Month: January 2019

  • हिंदुस्तान की जमीन पर कलंक है बाबरी ढांचा बोले वसीम रिजवी

    हिंदुस्तान की जमीन पर कलंक है बाबरी ढांचा बोले वसीम रिजवी

    लखनऊ,(कुमार अभिषेक)।शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी ने एक फिर बाबरी मस्जिद को लेकर चौंकाने वाला बयान दिया है. वसीम रिजवी ने मुसलमानों से समझौते के मेज पर बैठकर इसे हिंदुओं को सौंपने की वकालत की है.

    वसीम रिजवी ने कहा कि उस कलंक को मस्जिद कहना गुनाहे अजीम है क्योंकि मस्जिद के नीचे की खुदाई 137 मजदूरों ने की थी जिसमें 52 मुसलमान थे. उस खुदाई के दौरान 50 मंदिर के स्तंभों के नीचे के भाग में ईंटों का बनाया गया चबूतरा भी मिला था.

    उन्होंने दावा किया कि खुदाई के दौरान मंदिर से जुड़े कुल 265 पुराने अवशेष मिले थे. इसी के आधार पर भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआई) इस निर्णय पर पहुंचा था कि ऊपरी सतह पर बनी बाबरी मस्जिद के नीचे एक मंदिर दबा हुआ है. सीधे तौर से माना जाए कि बाबरी इन मंदिरों को तोड़कर इनके मलबे पर बनाई गई है.

    बाबरी मस्जिद का निर्माण तोड़े गए मंदिरों के मलबे पर बनाए जाने को लेकर रिजवी ने कहा कि इसका उल्लेख केके मोहम्मद की किताब ‘मैं भारतीय हूं’ में भी किया गया है. ऐसी स्थिति में उस बाबरी कलंक को जायज मस्जिद कहना इस्लामिक सिद्धांतों के विपरीत है.

    उन्होंने आगे कहा कि अभी भी वक्त है लोग बाबरी मस्जिद से जुड़ें, अपने गुनाहों की तौबा करें और हजरत मोहम्मद के इस्लाम को मानें. आतंकी अबु बक्र, उमर की विचारधारा को छोड़ एक समझौते की मेज पर बैठकर हार जीत के बगैर राम का हक हिंदुओं को वापस करो और एक नई अमन की मस्जिद लखनऊ में जायज पैसों से बनाने की पहल करो

    इससे पहले शिया सेंट्रल बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी पूजा स्‍थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम-1991 को खत्म करने की मांग कर चुके हैं. रिजवी के मुताबिक, पूजा स्‍थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम के तहत विवादित मस्जिदें सुरक्षित की जा चुकी हैं. उन्हें हिंदुओं को सौंपने में मुश्किल होगी, इसलिए इसे खत्म किया जाए.

    रिजवी ने इस एक्ट को खत्म करने के साथ-साथ उन 9 मस्जिदों को जिन्हें मुगल काल में मंदिरों को तोड़कर बनाया गया था, जिसमें अयोध्या, काशी, मथुरा, कुतुब मीनार, सहित कुल 9 मस्जिदें बनी हैं. उन्हें वापस हिंदुओं को सौंपने की मांग कर चुके हैं.

    उनकी यह भी मांग की है कि एक स्पेशल कमेटी बनाकर अदालत की निगरानी में विवादित मस्जिदों के बारे में ठीक-ठीक जानकारी दी जाए. अगर यह सिद्ध हो जाता है कि यह हिंदुओं के धर्म स्थलों को तोड़कर बनाया गया है तो फिर उन्हें हिंदुओं को वापस किया जाए.

    रिजवी यहां तक कह चुके हैं कि अयोध्या में उस जगह पर कभी मस्जिद नहीं थी और वहां कभी मस्जिद नहीं हो सकती है. यह भगवान राम का जन्मस्थान है और वहां केवल राम मंदिर बनाया जाएगा. बाबर से सहानुभूति रखने वालों की नियति में हार है.

  • बीआरटीएस से दुश्मनी मतलब महंगा सौदा

    बीआरटीएस से दुश्मनी मतलब महंगा सौदा

    -आलोक सिंघई-

    सत्ता संभालते ही कमलनाथ सरकार के नगरीय प्रशासन मंत्री जयवर्धन सिंह ने भोपाल के बीआरटीएस को उखाड़ने की मुहिम चला दी है। संत हिरदाराम नगर के सिंधी व्यवसायियों से हाथ उठवाकर उन्होंने बताया कि लोग बीआरटीएस से परेशान हैं और चुनावी वादा निभाने के लिए उनकी सरकार इसे उखड़वा देगी।मंत्रीजी के पिता और पंद्रह सालों तक कांग्रेस के निर्वासन के जिम्मेदार दिग्विजय सिंह ने भी बेटे के सुर में सुर मिलाकर बीआरटीएस के विरोध में कानूनी सलाह मशविरा जुटाना शुरु कर दिया है। पूर्ववर्ती यूपीए की कांग्रेस नीत सरकार ने ही केन्द्र में रहते हुए बीआरटीएस बनवाने का प्रोजेक्ट शुरु किया था। जिसे बाद में मोदी सरकार ने जारी रखा और देश के कई बड़े शहरों में इसे आकार दिया गया। भाजपा जिस प्रोजेक्ट को जस का तस स्वीकार करती रही उससे आखिर मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार खफा क्यों है।इस पर गौर किया जाए तो एक बड़े षड़यंत्र का खुलासा होता है।

    बीआरटीएस की जरूरत शहरों में बढ़ते यातायात के मद्देनजर महसूस की गई थी।पूर्ववर्ती राजीवगांधी सरकार ने जिस तरह आधुनिकीकरण के नाम पर देश में कारों को बनाने और विदेशों में बनी कारों के आयात की अनुमति दी थी उसके दुष्परिणाम जल्दी ही देश के सामने आने लगे। शहरों में आयातित पेट्रोलियम आधारित कारों और दुपहिया वाहनों की बाढ़ आ गई। हर घर के हर सदस्य के लिए लोगों ने अलग वाहन खरीदने शुरु कर दिए। नतीजा ये हुआ कि सड़कों पर वाहनों के चलने की जगह कम पड़ने लगी। लगातार ट्रेफिक जाम से जनता को निजात दिलाने के लिए आनन फानन में सड़कों का चौड़ीकरण करना मजबूरी हो गई। ये परिवहन इसलिए मंहगा था क्योंकि तेल खरीदने के लिए हमें विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती थी। दिग्विजय सिंह की सरकार तो सड़क, बिजली और पानी के संकट से उपजे विरोध के कारण ही उखाड़ फेंकी गई थी।

    इसके बाद आई भाजपा सरकारों ने सड़क बिजली और पानी के लिए भारी कर्ज लेना शुरु कर दिया। उमा भारती की सरकार कर्ज लेने की इस मुहिम के खिलाफ थी। उसने पूंजी उत्पादन के पंच ज अभियान को बढ़ावा दिया था। जिसमें जन, जंगल, जल, जमीन व जानवर को बुनियादी सम्पदा मानते हुए इन तत्वों के प्रति लोगों को जागरूक बनाने का विशेष अभियान 15 मई, 2004 से 15 जून, 2004 तक चलाया गया। हालांकि इस बीच उमा भारती के विरुद्ध भाजपा के भीतर से ही मुहिम चलाई जाने लगी। उनके बाद मुख्यमंत्री बने बाबूलाल गौर ने राजीव गांधी की चलाई तमाम नीतियों को नए नामों से लागू करना शुरु कर दिया।इसमें गोकुल ग्राम योजना भी थी जिसे पूर्ववर्ती दिग्विजय सिंह सरकार की पंचायती राज योजना और उमा भारती की पंच ज अभियान को मिलाकर लागू किया जाना था। ग्यारह महीने की उनकी सरकार की इन योजनाओं का अंत तब हो गया जब स्वर्गीय प्रमोद महाजन ने आगे बढ़कर शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बनवा दिया। जोर जबरदस्ती से किए इस पदारोहण के बाद मध्यप्रदेश में विदेशी कर्ज आधारित योजनाओं को लागू करने का स्वर्णयुग आ गया। सड़कों, बिजली और पानी की योजनाओं के लिए भारी भरकम कर्ज लिए जाने लगे। भारी बहुमत होने के कारण इन योजनाओं को दना दन मंजूरियां भी मिलती गईं। भाजपा को ये बहुमत लगातार तीन कार्यकालों तक मिलता रहा। हर छोटा बड़ा प्रोजेक्ट विदेशी कर्ज लेकर चलाया जाता रहा। बीआरटीएस के लिए भी भोपाल नगर निगम को साढ़े तीन सौ करोड़ रुपए का कर्ज दिलाया गया। इससे शहर को एक सिरे से दूसरे सिरे तक जोडने वाले मुख्य़ मार्ग का चौड़ीकरण भी किया गया और उसके बीच आरक्षित मार्ग भी बनाया गया। सड़क के बीच बनने वाले इस मार्ग का विरोध भी किया गया। कई जगहों पर लोगों को सड़क पार करने के लिए लंबा रास्ता तय करना पड़ता था जिससे लोग सबसे ज्यादा परेशान हुए। इस प्रोजेक्ट में कई अंडरपास,फ्लाईओवर और ओवरहेड पाथ वे भी बनाए जाने थे,बजट की कमी के कारण ये नहीं बनाए जा सके। बैरागढ़ के बाजार में बीआरटीएस से मुख्य मार्ग के व्यापारियों का कारोबार भी प्रभावित हुआ इसकी वजह से वहां छुटपुट विरोध भी पनपा।

    बीआरटीएस की आज भले ही आलोचना की जाती हो लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में सार्वजनिक परिवहन को बढ़ाने का इससे अच्छा कोई दूसरा तरीका नहीं था। कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने सार्वजनिक परिवहन को बढ़ाने के लिए ही जवाहर लाल शहरी नवीनीकरण परियोजना के तहत लो फ्लोर बसें चलाई थीं। एक कंपनी बनाकर उसे कर्ज दिया गया और बसें शुरु की गईं। इसकी वजह शहरों का अनियंत्रित विकास था। पूर्ववर्ती कांग्रेस की सरकारों ने बहुमंजिला रहवासी प्रोजेक्ट मंजूर नहीं किये नतीजतन दूरदराज के खेतों को बिल्डरों ने कालोनी बनाकर बेचना शुरु कर दिया। इससे कांग्रेस को चंदा देने वाले बिल्डर तो मिले लेकिन शहरों की सीमाएं दूर दूर तक फैल गईं। इससे शहर के एक कोने में रहने वाले व्यक्ति को दूसरे सिरे पर मौजूद अपने दफ्तर, फैक्टरी या बाजार तक पहुंचना भारी मंहगा सौदा साबित होने लगा था। बीआरटीएस इस समस्या के समाधान में मील का पत्थर साबित हुआ। शहर में एंबुलेंस, फायर बिग्रेड, वीआईपी मूवमेंट, सुरक्षित और त्वरित गति से करने के लिए बीआरटीएस सफल साबित हुए। शिवराज सिंह सरकार ने यूपीए सरकार की तमाम योजनाओं को न केवल लागू किया बल्कि कर्ज आधारित विकास के कई नए आयाम भी गढ़े।

    शिवराज सिंह सरकार ने कर्ज लेकर बांटने के लिए नई नई योजनाएं शुरु कर दीं। प्रदेश की आय बढ़ाने में जुटे वित्तमंत्री राघवजी भाई को अनैतिकता के मामले में फंसाने और रास्ते से हटाने की मुहिम भी इसी का हिस्सा थी ताकि कर्ज लेने की जरूरत लगातार बनी रहे। इन योजनाओं से जनता तो प्रसन्न हुई ही साथ में शिवराज सिंह के सहयोगी भी मालामाल हो गए। सड़क निर्माण करने वाली कंपनी दिलीप बिल्डकान का टर्नओवर तो अरबों तक पहुंच गया। कांग्रेस के लिए इस विकास के मायाजाल को काटना बहुत मुश्किल हो गया था। सिंहस्थ के बाद मुख्यमंत्री या सरकार बदलने की मान्यता का सहारा लेकर इस बार कांग्रेस इस जाल को काटने में कामयाब साबित हुई है। कांग्रेस जानती है कि विकास नीति के इस स्वरूप की सबसे बड़ी कीमत दिग्विजय सिंह सरकार को ही चुकानी पड़ी थी।

    दिग्विजय सिंह ने व्यापमं कांड और अन्य प्रयासों से शिवराज सिंह सरकार पर खूब तंज कसे और उसे अपने इलाके के विकास कार्य जारी रखने पर मजबूर किया।इसके बावजूद वे सत्ता खोने के लिए कांग्रेस के भीतर खलनायक बने रहे। शिवराज के मायाजाल को काटने के लिए उन्होंने पैदल नर्मदा परिक्रमा कर डाली। कांग्रेस ने किसानों के बीच शिवराज सिंह की बढ़ती लोकप्रियता को काटने के लिए कर्जमाफी का दांव खेला और शिवराज की ही शक्ति से उन्हें पराजित कर डाला।

    अब कमलनाथ सरकार में जब दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्धन सिंह केबिनेट मंत्री बन गए हैं तब दिग्विजय सिंह अपनी पूर्ववर्ती सरकार का नाश करने वाली विदेशी कर्ज आधारित परियोजनाओं की परतें खोलने में जुट गए हैं। ये योजनाएं भारी भ्रष्टाचार की वजह भी बनीं थीं। प्रदेश पर कर्ज का भारी दबाव भी इनकी वजह से ही बढ़ा है। सरकार को हर महीने कर्ज के ब्याज के रूप में अपनी आय का बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता है। सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू हो जाने के बाद सरकार की चुनौतियां बढ़ी हैं। उसकी आय का बड़ा हिस्सा तो केवल वेतन भुगतान पर ही खर्च हो जाता है। बाकी पैसा ब्याज चुकाने में खर्च हो जाता है। ऐसे में सरकार उन योजनाओं की कलई उतारने में जुट गई है। बैरागढ़ में सिंधियों के आक्रोश की वजह कई हैं। बीआरटीएस भी उसमें एक छोटी वजह है। इसके बावजूद जयवर्धन सिंह उसे मुद्दा बनाकर बीआरटीएस खोदने की अपील कर रहे हैं। हालांकि इसके लिए अब लगभग सौ करोड़ रुपयों का खर्च आने की संभावना है। क्योंकि बीआरटीएस को खोदना फिर उस पूरे ढांचे को नया रूप देना पड़ेगा जिस पर सरकार ने कर्ज लिया है।इसके बावजूद कर्ज ली गई रकम पर ब्याज तो देना ही पड़ेगा। साथ में मूलधन भी चुकाना होगा। इसलिए बीआरटीएस का विरोध एक तरह से गलती पर गलती ही साबित होने जा रहा है।

    जाहिर है कि नए नवेले मंत्री जयवर्धन सिंह हों या अल्पमत के बीच विरोधी मानसिकता के दलों का सहारा लेकर सत्ता में आई कमलनाथ सरकार इस तरह के विरोधों से वह नए विवादों को ही जन्म दे रही है। वह अंतर्स्फूर्त विकास की नई परिभाषा साकार कर सकती है। उसे प्रदेश के विकास का अवसर मिला है।इस मौके को यदि वो झगड़ों झंझटों के बीच ही गंवा देगी तो ये एक राजनीतिक गलती साबित होगी। सरकार को चाहिए कि वो अपने कामकाज में पारदर्शिता लाए। सरकार के बजट की बारीकियों को सार्वजनिक करे। यदि वो भी विदेशी कर्ज आधारित विकास को लागू करने वाली सरकार है तब तो उसे इस तरह के विवादों को हवा देना आत्महंता कदम साबित होगा। जरूरत इस बात की है कि वो सार्वजनिक परिवहन के इस ढांचे को न केवल स्वीकार करे बल्कि इसे सफल बनाने की कोई जुगत भी निकाले ताकि बीआरटीएस में बसों के फेरे बढ़ाए जा सकें। नियमित अंतराल पर बसों की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके। इससे लोगों को निजी वाहनों से चलने की मजबूरी से निजात मिल सकेगी। उन्हें सस्ता परिवहन उपलब्ध कराया जा सकेगा। जो लोकप्रिय फैसला साबित होगा।

  • राजनैतिक मुकदमे वापस लेगी कमलनाथ सरकार

    राजनैतिक मुकदमे वापस लेगी कमलनाथ सरकार

    मंत्रि-परिषद के निर्णय 

    भोपाल,17 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)।मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ की अध्यक्षता में हुई मंत्रि-परिषद की बैठक में व्यापक लोकहित में आपराधिक प्रकरणों के प्रत्याहरण के लिए नयी प्रक्रिया अनुमोदित की गई है। अनुमोदित प्रक्रिया अनुसार प्रत्याहरण के लिए अब किसी भी आवेदक को राजधानी आने की आवश्यकता नहीं होगी। वह अपना आवेदन सीधे संबंधित जिले के जिलादण्डाधिकारी को प्रस्तुत कर सकेगा।इन आवेदनों की छानबीन के बाद ये मुकदमे सरकार वापस लेगी चाहे वे किसी भी राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं से संबंधित क्यों न हों।

    मंत्रिपरिषद की बैठक के बाद जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा और खेल उच्च शिक्षा मंत्री जीतू पटवारी ने कहा कि प्रकरणों के प्रत्याहरण के लिए जिला एवं राज्य स्तरीय समिति के गठन के साथ ही प्रकरण प्रत्याहरण की त्वरित कार्यवाही सुनिश्चित करने के लिए संचालक लोक अभियोजन को संयोजक एवं नोडल एजेंसी घोषित किया गया है। जिला स्तरीय समिति में जिलादण्डाधिकारी को अध्यक्ष, जिला पुलिस अधीक्षक को सदस्य और जिला लोक अभियोजन अधिकारी को सदस्य सचिव बनाया गया है।

    राज्य स्तरीय समिति में अपर मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव गृह विभाग, प्रमुख सचिव विधि एवं विधायी कार्य, पुलिस महानिदेशक और महाधिवक्ता अथवा उनके द्वारा नामांकित प्रतिनिधि सदस्य होंगे। संचालक लोक अभियोजन को समिति का संयोजक बनाया गया है। राज्य स्तरीय समिति प्रक्रिया के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए समय-समय पर अनुशंसा कर सकेगी। मंत्रि-परिषद की बैठक में जय किसान फसल ऋण माफी योजना के क्रियान्वयन की समीक्षा भी की गई।

    जीतू पटवारी ने कहा कि सरकार ने 31 मार्च 2018 तक बकाया प्रकरणों और 12 दिसंबर 2018 तक चुकाए गए प्रकरणों में भी कर्जमाफी का लाभ मिलेगा। उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य है कि अधिक से अधिक किसानों तक इस योजना का लाभ मिले।उन्होंने कहा कि प्रदेश के 55 लाख किसान इस योजना से लाभान्वित होंगे।उन्होंने बताया कि 90फीसदी किसानों से संबंधित जानकारियां कंप्यूटर में दर्ज है केवल 7 फीसदी किसानों की जानकारियां एकत्रित की जानी हैं।

  • महिला अपराध पर पुलिस ने बनाया एक्शन प्लान

    महिला अपराध पर पुलिस ने बनाया एक्शन प्लान

    अतिरिक्‍त पुलिस महानिदेशक महिला अपराध ने ऊर्जा डेस्‍क की समीक्षा बैठक ली

    भोपाल, 15 जनवरी 2019। अतिरिक्‍त पुलिस महानिदेशक महिला अपराध अन्‍वेष मंगलम ने वीडियो कॉन्‍फ्रेंसिंग के माध्‍यम से 12 जिलों के एसपी के साथ ऊर्जा (URJA-अर्जेन्‍ट रिलीफ फॉर जस्‍ट एक्‍शन) डेस्‍क की समीक्षा बैठक की। उन्‍होंने कहा कि महिला अपराधों के संबंध में ऊर्जा डेस्‍क महिला पीडि़ता की शिकायतों पर संवेदनशीलता एवं सहानुभूति के साथ कार्यवाही करें तथा उन्‍हें एहसास करायें कि वे सही स्‍थान पर आई हैं और उन्‍हें न्‍याय मिलेगा। किसी भी तरह से केवल खानापूर्ति न की जाए सिर्फ और सिर्फ सटीक कार्यवाही हो।

    श्री मंगलम ने सभी एसपी को निर्देशित किया कि ऊर्जा डेस्‍क के लिए आवश्‍यक संसाधन मुहैया करवाकर अधिकारी एवं कर्मचारियों की नियमित रूप से ड्यूटी लगाकर सही कार्यवाही के लिए सतत मॉनिटरिंग करें। ऊर्जा हेल्‍प डेस्‍क में कार्यरत सभी अधिकारी एवं कर्मचारियों को निर्धारित कार्यक्रम अनुसार प्राथमिकता के आधार पर प्रशिक्षण दिलाया जाए। ऊर्जा हेल्‍प डेस्‍क के लिए आवश्‍यक संसाधनों एवं अन्‍य जरूरतों के लिए पुलिस मुख्‍यालय की संबंधित शाखा को यथाशीघ्र मांग प्रेषित की जाए। उन्‍होंने कहा कि ऊर्जा डेस्‍क में समर्थ, संवेदनशील एवं कर्तव्‍यनिष्‍ठ अधिकारी/कर्मचारियों को रखा जाए। श्री मंगलम ने कहा कि स्‍थानीय सामाजिक, धार्मिक एवं अन्‍य संगठनों सहित ग्राम रक्षा समिति, आशा कार्यकर्ता, दीदी आदि के सहयोग से थानों के आसपास के अंचलों में महिला अपराधों के प्रति जागरुकता एवं ऊर्जा डेस्‍क के संबंध में जानकारी देने के लिए व्‍यापक एवं कारगर प्रयास किए जाएं। ऊर्जा डेस्‍क में आई महिला पीडि़ता की शिकायत सुनने के लिए हर समय अधिकारी/कर्मचारी मौजूद रहें। ऊर्जा डेस्‍क का माहौल ऐसा हो जिसमें पीडि़ता बेझिझक एवं निडर होकर अपनी बात रख सके सा‍थ ही उसे यह एहसास हो कि वह सही जगह आई है और उसे न्‍याय मिलेगा। ऊर्जा डेस्‍क स्‍टाफ वॉट्सअप ग्रुप से जुड़कर निर्देशों, सूचनाओं एवं अन्‍य किसी भी जानकारी का त्‍वरित आदान-प्रदान करें। उन्‍होंने कहा कि ऊर्जा डेस्‍क से संबंधित कार्यवाही गंभीर एवं सटीक हो इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं है। श्री मंगलम ने 12 जिलों के सभी एसपी से ऊर्जा हेल्‍प डेस्‍क के संबंध में एक-एक करके विस्‍तृत जानकारी ली एवं निर्देश दिए।

    उल्‍लेखनीय है कि पुलिस महानिदेशक श्री ऋषि कुमार शुक्‍ला ने माह सितंबर 2018 में जहांगीराबाद में ऊर्जा (अर्जेन्‍ट रिलीफ फॉर जस्‍ट एक्‍शन) डेस्‍क का शुभारंभ किया था।प्रदेश के 12 जिलों विदिशा, रतलाम, इंदौर, भोपाल, बैतूल, सिवनी, बालाघाट, रीवा, जबलपुर, पन्‍ना, मुरैना एवं ग्‍वालियर के 180 थानों में पीडि़त महिलाओं की शिकायतें एवं समस्‍याएं सुनने के लिए तीन श्रेणियों में ऊर्जा हेल्‍प डेस्‍क स्‍थापित किए गए हैं। प्रथम वर्ष इन 180 थानों में ऊर्जा डेस्‍क के कार्य करने के बाद प्राप्‍त हुए वैज्ञानिक डेटा के आधार पर महिला अपराधों एवं अपराध पीडि़ताओं के बचाव के लिए आगे की नीति एवं कार्यवाही की योजना बनाई जाएगी। इस अवसर पर सहायक पुलिस महानिरीक्षक श्रीमती शालिनी दीक्षित, सुश्री इमरीन शाह, श्री एम.एस.मुजाल्‍दे, श्री मलय जैन, एवं रिसर्च टीम के सदस्‍य उपस्थित थे।

  • वंचितों को सक्षम बना रही मोदी सरकार : कृष्णा राज

    वंचितों को सक्षम बना रही मोदी सरकार : कृष्णा राज


    केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री ने दी अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अधिवेशन की जानकारी

    भोपाल16 जनवरी,(प्रेस सूचना केन्द्र)। समाज के वंचित तबके को कांग्रेस की सरकारें वोट बैंक समझती रहीं। इसलिए यह तबका आज भी पिछड़ा हुआ है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की सरकार इस वर्ग को सक्षम बनाने और उन्हें उनके मूलभूत अधिकार प्रदान करने का काम कर रही है। यह बात बुधवार को केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री श्रीमती कृष्णा राज ने पत्रकारों से चर्चा करते हुए कही। उन्होंने नागपुर में होने वाले अनुसूचित जाति मोर्चा के दो दिवसीय सम्मेलन की जानकारी भी दी।
    भाजपा सरकार ने ली वंचितों की सुध
    केंद्रीय राज्यमंत्री श्रीमती कृष्णा राज ने कहा कि कांग्रेस की सरकारों ने देश पर 70 सालों तक राज किया। इस दौरान ये सरकारें वंचित वर्ग को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करती रही, लेकिन उनकी दयनीय स्थिति को सुधारने के लिए कुछ नहीं किया। 2014 में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनने के बाद सरकार ने इस वर्ग के लिए वास्तविक प्रयास शुरू किए। प्रधानंमत्री श्री मोदी ने डॉ. अम्बेडकर की सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय भावना को मजबूत करने के लिए काम शुरू किया। उन्होंने संसद का विशेष सत्र भी बुलाया और अपने साढ़े चार वर्षों के कार्यकाल में गरीब और वंचित वर्ग को सक्षम बनाने, उनके अधिकार दिलाने के लिए कई योजनाएं शुरू कीं।
    कांग्रेस वोट लेती रही, नहीं किए प्रयास
    श्रीमती कृष्णा राज ने कहा कि आजादी के बाद कांग्रेस लंबे समय तक अनुसूचित जाति वर्ग के वोट लेती रही, लेकिन इन सालों में अनुसूचित जाति वर्ग का सामाजिक और आर्थिक उत्थान नगण्य रहा। बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के जीवन से जुड़े पांच स्थानों को पंचतीर्थ का दर्जा देने वाली प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने गरीबों और वंचितों को वास्तविक लाभ पहुंचाने के लिए योजनाएं शुरू कीं। उन्होंने कहा कि सबका साथ-सबका विकास की नीति पर चलने वाली मोदी सरकार ने किसी जातिगत आधार पर योजनाएं भले ही न बनाई हों, लेकिन गरीबों के लिए शुरू की उनकी योजनाओं से लाभान्वित होने वाले लोगों में बड़ी संख्या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों की ही हैं। उन्होंने कहा कि चाहे प्रधानमंत्री आवास योजना हो, उज्जवला योजना हो या आयुष्मान भारत योजना हो, सभी का लाभ हमारे अनुसूचित जाति वर्ग के लोग भरपूर ले रहे हैं।
    किसानों की समस्याओं का स्थायी हल खोज रही सरकार
    केन्द्रीय कृषि राज्यमंत्री श्रीमती कृष्णा राज ने कहा कि देश का किसान कर्ज से दबा है। लेकिन कांग्रेस की सरकारें समस्या को समझने की बजाय भटकाने की नीति पर चलती रहीं। उनकी समस्याओं को समझते हुए प्रधानमंत्री श्री मोदी की सरकार ने किसानों के लिए मृदा परीक्षण योजना, प्रधानमंत्री सिंचाई योजना आदि लागू की।
    इसके अलावा वर्ष 2022 तक देश के किसानों की आय को दोगुना करने की नीति पर चलते हुए मोदी सरकार ने स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट से भी अधिक करते हुए किसानों को उनकी लागत का डेढ़ गुना समर्थन मूल्य दिलाने का काम किया है। श्रीमती राज ने कहा कि हमारी सरकार सबको साथ लेकर देश का निर्माण करने की नीति पर चल रही है। देश में अब वोट बैंक की राजनीति नहीं चलेगी और आने वाले लोकसभा चुनाव में भी प्रचंड बहुमत के साथ प्रधानमंत्री श्री मोदी के नेतृत्व में एनडीए की ही सरकार बनेगी।
    राष्ट्रीय अधिवेशन में होगी समस्याओं पर चर्चा
    श्रीमती कृष्णा राज ने कहा कि अनुसूचित जाति वर्ग की समस्याओं और इस वर्ग के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों पर चर्चा के लिए भारतीय जनता पार्टी अनुसूचित जाति मोर्चा का दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन नागपुर में आयोजित किया जा रहा है। 19 और 20 जनवरी को आयोजित किए जा रहे इस अधिवेशन में मोर्चें के प्रदेश पदाधिकारी, कार्यसमिति सदस्य, जिला अध्यक्ष और महामंत्री भाग लेंगे। उन्होंने बताया कि इस अधिवेशन में करीब 10 हजार प्रतिभागियों के भाग लेने की संभावना है। इस दौरान श्रीमती कृष्णा राज के साथ वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मंत्री श्री लालसिंह आर्य एवं अजा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष श्री सूरज केरो, श्री मुकेश टटवाल उपस्थित थे।

  • 55 लाख किसानों का 50 हजार करोड़ का फसल ऋण होगा माफ

    55 लाख किसानों का 50 हजार करोड़ का फसल ऋण होगा माफ

    भोपाल,15 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र) मुख्यमंत्री कमल नाथ ने कहा है कि किसानों को मजबूत किये बिना मध्यप्रदेश की कृषि आधारित अर्थ-व्यवस्था मजबूत नहीं हो सकती। कृषि क्षेत्र अर्थ-व्यवस्था की नींव है। आज यहां ‘जय किसान फसल ऋण माफी योजना” का शुभारंभ करते हुए उन्होंने कहा कि इस योजना से प्रदेश के 55 लाख किसानों को ऋण माफी का लाभ मिलेगा। इन किसानों के 50 हजार करोड़ रूपये के फसल ऋण माफ हो जायेंगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह योजना मध्यप्रदेश के इतिहास में मील का पत्थर साबित होगी।

    श्री कमल नाथ ने स्थानीय पलाश होटल परिसर से योजना की शुरूआत की। इसके साथ ही पूरे प्रदेश में ऋण माफी की प्रक्रिया शुरू हो गई है। उन्होंने प्रतीक स्वरूप दस किसानों से ऋण मुक्ति आवेदन भरवाये और प्राप्त किये। आगामी पांच फरवरी तक पूरे प्रदेश में यह प्रक्रिया पूरी हो जायेगी।

    किसानों को मजबूती देगी योजना

    मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ ने कहा कि ‘जय किसान फसल ऋण माफी योजना” किसानों को आर्थिक रूप से मजबूती देने वाली योजना है। यह योजना कर्ज से जूझ रहे किसानों के लिये उपहार नहीं बल्कि कृषि क्षेत्र में बड़ा निवेश है । उन्होंने कहा कि कृषि आधारित अर्थ-व्यवस्था में जब तक किसान मजबूत नहीं होगा, तब तक प्रदेश आगे नहीं बढ़ सकता। मुख्यमंत्री ने जय किसान फसल ऋण माफी योजना के क्रियान्वयन से जुड़े सभी  अधिकारियों को भी धन्यवाद दिया ।

    जल्द शुरू होगा निवेश आने का सिलसिला

    मुख्यमंत्री ने कहा कि विगत दो दशकों में किसानों के बच्चे भी पढ़ लिख कर आगे आये हैं। इंजीनियर बने हैं। उनके लिए रोजगार की व्यवस्था करना होगा। युवाओं के लिये रोजगार निर्माण पर ज्यादा ध्यान दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि निवेश आने से रोजगार का निर्माण होता है और विश्वास से ही निवेश आता है । निवेश आए बिना रोजगार के अवसर पैदा करना संभव नहीं है । उन्होंने कहा कि जल्दी ही प्रदेश में निवेश आने का सिलसिला शुरू होगा।

    किसानों की मेहनत को समर्पित योजना

    मुख्यमंत्री ने कहा कि कि बाजारों में रौनक तभी होगी, जब किसानों की क्रय शक्ति मजबूत होगी। उन्होंने कहा कि यह योजना किसानों की मेहनत को समर्पित है। उन्होंने कहा कि किसान कर्ज में जन्म लेता है, कर्ज में जीता है और कर्ज में उसका अंत होता है। यह स्थिति ठीक नहीं है। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार किसानों को मजबूत करेगी।

    बजट की चिंता न करें विरोधी दल

    श्री कमल नाथ ने भाजपा द्वारा सरकार की स्थिरता और योजना के लिये बजट उपलब्‍धता पर व्यक्त की जा रही शंकाओं का स्पष्ट जवाब देते हुए कहा कि भाजपा को बजट की चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है।  उन्होंने कहा कि जो लोग वक्तव्य दे रहे हैं, वे खुद नहीं जानते कि बजट क्या होता है।

    प्रदेश की अपनी निवेश नीति होगी

    मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ ने कहा कि मध्यप्रदेश को निवेश के क्षेत्र में प्रतियोगी राज्य बनाना है । उन्होंने कहा कि अन्य राज्यों की तरह मध्यप्रदेश को भौगोलिक लाभ नहीं मिला है। इसलिए प्रदेश की अपनी नीति बनाना होगा।

    जनसंपर्क मंत्री श्री पी. सी. शर्मा ने कहा कि सरकार का शुरूआती एक घंटे में ही किसानों की कर्ज माफी का फैसला ऐतिहासिक कदम है। उन्होंने कहा कि लाखों किसान मुख्यमंत्री के प्रति आभार व्यक्त कर रहे हैं। कार्यक्रम में विधायक श्री आरिफ मसूद और किसान संघों के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

  • गांधी भवन में स्वास्थ्य शिविर

    गांधी भवन में स्वास्थ्य शिविर

    भोपाल,16 जनवरी(निज प्रतिनिधि)। श्यामला हिल्स स्थित गांधी भवन में निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर लगाया गया है। महाराष्ट्र के वर्धा में त्रिवेणी चैतन्यम ट्रस्ट के संस्थापक डॉ. सतीश सावरकर यहां 16 से 22 जनवरी तक ह्दय और डायबिटीज जैसे दुःसाध्य रोगों का इलाज करेंगे।यह चिकित्सा पूर्णतः अहिंसावादी और गांधीवादी नजरिए से की जाएगी। इस शिविर स्वास्थ्य के मौलिक सिद्धांतों को सिखाया जाएगा जिनसे बगैर गोली या दवा के स्वस्थ रहने के रहस्य बताए जाएंगे। इस संबंध में आज गांधी भवन न्यास के सचिव दयाराम नामदेव, गोविंद भूतड़ा,सी.पी.शर्मा,डॉ.एस.के.जैन ने पत्रकार वार्ता में चिकित्सा के तरीकों की जानकारी दी।

    श्री गोविंद भूतड़ा ने बताया कि इस शिविर में भोजन और निवास की व्यवस्था भी रहेगी। प्रदेश के कई जिलों से आने वाले रोगियों और जिज्ञासुओं को शिविर में गांधीवादी तरीकों से उपचार की जानकारियां दी जाएंगी। इस सरल उपचार पद्धति से ऐसे गंभीर रोगों का इलाज किया जाएगा जिन्हें आधुनिक मंहगी चिकित्सा पद्धति भी उपचार नहीं कर पाई है। डॉ.सतीश सावरकर देश के जाने माने साईको न्यूरोबिक विशेषज्ञ हैं। देश के कई जाने माने प्रतिष्ठान उनकी सेवाओं का लाभ लेते हैं। वे हृदय के ब्लाकेज, निराशा, दमा, पाचन विकारों,गठिया,थायराईड, एलर्जी,स्मरण शक्ति की कमी जैसे जटिल रोगों का निःशुल्क उपचार करेंगे।

    प्रेस वार्ता में वरिष्ठ पत्रकार विपिन शर्मा ने बताया कि यह शिविर सशुल्क है और इसमें शामिल होने के लिए पहले बुकिंग करानी होगी। चिकित्सा और उपचार मुफ्त किया जाएगा।

  • देश की सांस्कृतिक पहचान बनेगा मध्यप्रदेशःडॉ.साधौ

    देश की सांस्कृतिक पहचान बनेगा मध्यप्रदेशःडॉ.साधौ

    संस्कृति मंत्री डाक्टर विजय लक्ष्मी साधौ से मिलने मंत्रालय पहुंचे प्रहलाद सिंह टिपानिया जनकवि कबीर के भजन गायक हैं। प्रह्लाद जी पहले शिक्षक थे। वर्ष2011 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया था।

    मध्यप्रदेश की साझी विरासत को संवारेगा संस्कृति विभाग
    भोपाल,12 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। देश का हृदय प्रदेश कई संस्कृतियों का संगम स्थल है। यहां देश दुनिया की कई विचारधाराएं सामाजिक समरसता स्थापित करती हैं। पिछली सरकार धार्मिक कट्टरता के आधार पर प्रदेश को चलाने का प्रयास करती रही। इसकी वजह से कुछ लोगों ने सरकारी व्यवस्था पर कब्जा जमा लिया था। नई सरकार सभी संस्कृतियों का सम्मान करती है, हम प्रदेश की पहचान भी इसी तरह कायम करेंगे। मैं स्वयं कबीरपंथी हूं,सरकार ने मुझे संस्कृति विभाग का जिम्मा दिया है। पहले भी संस्कृति मंत्री रहते हुए मैं बेहतरीन आयोजनों से प्रदेश का गौरव बढ़ा चुकी हूं। इस बार संस्कृति विभाग जन जन की अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा। ये विचार कमलनाथ सरकार की संस्कृति मंत्री डाक्टर विजय लक्ष्मी साधो ने कार्यभार संभालने के बाद विशेष मुलाकात में कही।

    मध्यप्रदेश की संस्कृति, चिकित्सा शिक्षा और आयुष विभाग की मंत्री डाक्टर विजय लक्ष्मी साधौ ने कार्यभार संभालने के बाद विभाग की समीक्षा शुरु की है। संबंधित अधिकारियों से पिछली सरकार के कार्यकाल के दौरान किए गए सांस्कृतिक आयोजनों का ब्यौरा मांगा है। चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि अब तक जो जानकारियां सामने आई हैं उनके आधार पर कहा जा सकता है कि प्रदेश की संस्कृति को संवारने के नाम पर चंद लोगों ने पूरे बजट पर कब्जा कर रखा था। उन्हीं के परिजनों को आयोजनों से जुड़ी जवाबदारियां दी जाती रहीं हैं। हम किसी पंथ परंपरा को थोपे जाने के पक्षधर नहीं हैं। हमारी कोशिश होगी कि मध्यप्रदेश की साझी विरासत को उभारें ताकि देश दुनिया में प्रदेश की पहचान समृद्ध विरासत वाले प्रदेश के रूप में स्थापित हो।

    डाक्टर विजय लक्ष्मी साधौ ने बताया कि पूर्ववर्ती दिग्विजय सिंह की जिस सरकार में उन्हें संस्कृति विभाग की जवाबदारी दी गई थी तब मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों एक ही राज्य हुआ करते थे। तब हमने बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को उभारने वाले कई आयोजन किए थे। खजुराहो उत्सव, नदी किनारे होने वाले महेश्वर उत्सव से प्रदेश का मान बढ़ाया था। हमारे दौर में सिंधी, उर्दू अकादमी फल फूल रहीं थीं। विभिन्न संस्कृतियों के बीच मेलजोल बढ़ाने के लिए हम श्रीलंका के कलाकारों को भी आमंत्रित करते थे। अभी सांची के बौद्ध विश्विद्यालय को जानने का अवसर मिला वहां चंद लोगों ने पूरी व्यवस्था को अपने हाथों में कैद कर रखा है। ऐसे माहौल में हमें विभाग को ज्यादा जनोन्मुखी बनाने की जरूरत है।

    उन्होंने कहा कि स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी की प्रेरणा से भोपाल में स्थापित भारत भवन का उद्देश्य कला और संस्कृति पर अनुसंधान करके भारत की संस्कृति को समृद्ध बनाना रहा है। उसमें कई अलग अलग विचारधाराओं का हस्तक्षेप भी होता था इसके बावजूद कई मानदंड स्थापित किए गए। आज उसका स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। नई सरकार मध्यप्रदेश की साझी संस्कृतियों का जो गुलदस्ता प्रस्तुत करेगी उससे देश दुनिया में प्रदेश का मान बढ़ेगा।

  • भाजपा के ट्रेप में फंसी कांग्रेस

    भाजपा के ट्रेप में फंसी कांग्रेस

    लंगड़ी सरकार की छवि से बाहर निकलने के लिए कांग्रेस ने विधानसभा में अपना अध्यक्ष बनाकर जीत का उद्घोष करने में सफलता पाई है। इसी उत्साह के माहौल में उसने अपना उपाध्यक्ष भी बनाकर अपनी पीठ थपथपाई है। कांग्रेस के आम कार्यकर्ता से लेकर मुख्यमंत्री कमलनाथ तक इसे अपनी जीत बता रहे हैं।ऊपरी तौर पर ये नजर भी आ रहा है। सरकार की जी हुजूरी में लगा मीडिया भी इसे सरकार की जीत बता रहा है। इसके बावजूद राजनीतिक पंडितों का कहना है कि ये फैसला वास्तव में कांग्रेस को भाजपा के राजनीतिक जाल में फंसाने वाला साबित होने जा रहा है। भाजपा का स्थानीय नेतृत्व अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव परंपरागत रूप से करने का ही पक्षधर था। बाद में भाजपा हाईकमान की ओर से कहा गया कि अपनी ओर से अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के नाम घोषित किए जाएं। पार्टी की ओर से अध्यक्ष के रूप में आदिवासी नेता विजय शाह का नाम प्रस्तुत किया गया। उपाध्यक्ष के रूप में जगदीश देवड़ा का नाम प्रस्तुत किया गया। कांग्रेस ने व्हिप जारी किया और अपने सभी सदस्यों को विधानसभा में हाजिर रहने के निर्देश दिए गए। सचिवालय को दी गई सूचना न पढ़े जाने को मुद्दा बनाकर भाजपा ने सदन से वाकआऊट कर दिया। नतीजतन कांग्रेस ने एक पक्षीय वोटिंग कराई और एनपी प्रजापति को 120 मतों से विजयी घोषित कर दिया। भाजपा के नेताओं का कहना था कि यदि सदन में गुप्त मतदान कराया जाता तो कांग्रेस का प्रत्याशी चुनाव नहीं जीत सकता था। हालांकि ऐसी कोई परंपरा पहले कभी नहीं रही है कि गुप्त मतदान कराया जाता। भाजपा को भी वोटिंग नहीं करानी थी उसे तो बस केवल रायता फैलाना था। जीत के उल्लास में कांग्रेस ने भाजपा की रणनीति को समझने का कोई प्रयास नहीं किया। अगले दिन भाजपा ने उपाध्यक्ष के लिए भी अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। फिर वही कहानी दुहराई गई। चार सदस्यों ने सुश्री हिना कांवरे को उपाध्यक्ष बनाने के लिए नाम प्रस्तावित किया जबकि एक सदस्य ने भाजपा के जगदीश देवड़ा का नाम प्रस्तावित किया।ये प्रस्ताव विधिवत था और समर्थक भी मौजूद था। इसके बावजूद अध्यक्ष की आसंदी पर विराजमान एनपी प्रजापति ने पहले तो पूरे नाम नहीं पढ़े लेकिन जब नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने अनुरोध किया कि वे पूरे नाम पढ़ें अन्यथा उनके प्रत्याशी का नाम सदन के रिकार्ड में नहीं आएगा। इसके बाद अध्यक्ष ने जगदीश देवड़ा का नाम भी पढ़ दिया। इसके बाद विपक्ष के सदस्य नारेबाजी करते रहे और इसी बीच उपाध्यक्ष पद पर हिना कांवरे को विजयी घोषित कर दिया गया। कांग्रेस ने जो तैयारी की थी उसके बीच यही होना भी था। यदि विधिवत चुनाव होता तो भी कांग्रेस अपने प्रत्याशी को जिताने की पूरी कोशिश करती क्योंकि इससे उसे विश्वास मत की पुष्टि भी करनी थी। भाजपा को इस प्रक्रिया में चुनौती देनी भी नहीं थी उसे तो केवल सरकार और उसके प्रतिनिधियों के बीच अविश्वास जताना था। पिछले कार्यकालों में वह भी कमोबेश ऐसा ही करती रही थी। उसने हर बार मनमर्जी से सदन चलाया क्योंकि उसे स्पष्ट बहुमत प्राप्त था। इस बार उसे पता था कि संख्याबल उसके पास नहीं है।यदि वो तोड़फोड़ का प्रयास करती तो उसे इसकी बहुत मंहगी कीमत चुकानी पड़ती। जनता के बीच भी संदेश जाता कि भाजपा जनमत को मानने तैयार नहीं है।पिछले सालों में भाजपा ने बाकायदा कांग्रेस को उपाध्यक्ष पद देकर विपक्ष को अपने साथ चलने के लिए तैयार किया था। उसे मालूम है कि उपाध्यक्ष जैसे पद का कोई औचित्य नहीं है।यदि वो उपाध्यक्ष पद कृपा से भी स्वीकार कर लेती तो उसे सदन में अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करने की मजबूरी से बंध जाना पड़ता।अब वह सदन को चलाने की जवाबदारी से मुक्त है। वहीं कांग्रेस के नेतागण बार बार सफाई देकर कह रहे हैं कि भाजपा ने उसे चुनाव के लिए मजबूर किया हम तो परंपरा का पालन करना चाहते थे। जबकि हकीकत ये है कि कांग्रेस जाने अनजाने भाजपा के बिछाए जाल में फंस गई है। भाजपा तो झगड़ा करना ही चाहती थी। फिर ये किसने कह दिया कि चुनाव करवाने से कोई बुरा काम हो गया। चुनाव ने तो कांग्रेस के स्पष्टमत की पुष्टि ही की है। जो बात राज्यपाल महोदया के समक्ष कांग्रेस ने प्रमाणित की थी वही बात सदन में उसने दुहराई है। इसके बावजूद कांग्रेस ने अनजाने में बड़ी पराजय को गले लगा लिया है। यदि सदन विधिवत चलता तो कांग्रेस अपनी नीतियों पर विपक्ष की मुहर भी लगवा सकती थी। आलोचना के साथ ही सही पर वो अपनी नीतियों को लोकतांत्रिक जामा पहना सकती थी। अब ऐसा होना संभव नहीं दिखता। सदन का पहला सत्र ही कांग्रेस सुचारू रूप से नहीं चला पाई। ये जवाबदारी सरकार की होती है। विपक्ष का तो काम ही हो हल्ला मचाना है। ये जवाबदारी सरकार की थी कि वो विपक्ष को कैसे अपने साथ लेकर चले। यदि कांग्रेस बड़ा दिल करके भाजपा को उपाध्यक्ष देकर परंपरा का पालन करती तो भाजपा के सामने मजबूरी थी कि वो सदन को चलाने में सहयोग करे। भाजपा ये चाहती भी नहीं थी और कांग्रेस ने उसकी मांगी मुराद पूरी कर दी। अब यदि ये टकराव आने वाले समय में और बढ़ता है तो भाजपा उसी तरह असहयोग आंदोलन शुरु कर देगी जिस तरह से आजादी के संग्राम के दौरान महात्मा गांधी असहयोग आंदोलन का आव्हान करते थे।मध्यप्रदेश में सरकारी तंत्र का बोझ बहुत भारी हो चुका है। हर महीने सरकार को तीन हजार दो सौ करोड़ रुपए तो मात्र वेतन भत्तों के लिए जुटाने पड़ते हैं। कर्ज ली गई रकम का ब्याज अलग से भुगतना पड़ता है। विकास कार्यों के लिए भी भारी धनराशि की जरूरत पड़ती है। कर्जमाफी, बिजली बिल हाफ जैसी लोकप्रियता आधारित योजनाओं का दंड भी सरकारों को भुगतना पड़ता है। ऐसे में कमलनाथ सरकार के सामने चुनौती है कि वो सरकारी कामकाज को शांतिपूर्वक निपटाए। यदि सरकार रोज रोज नेतागिरी करके थोथी जीत के नशे की आदी हो जाएगी तो उसे सरकार चलाने लायक धनराशि जुटाना भी कठिन हो जाएगा। दरअसल कांग्रेस के नेतागण पिछली सरकारों के समान ही राजनीतिक व्यवस्था की आदत से बाहर नहीं आ पाए हैं। पहले केन्द्र की ओर से अनुदान मिल जाता था या कुछ योजनाओं को शत प्रतिशत तक मदद मिल जाती थी। जीएसटी लागू होने के बाद ये परिपाटी बदल गई है। अब राज्यों को टैक्स कलेक्शन करना होता है और उसे अनुपातिक धनराशि केन्द्र से वापस मिल जाती है। ऐसे स्थिति में यदि राज्य सरकार का टैक्स कलेक्शन घटेगा तो उसे वित्तीय संकट का सामना करना पड़ेगा। यदि जनता ने असहयोग कर दिया और टैक्स कलेक्शन में सरकार को टकराव का सामना करना पड़ा तो उसे उपहार में केवल बदनामी हाथ लगेगी।वित्तीय संकट बढ़ेगा को अलग। भाजपा के रणनीतिकार कांग्रेस को उसी दिशा में धकेल रहे हैं।कांग्रेस के नेतागण समझ लें कि यदि उन्होंने टकराव की नीति जारी रखी तो वो अपनी सरकार को सफल बनाकर जनता का दिल नहीं जीत पाएंगे। उम्मीद है कि भविष्य में कांग्रेस जीत के हैंगओवर से बाहर आएगी और टकराव की नीति छोड़कर प्रदेश के विकास की नींव रखेगी।

  • उपाध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने फिर किया जीत का उद्घोष

    उपाध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने फिर किया जीत का उद्घोष

    मध्यप्रदेश में नई सरकार के गठन के बाद पहला सत्र आज शोरशराबे की भेंट चढ़ गया। कमलनाथ सरकार ने इसी शोरगुल के बीच बाईस हजार करोड़ से अधिक का बजट पारित करवा लिया।विपक्ष की नारेबाजी और धरने के बीच सदन के समापन की घोषणा भी कर दी गई। सदन के समवेत होते ही पूर्व मुख्यमँत्री शिवराज सिंह चौहान ने कल राज्यसभा में पारित सवर्ण गरीबों को आरक्षण के विधेयक पर धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया। उन्होंने इस विधेयक को क्रांतिकारी बताते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अभिनंदन किया। विपक्षी सदस्यों ने मेजें थपथपाकर इसका समर्थन किया। इस बीच सत्ता पक्ष की ओर से कई सदस्यों ने विधेयक को राजनीतिक कदम बताते हुए कहा कि आगामी लोकसभा चुनावों को देखते हुए मोदी सरकार ने ये विधेयक प्रस्तुत किया था। इस बीच अध्यक्ष नर्मदा प्रसाद प्रजापति ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री यदि इस बात को उठाने से पहले सचिवालय को सूचना दे देते और अनुमति प्राप्त कर लेते तो अच्छा था। इस तरह से बीच में बोलने से नए सदस्यों पर गलत असर पड़ता है। इसके जवाब में जावरा से भाजपा विधायक राजेन्द्र पांडेय ने आसंदी पर सवाल उठाते हुए कहा कि नियम तोड़ने की शुरुआत आसंदी की ओर से पहले ही दिन हो गई थी।उपाध्यक्ष के चुनाव में भी इसी तरह सदन की मान्य परंपराओं और नियमों को ताक पर रख दिया गया। इस पर सत्ता पक्ष की ओर से कहा गया कि ये आसंदी का अपमान है। इस बीच अध्यक्ष एनपी प्रजापति ने कहा कि जब अध्यक्ष खड़े हों तब माननीय सदस्यगण बैठे रहें और अध्यक्ष की बात सुनें। इस बीच नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने कहा कि आसंदी की ओर से यदि उपाध्यक्ष निर्वाचन के संबंध में प्राप्त सूचनाएं पढ़ी नहीं जाएंगी तो वो केवल कागज का टुकड़ा ही रहेंगी। पांचों को एक साथ पढ़ा जाए और सदन से उसका अनुमोदन लिया जाए। अध्यक्ष के निर्वाचन में भी इसी प्रकार चार सूचनाएं पढ़कर कार्रवाई आगे बढ़ा दी गईं थी। इस पर आसंदी की ओर से उपाध्यक्ष के निर्वाचन के संबंध में प्राप्त पांचों सूचनाओं का पाठन किया गया। उन्होंने पांचीलाल मेढ़ा को अपना प्रस्ताव प्रस्तुत करने की अनुमति प्रदान की। जिसमें उन्होंने सुश्री हिना लिखीराम कांवरे को विधानसभा का उपाध्यक्ष चुने जाने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया। संसदीय कार्यमंत्री डाक्टर गोविंद सिंह ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। अध्यक्ष ने बताया कि सुश्री हिना लिखीराम कांवरे के लिए इसी प्रकार के प्रस्ताव विधानसभा सदस्य प्रताप ग्रेवाल, पीसी शर्मा, राजेश शुक्ला की ओर से भी प्रस्तुत किए गए हैं।एक अन्य प्रस्ताव नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव की ओर से जगदीश देवड़ा के लिए प्रस्तुत किया गया है। इस प्रस्ताव का समर्थन डाक्टर सीतासरन शर्मा ने किया है। इस बीच उन्होंने सदन से उपाध्यक्ष के निर्वाचन करने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि सुश्री हिना लिखीराम कांवरे को उपाध्यक्ष बनाए जाने पर सदन सहमत है। इसके जवाब में सत्तापक्ष के सदस्यों ने हाथ उठाकर समवेत स्वर में प्रस्ताव का समर्थन किया।अध्यक्ष ने इसके साथ ही उपाध्यक्ष के नाम निर्वाचन की घोषणा कर दी। जब ये प्रक्रिया चल रही थी तब पूर्व विधानसभा अध्यक्ष डाक्टर सीतासरन शर्मा ने प्वाईंट आफ आर्डर उठाते हुए अपनी बात कहने का समय मांगा। इस पर अध्यक्ष श्री एनपी प्रजापति ने कहा कि चुनाव की प्रक्रिया शुरु हो चुकी है ऐसे में प्वाईंट आफ आर्डर का कोई अर्थ नहीं और हम इसकी अनुमति नहीं देते हैं। उपाध्यक्ष के नाम की घोषणा के विरोध में विपक्ष के सदस्य गर्भगृह में आने लगे। इस पर अध्यक्ष ने सदस्यों से गर्भगृह में न आने का अनुरोध किया। नेता प्रतिपक्ष ने इस पर आपत्ति की। उन्होंने कहा कि ये आसंदी की तानाशाही है और ये नहीं चलेगी।ऐसे तो सदन नहीं चल सकता। आसंदी की ओर से विपक्ष को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। इस बीच पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आसंदी की ओर इशारा करते हुए अध्यक्ष से कहा कि आप निष्पक्ष नहीं हैं। हमें न्याय नहीं मिल सकता। इस पर शोरगुल बढ़ने लगा और अध्यक्ष ने सदन को दस मिनिट के लिए स्थगित करने की घोषणा कर दी। एक बार फिर जब सदन समवेत हुआ तो अध्यक्ष ने कहा कि मैंने नेता प्रतिपक्ष की बात सुनने के बाद ही कार्यवाही आगे बढ़ाई थी। इस पर नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि आसंदी से सत्य वचन किया जाए। पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष की ही बात सदन में नहीं सुनी जा रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई जिसे अध्यक्ष ने सदन की कार्यवाही से विलोपित करवा दिया। अध्यक्ष ने कहा कि कौल शकधर की किताब में साफ लिखा है कि चुनाव की प्रक्रिया शुरु हो जाने के बाद रोकी नहीं जा सकती। इस पर प्वाईंट आफ आर्डर नहीं लिया जा सकता। इस बीच सदन में शोरगुल होने लगा। गर्भगृह में खड़े विपक्ष के सदस्य नारेबाजी करने लगे। जिस पर सदन की कार्यवाही एक बार फिर दस मिनिट के लिए स्थगित कर दी गई। सदन के फिर समवेत होने पर अध्यक्ष ने सदस्यों से अनुरोध किया कि वे सदन को सुचारू रूप से चलाने में सहयोग करें। इस बीच नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने आसंदी की ओर इशारा करते हुए कहा कि आपका निर्वाचन असत्य है, असंवैधानिक है, अनियमित है। उन्होंने नारा लगाया अध्यक्ष जी इस्तीफा दो। इस बीच कई अन्य सदस्य भी अपने स्थान से खड़े होकर नारेबाजी करते सुने गए। शोरगुल बढ़ते देख अध्यक्ष ने सदन की कार्यवाही फिर से दस मिनिट के लिए स्थगित करने की घोषणा कर दी। लगभग साढ़े बारह बजे जब सदन एक बार फिर समवेत हुआ तो अध्यक्ष श्री प्रजापति ने कहा कि मेरा सदन के सभी सम्मानीय सदस्यों के प्रति सम्मान का भाव है। नियम प्रक्रियाओं के पालन में हमें कई बार कठिन फैसले भी लेने होते हैं। सदन के सभी वरिष्ठ सदस्य हमारे लिए आदरणीय हैं। इस बीच सत्ता पक्ष के केपीसिंह अपने स्थान पर खड़े हो गए और कहने लगे कि अध्यक्ष को अपने फैसले पर सफाई नहीं देनी चाहिए। अध्यक्ष ने कहा कि मैंने उपाध्यक्ष के निर्वाचन की कार्यवाही निर्वाचन की प्रक्रिया के अनुसार की है। मैं विपक्ष के सदस्यों के लिए सौंपता हूं कि वे इस पर फिर विचार करें। उन्होंने सदन की कार्यवाही आगे बढ़ाते हुए विधि और विधायी मंत्री पीसी शर्मा को मध्यप्रदेश माल और सेवा कर संशोधन अध्यादेश को सदन के पटल पर रखने की अनुमति प्रदान की।शोरशराबे के ही बीच पत्रों के पटल पर रखे जाने की प्रक्रिया भी चलती रही। इसी दौरान वित्तमंत्री तरुण भनोत ने भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के प्रतिवेदन भी सदन के पटल पर रखे।शासकीय विधि विषयक कार्यों से संबंधित विधेयक वाणिज्यिक कर मंत्री बृजेन्द्र सिंह राठौर ने प्रस्तुत किया और पुरःस्थापन की अनुमति प्राप्त की। इस बीच नवनिर्वाचित विधानसभा उपाध्यक्ष सुश्री हिना लिखीराम कांवरे ने राज्यपाल के अभिभाषण पर कृतज्ञता ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मंदसौर में किसानों को कर्जमाफी का जो वादा किया था कांग्रेस की कमलनाथ सरकार ने सत्ता संभालते ही कर्जमाफी की घोषणा कर दी है।इस बीच भी सदन में शोरगुल चलता रहा और कई बातें नहीं सुनी जा सकीं। इस बीच विजयलक्ष्मी साधो ने कहा कि जब सदन की सम्मानीय महिला सदस्य बोल रहीं हैं तब भी विपक्ष के सदस्य शोर मचा रहे हैं इससे साफ जाहिर हो जाता है कि महिलाओं के प्रति उनका क्या रवैया है। कांवरे ने कहा कि पिछली सरकार के बीच विधायिका और कार्यपालिका के बीच दूरियां बनी हुईं थीं। प्रशासनिक तौरतरीकों में काफी बदलाव किए जाने की जरूरत है। भाजपा के कई सदस्य बगैर अनुमति के बीच में बोलते रहे। भाजपा के दिनेश राय मुनमुन ने कहा कि कमलनाथ जी ने प्रदेश के युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता देने की घोषणा की है। ऐसे में युवाओं को आगे बढ़कर अन्य प्रदेशों के युवाओं को रोजगार से बाहर कर देना चाहिए। धन्यवाद प्रस्ताव के संबंध में सेवढ़ा विधायक घनश्याम सिंह ने सरकार ने अपने अधिकतर चुनावी वायदे पूरे कर दिए हैं। इस तरह से ये तेज काम करने वाली सरकार है। इस बीच उज्जैन के मोहन यादव अपने स्थान पर खड़े होकर सरकार के विरोध में भाषण करने लगे। उन्होंने कहा कि सदन में लोकतंत्र का अपमान किया जा रहा है। इस बीच आसंदी से द्वितीय अनुपूरक मांगों पर मतदान कराने की अनुमति प्रदान की। वित्तमंत्री तरुण भनोत ने इकत्तीस मार्च को समाप्त होने जा रहे वित्तीय वर्ष के लिए राज्य की संचित निधि में से प्रस्तावित खर्च के लिए बाईस हजार दो सौ सड़सठ करोड़, उनत्तीस लाख पांच हजार छह सौ रुपए की अनुपूरक राशि देने का अनुरोध किया जिसे सत्ता पक्ष ने विपक्षी शोरगुल के बीच पारित कर दिया। संसदीय कार्यमंत्री डाक्टर गोविंद सिंह ने कहा कि सदन से सभी कार्य पूरे हो चुके हैं इसलिए सदन को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया जाए। इस पर अध्यक्ष ने सहमति प्रदान की और सदन को अनिश्चित काल के लिए स्थगित करने की घोषणा की।

  • बीज से वृक्ष बन गया भोपाल उत्सव मेलाःराज्यपाल श्रीमती आनंदी बेन पटेल

    बीज से वृक्ष बन गया भोपाल उत्सव मेलाःराज्यपाल श्रीमती आनंदी बेन पटेल

    भोपाल,8 जनवरी(करुणा राजुरकर)।राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने भोपाल उत्सव मेला का शुभारंभ करते हुए कहा कि मध्यप्रदेश में मेरे पिछले एक साल के कार्यकाल में पहली बार मैं किसी मेले में आई हूं।यहां आकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। उन्होंने कहा कि मेला शब्द मेल से बना है और जहाँ बहुत से स्त्री-पुरुष, बच्चे इकट्ठे होकर आनंदित हो, अपनी मन-पसंद चीजें देखें और खरीदें इससे अच्छा क्या हो सकता है। हमारे देश में पहले मेले धार्मिक स्थानों पर ही लगते थे। पर अब उसका स्वरूप बदला है। मेले धार्मिक उद्देश्यों के साथ-साथ आर्थिक-सामाजिक और सांस्कृतिक उद्देश्यों से लगने लगे हैं। इन सबके अलावा आजकल पुस्तक मेलों का आयोजन भी हो रहा है और इन पुस्तक मेलों से प्रबुद्ध वर्ग को बहुत फायदा हुआ है। दिल्ली में लगने वाला विश्व पुस्तक मेला ने विदेशी पाठकों के बीच अपना स्थान बनाया है। इस अवसर पर जनसम्पर्क मंत्री श्री पी.सी. शर्मा विशेष रूप से उपस्थित थे।

    मेला समिति के अध्यक्ष श्री मनमोहन अग्रवाल ने राज्यपाल का स्वागत करते हुए कहा कि भोपाल मेले को शुरू करने में भास्कर समूह के संस्थापक स्वर्गीय श्री रमेश चंद्र अग्रवाल का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। मेला 27 वर्षों से निरतंर चल रहा है। वर्ष 1991 में सिर्फ 60 स्टाल शुरू होकर आज विशाल आकार लेता जा रहा है। अब यहाँ लगभग 600 स्टाल लगते हैं। यहाँ भोपाल ही नहीं अब तो आस पास के गाँवों और शहरों के लोग बड़ी संख्या में इस मेले में घूमने के लिए आते हैं।

    मेला समिति के महामंत्री श्री संतोष अग्रवाल ने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह मेला भोपाल शहर की पहचान बन गया है। यहाँ मनोरंजन के साथ-साथ नि:शुल्क हेल्थ हेल्थ कैम्प भी लगाया गया है। यहाँ नारायण सेवा संस्थान, उदयपुर के सहयोग से नि:शक्तजनों के लिए कृत्रिम अंगों का वितरण होगा। एलोपैथी के डॉक्टरों द्वारा नाक, कान, गला, केंसर आदि की जाँच होगी। दंत परीक्षण, शुगर की जाँच के अलावा नेत्र परीक्षण कर नि:शुल्क चश्मों का वितरण किया जायेगा।

  • गोपाल लीला की स्वीकार्यता

    गोपाल लीला की स्वीकार्यता

    पंडित गोपाल भार्गव की लीलाओं का जादू पिछले पैंतीस सालों से रहली गढ़ाकोटा क्षेत्र की जनता के सिर चढ़कर बोलता रहा है। जब प्रदेश में कांग्रेस की सरकारें हुआ करतीं थीं तब भी इलाके के लोग अपने गोपाल को विधानसभा भेजते थे। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने इस तिलिस्म को तोड़ने के लिए अपने अठारह मंत्रियों की भीड़ गढ़ाकोटा ले जाकर सम्मेलन किया था। उनका मानना था कि जनता के बीच वे गोपाल भार्गव की लोकप्रियता को कुचल देंगे। प्रदर्शन करते गोपाल भार्गव को पुलिस ने गिरफ्तार करके जनता को डराने की कोशिश भी की,लेकिन इसके बावजूद गोपाल भार्गव चुनाव जीते। विधानसभा में उन्होंने बीड़ी मजदूरों की बेबसी और उन्हें बीमे का लाभ दिलाने की आवाज उठाई जिसे दिग्विजय सिंह सरकार ने स्वीकार किया। तबसे गोपाल भार्गव और दिग्विजय सिंह के बीच सदाशयता के संबंध विकसित हुए जो आज तक बरकरार हैं।भाजपा की ओर से राजनाथ सिंह ने एक बार फिर उन्हें नेता प्रतिपक्ष घोषित करके संवाद का ऐसा पुख्ता पुल तैयार कर दिया है जो प्रदेश के विकास के लिए सोने में सुहागा साबित होने जा रहा है।उनके नेता प्रतिपक्ष के रूप में भाजपा सकारात्मक प्रतिरोध का नया अध्याय लिखने जा रही है।गोपाल भार्गव को ये जवाबदारी तब मिली है जब वे राजनैतिक परिपक्वता के शिखर पर पहुंच गए हैं।लंबे समय से सरकार में कैबिनेट मंत्री रहते हुए उन्होंने राजनीति को करीब से देखा समझा है।सत्ता पक्ष के कई वरिष्ठ मंत्री भी जब भाजपा के सत्ता से बाहर जाते समय उनका बंगला खाली होने का इंतजार कर रहे थे तब भार्गव ने ये कहते हुए टाल दिया कि अभी इंतजार करिए।जाहिर था कि वे पार्टी और कांग्रेस दोनों के ही नेताओं को आश्वस्त कर चुके थे कि अब उनकी बारी है। उमा भारती की सरकार में भी गोपाल भार्गव की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है। जब स्वर्गीय प्रमोद महाजन ने सारे विरोध को दरकिनार करते हुए शिवराज जी को मध्यप्रदेश की सत्ता की बागडोर पकड़ा दी थी तब गोपाल भार्गव या कैलाश विजयवर्गीय जैसे दिग्गज नेता यदि विद्रोह को हवा देते तो शिवराज को सत्तासीन नहीं किया जा सकता था। पार्टी के प्रति अनुशासन का वो शीर्ष दौर था जब सभी ने शिवराज जी को नेता के रूप में स्वीकार किया और चौदह सालों तक बखूबी साथ दिया। शिवराज जी को मुख्यमंत्री बनाए रखने वाली उद्योगपतियों,अफसरों और ठेकेदारों की जिस लाबी ने भाजपा के बधियाकरण की मुहिम चलाई उसी ने इस बार नखदंत विहीन भाजपा को सत्ता से बाहर खड़ा करवा दिया। शिवराज जी के कार्यकाल में जमीन से कटे दूसरी पंक्ति के जिन नेताओं को सत्ता के करीब ला खड़ा किया गया वे समय आने पर असरहीन साबित हुए।कई के तो चुनाव सामने देखकर हाथ पैर फूल गए थे। उनमें से कई ऐसे भी थे जो चुनाव के वक्त शिवराज का साथ छोड़कर दूर खड़े थे। पार्टी संगठन का ढांचा इस कदर तोड़ दिया गया था कि संगठन की आवाज बेअसर साबित हुई और मैदान में खड़े विद्रोही भाजपा की हार की बड़ी वजह बने।अब ऐसे वक्त गोपाल भार्गव को सदन में पार्टी का नेतृत्व करने का अवसर मिला है। हार से हताश भाजपा के विधायकों को अब भी भरोसा नहीं हो रहा कि वे सत्ता से बाहर किए जा चुके हैं,वो भी उस कांग्रेस के हाथों जो मैदान से नदारद थी। नेता प्रतिपक्ष की दौड़ में शिवराज सिंह चौहान की ओर से पूर्व मंत्री राजेन्द्र शुक्ल का नाम उठाया गया था। तर्क दिए जा रहे थे कि विंध्य क्षेत्र में भाजपा का प्रदर्शन अच्छा रहा है इसलिए उन्हें नेता प्रतिपक्ष के रूप में अवसर दिया जाना चाहिए। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की पसंद के रूप में पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा का नाम भी लिया जा रहा था। सवर्ण समाज के नाम पर उन्हें नेता प्रतिपक्ष के रूप में प्रचारित भी किया गया। उनके विरोध में कहा गया कि वे बमुश्किल चुनाव जीते हैं जबकि जनसंपर्क महकमा उनके पास था। पार्टी के भीतर संगठन के कई वरिष्ठ कार्यकर्ता भी नरोत्तम के खिलाफ थे। उन्होंने प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे और राजनाथ सिंह तक अपनी नापसंदगी की बात पहुंचाई। अमित शाह का कथित करीबी होने के कारण कोई खुलकर नहीं बोल रहा था। इसलिए जवाबदारी राजनाथ जी को सौंप दी गई। राजनाथ सिंह ने रायशुमारी के आधार पर अमित शाह के सामने गोपाल भार्गव का नाम रखा जिसे उन्होंने तत्काल अपनी मंजूरी दे दी। इसके साथ ही मध्य प्रदेश में रहली विधानसभा क्षेत्र से आठवीं बार विधायक बने पंडित गोपाल भार्गव विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष घोषित कर दिए गए। सोमवार को भारतीय जनता पार्टी के विधायक दल की बैठक में भार्गव को नेता चुना गया। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने गोपाल भार्गव को विधायक दल का नेता चुने जाने का प्रस्ताव रखा, जिसका पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने समर्थन किया। इसके बाद केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भार्गव को निर्विरोध रूप से भाजपा विधायक दल का नेता निर्वाचित किए जाने का एलान किया। जाहिर है कि गोपाल भार्गव आज की भाजपा के सर्वमान्य नेता के रूप में सामने आए हैं। शिवराज गुट के पतन के बाद भाजपा हाईकमान राज्य भाजपा को ऩए सिरे से संगठित होते देखना चाहता है। गोपाल भार्गव इस काम में निपुण हैं। विधानसभा में भाजपा अपने 109 विधायकों के साथ मजबूत स्थिति में है। जाहिर है कि बरसों बाद प्रदेश को एक मजबूत विपक्ष मिला है। गोपाल भार्गव कभी पाखंडी राजनीति के पक्षधर नहीं रहे हैं। जाहिर है कि उनके नेतृत्व वाला विधायक दल भी सकारात्मक और ठोस राजनीति का पैरवीकोर रहेगा। ऐसा पहली बार ही होगा जब इतना सशक्त और सकारात्मक विपक्ष प्रदेश को मिला है जो राज्य में नई राजनीति की इबारत लिखेगा।

  • विज्ञान के क्षेत्र में अध्ययन, अध्यापन और शोध की जरूरत: राज्यपाल श्रीमती पटेल

    विज्ञान के क्षेत्र में अध्ययन, अध्यापन और शोध की जरूरत: राज्यपाल श्रीमती पटेल

    माडर्न इंटरनेशनल स्कूल में राज्य-स्तरीय विद्यार्थी विज्ञान मंथन शिविर शुरू

    भोपाल,6 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने कहा है कि भारत में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। प्राचीन भारत विज्ञान और प्रौद्योगिकी दुनिया में सबसे आगे था। मगर हमने पेटेंट नहीं कराया क्योंकि उस समय पेटेंट नहीं होता था। जीरो से लेकर नौ तक की गिनती की खोज भारत में हुई, जिसका कोई पेटेंट नहीं है। भारतीय उप महाद्वीप में प्राचीन काल में पुष्पक विमान हुआ करते थे, जिसका परिष्कृत रूप आधुनिक युग का हेलीकॉप्टर है। महाभारत के संजय की दिव्य-दृष्टि भी दुनिया में अद्वितीय थी। भारत का इतिहास पाँच हजार साल पुराना है। इसकी सभ्यता, संस्कृति और विज्ञान खोज भी पाँच हजार साल से चली आ रही है। श्रीमती पटेल ने यह बातें राज्य स्तरीय विद्यार्थी विज्ञान मंथन शिविर के शुभारंभ के अवसर पर इंदौर के मॉडर्न इंटरनेशनल स्कूल में कही।

    बच्चों को गर्भ से ही अच्छे संस्कार जरूरी

    राज्यपाल श्रीमती पटेल ने कहा कि महाभारत में अभिमन्यु की कथा यह बताती है कि बच्चा गर्भ से ही सीखाना शुरू कर देता है। आधुनिक युग में गर्भवती माताओं को ऐसे काम करना चाहिये, जिससे गर्भ में पल रहे बच्चे को अच्छे संस्कार मिले। गर्भ में पल रहे बच्चे को पौष्टिक आहार, योगा, ध्यान, गीत-संगीत और विज्ञान की शिक्षा परोक्ष रूप से मिलती रहे। गर्भवती माता को अपने गर्भ में पल रहे बच्चे को अच्छा संस्कार देने के लिये स्वाध्याय करना जरूरी है।

    श्रीमती पटेल ने कहा कि भारत के वैज्ञानिकों ने खोज की है कि पेड़-पौधों में भी जीव होते हैं। मनुष्य के शरीर के रक्त-संचार की भाँति पौधों में भी नियमित रस-संचार होता रहता है। शांति, सुकून और गीत- संगीत का उन पर भी सकारात्मक असर होता है।

    विद्यार्थियों को मेडिकल शिक्षा जरूरी

    राज्यपाल श्रीमती पटेल ने कहा कि विद्याथियों को खेल-खेल में शिक्षा देना जरूरी है। उन पर दबाव और तनाव नहीं होना चाहिये। उन्होंने कहा कि हमारे देश मे चिकित्सकों की बहुत कमी है, जिस कमी को पूरा करने के लिये विद्याथियों को मेडिकल शिक्षा दी जाये। अच्छे डॉक्टर और वैज्ञानिक बनने के लिये विद्यार्थियों को विज्ञान की शिक्षा देना जरूरी है। विज्ञान विषय में धन अधिक खर्च होता है और मेहनत भी अधिक होती है। विज्ञान हमें अच्छे-बुरे, उचित-अनुचित और सही-गलत की शिक्षा देता है। हम अध्यात्म, संस्कृति और परम्परा को विज्ञान की कसौटी पर कस सकते हैं।

    डॉ. एस.पी. सिंह ने कहा कि विज्ञान भारती संस्थान के देश में एक लाख 40 हजार सदस्य हैं। इसकी स्थापना 1981 में बैंगलुरु में की गई। संस्थान का उदे्दश्य विज्ञान को बढ़ावा देना है।

    भारत में ज्ञान-विज्ञान की प्राचीन परम्परा

    डॉ. अनिल कोठारी ने विद्याथियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि भारत में ज्ञान-विज्ञान और खोज की प्राचीनतम परम्परा रही है। विश्व स्तर के मेघनाथ साहा, विक्रम साराभाई, एस. चंद्रशेखर, सी.वी. रमन आदि वैज्ञानिक भारत में हुए हैं। सम्मेलन का उदे्दश्य विज्ञान के विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करना है।

    डॉ. प्रदीप शर्मा ने कहा कि भारत दुनिया के प्राचीन देशों में से एक है। प्राचीन काल से यह विज्ञान, कला, संगीत और संस्कृति के क्षेत्र में समृद्ध रहा है। कार्यक्रम में डॉ. राजीव दीक्षित, श्री अनिल कारिया, श्री अनिल रावत, श्री संतोष पटेल, श्री अनिल खरे, श्री सुनील जोशी सहित गणमान्य नागरिक और बड़ी संख्या में विद्यार्थी मौजूद थे। संचालन श्रीमती अनुपमा मोदी ने किया।

  • प्रशासनिक बदलाव की धुरी बनेंगे डॉ.गोविंद सिंह

    प्रशासनिक बदलाव की धुरी बनेंगे डॉ.गोविंद सिंह

    कांग्रेस में समाजवादी पृष्ठभूमि का परचम लेकर चलने वाले डाक्टर गोविंद सिंह को मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सामान्य प्रशासन विभाग की जिम्मेदारी भी सौंप दी है।कमलनाथ के इस फैसले के कई अर्थ निकाले जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि कांग्रेस की अल्पमत वाली सरकार कई दबावों और तनावों के बीच झूल रही है। सत्ता के चार बड़े केन्द्र कांग्रेस सरकार के फैसलों को फुटबाल बना रहे हैं। आगामी विधानसभा के सत्र में ये खींचतान सरकार के लिए भारी पड़ सकती है। डाक्टर गोविंद सिंह ने तो पहले शपथ लेने से ही इंकार कर दिया था बाद में जीएडी विभाग लेने पर अड़ गए जिससे लगता है कि सरकार कई धड़ों में बंट गई है।

    हालांकि जो लोग डाक्टर गोविंद सिंह को जानते हैं वे समझते हैं कि लगातार जनता की पैरवी करने वाले डाक्टर साहब ने कभी ओछे दांव नहीं खेले हैं। वे जनहित के मुद्दों पर कई बार अपनी ही सरकार को घेरते रहे हैं। दिग्विजय सिंह सरकार में वे जनता के मुद्दों पर अपनी ही सरकार को खरीखोटी सुनाते रहे हैं।ऐसे में सामान्य प्रशासन विभाग लेने की उनकी जिद के क्या मायने हो सकते हैं। सामान्य प्रशासन विभाग सरकार का प्रमुख विभाग है। इसमें राजभवन सचिवालय,मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग,लोक आयुक्त एवं उप लोक आयुक्त,राज्य निर्वाचन आयुक्त का कार्यालय,मुख्य तकनीकी परीक्षक (सतर्कता),राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो,मध्यप्रदेश मानव अधिकार आयोग, आर.सी.वी.पी.नरोन्हा प्रशासन अकादमी मध्यप्रदेश,मध्यप्रदेश भवन,राज्य सत्कार अधिकारी का कार्यालय,विभागीय जांच आयुक्त कार्यालय,मध्यप्रदेश राज्य सूचना आयोग,अधिनियमों के अधीन गठित मंडल तथा निगम,मध्‍यप्रदेश सिविल सेवा सर्विसेस खेल मण्डल, विभाग के अधीन आने वाली सेवा का नाम,भारतीय प्रशासनिक सेवा,राज्य प्रशासनिक सेवा,मध्यप्रदेश मंत्रालयीन सेवा,राजभवन, मध्यप्रदेश प्रशासनिक अधिकरण, लोक सेवा आयोग, लोक आयुक्त एवं उप लोक आयुक्त, मुख्य तकनीकी परीक्षक, राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो, प्रशासन अकादमी और राज्य निर्वाचन आयोग के कार्यालयों से संबंधित सेवा विषय,आरक्षण प्रकोष्ठ,मानव अधिकार प्रकोष्ठ,पेंशन प्रकोष्ठ,पंच-ज प्रकोष्ठ,स्‍थानान्‍तर प्रकोष्ठ,सूचना का अधिकार प्रकोष्ठ,सुशासन प्रकोष्‍ठ,मुख्‍य सचिव कार्यालय,सत्‍कार कार्यालय जैसी महत्वपूर्ण जवाबदारी होती है।

    डाक्टर गोविंद सिंह को शुरुआती विभाग आबंटन में सहकारिता और संसदीय कार्य विभाग दिए गए थे। वे पहले भी सहकारिता और गृह विभाग संभाल चुके हैं। सहकारिता आंदोलन कांग्रेस की राजनैतिक शैली का प्रमुख औजार रहा है। हालांकि ये भी सच है कि सहकारिता आंदोलन को धराशायी करने में कांग्रेस के कुछ नेताओं ने बड़ी भूमिका निभाई। सहकारिता की आड़ में पनपे माफिया ने इस आंदोलन को शोषण का माध्यम बना दिया जो आगे चलकर जन आक्रोश की वजह बना।आज जब देश पूंजीवाद की राह पर चल रहा है तब सहकारिता के क्षेत्र को आज के संदर्भों में नए सिरे से परिभाषित करने की जरूरत है। ये काम ही अपने आप में इतना विस्तृत है कि इसे संभालने वाला व्यक्ति कोई दूसरा कार्य नहीं कर सकता। ऐसे में डाक्टर साहब को जीएडी जैसा बड़ा विभाग संभालने की जिद क्यों करनी पड़ी।

    इस मुद्दे की तहकीकात करते हुए कई नई बातें सामने आ रहीं हैं। ये तथ्य गौर करने लायक है कि डाक्टर गोविंद सिंह पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के करीबी माने जाते हैं। दिग्विजय सिंह सरकार की असफलता की एक बड़ी वजह उसका पंचायती राज लागू करने का फैसला भी माना जाता रहा है। पंचायती राज के नाम पर दिग्विजय सिंह की सरकार ने सरकारी तंत्र के समानांतर ऐसा ढांचा खड़ा कर दिया था जो निहायत गैर जिम्मेदार था और सरकारी खजाने पर बोझा साबित हुआ था। असामाजिक तत्वों और माफिया ताकतों ने तब कार्यपालिका का लगभग अपहरण कर लिया था। हालात इतने विपरीत हो गए थे कि नौकरशाही ने सरकार से असहयोग शुरु कर दिया और जिसकी परिणति दिग्गी सरकार के पतन के रूप में सामने आई थी। दिग्विजय सिंह सार्वजनिक मंचों पर सरकारी तंत्र को लताड़ते देखे जाते थे। आईएएस अफसर हों या आईपीएस अफसर सभी दिग्विजय सिंह के आक्रोश का शिकार बने। राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसरों की तो कोई बिसात ही नहीं थी। दिग्विजयसिंह की कई बातें तथ्यों पर आधारित भी थीं लेकिन नेता की मंशा को भांपकर कांग्रेसियों ने नौकरशाही को जिस तरह लताड़ना शुरु कर दिया वो असंतोष की बड़ी वजह बना था।

    इस बार डाक्टर गोविंद सिंह ने जिस जिद के साथ सामान्य प्रशासन विभाग की कमान हथियाई है उसके पीछे दिग्विजय सिंह से उनका तालमेल ही प्रमुख वजह माना जा रहा है। प्रशासनिक हलकों में कहा जा रहा है कि डाक्टर गोविंद सिंह के माध्यम से खुद दिग्विजय सिंह अपनी आधी अधूरी मंशा को लागू करना चाहते हैं। पिछले कार्यकाल में वे नौकरशाही पर लगाम लगाने का जो काम पूरा नहीं कर सके थे वो कमलनाथ मंत्रिमंडल में डॉ.गोविंद सिंह के माध्यम से करना चाहते हैं। जाहिर है कि खुद कमलनाथ भी इसी सोच के पक्षधर साबित होंगे। शपथ ग्रहण के बाद कार्यभार संभालने मंत्रालय पहुंचे मुख्यमंत्री ने पहली पत्रकार वार्ता में नौकरशाही पर निशाना साधा था। उनका कहना था कि आज के दौर का नौजवान लालफीताशाही को झेलने तैयार नहीं है। अफसरों को अपना सोच बदलना होगा। कार्यपालिका की जो जवाबदारी है उन कार्यों के लिए यदि कोई नागरिक शिकायत लेकर उनके पास आया तो वे बर्दाश्त नहीं करेंगे।

    भाजपा सरकार के पतन की वजह भी नौकरशाही को ही माना जा रहा है। भाजपा के कार्यकर्ताओं की हमेशा से शिकायत रही है कि अफसर उनकी बात नहीं सुनते। प्रशासनिक सुधारों को लेकर भाजपा ने तमाम चिंतन,मनन और बैठकें की हैं। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अफसरों को शासन व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग मानते थे। इसके बावजूद नौकरशाही के बीच सरकारी खजाने को लूटने की खुली होड़ पनपी वो शिवराज सिंह सरकार की कलंकित प्रशासनिक शैली की वजह बन गई थी। शिवराज सिंह सरकार के अंतिम चार सालों में जनधन खाते और केन्द्र के प्रयासों से योजनाओं का लाभ सीधे हितग्राहियों के खाते में पहुंचाने की व्यवस्था भी हुई लेकिन तब तक प्रशासनिक व्यवस्था इतनी बेलगाम हो चुकी थी कि जन आक्रोश से भाजपा का जनाधार प्रभावित भी हुआ।

    कांग्रेस की अल्पमत वाली कमलनाथ सरकार के सामने असरकारी उपस्थिति दिखाने के लिए बहुत कम समय है। लोकसभा चुनाव सिर पर खड़ा है। कांग्रेस ने चुनाव में वक्त है बदलाव का नारा दिया था। जनता ने उसी बदलाव की आस में उसे सरकार में भेजा है। ऐसे में यदि कार्यपालिका ने असहयोग शुरु कर दिया तो सरकार को लेने के देने पड़ सकते हैं। जाहिर है कि सरकार कार्यपालिका से सीधा टकराव लेने की स्थिति में नहीं है। इसके विपरीत यदि सरकार जनता को जीत का अहसास कराना चाहती है तो उसे नौकरशाही के चंगुल में फंसे पड़े प्रदेश को मुक्त कराना होगा। ये काम सामान्य प्रशासन विभाग को कसे बगैर संभव नहीं होगा। इस विभाग के ज्यादातर फैसले सरकार और मंत्रिपरिषद की जद में होते हैं। जाहिर है कि डाक्टर गोविंद सिंह पर बड़ी जवाबदारी होगी कि वे किस तरह कांग्रेस के सुधारों को लागू करें और अफसरशाही के बीच विद्रोह का भाव भी न पनपने दें। दूध के जले दिग्विजय सिंह के अरमानों की छाछ को फूंक फूंक कर कैसे पिएं। कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के बीच जो विशाल कार्यपालिका का बोझ कांग्रेस की सरकारें लादती रहीं हैं भाजपा ने भी उसमें थोडी़ बहुत वृद्धि ही की है।

    जाहिर है कि कांग्रेस की मौजूदा सरकार के सामने चुनौती है कि वो जनता को अनुत्पादक कार्यपालिका के बोझ से राहत कैसे दिलाए। सरकार ने सत्ता में आते ही पुलिस कर्मियों को एक दिन की छुट्टी का फैसला लागू कर दिया है। ऐसे में उसे आठ हजार पुलिस वालों को तत्काल नौकरी देने की मजबूरी का सामना करना पड़ेगा। पंद्रह सालों से सत्ता से बाहर रहे कांग्रेसी भी सरकार पर दबाव बना रहे हैं कि वो उनके चहेतों को सरकारी नौकरियां दे। जाहिर है कि चाहते हुए भी कांग्रेस की मौजूदा सरकार कार्यपालिका को सुधारने का कोई बड़ा अभियान नहीं चला पाएगी। ऐसे में डाक्टर गोविंद सिंह ने सामान्य प्रशासन विभाग लेकर कार्यपालिका के चक्रव्यूह में घुसने का फैसला तो कर लिया है लेकिन वे इसे कैसे भेदेंगे ये आने वाले समय में ही देखने मिलेगा।