Category: भारत

  • नेपाल पर लालिमा या कालिमा ?

    नेपाल पर लालिमा या कालिमा ?

    नेपाल के प्रधानमंत्री खड़ग प्रसाद शर्मा उर्फ ओली की हालिया हरकतों ने बता दिया है कि भारत और नेपाल के आपसी संबंधों पर नए सिरे से विचार करने का समय आ गया है।


    के. विक्रम राव

    हिन्दू-बहुल नेपाल के परले दर्जे के दहशतगर्द, नक्सली प्रधान मंत्री पंडित खड्ग प्रसाद शर्मा उर्फ़ ओली ने अपने इष्टदेव लाल चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को प्रसन्न कर दिया| ऐसी बेला पर जब दो एशियाई महाशक्तियां (लोकतान्त्रिक भारत तथा कम्युनिस्ट चीन) बौद्ध (पूर्वी) लद्दाख में बीजिंग द्वारा प्रायोजित मुठभेड़ में आमने सामने हैं, तो नेपाल ने एक नया मानचित्र प्रकाशित कर डाला| इसमें उत्तराखण्ड के धारचूला क्षेत्र वाले लिपुलेख मार्ग को अपना भूभाग दर्शा दिया| उसकी नीयत यही है कि दुनिया को दिखाये कि भारत विस्तारवादी राष्ट्र है जो दोनों पड़ोसियों से एक साथ उलझ गया है | संयोग नहीं, नेपाल का ऐसा इरादा है कि अट्ठावन-वर्ष पूर्व हुए भारत-चीन संग्राम को दुबारा मंचित किया जाय| इसी गलवान नदी के निकट भारतीय क्षेत्र अक्साई चिन के सरोवरों पर तब अपना कब्ज़ा किया था| आज उसे मजबूत करने का लाल चीन का आशय है| इसीलिए तब (20 अक्टूबर 1962) युद्ध हुआ था| लोक सभा में इसी अक्साई चिन क्षेत्र पर नेहरु सरकार की फजीहत हुई थी| तब पूरी संसद चीन की जनमुक्ति सेना द्वारा बोमडिला (आज का अरुणांचल) से अक्साई चिन (लद्दाख) तक भारतीय सेना के संहार और लूट से आक्रोशित थी| रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन ने सदन को आश्वस्त करते कहा था कि “चीन-अधिकृत सीमा क्षेत्रों में घास तक नहीं उगती|” इस पर देहरादूनवासी महावीर त्यागी ने कहा था “मेरी गंजी खोपड़ी पर भी कुछ नहीं उगता है| अतः पण्डित नेहरु जी, इसे भी चीन को दे दीजिये|”

    आज छः दशक बाद फिर सीमा पर संकट है| इस बार लजाकर, पराजय बोध लिए आँख में पानी भरने को भारतीय तैयार नहीं हैं| चीन ही नहीं, कम्युनिस्ट-नियंत्रित नेपाल से भी हिसाब चुकता करना होगा| एक घोषणा भारतीय संसद ने 1953 में की थी कि नेपाल पर आक्रमण भारत पर ऐलाने-जंग माना जायेगा|

    आखिर इस शर्मा ‘ओली’ की साजिश क्या है ? कौन है यह ? इन्हें इस्लामिक स्टेट ऑफ़ ईराक एण्ड सीरिया का मृत आतंकी, स्वघोषित आलमी खलीफा अबू बकर अल बगदादी का ही फोटोकॉपी माना जाता है|

    नक्सली चारु मजूमदार का प्रेरित शिष्य, यह ओली नेपाल-बंगाल सीमा पर, कभी अपनी जन अदालत बनाकर भूस्वामियों का सर कलम करता था| वर्गशत्रु की हत्या को नक्सली धर्म कहता था| लेकिन ऐसा किसान-पुत्र शीघ्र ही अकूत धन और जमीन हथियाने लगा| धन बल से सत्ता पाना लक्ष्य हो गया| क्रमशः इनके वैचारिक भटकाव से ग्रसित नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी भी कई टुकड़ों में विभाजित हो गई| पुष्प कमल दहल प्रचण्ड, विष्णु प्रसाद पाउडेल, माधव कुमार नेपाल, वामदेव गौतम, रामबहादुर थापा, झालानाथ खनल आदि| इनकी अतिवादिता में सिर्फ मात्रा का अन्तर ही है|

    इन लाल सितारों की राजनीतिक गंभीरता का अंदाजा यह जानकर लग जाता है की भारत के विरुद्ध विष-वमन तथा चीन के प्रति चरणछू प्रतिस्पर्धा में इनमें कौन कितना तेज है? इस वक्त पण्डित ओली अव्वल नम्बर पर हैं| उनका निष्कर्ष, उनका सुविचारित निदान है कि भारत से नेपाल में आया कोरोना ज्यादा भयंकर है| बनिस्बत चीन से फैले वायरस के| यह मूढ़ता और बुद्धिशून्यता का चरम हो गया है| इन्हीं प्रधान मंत्री ओली ने कहा कि सुता क्षेत्र नेपाल का है| जबकि गोरखपुर से लगा यह इलाका बिहार के पश्चिमी चंपारण जनपद का भूभाग है |

    पण्डित ओली की एक और ख्याति है| उनके नाम से रंग बिरंगे एनजीओ पलते हैं| सारा धन (देसी व विदेसी) इन्हीं के मार्फ़त जमाखर्च होता है| पिछले अप्रैल में आये भूकम्प के समय बटोरी 40 लाख डालर की राशि अभी तक राहत में खर्च नहीं हुई| तो किसके जेब में खो गयी? ओली जानें| विचारधारा से कम्युनिस्ट ओली लेनिनवादी नहीं हैं, वे स्तालिनवादी हैं| कट्टर हैं| शायद ही कोई अपराध उनसे नहीं हुआ हो| नेपाल समाजवादी पार्टी के नेता सुरेन्द्र यादव का अपहरण तथा हत्या की साजिश का श्रेय ओली को जाता है|

    यहाँ यादगार बात है कि जब भूटान का डोकलाम वाला हादसा हुआ था तो भारत अड़ गया| चीन को पीछे हटना पड़ा था| ठीक तभी राहुल गाँधी चीन के राजदूत के दिल्ली-स्थित शांतिपथ आवास में रात्रिभोज पर गये थे| फिर वे तिब्बत भी गए थे| इस बार वे खामोश हैं| शायद उनके पिताश्री के नाना की 1962 के सीमा संग्राम में हुई पराजय का बोध ताजा रहा होगा| इस बार उनकी जननी और भगिनी भी मोदी पर कुछ बोली नहीं| शायद योगी की बसों पर अटकी होंगी| उनकी टिप्पणी अपेक्षित थी जब ओली शर्मा ने नरेंद्र मोदी की भर्त्सना में राय दी थी| वे बोले थे कि सीमा मामले पर भारतीय प्रधान मंत्री “सत्यमेव जयते” पर यकीन करते हैं अथवा “सिंहमेव जयते” (ललाट के तीन शेर) को मानते हैं| अर्थात बल प्रयोग पर भरोसा है?

    दुखद आश्चर्य होता है कि पूज्य मत्स्येन्द्रनाथ द्वारा पवित्र की गयी भूमि आज अनीश्वरवादी कम्युनिस्टों के चंगुल में सिसक रही है| विश्व के इस एकमात्र हिन्दू राष्ट्र पर भी तेरहवीं सदी में शमशुद्दीन बेग आलम नाम के इस्लामिक आक्रमणकारी ने हमला किया था। इस्लामिक सेना काफी बड़ी थी और नेपाल की गुरखा सेना बेहद छोटी थी। फलस्वरूप गुरखा हार गए लेकिन हमेशा की तरह वे बहादुरी से लडे थे जिससे इस्लामिक सेना को भी बडा भारी नुकसान हुआ था। युद्ध के पश्चात् गोरखा सेनापति अकेला बचा था और दस दस मुस्लिम सैनिकों को टक्कर दे रहा था। यह नजारा देख कर शमशुद्दीन ने अपने सैनिकों को लडाई रोकने का आदेश दिया और त्रस्त होकर मैदान छोड़ दिया|

    आज इस्लामाबाद के साये में भारत-नेपाल सीमा पर मस्जिदों का बेतहाशा निर्माण हो गया है| चीन के साथ मिलकर, पाकिस्तान से यारी कर पण्डित ओली भारत-विरोधी त्रिगुट रच रहे हैं| नेपाल की धर्मप्रिय जनता को समाधान पर सोचना होगा|

    K Vikram Rao
    Mobile -9415000909
    E-mail –k.vikramrao@gmail.com

  • कांग्रेस के दामन पर ही लगे हैं दो दशकों से जारी पलायन के दाग

    कांग्रेस के दामन पर ही लगे हैं दो दशकों से जारी पलायन के दाग

    गिरीश पांडे,वरिष्ठ पत्रकार

    पब्लिक सब जानती है, मत बहाएं प्रवासी श्रमिकों को लेकर घड़ियाली आंसू

    कोरोना के इस अभूतपूर्व संकट के दौरान प्रवासी श्रमिकों एवं कामगारों को लेकर राजनीति चरम पर है। एक ओर जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुआई में लॉकडाउन के पहले चरण से ही श्रमिकों के ससम्मान और सुरक्षित वापसी के लिए हर संभव प्रयास किये जा रहें हैं वहीं कुछ दिनों से अपनी असली-नकली बसों के जरिए कांग्रेस प्रदेश इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। सपा और बसपा कमोबेश यही काम ट्वीटर पर कर रहे हैं।
    इस आरोप-प्रत्यारोप से दीगर पलायन से जुड़ी समस्या का एक और पहलू भी है। क्या वजह है कि उप्र के लोग इतनी बड़ी संख्या में घर-परिवार, नाते-रिश्तेदार को छोड़ अपनी जवानी खपाने दूसरे प्रदेशों के बड़े शहरों में जाते हैं? आजादी के इतने वर्षों के बाद भी देश की सबसे उर्वर भूमि (इंडो गंगेटिक बेल्ट) गंगा, यमुना और घाघरा जैसी बड़ी नदियों, वैविध्यपूर्ण जलवायु और प्रचुर मानव संसाधन होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर क्यों नहीं उपलब्ध हैं? इसके लिए दोषी कौन है?
    कुछ आंकड़ों से यह तस्वीर साफ हो जाएगी।
    उप्र से पिछले दो दशकों में 20 से 29 वर्ष की उम्र के लोगों का पलायन 97 फीसद बढ़ा है। यही किसी व्यक्ति की सर्वाधिक उत्पादक उम्र होती है। इसी उम्र में वह घर-परिवार, समाज, प्रदेश और देश को अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकता है। त्रासदी यह कि इसी समयावधि में उप्र से पलायन की यह दर पड़ोसी राज्य बिहार की तुलना में दोगुनी है।

    ये आंकड़े खेतीबाड़ी से जुड़ी देश की सबसे बड़ी संस्था भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के हैं। आईसीएआर द्वारा प्रकाशित रिसर्च जनरल डबलिंग फार्मर इनकम स्ट्रेटजी ऑफ उत्तर प्रदेश में इसका जिक्र है। गौर करने लायक है कि पिछले दो दशकों के दौरान प्रदेश में किनकी सत्ता थी। साथ ही आजादी के बाद प्रदेश में सर्वाधिक समय तक कौन सत्ता में रहा।

    हर कोई जानता है कि सर्वाधिक समय तक प्रदेश की सत्ता में कांग्रेस रही है और पिछले दो दशकों में अधिकांश समय तक सपा और बसपा ही सत्ता पर काबिज रहीं। फिर भी अगर यहां से लोग रोजी-रोटी की तलाश में बाहर जाते रहे तो इसका दोषी कौन?

    संबंधित दलों के प्रबुद्ध लोग जरूर इस आंकड़े से वाकिफ होंगे। अगर नहीं है तो ये उनके लिए शर्म की बात है। शर्त यह है कि अगर उनके पास शर्म बची हो। ऐसे में कोरोना के संकट के कारण महाराष्ट्र, पंजाब, दिल्ली और हरियाणा के बड़े शहरों में अपने सपनों को पूरा करने के लिए जो लोग गये हैं उनके संकट से भी जरूर वाकिफ होंगे। फिर पहले लॉकडाउन के समय से ही उनको इसका आभास क्यों नहीं हुआ? क्यों वे शुतुरमुर्ग की तरह इस संकट को बढऩे की प्रतीक्षा कर रहे थे? दिल्ली को छोड़ इनमें से सभी राज्यों में कांग्रेस सत्ता में साझीदार है। सवाल उठता है कि कांग्रेस ने तब तक का इंतजार क्यों किया जब प्रवासी सडक पर आ गये। जेठ की तपती धूप में वे भूख-प्यास से बेहाल होने लगे। सडकों पर कुचलकर वे मरने लगे। क्या कांग्रेस अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए इसी समय की प्रतीक्षा कर रही थी।

    लॉकडाउन के पहले ही चरण में राजधानी और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में लाखों की संख्या में श्रमिक सडक पर आ गये तो कांग्रेस सहित अन्य दल क्या कर रहे थे? कोटा और राजस्थान की समृद्धि में योगदान देने वाले हजारों बच्चों को उनके घर तक पहुंचाने के लिए कांग्रेस ने क्या किया? जब पानी सर के ऊपर से गुजर गया तो सोचा कि बहती गंगा में डुबकी लगा कर पुण्य कमा लिया जाये। आने वाले समय में जनता उससे ये सवाल जरूर पूछेगी।

    जहां तक भाजपा खास कर उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बात है तो वह पहले दिन से ही वे प्रवासी मजदूरों से होने वाली इस समस्या और इससे उत्पन्न समस्याओं एवं चुनौतियों के प्रति संजीदा थे। दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से अप्रैल के अंत में दिन-रात एक कर चार दिनों में चार लाख से अधिक श्रमिकों की वापसी, कोटा से 12 हजार बच्चों और प्रयागराज से 10 हजार बच्चों की वापसी इसका सबूत है। यही नहीं अब तक 1000 से अधिक ट्रेनों और बसों के जरिये करीब 22 लाख से अधिक लोगों की घर वापसी हो चुकी है। वह भी पूरी सुरक्षा और सम्मान से। हर आने वाले को उसकी दक्षता के अनुसार वह स्थानीय स्तर पर रोजी-रोटी की भी चिंता कर रहे हैं। बावजूद इसके इतनी घटिया राजनीति का कोई औचित्य नहीं।

  • सुरखी में चुनौतियों से ऊपर पहुंची गोविंद राजपूत की उड़ान

    सुरखी में चुनौतियों से ऊपर पहुंची गोविंद राजपूत की उड़ान

    रजनीश जैन,वरिष्ठ पत्रकार ,सागर

    सिंधिया के सिपहसालार गोविंद राजपूत को परास्त करने का मंसूबा पालना आसान है लेकिन उन्हें हराना अब आसान नहीं है। सागर जिले के सुरखी विधानसभा क्षेत्र में उनको हराने और हरवाने की कला सिर्फ पूर्व गृहमंत्री भूपेंद्रसिंह के पास है लेकिन वे ही अब गोविंदसिंह राजपूत के सारथी होंगे। तकरीबन तय है कि चुनाव का संचालन कद्दावर नेता भूपेंद्रसिंह के हाथों में होगा। सुरखी में भाजपा का परचम भूपेंद्र सिंह ने ही लहराया था,यह मूलरूप से उनका ही विधानसभा क्षेत्र रहा है। सुरखी में दोनों के खेमे एक होने का अर्थ 1+1=2 नहीं बल्कि =11 होगा। गोविंद राजपूत को 2013 के विधानसभा चुनाव में पराजित करने वाली पूर्व कांग्रेस विधायक संतोष साहू की बेटी पारुल साहू भी भूपेंद्र सिंह की ही खोज थीं। पिछले चुनाव में पारुल साहू टिकट काट कर भाजपा ने जैसे गोविंद राजपूत को वाकओवर ही दे दिया था। तब से पारुल साहू अपनी ही पार्टी में उपेक्षित महसूस कर रही हैं लेकिन लगता नहीं कि वे पार्टी छोड़ कर कांग्रेस की कमजोर कश्ती में सवार होंगी। ऐसे में असली प्रत्याशी ढूंढ़ना ही कांग्रेस के लिए चुनौती भरा काम है।

    यह हैरत की बात है कि कांग्रेस में रहते हुए गोविंद राजपूत के खिलाफ प्रत्याशी की खोज और तैयारी करना होती थी क्योंकि इस कठिन चुनौती के लिए कोई आसानी से तैयार नहीं होता था। लेकिन आज जब गोविंद भाजपा ज्वाइन करके,मंत्री बनके अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ मैदान में खड़े हैं तब उनके खिलाफ चुनाव लड़ने कांग्रेस से लगभग बीस प्रत्याशी टिकट मांग रहे हैं। और मैं इन सबके नाक्म देने की जहमत उठाए बिना साफ तौर पर इन सबको यह कह कर खारिज कर रहा हूं कि इनमें से एक भी गोविंद का टक्कर देने का माद्दा नहीं रखता। फिर कांग्रेस में टिकटार्थियों की इतनी लंबी क्यू क्यों है!? इसका उत्तर सीधा और सपाट है कि कांग्रेस के ज्यादातर अभ्यर्थी अपने ही हाईकमान और क्षत्रपों की आंतरिक वेदना और प्रतिशोध की भावनाओं का नगदीकरण करना चाह रहे हैं।

    जैसी कि खबरें आ रही हैं कि कमलनाथ और दिग्विजय सिंह सरकार गिराने के लिए सिंधिया को तगड़ा सबक सिखाना चाह रहे हैं। इसके लिए जो लक्ष्य रखे गए हैं उसमें से एक लक्ष्य गोविंद राजपूत को ‘एनीहाऊ’ पराजित करना भी है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं में अफवाह यहां तक है कि सुरखी के लिए दस करोड़ का बजट रखा गया है। बस यही दस करोड़ वह अनकापल्ली गुड़ है जिसके लिए मक्खियां बड़ी तादाद में भिनभिना रही हैं।…और इस मानसिकता वाली ये मक्खियां अच्छी तरह जानती हैं कि यह गुड़ चट कर जाने वाली मक्खी को शत्रुपक्ष से भी शहद चाटने का तगड़ा प्रस्ताव मिल सकता है। तो कांग्रेस के सामने पहली चुनौती यह सावधानी बरतने की है कि उन्हें असल प्रत्याशी खोजना है और जयचंद या मीरजाफरों से बचना है। जाहिर है जयचंद बड़े-बड़े कागजी समीकरण बना कर हाईकमान को रिझा रहे हैं पर ये सब उनके सब्जबाग हैं।

    असलियत यह है कि कांग्रेस के सामने संभावनाशील प्रत्याशी चयन के सीमित विकल्प हैं। पहला यह कि कांग्रेस का कोई कद्दावर नेता सुरखी से मैदान में उतरे। इनमें अजयसिंह राहुल भैया शीर्ष पर हैं। उसकी वजह यह है कि स्थानीय भाजपा नेता राजेंद्रसिंह मोकलपुर से सिर्फ उन्हीं की पटरी बैठती है। राजेंद्रसिंह से गोविंद राजपूत की ऐसी व्यक्तिगत अदावत है कि यदि उन्हें हराने की ठोस परिस्थिति बनती दिखी तब वे इसके लिए भाजपा छोड़ने जैसा कदम भी उठा सकते हैं।

    कांग्रेस के पास दूसरा विकल्प यह है कि भाजपा से राजेंद्र सिंह मोकलपुर या पारुलसाहू को तोड़ कर टिकट दिया जाए। पारुल साहू का टूटना मुश्किल काम है पर असंभव भी नहीं है। मोकलपुर टूट सकते हैं पर इसके लिए ठोस परिस्थितियां बनानी होंगी। वे अगर तैयार हो गए तो यह उनकी गोविंद राजपूत से प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष चौथी और भीषण जंग होगी। इस जंग के लिए वे लगातार अनुभवी होते जा रहे हैं और क्षेत्र की जनता भी उनको एक मौका देने पर विचार कर सकती है। कांग्रेसी और भाजपाई दोनों कार्यकर्ता उनके साथ आज भी फ्रेंडली हैं।

    इसके अलावा एक तीसरा और इकलौता विकल्प कांग्रेस के पास यह है कि वह अपने पुराने और कद्दावर कांग्रेसी नेता रहे विट्ठलभाई पटेल की नातिन धारणा पटेल को चुनाव लड़ने के लिए तैयार करे। यहां ध्यान रहे कि सुरखी क्षेत्र विट्ठलभाई का ही चुनाव क्षेत्र रहा है जहां उनको दीवान भगतसिंह भापेल ने अपनी राजनैतिक जमीन देकर जिताया और मंत्री के ओहदे तक पहुंचाया। पटेल परिवार कांग्रेस का निष्ठावान और पुराना परिवार रहा है। सुरखी क्षेत्र की जनता, वहां के कांग्रेस कार्यकर्ताओं में अब भी इस परिवार के प्रति विश्वास और सम्मान है। दरअसल कांग्रेस की तरफ से सुरखी क्षेत्र में गोविंद राजपूत की आरंभिक सफलताओं में विट्ठलभाई का भी योगदान रहा है। क्षेत्र के जातिगत समीकरण भी पटेल परिवार के पक्ष में हैं। वहां का परंपरागत कांग्रेसी वोटर और कांग्रेसी कार्यकर्ता इसके लिए आश्वस्त हो सकता है कि यह प्रत्याशी बिकेगा और झुकेगा नहीं और भविष्य में भी संघर्ष के लिए साथ रहेगा।

    धारणा पटेल वैसा ही फ्रेश, ऊर्जा से भरा,अंग्रेजीदां चेहरा है जैसी कि पारुल साहू थीं। गोविंद राजपूत खेमा ऐसे ही गुमनाम और नये चेहरे से भयभीत होता है क्योंकि तब उनकी सारी रणनीतियां असमंजस का शिकार हो जाती हैं। महिला मतदाताओं का सपोर्ट एकपक्षीय हो जाता है। धारणा पटेल वैसे तो कुछ वर्षों से एनजीओ के सहारे अपनी पुश्तैनी विरासत को रचनात्मक गति देने में सक्रिय हैं पर वे राजनीति के लिए एकदम नई हैं। उनका पूरा कैंपेन दिल्ली और भोपाल के वरिष्ठ नेताओं को हाथ में लेना होगा। आर्थिक मोर्चे पर भी अब इस परिवार से बहुत बेहतर की उम्मीद नहीं की जा सकती। लेकिन कुछ वर्षों पहले दादा विट्ठलभाई पटेल और हाल में पिता संजयभाई पटेल की मृत्यु की सहानुभूति लहर क्षेत्र की जनता और जिले के कांग्रेस कार्यकर्ताओं को उद्वेलित कर सकती है। इस तरह पार्टी को एक बेहतर संभावनाओं वाला प्रत्याशी हासिल होगा। लगभग महीने भर से कांग्रेस नेतृत्व के नुमाइंदे स्व विट्ठलभाई पटेल के परिवार के संपर्क में हैं और उनकी सहमति से ही उनके नाम पर क्षेत्र की जनता की नब्ज टटोली जा रही है।

  • अब आत्मनिर्भरता हमारी राह बोले प्रधानमंत्री

    अब आत्मनिर्भरता हमारी राह बोले प्रधानमंत्री

    प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम संबोधन

    सभी देशवासियों को आदर पूर्वक नमस्कार,

    कोरोना संक्रमण से मुकाबला करते हुए दुनिया को अब चार महीने से ज्यादा हो रहे हैं। इस दौरान तमाम देशों के 42 लाख से ज्यादा लोग कोरोना से संक्रमित हुए हैं। पौने तीन लाख से ज्यादा लोगों की दुखद मृत्यु हुई है। भारत में भी लोगों ने अपने स्वजन खोए हैं। मैं सभी के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त करता हूं।

    साथियों,

    एक वायरस ने दुनिया को तहस-नहस कर दिया है। विश्व भर में करोड़ों जिंदगियां संकट का सामना कर रही हैं। सारी दुनिया, जिंदगी बचाने की जंग में जुटी है। हमने ऐसा संकट न देखा है, न ही सुना है। निश्चित तौर पर मानव जाति के लिए ये सब कुछ अकल्पनीय है, ये Crisis अभूतपूर्व है।

    लेकिन थकना, हारना, टूटना-बिखरना, मानव को मंजूर नहीं है। सतर्क रहते हुए, ऐसी जंग के सभी नियमों का पालन करते हुए, अब हमें बचना भी है और आगे भी बढ़ना है। आज जब दुनिया संकट में है, तब हमें अपना संकल्प और मजबूत करना होगा। हमारा संकल्प इस संकट से भी विराट होगा।

    साथियों,

    हम पिछली शताब्दी से ही सुनते आए हैं कि 21वीं सदी हिंदुस्तान की है। हमें कोरोना से पहले की दुनिया को, वैश्विक व्यवस्थाओं को विस्तार से देखने-समझने का मौका मिला है। कोरोना संकट के बाद भी दुनिया में जो स्थितियां बन रही हैं, उसे भी हम निरंतर देख रहे हैं। जब हम इन दोनों कालखंडो को भारत के नजरिए से देखते हैं तो लगता है कि 21वीं सदी भारत की हो, ये हमारा सपना नहीं, ये हम सभी की जिम्मेदारी है। लेकिन इसका मार्ग क्या हो? विश्व की आज की स्थिति हमें सिखाती है कि इसका मार्ग एक ही है- “आत्मनिर्भर भारत”। हमारे यहां शास्त्रों में कहा गया है- एष: पंथा: यानि यही रास्ता है- आत्मनिर्भर भारत।

    साथियों,

    एक राष्ट्र के रूप में आज हम एक बहुत ही अहम मोड़ पर खड़े हैं। इतनी बड़ी आपदा, भारत के लिए एक संकेत लेकर आई है, एक संदेश लेकर आई है, एक अवसर लेकर आई है। मैं एक उदाहरण के साथ अपनी बात रखूंगा। जब कोरोना संकट शुरु हुआ, तब भारत में एक भी पीपीई किट नहीं बनती थी। एन-95 मास्क का भारत में नाममात्र उत्पादन होता था। आज स्थिति ये है कि भारत में ही हर रोज 2 लाख PPE और 2 लाख एन-95 मास्क बनाए जा रहे हैं। ये हम इसलिए कर पाए, क्योंकि भारत ने आपदा को अवसर में बदल दिया। आपदा को अवसर में बदलने की भारत की ये दृष्टि, आत्मनिर्भर भारत के हमारे संकल्प के लिए उतनी ही प्रभावी सिद्ध होने वाली है।

    साथियों,

    आज विश्व में आत्मनिर्भर शब्द के मायने बदल गए हैं, Global World में आत्मनिर्भरता की Definition बदल गई है। अर्थकेंद्रित वैश्वीकरण बनाम मानव केंद्रित वैश्वीकरण की चर्चा जोरों पर है। विश्व के सामने भारत का मूलभूत चिंतन, आशा की किरण नजर आता है। भारत की संस्कृति, भारत के संस्कार, उस आत्मनिर्भरता की बात करते हैं जिसकी आत्मा वसुधैव कुटुंबकम है। भारत जब आत्मनिर्भरता की बात करता है, तो आत्मकेंद्रित व्यवस्था की वकालत नहीं करता।

    भारत की आत्मनिर्भरता में संसार के सुख, सहयोग और शांति की चिंता होती है। जो संस्कृति जय जगत में विश्वास रखती हो, जो जीव मात्र का कल्याण चाहती हो, जो पूरे विश्व को परिवार मानती हो, जो अपनी आस्था में ‘माता भूमिः पुत्रो अहम् पृथिव्यः’ की सोच रखती हो जो पृथ्वी को मां मानती हो, वो संस्कृति, वो भारतभूमि, जब आत्मनिर्भर बनती है, तब उससे एक सुखी-समृद्ध विश्व की संभावना भी सुनिश्चित होती है।

    भारत की प्रगति में तो हमेशा विश्व की प्रगति समाहित रही है। भारत के लक्ष्यों का प्रभाव, भारत के कार्यों का प्रभाव, विश्व कल्याण पर पड़ता है। जब भारत खुले में शौच से मुक्त होता है तो दुनिया की तस्वीर बदल जाती है। टीबी हो, कुपोषण हो, पोलियो हो, भारत के अभियानों का असर दुनिया पर पड़ता ही पड़ता है। इंटरनेशनल सोलर अलायंस, ग्लोबर वॉर्मिंग के खिलाफ भारत की सौगात है। इंटरनेशनल योगा दिवस की पहल, मानव जीवन को तनाव से मुक्ति दिलाने के लिए भारत का उपहार है। जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रही दुनिया में आज भारत की दवाइयां एक नई आशा लेकर पहुंचती हैं। इन कदमों से दुनिया भर में भारत की भूरि-भूरि प्रशंसा होती है, तो हर भारतीय गर्व करता है। दुनिया को विश्वास होने लगा है कि भारत बहुत अच्छा कर सकता है, मानव जाति के कल्याण के लिए बहुत कुछ अच्छा दे सकता है। सवाल यह है – कि आखिर कैसे? इस सवाल का भी उत्तर है- 130 करोड़ देशवासियों का आत्मनिर्भर भारत का संकल्प।

    साथियों,

    हमारा सदियों का गौरवपूर्ण इतिहास रहा है। भारत जब समृद्ध था, सोने की चिड़िया कहा जाता था, संपन्न था, तब सदा विश्व के कल्याण की राह पर ही चला। वक्त बदल गया, देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ गया, हम विकास के लिए तरसते रहे। आज भारत विकास की ओर सफलतापूर्वक कदम बढ़ा रहा है, तब भी विश्व कल्याण की राह पर अटल है। याद करिए, इस शताब्दी की शुरुआत के समय Y2K संकट आया था। भारत के टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट्स ने दुनिया को उस संकट से निकाला था। आज हमारे पास साधन हैं, हमारे पास सामर्थ्य है, हमारे पास दुनिया का सबसे बेहतरीन टैलेंट है, हम Best Products बनाएंगे, अपनी Quality और बेहतर करेंगे, सप्लाई चेन को और आधुनिक बनाएंगे, ये हम कर सकते हैं और हम जरूर करेंगे।

    साथियों,

    मैंने अपनी आंखों से कच्छ भूकंप के वो दिन देखे हैं। हर तरफ सिर्फ मलबा ही मलबा। सब कुछ ध्वस्त हो गया था। ऐसा लगता था मानो कच्छ, मौत की चादर ओढ़कर सो गया हो। उस परिस्थिति में कोई सोच भी नहीं सकता था कि कभी हालात बदल पाएंगे। लेकिन देखते ही देखते कच्छ उठ खड़ा हुआ, कच्छ चल पड़ा, कच्छ बढ़ चला। यही हम भारतीयों की संकल्पशक्ति है। हम ठान लें तो कोई लक्ष्य असंभव नहीं, कोई राह मुश्किल नहीं। और आज तो चाह भी है, राह भी है। ये है भारत को आत्मनिर्भर बनाना। भारत की संकल्पशक्ति ऐसी है कि भारत आत्मनिर्भर बन सकता है।

    साथियों,

    आत्मनिर्भर भारत की ये भव्य इमारत, पाँच Pillars पर खड़ी होगी। पहला पिलर Economy एक ऐसी इकॉनॉमी जो Incremental change नहीं बल्कि Quantum Jump लाए । दूसरा पिलर Infrastructure एक ऐसा Infrastructure जो आधुनिक भारत की पहचान बने। तीसरा पिलर- हमारा System- एक ऐसा सिस्टम जो बीती शताब्दी की रीति-नीति नहीं, बल्कि 21वीं सदी के सपनों को साकार करने वाली Technology Driven व्यवस्थाओं पर आधारित हो। चौथा पिलर- हमारी Demography- दुनिया की सबसे बड़ी Democracy में हमारी Vibrant Demography हमारी ताकत है, आत्मनिर्भर भारत के लिए हमारी ऊर्जा का स्रोत है। पाँचवाँ पिलर- Demand- हमारी अर्थव्यवस्था में डिमांड और सप्लाई चेन का जो चक्र है, जो ताकत है, उसे पूरी क्षमता से इस्तेमाल किए जाने की जरूरत है।

    देश में डिमांड बढ़ाने के लिए, डिमांड को पूरा करने के लिए, हमारी सप्लाई चेन के हर स्टेक-होल्डर का सशक्त होना जरूरी है। हमारी सप्लाई चेन, हमारी आपूर्ति की उस व्यवस्था को हम मजबूत करेंगे जिसमें मेरे देश की मिट्टी की महक हो, हमारे मजदूरों के पसीने की खुशबू हो।

    साथियों,

    कोरोना संकट का सामना करते हुए, नए संकल्प के साथ मैं आज एक विशेष आर्थिक पैकेज की घोषणा कर रहा हूं। ये आर्थिक पैकेज, ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ की अहम कड़ी के तौर पर काम करेगा।

    साथियों,

    हाल में सरकार ने कोरोना संकट से जुड़ी जो आर्थिक घोषणाएं की थीं, जो रिजर्व बैंक के फैसले थे, और आज जिस आर्थिक पैकेज का ऐलान हो रहा है, उसे जोड़ दें तो ये करीब-करीब 20 लाख करोड़ रुपए का है। ये पैकेज भारत की GDP का करीब-करीब 10 प्रतिशत है।

    इन सबके जरिए देश के विभिन्न वर्गों को, आर्थिक व्यवस्था की कड़ियों को, 20 लाख करोड़ रुपए का संबल मिलेगा, सपोर्ट मिलेगा। 20 लाख करोड़ रुपए का ये पैकेज, 2020 में देश की विकास यात्रा को, आत्मनिर्भर भारत अभियान को एक नई गति देगा। आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को सिद्ध करने के लिए, इस पैकेज में Land, Labour, Liquidity  और Laws, सभी पर बल दिया गया है।

    ये आर्थिक पैकेज हमारे कुटीर उद्योग, गृह उद्योग, हमारे लघु-मंझोले उद्योग, हमारे MSME के लिए है, जो करोड़ों लोगों की आजीविका का साधन है, जो आत्मनिर्भर भारत के हमारे संकल्प का मजबूत आधार है। ये आर्थिक पैकेज देश के उस श्रमिक के लिए है, देश के उस किसान के लिए है जो हर स्थिति, हर मौसम में देशवासियों के लिए दिन रात परिश्रम कर रहा है। ये आर्थिक पैकेज हमारे देश के मध्यम वर्ग के लिए है, जो ईमानदारी से टैक्स देता है, देश के विकास में अपना योगदान देता है। ये आर्थिक पैकेज भारतीय उद्योग जगत के लिए है जो भारत के आर्थिक सामर्थ्य को बुलंदी देने के लिए संकल्पित हैं। कल से शुरू करके, आने वाले कुछ दिनों तक, वित्त मंत्री जी द्वारा आपको ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ से प्रेरित इस आर्थिक पैकेज की विस्तार से जानकारी दी जाएगी।

    साथियों,

    आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए Bold Reforms की प्रतिबद्धता के साथ अब देश का आगे बढ़ना अनिवार्य है। आपने भी अनुभव किया है कि बीते 6 वर्षों में जो Reforms हुए, उनके कारण आज संकट के इस समय भी भारत की व्यवस्थाएं अधिक सक्षम, अधिक समर्थ नज़र आईं हैं। वरना कौन सोच सकता था कि भारत सरकार जो पैसा भेजेगी, वो पूरा का पूरा गरीब की जेब में, किसान की जेब में पहुंच पाएगा। लेकिन ये हुआ। वो भी तब हुआ जब तमाम सरकारी दफ्तर बंद थे, ट्रांसपोर्ट के साधन बंद थे। जनधन-आधार-मोबाइल- JAM की त्रिशक्ति से जुड़ा ये सिर्फ एक रीफॉर्म था, जिसका असर हमने अभी देखा। अब Reforms के उस दायरे को व्यापक करना है, नई ऊंचाई देनी है।

    ये रिफॉर्मस खेती से जुड़ी पूरी सप्लाई चेन में होंगे, ताकि किसान भी सशक्त हो और भविष्य में कोरोना जैसे किसी दूसरे संकट में कृषि पर कम से कम असर हो। ये रिफॉर्म्स, Rational टैक्स सिस्टम, सरल और स्पष्ट नियम-कानून, उत्तम इंफ्रास्ट्रक्चर, समर्थ और सक्षम Human Resource, और मजबूत फाइनेंशियल सिस्टम के निर्माण के लिए होंगे। ये रिफॉर्म्स, बिजनेस को प्रोत्साहित करेंगे, निवेश को आकर्षित करेंगे और मेक इन इंडिया के हमारे संकल्प को सशक्त करेंगे।

    साथियों,

    आत्मनिर्भरता, आत्मबल और आत्मविश्वास से ही संभव है। आत्मनिर्भरता, ग्लोबल सप्लाई चेन में कड़ी स्पर्धा के लिए भी देश को तैयार करती है। और आज ये समय की मांग है कि भारत हर  स्पर्धा में जीते, ग्लोबल सप्लाई चेन में बड़ी भूमिका निभाए। इसे समझते हुए, भी आर्थिक पैकेज में अनेक प्रावधान किए गए हैं। इससे हमारे सभी सेक्टर्स की Efficiency बढ़ेगी और Quality भी सुनिश्चित होगी।

    साथियों,

    ये संकट इतना बड़ा है, कि बड़ी से बड़ी व्यवस्थाएं हिल गई हैं। लेकिन इन्हीं परिस्थितियों में हमने, देश ने हमारे गरीब भाई-बहनों की संघर्ष-शक्ति, उनकी संयम-शक्ति का भी दर्शन किया है। खासकर हमारे जो रेहड़ी वाले भाई-बहन हैं, ठेला लगाने वाले हैं, पटरी पर सामान बेचने वाले हैं, जो हमारे श्रमिक साथी हैं, जो घरों में काम करने वाले भाई-बहन हैं, उन्होंने इस दौरान बहुत तपस्या की है, त्याग किया है। ऐसा कौन होगा जिसने उनकी अनुपस्थिति को महसूस नहीं किया।

    अब हमारा कर्तव्य है उन्हें ताकतवर बनाने का, उनके आर्थिक हितों के लिए कुछ बड़े कदम उठाने का। इसे ध्यान में रखते हुए गरीब हो, श्रमिक हो, प्रवासी मजदूर हों, पशुपालक हों, हमारे मछुवारे साथी हों, संगठित क्षेत्र से हों या असंगठित क्षेत्र से, हर तबके के लिए आर्थिक पैकेज में कुछ महत्वपूर्ण फैसलों का ऐलान किया जाएगा।

    साथियों,

    कोरोना संकट ने हमें Local Manufacturing, Local Market, Local Supply Chain, का भी महत्व समझाया है। संकट के समय में, Local ने ही हमारी Demand पूरी की है, हमें इस Local ने ही बचाया है। Local सिर्फ जरूरत नहीं, बल्कि हमारी जिम्मेदारी है। समय ने हमें सिखाया है कि Local को हमें अपना जीवन मंत्र बनाना ही होगा।

    आपको आज जो Global Brands लगते हैं वो भी कभी ऐसे ही बिल्कुल Local थे। लेकिन जब वहां के लोगों ने उनका इस्तेमाल शुरू किया, उनका प्रचार शुरू किया, उनकी ब्रांडिंग की, उन पर गर्व किया, तो वो Products, Local से Global बन गए। इसलिए, आज से हर भारतवासी को अपने लोकल के लिए वोकल बनना है, न सिर्फ लोकल Products खरीदने हैं, बल्कि उनका गर्व से प्रचार भी करना है।

    मुझे पूरा विश्वास है कि हमारा देश ऐसा कर सकता है। आपके प्रयासों ने, तो हर बार, आपके प्रति मेरी श्रद्धा को और बढ़ाया है। मैं गर्व के साथ एक बात महसूस करता हूं, याद करता हूं। जब मैंने आपसे, देश से खादी खरीदने का आग्रह किया था। ये भी कहा था कि देश के हैंडलूम वर्कर्स को सपोर्ट करें। आप देखिए, बहुत ही कम समय में खादी और हैंडलूम, दोनों की ही डिमांड और बिक्री रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। इतना ही नहीं, उसे आपने बड़ा ब्रांड भी बना दिया। बहुत छोटा सा प्रयास था, लेकिन परिणाम मिला, बहुत अच्छा परिणाम मिला।

    साथियों,

    सभी एक्सपर्ट्स बताते हैं, साइंटिस्ट बताते हैं कि कोरोना लंबे समय तक हमारे जीवन का हिस्सा बना रहेगा। लेकिन साथ ही, हम ऐसा भी नहीं होने दे सकते कि हमारी जिंदगी सिर्फ कोरोना के इर्द-गिर्द ही सिमटकर रह जाए। हम मास्क पहनेंगे, दो गज की दूरी का पालन करेंगे लेकिन अपने लक्ष्यों को दूर नहीं होने देंगे।

    इसलिए, लॉकडाउन का चौथा चरण, लॉकडाउन 4, पूरी तरह नए रंग रूप वाला होगा, नए नियमों वाला होगा। राज्यों से हमें जो सुझाव मिल रहे हैं, उनके आधार पर लॉकडाउन 4 से जुड़ी जानकारी भी आपको 18 मई से पहले दी जाएगी। मुझे पूरा भरोसा है कि नियमों का पालन करते हुए, हम कोरोना से लड़ेंगे भी और आगे भी बढ़ेंगे।

    साथियों,

    हमारे यहाँ कहा गया है- ‘सर्वम् आत्म वशं सुखम्’ अर्थात, जो हमारे वश में है, जो हमारे नियंत्रण में है वही सुख है। आत्मनिर्भरता हमें सुख और संतोष देने के साथ-साथ सशक्त भी करती है। 21वीं सदी, भारत की सदी बनाने का हमारा दायित्व, आत्मनिर्भर भारत के प्रण से ही पूरा होगा। इस दायित्व को 130 करोड़ देशवासियों की प्राणशक्ति से ही ऊर्जा मिलेगी। आत्मनिर्भर भारत का ये युग, हर भारतवासी के लिए नूतन प्रण भी होगा, नूतन पर्व भी होगा।

    अब एक नई प्राणशक्ति, नई संकल्पशक्ति के साथ हमें आगे बढ़ना है। जब आचार-विचार कर्तव्य भाव से सराबोर हो, कर्मठता की पराकाष्ठा हो, कौशल्य की पूंजी हो, तो आत्मनिर्भर भारत बनने से कौन रोक सकता है? हम भारत को आत्म निर्भर भारत बना सकते हैं। हम भारत को आत्म निर्भर बनाकर रहेंगे। इस संकल्प के साथ, इस विश्वास के साथ, मैं आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं।

    आप अपने स्वास्थ्य का, अपने परिवार, अपने करीबियों का ध्यान रखिए।

  • सेक्युलर रहबर की याद में

    सेक्युलर रहबर की याद में


    के. विक्रम राव -देशहित के मायने

    सत्रह साल हो गये| ठीक आज ही (9 अप्रैल), भारतमित्र, इस्लामी राष्ट्रनायकों में एक अकेले सेक्युलर व्यक्ति सद्दाम हुसैन अल टिकरीती को अमरीकी सेना ने फाँसी की सज़ा सुनाई गई थी। बगदाद में न्यायिक प्रक्रिया का ढकोसला दिखा था। उसकी बाबत उल्लेख हो जिसमें सद्दाम को मुत्युदण्ड मिला था। कल्पना कीजिए यदि कहीं जार्ज बुश पर ईरान में नरसंहार का मुकदमा चलता। प्रधान न्यायाधीश होता ओसामा बिन लादेन, अभियोजन पक्ष के प्रमुख होते उत्तरी कोरिया के किम जोंग इल और अदालत का स्थान होता क्यूबा ? सद्दाम हुसैन के साथ ठीक ऐसा ही हुआ। प्रधान न्यायाधीश रउफ अब्दुल रशीद थे जो अल्पसंख्यक जनजाति कुर्द के थे। प्रधानमंत्री थे नूरी अल मलिकी जिनकी शिया पार्टी अल दावा ने 1982 में दुजैल में सद्दाम पर जानलेवा हमला किया था। मुकदमें की सुनवाई के दौरान सद्दाम के तीन वकीलों की हत्या कर दी गई थी। एक प्रधान जज रिज़गार मोहम्मद अमीन को त्यागपत्र देने पर विवश कर दिया गया क्योंकि वे निष्पक्ष थे। दूसरे जज का रहस्यमय निधन हो गया था। सद्दाम के वकील, अमरीका के पूर्व महाधिवक्ता तथा मानवाधिकार कार्यकर्ता रेम्ज़े क्लार्क को ईराकी सरकार ने बगदाद से निकाल दिया था। अर्थात् विजेता ने तय किया कि पराजित को कैसा न्याय दिया जाय। अमरीका की न्यायप्रियता महज़ आडम्बर सिद्ध हुई। केवल चरमपन्थी लोग ही इस पीड़ा से अछूते रहेंगे। कारण? दर्द की अनुभूति के लिए मर्म होना चाहिए!

    अतः चर्चा का मुद्दा है कि आखिर अपदस्थ राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन का अंजाम ऐसा क्यों हुआ? मजहब के नाम पर बादशाहत और सियासत करने वालों को सद्दाम कभी पसन्द नहीं आए। उनकी बाथ सोशलिस्ट पार्टी ने रूढ़िग्रस्त ईराकी समाज को समता-मूलक आधार पर पुनर्गठित किया था। रोटी, दवाई, शिक्षा, आवास आदि बुनियादी आवश्यकताओं को मूलाधिकार बनाया था। पड़ोसी अरब देशों में मध्यकालीन बर्बरता ही राजकीय प्रशासन की नीति है, मगर बगदाद में कानूनी ढांचा पश्चिमी न्याय सिद्धान्त पर आधारित था। ईराक में चोरी का दण्ड हाथ काटना नहीं था, वरन् जेल की सज़ा होती थी। इसीलिए अमरीकी पूंजीवादी दबाव में शाही सऊदी अरब ने सद्दाम हुसैन के सोशिलिस्ट ईराक को नेस्तनाबूद करने में कसर नहीं छोड़ी। सऊदी अरब के बादशाह ने पैगम्बरे इस्लाम की जन्मस्थली के निकट अमरीकी बमवर्षक जहाजी बेड़े को जगह दी। नाना की मसनद (जन्म स्थली) के ऊपर से उड़कर अमरीकी आततायियों ने नवासे की मजारों पर कर्बला में बम बरसाए थे। अपनी पत्रकारी यात्रा के दौरान इस तीर्थस्थली की मीनारों को क्षतिग्रस्त देखकर मुझ जैसे गैर-इस्लामी व्यक्ति का दिल भर आया था कि सऊदी अरब के इस्लामी शासकों को ऐसा नापाक काम करते अल्लाह का भी खौफ नही हुआ? शकूर खोसाई के राष्ट्रीय पुस्तकालय में अमरीकी बमों द्वारा जले ग्रन्थों को देखकर मेरे गाइड ने मुझे उस दौर की याद बरबस दिलाई जब चंगेज खाँ ने (1258) मुसतन्सरिया विश्वविद्यालय की दुर्लभ किताबों का गारा बना कर युफ्रेट्स नदी पर पुल बनवाया था।

    ईराकी समाजवादी गणराज्य के अपदस्थ राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन पर चले अभियोग और फिर सुनाए गये फैसले की मीनमेख निकालने के पूर्व खुदा के इस बन्दे की सुकृतियों से अवगत हो लें। भारत के हिन्दू राष्ट्रवादियों को याद दिलाना होगा कि सद्दाम हुसैन अकेले मुस्लिम राष्ट्राध्यक्ष थे जिन्होंने कश्मीर को भारत का अविभाज्य अंग कहा था। उनके राज में सरकारी कार्यालयों में नमाज़ अदायगी हेतु अवकाश नहीं मिलता था। कारण यही कि वे मज़हब को निजी आस्था की बात मानते थे। अयोध्या काण्ड पर जब इस्लामी दुनिया में बवण्डर उठा था, तो बगदाद शान्त था। सद्दाम ने कहा था कि एक पुरानी इमारत गिरी है, यह भारत का अपना मामला है। उन्हीं दिनों ढाका में प्राचीन ढाकेश्वरी मन्दिर ढाया गया था। तस्लीमा तसरीन ने अपनी कृति (लज्जा) में बांग्लादेश में हिन्दू तरूणियों पर हुए वीभत्स जुल्मों का वर्णन किया है। इसी पूर्वी पाकिस्तान को भारतीय सेना द्वारा मुक्त कराने पर शेख मुजीब के बांग्लादेश को मान्यता देने में सद्दाम सर्वप्रथम थे। इन्दिरा गांधी की (1975) ईराक यात्रा पर मेज़बान सद्दाम ने उनका सूटकेस उठाया था। जब रायबरेली से लोकसभा चुनाव (1977) में वे हार गईं थीं तो इन्दिरा गांधी को बगदाद में स्थायी आवास की पेशकश सद्दाम ने की थी। पोखरण द्वितीय (मई, 1998) पर भाजपावाली राजग सरकार को सद्दाम ने बधाई दी थी, जबकि कई परमाणु शक्ति वाले राष्ट्रों ने आर्थिक प्रतिबन्ध लादे थे। सद्दाम के नेतृत्व वाली बाथ सोशलिस्ट पार्टी के प्रतिनिधि भारतीय राजनैतिक पार्टियों के अधिवेशनों में शिरकत करते रहे। भारतीय राजनेताओं को स्मरण होगा कि भारतीय रेल के असंख्य कर्मियों को आकर्षक रोजगार सद्दाम ने वर्षों तक ईराक में उपलब्ध कराए। उत्तर प्रदेश सेतु निर्माण निगम ने तो ईराक से मिले ठेकों द्वारा बहुत लाभ कमाया। पैंतीस लाख अप्रवासी भारतीय श्रमजीवी सालाना एक खरब रुपये भारत भेजते थे। भारत को ईराकी तेल सस्ते दामों पर मुहय्या होता रहा। इस सुविधा का दुरूपयोग करने में कांग्रेसी विदेश मंत्री नटवर सिंह जैसे लोग तक नहीं चूके थे। आक्रान्त ईराक के तेल पर कई भारतीयों ने बेशर्मी से चाँदी काटी।

    सद्दाम को जार्ज बुश ने सेटन (शैतान) कहा था। टिकरीती गाँव का एक यतीम तरूण सद्दाम हुसैन अपने चाचाओं की कृपा पर पला। पैगम्बरे इस्लाम की पुत्री फातिमा का यह वंशज जब मात्र उन्नीस वर्ष का था तो बाथ सोशलिस्ट पार्टी में भर्ती हुआ। श्रम को उचित महत्व देना उसका दर्शन था। अमरीकी फौजों ने इस अपदस्थ राष्ट्रपति की जो मूर्तियां ढहा दी है, उनमें सद्दाम हुसैन हंसिया से बालियाँ काटते और हथौड़ा चलाते दिखते थे। अक्सर प्रश्न उठा कि सद्दाम हुसैन ईराक में ही क्यों छिपे रहे ? क्योंकि उन्होंने हार मानी नहीं, रार ही ठानी थी। अमूमन अपदस्थ राष्ट्रनेतागण स्विस बैंक में जमा दौलत से विदेश में जीवन बसर करते हैं। बगदाद से पलायन कर सद्दाम भी कास्त्रों के क्यूबा, किम जोंग इल के उत्तरी कोरिया अथवा चेवेज़ के वेनेजुएला में पनाह पा सकते थे। ये तीनों अमरीका के कट्टर शत्रु रहे । जब अमरीकी सैनिकों ने भूमिगत पुरोधा को पकड़ा था, पूछा कि आप कौन हैं? तो इसी दृढ़ता से सद्दाम का सधा जवाब था, ‘‘ईराक का राष्ट्रपति हूँ।’’

    भारत के सेक्युलर मुसलमानों को फख्र होगा याद करके कि ईराक में बुर्का लगभग लुप्त हो गया था। नरनारी की गैरबराबरी का प्रतीक यह काली पोशाक सद्दाम के ईराक में नागवार हो गई थी। कर्बला, मौसूल, टिकरीती आदि सुदूर इलाकों में मुझे बुर्का दिखा ही नहीं। स्कर्ट और ब्लाउज़ राजधानी बगदाद में आम लिबास था। माथे पर वे बिन्दिया लगाती थीं और उसे हिन्दिया कहती थीं। आधुनिक स्कूलों में पढ़ती छात्राओं, मेडिकल कालेजों में महिला चिकित्सकों और खाकी वर्दी में महिला पुलिस और सैनिकों को देखकर आशंका होती थी कि कहीं सेक्युलर भारत से आगे यह इस्लामी देश न बढ़ जाए।

    आज अमरीका द्वारा थोपे गये ‘‘लोकतांत्रिक’’ संविधान के तहत सेक्युलर निज़ाम का स्थान कठमुल्लों ने कब्जाया है। नरनारी की गैरबराबरी फिर मान्य हो गई है। दाढ़ी और बुर्का भी प्रगट हो गये हैं। ईराकी युवतियों के ऊँचे ललाट, घनी लटें, गहरी आंखें, नुकीली नाक, शोणित कपोल, उभरे वक्ष अब छिप गये। यदि आज बगदाद में कालिदास रहते तो वे यक्ष के दूत मेघ के वर्ण की उपमा एक सियाह बुर्के से करते। ईराक में ठीक वैसा ही हुआ जो सम्राट रजा शाह पहलवी के अपदस्थ होने पर खुमैनी राज में ईरान में हुआ, जहां चांद को लजा देने वाली पर्शियन रमणियां काले कैद में ढकेल दी गईं। इराक के नये संविधान में बहुपत्नी प्रथा, जुबानी तलाक का नियम और जारकर्म पर केवल स्त्री को पत्थर से मार डालना फिर से कानूनी बन गया हैं। लेकिन भाजपाई नेता जो मोहम्मद अली जिन्ना को सेक्युलर के खिताब से नवाज चुके हैं, सद्दाम हुसैन को सेक्युलर नहीं मानेंगे। उसके कारण भी हैं। सद्दाम हुसैन सोशलिस्ट थे| नित्य नमाज अता करते थे। कुरान की प्रति अपने साथ रखते थे। पैगम्बर के साथ ईसा मसीह का नाम लेते थे। मगर यहूदियों को शत्रु मानते थे।

    अब पुरोगामी मुस्लिम राष्ट्रों ने अमरीकी साम्राज्यवादी के साथ साजिश कर ईराक को फिर से मध्ययुग में ढकेल दिया।

    प्रत्येक नेक मुसलमान को और दुनिया के प्रगतिशीलों को सद्दाम बहुत याद आते रहेंगे|

    K Vikram Rao
    Mobile -9415000909
    E-mail –k.vikramrao@gmail.com

  • विचारधारा की कंगाली से डूबती कांग्रेस

    विचारधारा की कंगाली से डूबती कांग्रेस

    भोपाल,12 मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)। ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आने और फिर राज्य सभा भेजे जाने की तैयारी ने देश के तमाम राजनैतिक पंडितों को चकित कर दिया है। अपने समर्थक विधायको के साथ कांग्रेस छोड़ने से मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार संकट में घिर गई है। सरकार को पतन से बचाने के लिए जो डैमेज कंट्रोल के प्रयास किए जा रहे हैं उन पर गौर करें तो साफ तौर पर यही उभरता है कि कांग्रेस ने अपनी हार मान ली है और वह एक लूजर की तरह कुतर्क गढ़ने का प्रयास कर रही है।

    बैंगलोर के रिसार्ट में ज्योतिरादित्य सिंधिया के जिन विधायकों को प्रशिक्षण सत्र में रखा गया है वहां जाकर सरकार बचाने की गुहार लगाने पहुंचे कमलनाथ कैबिनेट के सदस्य जीतू पटवारी ने एक पुलिस अधिकारी से बदतमीजी शुरु कर दी। प्रायोजित कैमरे के सामने की गई इस बहस को जीतू पटवारी से दुर्व्यवहार करना बताया गया। यहां प्रेस वार्ता में दिग्विजय सिंह ने कहा कि विधायकों को बंदी बनाकर रखा गया है ये लोकतंत्र की हत्या है। जबकि उनके कानूनी सहयोगी विवेक तन्खा ने कहा कि विधायकों के अपहरण को लेकर उनकी पार्टी अदालत जाएगी।

    अपना सबसे बड़ा स्तंभ भरभराकर गिर जाने पर सफाई देते राहुल गांधी ने कहा कि ज्योतिरादित्य मेरे साथ पढ़े हैं मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूं। वे अपने भविष्य को लेकर चिंतित हो गए थे इसलिए उन्होंने भाजपा में जाने जैसा कदम उठाया। वहां न तो उन्हें आदर मिलेगा और न ही वे आत्मसम्मान बरकरार रख पाएंगे।

    राजनीति की इस चौपड़ पर भाजपा ने कांग्रेस को न केवल शह दी बल्कि एमपी में उसकी सरकार की नींव खोदकर उसे मात भी दे दी है। जिस विचारधारा की बात राहुल गांधी कह रहे हैं उसे देश की जनता ने बहुत पहले ही छोड़ दिया था। तभी तो देश के कई राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं और केन्द्र में लगातार दूसरी बार जनता ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को दूसरी बार सत्ता में भेजा है। जाहिर है कि उसी कड़ी में ज्योतिरादित्य का कांग्रेस छोड़ना विचारधारा के इसी पतन का उद्घोष बन गया है।

    कांग्रेस की जिस विचारधारा की बात राहुल गांधी कर रहे हैं उसे तो पीवी नरसिम्हाराव की सरकार ने 1991 में ही छोड़ दिया था। तब तत्कालीन वित्तमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने जिस मुक्त बाजार वाली अर्थव्यवस्था को हरी झंडी दिखाई थी उसने कांग्रेस की खैरात बांटने वाली नीति को समाप्त कर दिया था। इंस्पेक्टर राज की समाप्ति की घोषणा करके उन्होंने ये तो बता दिया था कि देश अब नई दिशा में चल पड़ा है। देश के लोगों को पूंजी बनाने में अपना योगदान देना होगा। खैरात के नाम पर देश के गले में मुर्दा बनकर लटकने का दौर खत्म हो गया है। ये बात जरूर है कि कांग्रेस की पुरानी साम्यवादी, समाजवादी छाया वाली मानसिकता,अवसरवाद और अंग्रेजों की गुलामी भरी चापलूसी की सोच की कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार सार्वजनिक रूप से निंदा नहीं की थी। उन्होंने सिर्फ यही कहा कि आने वाले भारत के निर्माण के लिए हमें अब नए मार्ग पर चलना होगा।

    इसके विपरीत राहुल गांधी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के फैसले पर सवालिया निशान लगाते समय उनके उन समर्थक विधायकों मंत्रियों को भी दोषी ठहरा दिया जिन्होंने कांग्रेस की सोच को ठुकराने का फैसला लिया। ऐसा कहकर वे देश के उन करोड़ों लोगों की मानसिकता को भी दोषी ठहरा रहे हैं जिन्होंने भाजपा को सत्ता में भेजकर देश चलाने का अवसर दिया है। एक अपरिपक्व नेता की तरह बचकानी भूमिका निभाते राहुल गांधी ने तो लोकसभा चुनावों के दोरान बदतमीजी की सीमाएं लांघ डालीं थी। उनकी ही शैली की नकल करते हुए कमलनाथ ने मध्यप्रदेश में विधायकों, अफसरों और नागरिकों को दोषी ठहराने की मुहिम चलाई थी। शुद्ध के लिए युद्ध के नाम पर व्यापारियों को दोषी ठहराना, अफसरों के तबादले करके पोस्टिंग में मोटा चंदा लेकर उन्हें अपराधी साबित करना, पत्रकारों को दूसरा धंधा करने की सलाह देकर पूरी पत्रकारिता को कटघरे में खड़ा करना, माफिया के विरुद्ध संग्राम का शोर मचाकर हर उद्यमी को अपराधी बताने जैसी हरकतें कांग्रेस की उस मूल विचारधारा का ही हिस्सा रहीं हैं जिस पर आजादी के बाद से कांग्रेस चलती रही है। गौर से देखें तो अंग्रेजों के विरुद्ध जब देश के सामंतों जमींदारों और राजाओं ने स्वाधीनता संग्राम चलाया था तब अंग्रेजों ने शाक एब्जार्बर के रूप में कांग्रेस को खड़ा किया था। इसी कांग्रेस के हाथों देश की सत्ता सौंपकर अंग्रेजों ने परोक्ष तौर पर सामंतों और राजाओं पर निशाना साधा। बाद में इंदिरागांधी ने रोटी कपड़ा और मकान का स्वप्न दिखाकर मिलावटियों और जमाखोरों पर निशाना लगाया। अस्सी के दशक की उम्र पहुंचे कमलनाथ आज भी उसी फाम्रूले को दुहराकर शासन चलाना चाह रहे थे। जिसे देश और प्रदेश के तमाम लोगों ने ठुकरा दिया है।एमपी के विधायकों और मंत्रियों ने तो खुलकर इस विचारधारा का विरोध किया है। इसके बावजूद राहुल गांधी इसे सही बताकर ज्योतिरादित्य को गलत साबित करने पर तुले हुए हैं।

    देश की आम जनता को विविधता के नाम पर जातियों, वर्गों,संप्रदायों में बांटकर देखने की सोच आज के कारोबारी दौर में कैसे जारी रखी जा सकती है। इसके बावजूद कई बार असफल साबित हो चुकी इस सोच को कांग्रेस जबरिया देश पर लादना चाह रही है।

    राहुल गांधी और उनका दंभ एक पल भी विचार करने तैयार नहीं हैं कि एक साथ देश का बड़ा वर्ग उन्हें क्यों धक्के मारकर सत्ता से बाहर कर रहा है। दरअसल कांग्रेस की विचारधारा मौलिक नहीं थी बल्कि वह समय काल और परिस्थितियों की उपज थी। अंग्रेजों ने कांग्रेस को जिस मकसद के लिए खड़ा किया उसके तहत उसे बड़े लोगों पर हमला करके उन्हें शोषक साबित करना था और गरीब को सहलाकर उसका समर्थन हासिल करना था। इसके लिए जरूरी था कि समर्थन देने वाला बहुसंख्यक वर्ग गरीब ही रहे ताकि ज्यादा से ज्यादा वोट हासिल किए जा सकें। पूंजीवाद ने इस विचारधारा को बदल दिया है। ज्योतिरादित्य का पाली बदलने का वर्तमान फैसला इसी सोच की देन है। देश को गरीबी के दलदल से बाहर निकालने वाले तमाम विचारक आज मोदी सरकार की सोच से सहमत हैं। इसलिए ज्योतिरादित्य सिंधिया के फैसले पर नहीं बल्कि राहुल गांधी की सोच पर आश्चर्य करने की जरूरत है। वे गहरी जड़ता के शिकार हैं और बंदरिया के मृत बच्चे की तरह मर चुकी सोच को गले लगाकर बैठ गये हैं। राहुल सोनिया कांग्रेस की यही जड़ता कांग्रेस के पतन की वजह बन गई है।इसी सोच पर चल रही कमलनाथ सरकार आज अल्पमत में आ चुकी है शेष कांग्रेसी राज्यों में भी यही सोच सरकारों के पतन की वजह बनने जा रही है ये आने वाले समय में साफ नजर आने लगेगा।

  • आबादी बढ़ी नहीं माफिया को खुश करने ले आए नया मास्टर प्लान

    आबादी बढ़ी नहीं माफिया को खुश करने ले आए नया मास्टर प्लान

    भोपाल,05 मार्च,(प्रेस सूचना केन्द्र)।भोपाल का विजन डाक्यूमेंट बताकर जारी किया गया नया मास्टर प्लान भू माफिया और ठेकेदारों की लाबी में उत्साह की वजह बन गया है। बजट से पहले कमलनाथ सरकार इसे अपना नवाचार बताकर इसे हर जिले और निकायों तक जारी करने की तैयारी कर रही है। जबकि दिग्विजय सिंह इसे लोकसभा चुनावों के दौरान जनता से किया गया अपना वादा पूरा करना बताकर वाहवाही लूटने का प्रयास कर रहे हैं। इस उछलकूद के बीच हकीकत ये है कि 1995 में जिस मास्टर प्लान को वर्ष 2005 के लिए घोषित किया गया था उसे शहर की आबादी 20 लाख होने तक के लिए पर्याप्त बताया गया था जबकि अभी 2020 तक भी शहर की आबादी 18 लाख नहीं हो पाई है इसके बावजूद नया मास्टर प्लान जारी कर दिया गया है।

    नगरीय प्रशासन मंत्री जयवर्धन सिंह ने आज भोपाल के मिंटो हाल में जो 2031 तक का प्रारूप जारी किया है उसमें अभी ये तय नहीं हो पाया है कि आधारभूत ढांचे के विकास के लिए आवश्यक धनराशि कहां से आएगी और उसे समयबद्ध रूप से कब तक पूरा किया जा सकेगा। सरकार जमीन के जिस मिश्रित भूमि उपयोग का ढिंढोरा पीट रही है वो दरअसल अराजकता और माफिया की मिलीभगत का ज्वलंत उदाहरण है। नगर तथा ग्राम निवेश संचालनालय के नगर निवेशकों का कहना है कि बीस मीटर चौड़ी सड़कों के रहवासी उपयोग की जमीनों को इस नए प्लान के अनुसार कमर्शियल किया जा सकेगा। जबकि जिन लोगों ने रहवासी इलाके में जमीनें खरीदकर मकान बनाए थे इस नियम से उनकी शांति छिन जाएगी और उनके घरों के आसपास व्यावसायिक आपाधापी शुरु हो जाएगी। नगर निवेश के नियमों के मुताबिक हर विकास प्लान में रहवासी इलाके के नजदीक व्यावसायिक उपयोग के लिए जमीन आरक्षित की जाती है। उसका रहवासी इलाके पर कोई प्रभाव भी नहीं पड़ता है, जबकि इस मास्टर प्लान में भू माफिया की गैरकानूनी गतिविधियों को संरक्षण देने के लिए बेजा छूट दी जा रही है।

    मध्यप्रदेश भूमि विकास नियम 2012 की धारा 9-10-11 के अनुसार जो लोग अनुमति लिए बगैर निर्माण कर रहे हैं या निर्माण कर चुके हैं वे सभी अवैध गतिविधियों के भागीदार होंगे। जिन्होंने भवन अनुज्ञा का पालन नहीं किया है उनके निर्माण अवैध हैं और शासन के राजस्व को क्षति पहुंचाने की मंशा के कारण ढहाए जाने योग्य हैं। इसके बावजूद नगर तथा ग्राम निवेश विभाग के अफसरों की मिलीभगत से उनके विरुद्ध कार्रवाई नहीं की गई है।

    नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम 1973 में साफ निर्देशित किया गया है कि जो व्यक्ति भूमि उपयोग के विरुद्ध निर्माण कार्य करेगा उसे सक्षम अधिकारी के निर्देश पर अर्थदंड से दंडित किया जाएगा। इस अपराध के लिए आरोपी को जेल भेजने तक का प्रावधान है। यही वजह है कि नगर तथा ग्राम निवेश विभाग के अफसर अतिक्रमणकारियों से सांठ गांठ करके आंखें मूंद लेते हैं। कर्तव्यहीनता करने वाले ऐसे अधिकारियों पर कार्रवाई किए बगैर नया मास्टर प्लान पूरी तरह औचित्य हीन है। अवैध निर्माण के ये कार्य बाकायदा अखबारों में इश्तेहार प्रकाशित करवाकर किए जा रहे हैं। ऐसे निर्माण खरीदे और बेचे जा रहे हैं इसके बावजूद सरकार नए मास्टर प्लान की कहानियां सुनाकर खुद को कर्तव्यनिष्ट बताने का प्रयास कर रही है।

    शासकीय भूमि के रखरखाव की जवाबदारी जिला प्रशासन के अधिकारियों की भी है। कई मामलों में नगर तथा ग्राम निवेश विभाग की ओर से जिला प्रशासन को अनुरोध भी किया लेकिन प्रशासनिक अधिकारी उस पर मौन साधकर बैठ जाते हैं। जब प्रशासनिक अमला शासकीय भूमियों के रखरखाव में असफल साबित हो रहा है तो फिर ऐसे मास्टर प्लानों का औचित्य क्या रह जाता है। जिला प्रशासन के अधिकारियों की लापरवाही के लिए उनके विरुद्ध भ्रष्ट आचरण अधिनियम और भू राजस्व संहिता के नियमों के तहत कार्रवाई न करके सरकार और शासन की ओर से गंभीर अनियमितताएं की जा रहीं हैं। इससे जहां शासन को भू राजस्व की क्षति हो रही है वहीं कई अवैध कालोनियां नागरिकों के लिए कई समस्याओं की वजह भी बनती जा रहीं हैं। इसके बावजूद सरकार मास्टर प्लान को जादुई चिराग साबित करने का प्रयास कर रही है।

    विद्वान राजा भोज ने लगभग 1000 साल पहले जिस भोजताल का निर्माण करवाकर पेयजल का बड़ा स्रोत विकसित किया था मौजूदा सरकारें उनके जल ग्रहण इलाकों में अतिक्रमणों पर भी रोक नहीं लगा पा रहीं हैं। ऐसे ही कई अतिक्रमणकारी सरकार के सहयोगी बने हुए हैं। जिस गति से जलग्रहण क्षेत्र में निर्माण को मंजूरियां मिलती रहीं हैं उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि अगले कुछ सालों में तालाब की मौत हो जाएगी। यही नहीं जल ग्रहण क्षेत्र में बनने वाले निर्माणों की वजह से नागरिकों को कई समस्याओं का भी सामना करना पड़ेगा जो मास्टर प्लान की मूल भावना के विपरीत हैं। जिस तरह जलग्रहण इलाकों में रासायनिक और कीटनाशकों के सहारे खेती की जा रही है उससे पेयजल में कई विषैले तत्व मिलने लगे हैं जिनके निवारण के लिए मास्टर प्लान में कोई प्रावधान नहीं किए गए हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि नया मास्टर प्लान आपाधापी में जारी किया है और इससे भू माफिया को अमीर बनाने का प्रयास किया जा रहा है।

    नगरीय प्रशासन मंत्री के अनुसार देश का पहला जीआईएस आधारित मास्टर प्लान राजधानी भोपाल में आकार लेगा। नगरीय विकास एवं आवास मंत्री श्री जयवर्द्धन सिंह और जनसम्पर्क मंत्री श्री पी.सी. शर्मा ने मिन्टो हॉल में भोपाल मास्टर प्लान-2031 के प्रारूप का लोकार्पण किया। मंत्री श्री सिंह ने कहा कि मुख्यमंत्री कमल नाथ के नेतृत्व में राज्य शासन ने मात्र 14 माह में भोपाल विकास योजना का प्रारूप जन-सामान्य के समक्ष प्रस्तुत कर दिया है। उन्होंने कहा कि वर्ष 1995 में लागू विकास योजना की अवधि वर्ष 2005 तक थी। वर्ष 2005 से अब तक भोपाल में चली विकास गतिविधियाँ किसी योजना के अनुरूप नहीं हो पाईं। उन्होंने कहा कि भोपाल विकास योजना-2031 के प्रारूप में 1017 वर्ग किलोमीटर योजना क्षेत्र तथा 35 लाख जनसंख्या के मान से प्रावधान किया गया है। प्रारूप में आउटर और इनर रिंग रोड के प्रावधान के साथ अन्य सड़कों के विकास के लिये बेटरमेंट चार्जेस की व्यवस्था की गई है। प्रारूप mptownplan.gov.in पर उपलब्ध है। इस पर नागरिकों से सुझाव आमंत्रित किये गये हैं। सुझाव ऑनलाइन दिये जा सकते हैं।

    इस प्रारूप में राजधानी की प्राकृतिक सुंदरता और जल-संरचनाओं को सुरक्षित और संवर्धित करने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। योजना क्षेत्र के हरित और वन क्षेत्र में वृद्धि राज्य शासन की प्राथमिकता और प्रतिबद्धता है। नगरीय विकास मंत्री ने कहा कि भोपाल की सांस्कृतिक-ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित रखना हमारी प्राथमिकता में शामिल है। इस क्रम में बड़ा तालाब क्षेत्र के विकास के लिये लेक डेव्हलपमेंट अथॉरिटी का गठन किया जायेगा। शासन की मंशा बड़ा तालाब के लेक फ्रंट को जिनेवा या मुम्बई के मरीन ड्राइव के समान विकसित करने की है। उन्होंने स्मार्ट सिटी क्षेत्र में 23.5 हेक्टेयर क्षेत्र में पार्क तथा वन संरचनाएँ विकसित करने के प्रावधान की जानकारी देते हुए बताया कि स्मार्ट सिटी क्षेत्र में लगभग 50 हजार पौधे लगाये जायेंगे।

    श्री सिंह ने कहा कि विकास योजना में युवा पीढ़ी को बेहतर व्यवस्थाएँ देने के लिये एजुकेशनल- यूथ हब बनाने का प्रावधान किया गया है। योजना में स्लम-फ्री भोपाल की अवधारणा पर कार्य किया जायेगा। स्लम के स्थान पर हाईराइज बिल्डिंग बनाई जायेंगी, जिनमें स्लम में रहने वाले लोगों को शिफ्ट किया जायेगा।

    नगरीय विकास एवं आवास मंत्री श्री जयवर्द्धन सिंह ने कहा कि प्रारूप पर जन-सामान्य के सुझाव आमंत्रित किये गये हैं। प्रारूप की विस्तृत जानकारी भोपाल संभागायुक्त कार्यालय, कलेक्टर कार्यालय, नगर निगम तथा कार्यालय संयुक्त संचालक नगर तथा ग्राम निवेश में प्रदर्शित की जायेगी।

    जनसम्पर्क मंत्री श्री पी.सी. शर्मा ने यातायात के दबाव को कम करने के लिये मुम्बई की सी-लिंक के समान भोपाल में बड़े तालाब पर श्यामला हिल्स क्षेत्र से टी-लिंक विकसित करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने सदर मंजिल को संरक्षित कर मिन्टो हॉल के समान विकसित करने का सुझाव दिया। विधायक श्री आरिफ मसूद ने भी सम्बोधित किया।

    प्रमुख सचिव नगरीय विकास एवं आवास श्री संजय दुबे ने विकास योजना की मुख्य विशेषताओं जैसे नगर की बाहरी परिधि की ओर विकास द्वारा जनसंख्या को उस क्षेत्र में बसने के लिये प्रोत्साहित करने, वाहन क्षमता के अनुसार विकास योजना, पार्किंग प्रावधानों में सुधार, ऐतिहासिक तथा पर्यावरण धरोहरों के संरक्षण और प्रीमियम तल क्षेत्र अनुपात द्वारा राजस्व वृद्धि और टीडीआर के माध्यम से राजस्व की बचत संबंधी प्रावधानों पर प्रकाश डाला। संचालक नगर तथा ग्राम निवेश श्री स्वतंत्र सिंह ने मास्टर प्लान की विस्तार से जानकारी दी।

  • जनता से माफी मांगे दिग्विजय सिंह

    जनता से माफी मांगे दिग्विजय सिंह

    भोपाल(प्रेस सूचना केन्द्र)। पिछले दो दिनों से मुख्यमंत्री कमलनाथ और दिग्विजयसिंह ने भाजपा पर विधायकों को बंधक बनाने, लालच देने और सरकार गिराने के जो आरोप लगाए हैं, वे बेहद निंदनीय और घटिया हैं। ये कांग्रेस की उस मानसिकता को प्रकट करते हैं, जिसे लोकतंत्र में स्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐसा करके मुख्यमंत्री कमलनाथ और दिग्विजयसिंह ने न सिर्फ भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं बल्कि उन विधायकों का भी अपमान किया है, जो लाखों लोगों द्वारा चुने गए हैं। दुर्भाग्य से इन विधायकों में कांग्रेस के विधायक भी शामिल हैं। कांग्रेस का झूठ अब पूरी तरह उजागर हो गया है। राज्यसभा चुनाव की आपाधापी में यह शर्मनाक हरकत करने के लिए कांग्रेस के नेताओं को जनता, विधायकों और भाजपा कार्यकर्ताओं से माफी मांगनी चाहिए। यह बात भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष व सांसद श्री विष्णुदत्त शर्मा ने विधायकों द्वारा भाजपा पर लगाए जा रहे आरोपों को गलत बताए जाने पर मीडिया के सामने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कही।

    श्री शर्मा ने कहा कि पिछले एक-सवा साल में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार हर मोर्चे पर असफल रही है। इस सरकार ने जनहित का कोई काम नहीं किया है। सरकार और कांग्रेस के नेता अलग-अलग तरीकों से लूट-खसोट में लगे हुए हैं। सत्ता में आने के पहले जनता से जो वादे किए थे, उनमें से किसी वादे को पूरा नहीं किया। कांग्रेस सरकार ने इन सभी मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने, उसे भ्रमित करने के लिये यह राजनीतिक प्रपंच रचा था, ताकि जनता बाकी सब बातें भूल जाए। लेकिन इस तरह की निंदनीय हथकंडेबाजी को भारतीय जनता पार्टी सहन नहीं करेगी और कमलनाथ सरकार को इसका करारा जवाब देगी।

    प्रदेश अध्यक्ष श्री शर्मा ने कहा कि गोएवल्स ने कहा था कि एक झूठ को स्थापित के लिये 100 झूठ बोलना पड़ता है। कांग्रेस के नेता गोएवल्स की संतानों के गिरोह के रूप में उभरे हैं और उनके इस सिद्धांत को चरितार्थ कर रहे हैं। श्री शर्मा ने कहा कि कांग्रेस की हमेशा यही कोशिश रहती है कि कैसे झूठ बोला जाए। कमलनाथ सरकार झूठ बोलकर ही सत्ता में आई और अब सत्ता में बने रहने के लिये सौ झूठ का सहारा ले रही है। वहीं, पर्दे के पीछे से सरकार चलाने वाले मिस्टर बंटाढार दिग्विजय सिंह लगातार झूठ बोलते रहते हैं।

    श्री शर्मा ने कहा कि जिन विधायकों को प्रलोभन देने के आरोप लगाए जा रहे थे, उन सभी को मुख्यमंत्री आवास पर बुलाकर दबाव डाला गया। इसके बावजूद उन विधायकों का कहना है कि हमें भाजपा की ओर से कोई ऑफर नहीं मिला और न ही कोई हमें लेकर गया था। यह इस बात का प्रमाण है कि दिग्विजय सिंह और कमलनाथ सहित तमाम नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी को बदनाम करने के लिए झूठ फैलाया था। श्री शर्मा ने कहा कि सच्चाई क्या है, इसे कांग्रेस के नेता भी जानते हैं। कमलनाथ के मंत्री उमंग सिंगार ने कहा है कि यह सब कांग्रेसी खेमे में चल रही राज्यसभा जाने की लड़ाई है। सांसद विवेक तन्खा मानते हैं कि कांग्रेस के भीतर भारी असंतोष है, उसी के परिणामस्वरूप यह स्थितियां बन रही हैं, इसलिए मुख्यमंत्री को कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोड़ देना चाहिए। मंत्री प्रदीप जायसवाल कहते हैं कि सरकार जाए या रहे, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। दिग्विजय सिंह के अनुज विधायक लक्ष्मण सिंह ईश्वर से दुआ कर रहे हैं कि मुख्यमंत्री को सद्बुद्धि आ जाए। वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया कहते हैं कि मुझे किसी हॉर्स ट्रेडिंग की जानकारी नहीं है। विधायक रामबाई का कहना था कि मुझे कोई कैसे उठा सकता है? कुल मिलाकर यह पूरा प्रपंच कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई का ठीकरा भाजपा पर फोड़ने के लिये रचा गया था।

    श्री शर्मा ने कहा कि जब से कमलनाथ सरकार बनी है, इसमें लगातार अंर्तद्वंद और अंर्तकलह चल रहा है। प्रदेश की जनता कांग्रेस सरकार को समझ चुकी है। यह सरकार माफियाओं की सरकार है। इन्होंने एक माफिया पर हाथ डाला और बाकी 99 माफियाओं से वसूली की है। भाजपा की सरकार ने कभी ऐसा नहीं किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस एक डूबता जहाज है और सभी इससे भाग रहे हैं। उन्होंने कहा कि दिग्विजय सिंह की वास्तविकता पूरा देश अच्छी तरह से जानता है। वे कितना झूठ बोलते हैं, किस तरह के देशद्रोही बयान देते, जनता को सब पता है। उन्होंने कहा कि दिग्विजयसिंह उन लोगों के साथ खड़े होते हैं, जो देश तोड़ने और आजादी के नारे लगाते हैं।

  • सीएनएन के पत्रकार अगोस्टा से ट्रंप की तीखी तकरार

    सीएनएन के पत्रकार अगोस्टा से ट्रंप की तीखी तकरार

    नई दिल्ली, 26 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के संवाददाता सम्मेलन में उनके और सीएनएन के पत्रकार जिम अकोस्टा के बीच तीखी बहस सामने आई। अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस टीवी नेटवर्क की ईमानदारी पर सवाल खड़े किए थे।पलटवार करते हुए रिपोर्टर ने कहा कि मुझे लगता है कि हमारा सच बताने का रिकॉर्ड आपके रिकॉर्ड से काफी बेहतर है।अकोस्टा ने ट्रंप से पूछा कि क्या वह आगामी राष्ट्रपति चुनाव में किसी भी विदेशी हस्तक्षेप को नकारने का संकल्प लेंगे। सीएनएन पत्रकार ने नए कार्यवाहक राष्ट्रीय खुफिया निदेशक की नियुक्ति के फैसले पर भी सवाल उठाया उनका कहना था कि जिन्हें ये जवाबदारी दी गई है उन्हें किसी भी किस्म का खुफिया अनुभव नहीं है।

    जवाब में ट्रंप ने कहा कि वह किसी देश से कोई मदद नहीं चाहते और उन्हें किसी देश से मदद नहीं मिली है। ट्रंप ने सीएनएन द्वारा पिछले दिनों एक गलत सूचना जारी करने पर खेद जताए जाने का भी जिक्र किया।जिसके आधार पर उन्होंने सीएनएन की विश्वसनीयता को ही कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया था।

    Jim Acosta Journalist CNN

    अकोस्टा ने इस पर कहा, ‘राष्ट्रपति महोदय, मुझे लगता है कि हमारा सच बताने का रिकॉर्ड आपके रिकॉर्ड से काफी बेहतर है।’ बहस बढ़ने लगी और ट्रंप ने कहा, ‘मैं आपको आपके रिकॉर्ड के बारे में बताता हूं। आपका रिकॉर्ड इतना खराब है कि आपको उस पर शर्म आनी चाहिए।’

    अकोस्टा ने कहा, ‘मुझे किसी बात पर शर्म नहीं आती और हमारा संस्थान भी शर्मिंदा नहीं है।’ अमेरिकी राष्ट्रपति ने सीएनएन पर प्रसारण के मामले में सबसे खराब रिकॉर्ड होने का भी आरोप लगाया। अकोस्टा और ट्रंप के बीच पहले भी कई बार कहासुनी हो चुकी है।

    पहले भी ट्रंप और अकोस्टा की हो चुकी है भिड़ंत
    बता दें कि व्हाइट हाउस ने 2018 में एक संवाददाता सम्मेलन में हुई बहस के बाद अकोस्टा के प्रेस पास को निलंबित कर दिया था। उनके व्हाइट हाउस में प्रवेश पर रोक लगा दी गई थी। ट्रंप प्रशासन ने प्रेस पास पर पाबंदी जारी रखी, लेकिन टीवी नेटवर्क ने इस मामले में व्हाइट हाउस पर मुकदमा दर्ज किया जिसके बाद एक न्यायाधीश ने उनके पास को बहाल कर दिया था।

  • कमलनाथ की कलाकारी की इकानामी और कटौती का रुदन

    कमलनाथ की कलाकारी की इकानामी और कटौती का रुदन

    मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार ने जनता से जुड़ी योजनाओं में कटौती करके बाजार में सूनापन ला दिया है। बजट की तैयारी में जुटे वित्तमंत्री तरुण भनोट भी कह रहे हैं कि केन्द्र की भाजपा सरकार ने फरवरी 2019 में जारी बजट अनुमान में मध्यप्रदेश को 63,750.81 करोड़ राशि आवंटित की थी। वर्ष 2020 के फरवरी माह के पुनरीक्षित अनुमान में यह राशि घटाकर 49,517.61 करोड़ कर दी गई। जोकि 14,233 करोड़ रुपए कम है।देश भर में कांग्रेस से जुड़े औद्योगिक घराने हों या व्यापारिक प्रतिष्ठान सभी बेरोजगारी के आंकड़े बढ़ाने का अभियान चलाए हुए हैं। वे ये जताने की कोशिश कर रहे हैं कि मोदी सरकार ने समानांतर अर्थव्यवस्था को खत्म करने का जो अभियान नोटबंदी से चलाया था वह असफल हो गया है। इसकी वजह से कंपनियां बंद हो रहीं हैं और रोजगार के साधन छिन गए हैं। राज्यों से मिलने वाली राशि का हिस्सा केन्द्र ने घटा दिया है जिससे राज्यों में वित्तीय संकट आ गया है। इस जैसी कई कहानियों से कमलनाथ सरकार अपनी असफलताओं पर पर्दा डालने का प्रयास कर रही है। जनता को बरगलाने वाले उनके धूर्त पहरुए भी यही डमरू बजा रहे हैं। हकीकत इससे बिल्कुल विपरीत है।

    हाल ही में पूर्व केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा राजधानी आए और उन्होंने केंद्रीय बजट में मध्यप्रदेश की हिस्सेदारी कम किए जाने के आरोप का जवाब देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री कमल नाथ का कटौती वाला बयान पूरी तरह राजनीतिक है।वास्तव में राज्य सरकार केंद्र की योजनाओं के पैसे का न तो उपयोग कर रही है, न ही उपयोगिता प्रमाणपत्र दे रही है. केंद्र की कोई भी योजना हो, उसका पैसा इसलिए उपलब्ध है क्योंकि केन्द्र ने उनके लिए स्पष्ट प्रावधान किए हैं,जबकि राज्य की सरकार योजनाओं का काम ही आगे नहीं बढ़ा रही है.”

    जयंत सिन्हा ने कहा कि केंद्र सरकार हर कदम पर मध्यप्रदेश के लोगों के साथ खड़ी है और मौजूदा बजट में भी प्रदेश के किसानों के लिए, सिंचाई सुविधाओं के लिए, नेशनल हाइवे और एयरपोर्ट के विकास के लिए कई प्रावधान किए गए हैं।उन्होंने केंद्रीय बजट की प्रशंसा करते हुए कहा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने जो बजट प्रस्तुत किया , उसमें देश के, समाज के हर वर्ग को लाभ मिल रहा है, इसलिए यह जन-जन का बजट है. समाज के गरीब तबके को पक्का घर देने के बाद केंद्र सरकार ने अब हर नल में जल पहुंचाने की व्यवस्था की है, तो गृहिणियों को महंगाई से राहत देने, कुकिंग गैस उपलब्ध कराने और उनके खाते खोलने की व्यवस्था की गई है. उद्योगपतियों को कार्पोरेट टैक्स का फायदा है, तो मध्यम वर्ग को आयकर में राहत मिली है. युवाओं के लिए स्वरोजगार और स्किल डेवलपमेंट के प्रावधान हैं, तो इस बजट के माध्यम से निवेशकों की भी मदद की गई है.

    सिन्हा ने कहा, “प्रधानमंत्री मोदी ने देश की अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य तय किया है और हम उसी तरफ बढ़ रहे हैं. केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत बजट इसी लक्ष्य को हासिल करने का पॉलिसी रोडमैप है.”उन्होंने कहा कि बजट 2020-21 में उपभोग, निवेश और स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन दिया गया है. इसका लाभ तो सभी को मिलेगा ही, यह अर्थव्यवस्था के विकास और विस्तार को भी गति देगा. सरकार ने अर्थव्यवस्था के विकास को गति देने के लिए बजट में जो प्रावधान किए हैं, उससे विकास दर तेजी से बढ़ेगी और जल्द ही उसके 7.5 प्रतिशत पर पहुंच जाने की आशा है. केंद्र सरकार ने राजकोषीय घाटे को नियंत्रण में रखने के सफल उपाय किए हैं।

    दरअसल कांग्रेस की कमलनाथ सरकार पुरानी दो खातों वाली अर्थव्यवस्था को मजबूत बना रही है जिससे काला धन बनाया जाता रहा है। देश के सार्वजनिक बैंकों की 85 फीसदी से अधिक पूंजी चंद औद्योगिक घरानों के हाथों में थमाकर जो फर्जी विकास के प्रतिष्ठान खड़े किए गए थे उन पर एनपीए की राशि वसूली के अभियान और सरफेसी एक्ट के चलते तालेबंदी होने लगी है। इसके विपरीत रोजगार बढ़ाने के लिए जो राशि सीधे नव उद्यमियों को आबंटित की जा रही है उससे देश भारी पूंजीकरण हुआ है। कुप्रचार में भले ही बार बार बेरोजगारी की बात कही जा रही हो लेकिन हकीकत में जो राशि बाजार में पहुंची है उसने न केवल रोजगार के अवसर बढ़ाए हैं बल्कि उपभोक्ताओं की खरीद क्षमता भी बढ़ाई है। बैंकों के खजाने भर गए हैं और वे सस्ती दरों पर कर्ज देने के लिए उद्यमियों के चक्कर काट रहे हैं। जाहिर है कि नए स्टार्टअप कारोबार बढ़ाने में सहयोगी साबित हो रहे हैं।

    वित्त मंत्री तरुण भनोत का कहना है कि केन्द्रीय योजनाओं में राज्यों की हिस्सेदारी यूपीए सरकार के समय 25 प्रतिशत थी जिसे वर्तमान एनडीए सरकार ने बढ़ाकर 40 और कुछ योजनाओं में 50 प्रतिशत तक कर दिया था। इस प्रकार राज्य के अंशदान में 60 से 100 प्रतिशत तक की वृद्धि की गई है। ये सब कहते हुए वे केन्द्र पर ज्यादा पूंजी जुटाने का आरोप लगा रहे हैं। हकीकत ये है कि केन्द्र की योजनाओं का लाभ मध्यप्रदेश समेत देश के तमाम राज्यों को मिल रहा है। पूंजी के बढ़े उत्पादन का लाभ भी सीधे राज्यों को ही तो मिल रहा है।

    पूंजी के बढ़ते संसाधनों के बावजूद उद्योगपति कहे जाने वाले कमलनाथ और रेत के कारोबारों में भागीदारी करने वाले वित्तमंत्री तरुण भनोत जनता को तरसाकर वित्तीय संकट का रोना रो रहे हैं। वे ये समझने भी तैयार नहीं हैं कि उनके घटिया वित्तीय प्रबंधन से प्रदेश की तो विकास दर प्रभावित हो ही रही है साथ में देश की विकास दर भी अपेक्षाकृत तौर पर गति नहीं पकड़ पा रही है। कल्याणकारी योजनाओं में सीधी कटौती करके कमलनाथ सरकार जो तीन हजार करोड़ रुपए बचाने का दावा कर रही है उससे अधिक राशि वह उन फर्जी योजनाओं पर खर्च कर चुकी है जिनसे भारी तादाद में काला धन बन रहा है। इस काले धन के निवेश से चंद औद्योगिक घरानों को बुलाकर कमलनाथ ये जताने का प्रयास कर रहे हैं कि देश का उद्योग जगत उनके इशारे पर चलता है। हालांकि ये उद्योग वे ही हैं जो भारी तादाद में रोजगार छीनने के लिए जाने जाते रहे हैं। आईटीसी ने जिस अगरबत्ती और बीड़ी उद्योग पर कब्जा जमाकर करोड़ों मजदूरों का रोजगार छीना है उसे रोजगार प्रदाता बताने की कोशिश से कमलनाथ की नीतियों की पोल सरे बाजार खुल रही है।

    भारतीय जनता पार्टी के राज्यस्तरीय तमाम नेता पिछले पंद्रह सालों से कांग्रेस की उसी सरकारीकरण और चोर बाजार वाली अर्थव्यवस्था की पैरवी करते रहे हैं जिसकी वजह से भारतीय रुपए की साख नहीं बढ़ सकी थी। आज वे भारत सरकार की श्वेत इकानामी का रहस्य भी नहीं समझ पा रहे हैं। यही वजह है कि भाजपा के नेता कमलनाथ सरकार की नीतियों का खुला विरोध नहीं कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की वजह से भाजपा ने कई राज्यों की सत्ताएं गंवा दी हैं। जबकि हकीकत में उनकी नासमझी भरी पिछलग्गू नीतियों की वजह से देश की अर्थव्यवस्था तेजी नहीं पकड़ सकी थी। पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह जिस इंस्पेक्टर राज के कभी न लौटने की बात कहते थे उनकी ही पार्टी की कमलनाथ सरकार आज इंस्पेक्टर राज की सहायता से भारी तादाद में काला धन जुटा रही है। तबादलों और पोस्टिंग से मौजूदा सरकार ने जितना काला धन जुटाया है वही अपने आप में एक रिकार्ड है। इसके बावजूद ये काला धन स्थानीय उद्योग और रोजगार बढ़ाने में उपयोगी साबित नहीं हो पा रहा है। आज देश में जो वित्तीय टूल विकसित हो गए हैं उनकी वजह से काले कारोबारियों की धरपकड़ सरल हो गई है। ये बात जरूर है कि अमले की कमी की वजह से सभी पर कार्रवाई नहीं हो पा रही है लेकिन ये भी तय है कि आज नहीं तो कल वे जरूर धरे जाएंगे तब उन्हें कमलनाथ के छिंदवाड़ा माडल के छेद स्पष्ट नजर आने लगेंगे। जीएसटी और आयकर विभाग की क्षमता यदि नहीं बढ़ाई गई तो आर्थिक संकट का रोना रोते कांग्रेसी नेतागण देश को रूस जैसे पतन की राह पर ढकेलते रहेंगे।

  • वोट की तिजारत के दौर में कितना सुना जाएगा विष्णु का संघनाद

    वोट की तिजारत के दौर में कितना सुना जाएगा विष्णु का संघनाद

    भारतीय लोकतंत्र अब सिर्फ पूंजीवाद की ओर पींगें बढ़ा रहा है. इसका असर इतना व्यापक हो चला है कि चुनावी वादों के शोर में मूल्यों की राजनीति अप्रासंगिक हो चली है। वोट का अब राजनीतिक मूल्यों से नाता टूटता जा रहा है और वह मुफ्त सौगातों के ऊपर लिपटा रंग बिरंगा रैपर बन गया है। हालिया दिल्ली विधानसभा के चुनावों में ये असर इतना स्पष्ट नजर आया कि उसने भारत की राजनीति की तस्वीर साफ कर दी है। इसके पहले पांच राज्यों के चुनाव में भी कमोबेश यही तस्वीर उभरी थी लेकिन तब इसका शोर इतना तीखा नहीं था। इसके बावजूद भारतीय जनता पार्टी ने कई राज्य हाथ से गंवाने के बाद मध्यप्रदेश में अपने सांसद विष्णुदत्त शर्मा को प्रदेश की कमान थमा दी है। वे संघ की तपोनिष्ट सेवा भावना से प्रेरित होकर राजनीति में आए हैं। यही वजह है कि उनकी सफलता को लेकर तरह तरह के संशय और आशंकाएं व्यक्त की जाने लगीं हैं। राजनीति के दीवानों का कहना है कि एक ओर जब देश में अरविंद केजरीवाल की गिफ्ट वाली राजनीति का बोलबाला है तब विष्णुदत्त शर्मा का देशराग कहां टिक सकता है।

    मध्यप्रदेश का राजनीतिक परिदृष्य दिल्ली से अलहदा नहीं है। यहां की राजनीति भी गिव एंड टेक के नए नए प्रतिमानों के बीच झूलती रही है। पहले जो राजनीति गरीबों के इर्दगिर्द घूमती रही थी वह आज निम्न मध्यम वर्ग को भी अपने आगोश में ले चुकी है। पिछले पंद्रह सालों में भारतीय जनता पार्टी ने किसानों के साथ साथ प्रदेश के बड़े हिस्से तक सत्ता का लाभ पहुंचाया था। विभिन्न हितग्राही मूलक योजनाओं ने शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता में चार चांद लगा दिए। सरकारी नौकरियां खरीदकर वेतन भत्तों के हकदार बने एक छोटे तबके को तो शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने नए वेतनमानों का लाभ दिया ही इसके साथ आम नागरिकों के बड़े तबके तक भी सत्ता का लाभांश पहुंचाने का प्रयोग किया। सैकड़ों योजनाओं के माध्यम से प्रदेश के बड़े हिस्से तक सरकारी आय और कर्ज से जुटाए गए संसाधनों का लाभ पहुंचाया। शिवराज की सबसे बड़ी उपलब्धि यही रही कि उन्होंने प्रदेश के एक बड़े तबके को सत्ता में सीधे भागीदार बनाया। किसानों के खातों में लाभांश और मुआवजे की राशि पहुंचाने का इतना सफल प्रयोग इसके पहले देश की राजनीति में भी नहीं किया गया था। यही कारण था कि शिवराज को अजेय कहा जाने लगा था।

    भाजपा की राजनीति में सेंध लगाना कांग्रेस के लिए कठिन नहीं रहा। संगठन और सिद्धांतों के बगैर कांग्रेस ने प्रदेश में पल रहे असंतोष की कड़ियां जोड़ लीं और भाजपा को सत्ता गंवानी पड़ी। कमलनाथ के नेतृत्व में कुशल व्यूहरचना करके कांग्रेस के रणनीतिकारों ने भाजपा को चौखाने चित्त कर दिया। जयस के नेतृत्व में आदिवासियों के आंदोलन से उभारा गया असंतोष भाजपा के पतन की सबसे बड़ी वजह बना। किसान कर्ज माफी और बेरोजगारों को भत्ता देने जैसे लुभावने वादों ने मतदाताओं को बरगलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसके विपरीत भारतीय जनता पार्टी ने भी कांग्रेस को सत्ता में आने का मार्ग सुगम कर दिया। शिवराज सिंह चौहान के गलत टिकिट वितरण ने कांग्रेस को सुरक्षित गुप्त मार्ग उपलब्ध कराया और कांग्रेस ने फोटो फिनिश मात देकर सत्ता अपनी झोली में डाल ली।

    शिवराज सिंह चौहान ने भाजपा के संगठन को जिस तरह अपने एकाधिकार से पंगु बनाया उससे भाजपा ने अपनी संघर्ष क्षमता गंवा दी। भाजपा के तमाम पदाधिकारी सत्ता की मलाई छानने में जुट गए और संगठन को उन्होंने हितग्राही मूलक योजनाओं के दरवाजे पटक दिया। यही वजह थी कि भाजपा का कैडर हितग्राही मूलक योजनाओं के सहारे सिसकता रहा और सत्ता के खिलाड़ी बड़े कारोबार से अपनी पीढ़ियां सुरक्षित करने में जुट गए। इस कवायद का सबसे बड़ा पहलू ये भी था कि उनके साथ कांग्रेस के वे तमाम सत्ता के दलाल भी सहयोगी के रूप में शामिल थे जिन्होंने मध्यप्रदेश की स्थापना के बाद से सत्ता की लूट में महारथ हासिल की थी। यही वजह थी कि कांग्रेस के लूटतंत्र की जड़ें पंद्रह सालों में और भी गहरी हो गई। आज कमलनाथ जिस माफिया राज को गरियाते फिरते हैं वह वास्तव में कांग्रेस की कथित गरीब परस्ती से ही उपजा था। पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह जिस इंसपेक्टर राज को लानत भेजते हुए कहते थे कि वह अब कभी नहीं लौटेगा उसे कमलनाथ ने आते ही एक बार फिरसे जिंदा कर दिया।

    शुद्ध के लिए युद्ध हो, तबादलों का बेशर्म कारोबार हो या फिर माफिया के विरुद्ध संग्राम का उद्घोष हो सभी के पीछे सत्ता की आड़ में लूट ही प्रमुख धुरी रहा है। कमलनाथ और उनकी ब्रिगेड ने सत्ता की आड़ में करोड़ों रुपयों का जो खेल किया है उसका सीधा असर प्रदेश की जनता पर पड़ रहा है। मंहगाई और अराजकता ने अपराध का आंकड़ा बढ़ा दिया है। सरेआम लूट, हत्याएं और मारपीट की घटनाएं बढ़ गईं हैं। जिस डकैती समस्या को कभी समाप्त घोषित कर दिया गया था वह अब अपहरण उद्योग के रूप में एक बार फिर सिर उठाने लगी है। जीएसटी को असफल बनाने के लिए राज्य प्रायोजित जो टैक्स चोरी की मुहिम चलाई जा रही है उसने केन्द्रीय करों में मिलने वाले हिस्से को अप्रत्याशित रूप से घटा दिया है। कमलनाथ जिस बेशर्मी से खजाना खाली है का राग अलाप रहे हैं उससे भी साफ हो गया है कि मौजूदा सरकार के पास प्रदेश को सफल बनाने का कोई रोड मैप नहीं है।

    अब इन हालात में भाजपा ने विष्णुदत्त शर्मा को प्रदेश की कमान थमाकर फैला रायता समेटने की जो कवायद शुरु की है उसका कितना असर जमीन पर होगा उसका आकलन करना निश्चित ही बहुत जटिल हो गया है। विष्णुदत्त शर्मा संघ की जोड़ने वाली राजनीति की गोद में पले बढ़े हैं। वे सभी वर्गों और तबकों के बीच संबंधों की फेविकाल बिछाते रहे हैं। बेशक वे इस कार्य में निपुण हैं। बरसों से वे समाज को जगाने वाले प्रचारकों की भूमिका में रहे हैं। इसके बावजूद आज दौर बदल गया है। अब समाज को जगाने के बजाए उसे मुफ्तखोरी के नशे में डुबाने का दौर शुरु हो गया है। साम्यवाद जहां सख्ती से नियंत्रण करता रहा है वहीं पूंजीवाद सुर संगीत में डूबे प्रलोभनों की लोरियां सुना रहा है। ऩिश्चित रूप से ऐसे दौर में भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनकर विष्णुदत्त शर्मा को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। ये चुनौतियां उनकी अब तक की राजनीतिक विरासत से बिल्कुल अलग हैं। यही वजह है कि भाजपा और संघ के स्वयंसेवकों के सामने तरह तरह के सवाल उठ रहे हैं जिनका शमन सिर्फ उन्हें ही करना है। देखना है वे राजनीति के इस व्यूह को कैसे भेद पाते हैं।

  • भाजपा ने संगठन गढ़ने बीडी शर्मा को बनाया प्रदेश अध्यक्ष

    भाजपा ने संगठन गढ़ने बीडी शर्मा को बनाया प्रदेश अध्यक्ष

    भोपाल,15 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश महामंत्री एवं सांसद विष्णुदत्त (व्हीडी) शर्मा को राष्ट्रीय नेतृत्व ने प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है। श्री विष्णुदत्त शर्मा ने अपने सामाजिक जीवन की शुरुआत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से की थी। इसके बाद वे कई वर्षों तक परिषद में पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में कार्य करते रहे। वर्तमान में वे भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश महामंत्री, मध्यप्रदेश ओलपिंक एसोसिएशन के प्रदेश उपाध्यक्ष के साथ ही खजुराहो लोकसभा सीट से सांसद हैं।

    श्री विष्णुदत्त शर्मा का लंबा कार्यकाल विद्यार्थी परिषद में कड़े परिश्रम और संघर्षों के साथ कार्य करते हुए व्यतीत हुआ है। उन्होंने अपने सामाजिक जीवन की शुरुआत वर्ष 1986 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से की। वे वर्ष 1994 तक विद्यार्थी परिषद में विभिन्न पदों पर रहे। वर्ष 1995 से परिषद में पूर्णकालिक के रूप में कार्य करते हुए विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया। यह सफर वर्ष 2013 तक सतत जारी रहा। वर्ष 2013 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी में प्रवेश किया तथा विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया।

    श्री विष्णुदत्त शर्मा का जन्म 01 अक्टूबर 1970 को मुरैना जिले के ग्राम सुरजनपुर में हुआ। उनके पिता श्री अमर सिंह शर्मा हैं। श्री विष्णुदत्त शर्मा ने एमएससी (एग्रीकल्चर एग्रोनामी) से की। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गृहग्राम सुरजनपुर के सरकारी स्कूल में हुई। इसके बाद कक्षा नवमी से 12वीं तक की पढ़ाई मुरैना से की। शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय मुरैना से बीएससी प्रथम वर्ष की पढ़ाई की। आगे की पढ़ाई के लिए ग्वालियर के कृषि महाविद्यालय में एडमिशन लिया। इसके बाद एमएससी की पढ़ाई के लिए सीहोर के कृषि महाविद्यालय में प्रवेश लिया। बचपन से ही उनकी सामाजिक कार्यो में रूचि थी। यही कारण रहा कि छात्र जीवन से ही उन्होंने सार्वजनिक राजनीति की शुरूआत कर दी। वे वर्ष 2001 से 2005 तक राष्ट्रीय मंत्री, वर्ष 2007 से 2009 तक परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री एवं तत्पश्चात वर्ष 2013 तक क्षेत्रीय संगठन मंत्री मध्यक्षेत्र (मप्र-छग) रहे। वर्ष 2001 से वर्ष 2005 तक प्रदेश संगठन मंत्री महाकौशल का दायित्व भी संभाला। इससे पहले वर्ष 1993 में मध्यभारत के प्रदेश मंत्री रहे। उज्जैन के विभाग संगठन मंत्री एवं ग्वालियर के विभाग प्रमुख का दायित्व भी उन्होंने बखूबी निभाया।

    श्री विष्णुदत्त शर्मा ने वर्ष 2013 में भारतीय जनता पार्टी में प्रवेश किया तो यहां भी उन्हें कई दायित्व मिले। पार्टी ने उन्हें वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में झारखंड के संथाल क्षेत्र की 6 लोकसभा सीटों के चुनाव प्रभारी की जिम्मेदारी सौंपी। यहां के विधानसभा चुनाव में भी उन्हें संथाल क्षेत्र का प्रभारी बनाया गया। इसके अलावा दिल्ली, बिहार, असम, मध्यप्रदेश सहित कई अन्य प्रदेशों में विधानसभा चुनाव में कार्य संचालन एवं प्रबंधन की जिम्मेदारी भी सौंपी गईं। वे मार्च 2014 से दिसंबर 2016 तक नेहरू युवा केंद्र संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे। 14 अगस्त 2016 से भाजपा के प्रदेश महामंत्री का दायित्व निभा रहे हैं।

    श्री विष्णुदत्त शर्मा ने राजनीति के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी कई उपलब्धियां हासिल की हैं। इनमें बेस्ट जोन इंटर यूनिवर्सिटी बॉलीवाल प्रतियोगिता में जवाहरलाल नेहरू कृषि विशवविद्यालय का प्रतिनिधित्व, कबड्डी और बॉलीवाल प्रतियोगिताओं में महाविद्यालयीन टीम के कप्तान, विभिन्न प्रतियोगिताओं में कृषि महाविद्यालय ग्वालियर का प्रतिनिधित्व, एथलेटिक्स प्रतियोगिता में महाविद्यालय स्तर पर चैंपियन भी रहे। इसके अलावा एनसीसी का सी सर्टिफिकेट प्राप्त किया एवं अखिल भारतीय ट्रेकिंग शिविर गंगोत्री-गौमुख में सहभागिता एवं एनसीसी का बी सर्टिफिकेट प्राप्त किया।

    श्री विष्णुदत्त शर्मा ने देश में बढ़ते भष्टाचार के खिलाफ भी अभियान चलाया। इसके लिए उन्होंने वर्ष 2012 में यूथ अगेंस्ट करप्शन के तहत कार्य किया। उन्होंने मंच के राष्ट्रीय सह संयोजक के रूप में देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर भष्टाचार के खिलाफ जनजागरण अभियान चलाया, साथ ही कई स्थानों पर आंदोलन एवं प्रदर्शन का नेतृत्व किया। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री प्रफुल्ल पटेल द्वारा दिल्ली एयरपोर्ट के भूमि घोटाले के विरूद्ध वर्ष 2012 में बालाघाट से गोदिंया (महाराष्ट्र) तक पदयात्रा की। देश भर में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं तत्कालीन केंद्र सरकार के खिलाफ मार्च 2012 में दिल्ली में संसद का घेराव किया। अभाविप के राष्ट्रीय महामंत्री रहते हुए देश भर में प्रवास किया एवं शिक्षा के व्याप्त व्यापारीकरण एवं अव्यवस्थाओं के खिलाफ जन आंदोलन खड़ा करते हुए सड़क से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक संघर्ष किया। मध्यप्रदेश में निजी मेडिकल कॉलेजों में गरीब बच्चों के प्रवेश में आने वाली कठिनाइयों के लिए कड़ा संघर्ष किया। इसके अलावा नर्मदा नदी को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए मां नर्मदा अध्ययन दल का गठन कर नर्मदा अध्ययन यात्रा की। श्री विष्णुदत्त शर्मा ने विद्यार्थी कल्याण न्यास संस्था की स्थापना भी की। यह संस्था गरीब एवं पिछड़े वर्गों के सामाजिक उत्थान के लिए कार्य करती है।

    श्री विष्णुदत्त शर्मा को अपने बेहतर कार्यों के लिए कई अवार्ड भी प्राप्त हुए हैं। वर्ष 2018 में उन्हें दिल्ली के प्रतिष्ठित कलाम फाउंडेशन द्वारा कलाम इनोवेशन एंड गवर्नेंस अवार्ड मिला। एमआईटी पुणे द्वारा यूथ लीडर अवार्ड प्रदान किया गया। इसके साथ ही शासकीय एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा युवाओं के नेतृत्व प्रदान करने, सामाजिक कार्यों के लिए प्रेरित करने, सेवा कार्यों को मान्यता प्रदान करते हुए कई अन्य अवार्ड, स्मृति चिन्ह एवं अभिनंदन पत्र भी मिले।

    श्री विष्णुदत्त शर्मा ने कई विदेश यात्राएं भी कीं। इनमें भारत सरकार के युवा कार्य एवं खेल मंत्रालय द्वारा इंडो-चीन यूथ एक्सचेंज प्रोग्राम 2015 में भारतीय डेलीगेशन का नेतृत्व प्रमुख रहा। अंतरराष्ट्रीय एग्रीकल्चर सेमिनार के लिए बैंकाक गए। राजनीतिक, सामाजिक अध्ययन के लिए सिंगापुर की यात्रा की। साथ ही नेपाल भी गए।

  • आपमें काम शुरु करने की ताकत होती तो आईएएस अफसर बनकर नौकरी नहीं करते-गडकरी

    आपमें काम शुरु करने की ताकत होती तो आईएएस अफसर बनकर नौकरी नहीं करते-गडकरी

    नागपुर 20 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। केंद्रीय सड़क और परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने आईएएस अफसरों के काम पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा- ‘मैं आपको सच बताता हूं, पैसे की कोई कमी नहीं है, जो कुछ कमी है वो सरकार में काम करने वाली मानसिकता की है। जो निगेटिव एटीट्यूड है, निर्णय करने में जो हिम्मत चाहिए, वो नहीं है।’ केंद्रीय मंत्री रविवार को नागपुर में विश्वेश्वरैया राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान के हीरक जयंती समारोह के उद्घाटन समारोह में बोल रहे थे।

    नितिन गडकरी ने आगे कहा- ‘परसों मैं एक बड़े फोरम में था, वे(आईएएस अफसर) कह रहे थे- हम यह शुरू करेंगे, वो शुरू करेंगे, तो मैंने उनको कहा- आप क्यों शुरू करेंगे? आपकी अगर शुरू करने की ताकत होती तो आप आईएएस अफसर बनकर यहां नौकरी नहीं करते। उन्होंने आगे कहा कि आप जाकर कोई बड़ा उद्योग कर सकते थे, आपका यह काम नहीं है, जो कर सकता है उसकी आप ज्यादा मदद करो, आप इस लफड़े में मत पड़ो। वी आर ओनली फैसिलिटेटर।’

    इस दौरान गडकरी ने अपने लक्ष्यों की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि पिछले पांच साल में हमने 17 लाख करोड़ रुपए के काम करवाए हैं। इस साल वह 5 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचना चाहते हैं।

    केंद्रीय मंत्री गडकरी ने यह भी कहा कि लोगों को उस क्षेत्र में काम करना चाहिए, जिसमें वे अच्छा कर सकते हैं। इससे पहले गडकरी ने रविवार को छत्रपति नगर के एक ग्राउंड में क्रिकेट भी खेला। उन्होंने शहर के कई ग्राउंड्स का दौरा किया। साथ ही खासदर क्रीड़ा महोत्सव के खिलाड़ियों की हौसला अफजाई भी की। केंद्रीय मंत्री ने एक ने एक ट्वीट में कहा- मैंने शहर की कई जगहों पर खिलाड़ियों के साथ अच्छा वक्त बिताया। छत्रपति नगर में मैं खुद को खिलाड़ियों के साथ खेलने से नहीं रोक सका।

  • कमलनाथ का सिख दंगों से कोई नाता नहीं -पीसी शर्मा

    कमलनाथ का सिख दंगों से कोई नाता नहीं -पीसी शर्मा

    भोपाल,6 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। दिल्ली में 1984 के सिख विरोधी दंगों से मुख्यमंत्री कमलनाथ का कोई लेना देना नहीं है। इस मुद्दे पर अब तक बिठाए गए आयोगों ने भी कमलनाथ को दोषी नहीं पाया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसके बावजूद सदन में कहा कि कांग्रेस ने सिख दंगों के आरोपों के बाद भी कमलनाथ को मुख्यमंत्री बना रखा है। ये तथ्य गलत है और प्रधानमंत्री जैसे पद पर बैठे व्यक्ति को ये कहना शोभा नहीं देता। आज राजधानी के जनसंपर्क संचालनालय में आयोजित पत्रकार वार्ता में श्री शर्मा ने दावा किया कि श्री कमलनाथ के नेतृत्व में प्रदेश विकास की ओर बढ़ रहा है।

    जब उन्हें बताया गया कि सिख दंगों के दौरान इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्टर संजय सूरी ने अपनी आंखों देखी घटना के बाद अपने अखबार में खबर छापी थी।जिसमें लिखा गया था कि स्वयं कमलनाथ ने सेंट्रल दिल्ली के रकाबगंज गुरुद्वारे के बाहर भीड़ का नेतृत्व किया था और उनकी उपस्थिति में दो सिख मारे गए थे। इस मामले की जांच करने वाले नानावटी आयोग ने कमलनाथ को संदेह का लाभ दिया था।जांच आयोग ने दो लोगों की गवाही सुनी थी, जिसमें तत्कालीन इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्टर संजय सूरी भी शामिल थे। उन्होंने कमलनाथ के मौके पर मौजूद होने की पुष्टि की थी। कमलनाथ ने यह स्वीकार किया था कि वे वहां मौजूद थे और भीड़ को शांत करने की कोशिश कर रहे थे।

    पिछले दिनों शिरोमणी अकाली दल के सदस्य और दिल्ली के विधायक मनजिंदर सिंह सिरसा ने मांग की थी कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तुरंत कमलनाथ को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देने के लिए कहें। उन्होंने दो गवाहों के लिए भी सुरक्षा की मांग की थी जो कमलनाथ के खिलाफ अदालत में गवाही देने के लिए तैयार हैं।

    केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने गृह मंत्रालय के सिख विरोधी दंगों का केस वापस खोलने के फैसले का स्वागत किया था। हरसिमरत बादल ने अपने ट्वीट में लिखा था कि ‘मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के खिलाफ मुकदमे को फिर से खोलना सिखों की जीत है। गलत तरीके से हल किए गए मामलों को फिर से खोलने के हमारे निरंतर प्रयासों का नतीजा है। अब कमलनाथ अपने अपराधों की कीमत चुकाएंगे.’

  • गांधी का सत्याग्रह अंग्रेजों का नाटक था बोले हेगड़े

    गांधी का सत्याग्रह अंग्रेजों का नाटक था बोले हेगड़े

    बैंगलुरु,2 फरवरी(शैलेश शुक्ला)।पूर्व केंद्रीय मंत्री और कर्नाटक से बीजेपी सांसद अनंत कुमार हेगड़े एक बार फिर से विवादों में हैं।हेगड़े ने राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी पर हमला बोला है और आजादी के आंदोलन को ‘ड्रामा’ करार दिया।बीजेपी नेता ने कहा कि पता नहीं लोग कैसे ‘इस तरह के लोगों को’ भारत में ‘महात्‍मा’ कहा जाता है।

    उत्‍तर कन्‍नड लोकसभा सीट से सांसद हेगड़े ने कहा कि पूरा स्‍वतंत्रता संघर्ष अंग्रेजों की सहमति और मदद से अंजाम दिया गया।’ हेगड़े ने कहा, ‘इन कथित नेताओं में से किसी नेता को पुलिस ने एक बार भी नहीं पीटा था। उनका स्‍वतंत्रता संघर्ष एक बड़ा ड्रामा था।’ महात्मा गांधी के ग्रुप के लोगों पर अंग्रेजों ने अत्याचार नहीं किया था। इन्हें जेल में भी सभी सुविधाएं दीं गई थी।

    हेगड़े ने कहा, ‘स्‍वतंत्रता संघर्ष को इन नेताओं ने ब्रिटिश लोगों की सहमति से रंगमंच पर उतारा था। यह वास्‍तविक संघष नहीं था। यह मिलीभगत से हुआ स्‍वतंत्रता संघर्ष था।’ बीजेपी नेता ने महात्‍मा गांधी के भूख हड़ताल और सत्‍याग्रह को एक ‘ड्रामा’ करार दिया।

    उन्‍होंने कहा, ‘कांग्रेस का समर्थन करने वाले लोग लगातार यह कहते रहते हैं कि भूख हड़ताल और सत्‍याग्रह की वजह से भारत को आजादी मिली। यह सत्‍य नहीं है। अंग्रेज सत्‍याग्रह की वजह से भारत से नहीं गए। अंग्रेजों ने निराशा में आकर हमें आजादी दी। जब मैं इतिहास पढ़ता हूं तो मेरा खून खौल उठता है। इस तरह से लोग हमारे देश में महात्‍मा बन गए।’

    इस बीच कांग्रेस नेता जयवीर शेरगिल ने अनंत कुमार हेगड़े के बयान की तीखी आलोचना की है। जयवीर ने कहा, महात्मा गांधी को देशप्रेम का सर्टिफिकेट उस पार्टी से नहीं चाहिए जो गोरों की सरकार के चमचे थे। अनंत हेगड़े उस संगठन से आते हैं जिन्होंने तिरंगे का विरोध किया, संविधान का विरोध किया, जिन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया।(नवभारत टाईम्स से साभार)

  • खजाने के लुटेरों पर लगे अंकुश

    खजाने के लुटेरों पर लगे अंकुश

    बजट सत्र का शुभारंभ करते हुए महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने एक बार फिर भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का संकल्प दुहराया है। कल पेश होने जा रहे आम बजट से पहले आज वित्तमंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमन ने आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया। इसमें दर्शाया गया है कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार आज 450 बिलियन डॉलर का ऐतिहासिक स्तर छू रहा है। देश में आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी बताते हुए शेयर बाजार ने ना नुकुर शुरु कर दी है। बजट को लेकर कार्पोरेट सेक्टर सरकार पर दबाव डालने का भरपूर प्रयास कर रहा है।इसके बावजूद नरेन्द्र मोदी की सरकार भारत की इकानामी को बढ़ाने के दावे पर अटल है। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस लगातार देश में ये संदेश देने का प्रयास कर रहा है कि मानों देश डूब गया हो और उसकी अर्थव्यवस्था को मोदी सरकार ने मटियामेट कर दिया है। हकीकत इससे ठीक उलट है। जबसे देश में नोटबंदी हुई है तबसे कांग्रेस ये जताने की कोशिश करती रही है कि मोदी सरकार ने बगैर सोचे समझे एक गलत फैसला लिया था जिसकी वजह से देश के उद्योग धंधे और कारोबार तबाह हो गए थे। नोटबंदी से कई सच उजागर हुए हैं। आयकर विभाग ने देश के उन कारोबारियों को नोटिस दिए हैं जिन्होंने नोटबंदी के दौरान बड़ी रकम के पुराने नोट जमा किए थे। उनसे पूछा जा रहा है कि वे बैंकों में जमा कराए गए नोटों के स्रोत उजागर करें। रिजर्व बैंक भी ये जानने को बेताब है कि आखिर जितनी तादाद में उसने नोट छापे उससे भी ज्यादा संख्या में नोट बैंकों में जमा कैसे करा दिए गए। डुप्लीकेट नोटों की खेप कहां कहां से आई। वे कौन लोग थे जिन्होंने जाली नोटों की खेप जमा कर रखी थी। सरकार के इस कदम से बाजार में खलबली मच गई है। काला धन बैंको में जमा करने का अपराध कर चुके लोगों के लिए अब सामने अंधी गली नजर आ रही है। वे अपनी गलती अब सुधार नहीं सकते हैं। यही वजह है कि वे करवट लेते बाजार के कारण पिट रही कंपनियों की आड़ लेकर अर्थव्यवस्था की तबाही का रोना रो रहे हैं। रोने वाले राज्यों में वे सबसे आगे हैं जिन राज्यों में कांग्रेस सत्तासीन है। छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार ने तो वे तमाम योजनाएं बंद कर डाली हैं जिन्हें पिछली रमन सरकार चलाती रही थी। भाजपा पर विज्ञापनों की खैरात बांटने वाली कमलनाथ सरकार भी कटौतियों पर उतारू है। कमलनाथ ने तो भुगतानों पर रोक लगाने के बजाए बजट की ही कैपिंग कर दी है। निर्धारित बजट की मात्र साठ फीसदी राशि ही विभागों को दी जा रही है। राशि की कमी की वजह से भुगतान लंबित हैं और लोग इसी प्रत्याशा में धीरज बांधे हुए हैं कि जल्दी ही उन्हें भुगतान प्राप्त होगा। पूर्व वित्तमंत्री जयंत मलैया के उस बयान को कमलनाथ ने अपना सूत्र वाक्य बना रखा है कि प्रदेश का खजाना खाली है। जबकि हकीकत ये है कि दिग्विजय सिंह सरकार की नालायकियों के बाद से प्रदेश का वित्तीय प्रबंधन बहुत कारगर हो चुका है। उमा भारती के वित्तमंत्री रहे राघवजी भाई ने जिस तरह प्रदेश की आय बढ़ाने का प्रयास किया वह उल्लेखनीय रहा है। बाद के वर्षो में शिवराज सिंह चौहान की मैं हूं न वाली रट ने अनाप शनाप खर्चे चालू कर दिए थे। ठाकुर लाबी की शह पर सिंधिया महाराज को गाली देते शिवराज सिंह चौहान दिग्विजय सिंह की शतरंज के जाल में बुरी तरह उलझ गए थे। उन्होंने दिग्गी की उन सभी नीतियों का चुग्गा शान से चुगा जिनकी वजह से दिग्गी ने प्रदेश का बंटाढार किया था।मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों में पलीता लगाने में जुटे शिवराज को इसीलिए केन्द्र ने सलाह देना बंद कर दिया और गलत टिकिट वितरण ने भाजपा की लुटिया डुबो दी। अब कमलनाथ तो इससे भी आगे बढ़कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। उनकी निगाह में प्रदेश के सारे लोग अपराधी हैं। सारे लोग लुटेरे हैं। इतनी वैमनस्यता से भरी सरकार इसके पहले कभी नहीं देखी गई। जिन रेत के ठेकों में वे प्रदेश को बारहसौ करोड़ रुपए आय का लालीपाप थमा रहे हैं वह सिर्फ दिवा स्वप्न साबित होने जा रहा है। सीहोर, होशंगाबाद और भिंड में रेत खनन के लिए हैदराबाद की जिस पावर मेक प्रोजेक्ट्स लिमिटेड को ठेका दिया गया है वह बैंकों का कर्ज गड़पने के आरोपों से घिरी है।एमपी, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में इस कंपनी के मालिकों ने हजारों लोगों को चूना लगाकर बैंकों के करोड़ों रुपए गड़प किए हैं। इसी तरह अन्य कई कंपनियां रेत के ठेकों की आ़ड़ में अपने घोटाले छुपा रहीं हैं। बेशक कमलनाथ सरकार कहे कि उनका वास्ता तो केवल रेत के ठेकों से आय बढ़ाने तक ही सीमित है लेकिन कंपनियों के आड़ में जिन्होंने देश का धन लूटा है उन्हें संरक्षण देना देश से गद्दारी करना है। कानून व्यवस्था भले ही राज्य का विषय हो लेकिन वित्तीय अनुशासन केन्द्र का सबसे प्रमुख अस्त्र है। भारत सरकार को उन कंपनियों के विरुद्ध भी कार्रवाई करनी चाहिए जिन्हें राजनैतिक वैमनस्य के जरिए कांग्रेस की राज्य सरकारें संरक्षण दे रहीं हैं। इन पर अंकुश लगाए बगैर पांच ट्रिलियन डालर की इकानामी का लक्ष्य नहीं पाया जा सकेगा।

  • कब्जाधारी कांग्रेसियों की सूची सार्वजनिक करेगी भाजपा बोले लुणावत

    कब्जाधारी कांग्रेसियों की सूची सार्वजनिक करेगी भाजपा बोले लुणावत

    भोपाल,21 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। भारतीय जनता पार्टी ने अपने पंद्रह सालों के शासनकाल में सार्वजनिक संपत्तियों पर कब्जा जमाने वाले अतिक्रमण कारियों के खिलाफ कार्रवाई की लेकिन कभी दलगत राजनीति के आधार पर भेदभाव नहीं किया। मौजूदा कांग्रेस सरकार चुन चुनकर भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्तांओं को अतिक्रमण के नाम पर प्रताड़ित कर रही है। ऐसे झूठे मामलों में प्रताड़ित किए जा रहे आम लोगों का नेतृत्व करते हुए कल भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता पूरे प्रदेश में कलेक्टर कार्यालयों का घेराव करेंगे। सरकार से मांग की जाएगी कि वह आम नागरिकों को भाजपा का कार्यकर्ता बताकर प्रताड़ित करना बंद करे। भाजपा ने हर जिले में कांग्रेस के पदाधिकारियों के अतिक्रमणों की सूची बनाई है जिसे सार्वजनिक किया जाएगा और सरकार से उन अतिक्रमण कारियों के विरुद्ध बेदखली की कार्रवाई करने की मांग की जाएगी। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष बृजेश लुणावत ने आज पार्टी के प्रदेश कार्यालय में आयोजित पत्रकार वार्ता में ये बात कही है।


    श्री लुणावत ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी जिस तरह के भेदभाव और अवैध वसूली के आरोप प्रदेश सरकार पर लगाती रही है, उसे स्वयं मुख्यमंत्री कमलनाथ भी मानते हैं और मुख्य सचिव की नोटशीट भाजपा के आरोपों पर मोहर लगाती है। मुख्यमंत्री ने माना है कि इस मुहिम के दौरान माफिया के नाम पर आम जनता को परेशान किया जा रहा है। उन्होंने लिखा है कि बिल्डिंग परमीशन जैसी छोटी-छोटी बातों के लिए हजारों नोटिस दिये जा रहे हैं, पुलिस और प्रशासन के लोग इसमें शामिल हैं, जबकि मैंने स्पष्ट आदेश दिया था कि कार्रवाई माफिया पर हो, जनता पर नहीं।

    श्री लुणावत ने कहा कि कमलनाथ सरकार प्रदेश में अराजकता का वातावरण बना रही है। प्रदेश में अवैध शराब माफिया, उत्खनन माफिया और ट्रांसपोर्ट माफिया सक्रिय हैं, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। कांग्रेस नेताओं और अधिकारियों की मिलीभगत से सरकारी जमीनों को हथियाया जा रहा है, अवैध कब्जे किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश में सबसे ज्यादा अतिक्रमण कांग्रेसियों के ही हैं, लेकिन गरीब जनता और भाजपा कार्यकर्ताओं को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है।

    श्री लुणावत ने कहा कि हमारी मांग है कि प्रदेश सरकार द्वारा माफियाओं की जो सूची तैयार कराई गई है, सरकार उसे जनता के बीच प्रस्तुत करे। यदि सरकार ऐसा नहीं करती है, तो भारतीय जनता पार्टी अपने स्तर पर तैयार की जा रही अतिक्रमण, अवैध कब्जों की सूचियां मुख्यमंत्री को सौंपेगी। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी को यह जानकारी है कि किस मंदिर की जमीन पर किस कांग्रेस नेता का कब्जा है और सरकारी तालाबों की जमीन किसने हथिया रखी है। उन्होंने कहा कि हमारी मांग है कि सरकार इन लोगों पर कार्रवाई करे और गरीब जनता तथा कार्यकर्ताओं को परेशान करना बंद करे।

    प्रदेश में 24 जनवरी को होने वाले विरोध प्रदर्शन के दौरान पार्टी के वरिष्ठ नेता अलग-अलग जिलों में आंदोलन का नेतृत्व करेंगे। प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह इंदौर में नगर-ग्रामीण द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करेंगे। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चैहान एवं सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर भोपाल में आंदोलन का नेतृत्व करेंगी। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व सांसद नंदकुमार सिंह चैहान खण्डवा में तथा नरोत्तम मिश्रा जबलपुर में उपस्थित रहेंगे। शिवपुरी में श्रीमती यशोधरा राजे सिंधिया, छतरपुर में भूपेन्द्र सिंह, उमरिया में रामलाल रौतेल, सतना में राजेन्द्र शुक्ला, दमोह में जयंत मलैया, टीकमगढ़ में लालसिंह आर्य, कटनी में गणेश सिंह, ग्वालियर नगर-ग्रामीण में विवेक शेजवलकर, होशंगाबाद में डॉ. सीताशरण शर्मा, हरदा में हेमंत खंडेलवाल, खरगोन में जितू जिराती, झाबुआ में सुदर्शन गुप्ता, धार में सुश्री ऊषा ठाकुर, मुरैना में जयसिंह कुशवाह, भिण्ड में रूस्तम सिंह, दतिया में श्रीमती संध्या राय, श्योपुर में अभय चैधरी, गुना में वेदप्रकाश शर्मा, अशोकनगर में नरेन्द्र बिरथरे, सागर में गौरीशंकर बिसेन, निवाड़ी में उमेश शुक्ला, पन्ना में बृजेन्द्रप्रताप सिंह, रीवा में जनार्दन मिश्र, सीधी में श्रीमती रीति पाठक, सिंगरौली में शशांक श्रीवास्तव, शहडोल में गिरीश द्विवेदी, अनूपपुर में ओमप्रकाश धुर्वे, डिण्डौरी में संपत्तिया उईके, मंडला में नरेश दिवाकर, बालाघाट में ढालसिंह बिसेन, सिवनी में कन्हाईराम रघुवंशी, नरसिंहपुर में राव उदयप्रताप सिंह, छिन्दवाड़ा में कमल पटेल, भोपाल नगर-ग्रामीण में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, रायसेन में डॉ. गौरीशंकर शेजवार, विदिशा में ध्रुवनारायण सिंह, सीहोर में रमाकांत भार्गव, बुरहानपुर में सुभाष कोठारी, बड़वानी में गजेन्द्र पटेल, अलीराजपुर में श्रीमती रंजना बघेल, उज्जैन नगर-ग्रामीण में रमेश मेंदोला, शाजापुर में महेन्द्र सोलंकी, आगर में विजेन्द्र सिंह सिसोदिया, देवास में कृष्णमुरारी मोघे, रतलाम में जी.एस. डामोर, मंदसौर में सुधीर गुप्ता एवं जगदीश देवड़ा नीमच में कार्यकर्ताओं के साथ कलेक्ट्रेट का घेराव करेंगे।

  • मीसाबंदी की विधवा को पेंशन दें बोला छग हाईकोर्ट

    मीसाबंदी की विधवा को पेंशन दें बोला छग हाईकोर्ट

    बिलासपुर.13 जनवरी,(प्रेस सूचना केन्द्र)। छत्तीसगढ़ (Chhattisagrh) की बिलासपुर हाईकोर्ट (Bilaspur High court) ने एक याचिका पर सुनवाई के बाद मीसाबंदी (Misabandi) की विधवा को आधी पेंशन (Pension) देने का आदेश दिया है. कांग्रेस सरकार के फैसले को सुधारने का आदेश देने वाला ये अदालत का पहला फैसला है।पेंशन के नियमों के मुताबिक बिलासपुर के इस मीसाबंदी की विधवा को पति की मृत्यु के बाद आधी पेंशन दी जाती थी। जिसे राज्य शासन ने कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद जनवरी 2019 से बंद कर दिया। कोर्ट के इस फैसले के बाद साफ हो गया है कि सरकार का फैसला गलत था और अब मीसाबंदियों की विधवाओं की पेंशन जारी रहेगी।

    कांग्रेस सरकार ने सत्ता में आने के बाद तमाम मीसाबंदियों की पैंशन सत्यापन के नाम पर रोक दी थी। पिछली भाजपा सरकार ने बाकायदा शासकीय अधिसूचना के माध्यम से ये पेंशन जारी की थी। नई सरकार के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई जिसके आधार पर हाईकोर्ट ने बिलासपुर के 28 और दुर्ग के 32 मीसाबंदियों को पेंशन देने का आदेश दिया था। इसके बावजूद मीसाबंदियों की विधवाओं की पेंशन जारी नहीं की गई थी। पेंशन बंद किए जाने के खिलाफ बिलासपुर के मीसाबंदी की विधवा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट के जस्टिस पी सेम कोशी की सिंगल बेंच ने मीसाबंदी की विधवा के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनके रोकी गई पेंशन की राशि और सारे एरियर्स को तत्काल जारी करने का आदेश दिया है। मीसाबंदी की विधवा की ओर से दायर यह राज्य का पहला मामला है। ऐसा माना जा रहा है कि अब बाकी विधवा पेंशन पाने वालों के लिए भी रास्ता साफ हो गया है.

    मध्यप्रदेश में भी अभी तक मीसाबंदियों की मौजूदगी और सच्चाई का सत्यापन होने के बावजूद कई पेंशन धारकों को भुगतान नहीं किया जा रहा है। पिछले 9 महीनों से पेंशन नहीं मिलने से परेशान मीसाबंदियों ने हाईकोर्ट की शरण भी ली है।छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने तमाम याचिकाओं पर एक स्वर में सरकार के आदेश को रद्द कर दिया है। अभी 4 दिनों पहले बिलासपुर के ही 28 मीसाबंदियों को हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद बड़ी राहत देते हुए उनकी तमाम पेंशन और भत्तों की राशि तत्काल जारी करने का आदेश दिया था. दो दिन पूर्व दुर्ग के 38 मीसाबंदियों को भी हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली थी और अब विधवा पेंशन के प्रकरण में भी हाईकोर्ट ने वही फैसला दिया है।

  • कैलाश पर प्रहार को मजबूर कांग्रेस

    कैलाश पर प्रहार को मजबूर कांग्रेस

    कमलनाथ सरकार को सबसे बड़ा खतरा महसूस हो रहे कैलाश विजयवर्गीय को जल्दी ही धारा 144 का उल्लंघन करने के आरोप में गिरफ्तार किया जा सकता है। उनके साथ इंदौर कमिश्नर के आवास के बाहर धरना देने वाले इंदौर से बीजेपी सांसद शंकर लालवानी, बीजेपी विधायक रमेश मेंदोला, महेंद्र हार्डिया और जिला अध्यक्ष गोपीकृष्ण नेमा के खिलाफ भी धारा 144 उल्लंघन करने की FIR दर्ज की गई है। इस दौरान कैलाश विजयवर्गीय ने बयान दिया था कि हम कमिश्नर से मिलने आए हैं इसके बाद भी अधिकारियों ने प्रोटोकाल का पालन नहीं किया और हमें सूचना नहीं दी कि कमिश्नर शहर में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे। साथ में उन्होंने पुछल्ला लगा दिया कि आज शहर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेतागण मौजूद हैं नहीं तो मैं शहर में आग लगा देता। कैलाश के इस बयान से सत्तारूढ़ कांग्रेस बौखला गई। कैबिनेट की बैठक में विकास योजनाओं को छोड़कर चर्चा का सबसे बड़ा मुद्दा कैलाश विजयवर्गीय का ये बयान ही बन गया। सज्जन सिंह वर्मा, जीतू पटवारी और स्वास्थ्य मंत्री तुलसी सिलावट ने प्रेसवार्ता में ही कैलाश के बयान को निशाना बना दिया। सज्जन सिंह वर्मा बोले कि कैलाश विजयवर्गीय जैसी भाषा बोल रहे हैं वह इंदौर के लोग पसंद नहीं करते। इंदौर विकास प्रेमियों का शहर है और वहां इस तरह की भाषा नहीं चल सकती। दरअसल कैलाश विजयवर्गीय को कमलनाथ सरकार सबसे बड़ा खतरा महसूस करती है। पश्चिम बंगाल के प्रभारी होने के कारण कैलाश विजयवर्गीय राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं। ममता बैनर्जी के गुंडों से लड़ते हुए कैलाश ने पश्चिम बंगाल में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है। वहां कांग्रेस का मुकाबला ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस से तो है ही साथ में भाजपा से भी है। जिस तरह महाराष्ट्र में कांग्रेस ने शरद पंवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से तालमेल बिठाकर सत्ता पाई है उसी तरह वह बंगाल में भी ममता बैनर्जी के सामने झुकने तैयार है। इसलिए कांग्रेस का हाईकमान नहीं चाहता कि वह बंगाल में भी कैलाश की भाजपा को सफलता के झंडे गाड़ने की छूट दे दे। यही वजह है कि मध्यप्रदेश में वह कैलाश को घेरकर भाजपा के सफल हथियार को भौंथरा करना चाहती है। धारा 144 के उल्लंघन जैसे छोटे से मुद्दे को उठाकर वह कैलाश को घुटना टेक कराना चाहती है। कांग्रेस की इस रणनीति का दूसरा असर यह भी हो रहा है कि कैलाश मध्यप्रदेश भाजपा का चेहरा भी बनते जा रहे हैं। हाईकमान से करीबी होने के नाते भाजपा संगठन का भी एक बड़ा धड़ा कैलाश से जुड़ता जा रहा है। ऐसे में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार जाने अनजाने में कैलाश पर प्रहार करके भाजपा को उसका सर्वमान्य नेता दिए दे रही है। कांग्रेस का दिग्विजय सिंह गुट भी कैलाश से करीबी महसूस करता है। ऐसे में कमलनाथ सरकार अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा कार्य कर रही है। जब प्रदेश में कमलनाथ सरकार के प्रति बैचेनी बढ़ रही है तब उसे विकासात्मक कार्यों पर जोर देना चाहिए। इसके विपरीत वह तोड़फोड़ की राजनीति में ही उलझी बैठी है। कमलनाथ सरकार की यह रणनीति आने वाले समय में प्रदेश की राजनीतिक स्थितियों में बड़ा बदलाव लाने वाली साबित हो सकती है।