भोपाल 06 नवंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। चंद्रमा या उसके ग्रहण का मन पर असर पूरे व्यक्तित्व को झिंझोड़कर रख देता है। कुंडली के अध्ययन से हर व्यक्ति के लिए अलग लोकव्यवहार और जीवनचर्या निर्धारित की जा सकती है। इससे सामाजिक उन्नति की राह भी प्रशस्त की जा सकती है। देश को ऐसे ज्योतिषियों की जरूरत है जो मनोविज्ञानी भी हों। वे लोगों का मार्गदर्शन करें ताकि समाज में सुख शांति और समृद्धि की स्थापना की जा सके। ये विचार रविवार को भोपाल के केन्द्रीय संस्कृत संस्थान में आयोजित राष्ट्रीय ज्योतिष सम्मेलन एवं सम्मान समारोह में प्रख्यात ज्योतिषी सुश्री हेमलता तिवारी ने व्यक्त किए। ये आयोजन ज्योतिष विचार मंच भोपाल की ओर से आयोजित किया गया था। इस अवसर पर देश भर से आए कई विद्वान ज्योतिषियों को सम्मानित भी किया गया। मानसिक रोगों पर चंद्रमा के असर का विश्लेषण करते हुए डॉ.हेमलता तिवारी ने कहा कि हमारे आसपास के लोगों के प्रति हमारा व्यवहार कुंडली में चंद्रमा की स्थितियों के अनुरूप निर्धारित होता है। यदि जातक का जन्म चंद्रमा की जिस स्थिति में हुआ है उसका व्यवहार उसी के मुताबिक होता है। हमारी मनोदशा से ही हमारे लोकव्यवहार निर्धारित होते हैं और यही भाग्य को संवारते भी हैं और बिगाड़ते भी हैं। समाज को बड़ी संख्या में ऐसे मनोविज्ञानी चाहिए जो ज्योतिष का मर्म समझते हों। जातक की कुंडली के अध्ययन से उसकी कई बीमारियों का निदान भी चुटकियों में किया जा सकता है। प्रोफेसर हंसराज ने कहा कि सूर्य की प्रतिनिधि आत्मा, और मन का प्रतिनिधि चंद्रमा लग्न के प्रतिनिधि शरीर के साथ मिलकर जीवन की दशा और दिशा तय करते हैं। आत्मा और मन राजा की तरह जीवन के आरोह अवरोह बनाते हैं। जो ग्रह हमारे जीवन पर असर डालते हैं हम केवल उन्हीं का अध्ययन कर पाते हैं। जैसे सूर्य और चंद्रमा का असर तो भौतिक जीवन पर स्पष्ट देखा जाता है लेकिन नवग्रहों और 27 नक्षत्रों के अध्ययन से कई समस्याओं का समाधान किया जाता है। ज्योतिष कर्म करने वाले साधक यदि अर्थलोलुपता के दुष्प्रभाव से बचे रहें तो इस विधा की शान दिन ब दिन बढ़ती जाएगी।
इस अवसर पर प्रमुख संरक्षक एमएस श्रीवास्तव ने चिकित्सा ज्योतिष के विभिन्न आयामों के आधार पर बताया कि देश के कई राज्यों में गंभीर बीमारियों का इलाज ज्योतिषीय मार्गदर्शन में किया जा रहा है। मंच के प्रमुख केसी कलानिधि ने कहा कि ज्योतिष शास्त्र में ऐसे लोगों की जरूरत नहीं है जो लोगों को ठगते रहते हैं। उन्होंने कहा कि कालसर्प दोष या तो होता है या नहीं होता लेकिन वह कभी आंशिक नहीं होता। जबकि कई ज्योतिषी भ्रांतियां फैलाकर लोगों को ठगने का काम करते रहते हैं। कार्यक्रम में न्यूसी समैया, राजेश सोनी, श्वेता विजयवर्गीय, पं.सुदर्शन लव पांडेय.समेत कई विद्वानों ने ज्योतिषीय घटनाओं पर प्रकाश डाला।
प्रधानमंत्री ने “श्री महाकाल लोक’’ के लोकार्पण के बाद जन समारोह को किया सम्बोधित
उज्जैन 11 अक्टूबर (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि भारत के सांस्कृतिक वैभव की पुर्नस्थापना का लाभ न केवल भारत को अपितु पूरे विश्व एवं समूची मानवता को मिलेगा। उज्जैन में ‘श्री महाकाल लोक’ की स्थापना इसी की कड़ी है। यह काल के कपाल पर कालातीत अस्तित्व का शिलालेख है। उज्जैन आज भारत की सांस्कृतिक अमरता की घोषणा और नये कालखण्ड का उद्घोष कर रहा है। हमारे लिये धर्म का अर्थ कर्त्तव्यों का सामूहिक संकल्प, विश्व का कल्याण एवं मानव मात्र की सेवा है। हमने आजादी के पहले जो खोया था, उसकी आज पुनर्स्थापना हो रही है। प्रधानमंत्री श्री मोदी आज उज्जैन में ‘श्री महाकाल लोक’ के लोकार्पण के बाद जन समारोह को सम्बोधित कर रहे थे। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि ‘श्री महाकाल लोक’ दिव्य है। यहाँ सब कुछ अलौकिक, अविस्मरणीय एवं अविश्वसनीय है। महाकाल की आराधना अन्त से अनन्त की यात्रा है, आनन्द की यात्रा है, इससे काल की रेखाएँ भी मिट जाती हैं। महाकाल लोक आने वाली कई पीढ़ियों को अलौकिक दिव्यता और सांस्कृतिक ऊर्जा की चेतना प्रदान करेगा। इस अदभुत कार्य के लिये मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान, उनकी सरकार और मन्दिर समिति का मैं हृदय से अभिनन्दन करता हूँ, जिन्होंने निरन्तर पूरे समर्पण से सेवा-यज्ञ किया है। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि भगवान महाकाल की नगरी उज्जैन वह नगरी है, जो प्रलय के प्रहार से भी मुक्त है। “प्रलयो न बाध्यते, तत् महाकाल पूज्यते”। उज्जैन न केवल काल गणना एवं ज्योतिषिय गणना का केन्द्र है, अपितु यह भारत की आत्मा का केन्द्र भी है। यह पवित्र सात पुरियों में एक है। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने शिक्षा ग्रहण की। विक्रमादित्य के प्रताप से भारत के स्वर्णकाल की शुरूआत हुई। विक्रम संवत महाकाल की भूमि से ही शुरू हुआ। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि उज्जैन के क्षण-क्षण में इतिहास, कण-कण में आध्यात्म और कोने-कोने में ईश्वरीय ऊर्जा है। यहाँ कालचक्र के चौरासी कल्पों के प्रतीक चौरासी महादेव, चार महावीर, छह विनायक, आठ भैरव, अष्टमातृका, नौ ग्रह, दस विष्णु, ग्यारह रूद्र, बारह आदित्य, चौबीस देवियाँ एवं 88 तीर्थ हैं। इन सबके केन्द्र में कालाधिराज महाराज विराजमान हैं। पूरे ब्रह्माण्ड की ऊर्जा को ऋषियों ने प्रतीक रूप में समाहित किया। उज्जैन ने एक हजार वर्षों तक भारत की सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान, गरिमा, साहित्य, कला का नेतृत्व किया। कालिदास एवं बाणभट्ट की रचनाओं में यहाँ की सभ्यता, संस्कृति, शिल्प और वैभव का वर्णन मिलता है। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि किसी राष्ट्र का सांस्कृतिक वैभव, उसकी पहचान उसकी सफलता की सबसे बड़ी निशानी है। भारत में हमारे धार्मिक एवं सांस्कृतिक केन्द्र का निरन्तर विकास किया जा रहा है। उज्जैन सहित सोमनाथ, केदारनाथ, बद्रीनाथ आदि केन्द्रों का समुचित विकास किया जा रहा है। चारधाम प्रोजेक्ट में ऑल वेदर रोड बनाये जा रहे हैं। हमने स्वदेश दर्शन एवं प्रसाद योजनाएँ चलाई हैं। हमारे धार्मिक एवं आध्यात्मिक केन्द्रों का गौरव पुनर्स्थापित हो रहा है। महाकाल लोक आज अतीत के गौरव के साथ भविष्य के स्वागत के लिये तैयार हो चुका है। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि हमारे प्राचीन मन्दिरों की दिव्यता, भव्यता, वास्तु और कला हमें आश्चर्यचकित करती है। कोणार्क का सूर्य मन्दिर, एलोरा का कैलाश मन्दिर, मोढेरा का सूर्य मन्दिर, तंजौर का ब्रह्मदेवेश्वर मन्दिर, कांचीपुरम का तिरूमल मन्दिर, रामेश्वरम मन्दिर, मीनाक्षी मन्दिर और श्रीनगर का शंकराचार्य मन्दिर बेजोड़ है। हमारे मन्दिरों का आध्यात्मिक सन्देश आज भी स्पष्ट रूप से सुनाई देता है। पीढ़ियाँ इसे देखती हैं, सुनती हैं। ये हमारी निरन्तरता और परम्परा के वाहक हैं। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि महाकाल लोक में हमारी सांस्कृतिक परम्परा को कला एवं शिल्प के रूप में उकेरा गया है। यहाँ शिव पुराण की कथाओं पर आधारित कलाकृतियाँ बनाई गई हैं। उन्होंने देशवासियों से अपील की कि वे यहाँ अवश्य आयें। यहाँ भगवान शिव के दर्शन के साथ ही उनकी महिमा और महत्व के दर्शन भी होंगे। यहाँ निर्मित पंचमुखी शिव, डमरू, अर्धचंद्र, सप्तऋषि मण्डल अद्वितीय हैं। शिव ही ज्ञान है। शिव दर्शन ब्रह्माण्ड दर्शन है। ज्योतिर्लिंगों का विकास भारत की आध्यात्मिक ज्योति ज्ञान एवं दर्शन का विकास है। भारत आज विश्व के मार्गदर्शन के लिये फिर तैयार है। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि श्री महाकालेश्वर में की जाने वाली भस्म आरती अवसान से पुनर्जीवन और अन्त से अनन्त की यात्रा का प्रतीक है। जहाँ महाकाल हैं, वहाँ विष भी कुंदन होता है। यह भारत की जीवटता और अपराजेय अस्तित्व की प्रतीक है। भारत सदियों से अजर-अमर है। हमारी सभ्यता, परम्परा, आत्मा-जागृत है। श्री महाकालेश्वर विश्व में एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। मन्दिर हमारी आस्था के प्रमाणित केन्द्र हैं। इनके माध्यम से भारत पुनर्जीवित हो रहा है। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि भारत में हजारों वर्षों से कुंभ मेले की परम्परा है। हर बारह वर्ष में हम अमृत मंथन करते हैं और उसमें निकलने वाले अमृत पथ पर चलते हैं। पिछले कुंभ मेले में मैं उज्जैन आया था। उस समय मेरे मन में श्री महाकाल लोक सम्बन्धी संकल्प आया, जिसे आज संकल्प के रूप में मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने चरितार्थ किया है, मैं उन्हें धन्यवाद देता हूँ। आज प्राचीन मूल्यों पर नया भारत खड़ा हो रहा है। हमारी विज्ञान और शोध की परम्पराएँ जीवित हैं। खगोल विद्या के क्षेत्र में चंद्र यान, गगन यान मिशन महत्वपूर्ण सफलताएँ हैं। रक्षा के क्षेत्र में हम आत्म-निर्भर हैं। हमारे युवा स्किल, स्पोर्ट्स, स्टार्टअप्स के क्षेत्र में विश्व में भारत का डंका बजा रहे हैं। मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि भारत में ही सभ्यता के सूर्य का उदय हुआ। हमारी संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम् एवं सर्वे भवन्तु सुखिन: भी है। हमारा सन्देश विश्व कल्याण का है। भारत के इसी सन्देश को स्वामी विवेकानन्द ने सारी दुनिया को दिया। एक नरेन्द्र ने जो किया दूसरा नरेन्द्र आज उसे पूरा कर रहा है। हमारा योग, उपनिषद, गीता-ज्ञान, आयुष वे दुनिया में लेकर गये। आज श्री नरेन्द्र मोदी गौरवशाली, वैभवशाली, शक्तिशाली भारत का निर्माण कर रहे हैं। श्री चौहान ने कहा कि 2016 के सिंहस्थ में विचार महाकुंभ भी हुआ था, जिसमें प्रधानमंत्री श्री मोदी आये थे। विचार महाकुंभ में 51 अमृत बिन्दु निकले, जिनमें से एक श्री महाकाल लोक की स्थापना का कार्य भी था। प्रधानमंत्री श्री मोदी की प्रेरणा से इस कार्य की शुरूआत की गई। वर्ष 2018 में केबिनेट ने इसे स्वीकृति दी, वर्ष 2019-20 में यह कार्य मंद हो गया, लेकिन वर्ष 2020 के बाद तेजी से हुआ। आज इसका लोकार्पण हो रहा है। भगवान शिव सबका कल्याण करने वाले हैं, थोड़ी-सी पूजा से वे प्रसन्न हो जाते हैं, जिसे दुनिया ठुकराती है, उसे अपनाते हैं। उन्होंने पूरी दुनिया को अमृत दिया और स्वयं जहर पिया। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि आज भौतिकता से दग्ध मानवता को शाश्वत शान्ति का अदभुत दर्शन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत करायेगा। हम सभी भारत के नवनिर्माण में अपना सर्वश्रेष्ठ दें। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने उपस्थित सभी को विश्व एवं प्राणीमात्र के कल्याण का संकल्प दिलाया। प्रारम्भ में प्रधानमंत्री श्री मोदी को राज्यपाल श्री मंगुभाई पटेल एवं मुख्यमंत्री श्री चौहान ने नन्दी द्वार की प्रतिकृति भेंट की। श्री मोदी का मुख्यमंत्री श्री चौहान ने रूद्राक्ष की माला, अंग वस्त्र एवं पगड़ी पहना कर स्वागत किया। प्रसिद्ध भजन गायक श्री कैलाश खेर ने सुमधुर शिव-स्तुति प्रस्तुत की। समूचा वातावरण शिवभक्ति से ओत-प्रोत हो गया। उल्लेखनीय है कि श्री महाकाल लोक के लोकार्पण अवसर पर महाकाल मन्दिर सहित पूरे प्रदेश के प्रमुख मन्दिरों एवं देवस्थलों पर रोशनी की गई और स्थानीय लोगों ने स्क्रीन पर लोकार्पण समारेाह को देखा। मन्दिरों में भजन-कीर्तन सहित शिव आरती भी हुई। मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के प्रयासों से न केवल मध्य प्रदेश के 52 जिले, बल्कि पूरे भारत सहित 40 से अधिक देश इस अदभुत समारोह के साक्षी बने। चारों ओर शिव महिमा की गूँज सुनाई दी। सभी लोग श्री महाकाल लोक के लोकार्पण से आनन्दित और भक्तिमय हो गये। धार्मिक और आध्यात्मिक रूप में विकसित किये गये श्री महाकाल लोक को देख कर भारत सहित अन्य देश के लोग भी मंत्रमुग्ध हो उठे। बनारस कॉरिडोर की तर्ज पर बने इस लोक के आकर्षण से कोई भी अछूता नहीं रहा। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने भी श्री महाकाल लोक को देख कर मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के प्रयासों पर प्रसन्नता जाहिर की। लोकार्पण समारोह में छत्तीसगढ़ की राज्यपाल सुश्री अनुसुइया उइके, झारखंड के राज्यपाल रमेश बैस, केन्द्रीय कृषि एवं कल्याण मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर, नागरिक उड्डयन एवं इस्पात मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, केन्द्रीय सामाजिक न्याय एवं अध्यिाकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार खटीक, इस्पात राज्य मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते, केन्द्रीय जलशक्ति एवं खाद्य प्र-संस्करण उद्योग राज्य मंत्री प्रहलाद पटेल सहित मध्य प्रदेश के मंत्रीगण एवं बड़ी संख्या में साधु-सन्त, श्रद्धालु और नागरिक उपस्थित थे।
पर्यूषण यानि दसलक्षण पर्व का जैनधर्म में बहुत ही महत्व है। यह पर्व हमारे जीवन को परिवर्तित करने का कारण बन सकता है। यह ऐसा पर्व है जो हमारी आत्मा की कालिमा को धोने का काम करता है। दिगम्बर एवं श्वेतांबर जैन दोनों में यह पर्व भारी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।वास्तव में ये वह अभ्यास पाठशाला है जिसमें हम अपने विचारों को आधुनिक जीवन के साथ अपडेट और मूल जीवनचर्या के साथ रीसेट कर सकते हैं।
दिगम्बर, श्वेताम्बर दोनों सम्प्रदाय इसे एक समान तौर पर स्वीकार करते हैं और पूरी वैचारिकता के साथ मनाते हैं।विशेष यह है कि श्वेताम्बर समाज भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशी से भाद्रपद शुक्ला पंचमी तक सिर्फ 8 दिन का मनाते हैं। जबकि दिगम्बर समाज में 10 दिन का प्रचलन है। यह एक मात्र आत्मशुद्धि और आत्म जागरण का पर्व है।इस वर्ष यह महापर्व श्वेतांबर परंपरा में 24 से 31 अगस्त एवं दिगम्बर जैन परंपरा में 31 अगस्त से 9 सितम्बर 2022 तक विधि विधान, त्याग-तपस्या, साधना के साथ मनाया जा रहा है।
आत्मा के दस मूलभूत गुणों की आराधना : इस पर्व में आत्मा के दस मूलभूत गुणों की आराधना की जाती है। इनका सीधा सम्बंध आत्मा के कोमल परिणामों से है। इस पर्व का वैशिष्ट्य है कि इसका सम्बन्ध किसी व्यक्ति विशेष से न होकर आत्मा के गुणों से है। इन गुणों में से एक गुण की भी परिपूर्णता हो जाय तो मोक्ष तत्व की उपलब्धि होने में किंचित् भी संदेह नहीं रह जाता है। जैन धर्म में अहिंसा एवं आत्मा की शुद्धि को सबसे महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। प्रत्येक समय हमारे द्वारा किये गये अच्छे या बुरे कार्यों से कर्म बंध होता है, जिनका फल हमें अवश्य भोगना पड़ता है। शुभ कर्म जीवन व आत्मा को उच्च स्थान तक ले जाता है, वही अशुभ कर्मों से हमारी आत्मा मलिन होती जाती है।इसलिए जीवन को सार्थक बनाने में ये सभी दस गुण बहुत कारगर साबित होते हैं।
दस दिन तक प्रत्येक दिन एक एक धर्म की आराधना : पर्युषण पर्व के दौरान विभिन्न धार्मिक क्रियाओं से आत्मशुद्धि की जाती व मोक्षमार्ग को प्रशस्त करने का प्रयास किया जाता है, ताकि जनम-मरण के चक्र से मुक्ति पायी जा सके। जब तक अशुभ कर्मों का बंधन नहीं छुटेगा, तब तक आत्मा के सच्चे स्वरूप को हम नहीं पा सकते हैं।
इस पर्व के दौरान दस धर्मों- उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन एवं उत्तम ब्रह्मचर्य को धारण किया जाता है। समाज के सभी पुरूष, महिलाएं एवं बच्चे पर्युषण पर्व को पूर्ण निष्ठा के साथ मनाते है। यह पर्व जीवन में नया परिवर्तन लाता है। दस दिवसीय यह पावन पर्व पापों और कषायों को रग -रग से विसर्जन करने का संदेश देता है।
आत्म जागरण का संदेश : संपूर्ण संसार में यही एक ऐसा उत्सव या पर्व है जिसमें आत्मरत होकर व्यक्ति आत्मार्थी बनता है व अलौकिक, आध्यात्मिक आनंद के शिखर पर आरोहण करता हुआ मोक्षगामी होने का सद्प्रयास करता है। पर्युषण आत्म जागरण का संदेश देता है और हमारी सोई हुई आत्मा को जगाता है। इस जाग्रत अवस्था से हमें आत्मा को पहचानने की शक्ति देता है।
यह पर्व जीवमात्र को क्रोध, मान,माया,लोभ, ईर्ष्या, द्वेष, असंयम आदि विकारी भावों से मुक्त होने की प्रेरणा देता है। हमारे विकार या खोटे भाव ही हमारे दु:ख का कारण हैं और ये भाव वाह्य पदार्थों या व्यक्तियों के संसर्ग के निमित्त से उत्पन्न होते हैं। आसक्ति—रहित आत्मावलोकन करने वाला प्राणी ही इनसे बच पाता है। इस पर्व में इसी आत्म दर्शन की साधना की जाती है। यह एक ऐसा अभिनव पर्व है कि जिसमें अपने ही भीतर छिपे सद्गुणों को विकसित करने का पुरुषार्थ किया जाता है। अपने व्यक्तित्व को समुन्नत बनाने का यह पर्व एक सर्वोत्तम माध्यम है।
इस दौरान व्यक्ति की संपूर्ण शक्तियां जग जाती हैं। पर्युषण का अर्थ है – ‘ परि ‘ यानी चारों ओर से , ‘ उषण ‘ यानी धर्म की आराधना। वर्ष भर के सांसारिक क्रिया – कलापों के कारण उसमें जो दोष चिपक गया है , उसे दूर करने का प्रयास इस दौरान किया जाता है। शरीर के पोषण में तो हम पूरा वर्ष व्यतीत कर देते हैं। पर पर्व के इन दिनों में आत्म के पोषण के लिए व्रत, नियम, त्याग, संयम को अपनाया जाता है।
विकृति का विनाश और विशुद्धि का विकास : सांसारिक मोह-माया से दूर मंदिरों में भगवान की पूजा-अर्चना, अभिषेक, आरती, जाप एवं गुरूओं के समागम में अधिक से अधिक समय को व्यतीत किया जाता है एवं अपनी इंद्रियों को वश में कर विजय प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। दसलक्षण धर्म (पर्यूषण पर्व) के फल के बारे में आचार्य कार्तिकेय स्वामी ने लिखा है-
यह धर्म के दशभेद पाप कर्म को नाश करने वाले और पुण्य का प्रार्दुभाव करने वाले हैं। इसे इस रूप में भी कहा जा सकता है कि यह धर्म पुण्य के पालक और पाप के प्रक्षालक हैें।
इस पर्व में सभी अपने को अधिक से अधिक शुद्ध एवं पवित्र करने का प्रयास करते है। प्रेम, क्षमा और सच्ची मैत्री के व्यवहार का संकल्प लिया जाता है। खान-पान की शुद्धि एवं आचार-व्यवहार की शालीनता को जीवनशैली का अभिन्न अंग बनाये रखने के लिये मन को मजबूत किया जाता है। विकृति का विनाश और विशुद्धि का विकास करना ही इस पर्व का ध्येय है। पर्व पापों और कषायों को रग -रग से विसर्जन करने का संदेश देता है।
राष्ट्रीय उत्कृष्टता नवाचार समिट में हेमलता तिवारी को मिला साहित्य श्री सम्मान
देहरादून,19 अगस्त(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। उत्तराखंड के पर्यटन स्थल देहरादून की अभ्युदय वातस्ल्यम संस्था की ओर से आयोजित समागम 2022 में देश भर से आए विद्वानों ने भारत को विश्वगुरु बनाने के सूत्र बताए हैं। संस्था की ओर से इन विद्वानों को सम्मान देकर अलंकृत भी किया गया है। छत्तीसगढ़ के रायपुर की विदुषी डॉ.हेमलता तिवारी को संस्था की ओर से साहित्य श्री सम्मान से अलंकृत किया गया। स्वाधीनता दिवस की 75 वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित अखिल भारतीय शैक्षिक नवाचार, प्राकृतिक-जैविक कृषि, शिल्प उद्यमी, पर्यावरणीय पर्यटन, आध्यात्मिक विज्ञान समागम 2022 में अभ्युदय वात्सल्यम की अध्यक्ष और निदेशक डॉ.श्रीमती गार्गी मिश्रा ने बताया कि उनकी संस्था ने देश भर में नवाचारों के लिए योग्य प्रतिभागियों को चयनित किया है। संस्था की ओर से भारतीय संस्कृति में रचे बसे सामाजिक अनुसंधान कर्ताओं को प्रोत्साहित किया जाता है। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय उत्कृष्ट नवाचार समिट में डॉ.हेमलता तिवारी को उत्कृष्ट साहित्य रचना काऊंसिलिंग, वोकेशनल ट्रेनर एवं व्यक्तित्व विकास के माध्यम से समाज का मार्गदर्शन करने के अनुकरणीय नवाचारी योगदान के लिए सम्मानित किया गया है। उन्होंने बताया कि विश्व कल्याण के लिए संकल्पित अभ्युदय वात्सल्यम परिवार वसुधैव कुटुंबकम की भावना से समाज में शिक्षा, सामाजिक, सांस्कृतिक, लोक कल्याण, एवं पर्यावरण आदि विषयों पर सिर्फ चिंतन ही नहीं कुछ प्रायोगिक कार्य भी कर रहे व्यक्तियों को सम्मानित करके गौरव महसूस कर रहा है। हम आशा करते हैं कि हमारी संस्था की ओर से चयनित ये विशेष व्यक्तित्व के धनी लोग भारतीय समाज को नए आयाम प्रदान करते रहेंगे। इन प्रतिभाशाली व्यक्तित्वों की ओर से किए जा रहे विशिष्ट कार्यऔर कर्तव्य के प्रति लगन शीलता देखकर देश की नई पीढ़ी प्रेरणा पाएगी और अनुकरण करके देश को बुलंदियों पर ले जाएगी।
संस्था की ओर से डॉ.हेमलता तिवारी को अभ्युदय श्री सम्मान और प्रशस्तिपत्र देकर सम्मानित किया गया। डॉ.तिवारी ने इस अवसर पर प्रेस से चर्चा करते हुए कहा कि भारत सरकार ने कृषि को सफल बनाने के लिए जो सुधार कार्य किए हैं वे सराहनीय हैं। मध्यप्रदेश के कई किसान अब बिखरी हुई कृषि परिस्थितियों पर विजय पाने के लिए सहकारिता के माध्यम से सामूहिक खेती कर रहे हैं। उनकी खेती संसाधनों और तकनीक के आधुनिक प्रयोग से सरल होती जा रही है। उन्होंने बताया कि छोटी जोत वाले किसानों के लिए कृषि का मशीनीकरण केवल ख्वाब रहता है। इस सपने को साकार करने के लिए किसानों ने कंपनी बनाकर खेती को संयुक्त करना शुरु कर दिया है। इससे उन्हें वे सभी संसाधन आसानी से मिलने लगे हैं जिन्हें छोटे किसानों के लिए दुरूह समझा जाता था।
उन्होंने बताया कि ठेका खेती की अवधारणा से डरे किसानों ने अब आपस में गठबंधन करके कंपनियां बनाई हैं। येकंपनियां किसानों को बीज खाद, पानी,ट्रेक्टर एवं अन्य मशीनें मुहैया कराने के साथ साथ अनाज की मार्केटिंग में भी मदद कर रहीं हैं। देश भर में इसी तरह से खेती के स्वरूप को बदलकर खाद्यान्न की जरूरतें पूरी की जा सकती हैं। यही नहीं जैविक खेती से उपजे खाद्यान्न से लोगों को कई बीमारियों से भी बचाया जा सकेगा। एक नए हिंदुस्तान की दिशा में इन प्रयासों का विस्तार जरूरी हो गया है।
कुंडलपुर 25 फरवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। दमोह जिले के कुंडलपुर में इन दिनों चल रहा बड़े बाबा भगवान आदिनाथ का महामस्तकाभिषेक अब हर नौ साल बाद होगा। भगवान आदिनाथ को ऊंची वेदी और भव्य जिनालय में प्रतिष्ठित करवाने के बाद आज आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने अपनी देशना में ये घोषणा की। वर्तमान महामस्तकाभिषेक होली के दिन तक चलता रहेगा,अगला आयोजन नौ साल बाद होगा। महामस्काभिषेक के इस अवसर पर देश विदेश से आए श्रद्धालुओं ने बढ़ चढ़कर भाग लिया। आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने कहा कि भगवान आदिनाथ के पुत्र भगवान बाहुबलि की प्रतिमा दक्षिण के श्रवणबेलगोला में है वहां महामस्तकाभिषेक हर बारह सालों में होता है। देश विदेश से धर्मावलंबी वहां पहुंचते हैं। भगवान बाहुबलि की ये प्रतिमा खड़गासन में है जबकि कुंडलपुर में उनके पिता भगवान आदिनाथ की विशाल प्रतिमा बैठी हुई अवस्था में है। कुंडलपुर में भगवान आदिनाथ की प्रतिमा समूचे विश्व में पुण्य के अर्जन के लिए पाप प्रक्षालन का निमित्त बनेगी। उन्होंने कहा कि आचार्यों के अनुसार पाप का प्रक्षालन करके ही पुण्य अर्जित किया जा सकता है। आगम में इसके सिवाय कोई दूसरा मार्ग नहीं बताया गया है। ये प्रभु की भक्ति और ध्यान से ही संभव हो सकता है। पुण्य का अर्जन स्थायी होता है ये किसी भी प्रकार नष्ट नहीं होता। शास्त्रों में 94 पदार्थ बताए गए हैं पर उनमें से केवल पुण्य ही ऐसा है जो अविनाशी है। आचार्यश्री ने कहा कि कुंडलपुर में महमस्तकाभिषेक का ये अवसर दुर्लभ है। मेरी शारीरिक अवस्था की वजह से मैं सोच रहा था कि शायद मैं पहाड़ चढ़कर बड़े बाबा के चरणों तक नहीं पहुंच पाऊंगा लेकिन बाबा ने मुझे बुला लिया। आज जहां महामस्तकाभिषेक चल रहा है वहां मैं भी पहुंच गया हूं। अब होली के बाद से हर नौ साल बाद महामस्तकाभिषेक की ये परंपरा चलती रहेगी। बड़े बाबा भगवान आदिनाथ पूरे विश्व के लिए पूज्यनीय हैं। यहां आकर लोग मुंडन कराते रहे हैं अब महामस्तकाभिषेक के माध्यम से वे पुण्य का अर्जन भी करते रहेंगे। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए वो जो जीवन शैली अपनाएंगे उससे सारे विश्व का कल्याण होगा।
कुंडलपुर पंचकल्याणक महोत्सव में जाकर केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वीडी शर्मा ने बडे़ बाबा के दर्शन किए
कुंडलपुर 22 फरवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। दमोह जिले के कुंडलपुर में चल रहे पंचकल्याणक महोत्सव में आज समवसरण में विराजमान आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने दो टूक शब्दों में कहा कि भारत धर्म सापेक्ष देश है। हमारे देश की सभी समस्याओं का समाधान धार्मिक परंपराओं से हो जाता है, ऐसे में देश को धर्म निरपेक्ष कहने की आयातित सोच से अब हमें बाहर निकलना होगा। समय आ गया है जब संविधान में डाला गया धर्मनिरपेक्ष शब्द हटाया जाए और उसकी जगह भारत को धर्म सापेक्ष देश घोषित किया जाए। धर्मसभा में उपस्थित जन समुदाय ने करतल ध्वनि से आचार्य़ श्री की बात का समर्थन किया। आचार्य श्री ने सबसे पवित्र समवसरण में विराजमान होकर ईश्वरीय वाणी के रूप में कहा कि भारत का जनमन जिस धार्मिकता से धरा का वैभव संवारता रहा है हमें उस पर गौर करना होगा। उन्होंने कहा कि राष्ट्र की रक्षा और उन्नति धर्म से विमुख होकर नहीं हो सकती। अंग्रेजों ने धर्म का अर्थ रिलीजन यानि साम्प्रदायिक होना गलत समझाया है। धर्म का सही अर्थ तो कर्तव्य का ठीक से पालन करना होता है। महोत्सव के खचाखच भरे विशाल पंडाल में जन समुदाय ने कई बार आचार्य श्री की बातों का जय जय उद्घोष करके समर्थन किया। पंचकल्याणक महोत्सव में आज केन्द्रीय विमानन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया भी पहुंचे थे। कुंडलपुर महोत्सव में आज भगवान आदिनाथ का समवसरण सजाया गया था। इस समवसरण में आचार्यश्री अपने निर्यापक शिष्यों के साथ विराजमान थे। समवसरण में भगवान की देशना (धर्म उपदेश) के रूप में आचार्यश्री ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि धर्म की विदेशी परिभाषा को स्वीकार करते हुए भारत को धर्म निरपेक्ष राष्ट्र कहा गया, यह बिल्कुल गलत है। धर्म का सही अर्थ समझा ही नहीं गया। धर्म हमें सन्मार्ग पर चलने की प्ररेणा देता है। धर्म हमारी आत्मा को पवित्र बनाता है। भारत की संस्कृति रही है कि धर्म पर चलने वाला राजा ही प्रजा को सुखी रख सकता है। धर्म से विमुख होकर जनता का हित कैसे हो सकता है? भारत के राजनेताओं को इस बारे में सोचना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत के नेताओं को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। आचार्यश्री ने धर्म के पांच गुण भी बताये। उन्होंने कहा कि जहां झूठ, चोरी, हिंसा, कुशील के साथ कम से कम परिग्रह (आवश्यकता के अनुसार वस्तुओं का संग्रह) की बात हो, वहां धर्म होता है।लोक के लिए धन का संग्रह तो किया जाए पर लोभवश संग्रह न किया जाए। दया का मूल ही धर्म है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में रहकर धर्म निरपेक्ष की बात करना, बिल्कुल गलत है। उन्होंने कहा कि मेरा यह संदेश केन्द्र सरकार तक पहुंचना चाहिए। आचार्यश्री के इस आव्हान पर लोगों ने तालियां बजाकर समर्थन किया।आचार्यश्री ने कहा कि हमारी मौलिक शिक्षा हर बच्चे को आत्मनिर्भर बना सकती है। हमें ऐसा आलोक चाहिए जो किसी भी ग्रहण की स्थिति में देश को अंधकार में भटकने से बचा सके।
आचार्यश्री ने इस बात पर चिन्ता व्यक्त की कि आज षड्यंत्र पूर्वक तरीके से अंडे को शाकाहारी और दूध को मांसाहारी बताया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस धरती पर यदि साक्षात लक्ष्मी है तो वह गाय है। शास्त्रों में लिखा है कि भगवान आदिनाथ के पुत्र भरत चक्रवर्ती के समय वे तीन करोड़ गौशालाओं का संचालन करते थे। आचार्यश्री ने नकली दूध के प्रचलन पर चिन्ता व्यक्त करते हुए, त्यौहारों के समय दूध मावा से बनी नकली मिठाईयों पर रोक लगाने की जरूरत भी बताई। कुंडलपुर महोत्सव में आज सुबह से प्रतिष्ठाचार्य विनय भैया के निर्देशन में धार्मिक अनुष्ठान शुरू हुए। भगवान के अभिषेक, शांतिधारा व नित्य पूजन के बाद आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज की पूजा की गई। इसके बाद मुनि आदिसागर को केवल ज्ञान प्राप्त हुआ। आचार्यश्री के संघस्थ मुनियों ने लगभग 2000 प्रतिमाओं को सूर्यमंत्र देकर उनकी प्राण प्रतिष्ठा की। कुंडलपुर के बड़े बाबा मंदिर में विराजमान नवीन प्रतिमाओं को भी सूर्यमंत्र दिया गया। पंचकल्याणक में भगवान की प्रतिमाओं को पहनाये गये वस्त्र व सोने के आभूषण लेने भक्तों में होड मच गई। मूल विधि नायक भगवान के वस्त्र आभूषण की बोली 2 करोड़ 17 लाख में लगी। कुंडलपुर महोत्सव में भगवान के समवसरण के लोकार्पण का सौभाग्य दुनिया के सबसे बड़े मार्बल व्यापारी अशोक पाटनी परिवार को मिला। उन्होंने सपरिवार समवसरण का लोकार्पण किया। केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और भाजपा प्रदेशाध्यक्ष वीडी शर्मा ने आज कुंडलपुर पहुंचकर बड़े बाबा आदिनाथ भगवानके दर्शन किए और छोटे बाबा आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज का आशीर्वाद लिया। सिंधिया ने प्रेस से चर्चा में कहा कि हम मप्र वासी सौभाग्यशाली हैं कि आचार्यश्री ने अपना अधिकांश समय मप्र में गुजारा है। उनका आशीर्वाद और मार्गदर्शन हमें मिलता रहता है। सिंधिया ने कहा कि प्रदेश की जनता की खुशहाली के लिये आशीर्वाद लेने कुंडलपुर आया हूं। वीडी शर्मा ने भी मीडिया से बात करते हुए कहा कि भगवान के दर्शन करने और आशीष लेने आया हूं। दस दिवसीय कुंडलपुर महोत्सव का समापन कल बुधवार को विशाल रथयात्रा फेरी के साथ होगा। फेरी के लिये देशभर से 27 रथ कुंडलपुर पहुंचकर चुके हैं। कल दोपहर में इन रथों पर भगवान को विराजमान कर मुख्य पांडाल की सात फेरियां लगाई जाएंगीं।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कुंडलपुर को पवित्र क्षेत्र घोषित किया
कुंडलपुर 21 फरवरी (प्रेस इँफार्मेशन सेंटर)। दमोह जिले में स्थित जैन तीर्थ क्षेत्र कुंडलपुर में आज मुख्यमंत्री शिवराज सिंहासन चौहान ने धर्मसभा में आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के सामने कहा कि तीर्थ क्षेत्र के आसपास के 7 किलोमीटर क्षेत्र को पवित्र स्थल के रूप में नोटिफाई किया जाएगा, यहां मांस मदिरा व अन्य अनैतिक गतिविधियों पर सख्ती से रोक रहेगी। चौहान आज सपत्नीक कुंडलपुर महोत्सव में शामिल होने पहुंचे थे। कुंडलपुर महोत्सव में आज ज्ञान कल्याणक (पूर्व) के धार्मिक अनुष्ठान प्रतिष्ठाचार्य विनय भैया के निर्देशन में किये गये। दोपहर में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने मंत्रिमंडल सहयोगी गोपाल भार्गव व ओमप्रकाश सकलेचा के साथ महोत्सव स्थल पहुंचे। उनके साथ उनकी पत्नि श्रीमती साधना सिंह भी थीं। पूर्व वित्तमंत्री जयंत मलैया और रामकृष्ण कुसमरिया भी इस अवसर पर उपस्थित थे। कुंडलपुर कमेटी ने मुख्यमंत्री और श्रीमती साधना सिंह को चांदी का मुकुट पहनाकर, चांदी का प्रशस्ति पत्र सौंपा। चौहान ने आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज के चरणों में श्रीफल भेंटकर आचार्यश्री का संघ सहित आशीर्वाद लिया।
आचार्यश्री विद्यासागर जी का आशीर्वाद लेने पहुंचे शिवराज सिंह चौहान और उनकी धर्मपत्नी
आचार्यश्री ने प्रवचन में कहा कि भारत के गौरवशाली इतिहास को सामने लाना जरूरी है।ये तभी संभव है जब देश को इंडिया बनाने के बजाए भारत बनाया जाए। भारत की मुद्रा का अवमूल्यन केवल इसलिए हो रहा है क्योंकि हमने आत्मनिर्भरता की राह छोड़कर आयातित सोच को महत्व देना बंद नहीं किया है। आजादी के बाद संविधान निर्माताओं ने भगवान आदिनाथ का प्रतीक चिन्ह संविधान पर अंकित किया था। भगवान आदिनाथ ने समाज को आत्मनिर्भरता का संदेश दिया था। उन्होंने कहा कि कोरोना जैसी बीमारियों को दूर भगाना चाहते हो तो आयुर्वेद पर जोर देना होगा। आजादी के बाद साढ़े सात दशक बीत चुके हैं अब हमें तेजी से काम करना होगा। आचार्य श्री ने कहा कि देश की बुलंदी के लिए हमें भाषा की भूमिका की पहचान करनी होगी। संविधान में हमने बहुत सारी बातें शामिल की हैं लेकिन हमारी संस्कृति की सोच को हम अब तक केन्द्र में नहीं ला पाए हैं। हमारे न्यायालय जनता की भाषा में घोषणा नहीं करते हैं इसलिए जनता की आस्था लोकतंत्र में स्थापित नहीं हो पा रही है। अदालत में भाषा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि मातृभाषा का असर पूरे समाज पर पड़ता है। पिता की भाषा(अंग्रेजी) देश के व्यक्तित्व का विकास अब तक नहीं कर पाई है। हम विदेशी विचार के प्रभाव में अपनी सहमति भले ही दे दें लेकिन इससे हमारी असफलता की इबारत ही लिखी जाती है। प्राणी की रक्षा तभी संभव है जब हम नकारात्मक भाव को तिलांजलि देंगे और हां की कूबत देखेंगे। सकारात्मकता का असर इतना प्रभावी होता है कि उसके नतीजे देखकर हम दंग रह जाते हैं। उन्होंने कहा कि कुंडलपुर के लोगों ने दस दिनों में विशाल पंचकल्याणक की तैयारियां करके साबित किया है कि यदि हम ठान लें तो सब संभव हो सकता है। भारतीयता को लागू करने में सरकारों को कोई शंका नहीं करनी चाहिए। जनता भी सब समझ रही है। आप आगे बढ़ें ,शंका न करें कि कुर्सी हिल जाएगी। जनता आपके सद्प्रयासों को हाथों हाथ लेगी, और आपकी कुस्री भी नहीं हिलेगी।हमें किसी पर अधिकार नहीं करना है,हमारी मंशा साफ है तो जाहिर है कि सबके अधिकार सुरक्षित रहेंगे। हमारी संस्कृति हमारे जीवन का अंग है, यही राष्ट्र के अंग अंग में ऊर्जा भरती है। हमारे देश में रामायण भी पढ़ी जाती है और महाभारत भी। आप इस संस्कृति पर चलेंगे तो देखेंगें कि जिस तरह आधी रात को विभीषण स्वयं चलकर राम की शरण में आया था और रावण राज का अंत हो गया था उसी तरह हम यदि आगे बढ़ेंगे तो सभी परेशानियों का अंत हो जाएगा। आज देश को सबसे उत्तम अवसर मिला है। हम फैसलें लेंगे तो दुनिया में कोई भी भारत को हिला नहीं पाएगा। उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के माध्यम से देश के नेताओं को संदेश दिया कि हम अपनी विचारधारा को मजबूत करेंगे तो उनकी राजनीति को कोई नुक्सान नहीं पहुंचेगा।
कुंडलपुर महोत्सव में विशाल जनसमूह के सामने शिवराज सिंह ने 17 जनवरी 2006 की तारीख को याद करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री का पद संभाले सिर्फ दो महीने हुए थे, तभी आचार्यश्री ने बड़े बाबा को बड़े सिंहासन पर विराजमान करने का भाव किया। कलेक्टर एसपी और सभी कानूनविद चेतावनी दे रहे थे कि ऐसा हुआ तो सरकार जा सकती है। मैंने तय कर लिया सरकार जाए तो चली जाए, लेकिन आचार्यश्री की भावना के अनुसार बड़े बाबा को बड़े सिंहासन पर विराजमान करके रहेंगे। चौहान ने कहा कि पिछले चुनाव में हमारी सरकार चली गई थी। हमने सोचा अब पांच साल तक विपक्ष में बैठना है, लेकिन बडे बाबा आदिनाथ भगवान और छोटे बाबा आचार्यश्री की कृपा से मुझे फिर से मुख्यमंत्री पद मिला। मैं भाग्यशाली हूं कि बड़े बाबा के भव्य व दिव्य मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा मेरे कार्यकाल में हो रही है। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार के संचालन में कभी कभी कुछ अड़चनें आती हैं। कुछ फैसले लेने में परेशानी होती है। ऐसे में मैं आचार्यश्री के चित्र के सामने ध्यान लगाने बैठता हूं और मेरी सारी समस्याओं का हल मुझे मिल जाता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि आचार्यश्री को प्रणाम किये बिना वह घर से नहीं निकलते। चौहान ने पहली बार आचार्यश्री से कहा कि सभी के प्रति करूणा रखने वाले आचार्यश्री अपने शरीर के प्रति इतने निर्मोही क्यों हैं? मानवता के कल्याण के लिये आचार्य भगवन का हमारे बीच रहना बहुत जरूरी है। आचार्यश्री के प्रवचन से पहले निर्यापक मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने सुझाव दिया कि कुंडलपुर के 100 किलोमीटर क्षेत्र को पशुओं के लिये अभ्यारण्य घोषित किया जाए, जहां पशु निर्भय होकर विचरण कर सकें। कुंडलपुर महोत्सव में कल मंगलवार को भगवान आदिनाथ का ज्ञान कल्याणक महोत्सव मनाया जाएगा। सुबह से ही धार्मिक अनुष्ठान शुरू होंगे। दोपहर में आचार्यश्री समोशरन में बैठकर प्रवचन देंगे।
श्रीमद्भगवदगीता को हिंदू धर्म में बड़ा ही पवित्र ग्रंथ माना जाता है। गीता के माध्यम से ही भगवान श्रीकृष्ण ने संसार को धर्मानुसार कर्म करने की प्रेरणा दी। हम आपको गीता के कुछ चुनिंदा प्रबंधन सूत्रों के बारे में बता रहे हैं जो भगवान श्रीकृष्ण ने कलयुग के मापदंडों को ध्यान में रखते हुए ही दिए हैं। श्लोक 1 त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तरमादेतत्त्रयं त्यजेत्।। अर्थ: काम, क्रोध व लोभ। यह तीन प्रकार के नरक के द्वार आत्मा का नाश करने वाले हैं अर्थात् अधोगति में ले जाने वाले हैं, इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए। मैनेजमेंट सूत्र: काम यानी इच्छाएं, गुस्सा व लालच ही सभी बुराइयों के मूल कारण हैं। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने इन्हें नरक का द्वार कहा है। जिस भी मनुष्य में ये 3 अवगुण होते हैं, वह हमेशा दूसरों को दुख पहुंचाकर अपने स्वार्थ की पूर्ति में लगे रहते हैं। अगर हम किसी लक्ष्य को पाना चाहते हैं तो ये 3 अवगुण हमें हमेशा के लिए छोड़ देना चाहिए। क्योंकि जब तक ये अवगुण हमारे मन में रहेंगे, हमारा मन अपने लक्ष्य से भटकता रहेगा। श्लोक 2 तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।। अर्थ: श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मनुष्यों को चाहिए कि वह संपूर्ण इंद्रियों को वश में करके समाहितचित्त हुआ मेरे परायण स्थित होवे, क्योंकि जिस पुरुष की इंद्रियां वश में होती हैं, उसकी ही बुद्धि स्थिर होती है। मैनेजमेंट सूत्र: जीभ, त्वचा, आंखें, कान, नाक आदि मनुष्य की इंद्रीयां कही गई हैं। इन्हीं के माध्यम से मनुष्य विभिन्न सांसारिक सुखों का भोग करता है जैसे- जीभ अलग-अलग स्वाद चखकर तृप्त होती है। सुंदर दृश्य देखकर आंखों को अच्छा लगता है। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो मनुष्य अपनी इंद्रीयों पर काबू रखता है उसी की बुद्धि स्थिर होती है। जिसकी बुद्धि स्थिर होगी, वही व्यक्ति अपने क्षेत्र में बुलंदी की ऊंचाइयों को छूता है और जीवन के कर्तव्यों का निर्वाह पूरी ईमानदारी से करता है। श्लोक 3 योगस्थ: कुरु कर्माणि संग त्यक्तवा धनंजय। सिद्धय-सिद्धयो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते।। अर्थ: हे धनंजय (अर्जुन)। कर्म न करने का आग्रह त्यागकर, यश-अपयश के विषय में समबुद्धि होकर योगयुक्त होकर, कर्म कर, (क्योंकि) समत्व को ही योग कहते हैं। मैनेजमेंट सूत्र: धर्म का अर्थ होता है कर्तव्य। धर्म के नाम पर हम अक्सर सिर्फ कर्मकांड, पूजा-पाठ, तीर्थ-मंदिरों तक सीमित रह जाते हैं। हमारे ग्रंथों ने कर्तव्य को ही धर्म कहा है। भगवान कहते हैं कि अपने कर्तव्य को पूरा करने में कभी यश-अपयश और हानि-लाभ का विचार नहीं करना चाहिए। बुद्धि को सिर्फ अपने कर्तव्य यानी धर्म पर टिकाकर काम करना चाहिए। इससे परिणाम बेहतर मिलेंगे और मन में शांति का वास होगा। मन में शांति होगी तो परमात्मा से आपका योग आसानी से होगा। आज का युवा अपने कर्तव्यों में फायदे और नुकसान का नापतौल पहले करता है, फिर उस कर्तव्य को पूरा करने के बारे में सोचता है। उस काम से तात्कालिक नुकसान देखने पर कई बार उसे टाल देते हैं और बाद में उससे ज्यादा हानि उठाते हैं। श्लोक 4 नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना। न चाभावयत: शांतिरशांतस्य कुत: सुखम्।। अर्थ: योगरहित पुरुष में निश्चय करने की बुद्धि नहीं होती और उसके मन में भावना भी नहीं होती। ऐसे भावनारहित पुरुष को शांति नहीं मिलती और जिसे शांति नहीं, उसे सुख कहां से मिलेगा। मैनेजमेंट सूत्र: हर मनुष्य की इच्छा होती है कि उसे सुख प्राप्त हो, इसके लिए वह भटकता रहता है, लेकिन सुख का मूल तो उसके अपने मन में स्थित होता है। जिस मनुष्य का मन इंद्रियों यानी धन, वासना, आलस्य आदि में लिप्त है, उसके मन में भावना ( आत्मज्ञान) नहीं होती। और जिस मनुष्य के मन में भावना नहीं होती, उसे किसी भी प्रकार से शांति नहीं मिलती और जिसके मन में शांति न हो, उसे सुख कहां से प्राप्त होगा। अत: सुख प्राप्त करने के लिए मन पर नियंत्रण होना बहुत आवश्यक है। श्लोक 5 विहाय कामान् य: कर्वान्पुमांश्चरति निस्पृह:। निर्ममो निरहंकार स शांतिमधिगच्छति।। अर्थ: जो मनुष्य सभी इच्छाओं व कामनाओं को त्याग कर ममता रहित और अहंकार रहित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करता है, उसे ही शांति प्राप्त होती है। मैनेजमेंट सूत्र: यहां भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन में किसी भी प्रकार की इच्छा व कामना को रखकर मनुष्य को शांति प्राप्त नहीं हो सकती। इसलिए शांति प्राप्त करने के लिए सबसे पहले मनुष्य को अपने मन से इच्छाओं को मिटाना होगा। हम जो भी कर्म करते हैं, उसके साथ अपने अपेक्षित परिणाम को साथ में चिपका देते हैं। अपनी पसंद के परिणाम की इच्छा हमें कमजोर कर देती है। वो ना हो तो व्यक्ति का मन और ज्यादा अशांत हो जाता है। मन से ममता अथवा अहंकार आदि भावों को मिटाकर तन्मयता से अपने कर्तव्यों का पालन करना होगा। तभी मनुष्य को शांति प्राप्त होगी। श्लोक 6 न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। कार्यते ह्यश: कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:।। अर्थ: कोई भी मनुष्य क्षण भर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। सभी प्राणी प्रकृति के अधीन हैं और प्रकृति अपने अनुसार हर प्राणी से कर्म करवाती है और उसके परिणाम भी देती है। मैनेजमेंट सूत्र: बुरे परिणामों के डर से अगर ये सोच लें कि हम कुछ नहीं करेंगे, तो ये हमारी मूर्खता है। खाली बैठे रहना भी एक तरह का कर्म ही है, जिसका परिणाम हमारी आर्थिक हानि, अपयश और समय की हानि के रुप में मिलता है। सारे जीव प्रकृति यानी परमात्मा के अधीन हैं, वो हमसे अपने अनुसार कर्म करवा ही लेगी। और उसका परिणाम भी मिलेगा ही। इसलिए कभी भी कर्म के प्रति उदासीन नहीं होना चाहिए, अपनी क्षमता और विवेक के आधार पर हमें निरंतर कर्म करते रहना चाहिए। श्लोक 7 नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण:। शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मण:।। अर्थ: तू शास्त्रों में बताए गए अपने धर्म के अनुसार कर्म कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा। मैनेजमेंट सूत्र: श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से मनुष्यों को समझाते हैं कि हर मनुष्य को अपने-अपने धर्म के अनुसार कर्म करना चाहिए जैसे- विद्यार्थी का धर्म है विद्या प्राप्त करना, सैनिक का कर्म है देश की रक्षा करना। जो लोग कर्म नहीं करते, उनसे श्रेष्ठ वे लोग होते हैं जो अपने धर्म के अनुसार कर्म करते हैं, क्योंकि बिना कर्म किए तो शरीर का पालन-पोषण करना भी संभव नहीं है। जिस व्यक्ति का जो कर्तव्य तय है, उसे वो पूरा करना ही चाहिए। श्लोक 8 यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।। अर्थ: श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं, सामान्य पुरुष भी वैसा ही आचरण करने लगते हैं। श्रेष्ठ पुरुष जिस कर्म को करता है, उसी को आदर्श मानकर लोग उसका अनुसरण करते हैं। मैनेजमेंट सूत्र: यहां भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि श्रेष्ठ पुरुष को सदैव अपने पद व गरिमा के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि वह जिस प्रकार का व्यवहार करेगा, सामान्य मनुष्य भी उसी की नकल करेंगे। जो कार्य श्रेष्ठ पुरुष करेगा, सामान्यजन उसी को अपना आदर्श मानेंगे। उदाहरण के तौर पर अगर किसी संस्थान में उच्च अधिकार पूरी मेहनत और निष्ठा से काम करते हैं तो वहां के दूसरे कर्मचारी भी वैसे ही काम करेंगे, लेकिन अगर उच्च अधिकारी काम को टालने लगेंगे तो कर्मचारी उनसे भी ज्यादा आलसी हो जाएंगे। श्लोक 9 न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्म संगिनाम्। जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्त: समाचरन्।। अर्थ: ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे किंतु स्वयं परमात्मा के स्वरूप में स्थित हुआ और सब कर्मों को अच्छी प्रकार करता हुआ उनसे भी वैसे ही करावे। मैनेजमेंट सूत्र: ये प्रतिस्पर्धा का दौर है, यहां हर कोई आगे निकलना चाहता है। ऐसे में अक्सर संस्थानों में ये होता है कि कुछ चतुर लोग अपना काम तो पूरा कर लेते हैं, लेकिन अपने साथी को उसी काम को टालने के लिए प्रोत्साहित करते हैं या काम के प्रति उसके मन में लापरवाही का भाव भर देते हैं। श्रेष्ठ व्यक्ति वही होता है जो अपने काम से दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है। संस्थान में उसी का भविष्य सबसे ज्यादा उज्जवल भी होता है। श्लोक 10 ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्या पार्थ सर्वश:।। अर्थ: हे अर्जुन। जो मनुष्य मुझे जिस प्रकार भजता है यानी जिस इच्छा से मेरा स्मरण करता है, उसी के अनुरूप मैं उसे फल प्रदान करता हूं। सभी लोग सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं। मैनेजमेंट सूत्र: इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि संसार में जो मनुष्य जैसा व्यवहार दूसरों के प्रति करता है, दूसरे भी उसी प्रकार का व्यवहार उसके साथ करते हैं। उदाहरण के तौर पर जो लोग भगवान का स्मरण मोक्ष प्राप्ति के लिए करते हैं, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। जो किसी अन्य इच्छा से प्रभु का स्मरण करते हैं, उनकी वह इच्छाएं भी प्रभु कृपा से पूर्ण हो जाती है। कंस ने सदैव भगवान को मृत्यु के रूप में स्मरण किया। इसलिए भगवान ने उसे मृत्यु प्रदान की। हमें परमात्मा को वैसे ही याद करना चाहिए जिस रुप में हम उसे पाना चाहते हैं। श्लोक 11 कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतु र्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।। अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन। कर्म करने में तेरा अधिकार है। उसके फलों के विषय में मत सोच। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु मत हो और कर्म न करने के विषय में भी तू आग्रह न कर। मैनेजमेंट सूत्र: भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन से कहना चाहते हैं कि मनुष्य को बिना फल की इच्छा से अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा व ईमानदारी से करना चाहिए। यदि कर्म करते समय फल की इच्छा मन में होगी तो आप पूर्ण निष्ठा से साथ वह कर्म नहीं कर पाओगे। निष्काम कर्म ही सर्वश्रेष्ठ परिणाम देता है। इसलिए बिना किसी फल की इच्छा से मन लगाकार अपना काम करते रहो। फल देना, न देना व कितना देना ये सभी बातें परमात्मा पर छोड़ दो क्योंकि परमात्मा ही सभी का पालनकर्ता है।
“यदि शूद्र में सत्य आदि उपयुक्त लक्षण हैं और ब्राह्मण में नहीं हैं, तो वह शूद्र शूद्र नहीं है, न वह ब्राह्मण ब्राह्मण। युधिष्ठिर कहते हैं कि हे सर्प जिसमें ये सत्य आदि ये लक्षण मौजूद हों, वह ब्राह्मण माना गया है और जिसमें इन लक्षणों का अभाव हो, उसे शूद्र कहना चाहिए”…. -महाभारत,वनपर्व सर्प-युधिष्ठिर संवाद
धर्मशात्रों में ब्राह्मणों का स्थान अप्रतिम और अमोघ माना गया है। लोग कह सकते है क्योंकि शास्त्रकार सबके सब ब्राह्मण होते थे इसलिए खुद को सर्वोपरि रखा। फिर भी ब्राह्मणत्व में ऐसा कुछ न कुछ तो होगा कि प्रायः प्रत्येक थर्मशास्त्रों में बार बार समाज को सावधान किया गया है कि वह ब्राह्मणों को रुष्ट होने का अवसर नहीं दे। क्योंकि….
मन्युप्रहरणा विप्राः न विप्रा शस्त्रयोधिनः। निहन्युर्मन्युना विप्राः बज्रपाणिर वासुरान।।
ब्राह्मण शस्त्र उठाकर युद्ध नहीं करता, उसका हथियार उसका क्रोध है। क्रोध के द्वारा ब्राह्मण वैसा ही विनाश करता है, जैसा विनाश असुरों का इंद्र करते हैं।
वास्तविक पक्ष यह है कि ब्राह्मणों के शील, स्वभाव और चरित्र की कल्पना जिस ऊंचे धरातल पर की गई है उसे देखते हुए यह सर्वोपरि स्थान प्राप्त हुआ।
ब्राह्मण नैतिकता के प्रहरी थे। वे समाज के विवेक के प्रतिनिधि होते थे, अतेव उनका धर्म था कि स्वयं राजा भी कुमार्ग पर चले तो उसका प्रतिरोध करे।
स्पष्टतः यह वही कर सकता है जिसे किसी वस्तु का लोभ न हो। राजा के चरणों में बिछा ब्राह्मण चारण हो सकता है ब्राह्मण नहीं। वह धन और कीर्ति के लोभ में पड़कर अपने कर्तव्य से विमुख न हो।
भगवान शंकराचार्य से जुड़ी एक कथा है..संन्यास की दीक्षा के उपरान्त वे भिक्षा के लिए एक ब्राह्मणी के घर पहुंचे- मातु भिक्षाम् देहि, की टेर लगाई। ब्राह्मणी अत्यंत गरीब थी। उसके घर अन्न का एक दाना भी न था। वह स्वयं कई दिनों से भूखी थी ..पर याचक अतिथि को कैसे लौटाती। उसके घर एक सूखा आँवला था उसे भिक्षु शंकर को दे दिया।
कृशकाय गरीब ब्रह्माणी की दशा देखकर आचार्य शंकर की करुणा जगी। शंकर ने स्त्रोत पाठकर माँ लक्ष्मी का आह्वान किया। माँ प्रसन्न हुईं और शंकर की याचनानुसार गरीब ब्राह्मणी के घर को स्वर्ण आँवलों से भर दिया।
शंकराचार्य यह स्वयं के लिए कर सकते थे या ब्राह्मणी क्षुधापूर्ति के अंतिम साधन से अपना पेट भर सकती थी। पर दोनों ने अपने अपने धर्म का अनुपालन किया। वास्तव में ब्राह्मण धर्म यही है इसीलिए वेदान्त, पुराणों में ब्राह्मण की सर्वोच्चता है।
सच्चा ब्राहमण वो जो धन, यश, कीर्ति, सम्मान की अपेक्षा न करे। इसीलिए मनुस्मृति में बार बार ब्राह्मणों को सावधान किया गया है।
असम्मानात्तपोवृद्धिः सम्मानातु तपःक्षयः
असम्मान पाने से तपस्या में वृद्धि होती है, सम्मान पाने से तप का विनाश होता है।
सम्मान से ब्राह्मण उसी प्रकार भागे, जैसे मनुष्य जहर से भागता है और अपमान की कामना वह उसी प्रकार करे, जैसे लोग अमृत की कामना करते हैं।
अर्चितः पूजितो विप्रः दुग्ध गौरिव सीदति।
अर्थात अर्चित पूजित विप्र दुही हुई गौ के समान सूख जाता है। यह मनु का आख्यान है उनके स्मृति ग्रंथ में।
क्या ऐसा नहीं लगता कि हम ब्राह्मणत्व के गौरव का तो उपभोग करना चाहते हैं पर उसके जीवन आचरण के कठोर अनुशासन को विस्मृत कर देते हैं। वैदिक काल में ब्राह्मणों का इसलिए सत्कार था क्योंकि वे कठोर जीवन का निर्वाह करते थे।
एक बड़ा प्रश्न वैदिक काल से ही विमर्श का विषय रहा है कि ब्राह्मणत्व जन्म से प्राप्त होता है या कर्म से।
जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उचयते।
इस श्लोक से स्पष्ट है वर्ण निर्धारण कर्म से होना चाहिए। किंतु अत्रि संहिता में यही बात विपरीत ढंग से कही गयी है।
जन्मना ब्राह्मणौं ग्येयः संस्काराद् द्विज उच्यते।
अर्थात् ब्राह्मण जन्म से ही ब्राह्मण होता है, संस्कारों से द्विजत्व की प्राप्ति होती है।
यह शंका महाभारतकार महर्षि व्यास के भी मन में भी थी, जिसे उन्होंने वनपर्व में वर्णित युधिष्ठिर-सर्प संवाद में प्रत्यक्ष किया है। सर्प युधिष्ठिर से पूछता है..ब्राह्मण कौन है? इस पर युधिष्ठिर कहते हैं कि ब्राह्मण वह है, जिसमें सत्य, क्षमा, सुशीलता, क्रूरता का अभाव तथा तपस्या और दया, इन सद्गुणों का निवास हो। इस पर सर्प शंका करता है कि ये गुण तो शूद्र में भी हो सकते हैं, तब ब्राह्मण और शूद्र में क्या अंतर है?
शूद्रेष्वपि च सत्यं च दानम्क्रोध एव च आनृशंस्रमहिंसा च घृणा चैव युधिष्ठिर।
अर्थात् हे युधिष्ठिर, सत्य, दान,दया, अहिंसा आदि गुण तो शूद्रों में भी हो सकते हैंं। इस पर युधिष्ठिर ने जो उत्तर दिया, वह किसी भी अभिनव मनुष्य का उत्तर हो सकता है। युधिष्ठिर ने कहा..
शूद्रे तु यद् भवेल्लक्ष्म द्विजे तच्च न विद्यते, न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मणः। यत्रैतल्लक्ष्यते सर्प वृत्तं स ब्राह्मणः स्मृतः यत्रैतन्न भवेत सर्प तं शूद्रमति निर्दिशेत।
अर्थात यदि शूद्र में सत्य आदि उपयुक्त लक्षण हैं और ब्राह्मण में नहीं हैं, तो वह शूद्र शूद्र नहीं है, न वह ब्राह्मण ब्राह्मण। हे सर्प जिसमें ये सत्य आदि ये लक्षण मौजूद हों, वह ब्राह्मण माना गया है और जिसमें इन लक्षणों का अभाव हो, उसे शूद्र कहना चाहिए।
भारतीय ग्यान परंपरा की अमूल्य निधि वैदिक वाग्यमय की रचना अकेले ब्राह्मणों ने नहीं की है। ऋषिपरंपरा में वर्ण व्यवस्था नहीं थी। प्रकारान्तर में वे ब्राह्मण माने गए जिन्होंने तप,साधना और ग्यान से ब्रह्म के रहस्य को जाना।
वेद सहित उस समय का रचा हुआ समग्र साहित्य श्रुति और स्मृति परंपरा से होते हुए उस काल तक पहुँचा जहाँ जनसंचार के साधन मिलने शुरू हुए। जब यह ग्यान वृहद ग्रंथों के रूप में संकलित होने लगा तब इसमें ग्रंथकारों की ओर से क्षेपक और बुद्धिविलास बखानने का काम शुरू हुआ। वैदिक ग्रंथों की टीकाएं सुविधानुसार की जाने लगी इससे ग्यान की मूल अवधारणा दूषित होने लगी।
जिस वर्ग पर इसके संरक्षण व संवर्धन की जिम्मेदारी थी उसी ने सबसे ज्यादा यह काम किया। ऋषिपरंपरा से प्रवाहित प्रवाहित होकर चली यह ग्यान संपदा समयकाल के साथ विरूपित होती गयी।
आज जिस शोध व अनुसंधान की जरूरत है वह यही कि नीर-क्षीर विवेक का प्रयोग करते हुए वेद पुराणों के शुद्ध व संशोधित संस्करण लाए जाएं जो समयकाल के विरूपण से मुक्त हों।
ग्यान पर ब्राह्मणों का एकाधिकार कभी नहीं रहा। उसे हर वर्ग के लोगों ने संपन्न किया। विश्व के दो महान ग्रंथ हैं, पहला बाल्मीक कृत रामायण, दूसरा वेदव्यास कृत महाभारत। ये दोनों ही महापुरुष जन्म से ब्राह्मण नहीं हैं। सूतजी जिन्हें कथावाचक या सूत्रधार के रूप में पुराणों को लोकमानस तक पहुंचाने का श्रेय जाता है वे ब्राह्मण नहीं अपितु वर्ण से शूद्र थे।
वेद ध्वनि सुनने पर शूद्र और स्त्री के कानों में पिघला हुआ सीसा डाल देने का श्लोक रचने वाले वही स्वार्थी तत्व थे जिन्होंने ने ऋषि परंपरा से निकले ग्यान को कर्मकाण्ड में बदलकर उसे अपनी वृत्ति(पेशा) बना लिया। यह जानना चाहिए कि वेद किन्हीं एक व्यक्ति द्वारा नहीं लिखे गए। यह तत्कालीन समाज की सहकारी रचनाकर्म है जिसमें महिलाओं का योगदान अग्रगण्य है।
वेदों में विदुषियों का सम्मान सहित उल्लेख है। और फिर इस बात का उल्लेख पहले ही कर चुका हूँ कि वेदों के रचनाकाल के समय वर्णव्यवस्था थी ही नहीं। यह तो बहुत बाद स्मृति ग्रंथों व पुराणों के रचनाकाल में घनीभूत हुई।
इसलिए महाभारत में युधिष्ठिर-सर्प संवाद में ब्राह्मण व शूद्र को जिस तरह परिभाषित किया गया और ग्रंथकार वेदव्यास ने जो परिभाषा दी वही सबको ग्राह्य और विशाल हिंदू समाज में उसी की ही पुर्नप्राणप्रतिष्ठा की जानी चाहिए।
धर्म,अर्थ,काम
और मोक्ष ये चार पुरुषार्थ
हैं। अर्थ और काम भौतिक हैं,तथा
मनुष्यों को इनकी आकांक्षा
होना स्वाभाविक है। ऐसा कोई
व्यक्ति नहीं होगा जो धन
प्राप्ति की आकांक्षा न रखता
हो। धन के बिना जीवन नीरस हो
जाता है। जिनके पास धन होता
है वे मजे में रहते हैं,एवं
अपने नाती पोतों के लिए धन
जोड़ते चले जाते हैं। धन हर
एक कार्य कर देता है। ज्योतिष
की दृष्टि से हम इसी विषय की
चर्चा यहां करेंगे।
धन स्थान
का कुंडली में दूसरा घर होता
है,एवं प्राप्ति(लाभ)
स्थान 11 वें
भाव को कहते हैं।जहां लाभ
स्थान उत्तम होगा वहीं धन की
बचत होगी। खर्च की स्थिति
जानने के लिए कुंडली में 12
वां घर होता है। इसके
साथ ही अन्य घरों का महत्व
संक्षेप में निम्नानुसार है।
1.लाभ स्थान
में स्वग्रही गुरु और
साथ में नेप्च्यून हो तो जातक
की(जिसकी
जन्म कुंडली हो) आय
उत्तम होती है।
2.लाभ
स्थान में गुरु अकेला हो,
तो जातक की आय
स्थिर होती है। अगर गुरु के
साथ शुक्र, बुध
अथवा ग्यारहवें भाव का स्वामी
हो तो आवक थोड़ी होती है।
3.ग्यारहवें
भाव में गुरु चंद्र की युति
हो तो वारिसनामा मिलता है,तथा
गुरु व चतुर्थेश हो, तो
भी जातक धन संपत्ति का वारिस
बनता है।
4.धनेश,
भाग्येश,
लाभ स्थान में
हो तो जातक की आवक बहुत होती
है। अगर धनेश भाग्येश साथ में
होकर 11 वें
स्थान में हो तो जातक अत्यंत
धनवान होता है।
5.धनेश,
भाग्येश में
से कोई भी एक ग्रह लाभस्थान
में हो और दूसरा बारहवें भाव
में हो तो जातक की आर्थिक स्थिति
सामान्य होती है।
6.ग्यारहवें
भाव पर बारहवें भाव के स्वामी
की दृष्टि पड़े तो साधारण आय
होती है।
7.लाभेश
छठे, आठवें
या बारहवें स्थान में हो तो
दूषित होने के कारण जातक की
आर्थिक आय मध्यम होती है।
8.ग्यारहवें
स्थान का स्वामी शत्रु स्थान
में या नीच का हो तो जातक की
आय घटती है।
9.ग्यारहवें
भाव का स्वामी दशम भाव में हो
तो आवक कम रहती है।
10.ग्यारहवें
भाव का स्वामी बारहवें भाव
में हो या दशम भाव में हो तो
भी आय से खर्च अधिक होता है।
उपर्युक्त
दस बिंदुओं में से आय कैसी
होगी ये दर्शाया गया है। बचत
बैंक बैलेन्स होगा या नहीं
इसकी जानकारी इस प्रकार है।
1.धन
स्थान से आवक नहीं देखी जाती
लेकिन इसे धन संचय या बैंक
बैलेन्स का स्थान कहते हैं।
धन स्थान के साथ बारहवें भाव
की स्थिति का अध्ययन करना
जरूरी है। क्योंकि बारहवां
भाव जातक का है। आवक-जावक
में से जो पैसा बचता है वही
बचत होती है।
2.धन
स्थान में व लाभ स्थान में ये
विशेषता है कि गुरु के साथ
शुक्र की युति हो तो धन संचय
में बाधा आती है। धन स्थान में
गुरु हो और शुक्र लाभेश या
भाग्येश होकर पड़ा हो अथवा
धन स्थान में गुरु लाभ भाव में
भाग्येश होकर पडा हो तो धन
संचय में खूब वृद्धि होती है।
3.अगर
धन स्थान में भाग्य स्थान का
परिवर्तन योग हो तो जातक की
आय का काफी हिस्सा खर्च होता
है। और उसके बाद भी काफी धन
अनुपयोगी पड़ा रहता है।
4.धन
स्थान का स्वामी गुरु हो और
कुंडली में शनि की युति हो
अथवा धन स्थान का स्वामी शनि
हो और गुरु की युति हो तो उसकी
संपत्ति कोई दूसरा नहीं ले
सकता। ऐसा जातक धन इकट्ठा करने
वाला होता है।
5.धन
स्थान का स्वामी पराक्रम में
हो तो जातक के पास पराक्रम
द्वारा कमाया धन होता है यानि
वह स्वप्रयत्नों से धन लाभ
पाता है।
6.धन
स्थान और पराक्रम स्थान के
स्वामी का एक दूसरी राशि में
परिवर्तन हो और इस परिवर्तन
योग में मंगल ग्रह हो तो जातक
के पास धन रहता है और वह कंजूस
प्रवृ़त्ति का होता है।
7.धन
स्थान का स्वामी कुंडली में
पांचवे स्थान में पड़ा हो और
शुक्र ग्रह युक्त हो या उस पर
शुक्र ग्रह की दृष्टि पड़ रही
हो या मित्र क्षेत्री हो तो
उस व्यक्ति के पास अटूट संपदा
होने में कोई शक नहीं है।
8.अगर
लाभ स्थान में सारे ग्रह पड़े
हों एवं आसपास कोई ग्रह नहीं
हो तो जातक की आय बहुत कम रहती
है। या यूं कहें कि कामचलाऊ
के अलावा धन नहीं रहता।
9.धनस्थान
का स्वामी कुंडली में लग्न
चतुर्थ, सप्तम,
दशम यानि केन्द्र
में शुभ या मित्र ग्रह की युति
में हों तो धन अच्छा जुड़ता
है।
धन
स्थान व लाभ स्थान के विचार
के बाद अब भाग्य स्थान बाकी
रह गया है। भाग्य के बगैर सब
अधूरा रहता है। अगर आपकी कुंडली
में भाग्य स्थान बली न हो तो
न तो धन रहेगा न लाभ तो आईए
भाग्य के विषय में थोड़ा जान
लें।
सर्व
प्रथम तो ये जानना आवश्यक है
कि भाग्य स्थान का संबंध मात्र
धन संपत्ति से नहीं होता इंसान
के व्यक्तित्व,यश
कीर्ति से भी इसका संबंध है।
नवम
भाव को भाग्य भवन कहते हैं।
भाग्य का अर्थ धनवान होना नहीं
होता बल्कि भाग्य शब्द का
क्षेत्र बहुत बड़ा है। भाग्य
के बल पर सब कुछ मिलता है,
ये बात ध्यान
में रखनी चाहिए।
1 . मेष
लग्न हो व भाग्य भाव में गुरु
व चंद्र की युति हो तो जातक के
धार्मिक होने के साथ साथ बाहिरी
संबंध उचित होंगे। व माता सुख
उत्तम रहता है। विद्या उत्तम
होने के साथ साथ पुत्रवान होकर
सुख भोगता है। यदि भाग्य भाव
में शुक्र हो तो धन संपत्तिवान
व स्त्री सुख उत्तम पाता है।
स्त्रियों
से लाभ भी मिलता है। अगर मंगल
हो व शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़
रही हो तो जातक शारीरिक सुख
व आयु लाभ पाने वाला होता है।
भाईयों का सहयोग उत्तम रहता
है,लेकिन
मातृ सुख से वंचित भी करता है।
इस भाव में चंद्र, गुरु,
शुक्र,
सूर्य ही उपयुक्त
रहते हैं। बाकी सभी ग्रह कुछ
न कुछ अनिष्ट कारक ही रहते
हैं।
2.यदि
जातक की वृषभ लग्न व नवम भाव
में बुध पड़ा हो तो वह धन
संपत्तिवान होगा। धन व्यापारिक
लेखन, या
बुद्धि के कार्यों से अर्जित
करने वाला होगा। शनि राज्य
से लाभ दिलाने वाला होगा। इसी
प्रकार जातक को शुक्र भी स्व
प्रयत्नों से नाना माया से
या कला के क्षेत्र से अर्थालाभ
दिलाने वाला होगा। इन ग्रहों
की दृष्टि नवम भावपर पड़ रही
होगी तो भी ये लाभ दिलाएगा।
3,मिथुन
लग्न वालों का भाग्य अधिकतर
कष्टप्रद ही रहता है। व बहुत
धीमी गति से आगे बढ़ते हैं
क्योंकि अष्टम भाव मकर होता
है। अतःशनि बाधक ग्रह बन जाता
है।
4.कर्क
लग्न वाले भाग्यशाली ही होते
हैं। यदि गुरु भाग्य भाव में
होता तो वह स्वराशि मीन का
होता है, व
लग्न पर उच्च दृष्टि डालता
है। सप्तम पराक्रम भाव पर
शत्रु दृष्टि पड़ती है,लेकिन
अशुभ फल न मिलकर शुभ फल ही मिलता
है। पंचम भाव पर मित्र दृष्टि
पड़ने से ये पंचम भाव को अमृतपान
कराता है। अतःविद्या –
पूजा आदि उत्तम
होते हैं। शारीरिक सौंदर्य
भी बढ़ता है लेकिन अक्सर इन्हें
गंजेपन का भी रोग होता है। ये
उच्च पदों पर भी आसीन होते
हैं। यदि सूर्य गुरु की युति
रही तो राजदूत न्यायाधीश
राजनीति में प्रमुख एवं धनवान
होते हैं। यदि शुक्र रहा तो
इनके पास अटूट धन रहता है। व
प्रारंभ से अंत तक धनाड्य रहते
हैं। लाभ भी बहुत होकर वाहन
अधिपति होते हैं।
5 सिंह
लग्न वालों के लिए सूर्य या
सूर्य बुध की युति अति उत्तम
होती है। ये जातक भी बिंदु
क्रमांक चार के विवेचन के समान
रहते हैं।
6.कन्या
लग्न वालों के लिए शुक्र या
चंद्र या फिर शुक्र चंद्र की
युति उत्तम रहकर धनवान बनाती
है।
7.तुला
लग्न वालों के लिए बुध ग्रह
उत्तम रहता है। बुध यदि नवम
में हो या बारहवें भाव में हो
तो भाग्य उत्तम रहता है। उसे
बाहर के व्यापार विदेश या
व्यापारी बाहिरी संबंधों से
लाभ होता है। शनि भी अति शुभ
माना जाएगा।
8.वृश्चिक
लग्न वालों को गुरु व चंद्र
उत्तम बलशाली रहेंगे या इन
ग्रहों की दृष्टि पड़ने पर
भी भाग्य बलवान माना जाएगा।
9.धनु
लग्न वालों को गुरु व सूर्य
भाग्यशाली ग्रह होकर भाग्य
को बढ़ाने वाले होंगे। मंगल
व चंद्र ग्रह भी शुभ रहेंगे।
10 मकर
लग्न वालों को शनि व बुध की
स्थिति उत्तम भाग्यवर्धक
रहेगी। शुक्र भी उत्तम फलदायक
होंगे।
11.कुंभ
लग्न वालों को शनि शुक्र की
स्थिति लाभप्रद होने के साथ
भाग्यवर्धक रहेगी।
12.मीन
लग्न वालों को गुरु व मंगल की
दृष्टि शुभ रहेगी। कहते हैं
कि बिन भाग्य के सब सून ,भाग्यहीन
व्यक्ति दरिद्र के समान होता
है एवं भाग्य का होना धन संपत्ति
में चार चांद लगा देता है।
– भरतचन्द्र नायक
विश्व के लब्ध प्रतिष्ठित इतिहासकार मौलाना आजाद स्मृति व्याख्यान माला में भाग लेने आये थे। तब उन्होनें आक्रांताओं द्वारा विजित देशों में की गयी ज्यादियतों का हवाला देते हुए कहा था कि आक्रांता विजित देश में अपने समर्थन में भवन प्रासाद स्मृति के रूप में बनाते रहे है। लेकिन इन स्मारकों का उद्देश्य मजहबी नहीं सियासी होता आया है। इसलिए साम्प्रदायिक भावुकता से इन स्मारकों को देखना अपने आपको धोखा देना है। विश्व इतिहासकार अर्नोल्ड टोनवी ने बताया कि 1614 में रूस ने पोलेंड के वारसा पर अपना अधिकार जमा लिया था। रूस ने अपनी विजयी महत्वाकांक्षा में ईस्टर्न आर्थोडाॅक्स क्रिश्चियन केथेडूल प्रमुख स्थान पर बना डाला। रूस का इसके पीछे उद्देश्य यही था कि पोलिस में यह भावना बैठ जाये कि उनका असल मालिक रूस है। बाद में 1918 में पोलेंड की आजादी के बाद केथेडूल को जमीदोंज करने में पोलिस ने वक्त नहीं लगाया। उन्होनें भारत सरकार की इस बात के लिए खुले मन से प्रशंसा की कि उसने औरंगजेब की मसजिदों को सम्मान के साथ वजूद में रहने दिया। उलटे भारत सरकार पुरातत्व विभाग मुगलकालीन स्मारकों का संधारण करता है, जबकि स्मारकों का उद्देश्य सिर्फ आक्रान्ता, विदेश से भारत आये आक्रांताओं का वर्चस्व याद दिलाना, भारतीय अस्मिता को आहत करना है। अर्नोल्ड टोनवी ने भारतीयों की सहिष्णुता को विश्व में सर्वोच्च निरूपित किया है। ऐसे में अयोध्या में राम मंदिर को ढहाये जाने और विध्वंस में बचे अवशेषों को जोड़कर बाबर द्वारा मजिस्द बनाये जाने का मंतव्य समझना कठिन नहीं है। ऐसे में बरसों से अदालत में चल रहे इस विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय ने इस मसले को यदि हिन्दू-मुस्लिम के बीच सुलह सफाई से हल करने को कहा है तो यह अदालत की दूरदर्शितापूर्ण परामर्ष है। सर्वोच्च न्यायालय ने यहां पर सदाशयता बतायी कि जरूरत पड़ने पर न्यायालय मध्यस्थता करने को भी तैयार है। मुख्य न्यायाधीश ने माननीय न्यायाधीश की सेवाएं देने का प्रस्ताव किया है।
अध्योध्या में राम मंदिर विवाद पर तकनीकी रूप से स्पष्ट है कि आक्रान्ता बाबर ने राम मंदिर के विशाल ढांचे को ध्वस्त किया और मसजिद का निर्माण करा दिया, जिसे बाद में बाबरी मसजिद कहा गया और कार सेवा करते हुए आवेश में कार सेवकों ने ढांचा जमीदोंज कर दिया। इस विवाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना है कि रामलला जहां तम्बू के नीचे विराजमान है, उस भूमि पर मंदिर के स्थान पर मंदिर बनाया जाये। एक तिहायी भूमि अखाड़े को शेष आवेदक मुस्लिम समाज के हक में जायेगी। लेकिन फैसला माना नही गया और सर्वोच्च न्यायालय में विवाद पहुंचा जहां सर्वोच्च न्यायालय ने सुलह करने की सलाह दी है। अगर इस सद्परामर्श पर भी असहमति जताते हुए कुछ मुस्लिम संगठन मामले पर न्यायालय के निर्देश की अवमानना करते हुए जिद पर अड़े है। न्यायालय के आदेश के समर्थन में कुछ अल्पसंख्यक संगठन आगे भी आये है। लेकिन उनकी आवाज कमजोर मानी जा रही है। मजे की बात यह है कि अयोध्या में बाबरी ढांचा ढहाये जाने के बाद अदालत में जिस बुजुर्ग मुस्लिम हाशिम अंसारी ने याचिका दर्ज की थी, उसका बाद में हृदय परिवर्तन हुआ और उसने सुलह सफायी की बात करते हुए इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि मजहब के नाम पर आक्रामक तेवर अपनाने वाले लोग खाते-पीते लड़ रहे है और आराध्य रामलला एक तंबू में ऐसे मौसम की मार झेल रहे है कि उन्हें भोग लगना भी मयस्सर नहीं है। लेकिन अफसोस इस बात का है कि आज जब परस्पर संवाद का अवसर मिला है, हासिम अंसारी जन्नत सिधार चुके है, मुस्लिमों के बीच ऐसे नेक इंसानों की कमी है, अहंकार और तर्क परोसा जा रहा है। वे भूलते है कि राममंदिर विवाद आस्था का विषय है, यह जायदाद के बंटवारे का मामला नहीं है। आस्था में तर्क कम हृदय की विशालता, संवेदशनीलता अपेक्षित होती है।
राम जन्मभूमि जमीन के विवाद में उच्च न्यायालय अपना फैसला पहले ही दे चुका है, जिसे मान्य नहीं किया गया। अस्मिता से जुड़े मामले को दीवानी विवाद मानते हुए जो लोग अंतिम रूप से सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की बात कहने पर अड़े है, वे मुगालते में है कि विवाद में उनके पक्ष में ही निर्णय सुनाया जायेगा। कुछ लोग देश की न्याय व्यवस्था पर इस मामले के निर्णय कराने का दायित्व थोप रहे है, उनमें दूरदर्शितापूर्ण सोच की आस्था केन्द्रित भावना और न्यायालय के प्रति सम्मान की कमी है। कमी इस बात से जाहिर हो जाती है कि वे अपनी महत्वाकांक्षा के मोह में न्यायपालिका की मर्यादा नहीं समझ पा रहे है, वास्तव में सर्वोच्च न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश खेहर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ का निर्णय एक आदर्श है जो दोनों पक्षों को सम्मान देता है और उनकी सदाशयता पर विश्वास करता है। राष्ट्र में समरसता का स्थायी भाव जगाता है। आत्म परीक्षण का संकेत करता है। आज समस्या यह है कि भावनात्मक विवाद न्यायालय की देहलीज पर पहुंचते है और जब लंबे खिंचने के बाद उन पर अदालत का निर्णय आता है तो सरकारें निर्णय को अमल में लाने में अपने को असमर्थ पाती है। दुनिया की महाशक्ति अमेरिका भी ऐसे हालात से गुजरा है। इसलिए भारत को सबक लेने की आवश्यकता है। अमेरिका का सर्वोच्च न्यायालय शक्तिमान है और अमेरिकी न्याय व्यवस्था हर मामले में हमारी व्यवस्था से परिपक्व और शासन व्यवस्था साधन संपन्न है। फिर भी 1930 में जब एक मामले पर निर्णय आया तो अमेरिका प्रशासन के हाथ-पैर फूल गये। तत्कालीन राष्ट्रपति रूजवेल्ट को कहना पड़ा था कि निर्णय का अनुपालन भी सर्वोच्च न्यायालय ही करे, सरकार सक्षम नहीं है। हमें भारतीय न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता और न्याय की अस्मिता को उस दिशा में धकेलना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती। देश में सर्वधर्म समभाव से सभी जी रहे है। उन्हें भावनात्मक अतिरेक में धकेलना बुद्धिमानी नहीं है।
परस्पर विश्वास जीतकर ले-देकर इस समस्या का समाधान कर आने वाली पीढ़ी को सद्भाव से जीने, आजाद मुल्क की तरह बरताव करने, राष्ट्र की अस्मिता को कायम रखने का संदेश देना है। इसलिए अहंकार और जिद् पर अड़े रहने का यह वक्त नहीं है। मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम की हम सभी संतान है, हिन्दु और मुसलमान, क्योंकि जो भारत में जन्मा है उसके आदिपुरूष श्रीराम ही थे। धर्म परिवर्तन एक आकस्मिता थी जो दंड के भय, लालच और प्रलोभन से विवशता बनी। लेकिन धर्म परिवर्तन मात्र से पुरखे तो नहीं बदल जाते। इस बात पर हमें गौरव भी महसूस करना है कि भारत ही हमारा वतन है और श्रीराम हमारे आदर्श पूर्वज है। राम मंदिर अयोध्या का हल वार्तालाप से ही निकलेगा। सर्वोच्च न्यायालय को तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहा राव के समय राष्ट्रपति जी ने कहा था कि वे समस्या का समाधान बतावें। तब सर्वोच्च न्यायलय ने दूरदर्शितापूर्ण उत्तर दिया था कि यह तो भावना का ज्वार है, इसे अपने ढंग से शांत होने दीजिये। एक कौम के रूप में हमें संकेत है कि आस्था में दखल देने के बजाय भाईचारा और बढ़प्पन का परिचय दें।
अयोध्या मामले को मंदिर की लड़ाई कहकर हम वास्तविकता से मुंह नहीं छिपा सकते। वास्तव में यह राष्ट्रीय सांस्कृतिक जागरण का संदेश है। भारत में थोपी गयी गलत धारणाओं के अवगुंठन से सच्चाई के अविष्कार का जन अभियान है। सोमनाथ के मंदिर के निर्माण के पीछे जो राष्ट्रवाद का आवेग था, अयोध्या मामला इसका अपवाद नहीं है। लेकिन सोमनाथ का भव्य मंदिर बनाना उसके पीछे महात्मा गांधी की जबरदस्त सहमति थी। सरदार वल्लभ भाई पटेल और तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद तो सोमनाथ मंदिर के निर्माण के बाद सोमनाथ पहुंचे और उद्घाटन के भव्य समारोह में भाग लेकर गौरवान्वित हुए थे। अयोध्या में राममंदिर के पीछे किसी दल, संगठन विशेष की भूमिका समझना न्यायसंगत नहीं है। यह सांस्कृतिक नवजागरण अपने को पहचानने का एक सात्विक अभियान बना है, जिसकी निरंतरता 1984 से दिखायी देती है। मामला आस्था बनाम कानून नहीं समझना चाहिए। बल्कि आस्था को कानून का समर्थन और सद्इच्छा के संबल की आवश्यकता है। महान भारत श्रेष्ठ भारत के नारे को सफल बनाने की परीक्षा की घड़ी है। न्यायालय के सहमति बनाने के आदेश पर असहमति दर्ज करने में साहस की आवश्यकता नहीं है। साहस इस बात का दिखाने का समय है कि राष्ट्रहित में अपनी सियासत, हार-जीत का जज्बा छोड़कर कौन आगे बढ़ता है और राष्ट्रीय भावनात्मक एकता का अमिट किरदार बनने का सौभाग्य प्राप्त करता है। साम्प्रदायिक संकीर्णता को त्याग कर आजादी की जंग जीती, लेकिन आजादी के बाद साम्प्रदायिक आधार पर विभाजन कर हम आज पराजित महसूस कर रहे है। हमारे सिर पर उजला दाग न लगे यह अहम प्रश्न है। जिस तरह मक्का मदीना पाक है, अयोध्या के प्रति हिन्दू की आस्था उसपे कम नहीं है। भारत को दुनिया ने विश्व गुरू रहने का गौरव दिया है। क्या हम एकता के हित में कुछ कर पाने में असहाय है। इस तर्क को खारिज नहीं किया जाना चाहिए कि अनेक मुस्लिम बहुल देशों में पाक मसजिदों को आवश्यकतानुसार शिफ्ट किया गया है। विवादित स्थल पर मसजिद बनाना वर्जित है, नमाज ऐसी पाक इबादत है जो कहीं पर भी अता की जाये स्वीकार्य होती है। ऐसे में सियासी ढंग से रंग देना उचित नहीं है।
अयोध्या विवाद से लंबे समय तक संबद्ध रहे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त माननीय न्यायाधीश पलोक वसु बताते है कि सर्वोच्च न्यायालय के ताजा आदेश के संदर्भ में सुलह के द्वार अवश्य खुलेंगे। बाबरी मजिस्द की कानूनी लड़ाई आरंभ करने वाले हासिम अंसारी ने भी इंतकाल के पहले बताया था कि कद्रदान लोग आगे आकर सुलह की राह निकालेंगे। हासिम अंसारी अंत काल में ईश्वर को प्यारें होने के पहले इस बात पर अफसोस जता रहे थे कि सियासतदां अपनी सियासत कर रहे है और रामलला कानूनी बंधन में बंधक है। जितना धन इस विवाद पर पानी की तरह बहाया गया है, उतने में अयोध्या और फैजाबाद जिला चमन बन जाता। हासिम अंसारी की सोच अल्हदा दी। इस समय उनकी आवश्यकता थी। यदि हासिम अंसारी के नेक तर्क में दम है तो ऐसा क्या कारण है कि कुछ लोग सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की टेर लगाते समय और धन, समाज के अमन-चैन को दांव पर लगा रहे है। स्थानीय जनता ने पहल की है, दस हजार से अधिक लोगों ने एक ज्ञापन पर रजाबंदी बताते हुए कहा कि शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में पहल हो। ज्ञापन में सचेत किया है कि पहल में स्थानीय लोगों को महत्व मिले। सियासत करने वाले लोगों को उसी तरह हाथ नहीं डालना चाहिए, जिस तरह इस ढांचे को बनाने वालों का मजहब से सरोकार नहीं था। उनका उद्देश्य समाज के विजित और विजेता के भाव को स्थायित्व प्रदान करना था। वास्तव में भारत की संस्कृति में नृपमत, लोकमत और साधुमत को मान्यता मिली है। जनता जाग चुकी है और इस मसले को लेकर जन-जन आश्वस्त है। 1992 की तरह न तो बगावती तेवर है और न जिद करने वालों को जनसमर्थन है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी को भी सकारात्मक ढंग से पढ़ा और सुना जाना चाहिए।