Month: February 2019

  • अपने ही चक्रव्यूह में उलझते कमलनाथ

    अपने ही चक्रव्यूह में उलझते कमलनाथ

    मुख्यमंत्री कमलनाथ की अब तक की राजनीति को चाहने वालों की लंबी जमात है। उनकी कार्यशैली के दीवाने नेता भी हैं और आम जनता भी। छिंदवाड़ा के लोग बरसों से उनकी सुलझी राजनीति के कायल रहे हैं। एक बार जब जनता ने उन्हें पराजय से दंडित किया तब भी उनके प्रति दीवानगी और सम्मान कम नहीं हुआ। लोगों को अपनी गलती का अहसास हुआ और बाद में उन्होंने अपनी गलती सुधारी भी। कमलनाथ के चाहने वालों को अब भी भरोसा है कि वे कथित छिंदवाड़ा माडल की तर्ज पर मध्यप्रदेश की कायापलट देंगे। सत्ता संभालने के लगभग छियासठ दिन बीतने के बाद लोगों की ये सोच संशय से घिरती नजर आ रही है। कांग्रेस की कमलनाथ सरकार ने जो फैसले लिए हैं, जो मंशाएं जाहिर की हैं और जमीन पर उसकी जो कार्यशैली नजर आ रही है उसे देखकर कहा जा सकता है कि कमलनाथ अपने ही चक्रव्यूह में उलझते जा रहे हैं।

    कमलनाथ की अब तक की राजनीति कभी सत्ता का केन्द्र नहीं रही है। वे या तो गांधी परिवार की नीतियों के पैरवीकोर रहे हैं या फिर अपनी राज्य सरकारों के सलाहकार की भूमिका में रहे हैं। उनके हाथों में केन्द्र सरकारों का बजट रहा जिससे उन्होंने राज्यों और जनता को उपकृत करने की भूमिका भी निभाई। पहली बार उन्हें सीमित बजट से राजनीतिक महल खड़ा करने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। उनके करिश्मे का जैसा प्रचार चुनाव के दौरान किया गया था उससे लोगों की अपेक्षाएं बढ़ती जा रही हैं। लोगों में बैचेनियां बढ़ रहीं हैं उन्हें अब भी लग रहा है कि आज नहीं तो कल कमलनाथ जी अपने पिटारे में छिपी धन की थैली निकालेंगे और मध्यप्रदेश की तस्वीर पलटकर रख देंगे।

    दो महीनों के शासनकाल की गतिविधियों को देखने के बाद ये कहा जा सकता है कि ऐसा कुछ होने नहीं जा रहा है। कांग्रेस सरकार की दो महीनों की रिकार्डशीट बेहद धुंधली है।वे न तो कोई बड़ा निवेश लाने में सफल हुए हैं और न ही पूंजी उत्पादन की कोई इबारत लिख पाए हैं। हां पिछली सरकार की योजनाओं की कतरब्यौंत करने का असफल प्रयास करते जरूर नजर आ रहे हैं।जिन योजनाओं पर उन्होंने कैंची चलाई उन्हें दुबारा जारी करके उन्होंने अपनी राजनीतिक अपरिपक्वता का भी उदाहरण पेश किया है। उनकी राजनीति सरकार के बजट को खर्च करने के इर्दगिर्द ही घूमती रही है। पहली बार उन्हें एक साथ कई आयामों के लिए पूंजी उत्पादन की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है जिसमें वे असफल साबित हो रहे हैं।

    इसकी एक बड़ी वजह आगामी लोकसभा चुनाव भी हैं।उन पर लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की सीटें बढ़ाने का जबर्दस्त दबाव है। इसके लिए वे लगातार लोकप्रियतावादी योजनाओं की घोषणाओं का जादू फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। बहुचर्चित किसान कर्जमाफी योजना से वे किसानों को बैंकों से नो ड्यूज दिलाने जा रहे हैं।किसानों का कर्ज चुकाने के लिए सरकार के पास कोई जमाराशि नहीं है। इसके लिए वे बैंकों की साख का सहारा ले रहे हैं। निश्चित तौर पर इसी महीने से वे किसानों को ये प्रमाण पत्र दिलवाना शुरु कर देंगे। वचनपत्र का ये वायदा पूरा होने से किसान प्रसन्न भी होंगे,लेकिन नया गल्ला सरकार नहीं खरीद रही है इससे किसान परेशान हैं।

    कमलनाथ की सरकार को किसानों की जिस फौज का सामना करना पड़ रहा है उससे वे खासे तनाव में भी हैं। पूर्व मंत्री डॉ.नरोत्तम मिश्र ने विधानसभा को बताया कि कार्यमंत्रणा समिति की बैठक के बाद अनौपचारिक चर्चा में मुख्यमंत्री कमलनाथ जी ने पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह से कहा कि आपने कृषि का उत्पादन इतना अधिक बढ़ा दिया कि अधिक उत्पादन ही समस्या बन गई है। दरअसल में कांग्रेस जिस रोजगार बढ़ाने की बातें सोच रही है या कर रही है उसे भाजपा की सरकार पहले ही कृषि क्षेत्र में बढ़ा चुकी है। कमलनाथ जी की सोच अभी भी उद्योगों के विस्तार से आगे नहीं निकल पा रही है,जबकि इसके लिए न तो सरकार के पास धन है और न ही निवेशक।उन्होंने दुनिया घूमी है,वे विकसित देशों की चकाचौंध से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं जबकि प्रदेश की हकीकत इसके विपरीत है।

    कांग्रेस सरकार के नेतागण जमीनी हकीकत समझने तैयार नहीं हैं। हवा हवाई बातें उनकी कार्यशैली का आधार हैं। सदन में कांग्रेस विधायक लक्ष्मण सिंह कह रहे थे कि पिछली सरकार अरबों रुपया विज्ञापन में बांट गई है इसलिए प्रदेश पर एक लाख अस्सी हजार करोड़ का कर्ज हो गया है। जबकि जमीनी हकीकत ये है कि मध्यप्रदेश का कर्ज आज भी तयशुदा सीमा से अधिक नहीं है।

    कमलनाथ ने सार्वजनिक कार्यक्रम में ये कहकर सनसनी फैला दी थी कि मैं अखबारों में अपनी फोटो नहीं छपवाना चाहता। आपको जो छापना हो छापें। हमारी सरकार विज्ञापन की सरकार नहीं है। बेहतर होगा कि आप लोग कोई दूसरा कारोबार कर लें। जबकि अपनी ही कही गई बातों के विपरीत कमलनाथ की सरकार अपने साठ दिनों में प्रचार के नाम पर 35 करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है। शिवराज सरकार ने मध्यप्रदेश की अर्थव्यवस्था को दो लाख दस हजार करोड़ रुपए के आंकड़े तक पहुंचाया था।इसमें से प्रचार पर खर्च साढ़े तीन सौ करोड़ रखा जाता था।इसकी अस्सी फीसदी राशि तो सरकारी प्रचार तंत्र की स्थापना, सत्कार और वाहनों पर ही खर्च हो जाती थी। मीडिया इंडस्ट्री आज बड़ा रूप ले चुकी है और वो इस बजट पर टिकी हुई नहीं है। तभी तो एक बड़े मीडिया संस्थान को कांग्रेस के कथित प्रयासों से तीन हजार करोड़ की आय कराई गई है। आज भी तमाम बड़े मीडिया संस्थानों की आय का महज तीस फीसदी धन सरकारी सेक्टर से आता है। जिसमें मध्यप्रदेश सरकार का हिस्सा तो और भी कम है। इसके बावजूद कमलनाथ सरकार और उसके मंत्री अपनी असफलताओं को छुपाने के लिए मीडिया को आधारहीन आरोपों से बदनाम कर रहे हैं।इसकी वजह स्वयं मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनके अनुभवहीन सलाहकारों की जमात है।

    कमलनाथ के करीबी और वित्तमंत्री तरुण भनोट अपनी सरकार पर दलाली के आरोपों से खफा हैं। उन्होंने सदन में कहा कि यदि सरकार जनहित के काम कर रही है तो क्या हम लोग दलाली खा रहे हैं।उन्हें सार्वजनिक तौर पर बताना होगा कि वे कौन से जनहित के कार्य हैं जिनके लिए दलालों की फौज वल्लभ भवन और विधानसभा में टूटी पड़ रही है। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों के थोपे गए सरकारी तंत्र को पालने के लिए राज्य को हर महीने तीन हजार दो सौ करोड़ रुपए स्थापना व्यय करना पड़ता है। इस व्यय का अधिकांश हिस्सा अनुत्पादक है। राज्य की आय तो सरकारी तंत्र को पालने और कर्ज का ब्याज चुकाने में ही खर्च हो जाती है। इसके बावजूद तबादलों के धंधे में लिप्त कमलनाथ सरकार प्रदेश की तस्वीर बदलने की डींगें हांक रही है।निश्चित तौर पर आने वाले समय में ये असंतोष की बड़ी वजह बनेगी। जिसका खमियाजा कांग्रेस को लोकसभा चुनावों में तो उठाना ही पड़ेगा साथ में पहली बार मध्यप्रदेश अपराध और अराजकता के दलदल में फंसने जा रहा है जिसके लिए आम जनता को अभी से तैयार रहना होगा।

    (लेखक जन न्याय दल के प्रदेश प्रवक्ता भी हैं। यह आलेख मीडिया पर लगाए जा रहे अनर्गल आरोपों के जवाब में लिखा गया है।)

  • कारोबारी लुटेंगे तो कौन करेगा निवेश

    कारोबारी लुटेंगे तो कौन करेगा निवेश

    जबरिया घर में घुसकर कब्जा जमाने वाले इन लोगों पर कार्रवाई करने से पुलिस भी घबरा रही है,जाहिर है ये भविष्य में बड़े आपराधिक टकराव की वजह भी बन सकती है।

    भोपाल,17 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। कांग्रेस के सत्ता में आते ही कई अपराधियों ने अपना पुराना कारोबार शुरु कर दिया है। वे सामाजिक न्याय के नाम पर ऐसी वारदातों को अंजाम दे रहे हैं जिनसे मध्यप्रदेश में कारोबार करना भरोसेमंद नहीं रहा है। कमलनाथ सरकार की पुलिस भी असमंजस में है और वो ऐसे मामलों में हाथ नहीं डाल रही है। जो कारोबारी सौदे, विवादों की वजह से अदालतों में हैं उनमें भी अपराधी तत्वों ने लूटमार शुरु कर दी है।

    भोपाल के शाहपुरा थाना क्षेत्र स्थित बावड़िया कला के लक्ष्मी परिसर में भवन क्रमांक 14 पर राहुल रघुवंशी के नेतृत्व में 40-50 लोगों की भीड़ ने जबरिया कब्जा कर लिया। इस परिसर का निर्माण गौरा कंस्ट्रक्शन ने किया है। प्रोप्राईटर विश्वजीत दुबे ने इस संबंध में घटना की दिनांक 4 फरवरी 2019 को शाहपुरा पुलिस थाने को सूचित किया और सुरक्षा की मांग भी की। पुलिस ने हस्तक्षेप से इंकार कर दिया, कहा कि मामला अदालत में है इसलिए आप वही अपनी बात रखें।

    पुलिस की बात आधी सही है मकान का दीवानी मामला अदालत में लंबित है, जबकि जबरिया हमला करके कब्जा कर लेने का मामला फौजदारी है। इसके बावजूद पुलिस ने फरियादी को चलता कर दिया। बाद में पुलिस से जुड़े कुछ लोगों ने बताया कि सुरेन्द्र और राहुल रघुवंशी पूर्व मंत्री हजारीलाल रघुवंशी के परिवार से जुड़े हैं, और सरकार के प्रभावी लोगों ने कहा है कि पुलिस इसमें हस्तक्षेप न करे।

    इस मकान के लिए श्रीमती उर्मिला रघुवंशी की ओर से लक्ष्मी प्रापर्टीज से मार्च 2007 में निर्माण अनुबंध किया गया था। तब इस मकान की कीमत 34 लाख थी। इसकी खरीद के लिए उर्मिला रघुवंशी ने 21 लाख रुपए बिड़ला होम फायनेंस से लोन लेकर चुका दिए। बाद में एक लाख रुपए नकद भी दिए। शेष 12 लाख रुपए का भुगतान शेष था जिसका चैक देकर उन्होंने बिल्डर से रजिस्ट्री भी करवा ली। बाद में चैक बाऊंस हो गया। जब शेष भुगतान नहीं मिला तो विक्रेता ने अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन होने पर भवन का आधिपत्य खरीददार को हस्तांतरित नहीं किया। भवन का आधिपत्य समय सीमा में हस्तांतरित हो सकता था लेकिन उर्मिला रघुवंशी की ओर से एक प्रकरण क्रमांक 406 ए 2014 श्रीमान षष्ठम व्यवहार न्यायाधीश वर्ग 2 भोपाल के सामने प्रस्तुत किया गया जिसमें स्थायी निषेधाज्ञा चाही गई थी। अदालत ने उर्मिला रघुवंशी का प्रकरण खारिज कर दिया क्योंकि वे अपना आधिपत्य साबित नहीं कर पाईं। अदालत ने पाया कि चैक बाऊंस करवाकर भवन का पूरा भुगतान नहीं किया गया है।इसलिए न्यायालय ने फैसला दिया कि संपत्ति पर गौरा कंस्ट्रक्शन का ही आधिपत्य है।

    चैक बाऊंस के मामले में भी अदालत ने उर्मिला रघुवंशी, पत्नी सुरेन्द्र सिंह रघुवंशी को दोषी पाया।अदालत के इस फैसले के खिलाफ उर्मिला रघुवंशी ने दूसरी अदालत में ये कहते हुए अपील की कि बिल्डर ने चैक बाऊंस होने की सूचना उन्हें समय अवधि में नहीं दी थी,इसलिए अब वे भुगतान देने के लिए उत्तरदायी नहीं हैं।गौरा कंस्ट्रक्शन ने आधिपत्य अपने पास ही रखा और इस धोखाधड़ी को हाईकोर्ट में चुनौती दी। तबसे ये प्रकरण विचाराधीन है।

    भाजपा की सरकार रहते समय तो राहुल रघुवंशी और उसके परिजनों ने अदालत के प्रकरण पर चुप्पी साधे रखी पर कांग्रेस की सरकार आने के बाद घेराबंदी करके 4 फरवरी को मकान पर कब्जा कर लिया। इस मकान में गौरा कंस्ट्रक्शन के 15 लाख रुपए के टाईल्स रखे थे। सामान लेने पहुंचे विश्वजीत दुबे को उर्मिला और राहुल रघुवंशी ने धमकाया कि मकान पर हमारा कब्जा है और आपसे जो बन सके कर लो। अब हमारी सरकार है। हम शेष रुपए भी नहीं देंगे और इतने लंबे अंतराल के कारण जो कीमत बढ़ चुकी है वो भी नहीं देंगे।

    सरेआम संपत्ति की इस लूट की शिकायत पर जब पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की तो फरियादी विश्वजीत दुबे ने आईजी इरशाद वली और एसएसपी संजय साहू के सामने भी इस आपराधिक मामले में हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई। इसके बावजूद पुलिस ने पूरे मामले में चुप्पी साध रखी है।

    सवाल ये है कि जब किसी खरीददार ने संपत्ति की कीमत ही नहीं चुकाई तो वो उस पर अपना कब्जा कैसे जता सकता है। अनुबंध की शर्तें तो तभी पूरी होती जब रजिस्ट्री के वक्त दिये गए चैक का भुगतान हो जाता। उर्मिला रघुवंशी, सुरेन्द्र रघुवंशी और राहुल रघुवंशी की ओर से जानबूझकर ये धोखाघड़ी की गई है इसके बावजूद पुलिस उनके कब्जे को लूट का आपराधिक कृत्य मानने तैयार नहीं है। सुरेन्द्र रघुवंशी पर कई अन्य आपराधिक मामले भी दर्ज हैं। इसके बावजूद पुलिस की चुप्पी बता रही है कि कांग्रेस की कमलनाथ सरकार कारोबारियों को लूटने से बचाने में रुचि नहीं दिखा रही है। जब कारोबारियों पर अपराधी इस तरह हावी होंगे तो ईज आफ डूइंग के लिए साख बना चुके मध्यप्रदेश में जो असुरक्षा का माहौल बनन लगा है उसमें निवेशकों को उनकी सुरक्षा का भरोसा कैसे दिलाया जा सकता है। शांति का टापू कहा जाने वाला मध्यप्रदेश यदि अब लुटेरों का स्वर्ग बन जाएगा तो इसका खमियाजा आम जनता को भुगतना पड़ेगा क्योंकि असुरक्षा के इस माहौल में कोई भी निवेशक यहां आने की हिम्मत नहीं करेगा।

  • राहुल ब्रिगेड ने छीनी भोपाल की शान

    राहुल ब्रिगेड ने छीनी भोपाल की शान

    लोकनिर्माण विभाग में कमाऊ परियोजनाओं पर वर्चस्व जमाने की मुहिम

    वक्त है बदलाव का नारा देकर कांग्रेस ने प्रदेश की सत्ता की चाभी मांगी थी। जनता ने इस वादे पर गौर किया कांग्रेस की झोली में चार फीसदी वोट अधिक डाल दिए। समीकरण कुछ ऐसे बने कि सत्तर हजार वोट कम पाकर भी कांग्रेस कुर्सी पर काबिज हो गई। जनता को अपेक्षा है कि कमलनाथ कांग्रेस जनहित में कुछ बदलाव करेगी। सरकार ने कुछ बड़े कदम उठाए भी हैं लेकिन सत्ता की आड़ में कई ठग भी सत्तासीन हो चले हैं। लोक निर्माण विभाग में बड़े बजट वाले प्रोजेक्ट हड़पने की मुहिम शुरु हो गई है। कई प्रोजेक्ट तो सजायाफ्ता अफसरों के हवाले कर दिए गए हैं। ठेठ राजधानी में सड़क निर्माण की एक परियोजना ऐसे अफसर के हवाले कर दी गई है जिसे भ्रष्टाचार में दोषी पाकर दंडित किया जा चुका है। एक अन्य प्रकरण में सजा मंजूर हो चुकी है। जबकि एक अन्य प्रकरण पर लोकायुक्त की जांच लंबित है और जल्दी ही एफआईआर दर्ज होने वाली है।

    राजधानी का विकास मंडीदीप से बैरागढ़ होते हुए सीहोर तक लंबी लंबी सड़कों के बीच हुआ है। पहली बार एक ऐसी सड़क बनाई जा रही है जो सीहोर से मंडीदीप को जोड़ने वाली होगी। भोपाल को काटने वाली ये पहली सड़क है। कलियासोत डैम से बर्रई के बीच बनने वाली इस 12 किलोमीटर सड़क की लागत 45 करोड़ रुपए अनुमानित की गई है। इस सड़क का सुझाव पूर्व मुख्य सचिव आर परशुराम ने दिया था। उनका कहना था कि मंडीदीप औद्योगिक क्षेत्र को इंदौर मार्ग से जोड़ने का प्रयास कुछ इस तरह किया जाए ताकि भोपाल से गुजरने वाले ट्रेफिक को वक्त भी कम लगे और यातायात की बाधाएं भी न आएं। लोक निर्माण विभाग के पूर्व ईएनसी अखिलेश अग्रवाल ने इसके लिए बाकायदा विभागीय अफसरों से सैटेलाईट सर्वे करवाया और तब ऐसा मार्ग खोजा गया जिसकी लागत बहुत कम हो। कलियासोत नहर के दायीं ओर बनने वाली इस सड़क की लागत इसलिए कम आ रही है क्योंकि इसमें मुआवजे की राशि का भुगतान अधिक नहीं किया जाना है। अतिक्रमण हटाने के प्रकरण भी कम हैं। इसके साथ साथ जिन तेरह चौराहों से होकर ये सड़क गुजरनी है उनसे शहर के बड़े हिस्से को सीधी कनेक्टिविटी मिलना संभव है। चूनाभट्टी से बनने वाला ये एक्सप्रेस हाईवे बहुत कम वक्त में सीधा बाईपास से जोड़ देगा। यही नहीं मंडीदीप से सीहोर जाने के मौजूदा मार्ग की तुलना में इस सड़क से लगभग बारह किलोमीटर की कमी भी आएगी।

    लोक निर्माण विभाग ने चार वर्षों के लंबे अध्ययन और नक्शे आदि बनाने के बाद अक्टूबर 2018 में ये प्रोजेक्ट शुरु किया है। इस प्रोजेक्ट को साकार करने वाले जेल 2 सबडिवीजन के अनुविभागीय अधिकारी अमलराज जैन को ये जवाबदारी दी गई थी। इंजीनियरों के भी इंजीनियर कहे जाने वाले मुख्य अभियंता अखिलेश अग्रवाल इस परियोजना पर अपनी पैनी नजर रखे हुए थे। इसलिए परियोजना का काम तेजी से पूरा किया जा रहा था। कमलनाथ सरकार के आते ही कई लोग ईएनसी पर कमाऊ प्रोजेक्ट देने का दबाव बनाने लगे। राहुल ब्रिगेड के प्रभारी रहे युवा केबिनेट मंत्री ने चूनाभट्टी से बर्रई के बीच बनने वाले एक्सप्रेस हाईवे का काम अपने रिश्तेदार विजय सिंह पटेल को देने का दबाव बनाया। अखिलेश अग्रवाल ने साफ इंकार कर दिया। नतीजन अगले दिन विभागीय मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने मामले में हस्तक्षेप किया और विभागाध्यक्ष से राहुल ब्रिगेड के संबंधित मंत्री का निर्देश मानने को कह दिया। आनन फानन में आदेश निकाला गया और विजय सिंह पटेल को ये परियोजना थमा दी गई। जब श्री विजय सिंह जतारा में सहायक यंत्री थे तब उन्होंने सड़क पर इतना कम डामरीकरण कराया था कि पहली बरसात में ही सड़क बह गई। जांचकर्ताओं ने इसके लिए श्री विजय सिंह को दोषी पाया और विभाग ने उनकी चार वेतनवृद्धि संचयी प्रभाव से रोकने की शास्ति अधिरोपित कर दी। विभागाध्यक्ष अखिलेश अग्रवाल ये जानते थे,लोकायुक्त के प्रकरण की भी उन्हें जानकारी थी लेकिन सरकार का निर्देश मानकर उन्होंने इस परियोजना को भ्रष्ट अफसर के हवाले कर दिया।हालांकि इसके बावजूद निर्माण भवन में सात वर्ष नौ माह की मैराथन जवाबदारी संभालने वाले अखिलेश अग्रवाल को भी विभाग से चलता कर दिया गया। वे निहायत ईमानदार अफसर माने जाते हैं पर सरकार में आ धमके कुछ गिरोहबाजों के लिए वे उपयोगी नहीं थे।

    मौजूदा मुख्य अभियंता श्री आर के मेहरा और विभागीय मंत्री सज्जन सिंह वर्मा के विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी संजय खांडे भी इस परियोजना की हकीकत से वाकिफ हैं। वे कहते भी हैं कि इस प्रोजेक्ट को साकार करना भोपाल के लिए विशेष तौर पर उपयोगी है। वे ये भी कहते हैं कि लोक निर्माण विभाग के नियमों और परंपराओं के अनुसार किसी भी प्रोजेक्ट को शुरु करने वाले अफसर को ही उसे पूरा करने की जवाबदारी दी जाती रही है।क्योंकि इससे परियोजना की बारीकियां आसानी से हल हो जाती हैं। कोई गंभीर शिकायत सामने आने पर ही परियोजना का प्रभारी बदला जाता है। इसके बावजूद सरकार का हुक्म बजाना अफसरों की मजबूरी है।

    मुख्यमंत्री कमलनाथ आमतौर पर सरकारी कामकाज में अधिक दखल देने के पक्ष में नहीं रहते हैं। उनके करीबी बताते हैं कि वे अफसरों पर राजनीतिक उद्देश्यों के लिए भी बेजा दबाव डालने के पक्षधर नहीं हैं। इसके बावजूद कांग्रेस में जिस तरह से कई नेताओं की लाबियां सक्रिय हैं उससे शासन प्रशासन पर तय शुदा राजनीतिक दबाव की तुलना में कई गुना तनाव थोपा जा रहा है। राजधानी की शान कही जाने वाली इस परियोजना में मौजूदा बदलाव आने के बाद शुरु हो चुका काम ठप पड़ गया है। निश्चित तौर पर यदि सरकार ने परियोजना की सुध नहीं ली तो इसका समय सीमा में पूरा होना भी असंभव है और लागत कितने गुना बढ़ेगी ये तो आने वाला समय ही बताएगा।

  • सरकार का सूचना आयुक्त कौन

    सरकार का सूचना आयुक्त कौन


    भोपाल,8 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)।मध्यप्रदेश के मुख्य सूचना आयुक्त केडी खान और सूचना आयुक्त आत्मदीप का कार्यकाल आज समाप्त हो गया। सूचना भवन में आयोजित एक औपचारिक कार्यक्रम में दोनों को विदाई भी दे दी गई। परिवार को सबसे प्रमुख इकाई मानने वाले केडी खान को राष्ट्रवादी भाजपा ने अपना सूचना आयुक्त बनाया था पर अब नए सूचना आयुक्त का फैसला कमलनाथ सरकार को करना है। फिलहाल सूचना आयुक्त सुखराज सिंह ने प्रभार संभाल लिया है।

    मुख्य सूचना आयुक्त के लिए जिन प्रमुख हस्तियों के प्रस्तावों पर सरकार विचार कर रही है उनमें सूचना आयुक्त आत्मदीप और सुखराज सिंह भी शामिल हैं। तरह तरह के नवाचारों से मध्यप्रदेश में सूचना के कानून को लोकप्रियता मिली उनमें बहुत सारे प्रयोग सूचना आयुक्त आत्मदीप ने किए थे। जनता को सूचना का अधिकार देने के लिए सामाजिक कार्यकर्ता अरूणा राय के नेतृत्व में राजस्थान से शुरू हुए आंदोलन में सहभागिता, सूचना का अधिकार अधिनियम एवं म0प्र0 सूचना का अधिकार (फीस व अपील) नियम 2005 के सुविज्ञ, सूचना के अधिकार के बेहतर क्रियान्वयन, इस अधिकार की पहुंच अधिकाधिक जनता तक पहुंचाने और इस अधिकार का लाभ ज्यादातर लोगों तक पहुंचाने के लिए म.प्र. राज्य सूचना आयुक्त के रूप में विशेष प्रयास, जनहित में म.प्र. में सर्वाधिक नवाचार किए ।
    देश में पहली बार म.प्र. में आर. टी. आई. एक्ट के तहत लोक अदालतों के आयोजन का शुभारंभ कराया । म0प्र0 सूचना आयोग में पहली बार वीडियो कान्फ्रेंसिंग से अपीलों की सुनवाई शुरू कराई । पक्षकारों की सुविधा के लिए सूचना आयोग को उसकी चारदीवारी से बाहर निकाल कर जनता के बीच ले जाने की पहल की । अपने प्रभार के सभी जिलों के दौरे कर जिला मुख्यालयों पर केंप कोर्ट लगाए और जिले की अपीलों का जिले में ही जाकर निराकरण करने का प्रयास किया । आर.टी.आई. एक्ट के प्रमुख उद्देश्य तथा एक्ट के मुख्य प्रावधानों की जानकारी देकर लोकसेवकों को लोकहित व लोक क्रिया कलाप से संबंधित अधिकाधिक जानकारियां नागरिकों को देने के लिए प्रेरित करने के लिए जिला मुख्यालयों पर जाकर लोक सूचना अधिकारियों, अपीलीय अधिकारियों व सूचना का अधिकार प्रकोष्ठ से जुडे़ लोक सेवकों की कार्यशालाएं आयोजित की । 5 वर्ष के कार्यकाल में 5 हजार से अधिक अपीलों व शिकायतों का निराकरण किया, सूचना के अधिकार की अवज्ञा करने वाले 21 लोक सूचना अधिकारियों को 3,13,500 रू0 के जुर्माने-हर्जाने से दंडित किया ।


    अपीलों व शिकायतों की सुनवाई के लिए पक्षकारों को भोपाल आने-जाने से राहत देने के लिए देश में पहली दफा मध्यप्रदेश में फोन पर सुनवाई कर प्रकरणों का निराकरण करने की पहल की । इससे अधिकारियों-कर्मचारियों की यात्रा पर खर्च होने वाले लोकधन की बचत हुई, शासकीय कार्यालयों का नियमित कामकाज बाधित होने से बचा, अधिकारियों-कर्मचारियों व अपीलार्थियों को यात्रा में होने वाली परेशानी से राहत मिली और सबके समय, श्रम, काम व धन की बचत हुई । उचित मूल्य की दुकानों, रेडक्रास सोसायटी आदि अनेक संस्थानों/निकायों को आर.टी.आई. एक्ट के दायरे में लाकर नागरिकों को वांछित सूचनाएं उपलब्ध कराने की पहल की ।


    सूचना आयुक्त के रूप में आत्मदीप ने देश में पहली बार म.प्र. में अपने स्तर पर ऐसी निःशुल्क सुविधा सबके लिए उपलब्ध कराई कि कोई भी नागरिक व लोकसेवक सूचना के अधिकार के संबंध में उनसे फोन, मोबाईल, वाट्सएप, इंस्ट्रग्राम, ईमेल आदि के जरिए कभी भी वांछित जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इस सुविधा से न केवल मध्यप्रदेश बल्कि अन्य राज्यों के भी काफी लोग लाभान्वित हुए जिनमें प्रवासी भारतीय भी शामिल हैं । सूचना के अधिकार के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से ‘राईट टू इंफर्मेशन’ (जर्नलिस्ट) नाम से फेसबुक पेज भी बनाया और सोशल मीडिया का भरपूर सदुपयोग किया । सुनवाई में निःशक्तजनों, बुजुर्गों व महिलाओं को प्राथमिकता देने का प्रावधान किया । अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर हर 8 मार्च को सिर्फ महिलाओं की अपीलों व शिकायतों को सुनवाई के लिए नियत किया ।


    प्रदेश के अनेक जिलों में गैर सरकारी कार्यक्रमों में भी प्रबोधन देकर सूचना के अधिकार को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया । दुबई व अबूधाबी में भी गोष्ठी आयोजित कर प्रवासी भारतीयों को सूचना के अधिकार का लाभ लेने हेतु प्रेरित किया।


    पत्रकार के रूप में: पूर्व में पत्रिका, नवभारत टाईम्स व जनसत्ता के कार्यालय संवाददाता/विशेष संवाददाता के रूप में करीब 35 वर्षों तक पूर्णकालिक पत्रकारिता की । जन सरोकारों से जुड़ी सार्थक पत्रकारिता करने तथा निष्पक्ष, खोजपूर्ण व रचनात्मक रिपोर्टिंग के लिए कई पुरूस्कारों से सम्मानित, विशेषकर मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत द्वारा श्रेष्ठ पत्रकार के रूप में ‘माणक अलंकरण’ से तथा जगदगुरू शंकराचार्य श्री वासुदेवानंद सरस्वती द्वारा ‘गुणीजन सम्मान’ से सम्मानित । देश के प्रमुख पत्रकार महासंघ नेशनल यूनियन आप जर्नलिस्टस्, इंडिया के राष्ट्रीय महासचिव के नाते पत्रकारों के लिए उल्लेखनीय कल्याणकारी कार्य किए तथा संयुक्त राष्ट्र के अंतराष्ट्रीय श्रम संगठन में पत्रकार बिरादरी का प्रतिनिधित्व करने वाले इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स, ब्रुसेल्स द्वारा विभिन्न देशों में आयोजित कार्यशालाओं में भागीदारी की ।


    म0प्र0 शासन द्वारा गठित राज्य स्तरीय पत्रकार अधिमान्यता समिति तथा म0प्र0 विधानसभाध्यक्ष द्वारा गठित पत्रकार दीर्घा सलाहकार समिति के भी सदस्य रहे । पत्रकारों के कल्याण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर गठित जर्नलिस्ट्स वेलफेयर फाउंडेशन, नई दिल्ली के भी दो बार निर्विरोध राष्ट्रीय सचिव चुने गए ।


    विज्ञान व प्रोद्यौगिकी: पत्रकारिता, आर.टी.आई. एक्ट सहित विभिन्न कानूनों व राज्य सूचना आयोग के काम-काज के बारे में विशेषज्ञता के अतिरिक्त भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र, मुंबई में प्रशिक्षण प्राप्त कर परमाणु उर्जा प्रोद्यौगिकी के क्षेत्र में भी विशेषज्ञता हासिल की । विज्ञान व तकनीकी के इस क्षेत्र में व पोखरण टू के संबंध में की गयी रिपोर्टिंग की देश के प्रमुख वैज्ञानिक डा0 अब्दुल कलाम आजाद, डा0 आर0 चिदंबरम व डा0 अनिल काकोड़कर द्वारा मुक्त कंठ से सराहना की गयी । जन सेवा को समर्पित, अब तक के जीवन पर अनुचित कार्य का कोई आक्षेप नहीं । पत्रकार व राज्य सूचना आयुक्त के रूप में संपूर्ण जीवन यात्रा बेदाग रही ।

  • कुंडली और एलोपैथी से इलाज

    कुंडली और एलोपैथी से इलाज

    जयपुर में ज्योतिष-एलोपैथी से इलाज की सुविधा वाले अस्पताल का लोकार्पण किया गया है। यहां मरीज की कुंडली देखकर न सिर्फ उसके रोग का पता लगाया जाएगा, बल्कि उसकी बीमारी ठीक होने लायक है अथवा नहीं, इसका भी पूर्वानुमान लगाया जाएगा। फिर इलाज से मरीज को पूर्ण स्वस्थ करने का प्रयास होगा।


    भारतीय प्राच्य ज्योतिष शोध संस्थान के इस संगीता मेमोरियल अस्पताल का लोकार्पण राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे तथा विधानसभा अध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी द्वारा किया गया। संस्थान के सचिव पं. अखिलेश शर्मा ने बताया कि मरीज की कुंडली में ग्रहों की दशा से उसकी बीमारी की सटीक जानकारी ली सकती है। ज्योतिष-एलोपैथी समन्वय से इलाज के लिए 2015 में राज्य सरकार को प्रस्ताव दिया गया था। उसके बाद 2017 में व्यापक शोध कर एक रिपोर्ट सरकार को सौंपी गई। शोध में एलोपैथी डाक्टरों ने ज्योतिषियों से बीमारी की पहचान संबंधी उनकी प्रक्रिया जानी, जिससे संतुष्ट होने के बाद ही इस अस्पताल की स्थापना की कवायद प्रारंभ हुई।


    पं. शर्मा ने दावा किया कि एलोपैथी चिकित्सा पद्धति से बीमारी के बारे में 80 फीसदी ही पता किया जा सकता है, जबकि ज्योतिष विज्ञान से सौ फीसदी एक्यूरेसी से बीमारी के कारण और निवारण के बारे में जानकारी ली जा सकती है। उन्होंने बताया कि उनके संस्थान के अस्पताल में एलोपैथी पद्धति से इलाज शुरू करने से पूर्व डॉक्टर मरीज का डाटा व कुंडली ज्योतिष विभाग को भेजेंगे। जहां पता लगाया जाएगा कि मरीज को क्या बीमारी है, किस अंग में बीमारी है और वह ठीक हो सकती है अथवा नहीं, यह रिपोर्ट आधे घंटे भीतर डॉक्टर को उपलब्ध करा दी जाएगी। डॉक्टर उसे अपनी रिपोर्ट से मिलान कर उपचार की क्रिया प्रारंभ करेंगे। पं. शर्मा के अनुसार आगामी एक अप्रैल से अस्पताल विधिवत रूप से कार्य करे लग जाएगा। 

  • दस लाख कारोबारियों पर चोट

    दस लाख कारोबारियों पर चोट

    सरकार ने गुमाश्ता कानून में कराए गए पंजीकरण को हर पांच साल में नवीनीकृत कराने का नियम समाप्त कर दिया है। अब मध्यप्रदेश में दुकान और स्थापना अधिनियम-1958 के प्रावधानों के तहत छोटे दुकानदारों, स्थापनाओं एवं स्टार्ट-अप को बार-बार दुकानों के लाईसेंस का नवीनीकरण नहीं कराना होगा। कमलनाथ सरकार का कहना है कि ऐसा करके उसने छोटे दुकानदारों और कारोबारियों को ईज आफ डूइंग बिजिनेस की तहजीब से झंझट मुक्त कर दिया है। इस निर्णय से प्रदेश के लगभग 10 लाख से अधिक छोटे दुकानदार, स्थापना व्यवसाई और स्टार्ट-अप लाभान्वित होंगे। नई व्यवस्था के अनुसार दुकानदार और स्थापनाओं को पूरे व्यवसाय अवधि में एक बार ऑनलाइन पंजीयन कराना होगा। पंजीयन कराने के बाद भविष्य में व्यवसाय के स्वरूप में परिवर्तन होने पर ही अपने पंजीयन में संशोधन कराना होगा।साथ ही पंजीयन की विभिन्न श्रेणियों को खत्म कर मात्र दो श्रेणी तक ही सीमित किया जा रहा है।पहली नजर में यह कदम बहुत जनोन्मुखी नजर आता है। सरकार और उसकी संस्था कांग्रेस भी यही प्रचारित कर रही है। जबकि हकीकत में ये बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सुभीते के लिए उठाया गया कदम है। वालमार्ट जैसी संस्थाओं ने भारत में अपना कारोबार फैलाने के लिए बाजार की आजादी स्थापित करने की मांग लंबे समय से उठा रखी है। छोटे उपभोक्ताओं के दबाव के कारण ही वालमार्ट के ब्रांडों को केवल थोक कारोबार की इजाजत दी गई है। वे अपना माल केवल थोक उपभोक्ताओं को बेच सकते हैं। इसके लिए उन्हें थोक उपभोक्ताओं के गुमाश्ता प्रमाण पत्र को ग्राहकी का आधार बनाना होता है। जाहिर है कि हर साल या पांच साल में जारी किए जाने वाले गुमाश्ता प्रमाणपत्र को वालमार्ट में हर बार नवीनीकृत कराना होता है। जैसे ही गुमाश्ता अनुमति का समय बीत जाता है वैसे ही वालमार्ट उस प्रमाणपत्र पर कारोबार नहीं कर सकता। इससे वालमार्ट के तमाम ब्रांड भारत में खासा घाटा उठा रहे हैं। उनकी मांग है कि उन्हें फुटकर कारोबार की इजाजत दी जाए। वालस्ट्रीट के दिग्गज मार्गन स्टेनली का कहना है कि भारत में वालमार्ट को यहां के नियमों के कारण घाटा हो रहा है। अमेरिकी रिटेल कंपनी वालमार्ट ने भारत के जिस प्रमुख ई कामर्स प्लेटफार्म फ्लिपकार्ट में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई थी उसे वह बेच सकती है। ये उसी तरह होगा जैसे 2017 में अमेजन ने चीन को छोड़ दिया था। ब्रोकरेज फर्म मार्गन स्टेनली का कहना है कि भारत में ई कामर्स में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश(एफडीआई) के जो नए नियम बने हैं उनसे वालमार्ट और अमेजन जैसे दिग्गज भी हिल गए हैं। वालमार्ट ने मई 2018 में भारत की सबसे बड़ी ई कामर्स कंपनी फ्लिपकार्ट में 77 प्रतिशत हिस्सेदारी करीब 1.07 लाख करोड़ रुपए में खरीदी थी। स्थानीय कारोबारियों ने तबसे ई कामर्स कंपनियों के खिलाफ अभियान चला रखा है। कारोबारियों का कहना है कि ई कामर्स के कारण उनका कारोबार तबाह हो रहा है।इसके बाद मोदी सरकार ने एफडीआई के नियमों में जो बदलाव किए उनके चलते फ्लिपकार्ट को अपने मौजूदा प्रोडक्टस में से 25प्रतिशत को हटाना पड़ रहा है। इसमें स्मार्टफोन और इलेक्ट्रानिक्स के आईटम भी शामिल हैं। सप्लाई चेन और एक्सक्लूसिव डील्स को लेकर नियमों में बदलाव से इलेक्ट्रानिक सेगमेंट पर बड़ा प्रभाव पड़ रहा है। जबकि फ्लिपकार्ट की 50 फीसदी कमाई इसी केटेगरी से आती है। हालत ये हो गई है कि अमेजन को अपने दो टाप सेलर्स क्लाऊडटेल और एपैरियो को भी हटाना पड़ा है। क्योंकि इन दोनों में अमेजन की हिस्सेदारी थी। एक फरवरी से लागू नए नियमों के मुताबिक एफडीआई वाली ई कामर्स कंपनियां मार्केटप्लेस पर उन कंपनियों का सामान नहीं बेच सकेंगी जिनमें उन्होंने निवेश कर रखा है। इसी तरह वे एक्सक्लूसिव बिक्री के लिए भी करार नहीं कर सकती हैं। अमेजन ने तो इन नियमों का विरोध करते हुए एक फरवरी से अपने प्लेटफार्म पर किराना प्रोडक्ट्स की बिक्री रोक दी है। भारत में निवेश करने वाली इन्हीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव के आगे झुकते हुए मध्यप्रदेश सरकार ने गुमाश्ता कानून की रीढ़ तोड़ दी है। अब जो प्रमाण पत्र एक बार जारी हो जाएंगे वे लगातार अस्तित्व में रहेंगे। इससे इन विदेशी कंपनियों को अपना ग्राहक आधार बढ़ाने में मदद मिलेगी। एक तरह से ये रिटेल बाजार में कब्जा जमाने की ओर बढ़ता कदम ही होगा। हालिया विधानसभा चुनावों में व्यापारियों ने भारी चंदा देकर भाजपा को हराने और कांग्रेस को सत्ता में लाने की मुहिम चलाई थी। सरकार के इस फैसले से उन्हें निराशा होगी। सरकार दावा कर रही है कि उसके इस फैसले से दस लाख छोटे व्यापारियों को सरलता हो जाएगी। जबकि हकीकत ये है कि सरकार के इस फैसले से दस लाख छोटे व्यापारियों की रोजी रोटी छिनने का संकट बढ़ गया है। भारत में पूंजीवाद लाने के लिए खुले बाजार को छूट देने की पहल 1991 में नरसिम्हाराव सरकार के वित्तमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह की पहल पर की गई थी। इसके बाद एनडीए की मनमोहन सिंह सरकार ने उन नीतियों को आगे बढ़ाया। आज जब मोदी सरकार देश की समृद्धि बढ़ाने की उसी दिशा में आगे बढ़ रही है तब उन नीतियों की आलोचना की जा रही थी। राज्य में कमलनाथ सरकार उन्हीं वैश्विक नीतियों को लागू कर रही है जिसका विरोध स्थानीय कारोबारी लंबे समय से करते रहे हैं। जाहिर है कि सरकार का यह फैसला एक बार फिर टकराव का माहौल निर्मित करेगा।

  • खनन की मंजूरी दे केन्द्रःकमलनाथ

    खनन की मंजूरी दे केन्द्रःकमलनाथ

    प्राइज डेफिसिट योजना के 575.90 करोड़ मांगे
    मुख्यमंत्री कमल नाथ की प्रधानमंत्री से मुलाकात,    

    भोपाल,4 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र) मुख्यमंत्री कमल नाथ ने नई दिल्ली में आज प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की और कृषि एवं खनन से जुड़े मुददों पर विस्तार से चर्चा की।  श्री नाथ ने राज्य की आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिये माइनिंग लीज पाने की पात्रता रखने वाले 27 प्रकरण में जल्द से जल्द निर्णय लेने का अनुरोध किया। श्री कमल नाथ ने प्रधानमंत्री को विस्तार से बताया कि मध्यप्रदेश के करीब 170 आवेदन हैं जो खदान एवं खनिज (विकास एवं नियमन) अधिनियम की धारा 10-ए और 2-बी के अंतर्गत माइनिंग लीज अनुदान पाने की पात्रता रखते हैं। इन प्रस्तावों पर जल्द निर्णय होने से राज्य की आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।

     मुख्यमंत्री ने बताया कि जनवरी 2015 में खदान और खनिज (विकास एवं नियमन) अधिनियम मध्यप्रदेश जैसे राज्य जिला खनिज कोष के नये प्रावधानों का लाभ उठा रहे हैं। साथ ही वे अधोसंरचना के विकास और खनन गतिविधियों से प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के लिये अन्य संकेतकों को सुधारने में भी योगदान दे रहे हैं।

    प्राइज डेफिसिट योजना के 575.90 करोड़ रूपये जारी करने का आग्रह

      मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ ने प्रधानमंत्री का ध्यान तिलहन के लिये प्राइज डेफिसिट भुगतान योजना के क्रियान्वयन लागत की शेष राशि 575.90 करोड़ रूपये शीघ्र जारी करने का आग्रह किया है। उन्होंने प्रधानमंत्री समर्थन मूल्य तय करने के पूर्व के निर्णय को आगे बढाते हुए अभियान के क्रियान्वयन के संबंध में ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि अभियान के माध्यम से किसानों को उनकी उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने के लिये राज्य सरकार प्रतिबद्ध है।

    श्री नाथ ने श्री मोदी को बताया कि मध्यप्रदेश सरकार ने 1951.80 करोड़ रूपये किसानों को भुगतान किये थे जो न्यूनतम समर्थन मूल्य और आदर्श विक्रय मूल्य का अंतर था। उन्होंने कहा कि यदि यह फसल नाफेड द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर उपार्जित होती तो प्रशासनिक लागत और हानि करीब 2800 करोड़ आती।

    मुख्यमंत्री ने लागत में 50 प्रतिशत की भागीदारी भारत सरकार द्वारा करने के निर्णय को देखते हुए शेष 575.90 करोड़ रूपये शीघ्र जारी करवाने का आग्रह किया ।

    सोयाबीन के लिये म.प्र. का  लक्ष्य 26.92 लाख मीट्रिक टन करने का आग्रह

    मुख्यमंत्री ने सोयाबीन के लिये प्राइज डेफिसिट योजना में राज्य के उत्पादन का 40 प्रतिशत यानी 26.92 लाख मीट्रिक टन लक्ष्य तय करने का आग्रह किया है।

    श्री नाथ ने कहा कि प्राइज डेफिसिट योजना की गाइडलाइन में राज्य को दिये लक्ष्य को उत्पादन का 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 40 प्रतिशत करने के तरीके का उल्लेख नहीं किया गया है जबकि यही मूल्य समर्थन योजना की गाइडलाइन में अंकित है। उन्होंने प्राइज डेफिसिट योजना में परिवर्तन करने का आग्रह करते हुए कहा कि इससे उत्पादन के 25 प्रतिशत के लक्ष्य को 40 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकेगा।

  • कश्मीर के मूल निवासियों को मजबूती देने का वक्त

    कश्मीर के मूल निवासियों को मजबूती देने का वक्त

    भोपाल,(प्रेस सूचना केन्द्र)।कश्मीर में सेना की सख्ती और आतंकवादी हमलों के बीच एक आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-इस्लाम ने पुलवामा में कई जगह पोस्टर लगाए थे, जिनमें कहा गया है कि कश्मीरी पंडित या तो घाटी छोड़ दें या फिर मरने के लिए तैयार रहें। यहां ध्यान देने वाली बात है कि कश्मीर में साल 1990 में हथियारबंद आंदोलन शुरू होने के बाद से अब तक लाखों कश्मीरी पंडित अपना घर-बार छोड़ कर चले गए। उस वक्त हुए नरसंहार में सैकड़ों पंडितों का कत्लेआम हुआ था। बड़ी संख्या में महिलाओं और लड़कियों के साथ बलात्कार हुए थे।

    कश्मीरी पंडितों पर इस्लाम के नाम पर कहर टूटा इसकी शह भारत विरोधियों ने दी थी। कश्मीर में हिंदुओं पर हमलों का सिलसिला 1989 में जिहाद के लिए गठित जमात-ए-इस्लामी ने शुरू किया था। जिसने कश्मीर में इस्लामिक ड्रेस कोड लागू कर दिया। आतंकी संगठन का नारा था-

    ‘हम सब एक, तुम भागो या मरो’। इसके बाद कश्मीरी पंडितों ने घाटी छोड़ दी।

    इस अराजकता से परेशान अमीर से अमीर कश्मीरी पंडित तक अपनी पुश्तैनी जमीन जायदाद छोड़कर शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर हो गए। हिंसा के उस दौर में 300 से अधिक हिंदू महिलाओं और पुरुषों की हत्या हुई थी। घाटी में कश्मीरी पंडितों के बुरे दिनों की शुरुआत 14 सितंबर 1989 से हुई थी।

    भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और वकील कश्मीरी पंडित, तिलक लाल तप्लू की जेकेएलएफ ने हत्या कर दी गई। इसके बाद जस्टिस नीलकांत गंजू की भी गोली मारकर हत्या कर दी गई। आतंक के उस दौर में अधिकतर हिंदू नेताओं को मौत की नींद सुला दिया गया।

    सरेआम हुए थे बलात्कार

    *मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक कश्मीरी पंडित नर्स के साथ आतंकियों ने सामूहिक बलात्कार किया और उसके बाद मार-मारकर उसकी हत्या कर दी। घाटी में कई कश्मीरी पंडितों की बस्तियों में सामूहिक बलात्कार और लड़कियों के अपहरण किए गए। हालात और बदतर हो गए थे।

    *एक स्थानीय उर्दू अखबार, हिज्ब उल मुजाहिदीन की तरफ से एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई थी कि ‘सभी हिंदू अपना सामान बांधें और कश्मीर छोड़ कर चले जाएं’।

    *एक अन्य स्थानीय समाचार पत्र अल सफा ने इस निष्कासन के आदेश को दोहराया।

    *मस्जिदों में भारत एवं हिंदू विरोधी भाषण दिए जाने लगे। सभी कश्मीरियों को कहा गया कि इस्लामिक ड्रेस कोड ही अपनाएं।

    *कश्मीरी पंडितों के घर के दरवाजों पर नोट लगा दिया गया, जिसमें लिखा था या तो मुस्लिम बन जाओ या कश्मीर छोड़ दो।

    *पाकिस्तान की तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो ने टीवी पर कश्मीरी मुस्लिमों को भारत से अलग होने के लिए भड़काना शुरू कर दिया।

    कश्मीर में हुए बड़े नरसंहार

    1. डोडा नरसंहार- अगस्त 14, 1993 को बस रोककर 15 हिंदुओं की हत्या कर दी गई।

    2. संग्रामपुर नरसंहार- मार्च 21, 1997 घर में घुसकर 7 कश्मीरी पंडितों को किडनैप कर मार डाला गया।

    3. वंधामा नरसंहार- जनवरी 25, 1998 को हथियारबंद आतंकियों ने 4 कश्मीरी परिवार के 23 लोगों को गोलियों से भून डाला।

    4. प्रानकोट नरसंहार- अप्रैल 17, 1998 को उधमपुर जिले के प्रानकोट गांव में एक कश्मीरी हिन्दू परिवार के 27 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया, इसमें 11 बच्चे भी शामिल थे। इस नरसंहार के बाद डर से पौनी और रियासी के 1000 हिंदुओं ने पलायन किया था।

    5. 2000 में अनंतनाग के पहलगाम में 30 अमरनाथ यात्रियों की आतंकियों ने हत्या कर दी थी।

    6. 20 मार्च 2000 चित्तीसिंघपोरा नरसंहार, होला मोहल्ला मना रहे 36 सिखों की गुरुद्वारे के सामने आतंकियों ने गोली मारकर हत्या कर दी।

    7. 2001 में डोडा में 6 हिंदुओं की आतंकियों ने गोली मारकर हत्या कर दी।

    8. 2001 में जम्मू रेलवे स्टेशन नरसंहार, सेना के भेष में आतंकियों ने रेलवे स्टेशन पर गोलीबारी कर दी, इसमें 11 लोगों की मौत हो गई।

    9. 2002 में जम्मू के रघुनाथ मंदिर पर आतंकियों ने दो बार हमला किया, पहला 30 मार्च और दूसरा 24 नवंबर को, इन दोनों हमलों में 15 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई।

    10. 2002 में कासिम नगर नरसंहार में 29 हिन्दू मजदूरों को मार डाला गया। इनमें 13 महिलाएं और एक बच्चा शामिल था।

    11. 2003 में नंदीमार्ग नरसंहार, पुलवामा जिले के नंदीमार्ग गांव में आतंकियों ने 24 हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया था।

    12. मार्च 1998 में मुस्लिम जिहादियों ने एक दूध पीते बच्चे का कत्ल किया जोकि निकृष्टता की पराकाष्ठा थी लेकिन छोटे बच्चे व महिलाएं, लड़कियां आतंकवादियों के सॉफ्ट टारगेट होते हैं क्योंकि वे अपने बचाव के उपाय भी नहीं कर सकते हैं।

    13. 2 फरवरी 1990 को सामाजिक कार्यकर्ता सतीश टिक्कु की हत्या कर दी गई।

    14. 23 फरवरी को कृषि विभाग के कर्मचारी अशोक की टांगों में गोली मारकर उन्हें घंटों तड़पाने के बाद सिर में गोली मारकर उनका कत्ल कर दिया गया। एक सप्ताह बाद इन मुस्लिम जिहादियों द्वारा नवीन सपरू का कत्ल कर दिया गया।

    15. 27 फरवरी को तेजकिशन को इन जिहादियों ने घर से उठा लिया और तरह-तरह की यातनाएं देने के बाद उसका कत्ल कर उसे बड़गाम में पेड़ पर

    लटका दिया।

    16. 19 मार्च को इखवान-अल-मुसलमीन नामक संगठन के जिहादियों ने टेलीकाम इंजीनियर बीके गंजु को घर में घुसकर पड़ोसी मुसलमानों की सहायता से मारा। उसके बाद राज्य सूचना विभाग में सहायक उपदेशक पीएन हांडा का कत्ल किया गया।

    17. 70 वर्षीय स्वरानंद और उनके 27 वर्षीय बेटे बीरेन्दर को मुस्लिम जिहादी घर से उठाकर अपने कैंप में ले गए। वहां उनकी पहले आंखें निकाली गईं, अंगुलियां काटी गईं फिर उनकी हत्या कर दी गई।

    कश्मीर घाटी से हिन्दुओं को मारकर भगाने के लिए चलाए गए अभियान के बाद जम्मू के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में हिन्दू मिटाओ-हिन्दू भगाओ अभियान चलाया गया। मुस्लिम जिहादियों ने हिन्दुओं का कत्लेआम किया, जो वर्तमान में भी जारी है। हिन्दुओं पर पहला हमला 1986 में अनंतनाग में हुआ। दिसंबर 1989 में जोगिंदरनाथ का नाम अन्य तीन अध्यापकों के साथ नोटिस बोर्ड पर चिपकाकर उन्हें घाटी छोड़ने की धमकी दी गई। यह तीनों लोग राधाकृष्ण स्कूल मे पढ़ाते थे। धमकाने का सिलसिला तब तक जारी रहा जब तक जून 1989 में जोगिन्दर वहां से भाग नहीं गए।

    हिन्दु मिटाओ-हिन्दू भगाओ अभियान चलाने से पहले 1984 से 86 के बीच में पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के मुस्लिम जिहादियों को भारतीय कश्मीर में बसाया गया और घाटी में जनसंख्या संतुलन मुस्लिम जिहादियों के पक्ष में बनाकर हिन्दुओं पर हमले शुरू करवाए गए। ये सब पाकिस्तान के इशारे पर हुआ।

    यह वह समय था जब मुस्लिम जिहादियों द्वारा प्रशासन में बैठे अपने आतंकवादी साथियों के सहयोग से हिन्दुओं पर अत्याचारों का सिलसिला बेरोकटोक जारी था। इस दौरान जान-माल के साथ-साथ हिन्दुओं की मां-बहन–बेटी भी सुरक्षित नहीं थे। सैकड़ों हिन्दुओं का कत्ल किया जा चुका था। दर्जनों महिलाओं की इज्जत को तार-तार किया जा चुका था। मस्जिदों व उर्दू प्रेस के माध्यम से मुस्लिम जिहाद का प्रचार-प्रसार जोरों पर था।

    यह जिहाद कश्मीर के साथ-साथ डोडा में भी पांव पसार चुका था। हिन्दुओं में प्रशासन व जिहादी आतंकवादियों के बीच गठजोड़ से दहशत फैल चुकी थी। लेकिन प्रशासन का ध्यान हिन्दुओं की रक्षा के बजाए मुस्लिम जिहादियों द्वारा हिन्दुओं पर किए जा रहे अत्याचारों व हिन्दुओं के नरसंहारों को छुपाने पर ज्यादा था। परिणामस्वरूप कश्मीर घाटी से हिन्दुओं का पलायन शुरू हो चुका था। 50 हजार से अधिक हिन्दू परिवार घाटी छोड़कर जम्मू व देश के अन्य हिस्सों में शरण लेने को मजबूर हो चुके थे।

    इस दौर में हिन्दुओं को मारने वाले सबके सब विदेशी नहीं थे। इन्हें मारने वाले स्थानीय मुस्लिम भी थे। वे समूहों में कत्ल से पहले हिन्दुओं के अंग-भंग करना, आंखें निकालना, नाखुन खींचना, बाल नोचना, जिंदा जलाना, चमड़ी खींचना खासकर महिलाओं के स्तनों को गाड़ी से बांधकर घसीटते हुए तड़पा-तड़पा कर मारना आम बात थी। कुल मिलाकर मुस्लिम जिहादियों द्वारा चलाए जा रहे हिन्दू मिटाओ-हिन्दू भगाओ अभियान की सफलता के पीछे जम्मू-कश्मीर की देशविरोधी सेकुलर सरकारों का योगदान पाकिस्तान से कहीं ज्यादा है।

  • सरकार ने रोका जबलपुर के मत्स्य महाविद्यालय का अनुदान

    सरकार ने रोका जबलपुर के मत्स्य महाविद्यालय का अनुदान

    मांझी समाज से भेदभाव भारी पड़ेगा बोले आनंद निषाद

    भोपाल,2फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। विधानसभा चुनावों में रोजगार दिलाने का वादा करने के लिए इस्तेमाल किया गया छिंदवाड़ा मॉडल कांग्रेस के सत्ता में आते ही हवा हवाई साबित होने लगा है। मुख्यमंत्री कमलनाथ बात बात में युवाओं को रोजगार दिलाने के लिए प्रशिक्षण दिलाने की बात करते हैं लेकिन सरकार का मछली पालन विभाग ये जवाबदारी उठाने को ही तैयार नहीं है।सरकार ने जबलपुर के मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय का अनुदान रोक दिया है जिससे वहां कई महीनों से वेतन नहीं बंट पा रहा है। सरकार की इस बेरुखी से मांझी समाज आक्रोश में है और उसके नेतागण दो दो हाथ करने की तैयारी कर रहे हैं।

    प्रदेश में मछली पालन के क्षेत्र में रोजगार बढ़ाने और पूंजी निर्माण के लिए निवृत्तमान भाजपा सरकार ने वर्ष 2012 में मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय जबलपुर की स्थापना की थी। मांझी समाज की एक मांग उनके बच्चों को उनकी पारंपरिक कला में प्रशिक्षित करने की भी थी। इसे देखते हुए कुलाधिपति के आदेशानुसार यह कालेज मछुआ कल्याण तथा मत्स्य विकास विभाग ने शुरु किया था। पूरे मध्यप्रदेश में मछली पालन सिखाने वाला ये एकमात्र कालेज है।विभाग ने कालेज की स्थापना के साथ ही उसे पांच साल की ग्रांट उपलब्ध कराई थी। तबसे कालेज से निकले करीबन अस्सी विद्यार्थी आज देश भर में मछली पालन व्यवसाय में रोजगार पा रहे हैं और प्रदेश में मछली उत्पादन के नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं।

    कालेज शुरु होने के बाद से मंजूर पंचवर्षीय प्रोजेक्ट का समय विगत वर्ष अगस्त माह में पूरा हो गया था। अनुपूरक बजट पारित होने के साथ इसकी नई ग्रांट मंजूर होनी थी। एक सितंबर 2018 को मत्स्य पालन विभाग ने अनुपूरक बजट के लिए कालेज का प्रस्ताव प्रस्तुत ही नहीं किया। विभाग के संचालक ओपी सक्सेना ने तब आश्वासन दिया था कि विभाग का बजट आबंटित होते ही कालेज की ग्रांट नवीनीकृत कर दी जाएगी। उस वक्त चुनाव का माहौल था और आचार संहिता के दौरान कोई बड़ा फैसला नहीं लिया जा सका। अब जबकि नई सरकार अपना कामकाज सुचारू रूप से संभाल चुकी है और पिछले पांच छह महीनों से कालेज में वेतन तक नहीं बंट सका है तब विभाग और शासन दोनों ही कालेज को फंड देने में आनाकानी कर रहे हैं।

    प्रमुख सचिव मछुआ कल्याण एवं मत्स्य विभाग अश्विनी कुमार राय का कहना है कि सरकार ने पांच साल के लिए बजट मंजूर किया था। मंजूरी देते वक्त कहा गया था कि भविष्य में कालेज अपने कामकाज का विस्तार अपने वित्तीय संसाधनों से करेगा। कालेज को शैक्षणिक जगत में अपनी गुणवत्ता स्थापित करनी चाहिए और बजट की व्यवस्था खुद करनी चाहिए।उनका कहना है कि इंडियन इंस्टीट्यूट आफ एग्रीकल्चर रिसर्च और उच्च शिक्षा अनुदान आयोग से अनुदान लेकर कालेज को चलाया जाना चाहिए। हालांकि यूजीसी के मान्यता दिलाने और अनुदान दिलाने की जवाबदारी शासन की ही होती है। जबकि आईएआरआई की ओर से अनुसंधान कार्यों के लिए अनुदान दिया जाता है।

    हकीकत ये है कि सरकार की पहल पर शासन ने बाकायदा अधिसूचना जारी करके यह कालेज शुरु कराया था।जाहिर है कि कालेज की स्थापना का व्यय शासन को ही वहन करना था।शासन ने ये जवाबदारी अपनी ओर से मत्स्य पालन विभाग को दी थी। अपना रुतबा दिखाते हुए मत्स्य पालन विभाग ने कालेज को शुरु कराते समय ऐसे शिक्षकों की भर्ती कर ली थी जिनकी पढ़ाई मत्स्य विज्ञान में नहीं हुई थी। ऐसे में उच्च शिक्षा के राष्ट्रीय संस्थानों की कसौटी पर कालेज को कसा जाना संभव नहीं था। इसके बावजूद चूंकि शासन ने गारंटी ली थी इसलिए कालेज का शैक्षणिक कामकाज सुचारू तौर पर चलता रहा।

    मत्स्य पालन के क्षेत्र में रोजगार और पूंजी निर्माण की बढ़ती संभावनाओं को देखते हुए देश के सीमांत राज्यों ने अपने युवाओं को इस क्षेत्र में प्रशिक्षित किया है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में दो कालेज हैं जहां इस कारोबार के कुशल युवाओं को तैयार किया जाता है। बिहार जैसे राज्य में भी मछली पालन के स्टार्टअप तैयार हो चुके हैं जबकि मध्यप्रदेश इस क्षेत्र में बहुत पिछड़ा है।

    मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय जबलपुर के प्रभारी अधिष्ठाता डॉ.एस.के.महाजन का कहना है कि पिछले सालों में हमने राज्य के बच्चों को वैश्विक कसौटियों से मुकाबले के लिए तैयार किया है। आज हमारे कालेज से निकले छात्र देश के मछली उद्योग की शीर्ष जवाबदारियां संभाल रहे हैं। विशाखापट्टनम के मछली उद्योग में छात्रदल के प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल होने गए डॉ.महाजन ने कहा कि मत्स्य पालन विभाग और उसका ये कालेज अपनी जवाबदारी ठीक तरह से निभा रहा है। यदि सरकार की ओर से इसे संरक्षण मिले तो प्रदेश के युवाओं को रोजगार के नए अवसर देने में हम कामयाब होंगे। कालेज की ओर से अनुदान और विकास संबंधी प्रस्ताव हमने विभाग को भेजा है, जिस पर शासन की मंजूरी का हमें इंतजार है।

    हालांकि मांझी समाज के साथ किए जा रहे सरकार के भेदभाव से मछुआरों के सर्वमान्य नेता आनंद निषाद बहुत नाराज हैं। उनका कहना है कि हमने जब प्रदेश में अपना राजनीतिक वजूद खंगालना शुरु किया तब घबराकर भाजपा की शिवराज सरकार ने इस कालेज की स्थापना की थी। बाद में कुछ राजनीतिक कारणों से मांझी समाज भेदभाव का शिकार हो गया। विधानसभा चुनाव में मांझी समाज ने राष्ट्रीय महान गणतंत्र पार्टी के बैनर तले अपने स्वाभिमान की लड़ाई लड़ी। जिसके कारण भाजपा की सरकार का पतन संभव हुआ। अब कमलनाथ की कांग्रेस सरकार मछुआरों के बच्चों से शिक्षा का हक छीन रही है, जिसे देखते हुए हम आने वाले समय में कांग्रेस के वजूद पर भी प्रहार कर सकते हैं। उनका कहना है कि प्रदेश के जन,जंगल,जमीन, जल, और जानवरों पर पहला हक प्रदेश के मूल निवासियों का है। सरकार यदि मांझी समाज के बच्चों की शिक्षा में रोड़े अटकाएगी तो हम उसकी ईंट से ईंट बजा देंगे। प्रदेश के हर जिले और हर विधानसभा सीट पर हमारी समाज का वोट बैंक निर्णायक है। हम इसे एकजुट कर रहे हैं और आगामी चुनावों में हमारी मौजूदगी सरकार बनाने और बिगाड़ने में निर्णायक साबित होगी।

  • कमलनाथ सरकार को दलालों ने घेरा

    कमलनाथ सरकार को दलालों ने घेरा

    राज्य मंत्रालय में रोज सुबह से देर शाम तक इसी तरह आगंतुकों का जमघट लगा रहता है। दलालों और सुरक्षा कर्मियों के बीच आए दिन बहसें होती रहती हैं।

    आगामी लोकसभा चुनावों के लिए राजनैतिक जमावट में जुटी कमलनाथ सरकार न चाहते हुए भी दलालों से घिर गई है। मुख्यमंत्री कमलनाथ जगह जगह वित्तीय कुप्रबंधन को रोकने के उपाय करते नजर आ रहे हैं जबकि कांग्रेस संगठन से जुड़े पदाधिकारी अपने लाव लश्कर समेत सत्ता की मलाई सूंतने में जुट गए हैं। सरकार के महत्वपूर्ण विभागों को खंगालने के लिए उन्होंने भाजपा शासनकाल के दलालों को भी अपने खेमे में शामिल कर लिया है। सबसे बड़ी बात तो ये है कि पिछले पंद्रह सालों के भाजपा शासनकाल में सुशासन की जो कवायद की गई थी वो अब ताक पर धर दी गई है और मंत्रालय के गलियारे दलालों की दौड़भाग से गुलजार हो चले हैं। एक मलाईदार विभाग के मंत्री के विशेष सहायक इतनी जल्दी में हैं कि उन्होंने पूरे प्रदेश के अफसरों को धमकाकर वसूलियां शुरु कर दीं हैं। लोगों ने भी उनकी डिमांड के फोन टेप कर लिये हैं और उचित समय का इंतजार कर रहे हैं।

    ऐसा नहीं कि मुख्यमंत्री कमलनाथ इस सच से अनजान हैं। उनके खबरची लगातार ये फीडबैक दे रहे हैं। इसके बावजूद मुख्यमंत्री सचिवालय से वेट एंड वाच की सलाह ही दी जा रही है। इसकी वजह कांग्रेस संगठन का बिखरा स्वरूप है। अलग अलग धड़ों में बंटी कांग्रेस के तमाम नेतागण और उऩके समर्थक लंबे समय से कह रहे हैं कि पिछले पंद्रह सालों से वे सत्ता की मलाई खाने से वंचित रहे हैं। ऐसे में उन्हें अगला आम चुनाव भी लड़ना है। जनता के बीच दौड़ भाग के लिए रसद पानी का इंतजाम करने के लिए उन्हें भी अवसर चाहिए। इसलिए मंत्रालय के दरवाजे कांग्रेस समर्थकों के लिए खोल दिए गए हैं। रोज सुबह से मंत्रालय के गलियारों में दौड़ भाग करते कांग्रेस समर्थकों की भीड़ देखी जा सकती है। इनके साथ आने वाले दलाल बाजार से आवेदन बनाकर लाते हैं और मंत्रियों के स्टाफ से नोटशीट बनवाकर आदेश जारी करवाने में जुट जाते हैं।

    लंबे समय से सत्ता की गुंडागर्दी भूल चुके अफसरों के लिए ये एक नया अनुभव साबित हो रहा है। एक कमाऊ विभाग के प्रमुख को पिछले दिनों बड़ी कड़वी हकीकत से रूबरू होना पड़ा। उन्होंने जब मंत्री के दफ्तर से धड़ाधड़ आ रही नोटशीट डंप करना शुरु कर दिया तो मंत्री के समर्थकों ने उन्हों फोन पर गरियाना शुरु कर दिया। कुछ समर्थकों ने तो अफसर की माता बहिनों की सलामती की दुआ करते हुए कहा कि अब अच्छे से समझ लो ये कांग्रेस की सरकार है। यहां ना नुकुर की तो हम कांग्रेसी अपने नेताओं को भी नहीं छोड़ते,अफसरों की बिसात ही क्या है। अफसर को ये प्रेम भरा प्रस्ताव जल्दी समझ में आ गया और सारी नोटशीट एक ही झटके में आदेश बन गईं।

    सत्ता बदलते ही प्रशासन में आई इस तब्दीली से अफसर हक्के बक्के हैं वे मुख्यमंत्री से शिकायत नहीं कर सकते क्योंकि पद संभालते ही उन्होंने साफ कह दिया था कि किसी भी कार्यकर्ता का काम अटकना नहीं चाहिए। यदि मेरे पास शिकायत आएगी तो मैं उसे बख्शूंगा नहीं। अब ऐसे में भला कांग्रेस के शेरों पर लगाम लगाने का साहस भला कौन कर सकता है। लगभग अराजकता के दौर में प्रवेश कर चुकी प्रशासनिक व्यवस्था को देखकर अफसरों ने भी वेट एंड वाच की ही शैली अख्तियार कर ली है। एक आला अफसर ने कहा कि हम तो प्रदेश हित को ध्यान में रखकर व्यवस्था बनाने की कोशिश कर रहे थे। अब जब सरकार ही नहीं चाहती कि नियमों और कानूनों का पालन हो तो हम क्या कर सकते हैं।

    अटल बिहारी वाजपेयी इंस्टीट्यूट आफ गुड गवर्नेंस एंड पालिसी एनालिसिस के प्रशासन प्रबंधक ग्रुप केप्टन एचपी शर्मा कहते हैं कि कोई भी सरकार बदलती है तो प्रशासन उसकी नीतियों के साथ कदमताल करने की कोशिश करता है।धीरे धीरे जब सरकार और अफसरों की कार्यशैली में साम्य स्थापित हो जाता है तो प्रशासनिक व्यवस्था आकार ले लेती है। पिछली सरकार लंबे समय तक रही ऐसे में जाहिर है कि सरकार और अफसरों ने एक दूसरे की प्राथमिकताओं को समझ लिया था। अब नई सरकार के सामने चुनावी चुनौतियां भी हैं ऐसे में प्रशासन की शैली को स्थिर होने में थोड़ा वक्त लग सकता है।

    दरअसल पिछली भाजपा सरकार ने तो कार्यकर्ताओं को हितग्राहियों की सूची में शामिल कर दिया था। तबादलों और पोस्टिंग के लिए भाजपा संगठन की राय जरूर ली जाती थी लेकिन प्रशासनिक प्रक्रिया मंत्रिमंडल के सदस्य ही पूरी करते थे। इससे जहां विकेन्द्रित भ्रष्टाचार पर लगाम लग जाती थी वहीं प्रशासनिक आधार पर कसावट लाने में भी भाजपा सरकार सफल थी। यही वजह है कि खनिज, वाणिज्यकर, आबकारी, जैसे आय बढ़ाने वाले विभागों से सरकार ने खासा वित्त जुटाया जिससे उसे विकास कार्यों के लिए पर्याप्त धनराशि मिलती रही थी।

    मुख्यमंत्री कमलनाथ प्रदेश के वित्तीय प्रबंधन में कसावट लाकर विकास योजनाओं के लिए धन की व्यवस्था करने की बात कहते रहे हैं। उन्होंने मीडिया का बजट रोककर दो टूक कह दिया है कि मुझे अपनी छवि चमकाने की जरूरत नहीं है। हालांकि ये बात भी सही है कि दो लाख करोड़ के बजट में मीडिया पर खर्च की जाने वाली धनराशि सौ करोड़ भी नहीं होती है। जबकि सड़कों, फ्लाईओवर और अन्य योजनाओं पर खर्च की जाने वाली धनराशि हजारों करोड़ की होती है। इसके बावजूद मीडिया पर प्रहार करने से जनता को ये संदेश देने में सफलता मिल रही है कि सरकार वित्तीय प्रबंधन सुधार रही है।

    कांग्रेस के विभिन्न गुटों के बीच सत्ता की मलाई लूटने की जो होड़ इन दिनों पावर गेलरी में देखी जा रही है उससे तो साफ समझ में आता है कि कमलनाथ सरकार आगे चलकर गंभीर वित्तीय संकट का सामना करने की तैयारी कर रही है। आज जब प्रदेश के विकास के लिए संसाधन जुटाने की जरूरत है तब तबादलों और पोस्टिंग के धंधे को फलने फूलने का अवसर देकर नई सरकार अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है। जब सरकार के विभाग अपने वित्तीय लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पाएंगे तो वह अपनी नोटशीट पर कर्ज लेने की हैसियत भी खो देगी। प्रदेश के नागरिकों को निश्चित रूप से गहरे वित्तीय संकट का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा।