Category: राजनीति

  • वोट की तिजारत के दौर में कितना सुना जाएगा विष्णु का संघनाद

    वोट की तिजारत के दौर में कितना सुना जाएगा विष्णु का संघनाद

    भारतीय लोकतंत्र अब सिर्फ पूंजीवाद की ओर पींगें बढ़ा रहा है. इसका असर इतना व्यापक हो चला है कि चुनावी वादों के शोर में मूल्यों की राजनीति अप्रासंगिक हो चली है। वोट का अब राजनीतिक मूल्यों से नाता टूटता जा रहा है और वह मुफ्त सौगातों के ऊपर लिपटा रंग बिरंगा रैपर बन गया है। हालिया दिल्ली विधानसभा के चुनावों में ये असर इतना स्पष्ट नजर आया कि उसने भारत की राजनीति की तस्वीर साफ कर दी है। इसके पहले पांच राज्यों के चुनाव में भी कमोबेश यही तस्वीर उभरी थी लेकिन तब इसका शोर इतना तीखा नहीं था। इसके बावजूद भारतीय जनता पार्टी ने कई राज्य हाथ से गंवाने के बाद मध्यप्रदेश में अपने सांसद विष्णुदत्त शर्मा को प्रदेश की कमान थमा दी है। वे संघ की तपोनिष्ट सेवा भावना से प्रेरित होकर राजनीति में आए हैं। यही वजह है कि उनकी सफलता को लेकर तरह तरह के संशय और आशंकाएं व्यक्त की जाने लगीं हैं। राजनीति के दीवानों का कहना है कि एक ओर जब देश में अरविंद केजरीवाल की गिफ्ट वाली राजनीति का बोलबाला है तब विष्णुदत्त शर्मा का देशराग कहां टिक सकता है।

    मध्यप्रदेश का राजनीतिक परिदृष्य दिल्ली से अलहदा नहीं है। यहां की राजनीति भी गिव एंड टेक के नए नए प्रतिमानों के बीच झूलती रही है। पहले जो राजनीति गरीबों के इर्दगिर्द घूमती रही थी वह आज निम्न मध्यम वर्ग को भी अपने आगोश में ले चुकी है। पिछले पंद्रह सालों में भारतीय जनता पार्टी ने किसानों के साथ साथ प्रदेश के बड़े हिस्से तक सत्ता का लाभ पहुंचाया था। विभिन्न हितग्राही मूलक योजनाओं ने शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता में चार चांद लगा दिए। सरकारी नौकरियां खरीदकर वेतन भत्तों के हकदार बने एक छोटे तबके को तो शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने नए वेतनमानों का लाभ दिया ही इसके साथ आम नागरिकों के बड़े तबके तक भी सत्ता का लाभांश पहुंचाने का प्रयोग किया। सैकड़ों योजनाओं के माध्यम से प्रदेश के बड़े हिस्से तक सरकारी आय और कर्ज से जुटाए गए संसाधनों का लाभ पहुंचाया। शिवराज की सबसे बड़ी उपलब्धि यही रही कि उन्होंने प्रदेश के एक बड़े तबके को सत्ता में सीधे भागीदार बनाया। किसानों के खातों में लाभांश और मुआवजे की राशि पहुंचाने का इतना सफल प्रयोग इसके पहले देश की राजनीति में भी नहीं किया गया था। यही कारण था कि शिवराज को अजेय कहा जाने लगा था।

    भाजपा की राजनीति में सेंध लगाना कांग्रेस के लिए कठिन नहीं रहा। संगठन और सिद्धांतों के बगैर कांग्रेस ने प्रदेश में पल रहे असंतोष की कड़ियां जोड़ लीं और भाजपा को सत्ता गंवानी पड़ी। कमलनाथ के नेतृत्व में कुशल व्यूहरचना करके कांग्रेस के रणनीतिकारों ने भाजपा को चौखाने चित्त कर दिया। जयस के नेतृत्व में आदिवासियों के आंदोलन से उभारा गया असंतोष भाजपा के पतन की सबसे बड़ी वजह बना। किसान कर्ज माफी और बेरोजगारों को भत्ता देने जैसे लुभावने वादों ने मतदाताओं को बरगलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसके विपरीत भारतीय जनता पार्टी ने भी कांग्रेस को सत्ता में आने का मार्ग सुगम कर दिया। शिवराज सिंह चौहान के गलत टिकिट वितरण ने कांग्रेस को सुरक्षित गुप्त मार्ग उपलब्ध कराया और कांग्रेस ने फोटो फिनिश मात देकर सत्ता अपनी झोली में डाल ली।

    शिवराज सिंह चौहान ने भाजपा के संगठन को जिस तरह अपने एकाधिकार से पंगु बनाया उससे भाजपा ने अपनी संघर्ष क्षमता गंवा दी। भाजपा के तमाम पदाधिकारी सत्ता की मलाई छानने में जुट गए और संगठन को उन्होंने हितग्राही मूलक योजनाओं के दरवाजे पटक दिया। यही वजह थी कि भाजपा का कैडर हितग्राही मूलक योजनाओं के सहारे सिसकता रहा और सत्ता के खिलाड़ी बड़े कारोबार से अपनी पीढ़ियां सुरक्षित करने में जुट गए। इस कवायद का सबसे बड़ा पहलू ये भी था कि उनके साथ कांग्रेस के वे तमाम सत्ता के दलाल भी सहयोगी के रूप में शामिल थे जिन्होंने मध्यप्रदेश की स्थापना के बाद से सत्ता की लूट में महारथ हासिल की थी। यही वजह थी कि कांग्रेस के लूटतंत्र की जड़ें पंद्रह सालों में और भी गहरी हो गई। आज कमलनाथ जिस माफिया राज को गरियाते फिरते हैं वह वास्तव में कांग्रेस की कथित गरीब परस्ती से ही उपजा था। पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह जिस इंसपेक्टर राज को लानत भेजते हुए कहते थे कि वह अब कभी नहीं लौटेगा उसे कमलनाथ ने आते ही एक बार फिरसे जिंदा कर दिया।

    शुद्ध के लिए युद्ध हो, तबादलों का बेशर्म कारोबार हो या फिर माफिया के विरुद्ध संग्राम का उद्घोष हो सभी के पीछे सत्ता की आड़ में लूट ही प्रमुख धुरी रहा है। कमलनाथ और उनकी ब्रिगेड ने सत्ता की आड़ में करोड़ों रुपयों का जो खेल किया है उसका सीधा असर प्रदेश की जनता पर पड़ रहा है। मंहगाई और अराजकता ने अपराध का आंकड़ा बढ़ा दिया है। सरेआम लूट, हत्याएं और मारपीट की घटनाएं बढ़ गईं हैं। जिस डकैती समस्या को कभी समाप्त घोषित कर दिया गया था वह अब अपहरण उद्योग के रूप में एक बार फिर सिर उठाने लगी है। जीएसटी को असफल बनाने के लिए राज्य प्रायोजित जो टैक्स चोरी की मुहिम चलाई जा रही है उसने केन्द्रीय करों में मिलने वाले हिस्से को अप्रत्याशित रूप से घटा दिया है। कमलनाथ जिस बेशर्मी से खजाना खाली है का राग अलाप रहे हैं उससे भी साफ हो गया है कि मौजूदा सरकार के पास प्रदेश को सफल बनाने का कोई रोड मैप नहीं है।

    अब इन हालात में भाजपा ने विष्णुदत्त शर्मा को प्रदेश की कमान थमाकर फैला रायता समेटने की जो कवायद शुरु की है उसका कितना असर जमीन पर होगा उसका आकलन करना निश्चित ही बहुत जटिल हो गया है। विष्णुदत्त शर्मा संघ की जोड़ने वाली राजनीति की गोद में पले बढ़े हैं। वे सभी वर्गों और तबकों के बीच संबंधों की फेविकाल बिछाते रहे हैं। बेशक वे इस कार्य में निपुण हैं। बरसों से वे समाज को जगाने वाले प्रचारकों की भूमिका में रहे हैं। इसके बावजूद आज दौर बदल गया है। अब समाज को जगाने के बजाए उसे मुफ्तखोरी के नशे में डुबाने का दौर शुरु हो गया है। साम्यवाद जहां सख्ती से नियंत्रण करता रहा है वहीं पूंजीवाद सुर संगीत में डूबे प्रलोभनों की लोरियां सुना रहा है। ऩिश्चित रूप से ऐसे दौर में भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनकर विष्णुदत्त शर्मा को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। ये चुनौतियां उनकी अब तक की राजनीतिक विरासत से बिल्कुल अलग हैं। यही वजह है कि भाजपा और संघ के स्वयंसेवकों के सामने तरह तरह के सवाल उठ रहे हैं जिनका शमन सिर्फ उन्हें ही करना है। देखना है वे राजनीति के इस व्यूह को कैसे भेद पाते हैं।

  • भाजपा ने संगठन गढ़ने बीडी शर्मा को बनाया प्रदेश अध्यक्ष

    भाजपा ने संगठन गढ़ने बीडी शर्मा को बनाया प्रदेश अध्यक्ष

    भोपाल,15 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश महामंत्री एवं सांसद विष्णुदत्त (व्हीडी) शर्मा को राष्ट्रीय नेतृत्व ने प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है। श्री विष्णुदत्त शर्मा ने अपने सामाजिक जीवन की शुरुआत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से की थी। इसके बाद वे कई वर्षों तक परिषद में पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में कार्य करते रहे। वर्तमान में वे भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश महामंत्री, मध्यप्रदेश ओलपिंक एसोसिएशन के प्रदेश उपाध्यक्ष के साथ ही खजुराहो लोकसभा सीट से सांसद हैं।

    श्री विष्णुदत्त शर्मा का लंबा कार्यकाल विद्यार्थी परिषद में कड़े परिश्रम और संघर्षों के साथ कार्य करते हुए व्यतीत हुआ है। उन्होंने अपने सामाजिक जीवन की शुरुआत वर्ष 1986 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से की। वे वर्ष 1994 तक विद्यार्थी परिषद में विभिन्न पदों पर रहे। वर्ष 1995 से परिषद में पूर्णकालिक के रूप में कार्य करते हुए विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया। यह सफर वर्ष 2013 तक सतत जारी रहा। वर्ष 2013 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी में प्रवेश किया तथा विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया।

    श्री विष्णुदत्त शर्मा का जन्म 01 अक्टूबर 1970 को मुरैना जिले के ग्राम सुरजनपुर में हुआ। उनके पिता श्री अमर सिंह शर्मा हैं। श्री विष्णुदत्त शर्मा ने एमएससी (एग्रीकल्चर एग्रोनामी) से की। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गृहग्राम सुरजनपुर के सरकारी स्कूल में हुई। इसके बाद कक्षा नवमी से 12वीं तक की पढ़ाई मुरैना से की। शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय मुरैना से बीएससी प्रथम वर्ष की पढ़ाई की। आगे की पढ़ाई के लिए ग्वालियर के कृषि महाविद्यालय में एडमिशन लिया। इसके बाद एमएससी की पढ़ाई के लिए सीहोर के कृषि महाविद्यालय में प्रवेश लिया। बचपन से ही उनकी सामाजिक कार्यो में रूचि थी। यही कारण रहा कि छात्र जीवन से ही उन्होंने सार्वजनिक राजनीति की शुरूआत कर दी। वे वर्ष 2001 से 2005 तक राष्ट्रीय मंत्री, वर्ष 2007 से 2009 तक परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री एवं तत्पश्चात वर्ष 2013 तक क्षेत्रीय संगठन मंत्री मध्यक्षेत्र (मप्र-छग) रहे। वर्ष 2001 से वर्ष 2005 तक प्रदेश संगठन मंत्री महाकौशल का दायित्व भी संभाला। इससे पहले वर्ष 1993 में मध्यभारत के प्रदेश मंत्री रहे। उज्जैन के विभाग संगठन मंत्री एवं ग्वालियर के विभाग प्रमुख का दायित्व भी उन्होंने बखूबी निभाया।

    श्री विष्णुदत्त शर्मा ने वर्ष 2013 में भारतीय जनता पार्टी में प्रवेश किया तो यहां भी उन्हें कई दायित्व मिले। पार्टी ने उन्हें वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में झारखंड के संथाल क्षेत्र की 6 लोकसभा सीटों के चुनाव प्रभारी की जिम्मेदारी सौंपी। यहां के विधानसभा चुनाव में भी उन्हें संथाल क्षेत्र का प्रभारी बनाया गया। इसके अलावा दिल्ली, बिहार, असम, मध्यप्रदेश सहित कई अन्य प्रदेशों में विधानसभा चुनाव में कार्य संचालन एवं प्रबंधन की जिम्मेदारी भी सौंपी गईं। वे मार्च 2014 से दिसंबर 2016 तक नेहरू युवा केंद्र संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे। 14 अगस्त 2016 से भाजपा के प्रदेश महामंत्री का दायित्व निभा रहे हैं।

    श्री विष्णुदत्त शर्मा ने राजनीति के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी कई उपलब्धियां हासिल की हैं। इनमें बेस्ट जोन इंटर यूनिवर्सिटी बॉलीवाल प्रतियोगिता में जवाहरलाल नेहरू कृषि विशवविद्यालय का प्रतिनिधित्व, कबड्डी और बॉलीवाल प्रतियोगिताओं में महाविद्यालयीन टीम के कप्तान, विभिन्न प्रतियोगिताओं में कृषि महाविद्यालय ग्वालियर का प्रतिनिधित्व, एथलेटिक्स प्रतियोगिता में महाविद्यालय स्तर पर चैंपियन भी रहे। इसके अलावा एनसीसी का सी सर्टिफिकेट प्राप्त किया एवं अखिल भारतीय ट्रेकिंग शिविर गंगोत्री-गौमुख में सहभागिता एवं एनसीसी का बी सर्टिफिकेट प्राप्त किया।

    श्री विष्णुदत्त शर्मा ने देश में बढ़ते भष्टाचार के खिलाफ भी अभियान चलाया। इसके लिए उन्होंने वर्ष 2012 में यूथ अगेंस्ट करप्शन के तहत कार्य किया। उन्होंने मंच के राष्ट्रीय सह संयोजक के रूप में देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर भष्टाचार के खिलाफ जनजागरण अभियान चलाया, साथ ही कई स्थानों पर आंदोलन एवं प्रदर्शन का नेतृत्व किया। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री प्रफुल्ल पटेल द्वारा दिल्ली एयरपोर्ट के भूमि घोटाले के विरूद्ध वर्ष 2012 में बालाघाट से गोदिंया (महाराष्ट्र) तक पदयात्रा की। देश भर में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं तत्कालीन केंद्र सरकार के खिलाफ मार्च 2012 में दिल्ली में संसद का घेराव किया। अभाविप के राष्ट्रीय महामंत्री रहते हुए देश भर में प्रवास किया एवं शिक्षा के व्याप्त व्यापारीकरण एवं अव्यवस्थाओं के खिलाफ जन आंदोलन खड़ा करते हुए सड़क से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक संघर्ष किया। मध्यप्रदेश में निजी मेडिकल कॉलेजों में गरीब बच्चों के प्रवेश में आने वाली कठिनाइयों के लिए कड़ा संघर्ष किया। इसके अलावा नर्मदा नदी को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए मां नर्मदा अध्ययन दल का गठन कर नर्मदा अध्ययन यात्रा की। श्री विष्णुदत्त शर्मा ने विद्यार्थी कल्याण न्यास संस्था की स्थापना भी की। यह संस्था गरीब एवं पिछड़े वर्गों के सामाजिक उत्थान के लिए कार्य करती है।

    श्री विष्णुदत्त शर्मा को अपने बेहतर कार्यों के लिए कई अवार्ड भी प्राप्त हुए हैं। वर्ष 2018 में उन्हें दिल्ली के प्रतिष्ठित कलाम फाउंडेशन द्वारा कलाम इनोवेशन एंड गवर्नेंस अवार्ड मिला। एमआईटी पुणे द्वारा यूथ लीडर अवार्ड प्रदान किया गया। इसके साथ ही शासकीय एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा युवाओं के नेतृत्व प्रदान करने, सामाजिक कार्यों के लिए प्रेरित करने, सेवा कार्यों को मान्यता प्रदान करते हुए कई अन्य अवार्ड, स्मृति चिन्ह एवं अभिनंदन पत्र भी मिले।

    श्री विष्णुदत्त शर्मा ने कई विदेश यात्राएं भी कीं। इनमें भारत सरकार के युवा कार्य एवं खेल मंत्रालय द्वारा इंडो-चीन यूथ एक्सचेंज प्रोग्राम 2015 में भारतीय डेलीगेशन का नेतृत्व प्रमुख रहा। अंतरराष्ट्रीय एग्रीकल्चर सेमिनार के लिए बैंकाक गए। राजनीतिक, सामाजिक अध्ययन के लिए सिंगापुर की यात्रा की। साथ ही नेपाल भी गए।

  • कमलनाथ का सिख दंगों से कोई नाता नहीं -पीसी शर्मा

    कमलनाथ का सिख दंगों से कोई नाता नहीं -पीसी शर्मा

    भोपाल,6 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। दिल्ली में 1984 के सिख विरोधी दंगों से मुख्यमंत्री कमलनाथ का कोई लेना देना नहीं है। इस मुद्दे पर अब तक बिठाए गए आयोगों ने भी कमलनाथ को दोषी नहीं पाया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसके बावजूद सदन में कहा कि कांग्रेस ने सिख दंगों के आरोपों के बाद भी कमलनाथ को मुख्यमंत्री बना रखा है। ये तथ्य गलत है और प्रधानमंत्री जैसे पद पर बैठे व्यक्ति को ये कहना शोभा नहीं देता। आज राजधानी के जनसंपर्क संचालनालय में आयोजित पत्रकार वार्ता में श्री शर्मा ने दावा किया कि श्री कमलनाथ के नेतृत्व में प्रदेश विकास की ओर बढ़ रहा है।

    जब उन्हें बताया गया कि सिख दंगों के दौरान इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्टर संजय सूरी ने अपनी आंखों देखी घटना के बाद अपने अखबार में खबर छापी थी।जिसमें लिखा गया था कि स्वयं कमलनाथ ने सेंट्रल दिल्ली के रकाबगंज गुरुद्वारे के बाहर भीड़ का नेतृत्व किया था और उनकी उपस्थिति में दो सिख मारे गए थे। इस मामले की जांच करने वाले नानावटी आयोग ने कमलनाथ को संदेह का लाभ दिया था।जांच आयोग ने दो लोगों की गवाही सुनी थी, जिसमें तत्कालीन इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्टर संजय सूरी भी शामिल थे। उन्होंने कमलनाथ के मौके पर मौजूद होने की पुष्टि की थी। कमलनाथ ने यह स्वीकार किया था कि वे वहां मौजूद थे और भीड़ को शांत करने की कोशिश कर रहे थे।

    पिछले दिनों शिरोमणी अकाली दल के सदस्य और दिल्ली के विधायक मनजिंदर सिंह सिरसा ने मांग की थी कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तुरंत कमलनाथ को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देने के लिए कहें। उन्होंने दो गवाहों के लिए भी सुरक्षा की मांग की थी जो कमलनाथ के खिलाफ अदालत में गवाही देने के लिए तैयार हैं।

    केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने गृह मंत्रालय के सिख विरोधी दंगों का केस वापस खोलने के फैसले का स्वागत किया था। हरसिमरत बादल ने अपने ट्वीट में लिखा था कि ‘मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के खिलाफ मुकदमे को फिर से खोलना सिखों की जीत है। गलत तरीके से हल किए गए मामलों को फिर से खोलने के हमारे निरंतर प्रयासों का नतीजा है। अब कमलनाथ अपने अपराधों की कीमत चुकाएंगे.’

  • गांधी का सत्याग्रह अंग्रेजों का नाटक था बोले हेगड़े

    गांधी का सत्याग्रह अंग्रेजों का नाटक था बोले हेगड़े

    बैंगलुरु,2 फरवरी(शैलेश शुक्ला)।पूर्व केंद्रीय मंत्री और कर्नाटक से बीजेपी सांसद अनंत कुमार हेगड़े एक बार फिर से विवादों में हैं।हेगड़े ने राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी पर हमला बोला है और आजादी के आंदोलन को ‘ड्रामा’ करार दिया।बीजेपी नेता ने कहा कि पता नहीं लोग कैसे ‘इस तरह के लोगों को’ भारत में ‘महात्‍मा’ कहा जाता है।

    उत्‍तर कन्‍नड लोकसभा सीट से सांसद हेगड़े ने कहा कि पूरा स्‍वतंत्रता संघर्ष अंग्रेजों की सहमति और मदद से अंजाम दिया गया।’ हेगड़े ने कहा, ‘इन कथित नेताओं में से किसी नेता को पुलिस ने एक बार भी नहीं पीटा था। उनका स्‍वतंत्रता संघर्ष एक बड़ा ड्रामा था।’ महात्मा गांधी के ग्रुप के लोगों पर अंग्रेजों ने अत्याचार नहीं किया था। इन्हें जेल में भी सभी सुविधाएं दीं गई थी।

    हेगड़े ने कहा, ‘स्‍वतंत्रता संघर्ष को इन नेताओं ने ब्रिटिश लोगों की सहमति से रंगमंच पर उतारा था। यह वास्‍तविक संघष नहीं था। यह मिलीभगत से हुआ स्‍वतंत्रता संघर्ष था।’ बीजेपी नेता ने महात्‍मा गांधी के भूख हड़ताल और सत्‍याग्रह को एक ‘ड्रामा’ करार दिया।

    उन्‍होंने कहा, ‘कांग्रेस का समर्थन करने वाले लोग लगातार यह कहते रहते हैं कि भूख हड़ताल और सत्‍याग्रह की वजह से भारत को आजादी मिली। यह सत्‍य नहीं है। अंग्रेज सत्‍याग्रह की वजह से भारत से नहीं गए। अंग्रेजों ने निराशा में आकर हमें आजादी दी। जब मैं इतिहास पढ़ता हूं तो मेरा खून खौल उठता है। इस तरह से लोग हमारे देश में महात्‍मा बन गए।’

    इस बीच कांग्रेस नेता जयवीर शेरगिल ने अनंत कुमार हेगड़े के बयान की तीखी आलोचना की है। जयवीर ने कहा, महात्मा गांधी को देशप्रेम का सर्टिफिकेट उस पार्टी से नहीं चाहिए जो गोरों की सरकार के चमचे थे। अनंत हेगड़े उस संगठन से आते हैं जिन्होंने तिरंगे का विरोध किया, संविधान का विरोध किया, जिन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया।(नवभारत टाईम्स से साभार)

  • कब्जाधारी कांग्रेसियों की सूची सार्वजनिक करेगी भाजपा बोले लुणावत

    कब्जाधारी कांग्रेसियों की सूची सार्वजनिक करेगी भाजपा बोले लुणावत

    भोपाल,21 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। भारतीय जनता पार्टी ने अपने पंद्रह सालों के शासनकाल में सार्वजनिक संपत्तियों पर कब्जा जमाने वाले अतिक्रमण कारियों के खिलाफ कार्रवाई की लेकिन कभी दलगत राजनीति के आधार पर भेदभाव नहीं किया। मौजूदा कांग्रेस सरकार चुन चुनकर भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्तांओं को अतिक्रमण के नाम पर प्रताड़ित कर रही है। ऐसे झूठे मामलों में प्रताड़ित किए जा रहे आम लोगों का नेतृत्व करते हुए कल भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता पूरे प्रदेश में कलेक्टर कार्यालयों का घेराव करेंगे। सरकार से मांग की जाएगी कि वह आम नागरिकों को भाजपा का कार्यकर्ता बताकर प्रताड़ित करना बंद करे। भाजपा ने हर जिले में कांग्रेस के पदाधिकारियों के अतिक्रमणों की सूची बनाई है जिसे सार्वजनिक किया जाएगा और सरकार से उन अतिक्रमण कारियों के विरुद्ध बेदखली की कार्रवाई करने की मांग की जाएगी। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष बृजेश लुणावत ने आज पार्टी के प्रदेश कार्यालय में आयोजित पत्रकार वार्ता में ये बात कही है।


    श्री लुणावत ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी जिस तरह के भेदभाव और अवैध वसूली के आरोप प्रदेश सरकार पर लगाती रही है, उसे स्वयं मुख्यमंत्री कमलनाथ भी मानते हैं और मुख्य सचिव की नोटशीट भाजपा के आरोपों पर मोहर लगाती है। मुख्यमंत्री ने माना है कि इस मुहिम के दौरान माफिया के नाम पर आम जनता को परेशान किया जा रहा है। उन्होंने लिखा है कि बिल्डिंग परमीशन जैसी छोटी-छोटी बातों के लिए हजारों नोटिस दिये जा रहे हैं, पुलिस और प्रशासन के लोग इसमें शामिल हैं, जबकि मैंने स्पष्ट आदेश दिया था कि कार्रवाई माफिया पर हो, जनता पर नहीं।

    श्री लुणावत ने कहा कि कमलनाथ सरकार प्रदेश में अराजकता का वातावरण बना रही है। प्रदेश में अवैध शराब माफिया, उत्खनन माफिया और ट्रांसपोर्ट माफिया सक्रिय हैं, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। कांग्रेस नेताओं और अधिकारियों की मिलीभगत से सरकारी जमीनों को हथियाया जा रहा है, अवैध कब्जे किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश में सबसे ज्यादा अतिक्रमण कांग्रेसियों के ही हैं, लेकिन गरीब जनता और भाजपा कार्यकर्ताओं को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है।

    श्री लुणावत ने कहा कि हमारी मांग है कि प्रदेश सरकार द्वारा माफियाओं की जो सूची तैयार कराई गई है, सरकार उसे जनता के बीच प्रस्तुत करे। यदि सरकार ऐसा नहीं करती है, तो भारतीय जनता पार्टी अपने स्तर पर तैयार की जा रही अतिक्रमण, अवैध कब्जों की सूचियां मुख्यमंत्री को सौंपेगी। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी को यह जानकारी है कि किस मंदिर की जमीन पर किस कांग्रेस नेता का कब्जा है और सरकारी तालाबों की जमीन किसने हथिया रखी है। उन्होंने कहा कि हमारी मांग है कि सरकार इन लोगों पर कार्रवाई करे और गरीब जनता तथा कार्यकर्ताओं को परेशान करना बंद करे।

    प्रदेश में 24 जनवरी को होने वाले विरोध प्रदर्शन के दौरान पार्टी के वरिष्ठ नेता अलग-अलग जिलों में आंदोलन का नेतृत्व करेंगे। प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह इंदौर में नगर-ग्रामीण द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करेंगे। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चैहान एवं सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर भोपाल में आंदोलन का नेतृत्व करेंगी। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व सांसद नंदकुमार सिंह चैहान खण्डवा में तथा नरोत्तम मिश्रा जबलपुर में उपस्थित रहेंगे। शिवपुरी में श्रीमती यशोधरा राजे सिंधिया, छतरपुर में भूपेन्द्र सिंह, उमरिया में रामलाल रौतेल, सतना में राजेन्द्र शुक्ला, दमोह में जयंत मलैया, टीकमगढ़ में लालसिंह आर्य, कटनी में गणेश सिंह, ग्वालियर नगर-ग्रामीण में विवेक शेजवलकर, होशंगाबाद में डॉ. सीताशरण शर्मा, हरदा में हेमंत खंडेलवाल, खरगोन में जितू जिराती, झाबुआ में सुदर्शन गुप्ता, धार में सुश्री ऊषा ठाकुर, मुरैना में जयसिंह कुशवाह, भिण्ड में रूस्तम सिंह, दतिया में श्रीमती संध्या राय, श्योपुर में अभय चैधरी, गुना में वेदप्रकाश शर्मा, अशोकनगर में नरेन्द्र बिरथरे, सागर में गौरीशंकर बिसेन, निवाड़ी में उमेश शुक्ला, पन्ना में बृजेन्द्रप्रताप सिंह, रीवा में जनार्दन मिश्र, सीधी में श्रीमती रीति पाठक, सिंगरौली में शशांक श्रीवास्तव, शहडोल में गिरीश द्विवेदी, अनूपपुर में ओमप्रकाश धुर्वे, डिण्डौरी में संपत्तिया उईके, मंडला में नरेश दिवाकर, बालाघाट में ढालसिंह बिसेन, सिवनी में कन्हाईराम रघुवंशी, नरसिंहपुर में राव उदयप्रताप सिंह, छिन्दवाड़ा में कमल पटेल, भोपाल नगर-ग्रामीण में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, रायसेन में डॉ. गौरीशंकर शेजवार, विदिशा में ध्रुवनारायण सिंह, सीहोर में रमाकांत भार्गव, बुरहानपुर में सुभाष कोठारी, बड़वानी में गजेन्द्र पटेल, अलीराजपुर में श्रीमती रंजना बघेल, उज्जैन नगर-ग्रामीण में रमेश मेंदोला, शाजापुर में महेन्द्र सोलंकी, आगर में विजेन्द्र सिंह सिसोदिया, देवास में कृष्णमुरारी मोघे, रतलाम में जी.एस. डामोर, मंदसौर में सुधीर गुप्ता एवं जगदीश देवड़ा नीमच में कार्यकर्ताओं के साथ कलेक्ट्रेट का घेराव करेंगे।

  • मीसाबंदी की विधवा को पेंशन दें बोला छग हाईकोर्ट

    मीसाबंदी की विधवा को पेंशन दें बोला छग हाईकोर्ट

    बिलासपुर.13 जनवरी,(प्रेस सूचना केन्द्र)। छत्तीसगढ़ (Chhattisagrh) की बिलासपुर हाईकोर्ट (Bilaspur High court) ने एक याचिका पर सुनवाई के बाद मीसाबंदी (Misabandi) की विधवा को आधी पेंशन (Pension) देने का आदेश दिया है. कांग्रेस सरकार के फैसले को सुधारने का आदेश देने वाला ये अदालत का पहला फैसला है।पेंशन के नियमों के मुताबिक बिलासपुर के इस मीसाबंदी की विधवा को पति की मृत्यु के बाद आधी पेंशन दी जाती थी। जिसे राज्य शासन ने कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद जनवरी 2019 से बंद कर दिया। कोर्ट के इस फैसले के बाद साफ हो गया है कि सरकार का फैसला गलत था और अब मीसाबंदियों की विधवाओं की पेंशन जारी रहेगी।

    कांग्रेस सरकार ने सत्ता में आने के बाद तमाम मीसाबंदियों की पैंशन सत्यापन के नाम पर रोक दी थी। पिछली भाजपा सरकार ने बाकायदा शासकीय अधिसूचना के माध्यम से ये पेंशन जारी की थी। नई सरकार के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई जिसके आधार पर हाईकोर्ट ने बिलासपुर के 28 और दुर्ग के 32 मीसाबंदियों को पेंशन देने का आदेश दिया था। इसके बावजूद मीसाबंदियों की विधवाओं की पेंशन जारी नहीं की गई थी। पेंशन बंद किए जाने के खिलाफ बिलासपुर के मीसाबंदी की विधवा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट के जस्टिस पी सेम कोशी की सिंगल बेंच ने मीसाबंदी की विधवा के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनके रोकी गई पेंशन की राशि और सारे एरियर्स को तत्काल जारी करने का आदेश दिया है। मीसाबंदी की विधवा की ओर से दायर यह राज्य का पहला मामला है। ऐसा माना जा रहा है कि अब बाकी विधवा पेंशन पाने वालों के लिए भी रास्ता साफ हो गया है.

    मध्यप्रदेश में भी अभी तक मीसाबंदियों की मौजूदगी और सच्चाई का सत्यापन होने के बावजूद कई पेंशन धारकों को भुगतान नहीं किया जा रहा है। पिछले 9 महीनों से पेंशन नहीं मिलने से परेशान मीसाबंदियों ने हाईकोर्ट की शरण भी ली है।छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने तमाम याचिकाओं पर एक स्वर में सरकार के आदेश को रद्द कर दिया है। अभी 4 दिनों पहले बिलासपुर के ही 28 मीसाबंदियों को हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद बड़ी राहत देते हुए उनकी तमाम पेंशन और भत्तों की राशि तत्काल जारी करने का आदेश दिया था. दो दिन पूर्व दुर्ग के 38 मीसाबंदियों को भी हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली थी और अब विधवा पेंशन के प्रकरण में भी हाईकोर्ट ने वही फैसला दिया है।

  • कैलाश पर प्रहार को मजबूर कांग्रेस

    कैलाश पर प्रहार को मजबूर कांग्रेस

    कमलनाथ सरकार को सबसे बड़ा खतरा महसूस हो रहे कैलाश विजयवर्गीय को जल्दी ही धारा 144 का उल्लंघन करने के आरोप में गिरफ्तार किया जा सकता है। उनके साथ इंदौर कमिश्नर के आवास के बाहर धरना देने वाले इंदौर से बीजेपी सांसद शंकर लालवानी, बीजेपी विधायक रमेश मेंदोला, महेंद्र हार्डिया और जिला अध्यक्ष गोपीकृष्ण नेमा के खिलाफ भी धारा 144 उल्लंघन करने की FIR दर्ज की गई है। इस दौरान कैलाश विजयवर्गीय ने बयान दिया था कि हम कमिश्नर से मिलने आए हैं इसके बाद भी अधिकारियों ने प्रोटोकाल का पालन नहीं किया और हमें सूचना नहीं दी कि कमिश्नर शहर में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे। साथ में उन्होंने पुछल्ला लगा दिया कि आज शहर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेतागण मौजूद हैं नहीं तो मैं शहर में आग लगा देता। कैलाश के इस बयान से सत्तारूढ़ कांग्रेस बौखला गई। कैबिनेट की बैठक में विकास योजनाओं को छोड़कर चर्चा का सबसे बड़ा मुद्दा कैलाश विजयवर्गीय का ये बयान ही बन गया। सज्जन सिंह वर्मा, जीतू पटवारी और स्वास्थ्य मंत्री तुलसी सिलावट ने प्रेसवार्ता में ही कैलाश के बयान को निशाना बना दिया। सज्जन सिंह वर्मा बोले कि कैलाश विजयवर्गीय जैसी भाषा बोल रहे हैं वह इंदौर के लोग पसंद नहीं करते। इंदौर विकास प्रेमियों का शहर है और वहां इस तरह की भाषा नहीं चल सकती। दरअसल कैलाश विजयवर्गीय को कमलनाथ सरकार सबसे बड़ा खतरा महसूस करती है। पश्चिम बंगाल के प्रभारी होने के कारण कैलाश विजयवर्गीय राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं। ममता बैनर्जी के गुंडों से लड़ते हुए कैलाश ने पश्चिम बंगाल में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है। वहां कांग्रेस का मुकाबला ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस से तो है ही साथ में भाजपा से भी है। जिस तरह महाराष्ट्र में कांग्रेस ने शरद पंवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से तालमेल बिठाकर सत्ता पाई है उसी तरह वह बंगाल में भी ममता बैनर्जी के सामने झुकने तैयार है। इसलिए कांग्रेस का हाईकमान नहीं चाहता कि वह बंगाल में भी कैलाश की भाजपा को सफलता के झंडे गाड़ने की छूट दे दे। यही वजह है कि मध्यप्रदेश में वह कैलाश को घेरकर भाजपा के सफल हथियार को भौंथरा करना चाहती है। धारा 144 के उल्लंघन जैसे छोटे से मुद्दे को उठाकर वह कैलाश को घुटना टेक कराना चाहती है। कांग्रेस की इस रणनीति का दूसरा असर यह भी हो रहा है कि कैलाश मध्यप्रदेश भाजपा का चेहरा भी बनते जा रहे हैं। हाईकमान से करीबी होने के नाते भाजपा संगठन का भी एक बड़ा धड़ा कैलाश से जुड़ता जा रहा है। ऐसे में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार जाने अनजाने में कैलाश पर प्रहार करके भाजपा को उसका सर्वमान्य नेता दिए दे रही है। कांग्रेस का दिग्विजय सिंह गुट भी कैलाश से करीबी महसूस करता है। ऐसे में कमलनाथ सरकार अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा कार्य कर रही है। जब प्रदेश में कमलनाथ सरकार के प्रति बैचेनी बढ़ रही है तब उसे विकासात्मक कार्यों पर जोर देना चाहिए। इसके विपरीत वह तोड़फोड़ की राजनीति में ही उलझी बैठी है। कमलनाथ सरकार की यह रणनीति आने वाले समय में प्रदेश की राजनीतिक स्थितियों में बड़ा बदलाव लाने वाली साबित हो सकती है।

  • आपातकाल की बूढ़ी कुढ़न

    आपातकाल की बूढ़ी कुढ़न

    लोकस्वामी अखबार पर तालाबंदी और संपादक जीतू सोनी पर दस हजार रुपए का इनाम घोषित करके कमलनाथ सरकार ने आपातकाल की यादें ताजा कर दीं हैं। एक बार फिर ये साबित हो गया है कि देश में केवल दो वर्ग हैं एक शोषक और दूसरा शोषित। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने जिस एसके मिश्रा छोटू को आईएएस बनाया था वे शिवराज सिंह चौहान के प्रमुख सचिव रहे और भ्रष्टाचार के सबसे बड़े संरक्षक भी रहे। पूरी आईएएस बिरादरी लंबे समय तक केवल इसलिए सदमे में रही क्योंकि उसे छोटू मिश्रा के निर्देशों का पालन करना पड़ा। रिश्वत में सोने और रत्नों की रिश्वत लेने वाले छोटू मिश्रा को तमाम शिकायतों के बावजूद शिवराज ने अपने से दूर नहीं किया। तमाम झंझावातों के बीच छोटू मिश्रा संवाद की कड़ी बने रहे। दिग्विजय सिंह को सत्ता का लाभ दिलाते रहे छोटू कांग्रेस के गुटीय संतुलन में भी प्रमुख कड़ी बने रहे। मुकेश नायक के जीजा होने के कारण वे उनकी पवई से जीत के शिल्पकार भी बने। शिवराज सिंह चौहान के वित्तीय सलाहकार होने के कारण ये जीजा साले भारतीय जनता पार्टी के कार्यकाल में मलाई छानते रहे। वित्तीय प्रबंधन की यही एकमात्र कला आज भी उन्हें कमलनाथ सरकार की सबसे पावरफुल शख्सियत बना रही है। वे आज भी इतने ताकतवर हैं कि जैसे ही इंदौर के जांबाज जीतू सोनी ने अपने अखबार में उनकी अय्याशी की कहानी छापी तो मौजूदा सरकार में भूचाल आ गया। बात दरअसल हरभजन सिंह की ब्लैकमेलिंग की नहीं है। दरअसल जीतू सोनी ने मध्यप्रदेश की सत्ता की उस चाभी को घुमा दिया जिससे कई सत्ताधीशों की तिजोरियों का राजमार्ग जुड़ा हुआ है। जीतू सोनी के पास जो सबूत हैं उनकी अगली किस्तें यदि जारी हो जातीं तो प्रदेश और देश को कर्ज के दलदल में घसीटने वाले उन सफेदपोशों के चेहरों पर कालिख पुत जाती जो लंबे समय से गद्दारी की इबारत लिख रहे हैं। इसमें भाजपा और कांग्रेस के वे तमाम चेहरे हैं जिन्हें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीके से प्रदेश पर शासन करने का अवसर मिला। जीतू सोनी का अखबार जब कैलाश विजयवर्गीय के खिलाफ खबरें छापता था तो इंदौर में तनाव हो जाता था। आज सतही तौर पर ही सही कैलाश विजय वर्गीय लोकस्वामी पर पड़े छापे की निंदा कर रहे हैं।दरअसल जीतू सोनी और उनकी पत्रकारिता को लंबे समय से देखने वाले पत्रकार भी जानते हैं कि माई होम को कैसे पुलिस महकमे ने समाज के नाबदान की तरह इस्तेमाल किया। माईहोम एकमात्र ऐसा डांस बार है जहां हर वक्त पुलिस की निगरानी रहती थी। इंदौर के तमाम नवधनाड्य वहां आते जाते रहते हैं। ऐसा दो दशकों से ज्यादा समय से चल रहा था। ये सारा तमाशा समाज के लिए इतना उपयोगी था कि अनुराधा शंकर जैसी दबंग पुलिस अधिकारी ने भी कभी इसे छेडने की कोशिश नहीं की। कमलनाथ ने जिन मनगढ़ंत कहानियों से इस अड्डे को तबाह करने का प्रयास किया है उसके नतीजे इंदौर के लोग अच्छी तरह जानते हैं। इंदौर वही शहर है जहां अनिल धस्माना पर जानलेवा हमला हुआ था। खुद रुचिवर्धन मिश्रा को इस मामले की गंभीरता बता दी गई थी। इसके बावजूद उन्होंने सरकार के इशारे पर अपने ही विभाग की बरसों की मेहनत को पलीता लगाने का फैसला कर लिया। हालांकि इसका थोड़ा बहुत आभास उन्हें भी हो गया था तभी जब वे प्रेस वार्ता में सरकार की गढ़ी कहानी सुना रहीं थीं तब उनके हाथ कांप रहे थे। जीतू सोनी को फरार करने और दस हजार रुपए का इनाम घोषित करने के पीछे कमलनाथ सरकार की मंशा केवल आतंक फैलाने की है। जैसा कि वह खाद्य पदार्थों में मिलावट के नाम पर रासुका लगाने के अभियान में कर चुकी है।

    इंदिरा गांधी की जमाखोरों के खिलाफ चलाई गई मुहिम की नकल बरसों बाद दुहराने के बाद भी कमलनाथ को वांछित सफलता नहीं मिल पा रही है। आपातकाल का हश्र पूरे देश के सामने है। कमलनाथ तो इंदिरा गांधी के समान बेदाग भी नहीं हैं। इसके बावजूद वे उसी पिटी फिल्म को दुबारा सुपरहिट कराने का ख्वाब पाले बैठे हैं। देश के असली उद्यमियों के विरुद्ध चलाई गई इस मुहिम की कुढ़न कोई अच्छे नतीजे लाएगी ये नहीं कहा जा सकता। दरअसल ये फर्जी उद्योगपतियों या कहा जाए देश के लुटेरों से जनता के संग्राम की शुरुआत कही जा सकती है। जीतू सोनी को तो माईहोम जैसे प्रोजेक्ट की वजह से प्रताड़ित किया जा सकता है लेकिन सूचना क्रांति के इस दौर में सच्चाई को छुपाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। फर्जी उद्योगपतियों की उद्यमिता के कारनामे भी जल्दी ही जनता जान जाएगी।तब एक नहीं हजारों जीतू सोनी खड़े होंगे और प्रदेश की पुलिस भी उनका मुकाबला नहीं कर पाएगी।

  • निर्दोष सिखों के नरसंहार के दोषी कब दंडित होंगे

    निर्दोष सिखों के नरसंहार के दोषी कब दंडित होंगे

    स. इकबाल सिंह लालपुरा

    1984 में निर्दोष सिखों का बर्बरता से नरसंहार किया गया, सरेराह गले में टायर डालकर उन्हें जलाया गया, सामूहिक कत्ल किए गए, बलात्कार किए गए, लूट की गई और गुरुद्वारों को तोड़ दिया गया। अच्छे भले लोग भी ‘खून का बदला खून’, ‘खून के छींटे सिखों के घर तक पहुंचने चाहिए’ और ‘जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है’ की बातें करने लगे

    31 अक्टूबर 1984 को देश की तात्कालिक प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का कत्ल उन्हीं की सुरक्षा में नियुक्त दो पुलिस कर्मचारियों (एक सब इंस्पेक्टर व एक सिपाही) ने प्रधानमंत्री के आवास पर ही कर दिया। किसी भी देश में प्रधानमंत्री व उसका निवास सबसे सुरक्षित स्थान होता है। जो भी व्यक्ति सेना, अर्धसैनिक दस्ते या पुलिस की वर्दी पहनता है, वह केवल देश के कानून व नागरिकों की सुरक्षा तक ही समर्पित होता है। उसका व्यक्तिगत धर्म/जाति का बंधन उसे अपनी ड्यूटी निरपक्षता से करने में रुकावट नहीं होना चाहिए। यदि सुरक्षा कर्मचारी अनुशासन की अवहेलना करें व रखवाले बनने की जगह कातिल, हत्यारे बन जाएं तब जरूर कुछ बड़े मानसिक कारणों की संभावना होती है।

    इंदिरा गांधी जी पर हमला 31 अक्टूबर 1984 को सुबह तकरीबन 9:20 पर हुआ। तुरंत उन्हें ‘ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस’ दिल्ली में ले जाया गया। जहां पर डॉक्टरों ने 10:50 पर उन्हें मृत घोषित कर दिया। 11:00 बजे प्रातः ऑल इंडिया रेडियो प्रधानमंत्री जी को उन्हीं के दो सिख शस्त्रधारी अंगरक्षकों द्वारा कत्ल किया जाने का ऐलान करता है। साधारणत: ‘ग्रेव एंड सडन प्रोवोकेशन’ जो जुर्म की गंभीरता को नहीं बल्कि सजा को कम करने की प्रक्रिया है जिसका तात्पर्य यह है कि दोषी की भावनाओं को ठेस पहुंची तो उसने जुर्म कर दिया। पर दिल्ली सिख कत्लेआम की कहानी तो कुछ अलग ही है।

    भावनाएं तो कुछ मिनटों के बाद ही शांत हो जाती हैं। परंतु दिल्ली में सिखों कत्लेआम कुछ मिनटों बाद नहीं, बल्कि कई घंटों की विचार मंथन से उत्पन्न हुई घटना प्रतीत होती है। । राजीव गांधी शाम 4:00 बजे वापस एम्स पहुंचते हैं। पहली पत्थरबाजी की घटना शाम 5:30 बजे तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह जी के एम्स पहुंचने पर होती है। रात में अकबर रोड दिल्ली के एक बंगले पर ऐसे कुछ मुख्य लोग इकट्ठे होते हैं, जिनमें से अधिकतर पर सिख कत्लेआम करवाने का दोष आज भी लगाया जाता है।

    1 नवंबर 1984 को सुबह केवल दिल्ली ही नहीं भारत के कई राज्यों में सिखों का नरसंहार आरंभ होता है। जिन्होंने प्रधान मंत्री जी की हत्या की थी। उनमें से एक को तो गिरफ्तार कर लिया गया व दूसरे को मौके पर ही मार गिराया गया। परंतु नरसंहार उन हजारों निर्दोष सिखों का हुआ जिनका कोई जुर्म ही नहीं था।

    निर्दोष सिखों का बर्बरता से नरसंहार किया गया, सरेराह गले में टायर डालकर उन्हें जलाया गया, सामूहिक कत्ल किए गए, बलात्कार किए गए, लूट की गई और गुरुद्वारों को तोड़ दिया गया। अच्छे भले लोग भी ‘खून का बदला खून’, ‘खून के छींटे सिखों के घर तक पहुंचने चाहिए’ और ‘जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है’ की बातें करने लगे। 3 नवंबर तक देश की पुलिस, फौज और अदालतें खामोश रही, इंसानियत उनके ह्रदय में नहीं जागी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इन 3 दिनों में करीब 2800 सिख दिल्ली में और 3350 सिख भारत के दूसरे राज्यों में कत्लेआम की भेंट चढ़े। लूट खसोट और नुकसान का तो कोई हिसाब ही नहीं। सरकारी तंत्र चाहे अराजकता की तस्वीर बना रहा परंतु आम आदमी के ह्रदय में इंसानियत जरूर कचोटती रही। उन्होंने मजलूमों को अपनी छाती से लगाकर, अपने घर में छुपाकर भी रखा कई जगह बचाने वाले भी भीड़ तंत्र के शिकार बनें और य​ह भले लोग शरणार्थी कैंपों में भी उनका सहारा बने। ये हमला एक धर्म को मानने वालों के द्वारा दूसरे पंथ पर नहीं था बल्कि बदला लेने की नियत से अपराधियों और राजनीतिक दल के नापाक गठबंधन का घिनौना कृत्य था|

    इस कत्लेआम की पड़ताल तो क्या होनी थी, पुलिस ने कोई मुकदमा भी दर्ज नहीं किया और न ही किसी अदालत ने कानून के पालन हेतु, स्वयं ही कोई कार्रवाई की। दुनिया भर में बदनामी के दाग से बचने हेतु तात्कालिक सरकार ने नवंबर 1984 में एक एडिशनल कमिश्नर पुलिस वेद मरवाह की अध्यक्षता में कमेटी बनाई । जिसे 1985 में बंद कर दिया गया। उस रिपोर्ट का भी कुछ पता नहीं। अगला कमीशन जस्टिस रंगनाथ मिश्रा का बना। जस्टिस रंगनाथ मिश्रा कमीशन ने कहा कि दोषियों की शिनाख्त करनी उसकी जिम्मेदारी का हिस्सा ही नहीं थी। इसी क्रम में अब तक 10 से अधिक कमीशन और कमेटियां बन चुकी हैं। परंतु पूर्ण इंसाफ की प्रक्रिया अभी देश की राजधानी दिल्ली में ही अधूरी है। देश के अन्य राज्यों में 35 साल पूरे होने के बाद भी सरकार इंसाफ की निष्पक्ष जांच, मुआवजा व दोषियों को सजा दिलाने हेतु पूरी तरह सजग नहीं है।

    सन 1993 में मदन लाल खुराना जी की तरफ से बनाई गई ‘जस्टिस नरूला कमेटी’ को भी उस समय कि केंद्र सरकार ने मान्यता नहीं दी थी। पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेई जी की सरकार ने सन 2000 में ‘जस्टिस जी. टी. नानावती कमीशन’ का गठन करके इस नरसंहार की जांच को आगे बढ़ाया। जो आज भी कभी तेज ओर कभी धीमी गति से चल रही हैं।

    बेगुनाह लोगों के कत्लेआम, लूटमार और औरतों के साथ बलात्कार करने वाले दोषियों को सजा करवाने की प्रक्रिया यदि 35 साल में पूरी नहीं हो सकी तो लगता है कि पूरी न्यायिक प्रक्रिया की भी जांच आवश्यक है।

    आज जब सारा विश्व और विशेषकर भारत सरकार श्री गुरु नानक देव जी का 550 साला प्रकाश उत्सव बना रही है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की तरफ से सिख भाईचारे के हरे जख्मों पर मरहम लगाने का प्रयास हो रहा है। तो अच्छा हो, कि समय निश्चित करके 1984 के अपराधियों की सजा दिलवाने के कार्य को भी प्रमुखता से किया जाए।

    ( लेखक पंजाब पुलिस से सेवानिवृत्त डीआईजी हैं )

  • अबकी बारी शिवसेना भारी, राऊत बोले सरकार बनाएंगे

    अबकी बारी शिवसेना भारी, राऊत बोले सरकार बनाएंगे

    मुंबई,2 नवंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। महाराष्ट्र में भाजपा शिवसेना युति के बीच मुख्यमंत्री को लेकर जो रार ठनी है उसका कोई समाधान होता नजर नहीं आ रहा है। 50-50 सीटों पर तालमेल से चुनाव लड़कर भाजपा ने 105 और शिवसेना ने 56 सीटें हासिल कीं हैं। स्वाभाविक तौर पर महाराष्ट्र के नागरिकों ने सर्वाधिक 25.7 प्रतिशत मत देकर भाजपा की निवृतमान सरकार को आगे अपना काम जारी रखने का जनादेश दिया है लेकिन उसका ये मत प्रतिशत तब है जब शिवसेना से उसका गठबंधन था। शिवसेना को भी इस चुनाव में 16.5 प्रतिशत मत प्राप्त हुए हैं। उसे भाजपा से गठबंधन की मंहगी कीमत चुकानी पड़ी है। यही वजह है कि शिवसेना अब अपना अस्तित्व बचाने के लिए आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाने की जिद पर अड़ी हुई है।

    शिवसेना सांसद संजय राऊत ने आज अल्टीमेटम दिया है कि यदि भाजपा पंद्रह दिनों तक सरकार नहीं बना पाएगी तो फिर शिवसेना सरकार बनाने का दावा पेश करेगी। शिवसेना हर हाल में अपना मुख्यमंत्री बनाने की जिद पर अड़ी हुई है। उसके नेताओं का कहना है कि एक बार सत्ता का संचालन भाजपा कर चुकी है इसलिए इस बार शिवसेना को मौका मिलना चाहिए। भाजपा का कहना है कि गठबंधन के बीच भाजपा ने ज्यादा सीटें पाईं हैं इसलिए बड़े दल होने के नाते उसे सरकार चलाने का अवसर मिलेगा। हालांकि कम सीटें आने के लिए शिवसेना अब भाजपा को ही दोषी बता रही है। उसके नेताओं का कहना है कि भाजपा के मत प्रतिशत में गिरावट बता रही है कि भाजपा को सत्ता चलाने का जनादेश नहीं है। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के आए नतीजों के मुताबिक 2014 के 122 सीटों के मुकाबले भाजपा इस बार 105 सीटों पर ही जीत दर्ज कर सकी। चुनाव आयोग के आंकड़े के अनुसार पार्टी को 17 सीटों का नुकसान होने के साथ कुल मिले मतों में भी करीब दो फीसदी की गिरावट आई है। आंकड़ो के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अलावा महाराष्ट्र की राजनीति की तीन अहम पार्टियों शिवसेना, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के मत प्रतिशत में भी गिरावट आई है। इसकी वजह कई सीटों पर बागियों के मिले मत हैं।

    भाजपा ने 2014 में 260 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे और उसके खाते में कुल पड़े मतों का 27.8 प्रतिशत गया जो इस चुनाव में घटकर 25.7 फीसदी रह गया। हालांकि, इस पिछले चुनाव में अकेले भाजपा लड़ी थी लेकिन इस बार वह शिवसेना के साथ गठबंधन में उतरी थी। शिवसेना को 288 सदस्यीय विधानसभा में 16.4 फीसदी मतों के साथ 56 सीटों पर जीत मिली है। इस प्रकार पिछले चुनाव के मुकाबले उसे सात सीटों और 2.9 फीसदी मतों का नुकसान हुआ है। हालांकि इस बार पार्टी ने 124 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे जबकि पिछली बार 282 पर उसने दावेदारी की थी।

    इस चुनाव में निर्दलीय सहित 28 गुटों को कुल 23.06 प्रतिशत मत मिले हैं जो 2014 के चुनाव के मुकाबले नौ फीसदी अधिक है और इन दलों को 19 सीटें मिली थीं। इन छोटे दलों में प्रकाश आंबेडकर के नेतृत्व वाली वंचित बहुजन अगाड़ी और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एमआईएमआईएम) शामिल हैं।

    इस बार 13 निर्दलीय जीतकर विधानसभा पहुंचे हैं। शरद पवार के नेतृत्व वाली राकांपा को इस बार 16.7 फीसदी के साथ 54 सीटें मिली है, जो 2014 के मुकाबले 13 सीटें अधिक है। हालांकि राकांपा के मत प्रतिशत में गिरावट आई है। पार्टी को 2014 में 17.2 प्रतिशत मत मिले थे। पार्टी ने 2019 में 117 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे।

    कांग्रेस को 2014 के 18 फीसदी के मुकाबले इस बार 15.9 प्रतिशत मिले हैं। हालांकि, उसकी सीटें 42 से बढ़कर 44 हो गई है। कांग्रेस ने इस बार 147 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे जबकि पिछली बार 287 सीटों पर दावेदारी की थी। राज ठाकरे के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के मत प्रतिशत में भी गिरावट आई है। पार्टी को 2.3 प्रतिशत मत मिले हैं जो 2014 के मुकाबले 1.4 फीसदी कम है।

  • सरकार को मिला पिट्ठू महापौर बिठाने का हक

    सरकार को मिला पिट्ठू महापौर बिठाने का हक

    देश के नीति निर्धारकों ने सत्ता की चाभी जनता को देने की मंशा से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 40 में राज्यों को पंचायतों का गठन करने का निर्देश दिया था। स्वर्गीय राजीव गांधी ने 1991 में संविधान में 73 वां संविधान संशोधन अधिनियम 1992 लाकर पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता दे दी। मध्यप्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायती राज को जोर शोर से लागू किया गया। दस सालों तक दिग्विजय सिंह की सरकार पंचायती राज का ढोल पीटती रही। इसमें गली के गुंडों को संवैधानिक पदों पर पहुंचा दिया गया। नतीजा ये निकला कि घनघोर अराजकता फैल गई और कुशासन के चलते कांग्रेस की सरकार को जनता ने घरों से निकलकर सत्ता से बाहर धकिया दिया। संवैधानिक व्यवस्था संभाल रही कार्यपालिका और पंचायती राज व्यवस्था में तीखा टकराव हुआ नतीजन पूरी अफसरशाही ने जनता के आक्रोश का नेतृत्व संभाल लिया। ये आक्रोश इतना अधिक था कि सत्ता में आने के बाद भाजपा की सरकारें तमाम खामियों के बावजूद पंद्रह सालों तक सत्ता में टिकी रहीं। लोग कांग्रेस को सत्ता में नहीं आने देना चाहते थे और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इसे अपनी लोकप्रियता बताकर प्रदेश की अर्थव्यवस्था चौपट करने वाली घोषणाएं करते रहे। लोकप्रियता बटोरने के फार्मूलों पर चलने वाली शिवराज सिंह चौहान सरकार की प्रशासनिक असफलताओं ने एक बार फिर करवट ली और अनमने भाव के बीच कांग्रेस को सत्ता की चाभी मिल गई। इस बार राजीव गांधी नहीं हैं और कांग्रेस अपनी गलतियों को दुहराना नहीं चाहती। इसलिए नगरीय निकाय चुनावों से पहले कमलनाथ सरकार ने जनता से महापौर चुनने का हक छीन लिया है।

    राज्यपाल महामहिम लालजी टंडन ने महापौर का चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से कराए जाने संबंधी सरकार के अध्यादेश को मंजूरी दे दी है। कमलनाथ का अनुमान है कि वे सत्ता के बल का इस्तेमाल करके आसानी से नगर निगमों में अपने पिट्ठू महापौर बिठा लेंगे। सरकार की मंत्रिपरिषद का फैसला है तो राज्यपाल को इसे मंजूरी देनी ही थी। भाजपा इस फैसले से सहमत नहीं है और भाजपा के दिग्गजों ने राज्यपाल से भेंटकर इस अध्यादेश के प्रति अपनी नाराजगी भी जताई थी। इस फैसले के पीछे काम कर रहे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने राज्यपाल पर दबाव बनाने के लिए बताते हैं राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा से बयान दिलवाया कि राज्यपाल को विधेयक पास करके अपने संवैधानिक दायित्वों का पालन करना चाहिए। इस सार्वजनिक बयान को लेकर राजभवन की नाराजगी की खबरों के बाद मुख्यमंत्री कमलनाथ स्वयं राज्यपाल महोदय से मिलने पहुंचे और कहा कि विवेक तनखा का बयान उनकी व्यक्तिगत राय है सरकार इससे इत्तेफाक नहीं रखती। एक तरह से सार्वजनिक माफीनामे के बाद राजभवन ने विधेयक को मंजूरी दे दी। जाहिर है कि कांग्रेस अब पंचायती राज जैसी गलती नहीं दुहराना चाहती है और वो चुने हुए जन प्रतिनिधियों के भरोसे बैठे रहने के बजाए अपने पिट्ठू नेताओं के माध्यम से शासन चलाना चाह रही है।

    दरअसल पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अब कमलनाथ सरकार में अपनी भूमिका का इस्तेमाल करके गलतियां सुधारने का प्रयास कर रहे है।वे राजनीति से सत्ता को मजबूत करने का फार्मूला तो पहले ही पा चुके हैं। अपने पुत्र जयवर्धन सिंह के माध्यम से वे प्रदेश के नगरीय ढांचे से प्रशासनिक धींगामुश्ती को पूरी तरह समाप्त करने का प्रयास कर रहे हैं। जयवर्धन सिंह नगरीय प्रशासन मंत्री हैं और कमलनाथ ने उन्हें वरद हस्त दे रखा है। भारत सरकार ने जबसे गांवों में जन सुविधाओं पहुंचाने के बजाए शहरीकरण की नीति पर जोर देना शुरु किया है तबसे नगरीय निकायों पर कब्जा जमाना सभी राजनीतिक दलों की ख्वाहिश बन चुकी है। भविष्य में नगरीय निकायों पर जिसका कब्जा होगा वही प्रदेश और देश की सत्ता पर काबिज हो सकेगा। कांग्रेस इसीलिए नगरीय निकायों में अपने पिट्ठू महापौर बिठाकर विकास की योजनाओं पर अपना नियंत्रण बनाना चाह रही है।

    केन्द्र से आने वाली अधिकतर योजनाओं की भी नोडल एजेंसी नगरीय निकाय होते हैं। इन सभी योजनाओं को मंजूरी के लिए महापौर की सहमति जरूरी होती है। नगरीय निकायों पर कब्जा जमाने की इस रणनीति से ठेकेदारों की पूरी लाबी सहमत है। सत्ता माफिया का रूप ले चुकी ये ताकतें जानती हैं कि यदि लोकतांत्रिक तरीके से नगरीय निकाय चलेंगे और निर्माण कार्यों के टेंडर खुलेआम सार्वजनिक मंच पर खोले जाएंगे तो फिर वे ठेके नहीं पा सकेंगे। यही वजह है कि जब दिग्विजय सिंह भोपाल से लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे तब यही ठेकेदारों की लाबी उनके समर्थन में भाजपा का साथ छोड़कर समर्थन दे रही थी। यदि जनता ने साध्वी प्रज्ञा को समर्थन देकर चुनाव न जिताया होता तो दिग्विजय सिंह एक सुपर मुख्यमंत्री के तौर पर सार्वजनिक मंच पर अपनी भूमिका निभाते देखे जाने लगते। हार के बाद वे पृष्ठभूमि में सक्रिय हैं और सरकार के फैसलों को प्रभावित कर रहे हैं।

    ऐसा नहीं कि सरकार के इस फैसले से अफसरशाही बहुत खुश है। कतिपय आला अफसर सत्ता पर पकड़ बनाती कांग्रेस के फैसलों से नाखुश हैं। उन्हें लगता है कि अभी जनता के फैसलों के नाम पर वे प्रमुख भूमिका निभा लेते थे। अब जबकि सरकार अपने पिट्ठू जनप्रतिनिधियों के माध्यम से फैसले लागू करेगी तब उनकी भूमिका में बड़ी कटौती हो जाएगी। जिस तरह भाजपा शासनकाल में व्यापमं के माध्यम से नौकरियों की भर्तियां कराए जाने से अफसरशाही के हाथों से बड़ा अधिकार छीन लिया गया था उसी तरह नगरीय निकायों पर कब्जा जमाकर कांग्रेस सभी निर्माण कार्यों पर अपनी पकड़ बना लेगी। वैसे सूत्र बताते हैं कि शिवराज सिंह चौहान का व्यापमं से भर्तियां कराने का फैसला भी पृष्ठभूमि में सक्रिय रहकर दिग्विजय सिंह ने ही करवाया था। अपने छोटे भाई लक्ष्मण सिंह और भाजपा के मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा के बीच तालमेल स्थापित करवाकर भर्तियों के अधिकारों का केन्द्रीकरण किया गया था।उसी सलाह का लाभ लेते हुए शिवराज सरकार पर भर्ती घोटाले के आरोप लगाए गए। अब सत्ता में आने के बाद कांग्रेस उस व्यापमं घोटाले का नाम भी नहीं लेना चाहती। कांग्रेस में सत्ता के विकेन्द्रीकरण की कवायद से उपजी हताशा की वजह से दिग्विजय सिंह सत्ता के केन्द्रीकरण के सबसे बड़े पैरवीकोर बन चुके हैं और कमलनाथ सरकार भी अब सत्ता के केन्द्रीकरण की ओर कदम बढ़ा रही है। नगरीय निकाय चुनावों के संदर्भ में लिया गया फैसला इसकी सबसे बड़ी नजीर बन गया है।

  • वाहन कंपनियों की सेल्स एजेंट क्यों बनी कमलनाथ सरकार

    वाहन कंपनियों की सेल्स एजेंट क्यों बनी कमलनाथ सरकार

    मध्यप्रदेश की कमलनाथ कांग्रेस सरकार इन दिनों भारी अंतर्विरोधों से जूझ रही है इसके बावजूद वह अपनी घिसी पिटी शासन शैली से मुक्त होने का प्रयास नहीं कर रही है। इसकी वजह उसके आकाओं की वह रणनीति है जिससे पार्टी को भारी आय होती रही है। पार्टी की आय का ढांचा जिस चुनावी चंदे पर टिका है उसे केन्द्रीय मोटर व्हीकल एक्ट के सुधारों ने तगड़ी चुनौती दी है। इसी कारण से आर्थिक संकटों से घिरी कमलनाथ सरकार प्रदेश की आय बढ़ाने का ये नया अवसर छोड़ रही है। एक्ट पर तत्काल अमल न करने के लिए उसने जनता की असुविधा का हवाला दिया है। हकीकत ये है कि वह अपने नागरिकों को वैकल्पिक सस्ता परिवहन दिलाने के बजाय जीवाश्म ईंधन आधारित मंहगे परिवहन के लिए मजबूर कर रही है।

    नए मोटर व्हीकल एक्ट में तगड़े जुर्माने के प्रावधान को लेकर पूरे देश में बहस चल रही है। कई राज्यों ने तो इसे लागू कर दिया है पर कई राज्य इसके प्रावधानों का विरोध कर रहे हैं। मध्यप्रदेश सरकार के परिवहन मंत्री गोविंद राजपूत ने ये कहकर प्रावधान लागू करने से इंकार कर दिया कि हम इन प्रावधानों का परीक्षण करा रहे हैं। हमारे पास ये अधिकार है कि हम एक्ट के प्रावधानों का परीक्षण करे और उसे स्थानीय जरूरतों के अनुसार लागू करें। हालांकि ऐसा करते हुए सरकार को अपनी आय बढ़ाने का एक बड़ा अवसर छोड़ना पड़ रहा है।

    केद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का कहना है कि देश में वाहन दुर्घटनाएं बढ़ रहीं हैं और प्रतिवर्ष लगभग डेढ़ लाख दुर्घटनाओं में 48000 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ रहा है। अधिकतर दुर्घटानाओं के मामलों में सड़क परिवहन के नियमों का उल्लंघन ही प्रमुख वजह होता है। नियमों के पालन के लिए जो शर्तें रखीं गईं थीं वे इतनी सरल थीं कि लोग आसानी से चालान भरकर निश्चिंत हो जाते थे। अब दंड के प्रावधान इतने कड़े किए गए हैं कि लोग सड़कों पर चलते समय यातायात के नियमों का पालन करने को मजबूर हो जाएंगे। दस्तावेजों के अभाव में घायलों और मृत व्यक्तियों को क्षतिपूर्ति भी नहीं मिल पाती है इसलिए नए मोटर व्हीकल एक्ट के प्रावधान लोगों को सुरक्षा दिलाने में मददगार साबित होंगे।

    इसके विपरीत मध्यप्रदेश राज्य के पुलिस और परिवहन विभाग ने दस्तावेजों के परीक्षण के लिए सिर्फ नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहन चालकों को रोके जाने की व्यवस्था की है। यदि वाहन चालक नियमों का पालन करते हुए यातायात करेंगे तो पुलिस उन्हें नहीं रोकेगी। वाहन चालक नियम तोड़ते हैं तो फिर उनके दस्तावेज भी चेक किए जाएंगे और चालानी कार्रवाई भी की जाएगी। वास्तव में इसकी बड़ी वजह राज्य सरकार के आरटीओ दफ्तरों में फैला भ्रष्टाचार और अव्यवस्था है। वाहन लाईसेंस बनवाने के लिए लोगों को इतने चक्कर काटने होते हैं कि वे बगैर दस्तावेज पूरे करवाए ही वाहन चलाना शुरु कर देते हैं। वाहन चालकों को वाहन का पंजीयन प्रमाणपत्र, और लाईसेंस बनवाने के लिए जो रिश्वत देना पड़ती है वह इसके लिए निर्धारित शुल्क से कई गुना ज्यादा होती है। चक्कर काटने होते हैं सो अलग।

    दरअसल भारत में राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार ने इतनी सारी वाहन कंपनियों को दुपहिया, चारपहिया वाहन बनाने की छूट दे डाली थी कि पूरे देश में सार्वजनिक परिवहन का ढांचा धराशायी हो गया। बड़ी संख्या में चार पहिया वाहन आ जाने से बसों से होने वाला सार्वजनिक परिवहन ढप पड़ गया। मध्यप्रदेश में राज्य सड़क परिवहन निगम जैसे प्रतिष्ठान को बंद करने की एक बड़ी वजह यह भी रही है। सार्वजनिक परिवहन बहुत सस्ता पड़ता है लेकिन इसके बावजूद भारत जैसे गरीब देश में राजीव गांधी की सरकार ने मंहगे वैयक्तिक परिवहन को बढ़ावा दिया। तेल उत्पादक देशों के व्यापारियों ने वाहन निर्माण में रुचि ली और देश में कई वाहन निर्माता कूद पड़े। जिसकी वजह से भारत की सड़कें वाहनों से पट गईं। हालात ये हो गए कि सड़कें चौड़ी करने के लिए, नए राजमार्ग बनाने के लिए देश को कर्ज लेना पड़ा। पिछली भाजपा सरकारों ने सड़क, बिजली और पानी के सुधार के नाम पर इतना कर्ज लिया कि प्रदेश को अपनी आय का बड़ा हिस्सा कर्ज का ब्याज चुकाने पर खर्च करना पड़ रहा है।

    कमलनाथ सरकार के सामने चुनौती है कि वह कैसे उत्पादकता बढ़ाए। उत्पादकता की लागत कैसे घटाए। इसके बावजूद उसकी रुचि जनता को सस्ता सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध कराने में नहीं है। कांग्रेस पार्टी के चुनावी चंदे का बड़ा हिस्सा तेल उत्पादक देशों, वाहन कंपनियों, वाहन कलपुर्जे बनाने वाली कंपनियों से ही आता है। यदि वह केन्द्रीय मोटर व्हीकल एक्ट को सख्ती से लागू करती है तो लोग सार्वजनिक परिवहन के साधनों की मांग करेंगे।वे अपने वाहन खरीदने के बजाए सार्वजनिक बसों में यात्रा करना पसंद करेंगे।इससे वाहन कंपनियों का मुनाफा घटेगा। तेल की खपत घटेगी और तेल कंपनियों को नुक्सान होगा।यही वजह है कि कमलनाथ सरकार मोटर व्हीकल एक्ट के प्रावधानों को सख्ती से लागू नहीं करना चाहती है। बेशक तेल खरीदी के नाम पर प्रदेश और देश की जनता को अपनी आय का बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता है। ये रकम विदेशी तेल कंपनियों तक जाती है। भारत की उत्पादकता की लागत बढ़ती है और मुनाफा तेल कंपनियों को होता है। यही वजह है कि तेल उत्पादक कंपनियां भारत में ऐसी सरकारें चाहती हैं जो परिवहन के नाम पर न तो वाहनों की कटौती करे और न ही सड़कों पर खर्च घटाए। इसके लिए वे राजनीतिक दलों को मोटा चंदा भी देती हैं।

    वैकल्पिक ईंधन के रूप में बिजली आधारित सार्वजनिक परिवहन के साधन आज मौजूद हैं। प्रदेश में बिजली का उत्पादन खपत से ज्यादा हो रहा है। बिजली कंपनियों को अपने अनुबंधों की वजह से बिजली खरीदी किए बगैर भी उसकी कीमत चुकानी पड़ रही है। ऐसे में जरूरत है कि अतिरिक्त बिजली की मदद से सरकार जनता को सस्ता सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध कराए। चुटका परमाणु बिजलीघर चालू होने के बाद देश के बिजली नेटवर्क में ऊर्जा का उत्पादन और भी ज्यादा बढ़ जाएगा। तब बिजली आधारित सार्वजनिक परिवहन सबसे सस्ता विकल्प होगा। कई राज्यों ने भविष्य की इस व्यवस्था को देखते हुए अपने शहरों में बिजली आधारित सार्वजनिक परिवहन शुरु भी कर दिया है। कमलनाथ सरकार के सामने मॉडल मौजूद हैं लेकिन वह पच्चीस साल पुराने अपने चंदा कमाऊ मॉडल पर ही चल रही है। वास्तव में वह तेल उत्पादक कंपनियों के सेल्स एजेंट की तरह काम कर रही है जो प्रदेश के विकास के लिए एक मंहगा सौदा साबित हो रहा है।

  • सिंघार की दहाड़ से आदिवासी खुश,ब्लैकमेलिंग विदा

    सिंघार की दहाड़ से आदिवासी खुश,ब्लैकमेलिंग विदा

    दिग्विजय सिंह को ब्लैकमेलर कहकर वनमंत्री उमंग सिंघार ने जन मन की आवाज का उद्घोष किया है। पार्टी के भीतर कमोबेश हर बड़ा छोटा नेता ये बात जानता है कि दिग्विजय सिंह के समर्थकों का गुट कैसे प्रदेश की सत्ता पर अपना जाल फैला चुका है। तबादले और पोस्टिंग का कारोबार जिस धड़ल्ले से दिग्विजय सिंह के दफ्तर से हुआ उससे वे खुद सत्ता के सबसे ताकतवर खिलाड़ी बन चुके हैं। कांग्रेस की सरकार आने के बाद से दिग्विजय सिंह का दफ्तर सत्ता पर कब्जा जमाने वाले,नेताओं, भ्रष्ट अफसरों और दलालों का अड्डा बना हुआ है। ये सब एक दिन में नहीं हुआ। पिछले तीस सालों से दिग्विजय सिंह की सतत राजनीतिक साधना का नतीजा है। दस साल मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने पूरे प्रदेश के गांव गांव तक अपने समर्थकों की फौज तैयार कर ली थी। ये फौज कांग्रेस के भीतर से ही नहीं बल्कि तमाम विरोधी राजनैतिक दलों के बीच से भी चयनित और गठित की गई थी। लंबे समय से कांग्रेस में राजनीतिक दूकान चला रहे मठाधीशों को तबाह करने के लिए उन्होंने भाजपा के उभरते नेताओं को भी अपना समर्थक बनाया था। उनकी ये रणनीति कारगर रही। कांग्रेस में दिग्गी का एकछत्र शासन चला और सत्ता जाने के बाद भी उनके यही समर्थक उन्हें प्रासंगिक भी बनाए रहे।

    ऊटपटांग बयानों और जनविरोधी फैसलों की आड़ में जब उन्होंने मध्यप्रदेश की सत्ता भाजपा को सौंपी तब वे जानते थे कि कांग्रेस फिलहाल सत्ता में लौटने वाली नहीं है। यही वजह थी कि उन्होंने दस सालों तक कोई चुनाव न लड़ने की घोषणा कर दी।अपने सभी समर्थकों को उन्होंने भाजपा के संगठन महामंत्री कप्तान सिंह सोलंकी से मिलकर भाजपा में भेज दिया। कांग्रेस के पंचायती राज में उनके इन्हीं समर्थकों ने भरपूर लूटपाट मचाई थी। भाजपा में शामिल होकर इन्होंने फिर से सत्ता पर कब्जा जमा लिया। सत्ता के इन दलालों को शुरुआती दौर में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का भरपूर संरक्षण भी मिलता रहा। इसकी एक वजह पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा थे,दूसरी वजह दिग्विजय सिंह की ब्लैकमेलिंग थी। पटवा को ये राजनीतिक विरासत स्वर्गीय अर्जुनसिंह से मिली थी। जब जब शिवराज सिंह चौहान को जानकारी मिली कि दिग्विजय सिंह के समर्थक जनहितकारी योजनाओं का लाभ आम जनता तक नहीं पहुंचने दे रहे हैं तब तब उन्होंने इनके खिलाफ कार्रवाई करने की कोशिश भी की। हर बार सुंदरलाल पटवा आड़े आए और उन्होंने शिवराज को कार्रवाई से रोक दिया। बाद में तो शिवराज सिंह स्वयं मजबूरी में इस लाबी का समर्थन करते नजर आए।

    शिवराज सिंह चौहान ने राजनीतिक हस्तक्षेप से बचने के लिए सत्ता की बागडोर खुर्राट आईएएस अफसरों को थमाई थी। राधेश्याम जुलानिया जैसे तेज तर्रार आला अफसर ने तो पंचायतों को दिए जाने वाला फंड रोक दिया था जिसके खिलाफ पंचायत सचिवों ने कई बार आंदोलन भी किए। ये सभी दिग्विजय सिंह की उसी स्लीपर सेल के सदस्य थे जो पिछले चुनाव में भाजपा का साथ छोड़कर कांग्रेस के साथ वापस जुड़ गए थे। शोभा ओझा आज उमंग सिंघार के घर के सामने पुतला जलाने वाले उन्हीं भाड़े के नेताओं को भाजपा का बता रही है।दिग्विजय सिंह इन्हीं दलालों के माध्यम से सबसे ज्यादा तबादले और पोस्टिंग कराने में सफल हुए हैं। जब तक कमलनाथ सरकार के मंत्री कामकाज समझ पाते तब तक सारा कारोबार दिग्गी समर्थकों ने समेट लिया है। उमंग सिंघार की दहाड़ की एक बड़ी वजह यह भी है।

    विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस को जयस के नेतृत्व में चलने वाले आदिवासी आंदोलन का समर्थन मिला था। जिन आदिवासियों को भाजपा और संघ के तपोनिष्ट कार्यकर्ताओं ने बरसों के जनशिक्षण के बाद कांग्रेस से मुक्त करने में सफलता पाई थी उन्हें जयस ने आदिवासी मुख्यमँत्री की चाहत जगाकर अपने साथ कर लिया। सत्ता में आने के लिए जयस के नेता डॉ.हीरालाल अलावा ने अलग पार्टी बनाकर संघर्ष करने के बजाए खुद कांग्रेस का विधायक बनना पसंद कर लिया। कमलनाथ ने उन्हें सीटों के समझौते पर भी अपनी शर्तों पर सहमत कर लिया था। हीरालाल अलावा के कांग्रेस में शामिल होने से आदिवासियों के बीच थोड़ी नाराजगी भी फैली थी जिसकी वजह से अलावा को स्वयं अपना चुनाव जीतने में खासी मशक्कत करना पड़ी थी।

    आदिवासियों का आंदोलन आज कांग्रेस की सत्ता का साथ पाकर एक बार फिर मजबूती से उभर रहा है। यह बेलगाम भी होता जा रहा है। इस पर लगाम लगाने के लिए कांग्रेस के भीतर से ही किसी आदिवासी नेतृत्व की सख्त जरूरत महसूस की जा रही थी। हीरालाल अलावा भी बार बार अपना वजूद बढ़ाने के लिए सरकार पर दबाव बना रहे थे। वे अभी राजनीति के नए नवेले खिलाड़ी हैं। सरकार के सत्ता में आने के बावजूद वे तबादलों और पोस्टिंग का धंधा समझ पाते इससे पहले सत्ता की मलाई दिग्विजय सिंह समर्थक चाट गए। इससे भाजपा से कांग्रेस में पहुंचे आदिवासी नेता खुद को छला महसूस करने लगे थे। इन सभी के बीच दिग्विजय सिंह की ब्रिगेड खलनायक के रूप में चर्चित रही है। यही वजह है कि आदिवासियों का नेतृत्व पाने के लिए उमंग सिंघार ने दिग्गी पर प्रहार करके आदिवासियों को खुश करने का प्रयास किया है।

    मुख्यमंत्री कमलनाथ भी दिग्गी ब्रिगेड पर लगाम लगाना चाहते थे। इसके बावजूद उनकी ये हैसियत कभी नहीं रही कि वे दिग्विजय से सीधा टकराव ले सकें। दिग्विजय सिंह की ब्लैकमेलिंग की शैली से वे अच्छी तरह वाकिफ हैं। खुद उनके कारोबार की कई कच्ची कड़ियां दिग्विजय सिंह जानते हैं। बताते हैं कि लोकसभा चुनाव के दौरान जिस हवाला गिरोह पर छापा पड़ा था उसकी गतिविधियों की सूचना दिग्विजय सिंह खेमे से ही लीक की गई थी। कमलनाथ के ओएसडी प्रवीण कक्कड और आरके मिगलानी तक तो जांच टीम पहुंची लेकिन कमलनाथ ने खुद को ज्यादातर आरोपों से बचा लिया। अब जिस तरह से उमंग सिंघार ने खुले आरोप लगाए तब राजनीतिक हलकों में यही माना जा रहा है कि उन्हें इसकी शह कमलनाथ खेमे से ही मिली थी।

    उमंग सिंघार ने तो दिग्गी को नंबर एक का ब्लैकमेलर कहने के साथ साथ उन्हें शराब तस्करी और रेत व खनिजों की तस्करी को संरक्षण देने के आरोप भी लगाए हैं। दरअसल आरोपों की फेरहिस्त तो और भी लंबी है जिन्हें वे सार्वजनिक तौर पर बोलने से बचते रहे हैं। दिग्विजय सिंह से उमंग सिंघार की अदावट वैसे तो काफी पुरानी है। उनकी बुआ स्वर्गीय जमुनादेवी तो कई बार दिग्विजय सिंह के विरुद्ध मोर्चा खोलती रहीं हैं। तब दिग्विजय सिंह सरकार के कार्यकाल में उमंग सिंघार के खिलाफ कई आरोप लगाए गए थे। इस बार सत्ता में आने के साथ उमंग सिंघार ने पुरानी अदावट का सूद समेत बदला ले डाला है।

    उमंग सिंघार की इस ललकार को ज्योतिरादित्य सिंधिया का भी समर्थन मिला है। उन्होंने यह कहकर सिंघार का बचाव ही किया कि मामला अब मुख्यमंत्री जी के पास है इसलिए विवाद की कोई वजह नहीं बची है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने प्रदेश अध्यक्ष पद पर चल रहे विवाद को शांत करने के लिए फिलहाल कमलनाथ को ही जवाबदारी संभालने को कहा है।दिग्विजय सिंह इस मुद्दे पर खामोश हैं और उन्होंने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया है कि खुद कमलनाथ इस विषय को देख रहे हैं। कमलनाथ से मुलाकात के बाद उमंग सिंघार ने भी चुप्पी साध ली है। उन्होंने कहा है कि वे अपनी बात कह चुके अब पार्टी हाईकमान ही आगे की कार्रवाई करेगी।फौरी तौर पर तो यह मामला शांत होता नजर आ रहा है लेकिन दिग्विजय सिंह समर्थक आगे भी खामोश रहेंगे यह नहीं कहा जा सकता। पहली बार राजनीति के अखाड़े में किसी योद्धा ने दिग्विजय सिंह को सीधी चुनौती दी है,जिस पर अभी कई नए दांवपेंच जरूर खेले जाएंगे।

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  • सिंधिया को कैसे स्वीकारे ठाकुरों से घिरी भाजपा

    सिंधिया को कैसे स्वीकारे ठाकुरों से घिरी भाजपा

    रामभुवन सिंह कुशवाह

    इसमें तो दो राय नहीं हो सकती कि कांग्रेस से ज्योतिरादित्य सिंधिया का शनैः शनैः मोह भंग होता जा रहा है पर वह अभी कितना जमीन पर दिखेगा इसका आज कुछ कहा नहीं जा सकता। यह तो निसंदेह सत्य है कि कोई कितना भी अपने को और दूसरों को अंधेरे में रखे राजशाही के दिन अब लद चुके हैं। स्वतंत्र भारत लोकतन्त्र का सात दशक तक का आनंद ले चुका है और अब जो पीढ़ी देश पर वर्चस्व स्थापित करती जा रही है वह आजाद भारत की है। राजा रानियों के किस्से अब कहानियों में तो अच्छे लगते हैं पर अतीत लौटकर तो नहीं आता।किन्तु जो वर्ग सत्ता और सुविधा में रहा हो वह सहज अपने अधिकार नहीं छोडना चाहता और भारतीय समाज भी मूर्तिपूजक श्रद्धावान रहा है इसलिए नए प्रकार की ‘सामंतशाही’ विकसित होने लगी है। क्योंकि लोकतंत्र ने वह आदर्श और अवसर तो नहीं दिया जिसकी आम जन को उम्मीद थी। सुखद और आशाजनक स्थिति यह भी है कि देश लोकतन्त्र से निराश कतई नहीं हैं क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अभ्युदय इसी व्यबस्था में होना संभव है।

    यहाँ मैं जिक्र सिंधिया राजघराने की कर रहा हूँ। उसकी मौजूदा पीढ़ी भारतीय राजनीति में अपेक्षाकृत अच्छा खासा दखल रखती है तो इसके प्रमुख रूप से दो कारण हैं। पहला इस खानदान में दो शख्शियतें ऐसी हुईं जिन्होंने उसे लोकतान्त्रिक बनाये रखा है। । पहली ‘माधो महाराज’ और दूसरी स्वर्गीय राजमाता विजया राजे सिंधिया । माधो महाराज अर्थात माधव राव सिंधिया का आशय वर्तमान पीढ़ी ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता और पूर्व केंद्रीय मंत्री माधव राव सिंधिया नहीं बल्कि उनके पितामह ( ज्योतिरदित्य सिंधिया के प्रपितामह ) महाराजा माधवराव सिंधिया , जिन्हें तत्कालीन ग्वालियर राज्य की जनता अत्यंत आदर से “ माधौ महाराज ” कहकर पुकारती थी । वे कितने उदार और दूरदर्शी थे यह इसी बात से जाना जा सकता है कि जब उनसे कोई सामान्यजन , किसान ‘अन्नदाता’ कहकर पुकारता था तब वे उसे बुरी तरह डाटते थे और कहा करते थे कि अन्नदाता मैं नहीं, आप लोग किसान हैं जो हमें अन्न देते हैं । दूसरे उन्होंने अपने राज्य में जिस तरह की कानून व्यवस्था की स्थापना की थी वह आदर्श थी। उन्होंने तत्कालीन जमींदारी जागीरदारी व्यवस्था को समन्वयकारी और जन हितैषी बनाया था। उस समय की “ जमींदार हितकारिणी सभा ” जनता के बीच आदर्श और लोकतान्त्रिक ढंग से कार्य करती थी और उसमें आमजन की समस्याएँ बड़ी सदाशयता से सुनी जातीं थीं। आज डॉ. भीमराव अंबेडकर को अनुसूचित वर्ग का संरक्षक और आरक्षण के व्यवस्था का जनक भले ही माना जाता हो परंतु आरक्षण की अवधारणा सबसे पहले इन्हीं माधव राव सिंधिया ने दी थी। जनता के “माधो महाराज” पहले ऐसे शासक थे जिन्होने तत्कालीन जमीदारों और जागीरदारों को सलाह दी थी कि आर्थिक और सामाजिक रूप से दबे कुचले लोगों को नौकरियों में आरक्षण दिया जावे और उनका संरक्षण किया जावे। मैंने स्वयं उस समय की बहुचर्चित पुस्तक “जमींदार हितकारिणी” को पढ़ा है उस पर शोध किया है। आज भी जो लोग इस विषय में शोध करना चाहें तो राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद उस पुस्तक को पढ़ सकते हैं।

    दूसरा व्यक्तित्व था राजमाता विजया राजे सिंधिया जिनका अभ्युदय स्वतंत्र भारत में हुआ । अत्यंत लोकप्रिय, संघर्षशील , अन्याय के विरुद्ध अनूठी योद्धा जिन्होंने तत्कालीन कांग्रेस की तानाशाही को उखाड़ फैका था और इंन्दिरा गांधी के आपातकाल का जमकर विरोध किया । वे इमरजेंसी में मीसा में निरुद्ध रहीं और दो बार उनके पक्ष में स्पष्ट बहुमत होने के बाद भी मुख्यमंत्री पद को ठुकरा कर मध्यप्रदेश में आदर्श और ईमानदार सुशासन देने का प्रयास किया। उन्होंने ही भारतीय जनसंघ , जनता पार्टी और भारतीय जनता पार्टी को इस काबिल बनाया कि आज वह भारत की एकमात्र पार्टी बन गई है जो कांग्रेस को सत्ताच्युत कर सकी। उस पर देश ने भरोसा भी दिखाया है।

    इसके अलावा भी कुछ कारण और भी है कि जिससे ग्वालियर राजघराना और कांग्रेस का सत्तारूढ़ खानदान में लंबे दौर तक राजनीतिक संबंध नहीं बनाए रखे जा सकते। ग्वालियर राज्य के शासक कट्टर हिन्दू विचारधारा के रहे हैं। मुस्लिम और ईसाई उनके स्वाभाविक शत्रु रहे हैं और उनके पुरखों ने लंबे समय तक उनसे युद्ध लड़ते रहे हैं। सिंधिया अंग्रेजों के अधीन अवश्य रहे हैं किन्तु उन्हें कभी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में भी सिंधिया दोनों पक्षों , अंग्रेज़ शासकों और स्वतन्त्रता सैनानियों में सदैव बैलेन्स करते रहे । इस कारण दोनों में भ्रम की स्थिति भी बनी रही । यह दूसरी बात थी कि सिंधिया ने अंततः अंग्रेजों का साथ दिया और आजादी के लिए संघर्ष कर रहे लोगों को क्रूरतापूर्वक दबाया भी, किन्तु लोग समझते हैं कि यह उनकी मजबूरी थी । तत्कालीन ग्वालियर के महाराजा ने अंग्रेज़ शासकों के अधीन रहते हुये महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के साथ भी संबंध बनाए रखे । उन्होंने अपने क्षेत्र में स्वतन्त्रता सैनानियों को संरक्षण दिया। ग्वालियर राज्य की सीमाएं मध्यप्रान्त (सेंट्रलप्रोविन्स) जहां अंग्रेजों का सीधा शासन था, से मिलतीं थीं इसलिए वहाँ के क्रांतिकारियों और तथाकथित विद्रोहियों को खुला संरक्षण ग्वालियर राज्य में मिलता था। सेंट्रलप्रोविन्स के ‘बागी’ बरदात करके भिंड , दतिया और ग्वालियर के कतिपय ग्रामों में संरक्षण पाते थे और ग्वालियर के बागी उस क्षेत्र में जाकर लूट खसोट करते थे यह तथ्य ऐतिहासिक हैं । लुटेरे पिंडरियों की ग्वालियर से दोस्ती और संरक्षण की खबरें तो लंदन तक पहुँचती रहीं थी। प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम 1857 के समय सेंट्रलप्रोविन्स का दक्षिणी जिला इटावा के कलेक्टर लॉर्ड ए ओ हयूम थे ( जो बाद में राष्ट्रीय कांग्रेस महासभा के संस्थापक बनें ) जिन्होने ब्रिटिश वाइसराय और इंग्लेन्ड में कंपनी हुकूमत से ग्वालियर के तत्कालीन महाराजा की शिकायत की थी । बाद में महाराजा को सत्ता से हटाने की ‘धमकी’ दी गई । तब कहीं तत्कालीन महाराजा ने हयूम के साथ एक सप्ताह भिंड में पड़ाव डालकर विद्रोहियों के खिलाफ अभियान चलाने को सहमत हुये। कथित विद्रोहियों उन्हें सहायता देने के आरोप में कई अधिकारियों को नौकरी से हटाया गया। यही नहीं 1857 के आंदोलन के विफल होने के बाद लॉर्ड हयूम के नेतृत्व में रियासत की सेना ने सीमांत गाँव में अत्याचार भी बहुत किए गए ।

    यह भी एतिहासिक तथ्य है कि 1857 के स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख हीरो तांत्या टोपे के ग्वालियर की सेना में आना जाना था। वे कई दिनों सेना के मराठा अधिकारियों के यहाँ ही रुकते थे और झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई ग्वालियर के किले में कब्जा करने से पूर्व कई दिनों मुरार छाबनी में दल बल सहित रुकी रहीं थी। भारत के स्वतंत्र हो जाने के बाद सबसे बड़ी रियासत के महाराजा सिंधिया ने सबसे पहले विलयपत्र पर हस्ताक्षर किए थे और सबसे अधिक खजाना सौंपा था। परिणामस्वरूप उन्हें मध्यभारत प्रांत का राज्यप्रमुख भी बनाया गया था।
    ग्वालियर के महाराजा अन्य देशी रियासतों की तरह कुछ समय स्वतंत्र पार्टी के सक्रिय सदस्य भी बनें किन्तु उनकी रुझान हिन्दू महासभा की ओर अधिक थी और ग्वालियर की हिन्दू महासभा उस समय सबसे सशक्त इकाई के रूप में जानी जाती थी जिसके परिणाम स्वरूप पहले चुनाव में कांग्रेस की वांछित सफलता न मिलने पर स्वयं प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ग्वालियर आए थे और उन्होंने तत्कालीन राज्यप्रमुख महाराजा जीवाजी राव सिंधिया से उनकी पत्नी महारानी विजयराजे सिंधिया को कांग्रेस के लिए मांगा था। महाराजा की सहमति प्राप्त होने पर महारानी सिंधिया कांग्रेस में शामिल हुईं और कांग्रेस की सांसद बनीं । इसके बाद ग्वालियर क्षेत्र में कांग्रेस के खाते खुलने लगे किन्तु ग्वालियर कोई जनता मूल रूप से हिन्दू महासभाई ही बनी रही जो समय के साथ भारतीय जनसंघ की समर्थक बन गईं।

    सन 1956 में सभी रियासतों और राज्यों को मिलाकर मध्यप्रदेश बनाया गया । राजमाता सिंधिया कांग्रेसी संसद होने के नाते उसमें काफी प्रभाव रखतीं थीं किन्तु 1967 में पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र और उनके बीच में तब ठन गई। जब मिश्र ने राजमाता से मिलने से मना कर दिया।इसका प्रमुख कारण राजमाता सिंधिया ने बस्तर के महाराजा प्रवीणचंद्र भंजदेव की पुलिस द्वारा निर्मम हत्या की आलोचना की थी। राजमाता सिंधिया द्वारिका प्रसाद मिश्रा से बुरी तरह नाराज हो गईं और उन्होंने उन्हें हटाने का संकल्प लिया। परिणामस्वरूप प्रदेश और देश में पहली संविद सरकार बनीं । राजमाता चाहती तो मुख्यमंत्री बन सकतीं थीं किन्तु उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बजाय सत्तासूत्र अपने हाथ में रखना ही उचित समझा। फिर 1971 के चुनाव हुये राजमाता सिंधिया ने भारतीय जनसंघ को समर्थन दिया और स्वयं भी जनसंघ के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ा और जीत गईं।उस समय 1971 में इन्दिरा गांधी की बेंक राष्ट्रीयकरण और गरीबी हटाओ नारे के कारण देश भर में प्रबल हवा चल रही थी किन्तु मध्यभारत क्षेत्र में सभी सीटें भारतीय जनसंघ के प्रत्याशी जीते और राजमाता सिंधिया की ख्याति राष्ट्रव्यापी होकर जनसंघ के लिए पूरे देश में दौरा करने लगीं । 1975 में इन्दिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोप दिया और राजमाता सिंधिया को गिरफ्तार कर लिया गया। मीसा में गिरफ्तार तो उनके पुत्र महाराजा माधवराव सिंधिया भी हुये किन्तु उन्हें पहले दिन ही पेरोल दे दी गई। कहा जाता है कि कांग्रेस की यह ‘घरभेदू’ नीति के कारण माँ और पुत्र में दूरियाँ बढ़ गईं तो महाराजा माधव राव सिंधिया के समर्थक मानते हैं कि महाराजा अपनी माँ की सहमति लेकर ही कांग्रेस में शामिल हुये थे। कुछ भी हो उन दोनों में दूरियाँ बढ़तीं रहीं और माधवराव सिंधिया के पाँव कांग्रेस में जमते रहे। किन्तु इन्दिरा गांधी बहुत चालक थीं उन्होने माधव राव जी को राज्यमंत्री बनाया बाद में वे केंद्र में उन्हें केबिनेटमंत्री बनया गया। इधर राजमाता सिंधिया जनता पार्टी की संस्थापक नेत्री बन कर और फिर भारतीय जनता पार्टी को पूरे देश में सर्वस्वीकार्य बनने में जुटीं रहीं। भारतीय जनता पार्टी ने उनकी सार्वजनिक सेवाओं और संघर्ष को सदैव सम्मान दिया। उनकी पुत्री वसुंधरा राजे राजस्थान की मुख्यमंत्री , उनकी दूसरी पुत्री यशोधरा राजे , भाई ध्यानेन्द्र सिंह ,भाभी श्रीमती माया सिंह मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री बनीं। इसके विपरीत कांग्रेस में माधव राव सिंधिया को वह सम्मान कभी नहीं मिला जिसके वे अधिकारी थे। इसका प्रमुख कारण ग्वालियर रियासत के परंपरागत प्रतिद्वंदी राघौगढ़ के राजा दिग्विजय रहे जो बाद में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने।

    राजशाही का अंत होने के बाद भी माधव राव सिंधिया गुना से जीतते रहे । उन्होंने 1971 में पहली बार जनसंघ के टिकट चुनाव जीता तब वे महज 26 साल के थे। जिसके बाद वे एक भी चुनाव नहीं हारे। वे लगातार नौ बार लोकसभा के सांसद रहे। 1984 में उन्होंने भाजपा के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी को ग्वालियर से चुनाव हराया। 30 सितंबर, 2001 के दिन माधवराव सिंधिया की एक हवाई हादसे में मृत्यु हो गई । तब उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना से सांसद बनें। इस दर्दनाक हादसे ने ज्योतिरादित्य सिंधिया की जिंदगी का रुख ही बदल दिया। स्टेनफोर्ड हार्वर्ड से पढ़कर लौटे ज्योतिरादित्य को विरासत के साथ अपने पिता की राजनीतिक विरासत भी संभालनी पड़ी। वे गुना से सांसद भी रहे हैं। इनकी गिनती सबसे युवा सांसदों में भी होती रही है। उनकी शादी नेपाल के राजघराने की की बेटी और उनकी बेटी चित्रांगदा की शादी जम्मू-कश्मीर और जमवाल घराने के युवराज विक्रमादित्य सिंह के साथ हुई। राजमाता सिंधिया और उनकी संतानों में मूल अंतर व्यवहार का है। राजमाता जी सदैव स्वयं को राजकीय गरिमा से बचतीं रहीं हैं वही चाहें माधव राव सिंधिया हों या उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया राजकीय गरिमा ने स्वयं को कभी भी उससे मुक्त होने का प्रयास नहीं किया और उनकी पुत्रियाँ भी लोकप्रिय होने के बाद भी ‘एरोगेन्ट’ के आरोप से कभी भी मुक्त नहीं हो पाईं।

    अभी हाल के 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत तो नहीं मिला फिर भी सपा और बसपा की एकतरफा समर्थन देने से सरकार कांग्रेस की बन गई। ग्वालियर क्षेत्र में सबसे अधिक सीटें कांग्रेस को मिलने से मुख्यमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का बनना तय था किन्तु दिग्विजय सिंह ने कमलनाथ का साथ दे दिया और ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक मात्र प्रदर्शन करते रह गए।इसके बाद प्रदेश में गुटबाजी चरम पर रही। माधव राव सिंधिया की उपेक्षा इतनी ज्यादा हुई कि उन्हें एक अदद सरकारी मकान भी नहीं दिया गया। वे जो मकान देखते उसी को किसी अन्य नेता के नाम कर दिया जाता। जब लोकसभा चुनाव हुये तो उन्हें षड्यंत्र पूर्वक हरा भी दिया गया। जब राहुल गांधी ने हार की ज़िम्मेदारी लेकर इस्तीफा दिया तो हवा उड़ा दी गई कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया है। सच्चाई ये थी कि राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना तो दूर उन्हें प्रदेश का अध्यक्ष भी नहीं बनाया गया।

    अब बारी ज्योतिरादित्य सिंधिया की थी । उन्होने भी कांग्रेस हाइकामन को राजनीतिक झटका देते हुये अनुच्छेद 370 की कश्मीर से समाप्ति का समर्थन कर दिया। अभी हल में वे ऐसा कोई अवसर नहीं चूकते जिसमें से यह धारणा न बने कि उनका कांग्रेस से मोहभंग हो रहा है। इधर भाजपा ने भी इस भ्रम को बढ़ाने में सहायता की है। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने रक्षाबंधन के मौके पर भाई माधवराव को याद किया और एक पुराना फोटो शेयर किया। एक भावुक संदेश में राजे ने लिखा कि उनके जीवन में भाई माधवराव जी की कमी हमेशा खटकती रहेगी।इस बीच 24 अगस्त को पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली की मृत्यु के अवसर पर ज्योतिरादित्य सिंधिया उनके घर अंतिम दर्शन करने और परिवार को ढाढ़स बंधाने माँ, महारानी , पुत्री और पुत्रवधु के साथ पहुँच गए। जिसके कारण यह धारणा बनती नजर आ रही है कि हो न हो ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा में शामिल हो सकते हैं ।

    भाजपा और सिंधिया की सम्बन्धों को डोर बहुत पुरानी है। भाजपा भी मानती है कि सिंधिया राजघराने के नेताओं और कांग्रेस के नेताओं में एक मूल अंतर है कि वे कम से कम अन्य कांग्रेसियों कि तरह बेईमान और भ्रष्ट नहीं हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी राहुल गांधी को बहुत निकट से देखा है । उन्हें निश्चित ही लगता होगा कि जो अपनी बहिन के लिए स्वस्थ और अनुकूल विचार नहीं रखता वह उनके लिए क्या और कितना सुविधा जनक होगा ? ज्योतिरादित्य सिंधिया यह भी भलीभांति मानते हैं कि भाजपा नेतृत्व का व्यवहार सदैव ‘सिंधियाज़’ के साथ सदाशयी और अनुकूलता का रहा है।

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  • कांग्रेस पर भारी मीसाबंदियों से वैमनस्य का सौदा

    कांग्रेस पर भारी मीसाबंदियों से वैमनस्य का सौदा

    मुख्यमंत्री कमलनाथ मध्यप्रदेश में श्रीमती इंदिरा गांधी की राजनीति की नकल करके अपनी सत्ता बचाने का प्रयास कर रहे हैं। बार बार वे केन्द्र सरकार के आर्थिक सुधारों को लागू करने का आश्वासन देते हैं लेकिन उसकी आड़ में राजनैतिक विरोधियों को कुचलने वाली राजनीति कर रहे हैं। वास्तव में वे किसी मूडी शासक की तरह बर्ताव कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी आम नागरिकों पर लांछन लगाने का काम कर रही है। मध्यप्रदेश में मिलावट को लेकर जो अभियान चलाया जा रहा है उसके बाद मिलावट के मामले घटने के बजाए बढ़ने लगे हैं। सरकार व्यापारियों पर रासुका लगा रही है इसके बावजूद उत्पादकता न बढ़ने से आई मंदी से जूझते लोग धड़ल्ले से मिलावट कर रहे हैं। कमोबेश ऐसी ही तस्वीर श्रीमती इंदिरागांधी के शासनकाल में भी देखी गई थी। उन्होंने आंतरिक सुरक्षा अधिनियम ( मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्यूरिटी एक्ट ) लागू करके मिलावटखोरों,जमाखोरों के विरुद्ध अभियान चलाया था। इसकी आड़ में तमाम राजनैतिक विरोधियों को भी जेलों में ठूंस दिया गया था। आज कमलनाथ सरकार आंदोलन करने वाले नेताओं पर जुर्माना लगाकार कमोबेश वही संदेश देने का प्रयास कर रही है। मीसा बंदियों के लिए चालू की गई पेंशन योजना को भी बंद करके कमलनाथ अपने राजनैतिक वैमनस्य का परिचय पहले ही दे चुके हैं।

    हाल ही में दो दिन पहले जब मुख्यमंत्री कमलनाथ को दिल्ली दरबार में हाजिरी देनी थी तब उनके मीडिया सलाहकारों ने खबर फैलाई कि सरकार ने मीसाबंदियों की पेंशन फिर शुरु कर दी है। शुरुआती कदम के रूप में दो हजार पेंशनरों को एरियर्स के साथ भुगतान कर दिया गया है। हालांकि इससे जुडा़ कोई आदेश जारी नहीं किया गया। सत्ता संभालते ही कमलनाथ ने पहले मीसाबंदियों की पेंशन बंद करने का आदेश दिया था बाद में सोच विचारकर कहा कि कुछ फर्जी लोग पेंशन ले रहे हैं इसलिए सरकार जांच के बाद पेंशन जारी करेगी।

    दरअसल पिछली भाजपा सरकार ने मीसा बंदी के दौरान जेल में निरुद्ध किए गए राजनीतिक विरोधियों को लोकतंत्र सेनानी बताते हुए पेंशन शुरु की थी। ये पेंशन स्वतंत्रता सेनानियों की तर्ज पर जारी की गई। विधानसभा में पारित मध्यप्रदेश लोकतंत्र सेनानी सम्मान नियम 2018 के अंतर्गत ऐसे लोकतंत्र सेनानी जो एक माह से कम कालावधि के लिए निरुद्ध रहे उन्हें 8000 रुपए और जो एक माह या एक माह से अधिक समय तक निरुद्ध रहे उन्हें 25000 रुपए प्रतिमाह की दर से सम्मान निधि की पात्रता प्रदान की गई। सरकार की ओर से स्वाधीनता सेनानियों को भी पच्चीस हजार रुपए प्रतिमाह की पेंशन दी जाती है।

    मीसाबंदी पेंशन के हकदार लोगों में भाजपा के साथ साथ कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों के जन प्रतिनिधि भी शामिल हैं। सरकार ने अपने बजट में वर्ष 2018-19 के लिए 40 करोड़ रुपए का प्रावधान भी किया है। पिछली सरकार ने वर्ष 2017 में सभी कलेक्टरों को परिपत्र जारी करके कहा था कि दिवंगत लोकतंत्र सेनानियों की पत्नियों या पतियों को सम्मान निधि का अंतरण एक महीने में हो जाना चाहिए।इसके बाजवूद सत्ता में आते ही कमलनाथ सरकार ने तमाम लोकतंत्र सेनानियों की पेंशन पर रोक लगा दी। सरकार के इस फैसले को हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में चुनौती भी दी गई। जिसमें कहा गया कि विधानसभा में पारित सरकार के फैसलो को कोई व्यक्ति केवल आदेश देकर खारिज नहीं कर सकता।जब 18 सितंबर 2018 को इसका प्रकाशन राजपत्र में भी कर दिया गया तो कोई व्यक्ति इसे सदन की अनुमति लिए बगैर कैसे खारिज कर सकता है।

    लोकतंत्र सेनानी संघ के अध्यक्ष कैलाश सोनी का कहना है कि सरकार ने जब जांच कराने का फैसला लिया तो किसी ने इस पर आपत्ति नहीं की। कुछ ऐसे मामलों का हवाला दिया गया था कि पेंशन गलत लोग भी दे रहे हैं। इसके बावजूद जांच में एक भी व्यक्ति को गलत पेंशन दिए जाने का मामला सामने नहीं आया। इसके बावजूद सरकार पिछले नौ महीनों से पेंशन पर लोक लगाए हुए थी। उन्होंने सभी पेंशनधारियों को पूर्ववत भुगतान जारी रखने की मांग भी की है।

    वास्तव में भाजपा सरकार ने जिन चार हजार लोकतंत्र सेनानियों को पेंशन चालू की थी उसका आधार जेलर से प्राप्त प्रमाण पत्र था। जिसमें जेल रिकार्ड के हवाले से निरुद्ध व्यक्ति के विरुद्ध दर्ज अपराध और जेल में बिताया उसका कार्यकाल प्रमाणित किया गया था। व्यक्ति या उसके परिजनों के जीवित होने का प्रमाणपत्र जांच करना विभागीय प्रक्रिया में पहले से ही शामिल है। इस लिहाज से पेंशन पर रोक लगाए जाने की जरूरत नहीं थी। इसके बावजूद सरकार ने पेंशन बंद कर दी। अब जबकि राज्य में वित्तीय संसाधनों की कमी है और राज्य संचालन के लिए केन्द्र से आर्थिक मदद की जरूरत महसूस हो रही है तब कमलनाथ सरकार ने पेंशन चालू करके केन्द्र सरकार को खुश करने का दांव खेला है।

    पिछले नौ महीनों से पेंशन के लिए भागदौड़ करते रहे पेंशनधारकों का कहना है कि सरकार ने पेंशन बंद करने को लेकर अस्पष्ट नीति बना रखी है। कई जिलों के कलेक्टर मनचाहे तरीके से पेंशन जारी कर रहे हैं जबकि शेष प्रदेश में पेंशन बंद कर दी गई है। इसी तरह कांग्रेस से जुड़े मीसाबंदी पेंशन प्राप्त कर रहे हैं जबकि अन्य राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों को पेंशन के लिए भटाकाया जा रहा है। मीसाबंदी पेंशन को बंद करने के पीछे कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति भी एक बड़ा मुद्दा रही है। कमलनाथ इस पेंशन को बंद करके इंदिरागांधी के प्रति अपनी आस्थाओं का प्रदर्शन करना चाह रहे हैं। यही वजह है कि कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी हों या राहुल गांधी और प्रियंका सभी कमलनाथ को अपना प्रतिनिधि मानते हैं। जबकि राहुल गांधी के करीबी होने के बावजूद ज्योतिरादित्य सिंधिया इसके बाद आते हैं। प्रदेश की ठाकुर लाबी इस गणित में सबसे पीछे आती है। ऐसे में कमलनाथ मीसाबंदी पेंशन को बंद करके अपनी पार्टी में राजनीतिक संतुलन साधने का प्रयास भी कर रहे हैं।

    इस सबके बावजूद देश पहले ही श्रीमती इंदिरा गांधी की राजनीति का हश्र देख चुका है। एमपी में उस राजनीति का दुहराव राज्य के विकास में बड़ा रोड़ा बन रहा है।जिस तरह से वैमनस्य की राजनीति करके अब कमलनाथ मीसाबंदी का समर्थन करते नजर आ रहे हैं उससे साफ है कि जनता के बीच उमड़ता आक्रोश जल्दी ही सरकार को भारी पड़ने वाला है। सत्तर अस्सी के दशक में तो कांग्रेस ही सबसे प्रमुख राजनीतिक दल होता था। वक्त के साथ कांग्रेस की राजनीति अपनी लोकप्रियता खो चुकी है। ऐसे में कमलनाथ की वैमनस्य भरी मूडी राजनीति भाजपा के लिए मददगार ही साबित होगी।

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  • युवाओं को रोजगार पाने लायक बनाएंगे बोले कमलनाथ

    युवाओं को रोजगार पाने लायक बनाएंगे बोले कमलनाथ

    भोपाल,20अगस्त(प्रेस सूचना केन्द्र)। राजीव गांधी की विकास नीति अब मध्यप्रदेश में साल भर तक प्रचारित की जाएगी। स्वर्गीय राजीव गांधी के 75 वें जन्मदिवस पर राजधानी के रवीन्द्र भवन में आयोजित सद्भावना दिवस समारोह में मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व में ये घोषणा की गई। युवा संकल्प वर्ष के रूप में मनाया जाने वाला ये आयोजन साल भर चलेगा, जिसमें युवाओं को राजीव गांधी की विकास नीति के आधार पर उद्योगों के अनुकूल बनाने के लिए कई कार्यक्रम चलाए जाएंगे।

    मुख्यमंत्री कमलनाथ ने स्वर्गीय राजीव गांधी के साथ दून स्कूल में पढ़ते समय अपने अनुभवों को साझा किया। उन्होंने कहा कि वे स्वर्गीय संजय गांधी के साथ पढ़ते थे और राजीव गांधी उनसे चार साल आगे थे। ज्ञान और शिक्षा में अंतर बताते हुए उन्होंने कहा कि स्कूलों में शिक्षा दी जाती है लेकिन ज्ञान हम प्रयोग करके हासिल करते हैं। जब स्वर्गीय इंदिरा गांधी की हत्या हुई तब देश की एकता पर आक्रमण हुआ था। देश पुरानी तकनीकों पर चल रहा था। ऐसे में राजीव गांधी ने आईटी और कंप्यूटर लाने की बात कही। 21 वीं सदी के भारत की परिकल्पना देश के सामने रखी। तब कांग्रेस के लोग भी मजाक बनाते थे। वे कहते थे कि इससे रोजगार के अवसर घट जाएंगे। रेलवे में कंप्यूटरीकरण के खिलाफ आंदोलन भी हुए लेकिन आज देश को इस तकनीक का लाभ मिल रहा है।

    देश को विविधता के बीच आगे बढ़ाने की कांग्रेस की सोच का शंखनाद करते हुए उन्होंने कहा कि भारत विभिन्नताओं से भरा देश है। यहां कई जातियां, धर्म, त्यौहार, रस्में, हैं। उत्तर में जो लोग धोती पहिनते हैं दक्षिण तक जाते जाते वो लुंगी बन जाती है। भारत की संस्कृति इस विविधता को बांधे रखती है। सोवियत संघ हमारे देखते बिखर गया। आज उसका नाम निशान भी नहीं बचा। भारत में ज्ञान की वजह से ही सद्भाव की संस्कृति रही। चंद्रगुप्त से सम्राट अशोक तक सद्भाव की ही बुनियाद रखी गई। यही विचार हमारा भविष्य भी सुरक्षित रखेगा।

    राजीव जी के सद्भाव के संदेश ने ही देश को दिशा दी और आज दुनिया भर में भारत का सम्मान बढ़ने की वजह भी उनकी ही सोच है। ये काम पिछले पांच सालों में नहीं हुआ है। इसका बीज राजीव जी ने डाला था। आज दुनिया भर में भारत के युवा इंजीनियर विकास के विभिन्न क्षेत्रों में अपना नाम रोशन कर रहे हैं।

    उन्होंने कहा कि दुनिया में तीन तरह के नेता होते हैं। एक वे जिन्हें देश प्यार करता है। दूसरे वे जिनसे देश डरता है और तीसरे वे जिनकी देश उपेक्षा कर देता है।राजीव जी से देश प्यार करता था। उन्होंने कहा कि आज का युवा पढ़ लिखकर बेरोजगार हो रहा है। वह न तो अपनी पारिवारिक जीविका चलाने लायक रह पाता है और न ही वह तकनीकी रूप से औद्योगिक क्षेत्र के उत्पादन का हिस्सा बन सकता है,इसलिए हमें युवाओं की शिक्षा की स्थितियां बदलनी होंगी।

    आयोजन में पहुंचे युवाओं के सवालों के जवाब के दौरान उन्होंने कहा कि आज प्रदेश को पूंजी निवेश की जरूरत है। इसके लिए हमें विश्वास का वातावरण बनाना होगा। प्रदेश में उद्योग लगेंगे तभी रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। बिना निवेश के प्रदेश न तो आगे बढ़ सकता है और न ही अन्य प्रदेशों के सामने प्रतिस्पर्धा में टिक सकता है। इसके लिए प्रदेश के युवाओं को स्किल आधारित गुणवत्ता युक्त शिक्षा दिए जाने की जरूरत है। शैक्षणिक संस्थाओं से रोजगार के लिए उपयोगी विद्यार्थी निकलें ये जरूरी है। उन्होंने कहा कि नौकरी पाना अचीवमेंट(उपलब्धि) हो सकता है लेकिन हमें आत्मसंतोष तभी मिल सकता है जब हम कसौटियों का फुलफिलमेंट करके खरे उतर पाएं।

    उन्होंने कहा कि राज्य में बेहतरीन स्टेडियम बनाए जा रहे हैं। खिलाड़ियों को विश्वस्तरीय प्रशिक्षण दिलाया जाएगा ताकि वे जीवन के हर मोर्चे पर सफलता हासिल करें।खेल के मैदान में जो दिमागी अनुशासन विकसित होता है वह क्लासरूम में नहीं पाया जा सकता। छिंदवाड़ा माडल पर पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि ये आज के स्किल इंडिया जैसा है जिसे हम फिनिशिंग स्कूल कह सकते हैं। इसमें हम समाज की जरूरत के मुताबिक युवा तैयार करते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार इन दिनों शुद्ध का युद्ध कार्यक्रम चला रही है जिसमें हम नागरिकों को गुणवत्ता युक्त खाद्य उपलब्ध कराने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में नशे के खिलाफ भी अभियान चलाया जाएगा।

  • तू चोर मैं सिपाही वाला खेल कांग्रेस की हताशा – शरदेंदु तिवारी

    तू चोर मैं सिपाही वाला खेल कांग्रेस की हताशा – शरदेंदु तिवारी

    भोपाल18 अगस्त(प्रेस सूचना केन्द्र)। नकली दुग्ध उत्पादों के नाम पर प्रदेश भर में मारे गए छापों के बावजूद प्रदेश में आज भी नकली दूध,मावा,पनीर,घी आदि धड़ल्ले से बेचा जा रहा है। सरकारी अमले की जांच में लगातार ये बात उजागर हो रही है। इसकी वजह आपूर्ति और मांग के बीच बड़ा अंतर होना है। इन छापों से जनता के बीच सरकार ने थोथी लोकप्रियता बटोरी है,यदि इतना ही प्रयास दुग्घ उत्पादन बढ़ाने की दिशा में किया जाता तो समस्या का स्थायी समाधान निकाला जा सकता था। चुरहट से भाजपा के विधायक शरदेंदु तिवारी ने आज पत्रकारों से चर्चा में सरकार के विभिन्न अभियानों को लेकर पूछे गए सवालों पर बेबाकी से जवाब दिए।

    चुरहट से कांग्रेस के दिग्गज नेता अजय सिंह को परास्त करके राजनीति के मैदान में खलबली मचाने वाले युवा विधायक शरदेंदु तिवारी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की राजनीति को जाति, धर्म, संप्रदाय के संकीर्ण नजरिए से बाहर लाकर विकास की दौड़ में खड़ा कर दिया है। आज का समाज अमीर और अमीरी के लिए प्रयासरत दो वर्गों में बंट गया है। कांग्रेस जिस तरह लोगों को धर्म और संप्रदायों में बांटकर राजनीति करती थी आज जनता की नब्ज पर उसकी पकड़ छूट गई है। वो अपना जनाधार तलाशने के लिए तू चोर मैं सिपाही का खेल खेल रही है। ये खेल थोड़े समय तो लोगों का ध्यान आकर्षित कर सकता है लेकिन अंततः लोग यह खेल समझ जाएंगे और इस पाखंड को विदा कर देंगे।

    अपने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दादा की विरासत को याद करते हुए श्री तिवारी ने कहा कि कमलनाथ सरकार इतने अंतर्विरोधों में घिरी है कि प्रशासनिक मशीनरी पर उसका नियंत्रण स्थापित नहीं हो पा रहा है। सरकार का आपदा प्रबंधन धराशायी हो गया है। पूरे प्रदेश में लोग बाढ़ की आपदा झेल रहे हैं और मुख्यमंत्री छापेमारी को ही प्रशासनिक सफलता मान बैठे हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ऐसे मौकों पर जनता के बीच जाकर लोगों को ढाढ़स बंधाते थे और आवश्यक प्रबंध करते थे लेकिन आज जनता को उनकी कमी खल रही है।

    श्री तिवारी ने कहा कि विंध्य अंचल ने भाजपा की राजनीति में अपने क्षेत्रीय विकास की झलक देखी है। भाजपा ने सबका साथ सबका विकास का लक्ष्य लेकर सबका विश्वास भी प्राप्त किया है। केन्द्र सरकार जनता की मूलभूत समस्याओं का समाधान कर रही है। ऐसे में कमलनाथ सरकार की विद्वेष से भरी राजनीति जनता के बीच आक्रोश की वजह बन रही है। उन्होंने कहा कि सरकार के मंत्री उन्हें वोट न देने वालों को दंडित करने का भाव लेकर सरकार चला रहे हैं। ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं कि जल्दी ही सरकार के प्रतिनिधियों और जनता के बीच टकराव के हालात बनने लगें।

    कश्मीर में धारा 370 पर मिले व्यापक जन समर्थन के बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि मोदी सरकार के कार्यों ने कांग्रेस की जड़ें हिला दीं हैं। कांग्रेस आरोप लगाने में जुटी है और सरकार जनता को डिलीवरी देने में जुटी है। यही वजह है कि पूरे देश में जहां जहां कांग्रेस की सरकारें हैं उन्हें जनता की उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है। मध्यप्रदेश में तो कांग्रेस के नेताओं और दलालों की फौज लूटो भागो की रणनीति पर चल रही है। यही वजह है कि कांग्रेस यहां सिर्फ लोकप्रियता बटोरने वाले अभियान चला रही है।समस्या ये है कि समय बदल चुका है जनता इन हथकंडों को समझने लगी है,जिससे कांग्रेस सरकार के वादे खोखले साबित हो रहे हैं।

  • अब तक मुखिया नहीं बन पाए मुख्यमंत्री कमलनाथ

    अब तक मुखिया नहीं बन पाए मुख्यमंत्री कमलनाथ

    वित्तमंत्री को ठेंगा और कमलनाथ के छिंदवाड़ा को विश्वविद्यालय

    भोपाल,24जुलाई(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। कांग्रेस की कमलनाथ सरकार अंधा बांटे रेवड़ी बार बार खुद को दे वाले अंदाज में शासन चला रही है। जब पूरे देश में शिक्षा के निजीकरण का दौर चल रहा है तब मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अपने चुनाव क्षेत्र में सरकारी विश्वविद्यालय खोलने की मंजूरी करा ली है जबकि वित्तमंत्री तरुण भनोट के गृह जिले जबलपुर के मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय को दो हजार रुपए का अनुदान देकर ठेंगा दिखा दिया है। हैरत की बात तो ये है कि नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन करके परिवारवादी मानसिकता का ही समर्थन किया है।

    मध्यप्रदेश विधानसभा ने कल मंगलवार को छिंदवाड़ा में सरकारी विश्वविद्यालय खोले जाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। मध्यप्रदेश विश्वविद्यालय(संशोधन) विधेयक 2019 के नाम से प्रस्तुत इस प्रस्ताव को सदन ने सर्वसम्मति से पारित करके विश्वविद्यालयों के अधिकार क्षेत्र को नए सिरे से परिभाषित कर दिया है। छिंदवाड़ा के इस नए विश्वविद्यालयका अधिकार क्षेत्र छिंदवाड़ा, सिवनी, बालाघाट और बैतूल राजस्व जिलों की सीमा रहेगा। विधेयक का औचित्य प्रतिपादित करते हुए कहा गया है कि संबंधित जिलों के युवाओं को उच्च शिक्षा की सहज पहुंच प्रदान करने के उद्देश्य से ये नया विश्वविद्यालय स्थापित किया जा रहा है। जबकि वहां पहले से ही जी.एच.रायसोनी विश्वविद्यालय स्थापित है और बेहतर शिक्षा मुहैया करा रहा है।

    अब तक छिंदवाड़ा के युवा रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर और बरकतउल्ला विवि भोपाल से डिग्री प्राप्त कर लेते थे। इस व्यवस्था में कोई परेशानी भी नहीं थी क्योंकि छिंदवाड़ा में कई निजी कालेज इन विश्वविद्यालयों से संबद्ध हैं। इसके बावजूद छिंदवाड़ा में सरकारी विश्वविद्यालय तब खोला जा रहा है जब मुख्यमंत्री बात बात पर कहते हैं कि प्रदेश का खजाना खाली है। नए सत्र से विश्वविद्यालय का सत्र आरंभ करने के लिए सरकार ने आनन फानन में तीन करोड़ रुपए मंजूर भी कर दिए हैं। ये राशि तो प्रारंभिक है लेकिन अब भविष्य में इस विश्विद्यालय का बड़ा खर्च भी सरकार के गले पड़ जाएगा।

    शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए प्रदेश में 34 निजी विश्वविद्यालय कार्यरत हैं।सरकारी क्षेत्र में पहले से कार्यरत सात विश्वविद्यालयों के साथ साथ अब राज्य सरकार ने ये आठवा विश्वविद्यालय भी खोलने की तैयारी कर ली है।जबकि सरकारी क्षेत्र के विश्वविद्यालय पहले से राज्य सरकार के लिए सरदर्द बने हुए हैं। अपना आर्थिक बोझ घटाने के लिए ही सरकार ने कालेजों को स्वायत्ता देकर उन्हें अपने आर्थिक संसाधन खुद जुटाने की जवाबदारी सौंप रखी है।

    रा्ज्य की भाजपा सरकार ने मछुआ समाज की मांग को देखते हुए जबलपुर में मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय खोला था। सरकारी वेटनरी कालेज जबलपुर से संबद्ध ये महाविद्यालय प्रदेश का एकमात्र कालेज है जो मछली पालन की तकनीक पर अनुसंधान भी करता है। इस कॉलेज से निकले विद्यार्थी आज पूरे भारत और दुनिया में अपने कुशलता के झंडे गाड़ रहे हैं। वित्तमंत्री तरुण भनोट खुद जबलपुर के हैं और कालेज का महत्व जानते हैं इसके बावजूद कालेज को मौजूदा सत्र में मात्र दो हजार रुपए का अनुदान स्वीकृत किया गया है। इसमें एक हजार रुपए वेतन और एक हजार रुपए अन्य मदि में दिए गए हैं।

    प्रमुख सचिव मछुआ कल्याण एवं मत्स्य विभाग अश्विनी कुमार राय इस तथ्य से पूरी तरह वाकिफ हैं फिर भी सरकार की नीति को देखते हुए उन्होंने चुप्पी साध रखी है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने छिंदवाड़ा विश्वविद्यालय खोले जाने की जरूरत प्रतिपादित करते हुए सदन में कहा कि हम चाहते हैं कि प्रदेश में और विश्वविद्यालय बनें। इससे प्राईवेट यूनिवर्सिटीज कम बनेंगी।वे नफे के लिए विश्वविद्यालय बनाते हैं। यदि सरकारी विश्वविद्यालय खुलेंगे और उन्हें मुनाफा नहीं होगा तो वे इस बारे में सोचना बंद कर देंगे।

    कांग्रेस जिस कमलनाथ को उद्योगपति और नई सोच वाला बताती है उनकी सोच को प्रतिबिंबित करने वाले ये वाक्य एक बार फिर बताते हैं कि विकास का छिंदवाड़ा माडल पूरी तरह आधारहीन है। सरकारी बजट और टैक्स चोरी के लिए राजनैतिक दलों को बड़ा चंदा देने वाले कार्पोरेट घरानों की सीएसआर राशि से दिखावटी विकास के माडल खड़े करने की कलाकारी की पोल अब खुलने लगी है। विकास के नाम पर मुख्यमंत्री के इस हस्तक्षेप से वित्तमंत्री तरुण भनोट खुद अचंभित हैं। छिंदवाड़ा के विश्विद्यालय का प्रस्ताव रखकर क्षेत्रीयता की इस आंधी में भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री गौरीशंकर चतुर्भुज बिसेन ने भी अपने हाथ धो लिए। गोपाल भार्गव ने इसके एवज में सागर में सरकारी विश्वविद्यालय खोलने जाने का थोथा आश्वासन लेकर चुप्पी साध ली।

    जबलपुर मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय का अनुदान बंद करने से राष्ट्रीय महान गणतंत्र पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष आनंद निषाद खासे खफा हैं। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ को भरोसा नहीं है कि उनकी सरकार ज्यादा चलेगी इसीलिए उन्होंने अपने क्षेत्र में विश्वविद्यालय खोलने में जल्दबाजी दिखाई। जब प्रदेश का खजाना खाली है तो नया विश्वविद्यालय खोलने की जरूरत क्या थी। प्रदेश में मछली पालन सिखाने वाले जबलपुर के एकमात्र महाविद्यालय को तो वे बजट दे नहीं पा रहे हैं उच्च शिक्षा के लिए संसाधन कहां से जुटा पाएंगे। उन्होंने कहा कि कमलनाथ की सरकार प्रदेश से छलावा कर रही है। सरकार को निषाद समाज के बच्चों के अध्यापन की पूरी व्यवस्था करनी चाहिए। यही नहीं बच्चों को इन महाविद्यालयो में कोटा आबंटित किया जाए। सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया जाए। निषाद समाज प्रदेश की आर्थिक उन्नति में बड़ा योगदान देता है। ऐसे में सरकारी भेदभाव समाज के बीच आक्रोश की बड़ी वजह बन गया है।

  • अफसरों की गैर मौजूदगी से बैकफुट पर आई सरकार,कार्यवाही स्थगित

    अफसरों की गैर मौजूदगी से बैकफुट पर आई सरकार,कार्यवाही स्थगित

    भोपाल,19 जुलाई(प्रेस सूचना केन्द्र)। पूर्व संसदीय कार्यमंत्री नरोत्तम मिश्रा के तीखे तेवरों ने पिछले दो दिनों में सरकार को बैकफुट पर आने को मजबूर कर दिया है। हालात ये हैं कि उनके तीखे सवालों के सामने सदन भी नतमस्तक होता नजर आया। इस तरह की संसदीय बहस प्रदेश की राजनीति में लंबे समय बाद देखने मिल रही है जिससे सहमत विधानसभा अध्यक्ष एनपी प्रजापति ने सदन को अगले दिन तक के लिए स्थगित करने की घोषणा कर दी। उनके फैसले की सभी वर्गों के बीच प्रशंसा की जा रही है।

    कल जब गृह विभाग पर बजट चर्चा का जवाब गृहमंत्री बाला बच्चन देने जा रहे थे तभी पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने व्यवस्था के प्रश्न के हवाले से अधिकारी दीर्घा की ओर सदन का ध्यान आकर्षित कराया। उन्होंने कहा कि माननीय अध्यक्ष जी ने ही ये निर्देश दिए थे कि जब किसी विभाग के संबंध में चर्चा चल रही हो तब उस विभाग के प्रमुख अधिकारी दीर्घा में अवश्य मौजूद रहें। इसके बावजूद पुलिस महानिदेशक वीपी सिंह और डीजी जेल संजय चौधरी आज दीर्घा में उपस्थित नहीं हैं। क्या उन्होंने अपनी गैरहाजिरी के लिए किसी से अनुमति ली है। उन्होंने कहा कि गृहमंत्री इतने निरीह हैं कि अधिकारी उनकी सुनते तक नहीं हैं।

    इस पर संसदीय कार्य मंत्री डाक्टर गोविंद सिंह ने कहा कि निश्चित तौर पर ये बहुत गंभीर बात है। मालूम चला है कि वे किसी बैठक में हैं। सदन की बैठक से ज्यादा महत्वपूर्ण और कौन सी बैठक हो सकती है। अधिकारियों को दीर्घा में उपस्थित रहना चाहिए। ये बहुत गंभीर बात है।मुख्यमंत्री और गृह सचिव को इस पर कार्रवाई करनी चाहिए। विपक्ष ने जिस ओर ध्यान आकर्षित कराया है उस पर सदन को संज्ञान लेना चाहिए। इस दौरान गृह सचिव एस.एन.मिश्रा भी दीर्घा में मौजूद थे।

    नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने कहा कि माननीय अध्यक्ष जी आपने ही व्यवस्था दी थी कि जनरल बजट पर चर्चा के दौरान विभाग प्रमुख और सचिव भी दीर्घा में उपस्थित रहें। उन्होंने कहा कि माननीय मंत्री जी आज अपने विभाग की चर्चा का उत्तर न दें। जब डीजी महोदय और जेल डीजी उपस्थित रहें तब कल या किसी और समय चर्चा का उत्तर दिया जाए।

    इस पर नरोत्तम मिश्रा ने कहा कि माननीय गृहमंत्री जी सक्षम हैं और वे आज भी जवाब दे सकते हैं। यदि वे आज अधिकारियों की अनुपस्थिति के कारण जवाब नहीं देते हैं तो ये भविष्य के लिए नजीर बन जाएगी। इस पर अध्यक्ष जी कोई व्यवस्था दे दें तो उचित होगा।

    जवाब में अध्यक्ष एन.पी.प्रजापति ने कहा कि सदन के निर्देशों का पालन नहीं होगा तो मुझे भी किताबें पलटकर नियमों का पालन कराना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि मैं जब बिजली मंत्री था और तब ओ एंड एम मेंबर मिस्टर भोंडे उपस्थित नहीं थे तो मैंने उन्हें नोटिस दिया था और धारा 11 ए के तहत कार्रवाई की थी। हमारा सदन लोकतंत्र का मंदिर है, गफलत बाजी की जाएगी तो ये सदन की अवमानना के दायरे में आएगा। उन्होंने कहा कि चर्चा के दौरान अधिकारियों को सदन में रहना चाहिए। यदि कोई नया विधायक अपनी बात सदन में उठा रहा है तो वह बात अधिकारियों तक प्रेषित होनी ही चाहिए। यदि नहीं जा रही है तो फिर क्या मतलब। इसके साथ ही उन्होंने सदन को शुक्रवार 11 बजे तक के लिए स्थगित करने की घोषणा कर दी।

    अध्यक्ष एन.पी.प्रजापति के इस फैसले पर पूरे सदन की ओर से उनकी सराहना की गई। इस तरह का माहौल बरसों बाद सदन में देखा गया।

  • खर्च कम करके आय बढ़ाएगा कमलनाथ सरकार का बजट

    खर्च कम करके आय बढ़ाएगा कमलनाथ सरकार का बजट

    मध्यप्रदेश विधानसभा के बजट सत्र में आज की कार्यवाही ने प्रदेश के राजनैतिक और आर्थिक हालात की पूरी तस्वीर प्रस्तुत कर दी। वित्तमंत्री तरुण भनोट के बजट भाषण पर सदन के 32 विधायकों ने पिछले दो दिनों में जिस तरह अपने विचार प्रस्तुत किए उन्हें लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच कई मुद्दों पर तीखी तकरार हुई। सदन के समवेत होते ही विधानसभा अध्यक्ष नर्मदा प्रसाद प्रजापति ने जब प्रश्नकाल प्रारंभ करने की अनुमति दी तो आरोप प्रत्यारोप का दौर भी शुरु हो गया। भाजपा विधायक जालम सिंह पटेल ने शिक्षा मंत्री प्रभुराम चौधरी से पूछा कि चुनाव के दौरान कांग्रेस ने अपने वचनपत्र में वादा किया था कि वह सत्ता में आने पर निजी स्कूलों के शिक्षकों का नियमितीकरण करेगी। अब सात महीने बीत चुके हैं, निजी स्कूलों के शिक्षक तनावपूर्ण माहौल में काम करते हैं। उन्हें सरकार कब नियमित करेगी और उनके वेतनमान बढ़ाएगी। उन्होंने कहा कि सरकार ने युवाओं को रोजगार देने का वादा करते हुए कहा था कि पीएससी से शिक्षकों के पद भरे जाएंगे और युवाओं को नौकरी दी जाएगी। श्री पटेल ने कहा कि यदि पीएससी होती है तो कई सालों से निजी स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षक बेरोजगार हो जाएंगे। ऐसे हालात में सरकार पहले उन्हें नियमित करे और फिर युवाओं की नई भर्तियां करे। कांग्रेस ने चुनाव में वादा तो कर दिया था पर वह इस पर अमल कब कर रही है। इस पर प्रभुराम चौधरी ने कहा कि सरकार इस पर विचार कर रही है और सभी संभावनाओं का अध्ययन कराया जा रहा है। इस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरु हो गया। इस बीच नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने प्रभुराम चौधरी के जवाब पर व्यंग्य कसते हुए कहा कि एक तरफ तो वोटें ठग लीं और अब कह रहे हैं कि वादों पर अमल की समय सीमा बताना संभव नहीं है। आपकी भी समय सीमा नहीं है कि सरकार आखिर कब तक रहेगी। इस पर गृहमंत्री बाला बच्चन ने कहा कि क्या आप हमारी समयसीमा तय करेंगे। हमारा फैसला तो विधायकगण कर चुके हैं। इस बीच लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री तुलसी सिलावट ने कहा कि आप अपनी समयसीमा बता दो कि आप कब तक नेता प्रतिपक्ष बने रहेंगे। इस पर भाजपा के डाक्टर नरोत्तम मिश्रा ने कहा कि एक मेरे पास एक वाट्सएप संदेश आया था जिसमें कहा गया था कि एक मानसून कर्नाटक से होता हुआ मध्यप्रदेश की ओर आने को अग्रसर है। इस पर अध्यक्ष एनपी प्रजापति ने कहा कि यह सदन का विषय नही है। इस पर बाला बच्चन ने जवाब दिया कि ये मानसून मध्यप्रदेश में प्रवेश नहीं कर पाएगा. एक सवाल के जवाब में विधायक मुन्नालाल गोयल ने पूछा कि स्मार्टसिटी प्रोजेक्ट में मध्यप्रदेश और केन्द्र के बीच हिस्सेदारी क्या है। इसके जवाब में नगरीय विकास एवं आवास मंत्री जयवर्धन सिंह ने बताया कि ये प्रोजेक्ट केन्द्र प्रवर्तित है और इसमें केन्द्र व राज्य की पचास पचास प्रतिशत की हिस्सेदारी है। इस पर श्री गोयल ने कहा कि इस प्रोजेक्ट के संबंध में जो गाईड लाईन बनाई गई है उसका पालन नहीं हो रहा है। स्मार्ट सिटी में शिक्षा, स्वास्थ्य, पार्क आदि की व्यवस्था की जानी है लेकिन राज्य सरकार गाईड लाईन का पालन नहीं कर रही है। उन्होंने कहा कि जो फंड केन्द्र से आ रहा है या राज्य खर्च कर रहा है उसका खर्च कैसे हो रहा है इसे जानने के लिए स्थानीय जन प्रतिनिधियों की निगरानी भी होनी चाहिए। ये राशि किसी व्यक्ति के अधिकार क्षेत्र में नहीं है। जनता का पैसा है और उसका पूरा उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इस पर नगरीय प्रशासन मंत्री जयवर्धन सिंह ने कहा कि मैं माननीय विधायक जी को पूरा आश्वासन देता हूं कि गाईड लाईन का पूरा पालन किया जाएगा।उन्होंने कहा कि ग्वालियर में फेस टू के लिए तीन सौ पचास करोड़ का फंड आया है। लेकिन अभी उसमें से केवल सैंतीस करोड़ ही खर्च हो पाए हैं। उन्होंने कहा कि स्मार्ट सिटी के लिए ग्वालियर में जो जगह निर्धारित है उसमें से विधायक जी की विधानसभा का बहुत छोटा क्षेत्र आता है। उन्होंने कहा कि खेल क्षेत्र और मेडीकल कालेज के लिए पांच करोड़ इन्क्यानवे लाख रुपए स्वीकृत हो चुके हैं। भोपाल के मास्टर प्लान के संबंध में विधायक रामेश्वर शर्मा ने नगरीय प्रशासन मंत्री जयवर्धन सिंह से पूछा कि मास्टर प्लान की सड़कों का निर्माण अब तक क्यों नहीं हो पाया है और सरकार इन्हें कब तक पूरा करेगी। इस पर श्री जयवर्धन सिंह ने कहा कि सड़कों का निर्माण बजट की व्यवस्था के आधार पर किया जाता है। जैसे जैसे बजट मिलता जाएगा सड़कों का निर्माण होता जाएगा। उन्होंने कहा कि भोपाल के मास्टर प्लान का काम जारी है। इसे 2005 में और 2015 में बन जाना था पर पिछली सरकार उसे लागू क्यों नहीं कर पाई इसकी वजह वे नहीं बता सकते। उन्होंने कहा कि अंतिम मास्टर प्लान 1995 में लागू हुआ था तबसे भोपाल की तस्वीर बहुत बदल चुकी है। हमारी सरकार का प्रयास है कि इस साल के अंत तक नया मास्टर प्लान लागू हो जाए। उन्होंने कहा कि कई एजेंसियां सड़कों का निर्माण करती हैं। कई सड़कें नगर निगम की होती है, कई सीपीए, कई लोक निर्माण विभाग और कई बीडीए की भी होती हैं इसलिए ये काम सदन के भीतर बैठकर तो तय नहीं किया जा सकता कि कौन सी सड़क कौन सी एजेंसी लेगी।

    विधायक नागेन्द्र सिंह ने रीवा जिले में अवैध उत्खनन का मामला उठाया तो खनिज मंत्री प्रदीप जयसवाल ने कहा कि अवैध उत्खनन रोकने के लिए सरकार मुस्तैदी से काम कर रही है। जुर्माना भी वसूला जा रहा है, वाहनों के राजसात करने की कार्रवाई भी की जा रही है। इस पर नागेन्द्र सिंह ने कहा कि अवैध उत्खनन की तुलना में सरकार की कार्रवाई बहुत सीमित है। इस विषय पर कई सदस्यों की टिप्पणियों को अध्यक्ष ने विलोपित कर दिया। प्रश्नकाल समाप्त होते ही कई सदस्य टोका टाकी करके अपनी बातें कहने लगे। इस पर अध्यक्ष श्री प्रजापति ने कहा कि शून्यकाल का मतलब ये नहीं कि सब शून्य हो गया है। जब घड़ी के दोनों कांटे बारह बजे पर आते हैं तो इसे शून्यकाल कहा जाता है। इसके बाद भी कार्यवाही चलती है इसलिए आप लोग हस्तक्षेप करना बंद करें। पथरिया विधायक राम बाई ने क्षेत्र के एक परिवार के अट्ठाईस लोगों को पुलिस मुकदमे में जबरन फंसाए जाने का मामला उठाया। इस पर अध्यक्ष श्री प्रजापति ने कहा कि जब कोई मामला अदालत में विचारणीय होता है तो उस पर सदन में चर्चा नहीं की जाती है। नरोत्तम मिश्रा ने विधानसभा में मीडिया के व्यवस्थापन का मुद्दा भी उठाया। इस पर नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने कहा कि आसंदी से कुछ ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि मीडिया का भी सम्मान बना रहे और विधायिका का भी गौरव बढ़े। इस पर अध्यक्ष ने कहा कि जो संस्था विधायिका के लिए बनी है उसमें ही यदि वो धक्के खाने को मजबूर हो जाए तो काम कैसे होगा। पहले मीडिया का स्वरूप बहुत छोटा था अब इलेक्ट्रानिक मीडिया भी है और प्रिंट मीडिया भी इसलिए दोनों के लिए अलग कक्ष दे दिए गए हैं। धीरे धीरे व्यवस्था जम जाएगी जो बातें सामने आएंगी उसके मुताबिक और भी बदलाव हो जाएंगे। नरोत्तम मिश्रा ने कहा कि एक ही सवाल के जवाब देने के लिए सदस्यों को दो अलग अलग स्थानों पर जाना पड़ रहा है। गोपाल भार्गव ने कहा कि विधानसभा सलाहकार समिति की राय से उचित व्यवस्था दे दें तो इसके जवाब में अध्यक्ष ने कहा कि उचित समय पर निर्णय ले लिया जाएगा। सदन के कामकाज को देखते हुए अध्यक्ष महोदय ने भोजनावकाश निरस्त कर दिया और मौजूदा वर्ष के आय व्ययक पर चर्चा आहूत की। बजट पर चर्चा करते हुए नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने कहा कि सदन में कहा गया कि आर्थिक सर्वेक्षण में जारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश पिछड़ गया है और बीमारू राज्य हो गया है। हकीकत में राज्य का विकास तेज गति से हुआ है। दो हजार तीन की तुलना में देखें तो राज्य में बिजली, सड़क,पानी, सिंचाई जैसे कई क्षेत्रों में अभूतपूर्व विकास हुआ है। जहां तीन हजार मेगावाट बिजली बनती थी वहां अब अठारह हजार छह सौ साठ मेगावाट बिजली बनती है। इस पर वाणिज्यिक कर मंत्री बृजेन्द्र सिंह राठौर ने कहा कि दो लाख करोड़ का कर्ज किसने लिया। इस पर गोपाल भार्गव ने कहा कि आपने तो सत्ता में आते ही कर्ज और फिजूलखर्ची शुरु कर दी है। अगले महीने से तो सरकार वेतन भी नहीं बांट पाएगी। पिछले पंद्रह सालों में हमारी सरकार ने कभी ओवरड्राफ्ट नहीं किया था। उन्होंने कहा कि इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगना चाहिए। यदि हम कहें कि नेहरू जी, इंदिरा जी, लाल बहादुर शास्त्री जी, अटलजी के जमाने में देश में कुछ नहीं हुआ तो ये कहना उन विभूतियों के साथ अन्याय करना होगा। उन्होंने कहा कि वित्त मंत्रीजी ने बजट में जो आय बढ़ने का आंकडा प्रस्तुत किया है उसे उन्हें एक बार फिर जांच करके कंफर्म करना चाहिए। उन्होंने कहा कि राज्य उत्पाद कर में सैंतीस प्रतिशत की ग्रोथ दिखाई गई है, जबकि अधिकतर ठेके बीस से अठारह प्रतिशत पर हो रहे हैं। पिछले दस वर्षों की ग्रोथ रेट को आधार बनाकर ये बजट बनाया जाता तो ज्यादा उपयुक्त होता। श्री भार्गव ने कहा कि मैं इस बजट को खोखला कहता हूं। उन्होंने कहा कि इस तरह के आंकड़ों के आधार पर बजट बनने से ये स्थितियां बनेंगी कि न तो निर्माण हो पाएंगे न ही भुगतान हो पाएंगे। उन्होंने कहा कि जीएसटी में 70 फीसदी की बढ़त दिखाई गई है , जबकि ये संभव नहीं है। यदि आप इतनी बढ़त दिखाएंगे तो फिर केन्द्र अतिरिक्त राशि क्यों देगा। नियम ये है कि यदि आप घाटे में जा रहे हैं तो घाटे की प्रतिपूर्ति केन्द्र से की जाएगी। जब आप मुनाफा दिखाएंगे तो संसाधन कैसे जुटा पाएंगे। इसी तरह स्टाम्प ड्यूटी में 23 फीसदी की बढ़त दिखाई गई है, जबकि कलेक्टर गाईड लाईन में 20 प्रतिशत की कमी की गई है। इसी तरह भू राजस्व में सौ फीसदी बढ़त दिखाई गई है जो किसी भी तरह संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि ऊर्जा विभाग की सब्सिडी आदि पर आठ हजार करोड़ का प्रावधान किया गया है जबकि हमने लगभग साढ़े चौदह हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया था। जाहिर है कि सरकार को अपने इस फैसले पर एक बार फिर विचार करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि सरकार ने सहकारी बैंकों को एक हजार करोड़ देने का फैसला किया है। यदि ऐसा होता है तो सरकार खस्ताहाल बैंकों की मालिक ही बन जाएगी। ऐसे में रिजर्व बैंक इन सहकारी बैंकों का लाईसेंस निरस्त कर देगा। सरकार को कर्ज के एवज में इन बैंकों में पूंजी निवेश करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि सारी सहकारी मिलें घाटे में चल रही हैं उन्हें उबारने के लिए बजट में कोई प्रावधान नहीं किए गए हैं।

    बजट भाषण के संबंध में सभी सदस्यों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करते हुए वित्तमंत्री तरुण भनोट ने कहा कि इस संबंध में सभी आपत्तियों का कोई आधार नहीं है। सरकार प्रदेश की बेहतरी के लिए काम कर रही है। शराब पर इस बार पंद्रह के स्थान पर बीस फीसदी वृद्धि की गई है इससे प्रदेश का राजस्व बढ़ेगा। उन्होंने पांच रुपए में गरीबों को भोजन कराने वाली दीन दयाल रसोई योजना बंद किए जाने के आरोप का खंडन करते हुए कहा कि राज्य में हर दिन तेरह हजार गरीबों को पांच रुपए में भोजन कराया जा रहा है। ये योजना कई कंपनियों से फंड जुटाकर चलाई जा रही है। सरकार इसमें आवश्यक सुधार भी करेगी। इस पर भाजपा के जालम सिंह पटेल ने कहा कि मैं स्वयं ये योजना चलाता रहा हूं। इसमें पांच रुपए की राशि बहुत कम पड़ती है। रसोई का पूरा खर्च नहीं निकल पाता है इसलिए इस राशि को बढ़ाया जाना चाहिए। इस पर वित्तमंत्री तरुण भनोट ने कहा कि सरकार इस सुझाव पर अवश्य विचार करेगी। मनोहर ऊंटवाल के आरोप के जवाब में श्री भनोट ने कहा कि हमने गौशालाओं के लिए दी जाने वाली चार रुपए की राशि को बढ़ाकर बीस रुपए प्रतिदिन प्रतिगाय की दर से बढ़ा दिए हैं। इससे गौवंश की देखभाल अच्छी तरह हो पाएगी। इसके लिए बजट में पर्याप्त प्रावधान किया गया है। आगे और भी संशोधन किए जाएंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछली भाजपा की सरकार तो एक गौशाला भी नहीं खोल सकी थी जबकि कमलनाथ सरकार ने जो प्रावधान किए हैं उससे प्रदेश में पर्याप्त गौशालाएं खोली जा सकेंगी। धीरे धीरे ये स्थिति बन जाएगी कि एक भी गौवंश आवारा हाल में सड़कों पर नहीं फिरेगा। इस बीच भाजपा के बहादुर सिंह चौहान ने कहा कि सरकार ने सारी जन हितैषी योजनाओं की दुर्गति कर दी है। तीर्थ दर्शन योजना में दो सौ करोड़ रुपए का प्रावधान किया जाता था सरकार ने बजट में उसे मात्र छह करोड़ रुपए कर दिया है।

    सदन में तीन अशासकीय संकल्प प्रस्तुत किए गए जिन्हें अध्यक्ष की घोषणा के अनुसार सर्वानुमति से पारित कर दिया गया। जिसमें प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए ग्रामीण इलाकों में आबंटित की जाने वाली राशि डेढ़ लाख रुपए से बढ़ाकर ढाई लाख रुपए किए जाने का संकल्प भी शामिल था। दशहरा दीपावली की छुट्टियों में या उसके तुरंत बाद परीक्षाओं का आयोजन न किए जाने और इटारसी से इलाहाबाद के लिए प्रतिदिन ट्रेन चलाने के संकल्प भी सदन ने पारित कर दिए। अपरान्ह अध्यक्ष महोदय ने सदन की कार्यवाही बुधवार सत्रह जुलाई तक के लिए स्थगित करने की घोषणा कर दी।