ग्वालियर सीट पर होने वाला उपचुनाव इस बात का परीक्षण भी होगा कि क्या जनता से सतत सम्पर्क का वोटिंग विहेवियर(मतदान व्यवहार)से कोई स्थाई रिश्ता होता है या नही? यहां से बीजेपी के कैंडिडेट प्रधुम्न सिंह तोमर मप्र में नरोत्तम मिश्रा के बाद सर्वाधिक जनसम्पर्क रखने वाले नेता है लिहाजा दलबदल के साथ उनका केन्डिडेचर उनके जनसपंर्क की निजी पूंजी का इम्तिहान भी होगा।
प्रधुम्न सिंह तोमर ग्वालियर से चौथा चुनाव लड़ेंगे।दो चुनाव वह जीत चुके है कमलनाथ सरकार में खाद्य मंत्री से स्तीफा देने वाले तोमर की खासियत यह है कि वे ग्वालियर विधानसभा के हर आम -ओ- खास के साथ खुद सतत सम्पर्क में रहते है।माना जाता है कि उनका खुद का निजी वोट बैंक भी है जिसे वह लगातार सहेजते रहे है।जनता की मूलभूत समस्याओं के लिए अक्सर सड़कों और जेल में दिखाई देने वाले प्रधुम्न सिंह के सामने नई चुनौती बीजेपी के निशान पर चुनाव लड़ने की है।वही बीजेपी जिसके विरुद्ध वह 15 साल तक सड़कों पर लड़ते रहे है।उसके कार्यकर्ताओं ,नेताओं से उनका खुला टकराव होता रहा है।वैसे ग्वालियर की सियासत को नजदीक से समझने वाले जानते है कि प्रधुम्न सिंह को जितना चुनावी सहयोग कांग्रेस से नही मिलता उससे अधिक कमलदल से मिल जाता है।वजह बीजेपी के नेता जयभान सिंह पवैया है जिनके नेचर को लेकर न केवल बीजेपी वर्कर बल्कि आम जनता में भी तीखी प्रतिक्रिया रहती है।2018 के चुनाव में पवैया की पराजय दीवार पर मोटे हरूफ में लिखी इबारत की तरह साफ थी क्योंकि मंत्री रहते हुए उनके पास ऐसी कोई उपलब्धि नही थी जो उन्हें इस उपनगर से फिर जिताने के लिए आधार बने उल्टे पांच साल उनके रूखे व्यवहार से जनता बेहद खफा थी।यही कारण था कि जनसघर्ष से नेता बनने वाले प्रधुम्न को 2018 में जीत के लिए कोई जतन नही करना पड़ा।
असल मे ग्वालियर सीट बीजेपी का गढ़ रही है यहां से केंद्रीय पंचायत मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर 1998 और 2003 में विधायक रहे है।डॉ धर्मवीर जैसे नेता भी यहां बीजेपी का झंडा गाड़ चुके है।यह इलाका बन्द हो चुके मिल्स के बेरोजगार श्रमिकों का भी है और महानगर की सबसे पिछड़ी बस्तियां भी यहीं है।यहाँ ठाकुर,ब्राह्मण,कोली,किरार,कमरिया(यादव),बाथम भोई,जाटव,शिवहरे,बिरादरी बहुसंख्यात्मक क्रम में है।इनके अलावा वैश्य ,राठौर,मुस्लिम,कुर्मी पटेल,लोधी,बघेल,पंजाबी,बाल्मीकि,प्रजापति,सेन,धोबी,नामदेव,गुर्जर,परिहार, खटीक,धानुक,बरार, सहित लगभग सभी जातियों को समेटे यह विधानसभा सीवर,पेयजल,सड़क,बिजली,बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर आज भी पिछड़ेपन का अहसास कराती है।प्रदेश सरकार में नरेंद्र सिंह तोमर,जयभान सिंह पवैया,प्रधुम्न सिंह जैसे कद्दावर मंत्री इस क्षेत्र ने दिये है लेकिन अभी भी यहां मूलभूत मामलों पर काम की लंबी फेहरिस्त है।यह तथ्य है कि विकास कार्य भी यहां बड़े पैमाने पर हुए है।
उपचुनाव की चर्चा पूरे क्षेत्र में है प्रधुम्न सिंह जबसे बेंगलुरू से लौटे है लगातार गली मोहल्लों में अपनी बैठक जमाये हुए है।कोरोना में भी उन्होने सेवा कार्यों में कोई कसर नही छोड़ी।लेकिन समस्या यहाँ बीजेपी और कांग्रेस से आये कार्यकर्ताओं के सुमेलन की है।प्रधुम्न पहल कर इसके लिये आगे भी बढ़े तो पवैया शायद ही इसके लिए तैयार हो।असल मे जयभान सिंह के लिये प्रधुम्न का बीजेपी से जीतने का मतलब है सियासी वानप्रस्थ। हालांकि पार्टी के निर्णय के विरुद्ध पवैया का जाना मुश्किल है लेकिन यहां पुरानी अदावत को आबोहवा में साफ महसूस किया जा सकता है। जो चुनावी गणित है वह फिलहाल प्रधुम्न सिंह के पक्ष में है क्योंकि उन्हें बीजेपी में सबसे ताकतवर नेता नरेंद्र सिंह सपोर्ट करेंगे।इनके अलावा सांसद विवेक शेजवलकर ,माया सिंह, वेदप्रकाश शर्मा,जयसिंह कुशवाह, सहित ग्वालियर के सभी बड़े नेता सिंधिया के साथ समन्वय की बात कह रहे है। स्वयं प्रधुम्न की पूंजी भी यहां कम नही है। तोमर ठाकुरों के अलावा कोली और बाथम समाज में प्रधुम्न का जबरदस्त जनाधार है इसके अलावा गरीब तबके में भी वह लोकप्रिय है।
उधर कांग्रेस के पास यहां से उतारने के लिए माथापच्ची करनी पड़ रही है क्योंकि जो सबसे प्रबल दावेदार है सुनील शर्मा वह कट्टर सिंधिया समर्थक रहे है।इतने स्वामी भक्त की पूरी चुनावी तैयारी के बाबजूद सिंधिया के कहने पर प्रधुम्न के लिए 2018 में मैदान छोड़ दिया।दूसरा नाम पूर्व जिलाध्यक्ष अशोक शर्मा का है कभी सुरेश पचौरी के नजदीक रहे अशोक शर्मा पहले भी इस सीट से नरेंद्र सिंह तोमर के विरुद्ध चुनाव लड़कर 26358 वोट से हार चुके है। स्थानीय राजनीति के पुराने खिलाड़ी होने के कारण उनके नाम पर भी कांग्रेस निर्णय कर सकती है।सुनील शर्मा की तुलना में वे सिंधिया के ज्यादा विरोधी कहे जा सकते है।अशोक शर्मा चूंकि सनाढ्य ब्राह्मण है और यहां इस उपवर्ग के ब्राह्मण ही सर्वाधिक है इसलिए उनकी दावेदारी को यहाँ अगर कांग्रेस दरकिनार करती है तो उसका ब्राह्मण कार्ड सुनील शर्मा के सहारे कमजोर पड़ सकता हैं क्योंकि सुनील यहां के स्थानीय ब्राह्मण न होकर मारवाड़ी है। सुनील कांग्रेस कैडर से ज्यादा सिंधिया भक्ति के चलते यहाँ केन्डिडेचर डवलप करने में सफल हुए है।उनके विरुद्ध कांग्रेस की बड़ी लॉबी यहां सक्रिय हो गई है।पिछले7 चुनावों में यहां बीजेपी चार और कांग्रेस तीन बार जीती है।बसपा का प्रभाव भी इस सीट पर अच्छा है।1990 से औसतन 16 परसेंट वोट यहां बसपा लेती आ रही है।इस बार भी बसपा यहां उम्मीदवार खड़ा करेगी जो कांग्रेस के लिए मुसीबत ही होगा।
भोपाल। समर्थन मूल्य पर मुक्त हस्त से फसलों की खरीद करने के मध्यप्रदेश सरकार के फैसले को प्रदेश के बड़े किसानों ने मुनाफा कमाने का साधन बना लिया है। वे अपनी अधिक जोत को फसलों की खरीद के लिए पंजीकृत करा लेते हैं। इससे उनकी फसलों का अधिकतर भाग सरकारी खरीद के दायरे में आ जाता है। इस साल जबकि कोरोना संकट के चलते सरकार की माली हालत खस्ता है तब भी ऐसे किसानों ने अपनी उपज सरकार को बेचने में सफलता पाई है। जबकि छोटे जोत वाले किसानों का खाद्यान्न बहुत कम खरीदा गया है। इस खामी के सामने आने के बाद अब सरकार के कान खड़े हुए हैं और उसने सीलिंग एक्ट के तहत जमीनों के रकबे की जांच भी शुरु कर दी है।
जमीन के रकबे के आधार पर फसल बिक्री के लिए किसानों ने जो पंजीयन कराया है उन आंकड़ों की जांच कराने पर कई बड़े किसानों को अपनी जमीनें बचाना कठिन हो जाएगा। कई जिलों में किसानों के पास जमीन का रकबा इतना ज्यादा है, जो सीलिंग एक्ट के दायरे में आ सकता है।
मप्र कृषि जोत अधिकतम सीमा अधिनियम 1960 (सीलिंग एक्ट)की धारा 7 के तहत प्रदेश के किसानों को खेती के लिए जमीन की अधिकतम जोत रखने का अधिकार है। यह पात्रता परिवार में सदस्यों की संख्या के आधार पर है। पिछले कुछ सालों में किसानों की जमीन की सिंचाई का रकबा बढ़ा है। केसीसी में अधिकतम कर्ज लेने के लिए भी किसानों ने राजस्व अभिलेखों में असिंचित जमीन को सिंचित करवाया है। साथ ही समर्थन मूल्य पर रबी एवं गर्मियों की फसलों की बिक्री के लिए जमीन को दो फसलीय सिंचित दर्ज कराया है। ऐसे में किसानों की सिंचित जमीन का रकबा बढ़ा है। इसका रिकॉर्ड किसान हर साल समर्थन मूल्य पर फसल बेचने के लिए पंजीयन कराते समय देते हैं। इसी रिकॉर्ड के आधार पर जांच हुई तो कई किसान इसके लपेटे में आ सकते हैं। खास बात यह है कि प्रदेश के किसी भी किसान के पास प्रदेश के किसी भी हिस्से में जमीन ज्यादा होती है तो वह सीलिंग एक्ट में आ सकती है।
तहसील स्तर के मामले की सुनवाई एसडीएम करते हैं। दो अलग-अलग तहसील के मामलों की सुनवाई कलेक्टर कोर्ट में होती है। दो जिलों के मामले की सुनवाई संभागायुक्त करते हैं। जबकि दो अलग-अलग संभाग में जमीन से जुड़े मामले की सुनवाई आयुक्त, भू-अभिलेख एवं बंदोबस्त करते हैं।
एक व्यक्ति एक फसलीय सिंचित जमीन 15 एकड़ तक रख सकता है। पांच सदस्यतीय परिवार 27 एकड़ तक रख सकता है। जबकि पांच से ज्यादा सदस्य होने पर हर सदस्य को 4.5 एकड़ रखने का अधिकार है, लेकिन अधिकतम 54 एकड़ तक रखी जा सकती है।
एक व्यक्ति दो फसलीय 10 एकड़ तक जमीन अपने पास रख सकता है। पांच सदस्यीय परिवार पति-पत्नी एवं तीन नाबालिग के लिए अधिकतम 18 एकड़ जमीन रखने का अधिकार है। संयुक्त परिवार जिसमें पति-पत्नी एवं तीन नाबालिगों के लिए यह सीमा अधिकतम 18 एकड़ है, लेकिन इससे ज्यादा सदस्य होने पर पांच से ज्यादा सदस्य होने पर हर सदस्य को 3 एकड़ जमीन रखने का अधिकार है, यह अधिकतम 36 एकड़ तक रखी जा सकती है।
इसी तरह असिंचित जमीन एक व्यक्ति 30 एकड़ तक रख सकता है। पांच सदस्यीय परिवार (दो नाबालिग समेत)54 एकड़ जमीन रख सकता है, पांच से ज्यादा सदस्य होने पर प्रति सदस्य 9 एकड़ असिंचित जमीन रख सकता है। लेकिन यह अधिकतम 108 एकड़ तक रखी जा सकती है। इससे ज्यादा जमीन होने पर सीलिंग एक्ट के तहत सरकार ले सकती है।
सीलिंग एक्ट के प्रकरणों की सुनवाई अलग-अलग स्तर पर होती है। इन सभी मामलों में आपत्ति होने पर इन मामलों का निराकरण शासन स्तर पर किया जाता है। ज्ञानेश्वर बी पाटिल, आयुक्त, भू-अभिलेख एवं बंदोबस्त एवं सचिव राजस्व
नेपाल के प्रधानमंत्री खड़ग प्रसाद शर्मा उर्फ ओली की हालिया हरकतों ने बता दिया है कि भारत और नेपाल के आपसी संबंधों पर नए सिरे से विचार करने का समय आ गया है।
के. विक्रम राव
हिन्दू-बहुल नेपाल के परले दर्जे के दहशतगर्द, नक्सली प्रधान मंत्री पंडित खड्ग प्रसाद शर्मा उर्फ़ ओली ने अपने इष्टदेव लाल चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को प्रसन्न कर दिया| ऐसी बेला पर जब दो एशियाई महाशक्तियां (लोकतान्त्रिक भारत तथा कम्युनिस्ट चीन) बौद्ध (पूर्वी) लद्दाख में बीजिंग द्वारा प्रायोजित मुठभेड़ में आमने सामने हैं, तो नेपाल ने एक नया मानचित्र प्रकाशित कर डाला| इसमें उत्तराखण्ड के धारचूला क्षेत्र वाले लिपुलेख मार्ग को अपना भूभाग दर्शा दिया| उसकी नीयत यही है कि दुनिया को दिखाये कि भारत विस्तारवादी राष्ट्र है जो दोनों पड़ोसियों से एक साथ उलझ गया है | संयोग नहीं, नेपाल का ऐसा इरादा है कि अट्ठावन-वर्ष पूर्व हुए भारत-चीन संग्राम को दुबारा मंचित किया जाय| इसी गलवान नदी के निकट भारतीय क्षेत्र अक्साई चिन के सरोवरों पर तब अपना कब्ज़ा किया था| आज उसे मजबूत करने का लाल चीन का आशय है| इसीलिए तब (20 अक्टूबर 1962) युद्ध हुआ था| लोक सभा में इसी अक्साई चिन क्षेत्र पर नेहरु सरकार की फजीहत हुई थी| तब पूरी संसद चीन की जनमुक्ति सेना द्वारा बोमडिला (आज का अरुणांचल) से अक्साई चिन (लद्दाख) तक भारतीय सेना के संहार और लूट से आक्रोशित थी| रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन ने सदन को आश्वस्त करते कहा था कि “चीन-अधिकृत सीमा क्षेत्रों में घास तक नहीं उगती|” इस पर देहरादूनवासी महावीर त्यागी ने कहा था “मेरी गंजी खोपड़ी पर भी कुछ नहीं उगता है| अतः पण्डित नेहरु जी, इसे भी चीन को दे दीजिये|”
आज छः दशक बाद फिर सीमा पर संकट है| इस बार लजाकर, पराजय बोध लिए आँख में पानी भरने को भारतीय तैयार नहीं हैं| चीन ही नहीं, कम्युनिस्ट-नियंत्रित नेपाल से भी हिसाब चुकता करना होगा| एक घोषणा भारतीय संसद ने 1953 में की थी कि नेपाल पर आक्रमण भारत पर ऐलाने-जंग माना जायेगा|
आखिर इस शर्मा ‘ओली’ की साजिश क्या है ? कौन है यह ? इन्हें इस्लामिक स्टेट ऑफ़ ईराक एण्ड सीरिया का मृत आतंकी, स्वघोषित आलमी खलीफा अबू बकर अल बगदादी का ही फोटोकॉपी माना जाता है|
नक्सली चारु मजूमदार का प्रेरित शिष्य, यह ओली नेपाल-बंगाल सीमा पर, कभी अपनी जन अदालत बनाकर भूस्वामियों का सर कलम करता था| वर्गशत्रु की हत्या को नक्सली धर्म कहता था| लेकिन ऐसा किसान-पुत्र शीघ्र ही अकूत धन और जमीन हथियाने लगा| धन बल से सत्ता पाना लक्ष्य हो गया| क्रमशः इनके वैचारिक भटकाव से ग्रसित नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी भी कई टुकड़ों में विभाजित हो गई| पुष्प कमल दहल प्रचण्ड, विष्णु प्रसाद पाउडेल, माधव कुमार नेपाल, वामदेव गौतम, रामबहादुर थापा, झालानाथ खनल आदि| इनकी अतिवादिता में सिर्फ मात्रा का अन्तर ही है|
इन लाल सितारों की राजनीतिक गंभीरता का अंदाजा यह जानकर लग जाता है की भारत के विरुद्ध विष-वमन तथा चीन के प्रति चरणछू प्रतिस्पर्धा में इनमें कौन कितना तेज है? इस वक्त पण्डित ओली अव्वल नम्बर पर हैं| उनका निष्कर्ष, उनका सुविचारित निदान है कि भारत से नेपाल में आया कोरोना ज्यादा भयंकर है| बनिस्बत चीन से फैले वायरस के| यह मूढ़ता और बुद्धिशून्यता का चरम हो गया है| इन्हीं प्रधान मंत्री ओली ने कहा कि सुता क्षेत्र नेपाल का है| जबकि गोरखपुर से लगा यह इलाका बिहार के पश्चिमी चंपारण जनपद का भूभाग है |
पण्डित ओली की एक और ख्याति है| उनके नाम से रंग बिरंगे एनजीओ पलते हैं| सारा धन (देसी व विदेसी) इन्हीं के मार्फ़त जमाखर्च होता है| पिछले अप्रैल में आये भूकम्प के समय बटोरी 40 लाख डालर की राशि अभी तक राहत में खर्च नहीं हुई| तो किसके जेब में खो गयी? ओली जानें| विचारधारा से कम्युनिस्ट ओली लेनिनवादी नहीं हैं, वे स्तालिनवादी हैं| कट्टर हैं| शायद ही कोई अपराध उनसे नहीं हुआ हो| नेपाल समाजवादी पार्टी के नेता सुरेन्द्र यादव का अपहरण तथा हत्या की साजिश का श्रेय ओली को जाता है|
यहाँ यादगार बात है कि जब भूटान का डोकलाम वाला हादसा हुआ था तो भारत अड़ गया| चीन को पीछे हटना पड़ा था| ठीक तभी राहुल गाँधी चीन के राजदूत के दिल्ली-स्थित शांतिपथ आवास में रात्रिभोज पर गये थे| फिर वे तिब्बत भी गए थे| इस बार वे खामोश हैं| शायद उनके पिताश्री के नाना की 1962 के सीमा संग्राम में हुई पराजय का बोध ताजा रहा होगा| इस बार उनकी जननी और भगिनी भी मोदी पर कुछ बोली नहीं| शायद योगी की बसों पर अटकी होंगी| उनकी टिप्पणी अपेक्षित थी जब ओली शर्मा ने नरेंद्र मोदी की भर्त्सना में राय दी थी| वे बोले थे कि सीमा मामले पर भारतीय प्रधान मंत्री “सत्यमेव जयते” पर यकीन करते हैं अथवा “सिंहमेव जयते” (ललाट के तीन शेर) को मानते हैं| अर्थात बल प्रयोग पर भरोसा है?
दुखद आश्चर्य होता है कि पूज्य मत्स्येन्द्रनाथ द्वारा पवित्र की गयी भूमि आज अनीश्वरवादी कम्युनिस्टों के चंगुल में सिसक रही है| विश्व के इस एकमात्र हिन्दू राष्ट्र पर भी तेरहवीं सदी में शमशुद्दीन बेग आलम नाम के इस्लामिक आक्रमणकारी ने हमला किया था। इस्लामिक सेना काफी बड़ी थी और नेपाल की गुरखा सेना बेहद छोटी थी। फलस्वरूप गुरखा हार गए लेकिन हमेशा की तरह वे बहादुरी से लडे थे जिससे इस्लामिक सेना को भी बडा भारी नुकसान हुआ था। युद्ध के पश्चात् गोरखा सेनापति अकेला बचा था और दस दस मुस्लिम सैनिकों को टक्कर दे रहा था। यह नजारा देख कर शमशुद्दीन ने अपने सैनिकों को लडाई रोकने का आदेश दिया और त्रस्त होकर मैदान छोड़ दिया|
आज इस्लामाबाद के साये में भारत-नेपाल सीमा पर मस्जिदों का बेतहाशा निर्माण हो गया है| चीन के साथ मिलकर, पाकिस्तान से यारी कर पण्डित ओली भारत-विरोधी त्रिगुट रच रहे हैं| नेपाल की धर्मप्रिय जनता को समाधान पर सोचना होगा|
K Vikram Rao Mobile -9415000909 E-mail –k.vikramrao@gmail.com
पब्लिक सब जानती है, मत बहाएं प्रवासी श्रमिकों को लेकर घड़ियाली आंसू
कोरोना के इस अभूतपूर्व संकट के दौरान प्रवासी श्रमिकों एवं कामगारों को लेकर राजनीति चरम पर है। एक ओर जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुआई में लॉकडाउन के पहले चरण से ही श्रमिकों के ससम्मान और सुरक्षित वापसी के लिए हर संभव प्रयास किये जा रहें हैं वहीं कुछ दिनों से अपनी असली-नकली बसों के जरिए कांग्रेस प्रदेश इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। सपा और बसपा कमोबेश यही काम ट्वीटर पर कर रहे हैं। इस आरोप-प्रत्यारोप से दीगर पलायन से जुड़ी समस्या का एक और पहलू भी है। क्या वजह है कि उप्र के लोग इतनी बड़ी संख्या में घर-परिवार, नाते-रिश्तेदार को छोड़ अपनी जवानी खपाने दूसरे प्रदेशों के बड़े शहरों में जाते हैं? आजादी के इतने वर्षों के बाद भी देश की सबसे उर्वर भूमि (इंडो गंगेटिक बेल्ट) गंगा, यमुना और घाघरा जैसी बड़ी नदियों, वैविध्यपूर्ण जलवायु और प्रचुर मानव संसाधन होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर क्यों नहीं उपलब्ध हैं? इसके लिए दोषी कौन है? कुछ आंकड़ों से यह तस्वीर साफ हो जाएगी। उप्र से पिछले दो दशकों में 20 से 29 वर्ष की उम्र के लोगों का पलायन 97 फीसद बढ़ा है। यही किसी व्यक्ति की सर्वाधिक उत्पादक उम्र होती है। इसी उम्र में वह घर-परिवार, समाज, प्रदेश और देश को अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकता है। त्रासदी यह कि इसी समयावधि में उप्र से पलायन की यह दर पड़ोसी राज्य बिहार की तुलना में दोगुनी है।
ये आंकड़े खेतीबाड़ी से जुड़ी देश की सबसे बड़ी संस्था भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के हैं। आईसीएआर द्वारा प्रकाशित रिसर्च जनरल डबलिंग फार्मर इनकम स्ट्रेटजी ऑफ उत्तर प्रदेश में इसका जिक्र है। गौर करने लायक है कि पिछले दो दशकों के दौरान प्रदेश में किनकी सत्ता थी। साथ ही आजादी के बाद प्रदेश में सर्वाधिक समय तक कौन सत्ता में रहा।
हर कोई जानता है कि सर्वाधिक समय तक प्रदेश की सत्ता में कांग्रेस रही है और पिछले दो दशकों में अधिकांश समय तक सपा और बसपा ही सत्ता पर काबिज रहीं। फिर भी अगर यहां से लोग रोजी-रोटी की तलाश में बाहर जाते रहे तो इसका दोषी कौन?
संबंधित दलों के प्रबुद्ध लोग जरूर इस आंकड़े से वाकिफ होंगे। अगर नहीं है तो ये उनके लिए शर्म की बात है। शर्त यह है कि अगर उनके पास शर्म बची हो। ऐसे में कोरोना के संकट के कारण महाराष्ट्र, पंजाब, दिल्ली और हरियाणा के बड़े शहरों में अपने सपनों को पूरा करने के लिए जो लोग गये हैं उनके संकट से भी जरूर वाकिफ होंगे। फिर पहले लॉकडाउन के समय से ही उनको इसका आभास क्यों नहीं हुआ? क्यों वे शुतुरमुर्ग की तरह इस संकट को बढऩे की प्रतीक्षा कर रहे थे? दिल्ली को छोड़ इनमें से सभी राज्यों में कांग्रेस सत्ता में साझीदार है। सवाल उठता है कि कांग्रेस ने तब तक का इंतजार क्यों किया जब प्रवासी सडक पर आ गये। जेठ की तपती धूप में वे भूख-प्यास से बेहाल होने लगे। सडकों पर कुचलकर वे मरने लगे। क्या कांग्रेस अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए इसी समय की प्रतीक्षा कर रही थी।
लॉकडाउन के पहले ही चरण में राजधानी और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में लाखों की संख्या में श्रमिक सडक पर आ गये तो कांग्रेस सहित अन्य दल क्या कर रहे थे? कोटा और राजस्थान की समृद्धि में योगदान देने वाले हजारों बच्चों को उनके घर तक पहुंचाने के लिए कांग्रेस ने क्या किया? जब पानी सर के ऊपर से गुजर गया तो सोचा कि बहती गंगा में डुबकी लगा कर पुण्य कमा लिया जाये। आने वाले समय में जनता उससे ये सवाल जरूर पूछेगी।
जहां तक भाजपा खास कर उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बात है तो वह पहले दिन से ही वे प्रवासी मजदूरों से होने वाली इस समस्या और इससे उत्पन्न समस्याओं एवं चुनौतियों के प्रति संजीदा थे। दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से अप्रैल के अंत में दिन-रात एक कर चार दिनों में चार लाख से अधिक श्रमिकों की वापसी, कोटा से 12 हजार बच्चों और प्रयागराज से 10 हजार बच्चों की वापसी इसका सबूत है। यही नहीं अब तक 1000 से अधिक ट्रेनों और बसों के जरिये करीब 22 लाख से अधिक लोगों की घर वापसी हो चुकी है। वह भी पूरी सुरक्षा और सम्मान से। हर आने वाले को उसकी दक्षता के अनुसार वह स्थानीय स्तर पर रोजी-रोटी की भी चिंता कर रहे हैं। बावजूद इसके इतनी घटिया राजनीति का कोई औचित्य नहीं।
सिंधिया के सिपहसालार गोविंद राजपूत को परास्त करने का मंसूबा पालना आसान है लेकिन उन्हें हराना अब आसान नहीं है। सागर जिले के सुरखी विधानसभा क्षेत्र में उनको हराने और हरवाने की कला सिर्फ पूर्व गृहमंत्री भूपेंद्रसिंह के पास है लेकिन वे ही अब गोविंदसिंह राजपूत के सारथी होंगे। तकरीबन तय है कि चुनाव का संचालन कद्दावर नेता भूपेंद्रसिंह के हाथों में होगा। सुरखी में भाजपा का परचम भूपेंद्र सिंह ने ही लहराया था,यह मूलरूप से उनका ही विधानसभा क्षेत्र रहा है। सुरखी में दोनों के खेमे एक होने का अर्थ 1+1=2 नहीं बल्कि =11 होगा। गोविंद राजपूत को 2013 के विधानसभा चुनाव में पराजित करने वाली पूर्व कांग्रेस विधायक संतोष साहू की बेटी पारुल साहू भी भूपेंद्र सिंह की ही खोज थीं। पिछले चुनाव में पारुल साहू टिकट काट कर भाजपा ने जैसे गोविंद राजपूत को वाकओवर ही दे दिया था। तब से पारुल साहू अपनी ही पार्टी में उपेक्षित महसूस कर रही हैं लेकिन लगता नहीं कि वे पार्टी छोड़ कर कांग्रेस की कमजोर कश्ती में सवार होंगी। ऐसे में असली प्रत्याशी ढूंढ़ना ही कांग्रेस के लिए चुनौती भरा काम है।
यह हैरत की बात है कि कांग्रेस में रहते हुए गोविंद राजपूत के खिलाफ प्रत्याशी की खोज और तैयारी करना होती थी क्योंकि इस कठिन चुनौती के लिए कोई आसानी से तैयार नहीं होता था। लेकिन आज जब गोविंद भाजपा ज्वाइन करके,मंत्री बनके अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ मैदान में खड़े हैं तब उनके खिलाफ चुनाव लड़ने कांग्रेस से लगभग बीस प्रत्याशी टिकट मांग रहे हैं। और मैं इन सबके नाक्म देने की जहमत उठाए बिना साफ तौर पर इन सबको यह कह कर खारिज कर रहा हूं कि इनमें से एक भी गोविंद का टक्कर देने का माद्दा नहीं रखता। फिर कांग्रेस में टिकटार्थियों की इतनी लंबी क्यू क्यों है!? इसका उत्तर सीधा और सपाट है कि कांग्रेस के ज्यादातर अभ्यर्थी अपने ही हाईकमान और क्षत्रपों की आंतरिक वेदना और प्रतिशोध की भावनाओं का नगदीकरण करना चाह रहे हैं।
जैसी कि खबरें आ रही हैं कि कमलनाथ और दिग्विजय सिंह सरकार गिराने के लिए सिंधिया को तगड़ा सबक सिखाना चाह रहे हैं। इसके लिए जो लक्ष्य रखे गए हैं उसमें से एक लक्ष्य गोविंद राजपूत को ‘एनीहाऊ’ पराजित करना भी है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं में अफवाह यहां तक है कि सुरखी के लिए दस करोड़ का बजट रखा गया है। बस यही दस करोड़ वह अनकापल्ली गुड़ है जिसके लिए मक्खियां बड़ी तादाद में भिनभिना रही हैं।…और इस मानसिकता वाली ये मक्खियां अच्छी तरह जानती हैं कि यह गुड़ चट कर जाने वाली मक्खी को शत्रुपक्ष से भी शहद चाटने का तगड़ा प्रस्ताव मिल सकता है। तो कांग्रेस के सामने पहली चुनौती यह सावधानी बरतने की है कि उन्हें असल प्रत्याशी खोजना है और जयचंद या मीरजाफरों से बचना है। जाहिर है जयचंद बड़े-बड़े कागजी समीकरण बना कर हाईकमान को रिझा रहे हैं पर ये सब उनके सब्जबाग हैं।
असलियत यह है कि कांग्रेस के सामने संभावनाशील प्रत्याशी चयन के सीमित विकल्प हैं। पहला यह कि कांग्रेस का कोई कद्दावर नेता सुरखी से मैदान में उतरे। इनमें अजयसिंह राहुल भैया शीर्ष पर हैं। उसकी वजह यह है कि स्थानीय भाजपा नेता राजेंद्रसिंह मोकलपुर से सिर्फ उन्हीं की पटरी बैठती है। राजेंद्रसिंह से गोविंद राजपूत की ऐसी व्यक्तिगत अदावत है कि यदि उन्हें हराने की ठोस परिस्थिति बनती दिखी तब वे इसके लिए भाजपा छोड़ने जैसा कदम भी उठा सकते हैं।
कांग्रेस के पास दूसरा विकल्प यह है कि भाजपा से राजेंद्र सिंह मोकलपुर या पारुलसाहू को तोड़ कर टिकट दिया जाए। पारुल साहू का टूटना मुश्किल काम है पर असंभव भी नहीं है। मोकलपुर टूट सकते हैं पर इसके लिए ठोस परिस्थितियां बनानी होंगी। वे अगर तैयार हो गए तो यह उनकी गोविंद राजपूत से प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष चौथी और भीषण जंग होगी। इस जंग के लिए वे लगातार अनुभवी होते जा रहे हैं और क्षेत्र की जनता भी उनको एक मौका देने पर विचार कर सकती है। कांग्रेसी और भाजपाई दोनों कार्यकर्ता उनके साथ आज भी फ्रेंडली हैं।
इसके अलावा एक तीसरा और इकलौता विकल्प कांग्रेस के पास यह है कि वह अपने पुराने और कद्दावर कांग्रेसी नेता रहे विट्ठलभाई पटेल की नातिन धारणा पटेल को चुनाव लड़ने के लिए तैयार करे। यहां ध्यान रहे कि सुरखी क्षेत्र विट्ठलभाई का ही चुनाव क्षेत्र रहा है जहां उनको दीवान भगतसिंह भापेल ने अपनी राजनैतिक जमीन देकर जिताया और मंत्री के ओहदे तक पहुंचाया। पटेल परिवार कांग्रेस का निष्ठावान और पुराना परिवार रहा है। सुरखी क्षेत्र की जनता, वहां के कांग्रेस कार्यकर्ताओं में अब भी इस परिवार के प्रति विश्वास और सम्मान है। दरअसल कांग्रेस की तरफ से सुरखी क्षेत्र में गोविंद राजपूत की आरंभिक सफलताओं में विट्ठलभाई का भी योगदान रहा है। क्षेत्र के जातिगत समीकरण भी पटेल परिवार के पक्ष में हैं। वहां का परंपरागत कांग्रेसी वोटर और कांग्रेसी कार्यकर्ता इसके लिए आश्वस्त हो सकता है कि यह प्रत्याशी बिकेगा और झुकेगा नहीं और भविष्य में भी संघर्ष के लिए साथ रहेगा।
धारणा पटेल वैसा ही फ्रेश, ऊर्जा से भरा,अंग्रेजीदां चेहरा है जैसी कि पारुल साहू थीं। गोविंद राजपूत खेमा ऐसे ही गुमनाम और नये चेहरे से भयभीत होता है क्योंकि तब उनकी सारी रणनीतियां असमंजस का शिकार हो जाती हैं। महिला मतदाताओं का सपोर्ट एकपक्षीय हो जाता है। धारणा पटेल वैसे तो कुछ वर्षों से एनजीओ के सहारे अपनी पुश्तैनी विरासत को रचनात्मक गति देने में सक्रिय हैं पर वे राजनीति के लिए एकदम नई हैं। उनका पूरा कैंपेन दिल्ली और भोपाल के वरिष्ठ नेताओं को हाथ में लेना होगा। आर्थिक मोर्चे पर भी अब इस परिवार से बहुत बेहतर की उम्मीद नहीं की जा सकती। लेकिन कुछ वर्षों पहले दादा विट्ठलभाई पटेल और हाल में पिता संजयभाई पटेल की मृत्यु की सहानुभूति लहर क्षेत्र की जनता और जिले के कांग्रेस कार्यकर्ताओं को उद्वेलित कर सकती है। इस तरह पार्टी को एक बेहतर संभावनाओं वाला प्रत्याशी हासिल होगा। लगभग महीने भर से कांग्रेस नेतृत्व के नुमाइंदे स्व विट्ठलभाई पटेल के परिवार के संपर्क में हैं और उनकी सहमति से ही उनके नाम पर क्षेत्र की जनता की नब्ज टटोली जा रही है।
आज का विज्ञान क्या इतना विकसित है जो कोराना से हार रहा है य और उसे विकसित होने के लिए भारतीय प्रयोग शाला के ज्ञान को आधार बनाना पड़ेगा।
लैब को लेण्ड पर लाना
भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने एक नारा दिया था वह था लैब को लेण्ड पर लाना है तभी देश विश्व में अग्रणी रहेगा और देशवासी आनंद, शांति और खुशहाल जीवन व्यतीत कर जहां से आया वहीं वापस चला जाएगा और जीवन सफल होगा।
मानसिक जीवन के आरंभ से ही हर देश और काल में मानव इन्हीं समस्याओं से लड़ रहा है समय-समय पर समस्याओं के समाधान के लिए व्यक्ति समाज और राजा सभी ने समय-समय पर प्रयोग कर आनंद शांति और खुशहाली के साथ मोक्ष प्राप्त किया इसे ही हम लेब नाम से जाने तथा लेण्ड पर लाने के लिए उन्होंने समाज को सिखाया तथा राजा ने अपनाकर शांति स्थापित की अब सोचे आज के वैज्ञानिकों ने जो जो खोजें कि उनका कब कहां उपयोग होना है।
सर्वप्रथम हम खुद को समाज और देश को देखें उसमें मुख्यता चार ही विचारधाराएं हैं जो सुख शांति दे सकती है।
प्रथम वर्ग है अर्थाति अर्थात सभी समस्याओं का समाधान अर्थ से किया जा सकता है अर्थात आर्थिक विकास मूल मंत्र रहा और कहा ''सर्व सुख काञ्चनस्थि'' और भारत ने इतनी खोजे करी और विकास लेब में किया जिसमें सोना बनाया राजा वली अपने वजन का सोना कढ़ाई में कूदकर बना लेते थे।
चाणक्य ने 17 प्रकार का स्वर्ण बनाया तथा देश में हीरा, पन्ना, पुखराज, नीलम विश्व का सबसे अच्छा खोजा और भारत को सोने की चिड़िया नाम विश्व ने दिया। उसी
लेब को लेण्ड पर लाना है इस वृति के विश्व में •०२% ही है जो यह जानते हैं और विश्व का संचालन कर रहे हैं।
दूसरा ग्रुप या समुदाय आर्ती (अर्थात दुखी रोगी) असहाय वर्ग आता है जो ६०% है आज की वैज्ञानिक लेब ने इंसान के जीवन को बड़ा नहीं पाय परंतु भारतीय ज्ञान ने आयुर्वेद लेब में अमर कर बताया मुर्दे को जिंदा किया और अंग काट कर दूसरे जीव का अंग लगा कर जिंदा किया जिसमें गणपति, और बिना सर के केकड़ा सोचो आधुनिक युग में आयुर्वेद लैब से मुर्दे को जिंदा करने वाले ज्ञान को लेण्ड पर लाना है जो आयुर्वेद शिक्षा बिना संभव नहीं।
तीसरा ग्रुप या समुदाय जिज्ञासु का आता है जो २०% ही होंगे जो सब रहस्य और तरीका सीखना चाहते हैं जिनमें भारत ही एक देश है जहां संपूर्ण जिज्ञासाओं को शांत करने हेतु ४ वेद, १०८ उपनिषद, १८ पुराण, गीता, योग दर्शन आदि का लैब रिसर्च रूप में वर्णन है क्यों उसकी शिक्षा नहीं दी जाती इसी ज्ञान के कारण भारत विश्व गुरु से जाना जाता था।
चौथा और अंतिम ग्रुप और समुदाय ज्ञानी वर्ग का है उसमें मात्र गुरु को लैब रूप में मान शिष्यों ने शांति पाई आज गुरु नहीं गुरु खोजना पड़ता है राजा को कार्य सोंपना पड़ता है तब गुरु की महिमा होगी जो बताई है
“गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु” और गुरु ही महेश्वर है क्या ऐसे गुरु है अगर है तो क्या कमी होगी भारत में चार प्रयोगशालाय थी हैं और रहेंगी इन्हें लेण्ड पर लाना है।
भारतीय प्रयोगशालाओं का निष्कर्ष जानिएतब आपको स्वयं पता चलेगा कि आज के आधुनिक विज्ञान से पुष्ट होता है या नहीं। सर्वप्रथम अर्थ को ले जिससे वर्तमान की विश्व समस्या हल होवेंगी।
भारतीयज्ञान-अर्थ :- अकुला एक से अनेक हुआ और आगे कहा जो विद अर्थात भासता है वही अर्थ पद से जाना जाता है। यही शरीर और ब्रह्मांड का निर्माण करता है इसी की आवश्यकता होती है उसका विनिमय कार्य द्रव्य से होता है कार्य द्रव का मानक स्वर्ण है अतः ब्रह्माण्डीय पदार्थों का विनिमय सोने से किया जा सकता है भारतीय प्रयोगशाला ने ब्रह्मा जी द्वारा ब्रम्हांड की रचना ही सोने के अण्डे से करी इससे पूर्ण कोई परिभाषा नहीं। मानव जीवन की उत्पत्ति स्थिति और मृत्यु का कारण स्वर्ण है आज विज्ञान भी संतान उत्पत्ति और संपूर्ण तंत्र तथा मानसिक क्रियाएं स्वर्ण आयनों से ही संभव बताया है अतः भारतीय प्रयोगशाला को लेण्ड पर लाना होगा।
दूसरा समुदाय दुखी और रोगियों का है जिनको चिकित्सा चाहिए चिकित्सा इतना व्यापक क्षेत्र है जिसमें आबादी के ६०% लोग ग्रसित हैं सभी को स्वस्थ रहना है और ३ अरब साल से मनुष्य जीने की इच्छा पूर्ण करता रहा है और निरोग रहता रहा है समय समय पर चिकित्सा में चमत्कारी प्रभाव दिखाएं हैं जो लैब तक आ गए थे जिसमें कर कर दिखाया है जैसे मियां मिर्च सारंगी वादक भगवान बुध और वशिष्ठ तथा विश्वामित्र का कायाकल्प हुआ यह सभी चिकित्सा प्रयोगशाला तक रही उदाहरण है इन्हें ही,
°परंपरागत चिकित्सा
°ग्रामीण चिकित्सा
°आयुर्वेद चिकित्सा
°प्राकृतिक चिकित्सा
आदि अनंत नामों से आदि से आज तक जानते हैं अतः इस समय पर चिकित्सा को लेण्ड पर लाना है।
तीसरा बौद्धिक स्तर आता है जिसमें मनुष्य कार्य करने के पूर्व निश्चय करता है कार्य भी किया जा चुका है जिसमें प्रश्न ही समाप्त हो जाते हैं जिनको लैब तक पहुंचाया गया है जिसमें वेद पुराण और भारतीय उपनिषद दर्शन गीता आदि आते हैं उन्हें ही उद्दमियों ने लैब को लेण्ड पर लाने में अलग अपने ढंग से पेश किया और ग्रुप बनाया इसमें कोई त्रुटि नहीं यह परंपरा है। समय आ गया है नई परंपरा और नए तरीके से जिज्ञासाओं को संतुष्ट करने का।
चौथा ज्ञानी या गुरुओं का आता है आदि से गुरुओं को महत्व दिया है और राम हो या कृष्ण या चंद्रगुप्त सभी के गुरुओं ने राज चलाने की वही ब्रह्मांड नीति को नए ढंग से कुछ जोड़ घटा कर शांति सुहृदयता और प्रकृति का आनंद लेने आने की इच्छा पूर्ण करने के तरीके बताए।
इस प्रकार चारों वर्ग जब संतुष्ट हो गए तो धरती स्वर्ग हो जाएगी परंतु माध्यम कौन होगा उसको आज के विकसित युग ने उद्दमी पद दिया जिसका तात्विक अर्थ है लैब को लेण्ड पर लाना जिसमें वही पुराना काम है नए परिवेश में नए ढंग से आकर्षक रूप रूप में प्रस्तुत करना है ठीक इसी प्रकार जैसे दांतों के लिए दतौंन मंजन से टूथपेस्ट आदि का निर्माण आता है। हमारे देश में उद्दमी जंगल गांव और शहरों में रहता है राजा सभी को सुखी देखना चाहता है अतः सोचें पहला उद्दमी को मालिक ने जंगल में ही उतारा सनातन धर्म में मनु और इस्लाम में आदम हब्बा जंगल ही में उतरे थे। सोचो क्यों आज आधुनिक युग में प्रत्येक व्यक्ति अपनी संपूर्ण आवश्यकताएं जंगल से ही पूरी करता है सर्वप्रथम आवश्यक आवश्यकता रोटी, कपड़ा, मकान इन तीनों का स्रोत जंगल है औषधि जंगल में मिलती है जिज्ञासा कर कर सीखे जंगल से पूर्ण होगी तथा गुरु का वास भी जंगल में ही होता है कभी सोचा आर्थिक रूप से विश्व का सबसे धनी आदमी जंगल से प्राप्त संपदा से ही होता है चाहे हीरा, सोना, मोती आदि हो या अन्य अतः सबसे अहम भूमिका Forest Base Economy होगी उसी के उद्दमी देश को सुखी करेंगे। उद्दमी को यह मालूम होना चाहिए कि जंगल से वनस्पति रूप में पेड़ नष्ट होते हैं पेड़ फल देते हैं पेड़ पतझड़ भी करते हैं अतः Forest produce base economy फिर Forest deteriorate base और Forest waste देश को मालामाल कर देगी।
इन तीनों के बाद agro based economy आती है। जंगल में जो होता है उसे कई गुना खेती से करें इसके बाद चिकित्सा पर आधारित अर्थव्यवस्था आती है। हमारे देश में जंगल गांव और शहर में रहने वालों की अनुपातिक संख्या १:२४:१२ है। यह पूरी जनसंख्या लेण्ड है और उसकी आवश्यकता सुखी शांत जीवनखुशहाली स्वास्थ्य आनंद लेकर शांतिपूर्ण जहां से आया वहां चला जावे यह उसका अभीष्ट है। भारत ने ३ अरब साल में सभी प्रकार की प्रयोगशालाएं निर्मित करी थी जिनकी खोजे हैं परंतु समय की आवश्यकता ने उन्हें बंद कर दिया परंतु ज्ञान विज्ञान के रूप में विद्यमान है आवश्यकता है आज की प्राथमिकता की उसके लिए उद्दमी तैयार कर विश्व शांति स्थापित की जा सकती है। इसके लिए शिक्षा में समूल परिवर्तन करना होगा जिसमें उद्दमी तैयार किए जावे जिसका सिद्धांत होगा “कर कर सीखे” दूसरा Education with free lodging and boarding अर्थात गुरुकुल पद्धति से होना चाहिए जिसका अभिप्राय उद्दमी बनाया हो। आज के उद्दमी का पहला नारा (१) Make money from waste दूसरा नारा (२) Input science and technology to convert low grade into high grade just coal into dimond यह प्रथ्वी लेब ही है जहां Aluminium oxide माणिक, पुखराज और नीलम बनता है। यह भी लैब ही है आज भी विज्ञान कि लैब यही कर रही है परंतु बहुत खर्चीला और कठिन है परंतु भारतीय लैब घर पर बना सकती है लैब जमीन में कोयला समय अंतराल में डायमंड बन रहा है उसे देख अमेरिका ने कोयले से हीरा बनाया है। आयुर्वेद में रसायन और पारद संहिता में यह सब रहस्य हैं इनकी लैब और उद्दमी बनाना होगा। दूसरा उद्दमी आयुर्वेद का बनाना होगा जो अमृत बनावे तीसरा उद्दमी विद्यालयों की स्थापना का बनाना होगा जो वैदिक ज्ञान को मूर्त रूप दे चौथा उद्दमी गुरुओं की परंपरा पर बनाना होगा इसमें मुख्य भूमिका राज आश्रय की ही होगी क्योंकि सभी कार्य राजाश्रेय से चलते हैं अतः राजा को युधिष्ठिर राम विक्रमादित्य हरिश्चंद्र जैसे चाहिए होंगे तभी रावण और कंस जैसे समाप्त होंगे हमें यथा राजा तथा प्रजा के नारे को साकार होता देखना है।
ॐ परमात्मने नमः
आज विज्ञान ने पदार्थ के अस्तित्व में PTV के अलावा चौथी विमा समय की पुष्टि का प्रत्यक्ष उदाहरण कोरोना के आतंक से प्रतीत हो रहा है ज्योतिष हो या वेद इनकी भविष्यवाणियों से २०२० से २०२५ ईसवी का समय विश्व आबादी को कम करेगा और उनके लिए कोरोना जैसे रोगों का वर्णन ऋग्वेद और अथर्वेद में मिलता है साथ ही भारत विश्व गुरु बनेगा एवं आर्थिक स्थिति में सबसे अच्छा होगा जिससे सोने की चिड़िया की कहावत भी साकार होगी। इसके लिए भारत के परमात्मा स्वरुप प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ही धन्यवाद के पात्र रहेंगे उनका नाम विश्व इतिहास में अमर रहेगा श्री मोदी जी ने जो कहा कि आयुर्वेद में ही कोरोना का उपचार मिलेगा यह बात सत्य है क्योंकि आयुर्वेद चार वेदों से आयु का ज्ञान लेकर पांचवा वेद आयुर्वेद है जिसमें आयु का ज्ञान लेकर आयु का विज्ञान किया जिसके उपयोग से मृत्यु पर विजय प्राप्त की और आयुर्वेद ने अमृत बना लिया तो आयुर्वेद का कार्य समाप्त हो गया। अब तो उस ज्ञान को वैज्ञानिक परिपेक्ष में उपयोग करना है। यह क्यों नहीं हो पा रहा क्योंकि हम आयुर्वेद को विज्ञान की तरह न पढ़ रहे ना समझ रहे इस कारण उसका उपयोग नहीं हो पा रहा अब आवश्यकता है और समस्त आयुर्वेदाचार्यों को यह कार्य सौंपा जाना चाहिए कि वे बताएं यह कोरोना वायरस क्या है यह आदमी द्वारा निर्मित है या समय अंतराल में प्रकृति प्रदत्त है आयुर्वेद का उपयोग तभी संभव है जब आयुर्वेद को ६ मान्यताओं पर उतारना होगा।
१. वेदों का ज्ञान (संस्कृत के ज्ञान के साथ)
२. आयुर्वेद का ज्ञान
३. ज्योतिष का ज्ञान
४. प्रयोगशाला (औषधि निर्माण)
५. चिकित्सालय (वास्तु शास्त्र से)
६. सहायक (स्त्री व पुरुष)
उपरोक्त ६ बातों को ध्यान में रखकर मृत्यु पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
आयुर्वेद की वैज्ञानिकता सिद्ध की जा सकती है तभी जब विज्ञान को सही मानकर कसौटी पर आयुर्वेद को कसा जावे और विज्ञान की पहुंच को सीमित बताया जावे जो निम्न प्रकार से संभव है विज्ञान शरीर को पदार्थों से निर्मित मानता है और उसकी निश्चित मात्रा होती है जिसकी कम ज्यादा मात्रा मृत्यु कारक हो जाती है जो स्थूल शरीर में भोजन से प्राप्त तत्व कोषा तक पहुंचाए जाते हैं जिसमें भोजन पदार्थ की अवस्था पर निर्भर करता है तथा कोषा तक जाने के लिए नाड़ियां साफ होना चाहिए अर्थात रास्ता होना चाहिए। आज का विज्ञान रसायनों की मात्रा के लिए शल्य चिकित्सा को महत्व देता है। नाड़ियों के लिए शालावय तन्त्र आयुर्वेद में विकसित था परंतु आज हम न ही आदमी पर हाथी का सर लगा पाए ना हम भोजन को ११ द्वारों से खा पा रहे ना ही भोजन को भक्ष भोज्य लेह और चौश्य अवस्था का ज्ञान कर चबाकर खाना गुटकना, लपटकर खाना नो चूसना इसके महत्व को जानते ना कर रहे। इस ज्ञान से हम औषधि सेवन शरबत, गोली, भस्म, लेप और पफ आदि सब सिस्टम समझेंगे और आयुर्वेद को मानेंगे।
आधुनिक विज्ञान औषधि के मन का निर्माण नहीं कर सकी इस कारण प्राचीन आयुर्वेद में संजीवनी बूटी सूर्योदय से पहले की बात तथा रविवार को आंवला ना खाना एकादशी को चावल आदि का क्यामहत्व है समझना पड़ेगा वहीं रावण ने बड़ के पत्ते से तार को ७ धातुओं में बदलने के महत्व को समय की महिमा बताई वहीं पानी के प्रकार और अर्क से सभी चिकित्सा संभव है। औषधि की जातियां जातियां समझना होंगी जैसे सफेद धतूरा, पीला, काला इसमें प्रभाव का क्या अंतर है इसी प्रकार प्लास पीला, सफेद, लाल इसके अलावा एक पत्ती ३ पत्ती और ५ पत्ती के पलाश में क्या अंतर है। इसी प्रकार इनके तोड़ने और एकत्र करना जिसमें शुक्ल और कृष्ण पक्ष अमावश्या पूर्णमासी दिन में रात्रि में आदि साथ ही ५ अंगों फल, फूल, तना, जड़, पत्ते इसमें क्या चाहिए कब और क्यों।
वेदों में सब बताया है यहां तक कि समय पर कौन सी औषधि प्रकृति निर्मित करती है जैसे औषधि स्वयं अपने निर्माण को जानती है उसी को जानकर जादू की औषधियां और औषधियों के साथ से अमृत और विष बन जाता है यदि कोरोना वायरस है तो आयुर्वेद का अगद, बल एवं भ्रत्य और भूत संकाय से इसे बनाया जा सकता है और रसायन व बाजीकरण से कोरोना से लड़ने की क्षमता प्रदान करी जा सकती है।
पृथ्वी पर जीवन की रक्षा आयुर्वेद से ही संभव है उसके लिए आयुर्वेद शिक्षा होनी चाहिए जिसमें पूरे ६ विषय पढ़ाए जावे।
The Prime Minister, Shri Narendra Modi holds 5th meeting with the State Chief Ministers via video conferencing on COVID-19 situation, in New Delhi on May 11, 2020.
प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम संबोधन
सभी देशवासियों को आदर पूर्वक नमस्कार,
कोरोना संक्रमण से मुकाबला करते हुए दुनिया को अब चार महीने से ज्यादा हो रहे हैं। इस दौरान तमाम देशों के 42 लाख से ज्यादा लोग कोरोना से संक्रमित हुए हैं। पौने तीन लाख से ज्यादा लोगों की दुखद मृत्यु हुई है। भारत में भी लोगों ने अपने स्वजन खोए हैं। मैं सभी के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त करता हूं।
साथियों,
एक वायरस ने दुनिया को तहस-नहस कर दिया है। विश्व भर में करोड़ों जिंदगियां संकट का सामना कर रही हैं। सारी दुनिया, जिंदगी बचाने की जंग में जुटी है। हमने ऐसा संकट न देखा है, न ही सुना है। निश्चित तौर पर मानव जाति के लिए ये सब कुछ अकल्पनीय है, ये Crisis अभूतपूर्व है।
लेकिन थकना, हारना, टूटना-बिखरना, मानव को मंजूर नहीं है। सतर्क रहते हुए, ऐसी जंग के सभी नियमों का पालन करते हुए, अब हमें बचना भी है और आगे भी बढ़ना है। आज जब दुनिया संकट में है, तब हमें अपना संकल्प और मजबूत करना होगा। हमारा संकल्प इस संकट से भी विराट होगा।
साथियों,
हम पिछली शताब्दी से ही सुनते आए हैं कि 21वीं सदी हिंदुस्तान की है। हमें कोरोना से पहले की दुनिया को, वैश्विक व्यवस्थाओं को विस्तार से देखने-समझने का मौका मिला है। कोरोना संकट के बाद भी दुनिया में जो स्थितियां बन रही हैं, उसे भी हम निरंतर देख रहे हैं। जब हम इन दोनों कालखंडो को भारत के नजरिए से देखते हैं तो लगता है कि 21वीं सदी भारत की हो, ये हमारा सपना नहीं, ये हम सभी की जिम्मेदारी है। लेकिन इसका मार्ग क्या हो? विश्व की आज की स्थिति हमें सिखाती है कि इसका मार्ग एक ही है- “आत्मनिर्भर भारत”। हमारे यहां शास्त्रों में कहा गया है- एष: पंथा: यानि यही रास्ता है- आत्मनिर्भर भारत।
साथियों,
एक राष्ट्र के रूप में आज हम एक बहुत ही अहम मोड़ पर खड़े हैं। इतनी बड़ी आपदा, भारत के लिए एक संकेत लेकर आई है, एक संदेश लेकर आई है, एक अवसर लेकर आई है। मैं एक उदाहरण के साथ अपनी बात रखूंगा। जब कोरोना संकट शुरु हुआ, तब भारत में एक भी पीपीई किट नहीं बनती थी। एन-95 मास्क का भारत में नाममात्र उत्पादन होता था। आज स्थिति ये है कि भारत में ही हर रोज 2 लाख PPE और 2 लाख एन-95 मास्क बनाए जा रहे हैं। ये हम इसलिए कर पाए, क्योंकि भारत ने आपदा को अवसर में बदल दिया। आपदा को अवसर में बदलने की भारत की ये दृष्टि, आत्मनिर्भर भारत के हमारे संकल्प के लिए उतनी ही प्रभावी सिद्ध होने वाली है।
साथियों,
आज विश्व में आत्मनिर्भर शब्द के मायने बदल गए हैं, Global World में आत्मनिर्भरता की Definition बदल गई है। अर्थकेंद्रित वैश्वीकरण बनाम मानव केंद्रित वैश्वीकरण की चर्चा जोरों पर है। विश्व के सामने भारत का मूलभूत चिंतन, आशा की किरण नजर आता है। भारत की संस्कृति, भारत के संस्कार, उस आत्मनिर्भरता की बात करते हैं जिसकी आत्मा वसुधैव कुटुंबकम है। भारत जब आत्मनिर्भरता की बात करता है, तो आत्मकेंद्रित व्यवस्था की वकालत नहीं करता।
भारत की आत्मनिर्भरता में संसार के सुख, सहयोग और शांति की चिंता होती है। जो संस्कृति जय जगत में विश्वास रखती हो, जो जीव मात्र का कल्याण चाहती हो, जो पूरे विश्व को परिवार मानती हो, जो अपनी आस्था में ‘माता भूमिः पुत्रो अहम् पृथिव्यः’ की सोच रखती हो जो पृथ्वी को मां मानती हो, वो संस्कृति, वो भारतभूमि, जब आत्मनिर्भर बनती है, तब उससे एक सुखी-समृद्ध विश्व की संभावना भी सुनिश्चित होती है।
भारत की प्रगति में तो हमेशा विश्व की प्रगति समाहित रही है। भारत के लक्ष्यों का प्रभाव, भारत के कार्यों का प्रभाव, विश्व कल्याण पर पड़ता है। जब भारत खुले में शौच से मुक्त होता है तो दुनिया की तस्वीर बदल जाती है। टीबी हो, कुपोषण हो, पोलियो हो, भारत के अभियानों का असर दुनिया पर पड़ता ही पड़ता है। इंटरनेशनल सोलर अलायंस, ग्लोबर वॉर्मिंग के खिलाफ भारत की सौगात है। इंटरनेशनल योगा दिवस की पहल, मानव जीवन को तनाव से मुक्ति दिलाने के लिए भारत का उपहार है। जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रही दुनिया में आज भारत की दवाइयां एक नई आशा लेकर पहुंचती हैं। इन कदमों से दुनिया भर में भारत की भूरि-भूरि प्रशंसा होती है, तो हर भारतीय गर्व करता है। दुनिया को विश्वास होने लगा है कि भारत बहुत अच्छा कर सकता है, मानव जाति के कल्याण के लिए बहुत कुछ अच्छा दे सकता है। सवाल यह है – कि आखिर कैसे? इस सवाल का भी उत्तर है- 130 करोड़ देशवासियों का आत्मनिर्भर भारत का संकल्प।
साथियों,
हमारा सदियों का गौरवपूर्ण इतिहास रहा है। भारत जब समृद्ध था, सोने की चिड़िया कहा जाता था, संपन्न था, तब सदा विश्व के कल्याण की राह पर ही चला। वक्त बदल गया, देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ गया, हम विकास के लिए तरसते रहे। आज भारत विकास की ओर सफलतापूर्वक कदम बढ़ा रहा है, तब भी विश्व कल्याण की राह पर अटल है। याद करिए, इस शताब्दी की शुरुआत के समय Y2K संकट आया था। भारत के टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट्स ने दुनिया को उस संकट से निकाला था। आज हमारे पास साधन हैं, हमारे पास सामर्थ्य है, हमारे पास दुनिया का सबसे बेहतरीन टैलेंट है, हम Best Products बनाएंगे, अपनी Quality और बेहतर करेंगे, सप्लाई चेन को और आधुनिक बनाएंगे, ये हम कर सकते हैं और हम जरूर करेंगे।
साथियों,
मैंने अपनी आंखों से कच्छ भूकंप के वो दिन देखे हैं। हर तरफ सिर्फ मलबा ही मलबा। सब कुछ ध्वस्त हो गया था। ऐसा लगता था मानो कच्छ, मौत की चादर ओढ़कर सो गया हो। उस परिस्थिति में कोई सोच भी नहीं सकता था कि कभी हालात बदल पाएंगे। लेकिन देखते ही देखते कच्छ उठ खड़ा हुआ, कच्छ चल पड़ा, कच्छ बढ़ चला। यही हम भारतीयों की संकल्पशक्ति है। हम ठान लें तो कोई लक्ष्य असंभव नहीं, कोई राह मुश्किल नहीं। और आज तो चाह भी है, राह भी है। ये है भारत को आत्मनिर्भर बनाना। भारत की संकल्पशक्ति ऐसी है कि भारत आत्मनिर्भर बन सकता है।
साथियों,
आत्मनिर्भर भारत की ये भव्य इमारत, पाँच Pillars पर खड़ी होगी। पहला पिलर Economy एक ऐसी इकॉनॉमी जो Incremental change नहीं बल्कि Quantum Jump लाए । दूसरा पिलर Infrastructure एक ऐसा Infrastructure जो आधुनिक भारत की पहचान बने। तीसरा पिलर- हमारा System- एक ऐसा सिस्टम जो बीती शताब्दी की रीति-नीति नहीं, बल्कि 21वीं सदी के सपनों को साकार करने वाली Technology Driven व्यवस्थाओं पर आधारित हो। चौथा पिलर- हमारी Demography- दुनिया की सबसे बड़ी Democracy में हमारी Vibrant Demography हमारी ताकत है, आत्मनिर्भर भारत के लिए हमारी ऊर्जा का स्रोत है। पाँचवाँ पिलर- Demand- हमारी अर्थव्यवस्था में डिमांड और सप्लाई चेन का जो चक्र है, जो ताकत है, उसे पूरी क्षमता से इस्तेमाल किए जाने की जरूरत है।
देश में डिमांड बढ़ाने के लिए, डिमांड को पूरा करने के लिए, हमारी सप्लाई चेन के हर स्टेक-होल्डर का सशक्त होना जरूरी है। हमारी सप्लाई चेन, हमारी आपूर्ति की उस व्यवस्था को हम मजबूत करेंगे जिसमें मेरे देश की मिट्टी की महक हो, हमारे मजदूरों के पसीने की खुशबू हो।
साथियों,
कोरोना संकट का सामना करते हुए, नए संकल्प के साथ मैं आज एक विशेष आर्थिक पैकेज की घोषणा कर रहा हूं। ये आर्थिक पैकेज, ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ की अहम कड़ी के तौर पर काम करेगा।
साथियों,
हाल में सरकार ने कोरोना संकट से जुड़ी जो आर्थिक घोषणाएं की थीं, जो रिजर्व बैंक के फैसले थे, और आज जिस आर्थिक पैकेज का ऐलान हो रहा है, उसे जोड़ दें तो ये करीब-करीब 20 लाख करोड़ रुपए का है। ये पैकेज भारत की GDP का करीब-करीब 10 प्रतिशत है।
इन सबके जरिए देश के विभिन्न वर्गों को, आर्थिक व्यवस्था की कड़ियों को, 20 लाख करोड़ रुपए का संबल मिलेगा, सपोर्ट मिलेगा। 20 लाख करोड़ रुपए का ये पैकेज, 2020 में देश की विकास यात्रा को, आत्मनिर्भर भारत अभियान को एक नई गति देगा। आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को सिद्ध करने के लिए, इस पैकेज में Land, Labour, Liquidity और Laws, सभी पर बल दिया गया है।
ये आर्थिक पैकेज हमारे कुटीर उद्योग, गृह उद्योग, हमारे लघु-मंझोले उद्योग, हमारे MSME के लिए है, जो करोड़ों लोगों की आजीविका का साधन है, जो आत्मनिर्भर भारत के हमारे संकल्प का मजबूत आधार है। ये आर्थिक पैकेज देश के उस श्रमिक के लिए है, देश के उस किसान के लिए है जो हर स्थिति, हर मौसम में देशवासियों के लिए दिन रात परिश्रम कर रहा है। ये आर्थिक पैकेज हमारे देश के मध्यम वर्ग के लिए है, जो ईमानदारी से टैक्स देता है, देश के विकास में अपना योगदान देता है। ये आर्थिक पैकेज भारतीय उद्योग जगत के लिए है जो भारत के आर्थिक सामर्थ्य को बुलंदी देने के लिए संकल्पित हैं। कल से शुरू करके, आने वाले कुछ दिनों तक, वित्त मंत्री जी द्वारा आपको ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ से प्रेरित इस आर्थिक पैकेज की विस्तार से जानकारी दी जाएगी।
साथियों,
आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए Bold Reforms की प्रतिबद्धता के साथ अब देश का आगे बढ़ना अनिवार्य है। आपने भी अनुभव किया है कि बीते 6 वर्षों में जो Reforms हुए, उनके कारण आज संकट के इस समय भी भारत की व्यवस्थाएं अधिक सक्षम, अधिक समर्थ नज़र आईं हैं। वरना कौन सोच सकता था कि भारत सरकार जो पैसा भेजेगी, वो पूरा का पूरा गरीब की जेब में, किसान की जेब में पहुंच पाएगा। लेकिन ये हुआ। वो भी तब हुआ जब तमाम सरकारी दफ्तर बंद थे, ट्रांसपोर्ट के साधन बंद थे। जनधन-आधार-मोबाइल- JAM की त्रिशक्ति से जुड़ा ये सिर्फ एक रीफॉर्म था, जिसका असर हमने अभी देखा। अब Reforms के उस दायरे को व्यापक करना है, नई ऊंचाई देनी है।
ये रिफॉर्मस खेती से जुड़ी पूरी सप्लाई चेन में होंगे, ताकि किसान भी सशक्त हो और भविष्य में कोरोना जैसे किसी दूसरे संकट में कृषि पर कम से कम असर हो। ये रिफॉर्म्स, Rational टैक्स सिस्टम, सरल और स्पष्ट नियम-कानून, उत्तम इंफ्रास्ट्रक्चर, समर्थ और सक्षम Human Resource, और मजबूत फाइनेंशियल सिस्टम के निर्माण के लिए होंगे। ये रिफॉर्म्स, बिजनेस को प्रोत्साहित करेंगे, निवेश को आकर्षित करेंगे और मेक इन इंडिया के हमारे संकल्प को सशक्त करेंगे।
साथियों,
आत्मनिर्भरता, आत्मबल और आत्मविश्वास से ही संभव है। आत्मनिर्भरता, ग्लोबल सप्लाई चेन में कड़ी स्पर्धा के लिए भी देश को तैयार करती है। और आज ये समय की मांग है कि भारत हर स्पर्धा में जीते, ग्लोबल सप्लाई चेन में बड़ी भूमिका निभाए। इसे समझते हुए, भी आर्थिक पैकेज में अनेक प्रावधान किए गए हैं। इससे हमारे सभी सेक्टर्स की Efficiency बढ़ेगी और Quality भी सुनिश्चित होगी।
साथियों,
ये संकट इतना बड़ा है, कि बड़ी से बड़ी व्यवस्थाएं हिल गई हैं। लेकिन इन्हीं परिस्थितियों में हमने, देश ने हमारे गरीब भाई-बहनों की संघर्ष-शक्ति, उनकी संयम-शक्ति का भी दर्शन किया है। खासकर हमारे जो रेहड़ी वाले भाई-बहन हैं, ठेला लगाने वाले हैं, पटरी पर सामान बेचने वाले हैं, जो हमारे श्रमिक साथी हैं, जो घरों में काम करने वाले भाई-बहन हैं, उन्होंने इस दौरान बहुत तपस्या की है, त्याग किया है। ऐसा कौन होगा जिसने उनकी अनुपस्थिति को महसूस नहीं किया।
अब हमारा कर्तव्य है उन्हें ताकतवर बनाने का, उनके आर्थिक हितों के लिए कुछ बड़े कदम उठाने का। इसे ध्यान में रखते हुए गरीब हो, श्रमिक हो, प्रवासी मजदूर हों, पशुपालक हों, हमारे मछुवारे साथी हों, संगठित क्षेत्र से हों या असंगठित क्षेत्र से, हर तबके के लिए आर्थिक पैकेज में कुछ महत्वपूर्ण फैसलों का ऐलान किया जाएगा।
साथियों,
कोरोना संकट ने हमें Local Manufacturing, Local Market, Local Supply Chain, का भी महत्व समझाया है। संकट के समय में, Local ने ही हमारी Demand पूरी की है, हमें इस Local ने ही बचाया है। Local सिर्फ जरूरत नहीं, बल्कि हमारी जिम्मेदारी है। समय ने हमें सिखाया है कि Local को हमें अपना जीवन मंत्र बनाना ही होगा।
आपको आज जो Global Brands लगते हैं वो भी कभी ऐसे ही बिल्कुल Local थे। लेकिन जब वहां के लोगों ने उनका इस्तेमाल शुरू किया, उनका प्रचार शुरू किया, उनकी ब्रांडिंग की, उन पर गर्व किया, तो वो Products, Local से Global बन गए। इसलिए, आज से हर भारतवासी को अपने लोकल के लिए वोकल बनना है, न सिर्फ लोकल Products खरीदने हैं, बल्कि उनका गर्व से प्रचार भी करना है।
मुझे पूरा विश्वास है कि हमारा देश ऐसा कर सकता है। आपके प्रयासों ने, तो हर बार, आपके प्रति मेरी श्रद्धा को और बढ़ाया है। मैं गर्व के साथ एक बात महसूस करता हूं, याद करता हूं। जब मैंने आपसे, देश से खादी खरीदने का आग्रह किया था। ये भी कहा था कि देश के हैंडलूम वर्कर्स को सपोर्ट करें। आप देखिए, बहुत ही कम समय में खादी और हैंडलूम, दोनों की ही डिमांड और बिक्री रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। इतना ही नहीं, उसे आपने बड़ा ब्रांड भी बना दिया। बहुत छोटा सा प्रयास था, लेकिन परिणाम मिला, बहुत अच्छा परिणाम मिला।
साथियों,
सभी एक्सपर्ट्स बताते हैं, साइंटिस्ट बताते हैं कि कोरोना लंबे समय तक हमारे जीवन का हिस्सा बना रहेगा। लेकिन साथ ही, हम ऐसा भी नहीं होने दे सकते कि हमारी जिंदगी सिर्फ कोरोना के इर्द-गिर्द ही सिमटकर रह जाए। हम मास्क पहनेंगे, दो गज की दूरी का पालन करेंगे लेकिन अपने लक्ष्यों को दूर नहीं होने देंगे।
इसलिए, लॉकडाउन का चौथा चरण, लॉकडाउन 4, पूरी तरह नए रंग रूप वाला होगा, नए नियमों वाला होगा। राज्यों से हमें जो सुझाव मिल रहे हैं, उनके आधार पर लॉकडाउन 4 से जुड़ी जानकारी भी आपको 18 मई से पहले दी जाएगी। मुझे पूरा भरोसा है कि नियमों का पालन करते हुए, हम कोरोना से लड़ेंगे भी और आगे भी बढ़ेंगे।
साथियों,
हमारे यहाँ कहा गया है- ‘सर्वम् आत्म वशं सुखम्’ अर्थात, जो हमारे वश में है, जो हमारे नियंत्रण में है वही सुख है। आत्मनिर्भरता हमें सुख और संतोष देने के साथ-साथ सशक्त भी करती है। 21वीं सदी, भारत की सदी बनाने का हमारा दायित्व, आत्मनिर्भर भारत के प्रण से ही पूरा होगा। इस दायित्व को 130 करोड़ देशवासियों की प्राणशक्ति से ही ऊर्जा मिलेगी। आत्मनिर्भर भारत का ये युग, हर भारतवासी के लिए नूतन प्रण भी होगा, नूतन पर्व भी होगा।
अब एक नई प्राणशक्ति, नई संकल्पशक्ति के साथ हमें आगे बढ़ना है। जब आचार-विचार कर्तव्य भाव से सराबोर हो, कर्मठता की पराकाष्ठा हो, कौशल्य की पूंजी हो, तो आत्मनिर्भर भारत बनने से कौन रोक सकता है? हम भारत को आत्म निर्भर भारत बना सकते हैं। हम भारत को आत्म निर्भर बनाकर रहेंगे। इस संकल्प के साथ, इस विश्वास के साथ, मैं आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं।
आप अपने स्वास्थ्य का, अपने परिवार, अपने करीबियों का ध्यान रखिए।
कोरोना
संकट के बाद चल रहे लंबे लॉक
डाऊन ने सरकारों की धूल निकाल
दी है। खुद को प्रदेशों और देश
का भाग्य विधाता कहलाने वाली
सरकारों की चूलें हिल गईं हैं।
अधिकतर राज्यों की सरकारें
अब लोगों को घरों पर बैठकर
नहीं खिला पा रहीं हैं। उनके
पास अनाज के तो भंडार हैं लेकिन
उन्हें सप्लाई करने वाला ढांचा
नहीं है। वे किसानों से खरीदा
गया अनाज फोकट में नहीं बांट
पा रहीं हैं। इसकी वजह से निम्न
मध्यमवर्गीय लोगों में भगदड़
मच गई है। देश में असंतुलित
विकास के ढांचे की वजह से
महाराष्ट्र को निर्माण का हब
तो बना दिया गया लेकिन उसमें
आजादी के 73 सालों
बाद भी जिम्मेदारी का भाव नहीं
आया है। पूर्ववर्ती कांग्रेस
सरकारों ने यूपी, बिहार,झारखंड,
मध्यप्रदेश जैसे
राज्यों में उद्योगों को
अनुमति देने के बजाए महाराष्ट्र
से समुद्र तटीय इलाकों में
उद्योगों की भरमार कर दी थी।
यही वजह है कि देश भर के कई
राज्यों से करोड़ों लोग इन
क्षेत्रों में कामकाज की तलाश
में पहुंच गए। मुंबई और
महाराष्ट्र में यूपी, बिहार,
मध्यप्रदेश,पश्चिम
बंगाल जैसे राज्यों से करीबन
तीस लाख मजदूर रह रहे हैं। जब
तक उद्योगों को सस्ते मजदूरों
की जरूरत थी महाराष्ट्र ने
उन्हें गले लगाया लेकिन अब
जबकि लॉक डाऊन चल रहा है तब
महाराष्ट्र की शिवसेना,
कांग्रेस और एनसीपी
सरकार मजदूरों से पल्ला झाड़
रही है। ऐसे ही औरंगाबाद से
लौट रहे 16 मजदूरों
की रेल की पटरियों पर मालगाड़ी
से कुचलकर मौत हो गई है। सड़क
मार्ग बंद होने की वजह
से वे रेल की पटरियों के सहारे
अगले स्टेशन पर किसी रेलगाड़ी
की उम्मीद में जा रहे थे। थकान
की वजह से वे पटरियों पर ही
बैठ गए और थकान की वजह से उनकी
आंख लग गई। इस बीच मालगाडी आ
गई और वे मारे गए। इस दुर्घटना
के बाद उद्धव सरकार की अमानवीय
सोच की पूरे देश में निंदा हो
रही है। अभी दो दिन पहले ही
शिवसेना के मुखपत्र सामना ने
संपादकीय में लिखा था कि राज्यों
की सरकारें अपने मजदूरों को
वापस नहीं आने दे रहीं हैं वे
कह रहीं हैं कि सरकारें मजदूरों
का कोरोना टेस्ट कराएं और फिर
अपने खर्चे से उन्हें घर भेजें।
वोट बैंक का कचरा अब किसी को
अपने आंगन में नहीं चाहिए।जिन
मजदूरों ने महाराष्ट्र के
विकास में उसकी समृद्धि के
लिए अपना जीवन नारकीय परिस्थितियों
में होम कर दिया उन्हें शिवसेना
की सोच आज वोट बैंक का कचरा
बता रही है। ये शर्मनाक है।
जब सरकारें उद्योगों को मंजूरी
देती हैं तब वे उनके लिए आवश्यक
मजदूरों की व्यवस्था करने की
छूट भी देती हैं। उन मजदूरों
के निवास भोजन की व्यवस्था
करने की जवाबदारी भी लेती हैं।
जब तक विकास की लोरियां सुनीं
सुनाई जा रहीं थीं तब यही मजदूर
महाराष्ट्र को अच्छे लग रहे
थे और जब संकटकाल में उन्हें
पालने की जवाबदारी आई है तो
सरकार हाथ ऊंचे कर रही है।
सरकार को ये होश ही नहीं है कि
वह अपने मजदूरों के भोजन निवास
की व्यवस्था कर पाए। वे अभागे
मजदूर रेल की पटरियों पर जा
रहे थे या उन्हें किसी ने मारकर
पटरी पर फेंक दिया इसकी जांच
होनी अभी बाकी है। पर इतना तो
साफ है कि महाराष्ट्र सरकार
अपना दायित्व निभाने में असफल
रही है। अपने राज्य में निवास
कर रहे मजदूरों का पालन करना
उसकी जवाबदारी है। कोरोना का
संक्रमण रोकने के लिए उन्हें
मौजूदा स्थान पर ही रोकना
जरूरी है। 135 करो़ड़
की आबादी वाले देश में केवल
56 हजार
संक्रमितों को देखें तो केन्द्र
सरकार की रणनीति कारगर रही
है। लेकिन अब राज्य सरकारें
यदि अपनी जवाबादारी नहीं
निभाएंगी तो ये संक्रमण देश
के अनेक राज्यों में गांव गांव
तक फैल सकता है। एम्स के
विशेषज्ञों ने भी चिंता व्यक्त
की है कि जून जुलाई का महीना
संक्रमण को फैलाने वाला साबित
हो सकता है। जाहिर है कि सरकारों
को दीर्घ रणनीति बनानी होगी
और मजदूरों को सामाजिक दूरी
बनाकर रोजगार और उत्पादन की
कड़ी शुरु करनी होगी ताकि देश
में भगदड़ न मचे और कोरोना से
होने वाली संभावित मौतों को
टाला जा सके।
भोपाल,5मई(प्रेस सूचना केन्द्र) उद्योगों और श्रमिकों के हित में 4 केन्द्रीय और 3 राज्य अधिनियमों में संशोधन की अधिसूचना जारी कर दी गई है। इसके साथ ही लोक सेवा प्रदाय गारंटी अधिनियम में 18 सेवाओं को एक दिन में देने का प्रावधान किया जा रहा है। मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने अधिकारियों के साथ बैठक में विभिन्न अधिनियमों में प्रस्तावित संशोधनों में बिन्दुवार चर्चा कर कोरोना के बाद उत्पन्न स्थिति में आगामी एक हजार दिनों में उद्योगों को विभिन्न रियायतें देने की जरूरत बताई थी। श्री चौहान ने आज के प्रतिस्पर्धी दौर में निवेश बढ़ाने और श्रमिकों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से श्रम कानूनों में आवश्यक संशोधन के प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए थे।
कारखाना अधिनियम 1948 के अंतर्गत कारखाना अधिनियम 1958 की धारा 6,7,8 धारा 21 से 41 (एच), 59,67,68,79,88 एवं धारा 112 को छोड़कर सभी धाराओं से नवीन उद्योगों को छूट रहेगी। इससे अब उद्योगों को विभागीय निरीक्षणों से मुक्ति मिलेगी। उद्योग अपनी मर्जी से थर्ड पार्टी इंस्पेक्शन करा सकेंगे। रजिस्टर के संधारण में छूट मिलेगी। फेक्ट्री इंस्पेक्टर द्वारा जाँच एवं निरीक्षण से मुक्ति मिलेगी। उद्योग अपनी सुविधा में शिफ्टों में परिवर्तन कर सकेंगे।
मध्यप्रदेश औद्योगिक संबंध अधिनियम 1960 में संशोधन के साथ इस अधिनियम के प्रावधान उद्योगों पर लागू नहीं होंगे। इससे किसी एक यूनियन से समझौते की बाध्यता समाप्त हो जायेगी। औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 में संशोधन के बाद नवीन स्थापनाओं को एक हजार दिवस तक औद्योगिक विवाद अधिनियम में अनेक प्रावधानों से छूट मिल जायेगी। संस्थान अपनी सुविधानुसार श्रमिकों को सेवा में रख सकेगा। उद्योगों द्वारा की गयी कार्यवाही के संबंध में श्रम विभाग एवं श्रम न्यायालय का हस्तक्षेप बंद हो जायेगा।
मध्यप्रदेश औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम 1961 में संशोधन के बाद 100 श्रमिक तक नियोजित करने वाले कारखानों को अधिनियम के प्रावधानों से छूट मिल जायेगी। इससे श्रमिक निष्ठापूर्वक उत्पादन में सहयोग करेंगे। मध्यप्रदेश श्रम कल्याण निधि अधिनियम 1982 के अंतर्गत जारी किये जाने वाले अध्यादेश के बाद सभी नवीन स्थापित कारखानों को आगामी एक हजार दिवस के लिये मध्यप्रदेश श्रम कल्याण मण्डल को प्रतिवर्ष प्रति श्रमिक 80 रूपये के अभिदाय के प्रदाय से छूट मिल जायेगी। इसके साथ ही वार्षिक रिटर्न से भी छूट मिलेगी।
लोक सेवा प्रदाय गारंटी अधिनियम 2010 के अंतर्गत जारी अधिसूचना के अनुसार श्रम विभाग की 18 सेवाओं को पहले तीस दिन में देने का प्रावधान था। अब इन सेवाओं को एक दिन में देने का प्रावधान किया गया है। कारखाना अधिनियम 1948, दुकान एवं स्थापना अधिनियम 1958, ठेका श्रम अधिनियम 1970, अंतर्राज्यीय प्रवासी कर्मकार अधिनियम 1979, मोटर परिवहन कर्मकार अधिनियम 1961, मध्यप्रदेश भवन एवं अन्य संनिर्माण कर्मकार अधिनियम 1996 और बीड़ी एवं सिगार कामगार (नियोजन की शर्ते) अधिनियम 1966 में पंजीयन के लिये ऑनलाइन आवेदन करने पर एक दिन में ही ऑनलाइन पंजीयन मिल जाएगा। इससे पंजीयन के लिये बेवजह कार्यालयों के चक्कर काटने से मुक्ति मिलेगी।
दुकान एवं स्थापना अधिनियम 1958 में संशोधन के बाद कोई भी दुकान एवं स्थापना सुबह 6 से रात 12 बजे तक खुली रह सकेगी। इससे दुकानदारों के साथ ही ग्राहकों को भी राहत मिलेगी। पचास से कम श्रमिकों को नियोजित करने वाले स्थापनाओं में श्रम आयुक्त की अनुमति के बाद ही निरीक्षण किया जा सकेगा। निरीक्षण में पारदर्शिता होगी। कारखानों को दो रिटर्न के स्थान पर एक ही रिटर्न भरना पड़ेगा।
ठेका श्रमिक अधिनियम 1970 में संशोधन के बाद ठेकेदारों को 20 के स्थान पर 50 श्रमिक नियोजित करने पर ही पंजीयन की बाध्यता होगी। 50 से कम श्रमिक नियोजित करने वाले ठेकेदार बिना पंजीयन के कार्य कर सकेंगे। इस अधिनियम में संशोधन के लिये प्रस्ताव केन्द्र सरकार को भेजा गया है।
कारखाना अधिनियम के अंतर्गत कारखाने की परिभाषा में विद्युत शक्ति के साथ 10 के स्थान पर 20 श्रमिक और बगैर विद्युत के 20 के स्थान पर 40 श्रमिक किया गया है। इस संशोधन का प्रस्ताव भी केन्द्र शासन को भेजा गया है। इससे छोटे उद्योगों को कारखाना अधिनियम के पंजीयन से मुक्ति मिलेगी। इसके पूर्व 13 केन्द्रीय एवं 4 राज्य कानूनों में आवश्यक श्रम संशोधन किये जा चुके हैं।