं बनना चाहता। दीपेन्द्र हुड्डा और मिलिंद देवड़ा ने भी पार्टी से अलग रुख अपनाया। जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि आजादी के समय जो भूल हुई थी उसे सुधारा जाना स्वागत योग्य है। नतीजा ये रहा कि जम्मू कश्मीर को दो केन्द्र शासित प्रदेशों में बांटने का बिल जब राज्यसभा में पेश हुआ तो इसके पक्ष में 125 और विरोध में 61 वोट पड़े। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने बिल का विरोध किया जबकि बसपा जैसे विरोधी दल समर्थन में रहे। इस घटना ने कांग्रेस की रणनीतिक हार को उजागर कर दिया है।

    अब जबकि पूरे देश में इस फैसले का जबर्दस्त अभिनंदन किया जा रहा है तब कांग्रेस अपनी भूल सुधारने की निरर्थक कोशिश कर रही है। राहुल गांधी के करीबी ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ट्वीट करके कहा कि वे सरकार के इस फैसले का समर्थन करते हैं। साथ में ये पुछल्ला भी जोड़ दिया कि यदि सरकार संवैधानिक तरीकों का पालन करती तो ज्यादा अच्छा होता। जबकि सरकार ने ये कदम कानूनी एहतियात के अंतर्गत उठाया है। जिस संसद की आड़ लेकर राष्ट्रपति से ये कानून लागू करवाया गया था उसी संसद की सलाह पर राष्ट्रपति ने कानून को रदद् कर दिया। कहा गया कि जम्मू कश्मीर की विधानसभा ने इसे स्वीकार किया था और उसकी अनुमति के बगैर धारा को नहीं हटाया जा सकता। जबकि अभी कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लगा हुआ है। जाहिर है ऐसे में किसी प्रकार की संवैधानिक अड़चन आड़े नहीं आती है।

    कांग्रेस की रणनीति हर कदम पर असफल साबित हुई है। जब धारा 370 हट चुकी है और कश्मीर के भीतर भी इसे लेकर सहमति का भाव बन चुका है तब कांग्रेस अपनी करतूतों पर लीपापोती करती नजर आ रही है। इसी रणनीति के चलते ज्योतिरादित्य सिंधिया से ये बयान जारी करवाया गया है। हालांकि इसका कोई औचित्य नहीं है। न तो वे इन दिनों किसी संवैधानिक पद पर हैं और न ही निर्वाचित जन प्रतिनिधि हैं। इसके बावजूद उनका बयान पार्टी के भीतर उठते असहमति के स्वरों को सहारा देने की कवायद जरूर है। यही वजह है कि अब पार्टी के कई नेतागण सरकार के फैसले का समर्थन ये कहते हुए कर रहे हैं कि ये देशहित का मसला है इसलिए वे इससे सहमत हैं।

    जो लोग ये अटकलें लगा रहे हैं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया पार्टी से असहमत हैं और उनकी नाराजगी मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार को अस्थिर कर सकती है वे केवल कांग्रेस को मुखौटे को वास्तविकता का जामा पहनाने का प्रयास कर रहे हैं। इसके बावजूद सिंधिया के बयान कांग्रेस के इस मुखौटे की सच्चाई उजागर कर रहे हैं। सिंधिया समर्थक मंत्रियों से बयान जारी करवाकर ऐसा बताने की कोशिश की गई कि सिंधिया की राय ही पार्टी की राय है। ये भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस सिंधिया को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना सकती है। हालांकि इसकी संभावना बहुत कम है। सिंधिया को मध्यप्रदेश कांग्रेस का ही बड़ा धड़ा अपना नेता नहीं मानता है। ऐसे में राहुल गांधी भी चाहें कि वे सिंधिया को अपना प्रतिनिधि अध्यक्ष बना दें तो वे कारगर साबित नहीं होंगे।

    ये बात भी सही है कि कांग्रेस इन दिनों ऊहापोह से गुजर रही है। उसे अपनी नीतियों पर नए सिरे से विचार करना जरूरी हो गया है। आजादी के दौर की कांग्रेस को छोड़कर इंदिरा कांग्रेस ने जो एकाधिकारवादी रणनीति अपनाई थी वो बाजारवाद की आंधी में अप्रासंगिक हो चली है। ऐसे में कांग्रेस को तय करना होगा कि वो अपने ही नेताओं के बनाए सरकारीकरण के ढांचे का विरोध कैसे करे।फिलहाल तो कांग्रेस के सामने खुद का अस्तित्व बचाए रखने की बड़ी चुनौती है। इसलिए वो चाहकर भी सिंधिया के मुखौटे के पीछे भी अपना चेहरा नहीं छुपा पा रही है।

  • बगैर प्रसाद कैसे मिले आशीर्वाद

    बगैर प्रसाद कैसे मिले आशीर्वाद

    मध्यप्रदेश सरकार ने लोकप्रियता बटोरने के लिए आपकी सरकार जनता के द्वार कार्यक्रम शुरु किया है। इस कार्यक्रम के माध्यम से सरकारी अफसर केम्प लगाकर जन समस्याओं का निदान करेंगे।नई बोतल में पुरानी शराब की तरह सरकार का ये कार्यक्रम जनता के बीच संवाद कायम करने का प्रयास है।प्रदेश की अधिसंख्य आबादी ने कांग्रेस को सत्ता नहीं सौंपी है। भाजपा को मिले मतों की संख्या कांग्रेस को मिली मत संख्या से अधिक है। जाहिर है कि जनता का बहुत बड़ा तबका कांग्रेस की नीतियों से इत्तेफाक नहीं रखता है। इसके बावजूद कांग्रेस सीटों के गणित की वजह से सत्ता में आ गई है।यही वजह है कि सरकार की नीतियों के प्रति जनता के बीच संतोष का भाव अब तक नहीं पनप पाया है।मुख्यमंत्री कमलनाथ ये बात अच्छी तरह जानते हैं। यही वजह है कि वे सत्ता का संचालन राज्य मंत्रालय में बैठकर ही चला रहे हैं। उन्हें मालूम है कि जब तक वे जनता को कुछ चमत्कार करके नहीं दिखा सकते तब तक जनता के बीच जाने पर उनका स्वागत फीके अंदाज में ही किया जाएगा। यही वजह है कि उनकी सरकार समस्याओं का इलाज करने के बजाए उन पर हाथ फेरने का उपाय अधिक कर रही है। सरकारी तंत्र जनता की समस्याओं के निदान के लिए जवाबदार है और उसके लिए सरकारी व्यवस्था ने बाकायदा बारह मासी दफ्तर लगाकर तैनात किया है। इसके बावजूद जनता की समस्याएं नहीं सुलझ पाती हैं। इसकी वजह सरकारी अफसरों और कर्मचारियों की लापरवाही और लालफीताशाही जिम्मेदार है। इसका समाधान अधिकाधिक योजनाओं को सरकारी तंत्र से मुक्ति दिलाकर ही किया जा सकता है। सरकार इसका समाधान उसी सरकारी तंत्र पर निर्भर होकर करना चाह रही है। राजीव गांधी की पंचायती राज व्यवस्था इसी सरकारी तंत्र को बाईपास करने का प्रयास था। पूर्व वर्ती दिग्विजय सिंह की सरकार ने भी इसी तरह की योजना चलाकर गांव गांव जाने का प्रयास किया था। वह योजना भ्रष्टाचार का विकेन्द्रीकरण बन गई थी। बुरी तरह असफल उस योजना की वजह से ही राज्य में भाजपा की सरकार का उदय हुआ था। पंद्रह सालों की भाजपा सरकार इस योजना से इतनी डरी हुई थी कि शिवराज सिंह चौहान ने कभी दुबारा अफसरों को बाईपास करने का साहस नहीं किया। वे अपनी सरकार अफसरों पर ही आश्रित रहकर चलाते रहे। यही वजह थी कि उनकी सरकार के कार्यकाल में भाजपा के कार्यकर्ता और नेता हमेशा शिकायत करते रहे कि अफसर हमारी बात नहीं सुनते हैं। कमलनाथ ने सरकार में आते ही अफसरों पर शिकंजा कसना शुरु कर दिया। तबादलों की बयार लाकर उन्होंने पहले तो अफसरों की जड़ें ढीली कीं और फिर कार्यकर्ताओं की शिकायतों पर उन्हें फुटबाल बना दिया। आज ये हालत है कि भारी चंदा देकर मनचाही पोस्टिंग पर पहुंचे अफसर को भी भरोसा नहीं कि वो अपनी पोस्टिंग पर बना रहेगा। एक अदना सा कार्यकर्ता यदि उसके कामकाज से असंतुष्ट होता है तो अफसर को उसकी पोस्टिंग से हटा दिया जाता है। सरकार अपनी इस नीति से अफसरशाही को लोकशाही में बदलने का प्रयास कर रही है। बरसों पुराने ये प्रयास बार बार असफल रहे हैं। अफसरों के चयन की प्रक्रिया और लोकतंत्र का ढर्रा इतना बिगड़ चुका है कि अब इसे कारगर प्रशासन का रूप दे पाना असंभव है। इसके बावजूद कमलनाथ प्रदेश में तीस साल पुराने सरकारीकरण को सफल बनाने का प्रयास कर रहे हैं। जो व्यवस्था प्रदेश और देश के विकास के लिए अनुत्पादक साबित हो चुकी है कमलनाथ उसे सफल होता दिखाने का प्रयास कर रहे हैं।मध्यप्रदेश राज्य अपनी इस अनुत्पादक व्यवस्था पर हर महीने तीन हजार दो सौ करोड़ रुपए खर्च करता है।वेतनमान बढ़ाए जाने के बाद इस व्यवस्था पर खर्च और भी ज्यादा बढ़ गया है। इसकी तुलना में राज्य को होने वाली मासिक आय घटी है। राजनैतिक चंदा वसूली की वजह से खजाने को होने वाली आय पर चोट पहुंची है। सरकार का लक्ष्य है कि इस कवायद से वह उस राजस्व को एकत्रित कर पाने में सफल होगी जो आज भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है। राज्य के बजट में टैक्स का आकलन भी बढ़ाकर किया गया है। राज्य सरकार यदि फिजूलखर्ची रोकने में सफल होती तो वह जनता के बीच अपनी लोकप्रियता बढ़ा सकती थी। फिलहाल तो सरकारी कवायद का सीधा असर जनता की जेब पर पड़ रहा है। सरकारी उठापटक का खमियाजा जनता को भुगतना पड़ रहा है। जिस तरह खाद्य वस्तुओं के सैंपल भरे जा रहे हैं और इसकी आड़ में भारी चंदा वसूली की जा रही है उसका बोझ अंतिम पंक्ति में पड़े आम नागरिक को उठाना पड़ रहा है। शायद यही लोकतंत्र की वह मंहगी कीमत है जो आम जनता को भुगतनी पड़ रही है।अगस्त का महीना आजादी के आकलन का महीना माना जाता है। जनता जाति, धर्म, संप्रदाय, बाजारवाद के जिन मुद्दों के बीच उलझी है उसके बीच वह इन मूलभूत मुद्दों का चिंतन आमतौर पर नहीं कर पाती है। सरकार को और राजनेताओं को इस विषय पर चिंतन जरूर करना चाहिए। फिलहाल तो सरकार का ये प्रयास होना चाहिए कि वो जनता के भरोसे को कैसे कायम रख पाती है।