Month: August 2018

  • अदालतों में भ्रष्टाचार का अंत

    अदालतों में भ्रष्टाचार का अंत

    भोपाल जिला बार एसोसिएशन ने जिले के लोगों को स्वाधीनता दिवस की बड़ी सौगात दी है। उसने घोषणा की है कि आज से जिले की अदालतों में भ्रष्टाचार नहीं होगा। किसी भी प्रकार के गैरकानूनी लेनदेन की शिकायत यदि मिलती है तो बार एसोसिएशन उस आपराधिक कृत्य करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में शिकायत दर्ज कराएगा। जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेश व्यास राज्य की एडवोकेट एनरोलमेंट कमेटी के अध्यक्ष भी हैं। जबलपुर हाईकोर्ट के दायरे में चलने वाली ये संस्था संवैधानिक दर्जा प्राप्त है। इस लिहाज से राजेश व्यास की राय प्रदेश की समूची न्यायपालिका की आत्मा की आवाज मानी जा सकती है। खुद राजेश व्यास कहते हैं कि उनकी ये राय एक दिन में नहीं बनी है। वे लंबे समय से प्रदेश भर के पीठासीन जजों, बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों,सदस्यों,वरिष्ठ अधिवक्ताओं, न्यायिक कर्मचारी संघों के पदाधिकारियों, कर्मचारियों, वरिष्ठ और कनिष्ठ अधिवक्ताओं, कोर्ट मुंशियों, थाने के मुंशियों ,चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों से चर्चा करते रहे हैं। सभी इस घृणित परंपरा को पसंद नहीं करते हैं। इसके बावजूद बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे। इस मुद्दे पर कोई बोलने की पहल नहीं करता है। इसलिए अदालतों की गरिमा रोज खंडित होती रहती है और न्याय देने दिलाने का काम आम जनता से दूर होता जाता है।

    राजेश व्यास कहते हैं कि ये बात सही है कि मंहगाई के इस दौर में किसी अनजान पक्ष के लिए न्याय दिलाने की लंबी जद्दोजहद बहुत खर्चीली होती है। यदि भ्रष्टाचार का सामना न भी करना पड़े तब भी पक्षकार को दर दर की ठोकरें खाना पड़ती हैं। ऐसे में लोग अदालत की चौखट चढ़ने को भी अपने पूर्व कर्मों का पाप मानने लगते हैं। यही वजह है कि सभी के बीच संवाद के दौरान उनके मन में भ्रष्टाचार मुक्त अदालतों का विचार आया। उनका कहना है कि लोगों के बीच से न्यायपालिका को लेकर बना संशय दूर होने से समूची न्यायप्रक्रिया से जुड़े लोगों को सिर ऊंचा करके चलने का अवसर मिलेगा।

    वे कहते हैं कि जिस तरह अदालतों का कामकाज तेजी से कंप्यूटरीकृत होता जा रहा है ऐसे माहौल में किसी पक्षकार का काम केवल इसलिए टरकाया जाए कि उससे रिश्वत वसूलनी है तो ये बड़ा गंभीर अपराध है। देश भर की अदालतों में जब लंबित प्रकरणों को निपटाने की तेजी अपनाई जा रही है ऐसे माहौल में वकीलों का काम सरल बनाने के लिए जरूरी है कि समूचा कामकाज पारदर्शी बनाया जाए। अब जबकि नोटबंदी के बाद लेनदेन का काम भी लोग मोबाईल एप से करने लगे हैं तब वकीलों की भागदौड़ घटाने के लिए भी जरूरी है कि न्याय प्रक्रिया को सरल बनाया जाए।
    राजेश व्यास ने झंडावंदन के बाद अध्यक्षीय उद्बोधन में जब ये बात कही तो वकीलों ने इसका भरपूर स्वागत किया। जिला एवं सत्र न्यायाधीश शैलेन्द्र शुक्ला ने भी उनकी बात का समर्थन करके इस राय पर अपना निर्णय सुना दिया। उन्होंने कहा कि ये सराहनीय पहल है और पूरी न्यायपालिका की ओर से वे इस फैसले का स्वागत करते हैं। ये राय इस संवैधानिक स्तंभ से जुड़े लोगों के बीच व्यापक विमर्श से निकली है इसलिए अदालतों में इसे लागू कराने के लिए कोई सख्ती की भी जरूरत नहीं पड़ेगी।

    राजेश व्यास ने कहा कि लोगों को सस्ता त्वरित और सुलभ न्याय दिलाना आज इसलिए भी जरूरी हो गया है कि देश विकास के एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है। यदि हम लोगों को कानूनी पचड़ों में ही उलझाए रहेंगे तो पड़ौसी देशों या विश्व के देशों से विकास के पैमाने पर कभी मुकाबला नहीं कर पाएंगे। उनका मानना है कि लोगों को सुलभ न्याय मिले और वकीलों को उन्हें न्याय दिलाने के लिए अनावश्यक परेशान न होने पड़े इसे देखते हुए ही उन्होंने ये निर्णय लिया कि इस नैतिक गंदगी का पुरजोर विरोध किया जाए।

    वरिष्ठ अधिवक्ता सी.एस. शर्मा कहते हैं कि इस फैसले से न्यायपालिका की गरिमा बढ़ेगी। अदालतों और जनता के बीच करीबी बढ़ने से ज्यादा लोग अदालतों के माध्यम से अपने फैसले करवा सकेंगे।जिस तरह पारिवारिक मामले अदालतों में अधिक आने लगे हैं उन्हें देखते हुए अदालतों को लोगों की मित्र बनाना जरूरी है। अदालत का कामकाज सुगम हो तो ज्यादा लोग अदालतों के माध्यम से कानून का राज कायम कर सकेंगे। विकास की गति तेज करने की दिशा में ये कदम मील का पत्थर साबित होगा। उनका कहना है कि इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए।

    एडवोकेट श्रीमती सुनीता राजपूत ने कहा कि अदालत की चौखटों पर पहुंचने वाले आम नागरिकों के हितों की रक्षा में ये नई परिपाटी ऐतिहासिक साबित होगी। उन्होंने कहा कि न्याय प्रक्रिया का लाभ आम नागरिकों तक पहुंचाने में वकीलों की बड़ी भूमिका होती है। अदालतों में बढ़ने वाले अनावश्यक खर्चों से डरकर बहुत से लोग न्याय से वंचित रह जाते हैं। अब जब अदालतों का कामकाज जनता के ज्यादा करीब होगा तो इससे ज्यादा लोग अदालत पहुंचेंगे और न्यायपालिका की गरिमा बढ़ेगी।

  • सत्ता की चाभी बनता आदिवासी मुख्यमंत्री का वादा

    सत्ता की चाभी बनता आदिवासी मुख्यमंत्री का वादा

    मध्यप्रदेश का चुनावी रण नित नए समीकरणों और संभावनाओं का साक्षी बनने लगा है। हर दिन वोट की घेरेबंदी नई नई कहानियों को जन्म दे रही है और सत्ता का परचम फहराने वाले योद्धा अपनी लामबंदी करने में जुट गए हैं। सियासी घोड़े दौड़ाने वाले सत्ताधीशों की राह में इस बार फिर आदिवासी मुख्यमंत्री का दावा नई चुनौती के रूप में उभर रहा है। आदिवासियों के संगठन जायस और मांझियों की पार्टी राष्ट्रीय महान गणतंत्र पार्टी के गठजोड़ ने सत्तारूढ़ भाजपा और प्रतिपक्ष में बैठी कांग्रेस दोनों की ही नींदें उड़ा दीं हैं। सत्ता के लिए वोटों की मारकाट के बीच जायस के राष्ट्रीय संरक्षक डाक्टर हीरालाल अलावा और मछुआरों के नेता आनंद निषाद एक चुनौती के रूप में उभर रहे हैं। सरकार से मान्यता प्राप्त आदिवासी वर्ग और पिछड़ों के बीच धकेल दिए गए मांझियों के बीच पनपी केमिस्ट्री ने सत्ता का खेल बिगाड़ने की तैयारी कर ली है। इन्हें लगता है कि वे अपने विशाल जनाधार को समेटकर कर्नाटक की तरह तीसरी शक्ति के रूप में उभरेंगे जो अंततः सत्ता में भागीदारी के लिए आदिवासी मुख्यमंत्री की अभिलाषा को पूरा करेगी।

    दरअसल आदिवासी वोट बैंक की कल्पना उस वादे के कारण उपजी थी जिसके अनुसार देश के बजट का साढ़े सात प्रतिशत हिस्सा मूल निवासी आदिवासियों पर खर्च किए जाने का प्रावधान किया गया था। आजादी के बाद से आदिवासी विकास के नाम पर अंधाधुंध बजट खर्च किया जाता रहा। कांग्रेस की सरकारों ने इस बजट का दोहन भी किया और आदिवासियों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल भी किया। संविधान की अनुसूची 29 में दर्ज आदिवासियों को विशेष दर्जा दिया गया है जिसके चलते इस वर्ग को आरक्षण का लाभ दिया जाता है। मांझी उपजाति भी इसी कोटे से आरक्षण का लाभ लेती रही है। पूर्ववर्ती दिग्विजय सिंह की कांग्रेसी सरकार ने पहली बार आदिवासी वोट बैंक को कमजोर करने के लिए कीर, भोई, निषाद, मल्लाह, उपजातियों को इस सूची से हटाकर पिछड़ा वर्ग की अनुसूची 12 में निकाल बाहर किया था। इसके लिए बाकायदा प्यारेलाल कंवर समिति बनाई गई। उसकी सिफारिशों को कैबिनेट से पारित करवाया गया। इसे विधानसभा में भी भेजा गया और 147 विधायकों की सहमति से पारित करवाया गया। बाद में जब उमा भारती के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी तब इसे अनुसूचित जन जाति की पात्रता से बाहर करने का आदेश जारी भी हो गया। दरअसल दिग्विजय सिंह के करीबी तनवंत सिंह कीर खुद पंधाना की रिजर्व सीट से चुनकर आते थे। उनका मानना था कि फूट डालने की इस नीति से आदिवासी मुख्यमंत्री का दबाव हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा। इसके लिए प्यारेलाल कंवर समिति ने पूजन विधि को आधार बनाया। उसका कहना था कि मांझी समाज हिंदू देवी देवताओं को पूजते हैं इसलिए इन्हें आदिवासी होने का लाभ नहीं दिया जा सकता। यही वजह है कि आरक्षण और बेरोजगारी के मुद्दे पर इस बार आदिवासी मुख्यमंत्री का वादा परवान चढ़ रहा है। हाल ही में हुई आदिवासियों की रैलियों ने भी जनता के स्वरों को अभिव्यक्ति दी है।

    राष्ट्रीय महान गणतंत्र पार्टी ने पिछले कुछ उपचुनावों में अपने मह्त्व को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया था। मुंगावली में चुनाव प्रभारी अरविंद भदौरिया को मांझी वोट के बिफरने की सूचना थी। इसके बावजूद उन्होंने अपने क्षत्रिय नेटवर्क पर भरोसा किया। नतीजतन भाजपा का प्रत्याशी वहां मात्र दो हजार मतों के अंतर से पराजित हो गया। जबकि राष्ट्रीय महान गणतंत्र पार्टी को 5400 मत प्राप्त हुए थे जो निश्चित रूप से भाजपा के मतों में सेंध थी। कोलारस में महान गणतंत्र पार्टी की चुनौती को कांग्रेस के रणनीतिकारों ने समय रहते पहचान लिया और खुद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने प्रयास करके मांझियों के टिकिट पर चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी को अपने पक्ष में चुनाव से बाहर करवा लिया। चित्रकूट में कांग्रेस के नीलांशु चतुर्वेदी ने राष्ट्रीय महान गणतंत्र पार्टी के प्रत्याशी प्रमोद कुशवाहा का पर्चा रद्द करवा लिया और अपनी जीत सुनिश्चित कर ली। इस बार आदिवासियों के नेता बनकर उभरे डाक्टर हीरालाल अलावा ने दिग्गी के षड़यंत्र को विफल करने के लिए निषादों से हाथ मिला लिया है। वे उन्हें अनुसूचित जन जाति में शामिल कराने का वादा कर रहे हैं। इसके एवज में वे उन तीस सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने की तैयारी कर रहे हैं जिन पर आदिवासी वोट निर्णायक रहते हैं। अभी उनमें से चौबीस सीटें भाजपा ने जीत रखीं हैं। आठ कांग्रेस और एक निर्दलीय के पास में है।

    आदिवासी सीटों को कांग्रेस से छीनने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े वनवासी परिषद और उसके अनुषांगिक संगठनों ने बड़ी भूमिका निभाई थी। उन्होंने बरसों तक वनवासियों के कल्याण की गतिविधियां चलाईं।नतीजतन पूरा आदिवासी इलाका भगवा हो गया था। भाजपा के आदिवासी नेता नेतृत्व की अभिलाषाओं पर खरे नहीं उतरे और भाजपा ने आदिवासियों के लिए चलते आ रहे विशेष दर्जे को लगभग सामान्य में बदल दिया। इसके चलते आदिवासियों के बीच नेतृत्व को लेकर खालीपन सा महसूस किया जाने लगा था। इस बीच उन्हें डाक्टर हीरालाल अलावा के रूप में एक युवा नेतृत्व मिल गया जिसने दोनों बड़े राजनीतिक समीकरणों के बीच सेंध लगाने की तैयारी कर ली है। उनके संगठन जायस के आव्हान पर मंदसौर, मनावर, बड़वाह, बड़वानी, राजपुर, कसरावद, खरगोन, खलगांव जैसे आदिवासी बहुल इलाकों में दर्जन भर सभाएं आयोजित की गईं जिसमें आदिवासियों ने बढ़ चढ़कर भागीदारी दर्ज कराई है।

    आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग इस कदर सिर चढ़कर बोल रही है कि भाजपा की रंजना बघेल ने भी बयान जारी करके अपने संगठन को चेताया कि लगभग बीस सीटों का गणित बिगड़ सकता है। वे मनावर से विधायक हैं और उन्हें ये मुद्दा सत्ता में आगे बढ़ने की सीढ़ी नजर आ रहा है। कांग्रेस के बाला बच्चन ने भी आदिवासियों के लामबंद होते जाने को खतरे की घंटी बताया है। कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ विभिन्न राजनैतिक दलों को भाजपा के विरुद्ध लामबंद करने की रणनीति पर चल रहे हैं इसलिए उन्हें ये हलचल गंभीर नजर नहीं आ रही है। जबकि उनके सहयोगी के रूप में उभर रहे दलित नेताओं की जमीन खिसक चुकी है और वे कांग्रेस के लिए अधिक उपयोगी साबित नहीं हो पा रहे हैं। उनमें बसपा की मायावती के साथ फूल सिंह बरैया जैसे नेता भी शामिल हैं।

    आदिवासियों के बीच नाराजगी की वजह कई ऐतिहासिक घटनाओं के कारण उपजी है। उनका कहना है कि जब शिवभानु सिंह सोलंकी का मुख्यमंत्री बनना तय था तब अर्जुनसिंह ने दिल्ली दरबार में कोर्निश बजाकर सत्ता का अपहरण कर लिया। इसके बाद शिवभानु सिंह सोलंकी को सर्किट हाऊस में बंद करके उनके गुर्गों ने भारी मारपीट की। जब इसी पिटाई कांड के बाद सोलंकी ने अस्पताल में मिलने गए अर्जुनसिंह को उनके बेटे का ध्यान रखने का निवेदन किया तो उन्होंने बेटे अरविंद नेताम को सांसद के रूप में सत्ता में शामिल होने का अवसर दिया। इसके बाद उनका भी पत्ता काट दिया गया। भाजपा के आदिवासी नेता फग्गन सिंह कुलस्ते सांसद निधि के उपयोग तक ही सिमटकर रह गए। आदिवासियों की जमीनों पर सवर्णों के कब्जे हो गए और जंगलों, खनिजों के दोहन में भी आदिवासियों को उनका हक कथित तौर पर नहीं दिया गया।

    अब जबकि चुनावी दंगल में तेजी आती जा रही है तब आरक्षण, बेरोजगारी और आदिवासी मुख्यमंत्री की आवाज को जनसमर्थन बढ़ता जा रहा है। जाहिर है कि ये आवाज भाजपा के सत्ता संधान अभियान में सेंध लगाने का सबब बन सकती है। कांग्रेस को अपने अवसान की चिंता सता रही है। ऐसे में देखना होगा कि दोनों राजनीतिक दलों के दिग्गज क्या फार्मूला निकालते हैं जो मध्यप्रदेश को कर्नाटक बनने से रोक सके। (प्रेस सूचना केन्द्र)

  • निजीकरण न किया तो फिर पूंजी खा जाएंगे बैंक

    निजीकरण न किया तो फिर पूंजी खा जाएंगे बैंक

    बैंक इस समय चारों तरफ से घिरे हुए हैं। देश की अर्थव्यवस्था का इंजन सेवा क्षेत्र हो गया है जिसे लोन की जरूरत कम है। बड़े उद्योग सीधे बॉड के माध्यम से पूंजी उठा रहे हैं
    डॉ. भरत झुनझुनवाला

    बैंक इस समय चारों तरफ से घिरे हुए हैं। देश की अर्थव्यवस्था का इंजन सेवा क्षेत्र हो गया है जिसे लोन की जरूरत कम है। बड़े उद्योग सीधे बॉड के माध्यम से पूंजी उठा रहे हैं। छोटे उद्योग पस्त है और इनकी लोन लेने की क्षमता ही नहीं रह गई है।

    विकास दर में गिरावट आने से खपत के लिए कम ही लोन दिए जा रहे हैं। ऊपर से सार्वजनिक बैंकों में कुप्रबंधन एवं भ्रष्टाचार व्याप्त है। इस स्थिति में सरकार को दो कदम उठाने चाहिए। छोटी मैनुफैक्चरिंग एवं सेवा क्षेत्र को ईकाइयों को संरक्षण देना चाहिए।

    मेक इन इंडिया को छोटे उद्योगों की तरफ मोडऩा चाहिए। साथ-साथ सार्वजनिक बैंकों का निजीकरण कर देना चाहिए। इनका डूबना निश्चित है। डूबे इसके पहले इनकी बिक्री कर देना चाहिए जैसे चतुर दुकानदार एक्सपायरी के पहले दवा को बेच देता है।

    सर्वविदित है कि सरकारी बैंकों की हालत खस्ता है। इन्हें पुनजीर्वित करने को सरकार छोटे सार्वजनिक बैंकों का बड़े सार्वजनिक बैंकों के साथ विलय करने पर विचार कर रही है। बड़े बैंकों की कार्यकुशलता अच्छी होने से इनके द्वारा छोटे बैंकों को पुनजीर्वित किया जा सकता है। लेकिन बड़े बैंकों के सामने स्वयं खतरा मंडरा रहा है। वास्तव में देश के बैंकिंग सेक्टर का मूल चरित्र ही बदलता जा रहा है।

    इकानॉमिक ग्रोथ में अब क्रेडिट की भूमिका ही सिकुड़ती जा रही है। वर्ष 2015 में हमारे सम्पूर्ण बैंकिंग सेक्टर द्वारा दिए गए लोन में 10.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। वर्ष 2016 में यह वृद्धि घट कर 5.1 प्रतिशत रह गई है। यानी कुल लोन बढ़ रहे हैं परन्तु बढ़त की गति कम होती जा रही है जैसे कार का एक्सलरेटर हल्का होता जा रहा है। इस स्थिति में स्वाभाविक है कि कमजोर बैंक दबाव में शीघ्र आएंगे जैसे अकाल के समय छोटे किसान पहले प्रभावित होते हैं।

    लोन की मांग कम होने का प्रमुख कारण है कि अर्थव्यवस्था का इंजन सेवा क्षेत्र हो गया है। इस क्षेत्र में साफ्टवेयर, होटल, ट्रांसपोर्ट, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि सेवाएं आती हैं जिनमें किसी भातैक माल जैसे कपड़े अथवा सब्जी का उत्पादन नहीं होता है।

    बीते 5 वर्षों में सेवा क्षेत्र में 51 प्रतिशत की ग्रोथ हुई जबकि मैन्युफैक्चरिंग में 32 प्रतिशत की। ऐतिहासिक तौर पर देखा जाए तो सेवा क्षेत्र का दबदबा बढ़ता जा रहा है। सेवाओं के व्यापार में लोन की जरूरत कम पड़ती है।

    जैसे साफ्टवेयर के निर्माण में 25,000 रुपए के एक कम्प्यूटर से वर्ष में 10-20 लाख रुपए के साफ्टवेयर का उत्पादन किया जा सकता है। अथवा एक कम्प्यूटर से वर्ष में लगभग 3-4 लाख रुपए के आनलाइन ट्यूशन दिए जा सकते हैं।

    तुलना में मैनुफैक्चरिंग में जमीन, फैक्ट्री शेड तथा मशीन में भारी निवेश की जरूरत पड़ती है। इसलिए मैनुफैक्चरिंग सेक्टर के फिसलने के साथ-साथ लोन की मांग कम होती जा रही है। हमारी बैंकिंग व्यवस्था के दबाव में आने का यह प्रमुख कारण दिखता है।

    दूसरा कारण बॉड मार्केट का विस्तार है कंपनियों द्वारा वर्तमान में भारी मात्रा में बॉड जारी किए जा रहे हैं। बॉड जारी करने को कंपनी द्वारा अपनी प्रापर्टी को रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी में गिरवी रखा जाता है।

    गिरवी रखी गई प्रापर्टी के सामने कंपनी द्वारा फुटकर निवेशकों को बॉड जारी किए जाते हैं। किसी विशेष स्थिति में कंपनी अगर डूब गई तो सरकार द्वारा गिरवी प्रापर्टी की नीलामी करके निवेशक को उनकी रकम लौटाने की व्यवस्था रहती है। इससे खुदरा निवेशक सुरक्षित महसूस करते हैं और बॉड खरीदते हैं। इस प्रक्रिया में कंपनी द्वारा ब्याज की सम्पूर्ण रकम निवेशक को मिलती है।

    बैंकों के माध्यम से लोन लेने में भी मूल रूप से यही प्रक्रिया अपनाई जाती है। कंपनी द्वारा अपनी प्रापर्टी को बैंक के पास गिरवी रख दिया जाता है। इस प्रापर्टी के सामने बैंक लोन देता है। कंपनी को लोन देने के लिए बैंक द्वारा खुदरा निवेशकों से फिक्स डिपाजिट में रकम ली जाती है। लोन देने वाले खुदरा निवेशक तथा लोन लेने वाली कंपनी के बीच बैंक बिचौलिए की भूमिका निभाता है।

    जैसे बैंक द्वारा 7 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से खुदरा निवेशक से रकम ली जाती है और 12 प्रतिशत की दर से उसी रकम से कंपनी को लोन दिया जाता है। बॉड तथा बैंक दोनों ही तरह से खुदरा निवेशक द्वारा ही निवेश की गई रकम को कंपनी तक पहुंचाया जाता है। बीते समय में बॉड के मार्केट का विकास हो जाने के कारण कंपनियां बॉड के माध्यम से सीधे खुदरा निवेशक से लोन ज्यादा ले रही हैं।

    कंपनी 10 प्रतिशत की दर से बॉड जारी करती है तो खुदरा निवेशक को 10 प्रतिशत का ब्याज मिलता है। बैंक को कमीशन नहीं मिलता है। बैंकों का धंधा मंद पड़ गया है। बीते 4 वर्षों में कुल लोन में बैंकों का हिस्सा 45 प्रतिशत से घट कर 22 प्रतिशत रह गया है जबकि बॉड का हिस्सा 22 प्रतिशत से बढ़कर 33 प्रतिशत हो गया है। वर्तमान समय में बैंकों के खस्ता हाल होने का यह दूसरा कारण है।

    हमारे सार्वजनिक बैंकों की मूल समस्या प्रबन्धन आदि की नहीं है। मूलरूप से बैंकों की जमीन ही खिसक गई है। सार्वजनिक बैंकों में इसके अतिरिक्त कुप्रबन्धन एवं भ्रष्टाचार की भी समस्या है। छोटे सार्वजनिक बैंकों का बड़े सार्वजनिक बैंकों के विलय से छोटे बैंकों में व्याप्त कुप्रबन्धन की समस्या का कुछ निदान हो सकता है। परन्तु बैंकों की जमीन के खिसकने से उत्पन्न मूल समस्या का समाधान विलय से हासिल नहीं हो सकता है।

    बॉड जारी करने की प्रक्रिया पेचीदी होती है। इसे बड़ी कंपनियों द्वारा ही अपनाया जा सकता है। खुदरा निवेशकों में भरोसा बनाने के लिए भारी एडवर्टाइज़मेंट देने होते हैं एवं रोड शो करने होते हैं। इसलिए छोटी कंपनियों को बैंकों पर ही निर्भर रहना होता है। लेकिन बीते समय में सरकार द्वारा लागू की गई नीतियों ने छोटे उद्योगों को पस्त कर दिया है।

    सरकार का प्रयास है कि मेक इन इंडिया जैसी योजनाओं के तहत बड़े, आधुनिक एवं आटोमेटिक मशीनों का उपयोग करने वाले उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए। फलस्वरूप छोटे उद्योगों को मिल रहा संरक्षण कम हो गया है।

    इसके बाद नोटबंदी के कारण इनके ग्राहक लुप्त हो गए। अब जीएसटी की जटिल व्यवस्था इनके लिए अभिशाप बन गई है। इस कारण छोटे उद्योगों द्वारा लोन कम ही लिए जा रहे हैं। बड़े उद्योग बॉड मार्केट के चलते बैंकों के हाथ से फिसल गए हैं।

    छोटे उद्योग स्वयं मृतप्राय हो रहे हैं। अत: सेवा एवं मैनुफैक्चरिंग दोनों क्षेत्रों में बैंकों का धंधा कमजोर पड़ रहा है। बचता है खपत का क्षेत्र जैसे कार अथवा मकान के लिए दिए गए लोन। यह क्षेत्र अभी भी जीवित हैं। परन्तु देश की आर्थिक विकास दर में गिरावट आने के कारण आम आदमी की क्रय शक्ति घट रही है और यह क्षेत्र भी दबाव में है।

    बैंक इस समय चारों तरफ से घिरे हुए हैं। देश की अर्थव्यवस्था का इंजन सेवा क्षेत्र हो गया है जिसे लोन की जरूरत कम है। बड़े उद्योग सीधे बॉड के माध्यम से पूंजी उठा रहे हैं। छोटे उद्योग पस्त है और इनकी लोन लेने की क्षमता ही नहीं रह गई है।

    विकास दर में गिरावट आने से खपत के लिए कम ही लोन दिए जा रहे हैं। ऊपर से सार्वजनिक बैंकों में कुप्रबंधन एवं भ्रष्टाचार व्याप्त है। इस स्थिति में सरकार को दो कदम उठाने चाहिए। छोटी मैनुफैक्चरिंग एवं सेवा क्षेत्र को ईकाइयों को संरक्षण देना चाहिए।

    मेक इन इंडिया को छोटे उद्योगों की तरफ मोडऩा चाहिए। साथ-साथ सार्वजनिक बैंकों का निजीकरण कर देना चाहिए। इनका डूबना निश्चित है। डूबे इसके पहले इनकी बिक्री कर देना चाहिए जैसे चतुर दुकानदार एक्सपायरी के पहले दवा को बेच देता है।