भोपाल,26
जून(प्रेस
सूचना केन्द्र)।
नगर विकास मंच मध्यप्रदेश के
संयोजक बिहारीलाल जी का कहना
है कि राजधानी के सुनियोजित
विकास के लिए प्रस्तावित
मास्टर प्लान के ड्राफ्ट में
आमूलचूल बदलाव करना जरूरी
है। ये मास्टर प्लान विधि
सम्मत नहीं है और इसे इतनी
जल्दबाजी में बनाया गया है
कि इसके ऊटपटांग स्वरूप का
लाभ लेते हुए माफिया ताकतों
ने बेशकीमती जमीनों को हथियाने
और बेचने का जाल बुन डाला है।
भू माफिया ने राजधानी में
रोजगार के अवसर विकसित किए
बगैर लोगों को गांवों से खदेड़कर
भीड़ जुटाने का षड़यंत्र रचा
है। प्रदेश के समन्वित विकास
के लिए प्रदेश के विभिन्न
शहरों के मास्टर प्लान के साथ
ही राजधानी का नगर निवेश भी
किया जाना जरूरी हो गया है।
आज एक पत्रकार वार्ता में नगर विकास मंच मध्यप्रदेश के पदाधिकारियों के साथ नगर तथा ग्राम निवेश विभाग मध्यप्रदेश के सेवानिवृत्त असिस्टेंट डायरेक्टर श्री बिहारी लाल ने कहा कि राजधानी के मास्टर प्लान के ड्राफ्ट में भारी गड़बड़ियां हैं। इसका महाविशाल स्वरूप वेवसाईट पर इस तरह दर्शाया गया है कि जिसे आम लोग पढ़ समझ नहीं सकते। इसके संपादित स्वरूप को पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित किया जाना जरूरी है। शहर के विकास में रुचि रखने वाले लोग इससे नगर विकास के संबंध में अपनी कीमती राय से शासन को अवगत करा सकेंगे। प्रेस वार्ता में मंच के अजय लखवानी समेत कई अन्य पदाधिकारी भी उपस्थित थे।
उन्होंने
कहा कि राजधानी की वर्तमान
भूमियों के मानचित्र बनाकर
उन्हें वार्डवार प्रदर्शित
किया जाना जरूरी है ताकि लोग
भविष्य की योजनाओं के संबंध
में अपनी भागीदारी सुनिश्चित
कर सकें। इस मास्टर प्लान को
संक्षिप्त पुस्तक के रूप में
और हिंदी भाषा में प्रकाशित
किया जाना जरूरी है। मास्टर
प्लान का ये ड्राफ्ट राजधानी
के ही 284 गांवों की
पंचायतों के अधिकारों का दमन
कर रहा है। इससे पंचायतों के
अधिकार समाप्त हो जाएंगे।
श्री बिहारीलाल ने कहा कि एक ओर जब भारत सरकार आत्मनिर्भर भारत की योजना पर कार्य कर रही है वहां राजधानी में रोजगार के अवसर न होने पर ही अंधे शहरीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है।शहर में लगभग 50 हजार से ज्यादा आवासीय प्रकोष्ठ खाली पड़े हैं। इसके बावजूद माफिया ताकतें शहर में और भी ज्यादा भवन बनाने का षड़यंत्र रच रही है।चीन में विकास के नाम पर ऐसे ही कई शहर खाली पड़े हैं जिन्हें भूतिया शहर कहा जाता है।सरकार की ये जवाबदारी है कि वो बेतरतीब शहरीकरण को रोककर लोगों को मौजूदा आवासों की सुविधा उपलब्ध कराए।
पत्रकार वार्ता में मौजूद नागरिकों ने जब उनसे सवाल किया कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में नगरीय विकास मंंत्री जयवर्धन सिंह किन माफिया ताकतों के इशारे पर ये मास्टर प्लान लागू कर रहे थे तो उन्होंने कहा कि कई अन्य ताकतें भी शहरी विकास की आड़ में अपना उल्लू सीधा करना चाह रहीं हैं। गौरतलब है कि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के इशारे पर कमलनाथ सरकार ने प्रदेश के कई शहरों में एक साथ मास्टर प्लान लागू करके गांवों से लोगों को खदेड़ने की तैयारी की थी,सरकार के अवसान के बाद ये स्थितियां बदल गईं हैं। इस स्थिति में शहरों और गांवों के समन्वित नियोजन की जरूरत महसूस की जा रही है। कोरोना के कहर के बाद तो इस योजना की प्रासंगिकता कई सवालों से घिर गई है।
भोपाल,25
जून(प्रेस
सूचना केन्द्र)।
कोरोना के उपचार के लिए बनाई
गई देशी दवा कोरोनिल को बाजार
में उतारने की घोषणा के बाद
वैश्विक दवा कंपनियों में
हड़कंप मच गया है। दवा निर्माता
पतंजलि आयुर्वेद को गरियाने
मैदान में उतरे कमीशनखोरों
ने बाबा रामदेव पर तरह तरह से
आरोपों की झड़ी लगा दी है। वे
दवा का क्लीनिकल ट्रायल नहीं
होने के आरोप लगा रहे हैं। इस
दवा को बनाने में प्रयुक्त
हुईं तमाम जड़ी बूटियां सदियों
से वायरसों को पराजित करती
रहीं हैं। सार्वकालिक उपयोगिता
सिद्ध कर चुकी इन जड़ी बूटियों
पर निशाना साधने वाले लोग दवा
की सफलता पर तुक्केबाजी भरे
आरोप लगा रहे हैं। वे ये सोचने
तैयार भी नहीं कि यदि भारत के
आयुर्वेदाचार्यों ने वायरस
की वैक्सीन का तोड़ देसी ढंग
से निकाल लिया है तो इसमें
नुक्सान क्या है। इस दवा को
बनाने की विधि और उसमें शामिल
जड़ी बूटियों की सदियों से
क्लीनिकल ट्रायल होती रही
है। जिन दवाओं की प्रमाणिकता
जन जन के बीच सिद्ध है उन्हें
कानून की तलवार लेकर बैठे
सरकारी अफसरों की क्लीनचिट
की जरूरत नहीं है।
दरअसल स्वास्थ्य के नाम पर विश्व भर में जो दवा उद्योग फैला हुआ है वह सुई की जगह तलवार का इस्तेमाल करके अपनी उपयोगिता सिद्ध करता रहा है। कोरोना के उपचार के लिए भी दुनिया भर की लगभग 130 कंपनियां अपना वैक्सीन बनाने में जुटी हैं। 11 कंपनियों की वैक्सीनों को तो विश्व स्वास्थ्य संगठन अपनी मंजूरी देने बेकरार बैठा है। अभी कोरोना के इलाज की जो विधि दुनिया भर में अपनाई जा रही है उसमें पहले रोगी का टेस्ट किया जाता है। लगभग पांच हजार भारतीय रुपयों की कीमत वाले इस टेस्ट के बाद पता चलता है कि रोगी कोरोना संक्रमित तो नहीं है। इसके बाद संक्रमित रोगियों का उपचार शुरु किया जाता है। ये उपचार पूरी तरह तुक्केबाजी पर टिका है और अन्य रोगों के लिए बनाई गई दवाईयों और विटामिनों के इस्तेमाल से इलाज किया जाता है। जिन रोगियों में डबल निमोनिया जैसे लक्षण पैदा हो जाते हैं और वे सांस नहीं ले पाते उन्हें वैंटीलेटर पर डाल दिया जाता है। जरा सी असावधानी रोगी की जान ले लेती है। नतीजतन तमाम आधुनिक चिकित्सा के उपयोग के बाद दुनिया के पांच लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। दरअसल कोरोना का हौवा खड़ा करने में जिन कंपनियों ने अपनी जमा पूंजी लगा दी है उन्हें यदि देशी फार्मूले ने परास्त कर दिया तो उन कंपनियों का तो दिवाला निकल जाएगा।
जबकि भारत की दवा निर्माता कंपनी पतंजलि आयुर्वेद ने दावा किया कि कोरोनिल टैबलेट और श्वासारि बटी दवाओं से कोविड-19 का इलाज किया जा सकेगा। अणु तेल का प्रयोग करने की सलाह तो बाबा रामदेव पहले से देते रहे हैं। पतंजलि योगपीठ ने यह भी दावा किया कि उसने इसका क्लिनिकल ट्रायल किया है और सौ फीसदी कोरोना संक्रमित लोगों को मौत के मुंह से बाहर निकाला है। जब इस घोषणा से वायरस पर शोध कर रहीं दुनिया भर की कंपनियों ने दबाव बनाना शुरु किया तो वैश्विक व्यापार संधियों में जकड़ी भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने दवा के प्रचार पर रोक लगाकर पूरी प्रक्रिया की जांच शुरु कर दी।
हालांकि
पतंजलि आयुर्वेद के चेयरमैन
आचार्य बालकृष्ण ने इसे
‘कम्युनिकेशन गैप’
बताते हुए यह दावा
किया है कि ‘उनकी
कंपनी ने आयुष मंत्रालय को
सारी जानकारी दे दी है।’
बालकृष्ण ने अपने
ट्वीट में लिखा है कि “यह
सरकार आयुर्वेद को प्रोत्साहन
व गौरव देने वाली है। क्लिनिकल
ट्रायल के जितने भी तय मानक
हैं, उन 100 प्रतिशत
पूरा किया गया है।”
सामान्य
परिस्थितियों में किसी दवा
को विकसित करने और उसका क्लिनिकल
ट्रायल पूरा होने में कम से
कम तीन साल तक का समय लगता है
लेकिन अगर स्थिति अपातकालीन
हो तो भी किसी दवा को बाज़ार
में आने में कम से कम दस महीने
से सालभर तक का समय लग जाता
है। कोरोनिल में प्रयुक्त
सभी जड़ी बूटियां कालातीत
हैं और अनुभव व समय की कसौटी
पर खरी साबित हो चुकी हैं।
भारत
में किसी दवा या ड्रग को बाज़ार
में उतारने से पहले किसी
व्यक्ति, संस्था
या स्पॉन्सर को कई चरणों से
होकर गुज़रना होता है. इसे
आम भाषा में ड्रग अप्रूवल
प्रोसेस कहते हैं। अप्रूवल
प्रोसेस के तहत, क्लिनिकल
ट्रायल के लिए आवेदन करना,
क्लिनिकल ट्रायल
कराना, मार्केटिंग
ऑथराइज़ेशन के लिए आवेदन करना
और पोस्ट मार्केटिंग स्ट्रेटजी
जैसे कई चरण आते हैं। भारत का
औषधि एवं प्रसाधन सामग्री
अधिनियम 1940 और नियम
1945 औषधियों तथा
प्रसाधनों के निर्माण,
बिक्री और वितरण को
विनियमित करता है.
औषधि
एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम
1940 और नियम 1945 के
अंतर्गत ही भारत सरकार का
केंद्रीय औषध मानक नियंत्रण
संगठन (सीडीएससीओ-
) दवाओं के अनुमोदन,
परीक्षणों का संचालन,
दवाओं के मानक तैयार
करने, देश में आयातित
होने वाली दवाओं की गुणवत्ता
पर नियंत्रण और राज्य दवा
नियंत्रण संगठनों को विशेष
सलाह देते हुए औषधि और प्रसाधन
सामग्री के लिए उत्तरदायी
है।
ड्रग रिसर्च
एंड मैन्युफ़ैक्चरिंग विशेषज्ञों
के अनुसार भारत में किसी दवा
के अप्रूवल के लिए सबसे पहले
इंवेस्टिगेशनल न्यू ड्रग
एप्लिकेशन यानी आईएनडी को
सीडीएससीओ के मुख्यालय में
जमा करना होता है। इसके बाद
न्यू ड्रग डिवीज़न इसका परीक्षण
करता है। इस परीक्षण के बाद
आईएनडी कमेटी इसका गहन अध्ययन
और समीक्षा करती है।इस समीक्षा
के बाद इस नई दवा को ड्रग कंट्रोलर
जनरल ऑफ़ इंडिया के पास भेजा
जाता है।अगर ड्रग कंट्रोलर
जनरल ऑफ़ इंडिया, आईएनडी
के इस आवेदन को सहमति दे देते
हैं तो इसके बाद कहीं जाकर
क्लिनिकल ट्रायल की बारी आती
है। क्लिनिकल ट्रायल के चरण
पूरे होने के बाद सीडीएससीओ
के पास दोबारा एक आवेदन करना
होता है। यह आवेदन न्यू ड्रग
रजिस्ट्रेशन के लिए होता है.
एक बार
फिर ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़
इंडिया इसकी समीक्षा करता
है। अगर यह नई दवा सभी मानकों
पर खरी उतरती है तब इसके लिए
लाइसेंस जारी किया जाता है।
दवा यदि सभी मानकों पर खरी
नहीं उतरती है तो डीसीजीआई
इसे रद्द कर देता है।भारत में
किसी नई दवा के लिए अगर लाइसेंस
हासिल करना है तो कई मानकों
का ध्यान रखना होता है। यह सभी
मानक औषधि एवं प्रसाधन सामग्री
अधिनियम 1940 और नियम
1945 के तहत आते हैं।नई
दवा दो तरह की हो सकती है.
एक तो वो जिसके बारे
में पहले कभी पता ही नहीं था.
इसे एनसीई कहते हैं।
ये एक ऐसी दवा होती है जिसमें
कोई नया केमिकल कंपाउंड हो।
दूसरी नई दवा उसे कहा जाता है
जिसमें कंपाउंड तो पहले से
ज्ञात हों लेकिन उनका फ़ॉर्मूलेशन
अलग हो। मसलन जो दवा अभी तक
टैबलेट के तौर पर दी जाती रही
उसे अब स्प्रे के रूप में दिया
जाने लगा हो। ये नई दवा के दो
रूप हैं लेकिन इनके लाइसेंसिंग
अप्रूवल के लिए नियम एक ही
होंगे।
अंग्रेज़ी
दवा और आयुर्वेंदिक दवा के
लिए अप्रूवल मिलने में बहुत
अंतर नहीं है लेकिन आयुर्वेद
में अगर किसी प्रतिष्ठित किताब
के अनुरूप कोई दवा तैयार की
गई है तो उसे आयुष मंत्रालय
तुरंत अप्रूवल दे देगा। जबकि
एलोपैथी में ऐसा नहीं है।“आयुर्वेद
प्राचीन भारतीय चिकित्सा
पद्धति है।जिसमें किसी जड़ी-बूटी
को किस मात्रा में, किस
रूप में और किस इस्तेमाल के
लिए अपनाया जा रहा है सबका
लिखित ज़िक्र है। ऐसे में अगर
कोई ठीक उसी रूप में अनुपालन
करते हुए कोई औषधि तैयार कर
रहा है तब तो ठीक है लेकिन अगर
कोई काढ़े की जगह टैबलेट बना
रहा है और मात्राओं के साथ
हेर-फेर कर रहा है
तो उसे सबसे पहले इसके लिए
रेफ़रेंस देना होता है।”
अगर
आप किसी प्राचीन और मान्य
आयुर्वेद संहिता को आधार बनाकर
कोई दवा तैयार कर रहे हैं तो
आपको क्लिनिकल ट्रायल में
जाने की ज़रूरत नहीं है लेकिन
अगर आप उसमें कुछ बदलाव कर रहे
हैं या उसकी अवस्था को बदल रहे
हैं और बाज़ार में उतारना
चाहते हैं तो कुछ शर्तों को
पूरा करने के बाद ही आप उसे
बाज़ार में ला सकेंगे। ऐसा
नहीं है कि किसी ने कुछ भी बनाया
और बाज़ार में बेचने लगा।”
एनपीपीए
यानी नेशनल फ़ार्मास्युटिकल
अथॉरिटी ढांचे के साथ देश के
हर राज्य में स्टेट ड्रग
कंट्रोलर होते हैं, जो
अपने राज्य में दवा के निर्माण
के लिए लाइसेंस जारी करते हैं।
जिस राज्य में दवा का निर्माण
होना है, वहां स्टेट
ड्रग कंट्रोलर से अप्रूवल
लेना होता है। नेशनल फ़ार्मास्युटिकल
अथॉरिटी भी दवाओं की निगरानी
करती है,अगर कोई नई
दवा ही नहीं बल्कि कोई शेड्यूल
ड्रग भी बाज़ार में लाया जा
रहा है तो उसे बाज़ार में लाने
से पहले उसकी क़ीमत तय की जाएगी।
जिसके लिए नेशनल फ़ार्मास्युटिकल
प्राइसिंग अथॉरिटी से अप्रूवल
लेना होगा। शेड्यूल ड्रग्स
का मतलब ऐसी दवाओं से है जो
पहले से ही नेशनल लिस्ट ऑफ़
एसेंशियल लिस्ट में शामिल
हों। इन मानक नियमों की अनदेखी
होने पर लाइसेंस रद्द भी हो
सकता है।
कांग्रेस को सत्ता में लाने के लिए राहुल गांधी ने किसान कर्जमाफी का जो पांसा फेंका था उसने तीन राज्यों में उन्हें सत्ता तो दिला दी लेकिन डेढ़ साल तक जब किसानों को लाभ नहीं हुआ तो मामला बिगड़ गया। उपजे जन असंतोष ने पार्टी में फूट के हालात पैदा किए और मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार का असमय अवसान हो गया। खुद कमलनाथ तो कर्ज माफी कर नहीं पाए अब बाहर बैठकर भाजपा सरकार पर राहुल गांधी के वादे को पूरा करने का दबाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं। जिस फार्मूले से किसानों के छोटे कर्ज माफ करने की शुरुआत कमलनाथ ने की थी उससे सहकारी समितियां कंगाल हो गईं हैं। किसान नए झमेलों में फंस गए हैं।उन्हें कांग्रेस के झूठे वादे की असलियत समझ में आ गई है। इसके विपरीत भाजपा ने किसानों को बेहतर मूल्य और मुआवजा दिलाने की जो पहल की है उससे कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ गईं हैं। आगामी उपचुनाव में मध्यभारत और प्रदेश के कई अंचलों में कांग्रेस को कर्जमाफी की असफलता के मुद्दे पर जनता के सवालों का सामना करना पड़ेगा। कृषि मंत्री कमल पटेल कहते हैं कि कर्जमाफी के इस झूठ का मुकदमा अब जनता चलाएगी और कांग्रेस को उसके पापों की सजा अवश्य भोगनी पड़ेगी।
एक चुनावी दांव के तहत बड़बोले राहुल गांधी ने चुनावी सभा में ऐलान किया था कि अगर सत्ता में आने के बाद दस दिनों के भीतर किसानों के दो लाख रुपए तक के कर्ज माफ नहीं हुए तो मुख्यमंत्री बदल दिया जाएगा। इस वादे में कर्ज की बात कही गई थी जबकि सत्ता में आने के तत्काल बाद कमलनाथ ने उसमें कृषि ऋण शब्द जोड़ दिया। कहा जाने लगा ये काम पांच सालों में कई चरणों में होगा। फिर कई शर्तें और भी जोड़ी गईं। कुल मिलाकर किसान को कर्ज माफी एक झुनझुना ही साबित हुई। कांग्रेस के इस झूठे वादे का असर बैंकिंग व्यवस्था को झेलना पड़ा। कांग्रेस ने ये वादा सरकारी और सहकारी बैंकों के भरोसे कर तो दिया था लेकिन सत्ता में आने के बाद इस ढोल की पोल खुल गई। राष्ट्रीयकृत बैंकों ने तो मोदी सरकार के बैंकिंग सुधारों के चलते इस झूठे वादे को पूरा करने में साफ असहमति जता दी। जबकि सहकारी बैंकों का ढांचा भ्रष्टाचारों की वजह से पहले ही धराशायी पड़ा था।जिन सहकारी साख समितियों ने बेहतर काम करके कुछ फंड बनाया था सरकार ने सबसे पहली गिद्ध दृष्टि उसी फंड पर टिका दी। सहकारी समितियों से कहा गया कि वे अपने फंड का आधा हिस्सा कर्जमाफी के लिए दे दें जिसकी भरपाई भविष्य में सरकार कर देगी। सरकार के इस निर्देश को कई समितियों ने सिरे से नकार दिया।
किसान
कर्ज माफी का मामला सबसे पहले
कागजों में उलझा हुआ नजर आने
लगा जब प्रमाण पत्रों और प्रचार
अभियानों की पोल खुलना प्रारंभ
हुई । कमलनाथ ने बाकायदा
सार्वजनिक आयोजनों में
पुरस्कारों की तरह कर्जमाफी
के प्रमाण पत्र बांटने शुरु
कर दिए। बहुत छोटे कर्जों के
इन प्रमाणपत्रों के बाद किसानों
को लगने लगा कि उनकी असफलता
का ढिंढोरा पीटकर सरकार उन्हें
सरे चौराहे बदनाम कर रही है।बगैर
सोचे समझे किया गया कर्जमाफी
का वादा इतना हवा हवाई था कि
सरकार ने शिवराज सरकार की तमाम
हितग्राही मूलक योजनाओं को
बंद करके कर्जमाफी पूरी करने
का शोर मचाना शुरु कर दिया।
जबकि इस बचत का धेला भर भी किसान
कर्जमाफी के लिए नहीं दिया
गया। इसी बीच लोकसभा चुनाव
आ गए तो सरकार को लगा कि चलो
कुछ समय के लिए तो आपदा टल गई
है। सभी प्रभारी मंत्रियों
से लेकर राज्य शासन के मंत्रियों
एवं विधायकों की ड्यूटी लगाई
गई कि लोकसभा चुनाव के बाद
किसी भी स्तर पर किसानों को
प्रमाण पत्रों के साथ-साथ
कर्ज माफी दे दी जाएगी । लोकसभा
चुनावों में जनता इस झांसे
में नहीं आई और उसने कांग्रेस
को अंडा पकड़ा दिया। केवल
मुख्यमंत्री कमलनाथ के पुत्र
खींचतान के सांसद बन पाए वह
भी तब जबकि उन्होंने भाजपा
के नेताओं की चरण वंदना करके
छिंदवाड़ा में कोई बड़ी चुनावी
सभा नहीं होने दी।लोकसभा चुनाव
के बाद सरकार का तंत्र एवं
संबंधित मंत्री ट्रांसफर
पोस्टिंग के धंधे में लग गए
। लगभग 2 महीने तक
अथवा उससे कहीं अधिक समय तक
यह धंधा बेशर्मी से बदस्तूर
चलता रहा।
विधायकों
की परेशानी यह थी कि जब भी वह
अपने विधानसभा क्षेत्रों में
विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों
में जाते थे तो उन्हें किसानों
का विरोध झेलना पड़ता था।किसान
उलाहना देते थे कि उनके साथ
इतना बड़ा मजाक क्यों किया
गया। लोकसभा चुनाव के बाद तो
किसानों के साथ किए गए छल और
कंगाली भरे कुशासन को झेलना
कांग्रेस के विधायकों के लिए
असहनीय हो गया था। जब भी कांग्रेस
के विधायक अथवा प्रभारी मंत्री
क्षेत्रों में जाते थे तो
किसान कर्जमाफी का दबाव बनाते
हुए घेराव करने लगते। सोशल
मीडिया पर लोकसभा चुनाव होने
के बाद लगातार 6 महीने
तक सरकार का जमकर मजाक उड़ता
रहा ।किसान कर्जमाफी के ढोल
की पोल खुलती जा रही थी और मालवा
के साथ साथ ग्वालियर चंबल
संभाग के अंचल के किसान भी
सरकार की नीतियों का माखौल
उड़ाने लगे।
ज्योतिरादित्य
सिंधिया के खिलाफ कांग्रेस
के कुछ नेताओं ने आलाकमान के
इशारे पर जो घेराबंदी की थी
और उन्हें चुनाव हरवाया था
उसकी भी असलियत सामने आने लगी।
सिंधिया समर्थक मंत्रियों
विधायकों को भी लगा कि चुनावी
चेहरे के रूप में तो सिंधिया
को आगे रखा गया लेकिन उनकी
उपेक्षा करके सिंधिया समर्थकों
को निपटाया जा रहा है। किसानों
से गालियां पड़वाईं जा रहीं
हैं।कमलनाथ को छिंदवाड़ा के
अलावा प्रदेश के किसी अंचल
के किसानों और आम नागरिकों
की चिंता नहीं है।जब कोई विधायक
या मंत्री मुख्यमंत्री निवास
से संपर्क करने का प्रयास करता
तो उससे आपत्तिजनक व्यवहार
करके उसकी उपेक्षा कर दी जाती।
ये हालत कमोबेश प्रदेश के हर
अंचल के विधायकों की थी लेकिन
ज्योतिरादित्य सिंधिया के
समर्थक विधायकों ने इस समस्या
से निपटने के लिए समाधान की
तलाश तेज कर दी।
कर्जमाफी
तो कमोबेश हर राज्य में असफल
साबित हुई है। उसके फेल होने
के दो कारण थे । कर्ज माफी की
घोषणा का क्रियान्वयन मुख्य
रूप से ग्रामीण स्तर पर स्थापित
सहकारी बैंकों से जुड़ा हुआ
था । जबकि सहकारी बैंकों को
कांग्रेस के नेता माफिया राज
बताते हुए मुकदमों में धकेलते
गए। अपना ही बाग नोंचते बंदरों
की तरह कांग्रेस ने सहकारी
आंदोलन का ही भट्टा बिठालना
शुरु कर दिया। दूसरा ये कि
दिग्विजय सिंह समर्थक अशोक
सिंह को अपेक्स बैंक का चेयरमैन
बना दिया गया। उन्हें तो
कांग्रेसियों की लूट की हवस
शांत करनी थी वे इसी का जतन
करते रहे लेकिन कर्जमाफी के
लिए फंड जुटाना उनके लिए
नामुमकिन था।इस बीच कमलनाथ
का वो बदनामशुदा बयान सामने
आ गया जिसमें उन्होंने सिंधिया
को लगभग दुत्कारते हुए कहा
कि यदि जनता की मांगों को लेकर
वे सड़क पा उतरना चाहते हैं
तो उतर जाएं। इस बयान ने कमलनाथ
सरकार के सारे रास्ते बंद कर
दिए और तय हो गया कि ये सरकार
चंद दिनों की ही मेहमान है।
किसानों
को दो लाख तक कर्ज माफी की
घोषणा में 31 मार्च
2018 की स्थिति में
फसल ऋण माफी 56 हजार
करोड़ से कहीं अधिक थी । जाहिर
था कि इतनी बड़ी रकम सरकार
अपने खजाने से नहीं लुटा सकती
थी। जब कर्ज माफी की पोल खुलने
लगी तो आंकड़े भी उलझाए जाने
लगे। 1 अप्रैल 2007
तक तो कांग्रेसियों
को भी समझ में आ गया कि कर्जमाफी
संभव नहीं है। भाजपा ने सत्ता
संभालते ही कर्जमाफी पर स्थिति
स्पष्ट करना शुरु कर दी कि
कांग्रेस ने झूठा वादा किया
था। उसने केवल सत्ता पाने के
लिए ये सफेद झूठ बोला था जबकि
भाजपा की पूर्ववर्ती सरकार
किसानों को लाभकारी मूल्य और
मुआवजा दिलाने की दिशा में
बहुत काम कर रही थी। कैबिनेट
की बैठक में 23 जून
को कृषि मंत्री कमल पटेल ने
कहा कि किसान कर्जमाफी कांग्रेस
का धोखा था और इसकी जांच कराई
जाना जरूरी है।राज्य स्तरीय
बैंकर्स समिति की बैठक के
तैयार एजेंडे में कोरोना के
बाद कर्जमाफी ही अहम मुद्दा
था।राष्ट्रीयकृत बैंकों और
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों
ने बताया कि सरकार ने पहले चरण
की जो कर्जमाफी धूमधाम से की
थी उसका ही पैसा सरकार ने नहीं
दिया था। बैठक में मौजूद कुछ
अफसरों ने एलएलबीसी के समन्वयक
एस डी माहुरकर से इस मुद्दे
पर चर्चा न करने को भी कहा
क्योंकि ऐसा करने से उनकी पोल
भी खुलती थी कि जब कर्जमाफी
गलत फैसला था तो उन्होंने उस
वक्त उसका विरोध क्यों नहीं
किया।
बैंकरों
की ये रिपोर्ट बताती है कि
सरकार ने कर्जमाफी का झूठा
वादा किया था और वादा निभाने
के चक्कर में बैंकों से धोखाघड़ी
तक कर डाली। राष्ट्रीकृत
बैंकों की तो मजबूरी है कि वे
लोकतांत्रिक सरकारों के
विरुद्ध धोखाधड़ी का मुकदमा
नहीं चला सकतीं लेकिन किसानों
के सामने ऐसी कोई मजबूरी नहीं
है। किसानों ने अब कांग्रेस
के विरुद्ध खुलकर बयानबाजी
शुरु कर दी है। कई किसान तो
कर्जमाफी के इस झूठे वादे के
लिए कांग्रेस को अदालत की चौखट
तक भी ले जाने की तैयारी कर
रहे हैं। अदालत उनके इस वाद
पर विचार करती है या नहीं ये
तो वक्त आने पर ही पता चलेगा
लेकिन इतना तय है कि आगामी आम
चुनावों में जनता की अदालत
जरूर वायदा खिलाफी के लिए
कांग्रेस को सूली चढ़ाएगी।
कांग्रेस के नेताओं से किसानों
का सवाल यही रहेगा कि जब औकात
नहीं थी तो कर्जमाफी का वादा
किया क्यों था।
The Union Minister for Rural Development, Panchayati Raj, Drinking Water & Sanitation and Urban Development, Shri Narendra Singh Tomar addressing at the launch of the Swachh Sarvekshan (Gramin)- 2017, in New Delhi on August 08, 2017.
जयराम शुक्ल
पिछले महीने ही मोदी 2.0 के एक साल पूरे हुए। इस एक साल का लेखाजोखा और सरकार की उपलब्धियों का प्रस्तुतिकरण नरेन्द्र तोमर ने जिस प्रभावी तरीके से किया उससे विपक्षी दल के नेता प्रभावित हुए बिना नहीं रहे। राज्यसभा के एक सदस्य(भाजपा के नहीं) का तो यहां तक कहना है कि श्री तोमर अपने जवाब से जिस तरह विपक्ष को संतुष्ट करते हैं और मीडिया को फेस करते हैं..इस वजह से वे सरकार की और भी बड़ी जिम्मेदारी के हकदार बनते हैं। सांसदजी का संकेत वित्तमंत्री जैसे गुरुतर दायित्व की ओर था क्योंकि इस पद के लिए धैर्य और जवाबदेही की बड़ी जरूरत होती है जो कि श्री तोमर में है।
यद्यपि श्री तोमर केंद्र सरकार में ग्रामीण विकास,पंचायतीराज, पेयजल और स्वच्छता मंत्री पद का जो दायित्व मिला है व कथित बड़े मंत्रालयों से ज्यादा महत्वपूर्ण व चुनौती भरा है। क्योंकि इन्हीं क्षेत्रों की पृष्ठभूमि पर आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला रखी जानी है। कोरोना से अर्थव्यवस्था को उबारने में देश को प्राणवायु तो भारतमाता ग्राम्यवासिनी से ही मिलनी है। श्री तोमर नरेन्द्र मोदी व अमित शाह दोनों शीर्ष नेताओं के विश्वसनीय हैं इसीलिए जब भी सरकार या संगठन को कोई सबक देना होता है तो पहला नाम श्री तोमर का ही आता है। वे संगठन में जहां मंडल अध्यक्ष, प्रदेश भाजयुमो, प्रदेश भाजपाध्यक्ष होते हुए राष्ट्रीय महामंत्री तक पहुंचे, वहीं नगर निगम पार्षद से लेकर विधायक, सांसद, राज्यसभा सदस्य निर्वाचित हुए।
पिछले कार्यकाल में वे इस्पात व खनन मंत्री थे..लेकिन पाँच साल पूरा होते-होते एक के बाद एक विभागों के अतिरिक्त दायित्व जुड़ते गए। जबकि सांगठनिक तौर पर वे गुजरात के विधानसभा चुनाव में वहां के प्रभारी रहे। संगठन और सरकार दोनों ही मामलों जहां कहीं कुछ पेंचीदगी दिखती है..वहां नरेन्द्र सिंह तोमर की अपरिहार्यता स्वमेव आ खड़ी होती है।
श्री तोमर की एक और खासियत दूसरे से अलग करती है वो हैं विवादों में डूबे बगैर विवादों को सुलझाना। मध्यप्रदेश में जो ये भाजपा सरकार है उसकी केंद्रीय भूमिका में कोई और नहीं श्री तोमर ही थे। ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए भाजपा में यही लाल कालीन बिछाने वालों में थे..जबकि ये स्वयं उसी चंबल-ग्वालियर क्षेत्र के क्षत्रप हैं जहां दशकों से महल का दबदबा चला आ रहा है। कोई दूसरा नेता होता तो उसका असुरक्षा बोध शायद ही जूनियर सिंधिया के लिए रास्ता बनाता।
जोड़तोड़ की सरकार में शिवराज सिंह चौहान का फिर से मुख्यमंत्री बन जाना सभी को चौंकाया। वजह श्री चौहान पर तोहमद थी कि जनता ने उनके नेतृत्व को नकार दिया इसलिए भाजपा हारी। सिद्धांततः यह सही भी है। सभी यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि प्रदेश के अगले मुख्यमंत्री श्री तोमर ही होंगे..लेकिन तोमर ने परोसी हुई थाल अपने मित्र की ओर खिसका दी और कुर्ता झाड़कर फिर अपने दायित्व में बिंध गए। राजनीति में तोमर-चौहान की युति की दुहाई आज भी दी जाती है। इसी युति ने..मध्यप्रदेश में दो-दो बार भाजपा की ताजपोशी कराई। इसबार जोड़ी टूटी थी, तोमर प्रदेश संगठन के अध्यक्ष नहीं थे। यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि केंद्र की राजनीति करते हुए भी नरेन्द्र सिंह तोमर मध्यप्रदेश की भाजपा के शुभंकर हैं।
भारतीय जनता पार्टी की नई पीढ़ी के जिन वरिष्ठ नेताओं ने अपने सहज, सरल और सफल व्यक्तित्व व कृतित्व से गहरी छाप छोड़ी है उनमें से नरेन्द्र सिंह तोमर का नाम सबसे आगे है। सहजता के आवरण में ढंका हुआ उनका कुशाग्र राजनय उनके व्यक्तित्व का चुम्बकीय आकर्षण है। यहीं वजह है कि 1998 से विधानसभा और फिर संसदीय पारी को आगे बढ़ाते हुए श्री तोमर प्रदेश ही नहीं देश में भाजपा की सरकार और संगठन से लेकर केन्द्रीय राजनीति तक अपरिहार्य हैं।
यह सब कुछ उन्हें विरासत में नहीं मिला अपितु उन्होंने अपनी लकीर खुद खींची, अपनी लीक स्वयं तैयार की। राजनीति के इस दौर में जहां धैर्य लुप्तप्राय तत्व है वहीं यह तोमरजी की सबसे बड़ी पूूँजी है। यही एक अद्भुत साम्य है जिसकी वजह से वे सरकार व संंगठन दोनोंं को प्रिय हैं। श्री तोमर की जड़ें राजनीति की जमीन पर गहराई तक हैं। वृस्तित जनाधार और लोकप्रियता की छांव उन्हें सहज, सरल, सौम्य और कुशाग्र बनाती है, यहीं उनके धैर्य और शक्ति-सामर्थ्य का आधार भी है।
श्री तोमर पूर्णत: सांस्कारिक राजनेता है जिन्होंने अपने दायित्व को कभी बड़ा या छोटा करके नहीं नापा। विद्यार्थी परिषद की छात्र राजनीति से उनके सार्वजनिक जीवन का शुभारंभ हुआ। श्री तोमर माटी से जुड़े नेता हैं, उन्होंने मुरैना जिले के ओरेठी गांव की जमीनी हकीकत देखी और यहीं से तप कर निकले। राजनीति में शून्य से शिखर तक पहुंचने वाले गिनती के ही सहयात्री ऐसे हैं जो गांव-मोहल्ले की राजनीति से चलकर दिल्ली के राजपथ तक पहुंचे।
श्री तोमर ने ग्वालियर नगर निगम की पार्षदी से चुनाव यात्रा शुरू की। वे तरूणाई में ही देश की मुख्य राजनीतिक धारा से जुड़ गए थे। आपातकाल के बाद 1977 में जब केन्द्र व प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार थी तब वे पार्टी के मण्डल अध्यक्ष बने। अपनी प्रभावी कार्यशैली और वक्तृत्व कला के जरिए वे मोर्चे के प्रदेश भर के युवाओं के चहेते बन गए परिणामत: 1996 में वे भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष बने।
यहां मैंने श्री तोमर के आरंभ काल का जिक्र इसलिए किया ताकि पार्टी की नई पीढ़ी यह जाने और समझे कि यदि लगन, निष्ठा और समर्पण है तो उसके उत्कर्ष को कोई बाधा नहीं रोक सकती, श्री तोमर, उनका व्यक्तित्व व उनकी राजनीतिक यात्रा इसका एक आदर्श व जीवंत प्रमाण है।
उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे सब कुछ करने, परिणाम देने व समर्थ होने के बावजूद भी स्वयं श्रेय लेने पर विश्वास नहीं करते। वे अपनी उपलब्धियों को साझा करते हैं। ‘शौमैनशिप’ उनमें दूर-दूर तक नहीं है।
मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में इस्पात व खान मंत्री के रूप में उनकी कार्यशैली,नवाचार व मूल्यवर्धित परिणाम देने की कला ने केंद्रीय नेतृत्व को प्रभावित किया। देश में खनन क्षेत्र को नया जीवन देने का बीड़ा इन्होंने उठाया व पहले ही दिन से उस दिशा में कार्यवाही शुरू कर दी। केन्द्र सरकार के खान मंत्रालय ने तोमरजी के नेतृत्व में खनन क्षेत्र में भारी ठहराव, अवैध खनन, पारदर्शिता की कमी और विनियमित ढ़ांचे की अपर्याप्तता की चुनौती से निपटने के लिए एमएमडीआर अधिनियम 1956 में व्यापक संशोधन किए। इससे अब केवल नीलामी प्रक्रिया के माध्यम से ही खनिज रियायतों का आवंटन हो सकेगा, विवेकाधिकार समाप्त हो गया, पारदर्शिता बढ़ गई, खनिज मूल्य में सरकार का हिस्सा बढ़ गया और निजी निवेश तथा आधुनिक प्रौद्योगिकी को आकृष्ट करने में सफलता मिली।
श्री तोमर के नेतृत्व व प्रशासनिक क्षमता का लोहा तो विपक्ष की राजनीति करने वाले भी मानते है। मेरी अपनी दृष्टि से श्री तोमर नई पीढ़ी के कार्यकर्ताओं के लिए इसलिए भी अनुगम्य और प्रेरणादायी हैं कि इकाई स्तर से शिखर की राजनीति तक का सफर किस धैर्य व संयम के साथ किया जाता है। वे एक पार्षद से विधायक, सांसद, मंत्री से केन्द्रीय मंत्री तक पहुंचे वहीं मंडल के अध्यक्ष के दायित्व से प्रदेश के अध्यक्ष, राष्ट्रीय महामंत्री बने। यह भारतीय जनता पार्टी में ही संभव है जहां कार्यकर्ता की क्षमता और निष्ठा का ईमानदारी से मूल्यांकन होता है। श्री तोमर इसकी जीती जागती मिसाल हैं।
चौबीस उपचुनावों की पहाड़ सी चुनौती से मुकाबिल कांग्रेस में घर की कलह थमने का नाम नही ले रही है।जिस चंबल ग्वालियर से बीजेपी सरकार के भविष्य का निर्णय होना है वहाँ कमलनाथ और दिग्विजयसिंह की लड़ाई खुलकर सामने आ गई है।कल पूर्व सीएम दिग्विजयसिंह ने राकेश चौधरी की घर वापसी पर एतराज जताया तो आज उनका जबाब देने के लिए चौधरी खुद भिंड से ग्वालियर आये और मीडिया के सामने दिग्विजयसिंह के अलावा अजय सिह और पूर्व मंत्री डॉ गोविंद सिंह पर गंभीर आरोप लगाए।माना जा रहा है कि कमलनाथ के इशारे पर ही चौधरी राकेश ने आज बकायदा प्रेस कांफ्रेंस लेकर यह हमला बोला है।चौधरी ने अजय सिंह पर जिस तल्खी के साथ आरोप लगाये है वे ठीक वैसे ही जैसे 2013 में पार्टी छोड़ते हुए लगाए गए थे।राकेश सिंह ने कहा कि अजय सिंह खुद तीन चुनाव हार चुके हैं और अपने पिता की विरासत को जो न बचा पाया हो वह कांग्रेस का क्या भला करेगा।राकेश सिंह ने इस कांफ्रेंस में जो कहा है उसके बहुत ही गहरे निहितार्थ भी है क्योंकि कल दिग्विजयसिंह ने कहा कि” मैं राकेश चौधरी के प्रवेश और मेहगांव से टिकट के पक्ष में नही हूँ”.आज इसका जबाब देते हुए उन्होंने कहाकि मैं तो कांग्रेस में ही हूँ और राहुल गांधी ने मुझसे खुद काम करने के लिए कहा है।यानी राकेश सिंह ने आज घोषित कर दिया कि वह कांग्रेस में है और उन्हें दिग्विजयसिंह, अजय सिंह की किसी एनओसी की जरूरत नही है।
मेहगांव से टिकट को लेकर चौधरी ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि कमलनाथ ने उन्हें बुलाकर पूछा है कि क्या वे चुनाव लड़ना चाहते है?इस पर उन्होंने एक तरह से अपनी सहमति व्यक्त की है पार्टी आदेश मानने के लहजे में।यानी कमलनाथ मेहगांव से चौधरी को टिकट देने का मन बना चुके है इसलिए कल के दिग्विजयसिंह के बयान का मतलब है इस मामले पर दोनों नेताओं के बीच मतभेद की स्थिति है।असल में अब यह स्पष्ट हो गया है कि मप्र में कमलनाथ और दिग्गीराजा के बीच समन्वय का दौर खत्म सा हो गया है जो कमलनाथ के सीएम रहते देखा जाता था।महीने भर में दिग्गीराजा को तीसरी बार यह कहना पड़ा है कि उनके और कमलनाथ के बीच कोई मतभेद नही है।यह साबित करता है कि जिन परिस्थितियों ने कमलनाथ सरकार के पतन की पटकथा लिखी थी कमोबेश उनमें कोई बुनियादी बदलाव नही आया है।राकेश चौधरी कमलनाथ और दिग्गीराजा के बीच अलगाव के प्रतीक भर है और यह भी समझना होगा कि सिंधिया के जाने के बाद कमलनाथ मप्र पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए भी व्यू रचना में जुटे है।ग्वालियर चंबल अंचल में वे अब उन चेहरों को आगे बढ़ाना चाहते है जो जीतने के बाद उनके हमकदम रहे।मेहगांव से राकेश चौधरी इसी व्यूह के मोहरे है।वैसे देखा जाए तो खुद दिग्विजयसिंह के भाई लक्ष्मण सिंह भी बीजेपी में चले गए थे लेकिन उन्हें पार्टी ने वापिस लेकर दो चुनाव लड़ाए।कमलनाथ इसे चौधरी पर लागू कर दिग्गीराजा को मैसेज देना चाहते है।कमलनाथ ऑफ द रिकॉर्ड सरकार जाने के लिए भी दिग्विजयसिंह को जिम्मेदार मानते है क्योंकि नाराज विधायकों के साथ दिग्विजय ही फ्रंट फूट पर बात कर रहे थे।इस आशय का उनका बयान भी पिछले दिनों सामने आ चुका है।जाहिर है मप्र कांग्रेस में जहां ज्यादा एकजुटता और आक्रमकता की आवश्यकता है वहा पार्टी के शीर्ष पर मतभेदों का यह खुला अंबार उसकी वापिसी के सपनों को परवान नही चढ़ने देगा।
यह भी समझना होगा कि इस अंचल में कमलनाथ के पास खुद की कोई पूंजी नही है सिंधिया के बाद जो कांग्रेस नजर आती है उसके तार दिग्गीराजा से ही जुड़े है क्योंकि न तो प्रदेशाध्यक्ष और न सीएम रहते हुए ही कमलनाथ कभी इस इलाके में आये।महल से कूटनीतिक मोर्चा राजा ही लेते रहे है इसलिए बरास्ता राहुल गांधी(जैसा कि आज चौधरी राकेश सिह ने कहा) नई खिचड़ी पकाने का प्रयास कमलनाथ करते है तो इसकी सफलता की संभावना कम ही होगी।राकेश के रूप में कमलनाथ का यह दूसरा हमला है दिग्गीराजा पर इससे पहले अशोक सिंह को प्रदेश महामंत्री से ग्वालियर ग्रामी न का अध्यक्ष बनाया जाना भी सियासी सन्देश देता था।तब जबकि अशोक सिंह गवलियर महानगर की दो सीटों से दावेदार थे।