साहित्यकारों को जोड़कर बना राजुरकर का राजः संतोष चौबे

विनय उपाध्याय ने अपनी सांस्कृतिक यात्रा से कई हस्तियों को पार पहुंचाया – मनोज श्रीवास्तव

*वरिष्ठ उद्घोषक विनय उपाध्याय को दिया राजुरकर राज स्मृति सम्मान** भोपाल,27 सितंबर( प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय के राज सदन में आयोजित समारोह में इस वर्ष का राजुरकर राज स्मृति सम्मान वरिष्ठ उद्घोषक एवं संपादक विनय उपाध्याय को प्रदान किया गया। समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार एवं रवींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति संतोष चौबे ने की। मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार मनोज श्रीवास्तव, विशिष्ट अतिथि डॉ. सीमा रायजादा तथा सारस्वत अतिथि अरविंद सोनी उपस्थित रहे।आरंभ में कार्यक्रम की भूमिका संस्थान की सचिव करुणा राजुरकर ने रखी। अंत में आभार प्रदर्शन संग्रहालय के अध्यक्ष रामराव वामनकर ने किया।

अध्यक्षता करते हुए संतोष चौबे ने कहा कि हिंदी बोलने में बहुत अच्छी लगती है, बस उसे बोलने का तरीका आना चाहिए और यह तरीका विनय उपाध्याय के पास है। उन्होंने कहा कि राजुरकर राज स्वयं उद्घोषक थे, और उन्होंने साहित्यकारों को जोड़कर साथ चलने की परंपरा शुरू की और लेखकों के साथ संवाद कायम किया।

मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व प्रशासनिक अधिकारी और वरिष्ठ साहित्यकार मनोज श्रीवास्तव ने राजुरकर राज की स्मृति को साझा करते हुए कहा कि वे उद्घोषक तो थे ही, इसके साथ ही वे एक सहज और अहंकार से रहित व्यक्ति थे। और आज जिनको सम्मानित किया गया वे भी नदी के पुल की तरह है, हमेशा बड़ी बड़ी हस्तियों को वैतरणी पार करवाते हैं। उन्होंने हिन्दी को मंच पर लोकप्रिय करने के लिए अपना सर्वस्व दिया।

विनय उपाध्याय ने नदी के पुल की तरह हमेशा दूसरों को आगे बढ़ाने का काम किया है। उन्होंने हिंदी को मंच पर लोकप्रिय बनाने के लिए अपना सर्वस्व दिया और हजारों सांस्कृतिक कार्यक्रमों को जीवंत किया। उद्घोषणा सांस्कृतिक मध्यस्थता का कार्य है।

डॉ. सीमा रायजादा ने कहा कि जो लोग समय, संस्कृति और समाज को समझकर काम करते हैं, वे आगे बढ़ते हैं। ऐसे लोग बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी होते हैं।

सम्मानित विनय उपाध्याय ने कहा कि राजुरकर राज ने एक व्यक्ति नहीं, बल्कि संस्था के रूप में अनेक कार्य किए। साहित्य, कला और संस्कृति के संरक्षण के साथ उन्होंने साहित्यकारों की रचनाओं को भी सहेजा। दुष्यंत कुमार संग्रहालय इसका उदाहरण है। उन्होंने वाद-विवाद से बचते हुए संतुलन के साथ अपने कार्य को आगे बढ़ाया।सम्मान के रूप में प्राप्त ग्यारह हजार रुपए की राशि उन्होंने संग्रहालय के विकास कार्यों के लिए ससम्मान वापस कर दी।

वरिष्ठ साहित्यकार विजय कुमार देव ने राजुरकर राज के साथ अपने संस्मरण साझा किए। अरविंद सोनी ने आकाशवाणी भोपाल में उनके साथ कार्य करने का स्मरण करते हुए कहा कि वे अपने कर्तव्य के प्रति सदैव गंभीर रहते थे और लेखन को निरंतर बनाए रखा।

कार्यक्रम का संचालन विशाखा राजुरकर राज ने किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में साहित्यकार, लेखक और पत्रकार उपस्थित थे।

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *