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  • भाजपा के सफल विकासवाद का उद्घोष करता नर्मदा समझौता

    भाजपा के सफल विकासवाद का उद्घोष करता नर्मदा समझौता

    मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने मध्यप्रदेश के स्वर्णिम आकाश में एक जबर्दस्त छलांग लगाकर दिखाई है। विकास की अवधारणा को लेकर दशकों तक शोर मचाते आंदोलनकारी आज भी समझने को राजी नहीं हैं कि विकास की बयार किसी भी जड़ता से मीलों आगे निकल जाती है। यही नहीं देश के बड़े अखबारों के माध्यम से इन बुद्धिजीवियों ने एक बार फिर भ्रम फैलाने का खटराग शुरु कर दिया है। जबकि पूंजी को चलायमान करने वाली भाजपा की विचारधारा ने इस समझौते के माध्यम से ये संदेश देने का प्रयास किया है कि विकास की धारा को किसी कीमत पर थमने नहीं दिया जाएगा। वास्तव में नर्मदा घाटी परियोजना स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी बहुउद्देशीय नदी परियोजनाओं में गिनी जाती है। सरदार सरोवर परियोजना से जुड़े वित्तीय दायित्वों, डूब क्षेत्र, पुनर्वास और मुआवजे को लेकर मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के बीच वर्षों से विवाद चलता रहा। जुलाई 2026 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में चारों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने लंबित वित्तीय दावों और नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण (NWDT) के पुरस्कार से जुड़े मुद्दों के समाधान के लिए एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी हस्ताक्षर किए। केंद्र सरकार के अनुसार इसका उद्देश्य दशकों से लंबित भुगतान, लागत साझेदारी तथा पुनर्वास संबंधी विवादों का स्थायी समाधान करना रहा है।

    मध्यप्रदेश के दृष्टिकोण से देखें तो इस समझौते का सबसे बड़ा लाभ यह है कि लंबे समय से अटके वित्तीय दावे और भुगतान का रास्ता साफ हुआ है। पिछले कुछ वर्षों से मध्यप्रदेश सरकार का दावा रहा था कि सरदार सरोवर परियोजना के कारण राज्य की बड़ी मात्रा में राजस्व भूमि, वन भूमि तथा अन्य सरकारी संपत्तियाँ डूब क्षेत्र में चली गईं, जिनका समुचित प्रतिपूर्ति मूल्य अभी तक प्राप्त नहीं हुआ था। इस विवाद के कारण हजारों करोड़ रुपये की राशि वर्षों से लंबित थी। समझौते के बाद एकमुश्त समाधान (One-Time Settlement) की दिशा में सहमति बनने से मध्यप्रदेश की वित्तीय स्थिति को लाभ मिलने की संभावना है। डैमिंग द नर्मदा किताब लिखने वाले नर्मदा आंदोलनकारी रमेश बिल्लौरे जब गांव गांव जाकर बांध के विरोध में अलख जगाने की कोशिश कर रहे थे तब भी बांध प्रभावित बांध के विरोध में नहीं थे। उनका डर था कि उनकी संपत्तियों का मुआवजा मिलेगा भी या नहीं। तब कांग्रेस की डिफाल्टर सरकारें हुआ करती थीं और किसी को ये विश्वास नहीं था कि सरकार मुआवजा कैसे दे पाएगी।

    इस बहुपक्षीय समझौते से प्रभावित हितधारकों की सूची बहुत बड़ी है। सबसे पहले प्रभावित होंगे वे हजारों परिवार जो नर्मदा घाटी में विस्थापित हुए। यदि समझौते के अनुरूप लंबित भुगतान और पुनर्वास संबंधी दायित्वों का समयबद्ध क्रियान्वयन होता रहेगा, तो उन्हें वर्षों से लंबित राहत मिल सकती है। दूसरा बड़ा वर्ग मध्यप्रदेश सरकार का है, जिसे लंबित वित्तीय दावों के समाधान से राजकोषीय राहत मिलेगी। तीसरा लाभार्थी कृषि और सिंचाई क्षेत्र है, क्योंकि अंतरराज्यीय विवाद समाप्त होने से परियोजना के संचालन और भविष्य के जल प्रबंधन में अधिक स्थिरता आएगी। चौथा लाभ उद्योग और ऊर्जा क्षेत्र को होगा, क्योंकि परियोजना से जुड़ी बिजली उत्पादन और जल प्रबंधन योजनाओं में समन्वय बढ़ेगा।

    पुनर्वास और मुआवजे का प्रश्न नर्मदा परियोजना का सबसे संवेदनशील पक्ष रहा है। नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण ने विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश दिए थे। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने भी विभिन्न मामलों में यह स्पष्ट किया कि पुनर्वास परियोजना का अभिन्न हिस्सा है और इसके बिना निर्माण कार्य आगे नहीं बढ़ सकता। समय के साथ भूमि के बदले भूमि, नकद मुआवजा, आवासीय भूखंड, आधारभूत सुविधाएँ तथा पुनर्वास स्थलों का विकास जैसी व्यवस्थाएँ लागू की गईं। हालिया समझौते का उद्देश्य इन्हीं लंबित वित्तीय दायित्वों और भुगतान संबंधी विवादों का अंतिम निपटारा करना है, जिससे प्रभावित परिवारों और राज्यों के बीच शेष विवाद समाप्त हो सकें।

    नर्मदा आंदोलन का नेतृत्व करने वालों का कहना था कि बिना पर्याप्त पुनर्वास के बड़े बांध का निर्माण मानवाधिकारों का उल्लंघन होगा। उनके प्रयासों के कारण पुनर्वास नीति पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर बहस हुई और सरकारों को पुनर्वास मानकों में कई बार सुधार करना पड़ा।इससे जहां प्रभावितों को मुआवजा मिलना सुनिश्चित हुआ वहीं परियोजना में विलंब से देश को एक मंहगी कीमत भी चुकानी पड़ी। बांध विरोध की लड़ाई यदि परियोजना स्थापना के वक्त लड़ी गई होती तो परियोजना का रूप कुछ और हो सकता था। बाद के वर्षों में खड़ा किया गया जन असंतोष विकास के मार्ग में बड़ा अवरोध बन गया। विकास के कथित गांधीवादी मॉडल की आड़ लेकर विकास विरोधियों ने प्रदेश और देश की तरुणाई को गुमराह किया जो आज भी एक चुनौती बना हुआ है।

    सरकारों तथा परियोजना समर्थकों का मत रहा कि लगातार न्यायालयी लड़ाइयों, धरना-प्रदर्शनों और पर्यावरणीय आपत्तियों के कारण परियोजना वर्षों तक विलंबित हुई, जिससे सिंचाई, पेयजल और विद्युत उत्पादन के अपेक्षित लाभ देर से मिले तथा लागत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर परियोजना को आगे बढ़ाने की अनुमति दी, साथ ही पुनर्वास संबंधी शर्तों के पालन पर भी बल दिया। इसलिए यह कहना अधिक संतुलित होगा कि आंदोलन ने परियोजना को पूरी तरह रोक नहीं दिया, बल्कि उसके क्रियान्वयन की गति और पुनर्वास नीति—दोनों को प्रभावित किया।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की भूमिका इस समझौते में राजनीतिक और प्रशासनिक—दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण रही। उन्होंने मध्यप्रदेश की ओर से समझौते पर हस्ताक्षर कर यह संकेत दिया कि राज्य अब दशकों पुराने विवादों को समाप्त कर विकास परियोजनाओं को गति देना चाहता है। राज्य सरकार लगातार यह तर्क देती रही है कि नर्मदा परियोजना से सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन के व्यापक लाभ प्राप्त हुए हैं तथा शेष वित्तीय विवादों का समाधान विकास की गति बढ़ाएगा। समझौते में उनकी भागीदारी इस राजनीतिक प्रतिबद्धता का संकेत मानी जा रही है।
    राज्य के मुख्य सचिव अनुराग जैन ने राज्य के वित्तीय सुधारों को लागू करते हुए प्रशासनिक दक्षता का युक्तियुक्त समाधान प्रस्तुत किया। नर्मदा घाटी विकास विभाग को वे तमाम अनुमतियां दी गईं जिनसे राज्यों के बीच ये समझौता आकार ले सका। ऐसे अंतरराज्यीय समझौतों में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों का कार्य राज्यों के दावों का परीक्षण, वित्तीय देयताओं का मिलान, कानूनी बिंदुओं का समन्वय तथा अंतिम मसौदे की तैयारी करना होता है। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी से यह स्पष्ट है कि मध्यप्रदेश के अधिकारियों ने गुजरात तथा अन्य राज्यों के अधिकारियों के साथ लंबे समय तक तकनीकी और वित्तीय स्तर पर बातचीत की, जिसके बाद राजनीतिक स्तर पर अंतिम समझौता संभव हो सका। हालांकि सार्वजनिक स्रोतों में प्रत्येक वार्ता चरण में व्यक्तिगत अधिकारियों की विस्तृत भूमिका का आधिकारिक विवरण उपलब्ध नहीं है।

    समग्र रूप से देखें तो यह समझौता केवल वित्तीय विवाद का समाधान नहीं है, बल्कि सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) का एक महत्वपूर्ण उदाहरण भी है। यदि लंबित भुगतान वास्तव में समय पर हो जाते हैं, पुनर्वास के शेष मामलों का न्यायसंगत निपटारा होता है और परियोजना से जुड़े सभी राज्यों के बीच समन्वय बना रहता है, तो मध्यप्रदेश को वित्तीय, कृषि, ऊर्जा तथा जल प्रबंधन—चारों क्षेत्रों में दीर्घकालिक लाभ मिल सकते हैं। वहीं यह भी उतना ही आवश्यक होगा कि विकास के साथ विस्थापित परिवारों के अधिकारों की अनदेखी न हो। किसी भी बड़ी नदी परियोजना की सफलता केवल बांध बनने से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि उससे प्रभावित अंतिम व्यक्ति को भी न्याय मिला या नहीं। यही इस ऐतिहासिक समझौते की वास्तविक कसौटी होगी।नर्मदा समग्र के सूत्रधार अनिल माधव दवे के प्रयासों को इस समझौते ने सच्ची श्रद्धांजलि दी है जिन्होंने नर्मदा और इस जैसी माता समान नदियों के विकास को लेकर पूरी अवधारणा प्रस्तुत की थी।

  • मुख्यमंत्री नहीं तो क्या माफिया होगा भूपति

    मुख्यमंत्री नहीं तो क्या माफिया होगा भूपति

    भोपाल 24 जून(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्यप्रदेश की राजनीति में एक बार फिर जमीन कारोबार और कथित भूमि सौदों को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और उनके परिवार से जुड़े भूमि कारोबार को लेकर कांग्रेस लगातार सवाल उठा रही है, जबकि भारतीय जनता पार्टी इसे राजनीतिक प्रेरित अभियान बताते हुए पलटवार कर रही है। हाल के दिनों में राष्ट्रीय मीडिया में प्रकाशित कुछ रिपोर्टों और सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं ने इस विवाद को और अधिक चर्चित बना दिया है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि आरोपों और राजनीतिक बयानों से अलग हटकर उपलब्ध तथ्यों, कानूनी स्थिति और राजनीतिक संदर्भ का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण किया जाए।

    मध्यप्रदेश में पिछले कुछ वर्षों के दौरान खनन, भू-माफिया, अवैध कॉलोनियों, भूमि अतिक्रमण और सरकारी जमीनों पर कब्जों के विरुद्ध विभिन्न स्तरों पर कार्रवाई की गई है। भाजपा का दावा है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में माफिया और संगठित हित समूहों के खिलाफ सख्त अभियान चलाया गया है। सरकार का कहना है कि अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण और प्रशासनिक सख्ती के कारण कई प्रभावशाली समूहों के आर्थिक हित प्रभावित हुए हैं। भाजपा नेताओं का आरोप है कि यही कारण है कि कुछ वर्ग राजनीतिक माध्यमों से सरकार को घेरने का प्रयास कर रहे हैं। सरकार पर कलंक का पोस्टर चिपकाने में जुटे ये वही माफिया ताकतें हैं जो लंबे समय से राज्य की सत्ता को घेरे रहीं हैं। कांग्रेस के बाद शिवराज सरकार भी इन लुटेरों के दबाव में बनी रही है। कमलनाथ सरकार के कार्यकाल में तो ये बेलगाम हो चले थे। इनसे निपटने के लिए ही डाक्टर मोहन यादव को मध्यप्रदेश की कमान सौंपी गई थी। उनकी सरकार की कार्रवाई से अब वो माफिया खौफजदा है जिसे अपनी बारी का इंतजार करना पड़ रहा है।

    दूसरी ओर कांग्रेस का आरोप है कि मुख्यमंत्री और उनके परिवार से जुड़े भूमि कारोबार की गहन जांच होनी चाहिए। कांग्रेस का कहना है कि सार्वजनिक जीवन में उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों के आर्थिक हितों और व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर पूर्ण पारदर्शिता आवश्यक है। पार्टी का तर्क है कि यदि किसी प्रकार की अनियमितता नहीं हुई है तो जांच से सरकार को भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। कांग्रेस नेताओं ने विभिन्न मंचों पर भूमि लेन-देन से जुड़े दस्तावेजों और व्यावसायिक गतिविधियों का हवाला देते हुए सवाल उठाए हैं।

    इस पूरे विवाद के बीच एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि डॉ. मोहन यादव का परिवार लंबे समय से व्यवसायिक गतिविधियों से जुड़ा रहा है और भूमि कारोबार भी उनके पारिवारिक व्यवसाय का हिस्सा रहा है। सार्वजनिक जीवन में आने से पहले तथा राजनीतिक पदों पर पहुंचने से पूर्व भी परिवार विभिन्न प्रकार के वैध व्यवसायों में सक्रिय रहा है। भाजपा का कहना है कि किसी व्यक्ति या उसके परिवार द्वारा वैध रूप से भूमि खरीदना, बेचना अथवा रियल एस्टेट कारोबार करना अपने आप में कोई अपराध नहीं है। किसी भी आरोप को प्रमाणित करने के लिए यह दिखाना आवश्यक होगा कि कानून का उल्लंघन हुआ है, सरकारी पद का दुरुपयोग किया गया है अथवा किसी प्रकार का अनुचित लाभ प्राप्त किया गया है।

    सरकार के समर्थकों और भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल का यह भी तर्क है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद डॉ. मोहन यादव के नई भूमि खरीदने या निजी लाभ के लिए पद के दुरुपयोग का अब तक कोई प्रमाण सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। यदि किसी रिपोर्ट में परिवार की पुरानी व्यावसायिक गतिविधियों या पूर्व में हुए भूमि सौदों का उल्लेख किया गया है, तो उसे सीधे तौर पर मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए किए गए किसी कथित दुरुपयोग से जोड़ना उचित नहीं माना जा सकता। भाजपा का कहना है कि सार्वजनिक दस्तावेजों में उपलब्ध जानकारी को संदर्भ से हटाकर प्रस्तुत किया जा रहा है।

    विश्लेषकों का मानना है कि विवाद का एक बड़ा पक्ष राजनीतिक भी है। मध्यप्रदेश में कांग्रेस और भाजपा के बीच लंबे समय से सत्ता संघर्ष जारी है। ऐसे में मुख्यमंत्री जैसे शीर्ष राजनीतिक चेहरे पर लगाए गए आरोप स्वाभाविक रूप से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाते हैं। विपक्ष का दायित्व सरकार से जवाब मांगना होता है, वहीं सरकार का दायित्व तथ्यों के आधार पर अपनी स्थिति स्पष्ट करना होता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में दोनों भूमिकाएं समान रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

    सोशल मीडिया ने इस विवाद को और अधिक जटिल बना दिया है। विभिन्न राजनीतिक समर्थक समूह अपने-अपने दृष्टिकोण से जानकारी साझा कर रहे हैं। कई बार अधूरी सूचनाएं, पुराने दस्तावेज या अपुष्ट दावे भी व्यापक रूप से प्रसारित हो जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में केवल सोशल मीडिया पोस्ट या राजनीतिक आरोपों के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। किसी भी गंभीर आरोप की पुष्टि के लिए राजस्व अभिलेख, पंजीयन दस्तावेज, न्यायालयीन रिकॉर्ड और जांच एजेंसियों के निष्कर्ष अधिक महत्वपूर्ण होते हैं।

    राजनीतिक पर्यवेक्षकों का यह भी मानना है कि वर्तमान विवाद केवल भूमि कारोबार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आगामी राजनीतिक रणनीतियों का भी हिस्सा हो सकता है। कांग्रेस राज्य सरकार को भ्रष्टाचार और कथित हितों के टकराव के मुद्दे पर घेरना चाहती है, जबकि भाजपा विपक्ष पर विकास कार्यों और प्रशासनिक उपलब्धियों से ध्यान भटकाने का आरोप लगा रही है। दोनों दलों के बीच यह संघर्ष आने वाले समय में और तीखा हो सकता है।

    कानूनी दृष्टि से देखा जाए तो किसी भी सार्वजनिक पदाधिकारी के विरुद्ध लगाए गए आरोप तब तक आरोप ही माने जाते हैं जब तक उन्हें सक्षम जांच अथवा न्यायिक प्रक्रिया द्वारा सिद्ध न कर दिया जाए। इसी प्रकार किसी भी व्यक्ति को केवल राजनीतिक आरोपों के आधार पर दोषी नहीं माना जा सकता। भारतीय न्याय व्यवस्था में प्रमाण, जांच और निष्पक्ष सुनवाई का सिद्धांत सर्वोपरि है। इसलिए इस पूरे विवाद का अंतिम मूल्यांकन भी तथ्यों और जांच के आधार पर ही संभव होगा।

    मध्यप्रदेश की जनता के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या आरोपों के समर्थन में पर्याप्त और ठोस प्रमाण उपलब्ध हैं, अथवा यह मामला राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित है। फिलहाल उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी के आधार पर यह स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री के परिवार का भूमि कारोबार से पुराना संबंध रहा है, लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद भूमि खरीद अथवा पद के दुरुपयोग से संबंधित आरोपों पर कोई अंतिम कानूनी निष्कर्ष सामने नहीं आया है। ऐसे में राजनीतिक बहस जारी रह सकती है, परंतु अंतिम सत्य का निर्धारण तथ्यों, दस्तावेजों और विधिक प्रक्रिया से ही होगा।

    मध्यप्रदेश की राजनीति में यह विवाद आने वाले दिनों में भी चर्चा का विषय बना रहेगा। विपक्ष जवाब मांगता रहेगा, सरकार अपनी सफाई देती रहेगी और जनता दोनों पक्षों के तर्कों का मूल्यांकन करती रहेगी। लोकतंत्र की यही विशेषता है कि प्रश्न पूछे जाएं, जवाब दिए जाएं और अंततः निर्णय तथ्यों के आधार पर हो, न कि केवल राजनीतिक शोरगुल के आधार पर।

  • मोहन ने लगाया छन्ना तो उखड़ पड़े खैराती नगर सेठ

    मोहन ने लगाया छन्ना तो उखड़ पड़े खैराती नगर सेठ

    भले ही भारत की अर्थव्यवस्था वृद्धि दर के लिहाज़ से मजबूत मानी जा रही है, लेकिन देश पर बढ़ते कर्ज को कई विदेशी ताकतें भाजपा सरकारों की असफलता ठहराने का प्रयास कर रहीं हैं। केंद्र और राज्यों दोनों का कर्ज लगातार बढ़ रहा है और इसका प्रत्यक्ष असर राज्यीय अर्थव्यवस्थाओं पर भी दिख रहा है। मध्यप्रदेश भी इससे अछूता नहीं है। यहाँ सरकार लगातार बड़े बजट और जनकल्याण योजनाओं के साथ आर्थिक गतिविधियों को तेज़ करने का प्रयास कर रही है, लेकिन इन पहलों का वित्तीय भार राज्य की ऋण-प्रणाली को चुनौती देता बताया जा रहा है।ये सारा शोर कमोबेश वही लोग मचा रहे हैं जो अब तक शिवराज सिंह चौहान की सरकार के दौरान मलाई छानते रहे हैं।


    भारत में पिछले कुछ वर्षों में सरकारी एवं घरेलू—दोनों स्तरों पर कर्ज तेज़ी से बढ़ा है। कोविड के बाद पुनरुद्धार पैकेज, बुनियादी ढाँचे में निवेश, सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता ने सरकारी उधारी पर निर्भरता बढ़ाई है। राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते ऋण का सीधा असर राज्यों की उधारी सीमा, बाजार ब्याज दरों और उधार की लागत पर पड़ता है। केंद्र की उधारी बढ़ने से बाजार में बांडों की मांग प्रभावित होती है और राज्यों को ऊँचे ब्याज पर ऋण लेना पड़ता है। यही स्थिति आज मध्यप्रदेश समेत कई राज्यों के सामने है।


    विधानसभा के हालिया सत्र में अनुपूरक बजट प्रस्तावों पर चर्चा करते हुए प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डाक्टर राजेन्द्र सिंह ने कहा कि सरकार पर कर्ज का बोझ लगभग चार लाख अस्सी हजार करोड़ से ज्यादा हो गया है। ये राज्य के कुल बजट से भी ज्यादा है। राज्य पर ब्याज का बोझ भी बढ़ता जा रहा है और सरकार की विकास योजनाएं प्रभावित हो रहीं हैं। मध्यप्रदेश का वार्षिक बजट जहाँ लगातार बढ़ा है, वहीं राज्य का कर्ज उससे भी तेज़ी से ऊपर गया है। 2025 तक उपलब्ध सरकारी आँकड़ों के अनुसार, राज्य पर बकाया ऋण लगभग 4.4–4.6 लाख करोड़ रुपयों तक पहुँच चुका है—जो राज्य के वार्षिक बजट (लगभग 4.21 लाख करोड़) से भी अधिक है।
    इसके अलावा, वर्ष 2025 के भीतर सरकार ने कई बार तात्कालिक उधारी (short-term borrowing) ली—जो यह संकेत देती है कि योजनाओं और भुगतान दायित्वों को पूरा रखने के लिए सरकार को बाजार से बार-बार धन जुटाना पड़ रहा है। राज्य की ऋण-से-GSDP अनुपात (Debt-to-GSDP Ratio) भी बढ़कर 31% के आसपास पहुँच गया है, जो आदर्श वित्तीय सीमा से अधिक माना जाता है।


    ऐसा कहा जा रहा है कि लाड़ली बहना योजना की वजह से सरकार झमेले में पड़ रही है। हालांकि ये योजना डाक्टर मोहन यादव को विरासत में मिली थी।वर्तमान सरकार ने महिलाओं को आर्थिक आधार देने के लिए ‘लाडली बहना’ योजना को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। उन्हें दी जाने वाली रकम भी बढ़ाई है। योजना की मासिक किश्तें और लगातार बढ़ती पात्रता संख्या के कारण राज्य को हर माह बड़ी राशि खर्च करनी पड़ती है। यह योजना सामाजिक रूप से अत्यंत प्रभावी है, लेकिन इसके लिए आवश्यक बजट का एक बड़ा हिस्सा उधार पर निर्भर है।


    सरकारी कर्मचारियों के वेतन-संशोधन, महंगाई भत्ते और पेंशन दायित्व बढ़े हैं, जिससे सरकार का नियमित राजस्व व्यय लगातार ऊपर जा रहा है। मेडिकल कॉलेज, नदी-लिंक, पर्यटन अवसंरचना और औद्योगिक इकाइयों पर बड़े निवेश की पहल की गई है। ये प्रोजेक्ट दीर्घकाल में लाभ देंगे, लेकिन शुरुआती वर्षों में इन पर भारी पूंजी खर्च की आवश्यकता होती है—जो उधारी के सहारे पूरी की जा रही है। सरकार ने मई से अक्टूबर 2025 के बीच कई बार 3,000–5,000 करोड़ रुपये के कर्ज लिए। यह नकदी-अभाव और बढ़ते भुगतान दायित्वों की ओर संकेत बताया जा रहा है। जबकि वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि ये रकम देश की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ाने में प्रयुक्त हो रही है इसलिए इस पर ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं है।


    डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में राज्य सरकार की प्राथमिकता जनकल्याण, महिलाओं का सशक्तिकरण, बड़े बुनियादी प्रोजेक्ट पर कार्य, औद्योगिक विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य पर नए निवेश के रूप में जारी है। इन सभी पहलों को जनता का समर्थन भी प्राप्त है। परंतु यह भी सच है कि इतनी व्यापक योजनाओं के लिए राज्य को सशक्त राजस्व आय की आवश्यकता है,जो अभी सीमित है। यही कारण है कि सरकार को बार-बार उधार लेकर नीतियों को गति देनी पड़ रही है। राजनीतिक दृष्टि से ये योजनाएँ मजबूत आधार बनाती हैं, लेकिन आर्थिक दृष्टि से ऋण-पोषित कल्याण मॉडल लंबे समय में चुनौती बन सकता है।


    वित्तीय तरलता घटने से कई कार्यक्रम गड़बड़ा जाते हैं। जब कर्ज बढ़ता है, तो बजट का बड़ा हिस्सा ब्याज भुगतान में जाता है। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचे में निवेश कम पड़ने का खतरा होता है। उच्च ऋण/GSDP अनुपात से राज्य की क्रेडिट रेटिंग प्रभावित होती है, और आने वाले वर्षों में उधार लेना महंगा हो सकता है। कर्ज जितना बढ़ता जाएगा, नीति-निर्माताओं के पास नई योजनाओं के लिए वित्तीय गुंजाइश उतनी ही कम होती जाएगी।
    मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव ने आय बढ़ाने वाले विभागों पर तेजी से कार्य करने का फैसला लिया है। उसका प्रयास है कि राजस्व आय बढ़े,उद्योग और पर्यटन पर निवेश बढ़ाने की नई नीतियां लाई जाएं। जीएसटी की प्रक्रिया मजबूत हो और कर संग्रहण की स्थितियों में सुधार हो। राज्य के संसाधनों और संपत्तियों का इस तरह से पुर्ननियोजन किया जाए कि उनसे आय बढ़ाई जा सके और बर्बादी रोकी जा सके। कल्याण योजनाओं के लिए लाभार्थियों की नियमित समीक्षा कर खर्च की दक्षता बेहतर की जा सकती है। सरकारी खरीद और प्रशासनिक खर्च में कटौती कर कर्ज निर्भरता को कम किया जा सकता है। ऐसे प्रोजेक्ट जिनसे सीधे राजस्व आय बढ़ती है — कृषि वैल्यू चेन, पर्यटन, स्वास्थ्य सेवाएँ, स्टार्टअप इकॉनमी — इन्हें प्राथमिकता मिलनी चाहिए।


    मध्यप्रदेश आज दो राहे पर खड़ा है उसे अपनी जन हितकारी योजनाएं जारी रखनी हैं लेकिन उसे अपने कर्ज के निवेश से आय के नए संसाधन भी विकसित करने हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की नीतियाँ सकारात्मक सामाजिक बदलाव ला रही हैं, किंतु इन नीतियों की वित्तीय स्थिरता तभी सुनिश्चित हो पाएगी जब राज्य कर्ज-निर्भरता से निकलकर मजबूत राजस्व-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ेगा। राज्य के लिए चुनौती यह नहीं कि योजनाएँ जारी रहें या नहीं—बल्कि यह है कि उन्हें वित्तीय दृष्टि से टिकाऊ कैसे बनाया जाए। यही वह बिंदु है जो आने वाले वर्षों में मध्यप्रदेश की आर्थिक सेहत और विकास गति दोनों तय करेगा।

  • खुद को महाराजा साबित करने पर क्यों तुले हैं शिवराज सिंह

    खुद को महाराजा साबित करने पर क्यों तुले हैं शिवराज सिंह


    अटल आडवाणी के खास सिपहसालार प्रमोद महाजन ने जब मध्यप्रदेश पर अपना आधिपत्य जमाने के लिए शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बनाकर भेजा था तब तक वे एक संघर्षरत नेता के रूप में ही पहचाने जाते थे। उमा भारती के तूफानी नेतृत्व के सामने शिवराज सिंह एक टिमटिमाते दिए की भांति थे। बाबूलाल गौर महज केयर टेकर के रूप में थे और उन्हें किनारे खिसका दिया गया था।भाजपा की लगभग डेढ़ दो दशक की सत्ता संभालने के बाद राज्य भले ही साढ़े तीन लाख करोड़ के कर्जे में डूब गया हो लेकिन शिवराज सिंह चौहान आज महाराजा बनकर सामने उपस्थित हैं। वे बार बार ये अहसास कराने का प्रयास भी करते रहते हैं कि आज भी राज्य में उनकी हैसियत कम नहीं हुई है। उनके बेटे की शादी में राजधानी भोपाल में जो रिसेप्शन हुआ वह उनके इन्हीं तेवरों का प्रदर्शन था। साल भर पहले मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव के बेटे की शादी तो इस जश्न के सामने फीकी नजर आती है। शादी के इस जश्न ने भाजपा की रीति नीति और सोच को लेकर कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं। मुख्यमंत्री रहते हुए डाक्टर मोहन यादव ने जिस पारिवारिक आयोजन को सादगीपूर्ण तरीके से मनाया उसे शिवराज सिंह ने आखिर क्यों अपनी शान की कुतुब मीनार बनाकर पेश किया।

    मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव ने बेटे की शादी को केवल पारिवारिक आयोजन बनाया


    लगभग साल भर पहले मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव के बेटे की शादी राजस्थान के पुष्कर स्थित पुष्करा रिसोर्ट से हुई थी।पुत्र वैभव की शादी में शामिल होने के लिए सीएम डाक्टर मोहन यादव भी पहुंचे थे। दो दिनों के इस आयोजन में ध्यान रखा गया था कि लोगों को कोई परेशानी न हो। सुरक्षा की दृष्टि से पुलिस ने आयोजन के आधे घंटे पहले पुष्कर सरोवर और ब्र्हमा मंदिर खाली करा दिया था। बाद में रिसोर्ट में पुत्र वैभव और पुत्र वधू शालिनी यादव का पाणिग्रहण संस्कार संपन्न हुआ। इस आयोजन में पूजा अर्चना के बाद मोहन यादव की पत्नी सीमा यादव ने अपने पति के चरण धोए और आशीर्वाद लिया।
    इसके विपरीत शिवराज सिंह चौहान के बेटे की शादी का आयोजन तीन चरणों में और भव्यता के बीच संपन्न किया जा रहा है। पहले चरण में जैत गांव में नगर भोज दिया गया जिसमें आसपास के गांवों के करीब एक लाख लोग शामिल हुए। राजधानी के भव्य समारोह में लगभग बीस हजार से अधिक लोगों ने नगर भोज में हिस्सा लिया। इसी तरह दिल्ली का आयोजन भी भव्य रखा गया है। शिवराज सिंह के करीबी बताते हैं कि ये आयोजन जन सहयोग से विशाल बन गया है। टेंट और भोजन की व्यवस्था माजिद भाई संभाले हुए थे। उनके पिता कंजे मियां राजधानी के नामी गिरामी टैंट हाऊस के मालिक थे। अपने कार्यकाल में शिवराज सिंह चौहान उन्हें लगभग पांच हजार करोड़ रुपयों से अधिक का भुगतान कर चुके हैं। इसी तरह सत्ता में रहते हुए उन्होंने जिन अफसरों और ठेकेदारों को भरपूर कमाई कराई वे सभी उनकी कृषि मंत्री की भूमिका से आशान्वित हैं।
    इस आयोजन की भव्यता राजनेताओं के सामने कई सवाल खड़े कर रही है। भाजपा खुद को आरएसएस की राजनीतिक उत्तराधिकारी मानती है। उसके पूर्वज चना चबेना खाकर संगठन को गढ़ने का कार्य करते रहे हैं। जबकि उसी भाजपा के वर्तमान राजनेता खुद को महाराजा साबित करने में जुटे हुए हैं। खुद को किसान पुत्र बताकर शिवराज सिंह चौहान ने मध्यप्रदेश की सत्ता में लंबी पारी खेली और वे अब इसी छवि को लेकर केन्द्रीय कृषि मंत्री भी हैं। उनके बेटे की हैसियत इतनी बड़ी नहीं कि इतना विशाल आयोजन कर सके। खुद शिवराज सिंह चौहान की घोषित आय भी इतनी नहीं कि वे इतना बडा आयोजन कर सकें। इसके बावजूद उनके आयोजन की भव्यता बताती है कि इसमें आय से अधिक काले धन का इस्तेमाल किया गया है।


    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भाजपा, दिल्ली की आप सरकार पर घोटालों और कुप्रबंधन के आरोप लगाकर सत्ता में पहुंची है। मोदी स्वयं केजरीवाल को अनुभवी चोर की संज्ञा देते रहे हैं। सरकार बनाने के बाद भाजपा वहां केजरीवाल सरकार के घोटालों की जांच कराए जाने की बात भी कह रही है। ऐसे में क्या मोदी अपनी ही कैबिनेट के मंत्री शिवराज सिह चौहान की संपत्तियों की जांच कराने का साहस दिखा पाएंगे। क्या वे उस काले धन के नेटवर्क का पर्दाफाश करने की पहल करवा पाएंगे जिसकी वजह से आज मध्यप्रदेश साढ़े तीन लाख करोड़ रुपयों के कर्ज में डूबा हुआ है।

  • सत्ता के लुटेरों को क्यों पनाह दे रही अफसरशाही

    सत्ता के लुटेरों को क्यों पनाह दे रही अफसरशाही

    भारत से अंग्रेजों को विदा हुए सतत्तर साल हो चुके हैं लेकिन उनका लूट का तंत्र आज भी बदस्तूर जारी है। आज भी आला अफसरों में एक वर्ग ऐसा है जो सरकारी संसाधनों को लूटने वालों को पनाह देता रहता है। सैडमैप के संसाधनों की लूटमार में ये कहानी स्पष्ट रूप से सामने आ रही है।सरकारी नौकरियां बेचने वालों के लिए सैडमैप आज एक मुफीद अखाड़ा बन गया है।नौकरशाही के ही एक वर्ग ने गुणवत्ता पूर्ण कार्य बल उपलब्ध कराने के लिए एक कंपनी सेक्रेटरी अनुराधा सिंघई को यहां का एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर बनाया था। उन्हें पांच सालों के लिए नियुक्ति दी गई थी। उन्होंने अपना काम संभालते ही सैडमैप में जुटे नौकरी माफिया और रिश्वत देकर नौकरी में आए फोकटियों की छुट्टी करनी शुरु कर दी। इससे हड़कंप मच गया और नौकरी माफिया ने कुछ निकाले गए कर्मचारियों को आगे करके ईडी अनुराधा सिंघई पर कथित अनियमितताओं को लेकर प्राथमिकी दर्ज करवा दी। मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो विद्वान न्यायाधीशों ने अनुराधा सिंघई को क्लीनचिट दे दी। उन्होंने अपना काम फिर चालू किया और सैडमैप को भंडार क्रय नियमों के अधिकार दिलाकर संस्थान की आय और बढ़ा दी। जब उन्होंने कार्यभार संभाला था तब सैडमैप की आय लगभग बीस करोड़ रुपए थी, कर्मचारियों को लगभग दस महीनों से तनख्वाह नहीं मिली थी। संस्थान लगभग बंद होने की कगार पर पहुंच गया था। विभिन्न कंपनियों और सरकारी प्रतिष्ठानों से कारोबार लेकर उन्होंने सैडमैप का टर्नओवर बीस करोड़ रुपयों से बढ़ाकर एक सौ तीस करोड़ रुपए कर दिया। जैसे ही ये चमत्कार लोगों की निगाह में आया वैसे ही लुटेरे सत्ता माफिया की लार टपकने लगी। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कुछ सत्ता के दलालों से सांठगांठ करके उन्होंने इस बार ईडी अनुराधा सिंघई को निलंबित करा दिया।

    इस अन्याय के खिलाफ जब वे हाईकोर्ट गईं तो शासन ने सैडमैप के फंड से ही लगभग नौ लाख रुपए निकालकर वकीलों की फौज पर खर्च कर दिए। हाईकोर्ट जबलपुर में जब शासन की ओर से महाधिवक्ता और उनके सहयोगी दर्जन भर वकीलों ने कहा कि निलंबन कोई सजा थोड़ी है। हमने तो केवल दस्तावेजों की जांच करने के लिए ईडी को निलंबित किया है। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि ठीक है अभी मामला पूरी तरह पका नहीं है इसलिए शासन को जांच कर लेने दी जाए। जिस तरह इकतरफा निलंबन की कार्यवाही की गई वह प्राकृतिक न्याय सिद्धांत के विरुद्ध थी। सैडमैप एक स्वायत्तशासी निकाय है और उद्योग विभाग के सचिव केवल इसके संरक्षक होते हैं। शासन इस संस्थान को कोई अनुदान भी नहीं देता है। ईडी, उद्योग विभाग का भी अधिकारी नहीं होता है इसके बावजूद श्रीमती सिंघई को उद्योग विभाग में हाजिरी देने के निर्देश दिए गए. संस्थान के लिए करोड़ों रुपए कमाने वाली इस कंपनी सेक्रेटरी को गुजारे भत्ते के रूप निलंबन के बाद मात्र आठ हजार रुपए दिए गए।

    इस अन्याय के विरुद्ध अनुराधा सिंघई ने मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव को पत्र लिखा जिसमें कहा गया कि उन्हें उद्योग विभाग के सचिव आईएएस नवनीत मोहन कोठारी अनावश्यक रूप से प्रताडि़त कर रहे हैं। अपने पत्र में उन्होंने न्याय के लिए अनुरोध करते हुए लिखा कि सैडमैप के अध्यक्ष और सचिव नवनीत मोहन कोठारी अपनी शक्ति और पद का दुरुपयोग करते हुए एक वरिष्ठ महिला अधिकारी का उत्पीड़न, दुर्व्यवहार, मानसिक यातना, अपमान,गलत निलंबन और अब जीवन भत्ता निर्वाह रोक रहे हैं । ऐसे में मुख्यमंत्री और जनप्रतिनिधि होने के नाते आप मामले में हस्तक्षेप करें और न्याय दिलाएं।

    उद्योग विभाग के सचिव ने मध्यप्रदेश औद्योगिक विकास निगम के कार्यकारी निदेशक सीएस धुर्वे के माध्यम से बीस अगस्त को एक पत्र भेजा और 21 अगस्त तक एक दिन में लगभग डेढ़ लाख पृष्ठों की जानकारी देने का दबाव बनाया। इसके जवाब में ईडी ने पत्र लिखकर निवेदन किया इस इस डेटा को संग्रहित करने में लगभग एक महीने का समय लगेगा इसलिए कृपया जवाब देने की समय सीमा बढ़ाने की कृपा करें। इस पत्र पर उद्योग विभाग ने कोई फैसला नहीं लिया और तीन सितंबर को ईडी को इकतरफा निलंबित कर दिया गया।
    उद्योग विभाग ने एक छोटे अफसर अंबरीश अधिकारी को भेजकर इकतरफा ईडी का कार्यभार हथिया लिया। श्री अंबरीश को विभाग के कुछ कर्मचारियों के साथ ईडी के दफ्तर भेजा गया और जबर्दस्ती ईडी की कुर्सी हथिया ली गई। ईडी को कार्यालय में मौजूद अपना निजी सामान भी नहीं उठाने दिया गया और सुरक्षा के लिए लगाए गए सभी कैमरे बंद कर दिए गए। उद्योग विभाग ने हाईकोर्ट को कहा कि कर्मचारियों के पीएफ, ईसआईसी चालान और फार्म 16 मे कोई छेड़छाड़ न हो सके इसके लिए श्रीमती सिंघई को निलंबित किया गया है जो कि कोई सजा नहीं है। एक स्वायत्तशासी निकाय की ईडी को पद से हटाने के इस षड़यंत्र में सैडमैप के ही फंड से लाखों रुपए निकाले गए और महाधिवक्ता समेत सचिव ने आठ प्रमुख वकीलों को खड़ा करके ऐसा माहौल बनाया कि हाईकोर्ट कोई राहत न दे पाए। यही नहीं अनुकूल रोस्टर का इंतजार करने के नाम पर भी मामले को कई दिनों तक लटकाया गया।

    श्रीमती अनुराधा सिंघई की कार और ड्राईवर छीन लिए गए। गौरतलब ये है कि जिस जानकारी को इकट्ठा करने के लिए उद्योग विभाग उन्हें एक महीने का वक्त नहीं दे रहा था उस जानकारी को अब तक उद्योग विभाग का अमला भी एकत्रित नहीं कर पाया है।फिर वो जानकारियां केंद्र या अन्य विभागों के पास संरक्षित है।जब सैडमैप के कर्मचारियों को दस दस महीनों तक वेतन नहीं मिल पा रहा था तब तो सूक्ष्म एवं लघु उद्योग विभाग कभी सामने नहीं आया। जिस स्ववित्त पोषित संगठन को अनुराधा सिंघई ने पैरों पर खड़ा किया उनके विरुद्ध कर्मचारियों को मानव ढाल बनाकर हमले किए जा रहे हैं। जिस नौकरी माफिया को सैडमैप से निकाल बाहर किया गया था उसने एक होनहार महिला अधिकारी का चरित्र हनन करने के लिए फर्जी मोबाईल चैट बनाया को पुलिस जांच में सामने आ गया। इस कूटरचना के आरोपी सिक्योरिटी एजेंसी के संचालक और उसके कर्मचारी का अपराध भी पुलिस ने उजागर कर दिया जिससे षड़यंत्र का पूरा खुलासा हो गया है। तब भी उद्योग विभाग ने आगे आकर कभी नौकरी माफिया के विरुद्ध सैडमैप को सहयोग नहीं किया।

    उन्होंने अपने पत्र में लिखा है कि एक महिला अधिकारी ने अपने पसीने और परिश्रम से मृत संगठन को पुर्नजीवित किया तो लोग फसल काटने आ गए और बीज बोने वाले को कुचलने लगे। इन लोगों को पुरुष भी कैसे कहा जा सकता है। एक झुंड में आकर ये एक महिला का शिकार करने में जुटे हुए हैं। ईडी ने अपने जिन सहयोगियों को संविदा आधार पर नियुक्त किया था उन्हें तोड़ने के लिए सचिव ने अध्यक्ष के रूप में फैसला लिया कि उन्हें सैडमेप में नहीं बल्कि किन्हीं अन्य सूचीबद्ध एजेंसियों के पेरोल पर रखा जाए। इसके लिए एक मानव संसाधन समिति का गठन किया जाए। ईडी ने सचिव को संभावित अधिकारियों की सूची भेजकर कहा कि आप आपने स्तर पर इस सूची को तय कर दीजिए । इसके बावजूद किसी समिति को गठित नहीं किया गया ताकि ईडी अपने सहयोगियों की टीम बढ़ाकर लंबित कार्यों का निपटारा न कर पाएं।

    लगभग तीन सालों में श्रीमती सिंघई ने सैडमेप का टर्नओवर चार गुना तक बढ़ा दिया है। नौकरियां बेचने वाले गिरोह को निकाल बाहर किया गया। मैनपावर आऊटसोर्सिंग उद्योग को साफ सुथरा बनाकर सरकारी कार्यालयों में संविदा के आधार पर नियुक्तियां सरल बना दी गईं। यही वजह थी कि सैडमेप को मध्यप्रदेश भंडार क्रय नियम अंतर्गत नैमेत्तिक नोडल एजेंसी बनाया गया।

    श्रीमती अनुराधा सिंघई ने अपने पत्र में लिखा है कि उन्होंने अगले दो सालों में लगभग पचास लाख नौकरियां सृजित करके रोजगार समस्या का समाधान करने का बीड़ा उठाया है। इस लक्ष्य को वे लगातार हासिल करती जा रहीं हैं जबकि नौकरी माफिया के लोग इन बेरोजगारों से नौकरी के एवज में रिश्वत लेकर बेरोजगारों और राज्य के साथ गद्दारी करने का षड़यंत्र कर कर रहे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री से अनुरोध किया है कि उनका गलत निलंबन रद्द किया जाए और उन्हें सम्मान के साथ बहाल किया जाए। उनके वित्तीय नुक्सान की भरपाई की जाए और वास्तविक दोषी को दंडित किया जाए।

    इस पत्र के जवाब में आईएएस और सूक्ष्म एवं लघु उद्योग विभाग के सचिव नवनीत कोठारी का कहना है कि श्रीमती सिंघई कई छोटे कर्मचारियों का वेतन नहीं दे रहीं थीं इसलिए उन्हें निलंबित किया गया है। जब उनसे कहा गया कि जिन कर्मचारियों की नौकरियां संदिग्ध हैं तो उन्हें वेतन क्यों दिया जाना चाहिए तो उन्होंने कहा कि हम मामले की जांच करा रहे हैं। उनके हटाए गए नौकरी माफिया को दुबारा सैडमैप में जगह दिए जाने पर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि मैं पिछले सात महीनों से सचिव पद पर आया हूं इससे पुराने मामलों के बारे में मैं कुछ नहीं बोल सकता।

    पाकिस्तान में सेना ने जिस तरह हर कमाई के तंत्र पर अपना कब्जा जमा लिया है और वहां कि अर्थव्यवस्था छिन्न भिन्न कर दी है उसी प्रकार मध्यप्रदेश में नौकरशाही ने हर कमाई के तंत्र पर अपना सिक्का जमा लिया है। लगभग अस्सी हजार करोड़ का स्थापना व्यय हड़प जाने वाला सरकारी तंत्र जनता की समस्याओं का समाधान देने में असफल साबित हो रहा है। उत्पादकता बढ़ाने के स्थान पर उद्यमियों से लूटमार की जाने लगी है।मोदी सरकार ने राज्य की आय बढ़ाने का लक्ष्य तय करके डाक्टर मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाकर भेजा है। चेतन काश्यप जैसे हुनरमंद उद्योगपति सूक्ष्म एवं लघु उद्योग विभाग के मंत्री बनाए गए हैं इसके बावजूद उनकी नाक तले नौकरी माफिया का षड़ंयत्र बदस्तूर जारी है।व्यापम भर्ती घोटाले की कहानियों की स्याही अभी सूखी नहीं है और एक बार फिर सेडमैप से नौकरियां बेचे जाने की नींव रखी जाने लगी है।उम्मीद की जानी चाहिए कि इस विषय पर राज्य के नीति निर्धारक एक बार गंभीरता से विचार करेंगे और समस्या का समाधान ढूंढ़ने में अपने हुनर का प्रयोग करेंगे। प्रशासनिक प्रमुख को बदलकर राज्य सरकार ने सुशासन की अपनी मंशा तो जाहिर कर दी है देखना है कि इसका असर कितने दिनों में साकार होता नजर आता है।

  • डॉ.मोहन यादव सरकार नहीं तो कौन चला रहा है मध्यप्रदेश

    डॉ.मोहन यादव सरकार नहीं तो कौन चला रहा है मध्यप्रदेश


    भोपाल,23 सितंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। पचास लाख युवाओं को नौकरी दिलाने का अभियान चला रहे सैडमैप की कार्यकारी निदेशक अनुराधा सिंघई(शर्मा) को इकतरफा आदेश से सस्पेंड करने वाला मामला गहराता जा रहा है। ईडी ने इस अन्याय की शिकायत मध्यप्रदेश हाईकोर्ट से की तो मध्यप्रदेश सरकार की ओर से महाधिवक्ता समेत आठ कानूनविद हाईकोर्ट में कैविएट का जवाब लेकर पहुंच गए। हाईकोर्ट ने लताड़ लगाई तो जजों को मैनेज करने के लिए सैडमैप से ही नौ लाख रुपए निकालकर मुकदमेबाजी पर खर्च कर दिए गए। मजेदार बात तो ये है कि इस अवैधानिक कार्रवाई के बारे में सूक्ष्म एवं लघु उद्योग मंत्री को भी विश्वास में नहीं लिया गया। मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव के सुशासन की जवाबदारी संभालने वालों को इस मामले में कुछ पता नहीं। सचिव नवनीत कोठारी कहते हैं मैं बता नहीं सकता। जब किसी को कुछ पता नहीं तो आखिर प्रदेश सरकार को चला कौन रहा है।


    जब सैडमैप घाटे की घाटी पर लुढ़क रहा था कर्मचारियों को दस दस महीने क तनख्वाह नहीं मिल रही थी सरकार इसे बंद करने का विचार कर रही थी तब एक कंपनी सेक्रेटरी अनुराधा सिंघई ने अपनी हिकमतअमली से संस्थान को अपने पैरों पर खड़ा कर दिया। आते ही उन्होंने जब संस्थान में जोंक की तरह लिपटे नौकरी माफिया को निकाल बाहर किया तो इन लोगों नेऊटपटांग कहानियां गढ़कर ईडी के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करवा दी। अदालत और सरकार को गुमराह करके की गई इस शिकायत की पोल हाईकोर्ट में खुल गई और श्रीमती सिंघई को बेदाग बरी कर दिया गया। उसी नौकरी माफिया ने इस बार सरकार के चोर दरवाजे से घुसकर संस्थान के निकाले गए भ्रष्ट अफसरों को दुबारा नौकरी में लाने की मुहिम चला दी है। इकतरफा सस्पेंशन के आदेश के माध्यम से सूक्ष्म एवं लघु उद्योग विभाग के एक जूनियर अधिकारी को यहां बिठा दिया गया उसने न तो विधिवत चार्ज लिया और न ही श्रीमती सिंघई के सस्पेंशन की प्रक्रिया पूरी की गई।


    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मेक इन इंडिया अभियान को सफल बनाने के लिए धड़ाधड़ नौकरियां जनरेट कर रहीं श्रीमती अनुराधा सिंघई को ये कहकर सस्पेंड किया गया कि वे आला अधिकारियों की बात नहीं मानती हैं। जबकि यही माईबाप संस्थान को कभी ठीक से नहीं चला सके । पिछले तीस सालों में संस्थान ने कोई करिश्मा नहीं किया। यहां पदस्थ ईडी और अन्य अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त रहे। लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू जैसे संस्थानों को छापे मारकर जांच करनी पड़ी। जब प्रदेश की एक हुनरमंद कंपनी सेक्रेटरी ने राज्य की पूंजी बनाने का पारदर्शी अभियान शुरु किया तो नौकरी माफिया ने तरह तरह के षड़यंत्र रचकर युवाओं की राह अवरुद्ध करने की मुहिम छेड़ दी है।


    हाईकोर्ट के पीठासीन जजों ने याचिका के निपटारे के लिए सरकार से जो सवाल जवाब किए उससे महाधिवक्ता समेत तमाम कानूनविद हकला गए। उन्होंने कई तरह के तर्क जुटाकर अदालत में रखे हैं इसके बावजूद वे किसी न्यायाधीश का सामना नहीं कर पा रहे हैं। नतीजतन रोटेशन के आधार पर किसी ऐसे जज का इंतजार किया जा रहा है जिसके माध्यम से शासन की काली करतूतों पर पर्दा डाला जा सके।


    सवाल तो ये है कि आखिर क्या वजह है कि राज्य सरकार स्वयं युवाओं को रोजगार दिलाने के अभियान में टांग फंसा रही है। सरकार में बैठे वो कौन लोग है जो राज्य की उत्पादकता बढ़ाने के अभियान में रोड़े अटका रहे हैं। यदि सैडमैप की ईडी कोई गलती कर रहीं थीं या कोई भ्रष्टाचार कर रहीं थीं तो राज्य मंत्रालय में बैठे आईएएस अफसरों में से ही कई अधिकारी उपलब्ध हैं जिनसे जांच करवाकर ईडी की गलतियां उजागर की जा सकतीं थीं। जिस नौकरी माफिया ने लोकायुक्त में शिकायत की उसी की जांच करवाकर ईडी के विरुद्ध कार्रवाई की जा सकती थी। ये न करते हुए शासन के विधि एवं न्याय विभाग ने मुकदमेबाजी पर मोटी फीस खर्च करने का फैसला ले लिया। सूत्र बताते हैं कि अपनी आत्मनिर्भरता की राह खोज रहे सैडमैप के ही फंड से नौ लाख रुपए वकीलों की फीस निकाली गई है।


    इस षड़यंत्र की भी पोल खुल गई है। कथित तौर पर शासन में सक्रिय जिस मंच के माध्यम से ये अभियान चलाया जा रहा है वह नौकरी माफिया का अड्डा बन गया है। सवा तीन लाख करोड़ रुपयों का बजट खर्च करने वाली मोहन यादव की भाजपा को पार्टी फंड के लिए कोई चंदे की जरूरत तो नहीं जो वह दिन को रात करने के लिए वकीलों और जजों की नाव पर डोल रही है।


    गौरतलब है कि प्रदेश के युवाओं में नौकरी की आकांक्षा होते हुए भी सरकार उन्हें रोजगार मुहैया नहीं करा पा रही है। लगभग अस्सी हजार करोड़ रुपयों के बजट से दस लाख अनुत्पादक सरकारी अमले को पाला पोसा जा रहा है। इसके विपरीत जब सरकार का ही एक संस्थान सरकारी के साथ कार्पोरेट,कोआपरेटिव, सेक्टर और उद्यमिता को बढ़ावा देकर रोजगार संवर्धन का पथ प्रशस्त कर रहा हो तो आखिर वो कौन है जो सरकार के इस अभियान में पलीता लगा रहा है। डाक्टर मोहन यादव की सरकार के नुमाईंदों को इसकी पड़ताल करनी होगी ताकि युवाओं को न्याय मिल सके और मोदी सरकार के राष्ट्रीय अनुष्ठान की आहूतियां बेरोकटोक जारी रह सकें।

    भारतीय जनता पार्टी स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा राजनीतिक संगठन होने का दावा करती है। कहा जाता है कि उसके नेतागण देश को सबसे तेज बढ़ती इकानामी बनाना चाहते हैं। ऐसे में जब कोई संस्थान उसके ही वोटरों को रोजगार दिलाने का बीड़ा उठाए हुए है तब उसे अस्थिर करने से आखिर किसे लाभ होने वाला है। ये षड़यंत्र भी तब चल रहा है जब सूक्ष्म एवं लघु उद्योग मंत्री चेतन काश्यप स्वयं उद्यमिता को बढ़ावा देने की मुहिम चलाए हुए हैं। वे खुद उद्योगपति हैं और सरकार से कोई वेतन भत्ते नहीं लेते हैं। भाजपा को सोचना होगा कि वह वित्तीय संरचनाओं में देश को आगे ले जाने वाले युवाओं को भर्ती करना चाहते हैं या फिर भेड़िया धसान युवाओं के सहारे शेखचिल्ली ख्वाब देखते रहना चाहेंगे।भारत माता की आराधना सुपुत्रों से होती है माफियागिरी से तो केवल पप्पू पैदा होते हैं।

  • संविधान से सदियों पुराना कर्म सिद्धांत

    संविधान से सदियों पुराना कर्म सिद्धांत


    देश और दुनिया के दूर दराज के देशों में भी आज भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिन धूमधाम से मनाया जा रहा है। मध्यप्रदेश में जबसे मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव ने आव्हान किया उसके बाद से तो गली गली और गांव गांव में जन्माष्टमी का माहौल सुरम्य बन चला है। हमेशा की तरह इस बार भी श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर प्रदेश भर में बारिश के छींटे पड़ रहे हैं। कई इलाकों में तो इतना अधिक पानी गिर रहा है कि मानों भगवान स्वयं नंदलाला के जन्म से आल्हादित हैं। ऐसे में कई विपक्षी नेताओं ने सरकार के आव्हान से असहमति जताते हुए बेसुरा राग अलापना शुरु कर दिया है। उन नेताओं का कहना है कि जन्माष्टमी जनता मनाए, धार्मिक संगठन मनाएं तो ठीक है लेकिन सरकार क्यों आव्हान कर रही है। दरअसल ये सभी वे आवाजें हैं जो विदेशी धर्मों की गोद में फलती फूलती रहीं हैं। आयातित सोच में रंगे इन नेताओं ने हमेशा सनातन को निशाना बनाया है। विदेशी सोच की नकल करने वाले ये नादान कहते हैं कि देश को आगे बढ़ना है तो किसी एक धर्म को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। उन लोगों को ये नहीं मालूम कि समूची वसुधा को अपना कुटुंब मानने वाला सनातन किसी भी खंडशः सोच से मीलों आगे सोचता है। आक्रांता बनकर भारत में आए जो विदेशी सोच कभी भी भारत के अस्तित्व को कुचल नहीं पाए वे आज संविधान की दुहाई देकर कह रहे हैं कि कृष्ण जनमाष्टमी मनाने से अन्य धर्मों को असमानता भरे माहौल का सामना करना पड़ेगा। ऐसे बयान देने वालों को श्रीमद भगवत गीता के उपदेशों की जानकारी मिल सके इसीलिए तो जन्माष्टमी का आयोजन धूमधाम से मनाया जा रहा है। जब युद्ध की तलवारें खिंची हुई हों तब कर्म का उपदेश देने वाले देवकीनंदन के मंत्र और भी ज्यादा सार्थक हो जाते हैं। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध के दौरान यही ज्ञान देने के लिए तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी युद्धभूमि तक गए थे। हठी जेलेंस्की यदि इस भाषा को समझ जाते तो यूक्रेन एक बार फिर खुशहाल देश बन सकता था। रूस के राष्ट्रपति ब्लादीमीर पुतिन ने तो भारत के प्रयासों का समर्थन करते हुए युद्ध रोक दिया। रूस भी चाहता है कि शांति का कोई मार्ग निकले। ये संभव इसलिए नहीं हो सका कि किसी ने यूक्रेन या अमेरिका को पहले कभी गीता के उपदेश नहीं सुनाए। युद्ध भूमि की हुंकार के बीच उन उपदेशों को समझने का सामर्थ्य आम योद्धा में नहीं होता। यदि श्रीकृष्ण दुर्योधन से कहते कि अनीति और अधर्म की राह पर चलोगे तो कर्म फल तुम्हें छोड़ेगा नहीं ऐसे में तुम्हारा नाश हो जाएगा,तो वो नहीं मानता। । कुछ ऐसी ही चुनौतियों के बावजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत का दर्शन युद्धभूमि तक पहुंचाकर अपना दायित्व निभाया। कमोबेश यही प्रयास मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव कर रहे हैं। जब विदेशी घुसपैठियों, आक्रांताओं और षड़यंत्रों के साथ कांग्रेस की पारिवारिक परंपरा के अध्यक्ष राहुल गांधी देश में जातिगत जनगणना का वैमनस्य फैलाने का प्रयास कर रहे हैं तब उन्हें गीता के उपदेश अवश्य पढ़ने चाहिए। मध्यप्रदेश की धरती से गीता का कर्म सिद्धांत पूरे विश्व को एक बार फिर सत्य के मार्ग पर चलने का आग्रह कर रहा है। चाहे असददुद्दीन औवेसी हों या फिर कांग्रेस के चंपू टाईप नेता उन सभी को समझना होगा कि भारत का संविधान लागू हुए तो मात्र 74 वर्ष हुए हैं। ये देश तो हजारों सालों से भगवान श्रीकृष्ण और भगवान श्री राम के बनाए आदर्शों पर चल रहा है। तबसे यहां कभी किसी अन्य धर्म या विचार को पद दलित करने का विचार नहीं फैला। चंद लुटेरों ने भले ही भारत की अस्मिता को कुचलने का प्रयास किया हो पर भारत आज भी अविचल और अडिग है। स्थिर है और संपूर्ण है। कितने ही आक्रांता आए और आकर चले गए। हम अपने शाश्वत सिद्धांतों पर लगातार चलते जा रहे हैं। मध्यप्रदेश सरकार भी तो यही समझाने का प्रयास कर रही है कि केवल और केवल सत्य के मार्ग पर चलिए। अन्य विचारों से गुमराह होकर सत्कर्म के मार्ग से विमुख होंगे तो फिर दंड भी आपको ही भोगना पड़ेगा। भारत अभी घोषित युद्ध के दौर में नहीं पहुंचा है इसलिए शायद नंदलाला के जीवनदर्शन की ये पुकार भटके हुए नौजवानों और नागरिकों का पुण्य मार्ग प्रशस्त करेगी।

  • जनादेश की बेहतर डिलीवरी के लिए शिवराज की विदाई उचित फैसला

    जनादेश की बेहतर डिलीवरी के लिए शिवराज की विदाई उचित फैसला


    -आलोक सिंघई-
    भारतीय जनता पार्टी की डॉक्टर मोहन यादव सरकार ने अभी तक अपना मंत्रिमंडल घोषित नहीं किया है। चुनाव नतीजों के इक्कीस दिन बीत चुके हैं लेकिन आगामी लोकसभा चुनावों को देखते हुए भाजपा कोई चूक नहीं करना चाह रही है। शिवराज की सत्ता के नजदीक रहकर उपकृत होता रहा एक बड़ा धड़ा ये कह रहा है कि शिवराज जी जैसे राजनेता को कमतर आंकना उचित नहीं है। वे एक आलराऊंडर खिलाड़ी थे उन्हें जबरन पेवेलियन में भेज दिया गया है। कांग्रेस के गुंडों की तरह शिवराज और उनके गुंडे बन चुके मंत्रियों ने भाजपा संगठन को आंखें दिखाना शुरु भी कर दी हैं। जबकि भाजपा का राष्ट्रीय संगठन जिस कार्पोरेट संस्कृति का अनुसरण कर रहा है उसमें चेहरे से ज्यादा अंकों का महत्व है । जिसने सेवा कार्य में ज्यादा अंक जीते हैं उसे कमान थमाई जा रही है। यही फार्मूला अपनाकर तीनों राज्यों में नए नेतृत्व को अवसर दिया गया है। कांग्रेस संस्कृति की घिसी पिटी परिवारवादी अवधारणा को छोड़कर ही भाजपा आज कार्यकर्ताओं की आशा का दल बनकर उभरी है। मध्यप्रदेश में तो कार्यकर्ताओं की एक बड़ी जमात बरसों से सत्ता की बाट जोह रही है ऐसे में शिवराज की विदाई हो या मंत्रियों की संभावित विदाई उसे देखने की दृष्टि बदलने का समय आ गया है।


    दरअसल जब हम मानना शुरु कर देते हैं जो जानने की वैज्ञानिक दृष्टि लुप्त प्राय हो जाती है। महाभारत युद्ध में श्रीकृष्ण के कहने पर अर्जुन ने हनुमानजी का आवाहन कर उनको रथ के ऊपर पताका के साथ विराजित किया। अर्जुन का रथ श्रीकृष्ण चला रहे थे और शेषनाग ने पृथ्वी के नीचे से अर्जुन के रथ के पहियों को पकड़ा था, जिससे रथ पीछे न जाए। इतना सब कुछ अर्जुन के रथ की रक्षा के लिए भगवान ने व्यवस्था की थी।


    महाभारत युद्ध समाप्ति के बाद अर्जुन ने भगवान से कहा पहले आप उतरिए मैं बाद में उतरता हूं, इस पर भगवान बोले नहीं अर्जुन पहले तुम उतरो। भगवान के आदेशनुसार अर्जुन रथ से उतर गए, थोड़ी देर बाद श्रीकृष्ण भी रथ से उतर गए, तभी शेषनाग पाताल लोक चले गए। हनुमानजी भी तुरंत अंतर्ध्यान हो गए। रथ से उतरते ही श्रीकृष्ण अर्जुन को कुछ दूर ले गए। इतने में ही अर्जुन का रथ तेज अग्नि की लपटों से धूं-धूं कर जलने लगा। अर्जुन बड़े हैरान हुए और श्रीकृष्ण से पूछा, भगवान ये क्या हुआ!


    कृष्ण बोले- ‘हे अर्जुन- ये रथ तो भीष्मपितामह, द्रोणाचार्य और कर्ण के दिव्यास्त्रों के वार से बहुत पहले ही जल गया था, क्योंकि पताका लिए हनुमानजी और मैं स्वयं रथ पर बैठा था, इसलिए यह रथ मेरे संकल्प से चल रहा था। अब जब कि तुम्हारा काम पूरा हो चुका है, तब मैंने उसे छोड़ दिया, इसलिए अब ये रथ भस्म हो गया।’


    व्यक्ति को लगता है कि उसके प्रभाव, बल, बुद्धि से सब हो रहा है, लेकिन जीवन में ऐसा बहुत कुछ होता है जो प्रभु कृपा या गुरु कृपा से हो रहा है, पर हमारा अहंकार कृपा को मानने को तैयार नहीं होता, जिस कारण अहंकार बढ़ता जाता है।ऐसा ही कुछ शिवराज सिंह चौहान और उनके समर्थकों के साथ हो रहा है। शिवराज जी के नेतृत्व में तो भाजपा सरकार पिछला चुनाव हार चुकी थी। खुद शिवराज जी सार्वजनिक तौर पर बोल चुके थे कि मैं मुक्त हुआ। ये अलग बात है कि किसी नए ब्रांड की तैयारी न होने की वजह से कांग्रेस की सरकार गिरने के बाद शिवराज जी को जवाबदारी सौंपी गई थी। ये शिवराज जी भी अच्छी तरह जानते थे कि उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ा जरूर जा रहा है लेकिन उन्हें सत्ता की बागडोर पार्टी के सुपुर्द करनी है। यही वजह है कि वे प्रदेश के कर्ज लिए धन से चलाई जा रहीं योजनाओं का श्रेय बटोरने का प्रयास करने लगे थे उन्हें लगता था कि जनता में उनकी लोकप्रियता को देखकर भाजपा हाईकमान हमेशा की तरह एक बार फिर लाचार हो जाएगा और मजबूर होकर उन्हें ही एक बार फिर प्रदेश की बागडोर सौंप देगा।


    यथार्थ तो ये है कि शिवराज की सत्ता काफी पहले ही विदा हो चुकी थी। वे तो सत्ता माफिया और चमचों की फौज के सहारे जैसे तैसे अपना काम चला रहे थे। शिवराज का कार्यकाल राज्य के इतिहास में मजबूरी का काल कहा जाएगा। जिस तरह से सत्ता पर शिव राज की ताजपोशी हुई और जिस तरह उन्होंने अपना एकछत्र साम्राज्य स्थापित करने के लिए पार्टी के स्वाभाविक नेतृत्व की नर्सरी को मटियामेट किया उससे पार्टी के भीतर बड़ा आक्रोश फैला चुका था।चुनाव जीतने की मजबूरी के चलते कार्यकर्ताओं ने चुप्पी साध रखी थी। भाजपा संगठन के सख्त तेवरों और उमा भारती की राजनीतिक दुर्दशा को देखकर कोई भी नया क्षत्रप खड़ा नहीं हो सका था। खुद मोहन यादव भी सत्ता सिंहासन के लिए अपनी जमात नहीं खड़ी कर पाए। आज भी उन्हें मालूम है कि यदि उन्होंने किसी लाबी का सहारा लेकर अपनी मनमानी की तो पार्टी के भीतर मजबूत हो चुके कई कार्यकर्ता उन्हें बर्दाश्त नहीं करेंगे। यही वजह है कि उन्हें अपना मंत्रिमंडल घोषित करने में देरी हो रही है। भाजपा हाईकमान ने राज्यों की सत्ता में मनमानी रोकने के लिए क्षेत्रीय स्तर पर प्रशासनिक अफसरों और पुलिस अफसरों की सत्ता का विकेन्द्रीकरण किया है। यही कुछ वह अपने मंत्रिमंडल में भी करने जा रही है। शिवराज और उनके मंत्रियों को सत्ता के मार्गदर्शन का अवसर जरूर मिलेगा। इससे ज्यादा की उम्मीद वे न रखें तो अच्छा होगा क्योंकि अब प्रदेश को सख्त सर्जरी की जरूरत भी है।

  • सरकारी कालेजों को दुबारा बजट देकर किसने किया भ्रष्टाचार

    सरकारी कालेजों को दुबारा बजट देकर किसने किया भ्रष्टाचार

    भोपाल, 21 जुलाई,(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर) उच्च शिक्षा विभाग के महाविद्यालय जोकि शिक्षा की सबसे ऊंची इकाई मानी जाती है,उनकी गरिमा ताक पर रखकर नियम विरुद्ध प्रक्रियाओं से उन्हें भ्रष्टाचार का केंद्र बनाया जा रहा है | उच्च शिक्षा विभाग ने अपने पत्र क्रमांक 291/272/आउशि/योजना/2023 दिनांक 6.6.23से महाविद्यालयों की एक सूची प्रकाशित की थी जिसमें यह निर्देश दिए गए थे की जो महाविद्यालय विश्व बैंक पोषित योजना ऑब्लिक रूसा योजना अंतर्गत आ रहे हैं उन कॉलेजों को प्रस्ताव नहीं भेजना है इन महाविद्यालयों को सम्मिलित नहीं किया जाएगा इसका प्रमाण पत्र भी कॉलेजों से मंगवाया गया था उसके बावजूद उन्हीं कॉलेजों को दुबारा बजट आवंटन कर दिया गया I जिन कॉलेजों पिपरई, मंदसौर पी जी कॉलेज , मंदसौर गर्ल्स ,नलखेडा , दालोदा को पिछले साल बजट आवंटित हुआ था उन्हें इस बार फिर बजट आबंटित कर दिया गया। उच्च अधिकारियों ने ही इस प्रक्रिया को डबल अपनाने के आदेश जारी किए हैं।
    यह प्रक्रिया प्रदेश के उच्च शिक्षा विभाग के अधिकांश महाविद्यालयों में एक जैसी की जा रही है और एक ही व्यक्ति विशेष फर्म एवं अधिकारियों को लाभ दिलाने की दृष्टि से यह कार्य किया जा रहा है| उच्च शिक्षा विभाग द्वारा वर्तमान में नामली ,जीरन,रावती ,अजयगढ़,मंदसौर , पवई,पिपरई , जैतवारा ,नलखेडा ,दलोदा एवं अन्य महाविद्यालयों को बजट आवंटित किया गया है निविदा की शर्त निम्नानुसार है :-

    1.सभी महाविद्यालय की निविदा में निविदाकारो से समस्त उत्पादों कि टेस्ट रिपोर्ट थर्ड पार्टी अन्य लैब से चाही गयी है, जबकि निर्माता द्वारा प्रदाय किये जा रहे उत्पादों को निर्माता कंपनी द्वारा अपनी टेस्टिंग लैब में टेस्ट करवाकर ही सप्लाई कर दिया गया। निविदा में न्यूनतम दर आने वाली फर्म को सामान देने के पूर्व थर्ड पार्टी इंस्पेक्शन/विभाग की तकनीकी समिति से कराना होता है I

    2.सभी महाविद्यालय कि निविदा में निविदाकार का पास्ट एक्सपीरियंस 50% मांगा गया है जिसमे बिड वैल्यू नहीं दर्शायी गई है। जिससे निविदाकार का पास्ट एक्सपीरियंस 50% उपकरणों कि संख्या के आधार पर आकलन होना है I जबकि आश्चर्य की बात यह है कि निविदा कि अतिरिक्त निविदा बिंदु क़ 6 की शर्तो में निविदाकार द्वारा पिछले 3 वर्षों में ₹ 1 करोड़ का एकल ऑर्डर एवं ₹ 47- 47 लाख रुपए के पृथक – पृथक दो आर्डर उपलब्ध कराने होंगे नहीं तो निविदा पत्रक के अभाव में अमान्य कर दी जावेगीI

    1. जेम पोर्टल पर उपलब्ध निविदा क्रमांक GEM/2023/B/3669315 DT. 11.7.23, GEM/2023/B/3669485, DT. 11.7.23, GEM/2023/B/3668564 DT.10.7.23 , GEM/2023/B/3667558 DT.11.7.23 , GEM/2023/B/3667559 Dt.11.7.2023 को प्रकाशित हुई | जिसमें GEM/2023/B/3669315 DT. 11.7.23 निविदा में विभाग का नाम डिपार्टमेंट ऑफ हायर एजुकेशन प्रदर्शित हो रहा है एवं निविदा में ऑर्गेनाइजेशन का नाम गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ़ मध्य प्रदेश प्रदर्शित है, निविदा के प्रपत्र में कहीं भी महाविद्यालय का नाम प्रदर्शित नहीं हो रहा है और उच्च शिक्षा विभाग में कोई भी ऐसा महाविद्यालय नहीं है जिसका नाम गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ़ मध्य प्रदेश हैI निविदा में धरोहर राशि की मांग की गई है जिसमें बेनेफिशरी के नाम के लिए गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ़ मध्य प्रदेश के नाम पर धरोहर राशि जमा करनी है , निविदा में महाविद्यालय का ऐसा कोई भी खाता नंबर नहीं है जिसमें यह राशि जमा की जा सके निविदाकारों के साथ मिलकर महाविद्यालय के अधिकारी/कर्मचारी एवं संस्था विशेष लोगो द्वारा राशी कि बंदरबांट करने का प्रयास किया जा रहा है |