Category: स्वास्थ्य रहस्य

  • आयुर्वेद की पढ़ाई का स्वरूप बदलें-शनकुशल

    आयुर्वेद की पढ़ाई का स्वरूप बदलें-शनकुशल

    ॐ परमात्मने नमः
    आज विज्ञान ने पदार्थ के अस्तित्व में PTV के अलावा चौथी विमा समय की पुष्टि का प्रत्यक्ष उदाहरण कोरोना के आतंक से प्रतीत हो रहा है ज्योतिष हो या वेद इनकी भविष्यवाणियों से २०२० से २०२५ ईसवी का समय विश्व आबादी को कम करेगा और उनके लिए कोरोना जैसे रोगों का वर्णन ऋग्वेद और अथर्वेद में मिलता है साथ ही भारत विश्व गुरु बनेगा एवं आर्थिक स्थिति में सबसे अच्छा होगा जिससे सोने की चिड़िया की कहावत भी साकार होगी। इसके लिए भारत के परमात्मा स्वरुप प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ही धन्यवाद के पात्र रहेंगे उनका नाम विश्व इतिहास में अमर रहेगा श्री मोदी जी ने जो कहा कि आयुर्वेद में ही कोरोना का उपचार मिलेगा यह बात सत्य है क्योंकि आयुर्वेद चार वेदों से आयु का ज्ञान लेकर पांचवा वेद आयुर्वेद है जिसमें आयु का ज्ञान लेकर आयु का विज्ञान किया जिसके उपयोग से मृत्यु पर विजय प्राप्त की और आयुर्वेद ने अमृत बना लिया तो आयुर्वेद का कार्य समाप्त हो गया। अब तो उस ज्ञान को वैज्ञानिक परिपेक्ष में उपयोग करना है। यह क्यों नहीं हो पा रहा क्योंकि हम आयुर्वेद को विज्ञान की तरह न पढ़ रहे ना समझ रहे इस कारण उसका उपयोग नहीं हो पा रहा अब आवश्यकता है और समस्त आयुर्वेदाचार्यों को यह कार्य सौंपा जाना चाहिए कि वे बताएं यह कोरोना वायरस क्या है यह आदमी द्वारा निर्मित है या समय अंतराल में प्रकृति प्रदत्त है आयुर्वेद का उपयोग तभी संभव है जब आयुर्वेद को ६ मान्यताओं पर उतारना होगा।

    १. वेदों का ज्ञान (संस्कृत के ज्ञान के साथ)
    २. आयुर्वेद का ज्ञान
    ३. ज्योतिष का ज्ञान
    ४. प्रयोगशाला (औषधि निर्माण)
    ५. चिकित्सालय (वास्तु शास्त्र से)
    ६. सहायक (स्त्री व पुरुष)

    उपरोक्त ६ बातों को ध्यान में रखकर मृत्यु पर विजय प्राप्त की जा सकती है। 
    
       आयुर्वेद की वैज्ञानिकता सिद्ध की जा सकती है तभी जब विज्ञान को सही मानकर कसौटी पर आयुर्वेद को कसा जावे और विज्ञान की पहुंच को सीमित बताया जावे जो निम्न प्रकार से संभव है विज्ञान शरीर को पदार्थों से निर्मित मानता है और उसकी निश्चित मात्रा होती है जिसकी कम ज्यादा मात्रा मृत्यु कारक हो जाती है जो स्थूल शरीर में भोजन से प्राप्त तत्व कोषा तक पहुंचाए जाते हैं जिसमें भोजन पदार्थ की अवस्था पर निर्भर करता है तथा कोषा तक जाने के लिए नाड़ियां साफ होना चाहिए अर्थात रास्ता होना चाहिए। आज का विज्ञान रसायनों की मात्रा के लिए शल्य चिकित्सा को महत्व देता है। नाड़ियों के लिए शालावय तन्त्र आयुर्वेद में विकसित था परंतु आज हम न ही आदमी पर हाथी का सर लगा पाए ना हम भोजन को ११ द्वारों से खा पा रहे ना ही भोजन को भक्ष भोज्य लेह और चौश्य अवस्था का ज्ञान कर चबाकर खाना गुटकना, लपटकर खाना नो चूसना इसके महत्व को जानते ना कर रहे। इस ज्ञान से हम औषधि सेवन शरबत, गोली, भस्म, लेप और पफ आदि सब सिस्टम समझेंगे और आयुर्वेद को मानेंगे। 
    
     आधुनिक विज्ञान औषधि के मन का निर्माण नहीं कर सकी इस कारण प्राचीन आयुर्वेद में संजीवनी बूटी सूर्योदय से पहले की बात तथा रविवार को आंवला ना खाना एकादशी को चावल आदि का क्यामहत्व है समझना पड़ेगा वहीं रावण ने बड़ के पत्ते से तार को ७ धातुओं में बदलने के महत्व को समय की महिमा बताई वहीं पानी के प्रकार और अर्क से सभी चिकित्सा संभव है। औषधि की जातियां जातियां समझना होंगी जैसे सफेद धतूरा, पीला, काला इसमें प्रभाव का क्या अंतर है इसी प्रकार प्लास पीला, सफेद, लाल इसके अलावा एक पत्ती ३ पत्ती और ५ पत्ती के पलाश में क्या अंतर है। इसी प्रकार इनके तोड़ने और एकत्र करना जिसमें शुक्ल और कृष्ण पक्ष अमावश्या पूर्णमासी दिन में रात्रि में आदि साथ ही ५ अंगों फल, फूल, तना, जड़, पत्ते इसमें क्या चाहिए कब और क्यों।

    वेदों में सब बताया है यहां तक कि समय पर कौन सी औषधि प्रकृति निर्मित करती है जैसे औषधि स्वयं अपने निर्माण को जानती है उसी को जानकर जादू की औषधियां और औषधियों के साथ से अमृत और विष बन जाता है यदि कोरोना वायरस है तो आयुर्वेद का अगद, बल एवं भ्रत्य और भूत संकाय से इसे बनाया जा सकता है और रसायन व बाजीकरण से कोरोना से लड़ने की क्षमता प्रदान करी जा सकती है।
    पृथ्वी पर जीवन की रक्षा आयुर्वेद से ही संभव है उसके लिए आयुर्वेद शिक्षा होनी चाहिए जिसमें पूरे ६ विषय पढ़ाए जावे।

  • आयुर्वेद में पहले से उपलब्ध है वायरस मुक्ति का उपायःआचार्य हुकुमचंद शनकुशल

    आयुर्वेद में पहले से उपलब्ध है वायरस मुक्ति का उपायःआचार्य हुकुमचंद शनकुशल

    भोपाल,8 अप्रैल(प्रेस इन्फार्मेशन सेंटर)। आयुर्वेद की शास्त्रोक्त पद्धति से बनाई गईं औषधियां कोरोना को परास्त करने में पूरी तरह सक्षम हैं।इसके पहले भी वायरसों के हमलों से आयुर्वेद रक्षा करता रहा है। आधुनिक चिकित्सा के वैज्ञानिक अनुसंधानों के बीच आयुर्वेद की जो परंपरा भुला दी गई है उस पर अमल करके भारत को दुनिया का मार्गदर्शन करना चाहिए। राजधानी में भारतीय योग अनुसंधान केन्द्र आनंदनगर के संस्थापक आचार्य हुकुमचंद शनकुशल ने कोरोना के उपचार की जो दवाएं विकसित की हैं वे उनके माध्यम से लोगों को मुफ्त उपचार सेवाएं भी दे रहे हैं।

    श्री शनकुशल ने बताया कि उन्होंने आयनिक पानी और अग्नि तत्व के माध्यम से कोरोना के उपचार की पूरी विधि विकसित की है। इस उपचार विधि में स्वर्णिम जल, विष्णुजल,नस्य, और धूनी मसाला व शर्बत बनाया है जो कोरोना संक्रमण को रोकने में कारगर है। उन्होंने अपने दावे की प्रमाणिकता को साबित करने के लिए आयुर्वेद में दिए गए उपायों का भी विवरण प्रस्तुत किया है। आयनिक जल का प्रयोगशाला में भी परीक्षण कराया गया है जिससे इसके सुरक्षित होने का विश्वास बढ़ेगा। इन दवाओं से उन्होंने आम मरीजों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सफलता भी पाई है।

    योग और आयुर्वेद को पिछले पचास सालों से भी अधिक समय से वैज्ञानिक आधार पर परिभाषित करते रहे आचार्य हुकुमचंद शनकुशल ने बताया कि ये जग जाहिर तथ्य है कि पीने का पानी यदि शुद्ध हो तो कई बीमारियों से बचा जा सकता है। पानी हमारी कोशिकाओं का प्रमुख तत्व भी होता है। हमारा शरीर कई किस्म के न्यूरोन्स की गतिविधियों से ही सक्रिय रहता है। यही वजह है कि स्वर्णिम जल शरीर पर तुरंत असर करता है। इसे बनाने के लिए ज्वालामुखी के चार सौ फीट की गहराई से निकाले गए पानी का शोधन किया जाता है।इस पानी में सोना, मैग्नीशियम और एल्यूमीनियम जैसे तत्वों के लवण मौजूद हैं। गहन चुंबकीय क्षेत्र से गुजारे गए इस पानी को सोने और तांबे के बीच से गुजारा जाता है। यही वजह है कि ये आयनिक पानी हमारे शरीर पर तेज असर डालता है। सरकार यदि पहल करे तो आम जनता को ये जल बहुत सस्ती कीमत पर उपलब्ध कराया जा सकता है।

    आचार्य हुकुमचंद शनकुशलः विश्व को स्वस्थ और सफल बनाने का सतत अनुष्ठान

    गौमूत्र से निर्मित विष्णुजल कोरोना जैसे वायरसों को निष्क्रिय करने में प्रभावी भूमिका निभाता है। शास्त्रोक्त विधि से इसे बनाने का विवरण कई ग्रंथों में पहले से मौजूद है। इसे बनाने के लिए आठ लीटर बछिया के मूत्र में आधा किलो सौंफ, आधा किलो धनिया मिलाकर 24 घंटे के लिए रख दिया जाता है। इसके बाद इसा अर्क उतार लिया जाता है। पांच लीटर इस अर्क में 250 ग्राम गंधक शोधित आंवला सार, 250 ग्राम चूना, 5 ग्राम लौंग, 5 ग्राम इलायची मिलाई जाती है। इसे नारंगी होने तक उबाला जाता है और फिर 24 घंटे बाद निथारकर छानकर रख लिया जाता है। इससे त्वचा को शुद्ध किया जाता है और शरीर पर भी छिड़ककर वायरस को निष्क्रिय कर दिया जाता है।

    कोरोना जिस तरह से मस्तिष्क की चेतना प्रभावित करता है और फेंफड़ों में रुकावट लाता है उसे बेअसर करने के लिए वैदिक नस्य बनाई जाती है। इसमें अपामार्ग, अरीठा, आक(मदार), गोलोचन, और केसर डालकर पीसा जाता है। इसे बनाने के लिए 25ग्राम चावल का आटा, 2 ग्राम शुद्ध केसर, 10 ग्राम अपामार्ग का आटा, 70 मिलीग्राम सफेद अर्क का दूध मिलाकर 24 घंटे बाद घोंटा जाता है। 5 ग्राम अरीठे का झाग 2 मिलीलीटर मिलाकर तब तक घोंटा जाता है जब तक कि ये सूख न जाए। इसमें 1 ग्राम शुद्ध गोलोचन मिलाकर घोंट दिया जाता है। इस नस्य को दिन में 11 बजे से 4 बजे के बीच सूंघा जाता है। अंगूठा और उसके पास वाली उंगली से चुटकी भर नस्य लेकर जोर से सूंघा जाता है। सूर्य की ओर नासा छिद्र करके सांस ली जाती है तो छींकें आने लगती हैं। कफ निकलने के बाद छींकें बंद हो जाती है। इसके बाद उंगली में थोड़ा गाय का घी मिलाकर नाक का सूखापन दूर कर दिया जाता है। इसके उपयोग से नाक से पानी बहना, सर्दी जुकाम और बुखार से रक्षा होती है और मस्तिष्कीय चेतना बढ़ती है।

    कोरोना में फेंफड़ों में फाईब्राईड विकसित हो जाते हैं और उनका स्पंज समाप्त होने लगता है।इससे फेंफड़ों में सांस रोक सकने की क्षमता समाप्त हो जाती है। इसका इलाज हवन प्रक्रिया से किया जाता है। हवन की जो समिधा बनाई जाती है उसमें अर्क(मदार) की लकड़़ी का उपयोग होता है। धूम लेने के लिए काले धतूरे के पत्ते, सत्यानाशी के बीज, बिल्ली की विष्टा, मोर पंख, गाय का सींग, सांप की केंचुली, नीम के पत्ते, वासा की छाल, अर्क के फूल, तुलसी पत्र, बहेड़ा पाऊडर, घी, शहद और गुग्गल मिलाकर धूनी दी जाती है। इससे फेंफड़े खराब नहीं हो पाते। अथर्व वेद की भूत विद्या में इस फार्मूले का विवरण दिया गया है। सन्निपात, भूत बाधा और नाड़ी चिकित्सा में ये विधि बहुत सफल साबित होती रही है। कोरोना वायरस को बेअसर करने में भी यही विधि रामबाण साबित होगी।

    गले की नली में खराश करने वाला कोरोना वायरस लिवर और किडनी को भी क्षतिग्रस्त करता है। इसके निदान के लिए आंवला, बहेड़ा, पारिजात और गुड़हल के फूल का शरबत रोगी को पिलाया जाता है। इससे वायरस का असर भी समाप्त होता है और पीड़ित की चेतना भी लौटने लगती है।

    श्री शनकुशल ने बताया कि पूरी चिकित्सा विधि अग्नि और आयनिक जल के प्रयोग पर केन्द्रित है। इसका असर अब तक वायरसों के आक्रमण से रक्षा के लिए होता रहा है। यजुर्वेद में भी इन विधियों का उल्लेख है। बड़े पैमाने पर ये कार्य सरकारी संरक्षण के बगैर संभव नहीं है। यदि कोरोना संक्रमितों को इस विधि से उपचार दिया जाए तो न केवल मरीजों को ठीक किया जा सकता है बल्कि देश के संसाधनों की बड़ी क्षति भी बचाई जा सकती है।

  • धन प्रबंधन से पहले देखें कुंडली

    धन प्रबंधन से पहले देखें कुंडली

    पं. अशोक पंवार मयंक

    धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष ये चार पुरुषार्थ हैं। अर्थ और काम भौतिक हैं,तथा मनुष्यों को इनकी आकांक्षा होना स्वाभाविक है। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा जो धन प्राप्ति की आकांक्षा न रखता हो। धन के बिना जीवन नीरस हो जाता है। जिनके पास धन होता है वे मजे में रहते हैं,एवं अपने नाती पोतों के लिए धन जोड़ते चले जाते हैं। धन हर एक कार्य कर देता है। ज्योतिष की दृष्टि से हम इसी विषय की चर्चा यहां करेंगे।

    धन स्थान का कुंडली में दूसरा घर होता है,एवं प्राप्ति(लाभ) स्थान 11 वें भाव को कहते हैं।जहां लाभ स्थान उत्तम होगा वहीं धन की बचत होगी। खर्च की स्थिति जानने के लिए कुंडली में 12 वां घर होता है। इसके साथ ही अन्य घरों का महत्व संक्षेप में निम्नानुसार है।

    1.लाभ स्थान में स्वग्रही गुरु और साथ में नेप्च्यून हो तो जातक की(जिसकी जन्म कुंडली हो) आय उत्तम होती है।

    2.लाभ स्थान में गुरु अकेला हो, तो जातक की आय स्थिर होती है। अगर गुरु के साथ शुक्र, बुध अथवा ग्यारहवें भाव का स्वामी हो तो आवक थोड़ी होती है।

    3.ग्यारहवें भाव में गुरु चंद्र की युति हो तो वारिसनामा मिलता है,तथा गुरु व चतुर्थेश हो, तो भी जातक धन संपत्ति का वारिस बनता है।

    4.धनेश, भाग्येश, लाभ स्थान में हो तो जातक की आवक बहुत होती है। अगर धनेश भाग्येश साथ में होकर 11 वें स्थान में हो तो जातक अत्यंत धनवान होता है।

    5.धनेश, भाग्येश में से कोई भी एक ग्रह लाभस्थान में हो और दूसरा बारहवें भाव में हो तो जातक की आर्थिक स्थिति सामान्य होती है।

    6.ग्यारहवें भाव पर बारहवें भाव के स्वामी की दृष्टि पड़े तो साधारण आय होती है।

    7.लाभेश छठे, आठवें या बारहवें स्थान में हो तो दूषित होने के कारण जातक की आर्थिक आय मध्यम होती है।

    8.ग्यारहवें स्थान का स्वामी शत्रु स्थान में या नीच का हो तो जातक की आय घटती है।

    9.ग्यारहवें भाव का स्वामी दशम भाव में हो तो आवक कम रहती है।

    10.ग्यारहवें भाव का स्वामी बारहवें भाव में हो या दशम भाव में हो तो भी आय से खर्च अधिक होता है।

    उपर्युक्त दस बिंदुओं में से आय कैसी होगी ये दर्शाया गया है। बचत बैंक बैलेन्स होगा या नहीं इसकी जानकारी इस प्रकार है।

    1.धन स्थान से आवक नहीं देखी जाती लेकिन इसे धन संचय या बैंक बैलेन्स का स्थान कहते हैं। धन स्थान के साथ बारहवें भाव की स्थिति का अध्ययन करना जरूरी है। क्योंकि बारहवां भाव जातक का है। आवक-जावक में से जो पैसा बचता है वही बचत होती है।

    2.धन स्थान में व लाभ स्थान में ये विशेषता है कि गुरु के साथ शुक्र की युति हो तो धन संचय में बाधा आती है। धन स्थान में गुरु हो और शुक्र लाभेश या भाग्येश होकर पड़ा हो अथवा धन स्थान में गुरु लाभ भाव में भाग्येश होकर पडा हो तो धन संचय में खूब वृद्धि होती है।

    3.अगर धन स्थान में भाग्य स्थान का परिवर्तन योग हो तो जातक की आय का काफी हिस्सा खर्च होता है। और उसके बाद भी काफी धन अनुपयोगी पड़ा रहता है।

    4.धन स्थान का स्वामी गुरु हो और कुंडली में शनि की युति हो अथवा धन स्थान का स्वामी शनि हो और गुरु की युति हो तो उसकी संपत्ति कोई दूसरा नहीं ले सकता। ऐसा जातक धन इकट्ठा करने वाला होता है।

    5.धन स्थान का स्वामी पराक्रम में हो तो जातक के पास पराक्रम द्वारा कमाया धन होता है यानि वह स्वप्रयत्नों से धन लाभ पाता है।

    6.धन स्थान और पराक्रम स्थान के स्वामी का एक दूसरी राशि में परिवर्तन हो और इस परिवर्तन योग में मंगल ग्रह हो तो जातक के पास धन रहता है और वह कंजूस प्रवृ़त्ति का होता है।

    7.धन स्थान का स्वामी कुंडली में पांचवे स्थान में पड़ा हो और शुक्र ग्रह युक्त हो या उस पर शुक्र ग्रह की दृष्टि पड़ रही हो या मित्र क्षेत्री हो तो उस व्यक्ति के पास अटूट संपदा होने में कोई शक नहीं है।

    8.अगर लाभ स्थान में सारे ग्रह पड़े हों एवं आसपास कोई ग्रह नहीं हो तो जातक की आय बहुत कम रहती है। या यूं कहें कि कामचलाऊ के अलावा धन नहीं रहता।

    9.धनस्थान का स्वामी कुंडली में लग्न चतुर्थ, सप्तम, दशम यानि केन्द्र में शुभ या मित्र ग्रह की युति में हों तो धन अच्छा जुड़ता है।

    धन स्थान व लाभ स्थान के विचार के बाद अब भाग्य स्थान बाकी रह गया है। भाग्य के बगैर सब अधूरा रहता है। अगर आपकी कुंडली में भाग्य स्थान बली न हो तो न तो धन रहेगा न लाभ तो आईए भाग्य के विषय में थोड़ा जान लें।

    सर्व प्रथम तो ये जानना आवश्यक है कि भाग्य स्थान का संबंध मात्र धन संपत्ति से नहीं होता इंसान के व्यक्तित्व,यश कीर्ति से भी इसका संबंध है।

    नवम भाव को भाग्य भवन कहते हैं। भाग्य का अर्थ धनवान होना नहीं होता बल्कि भाग्य शब्द का क्षेत्र बहुत बड़ा है। भाग्य के बल पर सब कुछ मिलता है, ये बात ध्यान में रखनी चाहिए।

    1 . मेष लग्न हो व भाग्य भाव में गुरु व चंद्र की युति हो तो जातक के धार्मिक होने के साथ साथ बाहिरी संबंध उचित होंगे। व माता सुख उत्तम रहता है। विद्या उत्तम होने के साथ साथ पुत्रवान होकर सुख भोगता है। यदि भाग्य भाव में शुक्र हो तो धन संपत्तिवान व स्त्री सुख उत्तम पाता है।

    स्त्रियों से लाभ भी मिलता है। अगर मंगल हो व शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ रही हो तो जातक शारीरिक सुख व आयु लाभ पाने वाला होता है। भाईयों का सहयोग उत्तम रहता है,लेकिन मातृ सुख से वंचित भी करता है। इस भाव में चंद्र, गुरु, शुक्र, सूर्य ही उपयुक्त रहते हैं। बाकी सभी ग्रह कुछ न कुछ अनिष्ट कारक ही रहते हैं।

    2.यदि जातक की वृषभ लग्न व नवम भाव में बुध पड़ा हो तो वह धन संपत्तिवान होगा। धन व्यापारिक लेखन, या बुद्धि के कार्यों से अर्जित करने वाला होगा। शनि राज्य से लाभ दिलाने वाला होगा। इसी प्रकार जातक को शुक्र भी स्व प्रयत्नों से नाना माया से या कला के क्षेत्र से अर्थालाभ दिलाने वाला होगा। इन ग्रहों की दृष्टि नवम भावपर पड़ रही होगी तो भी ये लाभ दिलाएगा।

    3,मिथुन लग्न वालों का भाग्य अधिकतर कष्टप्रद ही रहता है। व बहुत धीमी गति से आगे बढ़ते हैं क्योंकि अष्टम भाव मकर होता है। अतःशनि बाधक ग्रह बन जाता है।

    4.कर्क लग्न वाले भाग्यशाली ही होते हैं। यदि गुरु भाग्य भाव में होता तो वह स्वराशि मीन का होता है, व लग्न पर उच्च दृष्टि डालता है। सप्तम पराक्रम भाव पर शत्रु दृष्टि पड़ती है,लेकिन अशुभ फल न मिलकर शुभ फल ही मिलता है। पंचम भाव पर मित्र दृष्टि पड़ने से ये पंचम भाव को अमृतपान कराता है। अतःविद्या – पूजा आदि उत्तम होते हैं। शारीरिक सौंदर्य भी बढ़ता है लेकिन अक्सर इन्हें गंजेपन का भी रोग होता है। ये उच्च पदों पर भी आसीन होते हैं। यदि सूर्य गुरु की युति रही तो राजदूत न्यायाधीश राजनीति में प्रमुख एवं धनवान होते हैं। यदि शुक्र रहा तो इनके पास अटूट धन रहता है। व प्रारंभ से अंत तक धनाड्य रहते हैं। लाभ भी बहुत होकर वाहन अधिपति होते हैं।

    5 सिंह लग्न वालों के लिए सूर्य या सूर्य बुध की युति अति उत्तम होती है। ये जातक भी बिंदु क्रमांक चार के विवेचन के समान रहते हैं।

    6.कन्या लग्न वालों के लिए शुक्र या चंद्र या फिर शुक्र चंद्र की युति उत्तम रहकर धनवान बनाती है।

    7.तुला लग्न वालों के लिए बुध ग्रह उत्तम रहता है। बुध यदि नवम में हो या बारहवें भाव में हो तो भाग्य उत्तम रहता है। उसे बाहर के व्यापार विदेश या व्यापारी बाहिरी संबंधों से लाभ होता है। शनि भी अति शुभ माना जाएगा।

    8.वृश्चिक लग्न वालों को गुरु व चंद्र उत्तम बलशाली रहेंगे या इन ग्रहों की दृष्टि पड़ने पर भी भाग्य बलवान माना जाएगा।

    9.धनु लग्न वालों को गुरु व सूर्य भाग्यशाली ग्रह होकर भाग्य को बढ़ाने वाले होंगे। मंगल व चंद्र ग्रह भी शुभ रहेंगे।

    10 मकर लग्न वालों को शनि व बुध की स्थिति उत्तम भाग्यवर्धक रहेगी। शुक्र भी उत्तम फलदायक होंगे।

    11.कुंभ लग्न वालों को शनि शुक्र की स्थिति लाभप्रद होने के साथ भाग्यवर्धक रहेगी।

    12.मीन लग्न वालों को गुरु व मंगल की दृष्टि शुभ रहेगी। कहते हैं कि बिन भाग्य के सब सून ,भाग्यहीन व्यक्ति दरिद्र के समान होता है एवं भाग्य का होना धन संपत्ति में चार चांद लगा देता है।

  • कोरोना वायरस का असर महामारी घोषित

    कोरोना वायरस का असर महामारी घोषित

    दिल्ली,13 मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)। चीन में तबाही मचाने वाला कोरोना वायरस अब पूरे विश्व में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है। चीन से बाहर 122 देशों में कोरोना वायरस के मामलों की पुष्टि हुई है. इन देशों में थाईलैंड, ईरान, इटली, जापान, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं. आइए जानते हैं कि इस वायरस के लक्षण और बचाव के तरीके क्या हैं.

    कोरोना वायरस का संबंध वायरस के ऐसे परिवार से है, जिसके संक्रमण से जुकाम से लेकर सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्या क्या है कोरोना वायरस? कोरोना वायरस का संबंध वायरस के ऐसे परिवार से है, जिसके संक्रमण से जुकाम से लेकर सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्या हो सकती है. इस वायरस को पहले कभी नहीं देखा गया है. इस वायरस का संक्रमण दिसंबर में चीन के वुहान में शुरू हुआ था. डब्लूएचओ के मुताबिक, बुखार, खांसी, सांस लेने में तकलीफ इसके लक्षण हैं. अब तक इस वायरस को फैलने से रोकने वाला कोई टीका नहीं बना है. क्या हैं इस बीमारी के लक्षण? इसके लक्षण फ्लू से मिलते-जुलते हैं. संक्रमण के फलस्वरूप बुखार, जुकाम, सांस लेने में तकलीफ, नाक बहना और गले में खराश जैसी समस्या उत्पन्न होती हैं. यह वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है. इसलिए इसे लेकर बहुत सावधानी बरती जा रही है. कुछ मामलों में कोरोना वायरस घातक भी हो सकता है. खास तौर पर अधिक उम्र के लोग और जिन्हें पहले से अस्थमा, डायबिटीज़ और हार्ट की बीमारी है. क्या हैं इससे बचाव के उपाय? स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय ने कोरोना वायरस से बचने के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं. इनके मुताबिक, हाथों को साबुन से धोना चाहिए. अल्‍कोहल आधारित हैंड रब का इस्‍तेमाल भी किया जा सकता है. खांसते और छीकते समय नाक और मुंह रूमाल या टिश्‍यू पेपर से ढककर रखें. जिन व्‍यक्तियों में कोल्‍ड और फ्लू के लक्षण हों उनसे दूरी बनाकर रखें. अंडे और मांस के सेवन से बचें. जंगली जानवरों के संपर्क में आने से बचें. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सात स्टेप्स विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सात आसान स्टेप्स बताए हैं, जिनकी मदद से कोरोना वायरस को फैलने से रोका जा सकता है और खुद भी इसके इंफेक्शन से बचा जा सकता है.

    भारत सरकार ने भी कोरोना वायरस के लक्षण मिलने पर तत्काल स्वास्थ्य केंद्र पर सूचना देने को कहा है. स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से 24 घंटे चलने वाला कंट्रोल रूम तैयार किया गया है. फोन नंबर 011-23978046 के माध्यम से कंट्रोल रूम में संपर्क किया जा सकता है. इसके अलावा [email protected] पर मेलकर के भी कोरोना वायरस के लक्षणों या किसी भी तरह की आशंकाओं के बारे में जानकारी ली जा सकती है.

    चीन और इटली में सबसे ज्यादा असरचीन और इटली में सबसे ज्यादा असर

    चीन में इस वायरस का बहुत ज्यादा असर पड़ा है. सबसे ज्यादा असर चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है. पहले ही चीन की अर्थव्यवस्था सुस्ती के दौर में है. लगभग 18 साल पहले सार्स वायरस से भी ऐसा ही खतरा बना था. 2002-03 में सार्स की वजह से पूरी दुनिया में 700 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी. इटली में भी अब तक 800 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं.

    क्या आप जानते हैं कि कोरोना वायरस यानी कि क्या आप जानते हैं कि कोरोना वायरस यानी कि Coronavirus disease (COVID-19) बहुत सूक्ष्म लेकिन प्रभावी वायरस है. कोरोना वायरस मानव के बाल की तुलना में 900 गुना छोटा है. आकार में इस छोटे वायरस ने पूरी दुनिया को डरा दिया है. इसका खौफ आज दुनियाभर में दिख रहा है.

  • दिमाग को बीमार करता गांजे का नशा

    दिमाग को बीमार करता गांजे का नशा

    भोपाल,7 मार्च,(प्रेस सूचना केन्द्र)। गांजा या भांग भारत के कमोबेश हर इलाके में प्रयोग किया जाता है। कानूनी रोक के बावजूद ये नशा सभी इलाकों में आसानी से उपलब्ध हो जाता है। इस नशे का इस्तेमाल करने वालों का कहना है कि इन नशे से कोई नुक्सान नहीं होता है। इसके विपरीत हालिया शोधों ने साबित किया है कि गांजे का नशा कई तरह की मानसिक बीमारियों को जन्म दे देता है। इसकी वजह नशे की लत होती है।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़ दुनिया भर में क़रीब डेढ़ करोड़ लोग रोज़ाना गांजे का किसी न किसी रूप में इस्तेमाल करते हैं। यह संख्या किसी भी और ड्रग्स से काफ़ी ज़्यादा है. इसका सबसे ज़्यादा ख़तरा युवाओं में ख़ासकर किशोरों को होता है।

    ताजा शोध बताते हैं कि किशोरों के गांजा इस्तेमाल करने से उनमें डिप्रेशन, शिज्नो फ्रेजिया जैसी मानसिक बीमारियों का ख़तरा बढ़ जाता है। शोध में सामने आया है कि गांजे का सेवन करने से दिमाग़ के दो महत्वपूर्ण न्यूरोट्रांसमीटरों पर असर पड़ता है। ये हैं सेरोटोनिन और नोराड्रेनलीन. ये दोनों दिमाग़ में भावनाओं को, ख़ासकर डर की भावना को नियंत्रित करते हैं।

    कनाडा के जो किशोर बहुत ज़्यादा गांजे का सेवन करते हैं. इससे उनमें डिप्रेशन की शिकायत बढ़ती जाती है।इसके अलावा उनमें डर से जुड़ी भावनाएं बहुत ज़्यादा बढ़ जाती हैं। चिंताजनक तो ये है कि गांजे और शराब का एक साथ सेवन भी बढ़ता जा रहा है। यूरोपीय संघ के ड्रग्स विशेषज्ञ इस नए ट्रेंड की भी खतरनाक मानते हैं। नशे की लत लग जाने के बाद युवा लड़के लड़कियां गांजे का धुआं, बीयर या फिर एक्सेटिसी की गोलियां भी साथ में लेते हैं जो बहुत खतरनाक साबित होता है।

    यूरोपीय संघ में नशाखोरी के मामलों पर निगाह रखने वाले अधिकारी कहते हैं कि ड्रग्ज और अल्कोहल की मिलावट बड़ी समस्या है। ख़ासकर युवाओं में पी कर धुत्त होना और उसके साथ ड्रग्स लेना एक साथ चलता है। ड्रग्स लेने वाले अकसर शराब के भी आदी होते हैं।”

    अगर बढ़ती उम्र में गांजे का सेवन किया जाता है तो मस्तिष्क में सेरोटोनिन की मात्रा कम होने लगती है। इससे भावनात्मक असंतुलन पैदा होता है और नोरेड्रेनलीन की मात्रा दिमाग़ में बढ़ने लगती है जिससे तनाव बढ़ने का जोखिम बढ़ता जाता है या व्यक्ति तनाव की स्थिति का मुक़ाबला ठीक से नहीं कर पाता।

    इसके अलावा गांजे से बना स्कंक बहुत ज़्यादा ख़तरनाक है और इससे शिज्नो फ्रेजिया होने का ख़तरा भी बढ़ जाता है। लंदन के किंग्स कॉलेज में मानसिक रोग संस्थान के शोध में सामने आया है कि स्कंक लेने वालों के मस्तिष्क में टेट्रा हाइड्रो कैनेबिनॉल नाम का रासायनिक पदार्थ बहुत बढ़ जाता है और इससे मानसिक बीमारियां होने का ख़तरा भी बढ़ जाता है।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि “कई नए तरह के उत्पाद बाज़ार में हैं जो बहुत ही आक्रामक तरीक़े से बेचे जाते हैं और अकसर इंटरनेट के ज़रिए. जांच या प्रतिबंधों को अनदेखा करके यह व्यापारी बहुत तेज़ी से काम करते हैं।”

    इसी तरह गांजे के कई अन्य उत्पाद हैं जो स्वास्थ्य पर बुरा असर डालते हैं। अब तक के शोधो से यह भी सामने आया है कि गांजे के पौधे का इलाज में भी इस्तेमाल होता है। कैंसर, एड्स और नॉशिया जैसी बीमारियों में इसका इस्तेमाल होता है, लेकिन ज़्यादा मात्रा में लेने पर इसके प्रभाव बहुत हानिकारक होते हैं क्योंकि टेट्राहाइड्रोकैनेबिनॉल या टीएचएस की ज़रा भी ज़्यादा मात्रा और इसका बार बार सेवन मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरे प्रभाव डालता है। इसीलिए इलाज के लिए जिन दवाओं को संश्लेषित करके बनाया गया है उनमें नशाकारी तत्व टीएचएस की मात्रा कम रखी जाती है।

    कैनेबिस, मैरियुआना या गांजा के नाम से जाना जाने वाला यह पौधा मूल रूप से मध्य और दक्षिण एशिया में पाया जाता है और नशे के अलावा गांजे के अन्य इस्तेमाल अलग अलग समाजों में हज़ारों साल से चले आ रहे हैं। भारत में हिमाचल क्षेत्र का गांजा और भांग अच्छे माने जाते हैं।जबकि मध्यप्रदेश में आंध्रप्रदेश के सीमांत इलाके से गांजे की तस्करी की जाती है। नेपाल में भी मांग उठ रही है कि जब कई यूरोपीय देशों ने इसकी खेती पर से प्रतिबंध हटा दिया है तो वहां भी इसकी खेती को कानूनी निगरानी में किया जाए इससे किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारी जा सकती है।

  • कोरोना वायरस संक्रमण से मुक्ति दिलाएगा आयुर्वेद

    कोरोना वायरस संक्रमण से मुक्ति दिलाएगा आयुर्वेद

    भोपाल,28 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। कोरोना वायरस(Corona Virus) ने चीन में जिस तरह का कोहराम मचा रखा है उससे पूरी दुनिया दहशत में आ गई है। विश्व के कई देशों में कोरोना वायरस से निपटने की तैयारियां चल रहीं हैं। वे देश खासे दहशत में हैं जहां मांसाहार को बड़े पैमाने पर अपनाया जाता है। यही वजह है कि कई देशों में शाकाहार अपनाने की मुहिम चल पड़ी है। इस बीच भारत में कोरोना वायरस का इलाज आयुर्वेदिक तरीकों से करने के दावे किए जाने लगे हैं। कमोबेश यही दावे एड्स जैसी बीमारी को नियंत्रित करने के भी किए जाते रहे हैं।

    दरअसल में आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति जीवन दर्शन की वो शैली है जो इंसान को रोगों की गिरफ्त में ही नहीं आने देती। यदि भूल वश स्वस्थ इंसान का शरीर बीमार भी हो जाए तो आयुर्वेद में वात पित्त और कफ को संतुलित करके स्वस्थ बनाने की विधि मौजूद है। नाड़ी विज्ञान से शरीर की दशा को समझा जाता है फिर आयुर्वेदिक दवाओं से नाड़ी को संतुलित किया जाता है। इसी विधि से जटिल से जटिल रोगों का उपचार हो जाता है। यह उपचार पूरे प्राकृतिक तरीकों से किया जाता है।

    कोरोना वायरस के प्रकोप को लेकर मध्यप्रदेश के वरिष्ठ आयुर्वेदाचार्य कहते हैं कि आयुर्वेदिक दवाओं के संतुलित इस्तेमाल से कोरोना वायरस से मुक्ति पाई जा सकती है। जो फार्मूला सुझाया गया है उसके मुताबिक हरिद्राखंड, संशमणि बटी, और त्रिकटु चूर्ण के युक्तियुक्त प्रयोग से कोरोना वायरस आसानी से परास्त हो सकता है। तुलसी और गिलोय का काढ़ा जिसमें सात काली मिर्च डालकर उबाला गया हो वह कोरोना वायरस के संक्रमण को समाप्त कर सकता है। भारत में फेंफड़ों के रोगों और सर्दी जुकाम में इन दवाओं का इस्तेमाल सदियों से किया जाता रहा है। ये दवाएं सभी प्रमुख आयुर्वेदिक दवा फार्मेसियां बनाती हैं।

    हरसिंगार के पांच पत्तों की चाय बनाकर पीने से भी गंभीर संक्रमण को रोकने में मदद मिलती है।

  • बारिश गई अब बुखार से बचें

    बारिश गई अब बुखार से बचें

    भोपाल,19 सितंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)।बारिश के मौसम में वायरस, बैक्टीरिया, फंगस आदि से वायरल फीवर, पीलिया, फूड पॉयजिनिंग, मलेरिया, डेंगू, दस्त आदि रोगों की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं। इनमें वायरल फीवर की प्रबलता काफी हो जाती है। पं. खुशीलाल शर्मा शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. उमेश शुक्ला ने बताया है कि बुखार आने पर नियमित चार्टिंग करें। गिलोय (गुडूची) धनवटी का उपयोग करें। गला खराब होने पर मूलेठी चूसें। महासुदर्शन, चिरायता के काढ़े का सेवन करें। इन उपायों से दो-तीन दिन में मरीज को आराम मिल जाता है। डॉ. शुक्ला ने कहा कि इसके बाद भी यदि तेज बुखार बना रहता है, तो तुरंत नजदीकी अस्पताल में आवश्यक जाँचें करवायें।

    डॉ. उमेश शुक्ला ने जानकारी दी कि एहतिहात के तौर पर मरीज को पूरा आराम करना चाहिये। उन्होंने बताया कि पानी उबालकर पियें। संक्रमण ग्रस्त व्यक्ति को अलग कमरे में रखें क्योंकि उसके छींकने, थूकने और खाँसने से वातावरण में संक्रमण फैलता है। गीले कपड़े न पहनें। बारिश में न भीगें, नम वातावरण से बचें। ताजा खाना खायें और बाहर के खाने से परहेज करें। घर के आसपास, कूलर, गमलों आदि में पानी भरा न रहने दें क्योंकि यह मच्छरों का प्रजनन काल है। सोते समय मच्छरदानी का प्रयोग करें। दिन में पूरी बाँह के कपड़े पहनें। संक्रमित लोग भीड़-भाड़ वाली जगहों में जाने से बचें।

  • कुंडली और एलोपैथी से इलाज

    कुंडली और एलोपैथी से इलाज

    जयपुर में ज्योतिष-एलोपैथी से इलाज की सुविधा वाले अस्पताल का लोकार्पण किया गया है। यहां मरीज की कुंडली देखकर न सिर्फ उसके रोग का पता लगाया जाएगा, बल्कि उसकी बीमारी ठीक होने लायक है अथवा नहीं, इसका भी पूर्वानुमान लगाया जाएगा। फिर इलाज से मरीज को पूर्ण स्वस्थ करने का प्रयास होगा।


    भारतीय प्राच्य ज्योतिष शोध संस्थान के इस संगीता मेमोरियल अस्पताल का लोकार्पण राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे तथा विधानसभा अध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी द्वारा किया गया। संस्थान के सचिव पं. अखिलेश शर्मा ने बताया कि मरीज की कुंडली में ग्रहों की दशा से उसकी बीमारी की सटीक जानकारी ली सकती है। ज्योतिष-एलोपैथी समन्वय से इलाज के लिए 2015 में राज्य सरकार को प्रस्ताव दिया गया था। उसके बाद 2017 में व्यापक शोध कर एक रिपोर्ट सरकार को सौंपी गई। शोध में एलोपैथी डाक्टरों ने ज्योतिषियों से बीमारी की पहचान संबंधी उनकी प्रक्रिया जानी, जिससे संतुष्ट होने के बाद ही इस अस्पताल की स्थापना की कवायद प्रारंभ हुई।


    पं. शर्मा ने दावा किया कि एलोपैथी चिकित्सा पद्धति से बीमारी के बारे में 80 फीसदी ही पता किया जा सकता है, जबकि ज्योतिष विज्ञान से सौ फीसदी एक्यूरेसी से बीमारी के कारण और निवारण के बारे में जानकारी ली जा सकती है। उन्होंने बताया कि उनके संस्थान के अस्पताल में एलोपैथी पद्धति से इलाज शुरू करने से पूर्व डॉक्टर मरीज का डाटा व कुंडली ज्योतिष विभाग को भेजेंगे। जहां पता लगाया जाएगा कि मरीज को क्या बीमारी है, किस अंग में बीमारी है और वह ठीक हो सकती है अथवा नहीं, यह रिपोर्ट आधे घंटे भीतर डॉक्टर को उपलब्ध करा दी जाएगी। डॉक्टर उसे अपनी रिपोर्ट से मिलान कर उपचार की क्रिया प्रारंभ करेंगे। पं. शर्मा के अनुसार आगामी एक अप्रैल से अस्पताल विधिवत रूप से कार्य करे लग जाएगा। 

  • जेनेटिक बीमारियों के छलावे से सावधान

    जेनेटिक बीमारियों के छलावे से सावधान

    -डॉक्टर अरविन्द जैन भोपाल

    आज कल वैसे भी नव दम्पत्ति बच्चे के जन्म के प्रति बहुत जागरूक होते हैं और कोई कोई तो इस झंझट में नहीं पड़ना चाहते .कारण महिलाये अधिकांश अपने सौंदर्य या फिगर के पीछे बच्चा पैदा नहीं करना चाहती .दूसरा आजकल अपने कैरियर की दीवानगी के कारण बच्चे न हो इससे निजात चाहती हैं .तीसरा आजकल डॉक्टरों के अलावा महिलाएं ऑपेरशन से प्रसव कराने में प्राथमिकता देती हैं .इसके अलावा आजकल जन्मजात विकृत बच्चों के जन्म होने के भय से भी बचते हैं .आर्थिक सम्पन्नता और भविष्य के प्रति निश्चिंतता के कारण महानगरों में कुछ नर्सिंग होम्स और उनमे पदस्थ शिशु रोग विशेषज्ञ और जेनेटिक बीमारियों के डर से मनोवैज्ञानिक अज्ञात भयग्रस्त करते हैं .और आर्थिक सम्पन्नता के कारण और भविष्य की चिंता से मुक्त होने के कारण जेनेटिक बीमारियों से बचने यह रास्ता अपनाते हैं जो कितना शोषण का सरल मार्ग निकाला गया हैं .

    इन दिनों बच्चे के जन्म से पहले ज्यादातर पैरंट्स को प्राइवेट डॉक्टर्स यह समझाते हैं कि अगर बच्चे को कोई जेनेटिक बीमारी हो जाती है तो बच्चे का अम्ब्लिकल कॉर्ड ब्लड यूज कर बच्चे का इलाज किया जा सकता है और यही वजह से बड़ी संख्या में माता-पिता हजारों-लाखों रूपये खर्च कर अपने बच्चे के कॉर्ड ब्लड को प्राइवेट कॉर्ड ब्लड बैंक में सुरक्षित रखवाते हैं। हालांकि इंडियन अकैडमी ऑफ पीडिऐट्रिक्स IAP की मानें तो कॉर्ड ब्लड का बेहद सीमित इस्तेमाल हो सकता है। IAP की ओर से जारी एक स्टेटमेंट में प्राइवेट कॉर्ड बैंकिंग इंडस्ट्री की आलोचना करते हुए कहा गया है कि ये लोग झूठी बातों का प्रचार कर अपने प्रॉफिट और बिजनस के लिए आम लोगों का शोषण कर रहे हैं

    भ्रामक होते हैं कॉर्ड ब्लड बैंक के विज्ञापन
    IAP ने कहा, ‘कॉर्ड ब्लड के मामले में माता-पिता की अपने बच्चे के प्रति दायित्व की भावना का गलत तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है। ज्यादातर प्राइवेट कॉर्ड ब्लड बैंक भविष्य में होने वाली बीमारियों के इलाज के लिए कॉर्ड ब्लड को राम-बाण की तरह पेश करते हैं जबकि हकीकत यह है कि बच्चे के लिए कॉर्ड ब्लड का इस्तेमाल बेहद सीमित है। साथ ही प्राइवेट कॉर्ड ब्लड बैंक्स के विज्ञापन अक्सर भ्रामक होते हैं और उन्हें इस तरह से पेश किया जाता है मानो कॉर्ड ब्लड एक तरह का बायलॉजिकल इंश्योरेंस हो।’

    कॉर्ड ब्लड से फायदे की गुंजाइश सिर्फ 0.04%
    अमेरिकन सोसायटी फॉर ब्लड ऐंड मैरो ट्रांसप्लांटेशन के मुताबिक, बच्चे का अपने ही कॉर्ड ब्लड से फायदा पहुंचने की संभावना महज 0.04 प्रतिशत से 0.0005 प्रतिशत ही है। जेनेटिक बीमारियों के इलाज में अपने ही कॉर्ड ब्लड सेल्स का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता क्योंकि उनका म्युटेशन (तबदीली) भी सेम वैसी ही होगा। IAP की मानें तो कॉर्ड ब्लड सेल्स का इस्तेमाल हाई रिस्क सॉलिड ट्यूमर जैसी बीमारियों में ही हो सकता है।

    पब्लिक कॉर्ड ब्लड बैंक विकसित करने की जरूरत
    IAP का कहना है कि प्राइवेट कॉर्ड ब्लड बैंक की जगह पब्लिक कॉर्ड ब्लड बैंक विकसित किया जाना चाहिए जिसमें अलग-अलग डोनर्स के डिफरेंट जेनेटिक बनावट के कॉर्ड ब्लड को जमा कर रखा जा सकेगा जो कई अलग-अलग तरह की बीमारियों में काम आ सकता है। साथ ही इस तरह के ब्लड बैंक के लिए डोनर को किसी तरह का पैसा नहीं देना होगा।

    60 प्रतिशत डॉक्टरों को नहीं है सही जानकारी
    IAP के जर्नल इंडियन पीडियाट्रिक्स में प्रकाशित स्टेटमेंट में डॉक्टरों के बीच करवाया गया एक सर्वे भी शामिल था। इस सर्वे के मुताबिक करीब 60 प्रतिशत डॉक्टर्स इस बात से अनजान थे कि वे कौन सी बीमारियां हैं जिसका इलाज कॉर्ड ब्लड सेल ट्रांसप्लांटेशन से किया जा सकता है। करीब 90 प्रतिशत डॉक्टरों का मानना था कि बच्चे के अपने अम्ब्लिकल कॉर्ड का इस्तेमाल थैलसीमिया के इलाज में किया जा सकता है जो पूरी तरह से गलत है

    भारत में प्राइवेट कॉर्ड ब्लड बैकिंग इंडिस्ट्री करीब 300 करोड़ की है। एक बच्चे का अम्ब्लिकल कॉर्ड 20 साल तक सुरक्षित रखने में 50 हजार से 1 लाख रुपये तक का खर्च आता है।

    यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक हैं की भविष्य के प्रति हमें जागरूक रहना चाहिए पर इस प्रकार के भ्रामक प्रचार से ,गुमराह कर लाखों रूपया लूटना क्या यह मानवीयता हैं ?यदि कोई इस जाल में फंस गया हैं तो भविष्य के क्या करना चाहिए ?इस पर चर्चा कर निरयण लिया जाएगा पर यह एक खुला धोखा या छलावा हैं .

    पैसों के पीछे कितना ,,कैसे कैसे शोषण के हथकंडे अपनाये जा रहे हैं .सावधान .

    डॉक्टर अरविन्द जैन संस्थापक शाकाहार परिषद् भोपाल 09425006753

  • अस्पतालों में दवाओं की कमी न रहे बोलीं राज्यपाल

    अस्पतालों में दवाओं की कमी न रहे बोलीं राज्यपाल

    भोपाल 7 अप्रैल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने कहा है कि स्वास्थ्य विभाग सुनिश्चित करे कि अस्पतालों में जो दवाएं डाक्टर लिखें उनका भंडारण पूरा हो। डाक्टरों को कहा जाए कि वे गरीबों और ग्रामीणों को वही दवाएँ लिखें, जो अस्पतालों में उपलब्ध हों। सरपंचों तथा जन-प्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है कि टीकाकरण अभियान में पूरा सहयोग दें। उन्होंने किशोरियों के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देने पर जोर देते हुए कहा कि जांच के दौरान अगर हीमोग्लोबिन कम निकले, तो उसका पोषण बढ़ा कर इलाज करें। राज्यपाल ने विश्व स्वास्थ्य दिवस पर स्वास्थ्य विभाग की ओर से आयोजित बच्चों को निमोनिया तथा दिमागी बुखार जैसी जानलेवा बीमारी से सुरक्षा प्रदान करने वाली नवीन वैक्सीन पीसीबी के शुभारम्भ समारोह को सम्बोधित कर रही थीं। उल्लेखनीय है कि प्रदेश की सभी स्वास्थ्य संस्थाओं में नवीन वैक्सीन पीसीवी (टीका) नि:शुल्क टीकाकरण के लिए उपलब्ध रहेगा।

    राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने कहा कि डाक्टर गांवों में जाकर सरपंचों और जनप्रतिनिधियों के साथ मिलकर स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध करायें और विकास में अपना योगदान दें। उन्होंने डॉक्टरों से कहा कि बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए सरकार को सहयोग प्रदान करें। आँगनवाड़ी और प्राथमिक शालाओं में बच्चों को वितरित होने वाले भोजन की गुणवत्ता और पौष्टिकता और पानी की शुद्धता की भी जांच करें। गांव, शहर, स्कूल, आँगनवाड़ी तथा सार्वजनिक स्थलों पर सफाई अभियान में सभी वर्ग सहयोग करें। उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए शौचालय बहुत आवश्यक है। देश में शौचालय बनाने का 80 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है। आने वाले 2-3 साल में हमारे देश में शत-प्रतिशत शौचालय का निर्माण हो जायेगा।

    स्वास्थ्य मंत्री श्री रूस्तम सिंह ने कहा कि डाक्टरों के साथ-साथ सभी में सेवाभाव होना चाहिए। मध्यप्रदेश को स्वस्थ प्रदेश बनाने के लिए सभी मिल-जुलकर कार्य करें। इस बात पर ध्यान दें कि हम ग्रामीणों, गरीबों और पिछड़े लोगों तक बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ कैसे पहुँचा सकते हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं में निरंतर सुधार हो रहा है और अस्पतालों में सुविधाएँ बढ़ रही हैं।

    स्वास्थ्य विभाग की प्रमुख सचिव श्रीमती गौरी सिंह ने समारोह में अतिथियों का स्वागत किया। राज्यपाल ने कायाकल्प कार्यक्रम के अंतर्गत उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाली संस्थाओं और सरपचों को भी पुरस्कृत किया। इस अवसर पर आयुक्त स्वास्थ्य श्रीमती पल्लवी जैन, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के संचालक श्री एस. विश्वनाथन, यूनिसेफ के प्रतिनिधि माईकल जूमा और विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रतिनिधि डॉ. बी.पी. सुब्रामण्यम उपस्थित थे।

  • तंबाखू छोड़ना सिखाएगा क्विट लाईन नंबर

    तंबाखू छोड़ना सिखाएगा क्विट लाईन नंबर

    भोपाल 04 अप्रेल। सरकार ने तम्बाकू सेवन की लत को छोड़ने वालों के लिए तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विटलाइन नंबर) जारी की है। सरकार ने कंपनियों को ऐसे लेागों के लिए अब तम्बाकू उत्पादों के पैकेट पर ही क्विट लाइन नंबर लिखने की अधिसूचना जारी की है। नई चेतावनी 1 सितंबर, 2018 से प्रभावी होंगी ।
    वायॅस आॅफ टोबेको विक्टिम्स (वीओटीवी) के स्टेट पैट्रन एंव कैंसर सर्जन डा.ललित श्रीवास्तव ने बताया कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 3 अप्रैल, 2018 को जारी अधिसूचना में कहा है कि तम्बाकू पैकेटों पर 85 प्रतिशत की नई पैक चेतावनी होगी, जिसमें तम्बाकू उपयोग के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव, और तम्बाकू सेवन की लत को छोड़ने वालों के लिए तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) लिखना हेागा। अधिसूचना के अनुसार अब तम्बाकू के हर उत्पाद के पैकेट पर तम्बाकू से कैंसर होता है और तम्बाकू के कारण दर्दनाक मौत हेाती है के संदेश के साथ तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) 1800-11-2356 लिखा होगा।
    सरकार ने ग्लोबल एडल्ट टोबेको सर्वे रिपोर्ट 2017 के परिणामों को देखकर तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) को शुरू किया है। इस सर्वे में 62 प्रतिशत सिगरेट धूम्रपान करने वालों, 54प्रतिशत बिड़ी धूम्रपान करने वालों और 46 प्रतिशत धुएं रहित तम्बाकू उत्पादों के उपयोगकर्ताओं ने तम्बाकू उत्पादों पर सचित्र चेतावनी लेबल देखकर छोड़ने का सोचा था।
    सरकार द्वारा तंबाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) जारी होने की अधिसूचना पर पेशे से वकील 68 वर्षीय उमेश नारायण ने कहा कि तम्बाकू पैकेटों पर तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) यदि यह पहले पेश किया गया होता तो इससे उन्हें तम्बाकू छोड़ने में मदद मिलती। वे तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) की अधिसूचना जारी होने के बाद पहली प्रतिक्रिया दे रहे थे। वे ओरल कैंसर से पीड़ित हैं। उन्होंने कहा, बहुत से लोग तम्बाकू छोड़ना चाहते हैं लेकिन कभी-कभी अलस की वजह से इंटरनेट पर तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) का पता लगाने या जानकारी की कमी या दूसरों से पूछने में शर्म महसूस करने और अन्य कारणों से, उनकी तंबाकू का उपभोग करने की आदत बनी रहेती है और वे कैंसर और अन्य घातक रोगों के शिकार होकर अपना जीवन खत्म कर लेते हैं।
    उन्हेाने कहा कि हर बार, यदि कोई व्यक्ति तम्बाकू उत्पाद खरीदता है तो उसे स्वास्थ्य पर तम्बाकू के उपयोग के प्रभाव को दिखाए जाने वाले चित्रों को देखेगा, जो निश्चित रूप से उसे तम्बाकू उपभोक्ता को छोड़ने के लिए मजबूर करेगी और अब पैकेट पर तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) उपभोक्ता को निश्चित रूप से नंबर पर कॉल करने और तंबाकू की लत छोड़ने के तरीके ढूंढ़ने के लिए प्रोत्साहित करेगा।
    टाटा मेमोरियल अस्पताल के कैंसर सर्जन डॉ.पंकज चतुर्वेदी के अनुसार, भारत में तंबाकू के उपयोग के कारण हर साल करीब 12 लाख मौतें होती हैं। गैर-प्रसारी रोग (एनसीडी) का लगभग 40ः कैंसर, हृदय-नाड़ी रोगों और फेफड़ों के विकारों सहित सीधे तौर पर तम्बाकू के उपयोग के कारण होते हैं। भारत में लगभग 50 प्रतिशत कैंसर तंबाकू से हेाताहै और 9 प्रतिशत मौखिक कैंसर के रेागी इलाज के 12 महीने के भीतर मर जाते हैं। डॉ.पंकज चतुर्वेदी उस समिति का के भी सदस्य है, जिसने तम्बाकू उत्पादों के पैकेटों पर चेतावनी लिखने को अंतिम रूप दिया है।
    तम्बाकू पैकेजों पर ग्राफिक स्वास्थ्य चेतावनी तंबाकू के उपयोग के गंभीर और प्रतिकूल स्वास्थ्य परिणामों के बारे में जागरूकता पैदा करने का सबसे प्रभावी माध्यम है, खासकर युवाओं, बच्चों और अनपढ़ व्यक्तियों के बीच। इसे साबित करने के पर्याप्त प्रमाण हैं कि प्रभावी चेतावनी लेबल तंबाकू के उपयोग से संबंधित खतरों के बारे में जानकारी को बढ़ाते हैं और किशोरावस्था में तंबाकू का उपयोग करने के लिए इरादों को कम कर सकते हैं, तम्बाकू उपयोगकर्ताओं को छोड़ने के लिए राजी कर सकते हैं और पूर्व उपयोगकर्ताओं को फिर से शुरू करने से रोक सकते हैं।
    संबध हैल्थ फांउडेशन (एसएचएफ) के ट्रस्टी संजय सेठ ने कहा कि इस अधिसूना जारी होने के बाद महत्वपूर्ण यह है कि तंबाकू उत्पादो के पैकेटों पर तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) (1800112356) की छपाई उपयोगकर्ताओं को तम्बाकू छोड़ने में सहायता करेगा। नए चेतावनियों के परीक्षण के दौरान परीक्षण के दौरान उपयोगकर्ताओं के लक्षित समूहों (धूम्रपान और धुआं रहित दोनों) और गैर-उपयोगकर्ता और फोकस ग्रुप के प्रतिभागियों के बीच डमी पैक के साथ परीक्षण के लिए फील्ड परीक्षण किया गया था। तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) (1800112356) तम्बाकू उत्पादों के पैक पर लिखना एक नया विचार है जो धूम्रपान करने वालों को तम्बाकू छोड़ने के लिए सहायता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करेगा। वे इस बात को मानते हैं कि धूम्रपान करने वाले उपभोक्ता इसे लत से बाहर निकलना चाहते हैं, लेकिन उन्हें पता नहीं है कि सहायता कहाँ और कैसे प्राप्त करें। ऐसे लोगों के लिए, तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) बहुत उपयोगी होगी।
    कुछ प्रतिभागियों ने कहा कि पेशेवर सलाहकार बहुत महंगे हैं और जो लोग इनकी फीस वहन नहीं कर सकते, अब तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) पर कॉल करके सेवा का उपयोग कर सकते हैं। प्रतिभागियों द्वारा उठाए गए एक और पहलू कि तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) से मदद मांगने से फोन करने वाले का नाम अज्ञात रखने की भावना की भी रक्षा हेाती है। प्रतिभागियों ने बताया कि अगर कोई धूम्रपान करने वाला व्यक्ति तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) को फोन करेगा और तम्बाकू छोड़ने के बारे में परामर्श लेगा, तो वह साथियों, दोस्तों, सहकर्मियों के साथ सकारात्मक अपनी प्रतिक्रिया साझा करेगा। इससे भी अन्य लोग तम्बाकू सेवन को छोड़ने के लिए तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) पर कॉल कर सकते हैं।
    गौरतलब है कि विशेषज्ञ समिति की सिफारिश पर 15 अक्टूबर 2014 को केन्द्र सरकार ने सचित्र स्वास्थ्य चेतावनियों के नए सेट को अधिसूचित किया, जिसमें सभी तम्बाकू उत्पाद पैकेजों के प्रमुख प्रदर्शन क्षेत्र (सामने और पीछे) के 85 प्रतिशत को कवर किया गया था। संसद समितियों और तम्बाकू कंपनियों की सिफारिशों और कई उच्च न्यायालयों में पहले से इन चेतावनियों को चुनौती देने के कारण इसके कार्यान्वयन में देरी हुई। राजस्थान उच्च न्यायालय के माननीय उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद अंततः 85 प्रतिशत चेतावनियों का क्रियान्वयन हो पाया।
    सिगरेट, बीड़ी और चबाने वाले तंबाकू उत्पादों के पैकेटों पर दोनों तरफ की मौजूदा सचित्र चेतावनी छापने की अधिसूचना अप्रैल 2016 से राजस्थान उच्च न्यायालय और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय निर्देशो पर लागू किया गया था और यह लगभग दो साल से प्रभावी है।
    सर्वोच्च न्यायालय ने 4 मई, 2016 को तम्बाकू पैक पर 85 प्रतिशत चेतावनियों के कार्यान्वयन के निर्देशन देते हुए 85 प्रतिशत पैक चेतावनियों को चुनौती देने के सभी मामलों को कर्नाटक उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया था। माननीय कर्नाटक उच्च न्यायालय ने 15.12.2017 को सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद (पैकेजिंग और लेबलिंग) संशोधन नियम, 2014 को रद्द कर दिया और वर्ष 2008 की स्वास्थ्य चेतावनी को बहार कर दिया। इसमें पैक के प्रमुख प्रदर्शन क्षेत्र की तरफ 40 प्रतिशत पर चेतावनी की छपाई आवश्यकता है।
    माननीय कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले को केन्द्र सरकार और सिविल सोसाइटी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। इसके बाद 8 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा पारित फैसले पर रेाक लगा दी।

  • सुप्रीम कोर्ट ने मुँह के कैंसर से बचाने दिया फैसला

    सुप्रीम कोर्ट ने मुँह के कैंसर से बचाने दिया फैसला


    विश्व कैंसर दिवस: 4 फरवरी पर विशेष

    भोपाल 3 जनवरी। देश में ओरल कैंसर जिस तरह से महामारी के रुप में फैल रहा है,यदि समय रहते उचित कदम नही उठाए गए तो अकेले भारत में अगले तीन साल में करीब 9 लाख जिंदगियां काल के ग्रास में समाहित हो जांएगी। यही नही ओरल कैंसर के जनक तंबाकू उत्पादों की बिक्री पर पूर्णतया प्रतिबंध नही लगा तो इन लाखेां लोगों की मौत के अलावा 17 लाख से अधिक लोगों को यह जानलेवा बीमारी जकड़ लेगी। इन सबको बचाया जा सकता है बशर्ते सर्वोच्च न्यायालय के 23 सितंबर-2016 के निर्णय की राज्य सरकारें सख्ती से पालना करें। इस वर्ल्ड कैंसर दिवस पर हम सबको सकारात्मक रुप से इसे पालना कराने की दिशा में कदम उठाने की जरुरत है, इसी से लाखों लोगों की जिंदगी को बचाया जा सकेगा।

    इंडियन कांउसिल मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के अनुसार साल 2020 तक 17.3 लाख लोगों को जानलेवा बीमारी कैंसर जकड़ लेगी। जिससे 8.8 लाख लोग कैंसर की वजह से अपनी जान गंवा चुके होंगे। इससे न केवल लाखों परिवार प्रभावित होंगे बल्कि देश की अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा। यह हैरानीजनक तथ्य हाल में ब्रिक्स द्वारा जारी किए गए सर्वे रिपोर्ट में सामने आये हैं। इस सर्वे के मुताबिक वर्ष-2012 तक तम्बाकू जनित उत्पादों के सेवन से न केवल देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है बल्कि इसकी जीडीपी में भी गिरावट दर्ज की गई है। कैंसर के उपचार पर हुए भारी भरकम खर्च की वजह से 2012 में भारत ने कुल कार्यक्षमता में 6.7 बिलियन की कमी दर्ज की गई। जो कि हमारी आर्थिक विकास दर का 0.36 प्रतिशत है।

    दुनियांभर में एड्स, मलेरिया और टीबी से ज्यादा कैंसर पीडि़तो की मौत हो जाती है। वहीं मौत के दस प्रमुख कारणों में से कैंसर प्रमुख है। यह स्थिति पब्लिक हैल्थ के लिए एक बड़ी चुनौति उभरकर सामने आई है। इससे के लिए पूरी तरह से तंबाकू पर प्रतिबंध हो तभी कैंसर को रोका जा सकता है।

    सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की प्रभावी रूप से हो पालना

    गौरतलब है कि 23 सितंबर-2016 को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने ट्विन्स पैंक में तम्बाकू जनित पदार्थों (गुटका, जर्दा, पान मसाला, खैनी इत्यादि) की बिक्री पर पूर्णतया प्रतिबंध लगा दिया था। साथ ही कोर्ट ने एफएसएसएआई की 2.3.4 के तहत खाद्य वस्तुओं के साथ तंबाकू और निकोटीन युक्त पादर्थों की बिक्री प्रतिबंध को पूर्णतया लागू करने के निर्देश दिए थे। इस आदेश की राज्य सरकारों ने अभी तक प्रभावी रूप से पालना नहीं की जिस कारण आज भी इनकी बिक्री खुलेआम हो रही है। इसी का दुष्परिणाम है कि देश में तम्बाकू जनित पदार्थों के सेवन से मुंह व गले के कैंसर रोगियों में निरंतर इजाफा हो रहा है। सर्वे के मुताबिक तम्बाकू जनित पदार्थों की वजह से ही 90 फीसदी लोग मुंह व गले के कैंसर रोग से ग्रसित हो रहे हैं। राज्य सरकारों को चाहिए कि देश में ही नहीं बल्कि विश्वभर में महामारी की तरह फैल रहे कैंसर रोग से बचाव के लिए सुप्रीम कोर्ट की निर्देशों की प्रभावी रूप से पालना करें।

    पांच ब्रिक्स देशों में गंभीर चितंन का विषय

    कैंसर के उपचार पर होने वाले भारी भरकम खर्च व बिगड़ती अर्थव्यवस्था को लेकर ब्रिक्स देशों की चिंताएं भी बढ़ गई हैं। इस सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक केवल इन पांच ब्रिक्स देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, साउथ अफ्रीका) में विश्व की 40 फीसदी से अधिक जनसंख्या निवास करती है, जबकि इनका वैश्विक विकास दर का 25 फीसदी योगदान है। वहीं, 2012 में कैंसर से संबंधित मौतों के कारण इन पांचों देशों की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह से प्रभावित कर दिया है जिसके तहत करीब 46.3 बिलियन डालर का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा।

    वायॅस ऑफ टोबेको विक्टिम्स (वीओटीवी) के स्टेट पैट्रन एंव कैंसर रोग विशेषज्ञ डा.टी.पी.शाहू ने बताया कि तंबाकू के इस्तेमाल को कम करने के लिए राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट के आदेश की सख्ती से पालना करवानी चाहिए। जब हमें पता है कि 90 प्रतिशत मंुह के कैंसर का कारक तंबाकू उत्पाद है, इस स्थिति में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की पालना सुनिश्चिित कराने में क्या रोक है। प्रतिबंध की पालना सुनिश्चिित करनी चाहिए ताकि प्रतिवर्ष तंबाकू से होने वाली दस लाख मौतों को बचाया जा सके।

    इसके अलावा स्वस्थ जीवन शैली को अपनाने से भी कैंसर के खतरे को कम किया जा सकता है। ऐसा होने से कैंसर के ईलाज पर पर खर्च हो रहे भारी भरकम बजट के बोझ को कम कर देश की अर्थव्यवस्था को सुधारा जा सकता है।

    संबध हैल्थ फांउडेशन(एसएचएफ) के ट्रस्टी संजय सेठ ने कहा कि ग्लोबल एडल्ट टोबेको सर्वे (गेटस्) के अनुसार भारत में 26.7 करोड़ लेाग तंबाकू का उपभोग करते है। जबकि 5500 बच्चे प्रतिदिन तंबाकू उत्पादों का सेवन शुरु करतें है। इनमें से अधिकतर की मौत को तंबाकू पर प्रतिबंध करके बचाया जा सकता है।

    पूर्व रेल मंत्री व सांसद दिनेश त्रिवेदी ने बताया कि युवाअेा को अपने आत्मविश्वास को हमेशा साथ रखना चाहिए न कि किसी ब्रांडेड सिगरेट के पैकेट को। अधिकतर युवा सिगरेट इत्यादि का सेवन करतें है लेकिन आप अपने स्वस्थ जीवनशैली को चुने न कि कैंसर को।

  • देश के स्वास्थ्य पर भी सर्जिकल स्ट्राईक की जरूरतःडॉ.पारे

    देश के स्वास्थ्य पर भी सर्जिकल स्ट्राईक की जरूरतःडॉ.पारे

    भोपाल,23 जनवरी,(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। भारत की मौजूदा स्वास्थ्य व्यवस्थाएं एक महान देश को लाचार बना रहीं हैं। मोदी सरकार को इन पर सर्जिकल स्ट्राईक करके इसमें आमूल चूल बदलाव करना होगा। इस मुद्दे पर चुप्पी देश को भारी मंहगी पड़ रही है। युवाओं का देश भारत आज बीमार है और इसे स्वस्थ बनाने के लिए हम जो संसाधन झोंक रहे हैं उनसे हमारी प्रगति प्रभावित हो रही है। ये विचार एलोपैथिक और प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ.अंबर पारे ने व्यक्त किए।

    राजधानी के स्वराज भवन सभागार में अक्षर प्रभात जीव संरक्षण की ओर से आयोजित व्याख्यान माला में उन्होंने ये विचार व्यक्त किए। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर आयोजित इस कार्यक्रम में अक्षर प्रभात ट्रस्ट के रामगोपाल बंसल, रामनिवास गोलस और आनंद मार्ग संप्रदाय के कई गणमान्य व्यक्ति भी उपस्थित थे। इस अवसर पर शाकाहार को प्रोत्साहित करने वाली पुस्तक (हम भी पशु हैं क्या) का विमोचन किया गया।

    लाईलाज बीमारियों के इलाज के लिए लगभग 150 गांवों में मेडिकल कैंप लगाने वाले डॉ.अंबर पारे ने कहा कि देश के बीमार स्वास्थ्य ढांचे से निपटने के लिए हमें एलोपैथी, आयुर्वेद, होम्योपैथी और नेचुरोपैथी सभी का मिला जुला प्रयोग करना होगा। उन्होंने कहा कि भारत में हर व्यक्ति घरेलू दवाओं की जानकारी रखता है लेकिन उसे इतना ज्यादा डरा दिया जाता है कि वो जड़ी बूटियों और चूरन चटनी को खलनायक मानने लगता है। बाजारू सोच ने आम नागरिकों की जीवनशैली को इतना अधिक प्रदूषित कर दिया है कि लोगों की जीवन शक्ति घट गई है। नए नए प्रकार के रोग बढ़ रहे हैं। इसके लिए देश में व्यापक जन जागरण अभियान चलाना होगा। मौजूदा स्वास्थ्य ढांचे की गड़बड़ियों को उजागर करने के का जिम्मा सरकार को अपने हाथों में लेना होगा और इस क्षेत्र में उसी तरह सर्जिकल स्ट्राईक करनी होगी जैसे पाकिस्तान के खिलाफ की गई थी। खासतौर पर ह्दय रोगियों को तरह तरह से भयाक्रांत किया जा रहा है और उनसे भारी रकम वसूल की जा रही है।

    आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रोगी देश है। यहां दवाओं और इलाजों पर हर साल पांच लाख करोड़ से भी ज्यादा धन खर्च होता है। भारत को ठंडे देशों के लिए बनी दवाईयों की प्रयोगशाला बना दिया गया है। जबकि वे दवाईयां हमारी प्रकृति, खानपान और मनोदशाओं के लिए दुश्मन साबित हो रहीं हैं। उन्होंने कहा कि साईंटिफिक क्वांटम कन्शसनेस, सुपर कान्शियस एवं सब कांन्शियस, साईंस बियांड साईंस, योग एंड साईंटिफिक हीलिंग थैरेपी, स्पीरीचुअल साईंटिफिक हीलिंग पर अनुसंधान करके जो तरीके विकसित किए गए हैं उनसे असाध्य बीमारियों का भी इलाज संभव है।

    उन्होंने कहा कि 99 फीसदी चिकित्सक और मरीज इंसान के शरीर के लक्षणों के आधार पर इलाज करते हैं। जबकि इसकी जड़ हमारे प्राण शरीर में छुपी होती है। इसके लक्षण साल भर या छह महीने पहले ही नजर आने लगते हैं। इसके बावजूद डाक्टर पैथालाजी रिपोर्ट के आधार पर मरीज को क्लीन चिट दे देते हैं। बाद में रोग को असाध्य घोषित कर दिया जाता है। डॉ.पारे ने कहा कि हम प्राकृतिक चिकित्सा से शरीर के रोग हटाने पर जोर देते हैं जिससे मरीज का स्थाई इलाज होता है। व्याख्यानमाला के दौरान सफल इलाज पाने वाले पूजा, सोनल और कई अन्य रोगियों के अनुभव भी साझा किए गए। अंत में रामनिवास गोलस ने सभी आगंतुकों के प्रति आभार व्यक्त किया।

  • शाकाहार बनाए बॉडी और बचाए मर्दानगी

    शाकाहार बनाए बॉडी और बचाए मर्दानगी


    -हैल्थ रिपोर्टर-
    ज्यादातर शाकाहारी लोगों के दिमाग में इस तरह के विचार पनपते रहते हैं कि शाकाहार के चलते वह बॉडी नहीं बना पा रहे हैं। सबसे ज्यादा सवाल और शंकाएं रहती हैं प्रोटीन को लेकर। इस लेख में आपको अपनी जिज्ञासाओं के सभी समाधान मिल सकेंगे। ये कहना बंद कर दें कि शाकाहारी व्यक्ति कभी अच्छी बाडी नहीं बना सकता।शाकाहार में भी प्रोटीन, कार्बोहाईड्रेट और फैट के अच्छे स्रोत पाए जाते हैं। यदि हम उनका सही तरीके से इस्तेमाल करें तो शाकाहार को पचाना और उससे शरीर के मसल्स को मजबूती देना बड़ा सरल हो जाएगा। सबसे बड़ी बात तो ये कि शाकाहार पर आधारित शरीर बीमारियों से मुक्त रखता है और सही मायनों में मर्दानगी का पोषक होता है।

    हमारे देश में शाकाहारियों के भोजन में प्रोटीन कम शामिल होता है। क्योंकि एक तो ये मंहगा है फिर हमारे ज्यादातर खाद्य पदार्थों में कार्बोहाईड्रेट और फैट पाए जाते हैं। इसलिए शाकाहारियों को सबसे पहले पचने लायक प्रोटीन शामिल करने पर जोर देना होता है।

    शाकाहारी प्रोटीन – सोया टोफू, सोयाबीन के दाने, काला चना, काबुली चना, दूध, छाछ, योग हर्ट, पनीर, चीज़, मूंगफली, ओट्स, दालें, बादाम, दूध पाउडर, आइसक्रीम, प्रोटीन पाउडर, पास्ता, सोया मिल्क, प्रोटीन चॉकलेट।
    इनके अलावा हमारे खाने में रोटी, चावल, मक्‍का, दलिया, केले, आलू, शकरकंद भी होता है तो हमारी कार्ब्स और फैट की जरूरत पूरी हो जाती है। खाने पीने की इन चीजों के उपयोग के तरीके और संयोग पर भी खासा ध्यान रखना होता है। यदि हम इन खाद्य पदार्थों में संयोग का गणित नहीं समझेंगे तो ये खाद्य हमारे शरीर में कई असंतुलन पैदा कर सकते हैं।

    सबसे पहले हमें अपनी प्रोटीन की जरूरत का आकलन करना सीखना होगा। आपका वजन यदि 60 किलो है तो आपको 120 से लेकर 180 ग्राम प्रोटीन की जरूरत होगी। अपने वजन के प्रतिकिलो पर दो से तीन ग्राम प्रोटीन की जरूरत होती है। अब ये हिसाब लगाएं कि इतने प्रोटीन का इंतजाम कहां से होगा। हमें तय करना होगा कि हम कितना प्रोटीन कहां से प्राप्त करें। इसके लिए सबसे आसान स्रोत डबल टोंड दूध या छाछ होता है। हर दिन आप चार लीटर दूध और सूखे मेवे खाकर भी बाडी बना सकते हैं।

    बॉडी बनाने वाले लड़कों की डाईट कैसी हो

    उन्हें जिम जाने से पहले अपने प्रोटीन को बचाने का उपाय सीखना होगा।उनके शरीर को अपनी गतिविधियां चलाने के लिए सबसे पहले ईंधन की जरूरत होती है। ये ईंधन ऊर्जा यदि शरीर को फैट और कार्बोहाइड्रेट से नहीं मिले तो वह प्रोटीन को ईंधन की तरह इस्तेमाल करने लगेगी। इसलिए उसे ऐसा करने से रोकना होगा। प्रोटीन को बचाएं ताकि उसका ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल मसल्स बनाने में हो। इसके लिए जरूरी है बॉडी को भरपूर कैलोरी देना। इसके लिए दिन में कम से कम छह बार खाना खाएं। फल और ड्राई फ्रूट, ग्लूकोज या जूस और शहद को जरूर शामिल करें। रात के वक्त एक लीटर दूध जरूर पिएं ताकि बॉडी को मरम्मत के काम में आसानी हो। अगर दूध नहीं पी पाते तो फिर सोयाबीन या टोफू या पनीर या प्रोटीन पाउडर का इस्तेमाल करें।

    शरीर में फैट इकट्ठा न हो सके इसलिए प्रोटीन के शाकाहारी स्रोतों में फैट घटाने वाले साधन भी अपनाना पड़ते हैं।क्योंकि प्रोटीन के जो शाकाहारी स्रोत हैं उनमें फैट भी अच्छा खासा होता है। जो लोग वजन बढ़ाना चाहते हैं उनके लिए तो कुछ चिंता वाली बात नहीं मगर जो लोग ठोस बाडी के दीवाने हैं उन्हें सोचना पड़ेगा। इसके लिए आपको ग्रीन टी, कॉफी, हरी मिर्च, दालचीनी, लहसुन जैसे लीन बॉडी में मदद करने वाले फूड्स को भी साथ में रखना होगा। यही नहीं पेट की कसरत के लिए वक्त निकालना होगा और ठंडे पानी की बजाए ज्यादातर गर्म पानी पीना होगा। दूध भी गर्म पिएं, खासकर रात को। कलौंजी अथवा मंगरैल भी पेट कम करने में मदद करती है।कलौंजी का तेल भी लेकर शरीर में आवश्यक तत्वों की जरूरत पूरी की जा सकती है।

    मछली के विकल्प के रूप में शाकाहार में भी कई चीजें उपलब्ध हैं। अलसी, अलसी का तेल और अखरोट में बहुत उम्दा किस्म का फैट होता है। मछली को प्रोटीन के अलावा ओमेगा थ्री फैटी एसिड के लिए जाना जाता है। मछली न खाने वालों के लिए अपने खाले में अलसी उर्फ फ्लैक्‍सीड और अखरोट को शामिल करना चाहिए। अलसी को शेक में डाल सकते हैं और अखरोट को कैसे भी खाएं। दो से तीन बड़े चम्मच अलसी और मुट्ठी भर अखरोट की गिरी।

    मांसाहारी प्रोटीन के साथ केवल एक अच्छी बात ये है कि इसमें सभी आठ अमीनो एसिड मिलते हैं। शाकाहारी प्रोटीन में एक आध कम रह जाता है। लेकिन उसका भी उपाय है। दलिया में दाल और थोड़ी सब्जी मिला देंगे तो सारे अमीनो एसिड आ जाएंगे। सब्जियों और अनाज को आपस में मिलाएं। आपको पता है कि दाल व सोयाबीन में खूब प्रोटीन होता है मगर एक कटोरा दाल पीने की बजाए उसमें थोड़ा ओट्स और कोई सब्‍जी मिला लें। सोयाबीन के दानों के साथ साथ अंकुरित मूंग की दाल भी खाएं। कुल मिलाकर बात ये है कि दो अलग अलग परिवारों को साथ मिला लें।

    अगर कोई कसम नहीं खाई है तो फूड सप्लीमेंट लेने से कभी न चूकें। एक सीमा के बाद बिना सप्लीमेंट बॉडी बिल्डिंग काफी टफ हो जाती है खासकर उनके लिए जिन्हें साइज और शेप दोनों चाहिए। ऐसे में प्रोटीन पाउडर मदद करता है। शाकाहारियों पर क्रेटीन और ग्लूटामिन भी काम करता है। आजकल अच्छी कंपनियों के प्रोटीन पाउडर में क्रेटीन, ग्‍लूटामिन और बीसीएए मिला आता है। प्रोटीन पाउडर चुनते वक्‍त चेक कर लें अगर ये तीनों चीजें हैं तो अच्‍छा रहेगा।कई आयुर्वेदिक जड़ी बूटियां भी प्रोटीन की इस कमी की भरपाई कर देती हैं।

    आलू, केला, योग हर्ट, ब्रोकली,पालक और गोभी के परिवार की अन्य सब्‍जियां भी शरीर की प्रक्रिया सुचारू रूप से चलाने में मदद करती हैं। आलू और केले कसरत करने में मदद देंगे और प्रोटीन को खर्च होने से बचाएंगे। ये दोनों सब्जियां फाइबर के अलावा प्रोटीन, कैल्शियम, विटामिन बी और सी से भरी होती हैं। शतावरी का भी इस्तेमाल किया करें।

    आमतौर पर ये सभी चीजें भोजन को समृद्ध बनाने के लिए काफी हैं। लेकिन इसके साथ ये भी जरूरी है कि इन चीजों को हम बदल बदलकर लें। यदि हम इन्हें एक साथ लेंगे तो फायदे के बजाए नुक्सान भी हो सकता है। इसलिए सूझबूझ से इन्हें आपस में बदलते रहना भी जरूरी है। फिर आपको दिन में कम से कम छह बार खाना है। एक ही बार में भरपेट भोजन करने से वह पूरी तरह पच नहीं पाता और शरीर में एसीडिटी बढ़ाने लगता है।

    इस भोजन के साथ अपनी मानसिकता भी सकारात्मकता रखना सबसे जरूरी है। यदि आप खुद पर दया करेंगे तो इस भोजन का पूरा फायदा नहीं उठा पाएंगे। बहुत से शाकाहारी युवक न तो मेहनत अच्छी करते हैं न डाइट अच्‍छी लेते हैं और फिर आलसीपने का ठीकरा शाकाहार पर फोड़ देते हैं। डींगे हांकते हुए कहते फिरते हैं कि अगर हम मांसाहारी होते तो फलां को भी पटखनी मार देते।इस तरह की गप्पें मारना बंद कर दें क्योंकि कई दुबले पतले पहलवान अखाड़े में भारी पड़ जाते हैं जबकि कई मांसाहारी भी सुर्री बम साबित होते हैं। यदि किसी शाकाहारी की बॉडी नहीं बन पा रही है तो इसके लिए शाकाहार दोषी नहीं है। उसके भोजन के तरीके और एंजाईमों, प्रोटीनों, के संयोग से भी लाभ लिया जा सकता है। क्योंकि शाकाहार मानव शरीर के लिए ही बना है और वही उसे स्वस्थ रखता है।यदि संतुलित तरीके से भोजन लिया जाए और भरपूर पसीना बहाया जाए तो शरीर का वी शेप और सिक्स पैक एब्स भी आसानी से पाए जा सकते हैं।

    सप्‍लीमेंट बनाने वाली कंपनियों के उत्पादों को सोयाबीन पाऊडर से कड़ी टक्कर मिलती है। यदि लोग सोयाबीन लेकर प्रोटीन प्राप्त कर लेंगे तो उनका माल कौन खरीदेगा। जाहिर है कि ये कंपनियां सोयाबीन की बदनामी करती फिरती हैं। उनका कहना है कि सोयाबीन में टेस्टेस्टेरोन नहीं होता है। यदि ये न हो तो आप दूसरी चीजों से इसकी कमी पूरी कर सकते हैं। पर इसका मतलब ये तो नहीं कि सोयाबीन खराब हो गया।

    जो लोग सप्लीमेंट लिए बगैर लीन बॉडी चाहते हैं तो उन्हें इसके कई विकल्प भी मिल सकते हैं। वैसे तो प्रोटीन पाउडर लेने में कोई बुराई नहीं है। प्रोटीन के लिए आप चाहें नानवेज खाएं, या सप्लीमेंट और फैट लें तो ही आपका शरीर इस्पात बन सकता है। यदि आप इतनी शर्तें लगाएंगे तो फिर किसी कोच से अपने लायक डाईट फिक्स करवा लें।

    कसरत से एक घंटा पहले तीन केले और एक गिलास दूध शहद मिलाकर या एक बड़ा उबला आलू, दही और धनिया के पत्‍तों के साथ लेना जरूरी है । कसरत से पंद्रह मिनट पहले एक गिलास पानी में तीन चम्‍मच ग्‍लूकोज या एक गिलास बिना छना मौसमी का जूस या एक कप ठंडे पानी में एक चम्‍मच कॉफी ली जा सकती है।

    जबकि कसरत के बाद पहलवानों वाला शेक लिया जा सकता है। अपने नाश्ते में एक बड़ा कटोरा भर सोयाबीन (60 से 100 ग्राम) के भीगे हुए दाने टमाटर प्‍याज और लहसुन डालकर खायें। साथ में एक कप जूस या ग्‍लूकोज,या 50 से 80 ग्राम के आसपास मूंग की दाल पका लें और साथ में जरा सा सलाद भी लें।

    दोपहर का खाना – डेढ़ सौ ग्राम पनीर, आधा गिलास जूस या ग्‍लूकोज, एक प्‍लेट चावल, जरा सा सलाद या चटनी ली जा सकती है।

    शाम को – एक बड़ा कटोरा दलिया या ओट़स, जिसमें थोड़ी सब्‍जी या दाल भी पड़ी हो। ओट्स या दलिया पकाने के बाद उसमें दो चम्‍मच सरसों का तेल या ऑलिव ऑयल डाल लें। एक गिलास छाछ या मट्ठा लिया जा सकता है। मट्ठे के साथ 80 से 100 ग्राम मूंगफली के साथ में मक्‍का भी लें।

    रात का खाना – आपकी मर्जी। बस खाने के बाद कम से कम दो से तीन सौ ग्राम आइसक्रीम ली जा सकती है। इसके विकल्प के रूप में रबड़ी भी ली जा सकती है।जबकि सोने से आधा घंटा पहले 1 से आधा लीटर गर्म दूध।ये डाइट चार्ट उन लोगों के लिए है जिन्‍हें वजन बढ़ाना है और थोड़े बहुत फैट से परहेज नहीं है।इसमें प्रोटीन पाउडर को शामिल नहीं किया है। अगर लेते हैं तो एक्‍सरसाइज के बाद और रात को दूध के साथ ले सकते हैं। मिल्‍क पाउडर भी ले सकते हैं।

    ड्राई फ्रूट्स और फ्रूट्स चलते फिरते कभी भी लें। ग्रीन टी जब मन किया तब पी लें, मगर पिएं जरूर।
    डाइट चार्ट में बदलाव करते रहें। कभी सोयाबीन बढ़ा दें, कभी दूध तो कभी पनीर। प्रोटीन के चार पांच स्रोत हैं उनको हमेशा ध्‍यान में रखें।साथ में भूख बढ़ाने वाली जड़ी बूटियां या टॉनिक भी लेना जरूरी है। क्योंकि यदि भोजन ठीक से न पचे तो सारी मेहनत बेकार हो जाएगी। इसके साथ आपको ये भी ध्यान रखना होगा कि कम से कम दो बार पेट साफ हो।

    डाइट चार्ट देखने में टेंशन देने वाला लग सकता है मगर जब प्रयास करेंगे तो सब आसानी से हो जाएगा। अपने हिसाब से कुछ चीजें आगे पीछे करने की आजादी सबके पास होती है। शाकाहारी लोग 4 लीटर दूध के स्‍पेशल प्लान के बूते बहुत अच्छी गेनिंग कर सकते हैं।

    100 ग्राम में कितना प्रोटीन
    दूध – 3-4 ग्राम, पनीर – 18, सोयाबीन – 36, काला चना – 15, बादाम – 21, पास्‍ता – 12, पीनट बटर – 25, दूध पाउडर – 26, टोफू – 12-40, ओट्स – 16, मूंगफली – 26, दालें – 20-25, छाछ/ मट्ठा – 3, काबुली चना – 19 ग्राम

  • राम मंदिर तर्क नहीं आस्था का प्रतीक

    राम मंदिर तर्क नहीं आस्था का प्रतीक

    – भरतचन्द्र नायक
    विश्व के लब्ध प्रतिष्ठित इतिहासकार मौलाना आजाद स्मृति व्याख्यान माला में भाग लेने आये थे। तब उन्होनें आक्रांताओं द्वारा विजित देशों में की गयी ज्यादियतों का हवाला देते हुए कहा था कि आक्रांता विजित देश में अपने समर्थन में भवन प्रासाद स्मृति के रूप में बनाते रहे है। लेकिन इन स्मारकों का उद्देश्य मजहबी नहीं सियासी होता आया है। इसलिए साम्प्रदायिक भावुकता से इन स्मारकों को देखना अपने आपको धोखा देना है। विश्व इतिहासकार अर्नोल्ड टोनवी ने बताया कि 1614 में रूस ने पोलेंड के वारसा पर अपना अधिकार जमा लिया था। रूस ने अपनी विजयी महत्वाकांक्षा में ईस्टर्न आर्थोडाॅक्स क्रिश्चियन केथेडूल प्रमुख स्थान पर बना डाला। रूस का इसके पीछे उद्देश्य यही था कि पोलिस में यह भावना बैठ जाये कि उनका असल मालिक रूस है। बाद में 1918 में पोलेंड की आजादी के बाद केथेडूल को जमीदोंज करने में पोलिस ने वक्त नहीं लगाया। उन्होनें भारत सरकार की इस बात के लिए खुले मन से प्रशंसा की कि उसने औरंगजेब की मसजिदों को सम्मान के साथ वजूद में रहने दिया। उलटे भारत सरकार पुरातत्व विभाग मुगलकालीन स्मारकों का संधारण करता है, जबकि स्मारकों का उद्देश्य सिर्फ आक्रान्ता, विदेश से भारत आये आक्रांताओं का वर्चस्व याद दिलाना, भारतीय अस्मिता को आहत करना है। अर्नोल्ड टोनवी ने भारतीयों की सहिष्णुता को विश्व में सर्वोच्च निरूपित किया है। ऐसे में अयोध्या में राम मंदिर को ढहाये जाने और विध्वंस में बचे अवशेषों को जोड़कर बाबर द्वारा मजिस्द बनाये जाने का मंतव्य समझना कठिन नहीं है। ऐसे में बरसों से अदालत में चल रहे इस विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय ने इस मसले को यदि हिन्दू-मुस्लिम के बीच सुलह सफाई से हल करने को कहा है तो यह अदालत की दूरदर्शितापूर्ण परामर्ष है। सर्वोच्च न्यायालय ने यहां पर सदाशयता बतायी कि जरूरत पड़ने पर न्यायालय मध्यस्थता करने को भी तैयार है। मुख्य न्यायाधीश ने माननीय न्यायाधीश की सेवाएं देने का प्रस्ताव किया है।

    अध्योध्या में राम मंदिर विवाद पर तकनीकी रूप से स्पष्ट है कि आक्रान्ता बाबर ने राम मंदिर के विशाल ढांचे को ध्वस्त किया और मसजिद का निर्माण करा दिया, जिसे बाद में बाबरी मसजिद कहा गया और कार सेवा करते हुए आवेश में कार सेवकों ने ढांचा जमीदोंज कर दिया। इस विवाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना है कि रामलला जहां तम्बू के नीचे विराजमान है, उस भूमि पर मंदिर के स्थान पर मंदिर बनाया जाये। एक तिहायी भूमि अखाड़े को शेष आवेदक मुस्लिम समाज के हक में जायेगी। लेकिन फैसला माना नही गया और सर्वोच्च न्यायालय में विवाद पहुंचा जहां सर्वोच्च न्यायालय ने सुलह करने की सलाह दी है। अगर इस सद्परामर्श पर भी असहमति जताते हुए कुछ मुस्लिम संगठन मामले पर न्यायालय के निर्देश की अवमानना करते हुए जिद पर अड़े है। न्यायालय के आदेश के समर्थन में कुछ अल्पसंख्यक संगठन आगे भी आये है। लेकिन उनकी आवाज कमजोर मानी जा रही है। मजे की बात यह है कि अयोध्या में बाबरी ढांचा ढहाये जाने के बाद अदालत में जिस बुजुर्ग मुस्लिम हाशिम अंसारी ने याचिका दर्ज की थी, उसका बाद में हृदय परिवर्तन हुआ और उसने सुलह सफायी की बात करते हुए इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि मजहब के नाम पर आक्रामक तेवर अपनाने वाले लोग खाते-पीते लड़ रहे है और आराध्य रामलला एक तंबू में ऐसे मौसम की मार झेल रहे है कि उन्हें भोग लगना भी मयस्सर नहीं है। लेकिन अफसोस इस बात का है कि आज जब परस्पर संवाद का अवसर मिला है, हासिम अंसारी जन्नत सिधार चुके है, मुस्लिमों के बीच ऐसे नेक इंसानों की कमी है, अहंकार और तर्क परोसा जा रहा है। वे भूलते है कि राममंदिर विवाद आस्था का विषय है, यह जायदाद के बंटवारे का मामला नहीं है। आस्था में तर्क कम हृदय की विशालता, संवेदशनीलता अपेक्षित होती है।

    राम जन्मभूमि जमीन के विवाद में उच्च न्यायालय अपना फैसला पहले ही दे चुका है, जिसे मान्य नहीं किया गया। अस्मिता से जुड़े मामले को दीवानी विवाद मानते हुए जो लोग अंतिम रूप से सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की बात कहने पर अड़े है, वे मुगालते में है कि विवाद में उनके पक्ष में ही निर्णय सुनाया जायेगा। कुछ लोग देश की न्याय व्यवस्था पर इस मामले के निर्णय कराने का दायित्व थोप रहे है, उनमें दूरदर्शितापूर्ण सोच की आस्था केन्द्रित भावना और न्यायालय के प्रति सम्मान की कमी है। कमी इस बात से जाहिर हो जाती है कि वे अपनी महत्वाकांक्षा के मोह में न्यायपालिका की मर्यादा नहीं समझ पा रहे है, वास्तव में सर्वोच्च न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश खेहर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ का निर्णय एक आदर्श है जो दोनों पक्षों को सम्मान देता है और उनकी सदाशयता पर विश्वास करता है। राष्ट्र में समरसता का स्थायी भाव जगाता है। आत्म परीक्षण का संकेत करता है। आज समस्या यह है कि भावनात्मक विवाद न्यायालय की देहलीज पर पहुंचते है और जब लंबे खिंचने के बाद उन पर अदालत का निर्णय आता है तो सरकारें निर्णय को अमल में लाने में अपने को असमर्थ पाती है। दुनिया की महाशक्ति अमेरिका भी ऐसे हालात से गुजरा है। इसलिए भारत को सबक लेने की आवश्यकता है। अमेरिका का सर्वोच्च न्यायालय शक्तिमान है और अमेरिकी न्याय व्यवस्था हर मामले में हमारी व्यवस्था से परिपक्व और शासन व्यवस्था साधन संपन्न है। फिर भी 1930 में जब एक मामले पर निर्णय आया तो अमेरिका प्रशासन के हाथ-पैर फूल गये। तत्कालीन राष्ट्रपति रूजवेल्ट को कहना पड़ा था कि निर्णय का अनुपालन भी सर्वोच्च न्यायालय ही करे, सरकार सक्षम नहीं है। हमें भारतीय न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता और न्याय की अस्मिता को उस दिशा में धकेलना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती। देश में सर्वधर्म समभाव से सभी जी रहे है। उन्हें भावनात्मक अतिरेक में धकेलना बुद्धिमानी नहीं है।

    परस्पर विश्वास जीतकर ले-देकर इस समस्या का समाधान कर आने वाली पीढ़ी को सद्भाव से जीने, आजाद मुल्क की तरह बरताव करने, राष्ट्र की अस्मिता को कायम रखने का संदेश देना है। इसलिए अहंकार और जिद् पर अड़े रहने का यह वक्त नहीं है। मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम की हम सभी संतान है, हिन्दु और मुसलमान, क्योंकि जो भारत में जन्मा है उसके आदिपुरूष श्रीराम ही थे। धर्म परिवर्तन एक आकस्मिता थी जो दंड के भय, लालच और प्रलोभन से विवशता बनी। लेकिन धर्म परिवर्तन मात्र से पुरखे तो नहीं बदल जाते। इस बात पर हमें गौरव भी महसूस करना है कि भारत ही हमारा वतन है और श्रीराम हमारे आदर्श पूर्वज है। राम मंदिर अयोध्या का हल वार्तालाप से ही निकलेगा। सर्वोच्च न्यायालय को तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहा राव के समय राष्ट्रपति जी ने कहा था कि वे समस्या का समाधान बतावें। तब सर्वोच्च न्यायलय ने दूरदर्शितापूर्ण उत्तर दिया था कि यह तो भावना का ज्वार है, इसे अपने ढंग से शांत होने दीजिये। एक कौम के रूप में हमें संकेत है कि आस्था में दखल देने के बजाय भाईचारा और बढ़प्पन का परिचय दें।
    अयोध्या मामले को मंदिर की लड़ाई कहकर हम वास्तविकता से मुंह नहीं छिपा सकते। वास्तव में यह राष्ट्रीय सांस्कृतिक जागरण का संदेश है। भारत में थोपी गयी गलत धारणाओं के अवगुंठन से सच्चाई के अविष्कार का जन अभियान है। सोमनाथ के मंदिर के निर्माण के पीछे जो राष्ट्रवाद का आवेग था, अयोध्या मामला इसका अपवाद नहीं है। लेकिन सोमनाथ का भव्य मंदिर बनाना उसके पीछे महात्मा गांधी की जबरदस्त सहमति थी। सरदार वल्लभ भाई पटेल और तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद तो सोमनाथ मंदिर के निर्माण के बाद सोमनाथ पहुंचे और उद्घाटन के भव्य समारोह में भाग लेकर गौरवान्वित हुए थे। अयोध्या में राममंदिर के पीछे किसी दल, संगठन विशेष की भूमिका समझना न्यायसंगत नहीं है। यह सांस्कृतिक नवजागरण अपने को पहचानने का एक सात्विक अभियान बना है, जिसकी निरंतरता 1984 से दिखायी देती है। मामला आस्था बनाम कानून नहीं समझना चाहिए। बल्कि आस्था को कानून का समर्थन और सद्इच्छा के संबल की आवश्यकता है। महान भारत श्रेष्ठ भारत के नारे को सफल बनाने की परीक्षा की घड़ी है। न्यायालय के सहमति बनाने के आदेश पर असहमति दर्ज करने में साहस की आवश्यकता नहीं है। साहस इस बात का दिखाने का समय है कि राष्ट्रहित में अपनी सियासत, हार-जीत का जज्बा छोड़कर कौन आगे बढ़ता है और राष्ट्रीय भावनात्मक एकता का अमिट किरदार बनने का सौभाग्य प्राप्त करता है। साम्प्रदायिक संकीर्णता को त्याग कर आजादी की जंग जीती, लेकिन आजादी के बाद साम्प्रदायिक आधार पर विभाजन कर हम आज पराजित महसूस कर रहे है। हमारे सिर पर उजला दाग न लगे यह अहम प्रश्न है। जिस तरह मक्का मदीना पाक है, अयोध्या के प्रति हिन्दू की आस्था उसपे कम नहीं है। भारत को दुनिया ने विश्व गुरू रहने का गौरव दिया है। क्या हम एकता के हित में कुछ कर पाने में असहाय है। इस तर्क को खारिज नहीं किया जाना चाहिए कि अनेक मुस्लिम बहुल देशों में पाक मसजिदों को आवश्यकतानुसार शिफ्ट किया गया है। विवादित स्थल पर मसजिद बनाना वर्जित है, नमाज ऐसी पाक इबादत है जो कहीं पर भी अता की जाये स्वीकार्य होती है। ऐसे में सियासी ढंग से रंग देना उचित नहीं है।

    अयोध्या विवाद से लंबे समय तक संबद्ध रहे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त माननीय न्यायाधीश पलोक वसु बताते है कि सर्वोच्च न्यायालय के ताजा आदेश के संदर्भ में सुलह के द्वार अवश्य खुलेंगे। बाबरी मजिस्द की कानूनी लड़ाई आरंभ करने वाले हासिम अंसारी ने भी इंतकाल के पहले बताया था कि कद्रदान लोग आगे आकर सुलह की राह निकालेंगे। हासिम अंसारी अंत काल में ईश्वर को प्यारें होने के पहले इस बात पर अफसोस जता रहे थे कि सियासतदां अपनी सियासत कर रहे है और रामलला कानूनी बंधन में बंधक है। जितना धन इस विवाद पर पानी की तरह बहाया गया है, उतने में अयोध्या और फैजाबाद जिला चमन बन जाता। हासिम अंसारी की सोच अल्हदा दी। इस समय उनकी आवश्यकता थी। यदि हासिम अंसारी के नेक तर्क में दम है तो ऐसा क्या कारण है कि कुछ लोग सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की टेर लगाते समय और धन, समाज के अमन-चैन को दांव पर लगा रहे है। स्थानीय जनता ने पहल की है, दस हजार से अधिक लोगों ने एक ज्ञापन पर रजाबंदी बताते हुए कहा कि शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में पहल हो। ज्ञापन में सचेत किया है कि पहल में स्थानीय लोगों को महत्व मिले। सियासत करने वाले लोगों को उसी तरह हाथ नहीं डालना चाहिए, जिस तरह इस ढांचे को बनाने वालों का मजहब से सरोकार नहीं था। उनका उद्देश्य समाज के विजित और विजेता के भाव को स्थायित्व प्रदान करना था। वास्तव में भारत की संस्कृति में नृपमत, लोकमत और साधुमत को मान्यता मिली है। जनता जाग चुकी है और इस मसले को लेकर जन-जन आश्वस्त है। 1992 की तरह न तो बगावती तेवर है और न जिद करने वालों को जनसमर्थन है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी को भी सकारात्मक ढंग से पढ़ा और सुना जाना चाहिए।

  • दिमागी बीमारियों से बचना है तो पौष्टिक खाएं और पसीना बहाएं

    दिमागी बीमारियों से बचना है तो पौष्टिक खाएं और पसीना बहाएं

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    भोपाल । मेदांता अस्पताल गुड़गांव और मेदांता सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल इंदौर के डाक्टरों का कहना है कि मिर्गी, दिमाग में खून का थक्का जमने से होने वाले लकवे और ब्रेन ट्यूमर जैसे रोगों से बचना है तो हमें पौष्टिक भोजन के साथ साथ भरपूर वर्जिश करके खुद को स्वस्थ रखना होगा। मध्यप्रदेश के गंभीर रोगियों के लिए मेदांता अस्पताल ने कई आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं जुटाईं हैं। प्रदेश के डाक्टरों को और आम नागरिकों को अब दिमागी बीमारियों के निदान के लिए इंदौर में ही ये सुविधाएं उपलब्ध होने लगीं हैं।
    मध्यप्रदेश प्रेस क्लब की ओर से आयोजित प्रेस से मिलिए कार्यक्रम में आए न्यूरोलाजी के विशेषज्ञ डॉ.आत्माराम बंसल, डॉ.स्वाति चिंचुरे और डॉ.सुधीर दुबे ने दिमागी बीमारियों के संबंध में विस्तृत चर्चा करते हुए लोगों को भरोसा दिलाया कि दिमागी बीमारियों के उचित निदान के लिए अब लोगों को उचित मार्गदर्शन आसानी से मिलना संभव हो गया है।
    डॉ.सुधीर दुबे ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को देखने, सुनने, बोलने, खाना गटकने में तकलीफ हो,हाथ पैर में तकलीफ हो, शरीर के किसी अंग में सुन्नपन होतो तो उसे तत्काल न्यूरो फिजिशियन से मार्गदर्शन लेना चाहिए।
    डॉ. स्वाति चिंचुरे ने कहा कि दिमाग में खून का थक्का जमने, लकवा लगने की स्थिति में अब सिर की खोपड़ी को काटे बगैर तंत्रिकाओं का इलाज संभव है। पैर की या हाथ की नस से उपकरण मरीज के दिमाग में पहुंचाया जाता है और उससे तंत्रिकाओं की रुकावट दूर की जाती है। इससे डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों का भी सफल इलाज संभव हो गया है।
    डॉ. आत्माराम बंसल ने कहा कि दिमाग के किसी हिस्से में करंट बढ़ जाने से लोगों को मिर्गी आने लगती है। जिस मरीज को मिर्गी आ रही है उसके परिजनों को उसका वीडियो बना लेना चाहिए ताकि डाक्टर को उसका इलाज करने में आसानी हो सके। मेदांता अस्पताल में मरीज के दिमाग की स्केनिंग करके दिमाग के उस हिस्से का पता लगाया जाता है जहां से मिर्गी पैदा हो रही हो। इसके बाद यदि मरीज गंभीर स्थिति में हो तो उसके दिमाग का वो हिस्सा निकाल दिया जाता है। यदि बीमारी गंभीर नहीं है तो दवाईयों से भी मरीज का इलाज संभव हो जाता है। उन्होंने कहा कि अब आधुनिक दवाओं और चिकित्सा सुविधाओं से मिर्गी लाईलाज नहीं रही है।

  • बारिश में लें सेहत का आनंद

    बारिश में लें सेहत का आनंद

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    भोपाल। इस बार वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी को सच साबित करते हुए बारिश लगातार हो रही है।गरमी के सीजन के बाद तेजी से ठंडी होती धरती पर कई बीमारियां भी फैलने लगीं हैं। हर किसी को इस सुहाने मौसम का पूरा लुफ्त उठाने की इच्छा होती है पर साथ ही इस मौसम मे लोग अक्सर जल्दी बीमार हो जाते है।

    बारिश के मौसम में मलेरिया,डेंगू ,सर्दी-खांसी,जुलाब,उलटी,टाईफ़ोइड,त्वचा रोग,पीलिया इत्यादी अनेक रोग फैलते है। जिस तरह हम बारिश से बचने के लिए छाते के इस्तेमाल करते है ठीक उसी तरह बरसात के मौसम मे फैलनेवाली इन बीमारियों से बचने के लिए हमें कुछ एहतियात रूपी छाते का इस्तेमाल करना चाहिए।
    वर्षा ऋतु में नीचे दिए हुए जरुरी एहतियात बरते !
    १) हमेशा ताजे और स्वच्छ सब्जी / फल का सेवन करे।
    • ध्यान रहे की खाने से पहले फल / सब्जी को अच्छे से स्वच्छ पानी से धो कर साफ कर ले,खास कर हरी पत्तेदार सब्जी।
    • बासी भोजन,पहले से कटे हुए फल तथा दुषित भोजन का सेवन न करे ।
    • हमेशा ताजा गरम खाना खाए।
    • इस मौसम में सब्जी / फल जल्दी ख़राब हो जाते है इसलिए हमेशा ताजा फल या सब्जी का प्रयोग करे।
    • इन दिनों में हमारी पाचन शक्ति सबसे कम होती है।इसलिए जरुरी है अधिक तला,भुना खाना न खाया जाए बल्की ऐसा भोजन खाया खाए जो आसानी से पच जाए।जब भूख लगे तब ही और जीतनी भूख हो उतना ही आराम से पचने लायक खाना लेना चाहिए।
    • ज्यादा ठंडा,खट्टा न खाए।ज्यादा नमक वाली चीजे जैसे चिप्स,कुरकुरे,चटनी,पापड कम खाए क्योंकी इस मौसम मे शरीर पानी रुकने की संभावना ज्यादा होती है।
    २) बाहर की चीजें न खाएं

    • बाहर का सड़क के किनारे मिलनेवाला या होटल का खाना खाने से पूरी तरह बचना चाहिए। .
    • बाहर का खाना खाने से जुलाब,उलटी,टाईफ़ोइड इत्यादी गंभीर रोग हो सकते है।
    • सड़क के किनारे बेचे जानेवाले चायनिझ फ़ूड,भेल,पानी पूरी यह फ़ूड पॉईजनिंग होने के प्रमुख कारण है।

    ३) साफ पानी खूब पिएं

    • वर्षा ऋतु में हवा में अधिक नमी होने के कारण शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकलती है और साथ ही पसीना भी ज्यादा आता है,ऐसे में जरुरी है की शरीर में पर्याप्त पानी का प्रमाण रखने के लिए भरपूर पानी का सेवन करे।
    • हमेशा उबाल कर ठंडा किया हुआ या फ़िल्टर किये हुए स्वच्छ पानी का सेवन करे।कम से कम १५ मिनट तक पानी अवश्य उबाले।
    • ठंडा पेय पीने की बजाय तुलसी,इलायची की चाय या थोडा गरम पानी पीना ज्यादा फायादेमंद है।

    ४) बारिश से बचना होगा

    • हर किसी को बारिश में भीगना पसंद है पर बारिश में ज्यादा देर तक भीगने से सर्दी-खांसी और बुखार हो सकता है।
    • बारिश में भीगने पर ज्यादा देर तक बालो को गीला न रखे।
    • अगर आप को अस्थमा है या फिर आपको जल्दी सर्दी-जुखाम-खांसी हो जाती है तो बारिश में न भीगे।
    • बारिश से बचने के लिये छाता/रेनकोट का इस्तेमाल करना चाहिये।
    • कपडे/जूते /चप्पल गीले हो जाने पर तुरंत बदल दे।ज्यादा समय तक गीले कपडे पहनने से फंगल ईत्यादी त्वचा रोग हो सकते है।
    • डायबिटीज के मरीजो को विशेष रूप से अपने पैरो को ज्यादा ख्याल रखना चाहिये।पैर गीले होने पर तुरंत उन्हे साफ कर देना चाहिये।
    ५) बुजर्गो का बचाव
    • बदलते मौसम मे बुजर्गो के बीमार होने कि संभावना ज्यादा होती है। इसलिये जरुरी है कि उनके स्वास्थ्य का ख्याल रखा जाए।
    • बुजर्ग बारिश मे ज्यादा बाहर न निकले।गरम चाय,कोफी या सूप पिए।
    • ज्यादा कच्चे फल या सलाद न खाए।
    • खाने मे हल्दी ,ईलायची,सौन्फ,दालचीनी का इस्तेमाल करे।इनसे रोगप्रतिकार शक्ती बढती है।

    ६) रहें सावधान
    • रात्री मे सोने के लिए मच्छरदानी का प्रयोग करे।
    • अपने घर के आस-पास गंदगी न होने दे। घर के आस-पास के गड्ढों को भर दे।जिससे बारिश का पानी रुककर सडने न पाए। इससे मच्छर उत्पन्न नही होंगे।
    • घर कि अच्छी तरह फ़िनाईल से सफाई करे ताकि मक्खियाँ न आए।
    • बच्चो को बारीश से पूर्व ही टाईफाईड और हेपेटाईटिस के वैक्सीन लगवा दे।
    • अपनी नियमित चल रही दवाईयो का अधिक खुराक जमा कर ले ताकि बारीश कि वजह से बाहर न जा सकने पर दवा मे कोई गैप न पडे।
    • किसी भी रोग कि शंका होने पर तुरंत डॉक्टर के पास जाए।
    उपचार से बचाव बेहतर है,इस नियम का पालन वर्षा ऋतू मे करना जरुरी है।
    थोड़ा सावधान रहें और बारिश के मौसम का पूरा लाभ उठाएं।