Month: September 2019

  • पास्को एक्ट अब और घातक

    पास्को एक्ट अब और घातक

    भोपाल,30 सितंबर(दुर्गेश रायकवार)भारतीय संस्कृति और परम्परा हमेशा से गौरवशाली रही है। हमारे परिवारों में बच्चों को देवतुल्य माना गया है। यह माना जाता है कि उनका मन कच्ची माटी सा होता है और उसे जिस सांचे में ढालो, वह वैसा ही बन जाता है। नन्हीं बच्चियों को लेकर हमारा समाज अपने जन्म से संवेदनशील रहा है लेकिन बदलते दौर में सारे मानक बदल रहे हैं और हमारी गौरवशाली संस्कृति और परम्परा को घात पहुंचा रहे हैं। इन विपरीत और शर्मनाक स्थिति को नियंत्रण में करने के लिए कानून सख्त से सख्त कदम उठाता रहा है। बच्चों के साथ जिस तरह से बर्बर यौन व्यवहार किया जा रहा है, वह भारतीय समाज के लिए शर्मनाक है। बच्चों को यौन उत्पीडऩ से बचाने के लिए वर्ष 2012 में एक कानून बनाया गया था जिसे पॉक्सो कानून यानी की प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट 2012 जिसको हिंदी में लैंगिक उत्पीडऩ से बच्चों के संरक्षण का अधिनियम 2012 कहा जाता है। इस कानून के बाद भी अपराधों में कमी नहीं आने के कारण कानून को और सख्त बनाया गया है। हाल ही में 2019 में पाक्सो एक्ट में संशोधन कर अपराधी को दंड दिए जाने के लिए कड़े प्रावधान किए गए हैं।

    प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल अफेंसेस एक्ट 2012 के तहत अलग-अलग अपराध में पृथक-पृथक सजा का प्रावधान है। और यह भी ध्यान दिया जाता है कि इसका पालन कड़ाई से किया जा रहा है या नहीं। इस अधिनियम में सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय बाल संरक्षण मानकों के अनुरूप प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति यह जानता है कि किसी बच्चे का यौन शोषण हुआ है तो उसे इसकी रिपोर्ट नजदीकी थाने में देनी चाहिए, यदि वो ऐसा नहीं करता है तो उसे छह महीने के कारावास और आर्थिक दंड से दंडित किया जा सकता है।

    उल्लेखनीय है कि 18 साल से कम किसी भी मासूम के साथ अगर दुराचार होता है तो वह पॉक्सो एक्ट के तहत आता है। इस कानून के लगने पर तुरंत गिरफ्तारी का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त अधिनियम की धारा 11 के साथ यौन शोषण को भी परिभाषित किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि यदि कोई भी व्यक्ति अगर किसी बच्चे को गलत नीयत से छूता (बेड टच करता) है या फिर उसके साथ गलत हरकतें करने का प्रयास करता है या उसे पोर्नोग्राफी दिखाता है तो यह धारा 11 के तहत दोषी माना जाएगा। इस धारा के लगने पर दोषी को तीन साल तक की सजा हो सकती है।

    इस कानून की धारा चार में वो मामले आते हैं जिसमें बच्चे के साथ कुकर्म या फिर दुष्कर्म किया गया हो। इस अधिनियम में सात साल की सजा से लेकर उम्रकैद तक का प्रावधान है, साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है। धारा छह के अंतर्गत वो मामले आते हैं जिनमें बच्चों के साथ कुकर्म, दुष्कर्म के बाद उनको चोट पहुँचाई गई हो। इस धारा के तहत 10 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है। अगर धारा सात और आठ की बात की जाए तो उसमें ऐसे मामले आते हैं जिनमें बच्चों के गुप्तांग में चोट पहुँचाई जाती है। इसमें दोषियों को पाँच से सात साल की सजा के साथ जुर्माना का भी प्रावधान है।

    पाक्सो एक्ट बाल संरक्षक की जिम्मेदारी पुलिस को सौंपता है। इसमें पुलिस को बच्चे की देखभाल और संरक्षण के लिए तत्काल व्यवस्था बनाने की जिम्मेदारी दी जाती है। जैसे बच्चे के लिए आपातकालीन चिकित्सा उपचार प्राप्त करना और बच्चे को आश्रय गृह में रखना इत्यादि। पुलिस की यह जिम्मेदारी बनती है कि मामले को 24 घंटे के अंदर बाल कल्याण समिति की निगरानी में लाए जिससे समिति बच्चे की सुरक्षा और संरक्षण के लिए जरूरी कदम उठा सके।

    इस अधिनियम में बच्चे की मेडिकल जाँच के लिए प्रावधान भी किए गए हैं। यह भी निर्देश हैं कि जाँच बच्चे के लिए कम से कम पीड़ादायक हो। मेडिकल जाँच बच्चे के माता-पिता या किसी अन्य व्यक्ति की उपस्थिति में किया जाना चाहिए, जिस पर बच्चे का विश्वास हो और बच्ची की मेडिकल जाँच महिला चिकित्सक द्वारा ही की जानी चाहिए। अधिनियम में इस बात का ध्यान रखा गया है कि न्यायिक व्यवस्था के द्वारा फिर से बच्चे पर किसी भी प्रकार का दबाव नहीं बनाया जाए। इस नियम में केस की सुनवाई एक विशेष अदालत द्वारा बंद कमरे में कैमरे के सामने दोस्ताना माहौल में किया जाने का प्रावधान है। इस दौरान बच्चे की पहचान गुप्त रखने की कोशिश की जानी चाहिए। पुलिस की यह जिम्मेदारी बनती है कि मामले को 24 घंटे के अन्दर बाल कल्याण समिति की निगरानी में लाये। विशेष न्यायालय, उस बच्चे को दिए जाने वाली मुआवजा राशि का निर्धारण कर सकता है, जिससे बच्चे के चिकित्सा उपचार और पुनर्वास की व्यवस्था की जा सके। अधिनियम में यह कहा गया है कि बच्चे के यौन शोषण का मामला घटना घटने की तारीख से एक वर्ष के भीतर निपटाया जाना चाहिए।

    पॉक्सो अधिनियम में संशोधन बाल यौन अपराध के पहलुओं से उचित तरीके से निपटने के लिए किया गया है। एक आधिकारिक बयान में कहा गया है कि अधिनियम की धारा 4, 5 और 6 में संशोधन किए जाने का प्रस्ताव किया गया है, ताकि बच्चों का आक्रामक यौन उत्पीडऩ करने के मामले में मौत की सजा सहित कठोर सजा का प्रावधान हो सके। इसमें कहा गया है कि यह संशोधन, देश में बाल यौन अपराध की बढ़ती हुई प्रवृत्ति को रोकने के लिए कठोर उपाय करने की जरूरत के तहत, किया जा रहा है। इसके मुताबिक अधिनियम में 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा परिभाषित किया गया है। यह लैंगिक रूप से निरपेक्ष कानून है। संशोधन में प्राकृतिक संकटों और आपदाओं के समय बच्चों के यौन अपराधों से संरक्षण और आक्रामक यौन अपराध के उद्देश्य से बच्चों की जल्द यौन परिपक्वता के लिए उन्हें किसी भी तरीके से हार्मोन या कोई रासायनिक पदार्थ देने के मामले में अधिनियम की धारा 9 में संशोधन किया गया है।

    इस कानून के तहत बच्चों का यौन उत्पीडऩ करने वाले दोषियों को उम्रकैद के साथ मौत की सजा का प्रावधान किया गया है। कानून में बच्चों का यौन उत्पीडऩ करने के उद्देश्य से उन्हें दवा या रसायन आदि देकर जल्दी युवा करने को गैर जमानती अपराध बनाया गया है। इस अपराध के लिए पाँच साल तक की कैद का प्रावधान है।

    बाल पोर्नोग्राफी की बुराई से निपटने के लिए पॉक्सो अधिनियम, 2012 की धारा 14 और धारा 15 में भी संशोधन किया गया है। बच्चों से संबद्ध पोर्नोग्राफिक सामग्री को नष्ट नहीं करने/डिलीट नहीं करने पर जुर्माना लगाने का प्रस्ताव किया गया है। साथ ही, इस तरह की चीजों को अदालत में साक्ष्य के तौर पर पेश करने सहित कुछ मामलों को छोड़ कर अन्य किसी भी तरह के इस्तेमाल में जेल या जुर्माना, या दोनों सजा हो सकती है।

    नए प्रावधान में चाइल्ड पोर्नोग्राफी की परिभाषा तय की गई है, जिसमें चाइल्ड पोर्नोग्राफी की फोटो, वीडियो, कार्टून या फिर कंप्यूटर जेनरेटेड इमेज को दंडनीय अपराध की जद में लाया गया है। इससे जुड़ी सामग्री रखने पर 5000 से लेकर 10 हजार रुपये तक के जुर्माने के दंड की व्यवस्था की गई है। लेकिन अगर कोई ऐसी सामग्री का व्यवसायिक इस्तेमाल करता है तो उसे जेल की सख्त सजा होगी।

    इसमें व्यापारिक उद्देश्य के लिए किसी बच्चे की किसी भी रूप में पोर्नोग्राफिक सामग्री का भंडारण करने या उस सामग्री को अपने पास रखने के लिए दंड के प्रावधानों को अधिक कठोर बनाया गया है। यह संशोधन देश में बाल यौन उत्पीडऩ की बढ़ती प्रवृत्ति को रोकने की जरूरत के तहत सख्त उपाय करने के लिए किया गया है।

    सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश देते हुए कहा है कि वह हर जिले में विशेष न्यायालयों की स्थापना करें। इनकी स्थापना ऐसे जिलों में की जानी चाहिए जहाँ अधिनियम के तहत 100 या उससे अधिक मामले लंबित हैं। कोर्ट ने कहा कि विशेष अदालतों को 60 दिनों के अंदर-अंदर बच्चों पर यौन उत्पीडऩ के मामलों की सुनवाई शुरू करने की कोशिश करनी चाहिए। साथ ही यह भी कहा है कि वह चार हफ्तों में इसकी प्रगति रिपोर्ट दाखिल करें। यह अधिनियम पूरे भारत पर लागू होता है, पॉक्सो कानून के तहत सभी अपराधों की सुनवाई, एक विशेष न्यायालय द्वारा कैमरे के सामने बच्चे के माता पिता या जिन लोगों पर बच्चा भरोसा करता है, उनकी उपस्थिति में होती है।

    पाक्सो एक्ट को और सख्त बनाये जाने के बाद बच्चों को अधिक सुरक्षा की उम्मीद की जा सकती है। कानून के साथ-साथ इस दिशा में सामाजिक जागरूकता की भी आवश्यकता है। बच्चों के साथ दुर्व्यहार रोकने के लिए सबको सजग होना होगा क्योंकि जागरूकता से ही अपराधों पर नियंत्रण पाया जा सकेगा।

  • मोबाईल लुटेरों से निपटने पुलिस ने बनाया नया ठिकाना

    मोबाईल लुटेरों से निपटने पुलिस ने बनाया नया ठिकाना

    भोपाल,28 सितंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार आने के बाद मोबाईल लूट और चैन खींचने की घटनाओं में तेजी से इजाफा हुआ है। इससे निपटने के लिए पुलिस ने मोबाईल खोजने की यूनिट को पुरानी विधानसभा के सामने स्थित नए कंट्रोल रूम में कंप्यूटरीकृत सेंटर में शिफ्ट कर दिया है।

    मोबाईल लुटेरों से निपटने के लिए बनाए इस नए ठिकाने पर गुमशुदा मोबाईलों की सर्च की व्यवस्था की गई है। पुलिस की साईबर सेल यूनिट ने बढ़ती मोबाईल लूट की घटनाओं के मद्देनजर ये सेंटर जन सुविधा केन्द्र के रूप में विकसित किया है जबकि मोबाईल नेटवर्क के विश्लेषण की जिम्मेदारी साईबर क्राईम विंग को दी गई है।

    राजधानी के सभी सार्वजनिक स्थलों पर मोबाईल लुटेरों ने अपनी गतिविधियां बढ़ा दीं हैं। वे बेखौफ होकर जेबकतरी, मोबाईल चोरी और चैन स्नेचिंग जैसी वारदातों को अंजाम दे रहे हैं। इन सभी स्थानों पर सरकारी प्रबंधन ने न तो कैमरों की व्यवस्था की है और न ही निगरानी तंत्र विकसित किया है। पुलिस की कार्यप्रणाली भी फील्ड आधारित नहीं रही है इसलिए लुटेरों के हौसले बुलंद होते जा रहे हैं।

    खासतौर पर आरटीओ दफ्तर, अस्पतालों और हाट बाजारों में जेबकतरों के गिरोह बेखौफ होकर वारदातें कर रहे हैं जिनके सामने पुलिस पूरी तरह असहाय साबित हो रही है। पुलिस प्रशासन के निकम्मेपन का ही नतीजा है कि चोरी किए गए अधिकतर मोबाईल ढूंढ़े नहीं जा सके हैं। भोपाल पुलिस ने गुम मोबाईल की रिपोर्ट लिखवाने के लिए नए पुलिस कंट्रोल रूम की तीसरी मंजिल पर पूरी यूनिट शुरु की है।

    भोपाल जिले की सीमा में मोबाईल गुम हो जाने पर सूचनाएं इसी नए कंट्रोल रूम के सेंटर पर जमा किए जा रहे हैं। भोपाल पुलिस की वेवसाईट www.bhopalpolice.com/lostphone.html पर जो फार्म दिया गया है उसकी दो प्रतियों में यहां शिकायत की जा सकती है। आवेदन प्रस्तुत करते समय वोटर कार्ड या अन्य किसी पहचान पत्र के साथ मोबाईल बिल की फोटोकापी भी प्रस्तुत करनी होगी। दो प्रतियों में भरे इस फार्म के अलावा संबंधित थाने में दिए गए आवेदन की फोटोकापी भी लगानी होगी। आवेदन जमा करने का समय प्रातः 11 बजे से शाम 5 बजे तक है। अवकाश के दिन आवेदन पत्र जमा नहीं किए जाएंगे। मोबाईल मिलने पर फार्म में दिए गए नंबरों पर सूचना भेजी जाएगी। ध्यान रहे यहां मोबाईल गिर जाने या फिर गुम जाने पर ही फार्म लिया जाएगा। मोबाईल चोरी या छीने जाने की रिपोर्ट संबंधित पुलिस थाने में ही करनी होगी।

    अब इस नई व्यवस्था के चलते क्राइम ब्रांच में साइबर मामलों की जांच नहीं होगी. वहीं पेंडिंग 1530 मामलों को भी क्राइम ब्रांच से साइबर क्राइम ब्रांच में ट्रांसफर कर दिया गया है.दो साल में क्राइम ब्रांच के पास पहुंची 1530 शिकायतों को अब साइबर क्राइम ब्रांच को सौंपा गया है. इस ब्रांच की जिम्मेदारी एएसपी संदेश जैन को दी गई. जिले में सात एएसपी रैंक के अधिकारियों के पदों में से ये भी एक पद है. एससपी संदेश जैन ने बताया कि क्राइम ब्रांच पहुंचने वाले फरियादी साइबर क्राइम ब्रांच आना शुरू हो गए हैं. एक दिन में करीब 25 शिकायतें आ रही हैं. शिकायतों की जांच के लिए अलग-अलग टीमों को जिम्मेदारी दी गई है. जांच को प्रभावी तरीके से कर निराकरण भी कम समय में किया जा रहा है. साइबर क्राइम से जुड़ी शिकायतें पूरे मध्य प्रदेश में लगातार बढ़ती जा रही हैं. ऐसे में पुलिस ने भी इस चुनौती से निपटने के लिए जमीनी स्तर पर काम करना शुरू कर दिया है. अब प्रदेश स्तर पर नहीं, बल्कि जिला स्तर पर बनाई जा रही साइबर क्राइम ब्रांच इससे जुड़े अपराधों की जांच कर रही है. इसकी शुरुआत भोपाल से की गई. आने वाले दिनों में दूसरे बड़े महानगरों में जल्द शुरू किया जाएगा.

  • जनता से छीना प्रथम नागरिक चुनने का अधिकार

    जनता से छीना प्रथम नागरिक चुनने का अधिकार

    भोपाल,26 सितंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। मध्यप्रदेश में आगामी नगरीय निकाय चुनाव में नगर निगम के महापौर सहित नगर पालिका और नगर परिषद में अध्यक्ष का चुनाव अब पार्षद करेंगे। अभी तक जनता को इनके चुनाव करने का अधिकार था, लेकिन बुधवार 26 सितंबर को हुई कैबिनेट बैठक में इस पर मोहर लगा दी है कि अब पार्षद महापौर और अध्यक्ष का चुनाव करेंगे। नई व्यवस्था लागू करने के लिए मध्यप्रदेश नगर पालिक अधिनियम में संशोधन किया गया है। अगले साल होने वाले नगरीय निकाय चुनाव में 20 साल बाद अप्रत्यक्ष तौर पर महापौर और अध्यक्षों का चुनाव होगा। वहीं नगरीय निकाय चुनाव के पहले होने वाले परिसीमन का समय 6 माह से घटाकर सरकार ने 2 माह कर दिया है। अभी तक परिसीमन और चुनाव के बीच का समय 6 महीने होना जरूरी था।

    भाजपा ने सरकार के इस फैसले का विरोध किया है। भाजपा को यह आशंका है कि अप्रत्यक्ष प्रणाली से महापौर और अध्यक्षों के चुनाव हुए तो उसको नुकसान हो सकता है। जबकि कांग्रेस अप्रत्यक्ष प्रणाली से चुनाव करवाकर प्रदेश की ज्यादा से ज्यादा नगर निगमों, नगर पालिकाओं और नगर परिषदों में अपने समर्थकों को महापौर और अध्यक्ष बनाना चाहती है। मध्यप्रदेश में नगरीय निकाय चुनावों का गणित देखा जाए तो दोनों ही प्रमुख पार्टियों के 40-40 प्रतिशत पार्षद जीतते हैं। वहीं, निर्दलीय और अन्य दलों के पार्षद 20 प्रतिशत पर ही सिमट जाते हैं। कमलनाथ सरकार के इस फैसले के बाद कांग्रेस समर्थित पार्षदों के अलावा निर्दलीय और अन्य दल के पार्षद भी सत्ताधारी दल के साथ आना चाहेंगे। जिसके चलते प्रदेश के ज्यादातर नगरीय निकायों में कांग्रेस समर्थित जनप्रतिनिधियों की जीत होगी।

    कमलनाथ कैबिनेट ने इसके अलावा आपराधिक छवि वाले पार्षदों पर सख्ती करने का प्रस्ताव भी पारित किया है। अब ऐसे पार्षदों के दोषी पाए जाने पर उन्हें 6 माह की सजा और 25 हजार जुर्माने का प्रावधान सरकार ने किया है। कुल मिलाकर देखा जाए तो अभी तक प्रत्यक्ष प्रणाली से नगर निगम महापौर और नगरपालिका तथा नगर परिषद अध्यक्ष को जनता सीधे चुनती थी लेकिन बुधवार को नगरीय निकाय चुनाव को लेकर आए कैबिनेट के नए फैसले के तहत अब जनता सीधेतौर पर महापौर और अध्यक्ष का चुनाव नहीं कर सकेगी, इन्हें अब जनता के चुने हुए पार्षद ही चुनेंगे।

  • कमलनाथ सरकार को मैट्रो के कर्ज का सहारा

    कमलनाथ सरकार को मैट्रो के कर्ज का सहारा

    भोपाल,26 सितंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। घनघोर आर्थिक कुप्रबंधन से घिरी कमलनाथ सरकार ने कामकाज चलाने के लिए तीन शहरों में मैट्रो रेल परियोजना के नाम पर कर्ज बटोरने का अभियान चलाया है। इसके तहत आज भोपाल में सात हजार करोड़ रुपए के मैट्रो के पहले चरण का शिलान्यास किया गया। ये आकलन अभी आनन फानन में तैयार किया गया है वास्तविक लागत इससे कई गुना अधिक आने की संभावना व्यक्त की जा रही है।

    छिंदवाड़ा मॉडल की औद्योगिक कलाकारी वाली कमलनाथ की नौ महीने पुरानी बैसाखियों पर टिकी सरकार जिस तरह छीनाझपटी और भ्रष्टाचार के रिकार्ड बना रही है उसके चलते प्रदेश की तमाम आर्थिक व्यवस्थाएं गड़बड़ा गईं हैं। कमलनाथ जनता को बहलाने के लिए रोज रोज कहते फिरते हैं कि शिवराज सिंह चौहान सरकार खजाना खाली छोड़कर गई है। जबकि हकीकत ये है कि सरकार को जो बयालीस सौ करोड़ रुपए मासिक आय होती थी वो अब तेजी से गिरती जा रही है। सरकार के तमाम प्रस्ताव केन्द्र ने मैचिंग ग्रांट तक न चुका पाने के कारण वापस लौटा दिए हैं।

    कमलनाथ का जादू टूटने लगा है और वे जिस औद्योगिक जादूगरी का हवाला देकर सत्ता में आए थे उसकी हालत इतनी खस्ता है कि आज जब भोपाल में मैट्रो का उद्घाटन करते हुए उन्होंने इसे राजा भोज मैट्रो का नाम दिया तो कांग्रेस के ही एक विधायक आरिफ मसूद ने उनकी बात काट दी। उन्होंने कहा कि मैट्रो का नाम भोपाल मैट्रो ही रहने दिया जाए। मंच से कमलनाथ की बात काटे जाने से कांग्रेस के तमाम नेता और पदाधिकारी खुद को असहाय महसूस करते रहे।

    दरअसल सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने की भारत सरकार की नीति के चलते भोपाल में भी रेल शुरु करने की योजना बनाई गई थी। पूरे देश में राजीव गांधी की पहल पर जिस वैयक्तिक परिवहन को बढ़ावा दिया गया था वह बुरी तरह असफल साबित हुआ है। देश को आयातित ईंधन आधारित परिवहन के लिए मंहगी कीमत चुकानी पड़ी और हर आम आदमी को अपनी आय का बड़ा हिस्सा वाहन खरीदने पर खर्च करना पड़ा था। सड़कों पर वाहनों की भीड़ इतनी अधिक बढ़ गई कि सडकों को चौड़ा करने के लिए भी सरकारों को मोटा कर्ज लेना पड़ा इसके बावजूद सार्वजनिक परिवहन की हालत जस की तस रही।

    कमलनाथ ने कुर्सी संभालते वक्त कहा था कि भोपाल को मैट्रो की जरूरत नहीं है यहां मोनो रेल चलाई जानी चाहिए। इसके बावजूद अब वे ही इंदौर, जबलपुर और भोपाल में भी मेट्रो चलाने की वकालत कर रहे हैं। इसकी वजह मैट्रो पर लिया जाने वाला वह मोटा कर्ज है जिसका उपयोग वे प्रदेश का खर्च चलाने में करने की तैयारी कर रहे हैं। भोपाल में सात हजार करोड़ रुपए से जो 27.87 किलोमीटर की मैट्रो बिछाई जानी है उसका महज 1.79 किलोमीटर हिस्सा जमीन के नीचे होगा। बाकी पूरी मैट्रो पिलरों पर ही चलेगी। इसके दो कारीडोर बनेंगे जिसमें से एक करोंद सर्कल से एम्स तक 14.94 किलोमीटर और दूसरा भदभदा चौराहा से रत्नागिरि चौराहा तक 12.88 किलोमीटर का होगा। इसकी प्राथमिक लागत 6941 करोड़ 40 लाख होगी। प्रोजेक्ट में एलीवेटेड सेक्शन 26.08 किलोमीटर का होगा। इसमें कुल 28 स्टेशन बनेंगे। अंडर ग्राउण्ड सेक्शन 1.79 किलोमीटर का होगा, जिसमें 2 स्टेशन बनेंगे। पहला भाग दिसम्बर 2022 तक पूरा करने का लक्ष्य है।

    गौरतलब है कि दिल्ली प्रदेश में मैट्रो रेल 327 किलोमीटर चलती है।यह रेल नेटवर्क दिल्ली के एक करोड़ अस्सी लाख लोगों के लिए बनाया गया है जिसमें हर दिन सोलह लाख लोग सफर करते हैं। इसके बावजूद मैट्रो घाटे में चलती है। जबकि भोपाल की आबादी महज 23 लाख है और यहां 27 किलोमीटर में मैट्रो बिछाने की तैयारी की गई है। जिस तरह बीआरटीएस रोड़ असफल साबित हुई और शहर की परिवहन जरूरतें पूरी नहीं कर पाई उसी तरह मैट्रो भी फिलहाल औचित्यहीन है। इसके बावजूद कमलनाथ सरकार ने आनन फानन में मैट्रो केवल इसलिए प्रारंभ की ताकि वो इसके नाम पर कर्ज ले सके और राज्य की जरूरतें पूरी कर सके। कांग्रेस के लोग इसे कमलनाथ की औद्योगिक सूझबूझ बता रहे हैं जबकि दिन ब दिन प्रदेश के लोगों की बैचेनी बढ़ती जा रही है।

  • सुरक्षा के पक्षों को सामने लाएगा राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच

    सुरक्षा के पक्षों को सामने लाएगा राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच


    भोपाल,22सितंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के सरोकारों में आम जनता की भागीदारी बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच, प्रदेशव्यापी अभियान चलाएगा। मंच की भोपाल इकाई की कल शनिवार को आयोजित हुई बैठक में इस संबंध में व्यापक रणनीति बनाई गई और संबंधित प्रभारियों को दायित्व निर्वहन के लिए जवाबदारियां भी सौंपी गईं ।


    पूर्व पुलिस महानिदेशक और राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच की भोपाल इकाई के अध्यक्ष एस.के.राऊत की अध्यक्षता में आयोजित इस बैठक में देश भर में राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर चल रहे कार्यक्रमों की जानकारी दी गई। भोपाल के न्यूमार्केट में आयोजित इस बैठक में आगामी दिनों के लिए प्रस्तावित कार्यक्रमों के स्वरूपों पर विचार किया गया। श्री राऊत ने बताया कि इजरायल के फिलिस्तीन से सटे हायफा शहर की आजादी के संघर्ष में भारत की तीन रेजीमेंटों ने किसी वक्त बड़ी भूमिका निभाई थी उस घटना के सौ साल पूरे हो रहे हैं.उस समय भारत की ये रेजीमेंट ब्रिटिश सेना की अंग थीं। हर साल की तरह इस बार भी 23 सितंबर को इस संग्राम में बलिदान देने वाले भारत के 900 सैनिकों की याद में स्मरण दिवस मनाया जाएगा।

    उन्होंने कहा बताया कि आगामी 28 और 29 सितंबर को आगरा में होने वाले हिमालय हिंद महासागर राष्ट्र समूह कान्क्लेव में मध्यप्रदेश की इकाई बड़ी भूमिका निभाएगी। इसी तरह सोलह दिसंबर को चंडीगढ़ में प्रस्तावित नो मोर पाकिस्तान कार्यक्रम के लिए प्रदेश के जन नेताओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी। 29 दिसंबर से 01 जनवरी तक अंडमान-निकोबार द्वीप पर आयोजित शहीद स्वराज द्वीप नमन यात्रा में मध्यप्रदेश की हिस्सेदारी पर भी चर्चा हुई। इसके संयोजन की जिम्मेदारी गीतधीर को सौंपी गई है। इसी प्रकार 23 सितंबर को हाईफा दिवस कार्यक्रम के आयोजन के संयोजन का दायित्व कृपाशंकर चौबे को तथा 28-29 सितंबर को आगरा में होने वाले हिमालय हिंद महासागर राष्ट्र समूह कान्क्लेव के लिए सोशल मीडिया का संयोजन फैन्स की सचिव नेहा बग्गा को सौंपा गया। जबकि आगरा के इस आयोजन के लिए प्रदेश इकाई के प्रबंधन की जवाबदारी डॉ अनिल सौमित्र संभालेंगे। चंडीगढ़ में दिसंबर महीने में प्रस्तावित नो मोर पाकिस्तान कार्यक्रम में मध्यप्रदेश की भागीदारी को उल्लेखनीय बनाने की जवाबदारी आलोक सिंघई को सौंपी गई है।
    राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच की मध्यप्रदेश इकाई के महासचिव डॉ अनिल सौमित्र ने बताया कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर जन भागीदारी बढ़ाने के लिए प्रदेश के सभी जिलों की इकाईयां जागरूक नागरिकों के बीच संवाद नेटवर्क विकसित करेंगे। इस अभियान का उद्देश्य प्रदेश और देश के नागरिकों को राष्ट्रीय सुरक्षा के विभिन्न पहलुओं की जानकारी प्रदान करना रहेगा। विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों और संगठनों की भागीदारी बढ़ाने लिए महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों समेत तमाम शैक्षणिक संस्थानों में बैठकें आयोजित की जाएंगी।

  • बारिश गई अब बुखार से बचें

    बारिश गई अब बुखार से बचें

    भोपाल,19 सितंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)।बारिश के मौसम में वायरस, बैक्टीरिया, फंगस आदि से वायरल फीवर, पीलिया, फूड पॉयजिनिंग, मलेरिया, डेंगू, दस्त आदि रोगों की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं। इनमें वायरल फीवर की प्रबलता काफी हो जाती है। पं. खुशीलाल शर्मा शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. उमेश शुक्ला ने बताया है कि बुखार आने पर नियमित चार्टिंग करें। गिलोय (गुडूची) धनवटी का उपयोग करें। गला खराब होने पर मूलेठी चूसें। महासुदर्शन, चिरायता के काढ़े का सेवन करें। इन उपायों से दो-तीन दिन में मरीज को आराम मिल जाता है। डॉ. शुक्ला ने कहा कि इसके बाद भी यदि तेज बुखार बना रहता है, तो तुरंत नजदीकी अस्पताल में आवश्यक जाँचें करवायें।

    डॉ. उमेश शुक्ला ने जानकारी दी कि एहतिहात के तौर पर मरीज को पूरा आराम करना चाहिये। उन्होंने बताया कि पानी उबालकर पियें। संक्रमण ग्रस्त व्यक्ति को अलग कमरे में रखें क्योंकि उसके छींकने, थूकने और खाँसने से वातावरण में संक्रमण फैलता है। गीले कपड़े न पहनें। बारिश में न भीगें, नम वातावरण से बचें। ताजा खाना खायें और बाहर के खाने से परहेज करें। घर के आसपास, कूलर, गमलों आदि में पानी भरा न रहने दें क्योंकि यह मच्छरों का प्रजनन काल है। सोते समय मच्छरदानी का प्रयोग करें। दिन में पूरी बाँह के कपड़े पहनें। संक्रमित लोग भीड़-भाड़ वाली जगहों में जाने से बचें।

  • इंसानियत का महामार्ग है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

    इंसानियत का महामार्ग है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

    डॉ. अनिल सौमित्र

    देश के वर्तमान प्रधानमंत्री राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे हैं l प्रचारक और संचारक लगभग समानार्थी है l संघ का प्रत्येक स्वयंसेवक एक कुशल संचारक होता है l इसी प्रकार एक प्रचारक में श्रेष्ठ संचारक के सारे गुण विद्यमान होते हैं l प्रधानमंत्री श्री मोदी टेक्नोसेवी भी हैं l वे संचार के परम्परागत, आधुनिक और अत्याधुनिक साधनों का खूब इस्तेमाल करते हैं l एक अर्थ में वे भारत के वैश्विक संचारक और प्रचारक प्रतीत होते हैं l श्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी के संचार कौशल के करोड़ों मुरीद हैं l इसमें बड़ी संख्या संघ के स्वयंसेवकों की भी है l श्री मोदी की संचार साधना में आभासी और वास्तविक संचार का संतुलन कमाल का है l यह आदर्श और अनुसरण योग्य है l लेकिन यह आधा सच है l इसके आगे की बात यह है कि संघ में संचार प्रणाली, प्रकिया, संचार माध्यमों और उपकरणों को लेकर अंतर्द्वन्द्व और कशमकश की स्थिति है l संघ के अनेक अधिकारी, वरिष्ठ कार्यकर्ता और स्वयंसेवक हैं जिनकी आभासी सक्रियता वास्तविक गतिशीलता की तुलना में नगण्य है l हाल ही में संघ के उच्च अधिकारियों का ट्विटर खाता खुला, लेकिन उसमें अंतरण न के बराबर

    है l

    संचार पुरानी अवधारणा है l समाज और संघ अपेक्षाकृत नई अवधारणा है l संघ अर्थात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ l यह एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है l नित्य गतिशील शाखा के माध्यम से संघ सामाजिक परिवर्तन और पुनर्रचना के लिए प्रयासरत है l सामान्य तौर पर कहा जा सकता है कि समाज में मत-निर्माण, मत परिवर्तन, विचार परिमार्जन, लोकमत परिष्कार और व्यवहार परिवर्तन ही संघ का मुख्य कार्य है l संघ का यह प्रयास लोगों के साथ निरंतर संपर्क और संवाद पर आधारित है l इसके सम्पूर्ण प्रयासों के केंद्र में सुनियोजित, सुसंगत और सम्यक संचार व सम्प्रेषण ही है l संघ के योजनाकार और विचारक यह भली-भांति जानते हैं कि जैसे मनुष्य के लिए हवा और पानी आवश्यक है, वैसे ही समाज के लिए संचार जरूरी है l यही कारण है कि संघ ने संचार प्रक्रिया, पद्धति और तकनीक पर शुरू से ही गंभीर दृष्टि रखी है l संघ ने संगठन और समाज की आवश्यकताओं के अनुसार संचार प्रविधि व प्रक्रिया में युक्तिसंगत परिवर्तन भी किये

    हैं l संघ ने शाखा, स्वयंसेवक, और प्रचारक को संचार-तंत्र के रूप में विकसित किया है l संघ का पूरा ताना-बाना ही संचार आधारित है l संघ के प्रारम्भ से ही संचार और जनसंचार के विभिन्न माध्यमों का नियोजित उपयोग देखने को मिलता है l स्वयंसेवकों का व्यापक तंत्र ही संघ की सूचना प्रौद्योगिकी है l स्वयंसेवकों के माध्यम से संघ की विचारधारा प्रवाहित या संप्रेषित होती है l स्वयंसेवक में संपर्क, परिचय और नियमित संवाद के द्वारा विचारधारा को विस्तार देने का गुण विद्यमान होता है l

    संचार विशेषज्ञों के अनुसार, मनुष्य और समाज की ही तरह प्रौद्योगिकी की भी अपनी विचारधारा होती है l यह विचारधारा भले ही वैचारिक संगठनों की तरह न होती हो, लेकिन प्रौद्योगिकी भी अपनी विचारधारा को सतत आगे बढाने, अपने अनुसरणकर्ताओं की संख्या बढाने, उनमें उपयोग की आदत डालने की कोशिश करता है l इसमें उपयोगर्ताओं के साथ ही अन्य लोगों को प्रभावित करने का गुण विद्यमान होता है l सामान्यत: विचारधारा की दृष्टि से स्वयंसेवक और तकनीक अतुलनीय है l लेकिन जब हम सामाजिक अंत:क्रिया के परिप्रेक्ष्य में विचार करते हैं तो विचारधारा के प्रचार-प्रसार में तकनीक और स्वयंसेवक की तुलना की जा सकती है l किसी भी संगठन के कार्यकर्ता में अगर मानवीय गुणों को पृथक कर दें तो वह सिर्फ मशीन या प्रौद्योगिकी के सामान ही होगा l कमोबेश यही स्थिति संघ के स्वयंसेवकों में भी संभावित है l अगर स्वयंसेवकों में मानवीयता का गुण न हो तो उनमें और प्रौद्योगिकी की विचारधारा में अंतर नगण्य रह जाएगा l इसलिए कहा जा सकता है कि संघ के स्वयंसेवकों की विचारधारा मानवीय है, किन्तु प्रौद्योगिकी की विचारधारा अमानवीय l तो क्या तकनीक का अनियोजित, अनियंत्रित उपयोग, उसकी आदत और उसका अनुसरण व्यक्ति, समाज और संगठन को अमानवीय बना सकता है? अगर ऐसा है तो दुनियाभर में क्यों प्रौद्योगिकी का इतना उपयोग हो रहा है? मानव संगठनों में इसका दिनों-दिन बढता उपयोग क्या चिंता का विषय है?

    भारत और दुनिया में मानव समाज को संगठित करने के काम में सन 1925 से ही प्रयासरत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रारम्भिक समय से ही प्रौद्योगिकी के बारे में अन्य संगठनों से भिन्न विचार रखता रहा है l इसीलिये आरएसएस की स्थापना के शुरुआती दिनों में मानव संसाधन के अलावा अन्य सभी संसाधनों से एक निश्चित दूरी की परम्परा रही l कार्यक्रमों, गतिविधियों और योजनाओं का समाचार देना भी बहुत आवश्यक नहीं समझा जाता था l संचार तकनीक को तो तिरस्कार भाव से ही देखा जाता था l डोर टू डोर, मैन टू मैन और हार्ट टू हार्ट संचार सिर्फ संयोग नहीं, बल्कि संघ की सुदीर्घ नीति रही है l यद्यपि संघ के सिद्धांत और दर्शन में तो यह आज भी विद्यमान है, लेकिन व्यवहार में विचलन प्रतीत होता है l सकारात्मक या नकारात्मक, किसी भी प्रकार की सूचना को प्रसारित करने की संघ की विशिष्ट शैली रही है l संघ ने संवाद की भारतीय पद्धति और प्रारूप (माडल) को ही अपनाया है l अनेक अनूकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में सूचना-सम्प्रेषण का यह प्रारूप सफलतापूर्वक उपयोग किया जाता रहा है l आरएसएस की संगठनात्मक गठ संरचना सूचना-सम्प्रेषण की अदभुत व्यवस्था है l दरअसल यह संघ की संचार प्रौद्योगिकी ही है, जिसका लोहा उसके विरोधी भी मानते हैं l जैसे डिजिटल संचार के तहत कंप्यूटर का संजाल दुनियाभर में एक-दूसरे से जुड़ा है, ठीक वैसे ही संघ के स्वयंसेवकों का संजाल है, जो अल्प समय में अत्यंत तीव्र गति से संदेशों को संप्रेषित करने में सक्षम है l अनेक विषम परिस्थितियों और आपदाओं में संघ ने इस सूचना तंत्र का सकारात्मक उपयोग किया है l हांलाकि संघ की इस संचार क्षमता का मधु लिमये जैसे समाजवादी चिंतक व वैचारिक विरोधी ‘रियुमर्स स्प्रेडिंग सोसाइटी’ (आरएसएस) कह कर आलोचना करते रहे l

    कई शोधकर्ताओं और विश्लेषकों ने इस तथ्य का उल्लेख किया है कि कि संघ की सूचना प्रणाली को वर्तमान या आधुनिक संचार तकनीक ने काफी प्रभावित किया है l गत 20-25 वर्षों में संचार, विशेषकर संचार तकनीक में आमूल-चूल परिवर्तन होता दिखाई देता है l इसके कारण संघ की कार्यशैली, विशेषकर संपर्क और संवाद शैली में भी परिवर्तन हुआ है l सूचनाओं के तीव्र और गहन सम्प्रेषण के दौर में संघ के स्वयंसेवक भी पीछे नहीं रहना चाहते l संघ के विचारक प्रौद्योगिकी की विचारधारा और उसके प्रभावों से बखूबी वाकिफ हैं l वे भली-भाँति जानते हैं कि संचार-प्रौद्योगिकी अब लोगों की जरूरत और बहुत हद तक मजबूरी बन चुकी है l संचार तकनीक या सूचना प्रौद्योगिकी एक आवश्यक बुराई के रूप में ही सही, लेकिन स्वीकार्य हो चुका है l संघ में बौद्धिक विभाग के साथ ही बकायदा एक प्रचार विभाग भी है जो वर्षों से स्वयंसेवकों में प्रचार के महत्त्व का प्रतिपादन करता आ रहा है l यह प्रचार विभाग स्वयंसेवकों से ज्यादा समाज में विचार और सूचना सम्प्रेषण के लिए है l लेकिन तकनीक का प्रभाव ऐसा बढा है कि इससे संघ का स्वयं का तंत्र भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका है l दुनियाभर में विचार फैलाने और प्रतिगामी व विरोधी विचारों जवाब देने से लेकर संगठन के आतंरिक सूचना-प्रवाह तक में संचार- प्रौद्योगिकी की भूमिका अत्यधिक बढ़ गई है l इसमें कुछ तो तकनीक के इस्तेमाल का फैशन है, देखा-देखी है, लेकिन बहुत कुछ तकनीकी-उदारीकरण का प्रभाव भी है l संघ में अब सिर्फ बौद्धिक और प्रचार के लिए ही नहीं, बल्कि शारीरिक प्रशिक्षण के लिए भी संचार तकनीक का उपयोग आम चलन में है l

    एक समय था जब संघ में टेलीफोन से किसी कार्यक्रम की सूचना देना भी मजबूरी समझा जाता था, लेकिन आज ई-मेल, फेसबुक मैसेंजर, वाट्सेप, एसएमएस, गूगल हैंग-आउट आदि कम्प्युटर और मोबाईल फोन आधारित संचार-तकनीक के द्वारा सूचनाओं का आदान-प्रदान सामान्य-सी बात है l संघ की गठ-संरचना अब मोबाइल ‘एसएमएस-ग्रुप’ या वाट्सेप व्यवस्था पर अवलंबित हो चुकी है l संघ में स्मार्टफोन, आईपौड, आईपैड और लैपटाप से परहेज करने वाले अब कम ही बचे हैं l डिजिटल संचार माध्यमों से परहेज करने वाले इक्के-दुक्के लोग संघ के भीतर भी आधुनिकता विरोधी और रूढ़िवादी माने जाने लगे हैं l संचार-तकनीक का उपयोग करने वालों का अपना तर्क है l यद्यपि आधुनिक संचार तकनीक से परहेज करने वाले संघ में अल्पसंख्यक हैं, लेकिन उनका भी अपना मजबूत तर्क है l सूचना सम्प्रेषण के अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग करने वाले इसके गुण और फायदे बताते हैं, जबकि पारंपरिक संचार के समर्थक सूचना-प्रौद्योगिकी के नकारात्मक पहलुओं को उजागर कर इससे बचने की सलाह देते हैं l

    कई मुद्दों की तरह संचार पद्धति को लेकर संघ के भीतर एक कश्मकश की स्थिति बरकरार है l इस मामले में भी संघ ‘चिर पुरातन और नित्य-नूतन’ दो खेमों में बंटा है l एक तर्क ये है कि अगर युवाओं को जोडना है, दुनिया में विचारधारा को फैलाना है, भारत को दुनिया में सिरमौर बनाना है तो आज के चाल-चलन और तौर-तरीके को स्वीकारना ही होगा l तकनीक के प्रयोग में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना ही होगा l नई सोच के तरफदार हर क्षेत्र की तरह संचार क्षेत्र में भी संघ को सिरमौर होता हुआ देखना चाहते हैं l लेकिन संघ के भीतर एक तबका ऐसा है जो संघ की विचारधारा के साथ तकनीक की विचारधारा को भी बखूबी समझता है l वह तकनीक की ताकत को जानता है l वह डरता है कि “संघौ शक्ति कलियुगे” कहीं ‘तकनीकौ शक्ति कलियुगे’ न बन जाए l उसे डर है कि तकनीक का आकर्षण परम्परागत व्यवहार पद्धति पर भारी न पड़ जाए l तकनीक स्वयंसेवकों और समाज की आदत न बन जाए l इस मामले में वे महात्मा गांधी की सीख को भूलना नहीं चाहते जिसमें उन्होंने मानव सभ्यता के तकनीकीकरण का विरोध किया है l संघ का यह तबका गांधी जी की ही तरह प्रकृति आधारित मानव-सभ्यता के विकास का समर्थक है l इसी कारण वह इस सभ्यता के विधायक गुणतत्वों – धर्म, नीति, मूल्य आदि को बढ़ावा देना चाहता है l जबकि चर्च (ईसाइयत) पोषित वर्तमान सभ्यता यन्त्र, तकनीक, मशीन और प्रौद्योगिकी आधारित है l यह विविधता और विकेंद्रीकरण का विरोधी है l संचार-तकनीक की भी यही प्रवृत्ति प्रतीत होती है l

    हालांकि आज संघ के भीतर और संघ समर्थकों के द्वारा आधुनिक सूचना तकनीक का उपयोग करने की होड-सी दिख रही है l मोबाईल फोन के अत्याधुनिक एप्लीकेशन, इंटरनेट अनुसमर्थित – वेबसाईट, ब्लॉग, सोशल नेटवर्क और इलेक्ट्रानिक जनमाध्यमों के उपयोग में संघ के स्वयंसेवक किसी से भी पीछे नहीं हैं l संघ में तकनीक विरोधी अब अल्पसंख्यक हो चुके हैं l तो क्या यह मान लेना उचित होगा कि संघ के लिए संचार-तकनीक के उपयोग का लाभ-ही-लाभ है? कोई हानि नहीं, कोई नुकसान नहीं? क्या यह मान लिया जाए कि संघ, विचारधारा की दुनियावी लड़ाई में तकनीक के सहारे सबको पछाड़ ही देगा? क्या तकनीक की विचारधारा का संघ की विचारधारा पर कोई प्रभाव नहीं होगा? क्या संघ पर तकनीक बे-असर है? क्या यह मान लेना मुनासिब होगा कि तकनीक के सहारे स्वयंसेवकों की संघ-साधना डा. हेडगेवार के अभीष्ट को बिना किसी हानि के प्राप्त कर लेगी ? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके प्रति संघ के आधुनिकतावादी शायद बेपरवाह हैं l शायद उन्हें लगता है, अभी सोचने का नहीं, सबसे आगे निकल जाने करने का वक्त है ! लेकिन संघ के परम्परावादी चिंतित हैं l वे कट्टर और रूढ़िवादी होने के आरोपों से बेपरवाह संघ में तकनीकी अनुप्रयोगों पर लगाम लगाने, इसे नियंत्रित और नियोजित करने की हर संभव कोशिश में हैं l

    कुछ लोग भले ही तकनीक को नई सभ्यता का सिर्फ एक औजार भर मानते हों l लेकिन इस औजार का भी गलत उपयोग होना संभावित है l इस बात का खतरा तो है ही कि प्रौद्योगिकी आधारित संचार प्रक्रिया समाज में अमानवीय-संचार को बढ़ावा दे दे l डोर टू डोर, मैन टू मैन और हार्ट टू हार्ट की प्रतिस्थापना कम्प्युटर टू कम्प्युटर, फोन टू फोन, मेल-टू-मेल और व्हाट्सेप टू व्हाट्सेप के रूप में होने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता l यह भी संभव है कि स्वयंसेवकों की मानवीय विचारधारा को तकनीक की अमानवीय विचारधारा प्रभावित कर दे l तब शायद संघ सबसे तेज, सबसे आगे और सबसे बड़ा होकर भी निष्फल रह जाए! संघ वह न रहे जिसके लिए संघ है l पवित्र साध्य के लिए साधन की पवित्रता को कैसे झुठलाया जा सकता है l संघ के परम्परावादी साधन की पवित्रता और मानवीयता के सवाल पर सजग हैं, अपना पक्ष लेकर संघ में खड़े, समाज में डटे हैं l यह सही वक्त है कि संघ के आधुनिकतावादी भी संचार प्रौद्योगिकी की चकाचौंध में अपनी आँखें न भींचे – तकनीक के उपयोग के साथ उसकी विचारधारा को भी परखें !

    चूंकि संघ समाज के लिए, समाज में और समाज के द्वारा कार्य करता है l आज संघ मानव गतिविधि से जुड़े लगभग सभी क्षेत्रों में सक्रिय है l नि:सन्देश संघ कार्य की धुरी मनुष्य है l कोई भी उपकरण, मशीन, तकनीक या प्रौद्योगिकी संघ कार्य के लिए साधन मात्र हो सकता है, लेकिन लक्षित क्षेत्र तो मनुष्य और समाज ही है l संघ इस बात के लिए दृढ निश्चयी है की मानव सभ्यता को देव सभ्यता (प्रकृति उन्मुखी) की ओर ले जाना है, न कि दानव सभ्यता (मशीनोन्मुखी) की ओर l इसलिए संघ के योजनाकार संचार और संवाद के लिए भी मानवीय गुणों से युक्त संचार प्रारूप को ही श्रेष्ठ और युक्तिसंगत मानते हैं l इंटरनेट, कम्प्युटर, मोबाईल फोन आदि डिजिटल व तकनीक (उपकरण) आधारित सूचना तंत्र संघ को फौरी तौर पर मजबूरी में या आवश्यक बुराई के रूप में स्वीकार्य तो हो सकता है, लेकिन नीतिगत और दीर्घकालिक रूप से यह त्याज्य ही होगा l

    संघ को यह बखूबी पता है कि वर्तमान सूचना तकनीक ने एक अलग दुनिया निर्मित कर दी है जिसे संचार विशेषज्ञ ‘आभासी दुनिया’ कहते हैं l इस नव-निर्मित आभासी दुनिया और वास्तविक दुनिया में जमीन-आसमान का अंतर है l जो लोग जब भी, जितनी देर तक तकनीक के साथ आभासी दुनिया में होते हैं तो वे वास्तविक दुनिया से अलग-थलग हो जाते हैं l इस दुनिया में व्यक्ति अकेला होता है और उसके साथ होते हैं कम्प्यूटर, मोबाइल, गैजेट, चित्र, संकेत, ध्वनियाँ आदि l संघ को आभासी नहीं, वास्तविक दुनिया में काम करना है l इसलिए उसके लिए उपकरण और तकनीक से अधिक मानवीय गुणों- संवेदना, भावना आदि के साथ मनुष्य के मस्तिष्क और ह्रदय की चिंता है l संघ मानवीय समाज के विकास और सशक्तिकरण के लिए प्रतिबद्ध है, न कि मशीनी या तकनीकी समाज के लिए l

    ( लेखक संचार और संघ विचारों के अध्येता हैं )

  • बुंदस जैसे अफसरों का सोच आज भी औपनिवेशिक

    बुंदस जैसे अफसरों का सोच आज भी औपनिवेशिक

    (डॉ अजय खेमरिया)
    मप्र में छतरपुर के कलेक्टर कलेक्टर है मोहित बुंदस।सीधी भर्ती के आईएएस अफसर है इन्हें हटाने के लिये जिले की तीन पार्टियों के सभी पांच विधायक मप्र के सीएम से गुहार लगा चुके है।बीजेपी के विधायक राजेश प्रजापति को कलेक्टर महोदय ने पूरे दो घण्टे तक बाहर बिठाए रखा मिलने से पहले।कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे सत्यव्रत चतुर्वेदी के विधायक भाई आलोक चतुर्वेदी भी कुछ इन्ही अनुभवों से बेजार है।जिस सपा विधायक के समर्थन से कमलनाथ सरकार टिकी है वे राजेश शुक्ला भी मुख्यमंत्री से फरियाद कर रहे है कि कलेक्टर को हटाया जाए क्योंकि वे न किसी की सुनते है न फील्ड में जाते।बाबजूद मोहित बुंदस पर मुख्यमंत्री की कृपा बरस रही है।यह पहला मौका नही है जब मप्र में आईएएस अफसरों के सामने इस तरह चुने गए विद्यायको को लाचार और विवश होकर खड़ा होना पड़ा है।असल में मप्र में लगातार अफसरशाही की निरंकुशता बढ़ रही है न केवल कमजोर बहुमत वाली मौजूदा कमलनाथ सरकार में बल्कि मजबूत बहुमत से चलीं बीजेपी की सरकारों में भी अफसरशाही से जनता ही नही सत्ता पक्ष के विधायक और मंत्री तक परेशान रहे है।
    आखिर क्या वजह है कि भारत मे आज भी कलेक्टर का पद इतना ताकतवर होता जा रहा है इस उलटबांसी के की देश मे लोकतंत्र निचले स्तर पर मजबूत हुआ है लोगों में लोकतांत्रिक अधिकार और जागरूकता का व्यापक प्रसार हुआ है।कलेक्टर की ताकत अपरिमित रूप में बढ़ रही है।यह जानते हुए की इस पद का निर्माण गोरी हुकूमत ने औपनिवेशिक साम्राज्य की मैदानी पकड़ मजबूत करने के लिये किया था।कलेक्टर मतलब राजस्व औऱ लगान कलेक्शन करने वाला साहब।अंग्रेजी राज में इसे सूबा साहब भी कहा जाता था।क्योंकि तब आज की तरह जिलों की छोटी इकाइयां नही थी।आईसीएस की भर्ती भी अंग्रेजों के पास थी और शरुआती दौर में परीक्षा भी इंग्लैंड में ही हुआ करती थी।यानी समझ लीजिये ये पद जो बाद में आईसीएस की जगह आईएएस में तब्दील हुआ है उसकी गर्भ नाल उस अंग्रेजी साम्राज्यवाद में छिपी है जो भारतीयों को दोयम दर्जे का इंसान मानती थी।क्या यही मानसिकता इन अफसरों को मैदान में परिचालित करती है?मोहित बुंदस जैसे प्रहसन इसे साबित करने के लिये पर्याप्त आधार प्रदान करते है।सीधी भर्ती के अधिकतर आईएएस अफसर खुद को भारत मे सबसे काबिल और ताकतवर शख्स मानते है वे सोचते है कि यूपीएससी की परीक्षा पास कर आईएएस संवर्ग हासिल करने के बाद दुनियां में अब कुछ भी ऐसा नही जो उनसे ऊपर हो।अधिकतर आईएएस अधिकारी जब प्रशिक्षण प्राप्त कर मैदानी पदस्थापना पर आते है तो उन्हें इस बात का अहसास रहता है कि देश के सभी नेता अनपढ़ प्रायः है कानून औऱ नियमों का उन्हें कोई ज्ञान नही है।और इस देश मे हर कोई कानून तोड़कर गलत काम करना चाहता है।आईएएस ही कानून के अकेले रक्षक है उन्हें हर हाल में अडिग,सख्त,और अनुदार बने रहना है।वस्तुतः यह भारत की आइएएस बिरादरी का स्थायी चरित्र बन गया है।सवाल यह है कि क्या वाकई यूपीएससी की परीक्षा प्रवीण शख्स दुनिया का सर्वाधिक श्रेष्ठ और प्रतिभाशाली माना जाना चाहिये?पिछले 70 साल से तो यह मान ही लिया जाना चाहिये क्योंकि हर दिन इस बिरादरी की ताकत बढ़ती गई है।जिस अनुपात में सरकारों के काम बढ़े ,राज्य का चेहरा लोककल्याण के नाम पर जीवन के हर क्षेत्र में हस्तक्षेपनीय बना उसी अपरिमित अनुपात में आईएएस बिरादरी की ताकत,रुतबा,और अहं बढ़ता चला गया है।आज का कलेक्टर सही मायनों में अंग्रेज बहादुर से कम नही है औपनिवेशिक सूबों की तरह सूबा साहब को आज चरितार्थ कर रहा है। कलेक्टर दो तीन बीघा के सर्वसुविधायुक्त बंगलों में रहता है उसके पास भारतीय (दोयम)सेवादार है जो घर,रसोई,बगीचों से लेकर दफ्तरों तक हर जगह अर्दली में लगे है।जिसके घर के बिजली, पानी से लेकर खाने पीने तक कि किसी भी सुविधा का कोई ऑडिट नही होता है।जिसकी एक आवाज पर अधीनस्थ अफसरों की फ़ौज आधी रात को शीर्षासन करने पर ततपर रहती है।जिसकी सुरक्षा में 24 घण्टे जवान खड़े रहते है।आप उसकी मर्जी के बगैर उससे मिल नही सकते है।वह आपका फ़ोन उठाये यह उसकी मर्जी पर निर्भर है।वह विकास पुरुष है वह दंडाधिकारी है वह जिले का सुपर बॉस है। वह किसी को भी मुअतिल कर सकता है।वह आज का महाराजा है।उसके काम के घण्टे तय नही है,कोई उससे उसके काम का हिसाब नही मांग सकता है।फिर भी वह सिविल सर्वेंट है।उसका सुपर बॉस राज्य का मुख्य सचिव है जो अपनी बिरादरी का सर्वोच्च सरंक्षणदाता है।मायावती को छोड़कर भारत मे किसी शख्स ने कभी भी इस महाराजा के वर्चस्व को चुनौती नही दी।आईएएस ब्रह्म ज्ञानी है उनकी मेधा स्वयंसिद्ध है वह जिस जगह खड़ा हो जाता है उस क्षेत्र का हुलिया बदल देता है वह कभी कलेक्टर के रूप में विकास के नए आयाम स्थापित करता है जिसकी गवाही नीति आयोग के आभासी जिलों की संख्या दे ही रहे है।आईएसएस कभी बिजली कम्पनी के सीएमडी के रूप में भारत को ऊर्जीकरत कर देता है,कभी वह लोकस्वास्थ्य, कभी मेडिकल एजुकेशन, संचार,उधोग,सिविल एवियेशन,विज्ञान,स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा, पीएचई, जल संसाधन ,नगर विकास,जनसम्पर्क से लेकर शासन के हर क्षेत्र को अपनी प्रतिभा से अलंकृत करता रहता है।जब इतनी प्रतिभा किसी एक हाड़मांस में घनीभूत हो तब आपके पास उसकी अद्वितीय श्रेष्ठता को अधिमान्यता देने का कोई अन्य विकल्प शेष ही नही रह जाता है।
    सवाल यह भी है कि एक व्यक्ति के रूप में इस वर्ग के इस अवतार को आखिर विकसित किसने किया है?हमारी व्यवस्था में विधायिका ,कार्यपालिका, और न्यायपालिका का स्पष्ट विभाजन है लेकिन यहां चर्चिल की भविष्यवाणी ने फलित होकर सब कुछ अस्त व्यस्त कर दिया है शक्ति पृथक्करण का राजनीतिक सिद्धान्त तिरोहित हो चुका है कतिपय कमजोर चरित्र के लोगों ने सरकार के तीनों अंगो को अपनी अंतर्निहित भूमिका से भटका दिया है।सत्ता के लिये असुरक्षा की मार से पीड़ित नेताओं ने कभी इस तरफ सोचा ही नही की वह अपने सत्ता सुख को बचाने के लिये किस तरह उस व्यवस्था के दास बनते चले जा रहे है जो उनके सार्वजनिक अनुभवों से अधीनस्थ अमले के रूप में काम करने के लिये प्रावधित है।इस असुरक्षा की ग्रन्थि ने ही आज भारत की लोकशाही को बाबूशाही में बदल दिया है और मोहित बुंदस असल में इसी बाबूशाही के प्रतिनिधि भर है।ऐसा नही है कि इस बिरादरी में सभी एक जैसे है कुछ अफसर अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय करने का प्रयास करते है।मप्र में एक मुख्य सचिव के समकक्ष अफसर है जो जिस विभाग में रहते है उसमें ढल कर काम करते है।कुछ कलेक्टर के रूप में भी संवेदनशीलता दिखाते है लेकिन ऐसे अफसरों की संख्या बहुत ही कम है।
    प्रशासन के स्तर पर जिलाधिकारी को इस योग्य माना जाता है कि वह अपने अधीनस्थ अधिकारियों पर नियंत्रण में सक्षम है लेकिन 70 साल के अनुभव बताते है कि जिलों में ऐसा नही हुआ है।मप्र में हर मंगलवार जिला मुख्यालय पर जनसुनवाई होती है वहाँ औसतन दो तीन सौ लोग सुदूर गांवों से अपनी फरियाद लेकर कलेक्टर के पास आते है इसका मतलब अधीनस्थ अमला जनता की सुनवाई नही कर रहा है।अफसरशाही की संवेदनशीलता को खारिज करने के लिये हजारों मामले सामने रखे जा सकते है।जाहिर है देश मे इस वर्ग की उपयोगिता और योगदान पर विचार करने का समय आ गया है।क्या भर्ती के समय सेवा करने का जो जबाब अभ्यर्थियों द्वारा दिया जाता है वह सेवा में आने के बाद किसी औपनिवेशिक विशेषाधिकार को स्थापित कर देता है?अनुभव तो इसकी तस्दीक करते ही है।इसलिये समय आ गया है कि हम इस आईएसएस सिस्टम और इसकी भागीदारी पर खुले मन से पुनर्विचार करें।गांधी जी का एक प्रसंग यहां उदधृत किया जाना चाहिये।अहमदाबाद में अपने एक परिचित के बेटे नानालाल के आईसीएस में सिलेक्ट होने पर आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि सिविल सेवक भारत का भला नही कर सकते है।यह एक बुराई है।आज गांधी की 150 वी जन्मजयंती बर्ष में उनके विचारों के आलोक में आईएएस सिस्टम पर विचार किया जाना चाहिये।
    मौजूदा केंद्र सरकार ने निजी क्षेत्र के पेशेवर लोगों को लैटरल एंट्री के जरिये सीधे आईएएस के समकक्ष भर्ती का प्रयोग किया है इसे नए भारत मे समय की मांग कहा जा सकता है।
    तब तक सर्वशक्तिमान,सर्वाधिक प्रतिभाशाली, सर्वाधिक बुद्धिमान और कानून के रखवालों के अधीन आनन्द लीजिये।
    यह अलग बात है कि शिवपुरी जिले के एक कलेक्टर साहब को प्रधानमंत्री आवास योजना की बुनियादी गाइडलाइंस नही पता है वे आजकल एक दूसरे जिले में कलेक्टर है। सीधी भर्ती से इनकी पोजिशन भारत बर्ष में अंडर 30 थी।
    मान्यता यही है की कलेक्टर कभी गलती नही करते है उनसे ज्यादा किसी को कुछ नही आता है।इसीलिए मोहित बुंदस सभी विधायकों को घण्टे भर बाहर खड़ा रखते है।भले ही विधायक का स्थान प्रोटोकॉल में मुख्य सचिव से ऊपर है।

  • मंदी नहीं,विकास जारी बोलीं वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण

    मंदी नहीं,विकास जारी बोलीं वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण

    नयी दिल्ली,14 सितंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)।हाऊसिंग प्रोजेक्ट को गति देेने के लिए भारत सरकार दस हजार करोड़ रुपए उपलब्ध कराएगी। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने शनिवार को बताया कि सरकार ने अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए कई उपाय किए हैं।जो लोग मंदी की बात कह रहे हैं उनके अनुमान ताजा आंकड़ों के सामने काल्पनिक साबित हुए हैं। उन्होंने बताया कि सहायता ऐसी परियोजनाओं को ही मिलेगी, जो दिवाला संहिता के तहत एनसीएलटी में जाने या गैर-निष्पादित संपत्ति (एनपीए) घोषित होने से बची हुई हैं.

    वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने यहां अर्थव्यवस्था को नरमी से उबारने के लिए एक और पैकेज की घोषणा करते हुए कहा कि निर्माणाधीन परियोजनाओं के वित्त-पोषण के लिए सरकार करीब 10 हजार करोड़ रुपये की सहायता देगी. उन्होंने कहा कि इस काम में बाहरी निवेशकों से भी करीब इतनी ही राशि उपलब्ध होने का अनुमान है. उन्होंने कहा कि इससे किफायती तथा मध्य आय वर्ग के लिए बनायी जा रही आवासीय परियोजनाओं को पूरा करने में मदद मिलेगी. उन्होंने कहा कि इस कोष का प्रबंधन पेशेवर लोग करेंगे.


    वित्तमंत्री ने कहा कि भवन निर्माण के लिए कर्ज पर ब्याज दर को कम किया जायेगा तथा इन पर ब्याज की दर को 10 साल की सरकारी प्रतिभूतियों के यील्ड (निवेश-प्रतिफल) से जोड़ा जायेगा. उन्होंने कहा कि सरकारी नौकरी वाले लोग आवास की मांग में अहम योगदान देते हैं. इस व्यवस्था के तहत सरकारी नौकरी वाले अधिक लोगों को नया घर खरीदने का प्रोत्साहन मिलेगा. उन्होंने कहा कि डेवलपरों को विदेश से पूंजी जुटाने में मदद करने के लिए विदेश से लिये जाने वाले वाणिज्यिक ऋण से संबंधित गाइडलाइन आसान बनाई जाएगी।

    मुद्रास्फीति नियंत्रित और औद्योगिक उत्पादन में सुधार के स्पष्ट संकेत
    के साथ ही, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शनिवार को कहा कि मुद्रास्फीति नियंत्रण में है और औद्योगिक उत्पादन में सुधार के स्पष्ट संकेत दिख रहे हैं. उन्होंने अर्थव्यवस्था के लिए राहत की तीसरी किस्त की घोषणा करते हुए एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि मुद्रास्फीति चार फीसदी के लक्ष्य से अच्छी-खासी नीचे है. सरकार ने रिजर्व बैंक को खुदरा मुद्रास्फीति चार फीसदी से नीचे रखने का लक्ष्य दिया है. हालांकि खुदरा मुद्रास्फीति अगस्त में कुछ तेज होकर 3.21 फीसदी पर पहुंच गयी, लेकिन यह अब निर्धारित दायरे में है.

    सीतारमण ने कहा कि 2018-19 की चौथी तिमाही में औद्योगिक उत्पादन से संबंधित सारी चिंताओं के बाद भी जुलाई, 2019 तक हमें सुधार के स्पष्ट संकेत दिखाई देते हैं. उन्होंने कहा कि आंशिक ऋण गारंटी योजना समेत गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) में ऋण का प्रवाह सुधारने के कदमों की घोषणा के परिणाम दिखाई देने लगे हैं. उन्होंने कहा कि कई एनबीएफसी को फायदा हुआ है. उन्होंने कहा कि गोवा में जीएसटी परिषद की बैठक से एक दिन पहले वह अर्थव्यवस्था में ऋण प्रवाह की समीक्षा करने के लिए 19 सितंबर को सार्वजनिक बैंकों के प्रमुखों से मुलाकात करेंगी.

    वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने निर्यातकों के लिए ऋण प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के लिए ऋण आवंटन के संशोधित नियमों (पीएसएल) की घोषणा की. इससे निर्यातकों को 36,000 करोड़ रुपये से लेकर 68,000 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त वित्त पोषण मिलेगा. सीतारमण ने कहा कि निर्यातकों को ऋण के लिए पीएसएल नियमों की समीक्षा की जायेगी. दिशानिर्देशों पर भारतीय रिजर्व बैंक के साथ विचार-विमर्श चल रहा है.

    सीतारमण ने यहां संवाददाताओं से कहा, ‘‘इससे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के तहत निर्यात ऋण के लिए 36,000 करोड़ रुपये 68,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त पूंजी उपलब्ध होगी. उन्होंने कहा कि वाणिज्य विभाग के तहत एक अंतर-मंत्रालयी समूह निर्यात क्षेत्र को वित्त पोषण की सक्रिय निगरानी करेगा. इसके अलावा, निर्यात ऋण गारंटी निगम (ईसीजीसी) निर्यात ऋण बीमा योजना का दायरा बढ़ायेगा.

    सीतारमण ने कहा कि इस पहल की सालाना लागत 1,700 करोड़ रुपये आयेगी. साथ ही, यह ब्याज दर समेत निर्यात ऋण की पूरी लागत को विशेषकर लघु एवं मझोले कारोबारों के लिए कम करने में मदद करेगी. उन्होंने यह भी घोषणा की कि मुक्त व्यापार समझौता उपयोग मिशन की भी स्थापना की जायेगी.

    इसका मकसद निर्यातकों को उन देशों से शुल्क छूट दिलाने में मदद करना है, जिनके साथ भारत ने संधि की है. इसके अलावा, देश में चार स्थानों पर हस्तशिल्प, योग, पर्यटन, कपड़ा और चमड़ा क्षेत्रों के लिए वार्षिक शॉपिंग फेस्टिवल आयोजित किये जायेंगे.

  • वाहन कंपनियों की सेल्स एजेंट क्यों बनी कमलनाथ सरकार

    वाहन कंपनियों की सेल्स एजेंट क्यों बनी कमलनाथ सरकार

    मध्यप्रदेश की कमलनाथ कांग्रेस सरकार इन दिनों भारी अंतर्विरोधों से जूझ रही है इसके बावजूद वह अपनी घिसी पिटी शासन शैली से मुक्त होने का प्रयास नहीं कर रही है। इसकी वजह उसके आकाओं की वह रणनीति है जिससे पार्टी को भारी आय होती रही है। पार्टी की आय का ढांचा जिस चुनावी चंदे पर टिका है उसे केन्द्रीय मोटर व्हीकल एक्ट के सुधारों ने तगड़ी चुनौती दी है। इसी कारण से आर्थिक संकटों से घिरी कमलनाथ सरकार प्रदेश की आय बढ़ाने का ये नया अवसर छोड़ रही है। एक्ट पर तत्काल अमल न करने के लिए उसने जनता की असुविधा का हवाला दिया है। हकीकत ये है कि वह अपने नागरिकों को वैकल्पिक सस्ता परिवहन दिलाने के बजाय जीवाश्म ईंधन आधारित मंहगे परिवहन के लिए मजबूर कर रही है।

    नए मोटर व्हीकल एक्ट में तगड़े जुर्माने के प्रावधान को लेकर पूरे देश में बहस चल रही है। कई राज्यों ने तो इसे लागू कर दिया है पर कई राज्य इसके प्रावधानों का विरोध कर रहे हैं। मध्यप्रदेश सरकार के परिवहन मंत्री गोविंद राजपूत ने ये कहकर प्रावधान लागू करने से इंकार कर दिया कि हम इन प्रावधानों का परीक्षण करा रहे हैं। हमारे पास ये अधिकार है कि हम एक्ट के प्रावधानों का परीक्षण करे और उसे स्थानीय जरूरतों के अनुसार लागू करें। हालांकि ऐसा करते हुए सरकार को अपनी आय बढ़ाने का एक बड़ा अवसर छोड़ना पड़ रहा है।

    केद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का कहना है कि देश में वाहन दुर्घटनाएं बढ़ रहीं हैं और प्रतिवर्ष लगभग डेढ़ लाख दुर्घटनाओं में 48000 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ रहा है। अधिकतर दुर्घटानाओं के मामलों में सड़क परिवहन के नियमों का उल्लंघन ही प्रमुख वजह होता है। नियमों के पालन के लिए जो शर्तें रखीं गईं थीं वे इतनी सरल थीं कि लोग आसानी से चालान भरकर निश्चिंत हो जाते थे। अब दंड के प्रावधान इतने कड़े किए गए हैं कि लोग सड़कों पर चलते समय यातायात के नियमों का पालन करने को मजबूर हो जाएंगे। दस्तावेजों के अभाव में घायलों और मृत व्यक्तियों को क्षतिपूर्ति भी नहीं मिल पाती है इसलिए नए मोटर व्हीकल एक्ट के प्रावधान लोगों को सुरक्षा दिलाने में मददगार साबित होंगे।

    इसके विपरीत मध्यप्रदेश राज्य के पुलिस और परिवहन विभाग ने दस्तावेजों के परीक्षण के लिए सिर्फ नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहन चालकों को रोके जाने की व्यवस्था की है। यदि वाहन चालक नियमों का पालन करते हुए यातायात करेंगे तो पुलिस उन्हें नहीं रोकेगी। वाहन चालक नियम तोड़ते हैं तो फिर उनके दस्तावेज भी चेक किए जाएंगे और चालानी कार्रवाई भी की जाएगी। वास्तव में इसकी बड़ी वजह राज्य सरकार के आरटीओ दफ्तरों में फैला भ्रष्टाचार और अव्यवस्था है। वाहन लाईसेंस बनवाने के लिए लोगों को इतने चक्कर काटने होते हैं कि वे बगैर दस्तावेज पूरे करवाए ही वाहन चलाना शुरु कर देते हैं। वाहन चालकों को वाहन का पंजीयन प्रमाणपत्र, और लाईसेंस बनवाने के लिए जो रिश्वत देना पड़ती है वह इसके लिए निर्धारित शुल्क से कई गुना ज्यादा होती है। चक्कर काटने होते हैं सो अलग।

    दरअसल भारत में राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार ने इतनी सारी वाहन कंपनियों को दुपहिया, चारपहिया वाहन बनाने की छूट दे डाली थी कि पूरे देश में सार्वजनिक परिवहन का ढांचा धराशायी हो गया। बड़ी संख्या में चार पहिया वाहन आ जाने से बसों से होने वाला सार्वजनिक परिवहन ढप पड़ गया। मध्यप्रदेश में राज्य सड़क परिवहन निगम जैसे प्रतिष्ठान को बंद करने की एक बड़ी वजह यह भी रही है। सार्वजनिक परिवहन बहुत सस्ता पड़ता है लेकिन इसके बावजूद भारत जैसे गरीब देश में राजीव गांधी की सरकार ने मंहगे वैयक्तिक परिवहन को बढ़ावा दिया। तेल उत्पादक देशों के व्यापारियों ने वाहन निर्माण में रुचि ली और देश में कई वाहन निर्माता कूद पड़े। जिसकी वजह से भारत की सड़कें वाहनों से पट गईं। हालात ये हो गए कि सड़कें चौड़ी करने के लिए, नए राजमार्ग बनाने के लिए देश को कर्ज लेना पड़ा। पिछली भाजपा सरकारों ने सड़क, बिजली और पानी के सुधार के नाम पर इतना कर्ज लिया कि प्रदेश को अपनी आय का बड़ा हिस्सा कर्ज का ब्याज चुकाने पर खर्च करना पड़ रहा है।

    कमलनाथ सरकार के सामने चुनौती है कि वह कैसे उत्पादकता बढ़ाए। उत्पादकता की लागत कैसे घटाए। इसके बावजूद उसकी रुचि जनता को सस्ता सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध कराने में नहीं है। कांग्रेस पार्टी के चुनावी चंदे का बड़ा हिस्सा तेल उत्पादक देशों, वाहन कंपनियों, वाहन कलपुर्जे बनाने वाली कंपनियों से ही आता है। यदि वह केन्द्रीय मोटर व्हीकल एक्ट को सख्ती से लागू करती है तो लोग सार्वजनिक परिवहन के साधनों की मांग करेंगे।वे अपने वाहन खरीदने के बजाए सार्वजनिक बसों में यात्रा करना पसंद करेंगे।इससे वाहन कंपनियों का मुनाफा घटेगा। तेल की खपत घटेगी और तेल कंपनियों को नुक्सान होगा।यही वजह है कि कमलनाथ सरकार मोटर व्हीकल एक्ट के प्रावधानों को सख्ती से लागू नहीं करना चाहती है। बेशक तेल खरीदी के नाम पर प्रदेश और देश की जनता को अपनी आय का बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता है। ये रकम विदेशी तेल कंपनियों तक जाती है। भारत की उत्पादकता की लागत बढ़ती है और मुनाफा तेल कंपनियों को होता है। यही वजह है कि तेल उत्पादक कंपनियां भारत में ऐसी सरकारें चाहती हैं जो परिवहन के नाम पर न तो वाहनों की कटौती करे और न ही सड़कों पर खर्च घटाए। इसके लिए वे राजनीतिक दलों को मोटा चंदा भी देती हैं।

    वैकल्पिक ईंधन के रूप में बिजली आधारित सार्वजनिक परिवहन के साधन आज मौजूद हैं। प्रदेश में बिजली का उत्पादन खपत से ज्यादा हो रहा है। बिजली कंपनियों को अपने अनुबंधों की वजह से बिजली खरीदी किए बगैर भी उसकी कीमत चुकानी पड़ रही है। ऐसे में जरूरत है कि अतिरिक्त बिजली की मदद से सरकार जनता को सस्ता सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध कराए। चुटका परमाणु बिजलीघर चालू होने के बाद देश के बिजली नेटवर्क में ऊर्जा का उत्पादन और भी ज्यादा बढ़ जाएगा। तब बिजली आधारित सार्वजनिक परिवहन सबसे सस्ता विकल्प होगा। कई राज्यों ने भविष्य की इस व्यवस्था को देखते हुए अपने शहरों में बिजली आधारित सार्वजनिक परिवहन शुरु भी कर दिया है। कमलनाथ सरकार के सामने मॉडल मौजूद हैं लेकिन वह पच्चीस साल पुराने अपने चंदा कमाऊ मॉडल पर ही चल रही है। वास्तव में वह तेल उत्पादक कंपनियों के सेल्स एजेंट की तरह काम कर रही है जो प्रदेश के विकास के लिए एक मंहगा सौदा साबित हो रहा है।

  • हीरा निकालने की नीति अलग हो बोले कमलनाथ

    हीरा निकालने की नीति अलग हो बोले कमलनाथ

    भोपाल,5 सितंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। मुख्यमंत्री कमल नाथ ने आज फिर हीरा खदान की नीलामी को लेकर केन्द्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि हीरा खुदाई के लिए अलग नीति बनाई जानी चाहिए। कोयला खुदाई के लिए बनाई गई नीति के आधार पर ही हीरा और मैंगनीज की खुदाई कैसे हो सकती है।

    कमलनाथ का कहना है कि खनिज उत्पादन भविष्य की अर्थ-व्यवस्था का आधार है। मध्यप्रदेश में कीमती खनिजों का भंडार है, जिसका उपयोग राज्य के विकास के लिए जितनी जल्दी करें, उतना जनता के हित में होगा। मुख्यमंत्री ने मंत्रालय में भारत सरकार की मिनी रत्न कंपनी मिनरल एक्सप्लोरेशन कार्पोरेशन लिमिटेड के वरिष्ठ अधिकारियों से चर्चा करते हुए कहा कि वे मध्यप्रदेश को अपनी प्राथमिकता का प्रदेश बनायें। कोयला और चूना पत्थर के अलावा प्रदेश में कई बहुमूल्य खनिज हैं, जो भविष्य की अर्थ-व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। श्री कमल नाथ ने अधिकारियों को निर्देश दिये कि कीमती खनिजों के खनन की समयबद्ध योजना बनायें।

    मुख्यमंत्री कमल नाथ ने कहा कि भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के पास उपलब्ध खनन और भण्डारण की बहुमूल्य जानकारी का उपयोग कर खनन का काम तत्काल शुरू करने की तैयारी करें। एम.ई.सी.एल. के पास इसका उपयोग करने की क्षमता और विशेषज्ञता है। खनिजों के उत्खनन की समय-सीमा निर्धारित कर योजना बनायें। राज्य शासन पूरा सहयोग करेगा। मैगनीज, बाक्साइट, ग्रेफाईट, आयरन ओर एवं रेडियम, वेनेडियम जैसे मूल्यवान खनिजों के खनन पर ध्यान दें, जिनके भण्डारण की जानकारी उपलब्ध है। मुख्यमंत्री ने कहा कि बुंदेलखण्ड, महाकौशल और प्रदेश के पश्चिम भाग में इन खनिजों के कीमती भंडार उपलब्ध हैं। प्रत्येक खनिज की अलग नीति बनाकर काम शुरू किया जायेगा। उन्होंने कहा कि कोयला खनन की नीति डायमंड अथवा मैगनीज पर लागू नहीं हो सकती।

    बैठक में खनिज मंत्री प्रदीप जायसवाल, मुख्य सचिव एस.आर. मोहन्ती, प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री अशोक वर्णवाल, प्रमुख सचिव उद्योग राजेश राजौरा, प्रमुख सचिव खनिज नीरज मंडलोई और एम.ई.सी.एल. के अध्यक्ष तथा मुख्य महाप्रबंधक डा. रंजीत रथ उपस्थित थे।

  • व्यापारियों को ई कामर्स पर आना ही पड़ेगाःकमलनाथ

    व्यापारियों को ई कामर्स पर आना ही पड़ेगाःकमलनाथ

    भोपाल,4 सितंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। कनफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स कैट के पदाधिकारियों ने कैट के राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीण खंडेलवाल जी के नेतृत्व में बल्लभ भवन में माननीय मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ से मुलाकात की।व्यापारियों की समस्याओं के जवाब में उन्हें मुख्यमंत्री ने सुझाया कि यदि व्यापार को सुरक्षित रखना है और बढ़ाना है तो मौजूदा व्यवस्था के साथ साथ कारोबारियों को ई कामर्स का इस्तेमाल भी बढ़ाना होगा। यह प्लेटफार्म व्यापार की चुनौतियों से निपटने में मददगार साबित होगा।


    कैट के प्रवक्ता विवेक साहू ने हुए बताया कि भेंट के दौरान माननीय मुख्यमंत्री ने कहा कि विश्वभर में बढ़ते ऑनलाइन कारोबार को देखते हुए अब यह आवश्यक हो गया है कि आने वाले समय में व्यापारियों को ई-कॉमर्स पर लाना होगा। हम अपने व्यवसाय को ऑफलाइन के साथ-साथ आनॅलाइन पर भी रखे ।
    उन्होंने आगे कहा है कि हम मध्यप्रदेश में इसे अभियान के रूप में चलायेंगे।

    कैट के महामंत्री प्रवीण खंडेलवाल ने मुख्यमंत्री को बताया कि कैट एक पोर्टल तैयार करने जा रहा है जो व्यापारियों को ऑनलाइन व्यापार करने के लिए प्रेरित करेगा जिसमें विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राएं भी इसमें प्रतिभागी रहेंगे।हम उन्हें रोजगार के अवसर प्रदान करेंगे और छोटे कारोबारियों को बिना किसी आर्थिक भार के ई-कॉमर्स का उपयोग सिखाने में भी मददगार साबित होंगे।


    चर्चा में मुख्यमंत्री ने कहा कि मंडियों में किसानों को नगद भुगतान आवश्यक है क्योंकि बैंकों में कैश उपलब्ध ना होने की स्थिति में किसान को परेशानी होती है। अतः इसके लिए हम केन्द्र सरकार से बात करेंगे और व्यापरियों को परेशानी ना हो एवं किसान को भी उसकी फसल का पैसा मिले इसके लिए हम एक योजना बनाकर कार्य करेंगे।


    इस अवसर पर उन्होंने कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के ‘‘बैज‘‘ का लोकार्पण किया। कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के मध्यप्रदेश अध्यक्ष भूपेन्द्र जैन ने मुख्यमंत्री को पहला बैज लगाकर सम्मानित किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश के युवाओं को स्वावलंबी बनाने के लिए महिला उद्यमियों को विकास के लिए हर जिले में मुद्रा लोन शिविर लगाये जायेंगे और विश्वविद्यालय स्तर पर स्टार्टअप समिट होगी।


    मुख्यमंत्री ने कैट के प्रस्ताव को थाना स्तर पर व्यापारिक समितियां बनाने के लिए पुलिस महानिदेशक को आवश्यक दिशा-निर्देश देने का आश्वासन दिया।
    मुख्यमंत्री ने मध्यप्रदेश में व्यापारियों और कारोबारियों को आमंत्रित करते हुए कहा कि जो अधिक से अधिक रोजगार देगा उसके लिए राज्य शासन हरसंभव मदद करेगी। इस अवसर पर कैट के राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीण खंडेलवाल ने कैट, सीएससी, मास्टर कार्ड एवं ग्लोबल लिंकर ई-कॉमर्स बिजनिस की परिकल्पना से मुख्यमंत्री को अवगत कराया। मुख्यमंत्री ने कहा कि जिला स्तर पर कलेक्टर की अध्यक्षता में जो व्यापारिक समितियां बन रही हैं उनमें एवं अन्य जिला स्तरीय कमेटियों में कैट को उचित प्रतिनिधित्व मिलेगा। कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) मध्यप्रदेश राज्य शासन के साथ मिलकर प्रदेश के आर्थिक विकास के लिए कार्य करे।


    राष्ट्रीय वरिष्ठ उपाध्यक्ष कैलाश अग्रवाल, राधेश्याम महेश्वरी, ग्लोबल लिंकर के समीर वकील, कैट के सोशल मीडिया प्रभारी सुमित अग्रवाल, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राधेश्याम माहेश्वरी, सेन्ट्रल जोन कोर्डिनेटर रमेश गुप्ता, प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र जैन, महामंत्री मुकेश अग्रवाल, प्रवक्ता विवेक साहू, संयुक्त सचिव मनोज चौरसिया, अजय चौरिया, अविचल जैन, नरेन्द्र मांडिल आदि उपस्थित थे।


    इससे पूर्व प्रतिनिधिमंडल ने राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सुनील कुमार से भेंट की और व्यापारियों को ई-कॉमर्स में परिवर्तन करने के लिए विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं का सहयोग मांगा। इसे कुलपति ने स्वीकर किया और 9 सितम्बर से उनकी ट्रेनिंग प्रारंभ होगी।


    इसी श्रंखला में आज एमपी नगर स्थित गौरव होटल में विदेशी व्यापारियों के साथ बैठक का आयोजन किया गया ।बैठक के मुख्य अतिथि प्रवीण खंडेलवाल ने व्यापारियों को संबोधित करते हुए कहा कि आज का समय डिजिटल युग का हैं और उसके बिना व्यापार करना नामुमकिन है जो व्यापारी आज के दौर में डिजिटल तकनीक नहीं अपना आएगा वह धीरे-धीरे अपना व्यापार को खोता जाएगा।

  • सिंघार की दहाड़ से आदिवासी खुश,ब्लैकमेलिंग विदा

    सिंघार की दहाड़ से आदिवासी खुश,ब्लैकमेलिंग विदा

    दिग्विजय सिंह को ब्लैकमेलर कहकर वनमंत्री उमंग सिंघार ने जन मन की आवाज का उद्घोष किया है। पार्टी के भीतर कमोबेश हर बड़ा छोटा नेता ये बात जानता है कि दिग्विजय सिंह के समर्थकों का गुट कैसे प्रदेश की सत्ता पर अपना जाल फैला चुका है। तबादले और पोस्टिंग का कारोबार जिस धड़ल्ले से दिग्विजय सिंह के दफ्तर से हुआ उससे वे खुद सत्ता के सबसे ताकतवर खिलाड़ी बन चुके हैं। कांग्रेस की सरकार आने के बाद से दिग्विजय सिंह का दफ्तर सत्ता पर कब्जा जमाने वाले,नेताओं, भ्रष्ट अफसरों और दलालों का अड्डा बना हुआ है। ये सब एक दिन में नहीं हुआ। पिछले तीस सालों से दिग्विजय सिंह की सतत राजनीतिक साधना का नतीजा है। दस साल मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने पूरे प्रदेश के गांव गांव तक अपने समर्थकों की फौज तैयार कर ली थी। ये फौज कांग्रेस के भीतर से ही नहीं बल्कि तमाम विरोधी राजनैतिक दलों के बीच से भी चयनित और गठित की गई थी। लंबे समय से कांग्रेस में राजनीतिक दूकान चला रहे मठाधीशों को तबाह करने के लिए उन्होंने भाजपा के उभरते नेताओं को भी अपना समर्थक बनाया था। उनकी ये रणनीति कारगर रही। कांग्रेस में दिग्गी का एकछत्र शासन चला और सत्ता जाने के बाद भी उनके यही समर्थक उन्हें प्रासंगिक भी बनाए रहे।

    ऊटपटांग बयानों और जनविरोधी फैसलों की आड़ में जब उन्होंने मध्यप्रदेश की सत्ता भाजपा को सौंपी तब वे जानते थे कि कांग्रेस फिलहाल सत्ता में लौटने वाली नहीं है। यही वजह थी कि उन्होंने दस सालों तक कोई चुनाव न लड़ने की घोषणा कर दी।अपने सभी समर्थकों को उन्होंने भाजपा के संगठन महामंत्री कप्तान सिंह सोलंकी से मिलकर भाजपा में भेज दिया। कांग्रेस के पंचायती राज में उनके इन्हीं समर्थकों ने भरपूर लूटपाट मचाई थी। भाजपा में शामिल होकर इन्होंने फिर से सत्ता पर कब्जा जमा लिया। सत्ता के इन दलालों को शुरुआती दौर में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का भरपूर संरक्षण भी मिलता रहा। इसकी एक वजह पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा थे,दूसरी वजह दिग्विजय सिंह की ब्लैकमेलिंग थी। पटवा को ये राजनीतिक विरासत स्वर्गीय अर्जुनसिंह से मिली थी। जब जब शिवराज सिंह चौहान को जानकारी मिली कि दिग्विजय सिंह के समर्थक जनहितकारी योजनाओं का लाभ आम जनता तक नहीं पहुंचने दे रहे हैं तब तब उन्होंने इनके खिलाफ कार्रवाई करने की कोशिश भी की। हर बार सुंदरलाल पटवा आड़े आए और उन्होंने शिवराज को कार्रवाई से रोक दिया। बाद में तो शिवराज सिंह स्वयं मजबूरी में इस लाबी का समर्थन करते नजर आए।

    शिवराज सिंह चौहान ने राजनीतिक हस्तक्षेप से बचने के लिए सत्ता की बागडोर खुर्राट आईएएस अफसरों को थमाई थी। राधेश्याम जुलानिया जैसे तेज तर्रार आला अफसर ने तो पंचायतों को दिए जाने वाला फंड रोक दिया था जिसके खिलाफ पंचायत सचिवों ने कई बार आंदोलन भी किए। ये सभी दिग्विजय सिंह की उसी स्लीपर सेल के सदस्य थे जो पिछले चुनाव में भाजपा का साथ छोड़कर कांग्रेस के साथ वापस जुड़ गए थे। शोभा ओझा आज उमंग सिंघार के घर के सामने पुतला जलाने वाले उन्हीं भाड़े के नेताओं को भाजपा का बता रही है।दिग्विजय सिंह इन्हीं दलालों के माध्यम से सबसे ज्यादा तबादले और पोस्टिंग कराने में सफल हुए हैं। जब तक कमलनाथ सरकार के मंत्री कामकाज समझ पाते तब तक सारा कारोबार दिग्गी समर्थकों ने समेट लिया है। उमंग सिंघार की दहाड़ की एक बड़ी वजह यह भी है।

    विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस को जयस के नेतृत्व में चलने वाले आदिवासी आंदोलन का समर्थन मिला था। जिन आदिवासियों को भाजपा और संघ के तपोनिष्ट कार्यकर्ताओं ने बरसों के जनशिक्षण के बाद कांग्रेस से मुक्त करने में सफलता पाई थी उन्हें जयस ने आदिवासी मुख्यमँत्री की चाहत जगाकर अपने साथ कर लिया। सत्ता में आने के लिए जयस के नेता डॉ.हीरालाल अलावा ने अलग पार्टी बनाकर संघर्ष करने के बजाए खुद कांग्रेस का विधायक बनना पसंद कर लिया। कमलनाथ ने उन्हें सीटों के समझौते पर भी अपनी शर्तों पर सहमत कर लिया था। हीरालाल अलावा के कांग्रेस में शामिल होने से आदिवासियों के बीच थोड़ी नाराजगी भी फैली थी जिसकी वजह से अलावा को स्वयं अपना चुनाव जीतने में खासी मशक्कत करना पड़ी थी।

    आदिवासियों का आंदोलन आज कांग्रेस की सत्ता का साथ पाकर एक बार फिर मजबूती से उभर रहा है। यह बेलगाम भी होता जा रहा है। इस पर लगाम लगाने के लिए कांग्रेस के भीतर से ही किसी आदिवासी नेतृत्व की सख्त जरूरत महसूस की जा रही थी। हीरालाल अलावा भी बार बार अपना वजूद बढ़ाने के लिए सरकार पर दबाव बना रहे थे। वे अभी राजनीति के नए नवेले खिलाड़ी हैं। सरकार के सत्ता में आने के बावजूद वे तबादलों और पोस्टिंग का धंधा समझ पाते इससे पहले सत्ता की मलाई दिग्विजय सिंह समर्थक चाट गए। इससे भाजपा से कांग्रेस में पहुंचे आदिवासी नेता खुद को छला महसूस करने लगे थे। इन सभी के बीच दिग्विजय सिंह की ब्रिगेड खलनायक के रूप में चर्चित रही है। यही वजह है कि आदिवासियों का नेतृत्व पाने के लिए उमंग सिंघार ने दिग्गी पर प्रहार करके आदिवासियों को खुश करने का प्रयास किया है।

    मुख्यमंत्री कमलनाथ भी दिग्गी ब्रिगेड पर लगाम लगाना चाहते थे। इसके बावजूद उनकी ये हैसियत कभी नहीं रही कि वे दिग्विजय से सीधा टकराव ले सकें। दिग्विजय सिंह की ब्लैकमेलिंग की शैली से वे अच्छी तरह वाकिफ हैं। खुद उनके कारोबार की कई कच्ची कड़ियां दिग्विजय सिंह जानते हैं। बताते हैं कि लोकसभा चुनाव के दौरान जिस हवाला गिरोह पर छापा पड़ा था उसकी गतिविधियों की सूचना दिग्विजय सिंह खेमे से ही लीक की गई थी। कमलनाथ के ओएसडी प्रवीण कक्कड और आरके मिगलानी तक तो जांच टीम पहुंची लेकिन कमलनाथ ने खुद को ज्यादातर आरोपों से बचा लिया। अब जिस तरह से उमंग सिंघार ने खुले आरोप लगाए तब राजनीतिक हलकों में यही माना जा रहा है कि उन्हें इसकी शह कमलनाथ खेमे से ही मिली थी।

    उमंग सिंघार ने तो दिग्गी को नंबर एक का ब्लैकमेलर कहने के साथ साथ उन्हें शराब तस्करी और रेत व खनिजों की तस्करी को संरक्षण देने के आरोप भी लगाए हैं। दरअसल आरोपों की फेरहिस्त तो और भी लंबी है जिन्हें वे सार्वजनिक तौर पर बोलने से बचते रहे हैं। दिग्विजय सिंह से उमंग सिंघार की अदावट वैसे तो काफी पुरानी है। उनकी बुआ स्वर्गीय जमुनादेवी तो कई बार दिग्विजय सिंह के विरुद्ध मोर्चा खोलती रहीं हैं। तब दिग्विजय सिंह सरकार के कार्यकाल में उमंग सिंघार के खिलाफ कई आरोप लगाए गए थे। इस बार सत्ता में आने के साथ उमंग सिंघार ने पुरानी अदावट का सूद समेत बदला ले डाला है।

    उमंग सिंघार की इस ललकार को ज्योतिरादित्य सिंधिया का भी समर्थन मिला है। उन्होंने यह कहकर सिंघार का बचाव ही किया कि मामला अब मुख्यमंत्री जी के पास है इसलिए विवाद की कोई वजह नहीं बची है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने प्रदेश अध्यक्ष पद पर चल रहे विवाद को शांत करने के लिए फिलहाल कमलनाथ को ही जवाबदारी संभालने को कहा है।दिग्विजय सिंह इस मुद्दे पर खामोश हैं और उन्होंने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया है कि खुद कमलनाथ इस विषय को देख रहे हैं। कमलनाथ से मुलाकात के बाद उमंग सिंघार ने भी चुप्पी साध ली है। उन्होंने कहा है कि वे अपनी बात कह चुके अब पार्टी हाईकमान ही आगे की कार्रवाई करेगी।फौरी तौर पर तो यह मामला शांत होता नजर आ रहा है लेकिन दिग्विजय सिंह समर्थक आगे भी खामोश रहेंगे यह नहीं कहा जा सकता। पहली बार राजनीति के अखाड़े में किसी योद्धा ने दिग्विजय सिंह को सीधी चुनौती दी है,जिस पर अभी कई नए दांवपेंच जरूर खेले जाएंगे।

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  • दादा दरबार आश्रम में स्थानधारियों की भागीदारी बोले महंत डॉ.रविप्रकाश दादा भाई

    दादा दरबार आश्रम में स्थानधारियों की भागीदारी बोले महंत डॉ.रविप्रकाश दादा भाई

    दादा भाई डॉ.रवि प्रकाश ने मुख्यमंत्री कमलनाथ के प्रयासों पर प्रसन्नता जताई

    भोपाल 2 सितंबर। दादा दरबार की भक्ति परंपरा को देश विदेश में स्थापित करने वाले साधकों और स्थानधारी संतों के नाम पर भोपाल के आश्रम परिसर में कक्ष आरक्षित किए जाएंगे।इन कक्षों के माध्यम से धूनी वाले दादाजी के शिष्यों का जुड़ाव पूरे मध्यप्रदेश से हो सकेगा। इन संतों के संपर्क में रहने वाले शिष्यों के लिए भी आश्रम परिसर में कक्ष उपलब्ध रहेंगे। सतत धर्म चर्चा के लिए प्रवचनों का मंच भी उपलब्ध रहेगा। परिसर में अखंड ज्योति के साथ निरंतर चलने वाले यज्ञों में शामिल होने वाले साधकों और आगंतुकों के लिए परिसर की भोजनशाला साल भर चलेगी।अभी यहां प्रत्येक अमावस्या और पूर्णिमा को भंडारा होता है।

    महंत एवं संचालक डॉ.रविप्रकाश(दादाभाई) ने बताया कि श्री दादाजी धूनीवाले दरबार के समकालीन शिष्य संत के नाम से स्थापित ये कक्ष जरूरत पड़ने पर आरक्षित कराए जा सकेंगे। देश विदेश के कई स्थानों पर पिछले तीस पैंतीस सालों से धोनी माई और दादाजी की सेवा पूजा अर्चना के साथ कल्याणकारी कार्य भी संचालित किए जा रहे हैं। कई स्थानों पर तो ऐसे साधक इस भक्ति परंपरा की ध्वजा संभाले हुए हैं जिनका प्रचार भी नहीं हो पाया है। अघन त्रयोदशी दादा जी की पुण्यतिथि तक इन स्थानों को विधिवत तरीके से जोड़ लिया जाएगा। इसी के आधार पर दादाजी संप्रदाय के संत निवास की स्थापना की जाएगी। वर्तमान में दादाजी धूनीवाले दरबार श्यामला हिल्स भोपाल में जिन जिन स्थानों के स्थान धारियों के लिए नाम प्रस्तावित हैं उनमें दादाजी दरबार साईं खेड़ा खंडवा, इंदौर, छीपानेर,आवली घाट,सौंसर, पांडुर्ना,नागपुर जबलपुर, हंडिया,पुणे, मंडला, स्वामी चंद्रशेखर आनंद मुंबई एवं दादा नित्यानंद दमोह है ।

    माननीय मुख्यमंत्री कमलनाथ जी से प्रयासों का अभिनंदन

    गत 26 वर्षों से दादा जी के परम भक्तों एवं शिष्य के बीच में भावना के मंदिर की स्थापना के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ जी की ओर से जो प्रयास किया जा रहा है उस प्रयास का दादा जी भक्त शिष्य मंडल भोपाल स्वागत करता है। हम उनके इस प्रयास के प्रति उनका आभार व्यक्त करते हैं। मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ जी से हमारी ये अपेक्षा है कि भारत भवन भोपाल एवं दादाजी धूनीवाला दरबार श्यामला हिल्स भोपाल के मध्य जो समझौता हुआ था उस पर अमल किया जाए। सरकार की ओर से इस कार्य का आश्वासन पिछले चालीस सालों से लंबित है। इस समझौते में दादा धूनीवाले दरबार की भूमि के मुआवजे के संबंध में विधानसभा में तत्कालीन आवास एवं पर्यावरण मंत्री विष्णु राजोरिया ने विधायक कंकर मुंजारे के प्रश्न के जवाब में बारह आवास गृह, धर्मशाला, संस्कृत पाठशाला, पार्किंग, और कैंटीन बनाने का आश्वासन दिया था। इसकी भूमि व्यवस्था का भी पालन अब राज्य सरकार की ओर से किए जाने के संकेत मिलने लगे हैं।

    दादा जी भक्त मंडल भोपाल के शिष्यों की ओर से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री माननीय कमलनाथ जी से अपेक्षा है कि दादाजी के स्थान पंचम धाम खंडवा में भी स्थान धारी शिष्यों के पहुंचने पर ट्रस्ट की ओर से आश्रम की गरिमा के अनुसार निवास आरक्षित हो। इससे हम शिष्यों का भक्तिभाव अपने गुरुदेव के प्रति निरंतर सहज रहेगा। जिस प्रकार दादाजी धूनीवाले दरबार श्यामला हिल्स भोपाल के साधक संत गुरुदेव दादा भाई आश्रम में प्रदेश देश विदेश के समस्त स्थानधारियों के लिए कक्ष उनके नाम से बनाकर उन स्तानधारियों के लिए स्थान आरक्षित कर रहे हैं. ऐसा ही यदि खंडवा पंचम धाम में किया जाता है तो शिष्य परिवार का गौरव पूरे देश में बढ़ेगा ।

    आज की पत्रकार वार्ता में श्री दादाजी परहित सेवा संस्थान के पदाधिकारी भी उपस्थित रहे। संस्थान की ओर से पूरी दुनिया में फैले शिष्यों से लगातार संपर्क रखने के लिए आधुनिक तकनीकी साधनों का प्रयोग भी किया जा रहा है।

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  • निर्दोष व्यापारियों पर रासुका लगाए जाने से नाराजगी

    निर्दोष व्यापारियों पर रासुका लगाए जाने से नाराजगी

    भोपाल,1सितंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। क्वालिटी के मापदंडों को लेकर रासुका लगाए जाने ले नाराज व्यापारियों ने लामबंद होकर सरकार के निर्णय का विरोध शुरु कर दिया है। स्वास्थ्य मंत्री तुलसी सिलावट से चर्चा के बाद व्यापारियों ने सरकार की ओर से चलाए जा रहे शुद्ध के लिए युद्ध अभियान को अव्यावहारिक बताया है। व्यापारियों का कहना है कि सरकार यदि अपने अभियान को तर्कसंगत नहीं बनाएगी तो व्यापारियों की ये नाराजगी गंभीर रूप ले लेगी।

    कनफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट), खाद्य पेय एवं मिष्ठान विक्रेता संघ,नमकीन व्यापारी संघ,मावा व्यापारी संघ दूध डेरी प्रोडक्ट एसोसिएशन ने एकजुट होकर शनिवार को होटल पलाश मे पत्रकारवार्ता आयोजित रखी और अभियान की आड़ में व्यापारियों से की जा रही ज्यादतियों का विरोध किया।
    कैट के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कैलाश अग्रवाल ने बताया कि शासन एवं प्रशासन की ओर से व्यापारियों पर दर्ज किए जा रहे आपराधिक प्रकरणों और रासुका की कार्रवाई को लेकर संगठन ने मध्यप्रदेश शासन के मंत्री आरिफ अकील और तुलसी सिलावट जी से मुलाकात की थी। उन्होंने हमें आश्वासन दिया है कि अब व्यापारियों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज नहीं किए जाएंगे और रासुका की कार्रवाई नहीं होगी। व्यापारियों ने भी अपनी ओर से आश्वासन दिया कि वे मिलावट को जड़ से मिटाने में सरकार का पूरा सहयोग करेंगे।


    कैट के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राधेश्याम माहेश्वरी कहा कि हम भी चाहते हैं कि मिलावट पूरी तरह से खत्म हो। साथ ही हम भी मिलावट खोरों के विरुद्ध चलाई जा रही मुहिम में सहयोग करेंगे। मिलावटियों की वजह से बाजार में कीमतों का निर्धारण नहीं हो पाता है जिससे उपभोक्ताओं को अच्छी गुणवत्ता का माल नहीं मिलता है।


    कैट के प्रवक्ता विवेक साहू ने कहा की हम शासन एवं प्रशासन को यह भी कहना चाहते हैं कि आज यह बात समझने की जरूरत है कि हर व्यापारी मिलावट नहीं करता है। 100 में सिर्फ 5 फीसदी लोग ही ऐसे होंगे जो ये ग़लत काम करते है लेकिन ऐसे लोगो के कारण आज पूरा व्यापारी वर्ग जो 50-60सालो से ईमानदारी से काम करता आ रहा है एवं जिनकी तीन तीन पीढ़ियां अपने इस पेशे को बचाए रखने के लिए कार्य कर रही है वो सरकार के निशाने पर आ गए है और उसे भी जांच के नाम पर परेशान किया जा रहा है।उन्होंने कहा कि खाद्य सामग्री के नाम पर जो अपराधी तत्व नकली माल सप्लाई कर रहे हैं उन पर कार्रवाई से किसी को आपत्ति नहीं है लेकिन गुणवत्ता को आधार बनाकर व्यापारियों पर जो रासुका लगाई जा रही है वह अत्याचार है।मानवीय संवेदनाओं की हत्या है। यदि सरकार चाहे तो वह स्वयं दूध, मावा, मिठाई बनवाए और जनता को उपलब्ध कराए।


    खाद्य पेय एवं मिष्ठान विक्रेता संघ के मुरली हरवानी ने कहा की हमारे व्यापारियों को भय के माहौल में कार्य करना पड़ रहा है। शासन को चाहिए कि वह हमें भयमुक्त वातावरण प्रदान करें और हम भी अपनी ओर से प्रयास करेंगे कि हम मिलावट अभियान में शासन का सहयोग करें।


    पत्रकार वार्ता में कैट के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कैलाश अग्रवाल, राधेश्याम महेश्वरी, प्रवक्ता विवेक साहू मुरली हरवानी, मोहन शर्मा, संजीव अग्रवाल, राकेश जैन, संजय अग्रवाल, विजय नेमा, रमेश चंचल, पंकज टंग, कुबेर सिंह, रितेश विजयवर्गीय, शरद अग्रवाल, प्रमोद कुमार गुप्ता, मोहित सचदेव, प्रकाश राठौर, रमेश बनियानी, प्रदीप सोनी, प्रियंका अजमेरा, अजीत कुमार जैन, मुकेश साहू, दर्पण कुमार जैन, प्रेम यादव समेत कई अन्य व्यापारी भी उपस्थित थे।

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