Category: कृषि क्रांति

  • नानाजी देशमुख विश्विद्य़ालय ने विकास की सोच को कुशासन से रौंदा

    नानाजी देशमुख विश्विद्य़ालय ने विकास की सोच को कुशासन से रौंदा

    प्रदेश के एकमात्र मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय के शिक्षकों को पांच महीनों से नहीं मिला वेतन

    भोपाल,20 जनवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्यप्रदेश की अफसरशाही जब सुशासन की शाबासी लूटने के लिए आईएएस सर्विस मीट का उत्सव मना रही है तब जबलपुर के मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय के शिक्षक पांच महीनों से वेतन न मिलने की वजह से दर दर की ठोकरें खा रहे हैं। देश के मत्स्य कारोबार में प्रशिक्षित उद्यमियों को खड़ा करने वाला ये संस्थान नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय जबलपुर के कुलपति एसपी तिवारी के उस कुशासन की सजा भुगत रहा है जो उन्होंने नौकरियां बांटने की वाहवाही लूटने की वजह से थोपी है। प्रदेश में मछुआ कल्याण तथा मत्स्य पालन विभाग होते हुए इस कॉलेज को पशुपालन विभाग के हवाले सौंपने की नादानी इसी नौकरशाही ने की है जो आज पूरे देश में सुशासन का मॉडल बनी हुई है।

         चुनाव की देहलीज पर बैठी शिवराज सिंह चौहान सरकार ने अपने सभी विभागों को टारगेट दिया है कि वह अधिकाधिक भर्तियां करके युवाओं में बढ़ रही निराशा की भावना को दूर करे। इसका लाभ लेते हुए नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय के कुलपति ने लगभग सौ भर्तियां कर डाली हैं।कथित तौर पर भारी कमीशनखोरी में की गई इन भर्तियों ने न केवल विश्विद्यालय के बजट का भट्टा बिठाल दिया बल्कि अपने अधीन आने वाले मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय का बजट भी स्वाहा कर दिया है। लगभग ग्यारह करोड़ बजट दिए जाने के बावजूद विश्विद्यालय ने केवल सात करोड़ बीस लाख रुपए महाविद्यालय को दिए और बाकी बजट कहां लुटा दिया इसकी कोई जानकारी नहीं दी है। बजट की इस राशि का उपयोग अन्यत्र कर लिए जाने से महाविद्यालय को वेतन बांटने के लाले पड़ गए हैं।

            इस संबंध में कुलपति एसपी तिवारी का कहना है कि सरकार ने सातवें वेतन आयोग की अनुशंसाएं लागू कर दीं हैं इसलिए बजट कम पड़ गया है। नई भर्तियों से नौकरी में आए युवाओं को तो वेतन दिया जा रहा है पर पुराने शिक्षकों के वेतन के लिए सरकार से और राशि मिलने का इंतजार है। वे भर्तियों में भर्राशाही के आरोपों से इंकार करते हुए कहते हैं कि हमने पारदर्शी तरीके से नौकरियां बांटी हैं। उनसे जब पूछा गया कि जब बजट नहीं था तो नई भर्तियां क्यों कर लीं तो उनका कहना था कि हम सभी के वेतन की व्यवस्था कर रहे हैं।

           प्रदेश के एकमात्र मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय को जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर के वैज्ञानिकों ने मछली के कारोबार की संभावनाओं को देखते हुए स्थापित कराया था। तबसे इसे इंडियन काऊंसिल आफ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च की मान्यता के आधार पर ही चलाया जाता है। इस कॉलेज से पढ़कर निकले हजारों छात्र आज समुद्र तटीय इलाकों में कारोबार करने वाली इंटरनेशनल कंपनियों में कार्य कर रहे हैं। राज्य के तालाबों में किए जा रहे मत्स्यपालन कारोबार को विकसित करके इन विद्यार्थियों ने प्रदेश और देश के लिए विदेशी आय का खजाना खोल दिया है। राज्य के मछुआरों और निषाद जाति समुदाय के युवाओं के लिए जीवनरेखा बन चुके इस महाविद्यालय के विकास की संभावनाओं को देखते हुए राज्य सरकार ने अधिक ग्रांट देकर इसे संबल दिया था। इसके बावजूद कुलपति एसपी तिवारी ने महाविद्यालय में केवल चार नई भर्तियां की हैं और पुराने अधिकारियों कर्मचारियों और प्रोफेसरों का वेतन रोककर कालेज का माहौल विषाक्त बना दिया है।

            नानाजी देशमुख का नाम आत्मनिर्भर विकास के फार्मूलों के लिए जाना जाता है। जबकि उनके नाम पर बना विश्वविद्यालय आज विकास की संभावनाओं में पलीता लगाने में जुटा हुआ है। सरकार से अधिक बजट की मांग करके ये स्वशासी संस्थान एक पंगु व्यवस्था का जन्मदाता बन गया है। इन हालात से ऐसा नहीं कि राज्य सरकार या उसकी प्रशासनिक मशीनरी वाकिफ नहीं है। महाविद्यालय के विद्यार्थियों ने कई बार आंदोलन करके सरकार को अपनी व्यथा से अवगत कराया है। मत्स्यपालन के व्यवसाय से जुड़े राज्य के बड़े मतदाता वर्ग ने भी बार बार सरकार को अपने समुदाय की दुर्दशा की जानकारी दी है। इसके बावजूद नौकरियां बेचने में जुटे कई चमचे भाजपा सरकार को गुमराह कर रहे हैं।

            मछुआ कल्याण एवं मत्स्यपालन मंत्री तुलसी सिलावट ने भी कई बार प्रशासन को निर्देश देकर इस महाविद्यालय को अपने विभाग में शामिल करने की सलाह दी है। इसके बावजूद प्रशासनिक अधिकारियों ने मत्स्य कारोबार की संभावनाओं का दोहन करने में कोई रुचि नहीं दिखाई है। मछुआ कल्याण एवं मत्स्य पालन विभाग की प्रमुख सचिव कल्पना श्रीवास्तव से इस संबंध में मुलाकात करने का प्रयास किया गया पर वे आईएएस सर्विस मीट में व्यस्त होने की वजह से उपलब्ध नहीं हो सकीं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हर मंच से दावा करते रहते हैं कि उनकी प्रशासनिक मशीनरी ने प्रदेश को सर्वश्रेष्ठ राज्य बना दिया है लेकिन इस राज्य में कई विभाग ऐसे हैं जहां शिक्षकों और अधिकारियों को वेतन के लिए दर दर की ठोकरें खानी पड़ रहीं हैं।

  • वन मेले में फार्मा कंपनियों ने भी थोक में खरीदी जड़ीबूटियां

    वन मेले में फार्मा कंपनियों ने भी थोक में खरीदी जड़ीबूटियां

    पाँचवें दिन क्रेता-विक्रेता सम्मेलन में 34.50 करोड रूपये के व्यापार अनुबंध

    भोपाल,24 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। राजधानी के लाल परेड मैदान पर चल रहे अंतर्राष्ट्रीय वन मेले में आज शनिवार का अवकाश होने की वजह से लगभग 32 हजार लोग मेला देखने पहुंचे। सुबह से ही वन उत्पादों में रुचि रखने वाले लोग मेला स्थल पर जुटने लगे थे। मेले में जड़ी बूटियों की खरीद बिक्री के साथ नाड़ी वैद्यों और आयुर्वेदिक चिकित्सकों के साथ जंगलों के वनवासियों के पास भी लोगों का जमावड़ा लगा रहा। मेले में ज्योतिष पर आधारित पेड़ पौधों और जड़ी बूटियों के विक्रय में लोगों की खासी रुचि देखी गई। परिसर में एक ओर सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहे थे तो दूसरी ओर क्रेता विक्रेता सम्मेलन का आयोजन भी चल रहा था। मेला घूमने आए लोग फूड जोन में खाने पीने के विविध व्यंजनों का भी लुत्फ उठा रहे थे। क्रेता विक्रेता सम्मेलन के दौरान छत्तीसगढ़ लघु वनोपज संघ (CGMFP) और मध्य प्रदेश लघु वनोपज संघ (MPMFP) विंध्य हर्बल्स के मध्य 6 करोड़ रुपए का व्यावसायिक अनुबंध हुआ | इस अनुबंध के माध्यम से छत्तीसगढ़ हर्बल एवं विंध्य हर्बल्स एक दूसरे के उत्पादों को बेचने में बढ़ावा देंगे | इस अनुबंध को CGMFP से विशेष प्रबंध संचालक एस. एस. बजाज ने एवं विंध्य हर्बल्स की ओर से डॉ. दिलीप कुमार ( सी. ई. ओ. एमपीएमएफपी पार्क, भोपाल) ने हस्ताक्षर किया एवं दस्तावेजों का हस्तांतरण किया गया | बस्तर फूड , छत्तीसगढ़ से महुआ के एक्सपोर्ट का MOU हस्ताक्षर किया गया जिसके माध्यम से मध्यप्रदेश का फ़ूड ग्रेड २००मीट्रिक टन महुआ लंदन एक्सपोर्ट किया जायेगा इन प्रयासों से वनवासियों का बहुत कम मूल्य में बिकने वाले महुआ उनकी खासी कमाई कराएगा। इसके साथ 28 करोड़ 50 लाख रूपये के अनुबंध एमएफपीपीएआरसी और विभिन्न संस्थाओं के बीच भी किए गए। इससे आने वाले समय में जड़ी-बूटियों के क्षेत्र में शामिल प्राथमिक संग्राहक और उत्पादकों की आर्थिक समृद्धि तेजी से बढ़ेगी।

    वन मेले में आयोजित क्रेता विक्रेता सम्मेलन में एक वैश्विक मंडी का नजारा देखा गया।विक्रेता अपने माल का सैंपल लेकर आए थे और खरीददारों से मोल भाव कर रहे थे।


    क्रेता-विक्रेता सम्मेलन सेवा निवृत्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख श्री व्ही.आर. खरे के मुख्य आतिथ्य में हुआ। इसमें प्रदेश और देश के विभिन्न हिस्सों से 140 सहभागी ने प्रत्यक्ष रूप से और 300 प्रतिभागी वीडियो कॉन्फ्रेंस से संवाद किया गया। राज्य लघु वनोपज संघ के सीईओ डॉ. दिलीप कुमार ने बताया कि मध्यप्रदेश के 32 जिलों में 4491 करोड़ रूपये से ज्यादा का लघु वनोपज का व्यापार होता है। इसमें केवल महुआ का व्यापार 981 करोड़ रूपये का है। भूतपूर्व वन बल प्रमुख श्री राम प्रसाद ने बताया कि प्रदेश के छिन्दवाड़ा और सिवनी की चिरौंजी की सम्पूर्ण विश्व में मांग है। यह सबसे महंगा सूखा मेवा है।


    राज्य लघु वनोपज के अपर प्रबंध संचालक भागवत सिंह ने संघ की विभिन गतिविधियों को साझा किया। उन्होंने बताया कि संघ वन धन केन्द्रों के विकास, लघु वन उपज के व्यापार एवं संग्रहण के साथ प्रतिवर्ष 10 हजार हेक्टेयर भूमि पर वृक्षारोपण कराता है। छत्तीसगढ़ लघु वन उपज संघ के एस. एस. बजाज ने बताया कि छत्तीसगढ़ सरकार केन्द्रीय खाद्य प्रौद्योगिक संस्था मैसूर के साथ मिल कर महुआ से गुड़ बनाने पर अनुसंधान कर रहा है।
    अंतर्राष्ट्रीय वन मेले में दिन ब दिन भीड़ बढ़ती जा रही है, रविवार को मेले का आकर्षण चरम पर होगा। मेले के 5वें दिन 32 हजार लोगों ने मेले का आनंद लिया। विभिन्न स्टालों पर लोगों की भीड़ देख कर स्टॉल संचालकों का उत्साह भी बढ़ रहा है। कॉलेज के छात्र-छात्राओं द्वारा बनाए व्यंजनों का स्वाद लोगों का आकर्षण बढ़ा रहा है।
    मेले में पिछले 5 दिनों में 1 करोड़ 27 लाख रूपये के वनोपज हर्बल उत्पाद से निर्मित औषधियों की बिक्री हो चुकी है। स्थापित ओपीडी में 760 आगुंतकों ने आयुर्वेद चिकित्सक और अनुभवी वैद्यों से नि:शुल्क चिकित्सकीय परामर्श लिया।


    मेला प्रांगण में सोलो और ग्रुप नृत्य की रंगारंग प्रस्तुति में बच्चों ने सभी का मन को मोह लिया। एकल और सामूहिक नृत्य प्रस्तुति में 20 विद्यालयों के 146 छात्र-छात्राओं ने अदभुत कला का प्रदर्शन किया। एम.एम. म्यूजिकल ग्रुप की आर्केस्ट्रा और दुलैया कॉलेज के छात्र-छात्राओं द्वारा आकर्षक प्रस्तुति दी गई।

  • जंगलों का कवच हैं जड़ी बूटियां बोले उत्तराखंड के वनमंत्री

    जंगलों का कवच हैं जड़ी बूटियां बोले उत्तराखंड के वनमंत्री

    भोपाल,22 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।उत्तराखण्ड के वन मंत्री सुबोध उनियाल का कहना है कि आज के वन हमारी सामुदायिक सहभागिता से विकसित हो रहे हैं। जरूरी है कि इन वनों को वनवासियों की आत्मनिर्भरता का साधन भी बनाया जाए ताकि वनों का विनाश रुक सके और घने जंगल हमारी परिस्थितिकी को संवारने का साधन बन सकें। राजधानी के लाल परेड मैदान में चल रही दो दिवसीय कार्यशाला में श्री उनियाल ने वनसंपदा को जंगलों का रक्षा कवच बताया है। ये दो दिवसीय कार्यशाला ‘लघु वनोपज से आत्म-निर्भरता’ विषय पर आयोजित हो रही है जिसमें वनमेले में आए कई प्रकृति प्रेमी भी शामिल हो रहे हैं।


    श्री उनियाल ने कान्फ्रेंस में विभिन्न आयुर्वेदिक और वन-शिक्षण संस्थाओं से शामिल हुए विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि दुनिया का कोई लक्ष्य आपकी हिम्मत से बड़ा नहीं हो सकता। आप ये न सोचों कि इतने विशाल जंगलों को हम कैसे बचा सकते हैं। वनोपज से होने वाली आय जंगलों के रक्षकों की इतनी बड़ी फौज खड़ी कर सकती है जो सीमित संसाधनों में भी सफलता दिला सकती है।जंगलों की उपयोगिता से जुड़ी यह मानव शक्ति बगैर वेतन पर्यावरण बचा सकती है। जरूरत है कि हम लोगों को जड़ी बूटियों का महत्व समझाएं। देशी चिकित्सा के तौर तरीके उन्हें पेड़ों का महत्व आसानी से बता सकते हैं।


    राज्य लघु वनोपज संघ के एमडी पुष्कर सिंह ने बताया कि दो दिन तक चलने वाली कार्यशाला में देश-विदेश में हुए विभिन्न अनुसंधानों की जानकारी मिलेगी, जो आयुर्वेद के विद्यार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक साबित होगी। प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख श्री आर.के. गुप्ता ने बताया कि वन मेले में लगे स्टालों से प्रदेश की जैव विविधता झलकती है। यहाँ एक ओर पातालकोट का विश्व विख्यात शहद, झाबुआ का लाल चावल, महाकौशल क्षेत्र का कोदो-कुटकी और कई तरह के पारम्परिक औषधीय पौधों की प्रचुरता है।


    कार्यशाला में नेपाल, इंडोनेशिया, भूटान के विशेषज्ञों के साथ मध्यप्रदेश सहित उत्तराखण्ड, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, महाराष्ट्र और हिमाचल प्रदेश के विषय-विशेषज्ञ, अधिकारी और इंडस्ट्री एक्सपर्ट शामिल हुए।नेपाल सरकार के जलवायु परिवर्तन एवं पर्यावरण सलाहकार डॉ. माधव कर्की वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से शामिल हुए। उन्होंने मध्यप्रदेश और उत्तराखण्ड राज्य के संसाधनों के सतत प्रबंधन और संवर्धन की तारीफ करते हुए कहा कि नेपाल को इस संदर्भ में सीखना होगा।


    वन मंत्री श्री सुबोध उनियाल ने लाल परेड ग्राउंड में लगे वन मेले में लगी विभिन्न स्टालों का अवलोकन किया और प्रदर्शित उत्पादों की जानकारी भी प्राप्त की। वन बल प्रमुख आर.के. गुप्ता ने वन मंत्री को प्रतीक-चिन्ह भेंट किया। इस मौके पर भारतीय वन प्रबंध संस्थान (आईआईएफएम भोपाल) के डायरेक्टर डॉ. के. रविचंद्रन की मौजूदगी विशेष रही। अपर प्रबंध संचालक (व्यापार) श्री विभाष ठाकुर ने सभी आगंतुकों का आभार माना।

  • गायों को लंपी से बचाने में मिथिलीन ब्लू दवाई कारगर

    गायों को लंपी से बचाने में मिथिलीन ब्लू दवाई कारगर

    प्रभावी एंटीवायरल ड्रग  मिथिलीन ब्लू भारत सरकार के एल एस डी (लंपी) ट्रीटमेंट गाइडलाइन में शामिल

    वर्ष 1907 में  एम बी के सिंथेटिक  स्वरूप के आविष्कारक सर पौल  एलरिच को  एम बी के आविष्कार के लिए नोबल पुरस्कार दिया गया था.

    एम बी आय बी , ओरल , टॉपिकल सभी प्रकार से गोवंश के एल एस डी में   प्रभावी

    स्वास्थ्य गोवंश  के  एल एस डी से बचाव के लिए प्रोफिलेक्टिक डोज वायरस से बचाव में प्रभावी

    एमबी   टीम के ग्रामीण कार्यकर्ताओं ने 50000 गो वंश को 1 लाख लीटर एम बी वितरित की

    भारत के नागरिकों से वेटनरी डाक्टरों को एम बी दवाई दान में देने जी अपील की

     एम बी  टीम में राजस्थान यूपी गुजरात महाराष्ट्र हिमाचल के डॉक्टर और गौपालक शामिल

      भोपाल 19 सितंबर (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। कुख्यात लंपी रोग से हो रही गौवंश की मौतों के बीच राजधानी की सामाजिक कार्यकर्ता सुश्री साधना कार्णिक प्रधान ने इन दिनों व्यापक अभियान चलाया है। वे (लंपी रोग)  एल एस डी के लिए एम बी   टीम की राष्ट्रीय संयोजक भी हैं।  एल एस डी के लिए टीम एम बी के डॉक्टर जगदीप काकड़िया डॉक्टर  दीपक गोलवलकर अश्विन पटेल तथा राजस्थान के वेट  डाक्टरों व गौपालकों की टीम के साथ उनके कठिन प्रयास के बाद केंद्र सरकार ने  लंपी वायरस के लिए जारी मेडिकल ट्रीटमेंट गाइडलाइन में  मीथेलीन ब्लू  (एम बी) नामक एंटीवायरल दवा को   शामिल कर लिया है। एम बी  टीम  वेट डाक्टरों के साथ राजस्थान के कुछ जिलों में एम बी ट्रीटमेंट  के एल एस डी पर प्रभाव का अध्ययन कर  डाक्टरों को इलाज हेतु एम बी डोनेट भी करा रही है

    राजधानी भोपाल की सामाजिक कार्यकर्ता सुश्री साधना कार्णिक प्रधान, संयोजक,राष्ट्रीय एम बी टीम,
    मोबाइल 9425008021, [email protected], [email protected]

     सुश्री साधना कार्णिक प्रधान ने बताया कि एम बी टीम  ने  केंद्र सरकार मांग की है कि पिछले 2 वर्ष से भारत के अनेक राज्यो में फैली लपी स्किन डिजीज ( एल एस डी) को राष्ट्रीय महामारी घोषित किया जाए। इसके साथ ही भारत भर के अस्पतालो में गौवंश को एल एस डी का फ्री इलाज दिया जाए. उन्होंने बताया कि मिथेलीन ब्लू  एम बी   एक एंटी वायरल एंटी बायोटिक एंटीफंगल एंटी ऑक्सिडेंट एंटी इन्फ्लेमेटरी आदि     बहुउपयोगी दवा है जिसका उपयोग पिछले 40 वर्षी से  विभिन्न प्रकार के वायरस  के इलाज में गुजरात के डॉक्टर दीपक गोलवलकर करते आ रहे है

     एम बी टीम की संयोजक साधना कर्णीक प्रधान ने  बताया कि एल एस डी पर केंद्र सरकार की राष्ट्रीय ट्रीटमेंट गाइडलाइन में आने के बावजूद आज तक  देश की किसी  भी राज्य सरकार ने एल एस डी  महामारी से  पीड़ित तड़पते गोवंश  के इलाज के लिए एम बी  दवाई या ड्रग अभी तक डाक्टरों को उपलब्ध नहीं कराई है.जबकि एम बी इलाज  के एक  कोर्स से एक गाय का 5 दिन के इलाज खर्च मात्र 25 रुपए मासिक खर्च केवल  150 रुपए है

    टीम के विशेषज्ञों ने  बताया कि एम बी  बॉडी का चार्जर है एवम् वायरस के संक्रमण को समाप्त करती है। मजिक बुलेट्स यानी एम बी बॉडी का चार्जर है. यह शरीर के केवल टैरोरिस्ट ( आतंकवादी) सेल्स को  इलेक्ट्रॉन बंबार्डमेंट  से नष्ट करती है. जबकि शरीर की  स्वस्थ्य कोशिकाओं को एक्स्ट्रा इलेक्ट्रॉन की शक्ति प्रदान करती है. ब्रेन को भी चार्ज करती है.एम बी का कोई मेटाबॉलिज्म नहीं है यह  6 घंटे में शरीर से  पेशाब के द्वारा निकल जाती है.

    वर्तमान में लैब में प्रयुक्त किया जाने वाली मिथाईलीन ब्लू से पशुओं का इलाज चल रहा है.

    वर्तमान में एम बी  केवल दान दाताओं के माध्यम से डाक्टरों को उपलब्ध हो रही है।  उनकी  एम बी   टीम की ओएम बी की ओर से एम बी केवल  दानदाताओं के माध्यम से कई राज्यों  राजस्थान ,  जम्मू  , हिमाचल ,  महाराष्ट्र छत्तीसगढ़  के वेट डाक्टरों को एल एस डी के इलाज के लिए उपलब्ध कराई  जा रही है. जिसकी मात्रा बहुत कम है.सरकारी खरीद में अब तक इस दवाई को शामिल नहीं किया गया है।

    दुनिया भर के रिसर्च परिणाम के अनुसार

    एम बी आय बी एवम् ओरल डोज मात्रा

    एम बी आय वी डोज मात्रा……

     एम बी आय वी ( 8  से 15 एम जी/ केजी बॉडी वेट)

    धीमी आय वी  बोलस ( bolus)1% इंजेक्शन सीधे दिए जा सकते है  या 500 एम एल नॉर्मल सलाइन  के द्वारा ड्रीप के द्वारा

     ऊपरी उच्चतम डोज  ( 12 घंटे में )15 एम जी / केजी बॉडी वेट है

    एम बी ओरल डोज मात्रा……

    3 एम जी / के जी बॉडी वेट दिन में तीन बार ( प्रति 8 घंटे में)  कम से कम की मात्रा

    दुनियाभर की रिसर्च के अनुसार 8 से 15 एम जी /केजी बॉडी वेट

    उच्चतम सुरक्षित डोज 4500 एम एल.12 घंटे में

    टीम एम बी की द्वारा एल एस डी पर   एम बी ट्रीटमेंट के अध्ययन का प्रभाव……..

    साधना कर्णिक ने पत्रकारों से बातचीत में   बताया कि  उनकी एम बी टीम ने राजस्थान में  गंभीर रूप से लंपी पीड़ित जालोर व सचौर में  ग्रामीणों  व वेट डाक्टरों  के साथ  मिलकर करीब  2500 लंपी पीड़ित   पशुओं पर  मिथेलिन ब्लू  के 0.1% घनत्व के घोल  पर प्रयोग किया. जिसमे  से 500 गोवंश   अती गंभीर बीमार गम्भीर बीमार और  कम बीमार कैटेगरी के थे. जबकि  2000 से ज्यादा  स्वास्थ्य गोवंश को सावधानी के तौर  वायरस से बचाव हेतु सुरक्षात्मक डोज दिया गया. विभिन्न कैटेगरी में गोवंश की बीमारी की गंभीरता के आधार पर उनको डोज की मात्रा  दी गई. परिणाम के अनुसार एम बी ट्रीटमेंट से गंभीर रूप से प्रभावित  पीड़ित  पशुओं  पर यह इलाज  75% सफल रहा  कम प्रभावित पशुओं पर एम बी ट्रीटमेंट 85%प्रभावी रहा  अति गंभीर रूप से  बीमार पशुओं पर  एम बी ट्रीटमेंट  50% सफल रहा.  स्वस्थ्य पशु को एम बी ट्रीटमेंट  का डोज सावधानी के त्तौर पर देने के कारण उनका वायरस से  90% बचाव हुआ. वायरस से गौवंश  त्वचा पर होने वाले घावों पर भी एमबी ट्रीटमेंट 80 फीसदी प्रभावी पाया गया है। यह भी पाया गया कि एंटी बैक्टिरियल प्रभाव होने के कारण एम बी का  1% घनत्व का  इंजेक्शन  सबकट एल एस डी पीड़ित गायो के  स्किन  घावों को भरने की भी बहुत प्रभावी है .एम बी 1% से 2% घनत्व का  घोल भी एम बी के घाव भरने में  प्रभावी है.

    भावनगर में  डॉक्टर काकड़िया द्वारा अध्ययन…..

    डॉक्टर काकड़िया ने गुजरात भाव नगर में सामाजिक कार्यकर्ता अश्विन पटेल के साथ मिलकर 35 लंपी पीड़ित गायो पर एम बी के प्रभाव का  ट्रायल किया  जिसमे  एम बी ट्रीटमेंट देने के बाद प्रभावित गोवंश का तपमान 5 दिन मे 106 डिग्री से 101 डिग्री तक काम हुआ

    पॉक्स वायरस पर एम बी के प्रभाव का दुनिया भर मै रिसर्च. परिणाम……….

    एल एस डी  केप्री पॉक्स वेरायटी का वायरस है

    एम बी को  वर्ष 2006 में  पॉक्स वायरस ( लैंपी जैसा वायरस) के लिए पेटेंट भी  किया गया है

    अमेरिकी आविष्कारक क्रिस्टोफर वुल्फ और नेगी हेबिक ने 2006 में अपनी कंपनी बायो  एन  वीजन एंकॉर्पोरीशन के माध्यम से अपने एम बी से पॉक्स वायरस के इलाज का  आविष्कार का पेटेंट कराया कि एमबी पॉक्स वायरस पर काम करता है.

    संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन  FAO  एफएओ जो संयुक्त राष्ट्र का एक हिस्सा है और पशुपालन पर WHO की तरह काम करता है उसने 1988 से प्रकाशित अपनी वेबसाइट पर बताया  कि  पशुओं को को उनकी आनुवंशिक बीमारी में MB  जीवन भर   IV खुराक में दिया जा सकता है.

    सभी  सरकारें पशुओं के इलाज के लिए एमबी दवाई को तत्काल उपलब्ध कराए…….

    साधना कार्णिक ने देश के सभी राज्यो से गोवंश को बचाने के लिए एम बी को  इमरजेंसी स्तर पर तत्काल खरीदकर देश के सभी डाक्टरों को उपलब्ध कराने की मांग की है.

     देश  के नागरिकों से  अपने राज्य में एम बी सेंटर बनाकर एम बी देने की अपील…..

     साधना कार्णिक ने विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा एम बी उपलब्ध कराने  तक देशवासियों से इसे अपने  राज्य व जिलों  में एम बी सेंटर बनाकर वेट डाक्टरों को तड़पती हुई बेजुबान गायो  का प्रभावी इलाज करने के लिए लैब ग्रेड एम बी  पाउडर दन करने की अपील की है.

    एम बी का संक्षिप्त इतिहास…….

    एम बी याने नीली दवा मिथेलीन ब्लू
    यह एक सैकड़ों साल पुरानी दवा है जो आयुर्वेद में बुखार इंफेक्शन के लिए भारत सहित कई एशिया के कई देशों में इस्तेमाल की जाती थी
    यह नील के पौधों के रस से बनाई जाती थी.परन्तु इस खेती से जमीन बंजर हो जाती है इसलिए गांधी जी अंग्रेजो के समय नील।आंदोलन किया. तब अंग्रेजो ने इसका सिथेंटिक रूप एम बी बनाया.
    लम्पी वायरस पर एमबी अनुसंधान का विश्वव्यापी शोध
    विभिन्न शोध प्रकाशनों से यह पाया गया है उसका संक्षिप्त में शोध परिणाम
    एम बी पॉक्स वायरस पर काम करता है
    एम बी गायो मवेशियों और कुत्तों पर भी काम करता है
    एम बी गायो मवेशियों कुत्तों को जीवन भर दिया जा सकता है
    एम बी आय वी सीधे खून में नस द्वारा भी दिया जा सकता है
    8 से 15 मिलीग्राम प्रति किलो शरीर का वजन मवेशियों में एमबी की सुरक्षित मात्रा है
    गायो मवेशियों कुत्तों पर एम बी के इलाज का को विवरण गूगल पर मिला
    क्या एमबी पॉक्स वायरस पर काम कर सकता है?
    इस सवाल का जवाब सेंटर ऑफ डिजीज कंट्रोल अमेरिका की रिसर्च हेड सुश्री ललिता प्रियंवदा ने दिया है
    उनके शोध के अनुसार। प्रकाशित पत्रिका में उन्होंने कहा है कि एमबी पॉक्स वायरस पर काम करता है
    क्या गायों में एमबी का इलाज काम करता है ?
    इस प्रश्न का उत्तर आविष्कारक क्रिस्टोफर वुल्फ और नेगी हेबिक ने 2006 में दिया था
    2006 में अपनी कंपनी बायो एन वीजन एंकॉर्पोरीशन के माध्यम से इन दो आविष्कारकों ने अपने आविष्कार का पेटेंट कराया कि एमबी पॉक्स वायरस पर काम करता है
    तो ये दो अमेरिकी आविष्कारक 16 साल पहले जानते थे कि एमबी पॉक्स वायरस पर काम कर सकता है
    क्या एमबी जानवरों पर काम कर सकता है?
    47 सेकेंड में गूगल करने पर करीब 30 लाख 30 हजार रिसर्च रेफ पेपर्स और पब्लिकेशन दिखा रहे हैं जो कहते हैं कि एमबी गायो जानवरों कुत्तों में काम कर सकता है ?
    क्या जानवरों को गायों को IV MB लंबी अवधि दी जा सकती है?
    क्या एम बी गायो मवेशियों में यूरिया खाद के कारण हुई नाइट्रेट पॉयजन में काम करता है
    संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन FAO एफएओ जो संयुक्त राष्ट्र का एक हिस्सा है और पशुपालन पर WHO की तरह काम करता है
    1988 से प्रकाशित अपनी वेबसाइट पर बताया
    कि कुत्तों को उनकी आनुवंशिक Mythhemenoglobimia में MB की जीवन भर LIFELONG की IV खुराक दी जा सकती है
    जिसके बिना कुत्ते जीवित नहीं रह सकते.
    तो यह स्पष्ट करता है कि आवश्यकता पड़ने पर पशुओं या गायों में IV MB जीवनभर दिया जा सकता है
    क्या गायों में एमबी दी जा सकती है ?
    गूगल पर 1 लाख 59 हजार शोध प्रकाशन हैं कि गायों में नाइट्रेट विषाक्तता जो यूरिया खाद पत्तो घास के द्वारा गायो के पेट में जाने से हो सकता है में एमबी प्रभावी है
    एमबी के लिए सुझाई गई सुरक्षित खुराक 8 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम शरीर के वजन है
    क्या मवेशियों को एमबी दी जा सकती है ?
    अमेरिका में न्यू मैक्सिको स्टेट यूनिवर्सिटी कृषि विभाग अनुसंधान प्रकाशन का कहना है कि मवेशियों में नाइट्रेट विषाक्तता में
    2 से 4% एमबी 4 से 5 मिलीग्राम प्रति किलो मवेशियों के शरीर के वजन के हिसाब से दिया जा सकता है
    गायों मवेशियों में एम बी की सुरक्षित मात्रा
    सभी शोध कहते हैं कि 8 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम शरीर का वजन सुरक्षित है
    मवेशियों के लिए मर्क कंपनी का मानक औषध पशु चिकित्सा मैनुअल (एमएसडी)
    गायों और पशुधन की नाइट्रेट विषाक्तता
    एमबी नाइट्रेट विषाक्तता को कम करने वाला एजेंट है और मेथेमोग्लोबिन को हीमोग्लोबिन में बदल देता है जिससे गायो के शरीर में ऑक्सीजन की आपूर्ति बहाल हो जाती है
    धीमी गति से IV 1 to2% MB
    4 से 15 मिली प्रति किलो बॉडीवेट एमबी डोज की ऊपरी सुरक्षित सीमा है
    यह एक पुख्ता सबूत है कि एमबी बड़ी खुराक में गायों और मवेशियों को दिया जा सकता है
    एम बी जीवनभर देने के लिए सुरक्षित डोज है
    दुनिया भर में विभिन्न शोधों और प्रकाशनों के अनुसार
    15 एमएल प्रति किलो शरीर का वजन
    एक 300 से 500 किलो गाय में 24 घंटे में 4500 एमएल ऊपरी सुरक्षित सीमा है
    वजन के हिसाब से बछड़े को आधा या कम डोज दिया जा सकता है

  • जैविक खेती की ऊंचाईयां छू रहे मध्यप्रदेश के किसान

    जैविक खेती की ऊंचाईयां छू रहे मध्यप्रदेश के किसान

    अवनीश सोमकुंवर
    भोपाल,31 अगस्त (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।जैविक खेती से स्वस्थ भारत बनाने का मिशन लेकर चल रहे खंडवा जिले के 500 छोटे किसानों ने पूरे देश का ध्यान आकृष्ट किया है। ये किसान 918 हेक्टेयर में जैविक उत्पाद ले रहे हैं। इनके उत्पादों का “जैविक परिवार” ब्रांड हर घर पहुँच रहा है। सतपुड़ा जैविक प्रोडयूसर कंपनी से जुड़े किसान चाहते हैं कि देश के नागरिकों को शुद्ध अनाज, फल-सब्जी मिले। वे दवाओं से दूर रहे और हमारी धरती विषमुक्त रहे।

    कंपनी से जुड़े झिरन्या तहसील के बोदरानिया गाँव के दारा सिंह धार्वे मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की सोच से पूरी तरह सहमत हैं कि जैविक खेती धरती और मनुष्य को बचाने का सबसे ठोस उपाय है। दारा सिंह धार्वे को जैविक गेहूँ के अच्छे दाम मिल रहे हैं। इस साल 2500 रूपये प्रति क्विंटल तक मिल जायेंगे। वे कहते हैं – “जैविक खेती से अब ज्यादा से ज्यादा किसान जुड़ना चाहते हैं। रासायनिक खाद से खेती की लागत भी बढ़ जाती है और स्वास्थ्य को भी नुकसान होता है।

    कंपनी के सीईओ श्री विशाल शुक्ला बताते हैं कि कंपनी को बने तीसरा साल चल रहा है। इतने कम समय में कंपनी के जैविक उत्पादों ने मार्केट में अच्छी पहचान बना ली है। “जैविक परिवार” ब्रांड के कारण खेत और उपभोक्ता के बीज मजबूत संबंध बन गया है। वे बताते हैं कि अगले तीन सालों में 65 शहरों में सवा 3 लाख जैविक उत्पादों के उपभोक्ता जुड़ जायेंगे। जोमेटो, स्वीगी, निंबस, ई-कार्ट, मीशो, गाट इट जैसे डिलीवरी पार्टनर्स हमसे जुड़ गये हैं और इंदौर में काम भी शुरू कर दिया गया है। इस प्रकार आधुनिक मार्केटिंग और टेक्नालाजी की मदद से जैविक उत्पादों की पहुँच बढ़ाने की कोशिशें जारी है। “जैविक परिवार” को वितरक मिल रहे हैं। इसलिये ग्राहक सेवा विभाग हमने खोला है और उनके संपर्क में सेल्स टीम रहती है।

    श्री शुक्ला कहते हैं कि – “किसान उत्पाद संगठनों को एक साथ लाकर खेती के क्षेत्र में आर्थिक उद्यमिता की शुरूआत करने का जो सपना मुख्यमंत्री जी ने देखा है उसे साकार करने में हम हमेशा आगे रहेंगे।” वे कहते हैं – “कि मुख्यमंत्री की सोच प्रगतिशील है। वे दूरदृष्टा की तरह सोचते हैं।”

    सतपुड़ा जैविक प्रोड्यूसर कंपनी अस्तित्व में आने के संबंध में श्री शुक्ला बताते हैं कि- “शुरूआत गाँव-गाँव जाकर चौपाल बैठकें करने से हुई। छोटी-छोटी खेती करने वाले किसानों को एकजुट करना जरूरी था। एक साथ मिल कर खेती करने और मार्केटिंग करने के फायदों पर चर्चाओं के दौर शुरू हुए। शुरूआत दस किसानों से हुई। शुरूआत में गेहूँ, सोयाबीन और प्याज के लिए आपस में समूह बनाये। इन समूहों से मिलकर समितियाँ बनीं और इस तरह धीरे-धीरे किसान जुड़ते गये और यह सिलसिला जारी है। इसी बीच कोरोना काल आ गया लेकिन किसानों को परेशानी नहीं हुई। गेहूँ की खरीदी जारी रही। उनका जैविक उत्पाद सब्जी सीधे ग्राहकों के घर पहुँचने लगा।

    कंपनी से जुड़ने का कारण बताते हुए सिंगोट गांव के किसान श्री राजेश टिरोले कहते हैं कि – “एक साथ मिलकर एक ब्रांड के नाम से उत्पाद मार्केट में आने से दाम बढ़ते हैं और सभी किसानों को फायदा होता है।” श्री राजेश दो हेक्टेयर के छोटे किसान हैं। वे गेहूँ और सब्जियाँ लगाते हैं। शुद्ध रूप से जैविक खाद का उपयोग करते हैं। वे बताते हैं कि – “कंपनी में जुड़ने से जैविक सब्जियों के अच्छे दाम मिलने लगे हैं। पहले बहुत कम दाम में सब्जियाँ बिकती थी। अब जैविक परिवार ब्रांड के माध्यम से अच्छे दाम घर बैठे मिल रहे हैं। कंपनी के कारण हमारा सीधे ग्राहक से वास्ता पड़ा है। हमें अपना रेट तय करने की छूट है। कंपनी के जरिए पूरा माल बिक जाता है और हमें अपनी मेहनत का दाम मिल जाता है।”

    पुनासा तहसील के राजपुरागांव में श्री मनोज पांडे तीन एकड़ में जैविक पद्धति से गेहूँ और सब्जियाँ उगा रहे हैं। वे बताते हैं कि – “जैविक उत्पादों का बाजार अब बढ़ रहा है। हमारा जैविक गेहूँ भी अच्छे दाम पर बिक रहा है। जैविक सब्जियाँ भी पसंद की जा रही हैं। अकेले खेती करने में और कंपनी के साथ मिलकर खेती करने में मुनाफा होने के साथ ही मार्केट तक भी सीधी पहुँच बढ़ गई है। उनके अनुसार यह कंपनी एक ऐसा प्लेटफार्म है जो एक मिशन के साथ जैविक उत्पादों को आगे बढ़ा रहा है। उपभोक्ताओं और उत्पादक किसानों के बीच सेतु का काम कर रहा है। उपभोक्ताओं को शुद्ध जैविक अनाज और सब्जियाँ मिलते हैं और हमें अपनी कीमत। श्री पांडे कहते हैं कि जहर मुक्त खेती और दवा मुक्त दिनचर्या ही हमारा मिशन है। रसायन मिले खाने से न तो शरीर स्वस्थ होगा और न ही मन को खुशी मिलेगी।”

    जैविक परिवार ब्रांड की चुनौतियों के बारे में चिंता जाहिर करते हुए श्री पांडे कहते हैं कि – “जानकारी और ज्ञान के अभाव में असली-नकली की पहचान नहीं हो पाती। इसलिए नकली माल बिक जाता है और असली की पहचान नहीं हो पाती। इसका समाधन बताते हुए वे कहते हैं कि जैविक उत्पादों के प्रति जागरूकता बढ़ाना ही एक मात्र उपाय है।”

    श्री शुक्ला बताते हैं कि – “कंपनी ने अपनी गुणवत्ता के मानदण्ड बनाये हैं। हम गुणवत्ता की नीति पर काम करते हैं। कृषि विशेषज्ञों को इसमें शामिल किया है। राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम में तय किये गये गुणवत्ता मानदंडों का पूरा ख्याल रखा जाता है।”

    “जैविक परिवार” अपने से जुड़े किसान सदस्यों का पूरा ध्यान रखता है। उन्हें उम्दा किस्म के बीज देता है। जैविक कीट नियंत्रण से लेकर कोल्ड स्टोरेज की सुविधा भी दी जाती है। खेत से बाजार और ग्राहकों तक उत्पाद पहुँचाने की सुविधा भी उपलब्ध है। कंपनी को खेती के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने और छोटे किसानों की जिंदगी में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिये नाबार्ड ने सम्मानित भी किया है।

  • खेती का नया सहकारी मॉडल लागू होगाःअमित शाह

    खेती का नया सहकारी मॉडल लागू होगाःअमित शाह

    भोपाल,22 अगस्त(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा है कि भारत में शीघ्र ही कॉरपोरेट खेती के स्थान पर कोऑपरेटिव खेती होगी। केन्द्र सरकार शीघ्र ही नई सहकारिता नीति ला रही है। देश में सहकारिता विश्वविद्यालय खोला जायेगा। पैक्स (प्राथमिक कृषि सहकारी समिति) को बहुउद्देशीय बनाया जायेगा। मार्केटिंग के क्षेत्र में भारत सरकार आगामी एक माह में एक्सपोर्ट हाउस बनाने जा रही है। अमूल कुछ ही समय में देश में मिट्टी का परीक्षण एवं किसानों के उत्पाद का परीक्षण कर उन्हें जैविक प्रमाण-पत्र ‘अमूल’ के नाम से देगा। इससे किसानों को अपनी फसलों का अधिक मूल्य मिलेगा और प्राकृतिक एवं जैविक खेती को प्रोत्साहन मिलेगा।
    केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह आज भोपाल के होटल ताज में नाफेड द्वारा आयोजित “कृषि विपणन में सहकारी संस्थाओं की भूमिका” विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन में शामिल हुए। उन्होंने “एक जिला-एक उत्पाद योजना” में मध्यप्रदेश के 11 जिलों के 11 उत्पादों के साथ देश के 6 अन्य राज्यों के उत्पादों का भी प्रमोशन किया। श्री शाह ने “सहकार से समृद्धि-51 कहानियाँ” पुस्तक एवं “सहकारी पुस्तक परिपत्र भाग-1 एवं 2” का विमोचन भी किया।
    केन्द्रीय मंत्री श्री शाह ने कहा कि प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों को बहुउद्देशीय बनाने के उद्देश्य से एक माह में मॉडल एक्ट लेकर आयेंगे, जो इन्हें मजबूत एवं बहुआयामी बनायेगा। हर पैक्स को एफपीओ बनने की योग्यता प्राप्त हो जायेगी। वे मार्केटिंग के साथ ही भण्डारण, परिवहन सहित 22 प्रकार की गतिविधियाँ कर सकेंगी। पैक्स से अपेक्स तक मजबूत मार्केटिंग व्यवस्था होगी।
    केन्द्रीय मंत्री श्री शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत में किसानों की आय को दोगुना करने के सराहनीय प्रयास हुए हैं। भारत दलहन एवं तिलहन को छोड़ कर अन्य उत्पादों में आत्म-निर्भर हो चुका है। किसानों को अच्छा एमएसपी मूल्य दिलवाया जा रहा है। ई-नाम पोर्टल से 2 करोड़ रूपये से अधिक का व्यापार हो चुका है। हमारा कृषि निर्यात 50 विलियन डालर को पार कर चुका है। अब सहकारी संस्थाएँ जेम पोर्टल से न केवल खरीदी कर सकेंगी, बल्कि उत्पादों को बेच भी सकेंगी।
    केन्द्रीय मंत्री श्री शाह ने कहा कि नाफेड किसान और सरकार के बीच में मजबूत कड़ी है, जो सरकारी योजनाओं को जमीन पर उतारने का सशक्त माध्यम है। यह विपणन का शीर्ष संगठन है। नाफेड अपने कार्य को विस्तृत करे। ऐसी व्यवस्था हो कि निजी कम्पनियाँ भी नाफेड से उत्पाद खरीदें। मार्केटिंग की व्यवस्था से नाफेड आत्म-निर्भर बने।
    मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि “सबको साख-सबका विकास” मध्यप्रदेश में सहकारिता का मूल मंत्र है। इस दिशा में सरकार तेजी से काम कर रही है। सहकारिता भारत की मिट्टी एवं जड़ों में है। सर्वे भवन्तु सुखिन:, वसुधैव कुटुम्बकम यह सभी हमारे मंत्र है, जो सहकार की भावना को व्यक्त करते हैं। भारत सहकारिता के इतिहास में 6 जुलाई का दिन स्वर्ण अक्षर में लिखा जायेगा। इस दिन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने भारत में पृथक सहकारिता मंत्रालय बनाया और श्री अमित शाह को इसकी बागडोर सौंपी। श्री अमित शाह ने सहकारिता को भारत में नई दिशा एवं गति दी है। उनके शब्दा कोष में असंभव शब्द नहीं है।
    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा है कि मध्यप्रदेश में सहकारिता का इतिहास 118 वर्ष पुराना है। वर्ष 2012-13 से किसानों को शून्य प्रतिशत ब्याज पर ऋण दिया जा रहा है। श्री अमित शाह ने फैसला किया है कि शीघ्र ही 3 लाख रूपये तक अल्पावधि फसल ऋण पर डेढ़ प्रतिशत अधिक ब्याज अनुदान दिया जाएगा। इसके लिए हम उनके आभारी हैं। सरकार नई सहकारिता नीति बनाने जा रही है। प्रदेश में सहकारिता को स्व-रोजगार दिलाने का साधन बनाया जा रहा है। परम्परागत कारीगरों को सहकारी समिति के रूप में संगठित कर उनका कौशल संवर्धन किया जा रहा है। सहकारिता कानूनों में बदलाव एवं सरलीकरण किया जा रहा है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के भारत को 5 ट्रिलियन डालर की अर्थ-व्यवस्था बनाने के संकल्प को पूरा करने में सहकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका है।
    केंद्रीय कृषि और किसान-कल्याण मंत्री श्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि भारत के संस्कार में सहकार शामिल है। जितना सहकार बढ़ेगा उतनी ही देश प्रगति करेगा औरदेश की ताकत बढ़ेगी। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने भारत में सहकारिता को नए आयाम दिए हैं। उन्होंने भारत में पृथक सहकारिता मंत्रालय का गठन किया औरनाफेड को कर्ज से बाहर निकाला। इफको एवं अमूल दुनिया के सबसे बड़े सहकारिता संगठन है। सहकारिता से जुड़ कर हम स्वयं एवं भारत को आत्म-निर्भर बनाये।
    केन्द्रीय सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय कृषि और किसान-कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने दीप जला कर सम्मेलन का शुभारंभ किया। नाफेड के अध्यक्ष बिजेंद्र सिंह ने स्वागत भाषण दिया। केंद्रीय सहकारिता राज्य मंत्री बी.एल. वर्मा, म.प्र. केकृषि मंत्री कमल पटेल, सहकारिता मंत्री अरविंद सिंह भदौरिया, इफको के अध्यक्ष दिलीप सिंघानी, अध्यक्ष कृभको डॉ. चंद्रपाल सिंह सहित जन-प्रतिनिधि और बड़ी संख्या में सहकारिता से जुड़े प्रतिनिधि मौजूद रहे।

  • बांस चारकोल के निर्यात पर से रोक हटी

    बांस चारकोल के निर्यात पर से रोक हटी

    भोपाल, 22 मई(ऋषभ जैन)। राष्ट्रीय बांस मिशन की ओर से किसानों की आमदनी दोगुनी कराने के उद्देश्य से देश में बांस की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। प्रदेश के किसानों के लिए 19 मई 2022 का दिन सौगात से परिपूर्ण साबित हुआ है। इस दिन देश में पहली बार बम्बू चारकोल के निर्यात पर प्रतिबंध हटा दिया गया है।

    उल्लेखनीय है कि वन विभाग के प्रमुख श्री अशोक वर्णवाल, वन दल प्रमुख श्री आर.के. गुप्ता और बांस मिशन के डायरेक्टर डॉ. उत्तम कुमार सुबुद्धि ने राष्ट्र हित में बांस चारकोल के निर्यात से प्रतिबंध हटाने के लिए ठोस तर्क प्रस्तुत किये थे।

    बांस आधारित उद्योगों और दूरस्त ग्रामीण क्षेत्रों में हितग्राहियों को आर्थिक रूप से समृद्ध होने के लिए यह महत्वपूर्ण निर्णय वरदान साबित होगा। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बांस के चारकोल की अधिक माँग है। निर्यात प्रतिबंध हटने से बांस उद्योग अधिक लाभ उठाने में सक्षम होगा। बांस के कचरे का अधिकतम उपयोग भी हो सकेगा।

    बांस चारकोल का उपयोग बार्बेक्यू, मिट्टी के पोषण और उच्च स्तर के चारकोल निर्माण में कच्चे माल के रूप में किया जाता है। अमेरिका, जापान, कोरिया, बेल्जियम, जर्मनी, इटली, फ्रांस और यू.के. के अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी अधिक माँग है।

    वर्तमान में बांस उद्योग बांस के उपयोग और अत्यधिक उच्च लागत से जूझ रहा है। बांस का अधिक उपयोग अगरबत्ती निर्माण में होता है। करीब 16 प्रतिशत बांस का उपयोग अगरबत्ती की लकड़ी बनाने में होता है। अगरबत्ती उद्योग से देश के बड़े हिस्से में लोगों को रोजगार मिलता है। रोजगार के अधिक अवसर उपलब्ध कराने की मंशा से ‘कच्ची अगरबत्ती’ पर आयात नीति में बदलाव और गोल बांस की छड़ियों पर आयात शुल्क बढ़ाने की माँग की जाती रही है। बांस की छड़ियाँ वियतनाम और चीन से आयात की जाती हैं। अधिक माँग को देखने के बाद वाणिज्य मंत्रालय ने सितम्बर 2019 में कच्ची अगरबत्ती के आयात पर रोक लगा दी और जून 2020 में गोल बांस की छड़ियों पर आयात शुल्क बढ़ा दिया.

    बांस के उत्पाद में मध्यप्रदेश समृद्ध की श्रेणी में है। यहाँ 18 हजार 394 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बांस उत्पादन होता है, जो देश में सर्वाधिक है। राज्य बांस मिशन, राष्ट्रीय बांस मिशन की योजनाओं का प्रदेश में क्रियान्वयन करता है। मिशन द्वारा अभी तक 15 हजार हेक्टेयर कृषि-भूमि में बांस पौध-रोपण कराया गया है।

  • कृषि को लाभदायी बनाने का मॉडल बना मध्यप्रदेश

    कृषि को लाभदायी बनाने का मॉडल बना मध्यप्रदेश

    सुरेश गुप्ता
    किसानों की अथक मेहनत से आज प्रदेश कृषि विकास के क्षेत्र में सर्वोपरि है। प्रदेश को कृषि उत्पादन तथा योजना संचालन क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन के लिए सात कृषि कर्मण अवार्ड प्राप्त हुए हैं। प्रदेश आज दलहन-तिलहन के क्षेत्र और उत्पादन में देश में प्रथम है। सोयाबीन, उड़द के क्षेत्र एवं उत्पादन में प्रदेश, देश में प्रथम है। गेहूँ, मसूर, मक्का एवं तिल फसल के क्षेत्र एवं उत्पादन में देश में दूसरे स्थान पर है। सम्पूर्ण खाद्यान्न फसलों के उत्पादन में प्रदेश का देश में तीसरा स्थान है।
    मध्यप्रदेश ने देश में सबसे पहले कृषि को लाभदायी बनाने की दिशा में कदम बढ़ाये थे। मुख्यत: पाँच आधार बिन्दु क्रमश: कृषि लागत में कमी, उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि, कृषि विविधीकरण, उत्पाद का बेहतर मूल्य और कृषि क्षेत्र में आपदा प्रबंधन पर संकल्पित होकर कार्य किया गया। वर्ष 2004-05 में प्रदेश का कुल कृषि उत्पादन मात्र 2 करोड़ 38 लाख मी.टन था जो वर्ष 2020-2021 में बढ़कर 6 करोड़ 69 मी. टन हो गया है।
    प्रदेश में जैविक खेती का कुल क्षेत्र लगभग 16 लाख 37 हजार हेक्टेयर है जो देश में सर्वाधिक है। जैविक उत्पाद का उत्पादन 14 लाख 2 हजार मी.टन रहा, जो क्षेत्रफल की भाँति ही देश में सर्वाधिक है। जैविक खेती को प्रोत्साहन स्वरूप प्रदेश में कुल 17 लाख 31 हजार क्षेत्र हेक्टेयर जैविक प्रमाणिक है, जिसमें से 16 लाख 38 हजार एपीडा से और 93 हजार हेक्टेयर क्षेत्र, पी.जी.एस. से पंजीकृत है।
    प्रदेश ने पिछले वित्त वर्ष में 2683 करोड़ रूपये के मूल्य के 5 लाख मी.टन से अधिक के जैविक उत्पाद निर्यात किये हैं। प्रदेश में जैविक वनोपज भी ली जा रही है। इस वर्ष प्रदेश में 99 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में प्राकृतिक खेती का लक्ष्य है। प्रदेश के कृषि विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में जैविक/ प्राकृतिक खेती को शामिल करने की योजना है। दोनों कृषि विश्वविद्यालय में कम से कम 25 हेक्टेयर भूमि को प्राकृतिक खेती प्रदर्शन श्रेत्र में बदला जायेगा।
    वर्ष 2016 से प्रारम्भ प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के लिए प्रदेश के वार्षिक बजट में 2200 करोड़ रूपये की राशि का प्रावधान है। प्रदेश में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में कुल वर्षवार 4 करोड़ 43 लाख 61 हजार 570 किसान खरीफ 2016 से रबी 2021-22 तक (पाँच वर्षों में) पंजीकृत हुए। वर्तमान समय तक 73 लाख 69 हजार 614 किसानों को रबी 2019-20 तक की राशि 16 हजार 750 करोड़ 87 लाख रूपये का दावा राशि का वितरण किया गया है। यह प्रीमियम से दावा राशि का 93.41 प्रतिशत है।
    फसल बीमा का एंड-टू-एंड कम्‍प्‍युटराईजेशन प्रक्रियाधीन है। बीमा इकाई निर्धारण की प्रक्रिया भू-अभिलेख के साथ एकीकृत कर पूर्णत: ऑनलाईन है। औसत उपज उत्पादन के आकलन में रिमोर्ट सेंसिंग तकनीक के उपयोग की परियोजना प्रारंभ की गई है। पंजीयन की प्रक्रिया को आधार कार्ड से लिंक किया है, जिससे एक रकबे का एक ही बार बीमा हो सकेगा और दोहरीकरण की स्थिति निर्मित नहीं होगी।
    प्रदेश देश में बीज प्रमाणीकरण में अग्रणी है। बीज की गुणवत्ता के लिये क्यू.आर. कोड के प्रयोग का नवाचार किया गया है। किसानों की भागीदारी से संकर बीजों का उत्पादन कर प्रदेश को हाइब्रीड बीज उत्पादन का हब बनाया जा रहा है। प्रत्येक संभाग में एक के मान से दस उर्वरक और बीज परीक्षण प्रयोगशाला स्थापित की जा रही है। उन्नत बीजों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए रोलिंग प्लान को अद्यतन किया गया है। तीन हजार नये बीज ग्राम विकसित किये जा रहे हैं।
    जिला स्तर पर 50 मृदा परीक्षण प्रयोगशाला स्थापित की गई हैं और विकासखण्ड स्तर पर 265 मृदा स्वास्थ्य परीक्षण प्रयोगशालाएँ स्थापित की जा रही हैं। प्रदेश के 90 लाख किसानों को नि:शुल्क स्वाईल हेल्थ कार्ड वितरित किये जा चुके हैं।
    कृषि अधोसंरचना में सुधार के क्रम को प्रोत्साहन और वित्तीय सहायता देने की भारत सरकार की कृषि अवसंरचना निधि के उपयोग में प्रदेश, देश में अग्रणी है। इस निधि के अंतर्गत बैंकों द्वारा 1558 करोड़ रूपये से अधिक की राशि के 2129 आवेदन सत्यापित कर 1107 करोड़ रूपये के ऋण वितरित कर दिये गये हैं।
    पिछले डेढ़ दशक में सिंचाई का बजट 1005 करोड़ से बढ़ाकर 10 हजार 928 करोड़ रूपये किया गया है। यही वजह है कि 7.5 लाख हेक्टेयर की सिंचाई क्षमता 6 गुना बढ़कर आज की स्थिति में 43 लाख हेक्टेयर है। इस क्षमता को अगले तीन वर्ष में 65 लाख हेक्टेयर तक करने का लक्ष्य है। अकेले पिछले 2 वर्ष में 2 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई क्षमता निर्मित की जा चुकी है। वर्तमान में 60 हजार करोड़ से अधिक की लागत की 361 सिंचाई योजनाएँ निर्माणाधीन हैं। आने वाले तीन साल में 30 हजार करोड़ की परियोजनाओं को स्वीकृति दी जायेगी। जिन क्षेत्रों में पारम्परिक माध्यमों से सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराना संभव नहीं है, वहाँ भी पर ड्राप मोर क्राप कार्यक्रम सिंचाई सुविधा उपलब्ध करायी जा रही है।
    ़ राज्य सरकार प्रदेश को आवंटित 18.25 एमए एफ नर्मदा जल का वर्ष 2024 तक उपयोग सुनिश्चित करने की दिशा में तेजी से काम कर रही है। वर्तमान में साढ़े 12 लाख हेक्टेयर में सिंचाई सुविधा के‍लिए 35 हजार करोड़ रूपये की परियोजनाओं का निर्माण प्रगति पर है।
    राज्य सरकार के प्रयासों से प्रदेश बिजली के क्षेत्र में आत्म-निर्भर है। प्रदेश की उपलब्ध क्षमता बढ़कर 21 हजार 451 मेगावॉट हो गयी है। कृषि उपभोक्ताओं को प्रतिदिन 10 घंटे बिजली दी जा रही है।
    अनुसूचित जाति एवं जनजाति के एक हेक्टेयर तक भूमि वाले 5 हार्सपावर तक के स्थायी कृषि पंप उपभोक्ताओं को मुफ्त बिजली दी जा रही है। योजना में 9 लाख 41 हजार कृषक लाभान्वित हो रहे हैं। इस वित्त वर्ष में इन्हें कृषि कार्यों के लिए 5 हजार करोड़ रूपये की नि:शुल्क बिजली उपलब्ध करायी गई।
    अटल किसान ज्योति योजना में 10 हार्सपावर तक के अनमीटर्ड स्थायी कषि पंप कनेक्शनों को 750 रूपये और 10 हार्सपावर से अधिक के अनमीटर्ड स्थायी पंप कनेक्शनों को 1500 रूपये प्रति हार्सपावर प्रतिवर्ष के फ्लेट दर से बिजली प्रदाय की जा रही है। साथ ही 10 एच.पी. के मीटर युक्त स्थायी, अस्थायी पंप कनेक्शनों को भी ऊर्जा प्रभार में रियायत दी गई है। योजना से लगभग 26 लाख कृषि उपभोक्ता लाभान्वित हो रहे हैं। योजना के लिए इस वित्त वर्ष में 11 हजार 300 करोड़ रूपये की सब्सिडी का प्रावधान है।
    किसानों के स्वावलंबन, आय और आत्म-निर्भरता बढ़ाने के लिए कुसुम योजना का लाभ भी किसानों को सुलभ कराया जा रहा है। योजना में प्रदेश को आवंटित 300 मेगावाट लक्ष्य के विरूद्ध 296 मेगावाट क्षमता के लिए 139 किसानों का चयन किया जा चुका है। कुसुम ‘घ’ में 1500 मेगावाट की परियोजना के लिए निविदा की कार्यवाही की जा रही है। योजना में किसान अपनी कम उपजाऊ या बंजर जमीन पर सोलर संयंत्र की स्थापना कर शासन अपने घर, सिंचाई के उपयोग के बाद बची बिजली शासन को बेच सकते हैं। मुख्यमंत्री सोलर पंप योजना में लगभग 25 हजार किसानों ने पंजीयन करवाया है। कुसुम ‘सी’ योजना में ग्रिड कनेक्टेड पंपों को सौर ऊर्जा से उर्जीकृत किया गया है।
    प्रदेश में किसानों को शून्य प्रतिशत ब्याज पर फसल ऋण दिया जा रहा है। वर्ष 2003-04 में कृषकों को खेती के लिए मात्र 1273 करोड़ का फसल ऋण मिला था। इस वर्ष किसानों को रुपये 14 हजार 428 करोड़ के ऋण उपलब्ध कराये जा चुके है। विगत दो वर्ष में किसानों को 26 हजार करोड़ के ऋण शून्य प्रतिशत ब्याज दर पर दिये गये हैं।
    समर्थन मूल्य पर इस साल 16 लाख 16 हजार 671 किसानों से 128 लाख 15 हजार 970 मी.टन गेहूँ और 6 लाख 61 हजार 619 धान उत्पादक किसानों से 45 लाख 85 हजार 512 मीट्रिक टन धान का उपार्जन किया गया है। इसके अलावा प्रदेश में ज्वार, बाजरा, चना, सरसों, मसूर, मूंग एवं उड़द का उपार्जन भी किया जा रहा है। वर्ष 2020 में लगभग 15 लाख 81 हजार किसानों से 1 करोड़ 29 लाख 42 हजार 131 मी.टन गेहूँ का उपार्जन कर पंजाब को पीछे छोड़ते हुए मध्यप्रदेश देश का नंबर वन राज्य बना था।
    अपेक्स एवं जिला सहकारी केन्द्रीय बैंकों की शाखाओं में कोर-बैंकिंग सेवाएँ प्रारंभ करने के साथ एनईएफटी, एसएमएस एवं डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर की सुविधा उपलब्ध कराई जा चुकी है। एटीएम की सुविधा भी है। प्राथमिकी कृषि सहकारी साख समितियों के सदस्य कृषकों को भी बैंकिंग से जोड़ा जा रहा है।
    अब तक प्रदेश में निजी क्षेत्र में लगभग 3150 कस्टम हायरिंग सेंटर की स्थापना की गई है। इससे किसानों को सस्ती दर पर आधुनिकतम कृषि यंत्र किराए पर सुलभ हो रहे हैं।
    प्रदेश में उद्यानिकी के विकास की विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन के फलस्वरूप क्षेत्र विस्तार, उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि हुई है। उद्यानिकी फसल क्षेत्रफल वर्ष 2005 के 4 लाख 69 हजार से बढ़कर वर्ष 2020-21 में 23 लाख 43 हजार हेक्टेयर और उद्यानिकी फसलों का उत्पादन वर्ष 2005 के 42 लाख 9 हजार मी. टन से बढ़कर वर्ष 2020-21 में 340 लाख 31 हजार मी. टन तक पहुँच गया है। उद्यानिकी फसलों का क्लस्टर में विस्तार कराया जा रहा है। उत्पादन एवं उत्पादकता की वृद्धि को बनाये रखने के लिये उत्पादकों को गुणवत्ता युक्त पौध रोपण सामग्री प्राप्त होने पर विशेष ध्यान दिया जाकर उद्यानिकी नर्सरियों का उन्नयन किया जा रहा है। फसलोत्तर प्रबंधन के दिशा में विशेष प्रयास से आज प्रदेश में नश्वर उत्पादों के भण्डारण के लिये 8 लाख 81 हजार मी. टन शीत भण्डारण एवं 3 लाख 79 हजार मी. टन से ज्यादा प्याज भण्डारण क्षमता उपलब्ध है। वर्ष 2007-08 में प्याज भंडारण क्षमता मात्र 8530 मी. टन थी। उद्यानिकी में यंत्रीकरण को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।
    कृषि एवं उद्यानिकी फसलों पर आधारित लघु एवं मध्यम प्र-संस्करण उद्योगों को बढ़ावा दिया जा रहा है। प्रदेश में तेजी से विकसित हो रहे खाद्य प्र-संस्करण उद्योग से नवीन रोजगार के अवसर भी सृजित हो रहे हैं।
    प्रदेश का दुग्ध उत्पादन पिछले वर्ष 7.52 प्रतिशत वृद्धि के साथ बढ़कर 17.1 मिलियन टन हो गया है। राष्ट्रीय स्तर पर यह वृद्धि लगभग साढ़े पाँच प्रतिशत है। प्रदेश दुग्ध उत्पादन और पशुधन में 4 करोड़ 6 लाख 37 हजार 375 की संख्या के साथ आज देश में तीसरे स्थान पर है। पशुओं की स्वास्थ्य रक्षा के लिये व्यापक तौर पर नि:शुल्क पशु टीकाकरण किया जा रहा है। बकरी दूध विक्रय की भी शुरूआत की गई है। पशुपालन के क्षेत्र में आत्म-निर्भर बनाने के लिये 7 हजार युवाओं को जागरूक किया गया। 25 हजार 124 पशुपालकों को क्रेडिट कार्ड उपलब्ध कराये गये हैं। राष्ट्रीय पशुधन मिशन में प्रदेश में सर्वाधिक 530 आवेदन स्वीकृति के लिये बैंकों को भेजे गये हैं, जो देश में सर्वाधिक है।
    प्रदेश के सिंचाई जलाशयों एवं ग्रामीण तालाबों के कुल उपलब्ध जल-क्षेत्र के 99 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र में मछली पालन हो रहा है। किसानों की तरह मछुआरों को भी शून्य प्रतिशत ब्याज पर ऋण सुविधा उपलब्ध कराने फिशरमेन क्रेडिट कार्ड बनाये जा रहे हैं। अभी तक कुल 16 हजार 320 मछुआ क्रेडिट कार्ड बनाये जा चुके हैं। मत्स्योपादन में वृद्धि के लिये पंगेशियस एवं गिफ्ट तिलापिया जैसी आधुनिक पद्धति का उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है।

  • ब्लाक लेवल पर दोगुनी करेंगे किसानों की आयःकमल पटेल

    ब्लाक लेवल पर दोगुनी करेंगे किसानों की आयःकमल पटेल

    भोपाल,02 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। कृषि मंत्री कमल पटेल ने कहा है कि किसानों की आय दोगुनी करने के लिए हर ब्लाक में दो फूड प्रोड्यूसर आर्गेनाईजेशन(एपपीओ) बनाए जा रहे हैं। इनके माध्यम से किसानों को उनकी उपज का अधिकतम मूल्य दिलाया जाएगा। उन्होंने कहा कि जो लोग आंदोलन के माध्यम से किसानों को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं उनकी सदबुद्धि के लिए वे चार फरवरी को उपवास पर बैठेंगे।

    राजधानी में सेन्ट्रल प्रेस क्लब की ओर से आयोजित प्रेस वार्ता में श्री पटेल ने मध्यप्रदेश में किसानों के लिए चलाई जा रहीं विभिन्न योजनाओं की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि गांव की संपत्तियों को नक्शे पर लाकर भाजपा ने किसानों को लाचारी से बाहर निकालने में मदद की है। आज गांव की संपत्तियों पर लोन भी मिल सकता है और जमानत भी।

    उन्होंने कहा कि किसान अब और गुमराह न हों तथा इस बात को समझें कि प्रधानमंत्री द्वारा लाए गए तीनों किसान कानून देश के करोड़ों किसानों को मजबूत बनाएगा और किसान परिवारों का भविष्य इन तीनों कानून से संवेरगा। उन्होंने कहा कि यह कृषि कानून किसानों के हित में हैं, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़ी सूझ-बूझ के साथ लाया है। कुछ बिचौलिये जरूर इसे गलत रूप देने में लगे हुए हैं। कृषि मंत्री कमल पटेल ने कहा कि कोरोना काल में यही किसान, मजदूर खेत में काम करके पूरी दुनिया के लिए अनाज पैदा करा रहे थे। देश के 130 करोड़ लोगों को दोनों टाइम का भोजन मिला, अगर किसान भी तय कर लेता कि लॉक डाउन में हमें घर से नहीं निकलना है तो कल्पना कीजिए फिर क्या होता। इसलिए किसान अन्नदाता के साथ-साथ जीवनदाता है। उन्होंने कहा कि लेकिन गांधी जी के नाम पर जिन लोगों ने देश पर 60 सालों तक राज किया, लेकिन उन्होंने किसानों के लिए कुछ नहीं किया। देश के पहले प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे, जिन्होंने गांधी जी के सपने को पूरा करने के लिए गांव की और ध्यान दिया।

    कृषि मंत्री ने पत्रकारों के सवालों के जवाब में कहा कि मध्यप्रदेश सरकार की आर्थिक स्थिति मजबूत होने पर किसानों के कर्ज माफी पर विचार करेंगे। अभी तो किसान को कैसे व्यवसायिक रूप से मजबूत और सक्षम बनाने के लिए काम किये जा रहे है। किसानों से गेहूं के आलावा चना, मसूर, सरसों, उड़द की खरीदी भी फरवरी माह से शुरू कर दी है। कुल मिलाकर अब किसान को अपनी फसल का उचित दाम दिलाने के लिए राज्य सरकार कटिबद्ध है।

    कृषि मंत्री कमल पटेल ने कहा कि किसानों से जुड़े हुए कई पायलेट प्रोजेक्ट पर हरदा जिले में काम हो रहा है, जिसे आने वाले समय में पूरे प्रदेश में लागू किया जाएगा। उन्होंने 15 महीनों वाली कमलनाथ सरकार पर कटाक्ष करते हुए कहा कि किसानों के साथ सबसे बड़ा छलावा तो कर्जमाफी के नाम पर किया गया है। लेकिन शिवराज सरकार किसानों के साथ उनकी हर एक परेशानी में साथ है और उन्हें संबल देने का काम निरंतर कर रही है।

  • किसान को मुनाफा खोरों से आजाद करने की पहल

    किसान को मुनाफा खोरों से आजाद करने की पहल


    संकलन और संशोधन – गिरधारी भार्गव

    कभी सोचा है-??- किसानों का “धन्धा” क्यों बांधा गया था…
    सही क्या और गलत क्या -??-
    क्या किसानों का “तीन अध्यादेश” के विरुद्ध आंदोलन उचित – है भी या नहीं ?
    सन् 1960-70 के आसपास देश में कांग्रेसी सरकार ने एक कानून पास किया जिसका नाम था – “Apmc act” …
    इस एक्ट में यह प्रावधान किया गया कि किसान अपनी उपज केवल सरकार द्वारा तय स्थान अर्थात सरकारी मंडी में ही बेच सकता है।
    इस मंडी के बाहर किसान अपनी उपज नहीं बेच सकता। और इस मंडी में कृषि उपज की खरीद भी वो ही व्यक्ति कर सकता था जो Apmc act में registered हो, दूसरा नहीं।
    इन registered person को देशी भाषा में कहते हैं – “आढ़तिया” यानि “commission agent”…
    इस सारी व्यवस्था के पीछे कुतर्क यह दिया गया कि व्यापारी किसानों को लूटता है इस लिये सारी कृषि उपज की खरीद बिक्री -“सरकारी ईमानदार अफसरों” के सामने हो।
    जिससे “सरकारी ईमानदार अफसरों” को भी कुछ “हिस्सा पानी” मिलें।


    इस एक्ट आने के बाद किसानों का शोषण कई गुना बढ़ गया। इस एक्ट के कारण हुआ क्या कृषि उपज की खरीदारी करनें वालों की गिनती बहुत सीमित हो गई।
    किसान की उपज के मात्र 10 – 20 या 50 लोग ही ग्राहक होते है। ये ही चन्द लोग मिल कर किसान की उपज के भाव तय करते हैं।
    मजे कि बात ये है कि :— फिर रोते भी किसान ही है कि :—
    इस महगाई के दौर में – किसान को अपनी उपज की सही कीमत नही मिल है।
    जब खरीददार ही – “संगठित और सीमित संख्या में” – होंगे तो – सही कीमत कैसे मिलेगी – ??-
    यह मार्केट का नियम है कि अगर अपने producer का शोषण रोकना है तो आपको ऐसी व्यवस्था करनी पड़ेगी जिसमें – “खरीददार” buyer की गिनती unlimited हो।
    जब खरीददार ज्यादा होंगे तभी तो – किसी भी माल की कीमत बढ़ेगी।
    लेकिन वर्तमान में चल रही मण्डी व्यवस्था में तो – किसान की उपज के मात्र 10-20 या 50 लोग ही ग्राहक होते हैं।
    Apmc act से हुआ क्या कि अगर किसी retailer ने, किसी उपभोक्ता ने,
    किसी छोटे या बड़े manufacturer ने, या किसी बाहर के trader ने किसी मंडी से सामान खरीदना होता है तो वह किसान से सीधा नहीं खरीद सकता उसे आढ़तियों से ही समान खरीदना पड़ता है।
    इसमें आढ़तियों की होगी चाँदी ही चाँदी और किसान और उपभोक्ता दोनों रगड़ा गया।
    जब मंडी में किसान अपनी वर्ष भर की मेहनत को मंडी में लाता है तो buyer यानि आढ़तिये आपस में मिल जाते हैं और बहुत ही कम कीमत पर किसान की फसल खरीद लेते हैं।
    याद रहे :- बाद में यही फसल ऊँचे दाम पर उपभोक्ता को उपलब्ध होती थी।
    यह सारा गोरख धंधा ईमानदार अफसरों की नाक के नीचे होता है।
    एक टुकड़ा मंडी बोर्ड के अफसरों को डाल दिया जाता है।
    मंडी बोर्ड का “चेयरमैन” को लोकल MLA मोटी रिश्वत देकर नियुक्ति होता है। एक हड्डी राजनेताओं के हिस्से भी आती है। यह सारी लूट खसोट Apmc act की आड़ में हो रही है।
    दूसरा सरकार ने Apmc act की आड़ में कई तरह के टैक्स और commission किसान पर थोप दिए।
    जैसे कि :- किसान को भी अपनी फसल “कृषि उपज मंडी” में बेचने पर 3%, मार्किट फीस ,
    3% rural development fund और 2.5 commission ठोंक दिया गया।
    मजदूरी आदि मिलाकर यह फालतू खर्च 10% के आसपास हो जाता है। कई राज्यों में यह खर्च 20% तक पहुंच जाता है। यह सारा खर्च किसान पर पड़ता है।
    बाकी मंडी में फसल का transportation, रखरखाव का खर्च अलग पड़ता है।


    मंडियों में फसल की चोरी, कम तौलना, आम बात है। कई बार फसल कई दिनों तक नहीं बिकती किसान को खुद फसल की निगरानी करनी पड़ती है। एक बार फसल मंडी में आ गई तो किसान को वह “बिचोलियों” द्वारा तय की गयी कीमत पर,
    यानि – औने पौने दाम पर बेचनी ही पड़ती है।
    क्योंकि कई राज्यों में किसान अपने राज्य की दूसरी मंडी में अपनी फसल नहीं लेकर जा सकता । दूसरे राज्य की मंडी में फसल बेचना Apmc act के तहत गैर कानूनी है।
    Apmc act सारी कृषि उपज पर लागू होता है चाहे वह सब्ज़ी हो ,फल हो या अनाज हो। तभी हिमाचल में 10 रुपये किलो बिकने वाला सेब उपभोक्ता तक पहुँचते पहुँचते 100 रुपए किलो हो जाता है।


    आढ़तियों का आपस में मिलकर किसानो को लूटने का दृश्य बड़ा आम है। जो आढ़तिए किसानों को उचित दाम दिलाने का प्रयास करते हैं वे भी घाटे में नहीं रहते।इसके बावजूद किसानों की लूट होती रहती है। जिस फसल का retail में दाम 500 रुपये क्विंटल होता है, सारे आढ़तिये मिलकर उसका दाम 200 से बढ़ने नहीं देते।


    मोदी सरकार द्वारा किसानों की हालत सुधारने के लिये तीन अध्यादेश लाए गये हैं।
    जिसमें निम्नलिखित सुधार किए गए हैं :-
    1. अब किसान मंडी के बाहर भी अपनी फसल बेच सकता है और मंडी के अंदर भी ।
    2. किसान का सामान कोई भी व्यक्ति संस्था खरीद सकती है जिसके पास पैन कार्ड हो।
    3. अगर फसल मंडी के बाहर बिकती है तो राज्य सरकार किसान से कोई भी टैक्स वसूल नहीं सकती।
    4. किसान अपनी फसल किसी राज्य में किसी भी व्यक्ति को बेच सकता है।
    5. किसान contract farming करने के लिये अब स्वतंत्र है।
    कई लोग इन कानूनों के विरुद्ध दुष्प्रचार कर रहें है।
    जो कि निम्नलिखित हैं :-
    1. आरोप :- सरकार ने मंडीकरण खत्म कर दिया है ?
    उत्तर :- सरकार ने मंडीकरण खत्म नहीं किया। मण्डियां भी रहेंगी। लेकिन किसान को एक विकल्प दे दिया कि अगर उसको सही दाम मिलता है तो वह कहीं भी अपनी फसल बेच सकता है। मंडी में भी और मंडी के बाहर भी।
    2. आरोप :- सरकार MSP समाप्त कर रही है ?
    उत्तर :- मंडीकरण अलग चीज़ है, MSP न्यूनतम समर्थन मूल्य अलग चीज़ है। सारी फसलें सब्ज़ी, फल मंडीकरण में आते हैं, MSP सब फसलों की नहीं है।
    3. आरोप :- सारी फसल अम्बानी व अड़ानी खरीद लेगा?
    उत्तर :— वह तो तब भी खरीद सकते हैं – आढ़तियों को बीच में डालकर।


    यह तीन कानून किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मुक्ति के कानून हैं।
    आज इस सरकार ने किसानों पर – कांग्रेस द्वारा लगाई हुई – “बन्दिश” को हटा कर,
    “हर किसी को” अपनी उपज बेचने के लिये आज़ाद कर के,
    “पूरे देश का बाज़ार” किसानों के लिये खोल दिया है।”
    किसानों को कोई भी टैक्स भी नहीं देना होगा।
    जो भी लोग विरोध कर रहे हैं वो उनकी अपनी समझ है।
    भारत के किसानों को असली आजादी की दहलीज तक लाने वाली ऐसी किसान हितैषी सरकार इससे पहले कभी नहीं बनी थी।
    क्योकि ये मोदी जी – बहुत अच्छे से जानते हैं कि – “किसान और जवान” – ही देश का आधार हैं।

  • किसान कानून असली आजादी

    किसान कानून असली आजादी

    एपीएमसी कानून में बदलाव के बाद किसान अब सीधे बाजार में बेच सकेंगे अपनी उपज


    इस विषय पर पिछले प्रथम भाग में, मैंने नए किसान कानूनों की पृष्ठभूमि और प्रावधान और प्रभाव के बारे में लिखा था … जिसकी लिंक है । इसी विषय पर मैं अपने आलेख के इस दूसरे भाग में बताना चाहता हूं कि वर्ष 1961 में पश्चिमी अफ्रीका स्थित सिएरा लियोने देश को ब्रिटेन से स्वतंत्रता मिल गयी। इस देश का शासक सियाका स्टीवेंस नामक व्यक्ति बन गया। उसने अंग्रेजों की दोहन वाली व्यवस्था को ही चालू रखा तथा किसानों को अपना उत्पाद सरकारी मार्केटिंग बोर्ड को बेचने के लिए मजबूर करने की नीति अपने नए स्वतंत्र देश मे जारी रखीं।
    कुछ ही वर्षों में यह हालत हो गई कि वहां के किसानों को Palm Kernels (ताड़ की गरी), कोको (cocoa) और कॉफ़ी बीन्स की कीमत, विश्व में व्याप्त दर से आधी या उससे भी कम मिल रही थी। जब वर्ष 1985 में स्टीवंस को सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर किया गया, तब किसानों को अपने उत्पाद की कीमत का केवल 10% ही मिल रहा था।
    एक तरह से स्टीवेंस की नीति यह थी कि किसानों को जानबूझकर गरीब रखो; उनको निर्धनता के नाम पर कुछ लॉलीपॉप पकड़ा दो और सत्ता में बने रहो। इस लॉलीपॉप के बदले में ना तो उसने किसानों को कोई सुविधा दी , ना ही किसी इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास किया, ना ही कोई पब्लिक सर्विस उपलब्ध कराई। बल्कि उसने अपने आपको, अपने परिवार के सदस्यों को तथा चापलूसो को समृद्ध बनाया एवं विरोधियों से राजनीतिक समर्थन खरीदा। फलस्वरूप सियाका स्टीवेंस और उनकी पार्टी को भी भारत के गांधी परिवार एवम कांग्रेस की तर्ज पर वहां की जनता द्वारा नेपथ्य में धकेल दिया गया ।
    जहां तक मुझे ज्ञात है ,भारत में मंडी परिषद भी इसी प्रकार से किसानों का शोषण कर रही थी। स्थिति यह थी कि बैरसिया का किसान अपने उत्पादों को नर्मदापुरम में नहीं बेच सकता था; ना ही मेरठ का किसान दिल्ली में। मेरठ से दिल्ली तक बेचने की बात छोड़िये; मेरठ का वह किसान अपने उत्पादों को उत्तर प्रदेश स्थित मुज्जफरनगर में भी नहीं बेच सकता था क्योंकि उसे अपना सारा उत्पाद सरकारी कृषि मंडी में बेचने के लिए विवश किया जाता था।
    परिणाम यह हुआ कि किसानों को अगर अपने उत्पाद की कीमत किसी अन्य शहर या राज्य में बेहतर मिल रही है तो वह नहीं बेच सकता था। ना ही ग्राहक सीधे-सीधे उत्पाद किसानों से खरीद सकता था। मंडी परिषद के एकाधिकार का परिणाम यह निकला कि जो उत्पाद किसानों से दो-तीन रुपए किलो लिया जाता है, वही उत्पाद ग्राहकों को 40 से 50 रुपये किलो पड़ता है। बीच का अगर सात-आठ रुपए प्रति किलो ट्रांसपोर्ट, लेबर और कुछ अन्य खर्चों में भी मान लें, तब भी 30 रुपये बीच में कोई और खाकर धनी बन रहा था, वही चंदा देकर राजनीतिज्ञों को भी समृद्ध बना रहा था और उन्हें सत्ता में बैठने में मदद कर रहा था। इसी मंडी परिषद में काले धन को सफेद किया जा रहा था जिसका लाभ राजनीतिज्ञों तथा ब्यूरोक्रेट्स को मिल रहा था। पर देश की अर्थव्यवस्था पर बट्टा लग रहा था ।
    नए किसान कानून बनने के बाद भी किसान अब भी अपना उत्पाद मंडी परिषद् बेचने के लिए स्वतंत्र है। लेकिन अब उन्हें अपना उत्पाद कहीं भी बेचने की अतिरिक्त अनुमति एवम स्वतंत्रता है वो भी जहां उन्हें बेहतर दाम मिले वहां । और अगर मंडी परिषद अधिक कीमत दे रही है, तो वे वहां भी बेच देंगे। लेकिन अब किसानों को कोई मजबूर नहीं कर सकता कि वह मंडी परिषद को ही अपना माल बेचे।
    मोदी सरकार का यह कदम बाजार में प्रतियोगिता को बढ़ावा देगा क्योकि उद्यमी तथा ग्राहक सीधे किसानों से उत्पाद खरीद सकते हैं।
    इस प्रक्रिया से एक अन्य मार्केट का भी विकास होगा जिसे फ्यूचर ट्रेडिंग बोला जाता है। इसमें किसानों के द्वारा फसल बोते समय या फसल बोने के पहले ही उनकी पूरी फसल खरीद ली जाती है। फिर चाहे फसल काटने के समय दाम बाजार भाव से ऊपर हो या नीचे, वह फसल उस ग्राहक को लेना पड़ता है या ग्राहक को बेचना पड़ेगा।
    दूसरे शब्दों में किसानों को अपने उत्पाद की कीमत वसूलने के लिए मंडी परिषद के बाहर ट्रैक्टर में माल भरकर 3 दिन प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। अधिकतर किसानों को फसल बोने के पहले ही माल की कीमत मिल सकती है।
    हम यह प्रश्न क्यों नहीं पूछते कि किसानों के कल्याण के लिए नेहरू, इंदिरा, राजीव, मनमोहन, सोनिया ने जी जान लगा दिया; सारी नीतियां उनके लिए बनाई गई। तब भी वह निर्धन के निर्धन ही क्यों रहे …?
    मेरे अध्ययन के बाद यह भी आंकड़े भी है कि यदि किसानों की सबसे बड़े हितैषी शरद पवार की पार्टी (Nationalist Congress Party) और अकाली दल है। तो इसके बावजूद किसानों की आत्महत्या के मामले में महाराष्ट्र, पूरे देश में कई वर्षों से नंबर 1 पोजीशन पर है। पंजाब टॉप के 5 या 6 प्रांतों में है
    ऐसा नहीं है कि राजनीतिज्ञों को यह तथ्य पता नहीं है कि मंडी परिषद में क्या हो रहा है और किस प्रकार से किसानों को निर्धन बनाए रखा जा रहा है। मैं लॉ प्रोफेसर होने के नाते पूरी जिम्मेदारी कहता हूं कि भारत को ,भारत के किसानों को जानबूझकर निर्धन बनाएं रखा गया है। भ्रष्ट अभिजात्य वर्ग कुछ लॉलीपॉप जनता को पकड़ा देता है, किसानों को मुद्दा उछाल देता है और उनके नाम पे नारे लगा देता है।
    भारत मे कृषि की संसदीय स्थाई समिति जिसमे अध्यक्ष हुकुमदेव नारायण यादव थे तथा सभी राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि सांसद इस समिति के सदस्य थे। इस संसदीय समिति ने पूरे देश मे तीन वर्षों के पर्याप्त शौध और अध्ययन के बाद जनवरी 2019 में अपनी रिपोर्ट संसद के समक्ष प्रस्तुत की जिसका लब्बो लुआब कुछ यूं था कि
    ” मंडी परिषद राजनीति, भ्रष्टाचार, व्यापारियों और बिचौलिए के एकाधिकार का अखाड़ा हो गया है। देश भर में मंडी परिषद विभिन्न कारणों से किसानों के हित में काम नहीं कर रहा। उदहारण के लिए, मंडी परिषद बाजार में व्यापारियों की सीमित संख्या प्रतिस्पर्धा को कम करती है, अनुचित लाभ के लिए व्यापारियों की गुटबंदी (कार्टिलाइजेशन) को बढ़ावा देती है, बाजार शुल्क के नाम पर किसानो को अनुचित रूप से कम कीमत देती है। कुछ राज्यों में मंडी परिषद नियम किसानों के हित के लिए इतने नुकसानदेह हैं कि कृषि उपज की बिक्री मंडी क्षेत्र के बाहर होने के बावजूद भी बाजार शुल्क लगाया जाता है। मंडी परिषद नियम कृषि उत्पादों को विभिन्न स्थानों को बेचने में बांधा डालती है और प्रतिस्पर्धा को सीमित करती ​​है। यदि हम किसानों को न्याय प्रदान करना चाहते हैं, तो मंडी परिषद नियमो में मूलभूत सुधार की तत्काल आवश्यकता है। किसानों के पारिश्रमिक का उचित मूल्य निर्धारण तब तक सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है, जब तक कृषि उपज की बिक्री के लिए उपलब्ध बाज़ारो को बढ़ाया ना जाए।
    उपर्युक्त बातें इस रिपोर्ट में कहीं गयी ,आप संसदीय रिकार्ड से मिलान कर सकते हैं
    इसी संदर्भ में केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने स्पष्ट किया है की न्यूनतम समर्थन मूल्य कानून का अंग पहले भी नहीं था और एमएसपी कानून का अंग आज भी नहीं है। उन्होंने पूछा कि विपक्ष कई वर्षों तक सत्ता में रहा है और अगर MSP को कानून का हिस्सा बनाना था तब उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया?
    मैं स्वयम किसान परिवार से हूं , गांव में परिवार के लोगो से तथा कई मित्रों से चर्चा के बाद मेरा व्यक्तिगत निष्कर्ष यह है कि आज भी जिन कृषि उत्पादों के लिए मिनिमम सपोर्ट प्राइज़ या न्यूनतम समर्थन मूल्य या MSP निर्धारित की जाती है वे सब के सब सरकारी MSP की दर पर नहीं खरीदे जाते। अगर MSP को कानून का हिस्सा बना देंगे तो इसका परिणाम यह होगा कि जितने भी उत्पादों की MSP सरकार निर्धारित करेगी, अगर उससे एक रुपए भी कम मिला तो यह कानून का उल्लंघन होगा। अतः किसी भी व्यापारी, उद्यमी तथा दुकानदार को MSP से कम दर पर खरीदे उत्पाद को बेचने के लिए जेल की सजा भी हो सकती है
    परिणामस्वरूप, अगर कृषि उत्पाद मांग से अधिक हुआ तो व्यापारी और उद्यमी कृषको से सीधे उत्पाद नहीं खरीदेगा। वही उत्पाद फिर किसान मंडी परिषद में बेचने के लिए बाध्य हो जाएंगे जहाँ पर उनका शोषण होगा। देखते, देखते कृषि आधारित निजी उद्यम और व्यापार ध्वस्त हो जाएंगे।
    ऐसे कानून का एक अन्य दुष्परिणाम यह भी होगा। अगर सभी उत्पाद MSP की दर पर ही खरीदे जाने हैं तो हर व्यक्ति किसानी की तरफ जाना चाहेगा। हालत यह है कि भारत में अभी भी मांग से अधिक कृषि उत्पाद हो रहा है। आखिरकार कौन खरीदेगा मांग से अधिक उत्पाद? तो फिर प्याज ,टमाटर और सब्जियां या तो खेतों में या सड़कों पर फेंक कर नष्ट की जाएगी
    इसी प्रकार हमें इन उत्पादों को विश्व में बेचने में भी समस्या आएगी क्योंकि अन्य देश भारत पर आरोप लगा देंगे कि हम अपने कृषि उत्पादों पर सब्सिडी दे रहे हैं जिससे उनका सही मूल्य नहीं लग पा रहा है।
    मैंने अध्ययन के बाद पता किया है कि भारत के 86 प्रतिशत किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम कृषि योग्य भूमि है। इनमें से अधिकतर उत्तर प्रदेश और बिहार में स्थित हैं। इस सुधार से छोटे किसानों को लाभ होगा क्योंकि उनकी फसल अब मंडी परिषद के दांव-पेंच से मुक्त हो गई है
    प्रधानमंत्री मोदी ने मंडी परिषद कानून में सुधार करके शरद पवार, चिदंबरम, बादल जैसे तथाकथित “किसानों” की कमर तोड़ दी है।
    अंग्रेजों ने औपनिवेशिक शासन के दौरान किसानों को अपना सारा उत्पाद एक मार्केटिंग बोर्ड को बेचने के लिए विवश कर दिया। उसके पीछे औचित्य यह बताया कि मार्केटिंग बोर्ड किसानों को उचित दाम देंगे तथा कीमतों में उतार-चढ़ाव से उनकी रक्षा करेंगे। लेकिन वास्तविकता में यह बोर्ड किसानों से बाजार से कम दामों पर उत्पाद खरीदता था, बाजार में दुगने पर बेचता था ,या गोदाम के बाहर सड़ने,भीगने के लिए छोड़ देता था
    अंग्रेजो की इसी नीति पर चलने से कृषि प्रधान भारत आज भारी प्राकृतिक सम्पदा और कृषि उत्पादन के बावजूद निर्धन है क्योकि किसान अपना उत्पाद किसी सरकारी संस्था को बेचने के लिए बाध्य है।
    प्रधानमंत्री मोदी जी ने देश को बताने का प्रयास किया है कि किसान और जनता के बीच मे किस तरह कुछ राजनीतिक दल तथा परिवार, मंडियों/ दलालों के माध्यम से सिर्फ पूंजी और एकाधिकार द्वारा खुद अमीर और किसानों को गरीब बना रहे थे । एक फैक्ट्री का मालिक जब अपने उत्पाद की कीमत और कहां बेचना है यह खुद तय करता है तो किसान क्यों नही ? .. वास्तविक स्वतंत्रता देश को 2014 में और किसानों को 2020 में ही मिली है । आशा है भारत के वास्तविक किसान इस स्वतंत्रता के लिए प्रधानमंत्री का आभार अवश्य प्रदर्शित करेंगे ।// इति//

    • डॉ विश्वास चौहान
  • कृषि में निवेश से छोटे किसानों को लाभ होगा बोले कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर

    कृषि में निवेश से छोटे किसानों को लाभ होगा बोले कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर

    नरेन्द्र सिंह तोमरः किसानों की आय बढ़ाने में कामयाब रहेगा नया प्रबंधन फार्मूला

    केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण, ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की शुक्रवार को कहा कि कृषि क्षेत्र में नए निवेश से छोटी जोत वाले किसानों को ज्यादा फायदा होगा। उन्होंने कहा कि देश में अधिकांश किसानों के पास छोटी जोत की जमीन है और एक लाख करोड़ रुपये के कृषि इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड से इस क्षेत्र में नए निवेश आकर्षित होंगे जिसका किसानों को लाभ मिलेगा।

    केंद्रीय कृषि मंत्री यहां वर्चुअल कॉन्फ्रेंस के जरिए राज्यों के कृषि एवं सहकारिता मंत्रियों से बातचीत कर रहे थे। तोमर ने कहा, एक लाख करोड़ रुपये के कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर फंड और 10 हजार नए कृषक उत्पादक संगठन (एफपीओ) बनने से आने वाले दिनों में कृषि एवं ग्रामीण विकास के क्षेत्र में आमूलचूल बदलाव देखने को मिलेंगे।” उन्होंने राज्यों से नई प्रौद्योगिकी के माध्यम से क्षेत्रवार उपयुक्त अधोसंरचना विकसित करने में सहयोग की अपील की। तोमर ने कहा कि केंद्र सरकार के लिए कृषि उच्च प्राथमिकता का क्षेत्र है और इसका विकास इस प्रकार करने की आवश्यकता है ताकि नई पीढ़ी कृषि की ओर आकर्षित हो।

    बैठक के दौरान केंद्रीय कृषि मंत्री ने एफपीओ की गाइडलाइंस भी जारी की। इस मौके पर कृषि मंत्रालय के अधिकारियों ने एक लाख करोड़ रुपये के कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर फंड, एफपीओ, किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) के संबंध में प्रेजेन्टेशन के जरिए जानकारी दी। कॉन्फ्रेंस के दौरान उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा, गुजरात, तेलंगाना, बिहार, केरल, उत्तराखंड, पंजाब, छत्तीसगढ़, राजस्थान, मणिपुर, सिक्किम, नागालैंड सहित विभिन्न राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के मंत्रियों एवं विभागीय अधिकारियों ने भी विचार रखे। गुजरात के कृषि मंत्री आर.सी. फल्दू ने पशुपालकों को भी नई स्कीम में जोड़ने पर केंद्र सरकार का आभार जताया।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल ‘आत्मनिर्भर भारत’ की सराहना करते हुए बिहार के कृषि मंत्री डॉ. प्रेम कुमार ने कहा कि इससे कृषि क्षेत्र की भी प्रगति होगी। कई अन्य राज्यों के मंत्रियों ने भी अपने विचार पेश किए। इस मौके पर कृषि सचिव संजय अग्रवाल ने कहा कि देशभर में 90 हजार से ज्यादा सहकारी समितियां हैं, जिनमें से 60 हजार के पास जमीन भी हैं और वे सक्षम हैं। इनके जरिये एफपीओ गठन करते हुए ग्रामीण क्षेत्र में निवेश बढ़ाने की कोशिश होनी चाहिए। केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री कैलाश चैधरी भी कॉन्फ्रेंस के दौरान मौजूद थे।

  • साकार होने लगा किसानों की आय दोगुनी करने का संकल्प

    साकार होने लगा किसानों की आय दोगुनी करने का संकल्प

    भोपाल,12 जुलाई(प्रेस सूचना केन्द्र)।इसके अंतर्गत किसानों की आय दोगुनी करने से संबंधित मुद्दों की जाँच करने और वास्तविक रूप से किसानों की आय दोगुनी करने के लिये रणनीति की सिफारिश करने हेतु एक अंतर-मंत्रालयी समिति का गठन किया है।

    समिति के अनुसार, इस क्षेत्र में डिजिटल प्रौद्योगिकी की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण है, जो ग्रामीण भारत में कृषि गतिविधियों को अंजाम देने, इसे आधुनिक बनाने और व्यवस्थित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

    प्रौद्योगिकियों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence), बिग डेटा एनालिटिक्स (Big Data Analytics), ब्लॉक चेन टेक्नोलॉजी (Block chain Technology), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (Internet of Things) आदि शामिल हैं।

    सरकार ने प्रौद्योगिकियों के प्रसार के लिये ज़िला स्तर पर 713 कृषि विज्ञान केंद्र और 684 कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसियों की स्थापना की है।

    इसके अलावा, किसानों को केंद्रित प्रचार अभियान, किसान कॉल सेंटर, कृषि-क्लीनिक और कृषि-व्यवसाय केंद्रों के उद्यमी योजना, कृषि मेलों और प्रदर्शनियों, किसान एसएमएस पोर्टल इत्यादि के माध्यम से जानकारी प्रदान की जाती है।

    मंत्रालय की योजनाओं को सफल बनाने हेतु प्रौद्योगिकी का प्रसार बहुत महत्त्वपूर्ण है। प्रमुख

    किसानों को महत्त्वपूर्ण मापदंडों पर सूचना के प्रसार के लिये किसान सुविधा मोबाइल एप्लिकेशन को विकसित किया गया है, उदाहरण के लिये मौसम, बाजार मूल्य, पौध संरक्षण, इनपुट डीलर (बीज, कीटनाशक, उर्वरक) फार्म मशीनरी, मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card), कोल्ड स्टोरेज और गोदाम, पशु चिकित्सा केंद्र और डायग्नोस्टिक लैब्स आदि।

    आधुनिक प्रौद्योगिकी के माध्यम से किसानों को बाजार की जानकारी के साथ उपज बेचने के लिये बाजारों के बारे में बेहतर जानकारी दी जाती है, साथ ही बाजार की मौजूदा कीमतें और बाजार में वस्तुओं की मांग की जानकारी भी उपलब्ध कराई जाती है, जिससे किसान उचित मूल्य और सही समय पर उपज बेचने के लिये उचित निर्णय ले सकते हैं।

    भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (Indian Council of Agriculture Research-ICAR) ने राज्य कृषि विश्वविद्यालयों (State Agricultural Universities) और कृषि विज्ञान केंद्रों (Krishi Vigyan Kendras) द्वारा विकसित 100 से अधिक मोबाइल एप्लिकेशन भी विकसित किये हैं जो इनकी वेबसाइट पर उपलब्ध हैं।

    ये मोबाइल ऐप फसलों, बागवानी, पशु चिकित्सा, डेयरी, पोल्ट्री, मत्स्य पालन, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और एकीकृत विषयों के क्षेत्रों में किसानों को बहुमूल्य जानकारी प्रदान करते हैं, जिसमें विभिन्न वस्तुओं के बाजार मूल्य, मौसम से संबंधित जानकारी, सेवाएँ आदि शामिल हैं।

    पंजीकृत किसानों को SMS के माध्यम से विभिन्न फसल संबंधी मामलों पर सलाह भेजने के लिये mKisan पोर्टल (www.mkisan.gov.in) का विकास।

    किसानों को इलेक्ट्रॉनिक ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म प्रदान करने के लिये ई-राष्ट्रीय कृषि बाजार (e-National Agriculture Market- e-NAM) पहल की शुरूआत की गई है।

    कृषि उत्पादन के भंडारण, प्रसंस्कृत कृषि उत्पाद और उत्पादन के पश्चात होने वाले फसल नुकसान को कम करने के लिये वैज्ञानिक तरीके से भंडारण क्षमता को बढ़ाया जाएगा, इसके लिये कृषि बाजार से जुड़ी एकीकृत कृषि योजनाओं को क्रियांवित किया जाएगा।

    देश भर के सभी किसानों को 2 वर्ष के चक्र के भीतर एक बार मृदा स्वास्थ्य कार्ड प्रदान करने में राज्य सरकारों की सहायता की जा रही है इसके माध्यम से किसानों को मृदा के पोषक तत्वों की स्थिति की जानकारी प्रदान की जाती है। फसल उत्पादकता में वृद्धि करने तथा मृदा की उर्वरता को बनाए रखने के लिये किसानों को उचित पोषक तत्त्वों का उपयोग करने की सलाह भी दी जाती है।

    किसानों को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (ऑयल सीड्स और ऑयल पाम) के तहत बीज उपलब्ध करवाना, तकनीक का अंतरण (Transfer) करना, उत्पादन इकाइयों तथा जल संसाधन का उपयोग करने के लिए आवश्यक उपकरणों को भी उपलब्ध कराया जा रहा है। इस योजना के अंतर्गत किसानों को आर्थिक सहायता भी उपलब्ध की जा रही है जिससे किसानों को कृषि से संबंधित प्रशिक्षण भी प्राप्त हो सके ताकि किसान फसल का उत्पादन बढ़ा कर आर्थिक लाभ में वृद्धि कर सकें।

    कृषि-मौसम विज्ञान और भूमि आधारित अवलोकन परियोजना, बागवानी आकलन और प्रबंधन पर समन्वित प्रोग्राम के लिये भू-सूचना विज्ञान का उपयोग, राष्ट्रीय कृषि विकास आकलन और निगरानी प्रणाली जैसी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के माध्यम से कृषि को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

    देश में किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य

    सरकार ने 2022-23 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा है और इसके लिये कृषि सहयोग एवं किसान कल्याण विभाग के राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी की अध्यक्षता में एक अंतर-मंत्रिस्तरीय समिति गठित की है। इस समिति को किसानों की आय दोगुनी करने से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श करने और वर्ष 2022 तक सही अर्थों में किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य की प्राप्ति के लिये एक उपयुक्त रणनीति की सिफारिश करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है।

    समानांतर रूप से सरकार आय में वृद्धि को केंद्र में रखते हुए कृषि क्षेत्र को नई दिशा देने पर विशेष ध्यान दे रही है। किसानों के लिये शुद्ध धनात्मक रिटर्न सुनिश्चित करने हेतु राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के ज़रिये निम्नलिखित योजनाओं को बड़े पैमाने पर क्रियान्वित किया जा रहा है:

    मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, नीम लेपित यूरिया, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, परंपरागत कृषि विकास योजना, राष्ट्रीय कृषि बाज़ार योजना (e-NAM), बागवानी के एकीकृत विकास के लिये मिशन, राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, इत्यादि।

    इनके अलावा कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) की सिफारिशों के आधार पर खरीफ और रबी दोनों ही फसलों के लिये MSP को अधिसूचित किया जाता है। यह आयोग खेती-बाड़ी की लागत पर विभिन्न आँकड़ों का संकलन एवं विश्लेषण करता है और फिर MSP से जुड़ी अपनी सिफारिशें पेश करता है।

    किसानों की आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि सुनिश्चित करने के उद्देश्य से सरकार ने वर्ष 2018-19 के सीजन के लिये सभी खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्यों में वृद्धि की थी। गौरतलब है कि वर्ष 2018-19 के बजट में MSP को उत्पादन लागत का कम-से-कम 150 फीसदी तय करने की बात कही गई थी।

  • अब जनता की अदालत में चलेगा कर्जमाफी के झूठ का मुकदमा बोले कमल पटेल

    अब जनता की अदालत में चलेगा कर्जमाफी के झूठ का मुकदमा बोले कमल पटेल

    कांग्रेस को सत्ता में लाने के लिए राहुल गांधी ने किसान कर्जमाफी का जो पांसा फेंका था उसने तीन राज्यों में उन्हें सत्ता तो दिला दी लेकिन डेढ़ साल तक जब किसानों को लाभ नहीं हुआ तो मामला बिगड़ गया। उपजे जन असंतोष ने पार्टी में फूट के हालात पैदा किए और मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार का असमय अवसान हो गया। खुद कमलनाथ तो कर्ज माफी कर नहीं पाए अब बाहर बैठकर भाजपा सरकार पर राहुल गांधी के वादे को पूरा करने का दबाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं। जिस फार्मूले से किसानों के छोटे कर्ज माफ करने की शुरुआत कमलनाथ ने की थी उससे सहकारी समितियां कंगाल हो गईं हैं। किसान नए झमेलों में फंस गए हैं।उन्हें कांग्रेस के झूठे वादे की असलियत समझ में आ गई है। इसके विपरीत भाजपा ने किसानों को बेहतर मूल्य और मुआवजा दिलाने की जो पहल की है उससे कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ गईं हैं। आगामी उपचुनाव में मध्यभारत और प्रदेश के कई अंचलों में कांग्रेस को कर्जमाफी की असफलता के मुद्दे पर जनता के सवालों का सामना करना पड़ेगा। कृषि मंत्री कमल पटेल कहते हैं कि कर्जमाफी के इस झूठ का मुकदमा अब जनता चलाएगी और कांग्रेस को उसके पापों की सजा अवश्य भोगनी पड़ेगी।

    एक चुनावी दांव के तहत बड़बोले राहुल गांधी ने चुनावी सभा में ऐलान किया था कि अगर सत्ता में आने के बाद दस दिनों के भीतर किसानों के दो लाख रुपए तक के कर्ज माफ नहीं हुए तो मुख्यमंत्री बदल दिया जाएगा। इस वादे में कर्ज की बात कही गई थी जबकि सत्ता में आने के तत्काल बाद कमलनाथ ने उसमें कृषि ऋण शब्द जोड़ दिया। कहा जाने लगा ये काम पांच सालों में कई चरणों में होगा। फिर कई शर्तें और भी जोड़ी गईं। कुल मिलाकर किसान को कर्ज माफी एक झुनझुना ही साबित हुई। कांग्रेस के इस झूठे वादे का असर बैंकिंग व्यवस्था को झेलना पड़ा। कांग्रेस ने ये वादा सरकारी और सहकारी बैंकों के भरोसे कर तो दिया था लेकिन सत्ता में आने के बाद इस ढोल की पोल खुल गई। राष्ट्रीयकृत बैंकों ने तो मोदी सरकार के बैंकिंग सुधारों के चलते इस झूठे वादे को पूरा करने में साफ असहमति जता दी। जबकि सहकारी बैंकों का ढांचा भ्रष्टाचारों की वजह से पहले ही धराशायी पड़ा था।जिन सहकारी साख समितियों ने बेहतर काम करके कुछ फंड बनाया था सरकार ने सबसे पहली गिद्ध दृष्टि उसी फंड पर टिका दी। सहकारी समितियों से कहा गया कि वे अपने फंड का आधा हिस्सा कर्जमाफी के लिए दे दें जिसकी भरपाई भविष्य में सरकार कर देगी। सरकार के इस निर्देश को कई समितियों ने सिरे से नकार दिया।

    किसान कर्ज माफी का मामला सबसे पहले कागजों में उलझा हुआ नजर आने लगा जब प्रमाण पत्रों और प्रचार अभियानों की पोल खुलना प्रारंभ हुई । कमलनाथ ने बाकायदा सार्वजनिक आयोजनों में पुरस्कारों की तरह कर्जमाफी के प्रमाण पत्र बांटने शुरु कर दिए। बहुत छोटे कर्जों के इन प्रमाणपत्रों के बाद किसानों को लगने लगा कि उनकी असफलता का ढिंढोरा पीटकर सरकार उन्हें सरे चौराहे बदनाम कर रही है।बगैर सोचे समझे किया गया कर्जमाफी का वादा इतना हवा हवाई था कि सरकार ने शिवराज सरकार की तमाम हितग्राही मूलक योजनाओं को बंद करके कर्जमाफी पूरी करने का शोर मचाना शुरु कर दिया। जबकि इस बचत का धेला भर भी किसान कर्जमाफी के लिए नहीं दिया गया। इसी बीच लोकसभा चुनाव आ गए तो सरकार को लगा कि चलो कुछ समय के लिए तो आपदा टल गई है। सभी प्रभारी मंत्रियों से लेकर राज्य शासन के मंत्रियों एवं विधायकों की ड्यूटी लगाई गई कि लोकसभा चुनाव के बाद किसी भी स्तर पर किसानों को प्रमाण पत्रों के साथ-साथ कर्ज माफी दे दी जाएगी । लोकसभा चुनावों में जनता इस झांसे में नहीं आई और उसने कांग्रेस को अंडा पकड़ा दिया। केवल मुख्यमंत्री कमलनाथ के पुत्र खींचतान के सांसद बन पाए वह भी तब जबकि उन्होंने भाजपा के नेताओं की चरण वंदना करके छिंदवाड़ा में कोई बड़ी चुनावी सभा नहीं होने दी।लोकसभा चुनाव के बाद सरकार का तंत्र एवं संबंधित मंत्री ट्रांसफर पोस्टिंग के धंधे में लग गए । लगभग 2 महीने तक अथवा उससे कहीं अधिक समय तक यह धंधा बेशर्मी से बदस्तूर चलता रहा।

    विधायकों की परेशानी यह थी कि जब भी वह अपने विधानसभा क्षेत्रों में विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में जाते थे तो उन्हें किसानों का विरोध झेलना पड़ता था।किसान उलाहना देते थे कि उनके साथ इतना बड़ा मजाक क्यों किया गया। लोकसभा चुनाव के बाद तो किसानों के साथ किए गए छल और कंगाली भरे कुशासन को झेलना कांग्रेस के विधायकों के लिए असहनीय हो गया था। जब भी कांग्रेस के विधायक अथवा प्रभारी मंत्री क्षेत्रों में जाते थे तो किसान कर्जमाफी का दबाव बनाते हुए घेराव करने लगते। सोशल मीडिया पर लोकसभा चुनाव होने के बाद लगातार 6 महीने तक सरकार का जमकर मजाक उड़ता रहा ।किसान कर्जमाफी के ढोल की पोल खुलती जा रही थी और मालवा के साथ साथ ग्वालियर चंबल संभाग के अंचल के किसान भी सरकार की नीतियों का माखौल उड़ाने लगे।

    ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ कांग्रेस के कुछ नेताओं ने आलाकमान के इशारे पर जो घेराबंदी की थी और उन्हें चुनाव हरवाया था उसकी भी असलियत सामने आने लगी। सिंधिया समर्थक मंत्रियों विधायकों को भी लगा कि चुनावी चेहरे के रूप में तो सिंधिया को आगे रखा गया लेकिन उनकी उपेक्षा करके सिंधिया समर्थकों को निपटाया जा रहा है। किसानों से गालियां पड़वाईं जा रहीं हैं।कमलनाथ को छिंदवाड़ा के अलावा प्रदेश के किसी अंचल के किसानों और आम नागरिकों की चिंता नहीं है।जब कोई विधायक या मंत्री मुख्यमंत्री निवास से संपर्क करने का प्रयास करता तो उससे आपत्तिजनक व्यवहार करके उसकी उपेक्षा कर दी जाती। ये हालत कमोबेश प्रदेश के हर अंचल के विधायकों की थी लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक विधायकों ने इस समस्या से निपटने के लिए समाधान की तलाश तेज कर दी।

    कर्जमाफी तो कमोबेश हर राज्य में असफल साबित हुई है। उसके फेल होने के दो कारण थे । कर्ज माफी की घोषणा का क्रियान्वयन मुख्य रूप से ग्रामीण स्तर पर स्थापित सहकारी बैंकों से जुड़ा हुआ था । जबकि सहकारी बैंकों को कांग्रेस के नेता माफिया राज बताते हुए मुकदमों में धकेलते गए। अपना ही बाग नोंचते बंदरों की तरह कांग्रेस ने सहकारी आंदोलन का ही भट्टा बिठालना शुरु कर दिया। दूसरा ये कि दिग्विजय सिंह समर्थक अशोक सिंह को अपेक्स बैंक का चेयरमैन बना दिया गया। उन्हें तो कांग्रेसियों की लूट की हवस शांत करनी थी वे इसी का जतन करते रहे लेकिन कर्जमाफी के लिए फंड जुटाना उनके लिए नामुमकिन था।इस बीच कमलनाथ का वो बदनामशुदा बयान सामने आ गया जिसमें उन्होंने सिंधिया को लगभग दुत्कारते हुए कहा कि यदि जनता की मांगों को लेकर वे सड़क पा उतरना चाहते हैं तो उतर जाएं। इस बयान ने कमलनाथ सरकार के सारे रास्ते बंद कर दिए और तय हो गया कि ये सरकार चंद दिनों की ही मेहमान है।

    किसानों को दो लाख तक कर्ज माफी की घोषणा में 31 मार्च 2018 की स्थिति में फसल ऋण माफी 56 हजार करोड़ से कहीं अधिक थी । जाहिर था कि इतनी बड़ी रकम सरकार अपने खजाने से नहीं लुटा सकती थी। जब कर्ज माफी की पोल खुलने लगी तो आंकड़े भी उलझाए जाने लगे। 1 अप्रैल 2007 तक तो कांग्रेसियों को भी समझ में आ गया कि कर्जमाफी संभव नहीं है। भाजपा ने सत्ता संभालते ही कर्जमाफी पर स्थिति स्पष्ट करना शुरु कर दी कि कांग्रेस ने झूठा वादा किया था। उसने केवल सत्ता पाने के लिए ये सफेद झूठ बोला था जबकि भाजपा की पूर्ववर्ती सरकार किसानों को लाभकारी मूल्य और मुआवजा दिलाने की दिशा में बहुत काम कर रही थी। कैबिनेट की बैठक में 23 जून को कृषि मंत्री कमल पटेल ने कहा कि किसान कर्जमाफी कांग्रेस का धोखा था और इसकी जांच कराई जाना जरूरी है।राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति की बैठक के तैयार एजेंडे में कोरोना के बाद कर्जमाफी ही अहम मुद्दा था।राष्ट्रीयकृत बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों ने बताया कि सरकार ने पहले चरण की जो कर्जमाफी धूमधाम से की थी उसका ही पैसा सरकार ने नहीं दिया था। बैठक में मौजूद कुछ अफसरों ने एलएलबीसी के समन्वयक एस डी माहुरकर से इस मुद्दे पर चर्चा न करने को भी कहा क्योंकि ऐसा करने से उनकी पोल भी खुलती थी कि जब कर्जमाफी गलत फैसला था तो उन्होंने उस वक्त उसका विरोध क्यों नहीं किया।

    बैंकरों की ये रिपोर्ट बताती है कि सरकार ने कर्जमाफी का झूठा वादा किया था और वादा निभाने के चक्कर में बैंकों से धोखाघड़ी तक कर डाली। राष्ट्रीकृत बैंकों की तो मजबूरी है कि वे लोकतांत्रिक सरकारों के विरुद्ध धोखाधड़ी का मुकदमा नहीं चला सकतीं लेकिन किसानों के सामने ऐसी कोई मजबूरी नहीं है। किसानों ने अब कांग्रेस के विरुद्ध खुलकर बयानबाजी शुरु कर दी है। कई किसान तो कर्जमाफी के इस झूठे वादे के लिए कांग्रेस को अदालत की चौखट तक भी ले जाने की तैयारी कर रहे हैं। अदालत उनके इस वाद पर विचार करती है या नहीं ये तो वक्त आने पर ही पता चलेगा लेकिन इतना तय है कि आगामी आम चुनावों में जनता की अदालत जरूर वायदा खिलाफी के लिए कांग्रेस को सूली चढ़ाएगी। कांग्रेस के नेताओं से किसानों का सवाल यही रहेगा कि जब औकात नहीं थी तो कर्जमाफी का वादा किया क्यों था।

  • सरकार या कार्पोरेट की मोहताज नहीं पत्रकार की साख

    सरकार या कार्पोरेट की मोहताज नहीं पत्रकार की साख

    स्व.भुवन भूषण देवलिया की पत्रकारिता आज भी प्रासंगिकःपीसी शर्मा

    भोपाल,8 मार्च(प्रेस सूचना केन्द्र)। स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया जैसे मूर्धन्य पत्रकारों ने सामाजिक जीवन में जो आदर्श प्रस्तुत किए हैं वह पत्रकारिता आज भी प्रासंगिक है। सरकारें या कार्पोरेट की मजबूरियां जो भी हों लेकिन इन सबके बीच प्रतिबद्ध पत्रकार समाज के प्रति अपनी पक्षधरता की मशाल लेकर आगे बढ़ते रहते हैं। पत्रकारों की यही सामाजिक प्रतिबद्धता समाज का मार्गदर्शन करती है और सम्मान पाती है। इस धरोहर को संजोकर रखने वाले नई पीढ़ी के पत्रकार आज आशा की नई किरण बनकर उभर रहे हैं। स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यान माला के अष्टम आयोजन में आज प्रदेश के जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा ने युवा पत्रकार और डिंडोरी में ईटीवी के पत्रकार भीमशंकर साहू को सम्मानित करते हुए ये विचार व्यक्त किए।

    मीडिया ःप्रतिबद्धता और पक्षधरता का सवाल विषय पर माधव राव सप्रे संग्रहालय में आयोजित इस व्याख्यानमाला में प्रमुख वक्ता के रूप में वरिष्ठ पत्रकार श्री नरेन्द्र कुमार सिंह, नागपुर के वरिष्ठ पत्रकार श्री एसएन विनोद,पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर, और कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार श्री कमल दीक्षित ने इस मुद्दे के विविध आयामों पर प्रकाश डाला। उन्होंने माना कि पत्रकार की साख आज भी कायम है लेकिन जिस तरह कार्पोरेट घरानों और सरकारों ने मीडिया संस्थानों के संचालन की बागडोर थाम ली है उसकी वजह से आज की पत्रकारिता भी सवालों के घेरे में आ गई है। पत्रकार और संपादक गण यदि बुद्धिमत्ता से काम करें तो वे समाज के सामने नए आदर्श प्रस्तुत कर सकते हैं।

    प्रमुख वक्ता के रूप में श्री नरेन्द्र कुमार सिंह ने कहा कि आम जनता पत्रकार को निष्पक्ष देखना चाहती है लेकिन जिस तरह से उनकी पक्षधरता की छवि बन रही है उसके चलते आज चैनलों के रिपोर्टरों को अपने लोगो छुपाने पड़ रहे हैं। विचारधारा के आधार पर उन्हें गोदी मीडिया या टुकड़े टुकड़े गेंग शब्दों से लांछित किया जा रहा है। सेलिब्रिटीज पत्रकारों के व्यवहार ने जनता के मन में पूरी पत्रकार बिरादरी के प्रति चिढ़ का भाव पनपा दिया है। इस दौर में हमें प्रयास करना होगा कि पत्रकारिता की पवित्रता प्रभावित न हो। पत्रकारिता का शाश्वत नियम है कि खबरों के तथ्यों से कोई छेड़छाड़ न हो। ऐसा करके हम समाज का सही मार्गदर्शन कर सकते हैं।

    प्रमुख वक्ता के रूप में ही नागपुर से आए वरिष्ठ पत्रकार एसएन विनोद ने कहा कि विश्वसनीयता की कसौटी पर पत्रकारिता पराजित हो चुकी है आज वह अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। जिसे मुख्य धारा की पत्रकारिता कहा जाता है उसके पत्रकारों से यदि चर्चा की जाए तो उनका उथलापन उजागर हो जाता है। पत्रकारिता की साख में आ रही गिरावट की सबसे बड़ी वजह यही है कि कार्पोरेट घरानों और सरकारों ने दोयम दर्जे के पत्रकारों की सहायता से अपना एजेंडा चलाकर पत्रकारिता को बाजारू बना दिया है। संपादक यदि बुद्धिमान है तो वह मीडिया के संचालकों को उचित राय देकर जनहित की खबरों का प्रकाशन या प्रसारण निर्बाध रख सकता है। दरअसल में कोई भी मीडिया संस्थान का संचालक नहीं चाहता कि उसके माध्यम की साख धूल धूसरित हो। यदि संपादक उन्हें तार्किक वजह बताएंगे तो वे कभी मीडिया के दुरुपयोग की इजाजत नहीं देंगे। पत्रकारों ने यदि सत्ता और बाजार के सामने समर्पण कर दिया तो न केवल पत्रकारिता खत्म हो जाएगी बल्कि लोकतंत्र भी जिंदा नहीं रह पाएगा।

    पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि नई पीढ़ी के पत्रकारों के लिए जरूरी है कि वे अपना नजरिया केवल राजनीति के इर्दगिर्द सीमित न रखें। राजनेताओ का फैसला तो जनता कर लेगी। हमें विकास के मुद्दों को अपनी पत्रकारिता का पैमाना बनाना होगा। जिस तरह से सोशल मीडिया के माध्यम से समाज अपनी ऊर्जा व्यर्थ कर रहा है उसे देखते हुए सरकार को देश में तीसरा प्रेस आयोग गठित करना चाहिए जो आज के संदर्भ में पत्रकारिता के ढांचे में मूलभूत सुधार करे। पत्रकारिता की खामियों को बतोलेबाजी से दूर नहीं किया जा सकता इसके लिए हमें संवाद की न्यायिक विवेचना करनी होगी तभी इसे सार्थक बनाया जा सकेगा।

    पत्रकारिता के गुरु कमल दीक्षित ने कहा कि पत्रकारिता को प्रतिबद्धता की ओर मोड़ने से पहले उसे भावनात्मक मुद्दों की रस्सियों से बांधा जाता है। चाहे दलित विमर्श हो या फिर जातिगत भेदभाव की संकरी गलियां,सभी में दिलों को द्रवित करने वाली कहानियां सुनाई जाती हैं। दुष्प्रचार या प्रचार का अस्त्र बनने वाली पत्रकारिता को बचाने के लिए जरूरी है कि पत्रकार तार्किक हों और तथ्यों के आधार पर खबरें लिखें। बस इतना करना ही पत्रकारिता के उद्देश्यों को पूरा कर देगा। जब पत्रकार अपने काम को कैरियर मानने लग जाते हैं तो फिर उन्हें संचालकों के अधिक मुनाफा कमाने वाले सोच की पैरवी करनी पड़ती है। यही एक व्यवसाय है जिसमें आय के तीन स्रोत हैं यदि नैतिकता की लगाम ढीली कर दी जाए तो फिर मुनाफा तो कमाया जा सकता है लेकिन साख नहीं। कई घटनाओं में पत्रकारों ने न्यूज पोर्टल के माध्यम से वैकल्पिकता तलाश ली है। यही वजह है कि आम पाठक का भरोसा भले ही मीडिया संस्थान से डिग रहा हो लेकिन उसकी नजर में पत्रकार आज भी भरोसे का शिलालेख है।

    सवाल जवाब के दौर में वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा ने कहा कि आज की पत्रकारिता के सामने कोई संकट नहीं हैं। मतभिन्नता तो हमेशा से रही है इससे घबराने की कोई जरूरत नहीं है। वक्त के साथ जो चलेगा वही जिंदा रहेगा। आपातकाल के दौरान जिस तरह से पत्रकारिता का दमन किया गया वैसे दुहराव की तो आज कल्पना भी नहीं की जा सकती। पत्रकार यदि तथ्यों की सच्चाई पर टिके रहें तो फिर पत्रकारिता की साख को कोई कमजोर नहीं कर सकेगा।

    स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यानमाला समिति की ओर से सर्वश्री राजेश सिरोठिया, श्री राजीव सोनी, श्री शिवकुमार विवेक, सुश्री अपर्णा दुबे ने अतिथियों को स्मृतिचिन्ह, और तुलसी का पौधा देकर उनका अभिनंदन किया।स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया की धर्मपत्नी श्रीमती कीर्ति देवलिया ने पुण्य आत्मा के स्मरण के लिए सभी आगंतुकों के प्रति भाव प्रवण धन्यवाद ज्ञापित किया। जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा ने स्वर्गीय देवलिया जी के तैल चित्र पर माल्यार्पण किया और उनके कृतित्वों का स्मरण किया। आभार प्रदर्शन वरिष्ठ पत्रकार शिव अनुराग पटैरिया ने किया। आयोजन में शहर के कई गणमान्य अतिथियों ने भी शिरकत की जिनमें डॉक्टर हितेश वाजपेयी, अनिल सौमित्र,राजीव गांधी कालेज के संचालक डॉ.साजिद अली, संजीव शर्मा, राजेश रावत,राकेश भट्ट शामिल थे। आयोजन समिति की ओर से सर्वश्री अशोक मनवानी, डॉअपर्णा एलिया, आशीष देवलिया, अनामिका जोशी, शैलजा आलोक सिंघई ने अतिथियों की आगवानी की। दूरदर्शन के एंकर आदित्य श्रीवास्तव ने कार्यक्रम का संचालन किया।

  • सरकार की धूर्तता उजागर करने का धर्म निभाए प्रेस

    सरकार की धूर्तता उजागर करने का धर्म निभाए प्रेस

    प्रदेश भर के पत्रकार संगठन कल पांच फरवरी को सरकार से अपनी नाराजगी जताने भोपाल में इकट्ठे हो रहे हैं। उनकी नाराजगी की वजह सरकार की ओर से दिए जाने वाले विज्ञापनों में मनमानी कटौती करना है। पूर्व की शिवराज सिंह सरकार को विज्ञापन वाली सरकार बताकर सत्ता में आई कमलनाथ सरकार शुरु से प्रेस विरोधी रही है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की प्रेस के प्रति बदनीयती को देख चुकने के बावजूद ढेरों पत्रकारों ने कांग्रेस को सत्ता में लाने का एजेंडा चलाया था। इन्हीं पत्रकारों ने छिंदवाड़ा मॉडल को प्रदेश के विकास का राजमार्ग बताया था। ये वही पत्रकार थे जो शिवराज सिंह चौहान की सरकार की नालायकियों पर भी वाहवाही कर रहे थे। शिवराज की भाजपा भी उन्हीं पत्रकारों पर लट्टू थी जो अंधाधुंध कर्ज लेकर किए जा रहे विकास को प्रदेश का भविष्य बता रहे थे। हर साल तकरीबन पांच सौ करोड़ रुपए विज्ञापन के नाम पर खर्च करके शिवराज सरकार ने सौजन्य का वातावरण बनाया था। ये पांच सौ करोड़ रुपए प्रदेश के दो लाख दस हजार करोड़ के बजट का बहुत छोटा हिस्सा होता था। ये जानते बूझते कमलनाथ सत्ता में आने के बाद से प्रेस को जूता दिखा रहे हैं। यही वजह है कि पत्रकार उनसे खफा हैं और वे कमलनाथ विहीन सरकार की मांग कर रहे हैं।

    भाजपा को विज्ञापन वाली सरकार बताने वाले कमलनाथ ने भी सत्ता में आने के साल भर में लगभग चार सौ करोड़ रुपए विज्ञापन पर खर्च कर दिए हैं।वित्तीय वर्ष में ये राशि पांच सौ करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी होगी। अपनी इस हिकमत अमली में प्रबंधन की महारथ दिखाते हुए कमलनाथ ने लगभग बारह हजार पत्रकारों का टेंटुआ दबा दिया है। इन पत्रकारों के छोटे छोटे अखबार सरकार की ओर से मिलने वाले लगभग साठ हजार रुपए सालाना के सहारे परिवार चलाते थे और लोकतंत्र की जय जयकार करते थे। इसमें आधी राशि वह थी जो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती थी। लगभग नाममात्र की धनराशि के सहारे ये छोटे पत्रकार लोकतंत्र के नाम पर लूट करने वाले अफसरों और बाबुओं की खैरखबर लेते रहते थे। आज वे सरकार के खिलाफ लामबंद क्यों हैं इस रहस्य को समझना कठिन नहीं है।

    कांग्रेस की राजमाता इंदिरा गांधी ने सरकारीकरण और उद्योगों के राष्ट्रीयकरण को जिस तरह देश का भाग्य विधाता बताया था उसकी पोल खुद कांग्रेसी ही खोल चुके हैं। पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह ने जिस तरह नरसिम्हाराव की सरकार के वित्तमंत्री रहते हुए इस सरकारीकरण से मुक्ति का जो अभियान चलाया वो आज 29 साल बाद भी अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया है।वे कहते थे कि इंस्पेक्टर राज अब कभी नहीं लौटेगा। इसके बावजूद कांग्रेस की भ्रष्ट सरकारें हों या फिर कांग्रेस की पूंछ पकड़ू शिवराज सिंह चौहान जैसी सरकारें कोई भी भ्रष्टाचार के राजमार्ग को छोड़ने तैयार नहीं हैं। कमलनाथ ने तो आपातकाल के दौरान अपनाए गए फार्मूले का इस्तेमाल करके उस इंस्पेक्टर राज की वापिसी कर दी है।

    शिवराज सिंह चौहान की अति लोकप्रिय सरकारों ने कर्ज लेकर विकास के नाम पर पैसा बांटने का जो महारथ हासिल किया था उससे खैरात तो बंटती रही लेकिन विकास का ढांचा तैयार नहीं हो सका। आधारभूत ढांचे के विकास के नाम पर कर्ज लेकर शिवराज सरकार ने ढेरों कल्याणकारी योजनाएं चलाईं जिसकी वजह से लोगों में आज भी शिवराज के प्रति सदाशयता का भाव बना हुआ है। इसके बावजूद आय के आत्मनिर्भर संसाधन नहीं बन सके हैं। भारी बेरोजगारी से जूझ रहे प्रदेश को ये हकीकत अब समझ आ रही है जब कमलनाथ सरकार ने फोकट धन बांटने वाली योजनाएं बंद करना शुरु कर दीं हैं। इसके बावजूद सरकारी तंत्र की आड़ में खजाना उलीचने की परंपराएं आज भी जारी हैं।

    यही वजह है कि कमलनाथ सरकार ने भी सत्ता में आने के बाद खजाना लूटना जारी रखा है। सही मायनों में कमलनाथ सरकार दोहरी लूट कर रही है। सरकारी खजाने को लूटने वालों पर अंकुश लगाने के बजाए उसने तबादलों और पोस्टिंग का जो बेशर्मी भरा नंगा नाच किया उसने खजाने को बुरी तरह क्षतिग्रस्त किया है। हर तबादला भारी भरकम चंदा लेकर ही किया गया। ये अफसर जब नई पोस्टिंग पर गए तो उसका खर्च प्रदेश सरकार को वहन करना पड़ा। कई पदों पर बड़े अफसर तो दो से तीन करोड़ रुपए तक की रिश्वत लेकर गए थे इसलिए उन्होंने नया पद संभालते ही वसूलियां शुरु कर दीं। यही वजह है कि प्रदेश का खजाना तो खाली होता गया पर रिश्वतखोरों की चांदी हो गई। ये सब उस दौर में हुआ है जब कमलनाथ मिलावटखोरों और माफिया के विरुद्ध अभियान चला रहे हैं। अफसरों ने इस आड़ में प्रदेश को भरपूर लूटा क्योंकि वे तो इसके लिए सरकार को चंदा पहले ही दे चुके थे।

    शिवराज सिंह सरकार से सुविधा शुल्क लेने में मगन प्रेस इन सब गड़बड़झाले की रिपोर्ट करने को तैयार नहीं है। वह आज भी सोच रही है कि कमलनाथ कभी तो पसीजेंगे। आखिर उनकी भी पार्टी को चुनाव में जाना है। वे आज नहीं तो कल शिवराज की वही परिपाटी शुरु कर देंगे जिसने प्रेस को सुविधाभोगी बनाकर घरों तक सीमित कर दिया था।

    कमलनाथ की सरकार हर वित्तीय वर्ष में सरकारी अमले के वेतन पर 75 हजार करोड़ रुपए खर्च कर रही है। उसे इस अमले से एक लाख अस्सी हजार करोड़ की आय का अनुमान था।वित्तमंत्री तरुण भानोट ने डींगे हांकते हुए दो लाख दस हजार रुपए खर्च करने का दावा किया था। उनका कहना था कि हम वसूलियां इतनी ज्यादा करेंगे कि विकास के लिए इससे ज्यादा राशि जुटा लेंगे। इसके विपरीत सरकार की बदनीयती के चलते राज्य का खर्च भी नहीं निकल पाया है। उलटे सरकार ने लगभग इक्कीस हजार करोड़ का नया कर्ज ले डाला है। ये कर्ज भी भारी ब्याज पर लिया गया है।

    बैंक डिफाल्टरों से चंदा वसूली के लिए उन्हें सरकारी ठेकों में शामिल करके सरकार और उसके मंत्रियों ने जो चंदा वसूला है उससे वे टाकीज और अस्पताल खरीद रहे हैं। पांच सितारा होटलें बना रहे हैं। उद्योगों में भागीदारी बढ़ा रहे हैं। प्रदेश के लोगों को वे खजाना खाली होने का रोना सुना रहे हैं।

    सरकार के सामने विज्ञापनों का रोना रोने वाले पत्रकार ये पूछने को भी राजी नहीं हैं कि प्रदेश के मालिक कहलाने वालों के पास ऐसी कौन सी जादू की छड़ी है जो उन्होंने हजारों करोड़ रुपयों की दौलत जुटा ली है। उनके बेटे नशे में डूबे रहने के बाद भी हजारों करोड़ रुपयों की संपत्तियों के मालिक बन बैठे हैं। देश की जांच एजेंसियों ने उनके रिश्तेदारों से जो बयान लिए हैं उनमें साफ हो चुका है कि ये दौलत कहां से जुटाई गई है,इसके बावजूद प्रदेश के अखबार आईफा अवार्ड को प्रदेश का भाग्य संवारने का फार्मूला बता रहे हैं। पत्रकारों को चाहिए कि वे दुर्घटना और षड़यंत्रों से आई कमलनाथ सरकार की असलियत प्रदेश की जनता के सामने उजागर करें। जनता का विश्वास जीतें और अपने पैर मजबूत करें। अच्छी पत्रकारिता के लिए इससे अच्छा समय शायद फिर कभी न मिल पाएगा।

  • भारत को कश्मीर पर दो टूक फैसला लेना होगा-जनरल बख्शी

    भारत को कश्मीर पर दो टूक फैसला लेना होगा-जनरल बख्शी

    भोपाल, 10 अप्रैल,(मध्यप्रदेश प्रेस क्लब)। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, जो लोग इस पर दावा करते हैं उन्हें खुली चुनौती है कि वे इसे लेने का प्रयास करके देख लें। भारत सरकार की सहनशील नीति के कारण ही आज तक कश्मीर अशांत है। सरकार को दो टूक फैसला लेना होगा। यदि हम सहते रहेंगे तो कश्मीर के नाम पर लोग हमारे सिर पर बैठने का प्रयास करते रहेंगे। अब समय आ गया है जब कश्मीर की समस्या हमेशा के लिए सुलझा ली जाए और देश में अमन चैन स्थापित किया जाए। सेना के रिटायर्ड मेजर जनरल जीडी बख्शी ने आज पत्रकार वार्ता में ये बात कही। मध्यप्रदेश प्रेस क्लब के रजत जयंती समारोह के अवसर पर आयोजित पत्रकार वार्ता में आज दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक और विख्यात लेखक राजशेखर व्यास ,कंप्यूटर वैज्ञानिक चंद्रकांत राजू ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

    जनरल जी डी बख्शी ने कहा कि भारत विरोधी ताकतें बरसों से देश को खंडित करने का प्रयास करती रहीं हैं। जाति और धर्म के नाम पर देश को विभाजित करके भारत की विकास यात्रा बाधित की गई है। अंग्रेजों ने पहली जातिगत जनगणना वर्ष 1872 में कराई थी। देश को आजाद कराने के लिए 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने देश में जातिवादी वैमनस्य के बीज बोए। आजादी के बाद संविधान के नाम पर कभी जमीनी सच्चाई बताकर जातियों की खाई खोदी जाती रही है। भारत को कमजोर बनाने वाली ताकतें यहां अपनी पकड़ नहीं खोना चाहतीं इसलिए वे तरह तरह के षड़यंत्र कभी आईएसआई कभी वैश्विक संस्थाओं के माध्यम से करती रहती हैं।

    जनरल बख्शी ने कहा कि भारत के करदाताओं से एकत्रित धन से चलने वाले जवाहर लाल नेहरू विवि के हर छात्र पर आठ लाख रुपया हर साल खर्च होता है। इसके बावजूद वहां अफजल हम शर्मिंदा हैं तेरे कातिल जिंदा हैं जैसे नारे लगाने वाली मानसिकता पढ़ाई जाती है। ये अभिव्यक्ति की आजादी नहीं हैं। दुनिया के किसी भी देश में इस तरह के नारे लगाने की इजाजत नहीं है। इसके बावजूद भारत में ही मानवाधिकारों के नाम पर और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश को कमजोर करने की कोशिशें चलती रहती हैं। भारत सरकार को इस अराजकता को रोकना होगा।

    उन्होंने कहा कि भारत की आजादी की लड़ाई में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का योगदान अतुलनीय रहा है। इसके बावजूद पिछली सरकारों ने दिल्ली के प्रमुख स्थानों पर उनकी मूर्तियां नहीं लगाई । देश को बताया गया कि आजादी केवल गांधीजी के प्रयासों से आई जबकि ये सच्चाई नहीं है। आजाद हिंद फौज यदि ब्रिटिश हुकूमत को खुला चैलेंज नहीं देती तो अंग्रेज यहां से नहीं भागते। इसीलिए हम देश में पैन इंडिया मूवमेंट चला रहे हैं। हम देश से आव्हान करते हैं कि आजाद हिंद फौज के गठन के दिन इस बार हम दिल्ली चलो के नारे के साथ राम लीला मैदान में एकत्रित हों। सरकार से मांग करें कि वो जस्टिस मुखर्जी की रिपोर्ट लागू करे। उन्होंने कहा कि हमें भारत सरकार से बहुत सारी उम्मीदें हैं पर अब तक के कार्यकाल में सरकार ने इस दिशा में बहुत प्रयास नहीं किया है। बेशक सरकार के सामने देश को संवारने की काफी सारी चुनौतियां हैं पर देश को कारगर बनाने के लिए हमें कई मूलभूत फैसले लेने होंगे जिससे मौजूदा व्यवस्था को बदला जा सके।

    दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक राजशेखर व्यास ने कहा कि देश को मानसिक गुलामी से मुक्ति के लिए मैंने स्वयं 29 ग्रंथ लिखे हैं ताकि देश की नई पीढ़ी इस विशाल देश का पथ सुनिश्चित कर सके। आजादी के बाद के बरसों में हमें गुलामी की भाषा ही सिखाई जाती रही है। पांच सौ साल मुगलों और दो सौ साल अंग्रेजों की गुलामी से पहले का गौरवशाली इतिहास हमें नहीं बताया गया है। विदेशों से पढ़कर आने वाले भारत के नेताओं का भारतीयता से परिचित न होना इसकी सबसे बड़ी वजह थी। उज्जैन के ही पद्मभूषण पंडित सूर्यनारायण व्यास ने इसीलिए 1928 से उज्जैन में अखिल भारतीय कालिदास समारोह मनाना शुरु किया था।भारत के नेतागण शेख्सपियर की बात तो करते थे लेकिन वे कालिदास को नहीं जानते थे। जबकि तुलनात्मक रूप से महाकवि कालिदास की रचनाएं ऊंचे दर्जे की रहीं हैं।

    उन्होंने कहा कि भारत का दूरदर्शन आज भी देश से गहरा जुड़ाव रखता है। मीडिया के इस मंच की विराटता का अहसास आमतौर पर लोग नहीं लगा पाते हैं जबकि इसके विभिन्न चैनल समाज के हर तबके से सीधा संवाद करते हैं। उन्होंने कहा कि जो आकाशवाणी कभी घाटे का सौदा बना दी गई थी वो अब अपने पैरों पर खडी है। सरकारी मीडिया को निगम बनाने के बाद इस पर सरकार का भोंपू होने के आरोप तो नहीं लगते हैं लेकिन अभी इसकी लोकप्रियता बढ़ाने की बहुत सारी संभावनाएं बाकी हैं। ऊर्जावान लोगों को इससे जोड़कर इस माध्यम का पूरा उपयोग करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

    कंप्यूटर वैज्ञानिक चंद्रकांत राजू ने कहा कि भारत में उपनिवेशीकरण की मानसिकता ने विश्वविद्यालयों को अपने चंगुल में फंसा रखा है। यहां पढ़ने वाले छात्र छात्राएं केवल नौकरी खोजते रहते हैं जबकि वे दुनिया के अन्य देशों में जाकर चमत्कृत करने वाले काम करते हैं। अनुसंधान और पेटेंट के मामले में भारत इसलिए पिछड़ा है कि यहां की पढ़ाई विद्यार्थियों को पिछलग्गू बना देती है। बच्चों को गणित समझ नहीं आती फिर भी इस विषय पर आम चर्चा नहीं होती है। उन्होंने कहा कि भारत की शिक्षा प्रणाली पर देश में खुला संवाद होना चाहिए। हमें वास्तविक शिक्षा की दिशा में बहुत प्रयास करने होंगे।

    श्री राजू ने कहा कि देश को उपनिवेशीकरण की मानसिकता से मुक्ति दिलाने के लिए हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था में आमूल चूल बदलाव करने होंगे। कंप्यूटर जैसे विषय को बोधगम्य बनाने के लिए हमें अपनी पारंपरिक सोच पर अमल करना होगा। कंप्यूटर गणनाओं का सरल हल प्रस्तुत करता है। यदि हम गणनाओं की शैली नहीं बदलेंगे तो कंप्यूटर के चमत्कारों से वंचित रह जाएंगे। शिक्षा पर सार्वजनिक बहस होगी तो एक नए भारत का उदय होगा।

    पत्रकार वार्ता का संचालन मध्यप्रदेश प्रेस क्लब के अध्यक्ष डाक्टर नवीन जोशी ने किया। आभार प्रदर्शन क्लब के महासचिव नितिन वर्मा ने किया। अथितियों का स्वागत वरिष्ठ पत्रकार आलोक सिंघई, प्रसन्ना शहाणे, ब्रजेश द्विवेदी,अरविंद पटेल, अनुवेद नगाइच ने किया। इस अवसर पर प्रेस क्लब के पदाधिकारियों के अलावा मीडिया के प्रतिनिधि गण भी उपस्थित थे।

  • टाईम्स आफ इंडिया की खबर

    टाईम्स आफ इंडिया की खबर

    Congress attacks Shivraj Chouhan

    TNN | Dec 1, 2017, 10:10 IST

    BHOPAL: Launching a scathing attack on chief minister Shivraj Singh Chouhan for failing to curb crimes against women, Congress said he should feel ‘ashamed’ that MP was once again on the top in terms of rape cases in the country as per the National Crime Records Bureau (NCRB) report of 2016 released on Thursday.
    Congress said the chief minister along with his party is busy celebrating completion of 12 years in office.
    Senior Congress leader and Chhindwara MP Kamal Nath tweeted, “Madhya Pradesh shamed again!” Referring to women and minor girls as “sisters and nieces of Mama” (as Chouhan calls himself the brother of all women in the state and maternal uncle of all girls), Nath said they were not vulnerable to attacks anywhere else as in Shivraj Singh Chouhan’s regime in MP. “Once again MP is on top in rape cases. This is the truth of Shivraj rule, which indulges in fake celebration”, Nath said.
    Congress leader and Guna MP Jyotiraditya Scindia in his tweet said “Ground reality of women’s security in MP is extremely shameful. 4,882 rape cases in 2016. Madhya Pradesh is once again on the top in cases of rape.”