Month: September 2026

  • साहित्यकारों को जोड़कर बना राजुरकर का राजः संतोष चौबे

    साहित्यकारों को जोड़कर बना राजुरकर का राजः संतोष चौबे

    विनय उपाध्याय ने अपनी सांस्कृतिक यात्रा से कई हस्तियों को पार पहुंचाया – मनोज श्रीवास्तव

    *वरिष्ठ उद्घोषक विनय उपाध्याय को दिया राजुरकर राज स्मृति सम्मान** भोपाल,27 सितंबर( प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय के राज सदन में आयोजित समारोह में इस वर्ष का राजुरकर राज स्मृति सम्मान वरिष्ठ उद्घोषक एवं संपादक विनय उपाध्याय को प्रदान किया गया। समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार एवं रवींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति संतोष चौबे ने की। मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार मनोज श्रीवास्तव, विशिष्ट अतिथि डॉ. सीमा रायजादा तथा सारस्वत अतिथि अरविंद सोनी उपस्थित रहे।आरंभ में कार्यक्रम की भूमिका संस्थान की सचिव करुणा राजुरकर ने रखी। अंत में आभार प्रदर्शन संग्रहालय के अध्यक्ष रामराव वामनकर ने किया।

    अध्यक्षता करते हुए संतोष चौबे ने कहा कि हिंदी बोलने में बहुत अच्छी लगती है, बस उसे बोलने का तरीका आना चाहिए और यह तरीका विनय उपाध्याय के पास है। उन्होंने कहा कि राजुरकर राज स्वयं उद्घोषक थे, और उन्होंने साहित्यकारों को जोड़कर साथ चलने की परंपरा शुरू की और लेखकों के साथ संवाद कायम किया।

    मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व प्रशासनिक अधिकारी और वरिष्ठ साहित्यकार मनोज श्रीवास्तव ने राजुरकर राज की स्मृति को साझा करते हुए कहा कि वे उद्घोषक तो थे ही, इसके साथ ही वे एक सहज और अहंकार से रहित व्यक्ति थे। और आज जिनको सम्मानित किया गया वे भी नदी के पुल की तरह है, हमेशा बड़ी बड़ी हस्तियों को वैतरणी पार करवाते हैं। उन्होंने हिन्दी को मंच पर लोकप्रिय करने के लिए अपना सर्वस्व दिया।

    विनय उपाध्याय ने नदी के पुल की तरह हमेशा दूसरों को आगे बढ़ाने का काम किया है। उन्होंने हिंदी को मंच पर लोकप्रिय बनाने के लिए अपना सर्वस्व दिया और हजारों सांस्कृतिक कार्यक्रमों को जीवंत किया। उद्घोषणा सांस्कृतिक मध्यस्थता का कार्य है।

    डॉ. सीमा रायजादा ने कहा कि जो लोग समय, संस्कृति और समाज को समझकर काम करते हैं, वे आगे बढ़ते हैं। ऐसे लोग बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी होते हैं।

    सम्मानित विनय उपाध्याय ने कहा कि राजुरकर राज ने एक व्यक्ति नहीं, बल्कि संस्था के रूप में अनेक कार्य किए। साहित्य, कला और संस्कृति के संरक्षण के साथ उन्होंने साहित्यकारों की रचनाओं को भी सहेजा। दुष्यंत कुमार संग्रहालय इसका उदाहरण है। उन्होंने वाद-विवाद से बचते हुए संतुलन के साथ अपने कार्य को आगे बढ़ाया।सम्मान के रूप में प्राप्त ग्यारह हजार रुपए की राशि उन्होंने संग्रहालय के विकास कार्यों के लिए ससम्मान वापस कर दी।

    वरिष्ठ साहित्यकार विजय कुमार देव ने राजुरकर राज के साथ अपने संस्मरण साझा किए। अरविंद सोनी ने आकाशवाणी भोपाल में उनके साथ कार्य करने का स्मरण करते हुए कहा कि वे अपने कर्तव्य के प्रति सदैव गंभीर रहते थे और लेखन को निरंतर बनाए रखा।

    कार्यक्रम का संचालन विशाखा राजुरकर राज ने किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में साहित्यकार, लेखक और पत्रकार उपस्थित थे।

  • नया भोपाल बनाने का मसौदा जारी

    नया भोपाल बनाने का मसौदा जारी


    मास्टर प्लान पर नागरिकों से सुझाव आमंत्रित

    भोपाल 26 सितंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि श्री गणेश अनंत चतुर्दशी के पावन अवसर पर एक लंबे अंतराल के बाद भोपाल विकास योजना-2047 (मास्टर प्लान) के प्रारूप (ड्रॉफ्ट) का प्रकाशन कर दिया गया है।मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि कैपिटल सिटी की यह विकास योजना (मास्टर प्लान) भोपाल की प्राकृतिक धरोहर- भोजताल, वन क्षेत्रों एवं बाघ भ्रमण क्षेत्र के संरक्षण के साथ नागरिकों को बेहतर सुविधाएं, सुगम मोबिलिटी और आर्थिक विकास के अवसर उपलब्ध कराने की दृष्टि से तैयार की गई है। इस विकास योजना में हरित टीडीआर का बेहतर प्रावधान किया गया है, इससे हरित क्षेत्र में आने वाली भूमि के स्वामियों की क्षतिपूर्ति के साथ विकासकर्ताओं को टीडीआर के जरिए अतिरिक्त विकास की सुविधा भी मिल सकेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि समृद्ध, सुगम, सुरक्षित और विकसित भोपाल के संकल्प की दिशा में यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने कहा कि भोपाल विकास योजना के प्रकाशित प्रारूप पर नागरिकगण अपनी आपत्ति एवं सुझाव दे सकते हैं।

    भोपाल मास्टर प्लान ड्रॉफ्ट के हैं चार प्रमुख स्तंभ

    प्रकाशित भोपाल मास्टर प्लान का ड्रॉफ्ट सतत् विकास, समावेशी शहर और समृद्ध भविष्य की संकल्पना से अभिप्रेरित है। इसकी कोर थीम हरित भोपाल, समृद्ध भोपाल और विकसित भोपाल रखी गई है। इस मास्टर प्लान ड्रॉफ्ट के चार प्रमुख आधार स्तंभ रखे गए हैं। इसमें पहला प्राकृतिक पारिस्थितिकीय तंत्र के संरक्षण को प्राथमिकता दी गई है। इसके बाद दूसरा आधुनिक दृष्टिकोण एवं नागरिक हितैषी नियोजन पर बल दिया गया है। तीसरा सुधारोन्मुख एवं परिवर्तनकारी नियोजन को भी केन्द्रीय लक्ष्य (कोर टारगेट) में रखा गया है। चौथा इस मास्टर प्लान को आत्मनिर्भर एवं आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने वाले सतत् विकास की अवधारणा पर केन्द्रित किया गया है।

    भोपाल मास्टर प्लान ड्रॉफ्ट की प्रमुख विशेषताएं

    • प्राकृतिक संवेदनशीलता सम्मत नियोजन इस मास्टर प्लान की प्रमुख विशेषता है।
    • आर्थिक विकास एवं रोजगार सृजन सम्बन्धी प्रस्ताव।
    • महानगरीय अवधारणा के अनुरूप प्रस्ताव।
    • ग्रोथ कॉरिडोर के माध्यम से शहर का आर्थिक विकास।
    • राज्य की टीओडी नीति के अनुरूप मिश्रित भूमि उपयोग का प्रस्ताव।
    • असीमित एफएआर एवं भवन ऊंचाई।
    • विकास मापदंडों का सरलीकरण एवं युक्तियुक्तकरण।
    • मास्टर प्लान ड्रॉफ्ट में शहर के हरित क्षेत्र को 16 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया गया है।
    • विकास योजना के क्रियान्वयन के लिए पूंजी संग्रहण की समुचित व्यवस्था।
    • क्रिएटिव री-डेवलपमेंट के माध्यम से पुनर्विकास।
    • अफोर्डेबल हाउसिंग को प्रोत्साहन दिया गया है।
    • हरित टीडीआर के प्रावधान भी किए गए हैं।
    • मास्टर प्लान के क्रियान्वयन का प्रभावी पर्यवेक्षण भी सुनिश्चित किया गया है।
    • मास्टर प्लान ड्रॉफ्ट में सुरक्षित शहर (सेफ सिटी) के सभी प्रावधान भी किए गए हैं।
    • पार्किंग प्रोत्साहन संबंधी प्रावधान भी किए गए हैं।
    • निजी विकासकर्ताओं द्वारा विकास योजना की मांगों का क्रियान्वयन भी तय किया गया है।
    • मास्टर प्लान ड्रॉफ्ट में भोपाल को इकाई सिटी (EKAI – एज्युकेशन, नॉलेज एंड आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस सिटी) के रूप में डेवलप करने के लिए भी समुचित प्रस्ताव/प्रविधान किए गए हैं।
  • यौन आरोपी प्रकाश चंद्र गुप्ता की साजिश बेनकाब, पीड़िता को न्याय के लिए समन जारी

    यौन आरोपी प्रकाश चंद्र गुप्ता की साजिश बेनकाब, पीड़िता को न्याय के लिए समन जारी

    भोपाल, 22 सितंबर (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। बूटकॉम सिस्टम्स के प्रोप्राईटर प्रकाश चंद्र गुप्ता के खिलाफ नाबालिग से कथित यौन छेड़छाड़ के पॉक्सो प्रकरण में सुनवाई आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है। विशेष पॉक्सो न्यायालय ने आरोपी की ओर से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 91 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 94 के तहत प्रस्तुत आवेदन खारिज कर अभियोजन साक्ष्य के लिए समन जारी किए हैं। अदालत के इस आदेश से करीब चार साल पुराने मामले में पीड़िता के बयान दर्ज होने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

    इस मामले में नाबालिग पीड़िता ने अपने परिवार के साथ जाकर गुप्ता के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। मार्च 2024 से मामले में पीड़िता के बयान दर्ज नहीं हो पाए हैं। आरोपी के वकील हरीश मेहता की ओर से यह तर्क दिया जाता रहा कि प्रकरण के मूल दस्तावेज पुलिस के पास हैं और उनके उपलब्ध होने के बाद ही आगे की कार्रवाई होनी चाहिए। अदालत ने इस आधार को स्वीकार नहीं किया।

    गुप्ता की ओर से यह भी दावा किया गया था कि पीड़िता के परिवार के साथ आर्थिक लेनदेन हुआ था और इसी विवाद के कारण उसके खिलाफ शिकायत की गई।इसमें उसने पीड़िता के पिता के फर्जी हस्ताक्षरों वाला एक दस्तावेज प्रस्तुत किया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी आपराधिक मामले की विवेचना और विचारण को किसी अलग सिविल विवाद के आधार पर रोका नहीं जा सकता। आर्थिक लेनदेन का विवाद है तो उसके लिए अलग कानूनी प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।

    प्रेस इंफार्मेशन सेंटर की उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार  गुप्ता के खिलाफ इससे पहले भी आर्थिक धोखाधड़ी से जुड़े मामले सामने आ चुके हैं। भोपाल के एक चर्चित व्यापारी परिवार को झांसा देकर गुप्ता ने लगभग चार करोड़ रुपयों की ठगी की थी जिसमें उसे जेल भेजा गया था। वर्ष 2024 में केनरा बैंक की कोहेफिजा शाखा से जुड़े एक अन्य मामले में 2.21 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी के आरोप में गुप्ता को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। वर्ष 2006-07 के पंजाब नेशनल बैंक से जुड़े 32 लाख रुपये के पुराने मामले का भी उल्लेख उपलब्ध रिपोर्टों में है।

    हालांकि इन पुराने मामलों में लगाए गए आरोपों और वर्तमान पॉक्सो प्रकरण का अंतिम निर्णय संबंधित अदालतों द्वारा ही किया जाना है। वर्तमान मामले में अदालत का ताजा आदेश फिलहाल इतना स्पष्ट करता है कि दस्तावेजों और दूसरे विवादों के आधार पर कार्यवाही को लंबा खींचने की कोशिश स्वीकार नहीं की जाएंगी और अब अभियोजन साक्ष्य की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।   ये मामला लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 के विशेष न्यायाधीश की कोर्ट में विचारण के लिए चल रहा है। आरोपी का प्रयास है कि बालिका के बयान अदालत के समक्ष दर्ज न हो पाएं इसके लिए वह तरह तरह के आरोप लगाकर अदालत को गुमराह कर रहा है।

    दरअसल आदतन अपराधी  प्रकाश चंद्र गुप्ता हुंडी का धंधा दिखाकर हवाला का कारोबार करता है। दुनिया की आंखों में धूल झोंकने के लिए यह भोपाल के एमपीनगर में बूटकाम सिस्टम नाम से कंप्यूटर की दूकान चलाता है। कंप्यूटर व्यवसाय में ठगी से लेकर इसके विरुद्ध ज्यादा ब्याज दिलाने का वादा करके रकम हड़पने के कई मामले एमपीनगर पुलिस थाने में और अन्य जगहों व शहरों में लंबित हैं। पुलिस के पास गुप्ता का पिछले 25 सालों का रिकार्ड है जिसमें उसने आम नागरिकों के अलावा कई प्रतिष्ठित लोगों से अरबों रुपयों की ठगी और धोखाधड़ी की है। उसके विरुद्ध महिलाओं के विरुद्ध किए गए अपराधों की भी लंबी फेरहिस्त है।

  • सौरभ शर्मा से जब्त गोल्ड और भूपेन्द्र सिंह का जहरीली शराब कांड से क्या रिश्ता

    सौरभ शर्मा से जब्त गोल्ड और भूपेन्द्र सिंह का जहरीली शराब कांड से क्या रिश्ता

    भोपाल, 21 सितंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। सागर के बंडा-शाहगढ़ इलाके में जहरीली और नकली शराब से हुई मौतों ने मध्यप्रदेश में अवैध शराब के कारोबार और उसके पीछे काम करने वाले पूरे तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है। शुरुआती तौर पर मामला कुछ गांवों में बिक रही जहरीली शराब का लगा था, लेकिन पुलिस की जांच आगे बढ़ने के साथ इसकी कड़ियां अंतरराज्यीय शराब तस्करी, स्पिरिट की आपूर्ति, नकली बोतल-लेबल और लाइसेंसी शराब दुकान तक पहुंच गईं। 19 सितंबर तक पुलिस ने 52 लोगों को आरोपी बनाया और 37 गिरफ्तारियां होने की जानकारी सामने आई। मौतों की संख्या 30 से अधिक बताई गई है, हालांकि सरकारी रिकॉर्ड और स्थानीय आंकड़ों में अंतर है।

    जहरीली शराब कांड उजागर होने के बाद राजनीतिक हलकों में तरह तरह के कयास लगाए जाने लगे हैं। भोपाल में सौरभ शर्मा से जब्त 52 किलोग्राम सोना (गोल्ड) और लगभग 10 से 11 करोड़ रुपये नकद बरामद होने के मामले को इस शराब कांड से जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीति के गलियारों में चर्चा है कि भूपेन्द्र सिंह और खाद्य मंत्री गोविंद राजपूत के बीच पारंपरिक अदावट शराब कांड के रूप में सामने आई है।

    पुलिस की पूछताछ में सामने आई कहानी इस मामले को और गंभीर बनाती है। जांच के अनुसार बरेठी शराब दुकान से जुड़े लाइसेंसी मनीष लोधी का संपर्क उत्तर प्रदेश के शराब तस्कर रवि लखेरा से था। आरोप है कि इसी नेटवर्क ने नकली शराब बनाने की तकनीक और कच्चा माल उपलब्ध कराया। चंदू राजपूत के मक्के के खेत में स्पिरिट, खाली बोतल, नकली रैपर और पैकिंग सामग्री के सहारे करीब 50 पेटी नकली शराब तैयार किए जाने की जानकारी जांच में सामने आई। शराब को ‘सागर गोल्ड’ जैसे असली ब्रांड की शक्ल में बाजार तक पहुंचाया गया। पुलिस ने अलग-अलग स्थानों से शराब के साथ खाली क्वार्टर, ढक्कन, लेबल, पैकिंग सामग्री और शराब बनाने के उपकरण भी जब्त किए। रवि लखेरा के खिलाफ करीब 25 और मनीष लोधी के खिलाफ 11 आपराधिक मामले दर्ज होने की जानकारी पुलिस रिकॉर्ड के हवाले से सामने आई है।

    मामले की एक महत्वपूर्ण कड़ी आबकारी आयुक्त दीपक सक्सेना का वो बयान है,जिसमें  उन्होंने बताया कि जब्त शराब का स्टॉक बरेठी के एक शराब ठेकेदार से खरीदा गया था। संबंधित खेप की जांच कर यह पता लगाने के निर्देश दिए गए कि वह कहां-कहां पहुंची और बाजार से उसे वापस मंगाने को कहा गया। इससे यह सवाल भी सामने आया कि यदि किसी लाइसेंसी दुकान से खरीदी गई शराब नकली नेटवर्क तक पहुंच रही थी तो निगरानी व्यवस्था कहां विफल हुई।

    घटना के बाद आबकारी विभाग की भूमिका पर सरकार ने तत्काल कार्रवाई की। सहायक आबकारी आयुक्त कीर्ति दुबे, सहायक जिला आबकारी अधिकारी दिलीप खंडाते और बंडा की आबकारी उप निरीक्षक रोशनी उरेती को निलंबित किया गया, जबकि उपायुक्त एवं संभागीय उड़नदस्ता प्रभारी नीरजा श्रीवास्तव को ग्वालियर मुख्यालय अटैच किया गया। बाद में सागर में लंबे समय से पदस्थ सहायक जिला आबकारी अधिकारी मंजूषा सोनी को भी उनकी वर्तमान जिम्मेदारी से हटाया गया। घटना के बाद आबकारी आयुक्त ने प्रदेशभर में अवैध और जहरीली शराब के खिलाफ सर्चिंग तेज करने के निर्देश दिए। ग्वालियर में कार्रवाई के दौरान करीब 2300 लीटर एथेनॉल भी बरामद किया गया।

    पुलिस स्तर पर बंडा थाना प्रभारी राजेंद्र सिंह कुशवाहा और चौकी प्रभारी को निलंबित किया गया। प्रभावित क्षेत्र की छह शराब दुकानें सील कर उनके नमूने जांच के लिए भेजे गए। पुलिस कार्रवाई के साथ यह भी जांच शुरू हुई कि अवैध शराब की सूचना पहले से किस-किस स्तर पर थी और उसके बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई। गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ में नेटवर्क के दूसरे लोगों की भूमिका खोजी जा रही है। फरार प्रमुख आरोपियों की गिरफ्तारी पर इनाम घोषित किया गया है।

    स्वास्थ्य विभाग की भूमिका इस मामले में उपचार और बीमारी की पहचान तक सीमित दिखाई दी, लेकिन शुरुआती व्यवस्था की गति पर सवाल भी उठे। बड़ी संख्या में मरीजों को बंडा और सागर के अस्पतालों में भर्ती कराया गया। गंभीर मरीजों को बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज भेजा गया और कुछ को बेहतर उपचार के लिए बाहर भेजने की व्यवस्था की गई। उप मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल ने बीएमसी पहुंचकर मरीजों का हाल जाना और 24 घंटे विशेषज्ञ डॉक्टरों तथा जरूरी दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। प्रभावित गांवों में स्वास्थ्य दल भेजे गए। जहरीली शराब से आंखों पर पड़े प्रभाव की जांच के लिए बाद में स्वास्थ्य शिविर भी लगाए गए।

    सरकार ने मामले को केवल विभागीय कार्रवाई तक नहीं रखा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने न्यायिक जांच के आदेश दिए और सेवानिवृत्त हाईकोर्ट न्यायाधीश विष्णु प्रताप सिंह चौहान की अध्यक्षता में आयोग गठित किया गया। सागर संभाग में प्रशासनिक और पुलिस स्तर पर भी बदलाव किए गए। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को नीचे से ऊपर तक जिम्मेदारी की जांच करने और लापरवाही मिलने पर कार्रवाई के निर्देश दिए।

    राजनीतिक संरक्षण का आरोप इस मामले का सबसे संवेदनशील हिस्सा है। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि शराब कारोबार को राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण के बिना इतने बड़े स्तर पर चलाना संभव नहीं था।अभी तक उपलब्ध रिपोर्टों में पूर्व मंत्री भूपेंद्र सिंह के खिलाफ सागर के इस जहरीली शराब कांड में संरक्षण देने का कोई पुलिस या न्यायिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है।

    भूपेंद्र सिंह का नाम इसलिए चर्चा में आया क्योंकि अगस्त 2025 में उनके सगे भतीजे रुद्र प्रताप सिंह के बामोरा स्थित फार्म हाउस से करीब 11.79 लाख रुपये की अवैध शराब बरामद हुई थी। आबकारी अधिनियम के तहत मामला दर्ज होने के बाद भूपेंद्र सिंह ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से सार्वजनिक सूचना जारी कर कहा था कि उनके निकट परिवार के बाहर के रिश्तेदारों के कारोबार से उनका कोई संबंध नहीं है। हालांकि उनके इस वक्तव्य का असर बूमरेंग की तरह उलटा हुआ और जनता के बीच भूपेन्द्र सिंह संदेह की नजर से देखे जाने लगे।

    अब सागर शराब कांड के बाद विपक्ष इसी पुराने घटनाक्रम को जोड़कर सवाल उठा रहा है कि प्रभावशाली लोगों से जुड़े शराब कारोबार पर प्रशासन की निगरानी कितनी प्रभावी रही। असली सवाल न्यायिक जांच के सामने यह है कि क्या स्थानीय शराब कारोबारियों, लाइसेंसी दुकानों, तस्करों और अधिकारियों के बीच ऐसा कोई संरक्षण तंत्र था जिसने अवैध कारोबार को लंबे समय तक चलने दिया।

    सागर कांड की सबसे बड़ी अंतर्कथा यही है कि खेत में नकली शराब बनाने वाले कुछ लोगों की गिरफ्तारी से मामला खत्म नहीं होगा। यदि स्पिरिट दिल्ली से, बोतलें और पैकिंग सामग्री दूसरे शहरों से और तस्करी दूसरे राज्यों से जुड़ी थी तो स्थानीय स्तर पर इसकी निगरानी करने वाले तंत्र को इसकी भनक क्यों नहीं लगी। आबकारी आयुक्त की ओर से संबंधित खेप को वापस मंगाने का निर्देश और बाद में सामने आया बड़ा नेटवर्क बताता है कि जांच को केवल जहरीली शराब बनाने वालों तक सीमित रखने के बजाय सप्लाई चेन और उसकी निगरानी करने वालों तक ले जाना होगा। न्यायिक जांच अब यह तय करेगी कि मौतों के लिए केवल शराब बनाने और बेचने वाले जिम्मेदार थे या प्रशासनिक लापरवाही की भी कोई प्रमाणित भूमिका थी।

  • स्वामित्व योजना लागू होगी,नहीं फंसेंगे पटवारी

    स्वामित्व योजना लागू होगी,नहीं फंसेंगे पटवारी

    भोपाल, 18 सितंबर (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्यप्रदेश के गांवों की आबादी भूमि पर रह रहे परिवारों को मालिकाना हक देने के लिए शुरू की गई स्वामित्व अधिकार अभिलेख निष्पादन एवं पंजीयन योजना-2026 को पटवारियों के एक वर्ग के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन 17 सितंबर से शुरू हुए अभियान के तहत करीब 50 लाख ग्रामीण संपत्तियों की नि:शुल्क रजिस्ट्री की जानी है।

    पटवारियों की मुख्य आपत्ति रजिस्ट्री के दस्तावेज में उन्हें निष्पादन अधिकारी बनाए जाने को लेकर है। उनका कहना है कि स्वामित्व योजना में ड्रोन सर्वे, सीमांकन और सत्यापन के बाद ग्रामीणों के नाम सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज किए जा चुके हैं। अब उन्हीं संपत्तियों की रजिस्ट्री में उनके ई-सिग्नेचर कराए जा रहे हैं। भविष्य में संपत्ति को लेकर परिवारों या पड़ोसियों के बीच विवाद हुआ तो दस्तावेज तैयार करने वाले पटवारी को भी विवाद में पक्षकार बनाया जा सकता है। पटवारियों का सवाल है कि जब विवाद का फैसला करने का अधिकार उनके पास नहीं है तो इसकी जिम्मेदारी भी उन्हें क्यों दी जा रही है।प्रदेश के विभिन्न स्थानों से पटवारियों ने इस आशय के ज्ञापन स्थानीय प्रशासन को दिए हैं। दमोह में मध्यप्रदेश राजस्व कर्मचारी कल्याण संघ की जिला शाखा की ओर से कलेक्टर को दिए ज्ञापन में कहा गया है कि हम कानूनी पेचीदगियों का सामना करने को राजी नहीं हैं।

    प्रदेश के कई जिलों में पटवारी संगठनों ने प्रशासन को ज्ञापन देकर इस व्यवस्था में बदलाव की मांग की है। कुछ स्थानों पर काम प्रभावित होने की खबरें भी सामने आई हैं। उनका कहना है कि वे ग्रामीणों को मालिकाना हक देने के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि अपनी व्यक्तिगत कानूनी जवाबदेही को लेकर चिंतित हैं।

    राज्य सरकार का तर्क है कि यह सामान्य जमीन की खरीद-बिक्री की रजिस्ट्री नहीं है। स्वामित्व योजना के तहत सर्वे और सत्यापन के बाद तैयार अधिकार अभिलेखों का पंजीयन किया जा रहा है। जून में राज्य मंत्रिमंडल ने इसके लिए योजना को मंजूरी दी थी। रजिस्ट्री पर लगने वाली स्टांप ड्यूटी और पंजीयन शुल्क भी सरकार वहन कर रही है। इसका उद्देश्य ग्रामीणों को ऐसा वैध दस्तावेज देना है, जिसका उपयोग बैंक ऋण और दूसरी आर्थिक जरूरतों के लिए किया जा सके।

    केंद्र सरकार की स्वामित्व योजना में ड्रोन तकनीक से आबादी भूमि का सर्वे कर नक्शे और अधिकार अभिलेख तैयार किए जाते हैं। इसके बाद राज्यों को जमीनी सत्यापन और संपत्ति कार्ड उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी दी गई है। मध्यप्रदेश इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाकर अधिकार अभिलेखों का पंजीयन कर रहा है।

    पटवारियों की आपत्ति का मामला 15 सितंबर की कैबिनेट बैठक में भी उठा। प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सामने यह मुद्दा रखा। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को पटवारियों की चिंता दूर करने और कलेक्टरों को उन्हें समझाने के निर्देश दिए। सरकार का कहना है कि भविष्य में संपत्ति को लेकर विवाद होने पर पटवारी को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं माना जाएगा।

    मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल ने भी अधिकारियों को पंचायत स्तर पर शिविर लगाकर तेजी से रजिस्ट्रियां पूरी करने के निर्देश दिए हैं। अधिकारियों को प्रतिदिन 30 से 40 रजिस्ट्रियां करने का लक्ष्य दिया गया है।

    अब विवाद का समाधान केवल मौखिक आश्वासन से नहीं, बल्कि लिखित रूप से जिम्मेदारियां स्पष्ट करने से होगा। सरकार को यह बताना होगा कि अधिकार अभिलेख में दर्ज जानकारी की जिम्मेदारी किस स्तर की है, निष्पादन अधिकारी के रूप में पटवारी की भूमिका कितनी सीमित है और भविष्य में विवाद होने पर उसकी व्यक्तिगत जवाबदेही किस सीमा तक होगी। यह स्पष्ट होने पर एक ओर ग्रामीणों को संपत्ति का कानूनी दस्तावेज मिल सकेगा और दूसरी ओर मैदानी कर्मचारियों की आशंका भी दूर हो सकती है।

  • रामजी महाजन की 27वीं पुण्यतिथि पर 77 समाजसेवियों का सम्मान

    रामजी महाजन की 27वीं पुण्यतिथि पर 77 समाजसेवियों का सम्मान

    भोपाल 12 सितंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर) संयुक्त माली सैनी मरार समाज भोपाल ने युगपुरुष रामजी महाजन की 27वीं पुण्यतिथि के अवसर पर प्रदेश स्तरीय पिछड़ा वर्ग सम्मान दिवस समारोह महात्मा फुले भवन अरेरा कॉलोनी भोपाल में आयोजित किया ।
    कार्यक्रम में समाज के विभिन्न जिलों से आए 77 समाजसेवियों जिनमें डॉक्टर, इंजीनियर, अधिवक्ता, शिक्षक एवं वैज्ञानिक सम्मिलित रहे।

    कार्यक्रम में आए प्रमुख अतिथियों में श्री विश्वास कैलाश सारंग मंत्री मध्य प्रदेश शासन, श्रीमती मालती राय महापौर नगर निगम भोपाल, श्री भगवान दास सबनानी विधायक दक्षिण पश्चिम भोपाल, श्री पी सी शर्मा पूर्व मंत्री मध्य प्रदेश शासन, श्री अनोखी पटेल अध्यक्ष जिला कांग्रेस कमेटी भोपाल (ग्रामीण), रामनारायण चौहान, जगदीश सैनी, हरि सिंह सैनी सरपंच, राजेंद्र सैनी, राजेश चौहान, गीता प्रसाद माली पार्षद, डॉ प्रेमलता सैनी, श्रीमती शांति माली, डॉक्टर छाया सैनी, भूपेंद्र माली, बबलू सैनी, दिनेश सैनी, अजय सैनी, जगदीश सोलंकी, रामचरण माने, मधु अम्बाड़कर एवं समाज के गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। अतिथियों ने मासिक महात्मा फुले दर्शन पत्रिका विशेषांक का विमोचन किया।

    भोपाल के सबसे लोकप्रिय और सफल प्रशासक जीपी माली माली ने समाजसेवियों को एकजुट किया.


    कार्यक्रम की अध्यक्षता जी पी माली अध्यक्ष एवं पूर्व अपर कलेक्टर द्वारा की गई श्री जी पी माली द्वारा सामाजिक बंधुओ से रामजी महाजन के आदर्श एवं समाज की एक जुटता पर चलने का आह्वान किया। समाज द्वारा यह भी निश्चय किया गया कि प्रदेश स्तरीय दूसरा महिला सम्मेलन शीघ्र ही किया जाएगा।संचालन राजेंद्र अम्बाडकर एवं घनश्याम राहुल द्वारा किया गया

  • बागी पानसिंह तोमर का एनकाऊंटर करने वाले विजय रमन को खाकी वर्दी का योद्धा बताने वाली पुस्तक का विमोचन

    बागी पानसिंह तोमर का एनकाऊंटर करने वाले विजय रमन को खाकी वर्दी का योद्धा बताने वाली पुस्तक का विमोचन

     

    डीजीपी श्री कैलाश मकवाना बोले पुलिस का काम टारगेट पूरा करना

    भोपाल, 12 सितंबर,(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।चंबल के बागी पानसिंह तोमर का एनकाउंटर करने वाले स्वर्गीय विजय रमन के जीवन और व्यक्तित्व को संवारने वाली पुस्तक खाकी वर्दी का योद्धा के हिंदी संस्करण का लोकार्पण आज भोपाल में किया गया। आईपीएस अधिकारी स्व. विजय रमन के जीवन, कार्यशैली, साहस और अनुभवों पर आधारित इस पुस्तक का विमोचन समारोह शनिवार को दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय, भोपाल में संपन्न हुआ।

    समारोह में मध्यप्रदेश के डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस कैलाश मकवाना मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने कहा कि स्व. विजय रमन के साहस, नेतृत्व क्षमता, बुद्धिमत्ता और पुलिस सेवा में उनके उल्लेखनीय योगदान को हमेशा याद किया जाएगा।उन्होंने कहा कि पुलिस को जिन सामाजिक लक्ष्यों को पूरा करने की जवाबदारी दी जाती है कुशल अधिकारी उन्हें पूरा करते हैं। चंबल क्षेत्र में कुख्यात दस्यु पान सिंह तोमर और उसके गिरोह के खिलाफ चलाए गए अभियान में श्री रमन की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने बताया कि स्व. विजय रमन ने कुख्यात आतंकवादी गाज़ी बाबा के खिलाफ अभियान का भी नेतृत्व किया था।

    कार्यक्रम में स्व. विजय रमन की पत्नी श्रीमती वीना रमन तथा वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक गिरिजा शंकर विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। पब्लिक रिलेशंस सोसायटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनोज द्विवेदी ने अतिथियों का स्वागत किया। मंच का संचालन स्व. विजय रमन की पुत्रवधू श्रीमती दिव्या रमन ने किया। इसके साथ ही पूर्व पुलिस महानिदेशक एस.के. राउत तथा आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. रश्मि झा ने मंच से संबोधित किया।पूर्व पुलिस महानिदेशक सुरेन्द्र सिंह और पूर्व मंत्री आईपीएस रुस्तम सिंह जी भी कार्यक्रम में शामिल हुए।

    इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि स्व. श्री विजय रमन ने चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी कानून और कर्तव्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उनकी साहसिक कार्यशैली, निर्णय क्षमता और कर्तव्यनिष्ठा पुलिस सेवा से जुड़े अधिकारियों एवं नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है।

    वर्ष 2023 में उनके निधन के बाद प्रकाशित ‘खाकी वर्दी का योद्धा’ उनके जीवन, संघर्ष, अनुभवों और पुलिस सेवा में दिए गए योगदान को संजोने का महत्वपूर्ण प्रयास है। पुस्तक के माध्यम से स्व. विजय रमन की प्रेरणादायी यात्रा और उनकी कार्यशैली को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है।

  • राज्य के बैंकिंग सुधार राष्ट्र आराधना का पड़ावःभगवानदास सबनानी

    राज्य के बैंकिंग सुधार राष्ट्र आराधना का पड़ावःभगवानदास सबनानी

    भोपाल, 10 सितंबर (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।  भोपाल दक्षिण पश्चिम विधानसभा क्षेत्र के विधायक और भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश महामंत्री (State General Secretary) भगवानदास सबनानी ने कहा है कि राज्य सरकार के बैंकिंग सुधार राष्ट्र आराधना के संकल्पों का एक अभिनव पड़ाव है।सरकार ने कड़ी स्पर्धा में जन हितैषी बैंकिग देने वाले संस्थानों से कारोबार करके उत्कृष्ट बैंकिंग परंपरा को बढ़ावा दिया है।वे आज इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक के बैंकिंग क्षेत्र में दस वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित ग्राहक मिलन कार्यक्रम में शामिल हुए थे। भोपाल के एमपी नगर स्थित शाखा में आयोजित समारोह में बैंक की दस वर्ष की यात्रा और भविष्य की योजनाओं पर चर्चा हुई। इस अवसर पर भोपाल मध्यप्रदेश फार्मेसी काउंसिल के चेयरमैन संजय जैन ने भी केक काटकर समारोह की गरिमा बढ़ाई।

    श्री सबनानी ने कहा कि राज्य शासन की सजग निगाहों ने बैंकिंग के क्षेत्र में जो फैसले लिए हैं  उनका दूरगामी असर होगा। निगम मंडलों और सरकारी संस्थानों की आय बढ़ाने में इक्विटास बैंक अवश्य सार्थक भूमिका निभाएगा। भोपाल में आयोजित कार्यक्रम में बैंक के क्षेत्रीय प्रबंधक अमित देशपांडे,बैंक भोपाल संभाग प्रमुख मनीष मरदवार और शाखा प्रबंधक लोकेश जैन सहित अधिकारी ,कर्मचारी और प्रतिष्ठित ग्राहकगण भी मौजूद रहे।

    मध्यप्रदेश फार्मेसी काऊंसिल के चेयरमेन संजय जैन ने केक काटकर बैंक कर्मियों को बधाई दी।

    कार्यक्रम में शामिल मध्यप्रदेश फार्मेसी काऊंसिल के चेयरमेन संजय जैन ने कहा कि जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को संबल प्रदान करने के लिए राज्य सरकार ने गुणवत्तापूर्ण सेवाएं देने वाले बैंकों को जवाबदारियां दी हैं। इक्विटास बैंक अपने कुशल माईक्रोफायनेंस और ‘कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व’ की स्वस्थ परंपरा के लिए जाना जाता है। रिजर्व बैंक के कठोर मापदंडों पर खरा उतरने की वजह से सरकार के वित्त विभाग ने उसे अपना सहयोगी संस्थान बनाया है। बैंकिंग करते हुए मात्र एक दशक में बैंक ने जो स्थान हासिल किया है वह प्रशंसनीय है।

    इक्विटास की बैंकिंग यात्रा छोटे वित्त बैंक के रूप में शुरू हुई थी। पिछले दस वर्षों में बैंक ने देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी पहुंच बढ़ाई है। बचत खाते, जमा योजनाएं, ऋण और डिजिटल बैंकिंग जैसी सेवाओं के माध्यम से बैंक ने छोटे कारोबारियों, उद्यमियों और आम ग्राहकों तक पहुंच बनाने पर जोर दिया है। बैंक प्रबंधन के अनुसार आने वाले समय में तकनीक आधारित सेवाओं के साथ ग्राहक अनुभव को और बेहतर बनाने पर ध्यान दिया जाएगा।

    दसवीं वर्षगांठ के अवसर पर चेन्नई में बैंक के नए मुख्यालय इक्विटास टावर्स का उद्घाटन भी किया गया। अन्ना सलाई स्थित नए कॉरपोरेट कार्यालय का उद्घाटन भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर और मद्रास स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के चेयरमैन डॉ. सी. रंगराजन ने किया। समारोह में IRDAI के पूर्व चेयरमैन और इक्विटास होल्डिंग्स के पूर्व चेयरमैन एन. रंगाचारी, मुरुगप्पा ग्रुप के पूर्व चेयरमैन एम.ए. अलगप्पन तथा Aptus Value Housing Finance India के संस्थापक और कार्यकारी चेयरमैन एम. अनंदन विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। बैंक के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी पी.एन. वासुदेवन तथा चेयरमैन अनिल कुमार शर्मा ने भी कार्यक्रम को संबोधित किया।

    नए मुख्यालय का उद्घाटन बैंक की दस वर्ष की यात्रा में महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। नए भवन में एक हजार से अधिक कर्मचारियों के काम करने की क्षमता है। बैंक प्रबंधन ने इसे संगठन के अगले चरण के विस्तार, बेहतर कार्यप्रणाली और कर्मचारियों के बीच सहयोग बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है। समारोह में ‘व्हेन ऑर्गनाइजेशंस विन’ पुस्तक का विमोचन भी किया गया, जिसमें नेतृत्व, संगठनात्मक संस्कृति और बेहतर प्रशासन से जुड़े विषयों पर विचार प्रस्तुत किए गए।

    भोपाल में आयोजित समारोह में बैंक के अधिकारियों ने मध्यप्रदेश में बैंक की बढ़ती भूमिका का भी उल्लेख किया।बैंक के क्षेत्रीय व्यवसाय प्रबंधक मनीष मरदवार ने कहा कि बैंक ने रिजर्व बैंक की नियामकीय कसौटियों को पूरा करते हुए छोटे उद्यमियों और समाज के विभिन्न वर्गों तक बैंकिंग सुविधाएं पहुंचाने पर लगातार काम किया है। उनके अनुसार बैंकिंग व्यवस्था में अब प्रतिस्पर्धा का दायरा बढ़ रहा है। वित्तीय मजबूती और नियामकीय शर्तों को पूरा करने वाले निजी तथा छोटे वित्त बैंकों को भी संस्थागत बैंकिंग में अवसर मिल रहे हैं। इससे सरकारी संस्थाओं को बैंकिंग सेवाओं के अधिक विकल्प मिलने के साथ बैंकों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ने की संभावना है।

    शाखा प्रबंधक लोकेश जैन ने कहा कि मध्यप्रदेश सरकार के वित्त विभाग ने निर्धारित मापदंडों को पूरा करने वाले बैंकों की सूची में इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक को भी शामिल किया है। इससे सरकारी निकायों, निगमों, मंडलों, बोर्डों, उपक्रमों और विश्वविद्यालयों के पास उपलब्ध राशि को निर्धारित नियमों और शर्तों के अनुसार बैंक में जमा करने का अवसर मिल सकेगा।शासन के इस फैसले से राज्य के विकास का नया अध्याय शुरु होगा।

    उत्साह से लबरेज अधिकारियों और कर्मचारियों ने बैंक को जनहितैषी बनाने की प्रतिबद्धता दुहराई

    भोपाल में आयोजित समारोह में बैंक के अधिकारियों, कर्मचारियों और गणमान्य नागरिकों ने दस वर्ष की यात्रा को याद करते हुए अगले दशक के लिए शुभकामनाएं दीं। कार्यक्रम का मुख्य संदेश ग्राहक विश्वास, तकनीक आधारित बैंकिंग और जिम्मेदार विस्तार के साथ बैंकिंग सेवाओं को और व्यापक बनाने का रहा।

  • बंडा में जहरीली शराब लाने वाला अभी तक नहीं पकड़ाया

    बंडा में जहरीली शराब लाने वाला अभी तक नहीं पकड़ाया

    भोपाल, 07 सितंबर (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। सागर के बंडा-शाहगढ़ क्षेत्र में जहरीली शराब से हुई मौतों का आंकड़ा बढ़कर 21 तक पहुंच गया है। 120 से अधिक लोगों के उपचार की जानकारी सामने आई है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कुछ मृतकों की मौत मेथेनॉल के विषाक्त प्रभाव से होने की पुष्टि हुई है। इस घटना ने अवैध शराब के कारोबार के साथ आबकारी और पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    घटना के बाद सरकार ने सागर के सहायक आबकारी आयुक्त कीर्ति दुबे, सहायक जिला आबकारी अधिकारी दिलीप खंडाते और बंडा वृत्त की आबकारी उप निरीक्षक प्रोशनी उरेती को निलंबित किया है। उपायुक्त एवं संभागीय फ्लाइंग स्क्वाड प्रभारी नीरजा श्रीवास्तव को ग्वालियर मुख्यालय अटैच किया गया। बंडा थाना प्रभारी राजेंद्र सिंह कुशवाहा और गुगरा चौकी प्रभारी पूरण लाडिया पर भी निलंबन की कार्रवाई हुई है। प्रभावित क्षेत्र की शराब दुकानों को सील किया गया है और 30 से अधिक आरोपियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज कर कई लोगों को हिरासत में लिया गया है।

    सरकार की ओर से उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल ने सागर पहुंचकर बीएमसी अस्पताल में मरीजों और उनके परिजनों से मुलाकात की। उन्होंने इलाज में लापरवाही नहीं होने देने और अवैध शराब के पूरे नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए। मृतकों के परिवारों को चार-चार लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा भी की गई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जिम्मेदार लोगों को नहीं बख्शने की बात कही है।

    मामले की मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए गए हैं। जांच में शराब तैयार करने, भंडारण, परिवहन और वितरण से लेकर विभागीय लापरवाही तक की पड़ताल होगी। सागर पुलिस की प्रारंभिक जांच में उत्तर प्रदेश के ललितपुर से नकली शराब आने और उस पर फर्जी रैपर, सील और क्यूआर कोड लगाए जाने की बात सामने आई है। हालांकि ललितपुर पुलिस ने इस दावे को भ्रामक बताया है। इससे जांच का दायरा और महत्वपूर्ण हो गया है।

    कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने सरकार पर शराब माफिया को संरक्षण देने का आरोप लगाते हुए सागर एसपी अनुराग सुजानिया के खिलाफ कार्रवाई और उन्हें जेल भेजने की मांग की है। उन्होंने प्रशासन पर मौतों के वास्तविक आंकड़े छिपाने का आरोप भी लगाया है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भी सरकार से जवाब मांगा और शराब माफिया के संरक्षण का मुद्दा उठाया है। पटवारी के 50 मौतों के दावे की फिलहाल सरकारी आंकड़ों से पुष्टि नहीं हुई है।

    इस बीच इंदौर-उज्जैन के किसी शराब कारोबारी की सप्लाई और उसे कारोबार से हटाने के लिए जहरीली शराब कांड रचे जाने जैसी चर्चाएं भी हैं। फिलहाल जांच एजेंसियों ने इसकी पुष्टि नहीं की है। इसलिए जांच का यह संभावित कोण हो सकता है, तथ्य नहीं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतनी बड़ी मात्रा में जहरीली शराब स्थानीय नेटवर्क तक कैसे पहुंची और उसे रोकने में आबकारी तथा पुलिस तंत्र क्यों विफल रहा। मजिस्ट्रियल और पुलिस जांच के निष्कर्ष ही यह स्पष्ट करेंगे कि यह केवल शराब माफिया की साजिश थी या इसके पीछे किसी बड़े कारोबारी हित और प्रशासनिक संरक्षण की भी भूमिका थी।

  • घरों में बाजार बनाने वालों पर कार्रवाई कौन करेगा

    घरों में बाजार बनाने वालों पर कार्रवाई कौन करेगा

    भोपाल06 सितंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।राजधानी में अरेरा कॉलोनी, रोहित नगर, बावड़ियाकलां और दूसरे आवासीय इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियों के खिलाफ चल रही कार्रवाई को केवल दुकानदारों और रहवासियों के बीच का विवाद मानना बड़ी भूल होगी। यह संकट एक-दो साल में पैदा नहीं हुआ। इसके पीछे दो दशक से चली आ रही नगर नियोजन की कमजोरी, राजनीतिक संरक्षण, जमीन के कारोबार से जुड़े हित और प्रशासन की आंखों के सामने नियमों के उल्लंघन का लंबा सिलसिला है। अब जब नगर निगम कार्रवाई कर रहा है तो सवाल यह भी उठना चाहिए कि इतने वर्षों तक यह सब किसकी अनुमति, संरक्षण या लापरवाही से चलता रहा?

    अरेरा कॉलोनी और रोहित नगर मूल रूप से आवासीय क्षेत्र हैं। यहां घर बनाने के लिए स्वीकृत भूखंडों पर धीरे-धीरे दुकानें, शोरूम, रेस्टोरेंट, होटल, क्लीनिक और कार्यालय खुलते चले गए। इससे सड़क पर पार्किंग बढ़ी, यातायात का दबाव बढ़ा और रहवासियों की निजता तथा सुरक्षा प्रभावित हुई। रहवासियों की शिकायतें नई नहीं हैं। अरेरा कॉलोनी के एक निवासी के अनुसार 2021 से अब तक इस संबंध में अनेक शिकायतें शासन और नगर निगम के विभिन्न अधिकारियों को दी गईं, फिर भी प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।

    व्यापारियों का अपना तर्क है। उनका कहना है कि भोपाल का मास्टर प्लान लंबे समय से लंबित रहा और नए व्यावसायिक क्षेत्र विकसित नहीं किए गए। इसलिए शहर की जरूरत के साथ कारोबार आवासीय इलाकों में फैलता गया। यह तर्क पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन मास्टर प्लान का न आना किसी व्यक्ति को आवासीय भूखंड पर अपनी मर्जी से व्यावसायिक निर्माण करने का अधिकार नहीं देता। यही इस पूरे विवाद का मूल प्रश्न है।वास्तविक जिम्मेदारी तीन स्तरों पर तय होनी चाहिए।

    पहली जिम्मेदारी उन संपत्ति मालिकों और कारोबारियों की है जिन्होंने स्वीकृत आवासीय उपयोग के विपरीत निर्माण किया या व्यवसाय शुरू किया। यदि किसी ने जानबूझकर आवासीय अनुमति लेकर व्यावसायिक भवन खड़ा किया है तो केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि उसने बिजली का बिल, संपत्ति कर, जीएसटी या ट्रेड लाइसेंस लिया था। किसी विभाग की ओर से लिया गया कर या जारी किया गया लाइसेंस भूमि उपयोग को अपने आप वैध नहीं बना देता।

    दूसरी और अधिक गंभीर जिम्मेदारी नगर नियोजन और स्थानीय प्रशासन की है। जिस भवन में वर्षों से होटल चल रहा हो, जहां रोज दर्जनों वाहन खड़े होते हों, जहां शोरूम या अस्पताल संचालित हो रहा हो, उसे प्रशासन ने एक दिन में नहीं देखा। नगर निगम के अधिकारी, नगर तथा ग्राम निवेश विभाग, भवन अनुज्ञा से जुड़े अधिकारी और स्थानीय प्रशासन इस बदलाव से अनजान नहीं हो सकते। फिर सवाल उठता है कि कार्रवाई इतने वर्षों तक क्यों नहीं हुई?

    तीसरी जिम्मेदारी उस राजनीतिक तंत्र की बनती है जिसने इस अव्यवस्था को बढ़ने दिया। सत्ता में आने वाली सरकारों और स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधियों ने यदि लगातार बढ़ते व्यावसायीकरण को देखा और रोकने के बजाय उसे नजरअंदाज किया, तो जवाबदेही सभी की होनी चाहिए। आज राजनीतिक दल व्यापारियों के साथ खड़े होकर राहत की मांग कर रहे हैं और दूसरी ओर रहवासी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। यह राजनीति समस्या का समाधान नहीं है।

    इस पूरे मामले में भू-माफिया और बिल्डर लॉबी की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। आवासीय भूखंड का व्यावसायिक उपयोग उसकी कीमत कई गुना बढ़ा देता है। यही वह आर्थिक प्रोत्साहन है जिसने कई जगह नियमों को पीछे धकेला। यदि किसी बिल्डर या कॉलोनाइजर ने खरीदार को यह भरोसा दिलाकर संपत्ति बेची कि भविष्य में यहां दुकान या कार्यालय चल जाएगा, तो उसकी भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। केवल उस व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा जिसने अंत में दुकान खोली। यह पता लगाना जरूरी है कि उसे व्यावसायिक उपयोग का भरोसा किसने दिया, भवन का नक्शा किसने पास किया और वर्षों तक निरीक्षण किसने नहीं किया।

    नगर निगम ने अब बड़े पैमाने पर नोटिस और सीलिंग की कार्रवाई शुरू की है। अगस्त में अरेरा कॉलोनी और रोहित नगर से कार्रवाई शुरू हुई और बाद में शहर के अन्य क्षेत्रों तक पहुंची। अगस्त के अंत तक हजारों नोटिस जारी होने की जानकारी सामने आई। सितंबर की शुरुआत में भी कार्रवाई जारी रही, हालांकि कुछ स्थानों पर नोटिस लगे होने के बावजूद आसपास की दुकानें चलती मिलने से कार्रवाई की समानता पर सवाल उठे हैं

    यही स्थिति सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। कार्रवाई हो तो सब पर समान हो। प्रभावशाली व्यक्ति का होटल, बिल्डर का शोरूम और सामान्य नागरिक की छोटी दुकान—कानून के सामने इनके लिए अलग-अलग पैमाना नहीं हो सकता।

    मामला न्यायालय में भी गंभीर स्तर पर पहुंच चुका है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद भोपाल में कार्रवाई शुरू हुई और इस विषय की अगली महत्वपूर्ण सुनवाई 15 सितंबर को निर्धारित है। सरकार के लिए अब राजनीतिक समझौते से ज्यादा महत्वपूर्ण न्यायालय के आदेश और कानून के अनुरूप स्थायी व्यवस्था बनाना है।

    समाधान केवल सीलिंग नहीं है। सरकार को सबसे पहले हर संपत्ति का स्वीकृत भूमि उपयोग, स्वीकृत नक्शा और वास्तविक उपयोग सार्वजनिक करना चाहिए। इसके बाद तीन श्रेणियां बन सकती हैं—पूरी तरह वैध, नियमों के तहत सीमित रूप से नियमित किए जा सकने वाले और पूरी तरह अवैध। तीसरी श्रेणी पर बिना राजनीतिक हस्तक्षेप कार्रवाई होनी चाहिए। जहां मिश्रित भूमि उपयोग वैज्ञानिक आधार पर संभव है, वहां सड़क की चौड़ाई, पार्किंग, यातायात, अग्निसुरक्षा और सीवेज व्यवस्था को देखकर नए मास्टर प्लान में स्पष्ट प्रावधान किया जा सकता है।

    सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अवैध कारोबार को पहले बढ़ने दिया जाए और फिर उसके कारण पैदा हुई मानवीय परेशानी का पूरा भार सरकार पर डाल दिया जाए, यह भी न्याय नहीं है। कारोबार शुरू करने वाले को अपने निवेश का जोखिम समझना होगा। वहीं सरकार और नगर निगम यह नहीं कह सकते कि उन्हें कुछ पता ही नहीं था।

    भोपाल का असली सवाल दुकानों की सीलिंग नहीं है। सवाल यह है कि आवासीय भोपाल को व्यावसायिक भोपाल में बदलने की अनुमति किसने दी? अगर इसका जवाब नहीं मिला तो आज कुछ दुकानें सील होंगी, कल दूसरी जगह वही कहानी दोहराई जाएगी। कार्रवाई की सार्थकता तभी होगी जब दुकान के साथ उस व्यवस्था पर भी कार्रवाई हो जिसने आवासीय जमीन को बाजार बनने दिया—चाहे उसमें कारोबारी हो, बिल्डर हो, अधिकारी हो या राजनीतिक संरक्षण देने वाला व्यक्ति।

  • इक्विटास बैंक में डिपाजिट पार्क करके आय बढ़ाएंगे सरकारी उपक्रम

    इक्विटास बैंक में डिपाजिट पार्क करके आय बढ़ाएंगे सरकारी उपक्रम

    भोपाल 5 सितंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्यप्रदेश सरकार ने सरकारी निकायों, निगमों, मंडलों, बोर्डों, उपक्रमों और विश्वविद्यालयों के पास उपलब्ध कोष के बैंकिंग विनियोजन की व्यवस्था में निजी क्षेत्र के बैंकों के लिए प्रतिस्पर्धा का दायरा बढ़ाया है। वित्त विभाग ने 1 सितंबर 2026 को आदेश क्रमांक I/1276235/2026 जारी कर वित्तीय वर्ष 2026-27 में कोष विनियोजन के लिए स्वीकार किए जाने योग्य निजी क्षेत्र के बैंकों की नई सूची जारी की है। इस सूची में  स्पष्ट तौर पर इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक लिमिटेड को शामिल किया गया है।बैंक की कार्यप्रणाली की विश्वसनीयता के आधार पर ये फैसला लिया गया है।इक्विटास बैंक की दसवीं वर्षगांठ के अवसर पर सरकार ने उसे यह उपहार प्रदान किया है।

    वित्त विभाग के आदेश में स्पष्ट किया गया है कि वित्त विभाग के पूर्व निर्देशों की कंडिका 9.2 के अनुसार निजी बैंकों की सूची प्रत्येक वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर प्रकाशित आंकड़ों के आधार पर समय-समय पर अद्यतन की जाएगी। वित्तीय वर्ष 2025-26 के आंकड़ों के आधार पर 2026-27 में कोष विनियोजन के लिए स्वीकार किए गए निजी क्षेत्र के बैंकों की सूची इसी प्रक्रिया के तहत जारी की गई है। यानी बैंक का सूची में होना उसके पिछले वित्तीय प्रदर्शन और निर्धारित कसौटियों पर खरा उतरने से जुड़ा है।

    इस सूची में कुल 12 निजी और स्मॉल फाइनेंस बैंक हैं।इसके अनुसार राज्य की संस्थाएं अब अपने उपलब्ध कोष का विनियोजन इक्विटास बैंक में कर सकेंगी। अब तक ये संस्थान ज्यादातर सरकारी बैंकों में अपना कोष विनियोजित करते थे। ये बैंक कम ब्याज दर की वजह से राज्य के घाटे की वजह बन रहे थे। बाजार में अच्छे विकल्प मौजूद होने के बाद भी सरकारी संस्थान घिसी पिटी परिभाषा के कारण घाटा अर्जित कर रहे थे। सरकार की नई सूची में इक्विटास बैंक के साथ एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, एक्सिस बैंक, बंधन बैंक, एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक, सिटी यूनियन बैंक, जना स्मॉल फाइनेंस बैंक, करूर वैश्य बैंक, ईएसएएफ स्मॉल फाइनेंस बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक, जम्मू एंड कश्मीर बैंक भी शामिल हैं।

    वित्तमंत्री जगदीश देवड़ा के प्रयासों से राज्य की आय बढ़ाने के कई उपाय लागू किए जा रहे हैं।

    आदेश का एक और महत्वपूर्ण पक्ष सरकारी धन की सुरक्षा से जुड़ा है। वित्त विभाग ने कहा है कि ऐसे बैंक, जिनमें राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर शासकीय खातों के संचालन में वित्तीय अनियमितता पाई गई है, उन्हें इस सूची में शामिल नहीं किया गया है। इसका अर्थ यह है कि सरकार ने केवल बैंक की ब्याज दर को आधार नहीं बनाया है। सरकारी खातों के संचालन का पिछला रिकॉर्ड भी पात्रता की कसौटी का हिस्सा है।इक्विटास बैंक रिजर्व बैंक के मानकों पर लगातार खरा उतर रहा है इसलिए देश के बैंकिंग क्षेत्र में तेजी से उभर रहा है।

    भारत में बैंकिंग व्यवस्था लंबे समय तक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रभुत्व में रही। 1969 और 1980 में बड़े पैमाने पर बैंक राष्ट्रीयकृत किए गए। भारतीय रिजर्व बैंक के अपने ऐतिहासिक विवरण के अनुसार 1969 में 14 निजी बैंकों और 1980 में छह और निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ था। इसके बाद सरकारों का कामकाज केवल सरकारी बैंकों तक सीमित था और इस मोनोपाली के बावजूद सरकारी बैंक अपना कामकाज नहीं सुधार सके। रिजर्व बैंक ने जब बैंकिंग को अपनी कड़ी निगरानी में लिया तो सरकारी बैंक पिछड़ गए और निजी क्षेत्र के बैंक अपनी कार्यकुशलता की वजह से अर्थव्यवस्था के प्रमुख स्तंभ बनने लगे।

    राष्ट्रीयकरण का उद्देश्य बैंकिंग संसाधनों को व्यापक सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों से जोड़ना था। समय के साथ भारतीय बैंकिंग नीति में एक दूसरा महत्वपूर्ण विचार मजबूत हुआ—बैंकिंग में प्रतिस्पर्धा। निजी बैंकों, नए बैंकिंग लाइसेंस, स्मॉल फाइनेंस बैंकों और तकनीक आधारित बैंकिंग ने सरकारी और निजी बैंकों के बीच सेवा, लागत, ब्याज दर और तकनीकी क्षमता की प्रतिस्पर्धा को बढ़ाया। आरबीआई आज सार्वजनिक क्षेत्र, निजी क्षेत्र और स्मॉल फाइनेंस बैंकों को अलग-अलग श्रेणियों में नियामकीय ढांचे के भीतर संचालित करता है।आरबीआई की ओर से बैंकिंग लाइसेंस, पूंजी पर्याप्तता, तरलता, जोखिम प्रबंधन और अन्य prudential requirements की निगरानी की जाती है।

    मध्यप्रदेश के आदेश में यही फर्क महत्वपूर्ण है। सरकार ने निजी बैंकों के लिए अपना दरवाजा खोला है, लेकिन सूची को वित्तीय प्रदर्शन के आधार पर हर वित्तीय वर्ष में अपडेट करने की व्यवस्था भी रखी है। इसका परिणाम यह हो सकता है कि सरकारी कारोबार पाने के लिए बैंक केवल सरकारी स्वामित्व के आधार पर नहीं, बल्कि वित्तीय प्रदर्शन, सेवा गुणवत्ता, तकनीकी क्षमता, जोखिम प्रबंधन और प्रतिस्पर्धी दरों के आधार पर एक-दूसरे से मुकाबला करें।

    इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक के लिए यह निर्णय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बैंक मूल रूप से वित्तीय रूप से कम सेवा प्राप्त वर्गों तक बैंकिंग पहुंच बढ़ाने के उद्देश्य से विकसित हुए स्मॉल फाइनेंस बैंकिंग क्षेत्र का हिस्सा है। बैंक स्वयं अपनी पहचान ऐसे बैंक के रूप में करता है जो वित्तीय रूप से कम सेवा प्राप्त और वंचित वर्गों के लिए बैंकिंग समाधान उपलब्ध कराता है।श्रंगेरी पीठ के सहयोग से बैंक एक विशाल अस्पताल चलाता है और अपने मुनाफे का पांच फीसदी हिस्सा समाज सेवी कार्यों पर खर्च करता है।

    सरकारी कारोबार में स्मॉल फाइनेंस बैंक की भागीदारी इस बैंकिंग मॉडल के विस्तार का संकेत भी है। सरकारी संस्थाओं के पास अक्सर ऐसी रकम होती है जिसे तत्काल खर्च नहीं किया जाना है। इस धन को बैंक में रखा जाता है तो ब्याज से अतिरिक्त आय हासिल की जा सकती है। ऐसे में बैंक के बीच प्रतिस्पर्धा सरकारी संस्थाओं को बेहतर दर और बेहतर सेवा हासिल करने की स्थिति में ला सकती है। इक्विटास बैंक को तमिलनाडू और महाराष्ट्र सरकार के साथ सरकारी कर्मचारियों के वेतन और पेंशन खातों के लिए empanelled किया जा चुका है। आरबीआई की मौजूदा बैंकिंग व्यवस्था में भी स्मॉल फाइनेंस बैंक एक मान्य बैंकिंग श्रेणी है। कई अन्य राज्यों ने भी इक्विटास बैंक को अपना साझेदार बनाकर राज्य के विकास की कहानी लिखी है।

    मध्यप्रदेश के लिए इस निर्णय का सबसे व्यावहारिक पक्ष सरकारी धन के प्रबंधन में प्रतिस्पर्धा है। यदि कोई बैंक बेहतर ब्याज देता है, तकनीकी रूप से तेज सेवा उपलब्ध कराता है और सरकारी खातों के संचालन में बेहतर सुविधा देता है तो सरकारी संस्थाओं के पास उसके उपयोग का विकल्प होना वित्तीय प्रबंधन को अधिक बाजार आधारित बना सकता है। इससे सरकारी धन को केवल परंपरागत बैंकिंग संबंधों के आधार पर रखने की प्रवृत्ति कम हो सकती है।

    बैंकिंग बाजार के लिए इसका दूसरा अर्थ है कि सरकारी कारोबार अब केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए सुरक्षित क्षेत्र नहीं माना जाएगा। आरबीआई की बैंकिंग व्यवस्था में निजी क्षेत्र और स्मॉल फाइनेंस बैंकों की मौजूदगी इसी प्रतिस्पर्धी ढांचे का हिस्सा है। आरबीआई के अनुसार बैंकिंग क्षेत्र का समग्र नियमन बैंकिंग रेगुलेशन अधिनियम के ढांचे में होता है और सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्र के बैंक अलग स्वामित्व संरचनाओं के बावजूद नियामकीय व्यवस्था में काम करते हैं।

    इसी नजरिए से मध्यप्रदेश का फैसला भारतीय बैंकिंग के उस संक्रमण से जुड़ता है जिसमें बैंकिंग का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होता कि बैंक सरकारी है या निजी। अब सवाल यह है कि बैंक कितना सुरक्षित है, कितनी कुशलता से काम करता है, ग्राहक और संस्थागत खातों को कितनी अच्छी सेवा देता है, तकनीक का कितना प्रभावी उपयोग करता है और धन पर कितना बेहतर प्रतिफल देता है।

    इसका लाभ अंततः सरकार की आय और सार्वजनिक धन के बेहतर उपयोग में मिल सकता है। सरकारी कोष जनता का धन है। इसलिए उसे ऐसे बैंक में रखना जहां सुरक्षा के साथ बेहतर वित्तीय प्रतिफल और सेवा मिल सके, सार्वजनिक वित्त प्रबंधन का व्यावहारिक हिस्सा है। मध्यप्रदेश की नई सूची इसी सोच को आगे बढ़ाती दिखाई देती है।

    यही इस फैसले की सबसे बड़ी विशेषता है। सरकार बैंक नहीं चुन रही, वह बैंकों को सरकार के धन के लिए प्रतिस्पर्धा करने का अवसर दे रही है। राष्ट्रीयकरण के दौर में बैंकिंग का उद्देश्य संसाधनों को सरकारी नियंत्रण में लाना था। आज की अर्थव्यवस्था में लक्ष्य यह है कि नियंत्रित और विनियमित प्रतिस्पर्धा के माध्यम से उन्हीं संसाधनों का अधिक कुशल उपयोग हो। मध्यप्रदेश का यह निर्णय इसी बदलती भारतीय बैंकिंग सोच की व्यावहारिक अभिव्यक्ति माना जा सकता है।