Category: राजनीति

  • फूट डालने के नए प्रयासों पर प्रहार जरूरी

    फूट डालने के नए प्रयासों पर प्रहार जरूरी


    खेतों में किसान जो बीज बोता है धरती उसे कई गुना बढ़ाकर लौटा देती है। बात जब जीवित इंसानों की हो तो ये फलन कल्पनातीत होता है। एक व्यक्ति का सकारात्मक विचार पूरी मानवता को ऊंचाईयों के नए धरातल तक पहुंचा देता है ।इसके विपरीत एक नकारात्मक विचार करोड़ों लोगों के लिए जीवन मृत्यु का सबब भी बन जाता है। ये जानते बूझते भी कई विचारधाराएं अभिमान की पूर्ति के लिए स्वयं को संशोधित करने को तैयार नहीं हैं। भारत में अप्रासंगिक हो चली कांग्रेस भी अपनी गलतियों से सबक लेने को तैयार नहीं है। उसके नेता और कार्यकर्ता सभी अपने इतिहास से चिपटे हुए हैं और पार्टी को रसातल में जाते देख रहे हैं। कई समझदार समाजसेवी तो वक्त पर जाग गए और वैकल्पिक उपकरणों की ओर चले गए पर जड़ सलाहकारों की वजह से आज भी ढेरों कांग्रेसी पुराने ढर्रे पर ही चलते जा रहे हैं। उन्हें ये सब करने की पूरी आजादी है पर समस्या ये है कि वे अपनी नकारात्मकता भरा वोट बैंक बढ़ाने के लिए कई चिरपरिचित उपायों का सहारा ले रहे हैं। देश के जनमत को संवारने का कोई बड़ा प्रकल्प न होने की वजह से वे अपने उद्देश्यों में थोड़े बहुत सफल भी होते दिख रहे हैं। इस नकारात्मक अभियान से देश की तरुणाई का बहुमूल्य वक्त जरूर बर्बाद हो रहा है।
    इसे समझने के लिए हमें इतिहास की कुछ घटनाओं का विश्लेषण करना होगा। श्रीलंका में एक सिंहली सिपाही ने परेड का निरीक्षण करते समय राजीव गांधी के सिर पर अपनी बंदूक के बट से प्रहार किया था । सिंहलियों को लगता था कि तमिलनाडू में तमिलों के वोट कबाड़ने के लिए भारत की कांग्रेसी सरकार लिट्टे को हथियार और पैसा देकर उनके देश में अशांति फैला रही है। लिबरेशन टाईगर्स आफ तमिल ईलम ने राजीव गांधी को केवल इसलिए बम से उड़ा दिया था क्योंकि उसका मानना था कि उन्होंने सिंहलियों और तमिलों के बीच जारी संघर्ष में तमिलों की पीठ में छुरा घोंपा है। श्रीमती इंदिरा गांधी को उनके अंगरक्षक ने इसलिए गोली मार दी थी क्योंकि सिखों को लगता था कि श्रीमती गांधी ने अपने पैदा किए भस्मासुर जनरैल सिंह भिंडरावाला की आड़ में सिखों की आस्थाओं के केन्द्र स्वर्ण मंदिर को नेस्तनाबूत किया था। आपरेशन ब्लूस्टार के घावों ने सिखों की आत्मा को छलनी कर दिया था। जब श्रीमती गांधी की हत्या उनके ही अंगरक्षक सिख ने कर दी तो देश भर में हजारों सिखों को घरों से निकालकर जिंदा जला दिया गया । इस तरह की प्रतिक्रियावादी घटनाओं से देश का इतिहास भरा पड़ा है। महात्मा गांधी को एक सिरफिरे नाथूराम गोडसे ने केवल इसलिए गोलियां मार दीं थीं क्योंकि उसे लगता था कि महात्मा गांधी भारत विभाजन और लाखों हिंदुओं के कत्लेआम के दोषी हैं।
    ऐसी ढेरों घटनाएं कांग्रेस की कार्यशैली के स्याह पक्ष को दस्तावेजी प्रमाण के साथ प्रस्तुत करती हैं। इसके बावजूद आज की सोनिया राहुल कांग्रेस 137 साल पहले बनी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के स्थापित उद्देश्यों का वारिस होने का ढोंग छोड़ने तैयार नहीं है। तब सर ए ओ ह्यूम ने तत्कालीन ब्रिटिश शासकों को जन आक्रोश से बचाने के लिए 72 भारतीयों का एक जत्था तैयार किया था जिसकी आड़ में वे अपनी काली करतूतों पर पर्दा डालने का काम करते थे। समय बीतते ये जत्था इतना सफल हुआ कि दि्वतीय विश्वयुद्ध के बाद जब अंग्रेज अपने नियंत्रण वाले देशों को आजादी देने लगे तो उन्हें अपनी बनाई कांग्रेस ही सबसे अनुकूल नजर आई। आज की कांग्रेस अंग्रेजों के प्रभाव से इसलिए मुक्त नहीं होना चाहती क्योंकि केरल के समुद्री तटों से पुर्तगाल ,जिब्राल्टर, स्पेन और फिर इंग्लैंड होते हुए पौंड खरीदने के बड़े मार्ग पर वो अपना नियंत्रण नहीं खोना चाहती। जाहिर है इसीलिए इन दिनों चल रही राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा कश्मीर से कन्याकुमारी नहीं बल्कि केरल से दिल्ली की ओर चल रही है।
    कांग्रेस के इस सत्ता अनुष्ठान की अघोषित प्रायोजक पीएफआई यानि पापुलर फ्रंट आफ इंडिया को बताया जा रहा है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानि एनआईए के छापों और प्रवर्तन निदेशालय की जांच में पाया गया है कि पीएफआई कई आतंकवादी गतिविधियों से भी जुड़ा है। प्रवर्तन निदेशालय यानि ईडी को अब तक की जांच में पीएफआई के खातों से लगभग साठ करोड़ रुपयों के गैर कानूनी लेनदेन के सबूत मिले हैं। खाड़ी देशों में काम करने वाले मजदूरों के खातों का इस्तेमाल करके भारत जो रकम बुलाई जाती थी उसका उपयोग आतंकवादी गतिविधियों और राजनीति में खुद को मजबूत बनाने के लिए किया जाता था। पीएफआई के विभिन्न कैडर इस राशि का इस्तेमाल करके युवाओं को बम बनाने का प्रशिक्षण देते थे और युवाओं को बरगलाकर उन्हें आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठनों में भर्ती करवाते थे।अब इस तरह की अलगाववादी कार्यशैली को कथित संरक्षण देने वाली राहुल गांधी कांग्रेस यदि देश को जोड़ने का नारा दे रही है तो आसानी से समझा जा सकता है कि वह देश के कैसे लोगों को और क्यों जोड़ने का ख्वाब देख रही है।

    राष्ट्र संत श्री श्री रविशंकर जी ने श्रीलंका में भेदभाव के शिकार तमिलों और सत्ता पर इठलाते सिंहलियों के बीच सद्भाव कायम करने के लिए लगभग दस सालों तक जोखिम भरा अभियान चलाया था। उनके योग प्रशिक्षण कार्यक्रम द आर्ट आफ लिविंग को सिंहली सरकार और तमिलों दोनों का समर्थन मिलता था। श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे ने सद्भाव कायम करने की पहल करते हुए अपने हैलीकाप्टर से श्री श्री रविशंकर जी को लिट्टे प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरन से चर्चा करने भेजा था। टूटा टाईगर पुस्तक के लेखक स्वामी विरुपाक्ष लिखते हैं कि हमारे प्रयास निष्पक्ष और पवित्र थे हम शांति की इबारत लिखने जा रहे थे। इसके विपरीत अशांति चाहने वालों ने लिट्टे के खुफिया विभाग को षड़यंत्र पूर्वक संदेश पहुंचाया कि जब प्रभाकरन गुरुदेव से मिलेगा, तब भारत उसकी लोकेशन मालूम कर लेगा और उस पर बमबारी करके श्रींलंका की मदद करेगा।इस तरह शांति वार्ता में खलल डालने का ये प्रयास भारत की तत्कालीन कांग्रेस सरकार के उन्हीं लोगों ने किया था जो नहीं चाहते थे कि श्रीलंका में कभी शांति स्थापित हो। कांग्रेस को लगता था कि समुद्री सीमाओं और अपेक्षाकृत मुक्त सोच की वजह से सोने की लंका बन गई तो भारत के विकास की तस्वीर धुंधली पड़ सकती है।
    कांग्रेस की तत्कालीन सरकारें सिंहलियों और तमिलों को आपसी झगड़े में उलझाने के लिए लिट्टे को गुपचुप हथियार और धन मुहैया कराती थीं वहीं वे सिंहलियों को भी कारोबार में मदद करती थीं। जब 1987 में राजीव गांधी ने भारतीय शांति सेना को श्रीलंका भेजा तो घोषित रूप से उसे दोनों समुदायों के बीच शांति स्थापित करनी थी लेकिन निर्देशों की घुटन के बीच भारत की सेना सिंहलियों की पैरवीकोर बन गई और गौरिल्ला युद्ध लड़ रहे तमिलों का संहार करने लगी। इससे नाराज लिट्टे ने भारतीय शांति सेना पर हमले शुरु कर दिए। नतीजतन भारत की सेना को लगभग बारह सौ जवानों की शहादत झेलनी पड़ी। 1990 में वीपीसिंह की सरकार ने शांति सेना के मिशन को असफल करार दिया और सेना को वापस बुला लिया। श्रीलंका की सरकार, लिट्टे और भारत के बीच हुई संधि की वजह से लिट्टे को अपने समर्पित सैनिकों की भारी क्षति उठानी पड़ी थी। तब लिट्टे की ओर से अलग राष्ट्र की मांग की जा रही थी और उसे वैश्विक समर्थन भी मिल रहा था। लिट्टे को लगता था कि यदि राजीव गांधी दुबारा सत्ता में लौट आएंगे तो वे उसके पृथक राष्ट्र के अभियान में बाधक बन सकते हैं। यही वजह थी कि लिट्टे ने 1991 में श्रीपेरंबुदूर में राजीव गांधी को आत्मघाती बम हमले से उडा दिया।
    राजीव गांधी की हत्या के बाद भले ही देश में कांग्रेस की सरकार आ गई थी लेकिन हत्या का षड़यंत्र उजागर हो जाने के बावजूद पार्टी ने दुबारा भारतीय सेना का इस्तेमाल नहीं किया। इधर श्रीमती सोनिया गांधी ने भी घोषित रूप से भले ही राजीव गांधी के हमलावरों को माफ करने की बात कही पर उनके चीनी सलाहकारों ने श्रीलंका में दखल शुरु कर दिया। चीनी हथियारों, प्रशिक्षण और गोलाबारूद के सहारे सिंहली सेना ने वर्ष 2009 में लिट्टे प्रमुख वी प्रभाकरन को घात लगाकर उड़ा दिया। तबसे श्रीलंका में चीन का जो सैन्य हस्तक्षेप शुरु हुआ वह आज भारत के लिए सामरिक दृष्टि से चुनौती बन गया है।
    समुदायों ,जातियों में फूट डालकर उन्हें लड़ाने और राज करने की नीति कांग्रेस ने अंग्रेजों से सीखी है। इस बार वह कथित तौर पर पीएफआई के माध्यम से भारत में तख्ता पलट की रणनीति पर काम कर रही थी। ये तो गनीमत है कि चौकन्ने भारतीय सुरक्षा तंत्र ने समय से पहले आतंक की आहट को महसूस कर लिया और भांडा फूट गया। भारत में मुसलमानों और हिंदुओं में फूट डालकर अंग्रेजों ने जो खाई खोदी थी उसे कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीतियां अब तक सींचती रहीं हैं। हिंदू एकता को खंडित करने के लिए जाति के नाम पर आरक्षण की विषबेल भी भारत में अंग्रेजों के अघोषित हस्तक्षेप से पुष्पित और पल्लवित हुई है। बैलेंस शीट पर 2.66 लाख करोड़(ट्रिलियन डॉलर) के सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) वाला भारत आज 13.6 लाख करोड़ के सकल घरेलू उत्पाद वाले चीन से बहुत पीछे है।जबकि चीन की विकास यात्रा भारत से दो साल बाद शुरु हुई थी। कांग्रेस की पीव्ही नरसिम्हाराव सरकार ने जो फैसले लिए उन्हें कांग्रेसी आज तक स्वीकार नहीं कर पाए हैं। जाति और धर्म के नाम पर लड़ाने की चालें भारत को लगातार नाकाम बनाती रहीं हैं। जाहिर है इस बार देश जागरूक है और सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई को देशव्यापी जनसमर्थन मिल रहा है। फूट डालने के इन प्रयासों पर प्रहार समय की मांग भी है। एकजुट होते आतंक का अंत करने के लिए देश पहले से ही हाथों में हाथ डालकर साथ खड़ा है।

  • …..और कांग्रेस ने विभाजन स्वीकारा

    …..और कांग्रेस ने विभाजन स्वीकारा

    विभाजन की चुभन / 3

    • प्रशांत पोळ

    अपने देश में चालीस का दशक अत्यंत उथल-पुथल वाला रहा. दूसरा विश्व युध्द चल रहा था. ब्रिटिश सरकार के विरोध में जनमत तीव्र हो रहा था. विश्व युध्द समाप्त होने के पश्चात् भारत को स्वतंत्रता दी जाएगी ऐसी ब्रिटिश सरकार ने घोषणा भी की थी. किन्तु आजादी जब सामने दिखने लगी, तो मुस्लिम लीग ने अपने आक्रमण तेज कर दिए. देश में अनेक स्थानों पर दंगे भड़के. दंगों के माध्यम से खौफ निर्माण करने का काम मुस्लिम लीग कर रही थी.

    मुस्लिम लीग पाकिस्तान की मांग कर रही थी. प्रारंभ में तो कांग्रेस भी बंटवारे के विरोध में थी. गांधीजी ने ऐतिहासिक भाषण दिया था, जिसमे उन्होने कहा था की, ‘पहले मेरे शरीर के टुकडे होंगे, फिर इस देश का विभाजन होगा..!’

    इस देश के करोड़ो लोगों ने गांधीजी को अपना नेता माना था. ‘महात्मा’ की पदवी से नवाजा था. उन्हें पूरा विश्वास था गांधीजी पर. लेकिन ४ जून १९४७ को, दिल्ली की प्रार्थना सभा में गांधीजी ने यह विश्वास तोड़ दिया. उन्होंने, कांग्रेस पार्टी विभाजन का समर्थन क्यों कर रही हैं, इसलिए तर्क दिए… गांधीजी ने बंटवारे का समर्थन किया..!

    विभाजन नहीं होगा, ऐसा मानने वाले करोडो लोग इस घटना से टूट गए. विशेषतः सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों पर यह बहुत बड़ा आघात था. वे विभाजन के लिए तैयार नहीं थे. उन्होंने विस्थापन के बारे में सोचा ही नहीं था. गांधीजी फिर भी कह रहे थे की, ‘प्रस्तावित पाकिस्तान से हिन्दुओं को विस्थापित होने की कोई आवश्यकता नहीं हैं..’

    लेकिन डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ज्यादा व्यावहारिक थे. गाधीजी, नेहरु और जीना की नीतियों का उन्होंने पूरजोर विरोध किया था. अपने पुस्तक ‘थॉट ऑन पाकिस्तान’ में उन्होंने लिखा हैं – “श्री गांधी अस्पृश्यों को तो कोई भी राजनीतिक लाभ देने का विरोध करते हैं, लेकिन मुसलमानों के पक्ष में एक कोरे चेक पर हस्ताक्षर करने तैयार बैठे हैं.” आंबेडकर जी की मूल चिंता थी की ‘आखिर कांग्रेस द्वारा इतना पालने पोसने के बाद भी मुसलमान अलग देश की मांग क्यों कर रहे हैं..?’

    बाबासाहब आंबेडकर मूलतः अखंड भारत के समर्थक थे. उन्होंने लिखा हैं, ‘प्रकृति ने ही भारत को अखंड बनाया हैं.’ लेकिन वास्तविक धरातल पर उन्होंने द्विराष्ट्र वाद का समर्थन किया. उन्होंने कहा की मुसलमानों का हिन्दुओं के साथ सह-अस्तित्व संभव ही नहीं हैं. इसलिए उन्हें अलग राष्ट्र देना ही ठीक रहेगा. लेकिन एक शर्त पर – हिंदुस्तान के सारे मुसलमान प्रस्तावित पाकिस्तान में जायेंगे और वहां के सारे हिन्दू हिंदुस्तान में आयेंगे..! उनके शब्द हैं, “When partition took place, I felt that God was willing to lift his curse and let India be one great and prosperous” (जब विभाजन हुआ तो मुझे लगा मानो ईश्वर ने हमे दिया हुआ अभिशाप (श्राप) हटा लिया हैं और अब भारत एक महान और समृध्द राष्ट्र बनेगा). – डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर : राइटिंग अँड स्पीचेस, पहला खंड, पृष्ठ 146.

    दुर्भाग्य से कांग्रेस ने भारत विभाजन का प्रस्ताव तो स्वीकार किया, किन्तु जनसंख्या के अदलाबदली को सिरे से नकारा… इसका नतीजा रहा, इतिहास के सबसे दर्दनाक दंगे. लाखों लोगों की मृत्यु. करोडो लोगों का बिना किसी योजना के बलात विस्थापन..!

    पंधरा अगस्त जैसे जैसे निकट आ रहा था, वैसे वैसे बंगाल, पंजाब और सिंध में दंगे बढ़ रहे थे. हिन्दुओं को घर-बार छोड़ने के लिए विवश किया जा रहा था…

    ऐसे समय हमारा नेतृत्व क्या कर रहा था..?

    अगस्त, १९४७ के पहले और दुसरे सप्ताह में नेहरु व्यस्त थे, सत्तांतरण के कार्यक्रम की तैयारी में. उनकी बहन कृष्णा हाथिसिंग लिखती हैं – Jawahar was concerned about his wardrobe. १४ अगस्त के रात वाले समारोह में पहनने के लिए नेहरु ने अचकन और जाकिट पेरिस से मंगवाए थे. सीमा पर हो रहे दंगों की चिंता करने के बजाय, उन कपड़ों की चिंता नेहरु को थी. लॉर्ड माउंटबेटन को नेहरू आश्वस्त कर रहे थे की स्वतंत्रता के बाद भी भारत की सरकारी इमारतों पर, ब्रिटेन के शासकीय महत्व के दिनों में, यूनियन जैक फहराया जाएगा..!

    लेकिन जब पंजाब और सिंध जल रहा था, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरूजी ५ अगस्त से ८ अगस्त तक सिंध के दंगा पीड़ित क्षेत्रों में (जो अब पाकिस्तान में हैं) थे. कराची के हवाईअड्डे पर श्री गुरूजी को लेने के लिए जिस भारी मात्रा में स्वयंसेवक आये थे, उसके एक चौथाई भी लीगी कार्यकर्ता, जीना को लेने नहीं आए थे…!

    श्री गुरूजी ने धधकते वातावरण में कराची और हैदराबाद (सिंध) में स्वयंसेवकों की बैठके ली. साधु वासवानी जी के साथ सार्वजनिक सभा को संबोधित किया. लोगों को ढाढस बंधाया.

    श्री गुरूजी के पश्चात् १३ अगस्त को राष्ट्र सेविका समिति की तत्कालीन प्रमुख संचालिका वन्दनीय मौसी केलकर भी कराची पहुची. १४ अगस्त को, अर्थात जिस दिन पाकिस्तान का निर्माण हो रहा था, ठीक उसी दिन, उसी कराची शहर में मौसी केलकर जी ने समिति की बहनों की एक विशाल बैठक ली. साहस और समर्पण इसे कहते हैं !

    उस अशांत परिस्थिति में जब संघ, समिति और आर्य समाज के अधिकारी और कार्यकर्ता, लोगों में ढाढस बंधा रहे थे, उनके सुरक्षित भारत लौटने के प्रबंध कर रहे थे, तब देश का कांग्रेसी नेतृत्व दिल्ली में राज्यारोहण की खुशिया मनाने में व्यस्त था…! (क्रमशः)

    • प्रशांत पोळ

    विभाजन #भारत_विभाजन #Partition

  • द्रौपदी मुर्मू की विजय को सुनहरा बनाएगी सिन्हा की हार

    द्रौपदी मुर्मू की विजय को सुनहरा बनाएगी सिन्हा की हार

    के. विक्रम राव

    नौकरशाही से राजनीति में प्रविष्ट हुये यशवंत सिन्हा को यदि कुछ भी लाज—लिहाज हो तो राष्ट्रपति चुनाव से हट जायें। हजारीबाग में अपने व्यवसाय को देखें। व्यापार बढ़ायें, ज्यादा मुनाफा कमायें। राजनीति में हनीमून पर दोबारा आये हैं। अब पूरा हो गया। क्योंकि जनसेवा तो राजनीति में अब चन्द निस्वार्थ जन के लिये ही रह गयी है। यशवंत सिन्हा को इसी जुलाई 1 को ही नाम वापस ले लेना चाहिये था, जब उनकी प्रस्ताविका कुमारी ममता बनर्जी ने कहा था : ”भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रपति पद हेतु राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू को चुनावी मैदान में उतारने से पहले विपक्ष के साथ चर्चा की होती तो विपक्षी दल उनका समर्थन करने पर विचार कर सकते थे।” उन्होंने यह भी कहा कि ”मुर्मू के पास 18 जुलाई होने वाले राष्ट्रपति चुनाव जीतने की बेहतर संभावना है, क्योंकि महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन के बाद एनडीए की स्थिति मजबूत हुयी है।”

    उत्तर प्रदेश जो राष्ट्रीय राजनीति का ध्रुव केन्द्र है में यशवंत सिन्हा के लिये धूमधाम से अखिलेश यादव ने समर्थन जुटाया। पर दरार पड़ गयी। चचा शिवपाल के शब्दों में भतीजा अपरिपक्व हैं। मगर नासमझी इस कदर ? ओमप्रकाश राजभर को न बैठक में बुलाया। न उनसे सिन्हा के लिये समर्थन मांगा। खिसियाये राजभर योगी आदित्यनाथ के घर पर डिनर खाने चले गये। वहां द्रौपदी मुर्मू के लिये सभी अपने वोट की घोषणा कर रहे थे। वहीं शिवपाल सिंह भी वादा कर आये। शिवपाल समाजवादी पार्टी के कुछ और वोट काट सकते हैं। उन्होंने ने कहा कि ”मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राष्ट्रपति चुनाव में राजग प्रत्याशी द्रौपदी मुर्मू के पक्ष में वोट मांगा है। लिहाजा मैं मुर्मू को ही वोट करूंगा।” श्री यादव ने यहां कहा, ”मैंने पहले ही कहा था, राष्ट्रपति चुनाव में जो प्रत्याशी मुझसे वोट मांगेगा, मैं उसके पक्ष में वोट करुंगा। योगी आदित्यनाथ ने मुझसे (द्रौपदी मुर्मू के लिये) वोट देने को कहा था और मैंने फैसला किया है कि मैं उन्हें वोट दूंगा।” जयंत चौधरी बच गये। सपा मुखिया के साथ रह गये। मगर क्या फर्क डाल पायेंगे ?

    सिलसिलेवार अन्य राज्यों पर गौर करें। अन्नाद्रमुक और अन्य सहयोगी दल एनडीए की प्रत्याशी द्रौपदी मुर्मू का समर्थन करेंगे। मुर्मू ने अन्नाद्रमुक नेताओं—के. पलानीस्वामी और ओ. पन्नीरसेल्वम, तमिल मनीला कांग्रेस के अध्यक्ष जी. के. वासन, पट्टाली मक्कल काचि (पीएमके) के अध्यक्ष डॉ. अंबुमणि रामदास से मुलाकात की। सभी ने उनके प्रति समर्थन व्यक्त किया। वहीं शिरोमणी अकाली दल (शिअद) ने भी कहा कि वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की उम्मीदवार का समर्थन करेगा। शिअद ने मुर्मू का समर्थन करने का फैसला किया है। पार्टी का मानना है कि वह अल्पसंख्यकों, शोषित और पिछड़े वर्गों के साथ—साथ महिलाओं की प्रतीक है। देश में गरीब व आदिवासी वर्गों के प्रतीक के रुप में उभरी हैं। यही वजह है कि पार्टी राष्ट्रपति चुनाव में उनका समर्थन करेगी। ”सिख समुदाय पर अत्याचारों के कारण हम कांग्रेस के साथ कभी नहीं जायेंगे।”

    पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कह चुकीं हैं कि ”यदि एनडीए की ओर से पहले द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी के बारे में बता दिया जात तो हम भी राजी हो जाते और सर्वसम्मति से उन्हें चुना जा सकता था। ममता बनर्जी ने द्रौपदी मुर्मू की जीत की संभावनाएं ज्यादा होने की बात भी स्वीकार की।”

    बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजग उम्मीदवार के बारे में कहा, ”हम लोगों को पूरा भरोसा है कि मुर्मू भारी बहुमत से जीतेंगी। यह बहुत खुशी की बात है कि एक आदिवासी महिला देश के सर्वोच्च पद के लिये उम्मीदवार है।” मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का झारखण्ड मुक्ति मोर्चा अब द्रौपदी को वोट देगा जिससे गठबंधन सहयोगी कांग्रेसी पार्टी को शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी।

    बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने स्पष्ट किया कि सिर्फ अनुसूचित जनजाति की महिला होने के कारण ही उनकी पार्टी ने द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति चुनाव के लिये समर्थन देने का ऐलान किया है। उनका एक ही विधायक है।

    प्रतिद्वंदी यशवंत सिन्हा ने द्रौपदी पर तनिक शकुनि के अंदाज में विवाद उठा दिया। वे बोले कि ”यह महिला प्रत्याशी रबर स्टांप राष्ट्रपति बनेगी।” सिन्हा की घोषणा है कि वे खुद राष्ट्रपति चुने गये तो ”केवल संविधान के प्रति उत्तरदायी रहूंगा।” हालांकि भारत का संविधान गत 70 वर्षों में 108 बार संशोधित हो चुका है। तुलना में अमेरिका का संविधान गत सवा दो सौ वर्षों में केवल 25 बार संशोधित हुआ। जब 1975 में एमर्जेंसी इंदिरा गांधी ने थोपी थी तो जनाब यशवंत सिन्हाजी कलक्टरी कर रहे थे। सरकारी अफसर थे उस शासन के जो भ्रष्टाचार—विरोधी संघर्ष में जननायकों को जेल में कैद कर रही थी। तब उन्हीं के परिवारजन लोकनायक जयप्रकाश नारायण भी इंदिरा गांधी की जेल में नजरबंद थे। बाद में इन्हीं जेपी की सिफारिश पर प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने सिन्हा पर कृपादृष्टि दर्शायी थी। यही सिन्हाजी अब आदिवासी गरीब विधवा द्रौपदी मुर्मू से बेहिचक वचन मांग रहे है कि वे ”नाममात्र” की राष्ट्रपति नहीं रहेंगी। खामोश नहीं रहा करेंगी। मगर जब दस साल मनमोहन सिंह गूंगे रहे, सोनिया की धौंस के चलती रही, तब?

    अब जानिये अगर सिन्हा स्वयं राष्ट्रपति बन गये (मुंगेरी लाल के सपने जैसा) तो यशवंतजी क्या—क्या कर देंगे? वे केन्द्रीय संस्थाओं द्वारा विपक्ष को तंग करना बंद करा देंगे। नीक है, सब इसे स्वीकारते हैं। सांप्रदायिकता को रोकेंगे? दुरुस्त है। राज्य सरकारों को डगमायेंगे नहीं। यह भी वाजिब है। मगर इंदिरा गांधी काल का यही सरकारी (84—वर्षीय) नौकर चालीस साल के दौरान तो ”जी हुजूरी” भर करता रहा। कैसा कर्तव्य निभाया?

    यशवंत सिन्हा को बैठ जाने के आग्रह के लिये तर्क है, वे कभी भी गंभीर चुनौती देने वाले, प्रत्याशी नहीं रहे। विपक्ष की चौथी पसंद रहे। शरद पवार चतुर थे। हार की प्रतीती हो गयी थी। पलायन कर गये। अधिक फजीहत से बचने के पूर्व यशवंत सिन्हा को संतुष्ट होना चाहिये कि उन्हें आशातीत प्राप्ति तो हो गयी। हशिए पर पड़े इस राजनेता को फोकट में देशव्यापी मीडिया पब्लिसिटी मिल गयी। बड़े—बड़े राजनेताओं से भेंट हो गयी जो अब उनके समर्थक बन बैठे। बिन रकम खर्चे सिन्हा लाभ पा गये। विपुल चुनावी बजट पा गये। फ्री भारत दर्शन करने का मौका मिल गया। अब उनके राजनीति करने में कुछ ही वर्ष रह गये है। वानप्रस्थ खत्म हो गया। संन्यास का वक्त दस साल पूर्व ही आ गया था। अभी भी देर नहीं है कि सिन्हा साहब रिटायमेंट की घोषणा के लिये। इसमें राष्ट्रहित है। उनका यश भी बना रहेगा।

    साहित्य में यश का रंग सफेद, धवल कहा गया है। कवि भूषण ने कहा था कि छत्रपति शिवाजी के अपार यश से तीनों लोकों में सफेदी छा गयी। तब इन्द्र अपने सफेद हाथी ऐरावत को तलाशते रहे। खुद ऐरावत गोरे इन्द्र को खोजता रहा। अत: सारी गोरी चीजें और गोरे लोग खो गये। अब यशवंत को भी यश की तरह गोरे बने रहना चाहिये। पराजय की कालिमा से बचें।

    K. Vikram Rao

    Mobile -9415000909

    E-mail –k.vikramrao@gmail.com

  • नारी शक्ति के सम्मान की प्रतीक द्रौपदी मुर्मू

    नारी शक्ति के सम्मान की प्रतीक द्रौपदी मुर्मू

    -नेहा बग्गा-

    देश में हम आजादी के 75 वर्ष मना रहे हैं और इस अमृत महोत्सव में एनडीए की राष्ट्रपति उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के चयन से पूरे देश में खुशी का माहौल है। मध्यप्रदेश ही नहीं,  जनजाति समाज ही नहीं अपितु पुरे देश को आज गर्व की अनुभूति हो रही है। देश के इतिहास में यह पहली बार होगा जब कोई पूर्व पार्षद राष्ट्रपति बनने के बेहद करीब पहुंच गया है। राष्ट्रपति प्रत्याशी के रूप में द्रौपदी मुर्मू के चयन ने भले ही उन लोगों को चौंका दिया हो, जो राष्ट्रपति पद को एक विशेष दायरे में सीमित करके देखते हैं। लेकिन भाजपा संसदीय दल का यह निर्णय वास्तव में जनजातियों और महिलाओं के सशक्तीकरण की दिशा में भाजपा की नीतियों का ही प्रतिबिंब है। 
    ओडिशा में जन्मी द्रौपदी मुर्मू ने भुवनेश्वर स्थित रमादेवी महिला कॉलेज से स्नातक की डिग्री (बीए) हासिल की। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत बतौर शिक्षक के रूप में की,  फिर वह राजनीति में आ गईं। साल 1997 में पार्षद के रूप में मुर्मू ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की। इसके 3 साल बाद 2000 में पहली बार विधायक बनीं और फिर भाजपा-बीजेडी सरकार में दो बार मंत्री भी रहीं। बाद में मुर्मू झारखंड की राज्यपाल बनीं और इस प्रदेश की पहली महिला राज्यपाल भी बनीं। यही नहीं वह देश के किसी भी प्रदेश की राज्यपाल बनने वाली देश की पहली आदिवासी महिला नेता भी हैं। ओडिशा के मयूरभंज जिले से ताल्लुक रखने वाली द्रौपदी मुर्मू झारखंड की पहली महिला आदिवासी राज्यपाल बनीं और सबसे लंबे समय तक इस पद पर रहीं। झारखंड की राज्यपाल रहते हुए पक्ष और विपक्ष दोनों ही उनकी कार्यशैली के मुरीद रहे। उन्होंने ओडिशा के सर्वोत्तम विधायक को दिया जाने वाला नीलकंठ पुरस्कार भी हासिल किया है। इस पद से रिटायर होने के बाद ओडिशा के मयूरभंज जिले के रायरंगपुर में रह रही हैं। द्रौपदी मुर्मू अपनी साफ छवि और बेबाक फैसलों के लिए जानी जाती हैं। इनकी निजी जिंदगी भले ही त्रासदियों से भरी रही हो, लेकिन देश के इस सबसे बड़े पद पर उनका नामांकन होना ये साबित करता है कि वह मुश्किल हालातों से निपटना बखूबी जानती हैं।
    भारतीय जनता पार्टी ने सदैव सबका साथ सबका विकास और सबके प्रयासों के साथ समाज के वंचित पीड़ित शोषित वर्गों को प्रतिनिधित्व दिलवाने के लिए अनेकों काम किए हैं और योजनाएं चलाई हैं। चाहे विधायिका और मंत्रिमंडलों में महिलाओं, पिछड़ों और आदिवासियों की संख्या की बात हो, या फिर 26 जनवरी की परेड हो, भाजपा की नीतियां सरकार के निर्णयों से छलकती रही हैं। बीते वर्षों में आदिवासियों और महिलाओं के हितों में भाजपा की केंद्र और राज्य सरकारों ने जो निर्णय लिए हैं, जो काम किए हैं, वो अभूतपूर्व हैं। पार्टी के इन निर्णयों और कामों में मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार की अग्रणी भूमिका रही है। लाड़ली लक्ष्मी योजना से लेकर भगवान बिरसा मुंडा के जन्मदिवस को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने के निर्णय तक पूरे देश के लिए अनुकरणीय रहे हैं। 
    मध्यप्रदेश देश का पहला ऐसा राज्य है, जहां निकाय व स्थानीय पंचायत के चुनाव में महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए 50% का आरक्षण दिया और आज जब हम चुनावी मैदान में है तो यह देखने को मिलता है कि महिलाएं लगभग 80% के आसपास आज चुनावी रण में है। यह समाज और प्रदेश के लिए अत्यंत सौभाग्य का विषय है की ग्रहणी से लेकर फाइटर जेट तक मध्य प्रदेश की बेटियां लगातार अपने पंख फैला रही हैं। मध्यप्रदेश से पिछले दिनों राज्यसभा की दोनों सीटों पर दो महिला प्रत्याशियों को निर्विरोध चयन कर सर्वोच्च सदन राज्यसभा में भेजा गया है। जिसमें सुमित्रा वाल्मिकी देश की पहली वाल्मिकी समाज से आने वाली सांसद बनी,  वहीं पिछड़ा वर्ग से कविता पाटीदार को राज्यसभा भेजा गया। यह मध्यप्रदेश में महिला सशक्तीकरण के लिए किए जा रहे प्रयासों का ही नतीजा है कि आज 42 लाख लाडली लक्ष्मी मध्यप्रदेश में हैं और बेटी और बेटों का अनुपात जो पहले 1000 बेटों पर 912 था अब 970 हो गया है। 
    चाहे महिला सशक्तीकरण हो या जनजातीय अस्मिता के गौरव को पुनर्स्थापित करना हो इस दिशा में जितने कार्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में पिछले 8 सालों में हुए हैं वो पहले कभी नहीं हुए। द्रौपदी मुर्मू जी को राष्ट्रपति प्रत्याशी नामांकित किए जाने का ये निर्णय मोदी जी के महिला व जनजातीय कल्याण के उसी अटूट संकल्प का प्रतिबिंब है। द्रौपदी मुर्मू ने अभी तक अपने सभी दायित्वों को बहुत अच्छे से निभाया है चाहे वह शिक्षक का हो,  संगठन का हो, जनप्रतिनिधि का या फिर राज्यपाल का। आशा की जानी चाहिए कि देश के सर्वोच्च पद पर पदस्थ होकर वे इस भूमिका में भी नए कीर्तिमान बनाएंगी। 
    -लेखक भारतीय जनता पार्टी की प्रवक्ता हैं |

  • पंचायत चुनाव नहीं कराए तो आंदोलन करेगी कांग्रेस,कमलनाथ ने धमकाया

    पंचायत चुनाव नहीं कराए तो आंदोलन करेगी कांग्रेस,कमलनाथ ने धमकाया

    भोपाल,10 जनवरी(प्रेस इँफार्मेशन सेंटर)। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार को चेतावनी देकर कहा है कि सरकार दो महीने के अंदर परिसीमन, रोटेशन और ओबीसी आरक्षण के साथ पंचायत चुनाव कराए, नहीं तो कांग्रेस आंदोलन करेगी।
    सोमवार को भोपाल में मीडियाकर्मियों से बातचीत में कमलनाथ ने बीजेपी को ओबीसी विरोधी बताया।

    उन्होंने कहा कि सरकार की ओबीसी और आरक्षण विरोधी नीति के कारण प्रदेश में सात साल से पंचायत चुनाव नहीं हो पा रहे हैं। कुछ महीने पहले शिवराज सरकार इसके लिए अध्यादेश लेकर आई थी। उन्होंने अध्यादेश को काला कानून बताते हुए कहा कि इसमें न रोटेशन का पालन किया गया, न परिसीमन का और न आरक्षण का। इसी वजह से चुनाव रद्द हो गए। अगर सरकार दो महीने के भीतर परिसीमन, रोटेशन और ओबीसी आरक्षण के साथ ग्राम पंचायत चुनाव नहीं कराएगी तो कांग्रेस पार्टी जिला से लेकर ग्राम पंचायत स्तर तक आंदोलन करेगी ।


    कमलनाथ ने कहा कि शिवराज सिंह चौहान 15 साल से मुख्यमंत्री हैं, लेकिन कभी ओबीसी को 27% आरक्षण देने का प्रस्ताव सदन में नहीं रखा। पिछले दो साल से ओबीसी स्कॉलरशिप का 1210 करोड़ रुपये बकाया है। छात्र परेशान हैं, लेकिन सरकार को कोई चिंता नहीं है।


    हाल में हुई ओलावृष्टि के सवाल पर उन्होंने कहा कि सरकार को तत्काल किसानों को मुआवजा देना चाहिए। इस बारे में मुख्यमंत्री शिवराज की घोषणा को धूठा बताते हुए कमलनाथ ने कहा कि किसानों को हुए नुकसान का आकलन अब तक शुरू नहीं हुआ। फसल बीमा की राशि के भुगतान में हुई देरी के लिए भी उन्होंने बीजेपी सरकार को जिम्मेदार ठहराया।

  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लॉन्च की ब्लॉकचेन-आधारित डिजिटल डिग्री

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लॉन्च की ब्लॉकचेन-आधारित डिजिटल डिग्री

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लॉन्च की ब्लॉकचेन-आधारित डिजिटल डिग्री

    IIT कानपुर के दीक्षांत समारोह में छात्रों को डिजिटल डिग्री जारी की गई

    कानपुर, 28 दिसंबर 2021: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर के 54वें दीक्षांत समारोह में ब्लॉकचेन-आधारित डिजिटल डिग्री का शुभारंभ किया। इस दीक्षांत समारोह में सभी छात्रों को राष्ट्रीय ब्लॉकचेन परियोजना के तहत संस्थान में विकसित एक आंतरिक ब्लॉकचेन संचालित तकनीक के माध्यम से डिजिटल डिग्री जारी की गई। ये डिजिटल डिग्री विश्व स्तर पर सत्यापित की जा सकती है और इसकी फ़र्ज़ी कॉपी नहीं बनाई जा सकती।

    इस दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि प्रौद्योगिकी भविष्य है और इसे आईआईटी कानपुर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से अमूल्य उपहार मिल रहे हैं। वहीं, ऑल इंडिया रेडियो ने पीएम मोदी द्वारा लॉन्च की गई इस डिजिटल डिग्री के साथ इसकी खूबियाँ बताता छोटा वीडियो माइक्रो-ब्ल़ॉगिंग प्लेटफ़ॉर्म Koo App पर शेयर किया है।

    समारोह के दौरान एक क्लिक में एक साथ 1723 छात्रों को ब्लॉकचेन आधारित यह अतिसुरक्षित डिजिटल डिग्री सौंपी गई। इसके साथ ही आईआईटी कानपुर देश का ऐसा प्रमुख संस्थान बन गया जिसने ब्लॉकचेन तकनीक और दुनियाभर में अनोखी पहचान वाली डिग्री का वितरण किया। अगर बात करें इस डिग्री की तो हर एक डिग्री टेंडर प्रूफ़ यानी छेड़छाड़ रहित, दुनियाभर में सत्यापित की जा सकने योग्य, यूज़र की सहमति से देखी जा सकने वाली और केवल जिसे चाहें- वही देख सके, जैसी खूबियों से लैस है।

    क्या है ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी

    ब्लॉकचेन सिस्टम विकेंद्रीकरण के सिद्धांत पर काम करता है। इसका मतलब यह है कि इसका नियंत्रण किसी एक केंद्रीय एजेंसी के हाथों में नहीं है, बल्कि नोड्स के एक फैले हुए नेटवर्क के लिए है। ऐसी स्थिति में जब भले ही किसी विशिष्ट नोड को हैक कर लिया गया हो, यह डेटा को सुरक्षित रखने में मदद करेगा। इसके अलावा, एक ब्लॉकचेन में जानकारी एक सटीक टाइमस्टैम्प के साथ क्रमिक रूप से रिकॉर्ड और स्टोर की जाती है। इसमें पिछली जानकारी को बदला नहीं जा सकता औऱ केवल एक नया ब्लॉक जोड़कर संशोधित किया जा सकता है। इसके चलते किसी एक ट्रांसक्रिप्ट के साथ छेड़छाड़ करना बहुत कठिन हो जाता है।

  • पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 97वीं जयंती बड़ी हस्तियों ने किया याद

    पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 97वीं जयंती बड़ी हस्तियों ने किया याद

    पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 97वीं जयंती आज, नेताओं सहित देश की बड़ी हस्तियों ने किया याद

    भोपाल, 25 दिसंबर,(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री एवं भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की आज 97वीं जयंती है. ग्वालियर में जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर,1924 को हुआ था. 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद से यह दिन सुसाशन दिवस के रूप में मनाया जाता है.

    अपने कुशल नेतृत्व और राजनैतिक सूझभूज के साथ ही वह अपनी कविताओं के लिए भी जाने जाते हैं, जिनमें से अधिकतर उन्होंने हिंदी में लिखी हैं. समय समय पर अटल जी ने कभी संसद में तो कभी कही और अपनी कविताओं से लोगों पर बहुत गहरा प्रभाव छोड़ा. उन्होंने अपने पूरे राजनीतिक जीवन में कई महत्वपूर्ण विभागों को संभाला, मोरारजी देसाई की सरकार में वे विदेश मंत्री रहे और बाद में भाजपा की स्थापना कर सं 1996 में देश के प्रधानमंत्री भी बने.

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    भाजपा के पितृपुरुष एवं पूर्व प्रधानमंत्री, भारत रत्न से सम्मानित श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी की जयंती (सुशासन दिवस) पर आज कटनी में प्रबुद्धजनों और कार्यकर्ताओं से संवाद किया। श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी के सुशासन के सपने को साकार करने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी एवं मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में केन्द्र व राज्य सरकार पूरी तरह प्रतिबद्ध है। #AtalJiAmarRahen VD Sharma (@VDSharmaBJP) 25 Dec 2021
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    भारत के पूर्व प्रधानमंत्री, श्रेष्ठ कवि, प्रखर वक्ता भारत रत्न स्व. अटल बिहारी वाजपेयी जी की जयंती पर शत्-शत् नमन एवं समस्त देशवासियों को ’ सुशासन दिवस ’ की हार्दिक शुभकामनाएं। भारत को मजबूत राष्ट्र एवं प्रगति की राह में आगे बढ़ाने में आपका महान योगदान अनंत काल तक अविस्मरणीय रहेगा। Pushkar Singh Dhami (@pushkarsinghdhami) 25 Dec 2021
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    राष्ट्रसेवा में अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले, हमारे प्रेरणा स्रोत, भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री एवं भारतीय जनता पार्टी के पितामह, भारतरत्न परम श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी की जयंती पर उन्हें शत् शत् नमन। समस्त देशवासियों को सुशासन दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। #SushashanDiwas #AtalBihariVajpayee Keshav Prasad Maurya (@kpmaurya1) 25 Dec 2021
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    देश के पूर्व प्रधानमंत्री,भारत रत्न,स्व.अटलबिहारी वाजपेयी जी की जयंती के अवसर पर उन्हें नमन करते हुए आदरांजलि अर्पित करता हूँ। मध्यप्रदेश के ग्वालियर में जन्मे अटलजी की सादगी,सरलता,सहजता,उनके सिद्धांत,प्रतिस्पर्धी व विरोधी को भी सम्मान देने का उनका व्यक्तित्व,आज भी जेहन में है। KamalNath (@officeofknath) 25 Dec 2021